भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

अनुरागसागर वाणी

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करि प्रणाम सम्मुख रहे जाई। माता सब पूछी कुशललाई।।

कहु ब्रह्मा पितु दरसन पाये। दूसरि नारि कहाँ से लाये।।

तीनों ने माता के सम्मुख जाकर प्रणाम किया। माता ने कुशल पूछी, और कहा—हे ब्रह्मा! क्या तुमने पिता का दर्शन पाया और यह दूसरी नारी कहाँ से लाए!

ब्रह्मा ने कहा

कह ब्रह्मा दोऊ हैं साखी। परस्यो सीस देख इन आँखी।।

ब्रह्मा ने माता से कहा कि ये दोनों गवाह हैं कि मैंने पिता के दर्शन किये और उनके शीश का स्पर्श किया।

माता ने गायत्री से पूछा

तब माता बूझे अनुसारि। कछु गायत्री बचन विचारी।।

तुम देखा इन दर्शन पावा। कहो सत्य दर्शन परभावा।।

माता ने गायत्री से पूछा कि कहो, क्या ब्रह्मा ने दर्शन किये!

गायत्री ने कहा

तब गायत्री बचन सुनावा। ब्रह्मा दर्श सीस पितु पावा।।

मैं देखा इन परसेठ शीशा। ब्रह्माहि मिले देव जगदीशा।।

गायत्री ने झूठी गवाही देते हुए कहा कि ब्रह्मा ने पिता के दर्शन किये, मैंने देखा कि इसने पिता के शीश को स्पर्श भी किया।

लेइ पुहु प परसेठ सीस पितु, इन दृष्टि मैं देखत रही।।

जल ढार पुहु प चढ़ाय दीन्ह, हे जननि यह है सही।।

पुहुपते पुहुपावती भयी, प्रगट ताही ठामते।।

इनहु दरसन लह्यो पितु को, पूछहू इहि पुहु पावती।।

सबही साँच मैं तोसो कहूँ, नहिं झूठ हैं एको रती।।

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साहिब बन्दगी

गायत्री ने कहा कि मैंने देखा, ब्रह्मा ने पिता के शीश को स्पर्श कर वहाँ फूल चढ़ाया और उसी से यह पुहुपावती (पंपावती) नामक कन्या उत्पन्न हुई। यह बिलकुल सच है, मैं थोड़ा सा भी झूठ नहीं बोल रही हूँ, यदि तुम्हें यकीन न हो तो पंपावती से ही पूछ लो।

माता ने पुहुपावती से पूछा

कहु पुहुपावती मोहि, दरश कथा निरवार के ॥

यह मैं पूछों तोहि, किमि ब्रह्मा दरसन किये ॥

अद्या शक्ति ने पुहुपावती से कहा कि मैं तुमसे पूछती हूँ, बताओ क्या ब्रह्मा ने पिता के दर्शन किये?

पुहुपावती ने कहा

पुहु पावती बचन तब बोली । माता सत्य बचन नहीं डोली ॥

दर्शन सीस लह्यो चतुरानन । चढ़े सीस यह धर निश्चय मन ॥

पुहुपावती ने भी झूठी गवाही देते हुए कहा कि ब्रह्मा ने पिता के शीश को देखा।

साख सुनत अद्या अकुलानी । भा अचरज यह मर्म न जानी ॥

गवाही सुनकर शक्ति व्याकुल हुई, उसे अचरज हुआ कि यह कैसे हुआ! क्योंकि निरंजन ने तो कहा था कि वो किसी को दिखेगा नहीं। अद्या को रहस्य का पता न चला कि सब झूठ बोल रहे हैं।

काल जो कहिये अलख निरंजन, चारों वेदन गाई हो। यह मत से सब दुनियां उरझी, पाप पुण्य भुगताई हो॥

शाप से ग्रसित हुए सब

जब तीनों ने झूठ बोला तो अद्या शक्ति चिंतित हुई, उसने ध्यान में निरंजन से पूछा—

निरंजन ने कहा

अलख निरंजन अस प्रण भाखी। मोकहँ कोउ न देखै आँखी ॥ ये तीनहुँ कस कहहिँ लबारी। अलख निरंजन कहहु सम्हारी ॥ ध्यान कीन्ह अष्टंगी तेहि छन। ध्यान माहिँ अस कहो निरंजन ॥

आद्य शक्ति ने तब ध्यान में निरंजन से पूछा कि क्या इन्होंने तुम्हारा दर्शन किया! निरंजन ने भी ध्यान में कहा कि ये झूठ बोल रहे हैं, मुझे किसी ने नहीं देखा।

ब्रह्मा मोर दरश नहिं पाया। झूठी साखि इन आय दिवाया ॥ तीनों मिथ्या कहे बनाई। जनि मानहु ये हैं लबराई ॥

निरंजन ने कहा कि ब्रह्मा ने मेरा दर्शन नहीं पाया और इनसे झूठी गवाही दिलवायी है। ये तीनों झूठ बोल रहे हैं।

माता ने तीनों को शाप दिया

यह सुनि माता कीन्हँ दापा। ब्रह्मा को तब दीन्हों शापा ॥ पूजा तोरि करै कोई नाहीं। जो मिथ्या बोलेउ मम पाहीं ॥ इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा। नरक मोट अपने शिर लीन्हा ॥ आगे है जो शाख तुम्हारी। मिथ्या पाप करहि बहु भारी ॥ प्रगट करहिं बहु नेम अचारा। अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥ विष्णु भक्त सों करहिं हँकारा। ताते परि हैं नरक मँझारा ॥

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साहिब बन्दगी

कथा पुराण औरहिं समुझैहैं । चाल बिहून आपन दुख पैहैं ॥ उनसे और सुनै जो ज्ञाना । करिसो भक्ति कहौं परमाना ॥ और देव को अंश लखैहैं । औरन निन्दि काल मुख जैहैं ॥ देवन पूजा बहु विधि लैहै । दछिना कारण गला कटैहैं ॥ जा कह शिष्य करै पुनि जायी । परमारथ तिहि नाहिं लखायी ॥ परमारथ के निकट न जैहैं । स्वारथ अर्थ सबै समुझैहैं ॥ आप स्वारथी ज्ञान सुनैहैं । आपनि पूजा जगत दूढै हैं ॥ आपन पूजा जगहि दिढायी । परमारथ के निकट न जायी ॥ आप ऊँच औरहि कहै छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होई खोटा ॥

जब लग अस कीन्ह प्रहारा ।

ब्रह्मा मूर्छित मही कर धारा ॥

माता के बचन सुन ब्रह्मा मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े ।

गायत्री जान्यो तिहि वारा । हुइ हैं तोर पंच भरतारा ॥ गायत्री तोर होई वृषभ भतारा । सात पाँच और बहुत पसारा ॥ धर औतार अखज तुम खायी । बहुत झूठ तुम बचन सुनायी ॥ निज स्वारथ तुम मिथ्या भाखी । कहा जानि यह दीन्ही साखी ॥ मानि साप गायत्री लीन्ही । सावित्रिहि तब चितवत कीन्ही ॥

आद्या शक्ति ने तब गायत्री को भी शाप दिया, कहा-गाय हो जा ! तेरे अनेक पति होंगे । जिस मुख से झूठ बोला, उसी मुख से अब विष्ठा भी खाना । अब अद्या शक्ति ने सावित्री की ओर देखा ।

पुहु पावती निज नाम धरायेहु । मिथ्या कह निज जन्म नशायेहु ॥ सुनहु पुष्पावति तुम्हरो विश्वासा । नहिं पुजिहैं तुमसे कछु आसा ॥ होय कुगंध ठौर तब बासा । भुगतहु नरक काम गहि आसा ॥ जो तोहि सींच लगावे जानी । ताकर होय वंश की हानी ॥

शाप से ग्रसित हुए सब

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अब तुम जाय धरो औतारा । क्योड़ ! कैतकी नाम तुम्हारा ॥

आद्या शक्ति ने पुहुपावती को भी शाप दिया, कहा—तुमने झूठ बोला कि फूल से उत्पन्न हुई, जा केली का फूल हो जा। तू कुण्ठाओं पर उत्पन्न होगी और तुझे लगाने वाले का वंश ही समाप्त हो जायेगा।

भये शापवश तीनों विकल मति हीन छीन कुकर्मते ।

यह काल प्रचण्ड कामिनि डस्यो सब कहँ चर्मते ॥

ब्रह्मादि शिव सनकादि नारद कोठ न बचि भागि हो ।

सुनु धरमनि विरल बाचे सब्द सत सो लागि हो ॥

शाप पाकर तीनों व्याकुल हो गये और कुकर्म के कारण सबकी मति हीन हो गयी। साहिब धर्मदास से कहते हैं कि काल का यह प्रचण्ड जादू सबपर छाया हुआ है, जिस कारण माया के कामिनि रूप से कोई नहीं बच पाया, सबको इसने डस लिया है। कहाँ तक बात की जाए, ब्रह्मादि, शिव, सनकादि, नारद आदि कोई भी इससे बचकर भाग नहीं सका। हे धर्मदास! इससे केवल वे बिरले जन ही बच सकते हैं, जो सद्गुरु से सत्य शब्द पाकर उसमें रमे रहें।

शाप तीनों को दै लियो, मन माहिँ तब पछतावई ।

कस करहि मोहि निरंजना, पल छमा मोहि न आवई ॥

तो जब तीनों को शाप दे दिया तो शक्ति मन ही मन पछताने लगी कि मैंने इन्हें शाप क्यों दिया, छमा क्यों नहीं कर दिया, अब निरंजन पता नहीं क्या करेगा!

निरंजन ने आकाशवाणी की

अकास बानी तब भयी, यहु कहा कीन भवानिया ।

उत्पति कारन तोहि पठायो, कहा चरित यह ठानिया ॥

निरंजन ने आकाशवाणी की, कहा—हे भवानी! यह तुने क्या किया! मैंने तुम्हें सृष्टि का कार्य करने को कहा, लेकिन तूने क्या चरित्र किया!

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साहिब बन्दगी

अद्या को भी मिला शाप

नीचहि ऊँच सिताय, बदल मोहि सो पावई ॥

द्वारपर युग जब आय, तुमहुँ पंच भतारि हो ॥

निरंजन ने कहा कि आगे भी जो कोई बलवान निर्बल को सतायेगा, मैं उसे बदले में दुख दूगाँ, और अद्या को शाप दिया कि जब द्वारपर युग आयेगा जो द्रोपती (गायत्री) के पाँच पति होंगे वो आपके (आद्या शक्ति) पुत्र होंगे और बिना बाप के होंगे।

शाप ओयल जब सुनेउ भवानी। मन सन गुने कहा नहिं बानी ॥

ओयल प्रभाव शाप हम पाया। अब कहा निरंजन राया ॥

तोरै बस परी हम आई। जस चाहो तस करो उपाई ॥

बदले में निरंजन की आकाशवानी सुन अद्या चुप रह गयी और मन ही मन कहने लगी कि शाप के बदले में मैंने शाप पाया, पर मैं तो तेरे वश में हूँ, इसलिए जो तेरी इच्छा है, वही कर।

मन ही सख्यी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई। पांच पचीस तीन का पिंजड़ा, जामें तोहि राखा भरमाई॥

विष्णु को हुए पिता के दर्शन

अब माता विष्णु पहुँ आई। लीन्ह विष्णु कहँ गोद उठाई॥ पुनि अस कहै उ आदि भवानी। अब सुनहु पुत्र मम बानी॥ देख पुत्र तोहिँ पिता भिटावों। तोरे मन कर धोख मिटावों॥ प्रथमहिँ ज्ञान दृष्टि सों देखो। मोर बचन निज हृदय परे खो॥ मन स्वरूप करता कहँ जानो। मनते दूजा और न मानो॥ स्वर्ग पताल दौर मन केरा। मन अस्थिर मन अहै अनेरा॥ क्षणमहँ कला अनंत दिखावे। मनकहँ देख कोइ नहिँ पावे॥ निराकार मनही को कहिये। मन की आश निशि दिन रहिये॥ देखहु पलटि शून्य महँ जोती। जहवाँ झिलमिल झालर होती॥ फेरहु श्वास गगन कहँ धाओ। मार्ग अकाशहि ध्यान लगाओ॥ जैसे माता कहि समुझावा। तैसे विष्णु ध्यान मन लावा॥

विष्णु ने सत्य बोला था, इसलिए माता ने विष्णु को गोद में बिठाकर कहा कि हे पुत्र! तुझे पिता का दर्शन करवाती हूँ। मन ही सृष्टि का कर्ता है, मन से ही स्वर्ग, पाताल आदि हैं। मन को कोई देख नहीं पाता है, यही निराकार तुम्हारा पिता है। फिर शून्य में माता ने विष्णु को ज्योति के दर्शन कराए और कहा कि श्वास को पलट कर ऊपर शून्य में चढ़ाओ, ध्यान लगाओ। विष्णु ने वैसा ही किया।

तेहि पीछे धर्मदास, मन पुनि आप दिखायऊ।

कीन्ह ज्योति परकास, देखि विष्णु हर्षित भये॥

मातहि नायो शीश, बहु अधीन पुनि विष्णु भा।

मैं देखा जगदीश, हे जननी परसाद तुव॥

तब मन विष्णु को दिखाई दिया, निरंजन(मन) ने ज्योति दिखाई और उसे देख विष्णु बड़े प्रसन्न हुए, माता को शीश नवाया, कहा—मैंने तुम्हारी कृपा से परमात्मा के दर्शन कर लिये।

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साहिब बन्दगी

धर्मदास का संशय

धर्मदास ने पूछा

धर्मदास गहि टेके पाया। हे साहिब इक संशय आया।।

कन्या मन को ध्यान बतावा। सो यह सकल जीव भरमावा।।

धर्मदास जी ने साहिब के चरण पकड़ लिये, कहा कि एक संशय है, अद्या ने उस मन का ध्यान करना विष्णु को बता दिया, जिसने सब जीवों को भरमाया हुआ है।

साहिब कहते हैं

धर्मदास यह काल स्वभाऊ। पुरुष भेद विष्णु नहिं पाऊ।।

कामिनी की यह देखहु बाजी। अमृत गोय दियो विष साजी।।

देख ज्योति पतंग हु लासा। प्रीति जान आवै तिहि पास।।

परसत होवे भस्म पतंगा। अनजाने जरि मरे पतंगा।।

ज्योति स्वरूप काल असस आही। कठिन काल वह छाड़त नाहीं।।

काहि विष्णु औतारहि खाया। ब्रह्मा रुद्रहि खाय नचाया।।

कौन विपति जीवन की कहऊं। परखि वचन निज सहजहि रहऊं।।

लख जीव वह नित्यहि खाई। अस विकराल सो काल कसाई।।

साहिब ने कहा—हे धर्मदास! यह काल का स्वभाव था, परम पुरुष का भेद विष्णु ने नहीं पाया। अद्या का खेल तो देखो, उसने काल रूपी, मन रूपी विष का भेद विष्णु को देकर परम पुरुष रूपी अमृत का भेद गुप्त रखा। जैसे दीपक की लौ को देखकर पतंगा प्रसन्न होता है और प्रेम वश उसके पास आता है, पर उसके स्पर्श से वो पतंगा भस्म हो जाता है, अनजाने में बेचारा जल मरता है। ऐसे ही ज्योति स्वरूप काल भी किसी

विष्णु को हुए पिता के दर्शन

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को जीवित नहीं छोड़ता है। करोड़ों विष्णु के अवतारों को उसने खा लिया, ब्रह्मा और शिवजी को भी नचा-नचाकर खाया। फिर साधारण जीवों के जीवन का दुख कहाँ तक कहूँ! रोज़ एक लाख जीवों को वो खाता है, ऐसा भयानक कसाई है।

धर्मदास ने पूछा

धर्मदास कह सुनहु गुसाई। मोरे चित्त संशय अस आई॥ अष्टं गीहि पुरुष उत्पानी। जिहि विधि उपजी सो मैं जानी॥ पुनि वहि ग्रास लीन्ह धर्मराई। पुरुष प्रताप सु बाहर आई॥ सो अष्टं गीहि अस छल कीन्हा। गोइसि पुरुष प्रगट यम कीन्हा॥ पुरुष भेद नहिं सुनत बतावा। काल निरंजन ध्यान करावा॥ यह कस चरित कीन्ह अष्टं गी। तजा पुरुष भइ काल की संगी॥

धर्मदास ने कहा-हे साहिब! मेरे चित्त में एक संशय है कि अद्या को परम पुरुष ने उत्पन्न किया। फिर उस अद्या को काल निरंजन ने खा लिया। फिर परम पुरुष के प्रताप से वो बाहर आई। ऐसी आद्य शक्ति ने परम पुरुष का भेद क्यों नहीं दिया। काल निरंजन का ध्यान क्यों करवाया! उसने यह चरित्र क्यों किया कि परम पुरुष को छोड़ काल के साथ हो गयी!

साहिब कहते हैं

धर्म सुनहु जन नारि सुभाऊ। अब तोहि प्रगट वरणि समझाऊँ॥ होय पुत्री जेहि घर माहीं। अनेक यतन परितोष ताहीं॥ गयी सुता जब स्वामी गेहा। रात्या तासु संग गुण नेहा॥ मात पिता सबै बिसरावा। धर्मदास अस नारि स्वभावा॥ ताते अद्या भई विगानी। काल अंग हैं रही भवानी॥ ताते पुरुष प्रगटने लायी। काल रूप विष्णुहि दिखलायी॥

धर्मदास का संशय

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साहिब बन्दगी

साहिब ने कहा-हे धर्मदास ! मैं तुम्हें नारी स्वभाव बताता हूँ। जब पुत्री घर में होती है तो बड़े यत्न से उसे प्रसन्न, संतुष्ट किया जाता है, पर जब वो पति के घर चली जाती है तो उसी में खो जाती है, उसी से प्रेम करने लगती है, तब माता-पिता को भूल जाती है। ऐसे ही अद्या ने भी किया; वो बेगानी हो गयी, इसी कारण उसने विष्णु को भी काल का रूप ही दिखलाया।

काल निरंजन

चकिया सब रागन की रानी ॥

एक पाट धरती चले, एक चले असमानी।

काल निरंजन पीसन लागे सवालाख की घानी ॥

बड़े २ इस जगमें पिस गये, पिसे गये योगी जिंदा।

छप्पन कोटि यादवा पिस गये, परे काल के फंदा ॥

नौ भी पिस गये दस भी पिस गये, पिस गये सहस अठासी।

कथनी कथ कथ पिस गये भक्ता भये, गर्भ के वासी ॥

नौऊनाथ चौरासी पिस गये, बूढ़ा सुत अट्टासी।

मौनी औ सन्यासी पिस गये, परे काल की फांसी ॥

जंगम और सेबड़ा पिस गये, रावण कंसा।

कहें कबीर सुनो भाई साधो, बचे विवेकी संता ॥

विष्णु बने ठाकुर

धर्मदास ने पूछा

हे साहब यह जान्यो भेदा। अब आगे का करहु उछेदा ॥

कहा कि अब आगे का भेद समझाकर कहें।

साहिब ने कहा

पुनि माता कहि विष्णु दुलारा। मरदयो मान जेठनिजबारा ॥

अहो बिस्नु तुम लेहु असीसा। सब देवन में तुमही ईसा ॥

प्रथम पुत्र ब्रह्मा दुरि गयऊ। अकरम झूठ ताहि प्रिय भयऊ ॥

देवन श्रेष्ठ तुमहिं कहैं मानहिं। तुम्हरी पूजा सब कोइ ठानहिं ॥

माता ने विष्णु को आशीर्वाद दिया कि तुम सब देवताओं में श्रेष्ठ होंगे, क्योंकि बड़े पुत्र ब्रह्मा ने झूठ और कुकर्म जैसे पाप किये, इसलिए अब सब तुम्हारी ही पूजा करेंगे।

रूद्र पास गयी तब माता। तुम शिव कहो हृदय की बाता ॥

माँगहु जो तुम्हरे चित भावे। सो तोहि देऊँ मात फरमावे ॥

अद्या ने फिर शिवजी से पूछा कि तुम क्या चाहते हो, माँग लो।

जोरि पानि शिव कहबे लीन्हा। देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥

कबहुँ न बिनसे मेरी देही। हे माता माँगों बर ऐही ॥

हे जननी यह कीजै दाय। कबहु न बिनसै मेरी काया ॥

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विष्णु बने ठाकुर

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साहिब बन्दगी

शिवजी ने कहा-हे माता! मेरा शरीर कभी न मिटे।

कह अष्टंगी अस नहीं होई। दूसरा अमर भयो नहीं कोई॥

करहु योग तप पवन सनेहा। रहै चार युग तुम्हरी देहा॥

जौ लौं पृथ्वी अकाश सनेही। कबहुँ न विनशै तुम्हरी देही॥

आद्य शक्ति ने कहा-हे शिव! दूसरा अमर कोई नहीं हुआ, तुम पवन योग करो, जब तक पृथ्वी, आकाश, ब्रह्माण्ड रहेगा, तुम्हारा शरीर रहेगा।

ब्रह्मा मन में भयो उदासा। तब चलि गयो विष्णु के पास॥

जाय विष्णु सो विनती ठाना। तुम हो बंधु देव परधाना॥

तुम पर माता भई दयाला। शाप विवश हम भये बिहाला॥

निज करनी फल पाये हो भाई। किहि विधि दोष लगाऊँ माई॥

अब अस जतन करो हो भ्राता। चले परिवार वचन रहे माता॥

ब्रह्मा जी उदास होकर विष्णु के पास गये और विनती करते हुए कहा कि माता तुम पर दयाल हुई और शाप के कारण मेरा बुरा हाल हुआ, तुमने अपनी करनी का फल ही पाया है, इसलिए माता को भी दोष नहीं लगाया जा सकता है, पर अब कोई ऐसा यत्न करो कि माता की बात भी रह जाए और मेरा वंश भी चले।

कहे विष्णु छोड़ो मन भंगा। मैं करिहौं सेवकाई संग॥

तुम जेठे हम लहुरे भाई। चित संशय सब देहु बहाई॥

जो कोई होवे भक्त हमारा। सो सेवै तुम्हरो परिवारा॥

विष्णु ने कहा-हे ब्रह्मा! तुम बड़े भाई हो और मैं छोटा हूँ, मैं

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आपकी सेवा करूँगा, इसलिए दुखी मत होवो। जो भी हमारा भक्त होगा, वो जो-2 पुण्य आदि कर्म(यज्ञ, कीर्तन, दान आदि)करेगा, सो तुम्हारे परिवार के द्वारा ही। यानी ब्राह्मणों द्वारा ही सब लोग शुभ कर्म करवाते हैं।

ब्रह्मा भये आनंद, जबहि विष्णु अस भासेऊ ॥

मेटेउ चित कर द्वंद, सखा मोर सब सुखी भौ ॥

यह सुन ब्रह्मा बहुत प्रसन्न हुए, उनके चित्त का क्लेश समाप्त हुआ, क्योंकि वे जान गये कि अब मेरी संतान सुखी हो जायेगी, छल-कपट करके भी सुख से रहेगी।

चलो चलो सब कोउ कहै, मोहि अंदेशा और। साहिब से परिचय नहीं, जायेंगे किस ठौर॥

चौरासी लाख योनियाँ बनीं

चौरासी लाख योनियाँ बनीं

यह सब द्वंद बाद है गयऊ। तब पुनि जग की रचना भयऊ॥ चौरासी लख योनिन भाऊ। चार खानि चारहु निर्माऊ॥

जब यह झगड़ा समाप्त हो गया तो फिर जगत की रचना की गयी, चौरासी लाख योनियाँ और चार खानि बनाई गयीं।

प्रथम अंडज रच्यो जननी, चतुरमुख पिंडज कियो॥

विष्णु उष्मज रच्यो तबही, रुद्र अस्थावर लियो॥

लीन्ह रचि जेहि खानि चारो, जीव बंधन दीन्ह हो॥

माता ने अंडज खानि की उत्पत्ति की, ब्रह्मा ने पिंडज खानि की उत्पत्ति की, विष्णु ने उकमज खानि के जीवों को रचा और शिवजी ने अस्थावर जीवों की रचना की। इस तरह चार खानि की रचना करके जीवों को बाँध दिया।

नौ लख जल के जीव बखानी। चौदह लाख पक्षी परवानी॥

किरम कीट सत्ताइस लाख। तीस लाख पिंडज भाखा॥

चतुर लक्ष मानुष परमाना। मानुष देह परम पद जाना॥

और योनि परिचय नहीं पावे। कर्म बंध भव भटका खावे॥

नौ लाख जल के जीव(अस्थावर)हैं, 14 लाख अंडज हैं, 27 लाख उकमज खानि के जीव(कीट-पतंगे)हैं, 30 लाख पिंडज खानि हैं और चार लाख मानुष योनि हैं। इनमें मनुष्य ही परम पद(मोक्ष) की प्राप्ति कर सकते हैं, बाकी नहीं।

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चार खानि के तत्व भेद

चार खानि के तत्व भेद

धर्मदास ने पूछा

धर्मदास नायो पद शीशा। यह समुझाय कहो जगदीशा॥

सकल योनि जिव एक समाना। किमि कारण नहिं इक सम ज्ञाना॥

सो चरित्र मुहि कहौ बुझाई। जाते चित संशय मिट जाई॥

धर्मदास ने पूछा-हे सदगुरु! सभी योनियों में यदि एक ही जीव है तो क्या कारण है कि सबमें एक समान ज्ञान नहीं है?

साहिब ने कहा

चार खानि जिव एकै आहीं। तत्व वशेष अहैं सुन ताहीं॥

सो अब तुमसों कहो बखानी। तत्व एक अस्थावर जानी॥

ऊष्मज दौय तत्व परमाना। अंडज तीन तत्वगुणजाना॥

पिंडज चार तत्व गुण कहिये। पाँच तत्व मानुष तन लहिये॥

तासों होय ज्ञान अधिकारी। नर की देह भक्ति अनुसारी॥

साहिब ने कहा कि यद्यपि चारों खानि में एक ही जीव है, पर तत्वों के कारण सबमें कम-ज्यादा ज्ञान है, चेतना है। अस्थावर खानि के जीवों की रचना एक तत्व से हुई है, उकमज में दो तत्व हैं, अंडज में तीन तत्व हैं, पिंडज में चार तत्व हैं और मनुष्य में पाँचों तत्व हैं। इसी कारण मनुष्य में ज्ञान अधिक है, यह भक्ति-ध्यान के अनुकूल है।

धर्मदास ने पूछा

हे साहिब मुहि कहु समुझाई। कौन कौन तत्व इन सब पाई॥

अंडज अरु पिंडज के संग। ऊष्मज और अस्थावर अंगा॥

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साहिब बन्दगी

सो साहिब मोहि वरणि सुनाओ । करो दया जनि मोहि दुराओ ॥

धर्मदास ने कहा कि कौन-2 सी खानि में कौन-2 से तत्व हैं, कृपा करके मुझे समझाकर कहिए, छिपाइए मत।

साहिब ने कहा

खानि अंडज तीन तत्व हैं, अप वायु अरु तेज हो।

अचल खानि एक तत्वहि, तत्व जल का थेग हो ॥

साहिब ने कहा कि अंडज खानि में तीन तत्व हैं-पानी, हवा और अग्नि। दूसरी ओर अस्थार में एक ही तत्व है-जल।

ऊष्मज तत हैं दोय, वायु तेज सम जानिये।

पिंडज चारहिं सोय, पृथ्वी तेज अप वायु सम ॥

उकमज में दो तत्व हैं-वायु और अग्नि। पिंडज में चार तत्व हैं-पृथ्वी, अग्नि, जल और वायु।

पिंडज नर की देह सँवारा । तामें पाँच तत्व विस्तारा ॥

ताते ज्ञान होय अधिकाई । गहे नाम सत लोकहिं जाई ॥

पिंडज की मनुष्य खानि में पाँच तत्व हैं, इसलिए उसमें अधिक ज्ञान है और वो नाम के सहारे अमर लोक जा सकता है।

दुर्लभ मानुष जन्म है, मिले न बारम्बार। तरुवर ज्यों पत्ती झड़े बहुरि न लागे डार ॥

ज्ञान विभिन्नता का कारण

ज्ञान विभिन्नता का कारण

धर्मदास पूछते हैं

कहे धर्मदास सुन बंदीछोरा । इक संशय प्रभु मेटो मोरा ॥ सब नर नारि तत्व सम आहीं । इक सम ज्ञान सबन को नाहीं ॥ दया सील संतोस छमा गुन । कोई शून्य कोई होय संपुरन ॥ कोई मनुष्य होय अपराधी । कोई सीतल कोई काल उपाधी ॥ नाना गुन किहि कारण होई । साहिब बरन सुनाओ सोई ॥

धर्मदास ने पूछा-हे साहिब! सभी नर-नारियों में भी एक समान ज्ञान क्यों नहीं है, जबकि सबमें तत्वों की समानता है। कोई पापी है तो कोई पुण्यात्मा, कोई ज्ञान शून्य है तो कोई बहुत ज्ञानवान। विभिन्न गुणों वाले नर-नारी क्यों हैं!

साहिब कहते हैं

धर्मदास परखहुँ चित्त लायी । नर नारि गुन कहुँ समझायी ॥ चारि खानि जीव भरमाया । तब ले नर की देही पाया ॥ देह धरे छोड़े जस खाना । तैसे का कहुँ ज्ञान बखाना ॥

साहिब धर्मदास से कहते हैं कि चार खानि में भरमने के बाद जीव को मनुष्य तन मिलता है और जिस खानि की देह को छोड़कर वो मानव तन में आता है, उसी के अनुसार उसमें ज्ञान और गुणों का समावेश हो जाता है।

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विभिन्न योनियों से मानव तन में आए हुएओं की पहचान

विभिन्न योनियों से मानव तन में आए

हुओं की पहचान

प्रथम अंडज की कहीं मैं बानी। एकहि एक कहो बिलछानी ॥ आलस निद्रा ता कहँ होइ। काम क्रोध दरिद्री सोइ ॥ चोरी चुगली निंदा ठाने। ज्ञान ध्यान कछु मनहिं न आनै ॥ गुरु सतगुरु चीन्हें नहिं भाई। वेद शास्त्र सब देइ उठाई ॥ आपन नीच ऊँच मन होई। हम सम दूसर और ना कोई ॥ मैंले बस्तर नहीं नहाई। आँख कीच मुख लार बहाई ॥ पाँसा जुवा चित्त मन आने। गुरु चरनन निसि नहिं जाने ॥ कुबरा मूढ़ ताहि का होई। लम्बा होय पाव पुनि सोई ॥

साहिब कह रहे हैं कि जो अंडज खानि से मानव तन में आए हैं, उनकी पहचान बताता हूँ। उनमें निद्रा होती है, काम, क्रोध, से ग्रस्त होते हैं, दरिद्री होते हैं, चोरी, चुगली, परायी निंदा आदि ही उनका काम होता है, दूसरों के घर में आग लगाते हैं। सबसे बहस करते हैं, पर कुछ भी ज्ञान, ध्यान उनमें नहीं होता। गुरु-सतगुरु की पहचान उन्हें नहीं होती, वेद-शास्त्रों का कुछ पता नहीं होता, तुच्छ होते हुए भी खुद को बड़ा समझते हैं, मैंले कपड़े पहने रखते हैं, आँखों से कीच और मुँह से लार टपकती रहती है, जुए में मस्त रहते हैं, सिर उनका कुबड़ा और पाँव लम्बे होते हैं।

कहेँ कबीर सुनो धर्मदासा। ऊष्मज भेद कहैं परकासा ॥ जाइ शिकार जीव बहु मारे। बहुत आनंद होय तिमि वारे ॥ मार जीव जब घर कहँ आयी। बहु विधि रांध ताहि कहँ खाई ॥ निंदे शब्द और गुरु देवा। निंदे चौका नरियर भेवा ॥

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अनुरागसागर वाणी

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झूठे वचन सभा में कहई। टेढ़ी पाग छोर उरमई ॥ दया धरम मनहीं नहिं आवे। करें पुण्य तेहि हाँसी लावे ॥ भाला तिलक अरु चंदन करई। हाट बजार चिकन पट फिरई ॥ अन्तर पापी ऊपर दया। सो जिव यम के हाथ बिकाया ॥ लंब दाँत अरु वदन भयावन। पीरे नेत्र ऊँच अति पावन ॥

उकमज खानि से मानव तन में जो आए होते हैं, उन्हें शिकार खेलने में बड़ा आनन्द आता है। शिकार मारकर लाते हैं, और बड़े यत्न से पकाकर खाते हैं। गुरु और उनके नाम की निंदा करते हैं, झूठ बोलते हैं, टेढ़ी पगड़ी पहनते हैं, जिसका छोर लम्बा लटकता रहता है, उनके हृदय में दया-धर्म कुछ भी नहीं होता और दूसरों को पुण्य कर्म करते देख उनकी हँसी उड़ाते हैं। खुद माथे पर तिलक और चन्दन लगाकर बाजार में मटक-2 कर चलते हैं, उनके हृदय में कपट होता है, हृदय उनका कठोर होता है और ऊपर से कोमल बनते हैं, उनके दाँत लम्बे और शरीर डरावना होता है, उनकी आँखें आगे को उभरी होती हैं।

अचल खानि को कहौँ सँदेसा। देह धरे जस होवें भेसा ॥ छनिक बुद्धि होवे जिव कैरी। पलटत बुद्धि न लागे बेरी ॥ झंगा फेटा सिर पर पागी। राज द्वार सेवा भल लागी ॥ इत उत चितवत सैन जुमारहि। पर नारी कहँ सैन बुलावहि ॥ रस सों बात कहें मुख जानी। काम बान लागे उर आनी ॥ पर घर ताकहिं चोरों जायी। लाज सर्म उपजे नहिं भाई ॥ छन इक मन महँ बिसरे देवा। छन इक मन महँ कीजे सेवा ॥ छन इक ज्ञानी पोथी बाँचा। छन इक माहिं सबन घर नाचा ॥ छन इक मन में कीजे धर्मा। छन इक मन में करे अकर्मा ॥ भोजन करत माथ खजआई। बाँह जाँघ पुनि भींजत भाई ॥

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साहिब बन्दगी

भोजन करत सोय पुनि जाई । जो जगाय तिहि मारन धाई ॥ आँखें लाल होहिं पुनि जाकी । कहैं लग भेद कहौं मैं ताकी ॥

अस्थावर खानि से मनुष्य योनि में आने वालों की बुद्धि स्थिर नहीं होती, उनका निर्णय बदलता रहता है, सिर पर पगड़ी बाँधे रहते हैं, सरकारी नौकरी करते हैं, दूसरे की स्त्री की तरफ नज़र रखते हैं, इशारे से बुलाते हैं, कामुक बातें करते हैं और चोरों की तरह दूसरों के घर में घुसते हैं, यदि पकड़ लिए जाते हैं तो भी कोई शर्म नहीं होती, हँसते रहते हैं, एक क्षण में तो अपने ईष्ट को भूल जाते हैं और दूसरे ही क्षण उनकी सेवा करने लग जाते हैं, एक क्षण में तो पोथियाँ पढ़ने लगते हैं और दूसरे ही क्षण सबके घर में मौका मिलने पर नाचने लग जाते हैं, एक पल में तो शूरवीर हो जाते हैं और दूसरे ही पल कायर हो जाते हैं, एक पल तो अच्छे हो कर्म करने लगते हैं और दूसरे ही पल कुकर्मों में लग जाते हैं। भोजन करते हुए अपना माथा खुजलाते हैं, बाँह और जाँघ मलते हैं, भोजन के बाद सो जाते हैं और यदि कोई जगाए तो उसे मारने दौड़ते हैं, उनकी आँखें लाल होती हैं, उनका भेद कहाँ तक कहा जाए!

पिंडज खानिक लच्छ सुनाऊँ । गुन औगुन का भेद बताऊँ ॥ बैरागी उनमुनि मति धारी । करे धर्म पुनि वेद विचारी ॥ तीरथ औ पुनि योग समाधि । गुरु के चरण चित्त भल बाँधी ॥ वेद पुराण कथे बहु ज्ञाना । सभा बैठि बातें भल ठाना ॥ राज भोग कामिनि सुख माने । मन शंका कबहुँ नहिं आने ॥ उत्तम भोजन बहुत सुहाई । लौंग सुपारी बीरा खाई ॥ चच्छु तेज जाकर पुनि जानी । पराक्रम देही बल ठानी ॥ देखो स्वर्ग सदा तेहि हाथा । देखे प्रतिमा नावे माथा ॥

पिंडज खानि से मानव तन में आने वालों में वैराग्य होता है, वे वेद के अनुसार धर्म कार्य करते हैं, तीर्थ, योग आदि करते हैं और गुरु से प्रेम