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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१६८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

१६८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् यम, नियम और आसन द्वारा भली प्रकार नाड़ी-शोधन करके प्राणायाम करे ॥५३॥ मानव-देह का प्रमाण अपनी अँगुलियों से छियानवे अँगुल का है। शरीर से प्राण बाहर अँगुल अधिक प्रमाण वाला होता है ॥५४॥ देह में स्थित वायु को देहस्थ अग्नि के योग द्वारा न्यून और सम करने से ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया जाता है ॥५५॥ मानव देह के मध्य में तप्त सुवर्ण की प्रभा वाला तीन कोणयुक्त अग्नि का स्थान होता है। चार पैर वाले पशुओं में यह अग्नि स्थान चार कोने का होता है। पक्षियों का गोल, सर्प जाति वालों का छः कोने और स्वेदजों का आठ कोने वाला होता है। मानव-देह में उस स्थान पर नौ अँगुल प्रमाण का एक कन्द रहता है जो दीपक के समान प्रकाशित होता है। वह चार अँगुल ऊँचा और चार अँगुल चौड़ा होता है ॥५६-५६॥ तिर्यक, पक्षी और चौपायों में यह कन्द आण्डाकार होता है और उसका मध्यस्थान नाभि कहा जाता है इसमें बारह आरे वाला चक्र है जिसमें विष्णु आदि देवों की मूर्तियां हैं। इस चक्र को मैं (ब्रह्म) अपनी माया से फिराता रहता हूँ ॥५६॥ इन बारह आरों में जीव इस प्रकार घूमता रहता है जैसे मकड़ी अपने जाले में फिरती है ॥६०॥ प्राणाधिरूढश्चरति जीवस्तेन विना नहि। तस्योर्ध्वे कुण्डलीस्थानं नाभेस्तिर्यगथोर्ध्वतः ॥६१ अष्टप्रकृतिरूपा सा चाष्टधा कुण्डलीकृता। यथावद्वायु संचारं जलान्नादि च नित्यशः ॥६२ परितः कन्दपार्श्वे तु निरुद्ध्येव सदा स्थिता। मुखेनैव समावेष्ट्य ब्रह्मरन्ध्रमुखं यथा ॥६३ योग कालेनेन मरुता साग्निना बोधिता सती

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ १६६

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ १६६ स्फुरिता हृदयाकाशे नागरूपा महोज्ज्वला ॥६४ अपानाद्द्व्यङ्गुलादूर्ध्वमधो मेद्रस्य तावता । देहमध्यं मनुष्याणां हृन्मध्यं तु चतुष्पदाम् ॥६५ जीव प्राण पर आरूढ़ होकर ही भ्रमण करता है, उसके बिना नहीं कर सकता। उसके ऊपर कुण्डलिनी का तिरछा और ऊंचा स्थान है ॥६१॥ वह अष्ट प्रकृतिरूपा आठ प्रकार की कुण्डली करके कन्द को घेरे हुए है और वायु तथा अन्न-जल के सञ्चार को रोकती रहती है। उसने ब्रह्मरन्ध्र के मुख को अपने मुख से ढका हुआ है ॥६२- ॥६३॥ योगाभ्यास द्वारा यह कुण्डलिनी शक्ति पवन द्वारा जागृत अग्नि के समान हृदयाकाश में नाग रूप से अत्यन्त उज्ज्वल स्फुरित होती है ॥६४॥ अपान से दो अँगुल ऊपर और मेढ़ से नीचे, मानव-देह का मध्य भाग माना जाता है। चौपायों का मध्य भाग उनके हृदय- स्थान में होता है ॥६५॥ इतरेषां तुन्द मध्यं नानानाड़ीसमावृतम् । चतुष्प्रकारद्रव्ययुते देहमध्ये सुषुम्नया ॥६६ कन्दमध्ये स्थिता नाडी सुषुम्ना सुप्रतिष्ठिता । पद्मसूत्रप्रतीकाशा ऋजुरूर्ध्वप्रवर्तिनी ॥६७ ब्रह्मणो विवरं यावद्विद्युदाभासनालकम् । वैष्णवी ब्रह्मनाडी च निर्वाणप्रप्तिपद्धतिः ॥६८ इडा च पिङ्गला चैव तस्याः सव्येतरे स्थिते । इडा समुत्थिता कन्दान्द्वामनासापुटावधिः ॥६९ पिङ्गला चोत्थिता तस्माद्दक्षनासापुटाविधिः । गन्धारी हस्तिजिह्वा च द्वे चान्ये नाडिके स्थिते ॥७० पुरतः पृष्ठतस्तस्याः वामेतरदृशौ प्रति । पूषायशस्विनौनाड्यौ तस्मादेव समुत्थिते ॥७१

२०० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२०० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् सव्येतरश्रुत्यवधि पायु मूलावम्बुसा । अधोगता शुभा नाडी मेढ्रान्तावधिरायता ॥७२ अन्य प्राणियों का मध्य भाग नाभि के मध्य में होता है। प्राण और अपान से संयुक्त सुषुम्ना नाड़ी देह में चार प्रकार से प्रकाशित होती है ॥६६॥ कन्द के मध्य भाग में जो सुषुम्ना-नाड़ी स्थित है, वह पद्मसूत्र के समान अत्यन्त सूक्ष्म है और सीधी ऊपर की तरफ गई है॥६७॥ ब्रह्मरन्ध्र तक जाने वाली यह "वैष्णवी ब्रह्मनाड़ी" विद्युत के समान प्रकाशयुक्त और निर्वाण प्राप्त करने वाली है ॥६८॥ उसके अगल-बगल में इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ स्थित हैं। इड़ा कन्द से निकलकर बांये नासापुट तक गई है और पिङ्गला दांये नासापुट तक। गान्धारी और हस्तजिह्वा दो अन्य नाड़ियां भी वहां हैं जो उनके आगे-पीछे बांयी और दांयी आंख तक गई हैं। पूषा और यशस्विनी दो नाड़ियां गुदा मूल से निकलकर दांये और बांये कान तक गई हैं। अलम्बुसा नाम की नाड़ी मेढ़ स्थान के अन्त तक नीचे की ओर गई हैं ॥६६—७२॥ पादांगुष्ठावधिः कन्दादधोयाता च कौशिकी । दशप्रकारभूतास्ताः कथिताः कन्दसंभवाः ॥७३ तन्मूला बहवो नाड्यः स्थूलाः सूक्ष्माश्च नाडिकाः । द्वासप्ततिसहस्राणि स्थूलाः सूक्ष्मश्च नाड्यः ॥७४ संख्यातुं नैव शक्यन्ते स्थूलमूलाः पृथग्विधाः । यथाऽश्वत्थदले सूक्ष्माः स्थूलाश्च विततास्तथा ॥७५ प्राणापानौ समानश्च उदानो व्यान एव च । नागः कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनंजयः ॥७६ चरन्ति दशनाडीषु दश प्राणादिवायवः । प्राणादिपञ्चकं तेषु प्रधानं तत्र च द्वयम् ॥७७

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०१

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०१ प्राण एवाथवा ज्येष्ठो जीवात्मानं विभर्ति यः । आस्यनासिकयोर्मध्यं हृदयं नाभिमण्डलम् ॥७८ पादांगुष्ठमिति प्राणस्थानानि द्विजसत्तम । अपानश्चरति ब्रह्मन् गुदमेढ्रोरुजानुषु ॥७९ समानः सर्वगात्रेषु सर्वव्यापी व्यवस्थितः । उदानः सर्वसन्धिस्थः पादयोर्हस्तयोरपि ॥८० कन्द से पैर के अंगूठे तक कौशिकी नाम वाली नाड़ी गई है । इस प्रकार ये दस नाड़ियाँ कन्द से निकली हुई कही गई हैं ॥ ७३ ॥ उनसे निकलने वाली अन्य बहुत सी स्थूल और सूक्ष्म नाड़ियाँ हैं, जिनकी संख्या सब मिलाकर बहत्तर हजार कही गई है ॥ ७४ ॥ इन स्थूल और सूक्ष्म नाड़ियों की गिनती कर सकना कठिन है, वे उसी प्रकार फैली हुई हैं जिस प्रकार पीपल के पत्ते में नसें फैली होती हैं ॥ ७५ ॥ प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त और धनञ्जय—ये दश वायु भी नाड़ियों में चलते रहते हैं । इनमें प्राण आदि प्रथम पाँच मुख्य हैं, अथवा दो (प्राण और अपान) मुख्य हैं अथवा प्राणवायु ही सबसे मुख्य है जो जीव को धारण किये रहता है । हे द्विज श्रेष्ठ ! प्राण के मुख्य स्थान पाँच हैं-मुख नासिका का मध्य भाग, हृदय, नाभि-मण्डल और पैर का अँगूठा अपान, गुदा, मेढ्र, जङ्घा, और घुटने में चलता है । समान वायु सब अङ्गों में व्याप्त रहता है और उदान चारों हाथ पैरों और सब संधि स्थानों में स्थित है ॥७६-८०॥ व्यानः श्रोत्रोरुकट्यां च गुल्फस्कन्धगलेषु च । नागादिवायवः पञ्च त्वगस्थ्यादिषु संस्थिताः ॥८१ तुन्दस्थं जलमन्नं च रसादि च समीकृतम् । तुन्दमध्यगतः प्राणस्तानि कुर्यात्पृथक्पृथक् ॥८२

२०२ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२०२ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् इत्यादिश्चेष्टनं प्राणः करोति च पृथक्स्थितः । अपानवायुर्मूत्रादेः करोति च विसर्जनम् ॥८३ प्राणापानादिचेष्टादि क्रियते व्यानवायुना । उज्जीर्यंते शरीरस्थमुदानेन नभस्वता ॥८४ पोषणादि शरीरस्य समानः कुरुते सदा । उद्गारादिक्रियो नागः कूर्मोक्ष्यादिनिमीलनः ॥८५ व्यान नामक वायु श्रोत्र, जङ्घा कमर एड़ी, कन्धे, गले में रहता है तथा नाग आदि पाँच उपवायु त्वचा, अस्थि आदि में स्थित हैं ॥ ८१ ॥ आमाशय में स्थित जल, अन्न रसादिक को प्राणवायु एकत्र करके फिर पृथक् पृथक करता है ॥ ८२ ॥ इन कार्यों को प्राणवायु पृथक रह कर करता है । मल और मूत्र के विसर्जन का कार्य अपान-वायु द्वारा होता है ॥ ८३ ॥ प्राण, अपान वायुओं की चेष्टाएं व्यान वायु के योग से की जाती हैं और शरीरस्थ उदान से ऊर्ध्वगामी हुआ जाता है ॥ ८४ ॥ शरीर को पोषण सदैव समान वायु द्वारा होता है । डकार आदि क्रिया नाग से होती है और आंखों का खोलना बन्द करना कूर्म का कार्य है ॥ ८५ ॥ कृकरः क्षपयोः कर्ता दत्तो निद्रादिकर्मकृत् । मृतगात्रस्य शोभादि धनंजय उदाहृतः ॥८६ नाडीभेदं मरुद्भेदं मरुतां स्थानमेव च । चेष्टाश्च विविधास्तेषां ज्ञात्वैवं द्विजसत्तम ॥८७ शुद्धौ यतेत नाडीनां पूर्वोक्तज्ञानसंयुतः । विविक्तदेशमास्थाय सर्व संबन्धवर्जितः ॥८८ योगाङ्गद्रव्यसंपूर्णं तत्र दारुमये शुभे । आसने कल्पिते दर्भकुशकृष्णाजिनादिभिः ॥८९

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०३ ]

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०३ ] तावदासनमुत्सेधे तावद्द्वयसमायते । उपविश्यासनं सम्यक्स्वस्तिकादि यथारुचि ॥६० भूख लगना कृकर का, निद्रा आदि देवदत्त का और मृत शरीर की शोभा आदि धनञ्जय वायु का कार्य है ॥ ८६ ॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मण ! नाड़ी, वायु, प्राणों के स्थान और चेष्टाएँ विविध प्रकार की हैं, उनको जानना चाहिये ॥ ८७ ॥ जब पूर्वोक्त विधि से नाड़ियों को शुद्ध कर ले तब सब प्रकार के सम्बन्धों को त्याग कर एकान्त स्थान में, सब प्रकार की योग-साधन में आवश्यक सामग्री लेकर लकड़ी की बनी कुटी में दर्भ, कुशा और मृग चर्म का आसन प्रस्तुत करे ॥ ८८--८९ ॥ जब तक दोनों तरफ के अङ्ग समान न हो जांय तब तक आसन-साधन करता रहे । इसके लिए आसन स्थान पर बैठकर अपनी रुचि के अनुसार स्वास्तिक आदि कोई-सा भी आसन लगाता रहे ॥ ९० ॥ बद्ध्वा प्रागासनं विप्र ऋजुकायः समाहितः । नासाग्रन्यस्तनयनो दन्तैर्दन्तानस्पृशन् ॥९१ रसनां तालुनि न्यस्य स्वस्थचित्तो निरामयः । आकुञ्चितशिरः किञ्चिन्निबध्नन्योगमुद्रया ॥९२ हस्तौ यथोक्तविधिना प्राणायामं समाचरेत् । रेचनं पूरणं वायो शोधनं रेचनं तथा ॥९३ चतुर्भिः क्लेशनं वायोः प्राणायाम उदीर्यते । हस्तेन दक्षिणेनैव पीडयेन्नासिकापुटम् ॥९४ शनैः शनैरथ बहिः प्रक्षिपेत्पिङ्ग़लानिलम् । इडया वायुमापूर्य ब्रह्मान्धोशमानया ॥६५ पूरितं कुम्भयेत्तस्माच्चतुःषष्ट्या तु मात्रया ।

२०४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२०४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् द्वात्रिंशन्मात्रया सम्यग्रे चयेत्पिङ्गलाऽनिलम् ॥६६ पहले आसन लगाकर, शरीर को सीधा रखकर, नासाग्र पर दृष्टि रखते, दाँतों को दांतों से स्पर्श न करते हुये, जिह्वा को तालु में रखकर, स्वस्थ चित्त और निरागम भावसे, शिर को आंकुचित करके, योगमुद्रा में हाथों को बाँधकर विधिपूर्वक प्राणायाम करे। रेचक, पूरक, वायु का शोधन तथा रेचक करे ॥ ६१--६३ ॥ इन चार विधियों से वायु को चलाने को प्राणायाम कहते हैं। दाहिने हाथ से नासापुटों को दबाकर पिङ्गला ( दाँयी नासिका ) से वायु को बाहर निकाले । फिर सोलह मात्रा से वायु को भीतर खींचे और चौंसठ मात्रा में कुम्भक करे और बत्तीस मात्रा से उस वायु को पिंगला द्वारा बाहर निकाल दे ॥ ६६ ॥ एवं पुनः पुनः कार्यं व्युत्क्रमानुक्रमेण तु । संपूर्णकुम्भवद्देहं कुम्भयेन्मातरिश्वना ॥६७ पूरणान्नाडयः सर्वाः पूर्यन्ते मातरिश्वना । एवं कृते सति ब्रह्मंश्चरन्ति दश वायवः ॥६८ हृदयाम्भोरुहं चापि व्याकोचं भवति स्फुटम् । तत्र पश्येत्परात्मानं वासुदेवमकल्मषम् ॥६६ प्रातर्मध्यन्दिने सायमर्धरात्रे च कुम्भकान् । शनैरशीतिपर्यन्तं चतुर्वारं समभ्यसेत् ॥१०० इस प्रकार बारम्बार क्रम और विपरीत क्रम से अभ्यास करे और देह के भीतर भरे वायु को कुम्भ के समान रोके ॥ ६७ ॥ इससे सब नाड़ियाँ वायु से भर जाती हैं और उनमें दसों वायु भली प्रकार चलने लगते हैं ॥ ६८ ॥ तब हृदयरूपी कमल विकसित होकर स्पष्ट हो जाता है और वहाँ भगवान् वासुदेव के दर्शन होने लगते हैं

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०५

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०५ ॥ ९९ ॥ इस विधि से प्रातः मध्याह्न, सायं और आधीरात को चार बार कुम्भक करे और उसे क्रमशः अस्सी मात्रा तक पहुंचा दे ॥ १०० ॥ एकाहमात्रं कुर्वाणः सर्वपापैः प्रमुच्यते । संवत्सरत्रयादूर्ध्वं प्राणायामपरो नरः ॥१०१ योगसिद्धो भवेद्योगी वायुजिद्विजितेन्द्रियः । अल्पाशी स्वल्पनिद्रश्च तेजस्वी बलवान्भवेत् ॥१०२ अपमृत्युमपक्रम्य दीर्घमायुरवाप्नुयात् । प्रस्वेदजननं यस्य प्राणायामेषु सोऽधमः ॥१०३ कम्पनं वपुषो यस्य प्राणायामेषु मध्यमः । उत्थानं वपुषो यस्य स उत्तम उदाहृतः ॥१०४ अधमे व्याधिपापानां नाशः स्यान्मध्यमे पुनः । पापरोगमहाव्याधिनाशः स्यादुत्तमे पुनः ॥१०५ अल्पमूत्रोऽल्पविष्ठश्च लघुदेहो मिताशनः । पट्विन्द्रियः पटुमतिः कालत्रयविदात्मवान् ॥१०६ इस विधि से एक दिन अभ्यास करने से ही सब पापों से छुटकारा हो जाता है और तीन वर्ष तक इस प्रकार प्राणायाम करने वाला योग सिद्ध हो जाता है। वह योगी वायु को जीतने वाला, जितेन्द्रिय, अल्प आहार, स्वल्प निद्रा वाला, तेजस्वी तथा बलवान होता है। अकाल मृत्यु का भय मिटाकर दीर्घ आयु प्राप्त होती है। जिस प्राणायाम में पसीना आता है वह अधम है, जिसमें शरीर में कँपकँपी होती है वह मध्यम है और जिसमें शरीर ऊपर को उठता है वह उत्तम है ॥ १०१--१०४ ॥ अधम प्राणायाम से व्याधि और पापों का नाश होता है, मध्यम से महाव्याधियां, पाप तथा रोग मिट जाते हैं, उत्तम से अल्प-मूत्र, अल्प-मल शरीर की लघुता

२०६ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२०६ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् अल्प भोजन होता है, इन्द्रियाँ और बुद्धि तीव्र हो जाती हैं और तीनों काल का ज्ञाता हो जाता है ॥ १०५-१०६ ॥ रेचकं पूरकं मुक्त्वा कुम्भोकरणमेव यः । करोति त्रिषु कालेषु नैव तस्यास्ति दुर्लभम् ॥१०७ नाभिकन्दे च नासाग्रे पादांगुष्ठे च यत्नवान् । धारयेन्मनसा प्राणान्सन्ध्याकालेषु वा सदा ॥१०८ सर्वरोगैर्विनिमुक्तो जीवेद्योगी गतक्लमः । कुक्षिरोगविनाशः स्यान्नाभिकन्देषु धारणात् ॥१०६ नासाग्रधारणाद्दीर्घमायुः स्याद्देहलाघवः । ब्राह्मे मुहूर्ते संप्राप्ते वायुमाकृष्य जिह्वया ॥११० पिवतस्त्रिषु मासेषु वाक्सिद्धिर्महती भवेत् । अभ्यस्यतुश्च षण्मासान्महारोगविनाशनम् ॥१११ जो रेचक और पूरक को छोड़कर केवल कुम्भक ही करने लगता है । उसके लिए तीनों काल में कुछ भी कठिन नहीं रहता ॥ १०७ ॥ प्रयत्नशील साधक नाभिकन्द, नासाग्र और पैर के अंगूठे में सदैव संध्या समय मन द्वारा प्राण को धारण करे ॥ १०८ ॥ ऐसा साधक सब रोगों से छूटकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है । नाभिकन्द में प्राण-धारण करने से कुक्षि रोग नष्ट होते हैं ॥ १०६ ॥ नासग्र धारण करने से दीर्घायु और देह की लाघवता प्राप्त होती है । ब्राह्म मुहूर्त में जिह्वा से वायु को खींच कर पीने से तीन मास में वाक्य-सिद्धि प्राप्त होती है और छः मास में महारोग से छुटकारा मिल जाता है ॥ ११०-१११ ॥ यत्रयत्र धृतो वायुरङ्गे रोगादिदूषिते । धारणादेव मरुत्तत्तदारोग्यमंश्नुते ॥११२

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०७.

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०७. मनसो धारणादेव पवनो धारितो भवेत् । मनसः स्थापने हेतुरुच्यते द्विजपुङ्गव ॥११३ कारणानि समाहृत्य विषयेभ्यः समाहितः । अपानमूर्ध्वमाकृष्येदुदरोपरि धारयेत् ॥११४ बध्नन्कराभ्यां श्रोत्रादिकरणानि यथातथम् । युञ्जानस्य यथोक्तेन वर्त्मना स्ववशं मनः ॥११५ शरीर का जो अङ्ग रोग पीड़ित हो तो उसमें वायु को धारण करने से वह दूर हो जाता है ॥ ११२ ॥ मन की धारणा हो जाने से वायु की धारणा भी होने लगती है। मन को स्थित करने के लिये प्राण को साधन बतलाया गया है ॥ ११३ ॥ इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अपान वायु को ऊपर खींचकर ऊपर ही धारण करे, कानों को हाथों से बन्द किये रहे। इस साधन से मन वश में हो जाता है ॥ ११४-११५ ॥ मनोवशात्प्राणवायुः स्ववशे स्थाप्यते सदा । नासिकापुटयोः प्राणः पर्यायेण प्रवर्तते ॥११६ तिस्रश्च नाडिकास्तासु म यावन्तश्चरत्ययम् । शङ्खिनीविवरे याम्ये प्राणः प्राणभृतां सताम् ॥११७ तावन्तं च पुनः कालं सौम्ये चरित संततम् । इत्थं क्रमेण चरता वायुना वायुजिन्नरः ॥११८ अहश्च रात्रि पक्षं च मासं मत्वायनादिकम् । अन्तर्मुखो विजानीयात् कालभेदं समाहितः ॥११९ अङ्गुष्ठादिस्ववावयवास्फुरणदर्शनैरपि । अरिष्टं जीवितस्यापि जानीयात्क्षयमात्मनः ॥१२० इस प्रकार मन पर अधिकार हो जाने से प्राणवायु नियमित-

२०८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२०८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् हो जाता है और नासिका से क्रमपूर्वक आता जाता रहता है ॥ ११६ ॥ तीन नाड़ियाँ हैं। प्राणायाम करने वाले योगियों का श्वास दांये और बाँये नासापुट के समान समय तक चलता रहता है। इस प्रकार जिसका प्राणवायु क्रम से चलता है, वह प्राणजित हो जाता है। फिर वह दिन, रात्रि, पक्ष, मास, अयन आदि के काल-भेद को अन्तर्मुख होकर जानने लगता है ॥ ११७--११९ ॥ अँगूठा आदि अपने अवयवों में स्फुरण ( नदियों का रक्त गति से फड़कना ) बन्द हो जाने पर शीघ्र ही अपने जीवन का अन्त होना समझ लेना चाहिये ॥ १२० ॥ ज्ञात्वा यतेत कैवल्यप्राप्तये योगवित्तमः । पादांगुष्ठे करांगुष्ठे स्फुरणं यस्य नश्यति ॥१२१ तस्य संवत्सरादूर्ध्वं जीवितव्यक्षयो भवेत् । मणिबन्धे तथा गुल्फे स्फुरणं यस्य नश्यति ॥१२२ षष्मासावधिरेतस्य जीवितस्य स्थितिर्भवेत् । कूर्परास्फुरणं यस्य तस्य त्रैमासिकी स्थितिः ॥१२३ कक्षे मेहनपार्श्वे च स्फुरणानुपलम्भने । मासावधिजीवितं स्यात् तदर्धं सत्वदर्शने ॥१२४ आश्रिते जठरे द्वारे दिनानि दश जीवितम् । ज्योतिः खद्योतवद्यस्थ तदर्धं तस्य जीवितम् ॥१२५ इस प्रकार अनिष्ट सूचक संकेतों को जानकर योगी को मोक्ष-साधन में ध्यान लगाना चाहिए। जिसके पैर तथा हाथ के अँगूठों में स्फुरण न जान पड़े। उसका जीवन एक वर्ष में समाप्त हो जाता है। मणिबन्ध (कलाई) और गुल्फ (टखना) का स्फुरण बन्द हो जाने पर छः महीने तक जीवित रहता है। जब कोहनी में स्फुरण न हो तो जीवन की अवधि तीन मास रह जाती है

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ Public Domain. Digitization by eGangotri ] २०९ ॥ १२१-१२२ ॥ अगर कुक्षि, उपस्थेन्द्रिय में स्फुरण न हो तो एक महीने में और नेत्रों में स्फुरण न हो तो पन्द्रह दिन में जीवन का अन्त हो जाता है ॥ १२४ ॥ जठर-द्वार पर स्फुरण न होने से जीवन की अवधि दस दिन रह जाती है और अगर ज्योति जुगनू के समान हो जाय तो पाँच ही दिन शेष रह जाते हैं ॥ १२५ ॥ जिह्वाग्रादर्शने त्रीणि दिनानि स्थितिरात्मनः । ज्वालाया दर्शने मृत्युर्द्विदिने भवति ध्रुवम् ॥१२६ एवमादीन्वरिष्टानि दृष्ट्वाऽऽयुःक्षरकारणम् । निःश्रेयसाय युञ्जीत जपध्यानपरायणः ॥१२७ मनसा परमात्मानं ध्यात्वा तद्रूपतामियात् । यद्यष्टादशमेदेषु मर्मस्थानेषु धारणम् ॥१२८ स्थानात्स्थानं समाकृष्य प्रत्याहारः स उच्यते । पादांगुष्ठं तथा गुल्फं जङ्घामध्यं तथैव च ॥१२९ मध्यमूर्वोश्च मूलं च पयायुर्हृदयमेव च । मेहनं देहमध्यं च नाभिं च गलकूर्परम् ॥१३० तालुमूलं च मूलं च घ्राणस्याक्षणोश्च मण्डलम् । भ्रुवोर्मध्यं ललाटं मूलमूर्ध्वं च जानुनी ॥१३१ मूलं च करयोर्मूलं महाम्येतानि वै द्विजः । पञ्चभूतमये देहे भूतेष्वेतेषु पञ्चसु ॥१३२ अगर जिह्वा दिखलाई पड़ना बन्द हो जाय तो तीन दिन का समय समझना चाहिये और ज्वाला का दिखाई देना बन्द हो जाय तो दो ही दिन समझना चाहिये ॥ १२६ ॥ ये सब अरिष्ट आयु के क्षय के कारण रूप हैं । इनको जानकर अपने कल्याणार्थ जप और ध्यान में संलग्न हो ॥ १२७ ॥ मन से परमात्मा का ध्यान करते हुये उसकी एकरूपता को प्राप्त होने का यत्न करे । शरीर के अठारह मर्म स्थानों में धारणा की जाती है ॥१२८॥ एक स्थान से दूसरे स्थान Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

२१० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२१० ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् को खींचना प्रत्याहार कहा जाता है। पैर का अँगूठा, एड़ी जांघ का मध्यभाग उरु का मध्य, गुदा का मूल, हृदय, उपस्थ, देह का मध्य, नाभि, कण्ठ, कोहनी, तालु-मूल, नासिका का मूल, आंखों का मण्डल भौंहों का मध्य, ललाट, मस्तक का मूल, घुटने का मूल, हाथों का मूल स्थान—ये सब इस पञ्चभौतिक देह के मर्म स्थल हैं ॥ १२६--१३२ ॥ मनसो धारणं यत्तुयुक्तस्य च यमादिभिः । धारणा सा च संसारसागरोत्तारकारणम् ॥१३३ आजानुपदपर्यन्तं पृथिवीस्थानमिष्यते । पीतला चतुरस्त्रा च वसुधा वज्रलाञ्छिता ॥१३४ स्मर्त्तव्या पञ्चघटिका तत्रारोप्य प्रभञ्जनम् । आजानुकटिपर्यन्तमपां स्थानं प्रकीर्तितम् ॥१३५ अर्धचन्द्रसमाकारं श्वेतमजुंनलाञ्छितम् । स्मर्त्तव्यमम्भः श्वसनमारोप्य दशनाडिका ॥१३६ आदेहमध्यकट्यन्तमग्निस्यानमुदाहृतम् । तत्र सिन्दूरवर्णोऽग्निर्ज्वलनं दश पञ्च च ॥१३७ स्मर्त्तव्या घटिका प्राणं कृत्या कुम्भे तथेरितम् । नाभेरुपरि नासान्तं वायुस्थानं तु तत्र वै ॥१३८ वेदिकाकारबद्ध श्रो बलवान्भूतमारुतः । स्मर्तव्यः कुम्भकेनैव प्राणमारोप्य मारुतम् ॥१३९ घटिकाविंशतिस्तस्माद् घ्राणाद्ब्रह्मबिलावधि । व्योमस्थानं नभस्तत्र भिन्नाञ्जनसमप्रभम् ॥१४० यमादि द्वारा मन का जो धारण करना है वही धारणा है जिससे मनुष्य संसार-सागर को पार करने में समर्थ होता है ॥१३३॥ घुटनों से पैर तक पृथ्वी-स्थान कहा जाता है, पीतवर्ण की

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चारकोण वाली पृथ्वी वज्र-लंछिता है ॥ १३४ ॥ पांच घड़ी तक वायु को धारण करके पृथ्वी का ध्यान करना चाहिये। घुटनों से कमर तक जल का स्थान कहा है ॥ १३५ ॥ इस जल स्थान का आकार आधे चन्द्रमा के समान है, वर्ण श्वेत है तथा चांदी से लांछित है। इसमें दस घड़ी तक श्वाँस रोककर जल का ध्यान करे ॥ १३६ ॥ कटि से देह के मध्य अग्नि स्थान है। वह सिन्दूर के रङ्ग का है। उसमें पन्द्रह घड़ी प्राण को रोककर अग्नि का ध्यान करना चाहिये। नाभि से नासिका तक वायु का स्थान है, जिसका आकार वेदी के तुल्य है, धूम्रवत्, शक्तिशाली पवन का ध्यान बीस घड़ी तक कुम्भक द्वारा वायु को रोक कर करना चाहिये । नासिका से ब्रह्मरन्ध्र तक आकाश स्थान है जिसकी नीले रंग की प्रभा है ॥ १३६-१४० ॥

व्योम्नि मारुतमारोप्य कुम्भकेनैव यत्नवान् । पृथिव्यंशे तु देहस्य चतुर्बाहुं किरीटिनम् ॥१४१ अनिरुद्धं हरिं योगी यतेत भवमुक्तये । अबंशे पूरयेद्योगी नारायणमुदग्रधीः ॥१४२ प्रद्युम्नमग्नौ वाय्वंशे संकर्षणमतः परम् । व्योमांशे परमात्मानं वासुदेवं सदा स्मरेत् ॥१४३ अचिरादेव तत्प्राप्तिर्युञ्जानस्य न संशयः । बद्ध्वा योगासनं पूर्वं हृद्देशे हृदयाञ्जलिः ॥१४४ नासाग्रन्यस्तनयनो जिह्वां कृत्वा च तालुनि । दन्तैर्दन्तानसंस्पृश्य ऊर्ध्वकायः समाहितः ॥१४५ संयमेच्चेन्द्रियग्राममात्मबुद्ध्या विशुद्धया । चिन्तनं वासुदेवस्य परस्य परमात्मनः ॥१४६ प्रयत्नशील साधक कुम्भक द्वारा वायु को आकाश में रोके। फिर पृथ्वी अंश वाले भाग में चतुर्भुज किरीटधारी अनिरुद्ध हरि का

२१२ ] [त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२१२ ] [त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ध्यान करे, जिससे योगी मुक्ति को प्राप्त करने में समर्थ होता है। जल वाले अंश में नारायण का ध्यान करे, अग्नि के अंश में प्रद्युम्न का, वायु-अंश में संकर्षण का और आकाश वाले अंश में परमात्मा वासुदेव का ध्यान करे ॥ १४१-१४३ ॥ जो सदैव इस अभ्यास को करता रहता है उसको परमात्मा का साक्षात्कार शीघ्र ही हो जाता है। पहले योगासन पर बैठकर हृदय-प्रदेश में हृदय को स्थिति करते हुये नासाग्र पर दृष्टि को स्थिर करे, जिह्वा को तालु में लगावे, ऊपर और नीचे के दांतों का स्पर्श न होने दे, शरीर को ऊँचा करके समाहित होकर बैठे और शुद्ध आत्मबुद्धि से इन्द्रियों का संयम करता हुआ भगवान् वासुदेव का चिन्तन करे ॥ १४४-१४६ ॥ स्वरूपव्याप्तरूपस्य ध्यानं कैवल्यसिद्धिदम् । याममात्रं वासुदेवं चिन्तयेत्कुम्भकेन यः ॥१४७ सप्तजन्मार्जितं पापं तस्य नश्यति योगिनः । नाभिकन्दात्समारभ्य यावद्धृदयगोचरम् ॥१४८ जाग्रद्वृत्तिं विजानीयात्कण्ठस्थं स्वप्नवर्तनम् । सुषुप्तं तालुमध्यस्थं तुर्यं भ्रूमध्यसंस्थितम् ॥१४६ तुर्यातीतं परं ब्रह्म ब्रह्मरन्ध्रे तु लक्षयेत् । जाग्रद्वृत्तिं समारभ्य यावद्ब्रह्मबिलान्तरम् ॥१५० तत्रात्माऽयं तुरीयः स्यात् तुर्यान्ते विष्णुरुच्यते । ध्यानेनैव समायुक्तो व्योम्नि चात्यन्तनिर्मले ॥१५१ सूर्यकोटिद्युतिधरं नित्योदितमधोक्षजम् । हृदयाम्बुरुहासीनं ध्यायेद्वा विश्वरूपिणम् ॥१५२ इस प्रकार अपने भीतर व्याप्त परमात्मा के स्वरूप का ध्यान करने से कैवल्य की प्राप्ति होती है। इस प्रकार एक प्रहर तक

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २१३

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २१३ कुम्भक करते हुए जो भगवान वासुदेव का ध्यान करता है, उसके सात जन्म के पाप विनष्ट हो जाते हैं। नाभिकन्द से लेकर हृदय-प्रदेश तक जाग्रत वृत्ति का स्थान है, स्वप्न वृत्ति कण्ठ में रहती है, सुषुप्ति तालु के मध्य में और तुरीय भ्रुकुटियों के मध्य में स्थित है ॥ १४७-१४६ ॥ तुर्यातीत का स्थान ब्रह्मरन्ध्र में परब्रह्म की ओर होता है। जागृत वृत्ति से लगाकर ब्रह्मरन्ध्र तक तुरीय का आत्मा रहता है। उसके पश्चात् वह विष्णु कहलाता है। तब साधक अत्यन्त निर्मल आकाश में हृदय-कमल पर आसीन करोड़ों सूर्यं के समान प्रभा वाले नित्य उदयरूपी विश्वरूप विष्णु का ध्यान करे ॥ १५०--१५२ ॥ अनेकाकारखचितमनेकवदनान्वितम् । अनेकभुजसंयुक्तमनेकायुधमण्डितम् ॥१५३ नानावर्णधरं देवं शान्तमुग्रमुदायुधम् । अनेकनयनाकीर्णं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥१५४ ध्यायतो योगिनः सर्वमनोवृत्तिर्विनश्यति । हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं चैतन्यज्योतिरव्‍ययम् ॥१५५ कदम्बगोलकाकारं तुर्यातीतं परात्परम् । अनन्तमानन्दमयं चिन्मयं भास्करं विभुम् ॥१५६ निवातदीपसदृशमकृत्रिममणिप्रभम् । ध्यायतो योगिनस्तस्य मुक्तिः करतले स्थिता ॥१५७ उन नाना आकार वाले, अनेक मुखों वाले, अनेक भुजाओं वाले, अनेक आयुधों वाले, अनेक वर्ण वाले, देवरूप, शान्त, उग्र, आयुधों को उठाये हुये, अनेक नेत्रयुक्त, करोड़ों सूर्यों की प्रभा वाले विश्वरूप विष्णु का ध्यान करने से योगी की सब मनोवृत्तियां नष्ट हो जाती हैं। हृदत-कमल के मध्य स्थान में स्थित चैतन्य, ज्योतिरूप, अव्यय, कदम्ब के समान गोलाकार, तुर्यातीत, परात्पर, अनन्त, Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

२१४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२१४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् आनन्दमय, चिन्मय, प्रकाशमान, निर्वात स्थान में स्थित दीपक के समान अकृत्रिम मणि की प्रभा वाले परब्रह्म का ध्यान करने से मुक्ति योगी के करतलगत रहती है ॥१५३-१५७॥ विश्वरूपस्य देवस्य रूपं यत्किंचिदेव हि । स्थवीयः सूक्ष्ममन्यद्वा पश्यन्हृदयपंकजे ॥१५८ ध्यायतो योगिनो यस्तु साक्षादेव प्रकाशते । अणिमादिफलं चैव सुखेनैवोपजायते ॥१५९ जीवात्मनः परस्यापि यच्चैवमुभयोरपि । अहमेव परं ब्रह्म ब्रह्माहमिति संस्थितिः ॥१६० समाधिः स तु विज्ञेयः सर्ववृत्तिविवर्जितः । ब्रह्म संपद्यते योगी न भूयः संसृतिं व्रजेत ॥१६१ एवं विशोध्य तत्त्वानि योगी निःस्पृहचेतसा । यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयमेव प्रशाम्यति ॥१६२ ग्राह्याभावे मनःप्राणौ निश्चयज्ञानसंयुक्तः । शुद्धसत्त्वे परे लीनो जीवः सैन्धवपिण्डवत् ॥१६३ मोहजालकसंघातं विश्वं पश्यति स्वप्नवत् । सुषुप्तिवच्चश्चरति स्वभावपरिनिश्चलः ॥१६४ निर्वाणपदमाश्रित्य योगी कैवल्यमश्नुते । इत्युपनिषत् ॥ विश्व-रूप देव का जो कुछ स्थूल, सूक्ष्म अथवा अन्य प्रकार का रूप है, उसका अपने हृदय-कमल में जो योगी ध्यान करता है वह साक्षात् उन्हीं के रूप का हो जाता है और अणिमादि सिद्धियों के फल को अनायास ही पा लेता है ॥ १५८-१५९ ॥ जीवात्मा और परमात्मा दोनों का ज्ञान प्राप्त कर लेने पर "मैं ही ब्रह्म हूँ" इस

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ २१५

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ २१५ स्थिति को पा लेना ही समाधि कहा जाता है। उसमें समस्त वृत्तियों का अन्त हो जाता है। जो योगी इस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है वह पुनः संसार में नहीं आता ॥ १६०-१६१ ॥ इस प्रकार योगी तत्व का शोध करता हुआ निस्पृह चित्त से ईंधन रहित अग्नि के समान स्वयं ही शान्त हो जाता है ॥ १६२ ॥ फिर उसके लिये कुछ ग्रहण करने योग्य नहीं रहता, उसका मन और प्राण सच्चे आत्म-ज्ञान से युक्त हो जाते हैं और उसका जीव शुद्ध परमात्म तत्व में जल में नमक के समान लय हो जाता है ॥ १६३ ॥ उसे यह मोह जाल में फँसा हुआ संसार स्वप्न की तरह दिखाई देने लगता है और वह पूर्ण निश्चल हो स्वभाव से ही सुषुप्ति की-सी अवस्था में रहने लगता है ॥ १६४ ॥ ऐसा योगी निर्वाण पद को प्राप्त कर कैवल्य स्थिति में रहता है। यह उपनिषद् है। ॥ त्रिशिखिब्राह्मण उपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—

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अद्वयतारकोपनिषत्

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्ण मुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । शान्ति पाठ—यह पूर्ण है, वह पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण बनता है। पूर्ण में से पूर्ण ले लेने पर पूर्ण ही शेष रहता है। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । अथातोऽद्वयतारकोपनिषदं व्याख्यास्यामो यतये जितेन्द्रियाय शमादिषड्गुणपूर्णाय ॥१॥ चित्स्वरूपोऽहमिति सदा भावयन् सम्यङ्निमीलिताक्षः किंचिदुन्मीलिताक्षो वाऽन्तर्दृष्ट्या भ्रू दहरादुपरि सच्चिदानन्दतेजः कूटरूपं परं ब्रह्मावलोकयन् तद्रूपो भवति ॥२॥ गर्भजन्मजरामरणसंसारमहद्भयात् संतारमति तस्मा- त्तारकमिति। जीवेश्वरौ मायिकाविति विज्ञाय सर्वविशेषं नेति नेतीति विहाय यदवशिष्यते तदद्वयं ब्रह्म ॥३॥ तत्सिद्ध्यर्थं लक्ष्यत्रयानुसंधानं कर्तव्यम् ॥४॥ देहमध्ये ब्रह्मनाडी सुषुम्ना सूर्यरूपिणी पूर्णचन्द्राभा वर्तते । सा तु मूलाधारादारभ्य ब्रह्मरन्ध्रगामिनी भवति । तन्मध्ये तटित्कोटिसमानकान्त्या मृणालसूत्रवत् सूक्ष्माङ्गी कुण्डलिनीति प्रसिद्धाऽस्ति । तां दृष्ट्वा मनसैव नरः सर्वपापविना- शद्वारा मुक्तो भवति । फालोर्ध्वगललाटविशेषमण्डले निरन्तरं तेजस्तारकयोगविस्फुरणेन पश्यति चेत् सिद्धो भवति । तर्जन्य- ग्रोन्मीलितकर्णरन्ध्रद्वये तत्र फूत्कारशब्दो जायते । तत्र स्थिते Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

अद्वयतारकोपनिषत् [ २१७ मनसि चक्षुर्मध्यगतनीलज्योतिस्थलं विलोक्य अन्तर्दृष्ट्या निर- तिशयसुखं प्राप्नोति । एवं हृदये पश्यति । एवमन्तर्लक्ष्यलक्षणं मुमुक्षुभिरुपास्यम् ॥५॥ ॐ। अब अद्वयतारक उपनिषद का कथन करते हैं जो संन्यासी, जितेन्द्रिय तथा शम-दम आदि षट गुणों से युक्त साधकों के लिये है ॥ १ ॥ आंखें बन्द अथवा अधखुली रख कर अन्तर दृष्टि से भ्रुकुटियों के ऊपर के स्थान में "मैं चित् स्वरूप हूँ" इस प्रकार का भाव निरन्तर रखते हुये सच्चिदानन्द, तेज समूह रूप परब्रह्म की झांकी करने से परब्रह्म रूप हो जाता है ॥ २ ॥ जो गर्भ, जन्म, जरा, मरण, संसार आदि महान पापों से तारता है, उसे तारकब्रह्म कहा जाता है। जीव और ईश्वर को मायिक जानते हुए अन्य सबको 'नीति-नेति' कहते हुए जो कुछ शेष बचता है, वही अद्वय ब्रह्म है ॥ ३ ॥ उसकी सिद्धि के लिये तीन लक्ष्यों का अनुसंधान करना उचित है ॥ ४ ॥ देह के मध्य में सुषुम्ना नाम की ब्रह्मनाड़ी पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रकाश वाली उपस्थित है, वह मूलाधार से आरम्भ होकर ब्रह्मरन्ध्र तक जाती है। इस नाड़ी के मध्य में करोड़ों बिजलियों के समान तेजवाली, मृणाल के सूत्र की तरह सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति प्रसिद्ध है। इसका मन के द्वारा दर्शन करने से मनुष्य सब पापों से छूट कर मुक्त हो जाता है। ललाट के ऊपर विशेष मण्डल में स्फुरित होने वाले तेज को तारक ब्रह्म के योग से सदैव देखता रहता है, वह सिद्ध हो जाता है। दोनों कानों के छेदों को तर्जनी अँगुलियों के अग्रभाग से बन्द कर लेने पर फुत्कार का शब्द सुनाई देता है। उसमें मन को स्थित करके चक्षुओं के मध्य नीली ज्योति के स्थल को अन्तःदृष्टि से देखने पर अत्यन्त सुख की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार का दर्शन हृदय में भी किया जाता है। इस प्रकार के अन्तर्लक्षणों का मोक्षाभिलाषी पुरुष को अभ्यास करना चाहिये ॥५॥