विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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विज्ञानभैरव : १६१ 'ध्यान' पद से कही जाती है । इसका अभिप्राय यह है कि वेद्य अथवा अवेद्य विषयों की उप- स्थिति में भी समाधि के अभ्यास के कारण पवन रहित स्थान में स्थापित दीपक के समान जो स्थिर निर्विकार बुद्धि होती है, उसी को इस शास्त्र में 'ध्यान' के नाम से जाना जाता है । भगवान् के साकार रूप की कल्पना कर उसके मुंह, आँख आदि अंगों में अपने चित्त को स्थिर करना यहां ध्यान नहीं कहा जाता । ध्यान की यह कल्पना तो स्थूल दृष्टि वाले पशु-शास्त्रों की उपज है ॥१४३॥ १पूजा नाम न पुष्पाद्यैर्या मतिः क्रियते दृढा । निर्विकल्पे परे १व्योम्नि सा पूजा ह्यादराल्लयः ॥१४४॥ नाम इति प्रसिद्धेऽर्थे । प्रसिद्धमेतद् यदत्र शास्त्रे पुष्पाद्यैः पूजा न निष्पाद्यते, अपि तु निर्विकल्पे परे व्योम्नि महाव्योमनि परचिदाकाशे, या दृढा मतिः क्रियते, आदरात् श्रद्धाप्रकर्षात्, यो लयो विश्रान्तिः संपाद्यते, सैव तत्त्वतः पूजा ॥१४४॥ इस शास्त्र में यह बात प्रसिद्ध है कि यहाँ पुष्प, २धूप, गन्ध आदि बाह्य उपकरणों से पूजा नहीं की जाती, किन्तु निर्विकल्पक महाकाश अर्थात् परचिदाकाश, बोधभैरव के प्रति दृढ़ आस्था ही पूजा कहलाती है कि इस बोधभैरव से ही यह सारा संसार व्याप्त है । अतः आदर और श्रद्धा पूर्वक उक्त धारणाओं में से किसी एक धारणा का निरन्तर अभ्यास करते हुए उस बोधभैरव में, स्वात्मस्वरूप में विश्रान्ति प्राप्त कर लेना, लीन हो जाना ही परमार्थतः पूजा कहलाती है । जैसा कि संकेतपद्धति के निम्न श्लोक में भी बताया गया है— ३न पूजा बाह्यपुष्पादिद्रव्यैर्या प्रथिताऽनिशम् । स्वे महिम्न्यद्वये धाम्नि सा पूजा या परा स्थितिः ।। योगिनीहृदय ( ३।२-३ ) में पूजा के तीन भेद बताये गये हैं और परा पूजा का यह लक्षण किया गया है कि सभी जागतिक पदार्थों में अद्वय दृष्टि ही, उन सबकी परम महिमामय स्वात्म- स्वरूप में परम प्रतिष्ठा ही वस्तुतः परा पूजा है । तन्त्रालोक में पूजा का लक्षण इस प्रकार दिया गया है— १. महा°-ने० त० शि० स्त० ।
- तन्त्रा० वि० ( भा० १, आ० १, पृ० ५१; भा० ३, आ० ४, पृ १२४ ), स्तवचिन्ता- मणिटीका (पृ० १२० ) और नेत्रतन्त्रोद्योत ( भाग २, पृ० ९ ) में यह श्लोक मिलता है । शिवस्तोत्रावलीव्याख्या ( पृ० २११ ) पर चतुर्थ पाद और ( पृ० ३७३ ) पर उत्तरार्ध मात्र मिलता है ।
- धूप, गन्ध, दीप, नैवेद्य प्रभृति की आध्यात्मिक व्याख्या के लिये ऋजुविमर्शिनी ( पृ० १३४ ) देखनी चाहिये ।
- संकेतपद्धति का यह श्लोक ऋजुविमर्शिनी ( पृ० ८९ ) योगिनीहृदयदीपिका (पृ० १९१) प्रभृति ग्रन्थों में उद्धृत है । ११
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१६२ : विज्ञानभैरव पूजा नाम विभिन्नस्य भावौघस्यापि संगतिः । स्वतन्त्रविमलानन्तभैरवीयचिदात्मना ॥ (४।१२१) अर्थात् रूप, रस आदि विभिन्न भाव पदार्थों की देश, काल आदि से अपरिच्छिन्न, निरुपाधिक, स्वतन्त्र, स्वच्छ, भैरवाकार परसंवित् से, अर्थात् बोधभैरव से अभेद रूप में प्रतिष्ठा ही पूजा कही जाती है। भट्ट उत्पल ने अपनी शिवस्तोत्रावली में पूजाविधि का वर्णन इस प्रकार किया है— ध्यानायासतिरस्कारसिद्धस्त्वत्स्पर्शोत्सवः । पूजाविधिरिति ख्यातो भक्तानां स सदाऽस्तु मे ॥ (१७।४) अर्थात् उच्चार, करण, ध्यान प्रभृति प्रयत्नसाध्य आणव प्रभृति उपायों के सहारे से संपन्न होने वाली विविध बाह्य विधियों को छोड़कर अनुपाय प्रक्रिया से सहज विधि से सम्पन्न होने वाला स्वात्मस्वरूप बोधभैरव का साक्षात्कार ही भक्त जनों की वास्तविक पूजा-विधि है। इसीलिये भट्ट नारायण ने— मलतैलाक्तसंसारवासनावर्तिदाहिना । ज्ञानदीपेन देव त्वां कदा नु स्यामुपस्थितः ॥ (श्लो० ११३) स्तवचिन्तामणि के इस श्लोक में भगवान् से प्रार्थना की है कि हे भगवन्, मैं पुष्प आदि से तो नित्य ही आपकी पूजा करता हूँ, किन्तु आप मेरे लिये वह स्थिति उपस्थित कीजिये कि जिससे मैं आपके सामने उस ज्ञानरूपी दीपक को लेकर उपस्थित हो सकूं, जो कि मल से, अज्ञानरूपी तैल से सिंचित वासना रूपी बत्ती को, धर्म-अधर्म प्रभृति जागतिक परम्परा को आगे बढ़ाने वाले समस्त संस्कारों को जला देने वाला है। इन सब वचनों का संक्षिप्त अभिप्राय यही है कि भेद बुद्धि को छोड़कर अद्वय स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होना ही वास्तविक पूजा है, पुष्प आदि से की गई पूजा तो एक प्रकार का विकल्प व्यापार ही है ॥१४४॥ ¹अत्रैकतमयुक्तिस्थे योत्पद्येत दिनाद्दिनम् । ²भरिताकारता सात्र तृप्तिरत्यन्तपूर्णता ॥१४५॥ अत्र प्रोक्तधारणासु एकतमयुक्तिस्थे सिद्धसमाधानदार्ढ्ये योगिनि, एकस्यां कस्याञ्चिद् युक्तौ धारणायामवस्थिते योगिनि इति यावत्, दिनाद्दिनम् उत्तरोत्तरम् भरिताकारता निर्विकल्पसमाधिरसस्वादाद् या पूर्णस्वात्मस्वरूपोपलब्धिरूपाऽत्यन्तपूर्णता उत्पद्येत, सा अत्र शास्त्रे तृप्तिरिति कथ्यते ॥१४५॥ ऊपर बताई गई ११२ धारणाओं में से किसी एक युक्ति (धारणा) में दृढ़ता पूर्वक एकाग्र समाधि का अभ्यास करने वाले योगी के चित्त में दिन-प्रतिदिन उत्तरोत्तर निर्विकल्प समाधि के रस के आस्वाद के बढ़ते रहने से सर्वज्ञ व्याप्त भैरव स्वरूप की, पूर्ण स्वात्मस्वरूप १. °रि°-शि० ।
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ३४) में यह श्लोक उद्धृत है। २. भरिताकारता = भरितावस्था की विवेचना श्लोक ७१ की व्याख्या में देखनी चाहिये। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : १६३ की उपलब्धि जब परिपूर्ण हो जाती है, अर्थात् जब स्वात्मस्वरूप बोधभैरव का साक्षात्कार स्पष्ट हो जाता है, तो इसी अत्यन्त परिपूर्ण स्थिति का नाम तृप्ति है ॥१४५॥ १महाशून्यलये वह्नौ भूताक्षविषयादिकम् । हूयते मनसा २सार्धं ३स होमैश्चेतनास्रुचा ॥१४६॥ महाशून्यस्य शून्यातिशून्यपदस्य आ समन्तात् लयो यत्र तस्मिन् परतत्त्वात्मनि शून्यातिशून्यरूपे परभैरवस्वरूपे वह्नौ भूताक्षविषयादिकं भूतेन्द्रियविषयभुवनतत्त्वादि- रूपं सकलं जगत् संकल्पविकल्पात्मकम्, तद्विभागकल्पनाहेतुना मनसा सह, चेतना विश्वानुसन्धात्री शक्तिरेव स्रुक् तया चेतनास्रुचा यद् हूयते सोऽत्र शास्त्रे वस्तुतो होमो हविरित्युच्यते ॥१४६॥ महाशून्य अर्थात् २शून्यातिशून्य पदवी (महामाया शक्ति) का चारों तरफ से जिस परतत्त्वात्मक परभैरव स्वरूप वह्नि में विलयन हो जाता है, अर्थात् जहां पहुँच कर शून्याति- शून्य पदवी की भी कोई पृथक् सत्ता नहीं रहने पाती, उस बोधभैरव रूप अग्नि में पंच महा- भूत, इन्द्रिय गण, अनेक विषय, भुवन-तत्त्व आदि संकल्प-विकल्पात्मक सकल जगत् की इन विभागों की कल्पना में प्रधान सहायक मन के साथ आहुति दे देना ही वास्तविक होम या हवि कहलाता है। यज्ञीय होम में घृत आदि की आहुति स्रुवा नाम के लकड़ी के बने पात्र से दी जाती है, उसी तरह से उक्त पदार्थों की यह अद्भुत हवि भी चिति नामक पात्र में रखकर दी जाती है। यह चिति ही सारे विश्व का अनुसन्धान करने वाली चेतना नाम की शक्ति है। इस चेतना में ही समस्त जागतिक पदार्थों को रखकर उनको बोधभैरव रूप अग्नि में लीन कर दिया जाता है, जिससे कि शुद्ध स्वात्मस्वरूप बच रहता है। अद्वय नय के अनुसार यही वास्त- विक होम है, जिससे कि शुद्ध अद्वय तत्त्व के अतिरिक्त सब कुछ भस्म हो जाता है। स्वच्छन्द- तन्त्र में इस होम का निम्न प्रकार से वर्णन किया गया है— एवं हृदम्बुजावस्थो यष्टव्यो भैरवो विभुः । सबाह्याभ्यन्तरं कृत्वा पश्चाद्यजनमारभेत् ॥ (२।१५४) योगिनीहृदयदीपिका (पृ० २६४) में भी इसी अभिप्राय के दो श्लोक उद्धृत हैं— धर्माधर्महविर्दीप्ते आत्माग्नौ मनसा स्रुचा । सुषुम्णावर्त्मना नित्यमक्षवृत्तीर्जुहोम्यहम् ॥ नैदानैस्तर्पणैः सम्यग् विशुद्धैरमृतात्मभिः । मदहन्तां करोमीदं विश्वं हव्यपुरस्सरम् ॥ १. °दि°—ख० । २. साकं—शि० । ३. °मः स्रुक्च चेतना—ख० शि० ।
- महार्थ० परि० (पृ० १२७), स्वच्छन्द० (भा० १, प० २, पृ० ८७), शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ३३), योगिनी० दीपिका (पृ० २६४) में यह मिलता है।
- शून्यातिशून्य प्रभृति शब्दों की व्याख्या पृ० ४३-४४ की टिप्पणी में की जा चुकी है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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१६४ : विज्ञानभैरव इनमें से पहला श्लोक ज्ञानार्णवतन्त्र (२१।२९) और द्वितीय शुभगोदयावासना (श्लो० ३९) में उपलब्ध है। इसी लिए शिव सूत्र (२।८) में इस पांचभौतिक शरीर को हवि बताया गया है। भगवद्गीता में भी— सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ यहाँ ज्ञान से जलाई गई योगाग्नि में सभी बाह्य विषयों की आहुति देने की बात बताई गई है। महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १२७) में भी इस विषय का वर्णन मिलता है ॥१४६॥ यागोऽत्र परमेशानि तुष्टिरानन्दलक्षणा । क्षपणात् सर्वपापानां१ त्राणात् सर्वस्य पार्वति ॥१४७॥ रुद्रशक्तिसमावेशस्तत्क्षेत्रं भावना परा । अन्यथा तस्य तत्त्वस्य का पूजा कश्च तृप्यति ॥१४८॥ हे परमेशानि, उक्तसमाधानोत्था आनन्दलक्षणा तुष्टिरेवात्र यागो देवयजनम् । हे पार्वति, रुद्रप्रमातॄणां पतिरूपाणां या शक्तिरनाश्रिताख्या, तस्यां पशुप्रमातुस्तन्मयी- भवनमेव क्षेत्रम् । हेतुरूपेण क्षेत्रपदं निर्वक्ति—सर्वेषां सर्वविधानां पाशानां क्षपणात्, सर्वस्य प्राणिजातस्य च भवभयत्राणादिति । अर्थादस्मिन् शास्त्रे सर्वविधपाशक्षपणकरः सर्वविधभवभयमोचकश्च १रुद्रशक्तिसमावेशोऽनाश्रितशिवशक्त्यावेश एव क्षेत्रपदेनाभि- धीयते, न च पुनः कुरुक्षेत्रधर्मक्षेत्रादिगमनादि । एतत्सर्वं जप-ध्यान-पूजा-२तर्पण-होम- याग-क्षेत्रादिकं पराया देव्या भावनात्मकमेव विज्ञेयम् । यतो हि अद्वैतसतत्त्वस्य तस्य अन्यथा प्रकारान्तरेण का पूजा कश्च तृप्यति ? पूजनतर्पणादिकं कर्म ततो व्यतिरिक्तं न संभवतीति भावः ॥१४७-१४८॥ हे परमेश्वरि, इस शास्त्र में उक्त समाधि अवस्था में अनुभूयमान आनन्दजन्य सन्तुष्टि ही याग, अर्थात् देवयजन कहा जाता है। इसी प्रकार हे पार्वति, पशुरूपी प्रमाता को जब पूर्व उपदिष्ट किसी उत्कृष्ट भावना के माध्यम से पति रूपी रुद्र प्रमाता (अनाश्रित शिव) १. ॰शानां-ख० ।
- भट्ट आनन्द ने रुद्रशक्तिसमावेश का अर्थ 'रुद्र अर्थात् शिव की सर्वज्ञता प्रभृति छः शक्तियों का प्रादुर्भाव' किया है। शिव के सर्वज्ञता प्रभृतिः छः गुणों का विवेचन पृ० ८ की १ संख्या की टिप्पणी में देखना चाहिये ।
- 'तर्पण' शब्द की दो तरह की व्याख्या की जाती है । एक के अनुसार पूजा देवताओं की तथा तर्पण पितरों के निमित्त किया जाता है। दूसरी व्याख्या के अनुसार कुल, क्रम आदि शास्त्रों में प्रदर्शित तथा प्रस्तुत शास्त्र में भी 'जग्धिपान' (श्लो० ७१) प्रभृति श्लोकों में वर्णित विधि को तर्पण कहते हैं । इससे प्राप्त उल्लास दशा को तृप्ति कहा जाता है ।
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विज्ञानभैरव : १६५ की शक्ति में समावेश अर्थात् तन्मयता प्राप्त हो जाती है, तो इस तन्मयीभाव को ही यहाँ 'क्षेत्र' कहा जाता है। इस भैरव शास्त्र में अद्वय दृष्टि की प्रधानता के कारण कुरुक्षेत्र प्रभृति द्वैत दृष्टि के पोषक तीर्थ स्थानों को क्षेत्र नहीं माना जाता। निर्वचन पद्धति से क्षेत्र वह कह- लाता है, जो सभी तरह के पाशों को नष्ट करने वाला हो और समस्त प्राणियों की इस संसार रूपी भय से रक्षा कर सकता हो। अनाश्रित शिव में समाविष्ट हो जाने पर ही पशु प्रमाता सभी पाशों से मुक्त हो सकता है और इस संसार रूपी महाभय से त्राण पा सकता है। अतः 'क्षेत्र' पद से अनाश्रित शिव-शक्ति में पशु प्रमाता की स्थिति का ही बोध होगा, कुरुक्षेत्र प्रभृति तीर्थ स्थानों का नहीं, क्योंकि उनमें निवास करने वाला तो द्वैत स्थिति में ही पड़ा रह जाता है। इस प्रकार देवी के द्वारा किये गये जप, ध्यान, पूजा, तर्पण, होम, याग, क्षेत्र विषयक प्रश्नों का अद्वय नय के अनुसार समाधान प्रस्तुत कर भगवान् भैरव कहते हैं कि परम तत्त्व परमार्थतः अद्वय है, एक ही है। ऊपर बताई गई भावनात्मक पद्धति के सिवाय दूसरी कोई विधि नहीं है, जिसके अनुसार कि जप, पूजा आदि कर्मकाण्ड सम्पन्न हो सकें। पूजन, तर्पण आदि कर्म भी तो उस अद्वय तत्त्व से भिन्न नहीं है। ऐसी अवस्था में किससे किसकी पूजा की जायगी और कौन किससे तृप्त होगा ? पूज्यपूजकभाव और तर्प्यतर्पकभाव द्वैत दृष्टि में ही सम्भव हो सकता है, अतः इस अद्वय नय में भावना के सिवाय इनकी कोई पृथक् सत्ता नहीं है ॥१४७-१४८॥ स्वतन्त्रानन्दचिन्मात्रसारः स्वात्मा हि सर्वतः । आवेशनं तत्स्वरूपे स्वात्मनः स्नानमीरितम् ॥१४९॥ हि यतः, स्वात्मा सर्वतः स्वतन्त्रानन्दचिन्मात्रसारः, अतस्तस्मिन् स्वात्मस्वरूपे स्वात्मन आवेशनमेव स्नानमीरितम् । निगदितधारणाभ्यासेनाद्वैतस्वात्मस्वरूपस्य स्वतन्त्रानन्दचिन्मात्रसारतयाऽनुभवात् तत्स्वरूपे लयभावनैव मुख्यं स्नानमित्यर्थः ॥१४९॥ "यागक्षेत्रादि किं कथम्" (श्लो० १४१) इस श्लोक में आये आदि पद से स्नान का ग्रहण किया गया है। सदाचार में स्नान का प्रमुख स्थान है, अतः अद्वय नय के अनुसार प्रस्तुत श्लोक में स्नान की व्याख्या की गई है। ऊपर जिन धारणाओं का वर्णन किया गया है, उनमें से किसी एक के अभ्यास से अद्वय स्वभाव आत्मा के सब तरह से स्वतन्त्र, आनन्द, चिन्मात्र- स्वरूप का साक्षात्कार होने पर उसी में समाविष्ट हो जाने की स्थिति को ही यहाँ स्नान कहा जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि स्वात्मस्वरूप वस्तुतः स्वतन्त्र है। इसका यह स्वरूप आनन्द और ज्ञानमय है। अपने इस स्वाभाविक स्वरूप में उक्त धारणाओं के अभ्यास से साधक लीन हो जाता है। जैसे स्नान करने के लिये नदी, जलाशय आदि के जल में डुबकी लगाई जाती है, उसी तरह से इस आन्तर स्नान में भी साधक स्वात्मस्वरूप में डुबकी लगाता है। उसकी यह लीनावस्था ही अद्वय शास्त्र में स्नान के नाम से कही जाती है ॥१४९॥
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१६६ : विज्ञानभैरव १यैरेव पूज्यते द्रव्यैस्तर्प्यते वा परापरः१ । यश्चैव पूजकः सर्वः स एवैकः क्व पूजनम् ॥१५०॥ परापर इति परादेव्या सहितः परः परमेश्वरो भैरवः, यैरेव द्रव्यैः कुसुमादिभिः पूज्यते, क्षीरखण्डादिभिर्वा तर्प्यते, यश्चैव पूजकः सर्वः एकः स एव पूज्यपूजोपकरण- पूजकादिकः सर्व एष भेदस्तस्यैकस्य स्वरूपमित्येतेन तत्त्वज्ञानेन क्व पूजनं स्थूलमार्गेण कस्य पूजनं क्रियेत ? यदा हि सर्वस्य पूज्यपूजादेस्तदेकस्वरूपतया क्वापि भिन्नता नास्ति, तदा उक्तपारमार्थिकपूजाव्यतिरेकेण न किञ्चिदन्यत् पूजनादिकं संभवतीति भावः ॥१५०॥ परापर शब्द का अर्थ है परा देवी के साथ विद्यमान पर, परमेश्वर भैरव भट्टारक । परा देवी के साथ विद्यमान परभैरव की जिन पुष्प, गन्ध, धूप आदि से पूजा की जाती है, अथवा खीर, मिश्री-मावा आदि से भोग लगाया जाता है और जो पूजा करने वाला अथवा भोग लगाने वाला है, यह सब तो एक ही तत्त्व है। पूज्य, पूजन सामग्री और पूजक इस तरह के सभी भेद एक ही तत्त्व के विभिन्न स्वरूप हैं, इस तरह का पारमार्थिक बोध जग जाने पर किससे किसकी पूजा की जायगी ? जब कि इन सभी की एकरूपता के कारण परस्पर कोई भिन्नता नहीं है, तब इस अद्वय नय में प्रदर्शित पूजा के अतिरिक्त स्थूल दृष्टि से सम्पन्न होने वाली पूज्य, पूजन साधन, पूजा, पूजक आदि की परमार्थ दृष्टि से कोई सत्ता नहीं मानी जा सकती। इसी लिये महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १०७) में उद्धृत प्रभाकौल नामक ग्रन्थ में बताया गया है— यावत् तत् परमं शान्तं न विजानन्ति सुन्दरि । तावत् पूजाजपध्यानहोमलिङ्गार्चनादिकम् ॥ विदिते तु परे तत्त्वे सर्वाकारे निरामये । क्व पूजा क्व जपो होमः क्व च लिङ्गपरिग्रहः ॥ अर्थात् हे सुन्दरि, जब तक उस परम शान्त परमार्थ पद को नहीं जान पाते, तभी तक पूजा, जप, ध्यान, होम, लिगपूजा आदि कर्मकाण्ड किये जा सकते हैं। किन्तु जब उस सर्वाकार, निर्विकार, परम तत्त्व का बोध हो जाता है, तब पूजा, जप, होम, वेष-परिवर्तन आदि की कोई उपयोगिता नहीं रह जाती। इस स्थिति में तो पूजा, जप आदि की इस अद्वय भैरवनय में ऊपर बताई परिभाषाएं ही लागू हो सकती हैं ॥१५०॥ व्रजेत् प्राणो विशेज्जीव इच्छया कुटिलाकृतिः । दीर्घात्मा सा महादेवी परं२क्षेत्रं परापरा३ ॥१५१॥ १. ॰वरः-म० । २. परं-ख० । ३. ॰त्परा-ख० ।
- योगिनी० दीपिका (पृ० २४४), महार्थ० परि० (पृ० १०७) में प्राप्त है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : १६७ प्राण: 'स:' इत्येवंरूप: प्रकाशो व्रजेत् बहिर्नि:सरेत्, जीव: 'अहम्' इत्येवं प्रकार: क्षपारूपोऽपानो विशेत् अन्तः पुनः प्रविशेत् । प्राणस्य बहिर्निःसरणेऽपानस्यान्तःप्रवेशने च जीवात्मता संभवतीति संभावनायां लिङ् । अपानस्य प्रत्यावृत्त्यान्तःप्रवेशाभावे जीव एव न स्यादित्यपानदशैव जीवप्रादुर्भाव इत्यतो विशेज्जीव इत्युक्तम् । जीवस्य प्राणा- न्तर्वर्तित्वात् प्राणस्य हकारलिपिवत् कुटिलाकृतित्वाज्जीवोऽपि कुटिल इति इच्छाया कुटिलाकृतिरित्युक्तम् । वक्रत्वमपि तस्य स्वतन्त्रपरमेश्वरेच्छयैवेति भावः । कुण्डलिन्या अधोमुख्याः सार्धत्रिवलयाकारत्वात् तदन्तःस्था प्राणशक्तिरपि कुटिला । सा महादेवी महदम्बरैकप्रकाशस्वरूपा संविद्गगनचरी प्रमातृप्रमेयप्रमाणपथगामिनी, दीर्घात्मा वितताकृतिर्भवति । सैव परं क्षेत्रं सर्वपाशानां क्षपणात् सर्वस्य त्राणात् तीर्थभूमिर्वा सा, न तु कुरुक्षेत्रादि क्षेत्रम् । इयमेव देवी परापरा भेदाभेदात्मकतयाऽहमिति प्राधान्येन इदमिति गुणीकारेणार्थतस्तच्छब्दास्मच्छब्दयोरभेदः, तत्तया मत्तया निर्देशेन भेदश्चेति परापरात्वम् ॥१५१॥ 'ऊर्ध्वे प्राण' (श्लो० २४) इस श्लोक में सकार-हकार (सोऽहम्) जपात्मक हंस गायत्री (परा देवी) के स्वरूप का प्रारंभिक वर्णन किया गया था । मध्य में 'होच्चारं मनसा कुर्वन्' (श्लो० ८०) इस श्लोक में पुनः उसका उल्लेख हुआ । अब यहाँ उपसंहार में पुन उसका प्रतिपादन किया जा रहा है । वस्तुतः उक्त ११२ धारणाओं के प्रतिपादक प्रत्येक श्लोक के चतुर्थ चरण में भैरव ओर भैरवी के सामरस्यमय परा देवी के पारमार्थिक स्वरूप का ही विवेचन किया गया है । किन्तु इन तीन श्लोकों में विशेष रूप से उस स्वरूप का विवेचन मिलता है, जो कि सहज अजपाजप के नाम से प्रसिद्ध है । हंस गायत्री में विद्यमान सकार प्राण ओर प्रकाश (सूर्य अथवा दिन) का प्रतिनिधित्व करता है, तथा हकार जीव (अपान) तथा क्षपा (रात्रि) का । सभी प्राणियों के अनुभव के आधार पर यह बात सिद्ध है कि प्राण (सकार) की गति स्वाभाविक रूप से बाहर की ओर तथा अपान (हकार) की गति निरन्तर भीतर की ओर चलती रहती है । अपान को जीव इसलिये कहा जाता है कि प्राण के बाहर निकलने के बाद अपान जब शरीर में प्रविष्ट होता है, तभी यह बोध हो सकता है कि शरीर में जीवात्मा विद्यमान है । अपान के प्रवेश न करने पर शरीर शव कहा जायगा । अपान के कारण ही शरीर में जीवात्मा की स्थिति बनी रहती है, अतः स्वाभाविक है कि अपान को जीव के नाम से जाना जाय । व्रजेत् और विशेत् में संभावना में लिङ् लकार का प्रयोग किया गया है, विधि में नहीं । प्राण और अपान की गति कब तक चलती रहेगी, इस संबन्ध में किसी नियम का विधान नहीं किया जा सकता, केवल संभावना ही व्यक्त की जा सकती है । जीव अर्थात् अपान निरन्तर प्राण का अनुवर्तन करता रहता है, अर्थात् जब तक शरीर जीवित है, यह अवश्यंभावी है कि प्राण के निःसरण के बाद अपान का प्रवेश हो । जिस प्राण वायु का अपान अनुवर्तन करता है, उसकी गति हकार की लिखावट की तरह टेढी-मेढी होती है, अतः यह जीव भी अपनी इच्छा से ही प्राण के अनुरूप कुटिल (घुमावदार) आकृति धारण कर लेता है । जीव की यह वक्रता (कुटिलता=घुमावदार
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१६८ : विज्ञानभैरव आकृति) परमेश्वर की स्वतन्त्र इ च्छा शक्ति का ही खेल है। मूलाधार चक्र में कुण्डलिनी साढ़े तीन आटे मार कर बैठी रहती है, अतः उसमें रहने वाली यह प्राण शक्ति भी कुटिल आकार की हो जाती है। इस प्राण शक्ति के भीतर विद्यमान जीव बाल (केश) के अग्रभाग सोवें हिस्से के समान परम सूक्ष्म है। उसकी कोई आकृति नहीं है, किन्तु जीव के आधारभूत इस प्राण की वक्रता के कारण आधेय जीव में भी औपाधिक वक्रता मान ली जाती है । वास्तव में जीव कुटिल नहीं है, प्राण ही कुटिल है। "प्राक् संवित् प्राणे परिणता" कल्लट के इस वचन के अनुसार हृदय रूपी आकाश में संवित् का प्रवेश होते ही जीव दशा उत्पन्न होती है। पूर्णाहन्ता का विमर्श करने वाली संवित् से परिमित देह आदि में आत्मा का अभिमान करने वाली जीव दशा का आविर्भाव होता है, जैसे कि महाकाश से घटाकाश की उत्पत्ति होती है। प्राणशक्ति का एक लपेटा वाम नाडी इडा में और दूसरा लपेटा दक्षिण नाडी पिंगला में रहता है। इस तरह से उसके दो वलय (घेरे) बनते हैं। सुषुम्ना नाम की मध्य नाडी सार्ध कहलाती है, क्योंकि इसमें प्राण जब हृदयाकाश से ऊपर की ओर चढ़ता है, तब 'हम्' वर्ण की उत्पत्ति होती है और जब वह द्वादशान्त से उत- रता है, तो उसकी अपान दशा से 'सः' वर्ण उत्पन्न होता है। इन दो वर्णों का स्पष्ट उच्चारण करते रहने से ही जीव 'जीवित' कहलाता है। जैसा कि आगे (१५३ श्लो०) बताया जायगा कि जीव सदा 'हंस-हंस' इस मन्त्र का जप करता रहता है। इस मन्त्र का जप जीव ही करता है, परमेश्वर नहीं, क्योंकि परिमित अहन्ता का संपर्क जीव दशा में ही रहता है। ईश्वर दशा में तो पूर्णाहन्ता रहती है, अतः वहाँ 'मैं वह हूँ, वह मैं हूँ, मैं यह हूँ' इस तरह के विमर्श नहीं रहते। यह त्याज्य है, यह उपादेय है, यह मेरा है, यह मेरा नहीं है—इस तरह से छोड़ने और लेने के प्राण और अपान के धर्मों से समानता होने के कारण 1 जीव 'हंस' कहलाता है। इस तरह से सूर्य की किरणों के फैलने पर दिन के प्रकाश की तरह चित्(संवित्)सूर्य के हृदयाकाश में उदित होने पर प्राण का प्रकाश जगमगाने लगता है। चित्सूर्य की किरणें जब . सिमटती हैं, तो यह अपान दशा रात्रि कहलाती है। हृदय रूपी आकाश में रहने वाली यह संवित् ह और स, ,धर्म और अधर्म, दीर्घ और ह्रस्व, दिन और रात, अग्नि और सोम—इन सबको उत्पन्न करने वाली है, जो कि शून्य की भी विश्राम स्थली है। उसी को इस विज्ञानभैरव तन्त्र में 'परा देवी' कहा गया है। 'दीर्घात्मा''''परापरा' इस श्लोकार्ध में उसी का स्वरूप बताया गया है। यह महादेवी महाकाश को भी प्रकाशित करने वाली है, सदा बोधगगन में बिहार करती रहती है और साथ ही प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण व्यवहार को भी चलाती है। यही स और ह इन दोनों वर्णों को
- हान (त्याग) और उपादान (परिग्रह), छोड़ना और लेना—इन दोनों व्यापारों में हंस और जीव की समानता है। हंस जैसे दूध पी जाता है और पानी को छोड़ देता है, उसी तरह से जीव में भी प्राण और अपान का हान और उपादान व्यापार निरन्तर चलता रहता है। इसी समानता के आधार पर जीव को हंस कहा जाता है।
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विज्ञानभैरव : १६९
उत्पन्न करती है और उनको अपने में विलीन भी कर लेती है। यह महादेवी द्वादशान्त स्थित आकाश में सकार के रूप में तटस्थ भाव से रहती है और उसी के बगल में अन्तःकरण और बहिरिन्द्रिय के प्रतीकभूत विसर्ग स्वभाव हकार के रूप में। इस तरह इसकी यह अजपा स्थिति अन्यपदेश्य अर्थात् नाम और रूप के द्वारा समझने लायक न होने पर भी धीरे-धीरे स्थूल आकार धारण करने लगती है। इसके आकार का विस्तार होने पर ही द्वैत-संपत्ति को बढ़ाने वाले, नानात्व का प्रसार करने वाले, दिन रात, सुख-दुःख प्रभृति अनेक द्वन्द्वात्मक पदार्थों की सृष्टि होती है। यह महादेवी सभी तरह के पापों का नाश कर देने के कारण तथा सबकी रक्षक होने से सही माने में श्रेष्ठ तीर्थभूमि है। कुरुक्षेत्र प्रभृति तीर्थ इसकी बराबरी नहीं कर सकते। इस तरह से अपने स्वरूप का विस्तार करने के कारण यह दीर्घात्मा महादेवी इस द्वैत दशा में परापरा अवस्था में रहती है, क्योंकि यहाँ 'अहम्' (मैं) का बोध प्रधान रहता है और इदम् (यह) यह का बोध अप्रधान (गौण)। तत् और अस्मत् शब्द के अर्थ में कोई भेद नहीं है, किन्तु तत्ता (उसका) और मत्ता (मेरा), इदन्ता और अहन्ता के रूप में निर्देश करने पर भेद की भी प्रतीति होती है। अतः इस परापरा अवस्था में भेद और अभेद दोनों स्थितियाँ विद्यमान रहती हैं। हंस मन्त्र को अजपा इस लिये कहा जाता है कि अपरा अवस्था में यद्यपि इसके वाच्य वर्ण हकार और सकार का उच्चारण स्पष्ट होता है, किन्तु जब परा देवी इनको अपने में समेटे हुए अपने बाह्य स्वरूप का संवरण करती है, उस समय हकार के मस्तक पर स्थित बिन्दु रूप अनुस्वार का केवल बिन्दु के रूप में जप नहीं किया जा सकता। इसी तरह से यह प्राणशक्ति जब बाहर निकलती है, तब सकार के आगे विसर्ग रूप में स्थित दो बिन्दुओं का बिना अकार के उच्चारण नहीं हो सकता। इसीलिये 'हंसः' इस मन्त्र की अजपा गायत्री के रूप में ख्याति है। हंस मन्त्र वर्ण-क्रम से जैसे 'अजपा' रूप से प्रसिद्ध है, उसी तरह से यह 1संवित्क्रम से भी 'अजपा' स्थिति में ही रहता है। संवित् के प्रकाश से ही सभी शब्दों का स्फुरण होता है। उस संवित् के स्फुरण के लिये किसी अन्य पदार्थ की आवश्यकता नहीं रहती, वह तो स्वयंप्रकाश है, क्योंकि उसको प्रकाशित करने वाली दूसरी कोई संवित् नहीं है। स्वप्रकाश वस्तु को दूसरे प्रकाश की आवश्यकता नहीं रहती, जैसे कि एक दीपक को प्रकाशित करने के लिये दूसरे दीपक की जरूरत नहीं पड़ती। प्रश्न उठता है कि अभी बताया गया है कि हंस मन्त्र का उच्चारण जीवावस्था में ही होता है। इस प्रकार यह जीव दशा का मन्त्र है। तब इस जीवदशा (परिमित अहन्ता) के
- नित्याषोडशिकार्णव की अर्थरत्नावली टीका (पृ० ३, ३४-३९) में वर्ण, मण्डल (चक्र), मन्त्र, धाम और संवित् नामक क्रम दर्शन के पांच प्रमेयों का प्रतिपादन किया गया है। महार्थमंजरी (पृ० ८९-९४) में वृन्दचक्र के अन्तर्गत धाम, मुद्रा, वर्ण, कला, संवित्, भाव, पात और अनिकेत इन आठ पदार्थों की व्याख्या की गई है। प्रस्तुत प्रकरण में वर्णक्रम और संवित्क्रम से इन्हीं प्रमेयों की ओर इंगित है। जिज्ञासु जनों को इनके स्वरूप का परिचय वहीं से प्राप्त करना चाहिये।
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१७० : विज्ञानभैरव मन्त्र का विमर्श करने से पूर्णाहन्ता का बोध कैसे हो सकता है ? इस प्रश्न का उत्तर महेश्वरा- नन्द ने निम्न श्लोक में दिया है— यदि निजहृदयोल्लासं निर्णोतुं नित्यनिष्कलमिच्छा । मध्यत्रुटिस्त्रुटिव्याप्त्यास्तंगतयोः सोमसूर्ययोस्तर्हि ॥ (५६ श्लो०) इसका अभिप्राय यह है—सोम शब्द से यहाँ अपान हकार अभिप्रेत है, क्योंकि वह सारे वेद्य पदार्थों का पोषक है और सूर्य शब्द में प्राण सकार, जो कि सभी वेद्य पदार्थों को जानने वाला है । उक्त प्रक्रिया से हंकार और सःकार के अर्थात् सोम और सूर्य के अस्त हो जाने पर इनके अस्तगमन के काल के मध्य के क्षण का उसी तरह से उद्धार करना चाहिये, जैसे कि माणिक्य की मलिनता को दूर कर दिया जाता है । माणिक्य के मैल को साफ कर देने पर जैसे उसमें चमक पैदा हो जाती है, उसी तरह से मध्यक्षण का उद्धार करने पर 'हंसः' इस अजपा मन्त्र का विमर्श जाग उठता है । सकार जब अपने हृदयस्थानीय विसर्ग में और हकार अनुस्वार में विश्राम ले लेता है, तो इन दोनों अवस्थाओं को अलग करने वाला जो काल-क्षण है, उसका उद्धार करना चाहिये, उसको पकड़ना चाहिये । ऐसा करने में 'अहं सः' इस तरह का विमर्श उत्पन्न होता है। हंस मन्त्र से जुड़ा हुआ 'अहं सः, सोऽहम्' इस आकार का यह विमर्श महामन्त्र कहलाता है । इसी का विमर्श करना चाहिये, क्योंकि संवित् का यह स्वरूप ही अपनी प्रत्यभिज्ञा का, अर्थात् 'मै वही शिव हूँ' इस पहचान का उपाय है । इस प्रकार संवित्क्रम में 'अहं सः' अथवा 'सोऽहम्' यह अजपा मन्त्र का स्वरूप बनता है । जयरथ ने सकार और हकार के उच्चारण से उत्पन्न जप को सहज अर्थात् अकृत्रिम (स्वाभाविक) बताया है— सहौ क्षपादिनामानामधरोत्तरचारिणौ । परस्परद्वेषरतो मत्तो नागहुडोपमौ ॥ कस्तो रोधयितुं शक्तो वीर्यं मुक्त्वाऽस्वरं महत् । (तन्त्रा० वि० ३।१७०) यहाँ क्षपा और दिन से क्रमशः अपान और प्राण का निर्देश किया गया है। वीरावली कुल में भी क्षपा और दिन शब्द से इन्हीं का ग्रहण किया गया है । जैसे कि— सितासितौ दीर्घह्रस्वौ धर्माधर्मौ दिनक्षपे । क्षीयेते यदि तद्दीक्षा व्याप्त्या ध्यानेन योगतः ॥ (तन्त्रा० ६।७४) सित और असित शब्द से यहाँ पर शुक्ल दिन और कृष्ण रात्रि का ग्रहण किया गया है । प्रकाश का विकास होने से दिन को दीर्घ और प्रकाश का संकोच होने से रात्रि को ह्रस्व अर्थात् छोटी माना गया है । वेदोक्त विधियों का विस्तार दिन में ही होता है, अतः दिन को धर्म तथा रात्रि में वेदोक्त विधियों को करने का अधिकार न रहने से रात्रि को अधर्म कहा गया है । सूर्य को ही त्रयी (वेद) का शरीर माना गया है, चन्द्र को नहीं । इस प्रकार प्राण और अपान स्थानीय ये दिन और रात जब कुम्भक अवस्था में शान्त हो जाते हैं, निर्विकल्पा- त्मक परा संवित् के रूप में भासित होने लगते हैं, तभी ज्ञान, योग और क्रियात्मक दीक्षा से Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : १७१ मुक्ति की प्राप्ति होती है। कुम्भक अवस्था में प्राण और अपान की गति का अवरुद्ध हो जाना योगियों को भी अभीष्ट है। इसीलिये यहाँ 'क्षीयते तौ' अर्थात् प्राण और अपान क्षीण हो जाते हैं, ऐसा कहा गया है। यदि ऐसा न हो तो व्यर्थ की सारी आयु गँवा करके भी मनुष्य जन्म और मरण के निरन्तर बहने वाले प्रवाह को रोक न पावेगा। श्रुति और स्मृति ग्रन्थों में तो दिन और रात्रि का यमराज के कुत्तों के रूप में वर्णन मिलता है, क्योंकि ये मृत्यु के सन्देशवाहक दूत हैं। ये निरन्तर प्राणियों की आयु को क्षीण करते रहते हैं और अन्त में उनको मार डालते हैं। ऋग्वेद के यमसूक्त (१०।१४।११) में बताया गया है कि यम के रक्षक ये दिन-रात्रि रूपी दो कुत्ते बड़ी चतुराई से पहरा देते रहते हैं, अर्थात् दिन के विश्राम लेने पर रात्रि पहरा देने लगती है और रात्रि के विश्राम लेने पर पुनः दिन पहरा देने आ जाता है। इस तरह से निरन्तर चौकसी करते रहते हैं। 'चतुरक्षौ' इस पद की निष्पत्ति 'शकन्धु' आदि की तरह होती है। इसका विग्रह 'चतुरं निपुणमक्षं चक्रभ्रमणं ययोस्तौ' इस तरह से होता है। यहाँ 'अक्ष' शब्द चक्र का वाचक है। चक्र शब्द से परिवर्तन लक्षित होता है। इस तरह से 'चतुरक्षौ' का संस्कृत पर्याय 'चतुरचक्रौ' होगा। यम के दूत इन कुत्तों का वर्णन इस स्मृतिवचन में भी मिलता है— श्वानौ द्वौ श्यावशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ। ताभ्यां पिण्डं प्रदास्यामि स्यातां मे तावहिंसकौ ॥ वैवस्वत (यमराज) के कुल में उत्पन्न श्याव (काला) और शबल (चितकबरा) वर्ण वाले इन दोनों कुत्तों को मैं पिण्ड देता हूँ, ये मेरे लिये अहिंसक हो जायें, अर्थात् मुझे कुछ हानि न पहुँचावें। यहां श्याव (कृष्ण) वर्ण का कुत्ता रात्रि और शबल (चितकबरा) वर्ण का कुत्ता दिन है। दिन को शबल इसलिये कहा जाता है कि यह प्रातःकाल लाल वर्ण का, मध्याह्न में शुक्ल वर्ण का और सायंकाल काले वर्ण का दिखाई पड़ता है। वैवस्वत मृत्यु का नाम है। उसके घर में उत्पन्न होने से, उसके रक्षक होने से और मनुष्य की आयु का हरण करने वाले होने से ये मृत्यु के दूत कहे जाते हैं। उनके लिये मैं अपने पांचभौतिक शरीर को ही पिण्ड (ग्रास) के रूप में दे दूंगा, अर्थात् शरीर में अपनी ममता छोड़ दूँगा। लोक में यह बात प्रसिद्ध है कि कुत्ते को भात आदि का पिण्ड बना कर दिया जाता है। दिन-रात के बदलते रहने से अन्ततः यह पांचभौतिक शरीर जरा-जीर्ण होकर एक दिन गिर पड़ता है, अतः लौकिक दृष्टि से उसके अभाव में भात आदि का पिण्ड बना कर देने की बात ठीक है। मैं तो चिद्रूप हूँ, अविनाशी हूँ। दिनरात की गति के परिवर्तन को जब मैं प्राण और अपान की गति के परिवर्तन के साथ योगाभ्यास की अजपा प्रक्रिया से जोड़ देता हूँ, तो उस परिस्थिति में ये यमराज के कुत्ते मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेंगे। इसी अभिप्राय से उक्त श्लोक में 'स्याताम्' इस पद में सम्भावना के अर्थ में लिङ् लकार का प्रयोग किया गया है। कुत्ता काट न खाय, अपने दांत न गड़ा दे, इसके लिये उससे अपनी रक्षा अवश्य करनी पड़ती है। योग से, ध्यान से जब इन प्राण और अपान रूपी कुत्तों की गति क्षीण हो जाती है, तभी योगी दीक्षा का अधिकारी होता है, अर्थात् उसको ज्ञान की प्राप्ति होती है और उसकी पशु अवस्था की, अज्ञानावस्था
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१७२ : विज्ञानभैरव की वासनाएँ क्षीण हो जाती हैं। ऊपर उद्धृत 'सितासितौ' प्रभृति वीरावली शास्त्र के वचन का यही तात्पर्य है। जयरथ द्वारा उद्धृत 'सहौ क्षपादि' इत्यादि वचन के 'वीर्यं मुक्त्वाऽस्वरं महत्' इस अन्तिम चरण में आये अस्वर पद से कुछ लोग विभाग रहित पश्यन्ती दशा का ग्रहण करते हैं। जैसा कि वामननाथ ने कहा है— अप्राणमस्वरं ध्यात्वा पश्यन्त्या निर्विभा गया । चिन्मात्रस्पर्शयोगेन विलीनः स्यात् परे पदे ॥ इस श्लोक को "अबिन्दुमविसर्गं च" (श्लो० ८८) की व्याख्या करते समय पहले उद्धृत किया गया है और वहीं अकार की विभाग रहित पश्यन्ती दशा का भी विवरण दिया गया है। वामननाथ के इस प्रतिपादन का भी आधारभूत वचन यह है— ^1ततोऽस्वरोऽर्कसोमाग्निकलाबीजप्रसूतिभाक् । उदेत्येकः समालोकः प्रमाणार्थप्रमातृगः ॥ अर्थात् तब सूर्य, सोम और अग्नि की कलाओं के बीज को अंकुरित करने वाला अस्वर रूपी प्रकाश उदित होता है, जो कि प्रमाण, प्रमेय और प्रमाता इन सबको प्रकाशित कर देता है । “अर्थः प्रमेयम्” ^2 इस क्रमस्तोत्र के प्रमाण पर इस श्लोक में अर्थ शब्द से प्रमेय का ग्रहण किया जाता है। इस 'अस्वर' (अनुत्तर) अवस्था की प्राप्ति के लिये देश, काल और आकार के भेदों को मिटा देने वाली परा देवी का सहारा लेना चाहिये । इसी को निरावरण भगवती प्रज्ञा ॰पारमिता कहा जाता है। जैसे कि— निष्प्रपञ्चा निराभासा निर्विकल्पा निरामया । निःस्वभावा परा सूक्ष्मा बिन्दुनादविवर्जिता ॥ प्रज्ञापारमिताऽपारा सर्वबुद्धोदया परा । अर्थात् प्रज्ञा पारमिता का स्वरूप निष्प्रपंच, निराभास, निर्विकल्प, निरामय, निःस्वभाव, परम सूक्ष्म, बिन्दु और नाद से रहित है। यह सीमातीत है ओर सभी तरह की बुद्ध दशाओं के उदय का सर्वोत्कृष्ट कारण है। प्रज्ञा पारमिता स्वरूप शून्य भूमि का ही इस विज्ञानभैरव तन्त्र में परम शिव ने परा शक्ति के रूप में सर्वत्र उपदेश किया है। बौद्ध दर्शन में इस शून्य- भूमि को ही मोक्ष मान लिया गया है, किन्तु यह ध्यान देने की बात है कि भावनाओं के आधार पर जो साक्षात्कार होता है, वह शैव शास्त्र में माया के गर्भ में घूमते रहने का ही साधन बन पाता है, अर्थात् इससे परम पद की प्राप्ति नहीं हो पाती ॥ १५१ ॥
- ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० ३, पृ० ७१) में यह श्लोक सिद्धपाद का बताया गया है। तन्त्रालोकविवेक (आ० ३, भा० २, पृ० ७९) में भी यह वचन उद्धृत है।
- यह वचन शिवोपाध्याय की टीका के सिवाय अन्यत्र कहीं नहीं मिलता।
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विज्ञानभैरव : १७३ अस्यामनुचरंस्तिष्ठन् महानन्दमयेऽध्वरे । तया देव्या समाविष्टः परं भैरवमाप्नुयात् ॥१५२॥ अस्यां परापरभूमौ सकार-हकारसंघट्टात्मको य आनन्दः स महानन्दस्तन्मये अध्वरे यज्ञे ‘सोऽहम्’ इति विमर्शरूपे, अनुचरन् तिष्ठन् तया देव्या पश्यन्त्या सह समा- विष्ट एकीभूतः सन् परं भैरवमाप्नुयात् परास्वरूपो भवेत् ॥१५२॥ इस परापरा भूमि में सकार और हकार के संमिलन से जो आनन्द उत्पन्न होता है, वह महानन्द के नाम से प्रसिद्ध है । इस महानन्द की निष्पत्ति रूप परम पवित्र यज्ञ का अनुष्ठान करने से ही साधक को ‘वह (शिव) मैं ही हूँ’ इस तरह का विमर्श, प्रत्यभिज्ञा उत्पन्न होती है । इस विमर्श में विचरण करने वाला और विश्राम करने वाला साधक उस भगवती पश्यन्ती के साथ एकाकार होकर परभैरव के उत्कृष्ट स्वरूप को प्राप्त कर लेता है, उसमें समाविष्ट हो जाता है ॥१५२॥ १सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत् पुनः । हंस-हंसेत्यमुं२ मन्त्रं जीवो जपति नित्यशः ॥१५३॥ ३षट्शतानि दिवारात्रौ४ सहस्राण्येकविंशतिः । जपो देव्याः ५समुद्दिष्टः ६प्राणस्यान्ते सुदुर्लभः ॥१५४॥ प्राणः सकारेण सह बहिः निःसरति, अपानश्च हकारेण सह पुनरन्तः प्रवि- शेदिति संभाव्यते । एवं यावत्प्राणापानयोगंनिरन्तरतं प्रवर्तते, तावत्पर्यन्तं जीवो नित्य- शोऽनारतं ‘हंस हंस’ इत्यमुं मन्त्रं जपति । दिवारात्रौ अहर्निशमनवरतमुच्चार्यमाणस्य ‘हंस’ इति मन्त्रस्य अहोरात्रयोः षट्शतोत्तरैकविंशतिसहस्रवारमुच्चारणात्मको जपः संपद्यते । सोऽयं जपः प्राणस्यान्ते पर्यवसानावस्थायां सुदुर्लभो भवति । प्राणनिर्याणसमयेऽ- जपाजपविमर्शं बहुतरजन्मार्जितपुण्यातिशयेन लभ्यत इति भावः ॥१५३-१५४॥ प्राण सकार के साथ बाहर निकलता है और अपान जब शरीर में पुनः प्रविष्ट होता है, तो वह हकार का उच्चारण करता है । इस तरह से प्राण और अपान की गति जब तक १. श्लोकद्वयमेतत् शिवसूत्रविमर्शिनीक्रमेणात्र स्थाप्यते । अत्रत्यः प्रथमः श्लोकः कपुस्तके न दृश्यते । खपुस्तकेऽपि श्लोकस्यास्य पूर्वार्धो नास्ति । २. °त्यतो-शि०, °ति मन्त्रेण -ख० । ३. एकविंशत्सहस्राणि षट्शतानि दिवानिशम्-प० । ४. वरारोहे-त० । ५. विनिर्दिष्टः-शि० । ६. सुलभो दुर्लभो जडैः-शि० त० प० ।
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ५५) पर ये दोनों श्लोक उद्धृत हैं ।
- यह श्लोक शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ५५) के अतिरिक्त परमार्थसार (पृ० १५१) और तन्त्रा० वि० (भा० ४, आ० ६, पृ० २५) पर भी उद्धृत है । तन्त्रा० वि० (भा० ३, आ० ५, पृ० ५२) पर केवल पूर्वार्ध प्राप्त होता है ।
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१७४ : विज्ञानभैरव चलती रहती है, तब तक जीव प्रतिदिन निरन्तर 'हंस-हंस' इस मन्त्र का उच्चारण करता रहता है । दिन-रात प्राण और अपान की इस निरन्तर गतिशीलता में इस हंस मन्त्र का एक अहोरात्र में २१६०० बार जप पूरा हो जाता है । शरीर से प्राण के निकल जाने के बाद और अपान के पुनः प्रवेश न करने पर यह जप की विधि समाप्त हो जाती है । प्राण जब निकलते हैं, उस समय भी इस अजपा जप के साथ अपनी तन्मयता को स्थिर कर पाना अनेक जन्मों में अर्जित अतिशय पुण्य के कारण ही संभव हो सकता है, अन्यथा प्राण निकलते समय इस तरह की तन्मयता नहीं रहने पाती ॥१५३-१५४॥ इत्येतत् कथितं देवि परमामृतमुत्तमम् । एतच्च नैव कस्यापि प्रकाश्यं तु कदाचन ॥१५५॥ ¹परशिष्ये खले क्रूरे चाभक्ते² गुरुपादयोः । हे देवि, इत्येतत् एवमेतत्, उत्तमं परमामृतमयमिदं शास्त्रम्, ते तव, कथितम् उपदिष्टम् । एतच्च यस्य कस्यापि पुरतः कदाचन प्राणात्ययेऽपि नैव प्रकाशनीयम् । परशिष्ये खले क्रूरे गुरुपादयोर्भक्तिवर्जिते च शिष्ये एतन्नैव कदाचन प्रकाश्यम् ॥१५५॥ हे देवि, इस प्रकार मैंने तुमको इस उत्तम परम अमृतमय पद (मोक्ष) को प्राप्त कराने वाले शास्त्र का उपदेश किया है । इस शास्त्र का उपदेश जिस किसी अनधिकारी व्यक्ति को प्राण का संकट उपस्थित होने पर भी नहीं करना चाहिये । अन्य सम्प्रदाय में दीक्षित, कपटी और क्रूर व्यक्ति को तथा गुरु के चरणों में श्रद्धा न रखने वाले शिष्य को कभी भी इसका उपदेश नहीं करना चाहिये ॥१५५॥ निर्विकल्पमतीनां तु वीराणामुन्नतात्मनाम् ॥१५६॥ भक्तानां गुरुवर्यस्य दातव्यं निर्विशङ्कया । निर्विकल्पमतित्वादेव वीराणां छिन्नसंशयशत्रूणाम् उन्नतात्मनाम् उन्नत: शुद्ध- विद्याप्रधानो न तु मायापतित आत्मा येषाम्, गुरुवर्यस्य भक्तानां दिव्यौघ-सिद्धौघ-मान- वौघादिगुरुपङ्क्तिसमनुरक्तानां शिष्याणां पुरत एतद्रहस्यज्ञानं निर्विशङ्कया निर्विशङ्कं १. अभक्ते-क० । २. ०र्ग०-ख० ।
- परशिष्य शब्द का अर्थ है दूसरे का शिष्य या अन्य सम्प्रदाय में दीक्षित । योगिनीहृदय (३।२०२) में इसके लिये चुम्बक शब्द प्रयुक्त है । दीपिकाकार अमृतानन्द ने बिना भक्ति के केवल जानकारी प्राप्त करने के लिये विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन में लगे हुए पुरुष को चुम्बक कहा है । भास्करराय ने उपासना में रुचि न रख कर केवल शास्त्र के अध्ययन में लगे हुए व्यक्ति को चुम्बक बताया है । स्वच्छन्दतन्त्र (४।५३८) की टीका में क्षेमराज ने चुम्बक शब्द का अर्थ एकदम विपरीत किया है । वहाँ उस गुरु को चुम्बक बताया गया है जो कि गुरु-परम्परा से प्राप्त अपने ज्ञान को शिष्य में संक्रान्त कर चुका है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : १७५ दातव्यं देयम् । अथवा तत्त्वोपदेशकस्य देहप्रमातृकृतभेदस्य वस्तुतः शिवैकरूपस्य गुरोः, न तु नियतस्यैव कस्यचित्, भक्तानां निर्विशङ्कं प्रकाशनीयमित्यर्थः ॥१५६॥ बुद्धि में किसी प्रकार के विकल्प की स्थिति न रहने से जिनका चित्त सभी प्रकार के संदेहों से ऊपर उठ गया है और जिनकी आत्मा शुद्धविद्या की सृष्टि में प्रविष्ट हो गई है, अर्थात् जो अब माया की सृष्टि से भी ऊपर उठ गये हैं, इस तरह की उन्नत आत्मा वाले १वीरों को तथा २दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ नाम की गुरु-परम्पराओं की आराधना में जो श्रद्धा-भक्तिपूर्वक लगे हों, ऐसे शिष्यों के सामने इस रहस्य ज्ञान को बिना शंका के प्रकाशित करना चाहिये । अथवा किसी एक निश्चित गुरु के नहीं, किन्तु परमार्थ तत्त्व का उपदेश करने वाले, गुरुशिष्यभाव की पूर्ति करने के लिये काल्पनिक देह प्रमातृत्ता को स्वीकार करने वाले, वस्तुतः शिवस्वरूप गुरु के भक्त शिष्यों के सामने इस रहस्य ज्ञान को निशंक होकर प्रकाशित करना चाहिये ॥१५६॥ ग्रामं१ राज्यं पुरं देशं२ पुत्रदारं३कुटुम्बकम् ॥१५७॥ सर्वमेतत् परित्यज्य ग्राह्यमेतन्मृगेक्षणे । किमेभिरस्थिरैर्देवि स्थिरं परमिदं धनम् ॥१५८॥ प्राणा अपि प्रदातव्या न देयं परमामृतम् । हे मृगेक्षणे, ग्राम-राज्य-नगर-देश-पुत्र-कुटुम्बादिकं सर्वमेतत् परित्यज्य एत- द्रहस्यज्ञानं ग्राह्यमिति स्वीकार्यम् । हे देवि, ग्रामनगरादिभिरस्थिरैः किं प्रयोजनम् ? इदं परं स्थिरं धनमिति सर्वदौर्गत्यहरत्वादिदमेव स्थिरतरं धनमिति तदेव सर्वप्रकारेण ग्राह्यमिति भावः । राज्याद्यस्थिराननुगामिद्रव्यसंपत्त्यागेन एतदक्षयमनुवर्तमानमनुत्तर- सुखफलं स्थिरधनं संग्राह्यम्। एतच्च परमामृतमयमपात्रेभ्यः सर्वथा न देयम्। प्राणा नाम यथेच्छं प्रदातव्याः स्युः, एतत् परमामृतमयं रहस्यं तु अपात्रेभ्यः सर्वथाऽपि न देयमिति ॥१५७-१५८॥ हे मृगनयनि पार्वति ! ग्राम, राज्य, नगर, देश, पुत्र, स्त्री, कुटुम्ब आदि सबको छोड़ कर इस रहस्यमय, अत्यन्त गुप्त, परम उत्कृष्ट ज्ञान को ग्रहण करना चाहिये, क्योंकि हे देवि, ग्राम, राज्य आदि उक्त पदार्थ तो अस्थिर हैं, ये मनुष्य के साथ सदा नहीं रह सकते, अतः १. °मो-क० । २. °शः-क० । ३. °रा-ख० ।
- "अहमिति प्रलयं कुर्वन्निदमः प्रतियोगिनः" (श्लो० ५०) परापंचाशिका के इस श्लोक के आधार पर योगिनीहृदयदीपिकाकार अमृतानन्द ने इदन्ता का अहन्ता में प्रविलय करने वाले को, सारे जगत् को अपना ही स्वरूप समझने वाले को 'वीर' कहा है।
- दिव्यौघ, सिद्धौघ, मानवौघ क्रम से प्रवृत्त गुरु-परम्परा का पहले विवेचन किया जा चुका है । इस सम्बन्ध में नित्याषोडशिकार्णव का उपोद्घात (पृ० ९९-१०१) भी देखना चाहिये ।
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१७६ : विज्ञानभैरव ऐसे अस्थिर पदार्थों को लेकर हम क्या करेंगे ? हमें तो इस स्थिर धन, अक्षय ज्ञान का ही संग्रह करना चाहिये, जो कि सभी तरह की विपत्तियों को दूर करने वाला है। राज्य प्रभृति संपत्ति मनुष्य के साथ सदा रहने वाली नहीं है, अतः इस अस्थिर संपत्ति को छोड़ कर इस अक्षय, कभी साथ न छोड़ने वाले, अनुत्तर सुख को देने वाले, इस ज्ञानरूपी स्थिर धन का हमें सभी उपायों से संग्रह करना चाहिये । इस परम उत्कृष्ट अमृतमय ज्ञान के प्राप्त हो जाने पर इसको अयोग्य व्यक्ति को कभी नहीं देना चाहिये । अपने प्राण भले ही किसी के कहने पर दे दिये जांय, किन्तु परम अमृतमय, अत्यन्त गुप्त ज्ञान को किसी भी तरह से, प्राणों के मूल्य पर भी, कभी भी किसी अयोग्य व्यक्ति को नहीं देना चाहिये ।।१५७-१५८।। श्रीभैरवी१ उवाच देवदेव महादेव परितृप्तास्मि शङ्कर ।।१५९।। रुद्रयामलतन्त्रस्य सारमद्यावधारितम् । सर्वशक्तिप्रभेदानां हृदयं ज्ञातमद्य च ।।१६०।। इत्युक्तवाऽऽनन्दिता देवी कण्ठे लग्ना शिवस्य तु ।।१६१।। हे देवदेव, महादेव, शङ्कर, रहस्यार्थोपदेशनानेन अहं परितृप्ताऽस्मि परम- सन्तुष्टाऽस्मि । अद्य मया रुद्रयामलतन्त्रस्य सारमवधारितं ज्ञातम्, सर्वशक्तिप्रभेदानां परापरादिशक्तिभेदानां हृदयं गुह्यं रहस्यं च स्फुटमवगतम् । एवमुक्त्वा आनन्दिता सर्वसंशयत्यागपूर्वकं परमानन्दपदप्रवेशेन शिवैकमयीभूता, देवी शिवस्य कण्ठे लग्ना शिवेन सह सामरस्यतां गता ।।१५९-१६१।। इतना सुनकर देवी ने कहा कि हे देवों के देव, देवताओं के भी अधिपति महादेव, सबका कल्याण करने वाले भगवन्, मैं इस अत्यन्त गुप्त रहस्यमय ज्ञान को सुन कर परम सन्तुष्ट हूँ । आज मैंने रुद्रयामल तन्त्र के गूढ अभिप्राय को ठीक से समझ लिया है। साथ ही आज मैंने शक्ति तत्त्व के पर, अपर, परापर आदि भेदों के गुप्त रहस्य को भी स्पष्ट रूप से जान लिया है। इतना कहने के बाद अपने सभी प्रकार के सन्देहों के निवृत्त हो जाने से परम आनन्द में लीन, भावविभोर हुई भगवती पार्वती शिव में लीन हो गई, शिव के साथ मिल कर समरस, एकाकार हो गई, अपनी अद्वयावस्था में प्रतिष्ठित हो गई ।।१५९-१६१।। १. °देवी-क० ।
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श्लोकार्धानुक्रमणिका अचिरेण निराधारं ९१ आमूलात् किरणाभासां ३२ अजरामरतामेति १५६ आवेशनं तत्स्वरूपे १६५ अतत्त्वमिन्द्रजालाभ० १४४ आसने शयने स्थित्वा ९२ अतश्च तन्मयं सर्वं १०९ इच्छायामथवा ज्ञाने १०८ अतस्तद्धर्मधर्मित्वात् १९ इति भैरवशब्दस्य १४० अत्र चैकतमे युक्तो १५५ इतीन्द्रियाणि संत्यज्य १४७ अत्रैकतमयुक्तिस्थे १६२ इत्यादिधमं तत्त्वानां १०४ अद्यापि न निवृत्तो १ इत्युक्तवान्निन्दिता देवी १७६ अध्वप्रक्रिया तत्त्वं ६२ इत्येतत् कथितं देवि १७४ *अनच्कमहलं ध्यायन् १२१ इदं यदि वपुर्देव १५७ अनन्यचेतसः पुंस ५७ इन्द्रजालमयं विश्वं १११ अनन्यचेताः प्रत्यन्ते ४६ इन्द्रियद्वारकं सर्वं १४७ अनन्यचेताः सुभगे ५४ ईदृशेन क्रमेणैव ३६ अनागतायां निद्रायां ८५ उत्पत्तिद्वितयस्थाने २४ अनाहते पात्रकर्णे० ४२ उदेति देवि सहसा ९९ अन्तःस्वानुभवानन्दा १८ उद्गच्छन्तीं तडिद्रूपां ३३ अन्यथा तस्य तत्त्वस्य १६४ उपविश्यासने सम्यग् ९० अपेक्षा स्वशरीरस्य ११६ उभयोर्भावयोर्ज्ञाने ६५ अप्रबुद्धमतीनां हि १७ ऊर्ध्वं प्राणो ह्यधो जीवो २४ अबिन्दुमविसर्गं च ९९ ऊर्ध्वं मुष्टित्रयं यावत् ३३ अर्धेन्दुबिन्दुनादान्त० ४८ एकमेकस्वभावत्वा० १४८ अविकल्पमतेः सम्यक् १२२ एतच्च नैव कस्यापि १७४ अस्य सर्वस्य विश्वस्य ६२ एवमुक्तव्यवस्थायां १५७ अस्यामनुचरंस्तिष्ठत् १७३ एवमेव जगत्सर्वं ५७ अहं ममेदमित्यादि० १४२ एवमेव दुर्निशायां ९७ *आकाशं विमलं पश्यन् ९४ एवमेव निमील्यादौ ९७ आत्मनो निर्विकारस्य १४४ एवंविधा भैरवस्य १९ आत्मबुद्ध्याऽनन्यचेता० १०८ एवंविधे परे तत्त्वे १९ आधारेष्वथवाऽशक्त्या० १२१ एषाऽत्र प्रक्रिया बाह्या १५८ आनन्दमुद्गतं ध्यात्वा ८० कक्षव्योम्नि मनः कुर्वन् ९० आनन्दे महति प्राप्ते ८० कपालान्तर्मनो न्यस्य ३८
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१७८ : विज्ञानभैरव करङ्किण्या क्रोधनया ८६ चित्ताद्यन्तःकृतिर्नास्ति १०४ कररुद्धदृगस्त्रेण ४० चिद्धर्मा सर्वदेहेषु १०९ कामक्रोधलोभमोह० ११० चिन्तयेत् तां द्विषट्कान्ते ३२ कालाग्निना कालपदा० ५६ जग्धिपानकृतोल्लास० ८० किञ्चिज्ज्ञातं द्वैतदायि ९५ जपो देव्याः समुद्दिष्ट १७३ किञ्चिज्ज्ञैर्या स्मृता शुद्धिः १३१ जपः सोऽत्र स्वयं नादो १५९ किञ्चिदङ्गं विभिद्यादौ १०३ जलस्येवोर्मयो वह्ने० १२० किन्तत्त्वमिन्द्रजालस्य १४४ जातशक्तिसमावेश० १२१ किमेभिरस्थिरैर्देवि १७५ जीवन्नपि विमुक्तोऽसौ १५६ किं रूपं तत्त्वतो ९ ज्ञानप्रकाशकं सर्वं १४८ किं वा नवात्मभेदेन ९ ज्ञानायत्ता बहिर्भावा० १४४ कुतूहले क्षुधाद्यन्ते १२७ ज्ञायते दिग्विभागादि २१ कुम्भिता रेचिता वापि ३२ झगितीच्छां समुत्पन्ना० १०५ कुहनेन प्रयोगेण ७१ तज्ज्ञानं चित्तसहितं १२८ कूपादिके महागर्ते १२२ तत्र तत्र परानन्द० ८३ केवलं ज्ञानसत्तायां २० तत्र तत्र शिवावस्था १२२ केवलं वर्णितं पुंसां १५ तत्रैव च मनो लीनं ६३ केवलं वायुपूर्णा वा ७५ तत्रैव चेतनां युक्त्वा १०३ कैरुपायैर्मुखं तस्य २२ तत्त्वतो न नवात्मासौ १६ कैवल्यं जायते सद्यो १२१ तत्त्वतोऽहं तथाभूत० ९५ क्रमद्वादशकं सम्यग् ३४ तत्त्वतः कस्यचिन्नेत० १०८ क्रमेण मनसो दार्ढ्या० ३८ तत्त्वानि यानि निलयं ५७ क्वचिद्वस्तुनि विन्यस्य १२८ तत्स्र्वं भैरवाकारं ९४ क्षपणात् सर्वपापानां १६४ तत्स्र्वं भैरवं भाव्यं १३७ क्षुताद्यन्ते भये शोके १२७ तदन्ते शान्तनामासौ ३२ क्षोभशक्तिविरामेण १२१ तदसारतया देवि १५ खेचर्या दृष्टिकाले च ८६ तदा तन्मध्यभावेन ६६ गीतादिविषयास्वाद० ८२ तदात्मपरमात्मत्वे ११८ गृहणीयतमं भद्रे १४ तदासौ शिवरूपी २० ग्रामं राज्यं पुरं देशं १७५ तद्वपुस्तत्त्वतो ज्ञेयं १८ ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः ११५ तनूदेशे शून्यतैव ५२ घटादिभाजने दृष्टि ६४ तन्त्र्यादिवाद्यशब्देषु ४६ घटादौ यच्च विज्ञान० ११४ तया देव्या समाविष्टः १७३ चक्रारूढमदच्छं वा ९ तयाऽऽपूर्याशु मूर्धान्तं ३४ चूलासने स्थितस्याथ ९३ तल्लयं तत्क्षणाद् गत्वा ६४
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विज्ञानभैरव : १७९ तस्य तन्मात्रधर्मित्वा० १२६ नहि वर्णविभेदेन १२ तामेव मनसा ध्यात्वा १३० नादबिन्दुमयो वापि १६ तेजसा सूर्यदीपादे० ८५ नादबिन्दुमयं वापि ९ तैमिरं भावयन् रूपं ९७ निजदेहे सर्वदिक्कं ५० त्रिकभेदमशेषेण १ नित्ये निराश्रये शून्ये १३८ त्रिशिरोभेदभिन्नं ९ नित्यो विभुर्निराधारो १४३ दिक्कालकलनोन्मुक्ता १७ निधाय तत्प्रसङ्गेन ९० दिग्देशकालशून्या २२ निराधारेण चित्तेन १०२ दीर्घात्मा सा महादेवी १६६ निराधारे मनो याति १४२ दृढबुद्धेर्दृढीभूतं ५५ निराधारं मनः कृत्वा ११८ दृढेन मनसा दृष्ट्या ११२ निराश्रया चितिः शक्तिः १०३ दृष्टिनिवेश्या तत्रैव ८५ निनिमित्तं भवेज्ज्ञानं १०८ दृष्टे बिन्दौ क्रमाल्लीने ४० निर्विकल्पतया मध्ये ३१ देवदेव त्रिशूलाङ्क २२ निर्विकल्पमतीनां तु १७४ देवदेव महादेव १७६ निर्विकल्पमनास्तस्य ५० देहान्तरे त्वग्विभागं ५३ निर्विकल्पे परे व्योम्नि १६१ द्वादशाम्यधिकं देवि १५५ निर्विकल्पं निर्विकल्पो ५२ धामान्तःक्षोभसंभूत० ४१ निर्विकल्पं मनः कृत्वा ३४ ध्याताऽन्तर्व्योमया देव्या ३९ निर्वृक्षगिरिभित्त्यादि० ६४ ध्यानाथं भ्रान्तबुद्धीनां १५ निस्तरङ्गोपदेशानां १५५ ध्यानं या निश्चला बुद्धि० १६० नैव सर्वगतं जातं ११४ ध्यायते को महादेव १५७ परतत्वं सकलत्वेन १२ ध्यायतोऽनुत्तरे शून्ये ३५ परशिष्ये खले क्रूरे १७४ न किञ्चिदन्तरे तस्य ५३ परापरायाः सकल० १२ न चक्रक्रमसंभिन्नो १६ पराया यदि तद्वत् १२ न च तद्व्यतिरेकेण १३४ परित्यज्यानवस्थित्या १३९ न चासौ त्रिशिरा १६ पिण्डमन्त्रस्य सर्वस्य ४८ न चित्तं निक्षिपेद् दुःखे १११ पिपीलस्पर्शवेलायां ७२ न तु ध्यानं शरीराक्षि० १६० पीनां च दुर्बलां शक्ति ५८ न द्वेषं भावयेत् क्वापि १३६ पूजा नाम न पुष्पाद्यै० १६१ न मे बन्धो न मोक्षो मे १४६ पृष्ठशून्यं मूलशून्यं यु० ५१ न वह्नेर्दाहिका शक्ति० २० ★पृष्ठशून्यं मूलशून्यं हृ० ५१ न व्रजेन्न विशेच्छक्ति० ३१ प्रणवादिसमुच्चारात् ४४ न शुचिर्ह्यशुचिस्तस्मा० १३१ प्रतिक्षणं क्षीणवृत्ते० ५५
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१८० : विज्ञानभैरव प्रतिबिम्बमिदं बुद्धे० १४६ यत एव समुद्भूता १०५ प्रविश्य हृदये ध्यायन् ५८ यत्किञ्चित् सकलं रूपं १५ प्रविष्टस्याद्वये शून्ये ९८ यत्र यत्र मनस्तुष्टि० ८३ प्रशान्ते मानसे भावे ९३ यत्र यत्र मनो याति त० १३९ प्रसादं कुरु मे नाथ १३ यत्र यत्र मनो याति बा० १२३ प्रसार्य भैरवं रूपं ९७ यत्र यत्राक्षमार्गेण १२६ प्राणां अपि प्रदातव्या १७५ यत्सुखं ब्रह्मतत्त्वस्य ७७ प्लुष्टं विचिन्तयेदन्ते ५६ यथा तथा यत्र तत्र ५५ बाह्याकाशे मनः कृत्वा १३८ यथा प्रिये परिक्षीणं १५० बिन्दुं शिखान्ते हृदये ४१ यथाऽऽलोकेन दीपस्य २१ बुद्धि निस्तिमितां कृत्वा ११० यथा सम्यगहं वेद्मि २२ ब्रह्मणः परिपूर्णत्वा० १३५ यद्वेद्यं यद्ग्राह्यं १३७ भक्तानां गुरुवर्यस्य १७४ यदा ममेच्छा नोत्पन्ना १०७ भक्त्युद्रेकाद्विरक्तस्य १२९ यश्चैव पूजकः सर्वः १६६ भया सर्वं रवयति १४० यस्य कस्यापि वर्णस्य ४५ भरिताकारता सात्र १६२ यस्य कस्येन्द्रियस्यापि ९८ भावयेद् भरितावस्थां ८० यागोऽत्र परमेशानि १६४ भावे न्यक्ते निरुद्धा ६६ याऽवस्था भरितकारा भैरव० २२ भुवनाध्वादिरूपेण ५९ याऽवस्था भरिताकारा भैरवी १८ भूयोभूयः परे भावे १५९ युगपच्च द्वयं त्यक्त्वा ६५ भैरवि ज्ञायतां मध्ये १११ युगपत् स्वामृतेनैव ६९ भैरव्या भैरवस्येत्थं २७ युग०न्निर्विकल्पत्वा० ५१ भ्रमद्वा ध्यायतः सर्वं १११ युगपन्निस्त्रिकल्पेन ६८ भ्रान्त्वा भ्रान्त्वा शरीरेण १२१ यैरेव पूज्यते द्रव्यै० १६६ मध्यजिह्वे स्फारितास्ये ९१ योगिनस्तन्मयत्वेन ८२ मध्यनाडी मध्यसंस्था ३९ योगिनां तु विशेषोऽयं ११५ ममैव भैरवस्यैता १२० योगिनीनां प्रियो देवि १५६ मरुतोऽन्तर्बहिर्वापि २७ योगी समत्वविज्ञान० ७० महाशून्यालये वह्नौ १६३ रागद्वेषविनिर्मुक्तो १३६ मातृमोदकवत् सर्वं १७ रुद्रयामलतन्त्रस्य १७६ मानसं चेतना शक्ति० १५० रुद्रशक्तिसमावेश० १६४ माया विमोहिनी नाम १०४ लीनं मूर्ध्नि वियत्सर्वं ९४ मायासप्नोपमं चैव १५ लेहनामन्थनाकोटैः ७९ मृदासने स्फिजैकेन ९० वर्णस्य सविसर्गस्य १०२ वस्तुषु स्मर्यमाणेषु १२७ Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)