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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पहला अध्याय १— यह जो प्रउग शस्त्र है वह ग्रहों☸ में से सोम की आहु- तियां देने के लिये उपयुक्त है। प्रातः काल के नौ ग्रह हैं। बहिष्पवमान सूक्त के नौ मंत्रों से इनकी आहुति की जाती है। इस स्तुति के पश्चात् अध्वर्यु दसवें ग्रह को लेता है। हर एक मंत्र के साथ जो हिंकार बोली जाती हैं वह दसवां मंत्र मान लिया जाता है। इस प्रकार दश ग्रह और दश मंत्रों का समन्वय हो जाता है। होता वायु वाले तीन मंत्रों को पढ़ता है :— वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंकृताः । तेषां पाहि श्रुधी हवम् ॥ वाय उक्थेभिर्जरन्ते त्वामच्छा जरितारः । सुतसो'मा अहर्विदः ॥ वायो तव प्रपृञ्चती धेना जिगाति दाशुषे । उरूची सोमपीतये ॥ ( ऋ० १।२।१-३ ) ☸ग्रह उस प्याले को कहते हैं जो पात्र अर्थात् कलश के ऊपर रक्खा जाता है, और जिसमें से लेकर सोम की आहुतियां दी जाती हैं। नौ ग्रह यह हुये —(१) उपांशु (२) अन्तर्याम (३) वायव (४) ऐन्द्र- वायव (५) मैत्रावरुण (६) अश्विन (७) शुक्र (८) मन्थी (६) आग्रायण । ( १५९ )

१६० [ तीसरी पञ्चिका इससे वायु के ग्रह की स्तुति की जाती है । नीचे के तीन इन्द्र-वायु वाले मंत्र पढ़ता है :- इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरा गतम्। इन्दवो वामुशन्ति हि ॥ वायविन्द्रश्च चेतथः सुतानां वाजिनीवसू। तावा यातमुप द्र॒वत् ॥ वायविन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्कृतम्। मक्ष्वित्था धिया नरा ॥ ( ऋ० १।२।४-६ ) यह इन्द्र-वायु के ग्रह की स्तुति हुई । नीचे के तीन मित्रा-वरुण के मंत्र पढ़ता है :- मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम्। धियं घृताचीं साधन्ता ॥ ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा । क्रतुं बृहन्तमाशाथे ॥ कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया । दक्षं दधाते अपसम् ॥ ( ऋ० १।२।७-६ ) इससे मित्रावरुण के ग्रह की स्तुति हुई । नीचे के तीन मंत्र दो अश्विनों के लिये पढ़े गये :- अश्विना यज्वरीरिषो द्रवत् पाणी शुभस्पती । पुरुभुजा चनस्यतम् ॥ अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरया धिया । धिष्ण्या वनतं गिरः ॥ दस्रा युवाकवः सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः । आ यातं रुद्रवर्तनी ॥ ( ऋ० १।३।१-३ ) इससे अश्विनों के ग्रहों की स्तुति की गईँ । नीचे के तीन इन्द्र के मंत्र पढ़ता है :- इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः । अण्वीभिस्तना पूतासः ॥ इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः । उप ब्रह्माणि वाघतः ॥ इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः । सुते दधिष्व नश्चनः ॥ ( ऋ० १।३।४-६ ) इससे शुक्र और मन्थी ग्रह की स्तुति हुई । अब विश्वेदेवों के तीन मंत्र पढ़ता है :- ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वेदेवास आ गत । दाश्वांसो दाशुषः सुतम् ॥

पहला अध्याय ] १६१ विश्वे देवासो अप्तुरः सुतमा गन्त तूर्णयः । उस्रा इव स्वसराणि ॥ विश्वे देवासो अस्निध एहि मायासो अद्रुहः । मेधं जुषन्त वह्नयः ॥ ( ऋ० १।३।७-९ ) इससे आग्रायण ग्रह की स्तुति हुई । अब सरस्वती के तीन मंत्र पढ़ता है :— पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥ चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनां । यज्ञं दधे सरस्वती ॥ महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना । धियो विश्वा वि राजति ॥ ( ऋ० १।३।१०-१२ ) कोई सरस्वती का ग्रह ही नहीं । सरस्वती वाणी है । वाणी से जो कोई ग्रह लिये जाते हैं उन्हीं की इन शब्दों से स्तुति हो जाती है । जो इस रहस्य को समझता है वह कीर्ति पाता है । (१) २—यह जो प्रउग है इससे अन्न की प्राप्ति करता है । प्रउग में अन्य देवता की स्तुति होती है । और प्रउग में अन्य का ही कृत्य होता है । जो इस रहस्य को समझता है वह ग्रहों में अन्यान्य खाद्य पदार्थों को रखता है । यह जो प्रउग शस्त्र है वह यजमान का सबसे निकटस्थ सम्बन्धी है । इस लिये उसको इसका बहुत ध्यान रखना चाहिये । ऐसा कहा जाता है, क्योंकि इसी से होता संस्कार करता है । वह वायु के तीन मंत्रों को पढ़ता है । इसीलिये कहते हैं कि वायु प्राण है । प्राण वीर्य है । शरीर में वीर्य पहले उत्पन्न होता है, फिर मनुष्य पैदा होता है । यह जो वायु के मंत्रों को पढ़ता है उससे यजमान में प्राण का संस्कार करता है । इन्द्र और वायु के तीन मंत्र इसलिये पढ़ता है कि जहाँ प्राण है, वहाँ अपान है । इनके पढ़ने से यजमान में प्राण और अपान का संस्कार करता है । ११

१६२ [ तीसरी पञ्चिका वह मित्र और वरुण के लिये तीन मंत्र पढ़ता है । यह इस लिये कि कहते हैं कि जब आदमी बनता है तो पहले आंख बनती है। मित्र और वरुण के लिये मंत्र पढ़ कर वह मानों यजमान की आंख का संस्कार करता है । वह अश्विनों के तीन मंत्र पढ़ता है क्योंकि बच्चे के पैदा होने पर कहते हैं कि यह सुनने की इच्छा करता है। यह ध्यान दे रहा है। अश्विन के मंत्र पढ़कर वह यजमान के कानों का संस्कार करता है । इन्द्र के तीन मंत्र पढ़ता है क्योंकि उत्पन्न हुये बच्चे के विषय में कहा करते हैं कि यह पहले गर्दन उठाता है, फिर सिर । इन्द्र के मंत्र पढ़कर मानो वह यजमान में वीर्य्य का संस्कार करता है। विश्वेदेवों के तीन मंत्र पढ़ता है क्योंकि जब बच्चा पैदा होता है तो पीछे से हाथ पैर हिलाता है। अङ्ग विश्वेदेवों के हैं। इन मंत्रों को पढ़ कर मानो वह यजमान के अंगों का सस्कार करता है । वह सरस्वती के लिये तीन मंत्र पढ़ता है। क्योंकि जब बच्चा पैदा होता है तो वाणी सब से पीछे आती है। सरस्वती वाणी है। सरस्वती के तीन मंत्र बोलकर मानो वह यजमान में वाणी का संस्कार करता है । जो होता इस रहस्य को समझता है या जिस यजमान के लिये होता मंत्र पढ़ता है, वह एक बार उत्पन्न होने पर भी इन सब देवताओं, सब स्तुतियों, सब छन्दों, सब प्रउगों, सब सवनों द्वारा फिर नया जन्म पाता है। (२) ३—यह जो प्रउग शस्त्र है वह प्राणों के लिये है। सात देव के लिये मंत्र पढ़े जाते हैं। सिर में सात प्राण हैं। इनको पढ़कर मानो (होता यजमान के) सिर में सात प्राणों को रखता है।

पहला अध्याय ] १६३ यहां प्रश्न करते हैं कि क्या होता यजमान के लिये पाप या भद्र कर सकता है ? इसका उत्तर यह है कि जो जिसका होता होता है वह उसके लिये जो चाहे कर सकता है । यदि वह चाहे कि यजमान को प्राणों से वंचित करदे तो वायु के मंत्रों में गड़बड़ कर दे या एक पद छोड़ दे जिससे मंत्रों में गड़बड़ हो जाय । बस यजमान प्राणों से वंचित हो जायगा । यदि वह चाहे कि यजमान को प्राण और अपान से वंचित कर दे तो इन्द्र-वायु के मंत्रों में गड़बड़ करदे या एक पद छोड़ दे जिससे मंत्रों में गड़बड़ हो जाय । बस यजमान प्राण और अपान से वंचित हो जायगा । अगर चाहे कि आंख से उसे वंचित कर दे तो मित्र-वरुण के मंत्रों में गड़बड़ कर दे या एक पद छोड़ दे जिससे मंत्रों में गड़बड़ हो जाय । बस यजमान आंख से वंचित हो जायगा । अगर चाहे कि कान से उसे वंचित कर दे तो अश्विनों के तीन मंत्रों में गड़बड़ कर दे या एक पद छोड़ दे जिससे मंत्रों में गड़बड़ हो जाय । बस यजमान कान से वंचित हो जायगा । अगर चाहे कि उसे वीर्य से वंचित करदे तो इन्द्र के तीन मंत्रों में गड़बड़ कर दे या एक पद छोड़ दे जिससे मंत्रों में गड़- बड़ हो जाय । बस यजमान वीर्य से वंचित हो जायगा । अगर चाहे कि उसको अंगों (हाथ पैर) से वंचित कर दे तो विश्वेदेवों के मंत्रों में गड़बड़ कर दे या एक पद छोड़ दे जिस से मंत्रों में गड़बड़ हो जाय । बस यजमान अंगों से वंचित हो जायगा । अगर वह चाहे कि उसे वाणी से वंचित करदे तो सरस्वती के मंत्रों में गड़बड़ कर दे या एक पद छोड़ दे जिससे मंत्रों में गड़बड़ हो जाय और यजमान वाणी से वंचित हो जायगा ।

१६४ [ तीसरी पञ्चिका अगर वह चाहे कि उसको सब अंगों और आत्मा से युक्त रक्खूँ तो वह उन मंत्रों को यथाविधि ठीक ठीक पढ़े । इस प्रकार वह उसको सब अंगों और आत्मा से युक्त रखता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सब अंगों और आत्मा से अपने को युक्त रखता है। (३) ४—यहाँ प्रश्न होता है कि जब शस्त्र स्तोत्र के अनुकूल होना चाहिये तो सामगान करने वाले जिन अग्नि वाले मंत्रों को पढ़ते हैं उनको होता वायु वाले मंत्र से कैसे प्रतिपादन करता है। अग्नि के मंत्र वायु के मंत्रों के अनुकूल कैसे हो सकते हैं ? इसका उत्तर यह है कि यह जो देवता है वह अग्नि के ही शरीर हैं। यह जो अग्नि जलता है वह उसका वायु रूप है। इस प्रकार वायु के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। अग्नि जो जलता है वह दो भागों में जलता है। इन्द्र और वायु दो हैं। यह उसका ऐन्द्र-वायु रूप है। इस प्रकार वह ऐन्द्र-वायु के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। यह जो अग्नि जलने में ऊपर नीचे होता है यह मित्र और वरुण का रूप है। इस प्रकार वह मित्रावरुण के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। अग्नि का जो भयानक स्पर्श है वह वरुण का रूप है। यह जो भयानक स्पर्श होते हुये भी मित्र के समान उसके पास बैठते हैं यह उसका मित्र रूप है। इस प्रकार वह मित्रावरुण के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। यह जो दो भुजाओं और दो अरणियों से घिस कर अग्नि जलाते हैं यह अग्नि का अश्विन-रूप है। इस प्रकार वह अश्विनों के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। यह जो बड़े जोर से बबबब करके जलता है जिससे डरकर लोग भाग जाते हैं यह उसका इन्द्र का रूप है। इस प्रकार वह इन्द्र के रूप में अग्नि की स्तुति करता है।

पहला अध्याय ] १६५ यह जो एक अग्नि को कई जगह ले जाकर कई भाग कर देते हैं यह उसका विश्वेदेवों का रूप है। इस प्रकार विश्वेदेवों के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। जब अग्नि शोर करके बातचीत करने के समान जलता है, यह उसका सरस्वती रूप है। इस प्रकार होता सरस्वती के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। इस प्रकार जिन तीन-तीन मंत्रों को पढ़ते हैं उनमें भिन्न- भिन्न देवते होते हुये भी सामगान करने वाली स्तुति को वायु के मंत्र से आरंभ करके अनुकूलता दिखाते हैं। विश्वेदेवों के लिये शस्त्र पढ़कर नीचे का याज्य विश्वेदेवों के प्रति पढ़ता है :- विश्वेभिः सोम्यं मध्वऽग्न इन्द्रेण वायुना। पिबा मित्रस्य धामभिः ॥ (ऋ० १।१४।१०) इस प्रकार सब देवतों को भाग देकर वह सन्तुष्ट करता है। (४) ५-यह जो वषट्कार है वह देवों का पात्र है। वषट्कार रूपी देवपात्र से वह देवतों को तृप्त करता है। अनुवषट्कार से वह देवों को पुनः तृप्त करता है, जैसे लोग घोड़ों या गायों को बार बार घास या पानी देते हैं। इस पर शंका करते हैं कि जिस अग्नि में पहले आहुति दी थी उसी में फिर क्यों आहुति देते हैं और धिष्ण्या अग्नि के पास वषट्कार करते हैं ? इसका उत्तर यह है कि अनुवषट्कार "सोमस्याग्ने वीहि" करके वह वषट्कार भी करता है और धिष्णियों को तृप्त भी करता है। प्रश्न करते हैं कि सोम का वह स्विष्टकृत भाग कौन सा है जिसमें से बिना समाप्त किये हुये भक्षण कर लेते हैं और अनु- वषट्कार करते हैं ? इसका उत्तर यह है कि 'सोमस्याग्ने वीहि'

१६६ [ तीसरी पञ्चिका इस अनुवषट्कार से वह कृत्य को समाप्त कर देते हैं और सोम पान कर लेते हैं। यही सोम का स्विष्टकृत भाग है। अब वह वषट्कार करता है। (५) ६—यह जो वषट्कार है वह वज्र है। यदि उसका कोई शत्रु हो तो वषट्कार करते हुये उस शत्रु का ध्यान करले, बस वह वषट्कार वज्र के रूप में शत्रु का हनन कर देगा। वषट्कार में "षट्" (छः) शब्द आया है। छः ऋतुयें हैं। इस प्रकार वह ऋतुओं को बनाता और स्थापित करता है। जो ऋतुओं में स्थापित हो गया वह दूसरी चीज़ों में भी स्थापित हो जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह भली भांति स्थापित हो जाता है। वेद के पुत्र हिरण्यदन ने इस सम्बन्ध में यह कहा है :— वषट्कार में 'षट्' (छः) से होता इन छः चीज़ों को स्थापित करता है। द्यौ अंतरिक्ष में प्रतिष्ठित हैं। अंतरिक्ष पृथ्वी में। पृथिवी जलों में। जल सत्य में। सत्य ब्रह्म में। ब्रह्म तप में। यदि यह चीजें स्थापित हो गईं तो शेष सब कुछ स्थापित हो जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह भली भांति स्थापित हो जाता है। "वौषट्" का 'वौ' छः ऋतुओं का बोधक है। वषट्कार कहकर होता यजमान को ऋतुओं में भली भांति स्थापित करता है। जैसा वह देवों के साथ करता है वैसा देव उसके साथ करते हैं। (६) ७—वषट्कार तीन होते हैं। (१) वज्र (२) धामच्छद् (३) रिक्त। यह जो उच्चस्वर से और बल से वषट्कार करते हैं वह वज्र है। इससे वह जब चाहे तब अपने शत्रु और अहित- कारी को जिसको वह दबाना चाहे दबा सकता है। जिस यज-

पहला अध्याय ] १६७ मान के शत्रु हों उसके लिये वह वषट्कार रूपी इस वज्र का प्रयोग करे। यह धामच्छद् इसलिये हैं कि जिस ऋचा के साथ बोला जाता है उसी का भाग हो जाता है बिना कुछ भाग छोड़े हुये। प्रजा और पशु उसके पास होते हैं। इसलिये प्रजा और पशु की कामना वाले को यह वषट्कार करना चाहिये। जिसमें 'षट्' धीरे से कहा जाता है वह रिक्त है। इस प्रकार वह आत्मा और यजमान दोनों को रिक्त (शून्य) कर देता है। जो ऐसा वषट्कार करता है, वह स्वयं भी पापी है और वह भी जिसके लिये यह वषट्कार किया जाय। इसलिये उसको यह वषट्कार न करना चाहिये। यहां प्रश्न होता है कि क्या होता यजमान को पापी या भद्र बना सकता है? इसका उत्तर यह है कि हां, यदि वह किसी का होता है तो ऐसा कर सकता है। इस समय होता यजमान के लिये जो चाहे कर सकता है। यदि वह चाहे कि यजमान को यज्ञ का फल न मिले तो ऋचा और वषट्कार दोनों को एक स्वर से पढ़े। वह उसको यज्ञ के फल से वंचित कर देगा। अगर वह यजमान को बहुत पापी बनाना चाहे तो याज्य को जोर से पढ़े और वषट्कार को धीरे से। इससे यजमान पापी हो जायगा ! यदि वह यजमान को प्रसन्न करना चाहे तो याज्य मंत्र को धीरे से पढ़ कर वषट्कार को जोर से पढ़े। यह श्री के लिये किया जाता है। इससे वह यजमान को कल्याण युक्त कर देता है। मंत्र और वषट् को मिला देना चाहिये। बीच में रुकना* *विषय यह है कि मंत्र को बोलकर पीछे से 'ओ३म्' लगा देते हैं। और सबसे पिछला स्वर छोड़ देते हैं। जैसे अगर मंत्र के अंत में 'य' आया तो 'य' और 'ओ३म्' मिलकर 'योम्' बोलेंगे।

१६८ [ तीसरी पञ्चिका नहीं चाहिये । जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशु से युक्त होता है। (७) ८-वषट्कार करते समय जिस देवता के लिये आहुति दी जाय उसी का ध्यान करे । इस प्रकार साक्षात् देवता को प्रसन्न करता है, और उसके लिये प्रत्यञ्च रूप से याज्य मन्त्र पढ़ता है। वषट्कार ही वज्र है। इस वज्र को अगर बिना शांत किये फेंका जाय तो वह बिजली के समान हानिकारक होता है। इसको शांत करना सभी नहीं जानते, न उसकी प्रतिष्ठा को सभी जानते हैं। इसलिये जब बहुतों की मृत्यु होती हो तो वषट्कार के पश्चात् होता 'वागोजः' अनुमन्त्र बोलता है। इस प्रकार शांत होकर वषट्कार यजमान को हानि नहीं पहुँचाता। यजमान इस अनुमन्त्र को बोले :- “वषट्कार मा मां प्रमृक्षो माहंत्वां प्रमृक्षं बृहामनऽउपह्वये व्यानेते शरीरं प्रतिष्ठासि प्रतिष्ठां गच्छ प्रतिष्ठा मा गमय ।” “हे वषट्कार ! मुझे मत नष्ट कर । मैं तुझे नहीं नष्ट करूँगा। मैं तेरे मन को कोशिश कर के बुलाता हूँ । व्यान रूप से तू शरीर में प्रतिष्ठित है । प्रतिष्ठा को प्राप्त कर और मुझे प्रतिष्ठा को प्राप्त करा ।” कुछ लोग कहते हैं कि यह अनुमन्त्र बहुत बड़ा है और इसका कोई प्रभाव नहीं। इसके स्थान में “ओजः सह ओजः” ऐसा अनुमन्त्र वषट्कार के बाद बोलना चाहिये। ओज और सह वषट्कार के दो बड़े प्यारे शरीर हैं। इस प्रकार वह यज- मान को प्रियधाम प्राप्त कराता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रिय धाम को प्राप्त होता है। वषट्कार वाणी है और प्राण और अपान है। जब वषट्- कार किया जाता है तो यह तीनों शरीर से बाहर निकलते हैं।

पहला अध्याय ] १६९ इसलिये यह अनुमन्त्र पढ़ना चाहिये "वागोजः सह ओजो मयि प्राणापानौ" । इस प्रकार होता अपने में वाणी, प्राण और अपान को स्थापित करता है और पूर्ण आयु भोगता है । जो इस रहस्य को समझता है वह पूर्ण आयु भोगता है । (८) ९—यज्ञ देवताओं के पास से चला गया । उन्होंने उसको 'प्रैष' मन्त्रों से बुलाना चाहा । इन मन्त्रों का नाम "प्रैष" इसी लिये है कि इनके द्वारा यज्ञ को चाहा (प्र+इष्) । 'पुरोरुक्' मन्त्रों के द्वारा उन्होंने इसको चमकाया (प्रारोचयन्) । इसी लिये इनको 'पुरोरुक' कहते हैं । उन्होंने उसको वेदी में पाया (विद्-प्रापणे) इसीलिये इसको वेदी कहते हैं। उसको पाकर ग्रहों में ग्रहण किया । इसीलिये इनको 'ग्रह' कहते हैं। उसको पाकर उन्होंने 'निविद्' के द्वारा देवताओं से निवेदन किया इसलिये इनका नाम 'निविद्' हुआ । जब कोई किसी खोई हुई चीज को पाना चाहता है तो इसका अधिक भाग चाहता है या कम भाग । जो बड़ा ( या बुद्धिमान् ) होता है वह अच्छा भाग चाहता है । जो समझता है कि 'प्रैष' बलवान हैं वह यह भी जानता है कि वह श्रेष्ठ हैं । 'प्रैष' का अर्थ है खोये हुये को चाहना । इसलिये 'प्रैष' को सिर झुका कर बोलते हैं । (९) १०—निविद् जो हैं वह 'उक्थ' अर्थात् शस्त्रों के गर्भ हैं । प्रातः सवन में वे उक्थ या शस्त्रों से पहले रक्खे जाते हैं । क्योंकि गर्भ में बच्चे नीचे को सिर किये रहते हैं और नीचे को सिर किये पैदा होते हैं । दोपहर के सवन में वे शस्त्र के मध्य में रक्खे जाते हैं । क्योंकि गर्भ योनि के मध्य में होते हैं । सायं के सवन में निविद् पीछे रक्खे जाते हैं । क्योंकि गर्भ ऊपर से पैदा होते हैं । जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशु से युक्त होता है ।

१७० [ तीसरी पञ्चिका जो निविद् हैं वह ‘उक्थों’ के पेश (किनारे की बेल) हैं। यह प्रातः सवन में उक्थों के पहले रक्खे जाते हैं जैसे जुलाहा कपड़े के सिरे पर बेल बनाता है। दोपहर के सवन में बीच में रक्खे जाते हैं जैसे जुलाहा कपड़े के बीच में बेल बनाता है। सायंकाल के सवन में यह पीछे रक्खे जाते हैं जैसे जुलाहा कपड़े के पीछे बेल बनाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह यज्ञ के बेल बूटों से अपने को सजा लेता है। (१०) ११—यह जो निविद् हैं वह सूर्य्य के हैं। ये जो प्रातः सवन में उक्थों से पहले रक्खे जाते हैं, दोपहर के सवन में बीच में और तीसरे सवन में पीछे। ये सूर्य्य के ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। देवों ने यज्ञ को थोड़ा थोड़ा करके (पच्छः) पाया। इस- लिये निविद् भी टुकड़े टुकड़े कर के पढ़े जाते हैं। जब देवों ने यज्ञ को पाया तो उसमें से एक अश्व निकला। इसलिये कहते हैं कि यजमान निविद् पढ़ने वालों को एक अश्व दे। यह वर बहुत अच्छा समझा जाता है। निविद् पढ़ने वाला किसी पद को न छोड़े। क्योंकि पद छोड़ने से मानों यज्ञ में छेद करता है। यज्ञ में छिद्र हो जाने से यजमान बड़ा पापी हो जाता है। इसलिये निविद् में कोई पद न छोड़े। निविद् के दो पदों को उलट पलट न करे। यदि उलट पलट करेगा तो यज्ञ उलट पलट हो जायगा और यजमान भी उलट पलट हो जायगा। इसलिये निविद् के दो पदों को उलट पलट न करे। निविद् के दो पदों को मिलाना भी न चाहिये। यदि निविद् के दो पदों को मिला देगा तो यज्ञ की आयु को बिगाड़ देगा

पहला अध्याय ] १७१ और यजमान के लिये बड़ा कष्टदायक होगा । इसलिये निविद् पढ़ते हुये दो पदों को मिलाना नहीं चाहिये । केवल दो पदों को मिलाना चाहिये 'प्रेदं ब्रह्म', प्रेदं क्षत्र' । ऐसा करने से ब्रह्म और क्षत्र को जोड़ता है । इससे ब्रह्म और क्षत्र जुड़ जाते हैं । निविद् के लिये तीन मंत्रों से अधिक के सूक्त चुनें, क्योंकि निविद् के पद सूक्त के भिन्न भिन्न मन्त्रों के अनुकूल होने चाहिये । इसलिये निविद् के लिये तीन या चार मन्त्रों से अधिक के सूक्त चुनने चाहिये । निविद् के द्वारा स्तोत्र बढ़ जाता है । तीसरे सवन में निविद् को एक मन्त्र शेष रहने पर कहे । अगर दो मन्त्र शेष रहने पर निविद् कहेगा तो उत्पत्ति की शक्ति को नष्ट कर देगा और गर्भो को बालक से शून्य कर देगा । इसलिये तीसरे सवन में एक मन्त्र शेष रहने पर निविद् कहे । निविद् को सूक्त से आगे न जाने दे । जिस सूक्त से निविद् आगे निकल जाय तो फिर उसको पीछे न लौटावे क्योंकि उसका स्थान नष्ट हो गया । अब दूसरे देवता का और दूसरे छन्द का एक सूक्त चुने और उसमें निविद् रक्खे । दूसरे निविद् सूक्त को पढ़ने से पहले ऋग्वेद मंडल १० का ५७वां सूक्त पढ़े :- “मा प्रगाम पथो वयं” इत्यादि । “हम मार्ग से न भटकें” इत्यादि । क्योंकि जो यज्ञ में भूल जाता है वह मानों मार्ग से भटक जाता है । “मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः” ( ऋ० १०।५७।१ का दूसरा पद ) पढ़ कर वह यजमान को यज्ञ में भूल करने से बचा लेता है । “मान्तः स्थुर्नो अरातयः” ( ऋ० १०।५७।१ का तीसरा पद ) पढ़ने से वह शत्रुओं को हराकर मार भगाता है ।

१७२ [ तीसरी पञ्चिका “यो यज्ञस्य प्रसाधनस्तन्तुर्देवेष्वाततः। तमाहुतं निशीमहि” इसमें 'तन्तु' का अर्थ है सन्तान । क्योंकि इसको पढ़कर होता यजमान की सन्तान को फैलाता है (संतनोति) । (ऋ० १०।५७।३) “मनो न्वाहुवामहे नाराशंसेन सोमेन” । (ऋ० १०।५७।३) यह मन्त्र पढ़ता है क्योंकि मन से ही यज्ञ ताना जाता है । मन से ही किया जाता है। यही उसका (निविद् के सूक्त से आगे निकल जाने में जो भूल हुई उसका) प्रायश्चित्त है। (११) ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका का पहला अध्याय समाप्त

दूसरा अध्याय १२—कहते हैं कि देवताओं के लिये वैश्यों की कल्पना होनी चाहिये । एक छन्द को दूसरे छन्द में रखना चाहिये । प्रातः सवन में होता तीन अक्षर का 'शोंसावोम्' कहता है और अध्वर्यु पांच अक्षर का “'शंसामोदैवोम्” कहता है । इस प्रकार आठ अक्षर हो जाते हैं। आठ अक्षर की गायत्री होती है। इस प्रकार प्रातः सवन में पहले इसको गायत्री बना देते हैं। प्रातः सवन के अन्त में होता चार अक्षरों का “उक्थं वाचि" कहता है । इस पर अध्वर्यु चार अक्षरों का "ओमुक्थशः" कहता है । इस प्रकार प्रातः सवन के आरंभ और अन्त में गायत्री की कल्पना हो जाती है । दोपहर के सवन में होता छः अक्षरों का "अध्वर्योशोंसावोम्” कहता है । इस पर अध्वर्यु पांच अक्षरों का 'शंसामोदैवोम्' कहता है । इस प्रकार ग्यारह अक्षर हो जाते हैं । ग्यारह अक्षरं का त्रिष्टुभ् होता है । इस प्रकार दोपहर के सवन के पहले त्रिष्टुभू की कल्पना हो जाती है। सवन के अन्त में होता सात अक्षरों का "उक्थं वाचि इन्द्राय" कहता है । अध्वर्यु चार ( १७३ )

१७४ [ तीसरी पञ्चिका अक्षरों का “ओ३मुक्थाशाः” कहता है। यह ग्यारह अक्षर हो जाते हैं। ग्यारह अक्षरों का त्रिष्टुभ् होता है। इस प्रकार दोपहर के सवन के आरंभ और अन्त में त्रिष्टुभ् की कल्पना हो जाती है। तीसरे सवन के आरंभ में होता सात अक्षर का “अध्वर्योशो शोंसावोम्” कहता है। अध्वर्यु पांच अक्षर का “शंसामो दैवोम्” कहता है। यह बारह अक्षर हो जाते हैं। बारह अक्षर की जगती होती है। इस प्रकार तृतीय सवन के आदि में जगती छन्द की कल्पना हो जाती है। तृतीय सवन के अन्त में होता ग्यारह अक्षर का “उक्थं वाचि इन्द्राय देवेभ्यः”, अध्वर्यु एक अक्षर का ‘ओम्’ कहता है। इस प्रकार बारह अक्षर हो जाते हैं। बारह अक्षरों की जगती होती है। इस प्रकार तीसरे सवन के आरंभ और अन्त दोनों में जगती की कल्पना की जाती है। ऋषि ने इसको देखा और कहा :— यद् गायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभाद्वा त्रैष्टुभं निरतक्षत। यद् वा जगज् जगत्याहितं पदं य इत्तद् विदुस्ते अमृतत्वमानशुः॥ (ऋ० १।१६४।२३) “जो गायत्री को गायत्री पर, रखना जानते हैं, जिनको ज्ञान है कि त्रिष्टुभ् से त्रिष्टुभ् निकलता है और जगती जगती में रक्खा जाता है वह अमृतत्व को प्राप्त होते हैं।” इस प्रकार जो इस रहस्य को समझता है वह छन्द में छन्द को रखता है और देवताओं के लिये वैश्यों की कल्पना करता है। (१) १३—प्रजापति ने देवों के लिये यज्ञ और छन्दों के भाग अलग अलग कर दिये। उसने प्रातः सवन में अग्नि और वसुओं के लिये गायत्री छन्द दिया। दोपहर के सवन में इन्द्र

दूसरा अध्याय ] १७५ और रुद्रों के लिये त्रिष्टुभ् को, विश्वेदेवों और आदित्यों के लिये तीसरे सवन में जगती को दिया । उसका अपना छन्द अनुष्टुभ् था । उसको उसने अन्तिम मंत्र में जो 'अच्छावाक' का मंत्र है कर दिया । इस पर अनुष्टुभ् ने कहा, "तू देवों में बड़ा पापी है कि तूने अपने ही मुझ अनुष्टुभ् छन्द को अन्त की अच्छावाकीय ऋचा में ढकेल दिया। उसने भूल स्वीकार कर ली और उसने अपना सोम यज्ञ लिया और अनुष्टुभ् को उस के पहले ही अर्थात् मुख पर ही रख दिया । इसलिये सब सवनों में पहले अनुष्टुभ् रखा जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह पहला और मुख्य हो जाता है और श्रेष्ठता को प्राप्त होता है । प्रजापति ने अपने ही सोमयाग में ऐसा किया । इसलिये ऐसा करने से यजमान यज्ञ का स्वामी हो जाता है और यज्ञ ठीक हो जाता है। जब कभी यजमान इस प्रकार यज्ञ का स्वामी होकर यज्ञ करता है वह यज्ञ जनता के लिये होता है। (२) १४—अग्नि देवताओं का होता था । मृत्यु उसके लिये बहिष्पवमान स्तोत्र में बैठा छिपा रहा । अनुष्टुभ् छन्द में आज्य शस्त्र आरंभ करके उसने मृत्यु को जीता। मृत्यु आज्य में छिप रहा । प्र-उग शस्त्र का आरंभ करके उसने मृत्यु को परास्त किया । दोपहर के सवन में वह मृत्यु (अग्नि के लिये) पवमान में बैठा रहा । उसने अनुष्टुभ् के साथ मरुत्वतीय शस्त्र आरंभ करके मृत्यु को जीता। वह उस दोपहर के सवन में बृहती छन्दों में न बैठ सका। क्योंकि बृहती प्राण हैं। इस प्रकार मृत्यु प्राणों को न ले सका। इसीलिये होता दोपहर के सवन में बृहती छन्द में स्तोत्रिय के द्वारा कहता है । बृहती प्राण हैं ऐसा करने का प्रयोजन ही प्राणों की रक्षा है ।

१७६ [ तीसरी पञ्चिका तीसरे सवन में मृत्यु अग्नि के लिये पवमान स्तोत्र में छिपा रहा। अनुष्टुभ् के साथ वैश्वदेव शस्त्र आरंभ करके उसने मृत्यु को जीता। मृत्यु यज्ञायज्ञीय में जा छिपा। वैश्वानरीय अग्नि- मारुत सूक्त का आरंभ करके उसने मृत्यु को जीतां। वैश्वानरीय सूक्त वज्र है। यज्ञायज्ञीय साम प्रतिष्ठा है। वैश्वानरीय सूक्त को पँढ़ कर वह मृत्यु को अपने स्थान से निकाल देता है। मृत्यु के सब पाशों और सब गदाओं ( स्थाणून् ) को पार करके अग्नि छूट आया। जो होता इस रहस्य को समझता है वह सब झंझटों से छूट जाता है और पूरी आयु प्राप्त करता है। (३) १५—इन्द्र ने वृत्र को मार कर यह सोचा कि शायद मैं इसको न हरा सका, और दूर-दूर तक फिरता रहा। यहाँ तक कि वह बहुत दूर देश में पहुँचा। यह सब से दूर जगह अनुष्टुभ् है। वाणी ही अनुष्टुभ् है। वह (इन्द्र) वाणी में प्रवेश करके वहीं पड़ा रहा। सब प्राणी अलग अलग होकर उसको तलाश करते रहे। पितरों ने उसको एक दिन पहले ढूँढ़ लिया और देवों ने एक दिन पीछे। इसीलिये पितरों के लिये कृत्य एक दिन पहले किया जाता है और देवों के लिये एक दिन पीछे। उन्होंने कहा, "हम सोम निचोड़ें। इन्द्र हमारे पास शीघ्र ही आयेगा"। उन्होंने कहा "अच्छा", और सोम निचोड़ा। और नीचे का मंत्र पढ़कर उसको सोम के पास लाये :— आ त्वा रथं यथोतये सुम्नाय वर्तयामसि। तुविकूर्मिमृतीषहमन्द्र शविष्ठ सत्वते ॥ (ऋ० ८।६८।१) नीचे के मंत्र से इन्द्र 'सुत' शब्द के द्वारा देवताओं पर प्रकट हुआ :—

दूसरा अध्याय ] १७५ इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम् । अनाभयिन् ररिमा ते ॥ ( ऋ० ८।२।१ ) नीचे के मन्त्र से उन्होंने उसे यज्ञ के मध्य में बिठायाः— इन्द्र नेदीय एदिहि मितमेधाभिरूतिभिः । आ शन्तम शन्तमाभिर- भिष्टिभिरा स्वापे स्वापिभिः ॥ ( ऋ० ८।५३।५ ) जो इस रहस्य को समझता है अपने यज्ञ को इन्द्र के सामने करता है और इन्द्र के कारण उसका यज्ञ सफल हो जाता है । (४) १६—जब इन्द्र ने वृत्र को मारा तो सब देवताओं ने जाना कि वह मार न सका और वह भाग गये । केवल मरुत् जो उसी के सम्बन्धी हैं न भागे । ऊपर के मंत्र में जो “स्वापयः” “मरुतों” का वर्णन है वह प्राण हैं । प्राणों ने इन्द्र को न छोड़ा । इसलिये 'स्वापि' युक्त प्रगाथ बोला जाता है । अर्थात् “आस्वापे स्वापिभिः” । जब इस प्रगाथ के बाद इन्द्र के लिये मंत्र पढ़ा जाता है तो इसी को “मरुत्वतीय शस्त्र” कहते हैं । यदि 'स्वापि युक्त' यह प्रगाथ बोला जाता है तो “मरुत्वतीय शस्त्र ही बन जाता है” । (५) १७—अब ब्रह्मणस्पति के प्रगाथ को बोलता है । ब्रह्मणस्पति को पुरोहित बनाकर देवों ने स्वर्ग को जीता और इस लोक को भी । इस लिये यजमान भी बृहस्पति को पुरोहित बनाकर स्वर्ग लोक को जीत लेता है और इस लोक को भी । यह दोनों प्रगाथ स्तुति-शून्य होते हैं । उनको दुहरा कर पढ़ा जाता है ( चौथे पाद को तीन-तीन बार पढ़ने से दो मंत्रों के तीन मंत्र या तृच् हो जाते हैं ) । यहाँ कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि जब अन्य कोई मन्त्र स्तुति- शून्य होते हुये दुहराये नहीं जाते तो यह दोनों प्रगाथ स्तुति- शून्य होते हुये क्यों दुहराये जाते हैं ? इसका उत्तर यह है कि जो मरुत्वतीय शस्त्र है, वह पवमान उक्थ वाला है । यह स्तोत्र १२

१७८ [ तीसरी पञ्चिका के छः मंत्रों, बृहती के छः मंत्रों और त्रिष्टुभ् के तीन मंत्रों में गाया जाता है। इस प्रकार दोपहर के सवन के पवमान स्तोत्र में तीन छन्द और पंद्रह मंत्र होते हैं। यहां प्रश्न यह है कि यह तीन छन्दों वाला और पंद्रह मन्त्रों वाला दोपहर के सवन का पवमान अनुशस्त कैसे होता है ! इसका उत्तर यह है कि प्रतिपद् तृच् ( ऋ० ८।६८।१-३ ) की अन्तिम दो ऋचायें गायत्री छन्द में हैं ( पहली ऋचा अनुष्टुभ् में है ) और प्रतिपद् के पीछे के मंत्र भी गायत्री छन्द में हैं। इस प्रकार पवमान स्तोत्र के गायत्री मंत्र अनुशस्त हो जाते हैं। इन दोनों प्रगाथों द्वारा बृहती अनुशस्त होती हैं। इन बृहती मंत्रों को सामगान करने वाले रौरव और यौधा- जय स्वरों में तीन बार दोहरा कर पढ़ते हैं। इसलिये ये दो प्रगाथ स्तुति-शून्य होकर भी दोहरा कर पढ़े जाते हैं। इस प्रकार शस्त्र स्तोत्र के अनुकूल हो जाता है। दो धाय्य त्रिष्टुभ् में हैं और निविद् का सूक्त भी। इन मंत्रों से त्रिष्टुभ् अनुशस्त होते हैं। इस प्रकार जो इस रहस्य को समझता है उसके लिये तीन छंद और पंद्रह मंत्रों वाले पवमान अनुशस्त होते हैं। (६) १८—वह धाय्यों को पढ़ता है। प्रजापति ने धाय्यों के द्वारा इन लोकों में जिस जिस चीज़ की कामना की उसका पान किया ( अधयत् ) । इसी प्रकार जो यजमान इस रहस्य को समझता है वह इन धाय्यों के द्वारा जिस जिस कामना को करता है उसका इन लोकों में पान करता है ( धयति ) ( धय से धाय्य बना है ) । धाय्य क्या हैं ? जहाँ जहाँ देवों ने यज्ञ में छिद्र पाये वहां उनको धाय्यों से छिपा दिया। इस लिये उनको धाय्य कहते