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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

४२४ श्वेताश्वतरोपनिषद् जो परमात्मा सर्वप्रथम ब्रह्मा को उत्पन्न करता है और उन्हें वेदों का ज्ञान प्रदान करता है। मैं मोक्ष प्राप्ति की अभिलाषा से बुद्धि को प्रकाशित करने वाले उन देव की शरण ग्रहण करता हूँ॥ १८॥ निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्। अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम्॥ १९॥ जो कलाओं तथा क्रियाओं से रहित, सदा शान्त, निर्दोष, निर्मल, अमृतत्व का श्रेष्ठ सेतुरूप, (धूम्ररहित) प्रदीप्त अग्नि के समान देदीप्यमान है (हम उसकी शरण ग्रहण करते हैं)॥ १९॥ यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः। तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति॥ २०॥ जब मनुष्यगण आकाश को चमड़े की भाँति लपेट सकेंगे (जब कि यह असम्भव है); तब उस देव (परमात्मा) को जाने बिना भी दुःखों का अन्त हो सकेगा (यह भी असम्भव है)॥ २०॥ [वस्तुतः दुःखों की आत्यन्तिक निवृत्ति परमतत्त्व को जानकर ही ही सकती है।] तपः प्रभावाद्देवप्रसादाच्च ब्रह्म ह श्वेताश्वतरोऽथ विद्वान्। अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसङ्घजुष्टम्॥ २१॥ श्वेताश्वतर ऋषि ने तप के प्रभाव से और परमात्मा की कृपा से ब्रह्म को जाना तथा ऋषियों द्वारा सेवित उस परम पवित्र ब्रह्मतत्त्व का उन्होंने आश्रम के सुपात्रों को उपदेश दिया॥ २१॥ वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम्। नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः॥ २२॥ उपनिषदों (वेदान्त) में इस परम गुह्य ब्रह्मविद्या का पूर्वकल्प में उपदेश किया गया था। जिसका अन्तःकरण रागादि से शान्त न हुआ हो, उस साधक को तथा जो अपना पुत्र या शिष्य न हो (अर्थात् आचार्य के प्रति श्रद्धाभाव न रखता हो), उसे यह गुह्य ज्ञान नहीं देना चाहिए॥ २२॥ यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः प्रकाशन्ते महात्मन इति॥ २३॥ जिस साधक की परमात्मा में अत्यन्त भक्ति है तथा जैसी परमात्मा में है, वैसी ही गुरु में भी है, उस महान् आत्मा के हृदय में ही ये बताये गये गूढ़ ज्ञान प्रकाशित होते हैं, ऐसे महात्मा में ही (यह उपनिषद्) ज्ञान प्रकाशित होते हैं॥ २३॥ ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु.......इति। शान्तिः॥ ॥ इति श्वेताश्वतरोपनिषत्समाप्ता ॥

परिशिष्ट-१ परिभाषा कोश-१०८ उपनिषद् (ज्ञानखण्ड) १. अक्षर ब्रह्म - वेदान्त दर्शन में 'ब्रह्म' की अवधारणा उस परमसत्ता के रूप में है, जो सर्वातिशायी, सर्वसमर्थ, सर्वत्र विद्यमान रहने वाली सर्वोच्च शक्ति है। उस 'परब्रह्म' को अनेक नामों से अभिहित किया गया है- परमात्मा, परमेश्वर, ब्रह्म, भूमा, परमचैतन्य, अक्षरब्रह्म (ओंकार) इत्यादि। परब्रह्म का अक्षरात्मक स्वरूप 'ओंकार' 'प्रणव' के रूप में उपनिषदादिक आर्ष ग्रन्थों में सर्वत्र प्राप्त होता है। तात्त्विक दृष्टि से देखा जाय, तो 'ब्रह्म' अक्षर ही है, 'न क्षरति इति अक्षरः' जिसका क्षरण-विनाश नहीं होता है, वह 'अक्षर' है। इस दृष्टि से 'अक्षर' शब्द ब्रह्म की विशिष्टता का बोधक हुआ। वैसे अक्षरात्मक-वर्णात्मक ब्रह्म के रूप में 'ॐ' प्रणव को स्वीकार किया जाता है, जैसे- अक्षरं परमं पदम् (महाना० ११.१), अक्षरं परमं ब्रह्म निर्विशेषं निरंजनम् (१ यो०शि० ३.१६), अक्षरं ब्रह्मपरमं (गी० ८.३), अक्षरोऽहमोङ्कारोऽमरोऽभयोऽमृतो ब्रह्माभयं हि वै (गो० उ० ४०)। इन उद्धरणों को देखने से प्रतीत होता है कि अक्षर ब्रह्म-ओंकार-प्रणव-आत्मा आदि सभी एक ही तत्त्व के प्रतिपादक हैं। अक्षर ब्रह्म का विशद विवेचन माण्डूक्य उपनिषद् तथा गौड़पादकृत माण्डूक्य कारिका में उपलब्ध है। २. अग्नि- वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों में देवतारूप में अग्नि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह तीनों लोकों में प्रमुखतः तीन रूपों में है- आकाश में सूर्य, अन्तरिक्ष में विद्युत् और पृथ्वी पर साधारण अग्नि। ऋग्वेद में सबसे अधिक सूक्त अग्नि देवता की स्तुति में ही संगृहीत हैं। अग्नि की गृहपति कहा गया है और परिवार के सभी सदस्यों से उसका घनिष्ठ सम्बन्ध है (ऋ० २.१.९)। अग्नि को दिव्य पुरोहित भी कहा गया है- अग्निमीळे पुरोहितम् (ऋ० १.१.१)। अग्नि सर्वदर्शी है, वह मनुष्य के सब कर्मों को देखता है- (ऋ० १०.७९.५)। अग्नि को प्रमुख रूप से तीन रूपों में अभिहित किया गया है- १. गार्हपत्य २. दक्षिणाग्नि ३. आहवनीय। मीमांसा सूत्र में जैमिनि ने अग्नि के छः रूप वर्णित किये हैं- गार्हपत्य २. आहवनीय, ३. दक्षिणाग्नि ४. सभ्य ५. आवसथ्य और ६. औपासन। अग्नि और आदित्य दोनों को भर्ग भी कहा गया है-अग्निर्वै भर्गः। आदित्यो वै भर्गः (जैमि० ४.२८.२)। ३. अङ्गिरस् - द्र० - अथर्वा । ४. अङ्गुष्ठमात्र - मनुष्य को हृदय गुहा में वह परमात्मा आत्मा रूप में अंगुष्ठमात्र परिमाण वाला या अँगूठे जैसा समाविष्ट है। यही तथ्य उपनिषद् से भी प्रमाणित होता है- अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संन्निविष्टः (कठ० २.३.१७), अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति (कठ० २.१.१२)। यह परमात्मा हृदय में अङ्गुष्ठमात्र परिमाण वाली धूमरहित ज्योति के रूप में है- अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः (कठ० २.१.१३)। यह ज्योति सूर्य के समान प्रकाशमय और सङ्कल्प तथा अहंकार से युक्त है-अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः सङ्कल्पाहंकारसमन्वितो यः (श्वेता० ५.८)। ५. अज - अज का शब्दार्थ है - जिसका जन्म न हो, जन्म के बन्धन से रहित। अजन्मा, स्वयंभू, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, ईश्वर और कामदेव को भी अज कहकर निरूपित किया जाता है। मानस में ब्रह्म को अज कहा गया है- ब्रह्म जो व्यापक विरज, अज, अकल, अनीह, अभेद (रा०मा० १.५०)। जीव तथा माया को भी 'अज' रूप में माना गया है। महाभारत में अज के विषय में कहा गया है-नहि जातो न जायेयं न जनिष्ये कदाचन। क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानां तस्मादहमजः स्मृतः ॥ (महा० शान्ति० ३४२. ७४) अर्थात् मैं न उत्पन्न हुआ हूँ, न होता हूँ और न होऊँगा। सब प्राणियों का मैं क्षेत्रज्ञ हूँ, इसीलिए लोग मुझे अज कहते हैं। अनादि प्रकृति को भी अज कहा गया है। उपनिषद् के अनुसार बहुत से प्राणियों को त्रिगुणात्मक रचने वाली लाल, कृष्ण, सफेद रंग को एक अजन्मा प्रकृति को एक अज (अज्ञानी जीव) आसक्त होकर भोगता है और दूसरा अज (ज्ञानी पुरुष) भुक्त प्रकृति को त्याग देता है- अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः। अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ (श्वेता० ४.५)।

४३२ परिशिष्ट अनंत ६. अज्ञान — द्र० - अविद्या । ७. अणु- पदार्थ के अतिसूक्ष्म कण को अणु कहा गया है, यह पदार्थ का इन्द्रिय-अग्राह्य सूक्ष्मकण होता है, जो पदार्थ के मौलिक गुण को अपने में धारण किये रहता है। एक अणु, दो या अनेक परमाणुओं के संयोग से बनता है। अणु को विश्व प्रपंच का कारण मानने वाला सिद्धान्त अणुवाद कहलाया। वैशेषिक दर्शन का यह प्रमुख अङ्ग है। जैन मतानुसार अणु स्थूल या सूक्ष्म रूप में रह सकता है। जब यह सूक्ष्म रूप में रहता है, तो अगणित अणु एक स्थूल अणु को घेरे रहते है। अणु अपने अन्दर इतनी गति का विकास कर सकता है कि एक क्षण में वह विश्व के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँच सके। उपनिषद् में यह प्रतिपादन है कि आत्म तत्त्व के विषय में अन्य ज्ञानी पुरुष के उपदेश न करने पर मनुष्य का प्रवेश नहीं होता, क्योंकि वह अत्यन्त सूक्ष्म अणु से भी अधिक सूक्ष्म है; अतः तर्क से परे है- अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति अणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् (कठ० १.२.८)। वह आत्मतत्त्व सूक्ष्म से अतिसूक्ष्म और महान् से अति महान् है- अणोरणीयान्महतो महीयान् (कठ० १.२.२०)। ८. अथर्वा-अङ्गिरा - अथर्वा अथर्ववेद के द्रष्टा ऋषि हुए हैं। सम्भवतः इन्हीं के नाम से अथर्ववेद नाम एक वेद का पड़ा। ब्रह्माजी के प्रमुखतः दो पुत्र हुए हैं- एक अथर्वा, दूसरे अङ्गिरा। मुण्डकोपनिषद् के प्रथम श्लोक में देव ब्रह्मा के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में ये अभिप्रेत हैं। ब्रह्माजी ने सब विद्याओं में आधारभूत ब्रह्मविद्या का उपदेश सर्वप्रथम अथर्वा को किया। अथर्वा ने इस विद्या का उपदेश अङ्गिर ऋषि को किया- अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् (मुण्ड० १.१.२)। अथर्वा के गोत्रज अथर्वाणः या 'आथर्वणः' कहलाये और अङ्गिरा के गोत्रज 'आङ्गिरस' कहलाये। महाभारत में अथर्वा का उल्लेख अथर्वन् के रूप में मिलता है, जिन्होंने समुद्र में छिपे हुए अग्नि का पता लगाया था (महा०वनपर्व २२२)। अङ्गिरा का उल्लेख अङ्गिरस् नाम से ब्रह्मादेव के छः मानस पुत्रों में से एक पुत्र के रूप में मिलता है (महा० आदिपर्व ६५.१०)। अथर्वा और अङ्गिरा का संयुक्त रूप से उल्लेख कई स्थानों पर मिलता है। अथर्ववेद के मन्त्र अथर्वा और अङ्गिरा द्वारा दृष्ट होने के कारण उन्हें 'अथर्वाङ्गिरसः' कहकर निरूपित किया गया है- तस्य यजुरेव शिरः। अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा (तैत्ति०२.३.१)। ९. अद्वैत - वेदान्त दर्शन का प्रमुख सिद्धांत 'अद्वैत' है। आद्य शंकराचार्य ने इसी सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। इसलिए यह उनके सिद्धांत का पर्याय बन गया है। शंकराचार्य ने एकमात्र सत्ता 'परब्रह्म' को स्वीकार की है। उनके अनुसार पारमार्थिकी (भूत-वर्तमान-भविष्यत्) सत्ता 'परब्रह्म' की है। वही नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव वाला निर्गुण, अविकारी, कूटस्थ है, उसके अतिरिक्त और कोई तत्त्व नहीं है। एकमेवाद्वितीयम् ब्रह्म (त्रि०म०३.३, पैंग० १.१), एकमेव परं ब्रह्म विभाति (ब्रह्म० २), एकमेवाद्वितीयम् (छान्दो० ६.२.१) जैसे श्रुति वचन इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। सांख्य दर्शन प्रकृति और पुरुष दो तत्त्व स्वीकार करता है, इसलिए उसे 'द्वैत' दर्शन कहते हैं। कोई-कोई ईश्वर, जीव, प्रकृति तीन तत्त्व स्वीकार करते हैं, वे त्रैत दर्शन कहलाते हैं। शंकराचार्य ने एक तत्त्व को ही स्वीकार किया-न द्वैतः इति अद्वैतः, जहाँ दो तत्त्व नहीं हैं, वह अद्वैत है। शंकराचार्य जी का कहना है कि वही शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव वाला एक परमतत्त्व-परब्रह्म, माया विशिष्ट होकर सगुण ब्रह्म-अपरब्रह्म बन जाता है और जगत् का निमित्त एवं उपादान कारण बनता है। दूसरे शब्दों में 'ब्रह्म' तो एक ही है, परन्तु माया की उपाधि से कारण ब्रह्म और कार्य ब्रह्म-दो हो जाता है। कार्य ब्रह्म की केवल प्रातिभासिक एवं व्यावहारिक सत्ता है, पारमार्थिक सत्ता केवल कारण ब्रह्म को है। इसी एक तत्त्व को प्रधानता के आधार पर यह सिद्धांत 'अद्वैत' कहलाता है। १०. अधिष्ठान - अधिष्ठान शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं- वासस्थान, रहने का स्थान, स्थिति, मुकाम, आधार, अधिकार आदि। अधिष्ठान से सम्बद्ध अधिष्ठाता शब्द बना है, जिसका अर्थ है- अधिकारी, अध्यक्ष, मुखिया, नियन्ता, देखभाल करने वाला। अधिष्ठान शब्द की व्युत्पत्ति अधि+स्था-अधिकरणे ल्युट् की गयी है। इसके पर्याय हलायुधकोश में नगर, चक्र, प्रभाव, अध्यासन, अवस्थान आदि दिये गये हैं। उपनिषद् के अनुसार पाँच रूपों के त्यागने और अपने स्वरूप में स्थित होने से जो सत्ता (अधिष्ठान) शेष रहती है, उसे परम तत्त्व कहते हैं- पञ्चरूपपरित्यागात्स्वरूपप्रहाणतः । अधिष्ठानं परं तत्त्वमेकं सच्छिष्यते महत् (बह्व० ६)। ११. अनन्त - उस व्यापक-विराट् सृष्टि की रचना करने वाले परमात्मा को अनन्त कहा गया है। यह समूची सृष्टि अन्तहीन, अपरिमित, अप्रमेय या अनन्त है, इसकी रचना करने वाला परमात्मा भी अनन्त ही है। उपनिषद् में यह

अन्तःकरण चतुष्टय [परिशिष्ट] ४३३

तथ्य प्रतिपादित है कि उसे अनन्त इसलिए कहा जाता है कि उसका उच्चारण करते समय नीचे, ऊपर और तिर्यक् कहीं भी अन्त देखने में नहीं आता-यस्मादुच्चार्यमाण एवाद्यन्तं नोपलभ्यते तिर्यगूर्ध्वमधस्तात् तस्मादुच्यते अनन्तः (अ०शिर० ४८)। दिशा को तथा साम को अनन्त कहकर निरूपित किया गया है-अनन्ता हि दिशः (बृह० ४.१.५)। अनन्तं साम (जैमि० १.३५.८)। वह अनन्त परमात्मा व्यक्त-अव्यक्त सृष्टि प्रपञ्च में पूर्ण व्यापक और चैतन्यरूप है-अव्यक्तादि सृष्टिप्रपञ्चेषु पूर्णं व्यापकं चैतन्यमनन्तमित्युच्यते (स०सा० १२)।

१२. अन्तःकरण चतुष्टय— शरीर के अंग-अवयव जिस शक्ति से अपना कार्य-व्यापार सम्पन्न करते हैं, उसे 'इन्द्रियशक्ति' कहते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि शरीरस्थ चैतन्य अंश (जीवात्मा) जिनके माध्यम से कर्त्ता-भोक्ता की भूमिका सम्पन्न करता है, वे इन्द्रियाँ (करण)-साधन कहलाते हैं। ये मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं-१. अन्तरिन्द्रिय, २. बाह्येन्द्रिय। अन्तरिन्द्रिय, जो शरीर के अन्दर सक्रिय होती है, बाहर से उसका कुछ भी स्वरूप प्रकट नहीं हो पाता। इनकी संख्या ४ मानी गयी है। दूसरे शब्दों में इन्हें अन्तःकरण (अन्तरिन्द्रिय) चतुष्टय कहा जाता है। वे हैं- मन, बुद्धि,चित्त और अहंकार। आचार्य शंकर ने अपने विवेक चूड़ामणि में लिखा है- निगद्यतेऽन्तःकरणं मनो धीरहंकृतिश्चित्तमिति स्ववृत्तिभिः (वि० चू० ९५)। अर्थात् अपनी वृत्तियों के कारण अन्तःकरण मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार-इन चार नामों से कहा जाता है। वस्तुतः अन्तःकरण-अन्तरिन्द्रिय एक ही है-मन, वह अपनी वृत्तियों-कार्यों के आधार पर चार रूपों वाला हो जाता है। संकल्प-विकल्प के कारण मन, पदार्थ का विवेकपूर्वक निश्चय करने के कारण बुद्धि, अपना इष्ट चिन्तन करने के कारण चित्त तथा अहं-अहं (मैं- मैं) ऐसा स्वानुभूतिजन्य अभिमान करने के कारण अहंकार कहलाता है-मनस्तु संकल्पविकल्पनादिभिर्बुद्धिः पदार्थाध्यवसायधर्मतः॥ अत्राभिमानादहमित्यहंकृतिः स्वार्थानुसन्धानगुणेन चित्तम्॥ (वि० चू० ९६)। बाह्येन्द्रिय वह होती है, जिसका स्वरूप बाहर से भी प्रकट होता है। यह पुनः दो प्रकार की होती है-१. ज्ञान प्राप्ति की हेतुभूता, २. कर्म सम्पादन की हेतुभूता। ज्ञान प्राप्ति को कारणभूता इन्द्रिय-ज्ञानेन्द्रिय कहलाती है। इसकी संख्या पाँच है-श्रवण, त्वचा, नेत्र, घ्राण और जिह्वा। कर्म सम्पादन समर्था इन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय कहलाती है, इसकी संख्या भी पाँच है-वाक्, पाणि, पाद, गुदा और उपस्थ। इन दसों इन्द्रियों का आचार्य शंकर ने इस प्रकार उल्लेख किया है-बुद्धीन्द्रियाणि श्रवणं त्वगक्षि, घ्राणं च जिह्वा विषयावबोधनात्। वाक्पाणिपादं गुदमप्युपस्थः **कर्मेन्द्रियाणि प्रवणेन कर्मसु॥ (वि० चू० ९४)**अर्थात् श्रवण (सुनने की शक्ति), त्वचा (स्पर्शज्ञान की शक्ति), नेत्र (देखने की शक्ति), घ्राण (सूँघने की शक्ति) और जिह्वा (स्वादानुभूति की शक्ति)-ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, क्योंकि इनसे विषय का ज्ञान होता है तथा वाक् (वाणी), पाणि(हाथ),पाद (पैर), गुदा (मल विसर्जन अंग) और उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय)-ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं, क्योंकि इनका कर्मों की ओर झुकाव होता है। इस प्रकार कुल इन्द्रियाँ (मन, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय मिलकर) ग्यारह हो जाती हैं।

१३. अन्तर्मुख-बहिर्मुख— जिस साधक की वृत्ति आन्तरिक हो, अर्थात् अन्तःकरण की ओर प्रवृत्त होती हो, जो अपने ही विचारों और भावनाओं में तल्लीन रहता हो, वह अन्तर्मुख या आत्मरत कहा जाता है। अन्तर्मुख पुरुष अपनी इन्द्रियों और मन को हठात् आन्तरिक उत्थान में नियोजित कर आत्मशक्ति संचय करता और आत्म उत्कर्ष में लगा रहता है। अन्त में आत्मा में ही विराट् परमात्म चेतना से सम्बद्ध हो जाता है। बहिर्मुख व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को रस, रूप, गन्ध, स्पर्श और शब्द के सुखों में लगाता हुआ आन्तरिक शक्ति और मानसिक शक्ति को खोता चला जाता है। आत्मज्ञानी साधक बाह्य व्यवहार करता हुआ भी अन्तर्मुख रहता है और सदा थके हुए के समान सोता सा दिखाई देता है-अन्तर्मुखतया तिष्ठन्बहिर्वृत्तिपरोऽपि सन्। परिश्रान्ततया नित्यं निद्रालुरिव लक्ष्यते (अक्षि० २.३६)। वह सुषुप्त अथवा बुद्ध अवस्था में भी अन्तर्मुख रहता है-अन्तर्मुखतया नित्यं सुप्तो बुद्धो व्रजन्यठन् ॥ (अ०पू० १.३४)

१४. अन्तर्यामी-साक्षी— उस व्यापक परमात्मा के विभिन्न विशेषणों का निरूपण किया जाता है। वह व्यापक देव घट-घट व्यापी होने से अन्तर्यामी कहा गया है। वह सब कुछ देखने और जानने वाला होने से साक्षी भी कहा गया है। अन्तः-स्थित चैतन्य पुरुष को ही कूटस्थ, क्षेत्रज्ञ, अन्तर्यामी और साक्षी कहते हैं। यह जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में उत्पत्ति और लय को जानने वाला और स्वयं उत्पत्ति और लय से परे रहने वाला जो नित्य

४३४ | परिशिष्ट | अभ्युदय-निःश्रेयस साक्षी-चैतन्य है, वही तुरीय चैतन्य है-अवस्थात्रयभावाभाव साक्षी स्वयंभावरहितं नैरन्तर्यं चैतन्यं यदा तदा तत्तूरीयं चैतन्यमित्युच्यते (स०सा० ४)। ज्ञाता, ज्ञान तथा ज्ञेय को उत्पत्ति तथा लय को जानने वाला, फिर भी स्वयं उत्पत्ति और लय से रहित आत्मा साक्षी कहलाता है - ज्ञातृज्ञानज्ञेयानामाविर्भावतिरोभावज्ञाता स्वयमाविर्भावतिरोभावरहितः स्वयंज्योतिः साक्षीत्युच्यते (स०सा० ९)। इन कूटस्थ आदि उपाधि के भेदों में से स्वरूप लाभ के लिए जो आत्मा समस्त शरीर से माला के धागे को तरह पिरोया हुआ है, वह अन्तर्यामी कहलाता है-कूटस्थोपहितभेदानां स्वरूपलाभहेतुर्भूत्वा मणिगणे सूत्रमिव सर्वक्षेत्रेष्वनुस्यूतत्वेन यदा काश्यते आत्मा तदान्तर्यामीत्युच्यते (स०सा० ११)। जो साधक मोहरहित होकर साक्षी के समान जीवन व्यतीत करता है और बिना किसी फल की इच्छा से कर्म करता है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है (महो० १.५१)। १५. अपराविद्या - द्र०- पराविद्या। १६. अपरिग्रह - अनिवार्य आवश्यकता से अधिक का त्याग अपरिग्रह कहलाता है। योगदर्शन में यम के पाँच भेद वर्णित हैं- १. सत्य, २. अहिंसा, ३. अस्तेय, ४. ब्रह्मचर्य, ५. अपरिग्रह। जैन शास्त्र के अनुसार मोह का त्याग अपरिग्रह है। विषय वस्तुओं को अस्वीकार करना भी अपरिग्रह माना जाता है। महर्षि व्यास ने कहा है कि विषयों के उपभोग में विविध दोष देखकर उन्हें ग्रहण न करने का नाम अपरिग्रह है- विषयाणामर्जनरक्षणक्षयसंगहिंसादोष दर्शनादस्वीकरणमपरिग्रहः (साङ्ख्ययोगदर्शन-व्यास भाष्य)। स्वामी रामतीर्थ यति ने लिखा है कि समाधि के अनुष्ठान में अनुपयुक्त वस्तु का संग्रह न करना अपरिग्रह है। महर्षि पतञ्जलि ने लिखा है कि अपरिग्रह के स्थिर हो जाने पर साधक को जन्म-जन्मान्तरों के विषय में सम्यक् बोध हो जाता है- अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्ता सम्बोधः। (यो० द० २.३९) १७. अप्सरा - अप्सराओं की उत्पत्ति जल (अप्) से मानी जाती है। 'अप्सु जायन्ते इति अप्सराः' - इस व्युत्पत्ति के आधार पर अप्सरा शब्द से जल में या जल से उत्पन्न वनस्पतियां का बोध होता है। वनस्पतियाँ ही प्रारम्भिक तौर पर प्राणदायिनी, सुख-सुविधा (वस्त्र, आवास, भोजन आदि) प्रदान करने वाली थीं। आगे चलकर इन्हीं विशेषताओं से युक्त देवलोक की सुन्दरियों को अप्सरा कहा जाने लगा। अत्यधिक आनन्ददायी होने के कारण कठोपनिषद् में यमराज ने नचिकेता को आत्मज्ञान के बदले अप्सराएँ प्रदान करने की पेशकश की थी, परन्तु नचिकेता ने किसी भी प्रकार इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उनका कहना था कि जिस प्रकार दुनिया के हर सुख-आनन्द नश्वर हैं, उसी प्रकार देवलोक को इन अप्सराओं से प्राप्त होने वाला सुख और आनन्द भी नश्वर होगा। अतः मुझे अप्सरा नहीं आत्मज्ञान चाहिए। कठोपनिषद् में यह कथा बड़े विस्तार से व्याख्यायित है। कहा जाता है कि देवराज इन्द्र इन अप्सराओं के माध्यम से उन लोगों को पथभ्रष्ट कर देते हैं, जो जप-तप द्वारा इन्द्रपद का अधिकार प्राप्त कर लेना चाहते हैं। देवलोक की प्रमुख अप्सराओं के नाम हैं- मेनका, रम्भा, उर्वशी, घृताची, तिलोत्तमा आदि। १८. अभ्युदय-निःश्रेयस - अध्यात्म मार्ग लोगों द्वारा प्रायः पलायनवादी मार्ग माना जाता है। अधिकांश लोगों का मानना है कि 'धर्म-अध्यात्म' घर-द्वार छोड़कर अपनाया जा सकता है अथवा धर्म-अध्यात्म मार्ग पर चलने वालों के घर-द्वार छूट जाते हैं, व्यक्ति एकाकी-अकिंचन स्थिति में रह जाता है, जबकि यथार्थता इससे भिन्न है। इसमें भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के विकास की समस्त सम्भावनाएँ सन्निहित हैं। वैशेषिक दर्शनकार महर्षि कणाद ने धर्म को परिभाषा बताई है- यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः (वै०द०१.१.२) अर्थात् धर्म वह है, जो अभ्युदय (सांसारिक उन्नति ) तथा निःश्रेयस (परम कल्याण-आध्यात्मिक उन्नति) को सिद्ध करने वाला है। ऋषियों को थाती वेदज्ञान के रूप में विद्यमान है। वेदों में ज्ञान (आध्यात्मिक) और विज्ञान (भौतिक) दोनों विद्यमान हैं। उसमें ज्ञान के अन्तर्गत दर्शन, मनोविज्ञान, रहस्यवाद आदि गूढ़ विषय तो हैं ही, उसके साथ ही विज्ञान भी है। विज्ञान के अन्तर्गत तन्त्र प्रयोग, खगोल विज्ञान, ज्योतिष् विज्ञान, औषधि एवं चिकित्सा विज्ञान जैसे विषय समाहित हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय धर्म-अध्यात्म में अभ्युदय-भौतिक उन्नति एवं निःश्रेयस- आध्यात्मिक उन्नति दोनो तत्त्व पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं। जीवन को सार्थकता एवं सर्वतोमुखी विकास के लिए दोनों की उपयोगिता सुनिश्चित रूप से है।

अमृत-मृत्यु [परिशिष्ट] ४३५ १९. अमृत-मृत्यु - ईशावास्योपनिषद् में विद्या और अविद्या दोनों को महत्ता इस तरह प्रतिपादित है कि अविद्या द्वारा मृत्यु को पार करके (रहस्य जानकर) विद्या द्वारा अमरत्व को प्राप्ति की जा सकती है-अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते (ईश०११)। उपनिषद् में मृत्यु से अमृत (अमरत्व) की ओर ले चलने का भाव अभिव्यक्त हुआ है-मृत्योर्माऽमृतं गमय (बृह०१.३.२८)। इसी मन्त्र में असत् और तमस् को मृत्यु का प्रतीक और सत् और ज्योति को अमृत का प्रतीक निरूपित किया गया है। ब्रह्म को ही अमृत स्वरूप माना गया है-यदब्रह्म तदमृतम् (जैमि० १.२५.१०)। कठोपनिषद् के अनुसार जब मनुष्य के हृदय की ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं और समस्त कामनाएँ दूर हो जाती हैं, तो मनुष्य अमरत्व को प्राप्त होता है (कठ०२.३.१४-१५)। गीता में भगवान् कहते हैं कि सुख-दुःख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये ऐन्द्रिय विषय व्याकुल नहीं करते, वह अमृतत्व का अधिकारी होता है- यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते (गी०२.१५)। उपनिषद् के अनुसार बालबुद्धि ही बाह्य भोगों का अनुगमन कर मृत्यु के भयंकर पाशों में फँसते हैं, किन्तु विवेकवान् पुरुष अमरता को अटल जानकर जगत् के अनित्य पदार्थों की कामना नहीं करते-पराचः कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्। अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते (कठ०२.१.२)। मृत्यु इस जगत् का अटल नियम है। गीता में कहा गया है-जन्मने वाले को मृत्यु सुनिश्चित है और मरने वाले का जन्म भी निश्चित है-जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च (गी०२.२७)। २०. अर्वा - द्र० - अश्व । २१. अवधूत - द्र० - संन्यासी। २२. अविद्या, माया, अज्ञान- 'अविद्या' को समझने के लिए विद्या को समझना आवश्यक है। 'विद्या' वह शक्तिधारा है, जिसके द्वारा यथार्थ (जो जैसा है, उसको वैसा हो जानना) का बोध (स्वानुभूति) हो। 'अविद्या' विद्या का विरोधी भाव है-अविद्या तत्त्वविद्या विरोधिनी (वाच०)। 'अविद्या' द्वारा यथार्थ का बोध नहीं हो पाता। झाड़ी को भूत, रस्सी को साँप और सीपी को चाँदी की प्रतीति कराने वाली अविद्या ही है। वेदान्त दर्शन में इसके अनेक पर्याय मिलते हैं, यथा-अज्ञान, माया, अव्यक्त, आकाश, अक्षर, अव्याकृत प्रधान, प्रकृति, अध्यास, शक्ति, उपाधि आदि। आचार्य शंकर ने इसे माया कहते हुए, इसके गुणों को प्रकट करते हुए लिखा है-अव्यक्तानाम्नी परमेशशक्तिरनाद्यविद्या त्रिगुणात्मिका परा। कार्यानुमेया सुधियैव माया, यया जगत्सर्वमिदं प्रसूयते (वि०चू० ११०)। वस्तुतः माया और अविद्या में थोड़ा सा अन्तर है, वह यह कि 'अविद्या' चैतन्य तत्त्व को अपने वशवर्ती बना कर रखती है। इस प्रकार अविद्योपहित चैतन्य 'जीव' कहलाता है, किन्तु जब यही चैतन्य के वशवर्ती होकर उसकी आज्ञानुवर्ती बन जाती है, तो 'माया' कहलाती है और माया को वशवर्ती बनाने वाला चैतन्य 'ईश्वर' कहा जाता है। अविद्या ही चैतन्य-आत्मतत्त्व को अपने प्रभाव से आवृत कर लेती है (देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्- श्वेता० १.३) और उसे कर्म-बन्धनों में आबद्ध संसारी जीव को स्थिति प्रदान कर देती है, जबकि वह शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, चैतन्य (परमात्मा) रूप है। इसके इसी विशेष प्रभाव के कारण इसे 'अनिर्वचनीय' संज्ञा प्रदान की गई है। यह सत् भी है, असत् भी है। इसके द्वारा रस्सी में सर्प का भान होता है, ब्रह्म में जगत् की प्रतीति होती है। ज्ञान होने पर सर्प के स्थान पर रस्सी तथा जगत् के स्थान पर ब्रह्म का बोध होने से यह अस्तित्वहीन (असत्) हो जाती है। इसकी इसी विचित्रता का प्रतिपादन करते हुए आचार्य शंकर लिखते हैं-सन्नाप्यसन्नाप्युभयात्मिका नो भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो। सांगाप्यनंगाप्युभयात्मिका नो महाद्भुतानिर्वचनीयरूपा (वि० चू० १११)। इसी माया के प्रभाव से सभी प्राणी संसार सागर में डूबते-उतराते रहते हैं, इस सागर से पार नहीं जा पाते, तभी तो महात्मा कबीर ने कहा था- माया महाठगिनी मैं जानी। शास्त्र कहते हैं कि समर्पण भाव से परमात्मा के प्रति भक्ति भाव रखने वाले पर इस माया का प्रभाव नहीं हो पाता। वे परमात्मा को सब कुछ समर्पित करके कर्त्ता-भोक्ता भाव से मुक्त होकर इस माया पर विजय पा लेते हैं, अर्थात् भवसागर-भवबन्धन से मुक्त हो जाते है-दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते (गी० ७.१४)। २३. अश्व - पशुओं में पराक्रमवान्, बलिष्ठ और गतिमान् पशु अश्व है। इसके पर्यायवाची शब्दों में अर्वन्, अर्वा, हय, वाजी इत्यादि शब्द है। अश्व शक्ति, बलिष्ठता, चंचलता और गतिशीलता का भी प्रतीक माना गया है। बलिष्ठता के

लिए यह विशेष प्रसिद्ध है- अश्वः पशूनामोजिष्ठो बलिष्ठः (तै० ब्रा० ३.८.७.१), तस्मादश्वः पशूनां वीर्यवत्तमः (ऐत० ब्रा० ५.१)। चंचल तथा अग्रगामी ज्वालाओं से अग्नि को भी अश्व कहकर निरूपित किया गया है- अग्निर्वा अश्वः श्वेतः (शत० ब्रा० ३.६.२.५)। सोऽग्निरश्वो भूत्वा प्रथमः प्रजिगाय (गो० ब्रा० २.४.११)। यज्ञ की चञ्चल अग्नि को यज्ञाश्व संज्ञा से निरूपित किया जाता है। विराट् यज्ञ की कल्पना भी अश्वरूप में बृहदारण्यक उपनिषद् में की गयी है- उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः (बृह० १.१.१)। यह अश्व हय होकर असुरों को और अश्व होकर मनुष्यों को वहन करता है-हयो भूत्वा देवानवहद्वाजी गन्धर्वानर्वाऽसुरानश्वो मनुष्यान् (बृह० १.१.२)। इन्द्रियों का वश में न रह पाना दुष्ट अश्वों की भाँति माना गया है-तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः (कठ०१.३.५)। २४. अश्वमेध - अश्वमेध यज्ञ एक विशिष्ट वैदिक यज्ञ है। इसका प्रमुख उद्देश्य राष्ट्र में सांस्कृतिक एकता स्थापित करना था। इसका अन्य उद्देश्य था- राष्ट्र के पराक्रम को मेधा बुद्धि से संयुक्त करना, जिससे कि अश्व रूपी पाशविक या चञ्चल प्रवृत्तियों का मेध (मर्दन) हो सके। मध्य युग में राजनैतिक एकता स्थापित करने के उद्देश्य से अश्व छोड़कर यह विशिष्ट यज्ञानुष्ठान प्रारंभ किया जाता था। अश्वमेध को सभी यज्ञों का राजा कहा गया है- राजा वाऽएष यज्ञानां यदश्वमेधः (शत० ब्रा० १३.२.२.१)। अश्वमेध सम्पूर्ण राष्ट्र के हित के लिए राष्ट्र के पराक्रम, मेधा, सम्पदा और राष्ट्रीयता के विस्तार के उद्देश्य से ही सम्पन्न किया जाता था, अतः ब्राह्मण ग्रन्थ में कहा गया है- राष्ट्रं वा अश्वमेधः (तै० ब्रा० ३.८.९.४)। सूर्य तपता है और उसी से पराक्रम, सामर्थ्य और मेधा क्षरित होती है, अतः सूर्य को भी अश्वमेध संज्ञा से निरूपित किया गया है-एष ह वा अश्वमेधो य एष (सूर्यः) तपति (बृह० १.२.७)। २५. असम्भूति-सम्भूति - ईशावास्योपनिषद् में सम्भूति और असम्भूति शब्द का प्रयोग हुआ है। जिसका भाष्य करते हुए आचार्य शंकर ने लिखा है-सम्भवन्ं सम्भूतिः सा यस्य कार्यस्य सा सम्भूतिः, तस्या अन्या असम्भूतिः प्रकृतिः कारणमविद्या अव्याकृताख्या। सम्भवन (उत्पन्न होने) का नाम सम्भूति है, वह जिसके कार्य का धर्म है, उसे 'सम्भूति' कहते हैं। उससे अन्य असम्भूति-प्रकृति-कारण अथवा अव्याकृत नाम की अविद्या है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मूल प्रकृति जो दृश्यमान जगत् को आदि कारण है, 'असम्भूति' है और यह दृश्यमान जगत् 'सम्भूति' है। यह दिखायी देने वाला विश्व ब्रह्माण्ड जिसे दर्शन की भाषा में कार्य ब्रह्म भी कहा जाता है- सम्भूति है और इस ब्रह्माण्ड का आदि कारण अव्याकृत - अप्रकट रूप में विद्यमान जिसे दर्शन की भाषा में 'प्रकृति' कहा जाता है- असम्भूति है। ब्रह्माण्ड की तरह पिण्ड में 'सम्भूति-असम्भूति' की स्थिति है। पिण्ड (शरीर) में भी दो स्वरूप का अनुभव होता है -एक तो हाथ-पैर आदि अंग-अवयवों से शारीरिक कार्य करता हुआ-मन मस्तिष्क से सोच- विचार करता हुआ, दूसरा उसका कारण स्वरूप जो दृश्यमान नहीं होता, किन्तु दृश्यमान का कारण अवश्य है। दर्शन की भाषा में दृश्यमान को स्थूल-सूक्ष्म शरीर तथा अदृश्य को कारण शरीर कहा जाता है। यही कारण शरीर 'असम्भूति' तथा स्थूल-सूक्ष्म शरीर 'सम्भूति' की श्रेणी में आता है। उपनिषद् का मानना है कि 'मूल प्रकृति' को- कारण शरीर की - असम्भूति को सब कुछ मानकर उपासना करने वाला तथा दृश्यमान जगत् की स्थूल-सूक्ष्म शरीर को-सम्भूति को सब कुछ मानकर उपासना करने वाला घोर अन्धकार में पड़ने की तरह कल्याण की प्राप्ति नहीं कर पाता, क्योंकि ये दोनों अतिवादी दृष्टिकोण हैं। वस्तुतः मनुष्य को करना क्या चाहिए- इसका स्पष्ट निर्देश उपनिषद्कार ने ईशावास्योपनिषद् के चौदहवें मन्त्र में दिया है-सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयःसह। विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते।।' जो व्यक्ति सम्भूति (दृश्यमान जगत्) और विनाश (नाशरहित मूलकारण- प्रकृति)को साथ-साथ जानता है (उपासना करता है), वह विनाश-अव्याकृत प्रकृति से मृत्यु को पार करके, सम्भूति-दृश्यमान जगत्-कार्यब्रह्म-से अमरत्व को प्राप्त कर लेता है। समन्वयवादी दृष्टिकोण यही है। २६. असुर-राक्षस —शास्त्रों में मनुष्य मात्र को पाँच वर्गों में रखा गया है। चार वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और पंचम निषाद। उसी प्रकार सूक्ष्म लोक या अन्तरिक्ष लोक में पाँच वर्ग या श्रेणियों का वर्णन मिलता है- गन्धर्व, पितर, देवगण, असुर और राक्षस। यज्ञ की सामग्री भी यही ग्रहण करते हैं। इसकी पुष्टि निरुक्त शास्त्र में होती है- पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् । गन्धर्वाःपितरो देवा असुरा रक्षांसीत्येके । चत्वारो वर्णा निषादः पञ्चम इत्यौपमन्यवः (निरु० ३.८)। असुरों को दैत्यों, दानवों या राक्षसों की श्रेणी में गिना जाता है। इन्हें पवित्र यज्ञादि

आकाश [परिशिष्ट] ४३७

कार्यों में विघ्नकारी तथा कुमार्गगामी माना गया है। राक्षसों को कुबेर के धनकोश का रक्षक भी माना गया है। असु का अर्थ प्राण होने से असुर शब्द प्राणवान् या शक्तिमान् का भी बोधक है। असुरों के गुरु भृगुपुत्र शुक्राचार्य माने गये हैं। देवों, मनुष्यों एवं असुरों तीनों को प्रजापति की संतान कहकर स्वीकार किया गया है- त्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुर्देवा मनुष्या असुराः (बृह० ५.२.१)। २७. आकाश - पृथ्वी से ऊपर-नीचे विस्तृत अनंत आकाश (रिक्त स्थान) है, जिसमें सम्पूर्ण विश्व के सब पदार्थ ग्रह-उपग्रह, नक्षत्र, तारे, चन्द्र, सूर्य आदि स्थित हैं, आकाश कहलाता है। पृथ्वी के निकटवर्त्ती आकाश का वह भाग, जिसमें वायु और मेघ होते हैं, अन्तरिक्ष लोक कहा जाने लगा। पञ्चतत्त्वों में से एक तत्त्व आकाश है, जिसका गुण 'शब्द' है और उससे श्रोत्रेन्द्रिय की उत्पत्ति मानी गयी है। द्यौः, द्यु, अभ्र, व्योम, पुष्कर, अम्बर, गगन, नभ, अनन्त, स्वर्ग, खं आदि आकाश के पर्यायवाची शब्द हैं। पृथ्वी के ऊपर के आकाश (स्वर्ग) में तथा नीचे के आकाश (पाताल) में सात-सात लोकों के अस्तित्व का उल्लेख भी मिलता है। याज्ञवल्क्य ने गार्गी से आकाश के विस्तार का वर्णन किया है- जो द्युलोक से ऊपर, पृथ्वी से नीचे और जो द्युलोक एवं पृथ्वी के मध्य में है और द्युलोक एवं पृथ्वी तथा भूत, वर्तमान, भविष्यत्- ये सब आकाश में ओत-प्रोत हैं- यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाशे तदोतञ्च प्रोतञ्चेति (बृह० ३.८.४)। यह सम्पूर्ण विश्व आकाश में ही है- सर्वमित्याकाशे (तैत्ति० ३.१०.३)। २८. आत्मा-जीवात्मा - वेदान्त का प्रमुख प्रतिपाद्य विषय 'आत्मा' ही है। वेदान्त ग्रन्थों में 'आत्मा' के दो स्वरूप परिलक्षित होते हैं- एक शुद्ध-बुद्ध-निर्विकार स्वरूप, जिस पर अविद्या-अज्ञान का, कषाय-कल्मष का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, इसीलिए इसे 'परमात्मा' के समकक्ष माना जाता है- अयमात्मा ब्रह्म (नृ०उ० १.२, रा० उ० २.९), आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् (ऐत० १.१.१), आत्मैवेदं सर्वम् (नृ०उ० ७.४) इत्यादि औपनिषदिक वचन इसके प्रमाण हैं। आत्मा का दूसरा रूप वह है, जो अविद्या-अज्ञान आदि से आवृत होता है, इसे जीव की - जीवात्मा की संज्ञा प्रदान की जाती है। इसी का संसार में बारम्बार आवागमन होता है-अतति सन्ततभावेन जाग्रदादिसर्वावस्थासु अनुवर्त्तते। अत् सातत्यगमने+मनिन् = जीवः (हला०को०)। हलायुध कोश के इस निर्वचन से स्पष्ट है कि जो निरन्तर गतिमान् रहता है, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में शरीर का अनुवर्तन करता है, वह जीव है-एक एव हि भूतात्मा भूते-भूते व्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥ (ब्र०बि० १२) एक एवात्मा मन्तव्यो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु (ब्र०बि० ११), वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ (कठ० २.२.१०) इत्यादि उपनिषद् वाक्य इसी तथ्य का प्रतिपादन करते हैं। वेदान्त का मानना है कि इस 'आत्मतत्त्व' का आनुभूतिक ज्ञान हो जाने पर व्यक्ति (जीव) आवागमन से मुक्त हो जाता है- दुःखों से-शोक से मुक्त होकर परमशान्ति का अधिकारी बन जाता है- एकोवशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ (कठ० २.२.१२) वेदान्त के महान् तत्त्वज्ञ महर्षि याज्ञवल्क्य ने इसी उद्देश्य से अपनी धर्मपत्नी मैत्रेयी को आत्मानुसन्धान का निर्देश दिया था- आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि। आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेद सर्वं विदितम् (बृह० २.४.५) अर्थात् हे मैत्रेयि ! आत्मा ही दर्शन करने, श्रवण करने, मनन करने एवं निदिध्यासन (अनुभव) करने योग्य है। आत्मतत्त्व के दर्शन (साक्षात्कार) से, श्रवण से तथा बुद्धि द्वारा विशेष रूप से जानने (अनुभव करने) से सब कुछ ज्ञान हो जाता है। आत्मज्ञान के अभाव में मुक्ति प्राप्ति सम्भव नहीं- 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' । अतएव समय रहते जीवन के चरम लक्ष्य-आत्मज्ञान की प्राप्ति का परम पुरुषार्थ करके मोक्ष को प्राप्ति कर लेना मानव जीवन का उद्देश्य कहा गया है। २९. आदेश - आदेश शब्द के पर्याय आज्ञा, उपदेश, संकेत, विवरण, भविष्य कथन, विधिवाक्य आदि बताये गये हैं। उस मनोमय पुरुष का सिर यजुर्वेद है। ऋक् तथा साम क्रमशः दक्षिण और उत्तर भाग है। आदेश (विधि वचन) आत्मा (शरीर का मुख्य केन्द्र) है-तस्य यजुरेव शिरः। ऋग्दक्षिणः पक्षः। सामोत्तरः पक्षः। आदेश आत्मा (तैत्ति० २.३.१)। यह उस परम पुरुष का आदेश (संकेत) है, जो बिजली का चमकना है, वह उसके नेत्रों के झपकाने के समान है- तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यद्युतदा३ इतीत्यन्मीमिषदा३इत्यधिदैवतम् (केन०४.४)।

४३८ [परिशिष्ट] आवागमन-चक्र ३०. आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक — सम्पूर्ण विषयों या ज्ञान को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है- १. आधिभौतिक २. आधिदैविक ३. आध्यात्मिक। अन्यान्य प्राणियों के शरीरों अथवा स्थूल भौतिक तत्त्वों से सम्बन्धित विषय आधिभौतिक कहलाते हैं। दैवीय गुणों या देव सम्बन्धी विषयों को आधिदैविक कहा गया है। मन अथवा आत्म तत्त्व से सम्बन्धित विषय आध्यात्मिक कहलाते हैं। केनोपनिषद् में आध्यात्मिक तथ्य (उदाहरण) इस प्रकार है कि हमारा मन ब्रह्म के समीप जाता हुआ प्रतीत होता है, उस ब्रह्म का निरन्तर तीव्रता से स्मरण करता है, इसी मन के द्वारा ब्रह्म प्राप्ति का संकल्प लेता है- अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णः सङ्कल्पः (केन० ४.५)। ३१. आनन्द-परमानन्द — आनन्द का शाब्दिक अर्थ है- सम्यक् रूप से प्रसन्नता (आ+नन्द)। यह आत्मा अथवा परमात्मा के तीन अनिवार्य गुणों (सत्+चित्+आनन्द) में से एक है। अतः यह आत्मतत्त्व से सम्बन्धित है। आत्मा पञ्चकोशों के आवरण में आबद्ध है- जिनमें अन्तिम पंचमकोश आनन्दमय कोश है। यह विशिष्ट आध्यात्मिक सुख है। उपनिषद् के अनुसार आनन्द से ही सभी भूत (प्राणी) उत्पन्न होते हैं, आनन्द से ही जीवित रहते हैं और आनन्द में ही विलीन हो जाते हैं- आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभि संविशन्तीति (तैत्ति० ३.६)। उपनिषदों में अनेक स्थानों पर आत्मा के आनन्दस्वरूप होने का उल्लेख मिलता है- आनन्दरूपममृतं यद्विभाति (मुण्ड०२.२.७), आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् (तैत्ति० ३.६.१), आनन्द आत्मा (तैत्ति०२.५.१)। आत्मा को परमानन्द स्वरूप भी कहा गया है। इसका तात्पर्य निरतिशय सुखस्वरूप अथवा सर्वोच्च आनन्द स्वरूप से है। ब्रह्म की आनन्दरूपता को 'रसो वै सः' (तैत्ति० २. ७) के द्वारा भी प्रतिपादित किया गया है। ब्रह्म अपार अथवा अनन्त आनंद का सागर है। ३२. आपः — आपः शब्द विशेषतया 'जल' के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इसीलिए बादल के लिए आपधर और समुद्र के लिए आपनिधि शब्द प्रयुक्त हुआ है। जल के प्रवाह या आकाश के लिए भी आपः शब्द का उपयोग किया जाता है। आकाश में सतत संचरणशील प्रवाह या आकाशीय ईथर तत्त्व से भी इसकी संगति बिठाई गयी है। संभवतः प्राणरूप होने के कारण आपः को तुलना अन्न से को गयी है- आपो वा अन्नम् (तैत्ति० ३.८.१)। आपः (जल) में तेज प्रतिष्ठित है और तेज में आपः-अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः (तैत्ति०३.८.१)। वैदिक संहिताओं में आपः देवता को कई सूक्तों में स्तुति को गयी है, यहाँ इसका भावार्थ प्रायः सूक्ष्म आकाशीय तत्त्वों (सृष्टि संरचना की मूलभूत इकाई) के रूप में लिया गया है। आपः को प्राणरूप में भी निरूपित किया गया है- प्राणो ह्वापः (जैमि० ३.१०. ९)। वरुणदेव जल में प्रतिष्ठित हैं- स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति। अप्स्विति (बृह०३.९.२२)। सम्पूर्ण देवगणों को भी आपः से सम्बद्ध बताया गया है-आपो वै सर्वा देवताः (ना०प०३.७९)। ३३. आयतन — आयतन शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं- स्थान, मंदिर, विश्रामालय आदि। पुराणों में पवित्र स्थान, मंदिर आदि अर्थ में आयतन शब्द प्रयुक्त हुआ है, जैसे- देवायतन, शिवायतन आदि। विष्णु भगवान् को मङ्गल का आयतन कहकर निरूपित किया गया है- मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरुडध्वजः। मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलायतनो हरिः ॥ छान्दोग्योपनिषद् में वर्णन मिलता है कि जो आयतन को जानता है, वह अपने बन्धु-बान्धवों का आयतन (आश्रय) होता है। निश्चय ही मन (सम्पूर्ण इन्द्रियों का) आयतन है- यो ह वा आयतनं वेदायतनः ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् (छान्दो० ५.१.५)। प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन- यह चतुष्कल पाद ब्रह्म का आयतनवान् नाम वाला है-प्राणः कला। चक्षुः कला। श्रोत्रं कला। मनः कला। एष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम (छान्दो० ४.८.३)। ३४. आवागमन-चक्र — बार-बार जन्म लेना और मरना, भूतल पर आना और जाना, जीवात्मा का विभिन्न योनियों में परिभ्रमण करना आवागमन-चक्र कहलाता है। सभी हिन्दू दार्शनिक और धार्मिक सम्प्रदायों की यह मान्यता है कि जब तक जीव को मोक्ष प्राप्त नहीं होता, वह आवागमन-चक्र में परिभ्रमण करता रहता है। अच्छे-बुरे कर्मों के आधार पर उसे ८४ लाख योनियों में से किस योनि में पुनर्जन्म होगा, इसका निर्धारण होता है। आवागमन-चक्र को भव-बन्धन, संसार चक्र या जन्म-मरण चक्र भी कहते हैं। गीता में कहा गया है कि प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला और पापों को धो डालने वाला अनेक जन्मों के बाद सिद्ध होकर फिर परमगति (मुक्ति) को प्राप्त करता है-

आशा ( परिशिष्ट ) ४३९ प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥ (गी० ६.४५) जो आकाश में स्थित निष्कल तत्त्व का ध्यान करता है, वह भवबन्धन से मुक्त हो जाता है-नभस्थं निष्कलं ध्यात्वा मुच्यते भवबन्धनात् (ब्र०बि०२०)। ३५. आशा — किसी अप्राप्त के पाने की इच्छा को आशा कहते हैं। अभिलषित वस्तुओं के लिए भी आशा शब्द प्रयुक्त हुआ है। ऋषि कहते हैं, पितृगण के लिए स्वधा, मनुष्यों के लिए आशा (इष्ट वस्तुएँ), पशुओं के लिए तृण और जल का आगान करूँ-आशां मनुष्येभ्यः ( आगायानि ) (छान्दो० २.२२.२)। देवगण निश्चय ही सम्पूर्ण विश्व को आशाओं का प्रतिरक्षण करते हैं- एता ह वै देवता विश्वा आशाः प्रतिरक्षन्ति (जैमि० १.३४.११)। जगत् में सर्वप्रथम आशा ही थी, भविष्य में भी वही है, तब सर्वप्रथम अप् तत्त्व संन्यास हुआ-आशा वा इदमग्र आसीद् भविष्यदेव। तदभवत् । ता आपोऽभवन् (जैमि० ४. २२. १)। उपनिषद् में आशा को पिशाचिनी कहा गया है, जो अन्तःकरण में पाये जाने वाले आनन्द के आश्रय में रहती है-आनन्दमंतर्निजमाश्रयन्तमाशापिशाचीमवमानयन्तम् (मैत्रे० १.१२)। मनुष्य अपनी पत्नी को तरह सम्पूर्ण जीवन भर 'आशा' की पूर्ति के लिए अपनी शक्तियों का व्यय करता रहता है, अतः उपनिषद् में निर्देश है कि आशारूप पत्नी को त्यागने वाला तत्काल ही मुक्ति को प्राप्त होता है- आशापत्नीं त्यजेद्भावत्तावन्मुक्तो न संशयः (मैत्रे० २.१२)। ३६. आसक्ति —द्र०- मोह। ३७. आस्तिकता — वेद, परमेश्वर और परलोक इत्यादि में विश्वास करने वाला अथवा ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारने वाला अथवा ईश्वर की सर्वव्यापकता और न्यायकारिता का अनुभव करने वाला आस्तिक और उनका यह गुण आस्तिकता कहलाता है। दर्शन ग्रन्थों में ईश्वर या वेद के प्रति विश्वास दृष्टिगोचर होता है। ईश्वर सर्वव्यापी और न्यायकारी है, ईश्वर की इस सत्ता पर विश्वास ही आस्तिकता है। शंकराचार्य के अनुसार मोक्ष और वेद में श्रद्धा रखना ही आस्तिकता है। मनुस्मृति में भगवान् मनु ने कहा है-नास्तिको वेद निन्दकः अर्थात् वेद का निन्दक ही नास्तिक है। विद्वानों ने नास्तिक को व्युत्पत्तिपरक व्याख्या इस प्रकार को है-नास्ति ( परलोक ) इति मतिर्यस्य स नास्तिकः (अष्टा० ४.४.६० की वृत्ति) 'जिसकी मति परलोक की सत्ता में विश्वास नहीं रखती, वह नास्तिक है'। ३८. इन्द्रिय दमन — शरीर के वे अंग जिनकी शक्ति हमें विषयों का ज्ञान या बोध कराती है 'इन्द्रियाँ' कहे जाते हैं। संस्कारों के प्रभाववश मनुष्य प्रायः इन्द्रियों के माध्यम से अपनी जीवनीशक्ति विषयभोग और कायिक लिप्साओं में गँवाता जाता है। इन्द्रियों को तुष्टि के लिए वह प्रायः फुलझड़ी की तरह अपना बहुमूल्य जीवन रस जलाता रहता है। साधक को योग पथ पर सर्वप्रथम इन्द्रियों को दबाना या बलपूर्वक शान्त करना पड़ता है। इन्द्रियों के नियंत्रण या निरोध की इस प्रक्रिया को इन्द्रिय दमन या इन्द्रिय निग्रह कहते हैं। इसी के द्वारा साधक शक्ति संचय करता हुआ ईश्वर या ब्रह्म से योग प्राप्त करने की स्थिति में हो पाता है। गीता के अनुसार जिसकी इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है-वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता (गी०२.६१)। उपनिषद् में इन्द्रिय निग्रह को ही शौच (शुचिता) कहकर निरूपित किया गया है-शौचम् इन्द्रियनिग्रहः (मैत्रे०२.३)। प्रजापति ने देवों को उपदेश किया था-हे भोग प्रधान देवो ! इन्द्रियों का दमन करो (बृह०५.२.३)। ३९. इन्द्रियाँ —द्र० - अन्तःकरण चतुष्टय। ४०. इष्टापूर्त — वेद का पठन-पाठन, अग्निहोत्र और अतिथि सत्कार इष्ट कहलाते हैं और कुआँ, तालाब खुदवाना, देवमंदिर बनवाना, बगीचा लगाना आदि कर्म पूर्त कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में यज्ञ-यागादि अदृश्य फल वाले कर्मों को इष्ट कहते हैं और लोकहितकारी दृश्य फल वाले कर्मों को पूर्त कहते हैं अर्थात् लोक-परलोक के हितकारी सभी कर्मों को इष्टापूर्त कहते हैं। आत्मज्ञान को प्रधान मानने वाली उपनिषद् में वर्णन मिलता है कि इष्टापूर्त कर्मों को ही श्रेष्ठ मानने वाले विमूढ़ लोग उससे भिन्न यथार्थ श्रेय को नहीं जानते-इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः (मुण्ड० १.२.१०)। कठोपनिषद् में वर्णन है कि ब्राह्मण का सत्कार न करने वाले के उत्तमवाणी के फल और इष्टापूर्त कर्मों के फल का नाश हो जाता है (कठ०१.१.८)। मनुष्यों में जो लोग इष्टापूर्त कर्मों को ही करने योग्य कर्म मानकर उनकी उपासना करते हैं, वे चन्द्रमा के लोक को ही जीतते हैं- तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते (प्रश्न०१.९)।

४४० परिशिष्ट उपनिषद् ४१. ईश्वर-जीव — अद्वैत वेदान्त में 'एकमेवाद्वितीयम्' जैसे श्रुति वचनों द्वारा जिस नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, कूटस्थ, निष्क्रिय, अविकारी आदि विशेषणों से विभूषित परम चैतन्य का प्रतिपादन है, उसी को 'ब्रह्म' कहा गया है। 'ब्रह्म' के दो रूपों की परिकल्पना वेदान्त ग्रन्थों में प्राप्त होती है-प्रथम-परब्रह्म, द्वितीय-अपरब्रह्म। 'परब्रह्म' वह है, जो अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम् ......अर्थात् शब्दस्पर्शादिरहित, शुद्ध-बुद्ध, मुक्त स्वभाव वाला है। यह अविकारी और कूटस्थ है। यही 'ब्रह्म' जब सृष्टि-सृजन हेतु संकल्पवान् होता है, तो माया की शक्ति से समन्वित हो जाता है, इसे 'अपरब्रह्म' या 'सगुणब्रह्म' कहते हैं। इसी अपरब्रह्म को 'ईश्वर' भी कहा जाता है। 'माया' से परिच्छिन्न होने पर ही ब्रह्म का ईश्वरत्व, सर्वज्ञत्व तथा जगत् कारणत्व आदि सिद्ध होता है। जैसा कि विद्यारण्य स्वामी ने लिखा है- तच्छक्त्युपाधिसंयोगाद् ब्रह्मैवेश्वरतां व्रजेत् (पंच०३.४०)। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि माया को उपाधि से अवच्छिन्न (संयुक्त) ब्रह्म ही ईश्वर है। माया ईश्वर के अधीन होती है और जब माया (अविद्या) चैतन्य को अपने वशीभूत कर लेती है, तो वह अविद्याग्रस्त चैतन्य 'जीव' कहा जाता है। माया से संयुक्त, किन्तु माया को अपना वशवर्ती बनाने वाला चैतन्य ईश्वर और माया का वशवर्ती बना चैतन्य 'जीव' कहा जाता है, वस्तुतः ये दोनों उस परब्रह्म के ही रूप हैं। 'ईश्वर' को जगत् का निमित्त कारण माना जाता है। जैसे कुम्भकार घड़ा बनाता है, तो घड़े का निमित्त कारण कुम्भकार हुआ, किन्तु घड़ा बनता है मिट्टी से, इसलिए मिट्टी 'उपादान' कारण है, परन्तु जगत् के निर्माण में ईश्वर निमित्त कारण भी है और उपादान कारण भी, क्योंकि वही विविध नाम रूपात्मक जगत् के रूप में परिणत हो जाता है, जैसे मकड़ी जाला बनाती है, तो जाला बनाने की योग्यता के कारण वह निमित्त कारण होती है और जाला बनाने का पदार्थ भी अपने भीतर शरीर से ही निःसृत करती है, इसलिए वही उपादान कारण भी होती है। आवरण और विक्षेप शक्ति के आधार पर ईश्वर की उपादान कारणता सिद्ध होती है। जैसे रस्सी में सर्प की प्रतीति। आवरण शक्ति से 'रस्सी' का स्वरूप ढँक जाता है और विक्षेप शक्ति से 'रस्सी' के स्थान पर सर्प की प्रतीति होने लगती है। इसी तरह से आवरण शक्ति से ईश्वर का स्वरूप ढँक जाता है और विक्षेप द्वारा ईश्वर जगत् के रूप में दिखने लगता है। इस प्रकार 'ईश्वर' जगत् का निमित्त कारण तथा उपादान कारण दोनों है। जैसा कि डॉ० राधाकृष्णन् जी ने लिखा है-'ईश्वर' बिना साधनों से सृष्टि रचना करता है। अपनी महान् शक्तियों के द्वारा वह अपने को अनेक कार्यरूपों में परिणत कर लेने में समर्थ है। ४२. उद्गीथ — उद्गीथ शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- उद्+गै+थक्। अमरकोश के अनुसार इसका अर्थ है- प्रणवः सामवेद ध्वनिः इत्यरुणः (५.१९ वृत्ति)। उद्गीथ एक प्रकार का सामगान है। प्रणव अथवा ओंकार को भी उद्गीथ कहा गया है। ॐ यह अक्षर उद्गीथ का प्रतीक है- ओमित्येतदक्षरमुद्गीथः (छान्दो०१.१.५)। साम के भेद या विभाग इस प्रकार किये गये हैं- हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार, उपद्रव और निधन। यहाँ प्राण को उद्गीथ रूप वर्णित किया गया है- मन एव हिंकारो वाक् प्रस्तावः प्राण उद्गीथः (जैमि०१.३३.३)। उद्गीथ को देवों के लिए अमृत कहा गया है-उद्गीथं देवेभ्योऽमृतम् (जैमि० १.११.८)। जो उद्गीथ है, वही प्रणव अक्षर है और जो प्रणव है, वही उद्गीथ है। विचरणशील सूर्य भी उद्गीथ ही है- अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथः (छान्दो०१.५.१)। वाणी का रस ऋचा है, ऋचा का रस साम है और साम का रस उद्गीथ है- वाचः ऋग्रसः ऋचः सामरसः साम्नः उद्गीथो रसः (छान्दो०१.१.२)। ४३. उपनिषद् — 'उपनिषद्' शब्द की व्युत्पत्ति में सद् 'षदॢ विशरणगत्यवसादनेषु' धातु के पहले 'उप' और 'नि' ये दो उपसर्ग और अन्त में 'क्विप्' प्रत्यय लगता है। जिसका भावार्थ है-गुरु के निकट गूढ़ धर्म एवं रहस्यमय ज्ञान प्राप्ति के लिए बैठना। अमरकोश में उपनिषद् शब्द का अर्थ (धर्मे रहस्युपनिषत् स्यात् ) गूढ़ धर्म एवं रहस्य लिया गया है। उपनिषद् में जीवन और जगत् के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन, निरूपण तथा विवेचन है। वैदिक साहित्य के चार भाग किये गये हैं-१. संहिता, २. ब्राह्मण, ३. आरण्यक तथा ४. उपनिषद्। वैदिक साहित्य का अन्तिम भाग होने से उपनिषद् वेदान्त भी कहा जाता है। उपनिषद् का प्रमुख विषय ब्रह्म का निरूपण होने से इन्हें ब्रह्मविद्या भी कहा गया है। उपनिषदों में दो प्रकार की विद्याओं का उल्लेख है- १. परा और २. अपरा। पराविद्या ब्रह्मविद्या है, जिसका प्रमुख प्रतिपाद्य विषय ब्रह्म है। अपरा विद्या के अन्तर्गत संहिताओं, ब्राह्मणों तथा

उपप्राण [परिशिष्ट] ४४१

वेदाङ्गों का विवेचन दृष्टिगोचर होता है। उपनिषदों को कालक्रम के आधार पर दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-१. प्राचीन उपनिषद्, २. परवर्ती उपनिषद्। प्राचीन उपनिषद् वैदिक शाखाओं पर आधारित हैं। परवर्ती उपनिषद् मध्ययुग के धार्मिक सम्प्रदायों की देन हैं। उस ब्रह्म विषयक (ब्राह्मी) उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) का विवरण केनोपनिषद् में मिलता है। उस ब्रह्मविद्या के तीन आधार हैं- तप, दमन (इन्द्रिय-निग्रह) और निष्काम कर्म। सम्पूर्ण वेद उसी के अङ्ग हैं और सत्यरूप परमात्मा ही उसका अधिष्ठाता है-ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति। तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा। वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् (केन०४.७-८)। साधक यथार्थ तत्त्व को प्रकट करने वाली (उपनिषद्) विद्या के द्वारा जो कुछ भी श्रद्धापूर्वक करता है, वही अधिकाधिक सामर्थ्ययुक्त होता है- यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति (छान्दो०१.१.१०)।

४४. उपप्राण - द्र० - प्राण।

४५. उपाधि- जो वस्तु जिस विशेष रूप में दिखाई देती है, उस विशेष रूप को उस वस्तु को उपाधि कहते हैं अथवा जिसके संयोग से कोई वस्तु किसी विशेष रूप में दिखाई देती है, उसे उस वस्तु की उपाधि कहते हैं। जैसे साधारण वस्त्र जब किसी रंग विशेष में रंग दिया जाता है, तो वह उसी रंग का-लाल, नीला हो जाता है। यह लाल, नीला रंग उस वस्त्र को उपाधि कहलाता है। वेदान्त दर्शन में माया के संयोग या असंयोग से ब्रह्म के दो भेद निरूपित किये गये हैं- सोपाधि ब्रह्म (जीव) और निरुपाधि ब्रह्म। सोपाधि ब्रह्म की ब्रह्म का सगुणरूप तथा निरुपाधि ब्रह्म को ब्रह्म का निर्गुण रूप स्वीकार किया गया है। वह परब्रह्म त्वं और तत् आदि उपाधियों से भी परे है। मन आदि सूक्ष्म तत्त्वों की उपाधि जो आत्मा के साथ संयुक्त रहती है, उसे लिङ्ग शरीर कहते हैं।

४६. उपासना- जीव अपने इष्ट से एकाकार होने का अभ्यास जिस प्रक्रिया से करता है, उसे उपासना कहते हैं। इसमें भक्त भगवान् के प्रति समर्पण का अभ्यास करता है और शनैः-शनैः तद्रूप होने लगता है। उपासना का अर्थ पास बैठना (उप= समीप+आसन= बैठना) अथवा सेवा के रूप में विशेष रूप से लिया जाता है। कहीं-कहीं इसका अर्थ उपवास करना भी लिया गया है। उपनिषद् में कहा गया है जो केवल अविद्या (पदार्थपरक विद्या) की उपासना करते हैं, वे घोर अंधकार में फँस जाते हैं और जो केवल विद्या (चेतनापरक) की उपासना करते हैं, वे भी घोर अंधकार में फँस जाते हैं (ईश०९)। उपासना को ब्रह्म साक्षात्कार का साधन स्वीकार किया गया है। उपासना से साधक का चित्त एकाग्र हो जाता है। यह चित्त की एकाग्रता निर्विशेष ब्रह्म का साक्षात्कार कराने में समर्थ है- सगुणोपासनमपि चित्तैकाग्र्य द्वारा निर्विशेषब्रह्मसाक्षात्कारे हेतुः (वे०परि०)।

४७. ऋत-सत्य- प्रिय भाषण या सत्य वचन के अर्थ में सामान्यतः ऋत शब्द का प्रयोग होता है। इसके अन्य पर्यायवाची शब्द हैं- मोक्ष, जल, कर्मफल, यज्ञ, सूर्य, ब्रह्म, प्राकृतिक नियम, ईश्वरीय नियम, अनुकूल वचन। ऋत शब्द का प्रयोग अनुकूल वचन के अर्थ में इस प्रकार हुआ है- ऋतं वदिष्यामि (तै०आ०७.१.१)। ऋतं च सत्यं च वदत (तै०सं०३.२.७.१)। यज्ञ को भी ऋत कहा गया है- एष वा ऋतस्य पन्था यद्यज्ञः (मै०ब्रा०४.८.२), यज्ञो वाऽ ऋतस्य योनिः (शत०ब्रा०१.३.४.१६)। ॐ तथा ब्रह्म को भी ऋत से सम्बद्ध किया गया है- ओमित्येतदेवाक्षरममृतम् (जैमि०३.३६.५), ब्रह्म वा ऋतम् (शत०ब्रा०४.१.४.१०)। मन को भी ऋत कहकर निरूपित किया गया है-मनो वा ऋतम् (जैमि०३.३६.५)। वस्तुतः शाश्वत अटल नियम को ऋत कहते हैं और देश, काल के अनुसार बदल जाने वाले नियम को 'सत्य' कहते हैं। जल का नीचे की ओर प्रवाहित होना, अग्नि की लपटों का ऊपर की ओर उठना, सूर्य का उदय पूर्व दिशा में होना इत्यादि शाश्वत नियमों को 'ऋत' कहेंगे और ठण्डक के दिनों में भारत में दिन का छोटा होना, रात्रि का बड़ा होना, गर्मी में दिन का बड़ा होना, रात्रि का छोटा होना जैसे नियम देश, काल के अनुसार बदलते हैं, सर्दी-गर्मी का मौसम बदलता रहता है। यह सत्य है, किन्तु ऋत नहीं।

४८. ऋत्विज्- यज्ञ कराने वाले-याज्ञिक को ऋत्विज् कहा गया है। ऋत्विजों में चार प्रमुख होते हैं-ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता और उद्गाता। कहीं-कहीं प्रमुख ऋत्विजों को संख्या सात मानी गई है- होता, पोता, नेष्टा, आग्नीध्र, प्रशास्ता, अध्वर्यु और ब्रह्मा। ब्रह्मा यज्ञ की देखरेख मौन रहकर करता था। अध्वर्यु यज्ञ में व्यावहारिक कार्य-निर्देश एवं व्याख्या करता था। होता ऋचाओं का-यज्ञमंत्रों का उच्चारण तथा देवस्तुति करता था। उद्गाता का सम्बन्ध यज्ञ में

४४२ [परिशिष्ट] एकादशद्वार-एकादश अक्ष गायन (सामगान आदि) से होता था। बड़े यज्ञों में इन चारों ऋत्विजों के तीन-तीन अन्य सहयोगी भी होते थे। इस प्रकार यज्ञ में सोलह ऋत्विज् वरण किये जाते थे-षोडशर्त्विजो ब्रह्मोद्गातु होत्रध्वर्यु...... (का०श्रौ० ७.१.७)। चत्वारस्त्रिपुरुषाः। तस्य तस्योत्तरे त्रयः (आ०श्रौ०४.१.४-५)। ब्रह्मा के सहयोगी ऋत्विज्-ब्राह्मणाच्छंसी, आग्नीध्र एवं पोता, अध्वर्यु के सहयोगी ऋत्विज्-प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा और उन्नेता, होता के सहयोगी ऋत्विज्-मैत्रावरुण, अच्छावाक् और ग्रावस्तुत् एवं उद्गाता के सहयोगी ऋत्विज्-प्रस्तोता, प्रतिहर्ता एवं सुब्रह्मण्य होते थे। ४९. ऋद्धि-सिद्धि — ऋद्धि भौतिक समृद्धि का द्योतक है और सिद्धि आध्यात्मिक विभूति या सफलता आदि का द्योतक है। दूसरे शब्दों में ऋद्धि-सिद्धि समृद्धि और सफलता का बोधक है। ऋद्धि को लौकिक सुख-सम्पदा से तथा सिद्धि को अलौकिक शक्ति या विभूति से सम्बद्ध किया जाता है। योग की अष्टसिद्धियाँ प्रसिद्ध हैं- अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। भगवान् ने गीता में कहा है कि मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ तू सिद्धि को प्राप्त होगा-मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि (गी० १२.१०)। ५०. ऋषि — वेद मन्त्रों का द्रष्टा या उनका साक्षात्कार करने वाला या आध्यात्मिक तत्त्वों का द्रष्टा और प्रयोक्ता ऋषि कहलाता है। वेद मन्त्रों का अनुभूतिजन्य तत्त्वदर्शन समझने वाले, त्रिकालज्ञ, दिव्यदृष्टि सम्पन्न परोक्ष द्रष्टा को भी ऋषि कहते हैं। रत्नकोष के अनुसार ऋषि सात प्रकार के हैं-ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि, राजर्षि। भिन्न-भिन्न मन्वन्तरों में भिन्न-भिन्न ऋषि हुए हैं। इस वैवस्वत मन्वन्तर के सप्तर्षि ये हैं-कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज। अपाला, विश्ववारा, घोषा, सूर्या आदि महिलाओं ने भी वैदिक काल में ऋषित्व को प्राप्त किया था। उपनिषद् में वर्णन है कि ऋषिगण जो आसक्ति से परे विशुद्ध अन्तःकरण वाले होते हैं, वे परमात्मा को प्राप्त होकर ज्ञान से तृप्त और परम शान्त हो जाते हैं- संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः (मुंड० ३.२.५)। गीता में भी वर्णन मिलता है कि निष्पाप, छल, कपटरहित संयत आत्मा वाले सब प्राणियों के हित में रत रहने वाले, ऋषिगण ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करते हैं-लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः (गी० ५.२५)। ५१. एकत्व-ऐक्य — उपनिषदों में जीव और ब्रह्म में-आत्मा और परमात्मा में एकत्व-ऐक्य (एक होने का भाव) प्रतिपादित किया गया है। जीवो ब्रह्मैव नापरः; एकमेवाद्वितीयम् (छान्दो० ६.२.१)। ब्रह्म ही अज्ञान की उपाधि से संयुक्त होकर जीव कहलाता है। एक ही ईश्वर (इन्द्र) माया से संयुक्त होकर विविध रूपों को प्राप्त होता है-इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते (ऋ० ६.४७.१८)। एक ही परमात्मा प्रत्येक प्राणी में अवस्थित होकर उसी प्रकार विविध रूपों में दिखाई दे रहा है, जैसे चन्द्रमा एक होते हुए विभिन्न जलों में विविध रूपों में दिखाई देता है- एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्॥ (ब्र० बि० १९) गीता में श्रीकृष्ण का कथन है कि कुछ ज्ञानयज्ञ द्वारा एकत्व (अद्वैत) भाव से और पृथकत्व (द्वैत) भाव से विराट् पुरुष की उपासना करते हैं-ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् (गी० ९.१५)। ५२. एकर्षि अग्नि — मुण्डकोपनिषद् में वर्णित है कि जो निष्काम कर्मनिष्ठ, श्रुतिज्ञान के ज्ञाता और ब्रह्म के उपासक एकर्षि नामक अग्नि में श्रद्धापूर्वक हविष्यान्न अर्पित करते हैं, उन्हीं को विधिपूर्वक ब्रह्मविद्या का उपदेश करना चाहिए-क्रियावन्त श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षिं श्रद्धयन्तः। तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद्यैस्तु चीर्णम् (मुण्ड० ३.२.१०)। एकर्षि अग्नि का उल्लेख अन्यत्र कहीं नहीं मिलता है। कुछ विद्वज्जन एकर्षि अग्नि की संगति आत्मज्योति रूप अग्नि से बिठाते हैं। कहीं इसे प्राणाग्नि अथवा आत्माग्नि के रूप में स्वीकार किया गया है। कुछ विद्वानों ने एकर्षि शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की है-एक एव ऋषति गच्छति अर्थात् जो एक (अकेला) गतिमान् रहता है। कुछ विद्वानों के अनुसार सभी देवताओं में जो अग्नि विद्यमान रहती है, उसी अग्नि में ही वे सभी आहुतियों को ग्रहण या धारण करते हैं, उसे ही एकर्षि अग्नि कहा जाता है। ५३. एकादशद्वार-एकादश अक्ष — मनुष्य शरीर को एकादश द्वारों वाला अथवा एकादश अक्ष कहा गया है। यह शरीर दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र, एक मुख, ब्रह्मरन्ध्र, नाभि, गुदा और उपस्थ इन ग्यारह द्वारों वाला है। वह विशुद्ध अजन्मा परमेश्वर एकादश द्वारों वाले मनुष्य शरीर में रहता है, उसका ध्यान-अनुष्ठान करके मनुष्य कभी शोक नहीं करता और जीवनमुक्त होकर बन्धनों से मुक्त ही जाता है- पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः।

एषणात्रय परिशिष्ट ४४३ अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते (कठ० २.२.१)। उपनिषद् में ही मनुष्य शरीर को नवद्वार (दो आँख, दो कान, दो नासिका, एक मुख, एक गुदा, एक उपस्थ) वाला भी स्वीकार किया गया है-नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः (श्वेता० ३.१८)। ५४. एषणा त्रय - एषणा का शाब्दिक अर्थ इच्छा, चाह, प्रार्थना, याचना आदि है। सामान्य मनुष्य त्रय एषणा के बन्धन में फँसा होता है। ये एषणाएँ हैं-पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा। उपनिषद् में वर्णन है कि त्यागी पुरुष पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा से ऊँचे उठकर भिक्षाचर्या करते थे- ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति (बृह० ४.४.२२)। ब्राह्मण पुरुष भी आत्मा को जानकर त्रय एषणाओं से ऊँचे उठ जाते हैं (बृह०३.५.१)। परिव्राजक के लिए तीनों एषणाओं, तीनों वासनाओं, ममता एवं अहंकार का परित्याग करने का निर्देश है-एषणात्रयवासनात्रयममत्वाहंकारादिकं वमनान् (प०प० २)। ५५. ओङ्कार- ओङ्कार अथवा प्रणव परमात्मा का ही नाम अथवा प्रतीक है। ॐकार-यह अकार, उकार तथा मकार तीन वर्णों से बना हुआ है। ये तीनों अक्षर तीन शक्तियों-त्रिदेवों का बोध कराते हैं-अकारो विष्णुरुद्दिष्ट उकारस्तु महेश्वरः। मकारेणोच्यते ब्रह्मा प्रणवेन त्रयो मताः॥ इस प्रकार ॐ को ही ब्रह्म और सब कुछ स्वीकार किया गया है-ओमिति ब्रह्म। ओमितीदःसर्वम् (तैत्ति० १.८.१)। ओम् ही सभी मुमुक्षुओं का ध्येय है- ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वं मुमुक्षुभिः (ध्या०बि० ९)। ओम् ही उपास्य हैं, यही अपरिमित तेजरूप अग्नि आदित्य और प्राण है-तस्मादोमित्यनेनैतदुपासीताऽपरिमितं तेजः। तत् त्रेधाऽभिहितमग्नावदित्ये प्राणे (मैत्रा० ६.३७)। तीन अक्षरों के प्रणव के उच्चारण से योगी संसार के जन्म बन्धन से मुक्त हो जाते हैं-.....त्र्यक्षरं प्रणवं तदेतदोमिति। यमुक्त्वा मुच्यते योगी जन्मसंसारबन्धनात् (आ०बो०१)। ॐ अक्षर को जानकर जो जैसा चाहता है, वह वैसा पाता है- एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम्। एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् (कठ०१.२.१६)। ५६. कर्म- कर्म का सामान्य अर्थ क्रिया अथवा गति से है। दर्शन में इसे आध्यात्मिक तत्त्व कहा गया है, जिसे आत्मा संसार में वहन करता है। संसार में कर्मचक्र सुनिश्चित तथ्य है। निखिल ब्रह्माण्ड में देव, ग्रह, नक्षत्र तथा सभी चराचर अपने-अपने कर्म के कारण स्थित और गतिमान् हैं। उपनिषद् में इन्द्रियों द्वारा को जाने वाली क्रियाओं को कर्म कहा गया है, जो 'मैं करता हूँ', इस प्रकार को अध्यात्म निष्ठा से किया गया हो-कर्मेति च क्रियमाणेन्द्रियैः कर्माण्यहं करोमीत्यध्यात्मनिष्ठतया कृतं कर्मैव कर्म (निरा० ११)। गीता के अनुसार कर्म तीन प्रकार के कहे गये हैं-सात्त्विक, राजसी, तामसी। वेदों में तीन प्रकार के कर्मों का विधान है-नित्य, नैमित्तिक और काम्य। गीता के अनुसार सभी प्रकृति से उत्पन्न गुणों के अनुसार वशीभूत हुए कर्म करते हैं- कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः (गी० ३.५)। गीता में नियत कर्म करने का आदेश है, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है- नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः (गी० ३.८)। यज्ञ के लिए किये जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त अन्य कर्मों से यह लोक कर्म बन्धन में फँसता है, अतः आसक्ति रहित होकर यज्ञ के लिए कर्म करने का निर्देश आगे है- यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर (गी० ३.९)। कर्म की गति अत्यन्त गूढ़ है-गहना कर्मणो गतिः (गी०४.१७)। उपनिषद् कर्म करते हुए सौ वर्ष जीवित रहने की बात कहते हैं और यह भी कहते हैं कि इसके अतिरिक्त मनुष्य के कल्याण का और कोई मार्ग भी नहीं है- कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतःसमाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे (ईशा०२)। ५७. कर्मफल - मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है, परन्तु कर्मफल भोगने में पराधीन है। उसे किये हुए कर्मों का फल अवश्य मिलता है। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्मशुभाशुभम् (ना०पु० ३१.७०)। पिछले जन्मों का कर्मफल ही हमारा भाग्य या प्रारब्ध कहलाता है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- कर्म करने में आपका अधिकार है, फल प्राप्ति में कभी नहीं। कर्मों के फल की इच्छा मत करो, कर्म न करने में भी आसक्ति न रखो-कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि (गी० २.४७)। कर्मफल को त्यागकर युक्त पुरुष निष्ठा से भरी शान्ति को प्राप्त होता है- युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् (गी० ५.१२)। ध्यान से भी कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है, त्याग से शीघ्र शान्ति प्राप्त होती है, जैसा कि भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा है- ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् (गी० १२.१२)।

४४४ [परिशिष्ट] क्षेत्रज्ञ ५८. कवि-मनीषी— कवि शब्द के अर्थ कोश ग्रन्थों में सर्वज्ञ, विचारवान्, प्रतिभाशाली, प्रशंसनीय, दूरदर्शी विद्वान्, त्रिकालज्ञ पुरुष, मनीषी आदि दिये गये हैं। मनीषी शब्द के अर्थ पंडित, विद्वान्, बुद्धिमान्, मेधावी, स्तोता आदि दिये गये हैं। उपनिषदों में उस परब्रह्म परमात्मा को ही कवि-मनीषी कहकर प्रतिपादित किया गया है- कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतो (ईश० ८)। गीता में कहा गया है कि क्या कर्म है और क्या अकर्म, इसमें कविगण (बुद्धिमान्) भी मोहित हो जाते हैं- किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः (गी० ४.१६)। गीता ८.९ में परमेश्वर को कवि कहा गया है। कवि त्रिकालदर्शी एवं सर्वज्ञ होता है। परमेश्वर कवि है, तो सृष्टि उसकी कविता, निर्माता होने के कारण भी उसे कवि कहते हैं। उस पुराण पुरुष, सर्वेश्वर, सब देवों के उपास्य देव को कवि कहकर उपन्यस्त किया गया है-कविं पुराणं पुरुषं सनातनं सर्वेश्वरं सर्वदेवैरूपास्यम् (महो० ४.७१)। ५९. कामधेनु— यह मान्यता है कि समुद्र मंथन के चौदह रत्नों में एक रत्न कामधेनु भी थी, जिससे जो माँगा जाय, उसकी पूर्ति हो जाती थी। सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ति करने वाली इस धेनु (गाय) को कामधेनु कहा गया। वसिष्ठ ऋषि के पास भी ऐसी ही एक कामधेनु थी, जिसे शबला या नंदिनी नाम से जाना जाता था। जमदग्नि ऋषि के पास भी एक कामधेनु थी, जिसके बल पर उन्होंने हैहयराज का भव्य स्वागत किया था। ६०. कूटस्थ— 'कूटस्थ' शब्द के अर्थ हैं- सर्वोच्च स्थित, गूढ़ स्थित अथवा गुप्त रूप में स्थित, अन्तर्व्याप्त, अन्तर्यामी, परमेश्वर, जीवात्मा, सर्वोपरि स्थित, अचल, अविनाशी। न्याय दर्शन में परमेश्वर को कूटस्थ कहा गया है, जो जन्म- गुण से रहित है। सांख्य दर्शन की मान्यता के अनुसार कूटस्थ आत्मा-पुरुष है, जो परिमाणरहित है तथा जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में एक समान है, निर्लिप्त और द्रष्टा मात्र है। शाक्त परम्परा के अनुसार सर्वोच्च अन्तिम अवस्था में विष्णु या शिव एक ही परमात्मा है। केवल सृष्टिकाल में ये भिन्न होते हैं। कूटस्थ पुरुष जीवात्माओं का समष्टिगत रूप है। अव्यक्त पुरुष को भी कूटस्थ कहा गया है। जड़ प्रकृति के संसर्ग से परे अपने स्वरूप में स्थित मुक्त आत्मा कूटस्थ है। गीता के अनुसार इस लोक में क्षर और अक्षर दो प्रकार के पुरुष हैं। सब प्राणियों के शरीर तो क्षर हैं और कूटस्थ (आत्मा-पुरुष) अक्षर कहा जाता है-द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च/क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते (गी० १५.१६)। उपनिषद् ज्ञान के अनुसार ब्रह्मा से लेकर चींटी तक सब प्राणियों की बुद्धि में रहने वाला और उनके स्थूल-सूक्ष्म आदि देहों का नाश होने पर जो शेष रहा दिखाई देता है, वह कूटस्थ कहा जाता है-ब्रह्मादिपिपीलिकापर्यन्तं सर्वप्राणिबुद्धिष्वविशिष्टतयोपलभ्यमानः सर्वप्राणिबुद्धिस्थो यदा तदा कूटस्थ इत्युच्यते (स०सा० १०)। ६१. क्रतु— क्रतु शब्द के पर्याय कोश ग्रन्थों में यज्ञ, अश्वमेध, विवेक, प्रज्ञा, संकल्प, इच्छा आदि मिलते हैं। वह परम पुरुष क्रतुमय (संकल्पमय) ही है- अथ खलु क्रतुमयः पुरुषः (छान्दो० ३.१४.१)। उपनिषद् में लिखा है- छन्द, यज्ञ, क्रतु, (अग्निष्टोम आदि विशिष्ट यज्ञ कर्म), व्रत जो भी वेद वर्णित हैं, उनका अधिष्ठाता वह मायावी पुरुष है- छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति। अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत् तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः (श्वेता० ४.९)। वह परम पुरुष सम्पूर्ण क्रतुओं द्वारा यजन किया जाता है- स सर्वैः क्रतुभिर्यजते (अव्यक्तो० ७.१)। ६२. क्षेत्रज्ञ— शरीर रूपी क्षेत्र का ज्ञाता, सर्वसाक्षी अथवा जीवात्मा के अर्थ में क्षेत्रज्ञ शब्द प्रयुक्त हुआ है। शरीर के अधिष्ठाता, आत्मा अथवा परमात्मा के पर्याय रूप में भी क्षेत्रज्ञ प्रयुक्त हुआ है। उपनिषद् के अनुसार शरीर में जो प्रकाशमान चैतन्य स्वरूप है, वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है- तत्र यत् प्रकाशते चैतन्यं स क्षेत्रज्ञ इत्युच्यते (स०सा० ८) उस परमात्मा का अंश ही सब चेतन, प्राणियों में जीवात्मा बना है। वही प्रत्येक शरीर में क्षेत्रज्ञ रूप में विद्यमान है- अस्यांशोऽयं यश्चेतनमात्रः प्रतिपुरुषं क्षेत्रज्ञः (मैत्रा० २.५)। यही क्षेत्रज्ञ लिङ्ग शरीर में संकल्प, अभिमान तथा अध्यवसाय के रूप में प्रतिष्ठित है। यह विशुद्ध, नित्य, मुक्त, असंग तथा प्रजापति रूप है। गीता में भगवान् कहते हैं- यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है, इसे जानने वाले को तत्त्वज्ञाता, विद्वान्, क्षेत्रज्ञ कहते हैं। सब क्षेत्रों का मुझे ही क्षेत्रज्ञ जान। क्षेत्र क्षेत्रज्ञ के भेद का जो ज्ञान है, वही यथार्थ ज्ञान है-इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम (गी० १३.१-२)। शरीर रूपी क्षेत्र का पूरा-पूरा ज्ञान रखने वाला तथा इसका अधिकारी ही क्षेत्रज्ञ है।

गन्धर्व परिशिष्ट ४४५ ६३. गन्धर्व— देवों के एक भेद अथवा अर्धदेवों के रूप में गन्धवों को स्वीकार किया गया है। निरुक्त के अनुसार 'गा' या 'गो' की धारण करने वाला होने से इन्हें गन्धर्व कहा गया है। यहाँ 'गा' या 'गो' का भावार्थ पृथ्वी, किरण, वाणी इत्यादि ग्रहण किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि ये देवों के पास गाने वाले हैं, अतः वाणी या कण्ठ की धारण करने वाले हैं। वेदों में दो प्रकार के गन्धवों का उल्लेख हुआ है- एक द्युस्थानीय, दूसरे अन्तरिक्ष स्थानीय। द्युस्थानीय गन्धर्वों को दिव्य गन्धर्व कहा गया है। ये सोम के रक्षक, रोगों के चिकित्सक, सूर्य अश्वों के वाहक तथा स्वर्गीय ज्ञान प्रकाशक माने गये हैं। अन्तरिक्ष स्थानीय गन्धर्व नक्षत्रों के प्रवर्त्तक और सोम के रक्षक माने गये हैं। उपनिषद् तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में गन्धर्वों के दो भेद उल्लिखित हैं- देव गन्धर्व और मनुष्य गन्धर्व। शब्दार्थ चिन्तामणि में गन्धर्वों के दो भेद-दिव्य तथा मर्त्य वर्णित हुए हैं। अग्निपुराण में गन्धर्वों के बारह गण माने गये हैं- अभ्राज्य, अंधारि, रंभारि, सूर्यवर्चा, कृधु, हस्त, सुहस्त, स्वन्, मूर्धवान्, महामना, विश्वावसु और कृशानु। गंधर्वों का लोक गुह्यक लोक के ऊपर और विद्याधर लोक के नीचे वर्णित हुआ है। ६४. गायत्री— उपनिषद् के अनुसार तत्राणांस्तत्रे तद्यद्गयांस्तत्रे तस्माद्गायत्री (बृह० ५.१४.४); अर्थात् इसने प्राणों का त्राण किया, इसी से यह गायत्री है। 'गयान् (प्राणान्) त्रायते इति गायत्री' व्युत्पत्ति के अनुसार प्राणों का त्राण करने वाली शक्ति की गायत्री कहा गया है। इसीलिए गायत्री की प्राणोपासना भी कहा गया है। गायत्री को प्राणरूप में स्वीकार किया गया है- गायत्री वै प्राणः (शत०ब्रा० १.३.५.१५)। गायत्री को अग्नि, तेज और ब्रह्मवर्चस भी कहकर उपन्यस्त किया गया है- गायत्री वाऽग्निः (शत०ब्रा० १.८.२.१३), तेजो वै गायत्री (तै०सं० ३.२.९.३), गायत्री ब्रह्मवर्चसम् (मै०ब्रा० ४.३.१)। आठ-आठ अक्षरों के तीन पदों वाले छन्द को गायत्री छन्द कहा गया है। गायत्री को छन्दों में सर्वोत्तम माना गया है- गायत्री वै छन्दसामग्रं ज्यैष्ठ्यम् (जै०ब्रा० २.२२७)। त्रिकाल संध्या में इसी मंत्र के जप का विधान रहा है। गायत्री को ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों शक्तियों का रूप कहकर प्रतिपादित किया गया है- गायत्र्येव परो विष्णुर्गायत्र्येव परः शिवः। गायत्र्येव परो ब्रह्मा गायत्र्येव त्रयी ततः (स्कं० पु०काशी खं०पू०४.९.५८)। उपनिषद् का वर्णन है कि यह जो भी कुछ है, वस्तुतः वह गायत्री ही है- गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किंच (छान्दो० ३.१२.१) यह सम्पूर्ण पृथ्वी भी गायत्री ही है, जिसमें समस्त प्राणी प्रतिष्ठित हैं- या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिवी। अस्यां हीदं सर्वं भूतं प्रतिष्ठितम् (छान्दो० ३.१२.२)। गायत्री को वेदमाता, देवमाता तथा विश्वमाता कहा गया है। इनकी उपासना से व्यक्ति आयु, प्राण, प्रजा (सन्तान), पशु, कीर्ति, धन एवं ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति का अधिकारी बन जाता है- स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्। आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्। मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् (अथर्व० १९.७१.१)। ६५. गुरु-शिष्य- गायत्री मंत्र का उपदेष्टा गुरु कहलाता है। अध्यात्म विद्या या ब्रह्म विद्या प्रदान करने वाले आचार्य भी गुरु कहलाते हैं। गुरु जिस पुरुष की गायत्री या अन्य मन्त्र की दीक्षा देता है, वह शिष्य कहा जाता है। गुरु शिष्य परम्परा भारतवर्ष में अनादि काल से रही है। जिसका कोई गुरु नहीं होता था, उसे 'निगुरा' कहकर तिरस्कृत किया जाता था। गुरु सामान्य मनुष्यों के गृहस्थान से बहुत दूर एकान्त स्थान में जहाँ विद्यार्थियों को पढ़ाते थे- वह स्थान गुरुकुल कहा जाता था। गुरु तप-तितिक्षा द्वारा अपने व्यक्तित्व में प्रखरता-भारीपन या गुरुता के कारण यह प्रतिष्ठा पाता था। मनुस्मृति के अनुसार जो विप्र निषेक (गर्भाधान) आदि संस्कारों को यथाविधि कराता है और अन्न से पोषण करता है, वह गुरु कहलाता है- निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि। सम्भावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते। (म०स्मृ०२.१४२) इस परिभाषा से माता-पिता पहले गुरु हैं, फिर पुरोहित आदि। युक्तिकल्पतरु में अच्छे गुरु के अनेक लक्षण वर्णित हैं। चाणक्यनीति के अनुसार द्विजातियों के गुरु अग्नि, वर्णों के गुरु ब्राह्मण, स्त्रियों के गुरु पति और अतिथि सबके गुरु हैं- गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः। पतिरेको गुरुः स्त्रीणां सर्वेषामतिथिर्गुरुः (चा०नी०)। एक शिष्य के अन्दर सच्चे गुरु की प्राप्ति की जितनी उत्कंठा होती है, उससे कहीं अधिक एक गुरु के अन्दर सच्चे शिष्य की तलाश की व्याकुलता रहती है। अतः शिष्य की निरन्तर अपनी पात्रता के विकास का उद्यम करते रहना चाहिए। गुरु ग्रन्थ साहिब के अनुसार चाहे सौ चाँद चढ़ आयें, चाहे सहस्र सूर्यों का उदय हो जाये, तो भी गुरु के बिना अँधेरा ही रहता है। उपनिषद् ज्ञान के अनुसार समस्त

४४६ [परिशिष्ट] चतुर्युग

शरीरों में स्थित चैतन्य ब्रह्म की प्राप्ति कराने वाला गुरु ही उपास्य है और विद्या प्राप्त कर संसार के प्रपञ्चों का नाश होकर गम्भीर ज्ञानरूप जो ब्रह्म (अन्तर) में शेष रहे, वह शिष्य है- सर्व शरीरस्थ चैतन्यब्रह्म प्रापको गुरुरुपास्यः। शिष्य इति च विद्याध्वस्तप्रपञ्चावगाहित ज्ञानावशिष्टं ब्रह्मैव शिष्यः (निरा० ३०-३१) ६६. गृह्यसूत्र — गृह का शाब्दिक अर्थ है- गृह संबंधी या गृहस्थी से संबंधित। अत्यन्त थोड़े अक्षर वाले, सारगर्भित, व्यापक, अस्तोभ तथा अनवद्य (वाक्य या वाक्यांश) सूत्र कहे जाते है- स्वल्पाक्षरमसंदिग्ध सारवद् विश्वतो मुखम्। अस्तोभनवद्यञ्च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥ गृह्यसूत्र वैदिक पद्धति के वे शास्त्र हैं, जिनमें गृहस्यों के लिए मुंडन, यज्ञोपवीत, विवाह आदि षोडश संस्कारों के नियम-निर्देश और यज्ञादि कार्यों का वर्णन है-गृह्यन्ते संगृह्यन्ते वेदविहितानि कर्मकाण्डानि यत्र। गृह्यसूत्रों में प्रसिद्ध गृह्यसूत्र निम्न है-१. आश्वलायन, २. पारस्कर, ३. शांखायन, ४. मानव और ५. गोभिल। इनमें प्रतिपाद्य विषयों की तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-प्रथम भाग में छोटे पारिवारिक यज्ञों का वर्णन है। दूसरे में षोडश संस्कारों की विधि-व्यवस्था तथा तीसरे में श्राद्ध, पितृयज्ञ तथा गृहनिर्माण आदि का वर्णन है। वैदिक शाखाओं के उपलब्ध गृह्यसूत्रों का वर्णन इस प्रकार है-ऋक् सम्बन्धी- १. शाङ्खायन, २. शाम्बव्य, ३. आश्वलायन, साम सम्बन्धी- ४. गोभिल, ५. खादिर, ६. जैमिनि; शुक्ल यजुर्वेद सम्बन्धी- ७. पारस्कर; कृष्णयजुर्वेद सम्बन्धी- ८. आपस्तम्ब, ९. हिरण्यकेशी, १०. बौधायन, ११. भारद्वाज, १२. मानव, १३ वैखानस, १४. काठक, १५. वाराह; अथर्ववेद सम्बन्धी-१६. कौशिक। ६७. ग्रह-नक्षत्र — आकाशमण्डल के तारे जो अपने सौरमण्डल में सूर्य की परिक्रमा करते हैं, ग्रह कहलाते है। दूसरे शब्दों में किसी निर्धारित कक्षा में किसी सूर्य की परिक्रमा लगाने वाले तारे ग्रह कहे जाते हैं। फलित ज्योतिष् के अनुसार अपने सौरमण्डल में नौ ग्रह हैं- सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु। किसी- किसी बड़े ग्रह के साथ उपग्रह भी हैं, जो अपनी कक्षा में अपने ग्रह की परिक्रमा करते हैं। नक्षत्र तारों के वे समूह या गुच्छक हैं, जो चन्द्रमा के पथ में (चन्द्रमा के सापेक्ष) किन्तु अपने सौरमण्डल मे बहुत दूर दिखाई देते हैं। चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा २७-२८ दिनों में करता है, इस रीति से चन्द्रमा का पथ २७ नक्षत्रों में विभाजित किया गया है। चन्द्रमा के पथ की तरह सूर्य पथ की १२ राशियों में विभक्त किया गया है। नक्षत्र या तारे ग्रहों की तरह छोटे-छोटे पिण्ड नहीं हैं, वे बड़े-बड़े सूर्य है, जो हमारे सूर्य से बहुत दूरी पर हैं। ६८. चतुराश्रम — ऋषियों ने मनुष्य जीवन के लिए चार आश्रम निर्धारित किये थे- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। मनुष्य के जीवनकाल की लगभग १०० वर्ष मानकर प्रत्येक आश्रम की अवधि २५ वर्ष रखी गयी थी। उपनयन के अनंतर २५ वर्ष आयु तक की अवधि बालक ब्रह्मचर्य आश्रम में गुरुकुल में वास करता था। यह अवधि वेद, वेदाङ्ग आदि सम्पूर्ण ज्ञान संचय और शक्ति संचय के लिए थी। गुरुकुल में ब्रह्मचर्य आश्रम पूरा करने पर घर में उसे गृहस्थ आश्रम में प्रवेश दिया जाता था। यह अवधि प्राप्त हुए ज्ञान का समाज में व्यावहारिक प्रयोग हेतु और सेवा-सत्कार द्वारा पुण्य संचय के लिए थी। तदनन्तर वानप्रस्थ आश्रम में, वनों में रहकर इन्द्रिय निग्रह तथा मानसिक पुरुषार्थ किया जाता था। यह अवधि कठोर आत्म साधना के लिए थी। वानप्रस्थ के २५ वर्ष पूरा करने के बाद व्यक्ति घर और स्वजनों को छोड़कर परिव्रज्या के लिए निकल पड़ता था। यह अवधि आत्म उत्कर्ष और मोक्ष प्राप्ति के प्रयासों के लिए थी और जीवन के व्यावहारिक अनुभवजन्य ज्ञान के द्वारा गृहस्यों के मार्गदर्शन के लिए थी। ये चारों आश्रम जीवन की चारों अवस्थाओं-बाल्यावस्था, यौवनावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था से सम्बद्ध थे। आश्रमों का सम्बन्ध जीवन के चार उद्देश्यों-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष मे भी था। ब्रह्मचर्य का सम्बन्ध धर्म से था। गृहस्थ का अर्थ और काम से, वानप्रस्थ का उपराम और मोक्ष की तैयारी से और संन्यास का सम्बन्ध मोक्ष से था। आश्रमोपनिषद् में ब्रह्मचारियों, गृहस्थों, वानप्रस्थों तथा संन्यासियों के चार-चार निम्न भेद वर्णित हैं- ब्रह्मचारी-गायत्री, ब्राह्माण, प्राजापत्य तथा बृहन्। गृहस्थ-वार्ताकवृत्ति, शालीनवृत्ति, यायावर और घोर संन्यासिक। वानप्रस्थ-वैखानस, उदुम्बर, बालखिल्य और फेनप तथा संन्यासी-कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस। ६९. चतुर्युग — सृष्टि के कालचक्र की चार युगों में विभक्त किया गया है- कृतयुग या सत्युग, त्रेतायुग, द्वापरयुग एवं कलियुग। इसमें कलियुग ४,३२०००, द्वापरयुग ८,६४,०००, त्रेतायुग १२,९६,००० एवं सत्युग १७,२८,००० वर्षों का माना जाता है। चारों युगों को मिलाकर ४३,२०,००० वर्षों की एक चतुर्युगी होती है। एक हजार चतुर्युगी का

चतुर्वर्ण \hfill [परिशिष्ट] \hfill ४४७

ब्रह्मा का एक दिन और इतनी ही बड़ी एक रात होती है। एक मान्यता यह भी है कि कलियुग १२०० वर्ष, द्वापरयुग २४०० वर्ष, त्रेतायुग ३६०० वर्ष और सत्युग ४८०० वर्षों का होता है। एक चतुर्युगी १२००० वर्षों की होती है। ७१ चतुर्युगी का एक मन्वन्तर तथा १४ मन्वन्तरों का एक कल्प होता है। सत्युग में धर्म का प्रायः पूर्णांश, त्रेतायुग में त्रिगुण चतुर्थांश, द्वापर युग में अर्धांश तथा कलियुग में चतुर्थांश ही रह जाता है। सत्युग में सत्त्वगुण की प्रधानता तथा कलियुग में तमोगुण की प्रधानता होती है। महाभारत के अनुसार कृतयुग में नारायण का वर्ण श्वेत होता है, त्रेता में पीत वर्ण, द्वापर में रक्तवर्ण तथा कलियुग में कृष्णवर्ण होता है। ७०. चतुर्वर्ण— मनुष्य मात्र को कर्म के अनुसार चार विभागों में बाँटा गया- १. समाज में ज्ञान बाँटने वाले- ब्राह्मण, २. समाज की रक्षा करने वाले-क्षत्रिय, ३. समाज में द्रव्य साधन की पूर्ति करने वाले-वैश्य, ४. समाज में अपनी शारीरिक सेवा देने वाले-शूद्र। इस विभाजन को वर्ण व्यवस्था कहा गया। शतपथ ब्राह्मण में भी इस तथ्य की पुष्टि होती है- चत्वारो वै वर्णाः। ब्राह्मणो राजन्यो वैश्यः शूद्रः (शत०ब्रा० ५.५.४.९)। महाभारत के शान्तिपर्व में वर्णन है कि वर्णों में कोई ऊँच-नीच का भेद नहीं है, क्योंकि यह सारा संसार ब्रह्ममय है। ब्रह्मा ने सम्पूर्ण सृष्टि को रचना की और फिर कर्मों के अनुसार वर्ण बनते गये- न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्व ब्राह्ममिदं जगत्। ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्मभिर्वर्णतां गतम् (१८८.१०)। गीता में भगवान् ने कहा है कि गुण-कर्म के विभाग के अनुसार मैंने चार वर्ण बनाये हैं- चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः (गी०४.१३)। ७१. चतुर्व्यूह—चार पदार्थों या मनुष्यों का समूह चतुर्व्यूह कहलाता है। जैसे- १. राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न एवं २. कृष्ण, बलदेव, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध । पुराणों में वर्णन है कि ब्रह्मा ने सृष्टि कार्य हेतु वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध, इन चार रूपों में अवतार लिया था; अतः उन्हें चतुर्व्यूह कहते हैं। मुद्गलोपनिषद् में तीन मन्त्रों द्वारा चतुर्व्यूह भगवान् के स्वरूप का वर्णन है- एतेनैव च मन्त्रेण चतुर्व्यूहो विभाषिताः (मुद्ग०१.४)। ७२. चमस—चमस सोमपान करने या सोम वितरण करने का एक यज्ञपात्र होता था, जो चम्मच के आकार का तथा पलाश, उदुम्बर, खदिर आदि लकड़ी का बनता था। यह घृताहुति देने में भी प्रयुक्त होता था। वाचस्पत्यम् में चमस को सोमपान पात्र के रूप में स्वीकार किया गया है- पलाशादिकाष्ठ जाते यज्ञीयपात्रभेदे तलक्षणभेदादिकं यज्ञपात्रे। सोमपानपात्रभेदे च (वाच०)। अच्छावाक्, उद्गाता तथा अध्वर्यु द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले चमस क्रमशः अच्छावाक् चमस, उद्गातृ चमस तथा चमसाध्वर्यु कहलाते हैं। ७३. चातुर्मास्य-आग्रयण— चार मासों में पूरा किया जाने वाला एक विशेष श्रौत याग चातुर्मास्य कहलाता था। वसन्त और शरद् ऋतुओं में नवीन अन्न की इष्टि की जाती है, यह आग्रयण यज्ञ कहलाता है। वैदिक कल्प के अनुसार चार मास के प्रमुख तीन मौसमों के आरम्भ में चातुर्मास्य यज्ञ किया जाता था। प्रथम वैश्वदेव फाल्गुनी पूर्णिमा को, द्वितीय वरुण प्रघास आषाढ़ी पूर्णिमा को तथा तृतीय साकमेध कार्त्तिकी पूर्णिमा को होता था। वर्ष भर सभी संधियों में यज्ञ द्वारा संधिकाल को ठीक किया जाता था। रात-दिन की संधियों में अग्निहोत्र, पूर्णमासी तथा अमावस्या की संधियों में दर्श-पूर्णमास और ऋतु के आरंभ की संधियों में चातुर्मास्य यज्ञ किया जाता था (शत०ब्रा०१.६.३.३६)। जो चातुर्मास्य यज्ञ करता है, उसका पुण्य कभी नाश नहीं होता- अक्षय्यं ह वै सुकृतं चातुर्मास्ययाजिनो भवति (शत० ब्रा०२.६.३.१)। जो चातुर्मास्य यज्ञ करता है, वह परमधाम और परमगति को प्राप्त होता है- स परममेव स्थानं परमां गतिं गच्छति चातुर्मास्ययाजी (शत०ब्रा०२.६.४.९)। ७४. चित्त— अन्तःकरण की चार वृत्तियों- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार में से एक वृत्ति, जो अनुसंधानात्मक कही गयी है, चित्त कहलाती है। महर्षि पतञ्जलि के अनुसार मन, बुद्धि और अहंकार तीनों से मिलकर चित्त बनता है। योग दर्शन के अनुसार चित्त की पाँच वृत्तियाँ होती हैं- प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति। चित्त की पाँच प्रकार की भूमियाँ मानी गयी हैं- क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, निरुद्ध एवं एकाग्र। योग के लिए निरुद्ध एवं एकाग्रचित्त होना चाहिए। चित्त वृत्तियों के निरोध को योग कहते हैं। मैत्रेय्युपनिषद् में चित्त की महत्ता वर्णित है कि चित्त ही संसार है, अतः उसे प्रयत्नपूर्वक शुद्ध करना चाहिए। जिसका जैसा चित्त होता है, वह वैसा ही बन जाता है, यह सनातन रहस्य है। चित्त के शांत होने पर शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं। चित्त जितना इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है, उतना यदि परमेश्वर में हो जाय, तो बन्धन से कौन मुक्त न हो जाय (मैत्रा०४.३-५)। चित्त वृत्तियों के विनष्ट होने

४४८ [परिशिष्ट] जरा पर चित्त अपने उत्पत्ति स्थान में स्वयमेव ही शान्त हो जाता है (मैत्रा०४.१)। बुद्धि विषय ग्रहण करने से, चित्त चेतना से, अहन्ता अहंकार से अद्भुत (विशिष्ट) है- बुद्ध्या बुद्ध्यति। चित्तेन चेतयति। अहंकारेणाहंकरोति (ना०प०६.३)। उपनिषद् में चित्तशुद्धि के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहा गया है कि राग-द्वेष आदि से युक्त चित्त ही संसाररूप है, उसके दोषों से मुक्त हो जाने पर मोक्ष की प्राप्ति होना कहा जाता है- चित्तमेव ही संसारो रागादिक्लेशदूषितम्। तदेव तैर्विनिर्मुक्तं भवान्त इति कथ्यते (महो० ४. ६६)। ७५. छन्द - अक्षरों की गणना के अनुसार वैदिक वाक्यों का जो भेद किया गया है, वह छन्द कहलाता है। ऋषियों के अन्तःकरण में प्रस्फुटित मन्त्रों को मूर्त रूप देने का कार्य जिन वर्ण समूहों द्वारा सम्पन्न हुआ, वह छन्द कहलाया। वर्ण समूहों का यह निश्चित परिमाण ही छन्द है। इसके मुख्य सात भेद हैं- गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् और जगती। इनमें प्रत्येक के आठ-आठ भेद नियत किये गये हैं-आर्षी, दैवी, आसुरी, प्राजापत्या, याजुषी, साम्नी, आर्ची और ब्राह्मी। यजुर्वेद को कण्डिकाओं में सात मुख्य छन्द के अतिरिक्त भी कुछ छन्दो को परिगणना की गयी है- अतिजगती, शक्करी, अतिशक्करी, अष्टि, अत्यष्टि, धृति, अतिधृति, कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, संकृति, अभिकृति और उत्कृति। इन वैदिक छन्दों का निर्धारण वर्ण गणना के आधार पर ही हुआ है, इसमें मात्रा अर्थात् लघु-गुरु का विचार नहीं किया गया है। आगे चलकर काव्य में प्रत्येक पाद में मात्राओं के आधार पर छन्दों की व्युत्पत्ति भी हुई है। इन भेदों के आधार पर संस्कृत और हिन्दी भाषा के अनेक छन्दों के अनेक भेदों का वर्णन मिलता है। छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार एक समय देवताओं ने मृत्यु के भय से तीनों वेदों में प्रवेश किया और भिन्न-भिन्न छन्दों से अपने को आच्छादित किया। अतः जो आच्छादन करे, वही छन्द है, यही 'छन्दस्' शब्द की व्युत्पत्ति है- देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्रविशंस्ते छन्दोभिरच्छादयन्द्येभिराच्छादयंस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् (छान्दो० १.४.२)। ७६. जगत् - परमात्मा की बनायी यह दुनिया अथवा यह संसार जगत् कहलाता है। यह दृश्य जगत् है, इससे परे अदृश्य जगत् उससे अनन्त गुना व्यापक है। परमात्मा को जगत् ईश, जगत् पति या जगत् पिता भी कहते हैं। जगत् का कारण भी वह ब्रह्म ही है। सूर्य की इस जगत् की आत्मा कहकर निरूपित किया गया है- सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च (साम०६२९)। यह सब (जड़-चेतन) की आत्मा (शरीर) जगत् है- सर्वं वा इदमात्मा जगत् (शत०ब्रा०४.५.९.८)। आचार्य शंकर के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है। यह जगत् मिथ्या और मायावी है- ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या। जब तक मनुष्य संसार में लिप्त है, तब तक संसार की सत्ता है। जब मोह नष्ट हो जाता है, तब संसार भी नष्ट हो जाता है। आचार्य रामानुज के अनुसार ब्रह्म का शरीर यह जगत् ही है। ब्रह्म ही जगत् रूप में परिणत हुआ है। जगत् सत्य है, मिथ्या नहीं है। दर्शन ग्रन्थ के अनुसार यह जगत् तीन गुणों (सत्, रज, तम) के संयोग का परिणाम है। इस जगत् को अग्निषोमात्मक (अग्नि तथा सोम के संयोग से उत्पन्न) माना गया है- अग्नीषोमात्मकं जगत् (बृ०जा०२.७)। यह सम्पूर्ण जगत् ही ब्रह्म है, इनसे भिन्न कुछ भी नहीं है- सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन (निरा० ९)। ७७. जड़-चेतन - जगत् में हलचल और वृद्धि करने वाले प्राणियों, जीवों आदि को चेतन कहा गया है। निर्जीव तथा निश्चेष्ट पड़े रहने वाले पदार्थों को अचेतन या जड़ कहा गया है। पञ्च भौतिक तत्त्वों से बनी इस सृष्टि को जड़ जगत् कहते हैं। जड़ पदार्थ चेतना विहीन होते हैं। वह परम पुरुष-परमात्मा चेतन है, उसके अंश आत्मा या जीवात्मा भी चेतन हैं। चैतन्यता इसका गुण है। भोजनादि को चेष्टा करने वाले चेतन प्राणियों को 'साशन' और जड़ को 'अनशन' कहा गया है। इन्हें ही जङ्गम और स्थावर कहा जाता है। अचल तथा अपने स्थान पर स्थित रहने वाले पदार्थ स्थावर कहे जाते हैं। इसका विपरीतार्थक जङ्गम है। जड़-चेतन की ही अचर और चर कहा जाता है। जड़ या अचर पदार्थों का एक गुण जड़त्व है, जिसके कारण वे जहाँ के तहाँ पड़े रहते हैं, हिल-डुल नहीं पाते। ७८. जरा - मनुष्य के जन्म के बाद शैशव अवस्था और यौवन अवस्था प्राप्त होती है। यौवन बीतने पर जरा (जीर्णता- शिथिलता) आने लगती है। तत्पश्चात् अन्त में मृत्यु के रूप में शरीर समाप्त होता है- देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा (गी०२.१३)। गीता में भगवान् कहते हैं कि जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि ये जीव के चार दुःख हैं, इनका तथा अपने दोषों का अनुदर्शन मनुष्य की करना चाहिए- जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् (गी०१३.८)।

जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति [परिशिष्ट] ४४९ जब मनुष्य के बाल सफेद होने लगते हैं, तो उसे जराबोध होने लगता है, परन्तु पुण्य कर्मों (यज्ञादिकों) के परिणाम स्वरूप प्राप्त स्वर्गलोक में किञ्चित् मात्र भी भय नहीं है, वहाँ मृत्यु या जरा का भय नहीं रहता - स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति (कठ०१.१.१२)। ७९. जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति — व्यक्ति का जीवन जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति- इन तीन अवस्थाओं में होता हुआ व्यतीत होता है। व्यक्ति का अधिकांश समय जाग्रत् अवस्था में विविधविध कार्यों की सम्पन्न करते हुए व्यतीत होता है। वह जब जागरूक स्थिति में ज्ञानेन्द्रियों (आँख, कान आदि), कर्मेन्द्रियों (हाथ, पैर आदि) से कार्य करता हुआ, सुख- दुःख, कर्त्ता-भोक्ता की अनुभूति करता है, तो यही जाग्रत् अवस्था कहलाती है। जाग्रत् अवस्था में कार्य करते हुए जब व्यक्ति थककर सो जाता है, उस स्थिति में बाह्य जगत् से उसका कोई सम्बन्ध नहीं रहता; किन्तु अचेतन मन की सक्रियता से वह 'स्वप्न' लोक में विचरण करता है, तरह-तरह के स्वप्न देखता है- यह 'स्वप्नावस्था' है। स्वप्नावस्था में देखे गये दृश्य आदि की स्थिति जगने के बाद समास हो जाती है। इस स्थिति में स्थूल शरीर सक्रिय नहीं होती; किन्तु सूक्ष्म शरीर सक्रिय रहता है, वही स्वप्नावस्था के भय-शोक- आनन्द आदि की अनुभूति करता है। तीसरी अवस्था दोनों से भिन्न होती है। स्थूल शरीर की सक्रियता तो होती ही नहीं, सूक्ष्म शरीर भी सक्रिय नहीं होता-स्वप्न का अभाव होता है, उस स्थिति में प्रगाढ़ निद्रा रहती है, जिसमें स्वप्न आदि भी नहीं आते, परन्तु उठने के बाद तृप्ति की अनुभूति होती है, व्यक्ति की सहज अभिव्यक्ति होती है-आज खूब सोया, खूब आनन्द आया, कुछ भी ज्ञात न हुआ। कुछ न ज्ञात होने के बावजूद जो तृप्ति-आनन्द की अनुभूति होती है, यही 'सुषुप्ति' अवस्था है। इस समय कारण शरीर की आनन्द की अनुभूति होती है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों की सक्रियता की स्थिति ही जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्था है। ८०. जातवेदा — यह अग्नि का ही पर्याय है। कहीं-कहीं सूर्य के पर्याय में भी जातवेदा शब्द का प्रयोग हुआ है। अरणियों में जातवेदा अग्नि सन्निहित है- अरण्योर्निहितो जातवेदाः (कठ०२.१.८)। केनोपनिषद् में अग्निदेव की ही जातवेदा सम्बोधन प्रदान किया गया है- तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति (केन०३.३)। ८१. जीवन्मुक्त — भारतीय दर्शन जगत् में 'मोक्ष' की मानव-जीवन का चरम पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) माना गया है। वेदान्त दर्शन 'मोक्ष' की ज्ञान साध्य मानता है। ज्ञान (आत्मज्ञान-ब्रह्मज्ञान) के अभाव में मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती- ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः । जीव द्वारा यथार्थरूप से अपने स्वरूप की जान लेना ही मोक्ष है। जब तक जीव माया-अविद्या की (आवरण-विक्षेप) शक्तियों से बँधकर अपने की संसारी समझता रहता है, तब तक इस भवसागर-संसार में इधर-उधर भटकता रहता है। जब श्रवण-मनन-निदिध्यासन द्वारा अपने आत्म स्वरूप- ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार कर लेता है, तब वह मुक्त हो जाता है। ज्ञान के उदय और अज्ञान के विनाश का ही दूसरा नाम मोक्ष है। वस्तुतः जीव (आत्मा) स्वभाव से ही शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वरूप वाला होता है। मुक्ति की न उत्पत्ति होती है, न प्राप्ति। जब कोई सद्गुरु मिल जाता है और ज्ञान का उपदेश करता है, तो साधक का भ्रमात्मक अज्ञान दूर हो जाता है और विवेक-ज्ञान का उदय हो जाता है, यही मुक्ति की अवस्था है। वेदान्त ग्रन्थ में इसे 'ग्रीवेयकन्याय' द्वारा समझाया गया है। गले में पड़ी सुवर्ण-जंजीर की भ्रमवश बाहर ढूँढ़-ढूँढ़कर परेशान हुए व्यक्ति की जब कोई बुद्धिमान् गले में होने का संकेत करता है, तो उसे ध्यान आता है और सुवर्ण-जंजीर पाकर बड़ा प्रसन्न होता है। इस प्रकार 'मुक्ति' के आनन्द में डूबा हुआ साधक सांसारिक हर्ष-विषाद से ऊपर उठकर प्रसन्नतापूर्वक जीवन -यापन करता है, यही 'जीवन्मुक्त' की स्थिति है। दूसरों के देखने में वह सामान्य व्यक्तियों जैसा आचरण करता दिखता है; परन्तु वस्तुस्थिति उससे भिन्न होती है। वह कर्त्ता-भोक्ता के भाव से ऊपर उठ जाता है, उसके कर्म का पाप-पुण्य के रूप में कोई प्रतिफल नहीं होता, जो प्रारब्ध कर्म हैं, उन्हीं के अनुसार जीवनक्रम चलता रहता है। दग्ध बीज की तरह उनसे नये कर्म का अंकुरण नहीं होता। कुलाल चक्र (कुम्हार के चक्र) की तरह जीवन क्रम, पहले की गतिशीलता के क्रम में गतिशील रहता है। प्रारब्ध कर्मों के क्षीण हो जाने पर उसका हाड़-