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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

५८ आल्हखण्ड । १०६ चली बिजैसिनि झारखण्डते पहुँची रङ्गमहल में आय ३२ जितने जादू बिजमाँ डारे सो लश्कर ते लये उतार ॥ उतरी जादू जब लश्कर ते चेते सबै शूर सरदार ३३ आल्हा बोले तब मलखेते नहिं लखिपरे लहुरवा भाय ॥ सुनिकै बातैं मलखे बोले देवा शकुनदेव बतलाय ३४ लैके पोथी ज्योतिष वाली देवा हाल गयो सब गाय ॥ गुरुझिलमिलाकी मढ़ियामाँ बांधा तहां लहुरवा भाय ३५ सुनिकै बातैं ये देवा की आल्हा बहुत गयो घबड़ाय ॥ देवा बोला फिरि मलखेते मानो कही बनाफरराय ३६ बाना छोरो रजपूती का अँगमाँ लेवो भस्म लगाय ॥ योगी बनिकै हम तुम जावैं तौ सबकाम सिद्ध है जायँ ३७ बातैं सुनिकै ये देवा की योगी बने बीर मलखान ॥ तुरतै चलिभे झारखण्ड को पहुँचे तहाँ दूनहू ज्वान ३८ गुरुझिलमिलाकी मढ़ियाढिग गावैं तान वीर मलखान ॥ बाजै डमरू भल देवाकै सो परिगई भनक त्याहिकान ३६ गुरु झिलमिला बाहर आयो योगी लखा तहाँ दुइ ज्वान ॥ हाथ पकरिकै लै मढ़िया में बाबा बड़ा कीन सनमान ४० बोले योगी हम दोउभाई ऐसा कह्यो वीर मलखान ॥ अब हम जावैं हरद्वार को चाहैं कछू नहीं सनमान ४१ रमता योगी बहता पानी ये नहिं करैं कतौ बिश्राम ॥ नहिं अभिलाषा क्यहू बातकी केवल जपें रामको नाम ४२ सुनिकै बातें ये योगी की बोला तुरत झिलमिला ज्वान ॥ जो कछु मांगो सो कछु पावो हमरे वचन करो परमान ४३ सुनिकै बातें ये बाबा की बोले तुरत बनाफरराय ॥

माड़ोका युद्ध । १०७ ५६ मेढ़ा पावैं यहु बाबा जो तौ हम हरद्वार को जायँ ४४ यहुतो कैदी है बिजमाका मांगो और बस्तु कछु भाय ॥ जो हम पावैं यहु मेढ़ा ना तुम्हरो योग अकारथ जाय ४५ सुनिकै बातें ये योगिन की झिलमिल मेढ़ा दीन गहाय ॥ योगी बोले तब झिलमिल ते याको मानुष देव बनाय ४६ तबजलछिनक्योझिलमिलतापर मानुष भयो लहुरवा भाय ॥ चलिकै बाहर भे मढ़ियाते बोल्यो तुरत उदयसिंहराय ४७ मारो दादा यहि योगी को तौ सब काम सिद्ध ह्वैजायँ ॥ सुनिकै बातें ये ऊदन की लौटा तुरत बनाफरराय ४८ मूड़ काटिकै फिरि बाबाको औ मढ़ियामाँ दीन चलाय ॥ तीनों चलिभे फिरि तहँनाते औ लश्करमें पहुंचे आय ४६ खबरि सुनाई सब आल्हा को डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजे डंका अह्रतंका के मारू शब्द रहे हहराय ५० लैके फौजैं राजाजम्बा पहुँचा समरभूमिमाँ आय ॥ बम्बके गोला छूटन लागे धुँवना रहा सरग में छाय ५१ जौने हाथी के गोला लागै मानो गिरा धौरहर आय ॥ जौने बछेड़ा के गोला लागै मानो गिरह कबूतर खाय ५२ जौने क्षत्री के गोला लागै यमपुर तुरत देय दिखलाय ॥ गोला लागै ज्यहि सँड़िया के सो मुँहभरा तुरत गिरि जाय ५३ जौने तम्बू गोला लागै त्यहिकोलिये सरग मड़राय ॥ गोली ओली सम बर्षत भईं मानो मघा दीन झरि लाय ५४ भाला बलछी खट खट बोलैं डोलैं तीनों तहाँ बयारि ॥ कउँधालपकनिबिजुलीचमकनि कहूँकहूँ देखिपरे तलवारि ५५ तेगा चटकैं बर्दवान के कोता खानी चलैं कटार ॥

६० आल्हखण्ड । १०८ चहला उठिरहि तहँ चरबिनकी औ वहिचली रक्तकी धार ५६ शूर सिपाही माड़ोवाले नंगी हाथ लिये तलवार ॥ चलै सिरोही तहँ सँभरा भरि ऊना चलै विलाइतिक्यार ५७ दूनों फौजैं यकामिल हैगइँ वीरन रहे वीर ललकार ॥ दुइ दुइ तुरैन के बँधवैया ई सब डारि भागि तलवार ५८ जितने कायर रहें फौजन में तर लोथिन के रहे लुकाय ॥ हेला आवै जब हाथिन का तब बिनमरे मौत है जाय ५६ देवा बोलै तब ऊदनते हमरे सुनो बनाफरराय ॥ भागे क्षत्रिन को मार्यो ना नहिं सब क्षत्री धर्मनशाय ६० फूल केतकी का सूंघ्यो ना जबलग फुलवामिलै गुलाब ॥ दाया राख्यो द्विज देवन में ऊदन यही धर्म की आव ६१ घोड़ी कबुतरी का चढ़वैया मलघे बड़ा लड़ैया ज्वान ॥ बहुतन मारै तलवारी सों बहुतन लेय ढालसों प्रान ६२ को गति बरणै तहँ सय्यद की नाहर सिरगापर असवार ॥ गुर्ज उठाये रणमाँ मटकै पटकै बड़े बड़े सरदार ६३ अली अली कहि सय्यद धावै रणमाँ गली गली है जाय ॥ भली भली कहि आल्हा बोले रणमाँ थली थली थर्राय ६४ चली चली तहँ धरती डोलै बोलैं हली हली सब गाय ॥ कली कली जस सारँग सम्पुट तैसे डली डली मिलिजायँ ६५ को गति बरणै समरभूमि कै हमरे बूत कही ना जाय ॥ राजा जम्बा के मोर्चा पर कोउ रजपूत न रोकै पायँ ६६ चीरिकै धोती मारि लँगोटो कोउ कोउ अंग बिभूतिरमाय ॥ लोहुभरी माटी फिरि लैके रामानन्दी तिलक लगाय ६७ हमैं न मारो ओ रजपूतो हमतो जगन्नाथ को जायँ ॥

माड़ोका युद्ध । १०६ ५१ कोउकोउ ढालनको बचुकाकरि पीठिम डारिलीन भयखाय ६८ हम सौदागर हैं जयपुरके आये राजमहल में भाय ॥ पहिले फाटक के ऊपरमाँ मुर्चा परा बरोबरि आय ६६ जिन्हें पियारी रहें घर तिरिया तिन रण डारिदीन तलवारि ॥ हमें न मारो हमें न मारो दादा बापूकैरें गुहारि ७० त्यही समैया त्यहि अवसरमाँ बोला तहाँ बीरमलखान ॥ राजा जम्बाके मुर्चा पर ठहरे नहीं एकहू ज्वान ७१ सुनिकै बातें ये मलखे की आल्हा हाथी दीन बढ़ाय ॥ जम्बा केरे तहँ मुर्चामॉ पहुँचे तुरत बनाफरराय ७२ हाथी जानै भल आल्हा को यहु है देशराज को लाल ॥ देशराज औ बच्छराज दोउ मेरो भलो कीन प्रतिपाल ७३ ज्ञान जानवर में जैसो है मानुष नहीं दशो में पांच ॥ गर्भवती नारी के ऊपर फिरिनहिंचढ़ै जानवरसाँच ७४ ( रागानुरागोपदेशोपकारक सवैया ॥ ) साँच रह्यो मन ज्ञान विरागमें याँच रह्यो कर्त्ता कर्त्तारे ॥ आनि बिपत्तिपरी शिरऊपर राख हरी भर्त्ता भर्त्तारे ॥ जीव गुहारपुकार करी जब आय हरी कर्त्ता कर्त्तारे ॥ साँच न याँच करै ललिते तब नाहिं हरी भर्त्ता भर्त्तारे ७५ तैसो हाथी तहँ आल्हा को साँचो जाति पाँतिमें साँच ॥ मूंड़ि लपेटे जंजीरन को मारै हेरि हेरि दश पाँच ७६ बिकट लड़ाई हाथी कीन्ह्यो करणी रही समर में नाच ॥ जम्बा बोला तब आल्हा ते मानो बचन हमारे साँच ७७ तुम फिरिजावो म्वरे मुहराते हमरे बचन करो परमान ॥

६२ आल्हखण्ड । १९० अबै न आल्हा कछु बिगरा है नाकछु बहुतभयो नुकसान ७८ पुत्र हमारे मरि चारो गे हमरे बरै करेजे आग ॥ जो भगि जावो अब मोहबे को होवै बड़ी तुम्हारी भाग ७६ उठिकै हौदाते आल्हारण बोले दूनों भुजा उठाय ॥ रहे अधर्मी ना कौनों युग रावण कौरव के समुदाय ८० काह हकीकति त्वरि जम्बा है कोल्हू डारे बाप पिराय ॥ लरिका बिगरे अब ऊदन हैं जियतै कोल्हू डैरैं पिसाय ८१ सँभरिकै बैठै अब हौदापर जम्बा खबरदार है जाय ॥ मारु सिरोही म्वरि छाती माँ कैसी लाये शान धराय ८२ हमरो बाना मरदाना है यह हम ठीक दीन बतलाय ॥ उठै सिरोही जो रण हमरी तौ फिरि कौन परै दिखराय ८३ इतना सुनिकै नृप जम्बा ने कम्मर खैंचि लीन तलवार ॥ ऐंचि तड़ाका फिरि मारा शिर आल्हा लीन ढालपर वार ८४ आल्हा बोल्यो फिरि जम्बा ते दूसरि वार करो सरदार ॥ खैंचि सिरोही ज़म्बा मारी आल्हा लीन ढालपर वार ८५ कबों सिरोही जब बांधी ना मुर्चा खायगई तब धार ॥ वार तीसरी अब तुम मारो राजा माड़ो के सरदार ८६ साँकरि दीन्ही पचशबदाको आल्हा बोले वचन सुनाय ॥ हौदा गिरावै तुम जम्बा का हमरे निमक अदा है जाय ८७ खैंचि सिरोही दोउ हाथन सों जम्बा कीन तीसरी वार ॥ ढाल फटिगै गेंडावाली बचिगा आल्हा परमझुझार ८८ साँकरि फेरी पचशब्दाने हौदा तुरतै दीन गिराय ॥ आल्हा कूदे फिरि हौदा ते पकरयो नृपै तुरतही आय ८६ मलखे देवा सय्यद ऊदन चारो गये तहांपर आय ॥

बाँधिकै मुशकें नृप जम्बाकी कूदने लागि चारिहू भाय ६० रूपनबारी को बुलवायो ताही समय उदयसिंहराय ॥ तुम चलिजावो बबुरीबनका द्यावलि मातै लाउ बुलाय ६१ सुनिकै बातें ये ऊदन की रूपन तुरत पहुंचा जाय ॥ चढ़े पालकी द्यावलि आई जहाँपर रहे बनाफरराय ६२ आगि लगाय दई महलन में करिया पाखदये करवाय ॥ लैके कुंजी खोलि खजाना सो लक्कड़नमें लीन लदाय ६३ महल लूटिकै महारानिन के बबुरीबनका दीन पठाय ॥ तुरतै बांदी को बुलवायो औ यहकह्योउदयसिंहराय ६४ खबरि जनावो यह कुशलाको तुमको आल्हा रहे बुलाय ॥ सुनिकै बातें बघऊदनकी बाँदी तुरत पहुंचीजाय ६५ खबरि सुनाई सब कुशलाको आई सत्रू बेगिही धाय ॥ रानी बोली तहँ आल्हाते हमरे सुनो बनाफरराय ६६ हाथ औरतनपर छोड़योना नहिं सब क्षत्रीधर्म्म नशाय ॥ सुनिकै बातें ये कुशला की तुरतै ब्वला उदयसिंहराय ६७ नहीं जनाना म्वर बाना है जो हम डरैं और तैंमार ॥ चीरा कलँगी म्वरे बापके औ दै देव नौलखाहार ६८ डोला बिजैसिनि को मँगवावो हमरे साथ देउकरवाय ॥ सुनिकै बातें ये ऊदन की रानी गई सनाकाखाय ६६

  • कहा न मानै इन लरिकनका तो को बैठ पूत औ भाय ॥ यहै सोचिकै मन अपनेमाँ डोला तुरतदीन मँगवाय १०० चीरा कलँगीको मँगवायो औ दै डस्यो नौलखाहार ॥ ऊदन बरगदा के नीचेगे खपरी छुरी बापकी डार १०१ ऊदन देवा दोऊ मिलिकै कोल्हुन पास पहुंचेजाय ॥

६४ आल्हखण्ड । ११२ ठाढ़पिरायो नृप जम्बाको पाछे मूड़लीन कटवाय १०२ जहँ रहैं खुपड़ी देशराज की तहँ पर तुरतदीन टँगवाय ॥ तब रनबोले वहि समयामें स्याबसितुम्हेंउदयसिंहराय १०३ पूत सुपूते तुम अस होवैं नाही भलो गर्भ गिरि जाय ॥ पूत कपूते ज्यहि घर होवैं जरिजरिमरैंबाप औ माय १०४ पुरिखा रोवैं परे नरकमें नारी मरै जहर को खाय ॥ गली गली में भाई रोवैं करहत ज्ञाति परोसी जायँ १०५ पूत सुपुतिनि सिंहिनि माता निर्भय होय पूतको पाय ॥ गदही केरे दश बालक भे लादीअधिकअधिकसोजाय १०६ पूत सुपूता एक बंश में पालै जातिपांति को भाय ॥ जैसे बिरवा यक चन्दन को बनमाँ देय गंध फैलाय १०७ डाहु बुझान्यो अब जियरे को बैरी डारयो कल्हू पिराय ॥ लै कै खुपरी झरि काशी में किरियाकर्मकरो सबजाय १०८ इतना कहिकै रन झुप्पे भे आल्हा तुरत पहुंचे आय ॥ आल्हा बोले तहँ ऊदन ते लश्कर कूच देउ करवाय १०६ सुनिकै बातें ये आल्हा की रहिगे उदयसिंह शिरनाय ॥ खम्भ गड़ायो मलयागिरिको पंडित तुरतलीन बुलवाय ११० भाँवरि घूमी तहँ ऊदन ने आल्हा बोले बचन रिसाय ॥ नहिं लैजैहैं यहि मोहवे हम मानो कही उदयसिंहराय १११ जबसुधिकरि है पितु अपनेकी मारी स्त्रवत लहुरवाभाय ॥ कन्या वैरी की ज्यहिके घर नाचै मृत्यु शीश पर आय ११२ त्यहिते मारौ तुम ऊदन यहि तौ सब काम सिद्ध ह्रैजायँ ॥ ऊदन बोले तब आल्हा ते दादा साँची देयँ बताय ११३ हम जो मारैं यहि तिरिया को तौ रजपूती जाय नशाय ॥

माड़ोका युद्ध । ११३ ६५ बचन हमारे पर आई है मारैं कौन पारपर भाय ११४ आल्हा बोलैं तब मलखेते तुम सुनिलेउ हमारी ज्वान ॥ खैंचि सिरोही को कम्मरसे तुम यहि मरो बीरमलखान११५ सुनिकै बातें ये आल्हाकी मलखे रामचन्द्र को ध्याय ॥ खैंचिकै मारा रनि बिजमा को सो तहँ परी पछारखाय ११६ ऊदन दौरे त्यहि समया में गोदी तुरत लीन बैठाय ॥ आँसुन भिज्यो रनिबिजमाको धीरजदीन लहुरवाभाय ११७ यह नहिं जानत हम प्यारी थे तुमका मारैं बीर मलखान ॥ जेठे भाई मेरे मलखे हैं तिनसों काहकरौं मैदान ११८ और जो मारत कोउक्षत्री त्वहि तौ मैं कटा देत करवाय ॥ अब बसमेरो कछु प्यारी नहिं हैयहहु पितासरिस बड़भाय११६ धर्म पतिब्रत त्वर साँचो है हमरे मोह गयो मनछाय॥ अबकीबिछुुरी फिरिकबमिलिहौ साँचे हाल देउ बतलाय १२० सुनिकै बातें ये ऊदन की बिजमा बोली बचन सुनाय ॥ भोग बिलासै के कारण से संगिनिभइँनिपियातवआय१२१ जेठ हमारे मलखे लागैं तिन म्वहिं भुइँमादीनस्ववाय॥ मारे मलखे तहँ तुम जावो जहाँ न होय लहुरवाभाय१२२ शापित करिकै मलखाने को बिजमा बोली बचन उदार ॥ बेटी हैवे हम नरपति की फुलवा होई नाम हमार १२३ घोड़ खरीदन काबुल जैहौ तबहम मिलब तुम्हें सरदार ॥ यह तो देही हियनै रहि है नरवर लेव और अवतार १२४ इतना कहिकै रानी बिजमा औ मरिगई तड़ाका भाय ॥ लाश उठाई बघऊदन ने औ नर्मदा बहाई जाय १२५ कूच के डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥

६६ आल्हाखण्ड । ११४ लाखापातरि देशराज की सो बुलवई बीर मलखान १२६ संगै देवलि के पलकी त्यहि तहँ ते कूच दीन करवाय ॥ जौन सिपाही रहें महोबे के आल्हा तुरत लीन बुलवाय १२७ साल दुसाला काहू दीन्हो काहू कड़ा दीन डरवाय ॥ चौरा कलँगी दी काहू को काहू मोहर दीन छिदाय १२८ कूच कराये लोहागढ़ते बबुरीबनै पहुंचे आय ॥ जितनी सामारहै माड़ो की ताको ठीकठाक करवाय १२६ जितनो करिया लै आवा ता ताते दशगुन अधिक बढ़ाय ॥ आल्हा लैके हुशियारी सों बोले मातै शीश नवाय १३० हुकुम जो पावैं महतारी को मलखे साथ बनारस जायँ ॥ चाचा दादा की किरिया करि पारैं पिण्ड गया में माय १३१ डरैं खुपड़ियाँ हम फलगू में तुमहूं कूच देव करवाय ॥ सुनिकै बातें ये आल्हा की माता बारबार बलिजाय १३२ स्यावसि स्यावसि सबदल बोल्यो भै मन बड़ेखुशी मलखाने ॥ पाँय लागिकै फिरि माता के तहँते चले दूनहू ज्वान १३३ ईतो पहुंचे हैं काशी में हाँ उन कूच दीन करवाय ॥ सत्रह दिनकी मैयाग परिकै सबदल अटा मोहोबे आय १३४ बाजै डंका ऊदन को बङ्का शङ्का को बिसराय ॥ कम्मर छोरैं कोउ कोउ क्षत्री कोऊ रहे रामको ध्याय १३५ सय्यद देवा ऊदन मिलिकै तीनों चले जहाँ परिमाल ॥ चरणन गिरिकै महाराजा के औसब कह्यो आपनो हाल १३६ तहँते उठिकै ऊदन चलिभे मल्हना महल पहुंचे जाय ॥ चरणन गिरिकै महरानी के अपना हाल गये सब गाय १३७ बड़ी खुशाली भै मल्हना के वरणी कौन भांति सो जाय ॥

माड़ोका युद्ध । ११५ ६७ दान दक्षिणा बाँटन लागी तुरतै महलनबिप्रबुलाय १३८ जितनी माया रहै माड़ो की सो सब ऊदन तुरत मँगाय ॥ जहाँ खजाना परिमालिक को तामें दीन सबै भरवाय १३६ बड़ी खुशहाली भै मोहबेमाँ घर घर होयँ मङ्गलाचार ॥ उजरिगो माड़ो त्यहिसमयामाँ जहँ तहँ घूमें श्वानासियार १४० मैं पदबन्दौं पितु अपने के फिरि फिरि बारबार शिरनाय ॥ करी सहायि यहि समया में ताते गयौं कथा सबगाय १४१ आशिर्वाद देउँ मुंशी सुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो होतो ना ललितेकहतकथाकसगाय १४२ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द्र औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदाभरपूर १४३ माथ नवावौं रामचन्द्र को करिकै कृष्णचन्द्र को ध्यान ॥ दोउपद् बन्दों शिवशंकर के गणपतिगणाधीशबलवान १४४ दोउपद् ध्यावौं महरानी के जिनअभिमानी डरे नशाय ॥ पूरी तरंग यहाँ सों द्वैगै तव पद् सुमिरिदुर्गामाय १४५ इति श्रीलखनऊनिवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजवाबूप्रयागनारायण जीकी आज्ञानुसार उत्तरामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनु पं०ललिताप्रसादकृतआल्हाविजयवर्णननामपञ्चमस्तरङ्गः ५॥ माड़ोका युद्ध समाप्त ॥ इति ॥

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अथ आल्हखण्ड ॥ नैनागढ़की लड़ाई अथवा आल्हाका विवाह ॥ सवैया ॥ दीनसहायक नाम तुम्हार सुना बहु ग्रन्थन में महराजा । है शबरी गजगीध अजामिल ते अजहूं जिहिकोयशछाजा॥ जो करणी सुमिरों इनकी तबहीं मन धैर्य्य लहै रघुराजा । दीन पुकारकरै ललिते प्रभु बेगि द्रवो हे गरीब नेवाजा १॥ सुमिरन ॥ गया न कीन्ही जिन कलियुगमाँ काशिम घोड़ दान नहिंदीन ॥ जन्मत बैरी जिन मारा ना नाहक जन्म जगत में लीन १ पूजा कीन्ही नहिं शम्भू की अक्षत चन्दन फूल चढ़ाय ॥ फिरि गलभँदरी जिनबाजी ना मुख ना बम्ब बम्ब गा छाय २ भसमरमायो नहिं देही माँ कवहूंन लीन सुमिरनी हाथ ॥ सोचन लायक ते आय हैं जिन नहिं कबौं नवायोमाथ ३ को अस देवता रहै शम्भूसम जिनको पूज्यो रामउदार ॥ वेद उपनिषदके ज्ञाता रहें जिनबल भयो रावणाद्धार ४

३ आल्हखण्ड । ११८ झूटि सुमिरनी गे देवन के शाखा सुनो शूरमनक्यार ॥ ब्याह बखानों मैं आल्हाका होई तहाँ भयानक मार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ नैनागढ़ का जो महराजा साजा सबै भांति कर्त्तार ॥ राजा इन्दर का बरदानी औ नैपाली नाम उदार १ तिन घर कन्या इक पैदा भै सबविधि रूप शीलगुणखान ॥ पढ़िकै विद्या सब जादूकी कछुदिनबाद भई फिरिज्वान २ संगसहेलिन के खेलति भय सुनवाँ कही तासुका नाम ॥ खेल लरिकई को जाहिर है लरिका खेलैं चारिहूयाम ३ खेलत खेलत फुलबगिया गईं सब मिलि करैं फूलनकी मार ॥ कटहर बड़हर त्यहि बगिया में कहुँ कहुँ फूलिरही कचनार ४ उठै सुगन्धे कहुँ चन्दन की कतहूँ कदलिन खड़ी कतार ॥ गुम्मज सोहैं मोमशिरिन के कहुँ कहुँ फुलीं चमेलीडार ५ बेला फूले अलबेला कहुँ खिन्निन लता गई बहुछाय ॥ हर्र बहेरा साँखो बिरवा सीधे चले उपर को जायँ ६ बरगद फैले हैं नीचे को फैले भूमि रहे नियराय ॥ जैसे सम्पति सज्जन पावैं नीचे शीश झुकावत जायँ ७ शीशम जानो तुम नीचनको आधे सरग फरहरा खायँ ॥ चलै कुल्हाड़ा जब नीचेते गिरिकै टूक टूक हैजाएँ ८ को गति वरणै तहँ अधमनकै सोहैं करिल रूपते भाय ॥ ताल तमालन कै गिनतीना कदमन गई सघनता छाय ६ फुली नेवारी अब अगस्त्य हैं आमनडार कैलिया बोल ॥ सोहैं अशोकन के बिरवा भल तीनों तहाँ बयारी डोल १० गूलर जामुन पाकर पीपर कोनन खड़े वृक्ष सरदार ॥

आल्हाका बियाह । ११६ ३ तार अपारन के बिरवा बहु कहूँ कहूँ खड़े वृक्ष कहार ११ टेसू फूले कहूँ सोहत हैं जैसे सोहैं लड़ैता ज्वान ॥ रूप गुलाबन को देखत खन फूलनछांड़िदीनअभिमान १२ कौन कनै रन को वर्णन कर चाँदनि चाँद सरिस गै छाय ॥ फूल दुपहरी के भल सोहैं मोहैं मुनिन मनै अधिकाय १३ गेंदन केरे बहु बिरवा हैं अर्जुन वृक्ष परै दिखराय ॥ मेला लाग्यो नौरङ्गिन का हेला निंबुन का दर्शाय १४ ठेला भरि भरि अमरुतन का माली राजभवन को जाय ॥ केवँड़ा केरी उठै सुगन्धी कहुँकहुँ नागबेलिगै छाय १५ ताही बगिया सुनवाँ खेलै मेलै गले सखिन के हाथ ॥ सखियाँ बोलीं तहँ सुनवाँते तुम नित खेलोहमारेसाथ १६ पैर महावर पै तुम्हरे ना -टिकुली नहीं बिराजै भाल ॥ द्रव्य तुम्हारे का घर नाहीं जो नहिं ब्याहकरें नरपाल १७ इतना कहिकै सब आलिनने औ करताली दीन बजाय ॥ समय दुपहरी को जान्यो जब तब फिरि खेलबन्द द्वैजाय १८ कीरति गावैं सब आल्हा की माड़ो लिहेनि बापका दायँ ॥ धन्य बनाफर उदयसिंह हैं आल्हा केर लहुरवा भाय १६ ऐसी बातें सखियाँ करतै अपने भवन पहूँचीं आय ॥ ताही क्षणमें सुनवाँ मन में अपने ठीक लीन ठहराय २० ब्याही जैबे आल्हा सँग में की मरिजाब जहरको खाय ॥ छाय उदासी गै चिहरा में पूँछै बार बार तब माय २१ कौन रोगहै त्वरि देहीमाँ बेटी हाल देउ बतलाय ॥ पीली ह्वैगै सब देही है औतनकाँपिकाँपि रहिजाय २२ को हितकारी है मातासम नाता बड़ा जगत केहिभाय ॥

४ आल्हखण्ड । १२० अब तो बाबा कलियुग आये माता सहैं लात के घाय २३ सुनिकै बातें ये माता की सुनवाँ चरण शीश नवाय ॥ जो कछु भाषारहै सखियनने सुनवाँ मातै गई सुनाय २४ सुनिकै बातें सब कन्या की माता रही समय को देखि ॥ यकदिन ऐसा आनपहूँचा राजा रहा कन्यका पेखि २५ रानी बोली तब राजाते हमरे बचन करो परमान ॥ ब्याहन लायक यह कन्या भै सोतुमजानो नृपतिसुजान २६ सुनिकै बातें ये रानी की बिजिया बेटा लीन बुलाय ॥ नाई बारी को बुलवायो तिनते कह्योहालसमुझाय २७ जयो मोहोबे ना टीका लै सब कहुँ जाउ तुरतही धाये ॥ नाई बारी तुरतै चलिभे पहुँचे नगर नगर में जाय २८ काहू टीका को लीन्ह्यो ना. नैनागढ़ै पहुँचे आय ॥ खबरि सुनाई सब राजा को नेगिनचरणशीशनवाय २६ जालिम राजा नैनागढ़ का राजन यही विचारा जीय ॥ मारे डरके छाती धड़कै कैसेहोयँ तहांपर पीय ३० थोरी थोरी फौजें लैके नैनागढ़ै पहुँचे आय । नजरी दीन्ह्यो नेपाली को राजाचरण शीशनवाय ३१ सरवरि तुम्हरी का नाहीं हैं टीका लेयँ कहौ कस भाय । कुमक तुम्हारी को आयन है राजन सत्यदीन बतलाय ३२ त्यही समैया त्यहि औसरमाँ औ सुनवाँ को सुनो हवाल ॥ हीरामणि सुवनाको लैके सुनवाँ भई रोवासिनिबाल ३३ चूम्यो चाट्यो त्यहि सुवनाको औफिरिकह्योबचन यहगाय ॥ मेवा खायो भल पिंजरन में अब गाढ़े में होउ सहाय ३४ लैके पाती जाउ मोहोबे देवो उदयसिंह को जाय ॥

आल्हाका बिबाह । १२१ ५ लिखी हकीकत सब आल्हाको सुनवाँ बारबार समुझाय ३५ नामी ठाकुर तुम मोहबे में हमरो ब्याह करो अब आय ॥ नहिं मरिजयो जहर खायकै दूनों भाइ बनाफरराय ३६ लिखिकै पाती गल सुवनाके सुनवाँ तुरत दीन लटकाय ॥ मूठी दीन्ह्यो फिरि कोठे ते सुवना चला मोहोबे जाय ३७ चन्दन बगिया सुवना पहुँँच्यो तहँ पर रहें उदयसिंहराय ॥ चन्दन ऊपर सुवना बैठो परिगा दृष्टि तुरतही आय ३८ भल चुचकारयो उदयसिंहने आपन नाम दीन बतलाय ॥ सुवना बैठ्यो तब हाथेपर पाती छोरि लीन हर्षाय ३६ बाँचिकै पाती तब ऊदन ने औ सय्यद को दीन सुनाय ॥ सय्यद आल्हासों बतलायो मलखे देबै दीन बताय ४० लैके पाती औ सुवना को गे परिमाल कचहरी धाय ॥ कही हकीकति सब राजा सों पाती दीन उदयसिंहराय ४१ पढ़िकै पाती को परिमालिक मनमाँ गये सनाकाखाय ॥ होश उड़ान्यौ परिमालिक का मुहँकाबिरगयो कुम्हिलाय ४२ बोलि न आवा परिमालिक सों औ द्वाढ़ालों लार सुखाय ॥ थर थर थर थर देही काँपी शिरसों मुकुट गिरा भहराय ४३ रोम रोम सब ठाढ़े व्हैगे नैनन बही आँसु की धार ॥ धीरजधरिकै परिमालिक फिरि औ मलखे तन रहे निहारि ४४ मलखे बोले तब राजा ते साँचे बचन सुनो नरपाल ॥ टीका पठयो है बेटी ने सोनहिंलौटिसकैक्यहुकाल ४५ सुनिकै बातें मलखाने की बोले तुरत रजापरिमाल ॥ ब्याधि नशायो गढ़माड़ो की दूसरि ब्याधिभयोफिरिहाल ४६ टीका फेरो नयनागढ़ को मलखे मानो कही हमार ॥

६ | आल्हखण्ड | १२५


जालिम राजा नयपाली है ज्यहिघर अमरढोल सरदार ३७ कौन बियाहन त्यहि घर जैहै ऐहै लौटि कौन बलवान ॥ टीका फेरो सब राजन ने मानो कही वीर मलखान ४८ सवैया ॥ शान चढ़ी मलखान के ऊपर आन नहीं कछूहू नृप राखी। मोहिं पियार न प्राण भुवार कहौं मैं सत्य सदाशिव साखी ॥ कीरतिही प्रिय बीरनको हम शान कि आन सदा मनमाखी। आनरहै नहिं शान कि जो मरि जान भलो ललिते हम भाखी ४६ इतना कहिकै मलखाने ने डंका तुरत दीन बजवाय ॥ लिखिकै उत्तर उदयसिंहने सुवना गरे दीन लटकाय ५० उड़िकै सुवना फिरि मोहबे ते सुनवाँ पास पहुंचा आय ॥ रानी मल्हना के महलन में राजा तुरत पहुंचे जाय ५१ हाल बतायो सब मल्हना को सुनतै गई सनाकाखाय ॥ मलखे देवा को बुलवायो सुनतै गये महल में आय ५२ मल्हना बोली तब मलखे ते बेटा हाल देउ बतलाय ॥ काहे डंका तुम्हरे बाजे कहँ चढ़िजाउ बनाफरराय ५३ हाथ जोरिकै मलखे बोले मल्हना चरणन शीश नवाय ॥ पाती आई नैनागढ़ की आल्हा तहाँ बियाहन जायें ५४ सुनिकै बातें मलखाने की मल्हनै देवै कहा सुनाय ॥ शकुन तुम्हारे सों मलखाने माड़ो लीन बाप का दायँ ५५ कैसी गुजरी नैनागढ़ में सो सब हाल देव बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये मल्हना बुझि देवा पोथी लीन मँगवाय ५६ लैके पोथी ज्योतिष वानी औ सब हाल दीन बतलाय ॥ जीति तुम्हारी द्वैहै सांची बात कहैं हम माय ५७

आल्हाका विवाह । १२३ ७ इतना कहिकै दूनों चलि भे महलन भये मंगलाचार ॥ बांदी आंगन लीपन लागी पंडित साइति रहे बिचार ५८ एक कुमारी तेल चढ़ावै गावनलगीं सखी त्यहिकाल ॥ माय मंतरा भे पाछे सों नेगिननेग दीन परिमाल ५६ लैकै महाउर नाइनि आई नहखुर होनलाग त्यहिबार ॥ नाइनि मांग्यो तहँ पुरवाको दीन्ह्यो मल्हना परम उदार ६० उबटन करिकै तन केसरसों निर्मलजलसों फिरिअन्हवाय ॥ कंकण बांधागा आल्हा के दूलह बने बनाफरराय ६१ सजी पालकी तहँ ठाढ़ीथी तापर बैठि शम्भु को ध्याय ॥ कुँवा वियाहन आल्हा पहुंचे मल्हना पैर दीन लटकाय ६२ पहिली भाँवरि के फिरतैखन आल्हा गहा चरणको धाय ॥ बाग लगावों तेरे नाम की माता लेवो चरण उठाय ६३ ऐसो कहिकै सातों भाँवरि घूमा तुरत बनाफरराय ॥ मल्हनाबोली फिरि आल्हा सों सेयों तुमको दूध पियाय ६४ तासों द्यावलि सों अधिकी मैं तासों पैर दीन लटकाय ॥ पंजा फेर्यो फिरि पीढ़ी माँ तुम्हरो बार न बाँको जाय ६५ पाँय लागिकै फिरि द्यावलिके पलकी चढ़े बनाफरराय ॥ हुकुम लगायो बघऊदन ने डंका वजनलाग घहराय ६६ घोड़ करिलिया आल्हा वाला कोतल चला पालकी साथ ॥ मलखे पपिहापर बैठत भे नायकै रामचन्द्र को माथ ६७ घोड़ा मनोहरा की पीठी माँ देवा तुरत भयो असवार ॥ सय्यद सिरगा पर बैठत भे नाहर बनरस के सरदार ६८ अली अल्लामत औ दरियाखां बेटा जानबेग सुल्तान ॥ तेग बहादुर अलीबहादुर बैठे घोड़ आपने ज्वान ६६

८ आल्हखण्ड । १२४ मीराताल्हन के लरिका ये नाहर समरधनी तलवार ॥ मन्नागूजर मोहबे वालो सोऊ वेगि भयो असवार ७० सातलाख लग फौजैं सजिकै नैनागढ़ को भई तयार ॥ डंका बाजैं अहलंका के ऊदन बेंबुलपर असवार ७१ सजे बराती सब मोहबे के जल्दी कूच दीन करवाय ॥ सातरोज की मैजलि करिकै फौजैं अठीं धुरा पर आय ७२ आठ कोस नैनागढ़ रहिगा तहँपर डेरादीन डराय ॥ तम्बू गड़िगा तहँ आल्हा का बैठे सबै शूरमा आय ७३ ऊंचे ऊंचे तम्बू गड़िगे नीचे लागीं खूब बजार ॥ कम्भर छोरे राजपूतन ने हाथिन हौदा धरे उतार ७४ तंग बछेड़न की छोरी गईं क्षत्रिन धरा ढाल तलवार ॥ बनी रसोई राजपूतन की सबहिनजेंयलीन ज्यँवनार ७५ गा हरकारा तब तहँनाते जहँना भरीलाग दरबार ॥ बैठक बैठे सब क्षत्री हैं एकते एक शूर सरदार ७६ गम् गम् गम् गम् तबला गमकैं किन् किन् परी मँजीरन मार ॥ को गतिबरणै सारंगी कै होवै नाच पेतुरियन क्यार ७७ खये अफीमनके गोला कोउ पलकैं मूंदैं औ रहिजायँ ॥ कोऊ जमाये हैं भांगनको मनमाँ रहे रामयश गाय ७८ उड़ै तमाखू बुटवल वाली धुँवना रहा तहांपर छाय ॥ हाथ जोरि औ बिनती करिकै धावन बोल्यो शीशनवाय ७९ अईं बरातें क्यहु राजाकी धूरे परीं आजही आय ॥ आठकोस केहैं दूरीपर सांची खबरि दीन बतलाय ८० सुनिकै बातें नयपाली ने तीनों लड़का लये बुलाय ॥ जोगा भोगा औ बिजियाते राजा बोल्यो बचन सुनाय ८१

आल्हाका विवाह । १२५ ६ जावो जल्दी तुम धूरेपर हमको खबरि सुनावो आय ॥ सुनिकै बातें तीनों चलिभे धूरे तुरत पहुंचे जाय ८२ ऊंचे टिकुरी तीनों चढ़िकै दूरिते लखैं तमाशा भाय ॥ देखिकै फौजें मलखाने की तीनों गये तहाँ सन्नाय ८३ तीनों लौटे त्यहि टिकुरीते अपने महल पहुंचे आय ॥ भोजन केरी फिरि बिरियामाँ राजै खबरि दीन बतलाय ८४ लगी कचहरी हाँ आल्हाकी भारी लाग तहाँ दरबार ॥ बैठक बैठे सब क्षत्री हैं एकते एक शूर सरदार ८५ मीराताल्हन बनरसवाले आली खानदान के ज्वान ॥ बड़े पियारे ते क्षत्रिनके अपने धर्म कर्म अनुमान ८६ सच्चे साथी रहें चारों के यारों मानों कही हमार ॥ ऐसे होते जो सय्यद ना कैसे बने रहत सरदार ८७ अली अलामत औ दरियाखाँ बेटा जानबेग सुल्तान ॥ औरो लड़का रहें सय्यदके एकते एक रूप गुणखान ८८ मन्नागूजर मोहबे वाला बैठा बड़ा सजीला ज्वान ॥ रुपनाबारी ते त्यहि समया बोले तहाँ बीर मलखान ८९ ऐपनावारी बारी लै कै राजैद्वार पहुंचो जाय ॥ सुनिकै बातें मलखाने की रुपना बोला शीशनवाय ६० औरो नेगी मोहबे वाले आये साथ बनाफरराय ॥ ऐपनावारी बारी लै कै द्वारे मूड़ कटावै जाय ६१ सुनिकै बातें ये रुपना की बोले तुरत उदयसिंहराय ॥ तुमको नेगी हम मानैं ना जानें सदा आपनो भाय ६२ दादा बियाहन को रहि हैं ना बतियाँ कहिबे को रहिजायँ ॥ यश नहिंजावै नर मरिजावै परहित देवै मूड़क़टाय ६३