१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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योगकुण्डल्युपनिषत्
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्म हम दोनों की रक्षा करे, वह हम दोनों का पालन करे, हम दोनों एक साथ सामर्थ्य को प्राप्त हों, हमारा अध्ययन तेजस्वी हो हम परस्पर द्वेष न करे । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । प्रथमोऽध्यायः हेतुद्वयं हि चित्तस्य वासना च समीरणः । तयोर्विनष्ट एकस्मिंस्तद्द्वावपि विनश्यतः ॥१॥ तयोरादौ समीरस्य जयं कुर्यान्नरः सदा । मिताहारश्चसनं च शक्तिचालस्तृतीयकः ॥२॥ एतेषां लक्षणं वक्ष्ये शृणु गौतम सादरम् । सुस्निग्धमधुराहारश्चतुर्थां शावशेषकः ॥३॥ भुज्यते शिवसंप्रीत्यै मिताहारः स उच्यते । आसनं द्विविधं प्रोक्तं पद्मं वज्रासनं तथा ॥४॥ ऊर्वोरुपरि चेद्धत्ते उभे पादतले यथा । पद्मासनं भवेदेतत्सर्वपापप्रणशनम् ॥५॥ हरि ॐ। चित्त की अस्थिरता के दो कारण होते हैं, एक वासना, दूसरा श्वास ( प्राण ) इनमें से एक के नष्ट हो जाने पर Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२४८ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत्
दूसरा भी नष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ इसलिये साधक को पहले प्राण को जय करना चाहिये और इसके लिये मिताहार, आसन और शक्ति- चालन को करना चाहिये ॥ २ ॥ हे गौतम ! अब मैं तुझको इनके लक्षण बताता हूँ, उन्हें तू ध्यानपूर्वक सुन । सर्वं प्रथम स्निग्ध और मधुर आधार करना चाहिये तथा पेट के एक चौथाई भाग को खाली छोड़ देना चाहिये ॥ ३ ॥ इस प्रकार का भोजन भगवान के उद्देश्य से किया जाय, यही मिताहार है । आसनों में दो प्रकार के मुख्य हैं— पद्मासन और वज्रासन ॥ ४ ॥ दोनों जांघों पर एक दूसरे पैर के तलवों को सीधा रखने से पद्मासन होता है, जो सब पापों का नाश करने वाला है ॥ ५ ॥
वामाङ्घ्रिमूलं कन्धाधः अन्यं तदुपरि क्षिपेत् । समग्रीवशिरःकायो वज्रासमनमितीम् ॥६ कुण्डल्येव भवेच्छक्तिस्तां तु संचालयेद्बुधः । स्वस्थानादाभ्रुवोर्मध्यं शक्तिचालनमुच्यते ॥७ तत्साधने द्वयं मुख्यं सरस्वत्यास्तु चालनम् । प्राणरोधमधाभ्यासाहृज्वी कुण्डलिनी भवेत् ॥८ तयोरादौ सरस्वत्याश्चालनं कथयामि ते । अरुन्धत्येव कथिता पुराविद्भिः सरस्वती ॥६ यस्याः संचालने नैव स्वयं चलति कुण्डली । इडायां वहति प्राणे बद्ध्वा पद्मासनं दृढम् ॥१०
बांये पैर की एड़ी को योनि स्थान में रखे और दाहिने की एड़ी उसके ऊपर रखे, गर्दन तथा शिर को समान और सीधा रखे तो यह वज्रासन होता है ॥ ६ ॥ कुण्डली ही मुख्य शक्ति है, ज्ञानी साधक उसको चालन करके दोनों भौंहों के मध्य में ले जाता है तो वही
प्रथम अध्याय [ २४६ ]
प्रथम अध्याय [ २४६ ] शक्तिचालन है ॥ ७ ॥ कुण्डलिनी को चलाने के दो मुख्य साधन हैं, सरस्वती का चालन और प्राण निरोध, अभ्यास द्वारा लिपटी हुई कुण्डलिनी सीधी हो जाती है ॥ ८ ॥ पहले तुझको सरस्वती के चालन के विषय में समझाता हूं, प्राचीनता वाले सरस्वती को अरुन्धती कहते हैं। इस सरस्वती नाड़ी का चालन करने से कुण्डलिनी अपने आप चलने लगती है। इसके लिए जब श्वांस इड़ा [ बाँयी ] नाड़ी से बहती हो तो पद्मासन लगाकर बैठे ॥९-१०॥ द्वादशांगुलदैर्ध्यं च अम्बरं चतुरङ्गुलम् । बिस्तीर्य तेन तन्नाडीं वेष्टयित्वा ततः सुधीः ॥११ अंगुष्ठतर्जनीभ्यां तु हस्ताभ्यां धारयेहढ़म् । स्वशक्त्या चालयेद्वामे दक्षिणेन पुनः पुनः ॥१२ मुहूर्तद्वयपर्यन्तं निर्भयाच्चालयेत्सुधीः । ऊर्ध्वमाकर्षयेत्किञ्चित्सुषुम्नां कुण्डलीगता ॥१३ तेन कुण्डलिनी तस्याः सुषुम्नाया मुखं व्रजेत् । जहाति तस्मात्प्राणोऽयं सुषुम्नां व्रजति स्वतः ॥१४ तुन्दे तु ताणं कुर्याच्च कण्ठसंकोचने कृते । सरस्वत्याश्चालनेन वक्षः स्यादूर्ध्वंगो मरुत् ॥१५ तब बारह अंगुल लम्बे ओर चार अंगुल चौड़े आकाश के टुकड़े से ( कल्पित करके ) कुण्डलिनी को लपेटे ॥ ११ ॥ तब बांयी और दाहिनीं नासिका को अँगूठे और तर्जनी से दृढ़तापूर्वक पकड़े और पहले दाहिनीं से और फिर बांयी नासिका से बार बार रेचक और पूरक करे । साथ ही उसको मानसिक भावना द्वारा दांयी और बांयी ओर बार-बार चालन करता रहे ॥ १२ ॥ इस प्रकार दो मुहूर्त तक सरस्वती का चालन करता रहे । इसके पश्चात् सुषुम्ना नाड़ी को
२५० ] योगकुण्डल्युपनिषत् जो कुण्डलिनी के समीप ही रहती है किंचित ऊपर की तरफ खींचे ॥ १३ ॥ इस विधि से अभ्यास करने पर कुण्डलिनी सुषुम्ना के मुख में चढ़ने लगती है और प्राण भी स्वयं ही उस स्थान को छोड़कर सुषुम्ना में चलने लगता है ॥ १४ ॥ पेट को ऊपर की तरफ खींच कर तथा कण्ठ को संकोचन कर सरस्वती को चलाने से वायु वक्षस्थल से ऊपर चला जाता है ॥ १५ ॥ सूर्येण रेचयेद्वायुं सरस्वत्यास्तु चालने । कण्ठसंकोचनं कृत्वा वक्षः स्यादूर्ध्वगो मरुत् ॥१६ तस्मात्संचालयेन्नित्यं शब्दगर्भां सरस्वतीम् । यस्याः संचालनैनैव योगी रोगैः प्रमुच्यते ॥१७ गुल्मं जलोदरप्लीहो ये चान्ये तुन्दमध्यगाः । सर्वे ते शक्तिचालेन रोगा नश्यन्ति निश्चयम् ॥१८ प्राणरोधमथेदानीं प्रवक्ष्यामि समासतः । प्राणश्च देहगो वायुरायामः कुम्भकः स्मृतः ॥१९ स एव द्विविधः प्रोक्तः सहितः केवलस्तथा । यावत्केवलसिद्धिः स्यात्तावत्सहितमभ्यसेत् ॥२० जब सरस्वती का चालन किया जाय तो सूर्य नाड़ी ( दाहिनी ) से वायु का रेचक करे, कण्ठ से संकोचन कर ले तो वायु वक्षस्थल से ऊपर चला जाता है ॥ १६ ॥ इस प्रकार शब्दगर्भा सरस्वती का लगातार चालन करते रहना चाहिये । इसके चालन से योगी सब प्रकार के रोगों से छूट जाता है ॥ १७ ॥ गुल्म, जलोदर, प्लीहा तथा पेट सम्बन्धी अन्य रोग शक्तिचालन से निश्चयपूर्वक नष्ट हो जाते हैं ॥१८॥ आगे प्राण निरोध ( प्राणायाम ) को बतलाते हैं । देह में चलने वाले वायु को प्राण कहते हैं और जब वह स्थिर हो जाता है तब वह कुम्भक कहा जाता है ॥ १९ ॥ यह कुम्भक दो प्रकार का
प्रथम अध्याय ] [ Public Domain. Digitization by eGangotri ] २५१ बतलाया गया है--सहित और केवल । जब तक केवल कुम्भक सिद्ध न हो तब तक सहित-कुम्भक का अभ्यास करना चाहिये ॥ २० ॥ सूर्योज्जायी शीतली च भस्त्री चैव चतुर्थिका । भेदैरेव समं कुम्भो यः स्यात्सहितकुम्भकः ॥२१ पवित्रे निर्जने देशे शर्करादिविवर्जिते । धनुःप्रमाणपर्यन्ते शीताग्निजलवर्जिते ॥२२ पवित्रे नात्युच्चनीचे ह्यासने सुखदे सुखे । बद्धपद्मासन कृत्वा सरस्वत्यास्तु चालनम् ॥२३ दक्षनाड्या समाकृष्य बहिष्ठं पवनं शनैः । यथेष्टं पूरयेद्वायुं रेचयेदिडया ततः ॥२४ कपालशोधने वाऽपि रेचयेत्पवनं शनैः । चतुष्कं वातदोषं तु कृमिदोषं निहन्ति च ॥२५ सूर्यभेदी, शीतली और भस्त्रिका इन चार प्रकार के प्राणायामों के साथ सहित कुम्भक किया जाता है ॥ २१ ॥ एकान्त और पवित्र स्थान में जहां कंकड़-पत्थर आदि न हों और पास में ही घास, अग्नि, जल आदि न हों, वहां न अधिक ऊँचा न अधिक नीचा ऐसे पवित्र सुखदायक आसन पर बद्ध-पद्मासन लगाकर बैठे और सरस्वती का चालन करे ॥ २२--२३ ॥ दाहिनी नासिका से बाहर की वायु को धीरे-धीरे खींचे और पर्याप्त परिमाण में वायु के भीतर जाने पर बांयी नासिका से रेचन करे ॥ २४ ॥ कपाल शोधन की क्रिया में भी वायु को धीरे-धीरे बाहर निकाले । इससे चारों प्रकार के वातदोष और कृमिदोष नष्ट हो जाते हैं ॥२५॥ पुनः पुनरिदं कार्यं सूर्यभेदमुदाहृतम् । मुखं संयम्य नाडीभ्यामाकृष्य पवनं शनैः ॥२६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२५२ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् यथा लगति कण्ठात्तु हृदयावधि सस्वनम् । पूर्ववत्कुम्भयेत्प्राणं रेचयेदिडया ततः ॥२७ शीर्षोदिता नलहरं गलश्लेष्महरं परम् । सर्वरोगहरं पुण्यं देहानलविवर्धनम् ॥२८ नाडीजलोदरं धातुगतदोषविनाशनम् । गच्छतस्तिष्ठतः कार्यमुज्जय्याख्यं तु कुम्भकम् ॥२६ जिह्वया वायुमाकृष्य पूर्ववत्कुम्भकादनु । शनैस्तु घ्राणरन्ध्राभ्यां रेचयेदनिलं सुधीः ॥३० गुल्मप्लीहादिका दोषाः क्षयं पित्तं ज्वरं तृषाम् । विषाणि शीतली नाम कुम्भकोऽयं निहन्ति च ॥३१ इस क्रिया को सूर्य भेदन कहते हैं, इसका अभ्यास बार-बार करते रहना चाहिये । अब उज्जायी को बतलाते हैं कि मुख बन्द करके दोनों नासिकाओं से वायु को धीरे से खींचे जिससे वह शब्द करती हुई कण्ठ से लेकर हृदय तक भर जाय । तब पूर्ववत् कुम्भक करके बाँयी नासिका से रेचक करे, इससे मस्तक की उष्णता, गले का कफ और अन्य अनेक रोग दूर हो जाते हैं और देह की अग्नि की वृद्धि होती है । इससे नाड़ी सम्बन्धी जलोदर और धातु सम्बन्धी रोग भी दूर हो जाते हैं । इस उज्जायी कुम्भक को चलते-फिरते, स्थिर रहते सदैव करते रहना चाहिये ॥ ३६--२६ ॥ शीतली नामक प्राणायाम करते समय वायु को जिह्वा द्वारा खींचकर पूर्ववत् कुम्भक किया जाता है फिर नासिका के छिद्रों से वायु को शनैः निकाल दिया जाता है । इससे गुल्म, प्लीहा, पित्त ज्वर, तृषा आदि दूर होते हैं ॥ ३०--३१ ॥ ततः पद्मासनं बद्ध्वा समग्रीवोदरः सुधीः । मुखं संयम्य यत्नेन प्राणं घ्राणेन रेचयेत् ॥३२.
प्रथम अध्याय ] [ २५३
प्रथम अध्याय ] [ २५३ यथा लगति कण्ठात्तु कपाले सस्वनं ततः । वेगेन पूरयेत् किञ्चिद्धृत्पद्मावधि मारुतम् ॥ ३३ पुनर्विरचेयत्तद्वत्पूरयेच्च पुनः पुनः । यथैव लोहकाराणां भस्त्रावेगेन चाल्यते ॥३४ तथैव स्वशरीरस्थं चालयेत्पवनं शनैः । यथा श्रमो भवेद्देहे तथा सूर्येण रेचयेत् ॥३५ यथोदरं भवेत्पूर्णंपवनेन तथा लघु । धारयन्नासिकामध्यं तर्जनीभ्यां बिना दृढम् ॥३६ कुम्भक पूर्ववत्कृत्वा रेचयेदिडयाऽनिलम् । कण्ठोत्थितानलहरं शरीराग्निविवर्धनम् ॥३७ कुण्डलीबोधकं पुण्यं पापघ्नं शुभदं सुखम् । ब्रह्मनाडीमुखान्तस्थक फाद्यर्गलनाशनम् ॥३८ गुणत्रयसमुद्भू तग्रन्थित्रयविभेदकम् । विशेषेणैव कर्तव्यं भस्त्राख्यंकुम्भक त्विदम् ॥३६ अब भस्त्रिका प्राणायाम को बतलाते हैं कि पद्मासन लगाकर गर्दन और देह को सीधा रखते हुए, मुख को बन्द करके वायु को सावधानी पूर्वक नासिका से रेचन करे । फिर वायु को वेगपूर्वक शब्द करते हुए ऐसे खींचे कि कण्ठ, तालु, कपाल तथा हृदय को उसका स्पर्श जान पड़े । फिर उसे बाहर निकालकर पुनः पूरक करे, इस प्रकार वायु को बार-बार वेग पूर्वक इस प्रकार खींचे और भरे जैसे लुहार की भाथी चलती है । इसी विधि से शरीर स्थित वायु को सँभालकर चलावे । जब श्रम जान पड़े तब सूर्य नाड़ी से पूरक करे और तर्जनी के अतिरिक्त चारों ओर अँगुलियों से नासिका को मध्य से दृढ़तापूर्वक पकड़ कर कुम्भक करे तथा फिर बांयी नाक से रेचक करदे यह अभ्यास कण्ठ की जलन को मिटाता है और शरीर की अग्नि को बढ़ाता है, कुण्डली को जगाता है, पुण्यकारी, पाप नाशक
२५४ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् शुभ और सुखदायक है। ब्रह्मनाड़ी (सुषुम्ना) के मुख पर जो कफ आदि रहता है उसको नष्ट करने वाला है। यह सत् आदि तीनों गुणों से उत्पन्न तीनों ग्रन्थियों का भेदन करने वाला है। इसीलिये इस भस्त्रिका नामक प्राणायाम का विशेष रूप से अभ्यास करना चाहिये ॥३२-३६॥ चतुर्णामपि भेदानां कुम्भके समुपस्थिते । बन्धत्रयमिदं कार्यं योगिभिर्वीतकल्मषैः ॥४० प्रथमो मूलबन्धस्तु द्वितीयोड्डीयणाभिधः । जालन्धरस्तृतीयस्तु तेषां लक्षणमुच्यते ॥४१ अधोगत्तिमपानं वै ऊर्ध्वगं कुरुते बलात् । आकुञ्चनेन तं प्राहुर्मूलबन्धोऽयमुच्यते ॥४२ अपाने चोर्ध्वगे याते संप्राप्ते वह्निमण्डले । ततोऽनलशिखा दीर्घा वर्धते वायुना हृता ॥४३ ततो यातौ वह्न्यपानौ प्राणमुष्णस्वरूपकम् । तेनात्यन्तप्रदीप्तेन ज्वलनो देहजस्तथा ॥४४ तेन कुण्डलिनी सुप्ता संतप्ता संप्रबुध्यते । दण्डाहतभुजङ्गीव निश्वस्य ऋजुतां व्रजेत् ॥४५ इस प्रकार इन चारों प्रकार के प्राणायामों को रोकने के साथ- साथ योगी को तीन 'बन्ध' भी करने चाहिए । इनमें से पहला मूलबन्ध, दूसरा उड्डियाण और तीसरा जालन्धरबन्ध कहा जाता है ॥४०-४१॥ अधोगति वाले अपान को शक्तिपूर्वकं गुदा के आकुंचन द्वारा ऊपर ले जाने से मूलबन्ध होता है। अपान ऊपर जाकर वह्निमंडल से मिलता है तो उसके प्रभाव से अग्नि की तीव्रता बहुत अधिक हो जाती है। उस ज्वाला से संतप्त होकर सोई हुई कुण्डलिनी जागृत होती है और
प्रथम अध्याय ] [ २५५
प्रथम अध्याय ] [ २५५ दण्डे से मारी जाने वाली सर्पिणी के समान फुत्कार कर सीधी हो जाती है ॥४२-४५॥ बिलप्रवेशतो यत्र ब्रह्मनाड्यन्तरं व्रजेत् । तस्मान्नित्यं मूलबन्धः कर्तव्यो योगिभिः सदा ॥४६॥ कुम्भकान्ते रेचकादौ कर्तव्यस्तूड्डियाणकः । बन्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः ॥४७॥ तस्मादुड्डियणाख्योऽयं योगिभिः समुदाहृतः । सति वज्रासने पादौ कराभ्यां धारयेद्दृढम् ॥४८॥ गुल्फदेशसमीपे च कन्दं तत्र प्रपीडयेत् । पश्चिमं ताणमुदरे धारयेद्ध दये गले ॥४९॥ शनैः शनैर्यदा प्राणस्तुन्दसंधिं निगच्छति । तुन्ददोषं विनिर्धूय कर्तव्यं सततं शनैः ॥५०॥ तब वह बिल में प्रवेश करने के समान सुषुम्ना के भीतर जाती- है। इस कारण योगियों को मूलबन्ध का अभ्यास सदैव करना चाहिये- ॥ ४६ ॥ कुम्भक के पश्चात् रेचक करने के पूर्व उड्डियानबन्ध करना चाहिए, जिससे प्राण वायु सुषुम्ना के भीतर उड़ती है । इसलिए योगीजन इसको उड्डियाण कहते हैं। इसके लिये वज्रासन लगाकर पैरों- को हाथों से दृढ़तापूर्वक पकड़े। जहाँ गुल्फ (टखना) रखा जाता है वहाँ कन्द स्थानों को दबाये, पेट को ऊपर की तरफ खींचे और हृदय- तथा गले को भी तनाव देकर खींचे। इस विधि से प्राण क्रमशः पेट की संधियों में प्रवेश करता है और पेट के सब दोषों को दूर करता है। इस- कारण यह अभ्यास सदैव करते रहना चाहिये ॥४७-५०॥ पूरकान्ते तु कर्तव्यो बन्धो जालन्धराभिधः । कण्ठसंकोचरूपोऽसौ वायुमार्गनिरोधकः ॥५१॥ अधस्तात्कुञ्चनेनाशु कण्ठसंकोचने कृते । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२५६ [CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri] योगकुण्डल्युपनिषत् मध्ये पश्चिमताणेन स्यात्प्राणो ब्रह्मनाडिगः ॥५२॥ पूर्वोक्तेन क्रमेणैव सम्यगासनमास्थितः । चालनं तु सरस्वत्याः कृत्वा प्राणं निरोधयेत् ॥५३॥ प्रथमे दिवसे कार्यं कुम्भकानां चतुष्टयम् । प्रत्येकं दशसंख्याकं द्वितीये पञ्चभिस्तथा ॥५४॥ विंशत्यलं तृतीयेऽह्नि पञ्चवृद्ध्या दिने दिने । कर्तव्यः कुम्भको नित्यं बन्धत्रयसमन्वितः ॥५५॥ जालन्धरबंध में कंठ का संकोचन वायु को रोकने के निमित्त किया जाता है, वह बंध पूरक के अन्त में करना होता है ॥ ५१ ॥ अधोभाग में मूलबंध द्वारा गुदा का आकुंचन करे और ऊपर से जालंधर बन्ध द्वारा कण्ठ का संकोचन करे और मध्य में पश्चिमतान(उड्डीयान) से प्राण को खींचे। इस प्रकार सब तरफ से रोका जाकर प्राण ब्रह्मनाड़ी (सुषुम्ना) में चढ़ता है ॥ ५२ ॥ जैसे पहले बतलाया गया है सम्यक प्रकार से आसन पर बैठकर सरस्वती का चालन करके प्राण का निरोध करना चाहिये ॥ ५३ ॥ प्रथम दिन चारों कुम्भकों को दस-दस बार करना चाहिए और दूसरे दिन पन्द्रह-पन्द्रह बार करना चाहिये। तीसरे दिन बीस-बीस करना चाहिये, इसी प्रकार प्रतिदिन पाँच-पाँच बढ़ाता जाय। इन कुम्भकों का अभ्यास प्रतिदिन तीन बन्ध सहित करना चाहिये ॥५४-५५॥ दिवा सुप्तिर्निशायां तु जागरादतिमैथुनात् । बहुसंक्रमणं नित्यं रोधान्मूत्रपुरीषयोः ॥५६॥ विषमासनदौषाश्च प्रयासप्राणचिन्तनात् । शीघ्रमूत्पद्यते रोगः स्तम्भयेद्यदि संयमी ॥५७॥ योगाभ्यासेन मे रोग उत्पन्न इति कथ्यते । ततोऽभ्यासं त्यजेदेवं प्रथमं विघ्नमुच्यते ॥५८॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
प्रथम अध्याय ] [ २५७
प्रथम अध्याय ] [ २५७ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri द्वितीयं संशयाख्यं च तृतीयं च प्रमत्तता । आलस्याख्यं चतुर्थं च निद्रारूपं तु पञ्चमम् ॥५९ षष्ठं तु विरतिर्भ्रान्तिः सप्तमं परिकीर्तितम् । विषयं चाष्टमं चैव अनाख्यं नवमं स्मृतम् ॥६० अलब्धिर्योंगतत्त्वस्य दशमं प्रोच्यते बुधैः । इत्येतद्विघ्नदशकं विचारेण त्यजेद्बुधः ॥६१ दिन का सोना, रात का जगना, अति मैथुन, ज्यादा चलना, मलमूत्र का सदैव रोकना, आसन की विषमता, हठपूर्वक प्राण का अभ्यास आदि दोषों से शीघ्र ही रोगों का आक्रमण होता है ॥ ५६ ॥ यदि कोई कहे कि मुझे योगाभ्यास ही से रोग हुआ, तो उसे समझ लेना चाहिए कि योगाभ्यास का त्याग ही सबसे पहला विघ्न है, दूसरा विघ्न संशय करते रहना, तीसरा प्रमत्तता, चौथा आलस्य, पाँचवां अधिक निद्रा, छठा प्रेम न रहना, सातवां भ्रान्ति, आठवां विषमता, नवां अनाख्य और दसवां योगतत्व की अप्राप्ति है। बुद्धिमान साधक इन सबको विचार कर इनका त्याग कर दे ॥ ५७-६१ ॥ प्राणाभ्यासस्ततः कार्यों नित्यं सत्त्वास्थया धिया । सुषुम्ना लीयते चित्तं न च वायुः प्रधावति ॥६२ शुष्के मले तु योगी च स्याद्नतिश्चालिता ततः । अधोगतिमपानं वै ऊर्ध्वंगं कुरुते बलात् ॥६३ आकुञ्चनेन तं प्राहूर्मू'लबन्धोऽयमुच्यते । अपानश्चोर्ध्वगो भूत्वा वह्निना सह गच्छति ॥६४ प्राणस्थानं ततो वह्निः प्राणापानौ च सत्वरम् । मिलित्वा कुण्डलीं यति प्रसुप्ता कुण्डलाकृतिः ॥६५ तेनाग्निना च संतप्ता पवनेनैव चालिता । प्रसार्य स्वशरीर तु सुषुम्नाबदनान्तरे ॥६६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२५८ [ योगकुण्डल्युपनिषत् इस प्रकार प्राणायाम का अभ्यास नियमित रूप से सत्वमयी बुद्धि से करना चाहिए। इसके फलस्वरूप चित्त सुषुम्ना में संलग्न रहता है और उसमें प्राणवायु दौड़ता है ॥ ६२ ॥ जब मलशोधन हो जाय और प्राण चलने लगे तब प्रयत्नपूर्वक अपान की ऊर्ध्वगति करनी चाहिए ॥ ६३ ॥ इसके लिए जो गुदा का आकुंचन किया जाता है, उसे मूलबन्ध कहते हैं। यह अपान ऊपर आकर अग्नि के साथ संयुक्त होता है और ऊपर चढ़ता है ॥ ६४ ॥ जब यह अग्नि प्राण स्थान में पहुँच प्राणवायु से मिलता है और वे सोती हुई कुण्डलिनी को प्राप्त होते हैं तो उसकी उष्णता से तप्त होकर तथा वायु से चलित होकर कुण्डलिनी सीधी हो जाती है और सुषुम्ना के मुख में प्रवेश करती है ॥ ६५-६६ ॥ ब्रह्मग्रन्थिं ततो भित्त्वा रजोगुणसमुद्भवम् । सुषुम्ना वदने शीघ्रं विद्युल्लेखेव संस्फुरेत् ॥६७ विष्णुग्रन्थिं प्रयात्युच्चैः सत्वरं हृदि संस्थिता । ऊर्ध्वं गच्छति यच्चास्ते रुद्रग्रन्थिं तदुद्भवम् ॥६८ भ्रुवोर्मध्यं तु संभिद्य याति शीतांशुमण्डलम् । अनाहताख्यं यच्चक्रं दलैः षोडशभिर्युतम् ॥६९ तत्र शीतांशुसंजातं द्रवं शोषयति स्वयम् । चलिते प्राणवेगेन रक्तं पित्तं रविर्गृहात् ॥७० रजोगुण से उत्पन्न ब्रह्मग्रन्थि को भेदकर यह कुण्डलिनी शक्ति सुषुम्ना के भीतर बिजली की रेखा की तरह चढ़ती है ॥ ६७ ॥ शीघ्र ही यह हृदय स्थिति विष्णु-ग्रन्थि को प्राप्त होती हुई और भी ऊपर ( आज्ञा चक्र ) जाती है और वहाँ रुद्र-ग्रन्थि को प्राप्त होती है ॥ ६८ ॥ वहाँ से यह भौंहों के मध्य स्थान को भेदती हुई चन्द्रमा के स्थान में पहुँचती है, जहाँ सोलह पंखुरियों वाला अनाहत चक्र स्थित है ॥ ६९ ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
प्रथम अभ्यास ] [ २५६ यहाँ यह चन्द्रमा से उत्पन्न द्रव को सोख लेती है तथा प्राणवायु के वेग से रक्त और पित्त को सूर्य ग्रहण कर लेता है ॥ ७० ॥ यातेन्दुचक्रं यत्रास्ते शुद्धश्लेष्मद्रवात्मकम् । तन्न सिक्तं ग्रसत्युष्णं कथं शीतस्वभावकम् ॥७१ तथैव रभसा शुक्लं चन्द्ररूपं हि तप्यते । ऊर्ध्वं प्रहवति क्षुब्धा तदैव स्रवतेतराम् ॥७२ तस्यास्वादवशाच्चित्तं बहिष्टं विषमेषु यत् । तदेव परमं भुक्त्वा स्वस्थस्यात्मरतो युवा ॥७३ प्रकृत्यष्टकरूपं च स्थानं गच्छति कुण्डली । क्रोडीकृत्य शिवं याति क्रोडीकृत्य विलीयते ॥७४ इत्यधोध्वंरजः शुक्ले शिवे तदनु मारुतः । प्राणापानौ समौ याति सह जातौ तथैव च ॥७५ यह चन्द्र मंडल में जाकर वहाँ के द्रव पदार्थ को शोषण कर लेती है और उसे उष्ण कर देती है । तब वहाँ शीतलता कैसे रह सकती है ? ॥ ७१ ॥ यह चन्द्रमा के शुक्ल रूप को तप्त कर देती है और क्षुब्ध होती हुई ऊपर चढ़ती है ॥ ७२ ॥ इसके प्रभाव से जो चित्त पहले बाहरी पदार्थों में संलग्न रहता था, वह परमार्थ में लग कर आत्मानन्द का उपभोग करने लगता है ॥ ७३ ॥ इस प्रकार कुण्डलिनी अष्टधा प्रकृति को प्राप्त होकर शिव के साथ मिलती है और उसी के साथ लय को प्राप्त हो जाती है ॥ ७४ ॥ इससे अधोभाग का रज और ऊपर का शुक्ल मिलकर शिव में लीन हो जाते हैं, तथा प्राण और अपान भी उन्हीं में लीन हो जाते हैं, क्योंकि वे समान रूप से उत्पन्न होते हैं ॥ ७५ ॥ भूतेऽल्पे च मनोल्पे वा वाचके त्वतिवर्धते । धावयत्यखिला वाता अग्निमूषाहिरण्यवत् ॥७६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२६० ] योगकुण्डल्युपनिषत् आधिभौतिकदेहं तु अधिदैविकविग्रहे । देहोऽतिविमलं याति चातिवाहिकतामियात् ॥७७ जाड्यभावविनिर्मुक्तममलं चिन्मयात्मकम् । तस्यातिवाहिकं मुख्यं सर्वेषां तु मदात्मकम् ॥७८ जायाभवविनिर्मुक्तिः कालरूपस्य विभ्रमः । इति तं स्वस्वरूपा हि मती रज्जुभुजङ्गवत् ॥७९ मृषैवोदेति सकलं मृषैव प्रविलीयते । रौप्यबुद्धिः शुक्तिकायां स्त्रीपुंसोर्भ्रंमतो यथा ॥८० भौतिक देह चाहे छोटा हो या बड़ा हो जब उष्णता बहुत बढ़ती है तो वह समस्त देह में उसी प्रकार फैल जाती है जैसे गर्मी पाकर सुवर्ण फैल जाता है ॥ ७६ ॥ इसके प्रभाव से आधिभौतिक देह आधिदैविक हो जाता है और शरीर अत्यन्त विमल होकर सूक्ष्म शरीर की तरह हो जाता है ॥ ७७ ॥ वह जड़ता को त्याग कर निर्मल चित्स्वरूप हो जाता है, जब कि अन्य देह जड़तायुक्त ही बने रहते हैं ॥ ७८ ॥ ऐसे साधक का गर्भवास छूट जाता है और काल का भी उस पर वश नहीं चलता । उसको अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान हो जाता है । जिस प्रकार रस्सी में सांप का भ्रम होता है, सीपी में चाँदी का भ्रम होता है, स्त्री में पुरुष का भ्रम होता है, इसी प्रकार वह अपने देह सम्बन्धी भ्रम को समझ जाता है कि यह मिथ्या है ॥ ७९-८० ॥ पिण्डब्रह्माण्डयोरैक्यं लिङ्गसूत्रात्मनोरपि । स्वापाव्याकृतयोरैक्यं स्वप्रकाशचिदात्मनोः ॥८१ शक्तिः कुण्डलिनी नाम बिसतन्तुनिभा शुभा । मूलकन्दं फणाग्रेण दृष्ट्वा कमलकन्दवत् ॥८२ मुखेन पुच्छं संगृह्य ब्रह्मरन्ध्रसमन्विता । पद्मासनगतः स्वस्थो गुदमाकुञ्च्य साधकः ॥८३
द्वितीय अध्याय ] [ २६१
द्वितीय अध्याय ] [ २६१ वायुमूर्ध्वगतं कुर्वन् कुम्भकाविष्टमानसः । वाय्वाघातपवशादग्निः स्वाधिष्ठानगतो ज्वलन् ॥८४ ज्वलनाघातपवना घातोन्निद्रितोऽहिराट् । ब्रह्मग्रन्थि ततो भित्त्वा विष्णुग्रन्थिं भिनत्त्यतः ॥८५ रुद्रग्रन्थिं च भित्त्वैव कमलानि भिनत्ति षट् । सहस्रकमले शक्तिः शिवेन सह मोदते ॥ सैवावस्था परा ज्ञेया सैव निर्वृत्तिकारणा ॥८६ इति ॥ इससे पिण्ड और ब्रह्माण्ड की, लिंग-देह और सूत्रात्मा की एकता होकर अपनी आत्मा और स्वयं प्रकाश रूप चैतन्य में ऐक्य भाव हो जाता है। कुण्डलिनी शक्ति पद्मतन्तु के समान होती है और कमल के कन्द के समान ही मूलकन्द को फणाग्र से देखकर, अपनी पूँछ को मुख में डालकर ब्रह्मरन्ध्र के मुख को ढक कर सोती रहती है। उसके लिए साधक को पद्मासन लगाकर, गुदा का आकुंचन करके कुम्भक द्वारा वायु को ऊपर चढ़ाना चाहिए। वायु के जोर से स्वाधिष्ठान चक्र की अग्नि को प्रज्ज्वलित करे ॥ ८३-८४ ॥ तब अग्नि और पवन दोनों के आघात से सोई हुई कुण्डलिनी जागृत होती है और ब्रह्म-ग्रन्थि, विष्णु-ग्रन्थि तथा रुद्र-ग्रन्थि को तथा षट्चक्र को भेदन करती हुई सहस्र दल कमल में पहुँच जाती है। वहाँ यह शिव से शक्ति रूप में मिलकर आनन्द को प्राप्त होती है। यही श्रेष्ठ और मोक्षदायक अवस्था होती है ॥ ८६ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ द्वितीयोऽध्यायः अथाहं संप्रवक्ष्यामि विद्यां खेचरिसंज्ञिकाम् । यया विज्ञातवानस्य लोकेऽस्मिन्नजरामरः ॥१॥
२६२ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् मृत्युव्याधिजराग्रस्तो दृष्ट्वा विद्यामिमां मुने । बुद्धिं दृढतरां कृत्वा खेचरीं तु समभ्यसेत् ॥२ जरामृत्यु गदघ्नो यः खेचरीं वेत्ति भूतले । ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव तदभ्यासप्रयोगतः ॥३ तं मुने सर्वभावेने गुरुं मत्वा समाश्रयेत् । दुर्लभा खेचरी विद्या तदभ्यासोऽपि दुर्लभः ॥४ अभ्यासं मेलनं चैव युगपन्नैव सिध्यति । अभ्यासमात्रनिरता न विन्दन्ते ह मेलनम् ॥५ अब खेचरी विद्या के सम्बन्ध में बतलाते हैं, जिसके जानने से वृद्धावस्था तथा मृत्यु से छूट जाते हैं ॥ १ ॥ बुढ़ापा, मौत और रोगों में जो मनुष्य ग्रस्त हैं, उनको निश्चयपूर्वक इस विद्या का अभ्यास करना चाहिए और जो महापुरुष ग्रन्थों से, भाव से, अभ्यास से इनका ज्ञान रखता है, उसी को सर्व भाव से गुरु मानकर तथा उसका आश्रय ग्रहण करके इसकी शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए क्योंकि यह खेचरी विद्या बड़ी कठिन है और उसका अभ्यास और भी अधिक कठिन है ॥ २-४ ॥ इसका अभ्यास और मेलन ( योग ) दोनों एक साथ करने से अथवा दोनों को अलग-अलग करने से भी सिद्धि प्राप्त कर सकना संभव नहीं होता ॥ ५ ॥ अभ्यासं लभते ब्रह्मन् जन्मजन्मान्तरे क्वचित् । मेलनं जन्मनां तत्तु शतान्तेऽपि न लभ्यते ॥६ अभ्यासं बहुजन्मान्ते कृत्वा तद्भावसाधितम् । मेलनं लभते कश्चिद्योगी जन्मान्तरे क्वचित् ॥७ यदा तु मेलनं योगी लभते गुरुवक्त्रतः । तदा तत्सिद्धिमाप्नोति यदुक्ता शास्त्रसंततौ ॥८ ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव मेलनं लभते यदा ।
द्वितीय अध्याय ] [ २६३
द्वितीय अध्याय ] [ २६३ तदा शिवत्वमाप्नोति निर्मुक्तः सर्वसंसृतेः ॥६ शास्त्रं विनाऽपि संबोद्धुं गुरवोऽपि न शक्नुयुः । तस्मात्सुदुर्लभतरं लभ्यं शास्त्रमिदं मुने ॥१० अभ्यास तो किसी जन्म में मिल भी जाता है । पर मेलन (योग) सैकड़ों जन्म में भी नहीं मिलता ॥ ३ ॥ बहुत से जन्मों तक अभ्यास करने पर किसी जन्म में योगी 'मेलन' को प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ जब साधक गुरु के मुख से 'मेलन' का मन्त्र प्राप्त करता है, तो उसे शास्त्रानुकूल सिद्धि की भी प्राप्ति हो जाती है ॥ ८ ॥ जब साधक ग्रन्थ के अर्थ को समझ कर 'मेलन' को प्राप्त करता है, तो भी वह संसार से छूटकर शिवत्वं को प्राप्त होता है ॥ ६ ॥ शास्त्र का होना भी अत्यावश्यक है क्योंकि इसके बिना गुरु भी यथार्थ बोध नहीं करा सकते । इसी लिए शास्त्र का प्राप्त होना भी बड़े महत्व का है ॥१०॥ यावन्न लभ्यते शास्त्रं तावद्दुर्गा पर्यटेद्यतिः । यदा संलभ्यते शास्त्रं तदा सिद्धिः कर स्थिता ॥११ न शास्त्रेण विना सिद्धिर्दृष्टा चैव जगत्त्रये । तस्मान्मेलनदातारं शास्त्रदातारमच्युतम् ॥१२ तदभ्यासप्रदातारं शिवं मत्वा समाश्रयेत् । लब्ध्वा शास्त्रमिदं मह्यमन्येषां न प्रकाशयेत् ॥१३ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गोपनीयं विजानता । यत्रास्ते च गुरुर्ब्रह्मन्दिव्ययोगप्रदायकः ॥१४ तत्र गत्वा च तेनाक्तविद्यां संगृह्य खेचरीम् । तेनोक्तः सम्यगभ्यासं कुर्यादादावतन्द्रितः ॥१५ जब तक शास्त्र की प्राप्ति न हो तब तक पर्यटन करते हुए प्रयत्नशील रहे । जब सच्चा शास्त्र मिल जायगा तब सिद्धि हाथ में ही
२६४ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् रखी है ॥ ११ ॥ शास्त्र के बिना सिद्धि तीनों लोक में कहीं दिखाई नहीं देती । इसलिए मेलन ( योग ) का देने वाला, शास्त्र का देने वाला और अभ्यास का कराने वाला गुरु भगवत स्वरूप ही है, ऐसा समझ कर उसका आश्रय लेना चाहिये और इस शास्त्र को प्राप्त कर लेने पर किसी अन्य के सम्मुख प्रकट न करना चाहिए ॥१२—१३ ॥ इसलिए इसको हर तरह से प्रयत्न करके गुप्त रखना चाहिये और जहाँ कहीं इस दिव्य योग का ज्ञाता गुरु रहता हो, वहाँ उसके पास जाकर खेचरी विद्या को ग्रहण करके सम्यक रूप से इसका अभ्यास करना चाहिए ॥ १४—१५ ॥ अनया विद्यया योगी खेचरीसिद्धिभाग्भवेत् । खेचर्या खेचरीं युञ्जन् खेचरीबीजपूरया ॥१६ खेचराधिपतिर्भूत्वा खेचरेषु सदा वसेत् । खेचरावसथं वह्निसम्बुमण्डलभूषितम् ॥१७ आख्यातं खेचरीबीजं तेन योगः प्रसिध्यति । सोमांशनवकं वर्णं प्रतिलोमेन चोद्धरेत् ॥१८ तस्मात् त्र्यंशकमाख्यातमक्षरं चन्द्ररूपकम् । तस्मादप्यष्टमं वर्णं विलोमेनापरं मुने ॥१९ तथा तत्परमं विद्धि तदादिरपि पञ्चमा । इन्दोश्च बहुभिन्नं च कूटोऽयं परिकीर्तितः ॥२० योगी को इस विद्या द्वारा खेचरी शक्ति की प्राप्ति होती है । खेचरी में खेचरी के बीज सहित खेचरी का योग करने से साधक खेचरों ( देवताओं ) का अधीश्वर बनकर सदा उन्हीं में रहता है । खेचर का प्रतीक 'ह' कार आवसथ ( धारणा ) का 'ई'कार, अग्नि का 'रकार और जल का 'म'कार है । इन सबका योग करने से 'ह्रीं' होता है जो कि खेचरी का बीज मन्त्र है और इसी से खेचरी
द्वितीय अध्याय ] [ २६५
द्वितीय अध्याय ] [ २६५ योग सिद्ध होता है। सोमांश 'स' कार है, उसका प्रतिलोम से नौवां अक्षर 'भ' होता है। फिर चन्द्रमा का बीजाक्षर 'स' है, उसका आठवां अक्षर विलोम से 'म' होता है। फिर से पांच अक्षर उलटा गिनने से 'प' अक्षर निकलता है। चन्द्रमा का बीज 'स' और अनेक वर्ण वाला 'क्ष' अन्तिम अक्षर है। (इस प्रकार "ह्रीं भं सं मं पं सं क्ष" यह खेचरी का बीज मन्त्र प्रकट होता है) ॥ १६—२० ॥ गुरूपदेशलभ्यं च सर्वयोगप्रसिद्धिदम् । यत्तस्य देहजा माया निरुद्धकरणाश्रया ॥२१ स्वप्नेऽपि न लभेत्तस्य नित्यं द्वादशजप्यतः । य इमां पञ्च लक्षाणि जपेदपि सुयन्त्रितः ॥२२ तस्य श्रीखेचरीसिद्धिः स्वयमेव प्रवर्तते । नश्यन्ति सर्वविघ्नानि प्रसीदन्ति च देवताः ॥२३ वलीपलितनाशश्च भविष्यति न संशयः । एवं लब्ध्वा महाविद्यामभ्यासं कारयेत्ततः ॥२४ अन्यथा क्लिश्यते ब्रह्मन्न सिद्धिः खेचरी पथे । यदभ्यासविधौ विद्यां न लभेद्यः सुधामयीम् ॥२२ ततः संमेलकादौ च लब्ध्वा विद्यां सदां जपेत् । नान्यथा रहितो ब्रह्मन्न किंचित्सिद्धिभागभवेत् ॥२६ यह खेचरी मन्त्र सब प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है। यह गुरु के उपदेश से ही सिद्ध होता है। जो नियम से इसका प्रतिदिन बारह बार जप करता है, उसे अन्तःकरण में स्थित देह सम्बन्धी माया नहीं व्यापती। जो इसे भावपूर्वक पाँच लाख जपेगा उसको खेचरी की सिद्धि स्वयमेव हो जायेगी, सब विघ्न दूर होकर देवताओं की प्रसन्नता प्राप्त होगी ॥ २१—२३ ॥ इससे शरीर पर पड़ी हुई झुरियां मिट जाती हैं इसमें कुछ भी संशय नहीं। इस महाविद्या को जब
२६६ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् भली प्रकार जान ले तब उसका अभ्यास भली भाँति करे ॥ २४ ॥ ऐसा न करने से खेचरी की सिद्धि न होकर उलटा कष्ट ही उठाना पड़ता है । विधिपूर्वक अभ्यास करने पर भी सफलता न हो तो भी 'सम्मेलक' (गुरु शिक्षक आदि) के बताये अनुसार सदैव इसका जप करता रहे । बिना उपयुक्त शिक्षक के इनमें कभी सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती ॥ २५—२६ ॥ यदिदं लभ्यते शास्त्रं तदा विद्यां समाश्रयेत् । ततस्तदोदितां सिद्धिमाशु तां लभते मुनिः ॥२७ तालूमूलं समुत्कृष्य सप्तवासरमात्मवित् । स्वगुरूक्तप्रकारेण मलं सर्वं विशोधयेत् ॥२८ स्नुहिपत्रनिभं शस्त्रं सुतीक्ष्णं स्निग्धनिर्मलम् । समादाय ततस्तेत लोममात्रं समुच्छिनेत् ॥२६ हित्वा सैन्धवपथ्याभ्यां चूर्णिताभ्यां प्रकर्षयेत् । पुनः सप्तदिने प्राप्ते रोम मात्र समुच्छिनेत् ॥३० जब इस विद्या के शास्त्र का ठीक तरह से ज्ञान हो जायेगा तब साधक की सिद्धि प्राप्त करने में देर न लगेगी ॥ २७ ॥ सर्व प्रथम साधक को सात दिन तक तालु के मूल स्थान को गुरु के आदेश के अनुसार घिसकर वहां का सब मैल दूर करना चाहिए ॥ २८ ॥ फिर थूहर के पत्ते के समान उत्तम धार वाले शुद्ध चाकू आदि से तालूमूल को एक बाल के बराबर काटे अथवा गुरु या शिक्षक से कटावे) ॥ २६ ॥ कटे स्थान के ऊपर हर्र और सैन्धे नमक का चूर्ण भुरभुराता रहे। सात दिन के पश्चात् फिर पूर्ववत् बाल बराबर काटे ॥ ३० ॥ एवं क्रमेण षण्मासं नित्योद्युक्तः समाचरेत् । षण्मासाद्रसनामूलं शिराबन्धं प्रनश्यति ॥३१