ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड १ ] \t\t शाङ्करभाष्यार्थ \t\t १९
खण्ड १ ] \t\t शाङ्करभाष्यार्थ \t\t १९ “यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्” | क्योंकि “जहाँ इसके लिये सब कुछ (बृ० उ० २।४।१४) इत्य- | आत्मा ही हो गया है” इस प्रकार धिकृत्य क्रियाकारकफलादि- | आरम्भ करके विद्वान्के लिये क्रिया, सर्वव्यवहारनिराकरणाद्विदुषः । | कारक और फल आदि सम्पूर्ण तद्विपरीतस्याविदुषो “यत्र हि | व्यवहारका निराकरण किया है । द्वैतमिव” (बृ० उ० २।४। | तथा उसके विपरीत अविद्वान्के १४) इत्युक्त्वा क्रियाकारक- | लिये वाजसनेयिब्राह्मणमें “जहाँ कि फलरूपस्यैव संसारस्य दर्शित- | द्वैतके समान होता है” ऐसा कहकर त्वाच्च वाजसनेयिब्राह्मणे । तथे- | क्रिया, कारक और फलरूप संसार- हापि देवताख्यं संसारविषयं | विषयको प्रदर्शित किया है । इसी यत्फलमशनायादिमद्वस्त्वात्मकं | प्रकार यहाँ ( ऐतरेयोपनिषद्में ) तत्फलमुपसंहृत्य केवलं सर्वात्म- | भी जो क्षुधा-पिपासादियुक्त वस्तुरूप कवस्तुविषयं ज्ञानममृतत्वाय | संसारविषयक देवताख्यसंज्ञक फल वक्ष्यामीति प्रवर्तते । | है उसका उपसंहार कर अब केवल ऋणप्रतिबन्धश्चाविदुष एव | सर्वात्मक वस्तुविषयक ज्ञानका ही [ऋणप्रतिबन्ध-] मनुष्यपितृदेवलोक- | अमरत्व-प्राप्तिके लिये वर्णन करूँगी [विचारः] प्राप्तिं प्रति, न | —ऐसे अभिप्रायसे श्रुति प्रवृत्त विदुषः । “सोऽयं मनुष्यलोकः | होती है । पुत्रेणैव०” (बृ० उ० १।५। | तथा देवलोक, पितृलोक और १६ ) इत्यादिलोकत्रयसाधन- | मनुष्यलोककी प्राप्तिमें ऋणोंका प्रति- नियमश्रुतेः । विदुषश्च ऋणप्रति- | बन्ध तो अज्ञानीके ही लिये है, ज्ञानीके | लिये नहीं, जैसा कि “उस इस मनुष्य- | लोकको पुत्रके द्वारा ही [ जीता | जा सकता है ]” इत्यादि लोकत्रयकी | प्राप्तिके साधनका नियम करनेवाली | श्रुतिसे सिद्ध होता है । तथा आत्म- | लोकके इच्छुक विद्वान्के लिये
२० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
[मूल एवं संस्कृत-टीका]
बन्धाभावो दर्शित आत्मलोका- र्थिनः “किं प्रजया करिष्यामः” (बृ० उ० ४ । ४ । २२) इत्यादिना । तथा “एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुर्ऋषयः काव- षेयाः” इत्यादि । “एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वांसोऽग्निहोत्रं न जुह- वाञ्चक्रुः” (कौषी० २।५) इति च कौषीतकिनाम् । अस्त्विदं तर्हि ऋणानपाकरणे पारिव्राज्यानुपपत्तिरिति चेत् ? न; प्राग्गार्हस्थ्यप्रतिपत्तेर्ऋणि- त्वासंभवात् । अधिकाराना- रूढोऽप्यृणी चेत्स्यात् सर्वस्य ऋणित्वमित्यनिष्टं प्रसज्येत। प्रति- पन्नगार्हस्थ्यस्यापि “गृहाद्वनी भूत्वा प्रव्रजेद्यदि वेतरथा ब्रह्म- चर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा” (जा० उ० ४) इत्यात्मदर्शनो- पायसाधनत्वेनेष्यत एव पारिव्रा-
[हिन्दी-अनुवाद]
“हम प्रजासे क्या करेंगे ?” इत्यादि वाक्योंद्वारा ऋणोंके प्रतिबन्धका अभाव दिखलाया है । इसी प्रकार “वे प्रसिद्ध आत्मवेत्ता कावषेय ऋषि बोले-[ मैं अध्ययन कैसे करूँ ? होम कैसे करूँ ?]” इत्यादि श्रुति है तथा ऐसी ही “उस इस आत्मतत्त्वको जाननेवाले पूर्ववर्ती विद्वान् अग्निहोत्र नहीं करते थे” यह कौषीतकी शाखाकी श्रुति है। पूर्व०-तब विद्वान्के लिये तो ऋणोंका परिशोध बिना किये संन्यास करना बन नहीं सकता ? सिद्धान्ती-यह बात नहीं है, क्योंकि गृहस्थाश्रमकी प्राप्तिसे पूर्व तो ऋणित्व ही असम्भव है। यदि अधिकारासढ न हुआ पुरुष भी ऋणी हो सकता है तो सभीका ऋणी होना सिद्ध होगा और इस प्रकार बड़ा अनिष्ट प्राप्त होगा । जो गृहस्थाश्रम- को प्राप्त हो गया है उस पुरुषके लिये भी “गृहस्थाश्रमसे वानप्रस्थ होकर संन्यास करे अथवा [ इस क्रमको छोड़कर ] अन्य प्रकारसे यानी ब्रह्मचर्यसे, गृहस्थाश्रमसे अथवा वानप्रस्थाश्रमसे ही संन्यास कर दे” इत्यादि श्रुतियोंद्वारा आत्म- दर्शनके साधनके उपायरूपसे
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१
ज्यम् । यावज्जीवादिश्रुतीनाम- संन्यास प्राप्त हो ही जाता है । विद्वदमुमुक्षुविषये अविद्वान् और अमुमुक्षु पुरुषोंके यावज्जीवादि- विषयमें "यावज्जीवन अग्निहोत्र करे" श्रुतीनाम- कृतार्थता। छान्दोग्ये विद्वद्विषयत्वम् इत्यादि श्रुतियोंकी भी कृतार्थता है । च केषांचिद् द्वादश- छान्दोग्यमें तो किन्हीं-किन्हींके लिये रात्रमग्निहोत्रं हुत्वा तत ऊर्ध्वं बारह रात्रि अग्निहोत्र करके तदनन्तर परित्यागः श्रूयते । उसका परित्याग करना सुना जाता है । यत्त्वनधिकृतानां पारिव्राज्य- और तुमने जो कहा कि जिन्हें संन्यासस्य मिति, तन्न, तेषां कर्मका अधिकार नहीं है उन्हींके कर्मानधिकारि- पृथगेव "उत्सन्ना- लिये संन्यासका विधान है, सो विषयत्वनिरासः ग्निरनग्निको वा" ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उनके विषयमें "उत्सन्नाग्निरनग्निको वा" * इत्यादिश्रवणात् । सर्वस्मृतिषु इत्यादि अलग ही श्रुति है । तथा चाविशेषेणाश्रमविकल्पः प्रसिद्धः समस्त स्मृतियोंमें भी आश्रमोंका समुच्चयश्च । विकल्प १ और समुच्चय सामान्यरूपसे प्रसिद्ध ही है । यत्तु विदुषोऽर्थप्राप्तं व्युत्थान- तथा यह जो कहा कि विद्वान्- व्युत्थानविधि- मित्यशास्त्रार्थत्वे, को जो कर्मत्यागकी स्वतः प्राप्ति विचारः गृहे वने वा बतलायी है, सो शास्त्रका विषय न होनेके कारण उसके घर या वनमें तिष्ठतो न विशेष इति, रहनेमें कोई विशेषता नहीं है;
- जिसके अग्निहोत्रकी अग्नि प्रमादवश शान्त हो गयी है अथवा जिसने अग्निका परिग्रह नहीं किया है । १. क्रमकी अपेक्षा न करके जिस आश्रमसे संन्यास लेनेकी इच्छा हो उसीसे ले लेना । २. एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें क्रमानुसार जाना ।
२२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ तदसद्; व्युत्थानस्यैवार्थ- | ऐसा कहना ठीक नहीं । प्राप्तत्वान्नान्यत्रावस्थानं स्यात् । | व्युत्थानके स्वतः प्राप्त होनेके कारण ही उसकी अन्यत्र [ यानी अन्यत्रावस्थानस्य कामकर्म- | गृहस्थाश्रममें ] स्थिति नहीं हो सकती । अन्यत्र स्थितिको तो हमने प्रयुक्तत्वं ह्यवोचाम, तदभाव- | कामना और कर्मसे प्रेरित ही बतलाया है; और उसके अभावको मात्रं व्युत्थानमिति च । | ही व्युत्थान कहा है । यथाकामित्वं तु विदुषोऽत्यन्त- | स्वेच्छाचार तो अत्यन्त मूढ़का [विदुषो यथा-] मप्राप्तं अत्यन्तमूढ- | विषय समझा गया है, इसलिये विद्वान् [कामित्वनिषेधः] विषयत्वेनावगमात् । | के लिये वह अत्यन्त अप्राप्त है। तथा विद्वान्के लिये तो अत्यन्त भाररूप तथा शास्त्रचोदितमपि कर्म | होनेके कारण शास्त्रोक्त कर्मकी भी आत्मविदोऽप्राप्तं गुरुभारताव- | अप्राप्ति समझी जाती है । फिर गम्यते । किमुतात्यन्ताविवेक- | अत्यन्त अविवेकके कारण होनेवाले स्वेच्छाचारकी तौ बात ही क्या है? निमित्तं यथाकामित्वम् । न हि | उन्माद अथवा तिमिररोगसे दूषित उन्मादतिमिरदृष्ट्युपलब्धं वस्तु | दृष्टिद्वारा उपलब्ध हुई वस्तु उसके निवृत्त हो जानेपर भी वैसी ही तदपगमेऽपि तथैव स्यात् । | नहीं रहती, क्योंकि वह तो उन्माद उन्मादतिमिरदृष्टिनिमित्तत्वादेव | अथवा तिमिरदृष्टिके कारण ही वैसी प्रतीत होती है । अतः यह तस्य । तस्मादात्मविदो व्यु- | सिद्ध हुआ कि आत्मवेत्ताके लिये त्थानव्यतिरेकेण न यथाकामित्वं | व्युत्थानको छोड़कर न तो स्वेच्छा-चार ही है और न कोई अन्य न चान्यत्कर्तव्यमित्येतत्सिद्धम् । | कर्तव्य ही शेष रहता है ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३
| मूल एवं भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| यत्तु—“विद्यां चाविद्यां च<br><sub>[हाशिया: विदुषो ज्ञानकर्म-समुच्चयानुपपत्तिः]</sub> यस्तद्वेदोभयँसह” ( ई० उ० ११ ) इति न विद्यावतो विद्यया सहाविद्यापि वर्तते इत्ययमर्थः; कस्तर्हि एकस्मिन्पुरुषे एते एकदैव न सह संबध्येयातामित्यर्थः । यथा शुक्तिकायां रजतशुक्तिकाज्ञाने एकस्य पुरुषस्य । “दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता” ( क० उ० १ । २ । ४ ) इति हि काठके । तस्मान्न विद्यायां सत्यामविद्यासंभवोऽस्ति । | तथा ऐसा जो कहा है कि “जो पुरुष विद्या और अविद्या दोनोंको साथ-साथ जानता है” वह इसलिये नहीं है कि विद्वान्में विद्याके साथ अविद्या भी रहती है। तो फिर उसका क्या प्रयोजन है ? उसका तात्पर्य तो यही है कि एक ही पुरुषमें ये दोनों साथ-साथ नहीं रह सकते; जिस प्रकार कि सीपीमें एक पुरुषको [ एक ही समय ] चाँदी और सीपी दोनोंका ज्ञान नहीं हो सकता । कठोपनिषद्में भी कहा है—“जो विद्या और अविद्या नामसे जानी जाती हैं वे परस्पर अत्यन्त विपरीत (विरुद्ध स्वभाववाली) हैं ।” अतः विद्याके रहते हुए अविद्याका रहना किसी प्रकार सम्भव नहीं है । |
| “तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व” ( तै० उ० ३ । २ ) इत्यादि-श्रुतेः, तपआदि विद्योत्पत्तिसाधनं गुरुपासनादि च कर्म अविद्यात्मकत्वादविद्योच्यते तेन विद्यामुत्पाद्य मृत्युं काममतितरति । ततो निष्कामस्त्यक्तैषणो ब्रह्मविद्यया अमृतत्वमश्नुत इत्ये- | “तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर” इत्यादि श्रुतिके अनुसार तप आदि विद्योत्पत्तिके साधन और गुरुकी उपासना आदि कर्म अविद्यामय होनेके कारण 'अविद्या' कहे जाते हैं । उस अविद्यारूप कर्मसे विद्याको उत्पन्न करके वह मृत्यु यानी कामनाको पार कर जाता है। तब वह निष्काम और एषणामुक्त पुरुष ब्रह्मविद्यासे अमरत्व प्राप्त कर लेता है— |
२४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
२४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ तमर्थं दर्शयन्नाह—"अविद्यया | इसी अर्थको प्रदर्शित करते हुए कहते मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते" | हैं कि "अविद्यासे मृत्युको पारकर (ई० उ० ११) इति । | विद्यासे अमरत्व प्राप्त कर लेता है।" यत्तु पुरुपायुः सर्वं कर्मणैव | "कर्म करते हुए ही सौ वर्षतक [उपसंहारः] व्याप्तं "कुर्वन्नेवेह | जीवित रहनेकी इच्छा करे" इस कर्माणि जिजीवि- | मन्त्रद्वारा जो यह कहा गया था कि षेच्छत्ँ समाः" (ई० उ० २) | पुरुषकी सारी आयु कर्मसे ही व्याप्त है इति तदविद्वद्विषयत्वेन परिहृत- | उसका 'वह अविद्वान्से सम्बन्ध रखने- मितरथासंभवात् । यत्तु वक्ष्य- | वाला है'—ऐसा बतलाकर खण्डन कर माणमपि पूर्वोक्ततुल्यत्वात्कर्म- | दिया गया, क्योंकि अन्य प्रकार वैसा णाविरुद्धमात्मज्ञानमिति, तत्स- | होना असम्भव है । तथा तुमने जो विशेषनिर्विशेषतात्मतया प्रत्युक्तम्, | कहा था कि आगे कहा जानेवाला उत्तरत्र व्याख्याने च दर्शयि- | आत्मज्ञान भी पूर्वोक्त [श्रुतिकथित] ष्यामः । अतः केवलनिष्क्रिय- | ज्ञानके तुल्य होनेके कारण कर्मसे ब्रह्मात्मैकत्वविद्यादर्शनार्थमुत्तरो | अविरुद्ध ही है उस कथनको भी ग्रन्थ आरभ्यते— | सविशेष और निर्विशेष आत्मविषयक | बतलाकर खण्डन कर चुके हैं और | आगेकी व्याख्यामें इसका दिग्दर्शन भी | करायेंगे। अब यहाँसे केवल निष्क्रिय | ब्रह्म और आत्माकी एकताका ज्ञान | प्रदर्शित करनेके लिये आगेका ग्रन्थ | आरम्भ किया जाता है— आत्माके ईक्षणपूर्वक सृष्टि ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् । नान्य- त्किंचन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥ १ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पहले यह [ जगत् ] एकमात्र आत्मा ही था; उसके सिवा और कोई सक्रिय वस्तु नहीं थी । उसने यह सोचा कि 'लोकोंकी रचना करूँ' ॥ १ ॥ आत्मा आप्नोतेरत्तेरततेर्वा | [व्याप्तिबोधक] 'आप्',[भक्षणा- परः सर्वज्ञः सर्वशक्तिरशनाया- | र्थक] 'अद्' अथवा [सतत गमन- | बोधक ] 'अत्' धातुसे 'आत्मा' दिशर्वसंसारधर्मवर्जितो नित्य- | शब्द निष्पन्न हुआ है । यह जो | नाम, रूप और कर्मके भेदसे विविध- शुद्धबुद्धमुक्तस्वभावोऽजोऽजरो- | रूप प्रतीत होनेवाला जगत् कहा गया | है वह पहले यानी संसारकी सृष्टिसे ऽमरोऽमृतोऽभयोऽद्वयो वै; इदं | पूर्व सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, | क्षुधा-पिपासा आदि सम्पूर्ण सांसारिक यदुक्तं नामरूपकर्मभेदभिन्नं जग- | धर्मोंसे रहित, नित्य-शुद्ध-बुद्ध- दात्मैवैकोऽग्रे जगतः सृष्टेः | मुक्तस्वभाव, अजन्मा, अजर, अमर, | अमृत, अभय और अद्वयरूप आत्मा प्रागासीत् । | ही था । किं नेदानीं स एवैकः ? | पूर्व०-क्या इस समय भी एक- | मात्र वही नहीं है ? न । | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है। कथं तर्ह्यासीदित्युच्यते ? | पूर्व०-तो फिर 'आसीत् (था)' | ऐसा क्यों कहा है ? यद्यपीदानीं स एवैकस्तथा- | सिद्धान्ती-यद्यपि इस समय भी | अकेला वही है तो भी कुछ विशेषता प्यस्ति विशेषः । प्रागुत्पत्तेरव्या- | अवश्य है । [वह विशेषता यही | है कि ] उत्पत्तिसे पूर्व यह कृतनामरूपभेदमात्मभूतमात्मैक- | जगत् नाम-रूपादि भेदके व्यक्त न | होनेके कारण आत्मभूत और एक शब्दप्रत्ययगोचरं जगदिदानीं | 'आत्मा' शब्दकी प्रतीतिका ही ऐतरेयो० २—
२६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
व्याकृतनामरूपभेदत्वादनेकश्- | विषय था और इस समय नाम- ब्दप्रत्ययगोचरमात्मैकशब्दप्रत्य- | रूपादि भेदके व्यक्त हो जानेसे वह अनेक शब्दोंकी प्रतीतिका विषय यगोचरं चेति विशेषः । | तथा एकमात्र ‘आत्मा’ शब्दकी प्रतीतिका विषय भी हो रहा है ; यथा सलिलात्पृथक्फेननाम- | जिस प्रकार जलसे पृथक् फेनके नाम और रूपकी अभिव्यक्ति होनेसे रूपव्याकरणात्प्राक्सलिलैकशब्द- | पूर्व फेन एकमात्र ‘जल’ शब्दकी प्रतीतिक ही विषय था; किन्तु जिस प्रत्ययगोचरमेव फेनम्, यदा | समय वह जलसे अलग नाम और रूप- सलिलात्पृथङ्नामरूपभेदेन व्या- | के भेदसे व्यक्त हो जाता है उस समय कृतं भवति तदा सलिलं फेनं | वह फेन ‘जल’ और ‘फेन’ इस प्रकार अनेक शब्दोंकी प्रतीतिका विषय चेत्यनेकशब्दप्रत्ययभाक्सलिल- | तथा केवल ‘जल’ इस एक शब्द- मेवेति चैकशब्दप्रत्ययभाक्च | की प्रतीतिका विषय भी हो जाता है; उसी प्रकार [ उपर्युक्त भेद भी फेनं भवति तद्वत् । | समझना चाहिये ] । नान्यत्किंचन न किंचिदपि | उसके सिवा अन्य कोई व्यापार- मिषन्निमिषद् व्यापारवदितरद्वा । | युक्त अथवा निष्क्रिय वस्तु नहीं थी । यथा सांख्यानामात्मपक्षपाति | जिस प्रकार सांख्यवादियोंके मतमें आत्मासे अतिरिक्त स्वतन्त्र प्रधान स्वतन्त्रं प्रधानं यथा च काणा- | था, तथा कणादमतावलम्बियोंके दानामणवो न तद्वदिहान्य- | विचारमें परमाणु थे उस प्रकार इस (औपनिषद सिद्धान्त) में आत्मासे दात्मनः किंचिदपि वस्तु विद्यते । | अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं थी । किं तर्हि ? आत्मैवैक आसीदित्य- | तो फिर क्या था ? एकमात्र आत्मा भिप्रायः । | ही था—यह इसका अभिप्राय है ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७ स सर्वज्ञस्वाभाव्याद् आत्मा | सर्वज्ञस्वभाव होनेके कारण एक एव सन्नीक्षत । ननु प्रागु- | उस आत्माने अकेले होते हुए ही त्पत्तेरकार्यकरणत्वात्कथमीक्षित- | ईक्षण (चिन्तन) किया। यदि वान् । नायं दोषः, सर्वज्ञस्वाभा- | कहो कि जगत्की उत्पत्तिसे पूर्व व्यात्; तथा च मन्त्रवर्णः- | कार्य और करणका अभाव रहते "अपाणिपादो जवनो ग्रहीता" | हुए भी उसने किस प्रकार ईक्षण (श्वे० उ० ३ । १९) इत्यादिः। | किया ? तो यह कोई दोषकी बात केनाभिप्रायेणेत्याह-लोकान् | नहीं है, क्योंकि वह आत्मा स्वभाव- अम्भःप्रभृतीन् प्राणिकर्मफलोप- | से ही सर्वज्ञ है। इस विषयमें "हाथ- भोगस्थानभूतान्नु सृजै सृजेऽह- | पाँववाला न होकर भी वेगवान् और मिति ॥ १ ॥ | ग्रहण करनेवाला है" इत्यादि मन्त्र- वर्ण भी है। उसने किस अभिप्रायसे ईक्षण किया ? इसपर श्रुति कहती है-'मैं प्राणियोंके कर्मफलोपभोगके आश्रयभूत अम्भ आदि लोकोंकी रचना करूँ' इस प्रकार ईक्षण किया ॥ १ ॥
सृष्टिक्रम
एवमीक्षित्वा आलोच्य— | इस प्रकार ईक्षण यानी आलोचना करके—
स इमाँल्लोकानसृजत । अम्भो मरीचीर्मरमापो- दोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः ॥ २ ॥
२८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
२८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ उसने अम्भ, मरीचि, मर और आप्—इन लोकोंकी रचना की। जो द्युलोकसे परे है और स्वर्ग जिसकी प्रतिष्ठा है वह 'अम्भ' है, अन्तरिक्ष (भुवर्लोक) 'मरीचि' है, पृथिवी 'मर-लोक' है और जो [पृथिवीके] नीचे है वह 'आप' है ॥ २ ॥ स आत्मेमाँल्लोकानसृजत | उस आत्माने इन लोकोंकी रचना की। जिस प्रकार इस लोकमें सृष्टवान् । यथेह बुद्धिमांस्तक्षादि- | बुद्धिमान् शिल्पकार आदि 'मैं इस प्रकारके महल आदि बनाऊँ' रेवंप्रकारान्प्रासादादीन्सृज इति | ऐसा विचार करके उस विचारके ईक्षित्वेक्षानन्तरं प्रासादादीन्सृज- | अनन्तर ही महल आदिकी रचना करते हैं उसी प्रकार [उसने ईक्षण ति तद्वत् । | करके इन लोकादिकी रचना की] । ननु सोपादानस्तक्षादिः प्रा- | शंका—शिल्पकारादि तो उन महल आदिकी उपादान सामग्रीसे सादादीन्सृजतीति युक्तं निरुपा- | युक्त होते हैं इसलिये वे महल आदिकी रचना करते हैं—ऐसा कहना दानस्त्वात्मा कथं लोकान् | ठीक ही है; किन्तु उपादान (सामग्री) से रहित आत्मा किस प्रकार सृजति ? | लोकोंकी रचना करता है ? नैष दोषः; सलिलफेनस्था- | समाधान—यह कोई दोष नहीं [निरुपादानस्य] नीये आत्मभूते | है, क्योंकि जलमें [व्यक्त न हुए] [आत्मनः सृष्टि-] नामरूपे अव्याकृते | फेनस्थानीय अव्याकृत नाम और [कर्तृत्वम्] रूप, जो आत्मस्वरूप और एकमात्र आत्मैकशब्दवाच्ये | 'आत्मा' शब्दके ही वाच्य हैं, व्याकृतफेनस्थानीयस्य जगतः | व्याकृत फेनस्वरूप जगत्के उपादान उपादानभूते संभवतः । तस्माद् | हो सकते हैं। अतः वह सर्वज्ञ
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
आत्मभूतनामरूपोपादानभूतः | आत्मा अपने आत्मभूत नाम और सन्सर्वज्ञो जगन्निर्मिमीत इत्य- | रूपका उपादानस्वरूप होकर जगत्- विरुद्धम् । | की रचना करता है—इसमें कोई | विरोध नहीं है । अथवा, यथा विज्ञानवान्मा- | अथवा जिस प्रकार बुद्धियुक्त यावी निरुपादान आत्मानमेव | मायावी कोई उपादान न होनेपर आत्मान्तरत्वेनाकाशेन गच्छन्त- | भी स्वयं अपनेहीको अपने अन्यरूपसे मिव निर्मिमीते, तथा सर्वज्ञो | आकाशमें चलता हुआ-सा बना लेता देवः सर्वशक्तिर्महामाय आत्मान- | है, उसी प्रकार वह सर्वशक्तिमान्, मेवान्तरत्वेन जगद्रूपेण नि- | महामायावी, सर्वज्ञ देव अपनेहीको र्मिमीत इति युक्ततरम् । एवं च | जगत्-रूप अपने अन्य स्वरूपसे रच सति कार्यकारणोभयासद्वाद्यादि- | लेता है—यह बहुत युक्तियुक्त ही पक्षाश्च न प्रसज्यन्ते सुनिरा- | है । ऐसा होनेपर कार्य और कारण- कृताश्च भवन्ति । | इन दोनोंको असत् बतलानेवालोंके | [असद्वाद आदि] पक्षोंकी प्राप्ति नहीं | होती, और उनका पूर्णतया निरा- | करण हो जाता है । कांल्लोकानसृजतेत्याह- | उसने किन लोकोंकी रचना [आत्मसृष्ट- अम्भो मरीचीर्मरमाप | की ? इसपर कहते हैं—अम्भ, लोकाख्यानम् इति । आकाशादि- | मरीची, मर और आप आदिकी । क्रमेण अण्डमुत्पाद्याम्भःप्रभृतीन् | उसने आकाशादि क्रमसे अण्डको लोकानसृजत । तत्राम्भःप्रभृतीन् | उत्पन्न कर अम्भ आदि लोकोंकी स्वयमेव व्याचष्टे श्रुतिः । | रचना की । उन अम्भ आदि लोकों- | की श्रुति स्वयं ही व्याख्या करती है । अदस्तदम्भःशब्दवाच्यो लोकः, | अदः—वह 'अम्भ' शब्दसे कहा परेण दिवं द्युलोकात्परेण पर- | जानेवाला लोक है, जो द्युलोकसे स्तात्; सोऽम्भःशब्दवाच्यः, अम्भो- | परे है; वह जल (मेघों) को धारण
३० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
३० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ भरणात् । द्यौः प्रतिष्ठाश्रयस्तस्या- | करनेवाला होनेसे 'अम्भ' शब्दसे | कहा जाता है। उस अम्भलोकका म्भसो लोकस्य । द्युलोकादधस्ता- | द्युलोक प्रतिष्ठा यानी आश्रय है। | द्युलोकसे नीचे जो अन्तरिक्ष है वह दन्तरिक्षं यत्तन्मरीचयः । ए- | मरीचि लोक है। वह एक होनेपर भी | अनेकों स्थानभेदोंके कारण 'मरीचयः' कोऽप्यनेकस्थानभेदत्वाद्वहुवच- | इस प्रकार बहुवचनरूपसे प्रयुक्त नभाक्-मरीचय इति; मरीचि- | हुआ है। अथवा किरणोंसे सम्बन्धित | होनेके कारण वह 'मरीचि' कह- भिर्वा रश्मिभिः सम्बन्धात् । पृथिवी | लाता है। पृथिवी 'मर' है, क्योंकि | उसमें प्राणी मरते हैं। जो लोक मरो म्रियन्तेऽस्मिन् भूतानीति । | पृथिवीसे नीचेकी ओर हैं वे 'आप' | कहलाते हैं, क्योंकि 'अप्' शब्द या अधस्तात् पृथिव्यास्ता आप | [नीचेके लोकोंमें रहनेवाले प्राणियों- | द्वारा प्राप्य होनेके कारण प्राप्तिरूप उच्यन्ते; आप्नोतेः, लोकाः । यद्यपि | अर्थवाले ] 'आप्' धातुसे बना हुआ | है। यद्यपि सभी लोक पञ्चभूतमय पञ्चभूतात्मकत्वं लोकानां तथा- | हैं तथापि अम्भ, मरीचि, मर और प्यब्बाहुल्यादब्नामभिरेवाम्भो | आप-ये लोक आप (जल) की | अधिकता होनेके कारण 'आप' मरीचीर्मरमाप इत्युच्यन्ते ॥२॥ | ही कहे जाते हैं ॥ २ ॥ पुरुषरूप लोकपालकी रचना सर्वप्राणिकर्मफलोपादानाधि- | सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मफलरूप ष्ठानभूतांश्चतुरो लोकान् सृष्ट्वा- | उपादानके अधिष्ठानभूत चारों | लोकोंकी रचना कर- स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत् ॥ ३ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
उसने ईक्षण (विचार) किया कि—'ये लोक तो तैयार हो गये, अब लोकपालोंकी रचना करूँ'—ऐसा सोचकर उसने जलमेंसे ही एक पुरुष निकालकर अवयवयुक्त किया ॥ ३ ॥
स ईश्वरः पुनरेवेक्षत । इमे नु | उस ईश्वरने फिर भी ईक्षण अम्भःप्रभृतयो मया सृष्टा लोकाः | (विचार) किया । मेरे रचे हुए ये परिपालयितृवर्जिता विनश्येयुः; | अम्भ आदि लोक बिना किसी तस्मादेषां रक्षणार्थं लोकपालाँ- | रक्षकके नष्ट हो जायँगे । अतः इनकी ल्लोकानां पालयितॄन्नु सृजै | रक्षाके लिये मैं लोकपालोंकी— सृजेऽहमिति । | लोकोंकी रक्षा करनेवालोंकी रचना करूँ । एवमीक्षित्वा सोऽद्भ्य एव | ऐसा सोच कर उसने जलसे— अप्रधानेभ्य एव पञ्चभूतेभ्यो | जलप्रधान पञ्चभूतोंसे अर्थात् जिनसे येभ्योऽम्भःप्रभृतीन्ससृजांस्तेभ्य | उसने अम्भ आदि लोकोंकी रचना एवेत्यर्थः । पुरुषं पुरुषाकारं | की थीं उन्हींसे पुरुष यानी शिर और शिरःपाण्यादिमन्तं समुद्धृत्य | हाथ आदि वाले पुरुषाकारको, जिस अद्भ्यः समुपादाय मृत्पिण्डमिव | प्रकार कुम्हार पृथिवीसे मिट्टीका पिण्ड कुलालः पृथिव्याः, अमूर्च्छयत् | निकालता है, उसी प्रकार निकाल- मूर्च्छितवान् संपिण्डितवान् स्वाव- | कर मूर्च्छित किया अर्थात् अवयवोंकी यवसंयोजनेनेत्यर्थः ॥ ३ ॥ | योजना कर उसको बढ़ाया ॥ ३ ॥
इन्द्रियगोलक, इन्द्रिय और इन्द्रियाधिष्ठाता देवताओंकी उत्पत्ति तमभ्यतपत्तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं मुखाद्वाग्वाचोऽग्निर्नासिके निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुरक्षिणी निरभिद्येतामक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुष आदित्यः
३२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
३२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
कर्णौ निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्राद्दिशस्त्वङ्निर- भिद्यत त्वचो लोमानि लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा नाभिर्निरभिद्यत नाभ्या अपानोऽपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत शिश्नाद्रेतो रेतस आपः ॥ ४ ॥
उस विराट् पुरुषके उद्देश्यसे ईश्वरने संकल्प किया । उस संकल्प किये पिण्डसे अण्डेके समान मुख उत्पन्न हुआ । मुखसे वाक् और वागिन्द्रियसे अग्नि उत्पन्न हुआ । [ फिर ] नासिकारन्ध्र प्रकट हुए, नासिकारन्ध्रोंसे प्राण हुआ और प्राणसे वायु । [ इसी प्रकार ] नेत्र प्रकट हुए तथा नेत्रोंसे चक्षु-इन्द्रिय और चक्षुसे आदित्य उत्पन्न हुआ । [ फिर ] कान उत्पन्न हुए तथा कानोंसे श्रोत्रेन्द्रिय और श्रोत्रसे दिशाएँ प्रकट हुईं । [ तदनन्तर ] त्वचा प्रकट हुई तथा त्वचासे लोम और लोमोंसे ओषधि एवं वनस्पतियाँ उत्पन्न हुईं । [ इसी प्रकार ] हृदय उत्पन्न हुआ तथा हृदयसे मन और मनसे चन्द्रमा प्रकट हुआ । [ फिर ] नाभि उत्पन्न हुई तथा नाभिसे अपान और अपानसे मृत्युकी अभिव्यक्ति हुई । [ तदनन्तर ] शिश्न प्रकट हुआ तथा शिश्नसे रेतस् और रेतस्से आप उत्पन्न हुआ ।
तं पिण्डं पुरुषविधमुद्दिश्याभ्य- तपत्। तदभिध्यानं संकल्पं कृतवा- नित्यर्थः; “यस्य ज्ञानमयं तपः” (मु०उ० १।१।९) इत्यादिश्रुतेः। तस्याभितप्तस्येश्वरसंकल्पेन तप- साभितप्तस्य पिण्डस्य मुखं निर- भिद्यत मुखाकारं सुषिरमजायत यथा पक्षिणोऽण्डं निर्भिद्यत उस पुरुषाकार पिण्डके उद्देश्य- से ईश्वरने तप किया । अर्थात् उसका अभिध्यान यानी संकल्प किया, जैसा कि “जिसका तप ज्ञानमय है” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। उस अभितप्त—ईश्वरके संकल्परूप तपसे तपे हुए पिण्डका मुख प्रकट हुआ अर्थात् उसमें मुखाकार छिद्र इस प्रकार उत्पन्न हो गया जैसे कि पक्षीका अण्डा फट जाता है । उस
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
एवम् । तस्मान्निर्भिन्ना- | छिद्ररूप मुखसे वाक्-इन्द्रिय उत्पन्न न्मुखाद्वाकरणमिन्द्रियं निरवर्तत; | हुई और उस वाक् से वाणीका तदधिष्ठाताग्निस्ततो वाचो लोक- | अधिष्ठाता लोकपाल अग्नि हुआ । पालः । तथा नासिके निरभिद्ये- | इसी प्रकार नासिकारन्ध्र उत्पन्न हुए, ताम् । नासिकाभ्यां प्राणः, | उन नासिकारन्ध्रोंसे प्राण और प्राणाद्वायुः, इति सर्वत्राधिष्ठानं | प्राणसे वायु हुआ । इस प्रकार सभी करणं देवता च त्रयं क्रमेण | जगह इन्द्रियगोलक, इन्द्रिय और निर्भिन्नमिति । अक्षिणी कर्णौ | उसके अधिष्ठाता देव-ये तीनों ही त्वग् हृदयमन्तःकरणाधिष्ठानम्, | क्रमशः उत्पन्न हुए । दो नेत्र, दो मनोऽन्तःकरणम् । नाभिः सर्व- | कान और त्वचा [-ये इन्द्रियस्थान प्राणबन्धनस्थानम्। अपानसंयुक्त- | हैं], हृदय अन्तःकरणका अधिष्ठान त्वादपान इति पाय्विन्द्रियमुच्यते। | है और मन अन्तःकरण है। नाभि तस्मात् तस्याधिष्ठात्री देवता | सम्पूर्ण प्राणोंके बन्धनका स्थान है। मृत्युः । यथान्यत्र, तथा शिश्नं | अपान वायुयुक्त होनेके कारण पायु निरभिद्यत प्रजननइन्द्रियस्थानम् । | इन्द्रिय अपान कहलाती है; उससे इन्द्रियं रेतो रेतोविसर्गार्थत्वा- | उसकी अधिष्ठात्री देवता मृत्यु उत्पन्न त्सद्द रेतसोच्यते । रेतस आप | हुई । जैसे कि अन्यत्र [इन्द्रिय, इति ॥ ४ ॥ | इन्द्रियस्थान और देवता] बतलाये | गये हैं, उसी प्रकार प्रजननइन्द्रियका | आश्रयस्थान शिश्न उत्पन्न हुआ । | उसमें रेतः इन्द्रिय है, जो रेतोविसर्ग | (वीर्यत्याग) की हेतुभूत होनेसे रेतः | (वीर्य) के सम्बन्धसे 'रेतस्' कही | जाती है और रेतःसे आप (वीर्यके | अधिष्ठाता जल) का प्रादुर्भाव | हुआ ॥ ४ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावैतरेयोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये प्रथमः खण्डः समाप्तः ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
द्वितीय खण्ड देवताओंकी अन्न एवं आयतनयाचना ता एता देवता सृष्टा अस्मिन् महत्यर्णवे प्रापतंस्त- मशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत् ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति ॥ १ ॥ वे ये [इस प्रकार] रचे हुए [इन्द्रियाभिमानी] देवगण इस महासमुद्रमें पतित हो गये। उस (पिण्ड) को [परमात्माने] क्षुधा- पिपासासे संयुक्त कर दिया। तब उन इन्द्रियाभिमानी देवताओंने उससे कहा—'हमारे लिये कोई आश्रयस्थान बतलाइये, जिसमें स्थित होकर हम अन्न भक्षण कर सकें' ॥ १ ॥ ता एता अग्न्यादयो देवता | ईश्वरद्वारा लोकपालरूपसे संकल्प लोकपालत्वेन संकल्प्य सृष्टा | करके रचे हुए वे ये अग्नि आदि देवगण इस अति महान् संसारार्णव ईश्वरेणास्मिन्संसारार्णवे संसार- | —संसारसमुद्रमें [गिरे], जो (संसार- समुद्र) अविद्या, कामना और कर्मसे समुद्रे महत्यविद्याकामकर्मप्रभव- | उत्पन्न हुए दुःखरूप जल तथा तीव्र दुःखोदके तीव्ररोगजरामृत्यु- | रोग, जरा और मृत्युरूप महाग्राहोंसे पूर्ण है, अनादि अनन्त अपार एवं महाग्राहेऽनादावनन्तेऽपारे निरा- | निरालम्ब है, विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला अणुमात्र सुख ही लम्बे विषयेन्द्रियजनितसुखलवक्ष- | जिसकी क्षणिक विश्रान्तिका स्वरूप णविश्रामे पञ्चेन्द्रियार्थतृणमारुत- | है, जिसमें पाँचों इन्द्रियोंकी विषय-
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
विक्षोभोत्थितानर्थशतमहोर्मौ म- | तृणारूप पवनके विक्षोभसे उठी हारौरवाद्यनेकनिरयगतहाहेत्या- | हुई अनर्थरूप सैकड़ों उत्ताल तरंगें हैं, दिक्कूजिताक्रोशनोद्भूतमहारवे | जहाँ महारौरव आदि अनेकों नरकोंके सत्यार्जवदानदयाहिंसाशमदम- | 'हा हा' आदिक्रन्दन और चिल्लाहट धृत्याद्यात्मगुणपाथेयपूर्णज्ञानोडुपे | से बड़ा कोलाहल मचा हुआ है, सत्संगसर्वत्यागमार्गे मोक्षतीरे | जिसमें सत्य, सरलता, दान, दया, एतस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतन्पतित- | अहिंसा, शम, दम और धैर्य आदि वत्यः। | आत्माके गुणरूप पाथेयसे भरी हुई | ज्ञानरूप नौका है, सत्संग और | सर्वत्याग ही जिसमें [ नौकाओंके | आने-जानेका ] मार्ग है तथा मोक्ष | ही जिसका तीर है—ऐसे [संसार- | रूप] महासागरमें पतित हुए—गिरे।
तस्मादग्न्यादिदेवताप्यय- | अतः यहाँ यही अर्थ कहना इष्ट लक्षणापि या गतिर्व्याख्याता | है कि ज्ञान और कर्मके समुच्चया- ज्ञानकर्मसमुच्चयानुष्ठानफलभूता | नुष्ठानकी फलस्वरूपा जिस अग्नि सापि नालं संसारदुःखोपशमाय, | आदि देवतामें लीन होनारूप गतिकी इत्ययं विवक्षितोऽर्थोऽत्र । यत | [ पूर्व अध्यायोंमें ] व्याख्या की गयी एवं तस्मादेवं विदित्वा परं ब्रह्म | है वह भी सांसारिक दुःखकी आत्मात्मनः सर्वभूतानां च यो | शान्तिके लिये पर्याप्त नहीं है। वक्ष्यमाणविशेषणः प्रकृतश्च जग- | क्योंकि ऐसी बात है इसलिये दुत्पत्तिस्थितिसंहारहेतुत्वेन स | [ देवतालयरूप गति संसारदुःखकी | शान्तिका उपाय नहीं है ] ऐसा | जानकर जो परब्रह्म अपना और | सब प्राणियोंका आत्मा है, जिसके | विशेषण आगे बतलाये जानेवाले हैं | और संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और | संहारके कारणरूपसे जिसका यहाँ | प्रकरण है उसे संसारके सम्पूर्ण
३६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
३६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ सर्वसंसारदुःखोपशमनाय वेदि- | दुःखोंकी शान्तिके लिये जानना तव्यः । तस्मात् “एष पन्था | चाहिये । अतः “मोक्षप्राप्तिका और एतत्कर्मैतद्ब्रह्मैतत् सत्यम्” (ऐ० | कोई मार्ग नहीं है” इस श्रुतिके उ० २ । १ । १) यदेतत्पर- | अनुसार यह जो परब्रह्मका आत्म- ब्रह्मात्मज्ञानम् “नान्यः पन्था | स्वरूपसे ज्ञान है “यही मार्ग है, यही विद्यतेऽयनाय” (श्वे० उ० ३ । | कर्म है, यही ब्रह्म है और यही ८, ६ । १५) इति मन्त्रवर्णात् । | सत्य है।” तं स्थानकरणदेवतोत्पत्ति- | स्थान (इन्द्रियगोलक), इन्द्रिय बीजभूतं पुरुषं प्रथमोत्पादितं | और इन्द्रियाभिमानी देवताओंकी पिण्डमात्मानमशनायापिपासाभ्या- | उत्पत्तिके बीजभूत पुरुषरूपसे मन्ववार्जयदनुगमितवान्संयोजित- | प्रथम उत्पन्न किये हुए उस पिण्ड वानित्यर्थः। तस्य कारणभूतस्या- | अर्थात् आत्माको उसने क्षुधा और शनायादिदोषवत्त्वात्तत्कार्यभूता- | पिपासासे अन्ववार्जयत्-अनुगमित नामपि देवतानामशनायादि- | अर्थात् संयुक्त किया । उस कारण- मत्त्वम् । तास्ततोऽशनायापि- | भूत पिण्डके क्षुधा आदि दोषोंसे पासाभ्यां पीड्यमाना एनं पिता- | युक्त होनेके कारण उसके कार्यभूत महं स्रष्टारमब्रुवन्नुक्तवत्यः— | देवता आदि भी क्षुधा आदिसे युक्त आयतनमधिष्ठानं नोऽस्मभ्यं प्र- | हुए । तब क्षुधा-पिपासासे पीड़ित जानीहि विधत्स्व । यस्मिन्नायतने | होकर उन्होंने उस जगद्रचयिता प्रतिष्ठिताः समर्थाः सत्योऽन्न- | पितामहसे कहा—‘हमारे लिये मदाम भक्षयाम इति ॥ १ ॥ | आयतन-आश्रयस्थानकी व्यवस्था | करो, जिस आयतनमें प्रतिष्ठित होकर | हम सामर्थ्यवान् हो अन्न भक्षण कर | सकें’ ॥ १ ॥ गो और अश्वशरीरकी उत्पत्ति तथा देवताओंद्वारा उनकी अस्वीकृति एवमुक्त ईश्वरः— | ऐसा कहे जानेपर ईश्वर—
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७ ताभ्यो गामानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति । ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ॥ २ ॥ उन देवताओंके लिये गौ ले आया। वे बोले—'यह हमारे लिये पर्याप्त नहीं है।' [ फिर वह ] उनके लिये घोड़ा ले आया। वे बोले— 'यह भी हमारे लिये पर्याप्त नहीं है' ॥ २ ॥ ताभ्यो देव्ताभ्यो गां गवा- । उन देवताओंके लिये गौ-गौके कृतिविशिष्टं पिण्डं ताभ्य एवा- आकारवाला पिण्ड पूर्ववत् उस द्भ्यः पूर्ववत्पिण्डं समुद्धृत्य मूर्च्छ- जलसे निकालकर-अवयवोंकी यित्वानयददर्शितवान् । ताः पुन- योजनाद्वारा रचकर लाया अर्थात् उसे उन देवताओंको दिखलाया। र्गवाकृतिं दृष्ट्वाब्रुवन्—न वै नो- उस गौके समान आकारवाले प्राणको देखकर वे पुनः बोले 'यह पिण्ड हमारे ऽस्मदर्थमधिष्ठानायान्नमत्तुमयं पि- लिये अन्न भक्षण करनेके निमित्त ण्डोऽलं न वै । अलं पर्याप्तः, अत्तुं आश्रय बनानेके लिये पर्याप्त नहीं है। 'अलम्' का अर्थ पर्याप्त है। अर्थात् न योग्य इत्यर्थः । गवि प्रत्या- [ यह आश्रय ] भोजन करनेके योग्य नहीं है।' गौका परित्याग कर देनेपर ख्याते ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रु- वह उनके लिये घोड़ा लाया। तब वे 'हमारे लिये यह भी पर्याप्त नहीं है' वन्न वै नोऽयमलमिति पूर्ववत् ॥२॥ इस प्रकार पूर्ववत् कहने लगे ॥ २ ॥ मनुष्यशरीरकी उत्पत्ति और देवताओंद्वारा उसकी स्वीकृति सर्वप्रत्याख्याने— । इस प्रकार सबका त्याग कर दिया जानेपर— ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति । पुरुषो वाव सुकृतम् । ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति ॥३॥
३८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
३८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ वह उनके लिये पुरुष ले आया। वे बोले—'यह सुन्दर बना है, निश्चय पुरुष ही सुन्दर रचना है।' उन (देवताओं) से ईश्वरने कहा— 'अपने-अपने आयतन (आश्रयस्थानों) में प्रवेश कर जाओ' ॥ ३ ॥ ताभ्यः पुरुषमानयत्स्वयोनि- | [ वह ] उनके लिये उनका भूतम् । ताः स्वयोनिं पुरुषं | योनिरूप पुरुष ले आया । अपने दृष्ट्वा अखिन्नाः सत्यः सुकृतं | योनिभूत उस पुरुषको देखकर वे शोभनं कृतमिदमधिष्ठानं बतेत्य- | खेदरहित हो इस प्रकार बोले—'यह ब्रुवन् । तस्मात्पुरुषो वाव पुरुष | अधिष्ठान सुन्दर बना है । अतः एव सुकृतं सर्वपुण्यकर्महेतुत्वात् । | सम्पूर्ण पुण्यकर्मोंका कारण होनेसे स्वयं वा स्वेनैवात्मना स्वमायाभिः | निश्चय पुरुष ही सुकृत है । अथवा कृतत्वात्सुकृतमित्युच्यते । | स्वयं अपने-आप अपनी ही मायासे रचा होनेके कारण 'सुकृत' ऐसा कहा जाता है । ता देवता ईश्वरोऽब्रवीदिष्ट- | ईश्वरने, यह समझकर कि इन्हें मासामिदमधिष्ठानमिति मत्वा, | यह आश्रयस्थान प्रिय है, क्योंकि सर्वे हि स्वयोनिषु रमन्ते, अतो | सभी अपनी योनिमें सन्तुष्ट रहा यथायतनं यस्य यद्वदनादिक्रिया- | करते हैं, उन देवताओंसे कहा— योग्यमायतनं तत्प्रविशतेति॥३॥ | 'जिसका जो आयतन है उस अपनी सम्भाषणादि क्रियाके योग्य आयतन- में तुम सब प्रविष्ट हो जाओ' ॥३॥ देवताओंका अपने-अपने आयतनोंमें प्रवेश तथास्त्वित्यनुज्ञां प्रतिलभ्ये- | 'ऐसा ही हो' इस प्रकार श्वरस्य नगर्यामिव बलाधिकृता- | राजाकी आज्ञा पाकर जिस प्रकार दयः— | नगरीमें सेनाध्यक्षादि [ प्रवेश कर जाते हैं उसी प्रकार ]—