अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अठारहवाँ प्रकरण । २७५
उत्तर—अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! धनी लोग स्त्री-पुत्र धनादिक अर्थों को संग्रह करके उनको भोगते हैं, और उनके नाश होने पर अत्यन्त दुःखी होते हैं। देखो—
पृथिवीं धनपूर्णां चेदिमां सागरमेखलाम् । प्राप्नोति पुनरप्येष स्वर्गमिच्छति नित्यशः ॥ १ ॥
यदि समुद्र पर्यंत धन करके पूर्ण यह पृथिवी पुरुष को मिल भी जावे, तो भी वह स्वर्ग की नित्य ही इच्छा करता है ॥ १ ॥
संसार में धनवान् ही प्रायः करके रोगी दीखते हैं। किसी धनी को क्षुधा का, किसी को प्रमेह आदि का रोग बना ही रहता है। धनियों की परस्पर स्पर्धा बहुत रहती है। उनको राजा और चोरों से भय नित्य ही बना रहता है। चोरों के भय से रात्रि को नींद नहीं आती है। धन के संग्रह करने में और धन की रक्षा करने में उनको बड़ा क्लेश होता है। संसार में जितना दुःख धनियों को है, उतना दुःख गरीबों को नहीं है। धन करके जो विषय-भोगादिकों से सुख है, वह सुख नाशी है, तुच्छ है, इस वास्ते संपूर्ण धनादिक विषय-भोगों के त्यागे विना सुख-रूपी आत्मा की प्राप्ति कदापि नहीं होती है। जैसे वंध्या के पुत्र को असत् जान लेना ही उसका त्याग है। विना असत् जानने के उसका त्याग बनता नहीं है। क्योंकि जो वस्तु तीनों कालों में है ही नहीं, उसका त्याग कैसे किया जावे, इसलिये उसका मिथ्या जानना ही त्याग है। इसी तरह संकल्प-विकल्प-रूपी जितना जगत् है, उसको असत् जान लेना ही उसका त्याग है, इसी वार्ता को अब दिखलाते हैं ॥ २ ॥
२७६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
कर्तव्यदुःखमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मनः ।
कुतः प्रशमपीयूषधारासारमृते सुखम् ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
कर्तव्यदुःखमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मनः, कुतः, प्रशम-पीयूषधारासारम्, ऋते, सुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| कर्तव्यदुःख-मार्तण्डज्वाला-दग्धान्तरात्मनः = | कर्म-जन्य दुःख-रूपीसूर्य के ज्वाला से भस्म हुआ है मन जिसका, ऐसे पुरुष को | प्रशमपीयूष-धारासारम् = | शान्ति-रूपी अमृत की धारा की वृष्टि |
| ऋते = | बिना | ||
| सुखम् = | सुख | ||
| कुतः = | कहाँ |
भावार्थ ।
कर्तव्य-रूपी जितने कर्म हैं, उनसे जन्य जो दुःख हैं, वही एक सूर्य की तप्तरूपा अग्नि है । उस अग्नि करके जिसका मन दग्ध हो रहा है, उसको शान्ति-रूपी अमृत-जल के बिना कदापि सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
भवोऽयं भावनामात्रो न किञ्चित्परमार्थतः ।
नास्त्यभावः स्वभावानां भावाभावविभाविनाम् ॥ ४ ॥
अठारहवाँ प्रकरण । २७७
पदच्छेदः ।
भवः, अयम्, भावनामात्रः, न, किञ्चित्, परमार्थतः, न, अस्ति, अभावः, स्वभावानाम्, भावाभावविभाविनाम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अयम् = | यह | हि = | क्योंकि |
| भवः = | संसार | भावाभावविभाविनाम् = | $\left{\begin{matrix} भाव-रूप और \ अभाव-रूप पदार्थों \ में स्थित हुए \end{matrix}\right.$ |
| भावनामात्रः = | $\left{\begin{matrix} भावना-मात्र है \ अर्थात् संकल्प- \ मात्र है । \end{matrix}\right.$ | स्वभावानाम् = | स्वभावों का |
| परमार्थतः = | परमार्थ से | अभावः = | अभाव |
| किञ्चित् = | कुछ | न अस्ति = | नहीं होता है ॥ |
| न = | नहीं है |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! यह जगत् संकल्प-मात्र है । परमार्थ-दृष्टि से तो आत्मा से अतिरिक्त कोई भी वस्तु भाव-रूप अर्थात् सत्य-रूप नहीं है, आत्मा ही सत्य-रूप है, और संपूर्ण प्रपंच अभाव-रूप है अर्थात् असत्य-रूप है ।
प्रश्न—अभाव-रूप प्रपंच भी कालादिकों के वश से भाव स्वभाववाला हो जावेगा ?
उत्तर—भाव-रूप और अभाव-रूप में स्थित स्वभावों का अभाव-रूप कदापि नहीं हो सकता है अर्थात् भाव पदार्थ का अभाव कदापि नहीं होता है और अभाव पदार्थ का भाव कदापि नहीं होता है। जैसे मनोराज के और स्वप्न के पदार्थों का कदापि भाव नहीं होता है, वैसे प्रपंच के पदार्थों का कदापि
२७८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भाव नहीं होता है। जैसे मनोराज स्वप्न के पदार्थ सब संकल्प मात्र हैं, वैसे जाग्रत् के पदार्थ भी सब संकल्प-मात्र हैं। संकल्प के दूर होने से संसार-रूपी ताप भी दूर हो जाता है। संकल्पों का नाश ही मोक्ष का हेतु है ॥ ४ ॥
मूलम् ।
न दूरं न च संकोचाल्लब्धमेवात्मनः पदम् । निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम् ॥ ५ ॥
पदच्छेदः ।
न, दूरम्, न, च, संकोचात्, लब्धम्, एव, आत्मनः, पदम्, निर्विकल्पम्, निरायासम्, निर्विकारम्, निरञ्जनम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| आत्मनः = | आत्मा का | संकोचात् लब्धम् न=$ | संकोच से प्राप्त नहीं है अर्थात् परिच्छिन्न नहीं है |
| पदम् = | स्वरूप | निर्विकल्पम् = | संकल्प-रहित है |
| दूरम् = | दूर | निरायासम् = | प्रयत्न-रहित है |
| न = | नहीं है | निर्विकारम् = | विकार-रहित है |
| च = | और | निरञ्जनम् = | दुःख रहित है ॥ |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**संकल्प के दूर करने-मात्र से कैसे आत्मा-रूपी अमृत की प्राप्ति होती है ?
**उत्तर—**आत्मा किसी की दूर नहीं है और आत्मा परिच्छिन्न भी नहीं है, क्योंकि सर्वत्र व्यापक है, इसी वास्ते आत्मा नित्य ही प्राप्त है । मन के संकल्प के वश से अज्ञानी पुरुष आत्मा को अप्राप्त की नाईं मानते हैं ।
अठारहवाँ प्रकरण । २७९
जैसे किसी पुरुष के कंठ में स्वर्ण का भूषण पड़ा है, तथापि उसके भ्रम के वश से ऐसा ज्ञान होता है कि मेरा भूषण कहीं खो गया है । यद्यपि वह भूषण उसको प्राप्त भी है, परन्तु भ्रम करके अप्राप्त की तरह प्रतीत होता है । वैसे ही यह आत्मा सर्व पुरुषों को नित्य प्राप्त भी है, पर अपने स्वरूप के अज्ञान होने से संकल्पों के वश से अप्राप्त की तरह हो रहा है । आत्मा विकल्पों से अतीत है अर्थात् मन के विकल्पों के अभाव हो जाने से जाना जाता है । एवं वह विकारों से भी रहित है, और उपाधियों से शून्य है और सदैव एकरस है ॥ ५ ॥
मूलम् । व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रतः वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः ॥ ६ ॥
पदच्छेदः । व्यामोहमात्रविरतौ, स्वरूपादानमात्रतः, वीतशोकाः, विराजन्ते, निरावरणदृष्टयः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| व्यामोहमात्र-विरतौ = | विशेष मोह के निवृत्त होने पर | वीतशोकाः = | शोक से रहित |
| निरा-<br>वरण=<br>दृष्टयः | आवरण रहित दृष्टिवाले अर्थात् ज्ञानी पुरुष | ||
| स्वरूपादान-मात्रतः = | अपने स्वरूप के ग्रहणमात्र से ही | विराजन्ते = | शोभायमान होते हैं ॥ |
भावार्थ । **प्रश्न—**जब आत्मा नित्य ही प्राप्त है, तब फिर शास्त्र के
२८० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
विचार की और आचार्य के उपदेश की क्या आवश्यकता है ? उत्तर—अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! अज्ञान- रूपी मोह का आवरण सबके अन्तःकरण में हो रहा है । उस आवरण करके आत्मा का साक्षात्कार किसी को नहीं होता है । उस आवरण के दूर करने के लिये गुरु और शास्त्र की आवश्यकता है । जैसे दश पुरुषों ने एक नदी के पार उतर करके कहा कि सबको गिनती कर लो, कोई नदी में बह तो नहीं गया है । उनमें से एक पुरुष जब गिनती करने लगा, तब उसने अपने को छोड़कर औरों को गिना, तब नव आदमी गिनती में आए । उसने कहा, दशवाँ पुरुष नदी में बह गया है । फिर दूसरे ने गिना, तब उसने भी अपने को छोड़ करके ही गिना, तब भी नव ही पुरुष पाए गए । इसी तरह हरएक ने अपने को छोड़ करके गिना और एक कम पाया । तब उन सबको निश्चय होगया कि दशवाँ पुरुष नदी में बह गया, तां फिर वे सब मिलकर रोने लगे । उधर से एक बुद्धिमान् पुरुष आया, जसने उनको रोते देखकर पूछा, तुम क्यों रोते हो ? उन्होंने कहा, हम दश आदमी नदी से पार उतरे, उनमें से एक आदमी नदी में बह गया है । उनकी वार्ता को सुनकर उस आदमी ने जब उनको गिना, तब वे दश पूरे थे । उसने जाना ये सब मूर्ख हैं । तब उनसे कहा, हमारे सामने तुम फिर गिनो । उसके सामने जब एक उनमें से गिनने लगा, तब उसने अपने को न गिना, और कहा केवल नव हैं । तब उसने कहा, दशवाँ तू है । तब उसको ज्ञान हुआ कि हम सब पूरे हैं, कोई भी बहा नहीं ।
अठारहवाँ प्रकरण । २८१
दाष्ट्रान्त ।
अज्ञान के वश होकर जो अपने आत्मा को तीर्थों में और पर्वतों में खोजता फिरता है, वह दशवें पुरुष की तरह अपने को नहीं जानता है । जब गुरु उसको उपदेश करता है, तब वह जानता है कि सुख-रूप आत्मा मैं हूँ । इसलिये गुरु और शास्त्र की भी आवश्यकता है ।
तात्पर्य यह है कि जिसने गुरु और शास्त्र के उपदेश को श्रवण करके अपने स्वरूप का निश्चय कर लिया है, उसके अन्तःकरण में फिर मोह-रूपी आवरण कदापि नहीं रहता है, किन्तु वह संसार में शोभा को प्राप्त होता है ।। ६ ।।
मूलम् ।
समस्तं कल्पनामात्रमात्मा मुक्तः सनातनः । इति विज्ञाय धीरोहि किमभ्यस्यति बालवत् ॥७॥
पदच्छेदः ।
समस्तम्, कल्पनामात्रम्, आत्मा, मुक्तः, सनातनः, इति, विज्ञाय, धीरः, हि, किम्, अभ्यस्यति, बालवत् ।।
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| समस्तम् = सब जगत् | इति = ऐसा |
| कल्पनामात्रम् = कल्पना-मात्र है | विज्ञाय = ज्ञान करके |
| आत्मा = आत्मा | धीरः = पंडित |
| मुक्तः = मुक्त है | बालवत् = बालकों की नाई |
| च = और | किम् = क्या |
| सनातनः = सनातन है | अभ्यस्यति = अभ्यास करता है ॥ |
२८२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
संपूर्ण जगत् मन की कल्पना-मात्र है ।
शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा न वै बध्येत कर्हिचित् ।
बन्धमोक्षौ मनःसंस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ १ ॥
आत्मा शुद्ध है, नित्यमुक्त है, कदापि वह बंधायमान नहीं है, बंध और मोक्ष मन में स्थित है, उस मन के शान्त होने से बंध और मोक्ष भी शान्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
आत्मा नित्यमुक्त है, सनातन है, ऐसा निश्चय करके विद्वान् ज्ञानी बालक की नाईं चेष्टा करता है ॥ ७ ॥
मूलम् ।
आत्मा ब्रह्मेति निश्चित्य भावाभावौ च कल्पितौ ।
निष्कामः किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम् ॥८॥
पदच्छेदः ।
आत्मा, ब्रह्म, इति, निश्चित्य, भावाभावौ, च, कल्पितौ, निष्कामः, किम्, विजानाति, किम्, ब्रूते, च, करोति, किम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| आत्मा = | जीवात्मा | इति = | ऐसा |
| ब्रह्म = | ब्रह्म है | निश्चित्य = | निश्चय करके |
| च = | और | निष्कामः = | कामना-रहित पुरुष |
| भावाभावौ = | भाव और अभाव | किम् = | क्या |
| कल्पितौ = | कल्पित है | विजानाति = | जानता है |
अठारहवां प्रकरण । २८३
| च=और | |
| किम्=क्या | किम्=क्या |
| ब्रूते=कहता है | करोति=करता है |
भावार्थ । त्वं पद का अर्थ जो जीवात्मा है, और तत्पद का अर्थ जो ब्रह्म है, दोनों के अभेद को निश्चय करके भाव और अभाव अर्थात् भाव जो घटादि पदार्थ हैं, और उनका जो अभाव है, ये दोनों अधिष्ठानचेतन में कल्पित हैं । इस प्रकार समस्त जगत् को तुच्छ जानकर जिस विद्वान् की अविद्या नष्ट हो गई है, वह जिसके जानने की और कथन करने की इच्छा करता है, किंतु किसी की भी नहीं करता है, वह न किसी कार्य को करता है । क्योंकि अब उसमें कर्तृत्वाभिमान नहीं है ।। ८ ।।
मूलम् । अयं सोऽहमयं नाहमिति क्षीणा विकल्पनाः । सर्वमात्मेति निश्चित्य तूष्णींभूतस्य योगिनः ॥ ९ ॥
पदच्छेदः । अयम्, सः, अहम्, अयम्, न, अहम्, इति, क्षीणाः, विकल्पनाः, सर्वम्, आत्मा, इति, निश्चित्य, तूष्णींभतस्य, योगिनः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वम्=सब | निश्चित्य=निश्चय करके | ||
| आत्मा=आत्मा है | तूष्णींभतस्य=चुपचाप हुए | ||
| इति=ऐसा | यागिनः=योगी की |
२८४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| इति=ऐसी | अयम्=यह |
| विकल्पना=कल्पनाएँ कि | अहम्=मैं |
| अयम्=यह | न=नहीं हूँ |
| स=वह | क्षीणाः=क्षीण हो जाती है |
| अहम्=मैं हूँ |
भावार्थ ।
जिस विद्वान् ने ऐसा निश्चय किया है कि सर्वरूप आत्मा ही है । वह बाह्य शरीरादिकों के व्यापार से रहित हो जाता है, और वही जीवन्मुक्त भी कहा जाता है । कहा भी है—
वृत्तिहीनं मनः कृत्वा क्षेत्रज्ञं परमात्मनि ।
एकीकृत्य विमुच्येत योगोऽयं मुख्य उच्यते ॥ १ ॥
क्षेत्रज्ञ अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा में जो ध्येयाकारवृत्ति हुई थी, उस वृत्ति के नष्ट होने पर दानों की एकता को निश्चय करके ही पुरुष मुक्त हो जाता है, अर्थात् जिस काल में मन नाना प्रकार की कल्पना से रहित हो जाता है, उसी काल में वह मुक्त कहा जाता है ॥ ९ ॥
मूलम् ।
न विक्षेपो न चैकाग्र्यं नातिबोधो न मूढ़तः ।
न सुखं न चवा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः ॥ १० ॥
पदच्छेदः ।
न, विक्षेपः, न च, एकाग्रचम्, न, अतिबोधः, न मूढ़तः, न, सुखम्, न, च, वा, दुःखम्, उपशान्तस्य, योगिनः ॥
अठारहवाँ प्रकरण । २८५
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| उपशान्तस्य=शान्त हुए | न अतिबोधः=न बोध है |
| योगिनः=योगी को | न मूढ़ता=न मूर्खता है |
| न विक्षेपः=न विक्षेप है | न सुखम्=न सुख है |
| च=और | वा=और |
| न एकाग्रत्वम्=न एकाग्र- ता है | न दुःखम्=न दुःख है ॥ |
भावार्थ ।
अब संकल्प से रहित मन के स्वरूप को दिखाते हैं । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जिसका मन संकल्प-विकल्प से रहित हो गया है, उसको न विक्षेप होता है, और न वह एकाग्रता के लिये उद्यम करता है । क्योंकि जिसको विक्षेप होता है, वही निरोध के लिये यत्न करता है । उसको पदार्थों का अत्यन्त ज्ञान या मूढ़ता नहीं होती है, और न उसको विषयजन्य सुख या दुःख होता है । क्योंकि वह केवल आत्मानन्द में मग्न है ॥ १० ॥
मूलम् ।
स्वराज्ये भैक्ष्यवृत्तौ च लाभालाभे जने वने ।
निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः ॥११॥
पदच्छेदः ।
स्वराज्ये, भैक्ष्यवृत्तौ, च, लाभालाभे, जने, वने, निर्वि- कल्पस्वभावस्य, न, विशेषः, अस्ति, योगिनः ॥
२८६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वराज्ये = | राज्य में | वने = | वन में |
| भैक्ष्यवृत्तौ = | भिक्षा-वृत्ति में | निर्विकल्प-स्वभावस्य = | विकल्प-रहित स्वभाववाले |
| लाभालाभे = | लाभ और अ- लाभ में | योगिनः = | योगी को |
| जने = | मनुष्यों के समूह में | विशेषः = | कोई विशेषता |
| वा = | या | न अस्ति = | नहीं है ॥ |
भावार्थ ।
जीवन्मुक्त को स्वर्ग के राज्य मिलने पर भी न उसको हर्ष होता है, और भिक्षा-वृत्ति में न उसको विक्षेप होता है, और पदार्थ का लाभ और अलाभ दोनों उसको बराबर हैं, वन में रहे व घर में रहे, वह एकरस रहता है ॥ ११ ॥
मूलम् ।
क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकत्ता ।
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः ॥ १२ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, धर्मः, क्व, च, वा, कामः, क्व, च, अर्थः, क्व, विवेकत्ता, इदम्, कृतम्, न, इति, द्वन्द्वैः, मुक्तस्य, योगिनः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| इदम् = | यह | इति = | इस प्रकार |
| कृतम् = | किया गया है | द्वन्द्वैः = | द्वन्द्व से |
| इदम् = | यह | मुक्तस्य = | छूटे हुए |
| न कृतम् = | नहीं किया गया है | योगिनः = | योगी को |
अठारहवाँ प्रकरण । २८७
धर्मः=धर्म | अर्थः=अर्थ क्व=कहाँ है | क्व=कहाँ है वा=और | च=और कामः=काम | विवेकता=विचार क्व=कहाँ है | क्व=कहाँ है ।। च=और |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि स्थिर चित्तवाले योगी को धर्म, काम और अर्थ के साथ कुछ प्रयोजन नहीं रहता है, और इस काम को मैंने कर लिया है, या इसको मैं करूँगा, इस प्रकार के द्वन्द्वों से जो रहित है, वही जीवन्मुक्त योगी है ॥ १२ ॥
मूलम् ।
कृत्यं किमपि न एव न कापि हृदि रञ्जना । यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः ॥ १३ ॥
पदच्छेदः ।
कृत्यम्, किम्, अपि, न, एव, न, का, अपि, हृदि, रञ्जना, यथा, जीवनम्, एव, इह, जीवन्मुक्तस्य, योगिनः ॥
अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । जीवन्मुक्तस्य=जीवन्मुक्त | च=और योगिनः=योगी को | न=न कृत्यम्=कर्तव्य कर्म | हृदि=मन में किम् अपि न एव=कुछ भी नहीं है | का अपि=कोई भी
२८८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| रञ्जना अपि = अनुराग ही है<br>इह = इस संसार में<br>यथा = जैसे<br>जीवनम् = जीवन है | एव = वैसा ही है अर्थात् उसका भोगकर्मानु- सार है ॥ |
भावार्थ ।
प्रश्न—जब जीवन्मुक्त कोई क्रिया नहीं करेगा, तब उसके शरीर का निर्वाह कैसे होगा ?
उत्तर—जीवन्मुक्त पुरुष की कोई क्रिया अपने संकल्प से नहीं होती है, और न कुछ उसको करने-योग्य कर्म बाकी रहा है । क्योंकि उसको किसी पदार्थ में राग नहीं है, और राग के बिना कोई कृत्य कर्म है नहीं, और राग-द्वेष का हेतु जो अविद्या है, वह उसकी नष्ट हो गई है । उसके शरीर की यात्रा प्रारब्धवश से होती है ॥ १३ ॥
मूलम् ।
क्व मोहः क्व च वा विश्वं क्व तद्ध्यानं क्व मुक्तता ।
सर्वसंकल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः ॥ १४ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, मोहः, क्व, च, वा, विश्वम्, क्व, तत्, ध्यानम्, क्व, मुक्तता, सर्वसंकल्पसीमायाम्, विश्रान्तस्य, महात्मनः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वसंकल्प-सीमायाम् = | संपूर्ण संकल्पों की सीमा में अर्थात् आत्मज्ञान में | क्व = | कहाँ |
| मोह = | मोह है | ||
| च = | और | ||
| विश्रान्तस्य = | विश्रान्त हुए | क्व = | कहाँ |
| योगिनः = | योगी को | विश्वम् = | संसार है |
अठारहवाँ प्रकरण । २८९
| अन्वयः = शब्दार्थः | अन्वयः = शब्दार्थः |
|---|---|
| क्व=कहाँ | वा=और |
| तत्=वह | क्व=कहाँ |
| ध्यानम्=ध्यान है | मुक्ता=मुक्ति है ॥ |
भावार्थ । जीवन्मुक्त के सब संकल्प नष्ट हो जाते हैं, इसी से उसको मोह भी किसी पदार्थ में नहीं रहता है, इसी से उसकी दृष्टि में जगत् भी नहीं प्रतीत होता है, और न वह ध्यान की तथा मुक्ति की इच्छा करता है । क्योंकि उसके मन की फुरना कोई भी बाकी नहीं रहती है ॥ १४ ॥
मूलम् । येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै । निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति ॥ १५ ॥
पदच्छेदः । येन, विश्वम्, इदम्, दृष्टम्, सः, न, अस्ति, इति, करोतु, वै, निर्वासनः, किम्, कुरुते, पश्यन्, अपि, न, पश्यति ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| येन=जिस पुरुष करके | अस्ति=है |
| इदम्=यह | वै=निश्चय करके |
| विश्वम्=विश्व घट, पट आदि | निर्वासनः=वासना-रहित पुरुष |
| दृष्टम्=देखा गया है | किं कुरुते=क्या करता है अर्थात् कुछ भी नहीं करता है |
| सः=वह | सः=वह |
| इति=ऐसा | पश्यन्=देखता हुआ |
| करोतु=जाने कि | अपि=भी |
| तत्=वह अर्थात् विश्व | न पश्यति=नहीं देखता है ॥ |
| न=नहीं |
२९० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ । जिसने इस विश्व को अर्थात् जगत् को देखा है, वह यह नहीं कह सकता है कि जगत् है नहीं क्योंकि उसको जगत् होने और न होने की वासनाएँ बनी हैं, और जो निर्वासनिक पुरुष है, वह जगत् को देखता हुआ भी नहीं देखता है । क्योंकि वह सुसुप्ति-युक्त पुरुष की तरह मन के संकल्प और विकल्प से रहित है ।। १५ ।।
मूलम् । येन दृष्टं परं ब्रह्म सोऽहं ब्रह्मेति चिन्तयेत् । किं चिन्तयति निश्चिन्तो द्वितीयं यो न पश्यति ।।१६।।
पदच्छेदः । येन, दृष्टम्, परम्, ब्रह्म, सः, अहम्, ब्रह्म, इति, चिन्त- येत्, किम्, चिन्तयति, निश्चन्तः, द्वितीयम्, यः, न, पश्यति ।।
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| येन=जिस पुरुष द्वारा | यः=जो पुरुष |
| परम्=श्रेष्ठ | निश्चन्तः=निश्चिन्त हुआ |
| ब्रह्म=ब्रह्म | द्वितीयम्=दूसरे को |
| दृष्टम्=देखा गया है | न पश्यति=नहीं देखता है |
| सःअहम्=सो मैं ब्रह्म हूँ | सः=वह |
| इति=ऐसा | किं चिन्तयति=क्या चिन्ता करेगा ।। |
| चिन्तयेत्=विचार करे |
भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि जिस पुरुष ने सबसे अलग ब्रह्म को
अठारहवाँ प्रकरण । २९१
देखा है, उसी को ऐसा अनुभव है "अहं ब्रह्म" मैं ब्रह्म हूँ । को सारा जगत् ब्रह्म-रूप दिखाई देता है, और वह सर्व चिंता से रहित होकर कुछ भी चिन्तन नहीं करता है। और जो ब्रह्म का चिंतन है कि मैं ब्रह्म हूँ, उसको भी वह अभ्यास नहीं करता है ॥ १६ ॥
मूलम् । दृष्टो येनात्मविक्षेपो निरोधं कुरुते त्वसौ । उदारस्तु न विक्षिप्तःसाध्याभावात्करोति किम् ॥१७॥
पदच्छेदः । दृष्टः, येन, आत्मविक्षेपः, निरोधम्, कुरुते, तु, असौ, उदारः, तु, न, विक्षिप्तः, साध्याभावात्, करोति, किम् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| येन=जिस पुरुष द्वारा<br>आत्मविक्षेपः=आत्मा में विक्षेप<br>दृष्टः=देखा गया है<br>असौ=वह पुरुष<br>निरोधम्=चित्त के निरोध को<br>करोति=करता है<br>तु=परन्तु<br>उदारः=ज्ञानी पुरुष | तु=तो<br>न विक्षिप्तः=विक्षेप रहित है<br>+ अतः एव=इसलिये<br>साध्याभावात् = साध्य के अभाव होने के कारण<br>सः=वह<br>किम्=क्या<br>करोति=करेगा अर्थात् कुछ भी न करेगा ॥ |
भावार्थ । जिस पुरुष ने अपने में विक्षेपों को देखा है, वही विक्षेपों के दूर करने के लिये चित्त के निरोध की चिंता
२९२ अष्टावक्र गीता भा० टी० स०
को करता है। जिसको कोई विक्षेप नहीं रहा है, वह विक्षेप के दूर करने के लिये चित्त का निरोध भी नहीं करता है ॥ १७ ॥
मूलम् । धीरो लोकविपर्यस्तो वर्त्तमानोऽपि लोकवत् । न समाधिं न विक्षेपं न लेपं स्वस्य पश्यति ॥ १८ ॥
पदच्छेदः । धीरः, लाकविपर्यस्तः, वर्तमानः, अति, लोकवत्, न, समाधिम्, न, विक्षेपम्, न, लेपम्, स्वस्य, पश्यति ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| धीरः = ज्ञानी पुरुष | समाधिम् = समाधि को |
| लोकविपर्यस्तः = { लोक में विक्षेप- / रहित हुआ | न = न |
| च = और | विक्षेपम् = विक्षेप को |
| लोकवत् = लोक की तरह | च = और |
| वर्त्तमानः अपि = वर्त्तता हुआ भी | न = न |
| न = न | लेपम् = न बंधन को |
| स्वस्य = अपने | पश्यति = देखता है ॥ |
भावार्थ । जो विद्वान् है, वह लोकों में विक्षेप से रहित होकर प्रारब्धवशात् लोकों में रह करके बाधिता अनुवृत्ति करके व्यवहार को करता भी अपने आत्मा में निर्लेप स्थित है। क्योंकि न वह समाधि करता है, और न विक्षेप को प्राप्त होता है ॥ १८ ॥
अठारहवाँ प्रकरण । २९३
मूलम् ।
भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः ।
नैव किञ्चित् कृतं तेन लोकदृष्टचा विकुर्वता ॥१९॥
पदच्छेदः ।
भावाभावविहीनः, यः, तृप्तः, निर्वासनः, बुधः, न, एव, किञ्चित्, कृतम्, तेन, लोकदृष्टचाः, विकुर्वता ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यः = | जो | निर्वासनः = | वासना-रहित है |
| तृप्तः = | तृप्त हुआ | लोकदृष्टचा = | लोक दृष्टि में |
| बुधः = | ज्ञानी | तेन = | उस |
| भावाभाव-विहीनः = | भाव और अभाव से रहित है | कुर्वता = | किये हुए करके |
| च = | और | किञ्चित् एव = | कुछ भी |
| न कृतम् = | नहीं किया गया है ॥ |
भावार्थ ।
जो विद्वान् अपने आत्मानन्द करके ही तृप्त है, वह स्तुति और निन्दा आदिकों से रहित है, क्योंकि वह लोक दृष्टि से कर्त्ता हुआ भी अकर्त्ता है। आत्मज्ञान करके उसके कर्त्तृत्वादि अध्यास सब नष्ट हो गए हैं।
मूलम् ।
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः ।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठतः सुखम् ॥२०॥
२९४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः । प्रवृत्तौ, वा, निवृत्तौ, वा, न, एव, धीरस्य, दुग्रहः, यदा, यत्, कर्त्तुम्, आयाति, तत्, तिष्ठतः, सुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदा = | जब कभी | तिष्ठतः = | समाधिस्थ |
| यत् = | जो कुछ कर्म | धीरस्य = | ज्ञानी पुरुष को |
| कर्त्तुम् = | करने को | प्रवृत्तौ = | प्रवृत्ति में |
| आयाति = | आ पड़ता है | वा = | अथवा |
| तत् = | उसको | निवृत्तौ = | निवृत्ति में |
| सुखम् = | सुख पूर्वक | दुग्रहः = | दुराग्रह |
| कृत्वा = | करके | न एव = | कभी नहीं है ॥ |
भावार्थ । विद्वान् को प्रवृत्ति में और निवृत्ति में कोई आग्रह अर्थात् हठ नहीं है । क्योंकि वह कर्त्तृत्वादि अभिमान से रहित है । यदि प्रारब्ध के वश से विद्वान् को प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति करने को पड़ जावे, तब वह सुखपूर्वक उनको करता है, और असंग भी बना रहता है । क्योंकि उसको कर्त्तृत्वादिकों का अभिमान नहीं है ॥ २० ॥
मूलम् ।
निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः ।
क्षिप्तः संसारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ॥ २१ ॥
पदच्छेदः । निर्वासनः, निरालम्बः, स्वच्छन्दः, मुक्तबन्धनः, क्षिप्तः, संसारवातेन, चेष्टते, शुष्कपर्णवत् ॥