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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १२] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४६१

सर्गः १२] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४६१

अथ रामो ददौ ताभ्यो वरान्स्वास्तोषयन् प्रभुः । पूर्वं भृगुश्रवं भो नार्यः पुरा व्यासाग्रतो मया ॥७१॥ बहुस्त्रीहेतुना रूपमूर्त्तयः षोडशांगिनाः । तासां दानेन संतुष्टास्ते विप्रा मां सदाऽब्रुवन् ॥७२॥ फलं सहस्रगुणितं तवास्तु रघुनन्दन । अनन्तरूनतश्चाहं द्वापरे कृष्णरूपधृक् ॥७३॥ करोमि पाणिग्रहण युष्माकं द्वारकापुरि । यूयं नानान्नृपाणां च भविष्यथ् बालिकास्तदा ॥७४॥ भौमासुरस्तदाऽयं वै दुन्दुभिस्तु भविष्यति । भौमासुरश्च युष्माकं पूर्ववन्म हरिष्यति ।७५॥ तदा सर्वा मोचयिष्ये हत्वा तं जगतीसुतम् । ततो मया सुखेनैव क्रीडध्वं हि यथारुचि ॥७६॥ एवं ता रामवाक्यं तच्छ्रुत्वा प्रमुदिताननाः । आनन्दोत्फुल्लनयनाः सुखमापुर्वरांगनाः ॥७७॥ एतस्मिन्नंतरे रामं पश्यन्तो लक्ष्मणादयः । शनैर्मात्राप्युस्तत्र पदांकितपथा प्रभुम् ।७८॥ षोडशस्त्रीसहस्राणां मध्ये दृष्ट्वा रघूत्तमम् । परं विस्मयमापुस्ते प्रणेमुर्जगदीश्वरम् ॥७९॥ श्रुत्वा राममुखात्सर्वं यथावृत्तं सांत्वनंगम् । सर्वं मन्तुष्टमनसस्तस्थुः धाराद्यग्रतः ।८०॥ ततो रामाज्ञया दूताः शतशोऽथ सहस्रशः । वाहनान्यामयामासुः सेशास्तत्स्थलन्मुदा ॥८१॥ तेषु ताः स्वाः सुमध्योप्य वाहनेषु रघूत्तमः । शनैः सेनानिवासे स ययौ सीतांतिके प्रभुः ॥८२॥ ततस्ता जानकीं नेमुः सीतां वृत्तं रघूत्तमः । यथा वृत्तं तथा सर्वं कथयामास कौतुकात् ॥८३॥ ततस्ताः पूजयामास वस्त्रराभरणैरसौ । ततो रामः स कासारं सेनावासस्थलांतिके ॥८४।

के श्लोकोंका पाठ किया करें ॥७० ॥ १२ । इसके अनन्तर उनको वरदान देते हुए रामचन्द्रजी कहने लगे—हे स्त्रियों ! बहुत दिनोंकी बात है कि मैंने एक समय बहुत-सी स्त्रियोंको पानका इच्छासे व्यासजीके सम्मुख सुवर्णको सोलह स्त्रियां बनवाकर ब्राह्मणोंको दान दिया था । इससे प्रसन्न होकर उन विप्रोंने हमसे कहा—हे रघुनन्दन ! तुम्हें इस दानका सहस्रगुणा फल प्राप्त होगा अर्थात् सोलहके बदले सोलह हजार स्त्रियां प्राप्त होंगी । अतएव उनके आशीर्वादनानुसार द्वापरमें कृष्णका रूप धारण करके ॥ ७१-७३ ॥ मैं तुम सबोंका द्वारकापुरीम पाणिग्रहण करूँगा उस जन्ममें तुम अनेक राजाओंकी कन्याएं होओगी । दुन्दुभी राक्षस जिसको कि बालिने मार डाला है, उस जन्ममें भौमासुर होगा और इस जन्मके समान ही तुम्हारा हरण करेगा ॥ ७४ ॥ ७५ ॥ उस समय में भौमासुरको मारकर तुम सबोंको छुड़ाऊँगा और तबसे तुम सब आनन्द हमारे साथ बिहार करोगी ॥ ७६ । इस प्रकार रामके वाक्य सुनकर उनका चेहरा खिल उठा और वे अत्यन्त आनन्दित हुईं ॥ ७७ ॥ इसी समय रामको खोजते हुए उनके पैरोंके निशान देखत-देखते लक्ष्मणादि साथी भी वहीं आ पहुंचे । जब उन्होंने सोलह हजार स्त्रियोंके बीचमें रामको देखा तो बड़े विस्मित हुए और जगदीश्वर रामको उन लोगोंने प्रणाम किया । ७८ ॥ ७९ ॥ जब रामने उन स्त्रियोंका वास्तविक वृत्तान्त बतलाया तो वे बहुत प्रसन्न हुए और रामके आगे बैठ गये ॥ ८० ॥ इसके अनन्तर रामकी आज्ञासे हजारों वाहन आये । जिनपर उन स्त्रियोंको बिठाकर रामचन्द्रजी शिविरकी ओर चले, जहाँ कि सीताजी बैठी थीं ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ वहाँ पहुँचकर उन सब स्त्रियोंने सीताको प्रणाम किया और रामने उनका जो सच्चा-सच्चा हाल था, सो कह सुनाया । ८३ । इसके बाद सीताने अनेक वस्त्रों वाभरणादिसे उनका सत्कार किया । थोड़ा देर बाद रामने अपने शिविरके पास ही एक उत्तम सरोवर देखा, जो कमलों

४६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२

ददर्श सुमहच्छ्रेष्ठं स्पटंयततपां पतिम्। घनपादपमध्यस्थं सुतीर्थसलिलं शुभम् ॥८५॥ विशालं विकचाम्भोजमधुमत्तध्रुवद्रुतम् पद्मनीरत्नसंयुक्तं छन्नं मरकतैरिव ॥८६॥ स्वच्छन्दपुच्छलन्मत्स्यं स्वच्छं मानुषमना यथा। चलज्जलचराद्भिन्नवीचिराजिविराजितम् ॥८७॥ अन्तर्ग्राहगणक्रूरं खलानाभिव मानमम् कचिच्छेवालदुद्गम्यं कृपणस्येव मर्ददम् ॥८८॥ नानाविहङ्गसङ्घार्ति शमयन्तं दिवाऽनिशम्। उदारमिव सर्वस्वैरापन्नार्तिहरं महत् ॥८९॥ तपयंतं हिमाम्भोभिः क्षापदन्स्यनितनिभ्रं । दृष्ट्वं सवमनाथं हिमांशुमिव चाह्निकम् ॥९०। तं दृष्ट्वाऽभूत्सुसन्तुष्टः सीतया रघुनन्दनः । तत्र स्नात्वा सुखं रामः कृतपाध्याह्निकक्रियः ॥९१॥ भुक्त्वा बन्धुजनैः सर्वैराखेटाणसंवृतः। उवास सरसस्तीरे रम्या मकतपनकथाः ॥९२। सतः शरासनं बाणं कृत्वा रात्रीं स्थितान्नरीं । व्याधाः संधानपास्थाय रुरुधुः ककुमो पयः ।९३॥ एवं स्थितेषु वीरेषु वने विस्तार्य वागुराः। निद्रार्थ निर्गतं यूथं शूकराणां सरस्तटे ॥९४॥ चरित्वा सागसीकंदान् पपात व्याधमण्डले गत्वा विद्धास्तदाऽक्रीडा व्याधैश्च बहवो हताः ॥९५॥ क्षणेनैव वराहास्ते विद्धाः पेतुर्महीतले। तान्हत्वा तुमुलं नादं चक्रुर्वाधाः मुदान्विताः । ९६। धावन्तोऽपि मुदा तत्र मिलिता यत्र भूपतिः। तान्प्रदाय महैर्भूपः सेनानाथं ययौ पुनः ॥९७॥ एवं सप्तादिनान्येव स्थित्वा रामो वने सुखम्। भुक्त्वा नानाविधान् भोगान् सीतया सपुरा ययौ ।९८॥

गहराईसे समुद्रको मात कर रहा था, उसके आसपास घना वृक्षावली लगी हुई थी, स्थान-स्थानपर घाट बने हुए थे और पवित्र जल भरा था ॥८४॥ ८५॥ उसकी लम्बाई चौड़ाई का पार नहीं था खिले हुए कमलके फूलोंपर भौंर गुञ्जार रहे थे, फैले हुए पुरइनके बड़े बड़े पत्ते मरकतके समान सुन्दर लग रहे थे ॥८६॥ सज्जन प्राणीके मनकी तरह स्वच्छन्दतापूर्वक मछलियाँ खेल रही थीं। जलचर प्राणीगणके इधर-उधर चलनेके कारण बार-बार उसमें लहर उठ रही थी ॥८७॥ खल मनुष्यके हृदयके समान उसमें कितने ही घड़ियाल भरे थे। कहीं-कहीं कंजूस प्राणीके धनकी तरह सिवार भरा था, इससे उसमें प्रविष्ट होना दूभर लगता था ॥८८॥ दिनरात कितने ही पक्षी आकर अपनी थकावट दूर कर रहे थे। इससे वह सरोवर किसी ऐसे सज्जनके समान मालूम पड़ता था जो अपना सर्वस्व लुट कर गरीब तथा विपद्ग्रस्त जनोंका रक्षण तत्पर हो ॥८९॥ अपने ठंढे जलसे वह उसी तरह वनके जीवोंकी प्यास बुझा रहा था, जैसे चन्द्रमा दिन भरके परिश्रमसे दुःखी जनोंका समस्त पीड़ा रातमें हरण लिया करता है ॥९०॥ उस सरोवरको देखकर सीता तथा रामचन्द्र बहुत प्रसन्न हुए। उसमें स्नान किया, मध्याह्न कालका नित्यनियम किया और भोजन किया। फिर सारे शिकारियोंके साथ लेकर उसी तड़ागके समीप डेरा डाल दिया और अनेक तरहकी कहानियाँ कहते-कहते समय काटने लगे ॥९१॥९२॥ जब रात्रिका समय हुआ तो बहेलियेगण अनेक सामान लेकर चारों ओरसे उस तड़ागको घेर लिया और रामचन्द्रजी अपना धनुष बाण ठीक करके एक वृक्षके ऊपर जा बैठे ॥९३॥ जब कि व्याध जाल बिछाकर तत्परताके साथ सरोवरके चारों तरफ बैठ गये और ठीक मध्या रातका समय हुआ, तब वनसे शूकरों-का एक यूथ आ पहुँचा ॥९४॥ तालाबमें उत्पन्न कन्द खाकर वह शूकरयूथ बहेलियोंके ऊपर टूट पड़ा। उस समय बहुतसे शूकरोंको रामचन्द्रजीने मार डाला और बहुतोंको बहेलियोंने समाप्त कर दिया ॥९५॥ क्षणभरमें वे सारे शूकर मार डाले गये। उनको मारनेके अनन्तर व्याधोंने प्रसन्नताका कोलाहल मचाया ॥९६॥ सब बहेलिये मारे शूकरोंको दौड़ते हुए उस स्थानपर पहुँचे जहाँ रामचन्द्रजी बैठे थे। तब राम उन सबोंको तथा

सर्गः १२ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४१३

सर्गः १२ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४१३


ततो विप्रान्नृपान् वैश्यान् समाहूय रघूत्तमः ।
या यस्य दुहिता नारी या यस्य पुत्रपुत्रिका ॥ ९९ ॥
तस्मै तस्मै ददौ तां तामेवं सर्वा व्यसर्जयत् ।
वस्त्रालङ्कारभूषाद्यैः शोभयित्वा पृथक् पृथक् ॥ १०० ॥
ते विप्राद्याः पुनर्जाता मेनिरे निजबालिकाः ।
सतः स्वं स्वं पुरं नीत्वा भृशं वैश्याः प्रमोदिताः ॥ १०१ ॥
नृपपुत्रैर्विप्रपुत्रैस्तासां चक्रुः सुमङ्गलम् । रामप्रसादात्ताः प्रापुः पतिमग्र्यसुखं स्त्रियः ॥ १०२ ॥
ताश्चापि द्विजपुत्र्यस्तु पितृगेहमेव सर्वसु ।
निन्युः स्त्रीयायुषं तत्र व्रतचर्यादिभिः सुखम् ॥ १०३ ॥
विवाहकालानतिक्रमणात्न ता उद्वहिता द्विजैः ।
जन्मान्तरेण ता सर्वाः कृष्णः पत्नीः करिष्यति ॥ १०४ ॥
अथ रामः सुबाहोश्च पुत्रस्य मथुरां पुरीम् । विवाहार्थं सीतया स पौरांजनपदैर्ययौ । १०५॥
तत्र वैवाहिकं कर्म मपाद्य रघुनन्दनः । तस्थौ तत्र द्विपन्कालं मथुरायां यथासुखम् ॥ १०६॥
एकदा जानकीवाक्यात्कालिन्द्याः सङ्गमे शुभे । निशायां हेमपर्यङ्के सुखं सुष्वाप राघवः ॥ १०७॥
एतस्मिन्नन्तरे दासीर्दासान् दृष्ट्वा विनिद्रितान् ।
स्त्रीरूपेणाथ कालिंदी समांघ्रि संस्पृशच्छनैः ॥ १०८ ॥
ततो रामः प्रबुद्धाऽभूददर्श पुरतः स्थिताम् ।
सूर्यस्य तनयां पुण्यां कालिंदी कंजलोचनाम् ॥ १०९॥
दिव्यालङ्कारवस्त्राढ्यां दिव्यगन्धसुगन्धिताम् । नीलोत्पलदलश्यामां हेमकुंभपयोधराम् ॥ ११०॥
स्मिताननां सुरूपांरु किंकिणीजालमालिकाम् ।
केयूरकुंडलाढ्यां तां प्रोन्नत्तस्तनां वराम् ॥ १११॥

सैनिकोंको साथ लेकर अपने शिविरको लौट आये । इस प्रकार सात दिन वनमें रहते हुए अनेक तरहके सुखोंका उपभोग करके राम अपनी अयोध्यापुरीको लौट पड़े ॥ ९३ ॥ ९८ ॥ इसके अनन्तर दुन्दुभी द्वारा हरण की हुई उन कन्याओंको जो जिसकी पुत्री थी, उन-उन राजाओं, ब्राह्मणों तथा वैश्योंको बुलाकर दे दी और उन बालिकाओंको वस्त्राभूषणादिसे अलंकृत करके विदा कर दिया ॥ ९९ । १०० ॥ वे ब्राह्मणादिक अपनी कन्याओंका पुनर्जन्म मानकर रामके आज्ञानुसार अपन-अपन घरोंको ले गये और नृपों तथा वैश्योंने अच्छे वरोंके साथ उनका विवाह कर दिया । रामचन्द्रजीकी कृपासे उन सबको पतिके साथ विहार करनेका सुख प्राप्त हुआ ॥ १०१ ॥ १०२ ॥ उनमेंसे जो ब्राह्मणों की कन्यायें थी, वे विवाहकाल व्यतीत हो जानेके कारण विवाह न करके यूं ही पिताके घरपर व्रत-उपवासादि करके अपना जीवन यापन करने लगीं । क्योंकि उनको यह विश्वास हो गया था कि दूसरे जन्ममें स्वयं श्रीकृष्णचन्द्रजी मेरे पति होंगे ॥ १०३ ॥ १०४ ॥ कुछ दिनों बाद सुबाहुका विवाह करनेके लिये रामचन्द्रजी सीताके साथ मथुरापुरी गये ॥ १०५ ॥ वहाँपर विवाहका सारा कार्य सम्पादन करके कुछ दिन मथुरामें ही रहे ॥ १०६ ॥ एक दिन सीताके कहनेसे रामचन्द्रजी यमुनाके तटपर सोये । उस समय वहाँके सब दासों और दासियोंको निद्रित देखकर एक स्त्रीका रूप धारण किये यमुना स्वयं रामके पास गयी और जोरसे उनका पैर पकड़ा ॥ १०७ ॥ १०८ ॥ उसके ऐसा करनेपर रामचन्द्रजी जाग गये और सामने सूर्यकी पुत्री तथा कमलके समान नेत्रोंवाली कालिन्दीको देखा ॥ १०९ ॥ उस समय उसके शरीरमें दिव्य वस्त्राभूषण पडे थे । पैरोंमें सुन्दर नूपुर छनछना रहे थे । नील कमलकी पंखुड़ियोंके समान उसका रङ्ग था और सुवर्णकलशके समान उसके स्तन थे ॥ ११० ॥ मुस्कुराता हुआ मुख

५६४आनन्दरामायणे[ सर्गः १२

तां तादृशीं प्रसमीक्ष्य क्षणं तूष्णीं व्यचिन्तयत् । धन्यो विधाता येनेयं कालिन्दी रचिता पुरा ॥११२॥
इत्याश्चर्यमना भूत्वा तत्सौंदर्यं व्यलोकयत् । अथ रामः स तां प्राह वदागमनकारणम् ॥११३॥
सा प्राह तं विलज्जन्ती सर्वं त्वं वेत्सि राघव । ततो रामोऽब्रवीद्भद्रे चैकपत्नीव्रतं मम ॥११४॥
इह जन्मनि कालिन्दि त्वं याहि स्वस्थलं जवात् ।
यावत्सीता प्रबुद्धा न जायेत तावदेव हि ॥११५॥
सा रामवाक्यैर्वज्रैरिव भिन्नमरुत्स्थला भुवि । मूर्च्छामापाथ तत्रैव तां दृष्ट्वा सोऽब्रवीत् पुनः ॥११६॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ कालिन्दि शृणु त्वं वचनं मम । द्वापरे कृष्णरूपेण त्वां करिष्याम्यहं स्त्रियम् ॥११७॥
विवाह्यैव मयासार्धं तदा भोक्ष्यसि मन्सुखम्
इति श्रुत्वा रामवाक्यं किंचित्तुष्टमना नदी ॥११८॥
नत्वा रामं ययौ तूष्णीं रामध्यानपरायणा ।
ततो रामोऽपि सैन्येन सीतया स्वपुरीं ययौ ॥११९॥
एवं स केतवनगरे रामः स्त्रीवधुरेहजैः ।
चरित्राण्यकरोन्नाना पापनाशानि श्रवादिना ॥१२०॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे
षोडशसहस्रस्त्रियवकालिन्दीप्यवश्रीत्वदर्शनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥


था, केलेके खम्भेकी तार्ह उसकी जंघायें थीं किङ्कणी केयूर कुण्डल आदि आभूषण अपनी छटा दिखा रहे थे ॥ १११ । इस प्रकारकी एक अपरिचित नारीको अपने सामने देखकर राम थोडी देर तक यह सोचते रहे कि विधाता धन्य है, जिसने कालिन्दी जैसी नारीकी रचना की है । ११२ ॥ इस प्रकार विचार करते हुए वे उसका सौन्दर्य देखते रहे। इसके अनन्तर उससे कहने लगे-तुम अपने आनेका कारण बतलाओ ॥ ११३ ॥ रामकी बात सुनकर सकुचाती हुई कालिन्दीने कहा- हे राघव ! तुम सब कुछ जानते हो। फिर रामने कहा कि हे कालिन्दी ! इस जन्ममें मैंने एकपत्नीव्रत धारण कर रक्खा है। इसलिये सीता जाग जाय, इसके पहले ही तुम यहाँसे चली जाओ ॥ ११४ । ११५ ॥ रामके ये वाक्य वज्रके समान उसके हृदयमें लगे, जिससे वह वहींपर मूच्छित होकर गिर पड़ी। फिर रामने कहा कालिन्दी ! उठो-उठो, मेरी बात तो सुनो। द्वापर-युगमें मैं कृष्ण होकर तुम्हें अपनी स्त्री बनाऊँगा, आज तुम लौट जाओ। जन्मान्तरमें तुम मेरे साथ विहार करके सुखी होओगी। इस प्रकारकी बात सुनकर यमुनाको कुछ सन्तोष हुआ ॥ ११६-११८ ॥ तदनन्तर रामको प्रणाम करके उनका ध्यान करती हुई वह लौट गयी। उधर राम भी अपनी सेना तथा सीताके साथ अयोध्या चले गये ॥ ११९ । इस तरह रामचन्द्रजी साकेतपुरमें अपने पुत्रों तथा सीताके साथ अनेक लीलायें किया करते थे, जिनका श्रवण करनेसे समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १२० ॥ इति शतकोटि-रामचरितामृते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥

॥ इति राज्यकाण्डं पूर्वार्द्धं समाप्तम् ॥

श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु ।

श्रीसीतापतये नमः

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत-

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्


राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्)

त्रयोदशः सर्गः

( राम द्वारा राज्यभरमें हास्यपर प्रतिबन्ध )

श्रीरामदास उवाच

अथैकदा रमाजानिः सुहृद्भिः सदसि स्थितः । वीजितश्चामरेणैव लक्ष्मणेनातिशोभितः ॥ १ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र पौरः कश्चिद्रमार्थितः । वाराङ्गनानां नृत्यादि दृष्ट्वा हास्यं चकार सः ॥ २ ॥
तद्धास्यं राघवः श्रुत्वा सस्मार पूर्वचेष्टितम् । लङ्कायां युद्धसमये रावणस्य शिरोऽपि खात् ॥ ३ ॥
रामबाणान्स्मृतिं लब्ध्वाऽस्माभिश्चेति विहस्य च । श्रीपादं वन्दनं कर्तुं पतन्ति स्म प्रभुं पुनः ॥ ४ ॥
तेषां विकरालतां दृष्ट्वा दंतादीनां रघूत्तमः मद्भक्षुं हि पुनर्यान्ति शिरांस्येतानि खादिति । ५ ॥
रामो भीत्या पुनस्तानि खे शिरांस्त्यक्षिपच्छरैः । एकोत्तरशतान्येव वारं वारं स्वरान्वितः । ६ ॥
तदृष्ट्वा राघवः स्मृत्वा किं दशास्यस्य वै शिरः समागतं सभामध्येत्येति पार्श्वेष्वलोकयत् ॥ ७ ॥
मायाविनो राक्षसाश्च सन्त्यत्रेति विचिन्त्य च । एवं यदा यदा हास्यं स शुश्राव रघूत्तमः ॥ ८ ॥


श्रीरामदासजी बोले—एक दिन रामचन्द्रजी अपने मित्रोंके साथ सभामें बैठे थे। उस समय रामपर चँवर चल रहे थे और लक्ष्मण रामके पास बैठे हुए थे। इसलिए रामकी शोभा कईगुना अधिक दिखायी दे रही थी ॥ १ ॥ इसी समय सभाका कोई नागरिक वेश्याओंका नृत्य देखकर जोरोंके साथ हँस पड़ा ॥ २ ॥ उस हास्यको सुना तो रामको उस समयकी एक बात याद आ गयी, जब वे लङ्कामें रावणके मस्तकोंको अपने बाणोंसे काटकर आकाशमें उड़ा देते थे तो वे मस्तक यह समझकर कि रामके बाणोंसे मेरी बुद्धि ठिकाने आयी है। इस भावसे हँसते हुए ऊपरसे फिर नीचे आकर रामके चरणोंमें लोटते हुए वन्दना करने लगते थे ॥ ३ ॥ ४ ॥ उनके दाँतों आदिकी विकरालता देखकर रामको यह ख्याल होता था कि ये मस्तक मुझे खाने आ रहे हैं। इस लिए उन्हें फिर बाणों द्वारा आकाशमें उड़ा दिया करते थे। यह उपाय रामको एक दो बार नहीं पूरे एक सौ एक बार करने पड़े थे ॥ ५ ॥ ६ ॥ उसी बातको स्मरण करके रामने सोचा कि कहीं रावणके मस्तक ही तो इस सभामें आकर अट्टहास नहीं मार रहे हैं। इस भावसे उन्होंने अपने आस-पास विस्मयभरे नेत्रोंसे देखा । ७ ॥ क्योंकि उनका ख्याल था कि राक्षस मायावी होते हैं, शायद यहाँ भी आ जायें तो क्या आश्चर्य है। इस तरह राम जब कभी किसीका हास्य सुनते

७६६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १३

तदा तदा पूर्ववृत्तं स्मृत्वा पार्श्वं व्यलोकयत् । ततो रामः श्रुतं किञ्चि द्विनयामास सादरम् ॥९॥ यदा यदा श्रूयतेऽत्र हास्यं केनापि यत्कृतम् सदा तदा दन्तपङ्क्त्या दिष्टं हास्यं स्मराम्यहम् ॥१०॥ मायाविनो राक्षसास्ते मां विप्रतार्य पुनश्चित्रात् । माममुत्र यास्यन्ति त्विति मत्वा सचेतसि ॥११॥ अन्यच्च निंदितं हास्यं नीतिशास्त्रेषु सर्वदा । अतो हास्यं वर्जयामि सर्वेषां भूनिवासिनाम् ॥१२॥ इति निश्चित्य हृदये लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् । दुन्दुभिं घोषयस्वाद्य पुर्यां राष्ट्रेऽवनीतले ॥१३॥ स्मिताननो नरः कश्चिन्नारी वाप्यथ सुहृच्च यः । सीता वा तनयो बंधुः स मे दृश्या भवेदिति ॥१४॥ तथेति रामवाक्येन घोषयामास दुन्दुभिम् । पौरा जानपदाः सर्वे श्रुत्वा शिक्षाध्वनिं प्रभोः ॥१५॥ रामदण्डभयात् सर्वे न चक्रुस्ते स्मिताननम् । वारांगनानृत्यगीते नटगीतप्रवर्तने ॥१६॥ स्त्रीभिः सुहृद्भिर्मित्रैश्च विनोदानुत्सवोत्सवान् वरान् । मांगल्यानि च कर्माणि हास्यकारीणि नाचरात् । १७॥ वस्त्रसंग्रहकाभिश्च कौतुकानि हि यानि च । तूर्यघोषादिमाङ्गल्यकर्माणि विविधाः कथाः ॥१८॥ मात्रव्यंग्योत्सवान् सर्वान् यात्रायज्ञोत्सवान् शुभान् । कौतुकानुत्सवांश्चैव विवाहादिषु कर्मसु ॥१९॥ कांश्चित्कथञ्चापि न चक्रुश्च कदा जनाः । ययौ नावश्यककार्याद्विना सदसि कः प्रभुम् ॥२०॥ पुराणानीतिहासांश्च न पठन्ति स्म केचन । गर्भाधाने पुंसवनेनामकर्मादिषूत्सवान् ॥२१॥ पौरा जानपदाः सर्व मप्रष्टांगनिवासिनः । एतानि हास्यकारीणि नानाकर्माणि भूतले ॥२२॥ रहस्यपि न चक्रुस्ते रामदण्डभयात् कदा । एवमासीद्वर्षमेकं तदा भूम्यां कदापि हि ॥२३॥ स्मिताननं कस्य नारीन्न वक्त्रमंडनादिकम् । तदोग्यहृद्देवताश्च नानाकर्मोद्भवेववाः ॥२४॥ इन्द्राय कथयामासुस्तद्वृत्तं जगतीभवम् । इंद्रादीनां सुराणां च कर्माद्यरुचनादि हि । २५॥ नासीद्यदा जगत्त्यां हि तदेंद्रोऽकथयद्विधौ । तदा सुरु विविः प्राह न समाश्चेवरू हि नः ॥२६॥

तो उनका ध्यान उसी ओर आकृष्ट हो जाया करता था और अपने अगल-बगल निहारने लगते थे। इस समय रामने उस हास्यको सुनकर क्षणभर विचार किया और लक्ष्मण कहने लगे—॥८॥ ९ ॥ जब कभी मैं किसीका हास्य सुनता हूँ तो मुझे रावणकी हंसी स्मरण आ जाया करती है और यह ख्याल होता है कि वे मायावी राक्षस जिनको कि मैंने मार डाला है, धोखा देकर मुझे लानेके लिए फिर तो नहीं आ गये हैं ॥ १० ॥ ॥ ११ ॥ दूसरे नीतिशास्त्रम भी हास्यकी निन्दा की गयी है । इसीलिए आजसे मैं भूतलपर रहनेवालोंको हंसनेकी मनाही करता हूं । इसके बाद लक्ष्मणसे बोले कि मेरे राष्ट्र तथा पृथ्वीतल भरम डुगी पिटवाकर कहला दो कि कोई स्त्री पुरुष, मेरा मित्र, स्वयं सीता तथा मेरे बेटा या भाई भी न हँसे । जो इस आज्ञाके विपरीत चलेगा, उसे दण्ड भुगतना पडेगा ॥ १२-१४ ॥ लक्ष्मणने रामके वाक्यनुसार सारे और दुंदुभी बजवा-कर रामकी यह आज्ञा घोषित करा दी। जितने पुरवासी अथवा देशवासी थे, उन्होंने प्रभुकी इस शिक्षाध्वनि को सुनकर दण्डक भयसे हमेशाके लिये हँसना छोड़ दिया । वेश्याओके नृत्य, गान, नाटक, स्त्रियों या मित्रोंके साथ हंसी-दिल्लगी आदि ऐसे सब काय बन्द कर दिये गये, जिनमें हँसा आनेका अन्देशा रहता था ॥ १५-१७ ॥ उस समय बाँसपर चढ़कर नाचने आदिकी कथा, दुन्दुही-नगाड़े आदिके बाज, गाना, गान सावत्सरिक उत्सव, विवाह आदि मङ्गल कार्योंम भी हंसी आनेवाले खेल-कूद और गप शप आदि बातोंको बन्द कर दिया और बिना किसी विशेष कामके काई रामकी सभा में भी नहीं जाता था । १८-२० । लोगोंस पुराण-इतिहास आदिका भी पढ़ना छोड़ दिया । गर्भाधान, पुंसवन, नामकर्म आदि उत्सवोंमें हंसी न आने देनेका पूरा पूरा ध्यान रक्खा जाता था। मतलब यह कि सारे पुरवासी एवं देशवासी हास्योत्पादक कामोंको नहीं करते थे। रामके दण्डभयसे कोई एकान्तमे भी नही हँसता था। यह अवस्था एक वर्ष तक चलतीरही। इस बीचमे भूतलनिवा सियोंमेसे किसीका भी मुखमण्डल मुसकराता हुआ नहीं दीखा और किसीने भी अपना शृङ्गार आदि नहीं किया। ऐसी अवस्था में जितने ही कर्माङ्गदेवता और बहुतसे उत्साहोद्भवता एकत्रित होकर इन्द्रके पास गये ॥ २१-२४ ॥ उन्होंने पृथ्वीतलके उस समाचारको कह सुनाया । जब इन्द्रने सुना कि हम देवताओं-

सर्गः १२] गद्यकाव्यम् (उत्तरार्द्धम्) ४६७


नैवोपदेटुं योग्यः स ममापि जनरुच्युपः। युक्त्या कार्यं साधयामि येन वोऽद्य हितं भवेत् ॥२७॥
इत्याश्वास्य सुरान् सर्वान्विधिर्भूण्डलं ययौ। अयोध्यायाश्च सीमायां दृष्ट्वा वृक्षं सुविस्तृतम् ॥२८॥
स्वयं दिव्येण रूपेणो दृष्ट्वा पामरान् जहाश सः। एतस्मिन्नन्तरे कश्चिल्लक्कड़हारहः पुमान् ॥२९॥
श्रुत्वा पिप्पलहास्यं अनेन दीर्व जहाह सः। ततः स मतवाहश्च ययौ दृष्टं प्रमोः पुरेऽथ ॥३०॥
काष्ठभारक्रियाथै तत्र स्मृत्वा स्मितं हृदि। बणपुत्रस्य सोऽप्युच्चैर्न समर्थो निरोधितुम् ॥३१॥
द्वारपालस्य हास्यं तद्भावदूतोऽथ शुश्रुवे। राजदूतौ जहामोच्चैर्न समर्थो निरोधितुम् ॥३२॥
राजदूतः सभां गत्वा द्वारपालस्य यत् स्मितम्। हृदि स्मृत्वा जहामोच्चैरन्तस्स्थास्ते समासदः ॥३३॥
सभायां बहुगुः सर्वे रुन्द्ध्वा राघवोऽपि गः। उच्चैर्जहास सदसि दर्शितहामने स्थितः ॥३४॥
रामो विचारयामन्त किमर्थं हसितं मया। यस्मिस्रं सदा दण्डं वीगन् जानपदान्द्विजान् ॥३५॥
अहं करोमि सोऽप्यहं सभायां हसितः कथम्। दण्डयिष्यति मा कोऽप्य किंवां पौरा वदन्ति हि ॥३६॥
अस्माकमेव शिक्षाऽस्ति सर्वदा राघवस्य ना। न कथं हसितस्याथ सर्वैर्वा पुरत स्फुटम् ॥३७॥
शिक्षां करिष्यति विभोः कोऽप्य मिति वदंति ते। मानयिष्यति नाऽस्मते सभाणे शिक्षित जनाः ॥३८॥
अमंतव्यं व्रतं योग्यमिति रामस्त्वमन्यत। पुनर्जेहस श्रीगमस्तन्निरोद्धुं न सक्षमः ॥३९॥
ततो रामोऽब्रवीत्पौरान् सभास्थान्स्स्मितान्नभः। किमर्थं हसिता यूष मेम्बो हास्य मनापि हि ॥४०॥
प्रणागतं सभाणध्ये पौराः प्रोचुर्नृपोत्तमम्। दृष्ट्वा स्वदूतहाम्य हि तेनास्माक मनागतम् ॥४१॥
तत् पौरवचनं श्रुत्वा दूतमह रघूत्तमः। त्वया किमर्थं हसितं सोऽब्रवीत्पृष्ठनन्दनम् ॥४२॥


के क्योंकि पुत्रदादि मत्कार्य लुप्त होने जा रहे हैं तो ब्रह्माके पास जाकर यह बात बतायी। ब्रह्माजी कह कि रामचन्द्रजीके आगे हम बोलने कुछ भो शक्ति नहीं है ॥२५॥ २६॥ मैं उन्हें उपदेश नहीं दे सकता। क्योकि वे मेरे ईश हैं। इसलिए मैं किसी युक्ति अपना कार्यसाधन करूंगा कि जिससे आप लोगोंका कल्याण हो ॥२७॥ इस प्रकार उन्हें आश्वासन देकर ब्रह्माजी भूमण्डलकी ओर चल पड़े अयोध्याका सीमायार एक विशाल पिप्पल वृक्षको देखकर वे स्वयं उसके भीतर प्रविष्ट हो गए और उस रास्तेसे जाने-आनेवाले लोगोंको देख-देखकर जोरोंसे हंसने लगे। उसी समय एक लकड़हारा लकडोका बोझ माथेपर रखे हुए वहां आ पहुंचा। उसे यों देखकर पीपलके भीतर बैठे हुए ब्रह्माजी हंसे ॥२८॥२९॥ पीपलका हास्य सुनकर लकड़हारा पुने जोरोंसे हँसा और लकड़ोका बोझ लिए हुए अयोध्या नगरमें जा पहुंचा। गस्तमें उस पीपलकी हँसीवाली बात याद आ गयी और ठहाका मारकर हंस पड़ा। लेकिन क्षण भर बाद उसे रामको आज्ञाका स्मरण हो आया जिससे बेचारा शंकित हो उठा ॥३०॥३१॥ लकड़हारेकी हँसी सुनकर ओरपर-पर खड़ा सिपाही भी अपनी हँसी नहीं रोक सका । ३२॥ सिपाही सभामें गया तो उसे वहीं लकड़हारेकी हँसी याद आ गयी, जिससे वह हंस पड़ा। सिपाहीको हँसते देखा तो सभामें बैठे हुए लोग भी अपनी हंसी नहीं रोक सके और वे भी हंसने लगे ॥ ३३॥ इसपर सभामें लोगोंका हंसते देखकर रामचन्द्रका या हंसन गये । ३४॥ तब रामचन्द्रजी तुरन्त हंसी रोककर सोचने लगे—और लोग हंसे तो हंसे, मैं क्यों हंसा? जब मैं सारे भूमण्डलवासियोंका इस कामसे रोक रहा हूँ और दण्ड देता हूँ। तब मैं क्यो हंसा ? मुझे कौन दण्ड देगा ? और ये पुरवासी क्या कहेंगे ? यही न कि राम दूसरोंको ही शिक्षा देते हैं, प्रजाके वास्ते ही दण्डविधान करते हैं और स्वयं जो मनमें आता है सो कर डालते हैं। सब लोगोंके लिए जो हंसनेकी मनाही कर दी है, किन्तु स्वयं हजारों मनुष्योंके सामने ठठाकर हँसते हैं ॥३५-३७॥ इसका परिणाम यह होगा कि ये भविष्यमें मेरी बात नहीं मानेंगे। यह सब विचारकर रामने यह ठहराया कि मैंने बड़ी भारी भूल की है। लेकिन क्षणभर बाद ही रामको फिर हंसी आ गयी। पूरी चेष्टा करके भी वे हँसनेसे नहीं रुक सके ॥३८॥ तब रामचन्द्रजी सभाके लोगोंसे कहने लगे-आपलोग किस बातपर हंसे ? आप लोगोंको हंसते देख-कर मैं भी हंस गया। सभामें बैठे हुए पुरवासियोंने उत्तर दिया कि आपके सिपाहीको हंसते देखकर हमें

४५८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १३

भारवाहस्य हास्यं तन् स्मृत्वा प्रहसितं मया । तद्भूतवचनं श्रुत्वा भारवाहं तदा प्रभुः ॥४३॥
दर्शनीयं सदसि तमाह रघुनन्दनः । मा भीतिं भज प्रत्यक्षं सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः ॥४४॥
हेतुं किमर्थं हसितं त्वयाऽथ कथयस्व माम् । स भारवाहकश्चकितः शुष्ककंठोष्ठतालुकः ॥४५॥
वेपमानः स्खलद्वाचा राघव वाक्यमब्रवीत् । अयोध्यायाश्च सीमायामश्वत्थस्य मयाऽद्य हि । ४६॥
दृष्ट्वा प्रहसितं राजन् हेतुं हास्यं तथा श्रुतम् मद्दूर्वा तद्विद्रं स प्रभुः श्रुत्वा मुविस्मितः । ४७॥
दूतानुवाच भोऽगच्छध्वनेनेन सह वेगतः । यूयं गत्वाऽद्य द्रष्टव्यं किं सत्यं कथ्यते न वा ॥४८॥
अनेन भारवाहेन ते तथेति त्वरान्विताः । गत्वाऽश्वत्थमथोपरि दृष्ट्वातुस्ने स्मितं मुहुः ॥४९॥
तदाश्चर्यञ्च ते दूताः प्रहसंन्तोऽतिवेगवन्तः । अश्वत्थमद्रितं सर्वं गत्वा सर्वं न्यवेदयन् ॥५०॥
तद्भूतवचनं श्रुत्वा राघवश्चातिविस्मितः । राज्ये ममैतद्दुश्चिह्नं मे शिक्षा ले मुप्तमुत्थम् ॥५१॥
इति निश्चित्य मनसि दूताँश्चाज्ञापयन्तदा । छिद्यतां चलपत्रः स ममाज्ञाभङ्गकारकः ॥५२॥
तद्रामवचनादेव शतशोऽथ सहस्रशः । कुठारपाणयः शीघ्रमप्रययु दुर्द्रुमन्तदा । ५३।
हास्यमानं नगं दृष्ट्वा ते सर्वेऽतीव विस्मिताः । कुठारैरनं तदा छेत्तुमुद्यता राघवाज्ञया ॥५४॥
ताञ्छेत्तुकामान् सकलान् ग्राव्नान् स्वनिकट विधिः । क्षित्वाऽमन्त्रान्त समापोरात्स्वेध्वनिनर्र्तैः । ५५॥
उपलैश्छिन्नभिन्नाङ्गास्ते दूता लोहिताङ्किताः । कोलाहलं प्रकुर्वन्ता रामं द्रुतं न्यवेदयन् ॥५६॥
ततोऽतिविस्मितो रामः पुनर्दूतान् सहस्रशः । प्रेषयामास तं छेत्तुं धनुर्बाणसिधारिणः ॥५७॥
तेऽपि गत्वा नगं तेन ताड़िता उपलैर्दृढम् । छिन्नाङ्गा राघवं वेगात्सर्वं वृत्तं न्यवेदयन् ॥५८।
ततो रामोऽतिमक्रुद्धः सुमंत्र सेनया युतम् । प्रेषयामास तं वृक्षं छेत्तुं बुद्धिपुरःसरम् ॥५९।

हँसी आ गयी ॥ ३९-४१ ॥ पश्चात्कि सी बात सुनकर गमन सिपाहीसे पूछा कि तुम क्यों हँसे ? उसने कहा कि एक लकड़हारेका हँसना देखकर मुझे हँसी आ गयी । दूतका बात सुनकर रामने दूतों द्वारा लकड़हारको पकड़वा मगाया और उससे कहा कि किस प्रकारका भय न करके मुझ यह बतलाओ कि तुम काम्राश्चर्य क्यों हंस थे ? ॥ ४२-४५॥ वह उस नामका बात सुनकर चौकन्ना हो गया । उसके कंठ, ओष्ठ और तालू सूख गये, थरथर कांपन लगा और भयभीत हुए स्वरसे उसन उत्तर दिया कि अयोध्याके समीप ही एक पीपलका वृक्ष है। मैने बाजार आते समय उस वृक्षकी हंसी सुना और हंस पड़ा। नगरमें आया तो यहाँ भी एकाएक वह बात याद आ गयी और चेष्टा करके भी मे हंसीको नहीं रोक सका । उसकी यह बात सुनकर मुसकराते हुए रामचन्द्रजीने दूतोंको आज्ञा दी कि तुम लोग इसके साथ जाकर देखो कि यह जो कह रहा है, वह ठीक है या नहीं ॥ ४५-४८॥ उस भारवाहकके साथ-साथ दूत चले, पीपलके समीप गये और उसकी हंसी सुनी तो स्वयं खूब हंसे और लौटकर उसका वहाँका सच्चा वृत्तांत सुना दिया ॥ ४६॥ ५० ॥ दूतों-की बात सुनकर राम बहुत विस्मित हुए और सोचने लगे कि हमारे राज्यम यह एक बड़ा दुश्चिह्न उत्पन्न होकर मेरे शासनको ही लुप्त कर देना चाहता है। इस प्रकार विचार करके रामने दूतोंको आज्ञा दी कि उस पीपलके वृक्षको काट डालो। क्योंकि यह मेरी आज्ञा भङ्ग कर रहा है ॥ ५१॥ ५२ ॥ रामके आज्ञानुसार सैकड़ों हजारो व्यक्ति कुठार ललेकर उस वृक्षकी ओर चल पड़े । उस समय भी उस वृक्षका हंसन देखकर वे सब उसे काटनेको उद्यत हो गये । उनको देखकर बहुत उस वृक्षपरसे ही पत्थरके टुकड़े फेंक फेंककर मारन लगे । इस अपकारसे कितनों ही लोगोंका गहरी चोट आयी । रुधिरसे उनका शरीर भीग गया और चिल्लाते हुए उन्होंने रामके पास पहुंचकर वहाँका हाल बतलाया । ५३-५६ ॥ सो सुनकर रामको और भी आश्चर्य हुआ और फिर हजारो दूतांका वह वृक्ष काटनेके लिए भेजा । धनुष बाण एवं तलवार धारण किये हुए वे दूत जब वृक्षके पास पहुंचे तो फिर प्रयागे पत्थर फेंक फेंककर मारा, जिससे भिन्नमस्तक हो उन सबने लौटकर रामको यह समाचार सुनाया। ५७ ॥ ५८ ॥ सब रामने कुपित होकर बहुत सी सेनाके साथ

सर्गः १२] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४६९

सर्गः १२] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४६९

सुमन्त्रो राघवं नत्वा सेनया तं मृगं ययौ । तावच्छश्वत्पाषाणौघैर्गन्तुं न स क्षमः ॥६०॥ ततो राघवभीत्या स शनैः सैन्येन सम्पुरः । ययौ तावन्मृगोद्भूतैः पाषाणैस्ताडितोऽपतत् ॥६१॥ सुमन्त्रं पतितं दृष्ट्वा हाहाकारो महानभूत् । अयोध्यायां च सर्वत्र तद्भङ्गमिवाभवत् ॥६२॥ सुमन्त्रं पतितं श्रुत्वा पुत्राभ्यां रघुनन्दनः । सैन्येन प्रेषयामास शत्रुघ्नं तं मृगं पुनः ॥६३॥ ततस्तत्कौतुकं श्रुत्वा पौरनार्यः सहस्रशः । प्रासादशिखराङ्कारूढा उच्चांड्य च व्यलोकयन् ॥६४॥ तर्जन्या दर्शयामासुः प्रोत्थ्यश्वेति ता मिथः । वामहस्तं भ्रुवोः स्थाप्य रवितीक्ष्णनिवारकम् ॥६५॥ कुञ्चितानलकाम्नेत्रपतितान् करपल्लवैः । स्त्रियो निवार्य प्रासादात्पुरुषाञ्जसम्मुखान् ॥६६॥ निद्रासंभ्रान्तनयनान्नान्योन्यं दर्शयन्मृगम् । एवं तन्नगरं सर्वं चकितं चाभवत्तदा ॥६७॥ शत्रुघ्नोऽथ पुराद्वात्रात्सैन्येन निर्गतो बहिः । तावत्तद्रथवाहाश्च संस्थिता एव ते पथि ॥६८॥ ताडिता अपि सूतेन नोत्तस्थुस्तुरगोत्तमाः । कुशस्याथ लवस्यापि रथवाहास्तथैव च ॥६९॥ ताडिता रुरुमद्देन नोत्तस्थुः पथि संस्थिताः । आश्चर्यञ्च तदद्भुतं राघवाय न्यवेदयन् ॥७०॥ रामोऽपि श्रुत्वा चकितस्तदा चिन्तैश्चिन्तयन् । विचारः करणीयाऽत्र ह्यविचारोऽद्य नोचितः ॥७१॥ अन्यत्र कारणं किञ्चि-द्रष्टव्योऽद्य पुरोहितः । जानन्नपि स्मादावः स्वयं सर्वं तथापि सः ॥७२॥ मानुषं भावमाश्रित्य पुरोहितमथाद्वयत् । सोपि समागत्याशु धेन्वां मयां प्रययौ गुरुः ॥७३॥ प्रत्युद्गम्य गुरुं रामो दद्यावासनमुत्तमम् । ततः सम्पूज्य विधिवत्सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥७४॥ तच्छ्रुत्वा राघवं प्राह वसिष्ठो मुनिसत्तमः । वाल्मीकिम्प्वद्य प्रष्टव्यो येन ते चरितं कृतम् ॥७५॥ तद्गुरोर्वचनं श्रुत्वा वाल्मीकिं स समाह्वयत् । सोऽपि समागत्य शीघ्रे ययौ श्रीराघवं प्रति ॥७६॥

मृस्तकके मुखकाटनेके लिए भेजा। सुमन्त रामको प्रणाम करके उसमृगकी ओर वढे। किन्तु वहांसे थोड़ी दूरपर ही थे। इतनामें पत्थरोंका वर्षा होने लगी। जिससे उस मृगके पासतक नहीं पहुँच सके ॥ ५९ ॥ ६० ॥ लेकिन रामके भयसे सुमन्त पीछे न लौटकर आगे ही बढ़ते गये और उधरसे बराबर पत्थरोंकी वृष्टि होती रही। जिससे वे घायल होकर गिर पड़े ॥ ६१ ॥ सुमन्तको गिरते देखा तो सेनामें बड़ा कोलाहल होने लगा। सारे अयोध्यानवासियोंका वह एक अनहोना-सा बात मालूम पड़ा । ६२ ॥ सुमन्तको घायल सुना तो रामने अपने दोनो पुत्रोंके साथ एक बड़ी सेना भेजी ॥ ६३ ॥ इस कौतूहलको सुना तो नगरकी बहुत-सी स्त्रियाँ अपनी-अपनी अट्टालिकाओंपर चढ़कर मस्तक ऊँचा कर उस मृगको देखने लगीं और धूपके प्रकाशका निवारण करनेके लिए अपना बायां हाथ भौंहापर रख-रखकर एक दूसरेको उसपर उँगलियोंसे वह मृग दिखाने लगीं ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ नेत्रके सामने आये हुए केशोंको हटाती हुई वे स्त्रियाँ मकानकी छतों, कंगूरों और अटारियोंपर अधिक-से-अधिक संख्यामें एकत्र हो गयीं ॥ ६६ ॥ कितनोंकी आंखें उस मृगका निहारते- निहारते नींदका भ्रममें यांझिल हो गया। इस तरह उस समय सारा नगर विस्मित हो रहा था । ६७ ॥ उधर शत्रुघ्न अपनी सेना लेकर चले । नगरसे बाहर निकले ही थे कि उनके रथवाले घोड़े रास्तेमें बैठ गये और कोचवानके बार-बार मारनेपर भी नहीं उठे यही दशा कुश और लवके भी रथको हुई । उनके घोड़े भी रास्तेमें बैठ गये और कितने ही डंडे छानपर भी नहीं उठे तो वे सब लौटकर आश्चर्यके साथ रामके पास पहुँचे और यह हाल बताया ॥ ६८-७० ॥ यह सुना तो वे मनमे विचारने लगे कि इस विषयमे पूर्णतया विचार करके काम करनेकी आवश्यकता है आज अविचारित काम नहीं फलनेका है ॥ ७१ ॥ इसमे अवश्य कोई कारण है। अतः पहल पुरोहितको बुलाकर पूछ लेना जरूरी है। यद्यपि रामचन्द्रजी सब कुछ जानते थे, फिर भी मनुष्यभावसे उन्होंने पुरोहितको बुलवाया। रामके आज्ञानुसार तुरन्त गुरुजी राजसभामे जा पहुँचे। तब राम गुरुके आगे गये और एक उत्तम आसनपर बिठाकर पूजन करनेके अनन्तर सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ७२-७४ । यह सब सुनकर गुरु वसिष्ठने कहा कि इस विषयमें आप वाल्मीकिजीसे पूछ-ताछ करें तो अच्छा होगा। क्योंकि उन्होंने ही आपके चरित्रको बनाया है ॥ ७५ ॥ गुरुके आज्ञानुसार रामने वाल्मीकि

४७० आनन्दरामायणे [सर्गः १३

प्रत्युद्गम्य मुनिं रामो ददावासनमुत्तमम् । नत्वा सम्पूज्य विधिवत् सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥७७॥ ततो विहस्य वाल्मीकिः प्रोवाच रघुनन्दनम् । सर्वं वेत्सि भवान् राम किमर्थं मां तु पृच्छसि ॥७८॥ स्वचेत्पृच्छसि रामात्र मानुष्यं भावमाश्रितः । तर्हि ते कथयाम्यद्य शृणुष्व रघुनन्दन ॥७९॥ त्वयाऽत्र वर्जितं हास्यं त्वद्विद्या मर्कलर्जनैः हास्यकारीणि कर्माणि संत्यक्तान्यवनीतले ॥८०॥ विवाहादिसमुत्साहाः कथावार्त्तादिकौतुकम् । मङ्गलोन्माहगीतानि नृत्यं यज्ञादिसंक्रियाः ॥८१॥ यात्राः संस्तम्भरोन्माहास्त्यक्ताः पञ्चशतानि तु यद्यत्कर्म तोषकारि हास्यकारि च तन्नरैः ॥८२॥ एकसंवत्सरं नात्र क्रियते रघुनन्दन उन्माहदेवताः मत्तास्तथा कर्माङ्गदेवताः ॥८३॥ इन्द्रादिलोकपालाश्च दृष्ट्वा स्वांप प्ररोजनम् । तुम भूप्रां ततो गम तद्रूपं कथयन्विधिम् ॥८४॥ ततो विधिश्च तच्छ्रुत्त्वादसमर्थस्त्वायं निवेदितुम् । मयि कुटेशमामन्त्र्य योऽश्वत्थे सप्रवेशितः ॥८५॥ हितार्थं निर्जगाणां स सोऽद्य तिष्ठति पिप्पल त्राजकर्तृपद्रवान् राम छन्प्रुकमजु वशामनान् ॥८६॥ तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा राघवः क्रोधमाययौ । अहमेवाद्य गच्छामि भारं पश्यामि ब्रह्मणः ॥८७॥ कथं नाम रघुश्रेष्ठः स्वशिक्षां परिवर्त्तयेत् । इत्युक्त्वाज्ञापयामास स्वांयां सेनां तदा प्रभुः ॥८८॥ ततस्तं बोधयामास वाल्मीकिर्मुनिसत्तमः । क्रोधं त्यज रघुश्रेष्ठ शृणुष्व वचनं मम । सच्चिदानन्दसम्पन्नस्त्वमानन्दघनो नृप ॥८९॥ भवाऽस्ति चरितं राम तव किञ्चित्पुत्रयोर्मुखात् । त्वयाऽपि यज्ञसमये श्रुतं यल्ललटे पुरा ॥९०॥ यस्य संश्रवणाद्ब्रह्मानन्दरूपी भवेन्नरः । हास्यं वस्त्वेति चेत्त्वाह ते च्छास्तं त्त्रिदम् ॥९१॥ न जनाः कीर्त्तयिष्यन्ति मुखरूपं स्मितं विना । अन्यत् किंचित् प्रवक्ष्यामि प्रभो ब्रूश तवग्रतः ॥९२॥ शतकोटिमितं तेऽत्र चरितं यन्मया कृतम् । पुरा त्वया विविक्तं यत् सर्वमे रघुनन्दन ॥९३॥

का बुलवाया । यह सन्देश पाते ही वाल्मीकि रामके मिलनक चल दए ॥ ७६ ॥ तहाँ पहुंचतहीर रामन उठ- कर उनका अगवानी की और एक सुन्दर आसनपर बिठाकर पूजन किय । फिर जो कुछ वृत्तान्त बताना था, सो बताया ॥ ७७ ॥ यह सब सुना तो हंसकर वाल्मीकिने कहा- हे राम ! आपसे कुछ छिपा नहीं है, आप सब जानते हैं । फिर हमसे क्यों पूछते हैं ? ॥ ७८ । हाँ यदि मानवभावका आश्रय लेकर आप हमसे पूछते हैं तो बताता हूँ, सुनिए ॥ ७९ । आपने अपने राज्यमें हंसीको मनाही कर दी है। इससे सब लोगोंने ऐसे शुभ कार्योंका करना बन्द कर दिया है, जो हंसी-खुशीसे ही सम्पन्न होसकते हैं ॥ ८० । विवाह, कथावार्ता, खेल-तमाशे, नाच-गान, यज्ञादिक सत्क्रियाएं, यात्रा और सांवत्सरिक उत्सव आदि सब कामलोगोंने बन्द कर दिये हैं। कहनेका मतलब यह कि जितने कार्य हृदयको आनन्दित करनेवाले हैं, वे सब आज एक वर्षसे बन्द हैं । इससे व्याकुल होकर समस्त उत्साहदेवता, कर्माङ्गदेवता तथा इन्द्रादि लोकपाल भूमण्डलपर अपनी प्रजाको दुःखी होते देख ब्रह्माके पास गये और उन्हें अपना दुःख सुनाया ॥ ८१-८४ ॥ इसके बाद ब्रह्माजी आपसे कुछ कहने-सुननेमें असमर्थ होकर उस पीपल-वृक्षमें गुप्त रूपसे प्रविष्ट हो गये हैं। देवताओंकी कल्याण-कामनासे वे आज भी उसमें बैठे हुए हैं । जो कोई उस वृक्षको काटनेके लिये जाता है, वे उसपर पत्थर बरसाते हैं ॥ ८५ ॥ ८६ ॥ मुनिराज वाल्मीकिके मुखसे यह हाल सुनकर रामको क्रोध आ गया और उन्होंने कहा कि आज मैं स्वयं जाकर ब्रह्माका पराक्रम देखता हूँ । रघुवंशका एक श्रेष्ठ क्षत्रिय अपने आदेशमें किसी प्रकार का उलट- फेर नहीं कर सकता। इतना कहकर रामने अपनी सेना तैयार करनेकी आज्ञा दी ॥ ८७ । ८८ । तब वाल्मीकि समझाने लगे—हे रघुश्रेष्ठ ! इस प्रकार क्रोध न करके मेरी बात सुनिये। आप साक्षात् सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म हैं और आपका चरित्र लोगोंको आनन्दित करनेवाला है। उस दिन ही बनाकर आपके पुत्रोंके मुखसे यज्ञशालामें सुनवाया था, उसे आपने भी सुना है। जिस जिसके सुनने मात्रसे मनुष्य आनन्दमग्न हो जाता है, ऐसे पुनीत चरित्रको लोग यदि आपने हंसीका नियम रक्खेंगे तो नहीं सुन सकेंगे। क्योंकि कथा सुनकर आनन्दको प्राप्त लोग हंसे बिना नहीं रह सकेंगे। इसके सिवाय हे प्रभो ! मुझे आपसे कुछ और भी कहना

सर्गः १३ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७१

सर्गः १३ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७१

भागाद्राङ्कतवर्णान्स्तद्वाग्रथाथाणान् प्रभो । सारं सारं प्रगृह्याथ यद्यद्रम्यं मनोरमम् ॥ ९४ ॥
कथानकं तेन तेन व्यासेन मुनिनाऽत्र हि । अष्टादश पुराणानि तथोपपुराणानि च ॥ ९५ ॥
कृतान्यन्येऽपि मुनयः षट्शास्त्रादीन्यनेकशः । अग्रे सर्वं करिष्यन्ति सारं रम्यं प्रगृह्य च ॥ ९६ ॥
ततोऽत्र श्लोकरूपं च यन्मया हरके वने । चतुर्दशवत्सरैश्च कैकेयीदुष्टभावतः ॥ ९७ ॥
कृतं चरित्रं सीताया विरहादि च गद्यत । तत्र किञ्चित्क्षेपभूतं हि चतुर्विंशत्सहस्रकम् ॥ ९८ ॥
तावन्मात्रं वदिष्यन्ति यद्वाल्मीकेः कृतं स्थिति । तन्मत्रं सकलं ज्ञात्वा भावि वृत्तं रघूत्तम ॥ ९९ ॥
श्लोकसङ्ख्यायोगश्च पूर्वमेव मयेरितः । युद्ध प्रयाने भातस्य श्लोकश्चैवोपरागके ॥ १०० ॥
रतिनिशायां श्रोतव्याऽऽनन्दरामायणं सदा । युद्धं ज्ञेयं भारतं हि रतिर्भागवतं स्मृतम् ॥ १०१ ॥
शेषभूतं चतुर्विंशत्सहस्रं शोक उच्यते । तव भाविबरेणैतदानन्दचरितं तव ॥ १०२ ॥
शतकोटिमितं पूर्वं यन्मयैव विनिर्मितम् । नवकाण्डमितं रम्यं षयुद्रादशसहस्रकम् ॥ १०३ ॥
नवोत्ताशतं सर्वं क्वचिन् स्थास्यति भूतले । तव भाविदरान्नाय न कोऽप्येनां मनोरमाम् ॥ १०४ ॥
अष्टोत्तरशतैः सर्गैर्निर्मितां मेरुणाऽन्विताम् । तव कीर्तनमालां नो खण्डयिष्यति भूतले ॥ १०५ ॥
नवकाण्डयुतं रम्यं दृष्टा स्तरणहेतवे । एतद्धि स्थापयिष्यति यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ १०६ ॥
यदा तत् खण्डितं पूर्वं व्यासेन मुनिना तत्र । शतकोटिमितं रामचरितं यन्मया कृतम् ॥ १०७ ॥
तदा किञ्चिद्धितं दृष्ट्वाहं तूष्णीमेव संस्थितः । भविष्यति कलौ मन्दमतयोऽल्पायुषो नराः ॥ १०८ ॥
न समर्था मम ग्रन्थं विमलं श्रोतुं कदापि हि । अतो व्यासेन मुनिना मत्कार्यं यत्पृथक् कृतम् १०९
सन्तस्याभिन्यहं मत्वा परां तृप्ति गतः प्रभो । अनस्त्वं प्रार्थयाम्यद्य नवकाण्डमितं त्विदम् ॥ ११० ॥
जानन्दरामचरितं न विरूपय राघव । वर्जयिष्यामि खेट्ठाख्यं तदा दुःखमय प्रभो ॥ १११ ॥

है। मैंने जो सौ करोड़ श्लोकोंमें आपके चरित्रका वर्णन किया है, उसे हे रघुनन्दन ! आप कुछ समय पहले कई भागोंम बाँट चुके हैं। ८२-६३ ॥ उनमेंसे जो भाग भारतवर्षके लिये चुना था, उसके सार अंशको लेकर जो कथानक अच्छे थे, सुननेमात्रसे समझमें आ जाते वा कानोंको प्रिय लगते थे, उन्हींके आधारपर व्यासदेवने अष्टादश पुराणों तथा उपपुराणोंको बना दिया है। इनके अतिरिक्त भी बहुतसे ऋषि उन्हींकी सहायतासे षट्शास्त्र आदि कितने ही शास्त्र बनायेंगे ॥ ९४-९६ ॥ कुछ ही समय बीतनेके बाद कैकेयीकी दुष्टतासे आपको चौदह वर्ष पर्यन्त जो दुःख झेलने पड़े थे, सीताके विरह आदिका दुःख जो चौबीस हजार श्लोकोंसे कुछ कम है, उतने ही चरित्रकी नींव मुझ वाल्मीकिका बनाया हुआ मानेंगे। इस भावी स्थितिको समझकर ही मैने आपके उतने श्लोकमय चरित्रको विशेष उत्साहके साथ लिखा है। सब लोगोंको चाहिये कि सबेरे युद्ध-चरित्र तथा दोपहरके बाद शोक-चरित्रका श्रवण करें युद्धचरित्रका मतलब महाभारत, रति-चरित्रका श्रीमद्भागवत तथा बाकी चौबीस हजार श्लोकोंका मतलब शोकचरित्र माना गया है। आपके भावी वरदानके प्रभावसे आपका यह आनन्दरामायण, सौ करोड़ श्लोकोंवाला मेरा बनाया रामचरित्र, नौ काण्डोंवाला द्वादश सहस्रात्मक रामचरित्र एवं एक सौ नौ श्लोकोंवाली रामायण ये सब पृथ्वीतलमें कही न कही रहेंगे ही। आपके भावी वरदानसे एक सुन्दर कीर्तनमाला, जिसमें १०८ सर्ग हैं, सुमेरुकी मनकासदृश अग्यसे लगी है, इसका कोई भी खण्डन नहीं कर सकेगा। इस नौ काण्डोंवाले चरित्रको लोग आपकी प्रसन्नताके लिए तबतक सम्हालेंगे, जब तक कि संसारमें सूर्य-चन्द्र विद्यमान रहेंगे ॥ ९७-१०६ ॥ मेरे बनाये सौ करोड़ श्लोकोंवाले रामचरित्रका खण्डन करके जब व्यासजीने १८ पुराण बनाये थे, तब उससे किसी प्रकारका कल्याण देखकर ही मैं चुप रह गया था। उस समय मेरे विचारमे आया कि आगे चलकर कलियुगमें लोग मन्दबुद्धि तथा अल्पायु होंगे। इस कारण वे मेरे इतने बड़े ग्रन्थको कभी नहीं सुन सकेंगे। व्यासजीने मेरे काव्यसे कथायें अलग करके जो पुराणोंको बनाया, सो बहुत अच्छा किया। इससे

४७२ आनन्दरामायणे [सर्गः १३

भविष्यति सुखवृद्धि र्चेतसाऽपि प्रमोदनम् । अभाने कथयन्त्येव येन ते शिक्षितं भुवि ॥११२॥ भविष्यति मृषा नैव येन दृष्टास्तु देवताः । भविष्यंति जनाश्चापि मम्यन्मत्कविता भवेत् ॥११३॥ जना हसंतु सर्वत्र दृष्टानां दशनं विना । आत्मवान्कश्चाद्य वस्त्रेण रुद्धा कौतुकदर्शनात् ॥११४॥ हास्यं लक्ष्मीसूचकं हि हसितं मंगलप्रदायकम् । धावन्यं हसितं चैतद्धस्यात्कृष्टं न किंचन ॥११५॥ नारी स्मितवदना यस्मिन्गेहे तन्मन्दिरं स्मृतम् । लक्ष्मीरूपाऽवस्थिताऽने तत्र निश्चय रघुनन्दन ॥११६॥ स एव पुरुषो धन्यो यस्य स्यान्न स्मिताननम् । स एव पुरुषो निन्द्यो यस्यास्यं क्रोधसंयुतम् । ११७॥ प्रमदा निन्दिता सापि यस्याः क्रोधयुतं मुखम् । गर्हयन्त्यत्रहास्यं हि सर्वदा ते मुनीश्वराः ॥११८॥ अतस्त्वां प्रार्थयाम्येतन्मानय त्वं वचो मम । न करोमि विधिर्गर्वं त्वां तातं वेद्मि राघव । ११९॥ जानयिष्यामि शरणं त्वाहं चतुराननम् । एवं वाल्मीकिरचनमंगीकृत्य रघूत्तमः ॥१२०॥ एवमस्त्विति तं प्राह मुनिं तष्ठ हसन्निव । तद्रामवचनं श्रुत्वा वाल्मीकिस्तुष्टमानसः ॥१२१॥ शिष्यं संप्रेष्य ब्रह्माद्यमानायामास पिप्पलात् । अश्वाः सर्वे समुत्तस्थुर्ययुस्ते नगरीं प्रति ॥१२२.। ययौ सैन्येन शत्रुघ्नो रामपार्श्वे स्थितोऽभवत् । रामपुत्रौ ययायातौ पितुरग्रे निषेद्तुः ॥१२३॥ रामाज्ञया मारवाहन्तो दन्त्यैर्मज्जनः । कुवेरेण सुधावृष्टिः सुमन्त्राद्याः सुजीविताः ॥१२४ । सुमन्त्राद्या राज्ञाऽऽत्मरक्षणं राघव ययुः । नत्वा रामं सुमंत्रः स रामपार्श्वे स्थितोऽभवत् । १२५॥ दृष्टः सुरैर्यावदिंद्रः प्राप्तं प्रणम्य स, गर्वं गत्वाऽब्रवीद्ब्रह्मा मया त्वदपराधितम् १२६॥ तत्क्षमस्व रघुश्रेष्ठ स्वस्वाभ्याः सर्वदा वयम् । पुराऽस्माकं हितार्थे हि त्वया रामावतीर्णते ॥१२७॥


मुझे बड़ी प्रसन्नता है, अर्थात् आज आप से प्रार्थना करता हूँ कि इस मेरे करवाएने आनन्दरामायणकी शोभा न बिगाड़िए, यदि आप इसके लिए न हँसा सजा तक तब तो बड़ा अनर्थ होगा। मेरी रामायण किसी कामकी नहीं रह जायगी इसीलिए मैं आपस कहता हूँ कि कोई ऐसा उपाय कीजिए, जिससे आपके आदेशकी विगा प्रज्ञाका कन्तर न घट और हनता तथा मनुषा की प्रसन्न रहे और मेरी कवित्व भी सन्द हो जाय १०७-११३ । लोग हँस सहा किन्तु उनके दाँतन दिखायी द। किसी कौतुकको देखकर यदि लोगोंको हँसा आ जाय तो कपडस मुंह रोक्कर हंसें ॥ ११४ ॥ क्योंकि हंसी लक्ष्मीमूलक है, हँसी सबको मुख देनेवाली वस्तु है और हंसी मंगलमयी मानी गयी है। कहनेका भाव यह कि हँसीसे बढ़कर कोई बात ही हीं नहीं ।। ११५ ।। जिस घरमे मुस्काती हुई नारी रहना है, वह घर देवालयके समान पवित्र होता है और लक्ष्मी वहाँपर ही निवास करती है। हे रघुनन्दन ! इसमें किसी प्रकारका संशय नहीं है ॥ ११६ ॥ वही पुरुष धन्य है, जिसका मुखमण्डल सदा हसता हुआ दीखे और बही पुरुष अधम है, जिसका मुख सदा कोषमे युत्त रहे ॥ ११७॥ वह स्त्री भी निन्द्य है, जो सदा क्रोधयुक्त मुँह बनाये रहती है। बडे-बड़े मुनिगण आदि हास्यको सदासे निन्दा करते आय हैं ११८ ॥ बसअत मैं बापस प्रार्थना करता हूँ कि मेरी यह बात मान लीजिए बह्म किसी तरह अभिमान न करके आपको अपने पिताके समान मानते हैं । ११९ ॥ मैं स्वय जाकर ब्रह्माको आपका लज्जाब करूंगा वे आपसे क्षमा मांगेंगे । रामने वाल्मीकिके वाक्यगौरवको समझकर उनकी बात मान ली और कहा कि जैसा आप कहते हैं, वैसा ही होगा। रामकी स्वीकृति सुनकर वाल्मीकि परम प्रसन्न हुए और अपना एक शिष्य भेजकर उस पीपलपरसे ब्रह्माजीको बुलवाया । यह हो जानेपर शत्रुघ्न तथा लव-कुशके जो घोडे अबतक रास्तेमें बँधे थे, वे उठ खड़े हुए और अयोध्याको वापस चल दिये । शत्रुघ्न और लव-कुश भी अपनी सेना लिये हुए आये और रामके पास आकर बैठ गये ॥ १२०-१२३॥ रामकी आज्ञासे उन्होंने अस्त्रहारोंको छोड़ दिया । इन्द्रने आकर अमृतकी वर्षा की, जिससे सुमन्त्रादि जो योद्धा मूर्च्छित पड़े थे, वे सचेत हो गये ।। १२४ ।। इसके अनन्तर युद्धको छांटनेके लिए गद्दे हुए लोग रामके पास आये। सुमन्त्र रायके पास आकर बैठ गये। थोडी देर बाद देवताओंके साथ-साथ इन्द्र और ब्रह्मा भी रामकी सभामें आये और बैठ गये । रामको प्रणाम

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४७३

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४७३

अवताराश्च बहवो धृता नो रिपवो हताः। शंखासुरो वेदहर्ता मत्स्यरूपेण दारितः ॥१२८॥ तथाऽस्माकं सुधां दातुं मज्जंतं मंदराचलम् । दृष्ट्वा स कूर्मरूपेण त्वया पृष्ठे धृतो गिरिः ॥१२९॥ मत्पृथ्वीति स्पर्द्धमानं हिरण्याक्षं निहत्य च। त्वया वाराहरूपेण जलात्पृथ्वी समुद्धृता ॥१३०॥ प्रह्लादवचनात्स्तम्भादाविर्भूय त्वया पुरा। नरसिंहस्वरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः ॥१३१॥ हृत्वा राज्यं हृतं दृष्ट्वा पुरा तु मघवतस्त्वया। बलिर्वामनरूपेण पाताले विनिवेशितः ॥१३२॥ नृपैरधर्मनिरतैरदृष्टा ध्यार्त्ता सुभृं पुरा। त्वयैकविंशद्वारं हि जामदग्न्यस्वरूपिणा ॥१३३॥ पितृवैरं पुरस्कृत्य निःक्षत्रो पृथिवी कृता। दशास्यकुम्भकर्णौ तौ रामरूपेण राक्षसौ ॥१३४॥ पत्नीवैरं पुरस्कृत्य त्वया दृष्टौ हताविह। उद्धारितौ तौ स्वगणौ द्विवारं देवशापतः ॥१३५॥ एकवारं पुनस्त्वग्रे त्वं तावेवोद्धरिष्यसि । तच्छ्रुत्वावचनं श्रुत्वा वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥१३६॥ सर्वं जानन्नपि ज्ञानान्मां प्रप्रच्छ तं विधिम् ॥१३७॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्धे रामहस्त्यप्रतिरोघो नाम त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥


चतुर्दशः सर्गः

( शंखचूड़िकी जन्मगाथा तथा बहुतेरे मंत्रोंका निरूपण )

श्रीरामदास उवाच

कौ गणौ देवशप्तौ तौ कथमद्धारितौ वद। पुरा द्विवारं रामेणाग्रे कथं वोद्धरिष्यति ॥१॥ तद्वसिष्ठवचः श्रुत्वा विधिः प्राह विहस्य तम्। सर्वं वेत्सि भवान् लोकान् ज्ञापितुं मां हि पृच्छसि ॥२॥ तदा वदाम्यहं सर्वं गणयोः शापकारणम्। एकदाऽथ महाविष्णुर्वैकुण्ठे रमया रहः ॥३॥ संस्थितश्च तदा द्वारि विष्णुं द्रष्टुं सुचेतसौ। तापसाश्विनीकुमारौ हि समाजग्मतुरुदगतौ ॥४॥

करनेके पश्चात् ब्रह्माने कहा—मैंने जो कुछ अपराध किया है, सो क्षमा करें । हे रघुकुलश्रेष्ठ ! आपका कर्त्तव्य है कि आप हमारी रक्षा करें। पहले भी आपने हमारी रक्षा करनेके लिए पृथ्वीतलपर कितने ही अवतार लेकर हमारे शत्रुओंको मारा है। वेदोंको चुरानेवाले शंखासुरको आपने मत्स्यका रूप धारण करके मारा था ॥१२८-१२९॥ हम सबोंको अमृत पिलानेकी इच्छासे, समुद्रमन्थनके समय जब मन्दराचल डूबा जा रहा था, तब कूर्मरूप धारण करके उसे अपनी पीठपर रखा था। "यह पृथ्वी मेरी है" इस प्रकार कहकर डींग मारनेवाले हिरण्याक्षको मारकर आपने वाराहरूप धारण करके जलमें डूबी हुई पृथ्वीका उद्धार किया ॥ १३० ॥ १३० ॥ प्रह्लादके वचनसे आप खम्भेसे प्रकट हुए और हिरण्यकशिपुका संहार किया। जब दैत्योंते इन्द्रसे राज्य छीन लिया था, तब आपने वामनरूप धारण करके भीख माँगी और बलिको पाताल लोक भेज दिया ॥१३१ १३२॥ जब इस पृथ्वीमण्डलमे पापी राजाओंका अत्याचार देखा तो परशुरामका रूप धारण करके पितृवैरके व्याजसे पृथ्वीको क्षत्रियविहीन कर दिया । रावण और कुम्भकर्णको आपने पत्नीवैरके बहाने यमपुर पहुँचाया। दो बार आपने देवताओंके शापसे अपने गणोंकी रक्षा की है और भविष्यमे फिर एक बार उनका उद्धार करेंगे। ब्रह्माकी बातको सुनकर सब कुछ जानते हुए भी वसिष्ठने ब्रह्माजीसे पूछा—॥ १३३-१३७ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्वित राज्यकांडे उत्तराद्धे त्रयोदशः सर्गः ॥१३॥

वसिष्ठजी कहने लगे—वे दोनों कौनसे गण थे, जिनको देवताओंका शाप प्राप्त हुआ था और रामने उनका उद्धार किया था और फिर भी उद्धार करेंगे, सो कहिए ॥ १॥ इस प्रकार वसिष्ठकी बातसुनकर ब्रह्माने हँसकर कहा—आप सब कुछ जानते हैं, किन्तु मुझे ज्ञान प्राप्त करानेके लिए मुझसे पूछ रहे हैं तो मैं भी उन गणोंके शापका कारण बतलाता हूँ। एक समय महाविष्णु एकान्तमें

४७४आनन्दरामायणे[ सर्गः १४

समागती देववैद्यौ तौ दृष्ट्वा द्वारगतौ । जयविजयात्मानौ तयोरग्रे बभूवतुः ॥ ६ ॥
ताभ्यां वैदौ तदा प्रोक्तौ विष्णुस्तिष्ठति वै रहः । नायं कालो दर्शनस्य तच्छ्रुत्वा प्रोचतुः सुरौ ॥ ६ ॥
अधुना द्रष्टुमिच्छामो विष्णुं कथयतां नरौ । तयोर्द्वियोगमनं युवां शृणुतं चेरितम् ॥ ७ ॥
इत्योर्वचनं श्रुत्वा तौ पुनः प्रोचतुर्गणौ । नगच्छावो महाविष्णुमस्मल्लक्ष्म्या रहःस्थितम् ॥ ८ ॥
एवं त्रिवारं ताभ्यां तौ प्रोक्तौ नैच्छतुर्गणौ । तदाऽश्विनीकुमारौ तौ प्रोचतुः क्रोधमूर्च्छितौ ॥ ९ ॥
आव्योर्वारणनं नैव युवाभ्यां हि श्रुतं गणौ । यतस्त्रिवारं तस्मात्तु युवां जन्मत्रयं भुवि ॥ १० ॥
कथयद्य न संदेहस्तच्छ्रुत्वा ह्यवरं तयोः । अथावति तयोः शापं ददतुर्देववैद्ययोः ॥ ११ ॥
विनापराधतः शापो यस्माद्दत्तस्तु चारयोः । एकवारं युवां क्वापि जन्मप्राप्स्यथु वै भुवि ॥ १२ ॥
एवं परस्परं शापं रुद्ध्वा हाहेति चक्रतुः । सदा कोलाहलश्चासीद्वाह्वायाम तान् हरिः ॥ १३ ॥
तद्वृत्तगसकलं श्रुतं प्रोचुस्ते जगदीश्वरम् । पश्चात्ते महताविष्णुं प्रार्थयामशुरादरात् ॥ १४ ॥
येन शीघ्रं विमुक्तिः स्यात्तन्नो वद महेश्वर ! ततः प्रोवाच तान् विष्णुर्मुक्तिः शीघ्रं शुभाऽत्र हि ॥ १५ ॥
मयि भक्त्या विरोधिन्या जायते नात्र संशयः । समञ्जस्यादरेणैव मद्भक्त्या जायते गतिः ॥ १६ ॥
युष्माकं रोचते या सा भक्तिः कार्याऽवनीतले । तद्विष्णोर्वचनं श्रुत्वा ते प्रोचुर्जगदीश्वरम् । १७ ॥
नोऽस्तु भक्त्या विरोघिन्या शीघ्रं नो दर्शनं पुनः । तथेत्युक्त्वा रमानाधस्तान् सर्वान् म व्यसर्जयत् १८ ॥
ते जन्मानि ततः प्रापुर्ब्रह्मर्ष्या सुनिनन्दनः । जयो जातो हिरण्याक्षो हिरण्यकशिपुस्तथा ॥ १९ ॥
बातोऽत्र विजयः पूर्वं तौ हतौ विष्णुना भुग । वाराहरूपिणाऽनेन हिरण्याक्षो विदारितः ॥ २० ॥
नरसिंहरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः । ततः पुनर्जन्म तौ हि द्वितीयं प्रत्यतुर्भुवि ॥ २१ ॥


लक्ष्मीके साथ बैठे थे। उसी समय उनके दर्शनार्थ अश्विनीकुमार वहाँ जा पहुँचे ॥ १-४ ॥ तब देववैद्योंको देखकर जय-विजय नामक दोनों द्वारपाल उनके सामने पहुँच और कहने लगे-इस समय भगवान् एकान्तमें हैं। अतएव आप लोग दर्शन नहीं कर सकेंगे। यह सुनकर वे दोनों देवता बोले-विष्णुभगवान्‌से जाकर कह दो कि हम अभी इसी समय आपका दर्शन करना चाहते हैं। देवताओ की बात सुनकर जय-विजयने कहा कि हम अभी उनके पास नहीं जायेंगे। वे लक्ष्मीके साथ एकान्तमें बैठे हैं ॥ ५-८ ॥ इस तरह तीन बार अश्विनीकुमारोंके कहनेपर भी जब जय-विजयने उनकी बात नहीं मानी तब क्रुद्ध होकर उन्होंने शाप देते हुए कहा कि तीन बार तुम लोगोंने मेरी बातका उल्लंघन किया है, इसलिए तुम्हें तीन बार पृथ्वीलोकमें जन्म लेना पड़ेगा । उनके इस शापको सुनकर जय विजयने भी अश्विनीकुमारोंको शाप देते हुए कहा कि बिना अपराध तुमने हमको शाप दिया है। इसलिए तुम दोनोंको एक बार पृथ्वीतलपर जन्म लेना पड़ेगा ॥ ९-१२॥ इस प्रकार आपसमें शाप पाकर वे चारों हाहाकार करके पछताने लगे और वैकुण्ठधाममें कोलाहल मच गया तब विष्णुभगवान्‌ने उनको अपने पास बुलाया ॥ १३ ॥ भगवान्‌ने उनका वृत्तान्त सुना। इसके अनन्तर आदरपूर्वक उन चारोंने भगवान्‌से प्रार्थना की - ॥ १४ ॥ हे महेश्वर ! जिससे हमलोग शीघ्र इस शापसे मुक्त हो जायें, इस बात वहीं उपाय बतलाइये । विष्णुभगवान्‌ने उन्हें समझाते हुए कहा कि घबड़ाओ नहीं, शीघ्र ही तुम लोग शापसे मुक्त हो जाओगे, किन्तु उपाय दो हैं। एक यह कि तुमलोग हमारी भक्तिसे विरोधभाव रक्खो। दूसरे उपायमें हमारी भक्ति करके मुक्ति पानेका विचार करो। यदि मेरी भक्तिमें विरुद्ध रहोगे तो शीघ्र मुक्ति मिल जायगी और भक्ति के साथ चाहोगे तो बहुत बार जन्म लेना पड़ेगा। इन दोनोंमेंसे जो उपाय अच्छा जंचे उसे चुन लो। इस प्रकार विष्णुकी बात सुनकर उन लागोंने उत्तर दिया कि हम आपकी भक्तिमें विरुद्ध भाव रक्खेंगे, जिससे शीघ्र मुक्ति हो जाय। भगवान्‌ने भी "अच्छा वैसा ही हो" यह कहकर उन लोगोंको विदा कर दिया ॥ १५-१८ ॥ तदनन्तर वे लोग मृत्युलोकमें आकर जन्मे। उनमें जय हिरण्याक्ष नामका तथा विजय हिरण्यकशिपु राक्षस होकर जन्मा। इसके अनन्तर वाराहरूप धारण करके विष्णुभगवान्‌ने हिरण्याक्षको मारा और नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुका संहार किया ॥ १९ ॥ २० ॥ दूसरे जन्ममें

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७५

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७५

जयो जातो रावणोऽथ कुम्भकर्णस्तदापरः । जातो विजयनामा हि रामेनानेन तौ हतौ ॥२२॥ तावश्विनीसुतौ हि एक ऐरावण स्मृतः । मैरावणश्च त्वपरं पत्र तौ जनितावभौ ॥२३॥ पाताले वरदानाच्च रामहस्तान्मृतिं गतौ । अग्रे जयः शिशुपालो भविष्यति न संशयः ॥२४॥ विजयो दन्तवक्त्रश्च भविष्यत्यर्द्धनातले । द्वापरे कृष्णरूपेण शिशुपालं हरिः स्वयम् ॥२५॥ भविष्यति दन्तवक्त्रं तथैव मुनिसत्तम । एवं जन्मत्रय शापाद्भुक्त्वा तौ भगवद्गणौ ॥२६॥ जयविजयनामानौ पूर्ववत् स्यास्यतः सुधी । कृतदेशेऽथ वै विष्णोर्वैकुण्ठे दुःखवर्जिते ॥२७॥ तावश्विनौ देववैद्यौ पूर्ववदिति तौ स्थितौ । एवं मुने त्वया पृष्टं तन्मया परिकीर्तितम् ॥२८॥ भगवद्गणयोः शापकारणं च पुरातनम् । एव राघव चाग्रे त्वं द्वापरे वरमे शुभे ॥२९॥ जरासंधादिवीरैश्च कंसार्थैरपि भूतले । क्षिप्रं दृष्ट्वाऽत्रावतीर्य कृष्णरूपेण लीलया ॥३०॥ सर्वान्हत्वा तोषयुक्तं करिष्यसि महीतलम् । तान् बौद्धांबुदरूपेण कलावग्रे विजेष्यसि ॥३१॥ वर्णसंकरमाक्ष्य कलेरन्ते रघूत्तम । कल्किरूपेण सकलान्संहारष्यसि लीलया ॥३२॥ एवं दशावताराश्च तथान्येऽपि सहस्रशः । त्वया हितार्थमस्माकं धृताश्चाग्रे धरिष्यसि ॥३३॥

श्रीरामदास उवाच

एवं स्तुवन् ब्रह्माथ समालिङ्गय रघूत्तमः । मन्निदेश्यामने प्राह स्वदर्थं च मुनेर्गिरा ॥३४॥ हास्यमाशास्ति किं येऽनाः कुर्वतु ते सुखम् यथा वाल्मीकिना प्रोक्तं तथा चा रिस्तथास्तु वं ॥३५॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा महा हृष्टाः सुरोदयाः । प्रपच्छ च वाल्मीकिं सभायां रघुनन्दनः ॥३६॥ ममावतारतः पूर्वं त्वया मच्चरितं कृतम् । कथं ज्ञातं त्वया पूर्वं केन त्वामुपदेशितम् ॥३७॥ पूर्वजन्मनि कस्त्वं हि किं पुण्यं हि त्वया कृतम् । तन्मवं विस्तरेणैव कथयस्वाद्य मां प्रति ॥३८॥

'वे दोनों रावण और कुम्भकर्ण होकर जन्म और भगवानने रामका रूप धारण करके उन्हें मारा ॥ २१ ॥ २२ ॥ दोनों अश्विनीकुमारोंमेंसे एक ऐरावण एवं दूसरा मैरावणके रूपसे धरतीपर आया और पाताललोकमें रामके हाथों उन दोनोंकी मृत्यु हुई । अगले जन्ममें जय शिशुपाल तथा विजय दन्तवक्त्रके नामसे जन्मेगा । द्वापरमें भगवान् कृष्णरूपमें उन दोनोंका संहार करेंगे । इस तरह आपसके शाप भोगके वे लोग तीन जन्ममें अपनी करनीका फल भोगकर फिर पहलेकी तरह जय विजयके नामसे भगवान्‌के द्वारपाल हो जायेंगे, तब उन्हें फिर कोई क्लेश नहीं होगा ॥ २३-२७ ॥ तबसे अश्विनीकुमार भी आनन्दके साथ स्वर्गलोकमें निवास करेंगे । हे मुनिराज ! आपने हमसे जो कुछ पूछा, वह मैंने बतलाया। इसका सारांश यह निकला कि उन दोनों भगवद्गणोंके लिए एक प्राचीन शाप कारण था। उसमें कोई नयी बात नहीं थी। हे राघव ! आगे द्वापर युगमें भी पृथ्वी जब कंस तथा जरासंध आदि दुष्टोंके अत्याचारोंसे घबड़ा जायगी, तब आप कृष्ण अवतार लेकर दुष्टोंका संहार करते हुए पृथ्वीका भार उतारेंगे। उसी प्रकार कलियुगमें बुद्धका रूप धारण करके आप बौद्धोंको पराजित करेंगे ॥ २८-३१ ॥ हे रघूत्तम कलियुगके अन्तमें जब समस्त संसार वर्णसंकर हो जायगा, तब आप कल्किरूप धारण करके सबका संहार करेंगे। इस तरह दस क्या, हजारो अवतार आपने हम लोगोंके कल्याणके लिये लिये हैं और भविष्यमें भी लेंगे ॥ ३२ ॥ ३३॥ श्रीरामदास बोले—इस तरह स्तुति करते हुए ब्रह्माको राघवन हृदयसे लगा लिया और अपनी बगलमें बिठाकर कहा कि वाल्मीकिके कथनानुसार मैं आज्ञा देता हूँ कि तुम्हारे सुखके लिये लोग हँसें या जो कुछ करें, मुझे कोई आपत्ति नहीं है। वाल्मीकिने जो कहा है, उसके अनुसार मेरी प्रजाके लोग काम करेंगे ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ रामकी इस बातको सुनकर जितने देवत थे, वे सब प्रसन्न हो गये । इसके पश्चात् रामने वाल्मीकिसे कहा कि मेरे अवतारसे पहले ही आपने मेरा चरित्र रामायण बना डाला है । सो भविष्यकी बात आपको कैसे मालूम हुई ? उन्हें किसने बतायी थी ? । ३६ ॥ ३७ ॥ पूर्वजन्ममें आप कौन थे और आपने कौनसे पुण्यकार्य किये थे, सो मुझसे कहिए। इस प्रकार रामके प्रश्न

४७१ आनन्दरामायणे [ सर्गः १४


तद्रामवचनं श्रुत्वा वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवः । सभायां राघवार्थं सर्वं वक्तुं समुपचक्रमे ॥३९॥
वाल्मीकिरुवाच
सम्यक्पृष्टं त्वया राम सावधानमनाः शृणु । राम स्वनाममहिमा वर्ण्यते केन वा कथम् ॥४०॥
यत्प्रभावादहं राम ब्रह्मर्षित्वमवाप्तवान् । शृणु राघव मत्सत्यं कथां मे पूर्वजन्मनः ॥४१॥
पंपातीरे द्विजः कश्चिच्छंखो नाम महायशाः । गुरोः सिद्धिं गमश्चागाद्नदीं गोदावरीं प्रति ॥४२॥
तीर्त्वा भीमरथीं पुण्यां कान्तारे कंटकाविले । निर्जले विजने घोरे वैशाखे तापकंपितः ॥४३॥
शनै चोपाविशन्मार्गे मध्याह्नसमये द्विजः । तदा कश्चिद्दुराचारी व्याधश्चापशरः शठः ॥४४॥
निर्दयः सर्वभूतेषु कालांतक इवापरः । तं कुण्डलधरं विप्रं दीक्षितं भास्करोपमम् ॥४५॥
खङ्गेन भीषयित्वा तु जग्राह कुंडलादिकम् उपानहौ तच्छत्रं च वस्त्राणि च कमण्डलुम् ॥
पश्चाद्व्याधश्च तं विप्रं गच्छेत्याह स मूढधीः ॥४६॥
तथा स मूल्छन्पथि शर्कराविले सूर्यशुतप्ते अनवर्जिते खरे ।
संतप्तपादस्तृणगोपिते स्थले क्वचित्क्व वस्त्रोपरि संस्थितोऽभवत् ॥४७॥
स वै द्रुतं तापतप्तोऽपि विप्रन्दाहेति वादी प्रजगाम विप्रः ।
दृष्ट्वा मुनिं तं बहुविह्वलन्तन्प मध्यं गते पूष्णि यदाऽतितीव्रे ॥४८॥
व्याधस्य जाता मतिरीदृशी वै तस्मै ददामीति च पादरक्षे ।
चौर्येन धर्मम् तु तस्करो न वने गृहीव सकल चतन्मे ॥४९॥
चौर्येण च स्वधर्मेण यद्गृहीतं वनान्तरे । तदीयमेव तन्मत्वं व्याधानां धर्मनिर्णयः ।५०।
तस्मादुपानहौ दास्ये मुहुर्दुःखापनुत्तये । तेन श्रेयो भवेद्यच्च तद्द्वन्मेऽस्तु पापिनः ॥५१॥
जीर्णे नोपानहावेतौ ह्रस्वौ स्तश्च पदोर्मम । न चाभ्यामस्ति मे कार्यं तस्मात्तस्मै ददाम्यहम् ॥५२॥

करनेपर वाल्मीकिजीने बतलाना प्रारम्भ किया । उन्होंने कहा—आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सावधान चित्त होकर सुनिये । हे राम ! आपके नामकी महिमाका वर्णन कौन कर सकता है, जिसके प्रभावसे आज मै ब्रह्मर्षिपदपर बैठा हूँ । अच्छा, पहले अपने पूर्वजन्मका वृत्तान्त ही बतलाता हूँ । पम्पा सरोवरके पास कोई एक महान् यशस्वी शङ्ख नामका ब्राह्मण रहता था। उसने गुरुके पाससे सिद्धि प्राप्त की और कुछ दिनों बाद गोदावरी नदीपर गया । उसे पार करके भीमरथी नदी पार किया और एक ऐसे निर्जन वनमें पहुंचा, जहाँ जलतक मिलना कठिन था । वह वैशाखका महीना था । मारे गर्मीके उसका जी बेचैन था । दोपहरके समय थककर वह उसी वनमे बैठ गया । उसी समय धनुष-बाण लिये एक दुष्ट व्याध उसके पास आ पहुंचा । ३९-४४ । वह दूसरे यमराजके समान भयानक और निर्दयी था। उसने उस सूर्यके समान तेजस्वी ब्राह्मणको तलवारसे भयभीत करके उसके कुण्डलादि आभूषण, जूते, छतरी, वस्त्र तथा कमण्डलु आदि छीन लिये । इसके बाद उसने "जाओ" कहकर छोड़ दिया ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ बेचारा ब्राह्मण कङ्कड़-पत्थर तथा सूर्यके तापसे जलती हुई बालुकाव्याप्त मार्गसे चलने लगा । जब उसके पैर ज्यादा जलने लगते तो किसी तृण आदिवर पैर ठंडा करके आगे बढ़ता था । चलते-चलते जब पैर बहुत जलने लगे तो वह कपड़ा बिछाकर एक स्थानपर बैठ गया ॥ ४७ ॥ थोड़ी देर बाद उठकर उस कड़ाकेकी धूपमें पैरके जलनेसे हाहाकार करता हुआ वह फिर आगे बढ़ा । उस ब्राह्मणको जलती दुपहरीमें इस तरह दुःखित देखकर व्याधके मनमें आया कि मैने इसकी सारी वस्तुएँ तो छीन ली हैं। न हो, इसे इसके जूते लौटा दूँ । इसकी सब चीजें छीनकर मैंने अपने धर्मका पालन किया ही है। हे राम ! वनमें आने जानेवाले पथिकोंके सामान छीन लेना, उन लोगोंके धर्ममें सम्मिलित है। उस चौरने सोचा कि इसके जूते इसे दे डालूँ तो इसका क्लेश दूर हो जायगा और उससे जो पुण्य होगा, सो मुझे

सर्गः १९ ] स्कन्दपुराणम् (उत्तरार्द्धम्) ४७७


इति निश्चित्य मनसि तूर्णं गत्वा ददौ च तौ । घर्मेण तप्तं तं दृष्ट्वा व्रजन्तं पथि संकटे ॥ ५३ ॥
उपानहौ गृहीत्वासौ निर्वृतिं च परां ययौ । मुदा प्रहर्षितो भूत्वा विप्रः शम्भुः पुनरब्रवीत् ॥ ५४ ॥
पूर्वपुण्येन ते जाता शुभा बुद्धिरनन्तर, यया दत्ते त्वया वैशाखे पादत्राणे दुरत्यये ॥ ५५ ॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा विप्रं व्याधोऽथ सोऽब्रवीत् । किं मयाऽऽचरितं पूर्वं पुण्यं तन्मे वद प्रभो ॥ ५६ ॥

आतपो बाधते घोरो नात्र छाया न वै जलम् । तस्मात्स्थान्तरं गत्वा यत्र छायाम्बु वर्तते ॥ ५७ ॥
तत्र गत्वा जलं पीत्वा सुखछायामाश्रित्य च । ततो मे सुकृतं पूर्वं सविस्तारं वदाम्यहम् ॥ ५८ ॥
इत्युक्तो मुनिना तेन व्याधः प्राह कृताञ्जलिः । इतोऽविदूरे सलिलं वर्तते च सरोवरे ॥ ५९ ॥
कपित्थास्तत्र वै सन्ति फलभारैश्च पीडिताः । गच्छामस्तत्र संतुष्टिर्भविता नात्र संशयः ॥ ६० ॥
व्याधेनैव समादिष्टस्तेन साकं ययौ मुनिः । कियद्दूरं ततो गत्वा ददर्शाश्चर्यं सरोवरम् ॥ ६१ ॥
स्नात्वा मध्याह्नवेलायां तस्मिन्सरसि निर्मले । आचम्योपस्पृश्याथ कृत्वा माध्याह्निकीः क्रियाः ॥ ६२ ॥
देवपूजां तथा कृत्वा फलमूलमनोरमैः । व्याधेनोपनीतं सुस्वादु कपित्थं भक्षयारि च ॥ ६३ ॥
भुक्त्वोः सुखं जलं पीत्वा सुच्छायां च समाश्रितः । सुखोपविष्टस्तं प्राह पूर्वपुण्यं वदामि ते ॥ ६४ ॥
शाकले नगरे पूर्वं द्विजन्मा वेदपारगः । स्तम्भो नाम महापापी तथा श्रावस्तगोत्रजः ॥ ६५ ॥
तवेष्टा गणिका काचिन्नाम्ना नीचगणेशिका । त्यक्तनित्यक्रियो नित्यं शूद्रवन्मूर्त्तितोऽप्यभूत् ॥ ६६ ॥
शून्याचारस्य मूढस्य पाखण्डस्याप्रियस्य च । ब्राह्मणी ते तदाऽऽचार्याऽऽया शोभनमयी तथा ॥ ६७ ॥
सा त्वां पर्यचरत्सुभ्रूः समेवञ्च प्रातजाधवम् । अन्योन्यं क्षालयन्ती च पादौ स्वांप्रयकाङ्क्षया ॥ ६८ ॥
उभयोरप्यधः शौचे उभयोर्वचने रता । ईक्षया बाधमाणाऽपि दिनकार्ये द्वयोः स्थिता ॥ ६९ ॥


पापीके पासमें अच्छा ही होगा ॥४८-५२॥ जूतोंकी पद्धत और छोटी है। इसलिए मेरे पैरमें न आयेंगे। सब इसे दे ही डालूँ। इस प्रकार निश्चय करके दौड़ता हुआ उस धूप तथा कण्ठियोंके झमेले दुःखी ब्राह्मणके पास पहुंचा और उसने वह जूता दे दिया ॥५३-५५॥ जूता मिलनेपर उसे बड़ा आनन्द मिला और ब्राह्मणने कहा-तुम सुखी होओ। हे वनचर ! तुम्हारे किस पुण्यसे तुम्हारी ऐसी बुद्धि हुई है। जिससे तुमने वैशाख महीनेमें इस जूतेका दान दिया है ॥५४॥ ५५ । इस प्रकार ब्राह्मणकी बात सुनकर व्याधने कहा कि पूर्वजन्ममें मैंने कौनसा पुण्य किया था। महाराज विस्तारपूर्वक मुझे बतलाइये ॥५६॥ ब्राह्मणने कहा कि इस समय मुझे घाम ज्यादा लग रहा है। इस जंगलमें न तो पानी है न छाया ही है। इसलिए किसी एक स्थान-पर चलो, जहाँ कि छाया और पानी मिल सके। सुखी होनेपर तुम्हें तुम्हारे पूर्वजन्मका वृत्तांत सुनाऊँगा ॥५७॥५८॥ इस प्रकार ब्राह्मणकी बात सुनी तो हाथ जोड़कर व्याधने कहा कि पास ही सरोवरमें पानी है और उसके आस-पास बहुतसे कैथके वृक्ष फलसे लदे हुए विद्यमान हैं। वहाँपर चलनेसे आप सन्तुष्ट हो जायेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ ५९ । ६० ॥ व्याधके उसी कहनानुसार ब्राह्मण उसके साथ चलकर उस सरो-वरके पास पहुंचा। दोपहरके समय उसने स्नान किया, बदन पोंछने और मध्याह्नकालकी क्रियायें पूरी कीं। फिर देवताका पूजन करके व्याधके लाये हुए कैथके फल खाये, सरोवरका ठंडा पानी पिया और छायामें सुखसे बैठकर विप्र बोला-अब मैं तुम्हारे पूर्वजन्मके पुण्य बतलाता हूँ ॥६१-६४॥ पूर्वजन्ममें शाकल नामकी नगरीमें तुम वेदपारगा स्तम्भ नामके ब्राह्मण थे। श्रावस्त गोत्रमें तुम्हारा जन्म हुआथा, किन्तु तुम बड़े भारी पापी थे। दुःसङ्गके दण्डवश तुम एक वेश्यापर मुग्ध हो गये। तुमने अपनी सारी नित्य क्रियायें छोड़ दीं और शूद्रके समान मूर्त्तिमें सर्वेश्वर बनने लगे। तुम जैसे मूर्ख तथा आचार विहीन ब्राह्मण-के घरमें एक अति रूपवती ब्राह्मणी पत्नी भार्या थी। वह उस वेश्याकी तथा तुम्हारी खूब सेवा करती थी तुम्हें प्रसन्न रखनेकी इच्छासे वह तुम दोनोंके पैर धोती थी । ६५-६८। तुम दोनोंका अपेक्षा नीची शय्यापर

५७८ आनन्दरामायणे [सर्गः १४

एवं शुश्रूषयन्त्या हि भर्तारं वेश्यया सह। जगाम सुमहान्कालो दुःखिताया महीतले ॥७०॥ अपरास्मिन्दिने भर्ता माहिषं मूलकाञ्चितम्। अभक्षयत्सुतक्राक्तं निष्पावांस्तैलमिश्रितान् ॥७१॥ तमपथ्यमशित्वा तु वमथुंश्च समेरयत्। अथान्तःदारुणो रोगो व्यजायत भगंदरः ॥७२॥ स दह्यमानो रोगेण दिवारात्रं तु भूरिशः। यावदास्ते गृहे वित्तं तावद्वेश्या च संस्थिता ॥७३॥ गृहीत्वा सकलं वित्तं पश्चात्तस्य मन्दिरे। अन्यस्य पार्श्वमासाद्य तस्थौ घोराऽतिनिर्घृणा ॥७४॥ ततः स दीनबदनो व्याधिबाधामृषा हतः। उरुवाष्पमुखो भार्यां रुजा व्याकुलमानसः ॥७५॥ परिपालय मां देवि वेश्यासक्तं सुनिष्ठुरम्। न मयोपकृतं किञ्चित्तव सुन्दरि पावनि ॥७६॥ यो भार्यां प्रणतां पापो नानुमन्येत मूर्खधीः। स विड्भो भवनीचासु दश जन्मानि सप्त च ॥७७॥ दिवारात्रं महाभागे निन्दितः साधुभिर्जनैः। पापयोनिमवाप्स्यामि त्वां साध्वीमवमन्य वै। ७८॥ अहं कापेन दग्धोऽस्मि सदा निष्ठुरभाषणः। एवं ब्रुवाणं भर्तारं कृताञ्जलिपुटाऽब्रवीत् ॥७९॥ न दैन्यं भजतां कार्ये न व्रीडां कुरु मां प्रति। न चापि त्वयि मे क्रोधो वर्तते सुमनागपि ॥८०॥ पुरा कृतानि पापानि दुःखानि भवति हि। तानि यः क्षमते साध्वी पुरुषो वा स उत्तमः ॥८१॥ यन्मया पापया पापं कृतं वै पूर्वजन्मनि। तद्दुःखजन्यया न मे दुःखं न विषादः कथंचन ॥८२॥ इत्येवमुक्त्वा भर्तारं सा सुश्रूषन्त्यपालयत्। आनीय जनकाद्वित्तं बन्धुभ्यो वरवर्णिनी ॥८३॥ क्षीरोदवासिनं विष्णुं भर्तृदेहे व्यचिन्तयत्। शोधयन्ती दिवारात्रौ पुरीषं मूत्रमेव च ॥८४॥ नखेन कर्षती भर्तुः कृमीन्देहाच्छनैः शनैः। न सा स्वपिति रात्रौ तु दिवा वा वरवर्णिनी ॥८५॥ भर्तुर्दुःखेन संतप्ता दुःखितेदमथाब्रवीत्। देवाश्च पांतु भर्तारं पितरो ये च विश्रुताः ॥८६॥ कुर्वन्तु रोगहीनं मे भर्तारं हृतकल्मषम्। चंडिकायै प्रदास्यामि रक्तं मांसं सुखोद्भवम् ॥८७॥

होती और दोनोंकी आज्ञाका पालन करता रहता थ। यद्यपि वेश्या उसे अपनी सेवा करनेसे रोकती, फिर भी वह न मानती ओर तुम दोनोंकी परिचर्याम गत दिन लगी रहता थी। इस तरह सेवा करते करते उस दुखियाके बहुत दिन बीत गये। एक दिन उसकेपतिने कुछ ऐसी चीज खा ली, जिससे के दस्त होग यता और कुछ दिनों बाद उसके अतिदारुण भगन्दर रोगका रूप धारण कर लिया॥६९-७२॥ उस रोगके स्वरूप रात-दिन जलने लगा। जब तक उसपर रुपैये थे, तब तक वेश्या रही। बादम घरकी रही-सही पूँजी फूरकर निकल भागी और किसी दूसरेके घर जा बैठी। ऐसी अवस्थाम रोता हुआ मनुष्य अपनी स्त्री-से कहने लगा-॥७३-७५॥ हे देवि! मुझ वेश्यासक्त तथा निष्ठुर पुरुषकी रक्षा करो। हे सुन्दरि! हे पावनि! मैंने जीवनभरमें तुम्हारा कोई उपकार नहीं किया है। शास्त्र कहता है कि जो दोषी शीलवन्ती भार्या-का निरादर करता है, वह सत्तर जन्म तक नपुंसक होकर जन्म लेता है। अच्छे पुरुष ऐसे मनुष्योंकी रात-दिन निन्दा करते हैं। तुम जैसी सती-साध्वी नारीका अपमान करके मुझे किस नीच योनिम जाना पड़ेगा ॥७६-७८। क्योंकि मैं सदा तुम्हारे ऊपर कुपित रहता और रूखी बात बोला करता था। इस प्रकार दीनभावसे प्रार्थना करते हुए पतिको स्त्रोने हाथ जोड़कर कहा-हे कान्त! आप किसी प्रकार दुःखी न हों और उन बीती बातोंके लिए पश्चात्ताप न करें। मुझ तुम्हारेपर उनके लिए कोई विम्बा या क्रोध नहीं है ॥७९॥८०॥ अपने पूर्वजन्मके किये हुए पाप ही दुःखरूप प्राप्त होते हैं। जो स्त्री या पुरुष उन दुःखोंको सह लेता है, वे उत्तम हैं। मुझ पापिनाने पूर्वजन्ममें जो पाप किये थे, उनको भोगते हुए मुझे किसी तरह का दुःख या विषाद नहीं है॥८१॥८२॥ इतना कहकर उसने अपने पतिका ढाढ़स बंधाया और पिता तथा चाचाओँके पाससे धन माँग लाकर सेवा करने लगा। वह उस गंधी पतिके शरीरमें क्षीरसागरनिवासी विष्णुभगवान्‌का निवास मानती हुई रात दिन मल-मूत्र उठाकर सेवा करती रही ॥८३॥८४॥ पतिके शरीरमें पड़े हुए कीड़ों को नाखुनसे निकालती रहती थी। इस प्रकार सेवा करनेसे रात-दिन कभी उसे सोनेतक की छुट्टी नही मिलती थी। स्वामीके दुःखसे दुःखित होकर वह देवताओंको मनाती, पितरोंसे विनती करती

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७१

सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७१

सकृन्न मक्षिपोपेन भर्तुरारोग्यहेतवे । मोदकानपि दास्यामि विघ्नेशाय महात्मने ॥८८॥ मन्दवारे करिष्यामि भवेत्वहमपोषणम् । नोपभोक्ष्यामि मधुरं नोपभोक्ष्यामि वै घृतम् ॥८९॥ तैलाभ्यङ्गविहीनाऽहं सदा स्वप्स्यामि भूतले । जीवत्वयं रोगहीनो भर्ता मे शरदां शतम् ॥९०॥ एवं सा व्याहरद्देवी वासरे वासरे वने । तदा चागादृषिः कश्चिन्महात्मा देवलाह्वयः ॥९१॥ वैशाखमासे घर्मार्त्तः स ययौ तस्य वै गृहे । तदा ते भार्यया प्रोक्तं वैद्योऽयं गृहमागतः ॥९२॥ तेन ते रोगहानिः स्यात्स्यातिथ्यं करोम्यहम् । यद्याह पथ्यमिच्छ्वं मां नोचेन्नैव करोम्यहम् ॥९३॥ शान्त्या त्वां धर्मविन्मुखं भिषग्व्याजेन वञ्चितम् । तस्यातिथ्यं तु वै कर्तुं दत्ताऽऽज्ञा वै पुरा त्वया ॥९४॥ तस्य पत्नी तदा तुष्टा पूजयामास मा मुनिम् । पादावनेजनं कृत्वा तज्जलं मूर्ध्नि तेऽवहत् । ९५॥ पातुं तुभ्यं ददौ वीर्यं त्वामुक्त्वा भेषजं त्विति पानकं च ददौ तस्मै घर्मार्त्ताय महात्मने ॥९६॥ दिव्यान्नैर्भोजयामास सुगन्धव्यजने ददौ । त्वयाऽनुज्ञापिता साय धर्मतापं व्यशारयत् ॥९७॥ स प्रातःकदिते सूर्ये मुनिर्भाग्यान्तरं ययौ । अथ नाल्पेन कालेन सन्निपातोऽभवत्तव ॥९८॥ त्रिकटु मुश्व आधाय्मा भर्त्तारंङ्गुलिमव्यदन् । कफेन दन्तपङ्क्तिभ्यां मीलित्वाभ्यां दृढं तदा ॥९९॥ ते वक्त्रेऽङ्गुलिखण्डं तस्थितमभवन्निबोधतत् । गङपित्ताङ्गुले स्तस्याः पश्चात्त्वं सं गतः पुरा ॥१००॥ शय्यायां सुमनोहायां स्मरन्तां पुश्चलीं हृदि । मृतं विज्ञाय भर्त्तारं भार्या कांतिमता तव ॥१०१॥ विक्रीन्वा वलये स्वे त्वां गृहीत्वा चन्दनं बहु । चक्रे चितिंतनेन माध्वी मध्ये कृत्वा पतिं तदा ॥१०२॥ समालिङ्ग्य भुजाभ्यां ते पादौ चालिङ्ग्य पादयोः । मुखे मुखं निजं कृत्वा हृदये हृदयं तथा ॥१०३॥ गुह्ये कृत्वा तु गुह्यं स्वमेवं सा रायमागता । दाहयामास कल्याणी भर्तुरैहिकजान्वितम् ॥ आत्मना सह तन्वी ज्वलितं जातवेदसि । १०४ । एवं वरा सा ललना पतिव्रता ददाम ने सुखमित्युदी । विसृज्य देहं सहसा प्रयाथ पर्ति जयत्युच्च सुरादिरोद्यम् ॥१०५॥


और चण्डिकाके समीप यह प्रार्थना करता- हे देवि ! यदि मेरे पतिदेव शीघ्र अच्छे हो जायें तो मैं महिषके रक्त और मांससे मिला हुआ अन्न आपका समर्पण करूंगी वा देत यदि अच्छे हो जायें तो मैं गणेशजीको लड्डू चढ़ाऊंगी और प्रत्येक शनिवारको व्रत करूंगी । मैं मिठाई, मट्ठा छोड़ दूंगी, घी भी नहीं खाऊँगी, शरीरमे तेल और उबटन लगाना त्याग दूंगी और सदा जमीनपर सोऊंगी। लेकिन मेरे पतिदेव रोगमुक्त हो जायें और संवदा वर्ष जीवित रहें ॥८८-९०॥ इसतरह वह नित्य मानना माना करती थी । इसी बीच एक दिन महात्मा देवल ऋषि सहसा उसके घर पहुंचे। वह वैशाखका महीना था; स्तम्भको स्त्री पतिके पास आकर कहने लगी कि एक कोई वैद्य देवात् मेरे घर आ गया है। यह अवश्य किसी उपायसे आपका रोग नष्ट कर देगा। आप यदि आज्ञा दें तो मैं उसकी सेवा करूँ, नहीं तो नहीं ॥ ९१-९३ ॥ स्तम्भ (तुम) ने सेवा करनेकी आज्ञा दे दी। स्त्रीने प्रसन्न मनसे देवलकी पूजा की। इनके चरण धोकर उस जलको माथे चढ़ाया और थोड़ा-सा जल दवाके व्याजसे स्तम्भ (तुम) को भी पिला दिया। फिर उन देवल ऋषिको उसने शर्बत पिलाया। अच्छे-अच्छे पकवान बनाकर भोजन कराया और तुम्हारे कहनेसे उनकी पंखा भी झलकर उनका सन्ताप दूर किया ॥ ९४-९७ ॥ रातभर देवलऋषि उनके घर रहे और सवेरे दूसरे गाँवको चले गये। थोड़े दिन बाद स्तम्भको (तुमको) सन्निपात हो गया। स्त्रीने त्रिकटु (सोंठ, मिर्च, पीपल) का काढा बनाकर स्तम्भके (तुम्हारे) मुखमें दिया, इतनेमें कफके प्रकोपसे दांत अकड़ गये और तुमने स्त्रीकी एक ऊँगली काट ली। तुम्हारे मुखमें वह कोमल उँगली पड़ी ही रही और तुम्हारी मृत्यु हो गयी ॥ ९८-१०० ॥ मरणकालमें शय्यापर पड़े हुए उसी पुंश्चली वेश्याका स्मरण करते-करते तुमने प्राण त्याग दिया। जब उस सतीने जाना कि तुम्हारी मृत्यु हो गयी है तो अपने दोनों कङ्कण बेचकर बहुत-सी चन्दनकी लकड़ी खरीदी और उसकी चिता बनायी। फिर दोनों भुजाओंसे भुजायें पैरसे पैर, मुखसे मुख तथा हृदयसे

४८० आनन्दरामायणे [ सर्ग १४

त्वमन्तकाले गलिकेच्छया हि देहं त्यक्त्वा त्यक्तकर्मा दुरात्मा । व्याधजन्म प्राप्तसि घोरधर्मं हिंसात्मकः सर्वदोषैककारी ॥१०६॥ दत्ता त्वया पादरक्षौपुटे वै संस्मृत्य माधवे मद्धिताय । प्रियाङ्गनाजातेव जाता सुबुद्धिर्धर्मं नृते पादरक्षादिने वै ॥१०७॥ पूर्वं मूर्ध्ना पादरक्षावरोपे जलं मुनेः सर्वपापप्रहारि । तेनैव त संस्मृतिर्मे वनेऽस्मिन् जाता श्रोतुं स्वीयपुण्यं मनिश्व ॥१०८॥ हस्ते कृत्वांगुलिं यस्यान्मृतः पूर्वजन्मांतरे त माद्य वने मांसदाह्यनेऽभूद्देनेचर । १०९ । वेश्या सा झिल्लिका जाता भार्याया तव वर्तते शय्यायां माषानेऽद्य शयनं भुवि सर्वदा ॥११०॥ इति ते सर्वमाख्यातं पूर्वजन्मनि यत्कृतम् तत्कर्म पुण्यं पापं च दृष्टं दिव्येन चक्षुषा ॥१११॥ अतः परं भावि वृत्तं शृणु तेऽहं वदामि वै कृपनाम मुनिस्त्यग्रे करिष्यथ सरोवरे ॥११२॥ करिष्यति तपस्तीव्रं चान्द्रायणपरःस्थितः । पश्चात्प्रयोगिमाते तन्नेत्राभ्यां वहिः सूनम् ॥ ११३॥ वीर्यं दृष्ट्वोर्वी काचित्स्वयं स्खलितमद्भुतम् । ग्रहीष्यति स्वतः काले तस्मात्त्वम्पुत्रवस्तदा ॥११४॥ किराताः पालयिष्यंति किरातत्वं महिष्यसि । उपारक्षार्पणेनेऽद्य यस्मात्सम्पुण्यतस्तदा ॥११५॥ भविष्यति सङ्गविस्ते वने सप्तमुनीश्वरैः । तेषां प्रसादाद्वाल्मीकिर्मुनिरूत्त्व हि भविष्यसि ॥११६॥ यस्त्वं रामकथां दिव्यां सुप्रबन्धैः करिष्यसि ।

वाल्मीकिरुवाच इति व्याधं समादिश्य धर्मान्वैशाखजानपि ।११७। उपदिष्ट्य सविस्तारं प्रतस्थे गौतमीं तदा स द्विजः कुण्डलाद्यैश्च तद्दत्तैस्तुष्टमानसः ।।११८।। व्याधोऽपि शङ्खवचनं तस्मिन्नेव वने चरम् । सर्वान्त्याचमार्यान्तानर्चनान्पाऽकरोत्सुमान् ११९।।

हृदयका आलिंगन करके तुम्हारे साथ घबराता विमान द्वाराकी व्य वहर छह राममें रमी पतिव्रता स्त्री सती होकर वैकुण्ठलोकको चली गयी १०१-१०५ ॥ अथ ब्राह्मण चित्त कार्योंको त्यागे हुए तुमने अन्तसमय- में वेश्याका चिन्तन करते हुए प्राण त्यागे थे। इससे ऐसा उद्गाहारी नया हिंसासे आसक्त इस घोरकर्ममय काप्रिका वीजम उत्पन्न हुए हो। उस समय वैशाख इनंगो आये हुए दैवज्ञ ऋषिकी पूजाके लिए तुमने अपनी स्त्रीको आज्ञा दे दी थी, उसी पुण्यमे तुम्हारे हृदयमें धर्मबुद्धि उत्पन्न हुई है। इसीसे इस समय तुमने मेरे जूते वापस दे दिये हैं। तुम्हारे स्थान देवारुक वन्दके ब्राह्मणका चरण-जल तुम्हारे माथ चढाया था, उसी पुण्यसे बाज हमारी भेट हुई है और तुम अपने पूर्वजन्मका वृत्तांत सुन रहे हो ॥ १०६-१०८॥ तुमने पूर्वजन्ममें अपनी स्त्रीकी उंगली काट ली थी। इसलिए हे वनेचर ! इस समय तुम माँसाहारी हो । वह वेश्या इस समय में ल्ली है। मरने समय तुम शय्यापर हुए थे, इस कारण इस जन्ममें तुम्हे सर्वदा भूमिपर शयन करना पडता है। मैंने अपनी योगदृष्टिसे तुम्हारे पूर्वजन्मके पाप-पुण्य देखकर तुम्हें बतलाया है ॥ १०६-१११॥ इसके अनन्तर अब मैं तुम्हें तुम्हारे भावी जीवनका हाल बतलाता हूँ सुनो । कुपनामक कोई तपस्वी अमर त्यागकर एक सरोवरके निकट तपस्या बार । पश्चात् अन्तम उनकी आंखोंसे वीर्य निकलेगा। उसे देखकर काई सर्पिणी खा जायगी। उसीके उदरसे तुम किरातके रूपमें उत्पन्न होओगे ॥ ११२-११४॥ किरात लोग तुम्हारी रक्षा करेंगे और तुम उन्हींके साथ रहोगे। जो तुम इस समय मुझे मेरा जूता वापस दे रहे हो, इसी पुण्यसे एक बार तुम्हारा सप्त ऋषियांस भेट होगी और उनकी दयासे तुम वाल्मीक नामक ऋषि होओगे ॥ ११५, ११६ । अपनी अच्छी रचनासे तुम रामकथाका निर्माण करागे । वाल्मीकिजी कहते हैं कि इस प्रकार वैशाख मासका धर्म तथा विविध उपदेश देकर व्याधसे कुण्डल आदि पाकर प्रसन्न मन शंख गौतमी नदीकी ओर चले गये। व्याधने भी शंखके उपदेशसे वनमें फल-मूल द्वारा ही वैशाख मासके धर्मोकी