भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

दूसरा अध्याय ११—देवों ने यज्ञ फैलाया। वह जब यज्ञ पूर रहे थे उस समय असुरों ने आक्रमण किया कि हम यज्ञ को रोक दें। उन्होंने पूर्व की ओर से यूप पर आक्रमण किया जब आप्रि मंत्र पढ़े जा चुके थे और अग्नि पशु के चारों ओर नहीं ली जाई गई थी। देव जग पड़े और अपनी तथा यज्ञ की रक्षा के निमित्त अग्नि रूपी तीन दीवारें चारों ओर बना दीं। असुरों ने इन दीवारों को जलता हुआ और चमकता हुआ देखकर आक्रमण न किया। वे भाग गये। देवों ने असुरों को पूर्व में भी हरा दिया और पश्चिम में भी। इसीलिये यजमान लोग अग्नि को पशु के चारों ओर ले जाते हैं और मन्त्र पढ़ते हैं। क्योंकि वह जलती हुई आग के रूप में तीन दीवारें बना देते हैं, अपनी रक्षा के लिए और यज्ञ की रक्षा के लिये। जब पशु को आप्रि मंत्र पढ़कर पवित्र कर लिया और अग्नि को चारों ओर फिरा लिया तो वह उसे उत्तर की ओर ले जाते हैं। उसके आगे आगे जलती हुई लकड़ी ले जाते हैं मानो पशु ( १११ )

११२ [ दूसरी पञ्चिका अन्त को यजमान ही तो है। वह मानते हैं कि इस प्रकाश द्वारा यजमान स्वर्ग को जायगा और इस प्रकार यजमान स्वर्ग को जाता है। जहाँ पशु मारा जाने वाला है वहाँ अध्वर्यु दर्भ छोड़ देता है। जब आप्री मंत्र पढ़कर और अग्नि को चारों ओर फिरा कर, पशु को वेदी के बाहर लाते हैं तो दर्भों पर बिठा देते हैं। उसके मलमूत्र के लिये गड़्ढा खोदते हैं। मलमूत्र वनस्पति से सम्बन्ध रखते हैं। वनस्पति का उपयुक्त स्थान भूमि है। इस प्रकार वह इनको उपयुक्त स्थान में रखते हैं। इस पर आक्षेप होता है कि जब समस्त पशु हवि है और जब उसके बहुत से भाग जैसे, रोम, त्वचा, रुधिर, अधपचा खाना, खुर, सींग गिर पड़ते हैं तो यह कमी कैसे पूरी की जाती है। इसका उत्तर यह है कि यदि पशु के साथ पूरा पूरा पुरोडाश भी आहुति में दिया जाय तो यह कमी पूरी हो जाती है। जब पशुओं में से मेध निकल गया तब चावल और जौ उत्पन्न हुये। जब पशु के साथ पूरा-पूरा भाग करके पुरोडाश डालते हैं तो समझते हैं कि पशु को मेध के साथ आहुत किया। पूरा पशु आहुत किया।” जो इस रहस्य को समझता है उसका पशु पूरा पूरा आहुत होता है। (१) १२—उसकी वपा को निकाल कर (भूनने के लिये) लाते हैं। अध्वर्यु स्रुवा से घी टपकाता है और जब बूँदें टपकती हैं तो कहता है, “इसके योग्य मंत्र पढ़ो।” बूँदें सभी देवतों की होती हैं। शायद वह सोचे कि यह मेरे नहीं हैं। और वे बिना निर्देश किये ही देवों के पास चली जायें (परन्तु उसको अनुवाक्य पढ़ना चाहिये)। वह पढ़ता है :— जुषस्व सप्रथस्तमं वचो देवप्सरस्तमम् । हव्या जुषानि आसनि ॥ (ऋ० १।७५।१)

दूसरा अध्याय ] ११३ हमारी अति विस्तीर्णां और देवों के लिये प्रिय वाणी को स्वीकार कर। जब तेरे मुँह में आहुतियाँ पड़ती हों)। इस मंत्र से वह अग्नि के मुख में वह बूँदें डालता है। अब वह तीसरे मंडल के २१वें सूक्त को पढ़ता है :— इमं नो यज्ञममृतेषु धेहीमा हव्या जातवेदो जुषस्व। स्तोकानामग्ने मेदसो घृतस्य होतः प्राशान प्रथमो निषद्य॥ (ऋ० ३।२१।१) (हमारे इस यज्ञ को अमर लोगों में रख। हे जातवेद अग्नि! हमारी आहुतियों को स्वीकार कर! हे होता अग्नि! पहले बैठकर चिकने घी की बूँदों को खा।) घृतवन्तः पावक ते स्तोकाः श्चोतन्ति मेदसः। स्वधर्मन् देववीतये श्रेष्ठं नो धेहि वार्यम्॥ (ऋ० ३।२१।२) (हे पवित्र करने वाले चिकनी घी युक्त बूँदें तेरे लिए पड़ रही हैं। अपने धर्म के अनुसार श्रेष्ठवर को जो देवों के योग्य है हमको दे)। तुभ्यं स्तोका घृतश्चुतोऽग्ने विप्राय सन्त्य। ऋषिः श्रेष्ठः समिध्यसे यज्ञस्य प्राविता भव॥ (ऋ० ३।२१।३) (हे अग्नि तुझ विप्र के लिये घी युक्त बूँदें पड़ रही हैं। ऋषि और श्रेष्ठ तू प्रज्वलित होता है। तू यज्ञ का रक्षक बन)। तुभ्यं श्चोतन्त्यद्रिगो शचीवः स्तोकासो अग्ने मेदसो घृतस्य। कवि- शस्तो बृहता भानुनागा हव्या जुषस्व मेधिर॥ (ऋ० ३।२१।४) (हे तेज चलने वाले और शक्तिशाली अग्नि तेरे लिये घी की चिकनी बूँदें पड़ रही हैं। कवियों द्वारा प्रशंसित और मेधिर अर्थात् प्रज्ञावान् अग्नि तू बड़े प्रकाश से आया है। हमारी आहुतियों को स्वीकार कर)। ओजिष्ठं ते मध्यतो मेद उद्धृतं प्र ते वयं ददामहे। श्चोतन्ति ते वसो स्तोका अधि त्वचि प्रति तान् देवशो विहि॥ (ऋ० ३।२१।५) ८

११४ [ दूसरी पञ्चिका- ( हम तेरे लिये बीच में से ली हुई और अत्यन्त ओज वाली चिकनाई को अर्पण करते हैं। हे वसु अग्नि ! तेरी त्वचा पर बूँदें पड़ती हैं। उनको देवों तक ले जा )। पहले मंत्र में जो यह शब्द आये हैं "इमा हव्या जातवेदो जुषस्व" इनसे वह हवि को स्वीकार कराता है। "स्तोकानामग्ने मेदसो घृतस्य" ✤ इसमें घी और मेद ( चर्बी) की बूँदों का वर्णन है। "होता प्राक्षान प्रथमो निषद्य" से तात्पर्य यह है कि देवों का होता अग्नि है। इसलिये होता का अर्थ है अग्नि। दूसरे मन्त्र में है "घृतवंतः पावक ते स्तोका श्चोतंति मेदसः" इसमें घी और चर्बी दोनों का वर्णन है। "स्वधर्म देववीतये श्रेष्ठं नो धेहि वार्यम्" इससे आशीर्वाद चाहता है। तीसरे मन्त्र में तुभ्यं स्तोका घृतश्चुतोऽअग्ने विप्राय सन्त्य" यहाँ घी की बूँदों से तात्पर्य है। "ऋषिः श्रेष्ठः समिध्यसे" यज्ञस्यप्राविता भव" इससे यज्ञ की पूर्ति के लिये आशीर्वाद देता है। चौथे मन्त्र के पहले भाग "तुभ्यं श्चीतन्त्यधिगो...घृतस्य" में घी और चर्बी दोनों का वर्णन है। पिछले भाग "कवि... मेधिर" में हव्य की स्वीकारी के लिये आशीर्वाद है। पाँचवें मन्त्र "ओजिष्ठ......वीहि" के पश्चात् बूंदों के लिये वषट्कार बोलता है। अब वह अनुवषट्कार बोलता है। "सोमस्य अग्ने वीहि" में 'सोम' के स्थान में "स्तोकानां" ऐसा कहता है। बूंदें सब देव- ✤ ब्राह्मण में "मेदसश्च हि घृतस्य च" ऐसा पाठ है। 'च' वेद मंत्र में नहीं है। 'च' के अभाव में 'मेदसः' 'घृतस्य' का विशेषण हो जाता है परन्तु 'च' के द्वारा अलग करने से 'मेदसः' का 'चर्बी' अर्थ होगा।

दूसरा अध्याय ] १.१५ तानों को होती हैं। इसीलिये पृथ्वी पर बूंद बूंद कर के वर्षा होती है। (२) १३—इस पर प्रश्न होता है कि 'स्वाहा' के लिये 'पुरोनु- वाक्य' क्या हैं, “प्रैषः” क्या है और याज्य क्या हैं ? ( उत्तर यह है कि जो पढ़े गये वह 'पुरोनुवाक्य' हैं, ऐसे ही 'प्रैष' और ऐसे ही 'याज्य' । ) फिर प्रश्न होता है कि 'स्वाहाकृति' के देवता क्या हैं ? इसका उत्तर देना चाहिये "विश्वे देवा" अर्थात् सब देवता । क्योंकि याज्य मन्त्र के अन्त में आता है "स्वाहाकृतं हविरदंतु देवाः ।” देवों ने यज्ञ, श्रम और तप, और आहुतियों द्वारा स्वर्ग लोक को जीता । 'वपा' की आहुति देने के अनन्तर ही स्वर्ग लोक उनको दिखाई दिया। उन्होंने दूसरे कृत्यों को सर्वथा छोड़कर वपा की आहुति द्वारा ही स्वर्ग लोक की प्राप्ति की। इसके पश्चात् मनुष्य और ऋषि देवों के यज्ञ स्थान को गये कि कुछ यज्ञ के विषय में ज्ञान प्राप्त करें। उन्होंने इधर-उधर घूम फिर कर देखा कि एक पशु मरा पड़ा है जिसकी अंतड़ियां निकली हुई हैं। तब उन्होंने जाना कि यज्ञ के पशु में वपा का होना आवश्यक है। 'वपा' ही पशु को पूर्ण बनाती है। यह जो तीसरी आहुति में (पशु के वपा को छोड़ कर अन्य भागों को ) भूनते हैं इससे तात्पर्य यह है कि हमारा यज्ञ बहुत बहुत आहुतियों से पूर्ण हो। हमारा यज्ञ पूर्ण पशु से पूरा हो। जो इस रहस्य को समझता है उसका यज्ञ बहुत बहुत आहु- तियों से पूरा होता है। उसका यज्ञ पूर्ण पशु से पूरा होता है। (३) १४—यह जो वपा की आहुति है यह अमृत की आहुति है। अग्नि की आहुति अमृत-आहुति है। आज्य-आहुति अमृत- आहुति है।

११६ [ दूसरी पञ्चिका ये सब आहुतियाँ अशरीरी अर्थात् शरीर रहित हैं। इन्हीं अशरीरी आहुतियों द्वारा यजमान अमृतत्व को प्राप्त करता है। यह जो 'वपा' है वह वीर्य के सदृश है। जैसे वीर्य (गर्भा- शय में) छिप जाता है उसी प्रकार वपा (अग्नि में) छिप जाती है। जैसे वीर्य सफेद होता है उसी प्रकार वपा। जैसे वीर्य अशरीरी होता है वैसे ही वपा। यह जो रुधिर और मांस है यही शरीर हैं। इसलिये (होता अध्वर्य से) कहे, "जितना रुधिर-शून्य है उसे काट डालो"। (वपा-आहुति में) पाँच भाग होते हैं। चाहे यजमान के पास चार ही भाग क्यों न हों (अर्थात् वपा-आहुति का एक भाग सोने की तश्तरी भी है। यदि यजमान के पास सोने की तश्तरी न हो तो चार ही भाग रह जाते हैं फिर भी इन चार के ही पाँच कर लिये जाते हैं) (१) चमचे से घी डालना अर्थात् उपस्तरण क्रिया, ।(२) सोने की तश्तरी, (३) वपा, (४) सोने की तश्तरी का घी, (५) घी की बूँदें टपकाना। यहाँ प्रश्न होता है कि यदि सोना न हो तो क्या करे। (इसका उत्तर यह है) कि पहले दो बार घी को चमचे में डाले अर्थात् दो बार उपस्तरण क्रिया करे, फिर वपा रक्खे, फिर उस पर दो बार गर्म घी टपकावे। घी अमृत है। सोना भी अमृत है। इससे घी टपकाने से यजमान का अभिप्राय पूरा हो जाता है। दो बार के घृत लेने और सोने के सहित वपा-आहुति के पाँच भाग हो जाते हैं। पुरुष में भी पाँच भाग होते हैं, लोम, त्वचा, मांस, अस्थि, मज्जा। होता वपा-आहुति द्वारा यजमान को पाँच भाग वाला बना कर अग्नि में आहुति देता है जो देवों की योनि है। अग्नि देवों की योनि है। आहुतियों द्वारा अग्नि की योनि में उत्पन्न होकर सोने के शरीर के साथ स्वर्गलोक को प्राप्त होता है। (४)

दूसरा अध्याय ] ११७ १५—अध्वर्यु कहता है, "होता ! प्रातःकाल वाले देवों के लिये अनुवाक्य बोलो।" प्रातःकाल आने वाले देव हैं उषा, अग्नि और दो अश्विन। यह देव सात सात छन्दों द्वारा आ जाते हैं और उसके बुलाने से आ जाते हैं जो इस रहस्य को समझता है। प्रजापति होता के प्रातःकाल के अनुवाक्य बोलने पर देव और असुर यज्ञ में आ पहुँचे और कहने लगे, "यह हमारे लिये कहेगा। यह हमारे लिये कहेगा।" उसने केवल देवों के लिये कहा। इस प्रकार देव असुरों से जीत गये। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने शत्रु, अहितकारी के ऊपर विजय पा लेता है। इसको "प्रातरनुवाक्य" कहते हैं। क्योंकि प्रजापति ने प्रातःकाल इसका उच्चारण किया था। बड़ी रात से ही इसका पाठ करना चाहिये। जो पूर्ण वाणी और पूर्ण ब्रह्म का गृहीता होता है और जो श्रेष्ठ होता है उसी की बात लोग मानते हैं। इसलिये बहुत रात से ही उठ कर सबके बोलने से पहले ही पाठ करे (अर्थात् प्रातःकाल सब से पहले उसी की वाणी सुनाई दे)। यदि वह देर से उठकर पाठ करेगा तो उसका पाठ 'पहले कहा हुआ' न होकर दूसरों का 'अनुवाद' स्वरूप हो जायगा। इसलिये बड़ी रात से उठकर पाठ करना चाहिये। मुर्गा से भी पहले बोलना चाहिये। यह जो पक्षी हैं, मुर्गा सहित सब निर्ऋति (मृत्यु?) के मुख हैं। मुर्गा बोलने से पहले 'प्रातरनुवाक्य' बोलने का तात्पर्य यह है कि यदि अन्य (मनुष्य या पशु) अपनी बोली सुना चुकेंगे तो यज्ञ सम्बन्धी वाणी नहीं सुनाई जा सकेगी। इसलिये बड़ी रात से ही अनुवाक का पाठ होना चाहिये। जब अध्वर्यु उपाकर्म (कृत्य) करे तभी होता "प्रातरनुवाक" बोले। जब अध्वर्यु उपाक्रम करता है तो वाणी से ही प्रारंभ

११८ [ दूसरी पञ्चिका करता है। और होता भी वाणी से ही पाठ करता है। वाणी ही ब्रह्म है इसलिये वाणी या ब्रह्म से जो कामना सिद्ध हो सकती है वह सब सिद्ध हो जाती है । (५) १६—जब प्रजापति स्वयं होता था और वह प्रातरनुवाक बोलने को था तो सब देवता उत्सुक थे कि “वह सबसे पहले मेरा नाम लेगा। मेरा नाम लेगा।” उसने इधर-उधर देखकर सोचा कि यदि एक ही देवता को लक्ष्य करके पढ़ता हूँ तो अन्य देवता किस प्रकार तृप्त हो सकेंगे । तब उसने नीचे की ऋचा को देखा :— आपो रेवतीः क्षयथा हि वस्वः क्रतुं च भद्रं बिभृथामृतं च । रायश्च स्थ स्वपत्यस्य पत्नीः सरस्वती तद् गृणते वयो धात् ॥ ( ऋ० १०।३०।१२ ) ( हे धनयुक्त “आपः” तुम सब कोशों के ऊपर शासन करते हो । यज्ञ, कल्याण और अमृत को देने वाले हो । तुम स्वतंत्र धनों की पत्नी (स्वामिनी) हो । सरस्वती देवी गान करने वाले को चिरायु करे । ) “आप” सब देवता हैं। और “रेवती” भी सब देवता हैं। इस प्रकार उसने ऐसे मंत्र से अनुवाक पढ़ा कि सब देवता सन्तुष्ट हो गये । सबने सोचा, “यह मेरे लिये कहता है। यह मेरे लिये कहता है।” जब वह अनुवाक पढ़ रहा था तो सब प्रसन्न हुये । जो इस रहस्य को समझकर इस मंत्र से अपना अनुवाक पढ़ता है वह सब देवताओं को लक्ष्य में रखकर पढ़ता है और सब देवता उससे प्रसन्न होते हैं । देवों को भय हुआ कि इस प्रातर्यज्ञ को असुर ले लेंगे क्यों- कि वह बड़े हैं, बलिष्ठ हैं। परन्तु इन्द्र ने उनसे कहा, “मत डरो । मैं अपने प्रातःकाल के वज्र की तीन गुनी शक्ति से उनको मार दूंगा ।” तब उसने ऊपर की ऋचा पढ़ी । यह ऋचा वज्र है

दूसरा अध्याय ] ११६ क्योंकि 'अपोनप्त्रीय' इसका देवता है। यह ऋचा वज्र है क्योंकि त्रिष्टुप् छन्द में है। यह ऋचा वज्र है क्योंकि यह 'वाणी' है। उस वज्र को इन्हीं तीनों के द्वारा फेंका और इस वज्र से असुरों को मारा। इस प्रकार देव जीत गये और असुर परास्त हो गये। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने अहित-चिंतक शत्रु के ऊपर आधिपत्य कर लेता है। इस पर कहते हैं कि उसी को होता बनना चाहिये जो इस ऋचा में सब छन्द उत्पन्न कर दे। यदि यह तीन बार बोली जाय तो इसमें सब छन्द उत्पन्न हो जाते हैं। (६) १७—दीर्घ आयु की कामना वाला सौ मंत्र पढ़े। मनुष्य की आयु सौ वर्ष की है। उसमें सौ पराक्रम और सौ इन्द्रियाँ होती हैं। जो सौ मंत्र पढ़ता है वह यजमान के लिये इतनी आयु, इतना पराक्रम और इतनी इन्द्रियों को धारण करता है। जिसको यज्ञ की कामना हो वह ३६० मंत्र पढ़े। क्योंकि संवत्सर में ३६० दिन होते हैं। संवत्सर इतना ही होता है। संवत्सर प्रजापति है। प्रजापति यज्ञ है। जो होता यह समझकर ३६० मंत्र पढ़ता है वह यज्ञ को यजमान की ओर झुकाता है। प्रजा और पशु की कामना वाला ७२० मंत्र पढ़े। सम्वत्सर में ७२० दिन रात होते हैं। सम्वत्सर इतना ही होता हैं। संवत्सर प्रजापति है। क्योंकि इसी के उत्पन्न होने पर सब प्रजा उत्पन्न होती है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजापति संवत्सर के पीछे उत्पन्न होकर प्रजा और पशु को पाता है। प्रजावाला और पशु वाला होता है। यदि कोई ब्राह्मणेतर या ऐसा पुरुष यज्ञ करे जिस पर अपराधों का धब्बा हो तो ८०० मंत्र पढ़ने चाहिये। गायत्री में आठ अक्षर होते हैं। देवता भी गायत्री की ही प्रकृति के हैं। इस लिये उन्होंने पाप के अनिष्ट फलों का निवारण कर दिया। जो

१२० . [ दूसरी पञ्चिका इस बात को समझता है वह गायत्री के द्वारा अपने को पाप और दोष के बुरे परिणाम से बचा लेता है । जिसको स्वर्ग की कामना हो वह हजार मंत्र पढ़े । स्वर्ग यहाँ से घोड़े की एक हजार दिन की यात्रा के बराबर दूर है । स्वर्ग लोक की प्राप्ति के लिये ( ऐसा किया जाता है ) । सम्पत्ति और देव-संगम के लिये अपरिमित मंत्र बोले । प्रजापति अपरिमित है । यह जो प्रातरनुवाक है वह प्रजापति का है । उसमें सब कामनायें शामिल हैं । यह जो अपरिमित संख्या में मंत्र बोले जाते हैं वह सब कामनाओं की सिद्धि के लिए बोले जाते हैं । जो इस रहस्य को समझता है उसकी सब कामनायें सिद्ध हो जाती हैं । इसलिये अपरिमित मंत्र बोलने चाहिये । वह अग्नि के लिए सात छन्दों में मंत्र बोलता है । क्योंकि देव- लोक सात हैं । जो इस रहस्य को जानता है वह सब लोकों में सुख पाता है । उषा के लिये सात छन्दों का मंत्र बोलता है । गाँव के पशु सात* होते हैं । जो इस रहस्य को समझता है वह गाँव के सात पशुओं को प्राप्त होता है । दोनों अश्विनों के लिये सात प्रकार के छन्द बोले जाते हैं । क्योंकि वाणी ने सात प्रकार से बोला । सात प्रकार से वाणी ने बोला । पूर्ण वाणी और पूर्ण ब्रह्म में (यही सात छन्द हैं) । तीन देवताओं के लिये मन्त्र बोलता है । क्योंकि यह तीन लोक तिहरे तिहरे हैं । यह मन्त्र तीनों लोकों की विजय के लिए पढ़े जाते हैं । ( ७ ) १८—इस पर प्रश्न होता है कि प्रातरनुवाक कैसे बोलने चाहिये ? छन्दों के अनुसार बोलने चाहिये । यह जो छन्द हैं वह प्रजापति के अंग हैं । जो यज्ञ करता है वह प्रजापति है । *बकरी, भेड़, गाय, घोड़े, गधे, ऊँट और मनुष्य ।

दूसरा अध्याय ] १२१ यजमान के हित के लिये प्रातरनुवाक पाद पाद करके बोलने चाहिये । पशुओं के चार पाद होते हैं। ( ऐसा करने से ) पशुओं को पाता है। ऋचायें आधी आधी करके बोलनी चाहियें । यह जो इस प्रकार बोलता है प्रतिष्ठा के लिए बोलता है। मनुष्य के दो पाद होते हैं पशु के चार पाद । इस प्रकार वह दो पैर वाले यजमान को चार पैर वाले पशुओं में स्थापना करता है। इसलिए प्रातरनुवाक को आधी आधी ऋचा करके बोलना चाहिये । यहाँ यह प्रश्न होता है कि प्रातरनुवाक तो व्यूह हैं, फिर यह अव्यूह कैसे हो गये ? इसका उत्तर यह है कि *"यदि इसके मध्य से बृहती छन्द चला न जाय”। कुछ देवता आहुतियों में भाग लेते हैं, कुछ स्तोमों ( साम- वेदीय प्रार्थना ) में। कुछ छन्दों में। आहुतियों से उन देवों को प्रसन्न किया जाता है जो आहुतियों में भाग लेने वाले हैं। स्तुति और प्रशंसा से उनको जो स्तोम और छन्दों में भाग लेने वाले हैं। जो इस रहस्य को समझता है उससे दोनों प्रकार के देव सन्तुष्ट रहते हैं।

*छन्दों का साधारण क्रम यह है—गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् और जगती। गायत्री में २४ अक्षर होते हैं। उष्णिक् में २८, अनुष्टुप में ३२, बृहती में ३६, पंक्ति में ४०, त्रिष्टुप् में ४४ और जगती में ४८। इस प्रकार हर दूसरे में ४ अक्षर बढ़ जाते हैं। इस क्रमशः बढ़ने को व्यूह्ल कहते हैं। प्रातरनुवाक में छन्दों का क्रम टूट जाता है अर्थात् गायत्री, अनुष्टुप, त्रिष्टुप्, बृहती, उष्णिक्, जगती, पंक्ति। इस प्रकार यह अव्यूह्ल हो गये। इसका उत्तर यह दिया गया है कि 'बृहती' छन्द बीच से उठाया नहीं गया इस लिये व्यूह्ल का अव्यूह्ल हो गया।

१२२ [ दूसरी पञ्चिका तैंतीस देवता सोमपा हैं। ३३ असोमपा । सोमपा यह हैं। आठ वसु, ११ रुद्र, बारह आदित्य, प्रजा- पति, और वषट्कार । असोमपा यह हैं, ११ प्रयाज, ११ अनुयाज, ११ उपयाज ॥ यह पशु में भाग रखते हैं। सोम से सोमपा देवताओं को संतुष्ट करता है और पशु से असोमपा देवताओं को । इस प्रकार जो इस रहस्य को समझता है वह दोनों प्रकार के देवों को सन्तुष्ट कर देता है। वह इस मंत्र से समाप्त करता है :- अभूदुषा रुशत् पशुरग्निरधाय्यृत्वियः। अयोजि वां वृषण्वसू रथो दस्रावमर्त्यो माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥ ( ऋ० ५।७५।६ ) ( श्वेत पशु वाली उषा आ गई । ऋतु के अनुकूल अग्नि रख दी गई। हे विचित्र वीरो ( दोनों अश्विनो ) तुम्हारा न मरने वाला रथ जोता जा चुका । हे मधु को प्रिय रखने वाले, तुम दोनों हमारे बुलाने को सुनो ) । इस पर प्रश्न होता है कि यदि अग्नि के, उषा के और अश्विन की तीन ऋचाओं को बोलता है तो यह एक ऋचा बोलने का क्या प्रयोजन है ? इसका उत्तर यह है कि इस ऋचा में तीनों देवों का वर्णन है। "अभूदुषा रुशत् पशुः" यह 'उषा' के लिये । "अग्निरधाय्यृत्वियः" यह अग्नि के लिए । "अयोजि वां वृषण्वसू रथो दस्रावमर्त्यो माध्वी मम श्रुतं हवम् ।” दोनों अश्विनों के लिये । इस प्रकार एक ऋचा से समाप्त करने से तीनों देवों की स्तुति शामिल हो जाती है। (८)

तीसरा अध्याय १९-ऋषियों ने सरस्वती के किनारे सत्र करते हुये कवष को जो इलूषा का पुत्र था यह कह कर सोम यज्ञ से निकाल दिया, "यह दासीपुत्र, ज्वारी, अब्राह्मण हमारे मध्य में दीक्षा को कैसे प्राप्त करेगा।" उन्होंने उसको रेगिस्तान में निकाल दिया कि वह प्यासा मर जाय और सरस्वती का पानी न पी सके। उसने रेगिस्तान में जाकर प्यास से तंग आकर अपोनप्त्रीय मंत्रों को देखा :- "प्रदेवत्रा ब्रह्मणे गातुरेतु... इति" ( ऋ० १०।३० ) ꕤ इस "अपां न पात्" सूक्त में १५ मंत्र हैं जो नीचे दिये जाते हैं - प्र देवत्रा ब्रह्मणे गातुरेत्वपो अच्छा मनसो न प्रयुक्ति । महीं मित्रस्य वरुणस्य धासिं पृथुज्रयसे रीरधा सुवृक्तिम् ॥१॥ अध्वर्यवो हविष्मन्तो हिभूताऽच्छाप इतो शतीरुशन्तः। अव याश्चष्टे अरुणः सुपर्णस्तमास्यध्वमूर्भिमद्या सुहस्ताः ॥२॥ अध्वर्यवोडप इता समुद्र मपां नपातं हविषा यजध्वम् । स वो दददूर्भिमद्या सुपूतं तस्मै सोमं मधुमन्तं सुनोत ॥३॥ ( १२३ )

१२४ [ दूसरी पञ्चिका “ब्राह्मण के लिये देवों तक पहुँचने के लिये रास्ता हो ।” इस प्रकार वह् जलों के ( अपाम् ) प्रियधाम को प्राप्त हो यो अनिध्मो दीदय दप्स्वन्त्यँ विप्रास ईलते अध्वरेषु । अपां नपान्मधुमती रपो दा याभिरिन्द्रो वावृधे वीर्याय ॥४॥ याभिः सोमो मोदते हर्षते च कल्याणीभिर्युवतिभिर्न मर्यः । ता अध्वर्यो अपो अच्छा परेहि यदासिक्ता ओषधीभिः पुनीतात् ॥५॥ एवेचने युवतयो नमन्त यदीनुशन्नुशतीरेत्यच्छ । सं जानते मनसा संचिकित्रऽध्वर्यवो धिषणापश्च देवीः ॥६॥ यो वो वृताभ्यो अकृणोदु लोकं यो वो मह्या अभिशस्तेरमुञ्चत् । तस्मा इन्द्राय मधुमन्तर्मूर्मिं देवमादनं प्र हिणोतनापः ॥७॥ प्रास्मै हिनोत मधुमन्तमूर्मिं गर्भो यो वः सिन्धवो मध्व उत्सः । घृतपृष्ठमीड्यमध्वरेष्वाऽऽपो रेवतीः शृणुता हवं मे ॥८॥ तं सिन्धवो मत्सरमिद्रपानमूर्म्मिं प्र हेत य उभे इयर्त्ति । मदच्युत मौशानं नभोजां परि त्रितन्तुं विचरन्तमुत्सम् ॥९॥ आवर्त्ततीरध नु द्विधारा गोषुयुधो न नियवं चरन्तीः । ऋषे जनित्रीर्भुवनस्य पत्नीरपो वन्दस्व सवृधः सयोनीः ॥१०॥ हिनोता नो अध्वरं देवयज्या हिनोत ब्रह्म सनये धनानाम् । ऋतस्य योगे विष्यध्वमूहः श्रुष्टीवरीर्भूत नास्मभ्यमापः ॥११॥ आपो रेवतीः क्षयथा हि वस्वः क्रतुं च भद्रं बिभृथामृतं च । रायश्च स्थ स्वपत्यस्य पत्नीः सरस्वती तद्गृणते वयो धात् ॥१२॥ प्रति यदापो अदृशमायतीर्घृतं पयांसि बिभ्रतीर्मधूनि । अध्वर्युभिर्मनसा संविदाना इन्द्राय सोमं सुषुतं भरन्तीः ॥१३॥ एमा अगमन् रेवतीर्जीवधन्या अध्वर्यवः सादयता सखायः । नि बर्हिषि धत्तन सोम्यासोऽपां नप्त्रा संविदानास एनाः ॥१४॥ आगमन्नाप उशतीर्बर्हिरेदं न्यध्वरे असदन् देवयन्तीः । अध्वर्य्यवः सुनुतेन्द्राय सोमयभूदु वः सुशका देवयज्या ॥१५॥ ( ऋ० १०।३० )

तीसरा अध्याय ] १२५ गया । वे उसको मिलने गये। सरस्वती ने उसे चारों ओर से घेर लिया। इसलिये इस स्थान को परिसारक कहते हैं। क्योंकि सरस्वती ने इसको घेर लिया (परि ससार) इसलिये ऋषि कहने लगे कि देवता इसको जानते हैं, लाओ इसे बुला लें । उनको बुलाने के पश्चात् उन्होंने "अपो नप्त्रीयम्" बनाया । अर्थात् "प्र देवत्रा ब्रह्मणे गातुरेतु" इत्यादि । इसके द्वारा उन्होंने जलों के परम धाम को पाया और देवों के परम धाम को भी । जो कोई इस रहस्य को समझता है और जो इस रहस्य को समझ कर 'अपोनप्त्रीय' को करता है वह जलों और देवों के प्रिय धाम को प्राप्त होता है और परम लोक पर विजय पाता है। उसको इसका पाठ निरन्तर करना चाहिये । ऐसा करने से सन्तान के लिये निरन्तर वर्षा होगी । यदि ठहर ठहर कर पढ़ेगा तो सन्तान के लिये बादल भी रुक कर बरसेगा । इसलिए निरन्तर पढ़ना चाहिये । यदि पहली ऋचा को बिना रुके हुये तीन बार बोले तो सभी सूक्त निरन्तर बोला हुआ माना जा सकता है। (१) २०—पहली नौ ऋचायें (१०।३० की) क्रमशः बोलकर ग्यारहवीं ऋचा को दसवीं के स्थान में अर्थात् "हिनोतानोऽअध्वरं देव यज्य" और दसवीं को ग्यारहवीं के स्थान में अर्थात् "आव- वृततीरधु नु द्विधारा" इत्यादि बोले। यह उस समय बोलना चाहिये जब "एकधना" नामक जलों को नदी से लावें । जब होता इन जलों को आता देखे तो कहे :— प्रति यदापो अदृशमायती घृ॒तं पयांसि बिभ्रतीर्मधूनि । अध्वर्यु- भिर्मनसा संविदाना इन्द्राय सोमं सुषुतं भरन्तीः ॥ (ऋ० १०।३०।१३) जब जल आ जावें तो नीचे का मंत्र पढ़े :— आ धेनवः पयसा तूर्यर्था अमर्धन्तीरुप नो यन्तु मध्वा । महो राये बृहतीः सप्तविप्रो मयोभुवो जरिता जोहवीति ॥ (ऋ० ५।४३।१)

१२६ [ दूसरी पञ्चिका जब (वसतीवरि और एकधना जल) मिलाये जायं तो होता यह मंत्र पढ़े :- समन्या यन्त्युप यन्त्यन्याः समानमूर्वं नद्यः पृणन्ति। तन् शूचिं शुचयो दीदिवांसमपां नपातं परि तस्थुरापः ॥ (ऋ० २।३५।३) जो जल पहले दिन लाये जाते हैं उनको "वसतीवरि" और जो उसी दिन प्रातःकाल लाये जाते हैं उनको "एकधन" कहते हैं। ये दोनों जल इस बात पर झगड़ पड़े कि "हम यज्ञ को पहले ले जावें", "हम यज्ञ को पहले ले जावें।" भृगु ने इनको देखा कि झगड़ रहे हैं। उसने इनको ऊपर की ऋचा (ऋ० २।३५।३) से शान्त किया। इससे वह शान्त हो गये। जो इस रहस्य को समझ कर इस प्रकार जलों को शान्त करता है वह इसी प्रकार यज्ञ को पहले ले जायेगा। होता के चमसे में 'वसतीवरी और एकधना जलों के डालने पर यह मन्त्र पढ़ता है :- आपो न देवीरुप यन्ति होत्रियमवः पश्यन्ति विततं यथा रजः । प्राचैर्देवासः प्रणयन्ति देवयुं ब्रह्मप्रियं जोषयन्ते वरा इव । (ऋ० १०।८३।२) अब होता अध्वर्यु से पूछता है, "क्या तुमको जल मिल गये ?" जल ही यज्ञ है। इस प्रश्न से तात्पर्य यह है कि "क्या यज्ञ मिल गया ?" इस पर अध्वर्यु उत्तर देता है, "मिल गये। देख लो।" (अब होता अध्वर्यु से कहता है :-) "हे अध्वर्यु इन जलों से तुम इन्द्र के लिये मधु-सहित सोम को जो वर्षा लाने वाला और तीव्रान्त अर्थात् शुभ परिणाम वाला है। बीच में अन्य कृत्य करके निचोड़ो। वह इन्द्र कैसा है ? वसु वाला, रुद्र वाला, आदित्य वाला, ऋभु वाला, विभु वाला, अन्न वाला, बृहस्पति वाला, और विश्व-देव वाला, यह (आठ

तीसरा अध्याय ] १२७ इन्द्र के विशेषण हैं )। जिस ( सोम ) को पीकर इन्द्र ने वृत्रों को मारा और शत्रुओं को पराजित किया । ओ३म् ।” यह कह कर होता अपनी जगह से उठता है । उठकर जलों का सम्मान करता है जैसे जब कोई प्रतिष्ठित पुरुष निकट आता है तो उठ कर सम्मान करते हैं । इसलिये उठ कर और सामने मुँह करके जलों का सम्मान किया जाता है । इसी प्रकार प्रतिष्ठित पुरुष का सम्मान करते हैं । इसलिये होता को सम्मानार्थ जलों के पीछे जाना चाहिये । यदि दूसरा कोई भी यज्ञ करे तो भी होता यश प्राप्ति के समर्थ है । इसलिये मंत्र पढ़ने वाले को जलों के पीछे जाना चाहिये । उनके पीछे जाते हुये उसे यह मंत्र बोलना चाहिये :- अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम् । पृञ्चतीर्मधुना पयः ॥ ( ऋ० १।२३।१६ ) जो यश की कामना करे वह यह मंत्र पढ़े । जो तेज या ब्रह्मवर्चस् की कामना करे वह यह मंत्र पढ़े :- अमूर्या उपसूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह । ता नो हिन्वन्त्वध्वरम् ॥ ( ऋ० १।२३।१७ ) जो पशु की कामना हो तो यह मंत्र पढ़े :- अपो देवीरुप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः । सिन्धुभ्यः कर्त्वं हविः ॥ ( ऋ० १।२३।१८ ) जो इनको पढ़ता हुआ जलों के पीछे जायगा वह अवश्य ही इन कामनाओं की पूर्ति करेगा । जो इस रहस्य को समझता है वह इसे इन कामनाओं को पा लेता है । जब वसतीवरी और एकधना जल वेदी पर रखे जा रहे हैं तब वह यह मंत्र पढ़ता है :-

१२८ [ दूसरी पञ्चिका एमा अग्मन् रेवतीर्जीवधन्या अध्वर्यवः सादयता सखायः । नि बर्हिषि धत्तन सोम्यासोऽपां नप्त्रा संविदानास एनाः ॥ ( ऋ० १०।३०।१४ ) और जब जलों को वेदी में रख चुकता है तो नीचे के मंत्र पढ़ता है :— आगमन्नाप उशतीर्बर्हिरेदं न्यध्वरे असदन् देवयन्तीः । अध्वर्यवः सुनुतेन्द्राय सोममभूदुवः सुशका देवयज्या ॥ ( २ ) (ऋ० १०।३०।१५) २१—प्रातरनुवाक यज्ञ का शिर है। उपांशु और अंतर्याम प्राण और अपान है। ( उपांशु और अंतर्याम दो घड़े होते हैं जिनमें सोम रस रक्खा जाता है। घड़ों को उपांशु पात्र और अंतर्याम पात्र कहते हैं। और घड़ों के ऊपर जो छोटे प्याले से होते हैं उनको उपांशु ग्रह और अंतर्याम ग्रह कहते हैं )। वाणी वज्र है। जब उपांशु और अंतर्याम से आहुतियां दी जाती हों तो होता शब्द न बोले। यदि वह बोलेगा तो इस वाणी रूपी वज्र के द्वारा यजमान के प्राण ले लेगा। यदि बोल पड़े तो किसी अन्य को चाहिये कि होता से कहदे कि तुमने वाणी बोलकर वाणी रूपी वज्र से होता के प्राण ले लिये अब तुम्हारे प्राण भी चले जायँगे। सदा ऐसा ही होता है। इस लिये जब उपांशु और अंतर्याम से आहुतियां दी जायं तो होता वाणी को न निकाले। जब उपांशु से आहुति दी जा चुके तो वह यह बोले :— “प्राणं यच्छ स्वाहा त्वा सुह्व सूर्याय ।” अर्थात् “प्राण को ले । स्वाहा । हे अच्छी प्रकार बुलाने वाली वाणी, तुझको सूर्य के लिये छोड़ता हूँ ।” अब वह प्राण को खींचे और कहे, “हे प्राण, मुझ में प्राण धारण करा ।” जब अंतर्याम ग्रह से आहुति दी जा चुके तो वह बोले :— “अपानं यच्छ स्वाहा त्वा सुह्व सूर्याय ।”

तीसरा अध्याय ] १२९ और अपान को बाहर निकाल कर कहे, "हे अपान, मुझ में अपान धारण करा।" फिर जिस पत्थर पर उपांशु का सोम पीसा गया उसको यह कह कर छूता है "व्यानाय त्वा" और वाणी को छोड़ता है। यह उपांश सवन आत्मा है। होता इस प्रकार आत्मा में प्राण धारण करा के वाणी को छोड़ता है, और पूरी आयु को प्राप्त होता है। इसी प्रकार वह भी जो इस रहस्य को समझता है। (३) २२—यहाँ कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि होता उन सब के साथ चले या न चले। कुछ लोग कहते हैं कि चले, क्योंकि बहिष्पवमान का स्तोत्र मनुष्यों और देवों दोनों के लिए है। इस लिये यह भी उसमें शामिल हो सकता है। परन्तु यह विचार ठीक नहीं। यदि वह चलेगा तो ऋक् को साम के पीछे डाल देगा। यदि कोई उसे ऐसा करते भी देखे तो उससे कह दे—"यह होता साम गाने वालों के पीछे हो लिया और हमने अपना यश उद्गाता को दे दिया। अपने स्थान से गिर गया और गिरता रहेगा"। ऐसा सदा होता है। इस लिये जहाँ बैठा है वहीं बैठा रहे और यह अनुमंत्र पढ़ता रहे, "यो देवानामिहसोम पीथोयज्ञे बर्हिषिवेद्यां । तस्यापि भक्षयामसि" । अर्थात् "इस बर्हि यज्ञ में देवों के लिए सोम निकाला गया, उसे हम खावें।" इस प्रकार होता उस सोम से वंचित नहीं रहता। अब उसको कहना चाहिये:— "मुखमसि मुखं भूयासम्" "तू मुख है, मैं भी मुख अर्थात् मुख्य हो जाऊँ।" ९

१३० [ दूसरी पञ्चिका बहिष्पवमान यज्ञ का मुख (मुख्य भाग) है। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने लोगों में मुख्य होता है। श्रेष्ठ होता है। दीर्घजिह्वी (लम्बी ज़बान वाली) नाम की एक आसुरी स्त्री थी। उसने देवताओं के प्रातःसवन को चाट लिया। उसमें नशा नहीं रहा। देवों ने इसका उपचार करना चाहा। उन्होंने मित्र और वरुण से कहा, "तुम दोनों इसका उपचार कर दो"। उन्होंने कहा, "अच्छा, पहले हम तुमसे वर माँग लें।" देवों ने कहा, "माँग लो"। उन्होंने प्रातःसवन में से पयस्या (मट्ठे) को माँग लिया। यह उनका सदा का वर है। यह जो पहले उस आसुरी ने बिना नशे के कर दिया था वह पयस्या मट्ठे के द्वारा ठीक हो गया। क्योंकि (मित्र और वरुण) दोनों ने पयस्या के द्वारा (सोम रस को) ठीक कर दिया। (४) २३—देवों के सवन साथ जुड़े नहीं रहते थे (गिरे पड़ते थे) उन्होंने पुरोडाशों को देखा। उन्होंने उनमें से हर एक सवन का भाग अलग कर दिया। जिससे वह सब सवन जुड़े रहें। इस लिये जब सवनों के लिये पुरोडाश के भाग किये जाते हैं तो वे सवन जुड़े रहते हैं। इसी प्रकार उन्होंने उनको जोड़े रक्खा। देवों ने इनको (सोमरस से) पहले काटा। इस लिये इनका नाम पुरोडाश हुआ। यही पुरोडाशों का पुरोडाशत्व है। इस पर कुछ लोग कहते हैं कि हर एक सवन के लिये इस प्रकार पुरोडाश को विभाजित करे—प्रातः सवन के लिये आठ कपालों का, दोपहर के सवन के लिए ११ कपालों का और १२ कपालों का तीसरे सवन के लिए। क्योंकि सवनों का रूप छन्दों के रूपों के अनुसार है। लेकिन यह बात माननीय नहीं। जितने पुरोडाश सवनों के लिए काटे जाते हैं वे सब इन्द्र के हैं। इस लिये उनको ११ कपालों पर ही रखना चाहिये।