ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
दूसरा अध्याय ] ३३ दोहराता है। पथ्या के याज्य मंत्रों को दुहरा कर वह वाणी को यज्ञ के पहले रखता है। अग्नि प्राण है और सोम अपान। सविता प्रेरणा के लिये है और अदिति स्थापना के लिये। जब पथ्या के लिये याज्य मंत्र बोलता है तब वह यज्ञ को पथ अर्थात् मार्ग पर डाल देता है। अग्नि और सोम दो आँखें हैं। सविता प्रेरणा के लिये है और अदिति स्थापना के लिये। देवों ने यज्ञ को आँख से ही जाना। जो अप्रज्ञेय अर्थात् न जानी हुई चीज़ है उसे आँख से ही जानते हैं। जो अटकने पर आँख के निरन्तर प्रयोग के द्वारा जान लेता है वह जान लेता है। देवों ने जो यज्ञ को जाना वह इसी पृथ्वी पर जाना। इसी पृथ्वी पर यज्ञ की चीजें इकट्ठी कीं। इसी पृथ्वी पर यज्ञ ताना जाता है। इसी पर यज्ञ किया जाता है। इसी पृथ्वी पर यज्ञ की चीजें इकट्ठी की जाती हैं। यह पृथिवी ही अदिति है। अन्तिम याज्य मंत्र इसी अदिति के लिये है। यह अन्तिम याज्य मंत्र यज्ञ को जानने के लिये और पीछे से स्वर्ग को देखने के लिये बोला जाता है। (२) ९—कहा जाता है कि देवों की “साधारण जनता” ❀ होनी चाहिये। क्योंकि जब देवों की जनता होगी तो मनुष्य की भी होगी। जब सब जनता मिल गई तो यज्ञ तैयार हो गया। जिस जनता में इस रहस्य का समझने वाला 'होता' होता है उसके ❀ विश इत्ययं शब्दः प्रजामात्रवाची, वैश्यजाति विशेष वाची वा; सन्ति हि देवेष्वपि जाति विशेषाः ।—सायण हमारी सम्मति में विट् या मरुत् का अर्थ प्रजामात्र, या साधारण जनता (common people) है। यहाँ वैश्य जाति से तात्पर्य नहीं है। तात्पर्य यह है कि साधारण जनता का सहयोग यज्ञ के लिये आव- श्यक है। 'जनता' शब्द मूल में आया भी है (यज्ञोऽपि तस्यै जनतायै कल्पते यत्रैवं विद्वान् होता भवति )। ३
३४ [ प्रथम पञ्चिका लिये भी यह यज्ञ तैयार हो जाता है । ( नीचे का मन्त्र पढ़ने से देव जनता से युक्त हो जाते हैं ) स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्यप्सु वृजने स्वर्वति । स्वस्ति नः पुत्रकृथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरुतो दधातन ॥ (ऋ० १०।६३।१५) मरुत देवों की जनता हैं । यज्ञ के आरम्भ में होता इस मंत्र को पढ़ कर उन (मरुतों) को तैयार कर देता है । कहते हैं कि होता (याज्य और अनुवाक्य मन्त्रों में) सब छन्दों के मंत्र बोले । देव सब छन्दों द्वारा यज्ञ करके स्वर्गलोक को प्राप्त हुये । इसी प्रकार यजमान भी सब छन्दों द्वारा यज्ञ करके स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेता है । “स्वस्ति नः पथ्यासु” और “स्वस्ति रिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा” (ऋ० १०।६३।१५, १६) यह दो मंत्र जो “पथ्यायाः स्वस्तेः” अर्थात् मार्ग के कल्याण के लिये हैं, त्रिष्टुभ् छन्द में हैं । “अग्ने नय सुपथाराये अस्मान्” (ऋ० १।१८९।१) और “आ देवाना- मपि पन्थामगन्म” (ऋ० १०।२।३) जो अग्नि के लिये हैं यह दोनों भी त्रिष्टुभ् छन्दों में हैं । “त्वं सोम प्रचिकितो मनीषा” (ऋ० १।९१।१) और “याते धामानि दिवि या पृथिव्यां” (ऋ० १।९१।४) यह दोनों सोम के मंत्र भी त्रिष्टुभ् में हैं । “आ विश्वदेवं सत्पतिं” (ऋ० ५।८२।७) और “य इमा विश्वा जातानि” (ऋ० ५।८२।९) यह दोनों सविता के मन्त्र गायत्री छन्द में हैं । “सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं” (ऋ० १०।६३।१०) और “महीम् षु मातरं सुव्रतानाम्” (अथर्व० ७।६।२) यह दोनों अदिति के मंत्र जगती छन्द में हैं । यह त्रिष्टुभ्, गायत्री और जगती मुख्य छन्द हैं । अन्य छन्द इनके अनुयायी हैं । यही यज्ञ में विशेषतः काम आते हैं । इसलिये जो इस रहस्य को समझ कर इन छन्दों में अनु-
दूसरा अध्याय ] ३५ वाक्य और याज्य पढ़ता है वह मानो सब छन्दों द्वारा यज्ञ कर लेता है । (३) १०—( प्रायणीय इष्टि के ) इन सब अनुवाक्य और याज्य मन्त्रों में 'प्र', 'नी', 'पथि', 'स्वस्ति' शब्द आते हैं। देवों ने इन्हीं से यज्ञ करके स्वर्ग लोक की प्राप्ति की । इसी प्रकार यजमान भी इन्हीं मन्त्रों से यज्ञ करके स्वर्ग लोक को जाता है । इनमें एक पद है "स्वस्ति राये मरुतो दधातन" (ऋ० १०।६३।१५) अर्थात् "हे मरुतो, हमको कल्याण युक्त धन दो ।" मरुत देवों के वैश्य हैं और अन्तरिक्ष में रहते हैं। जो स्वर्ग को जाता है वह उनसे निवेदन करने जाता है, वह उसको रोक या मार भी सकते हैं। होता जो कहता है "स्वस्ति राये मरुतो दधातन" ( ऋ० १०।६३।१५ ), वह ऐसा कह कर मानों यजमान का देवों के वैश्य मरुतों के साथ परिचय कराता है । तब मरुत न तो उसको जो स्वर्ग को जाता है, रोकते हैं और न मारते हैं। जो इस रहस्य को जानता है वह उनके द्वारा स्वर्ग लोक तक अच्छा मार्ग पा लेता है । इस ( प्रायणीय इष्टि ) की स्विष्टकृत् आहुति के लिये जो दो संयाज्य मन्त्र हैं, वह विराट् छन्द में होने चाहिये । जिसमें तेतीस अक्षर होते हैं । यह दो मन्त्र यह हैं :— (१) सेदग्निरग्नींरत्यस्त्वन्यान्यत्र वाजी तनयो वंळुगशिः । सहस्र पाथा अक्षरा समेति । (ऋ० ७।१।१४) (२) सेदग्निर्यो वनुष्यतो निपाति समेद्धारमंहस उरुष्यात् । सुजातासः परि चरन्ति वीराः । (ऋ० ७।१।१५) देवों ने इन दो संयाज्यों को विराट् छन्द में पढ़ कर स्वर्ग की प्राप्ति की । इसी प्रकार जो यजमान इन दोनों संयाज्यों को विराट् छन्द में पढ़ता है वह स्वर्ग लोक की प्राप्ति कर लेता है । इनमें तेतीस अक्षर होते हैं । तेतीस ही देवते हैं, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, प्रजापति और वषट्कार । इस प्रकार
३६ [ प्रथम पञ्चिका मन्त्र के तेतीस अक्षरों में होता देवों को यज्ञ के अग्र भाग में ही यज्ञ में शरीक कर लेता है। क्योंकि एक एक अक्षर एक एक देव के लिये पात्र है ( dish ) है जिससे वे प्रसन्न और तृप्त हो जाते हैं। (४) ११—कुछ लोग कहते हैं कि प्रायणीय इष्टि में प्रयाज पढ़ने चाहिये और अनुयाज नहीं पढ़ने चाहिये। क्योंकि प्रायणीय इष्टि के अनुयाज हीन हैं अर्थात् उनमें देर लगती है। परन्तु यह पक्ष आदर के योग्य नहीं है। प्रयाज और अनुयाज दोनों ही होने चाहिये। प्रयाज प्राण हैं और अनुयाज प्रजा हैं। यदि प्रयाजों को छोड़ देगा तो यजमान के प्राणों को छोड़ देगा। और यदि अनुयाजों को छोड़ देगा, तो यजमान की सन्तान को छोड़ देगा। इसलिये (प्रायणीय इष्टि में) प्रयाज और अनुयाज दोनों ही होने चाहिये। पत्नियों* के संयाज्यों को न बोले। न संस्थित यजुओं को। इतना यज्ञ पूरा हो गया। यज्ञ की संतति (जारी रखने) के लिये प्रायणीय इष्टि का शेष भाग उदयनी इष्टि के भाग में मिलाने के लिये रख लेना चाहिये। (जिससे दोनों इष्टियां मिल कर एक हो जायं)। यज्ञ बीच में न टूटे इसके लिये एक और उपाय है अर्थात् जिस थाली में प्रायणीय इष्टि का पुरोडाश तैयार किया, उसी थाली में उदयनीय-इष्टि का पुरोडाश तैयार करे। इस प्रकार, यज्ञ बीच में टूटता नहीं। उसका सिलसिला कायम रहता है। कुछ लोगों का कहना है कि इससे लोग परलोक में सफल हो जाते हैं, इस लोक में नहीं। जब यह 'प्रायणीयम्', 'प्रायणीयम्'
- राका सिनीवाली (पूर्णिमा के) और कुहू और अनुमति (अमावस्या के) देवपत्नियों के लिये जो मंत्र पढ़े जाते हैं, वह पत्नी- संयाज्य कहलाते हैं।
दूसरा अध्याय ] ३७ कह कर पुरोडाश को निकालते और आहुति देते हैं तो यजमान उस लोक को चले जाते हैं (प्रयन्ति)। परन्तु इन लोगों का यह कथन अविद्यावश है। प्रायणीय और उदयनीय इष्टियों के याज्य और अनुवाक्य मन्त्रों में इस प्रकार उलट फेर होना चाहिये कि प्रायणीय इष्टि का अनुवाक्य उदयनीय इष्टि का याज्य मन्त्र हो जाता है और प्रायणीय इष्टि का याज्य मन्त्र उदयनीय इष्टि का अनुवाक्य हो जाता है। होता इस उलट फेर को इसलिये करता है कि दोनों लोकों में समृद्धि प्राप्त हो, दोनों लोकों में प्रतिष्ठा प्राप्त हो। जो इस रहस्य को समझता है वह दोनों की समृद्धि और दोनों लोकों की प्रतिष्ठा पा लेता है। अदिति के लिये जो चरु प्रायणीय इष्टि में और जो उदयनीय इष्टि में दिया जाता है, वह यज्ञ के धारण करने के लिये, यज्ञ के बांधने के लिये अर्थात् इसलिये दिया जाता है कि यज्ञ हाथ से निकलने न पावे। किसी ने कहा है कि यह ऐसे ही है जैसे किसी रस्सी के दोनों सिरे बांधने से वह रस्सी हाथ से छूटने नहीं पाती। इसी प्रकार प्रायणीय और उदयनीय इष्टियों में अग्नि को चरु देकर होता यज्ञ के दोनों शिरों को बांध देता है। 'पथ्या स्वस्ति' के साथ ही उदयनीय इष्टियों में समाप्त कर देते हैं। इस प्रकार यजमान स्वस्ति के साथ यहां आरम्भ करते हैं और स्वस्ति के साथ वहां (परलोक में) समाप्त कर देते हैं। (५) ऐतरेय ब्राह्मण की पहली पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त
तीसरा अध्याय सोम-क्रय, अग्नि-मथन, आतिथ्य-इष्टि १२—देवों ने राजा सोम को पूर्व दिशा में खरीदा था। इस लिये यह पूर्व दिशा में ही खरीदा जाता है। उन्होंने तेरहवें महीने से सोम खरीदा था, इसलिये तेरहवां महीना निन्दनीय है। सोम का बेचना निन्दनीय है। इसलिये सोम का बेचने वाला पापी है। जब उसको मोल लेकर मनुष्यों के पास लाये तो उसकी शक्तियां तथा इन्द्रियां सब दिशाओं में फैल गईं। उन्होंने उनको एक ऋचा के द्वारा इकट्ठा करने की चेष्टा की। परन्तु वह न कर सके। तब उन्होंने दो, तीन, चार, पांच, छः और सात मन्त्रों से यत्न किया। परन्तु वह उनको इकट्ठा न कर सके। तब आठ मन्त्रों से सफल हुये और उनको प्राप्त किया। अष्ट (आठ) को अष्ट इसलिये कहते हैं कि इससे अश्नुते अर्थात् प्राप्ति होती है। ('अष्ट' अश् धातु से बनता है जिसका अर्थ है प्राप्त करना)। जो इस रहस्य को समझता है वह जो चाहता है उसी को पा लेता है। इसीलिये इन कर्मों में आठ आठ मन्त्र होते हैं जिससे सोम की इन्द्रियां और शक्तियां इकट्ठी हो सकें। (१) ( ३८ )
तीसरा अध्याय ] ३६ १३—अब अध्वर्यु होता से कहता है, "खरीदे हुये और लाये हुये सोम के लिये मन्त्र पढ़ो।" वह कहता है—"भद्रादभि- श्रेयः प्रेहि *" अर्थात् "इस लोक से चल कर इससे श्रेष्ठ लोक को जा।" यह लोक भद्र है। इसलिये 'भद्र' से तात्पर्य है इस लोक का। स्वर्ग लोक इस लोक से 'श्रेयः' अर्थात् श्रेष्ठ है। इसके कहने से होता यजमान को परलोक को भेजता है। अब कहता है :— बृहस्पतिः पुर एता तेऽअस्तु । ( मन्त्र का दूसरा पाद ) "बृहस्पति तेरा पथ प्रदर्शक हो" । ब्रह्म ही बृहस्पति है। ब्रह्म को पथ प्रदर्शक बनाने से यज्ञ में विघ्न न होगा । अब कहता है— अथैमवस्य वरऽआ पृथिव्या । ( मन्त्र का तीसरा पाद ) "इसे पृथ्वी के ऊपर ठहराओ" (अथ ईं अवस्य)
- भद्रादभिश्रेयः प्रेहि बृहस्पतिः पुर एता ते अस्तु । अथै मवस्य वर आ पृथिव्या आरे शत्रून् कृणुहि सर्ववीरः ॥ ( तैत्तिरीय संहिता, १।२।३।२ ) भद्रादधि श्रेयः प्रेहि बृहस्पतिः पुर एता ते अस्तु । अथैममस्या वर आ पृथिव्या आरे शत्रुं कृणुहि सर्ववीरम् ॥ ( अथर्व ७।८।१ ) इन दोनों मन्त्रों में थोड़ा सा भेद है। तै० में 'अभि' है। अथर्व० में अधि; तै० में अथैमवस्य ( अथ ईं अवस्य ) है। अथर्व० में 'अथै- ममस्याः' ( अथ इमम् अस्याः ) है । तै० में शत्रून् ( बहुवचन ) है, अथर्व में एक वचन शत्रुं; तै० में सर्ववीरः ( प्रथमा ) है और अथर्व० में सर्ववीरम् ( द्वितीया ) ।
४० [ प्रथम पञ्चिका ‘वर’ का अर्थ है देव भजन अर्थात् यज्ञ का स्थान। इस प्रकार वह यज्ञ-स्थान पृथिवी पर सोम को ठहराता है। अब कहता है :— आरे शत्रून् कृणुहि सर्ववीरः। (मन्त्र का तीसरा पाद) “सर्व शक्तिमान् होकर शत्रुओं को भगा”। ऐसा कहने से होता यजमान के साथ अहित करने वाले शत्रु को भगा देता है और उसको सबसे नीचा स्थान दिलाता है। अब वह “सोमा यास्ते मयोभुव” ✤ वाले तीन मन्त्र जो गायत्री छन्द में हैं पढ़ता है। इस प्रकार वह सोम राजा को उसी के देवता और उसी के छन्द द्वारा लाकर प्रसन्न करता है। अब वह (होता) पढ़ता है। सर्वे नंदं ति यशसा गतेन सभासाहेन सख्या सखायः। किल्बिषस्पृत् पितुषणि र्ह्येषामरं हितो भवति वाजिनाय॥ (ऋ० १०।७१।१०) “सब मित्र ऐसे मित्र के आने पर जो सभा में जीत कर यश के साथ आता है प्रसन्न होते हैं। उनकी दोषों से रक्षा करने वाला और अन्न देने वाला और उनकी इन्द्रियों को शक्ति प्रदान करने वाला होता है”। सोम राजा ही “यश” है। इसके मोल लेने पर सभी आनन्द मनाते हैं, वह जिनको यज्ञ में कुछ मिलेगा और वह जिनको न मिलेगा। यह जो सोम राजा है वह ब्राह्मणों का “सभा में जीतने ✤ सोम यास्ते मयोभुव ऊतयः सन्ति दाशुषे। ताभिर्नोऽविताभव॥ इमं यज्ञमिदं वचो जुजुषाण उपागहि। सोम त्वं नो वृधेभव॥ सोम गीर्भिष्ट्वावयं वर्धयामो वचोविदः। सुमृडीको न आविश॥ (ऋ० १।९१।६, १०, ११)
तीसरा अध्याय ] ४१. वाला सखा" है। वही "किल्विषस्पृत्" या दोषों से रक्षा करने वाला है। जो कोई "किल्विषं" या दोषी हो जाता है उसी की वह रक्षा करता है। जो श्रेष्ठ होता है वही दोषी हो जाता है (अर्थात् पहले ठीक ठीक मंत्र उच्चारण करता है, फिर थक जाता है)। इसीलिये कहते हैं (होता के प्रति), "अब मत पढ़ो"। (अध्वर्यु के प्रति) "अब कृत्य मत करो"। जिससे जल्दी में गड़बड़ न हो जाय। वह "पितुषणि" है। 'पितु' का अर्थ है 'अन्न' और 'सनि' का अर्थ है 'दान'। 'पितु' दक्षिणा को भी कहते हैं। (यजमान ऋत्विजों को सोमयज्ञ करने के बदले) दक्षिणा देता है। इस प्रकार वह (सोम-राजा को ऋत्विजों के अर्थ) अन्न का देने वाला बनाता है। "अरंहितो भवति वाजिनाय"। यहाँ इन्द्रियों की शक्तियों का नाम "वाजिन" है। जो इस रहस्य को समझता है उसकी इन्द्रियों की शक्ति बुढ़ापे तक क्षीण नहीं होती। अब होता नीचे के मंत्र को पढ़ता है :- आगन् देव ऋतुभिर्वर्धतु क्षयं दधातु नः सविता सुप्रजामिषम्। स नः क्षपाभिरहभिश्च जिन्वतु प्रजावन्तं रयिमस्मे समिन्वतु ॥ ※ (ऋ० ४।५३।७) “देव सविता ऋतुओं के साथ आवे। घर को समृद्ध करे। और हमको सन्तान और धन से युक्त करे। वह हम पर रातों और दिनों में कृपा करे। वह हमको सन्तान के सहित धन दे।” 'आगन् देवः' का अर्थ है, "वह (सोम) यहाँ आ गया है"। “ऋतुभिर्वर्धतु क्षयं” में ऋतुयें सोम राजा के भाई हैं। जैसे मनुष्यों में राजों के भाई हुआ करते हैं उसी प्रकार। होता इस ※ यह मन्त्र ऐ० ब्रा० में 'सोम' के लिये आया है। परन्तु ऋग्वेद में यह सविता विषयक है। क्या सोम और सविता पर्याय हैं ? ले०
४२ [प्रथम पञ्चिका मन्त्र को पढ़ कर मानो सोम के साथ उसके भाइयों को ले आता है। “दधातु नः सविता सुप्रजामिषम्” आशीर्वाद है। और “वह हमको सन्तान के सहित धन दे” यह भी आशीर्वाद है। अब होता पढ़ता है :— या ते धामानि हविषा यजन्ति ता ते विश्वा परिभूरस्तु यज्ञम् । गयस्फानः प्रतरणः सुवीरोऽवीरहा प्रचरा सोम दुर्यान् ॥ (ऋ० १।६१।१६) “तेरे जिन गुणों का हवि द्वारा गान करते हैं वे सब गुण इस यज्ञ में हर जगह आ जावें । हे सोम हमारे घरों में आ । हमारी गायों❀ को बढ़ाता हुआ, रक्षा करता हुआ । वीरों को देता हुआ और वीरों को न मारता हुआ ।” “गयस्फानः प्रतरणः सुवीरः” का तात्पर्य है कि गायों का बढ़ाने वाला और रक्षा करने वाला हो । “अवीरहा प्रचरा सोम दुर्यान्” का तात्पर्य यह है कि ‘दुर्यान्’ अर्थात् यजमान के ‘घर’ आये हुये सोम राजा से डरते हैं। इस मंत्र को पढ़ कर वह सोम को शान्त करता है जिससे वह शांत हुआ सोम प्रजा और पशुओं की हिंसा न करे । अब होता वरुण सम्बन्धी नीचे के मन्त्र से समाप्त करता है :— इमां धियं शिक्षमाणस्य देव क्रतुं दक्षं वरुण सं शिशाधि । यया- ति विश्वा दुरिता तरेम सुतर्माणमधि नावं रुहेम ॥ (ऋ० ८।४२।३ ) “हे देव वरुण ! शिष्य को बुद्धि, कर्त्तव्यता और होशियारी दो । जिससे हम सब बुराइयों को तर जायं और अच्छी तरह पार करने वाली नाव पर चढ़ें ।” (सोम) जब तक (कपड़े में) ❀ऐतरेय में ‘गयस्फान’ का अर्थ किया है ‘गवां नः स्फावयिता’ ( हमारी गायों को बढ़ाने वाला )। वस्तुतः ‘गय’ का अर्थ है प्राण । ‘गयस्फान’ का अर्थ हुआ ‘प्राण शक्ति को बढ़ाने वाला ।’
तीसरा अध्याय ] ४३ बंधा रहता है और (यज्ञ शाला के प्राग्वंश अर्थात् आगे के भाग में) लाया जाता है, उस समय तक यह अरुण देवता का होता है। इसलिये इस मन्त्र को पढ़ कर यह सोम को उसी के देवता और उसी के छन्द से समृद्ध करता है। 'शिक्षमाणस्य' उसके लिये आया है जो यज्ञ करता है क्योंकि वह सीखता है। 'ऋतुं दक्षं वरुण संशिशाधि' से तात्पर्य है कि 'हे वरुण तुम वीर्य और प्रजा को दो।' 'नाव' से तात्पर्य है यज्ञ का, जिससे भली भांति मार्ग को तर जायं। काला मृग चर्म सुमार्ग है और वाणी नाव। इस मन्त्र को पढ़ कर यजमान वाणी रूप नाव पर चढ़ता है और स्वर्ग को पहुँच जाता है। यह आठों मन्त्र पूर्ण रीत्या रूप-समृद्ध हैं। जिस मन्त्र में जो क्रिया करनी हो उसी का विधान हो वह मन्त्र रूप-समृद्ध होता है। ऐसे ही मन्त्र से यज्ञ सफल होता है। इनमें से पहले (अद्रादभिश्चेय इति) और पिछले मन्त्र (इमां धियमिति) को तीन तीन बार पढ़ा जाता है। इस प्रकार यह बारह हो जाते हैं। बारह ही महीने वर्ष के होते हैं। वर्ष ही प्रजापति है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजापति के इन मन्त्रों द्वारा सफल हो जाता है। पहले और पिछले मन्त्रों को तीन तीन बार पढ़ कर वह यज्ञ रूपी रस्सी की दोनों गांठों को कड़ी बांधता है जिससे वह फिसल न जाय। (२) १४—(जिस गाड़ी में सोम राजा लाया जाता है) उसके एक बैल को जुता रखते हैं और एक का खोल देते हैं। तब वह उसको गाड़ी में से उतारते हैं। यदि दोनों बैलों को खोल कर उतारा जाय तो वह सोम राजा "पितृदेवत्य" (पितरों के आधीन) हो जाय। यदि दोनों बैलों को जुते हुये उतारें तो प्रजा के लिये
४४ [प्रथम. पञ्चिका योगक्षेम✤ न हो। प्रजा तितर बितर हो जाय। विमुक्त बैल घर में रहती हुई सन्तान का स्थानापन्न हैं और जो जुता हुआ है वह क्रियाओं का रूप है। जो एक बैल को खोल कर और एक को जुते हुये सोम को उतारता है वह दोनों प्रकार का कुशल प्राप्त करता है अर्थात् वर्तमान और भविष्य। देव और असुर इन लोकों में लड़े। वे पूर्व दिशा में लड़े। वहाँ से असुर जीत गये। वे पश्चिम दिशा में लड़े। वहाँ से असुर जीत गये। वह उत्तर दिशा में लड़े। वहाँ से भी असुर जीत गये। वह उत्तर दिशा में लड़े। वहाँ देव न हारे। यही दिशा अपराजिता है। इसलिये इसी दिशा में कार्य करे या करावे। इसी दिशा से उसके ऋण दूर हो जायेंगे। देवों ने कहा कि राजा न होने के कारण (असुर) हमको जीत लेते हैं। इसलिये एक राजा चुन लें। सब ने कहा, “अच्छा”। उन्होंने सोम राजा को चुना। उन्होंने सोम राजा की सहायता से सब दिशायें जीत लीं। यह सोम राजा ही है जो यज्ञ करता है। जब उसे (गाड़ी पर) रखते हैं तो वह पूर्वाभि- मुख होता है। इस प्रकार यजमान पूर्व दिशा को जीत लेता है। वे गाड़ी को दक्षिण को मोड़ते हैं। इस प्रकार दक्षिण दिशा को जीतते हैं। जब गाड़ी उत्तर दिशा की ओर होती है वह (सोम को) उतार लेते हैं। इससे उत्तर दिशा को जीत लेते हैं। जो इस रहस्य को जानता है वह सोम राजा की सहायता से सब दिशायें जीत लेता है। (३) ✤योग का अर्थ है कार्यपरायणता और क्षेम का अर्थ है विश्राम। जुता हुआ बैल 'योग' का प्रतिनिधि है और खुला हुआ 'क्षेम' का। —तै०,
तीसरा अध्याय ] ४५ १५—सोम राजा के आने पर आतिथ्य हवि बनाई जाती है। सोमराजा यजमान के घरों में आता है। उसके लिये यह आतिथ्य हवि तैय्यार की जाती है। इसीलिये इसको आतिथ्य- हवि कहते हैं। (यह पुरोडाश) नौ कपालों में होता है। प्राण नौ हैं। प्राणों के बनाने और प्राणों का ज्ञान प्राप्त करने के लिये। यह पुरोडाश विष्णु का होता है क्योंकि विष्णु ही यज्ञ है। उसी के देवता और उसी के छन्द से यज्ञ को सम्पादित करते हैं। जब सोम खरीदा जाता है तो सब छन्द और सब पृष्ठ (सामवेद के दो मंत्रों के जोड़े) उसके साथ आते हैं। जो-जो लोग राजा के साथ आते हैं उन सभी का सत्कार किया जाता है। जब सोम राजा आ जाता है तो अग्नि का मंथन किया जाता है। जब कोई राजा या अन्य पुरुष आता है तो बैल या बांझ गाय को मारते हैं। इसी प्रकार अग्नि का मथना भी पशु मारने के तुल्य है क्योंकि अग्नि देवों का पशु है। ✡ (४) १६—अध्वर्यु (होता से) कहता है "मथी हुई अग्नि के लिये पढ़"। इस पर वह इस सविता सम्बन्धी अर्थात् सावित्री ऋचा को पढ़ता है :— अभि त्वा देव सवितरीशानं वार्याणाम्। सदावन् भागमीमहे ॥ (ऋ० १।२४।३) यहाँ प्रश्न उठता है कि मथी हुई अग्नि के लिये मंत्र बोलना था और बोला सविता के लिये। यह क्यों ? इसका उत्तर यह ✡सायण ने 'उक्षाणं' का अर्थ 'वृषभ' किया है और 'वेहत्' का 'गर्भघातिनीं वृद्धां गां'। अगले खण्ड में सविता के विषय में जो कहा गया वह तो बैल या गाय मारने की उपमा को सुसंगत नहीं करता। यह समस्त प्रकरण विचारणीय है। बहुत से विद्वानों के मत में अतिथि के लिये बैल या गाय मारने की बात भ्रममूलक है। —ले०
४६ [ प्रथम पञ्चिका है कि सविता तो सभी उत्पत्तियों का स्वामी है। सविता की प्रेरणा से ही अग्नि मथी जाती है। इस लिये सविता का मन्त्र पढ़ा गया। अब नीचे का द्यावा-पृथिवी का मन्त्र पढ़ा जाता है :— मही ※द्यावा पृथिवी इह ज्येष्ठे रुचा भवतां शुचयद्भि॒िरर्कैः । यत् सीं वरिष्ठे बृहती विमिन्वन् रूवद्धोक्षा प्रथानेभिरेवैः । (ऋ० ४।५६।१) यहाँ प्रश्न उठता है कि जब मथी हुई अग्नि के लिये मन्त्र पढ़ना है तो द्यावा-पृथिवी के लिये क्यों पढ़ते हैं। इसका उत्तर यह है कि जब अग्नि उत्पन्न हुआ तो देवों ने उसे द्यौ और पृथिवी के बीच में ग्रहण किया और द्यावा-पृथिवी के बीच में ही पकड़े रक्खा। इस लिये द्यावा-पृथिवी का मंत्र पढ़ते हैं। अग्नि को मथते समय तीन अग्नि की ऋचाओं को जो गायत्री छन्द में पढ़ते हैं :— त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत। मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः ॥ तमु त्वा दध्यङ् ऋषिः पुत्रईंधे अथर्वणः। वृत्रहणं पुरन्दरम् ॥ तमुत्या पाथ्यो वृषा समीधे दस्युहन्तमम्। धनञ्जयं रणे रणे ॥ (ऋ० ६।१६।१३, १४, १५) इसी प्रकार वह अग्नि को उसी के देवता और उसी के छन्दों द्वारा समृद्ध करता है। “अथर्वा निरमंथत” ऐसा कहने से मंत्र रूप-समृद्ध हो जाता है। अर्थात् जो क्रिया करनी होती है यदि वही मंत्र में भी वर्णित हो तो उस मंत्र को रूप-समृद्ध कहते हैं। रूप-समृद्ध मंत्र से ही क्रिया सफल होती है। यदि अग्नि न उत्पन्न हो या देर में उत्पन्न हो तो राक्षसों को मारने वाली नीचे की ऋचायें पढ़ी जाती हैं :— ※ऐतरेय ब्राह्मण में “मही द्यौः पृथिवी चन” ऐसा पाठ है। क्या यह यही मंत्र पाठान्तर के साथ है या अन्य कोई मंत्र ? —ले०
दूसरा अध्याय ] ४७ यह नौ मंत्र यह हैं :— (१) अग्ने हंसि न्यत्रिणं दीद्यन् मर्त्येष्वा । स्वे क्षये शुचिव्रत ॥ (२) उत्तिष्ठसि स्वाहुतो घृतानि प्रति मोदसे । यत् त्वा स्रुचः समस्थिरन् ॥ (३) सन्नाहुतो विरोचतेऽग्निरीलेन्यो गिरा । स्रुचा प्रतीकमज्यते ॥ (४) घृतेनाग्निः समज्यते मधुप्रतीक आहुतः । रोचमानो विभावसुः ॥ (५) जरमाणः समिध्यसे देवेभ्यो हव्यवाहन । तं त्वा हवन्ते मर्त्याः ॥ (६) तं मर्ता अमर्त्यं घृतेनाग्निं सपर्यत । अदाभ्यं गृहपतिम् ॥ (७) अदाभ्येन शोचिषाग्ने रक्षस्त्वं दह । गोपा ऋतस्य दीदिहि ॥ (८) सत्वमग्ने प्रतीकेन प्रत्योष यातुधान्यः । उरुक्षयेषु दीद्यत् ॥ (६) तं त्वा गीर्भिरुरुक्षया हव्यवाहं समीधिरे । यजिष्ठं मानुषे जने ॥ (ऋ० १०।११८।१-६) यह मंत्र राक्षसों के मारने के लिये पढ़े जाते हैं क्योंकि जब अग्नि उत्पन्न नहीं होता या देर में उत्पन्न होता है तो राक्षस उसे पकड़ लेते हैं । जब एक या दो या अधिक मंत्र पढ़ने पर अग्नि उत्पन्न हो जाय तो उत्पत्ति के योग्य नीचे का मंत्र पढ़ना चाहिये :— उत ब्रुवन्तु जन्तव उदग्निवृत्रहाजनि । धनञ्जयो रणे रणे ॥ (ऋ० १।७४।३) जो यज्ञ का रूप-समृद्ध होता है उसी से यज्ञ सफल होता है । अब यह मंत्र पढ़ता है :— अयं हस्तेन खादि॒नं शिशुं जातं न बिभ्रति । विशामग्निं स्वध्वरम् ॥ (ऋ० ६।१६।४०) मंत्र मे "हस्त" (हाथ) आया है । हाथ से ही तो अग्नि को मथते हैं । 'शिशुं जातं" (पैदा हुआ बच्चा) शब्द आया है । जैसे बच्चा उत्पन्न होता है उसी प्रकार अग्नि उत्पन्न होता है । "न बिभ्रति" इत्यादि में जो 'न' है वह 'ओ३म्' अर्थात् स्वीकारी के अर्थ में है । जैसे देवों के लिये, उसी प्रकार मनुष्यों के लिये ।
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ४८ [ प्रथम पञ्चिका अब पढ़ता है :— प्र देवं देववीतये भरता वसुवित्तमम् । आ स्वे योनौ निषीदतु ॥ (ऋ० ६।१६।४१) यह मन्त्र उस समय के लिये उपयुक्त है जब अग्नि आहव- नीय कुण्ड में डाला जाता है । “आ स्वे योनौ निषीदतु” (वह अपने घर में बैठे) का तात्पर्य यह है कि आहवनीय अग्नि का उचित स्थान है । आ जातं जात वेदसि प्रियं शिशीतातिथिम् । स्योन आ गृहपतिम् ॥ (ऋ० ६।१६।४२) इस मन्त्र में 'जातं' एक (अर्थात् अग्नि) है और 'जातवेद' दूसरा (अर्थात् आहवनीय) । 'प्रियं शिशीतातिथिम्' से यह जो (मथा हुआ) अग्नि है वह दूसरे अग्नि (अर्थात् आहवनीय) का प्यारा अतिथि है । “स्योन आ गृहपतिम्” से (ऋत्विज् अग्नि) को शान्ति के साथ (आहवनीय) में स्थापित करता है । अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा । हव्यवाड् जुह्वास्यः ॥ (ऋ० १।१२।६) यह मन्त्र तो यज्ञ का अभिरूप ही है और ठीक है । त्वं ह्यग्ने अग्निना विप्रो विप्रेण सन्सता । सखा सख्या समिध्यसे ॥ (ऋ० ८।४३।१४) इस मन्त्र में एक अग्नि एक विप्र है और दूसरी अग्नि दूसरा विप्र । एक अग्नि एक सत्ता है और दूसरी अग्नि दूसरी सत्ता । 'सखा सख्या समिध्यसे' में एक सखा एक अग्नि है और दूसरा 'सखा दूसरी अग्नि है । तं मर्ज्यन्त सुक्रतुं पुरो यावानमाजिषु । स्वेषु क्षयेषु वाजिनम् ॥ (ऋ० ८।८४।८) इस मन्त्र में 'स्वेषु क्षयेषु' का अर्थात् यह है कि एक अग्नि दूसरी अग्नि का अपना ही घर है । CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
तीसरा अध्याय ] ४६ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाक महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः । (ऋ० १।१६४।५०) इस मन्त्र से समाप्त करता है । देवों ने यज्ञ द्वारा ही यज्ञ किया । अग्नि द्वारा ही अग्नि में यज्ञ करके देव स्वर्ग को गये थे । "यह पहले धर्म थे ।" "वे बड़े लोग (महिमानः) उसी स्वर्ग को प्राप्त हो गये जहां पहले साध्य लोग हैं । छन्द ही 'साध्य देव' हैं जिन्होंने पहले अग्नि द्वारा अग्नि में यज्ञ किया । उन्होंने स्वर्ग लोग की प्राप्ति की । वे आदित्य और अंगिरा थे । उन्होंने अग्नि द्वारा अग्नि में यज्ञ किया । वह स्वर्ग लोक को प्राप्त हो गये । यह जो अग्नि की आहुति है वह स्वर्ग में ले जाने वाली आहुति है । यदि यज्ञ करने वाला ठीक ब्राह्मण न हो या दुराचारी हो तो भी यह आहुति देवताओं तक पहुँच जाती है । पापी से मिल कर दूषित नहीं होती । जो इस रहस्य को समझता है उसकी आहुति अवश्य ही देवताओं तक पहुँच जाती है । पापी से मिल कर दूषित नहीं होती । यह तेरह मन्त्र हैं और सभी "रूप समृद्ध" हैं । यज्ञ तभी सफल होता है जब मन्त्र यज्ञ का 'रूप समृद्ध' हो अर्थात् उसमें वही वर्णन हो जैसी क्रिया करनी है । इन तेरह मन्त्रों में पहला और अन्तिम तीन तीन बार बोला जाता है । इस प्रकार यह सत्रह हो जाते हैं । 'प्रजापति' भी सत्रह अंगों वाला है । एक सम्वत्सर या बारह मास और पांच ऋतुयें । प्रजापति ही संवत्सर है । जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजापति सम्बन्धी ऋचाओं द्वारा सफल हो जाता है । पहले और पिछले मन्त्र को तीन तीन बार पढ़ कर वह यज्ञ के आगे और पीछे में गांठ लगा देता है जिससे वह यज्ञ बीच में से फिसल न सके । (५) ४
५० [ प्रथम पञ्चिका १७—दोनों आज्य भागों के पुरोनुवाक्य यह हैं :— समिधाग्नि दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् । आस्मिन् हव्या जुहोतन ॥ (ऋ० ८।४४।१) आ प्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवा वाजस्य सङ्गथे ॥ (ऋ० १।९१।१६) इन दोनों ऋचाओं में आतिथ्य का वर्णन है। इसलिये यह दोनों रूप-समृद्ध हैं। ऋचा की रूप-समृद्धता यही है कि जो क्रिया करनी हो उसका उसमें विधान हो। पहली 'अतिथि' वाली ऋचा का देवता अग्नि है। दूसरी का देवता सोम है, उसमें 'अतिथि' शब्द नहीं आया। यदि सोम को सम्बोधित करने वाली किसी ऋचा में 'अतिथि' शब्द आता तो उस ऋचा का प्रयोग किया जाता। परन्तु यह ऋचा (ऋ० १।९१।१६) भी अतिथि के ही लिये है क्योंकि इसमें 'आपीन' अर्थात् मोटे होने की ओर संकेत करते हैं। जब अतिथि का सत्कार करते हैं तो मानों उसे मोटा करते हैं। अग्नि और सोम दोनों का याज्य मन्त्र 'जुषाणः' से आरम्भ होता है। अनुवाक्य यह है :— इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूळ्हमस्य पांसुरे ॥ (ऋ० १।२२।१७) और याज्य मन्त्र यह है :— तदस्य प्रियमभि पाथो अश्यां नरो यत्र देवयवो मदन्ति । उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः ॥ (ऋ० १।१५४।५) यह दोनों ऋचायें विष्णु सम्बन्धी हैं। पहली में तीन पद हैं। उसको बोल कर दूसरी के चार पदों को बोलता है। इस प्रकार सात पद हो जाते हैं। आतिथ्य यज्ञ का सिर है। सिर में सात प्राण होते हैं।
तीसरा अध्याय ] ५१ इस कृत्य को करके होता यजमान के सिर में मानो सातों प्राणों को रखता है। स्विष्टकृत् के दो संयाज्य मन्त्र यह हैं :- होतारं चित्ररथमध्वरस्य यज्ञस्य यज्ञस्य केतुं रुशन्तम्। प्रत्यर्धि देवस्य देवस्य मह्ला श्रिया त्वग्निमतिथिं जनानाम् ॥ (ऋ० १०।९१।३) प्र प्रायमग्निर्भरतस्य शृण्वे वि यत् सूर्यो न रोचते बृहद् भाः। अभि यः पूरुं पृतनासु तस्थौ द्युतानो दैव्यो अतिथिः शुशोच ॥ (ऋ० ७।८।४) यह दोनों अतिथि सम्बन्धी ऋचायें हैं। इसलिये रूप-समृद्ध हैं। जो ऋचायें रूप समृद्ध होती हैं वे यज्ञ के लिये ठीक होती हैं। क्योंकि ऋचाओं में वही बात होती है जिसको करना होता है। यह दोनों त्रिष्टुभ् हैं इसलिये इन्द्र की शक्ति पाने के लिये ठीक हैं। यज्ञ-अवशिष्ट खाने से कृत्य समाप्त हो जाता है। देवों ने अतिथि-इष्टि के अन्त में यज्ञ शेष खाया। उसी से वह सन्तुष्ट हो गये। इसलिये इस इष्टि की अन्तिम क्रिया यज्ञ-शेष का भोग है। इस इष्टि में प्रयाज आहुतियां दी जाती हैं। अनुयाज नहीं। प्रयाज और अनुयाज दोनों ही प्राण हैं। शिर के प्राण प्रयाज हैं। जो शरीर के निचले भाग के प्राण हैं वह अनुयाज हैं। जो अनुयाज आहुतियां देना चाहे वह ऐसा ही होगा मानो बीच के प्राणों को काट कर शिर में रख दे। यह अर्थ है कि शिर के प्राण और निचले प्राण सब एक ही स्थान पर मिलें। इसलिये इस इष्टि में यदि अनुयाज न हों, केवल प्रयाज ही हों तो अनु- याज करने वाले का अभिप्राय भी सिद्ध हो ही जाता है। (६) ऐतरेय ब्राह्मण की पहली पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त।
चौथा अध्याय प्रवर्ग्य-इष्टि १८—यज्ञ देवतों के पास से यह कह कर चला गया कि मैं तुम्हारा अन्न नहीं बनूँगा। देवों ने कहा, “न जा, तू ही हमारा अन्न होगा।” देवों ने उसको अंग-भंग कर दिया। अंग-भंग किया हुआ यज्ञ उनके लिये प्रभावयुक्त (हितकर) न हुआ। देवों ने कहा, “अंग-भंग किया यज्ञ हमारा अन्न नहीं बन सकता। इस लिये इस यज्ञ को पूर्ण करना चाहिये। उन्होंने उसको पूर्ण किया। जब पूर्ण हो गया तो उन्होंने कहा, “हे अश्विनौ ! तुम दोनों इस यज्ञ को चंगा कर दो। दो अश्विन् देवों के चिकित्सक हैं। अश्विन् देवों के अध्वर्यु हैं। इसलिये दोनों अध्वर्यु ✤ धर्म (अर्थात् प्रवर्ग्य के लिये जो कुछ सामग्री होती है उस) को इकट्ठा कर देते हैं। ऐसा करके वह कहते हैं :— “ब्रह्म, हम प्रवर्ग्य-इष्टि करना चाहते हैं। होता ! तुम स्तुति पढ़ो”। (१) ✤ एक अध्वर्यु और दूसरा प्रति-प्रस्थाता दोनों मिलकर दो अध्वर्यु हुये। ( ५२ )