अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-३० देवता—दर्भमणि
सूक्त-३० देवता—दर्भमणि
यत् ते दर्भ जरामृत्युः शतं वर्मसु वर्म ते.
तेनेमं वर्मिणं कृत्वा सपत्नाञ्जहि वीर्यैः.. (१)
हे दर्भ! तेरी गांठों में सैकड़ों वृद्धावस्थाएं और मृत्यु व्याप्त हैं. तेरे पास वृद्धावस्था और
मृत्यु से बचाने वाला कवच है. उस कवच से रक्षा, जय आदि की कामना करने वाले पुरुष को
सुरक्षित कर के अपनी शक्तियों से इस राजा के शत्रुओं को मारो. (१)
शतं ते दर्भ वर्मणि सहस्रं वीर्याणि ते.
तमस्मै विश्वे त्वां देवा जरसे भर्त्वा अदुः.. (२)
हे दर्भमणि! तुम्हारी गांठों में सैकड़ों सुरक्षा कवच और शक्तियां विद्यमान हैं. सभी देवों
से रक्षा की कामना करने वाले इस राजा को वृद्धावस्था दूर करने के लिए तुम्हें दिया है. (२)
त्वामाहुर्देववर्म त्वां दर्भ ब्रह्मणस्पतिम्.
त्वामिन्द्रस्याहुर्वर्म त्वं राष्ट्राणि रक्षसि.. (३)
हे दर्भमणि! तुम्हें देवों का कवच और वेदों का रक्षक कहा गया है. तुम्हें इंद्रक कवच
बताया गया है. तुम राष्ट्रों की रक्षा करते हो. (३)
सपत्नाक्षयणं दर्भ द्विषतस्तपनं हृदः.
मणिं क्षत्रस्य वर्धनं तनूपानं कृणोमि ते.. (४)
हे दर्भमणि! तुम शत्रुओं का विनाश करने वाले तथा द्वेष करने वालों के हृदय को
संतप्त करने वाले हो. हे राजन्! मैं दर्भमणि को तुम्हारा रक्षक एवं शक्ति बढ़ाने वाला बनाता
हूं. (४)
यत् समुद्रो अभ्यक्रन्दत् पर्जन्यो विद्युता सह.
ततो हिरण्ययो बिन्दुस्ततो दर्भो अजायत.. (५)
जिस मेघ से जल बरसता है, उस से बिजली की गड़गड़ाहट के साथ हिरण्यमय बूंद
प्रकट हुई, उन्हीं से दर्भ उत्पन्न हुआ है. (५)
सूक्त-३१ देवता—औदुंबरमणि
औदुम्बरेण मणिना पुष्टिकाम्याय वेधसा.
पशूनां सर्वेषां स्फातिं गोष्ठे मे सविता करत्.. (१)
विधाता ने पशु, पुत्र, धन, शरीर आदि की कामना करने वाले पुरुष के लिए प्राचीन
ebook converter DEMO Watermarks*
काल में उदुंबर अर्थात् गूलर की मणि के द्वारा इन्हें प्रदान करने का प्रयोग किया है. मैं उसी
उदुंबर मणि के द्वारा तेरी रक्षा करता हूं. सविता देव मेरी गोशाला में दो पैरों वाले मनुष्यों और
चार पैरों वाले पशुओं की वृद्धि करें. (१)
यो नो अग्निर्गार्हपत्यः पशूनामधिपा असत्.
औदुम्बरो वृषा मणिः सं मा सृजतु पुष्ट्या.. (२)
जो गार्हपत्य अग्नि है, वह हमारे पशुओं का पालनकर्ता है. मनचाहा फल देने वाली
उदुंबर मणि मेरे शरीर की वृद्धि तथा सभी प्रकार से पशुओं का पोषण करे. (२)
करीषिणीं फलवतीं स्वधामिरां च नो गृहे.
औदुम्बरस्य तेजसा धाता पुष्टिं दधातु मे.. (३)
विधाता देव गूलर की मणि के तेज के द्वारा मेरे शरीर की पुष्टि करें तथा मेरे घर में अन्न
तथा गोबर करने वाली गाएं प्रदान करें. (३)
यद् द्विपाच्च चतुष्पाच्च यान्यन्नानि ये रसाः.
गृहे ३ हं त्वेषां भूमानं बिभ्रदौदुम्बरं मणिम्.. (४)
उदुंबर मणि को धारण करता हुआ मैं दो पैरों वाले पुरुषों, चार पैरों वाले पशुओं, सभी
प्रकार के अन्नों तथा शहद, दूध आदि रसों की अधिकता को स्वीकार करूं. (४)
पुष्टिं पशूनां परि जग्रभाहं चतुष्पदां द्विपदां यच्च धान्यम्.
पयः पशूनां रसमोषधीनां बृहस्पतिः सविता मे नि यच्छात्.. (५)
उदुंबर मणि के तेज से तथा बृहस्पति और सविता देव की कृपा से मैं दो पैरों वाले
मनुष्यों, चार पैरों वाले पशुओं तथा गेहूं, जौ आदि अन्नों की अधिकता स्वीकार करूं. ये देव
मुझे पशुओं का दूध और ओषधियां अर्थात् जड़ीबूटियों का रस प्रदान करें. (५)
अहं पशूनामधिपा असानि मयि पुष्टं पुष्टपतिर्दधातु.
मह्यमौदुम्बरो मणिर्द्रविणानि नि यच्छतु.. (६)
पुष्टि की कामना करने वाला मैं दो पैरों वाले मनुष्यों तथा चार पैरों वाले पशुओं का
स्वामी बनूं. पशु आदि की पुष्टि की स्वामिनी उदुम्बर मणि मुझे स्वर्ण आदि धन प्रदान करे.
(६)
उप मौदुम्बरो मणिः प्रजया च धनेन च.
इन्द्रेण जिन्वितो मणिरा मागन्त्सह वर्चसा.. (७)
उदुंबर मणि मुझ को पुत्र, पौत्र आदि प्रजा और सोना, चांदी रूप धन से संपन्न करे. इंद्र
ebook converter DEMO Watermarks*
के द्वारा प्रेरित उदुंबर मणि विशेष तेज के साथ मेरे समीप आए. (७)
देवो मणिः सपत्नहा धनसा धनसातये.
पशोरन्नस्य भूमानं गवां स्फातिं नि यच्छतु.. (८)
प्रकाश युक्त उदुंबर मणि शत्रुओं का हनन करने वाली, धनों का लाभ कराने वाली हो.
वह मणि मुझे पशुओं तथा अन्न की अधिकता तथा गायों की अधिकता प्रदान करे. (८)
यथाग्रे त्वं वनस्पते पुष्ट्या सह जज्ञिषे.
एवा धनस्य मे स्फातिमा दधातु सरस्वती.. (९)
हे वन का पालन करने वाली उदुंबर मणि! तुम जिस प्रकार ओषधियों और वनस्पतियों
की रचना के समय पुष्टि के साथ उत्पन्न हुई हो, उसी प्रकार तुम्हारे साधन से सरस्वती देवी
मुझे धन की अधिकता प्रदान करें. (९)
आ मे धनं सरस्वती पयस्फातिं च धान्यम्.
सिनीवाल्यु १ पा वहादयं चौदुम्बरो मणिः.. (१०)
सरस्वती देवी मेरे धन की, दूध की तथा अन्न की वृद्धि करें. अमावस्या की देवी
सिनीवाली तथा यह उदुंबर मणि धन आदि प्रदान करें. (१०)
त्वं मणीनामधिपा वृषासि त्वयि पुष्टं पुष्टपतिर्जजान.
त्वयी मे वाजा द्रविणानि सर्वौदुम्बरः स त्वमस्मत् सहस्वारादरातिममतिं
क्षुधं च.. (११)
हे उदुंबर मणि! तुम अन्य रक्षा साधनों की स्वामिनी हो. प्रजापति ने तुम को गाय, घोड़ा
आदि की पुष्टि की क्षमता प्रदान की है. तुम में ये सभी घोड़े और अन्न व्याप्त हैं. तुम इन सब
को पराजित करो. तुम शत्रु तथा दरिद्रता को हम से दूर करो. तुम बुद्धि के अभाव और भूख
को हम से दूर करो. (११)
ग्रामणीरसि ग्रामणीरुत्थायाभिषिक्तो ऽ भि मा सिञ्च वर्चसा.
तेजो ऽ सि तेजो मयि धारयाधि रयिरसि रयिं मे धेहि.. (१२)
हे उदुंबर मणि! तुम गाय की स्वामिनी हो. तुम हमारी सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करो.
तुम तेज से अभिषिक्त हो, उठ कर मुझे भी तेज से सिंचित करो. तुम तेज रूप हो, मुझ में भी
तेज धारण करो. तुम धन प्राप्त करने वाली हो, मुझे भी धन प्राप्त कराओ. (१२)
पुष्टिरसि पुष्ट्या मा समङ्ग्धि गृहमेधी गृहपतिं मा कृणु.
औदुम्बरः स त्वमस्मासु धेहि रयिं च नः सर्ववीरं नि यच्छ रायस्पोषाय प्रति
मुञ्चे अहं त्वाम्.. (१३)
ebook converter DEMO Watermarks*
हे उदुंबर मणि! तुम पुष्टि हो, मुझे भी पुष्टि से युक्त करो. तुम गृहमेधी हो, मुझे गृहपति
बनाओ. तुम हमें धन प्रदान करो. तुम हमें ऐसा धन प्रदान करो, जिस से हमारे पुत्र, पौत्र,
सेवक आदि पुष्ट हों. हे मणि! मैं तुझे धनों की वृद्धि के लिए बांधता हूं. (१३)
अयमौदुम्बरो मणिवीरो वीराय बध्यते.
स नः सनिं मधुमतीं कृणोतु रयिं च नः सर्ववीरं नि यच्छात्.. (१४)
अमित्रों का विनाश करने वाली यह उदुंबर मणि वीरता को प्राप्त करने के लिए बांधी
जाती है. यह मणि हमारी उपलब्धि को मधुमती करे. यह हमारे सभी वीरों अर्थात् पुत्र, पौत्र
आदि को धन प्रदान करे. (१४)
सूक्त-३२ देवता—दर्भ
शतकाण्डो दुश्च्यवनः सहस्रपर्ण उत्तिरः.
दर्भो य उग्र ओषधिस्तं ते बध्नाम्यायायुषे... (१)
हे मृत्यु के भय से दुःखी पुरुष! मैं सौ गांठों वाली, दुःख में चबाने योग्य, हजार पुत्रों
वाली एवं उत्तम दर्भ उग्र ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी है, उसे मैं दीर्घ आयु प्राप्त करने के लिए
बांधता हूं. (१)
नास्य केशान् प्र वपन्ति नोरसि ताडमा घ्नते.
यस्मा अच्छिन्नपर्णेन दर्भेण शर्म यच्छति.. (२)
उस के केशों को मृत्यु दूत नहीं खींचते हैं तथा राक्षस, पिशाच आदि हृदय में चोट पहुंचा
कर उसी की हिंसा नहीं करते, जिसे प्रयोक्ता बिना कटे हुए पत्तों वाले दर्भ से बनी मणि सुख
पहुंचाती है. (२)
दिवि ते तूलमोधधे पृथिव्यामसि निष्ठितः.
त्वया सहस्रकाण्डेनायुः प्र वर्धयामहे.. (३)
हे सौ गांठों वाली दर्भ नामक ओषधि! तेरा ऊपर वाला भाग द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में है
तथा तू पृथ्वी पर स्थित है. इस प्रकार पृथ्वी से स्वर्ग तक व्याप्त होने वाली तथा हजार गांठों
वाली दर्भ नाम की ओषधि के द्वारा मैं तेरी आयु को बढ़ाता हूं. (३)
तिस्रो दिवो अत्यतृणत् तिस्र इमाः पृथिवीरुत.
त्वयाहं दुर्हार्दो जिह्वां नि तृणद्मि वचांसि.. (४)
हे हजार गांठों वाली ओषधि दर्भ! तू तीन स्वर्गों का अतिक्रमण गई है तथा तूने इन तीन
पृथ्वियों का अतिक्रमण किया है. मैं तेरे द्वारा उस की जीभ को लपेटता हूं जो मेरे प्रति
दुर्भावना रखता है तथा उस के वचनों को बांधता हूं. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*
त्वमसि सहमानो ऽ हमस्मि सहस्वान्.
उभौ सहस्वन्तौ भूत्वा सपत्नान्सहिषीवहि.. (५)
हे सौ गांठों वाली ओषधि दर्भ! तुम शत्रुओं को वश में करने वाली हो तथा मैं शत्रु की
हिंसा के साधन और बल से युक्त हूं. हम दोनों शत्रु को दबा के स्वभाव वाले हो कर अपने
शत्रुओं को पराजित करें. (५)
सहस्व नो अभिमातिं सहस्व पृतनायतः.
सहस्व सर्वान् दुर्हर्दः सुहार्दो मे बहून् कृधि.. (६)
हे सौ गांठों वाली ओषधि दर्भ! हमारे शत्रुओं अथवा पापों को पराजित करो. जो लोग
हमारे विरुद्ध सेना एकत्र कर रहे हैं, उन को भी पराजित करो. मेरे प्रति दुर्भावना रखने वाले
व्यक्तियों का विनाश करो और मेरे मित्रों की संख्या बढ़ाओ. (६)
दर्भेण देवजातेन दिवि ष्टम्भेन शश्वदित्.
तेनाहं शश्वतो जनाँ असनं सनवानि च.. (७)
देवों के समीप से उत्पन्न, द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में स्थित रहने वाले दर्भ के द्वारा मैं सर्वदा
दीर्घजीवी जनों को प्राप्त करूं. (७)
प्रियं मा दर्भ कृणु ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च.
यस्मै च कामयामहे सर्वस्मै च विपश्यते.. (८)
हे दर्भ! मुझ धारणकर्ता को ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र तथा श्रेष्ठ जनों का प्रिय बनाओ.
अनुलोम और प्रतिलोम जाति के मध्य जिन लोगों को मैं अपना प्रिय बनाना चाहूं, पाप
अन्वेषण करने वाले उस पुरुष को मेरा प्रिय बनाओ. (८)
यो जायमानः पृथिवीमदृंहद् यो अस्तभ्नादन्तरिक्षं दिवं च.
यं बिभ्रतं ननु पाप्मा विवेद् स नो ऽ यं दर्भो वरुणो दिवा कः.. (९)
जिस दर्भ ने उत्पन्न होते ही पृथ्वी को दृढ़ किया था तथा जिस ने अंतरिक्ष और द्युलोक
अर्थात् स्वर्ग को स्थिर किया, उस दर्भ को जानने वाले को पाप स्पर्श नहीं करता. इस प्रकार
का अंधकार निवारक दर्भ हमें प्रकाश दे. (९)
सपत्नहा शतकाण्डः सहस्वानोषधीनां प्रथमः सं बभूव.
स नोऽयं दर्भः परि पातु विश्वतस्तेन साक्षीय पृतनाः पृतन्यतः.. (१०)
शत्रुओं का विनाश करने वाला, सौ गांठों से युक्त एवं शक्तिशाली दर्भ सभी ओषधियों
अर्थात् जड़ीबूटियों से पहले उत्पन्न हुआ है. इस प्रकार का दर्भ सभी दिशाओं के भयों से
हमारी रक्षा करें. उस दर्भमणि की सहायता से मैं उस सेना को पराजित करूं, जिसे मेरा शत्रु
ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-३३ देवता—दर्भ
एकत्र करता है. (१०)
सूक्त-३३ देवता—दर्भ
सहस्रार्घः शतकाण्डः सहस्वानपामग्निर्विरुधां राजसूयम्.
स नो ऽ यं दर्भः परि पातु विश्वतो देवो मणिरायुषा सं सृजाति नः.. (१)
बहुमूल्य, सौ गांठों वाली, शक्ति संपन्न, जलों की अग्नि अर्थात् वाडवाग्नि, राजसूय कर्म
के समान यह दर्भ चारों ओर से हमारी रक्षा करे. यह देवों के द्वारा निर्मित मणि हमें आयु से
मिलाए. (१)
घृतादुल्लुप्तो मधुमान् पयस्वान् भूमिंदृंहोऽच्युतश्च्यावयिष्णुः.
नुदन्सपत्नानधराँश्च कृण्वन् दर्भा रोह महतामिन्द्रियेण.. (२)
हवन करने से शेष बचे घृत से चिकना बना हुआ, मधुरता से युक्त, अधिक दूध वाला,
अपनी जड़ों से धरती को दृढ़ करने वाला, अपने स्थान से पतित न होने वाला, दूसरों का
पतन कराने वाला, शत्रुओं को दूर भगाता हुआ और शक्ति हीन बनाता हुआ दर्भ अन्य
अधिक बल युक्त ओषधियों अर्थात् जड़ीबूटियों में इंद्र के द्वारा प्रदत्त सामर्थ्य से स्थित बने.
(२)
त्वं भूमित्येष्योजसा त्वं वेद्यां सीदसि चारुरध्वरे.
त्वां पवित्रमृषायो ऽ भरन्त त्वं पुनीहि दुरितान्यस्मत्.. (३)
हे दर्भमणि! तुम अपने बल से भूमि का अतिक्रमण करते हो. तुम यज्ञ में सुंदर वेदी पर
स्थित होते हो. ऋषियों ने तुम्हें पवित्र करके आहरण किया है. तुम पापों को हम से दूर
भगाओ. (३)
तीक्ष्णो राजा विषासही रक्षोहा विश्वचर्षणिः.
ओजो देवानां बलमुग्रमेतत् तं ते बध्नामि जरसे स्वस्तये.. (४)
तीक्ष्ण, सभी ओषधियों में श्रेष्ठ, विशेष रूप से शत्रु नाशक, राक्षसों का हनन करने
वाला, सारे संसार को देखने वाला, देवों का बल तथा दूसरों के द्वारा असहनीय शक्ति संपन्न
यह दर्भ नाम का रक्षा साधन है. हे रक्षा की इच्छा करने वाले पुरुष! इस प्रकार की दर्भमणि
को मैं तेरी वृद्धावस्था दूर करने एवं कल्याण के लिए तेरे हाथ में बांधता हूं. (४)
दर्भेण त्वं कृण्वद् वीर्याणि दर्भ बिभ्रदात्मना मा व्यथिष्ठाः.
अतिष्ठाया वर्चसाधान्यान्त्सूर्य इवा भाहि प्रदिशश्चतस्रः.. (५)
हे पुरुष! तुम दर्भमणि रूपी साधन के द्वारा वीरता पूर्ण कर्म करो. शक्ति के साधन इस
दर्भमणि को धारण करते हुए तुम दुःखी मत होओ. तुम अपने शरीर के बल से शत्रुओं को
ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-३४ देवता—जंगिड़ वनस्पति
व्यथित कर के सूर्य के समान चारों दिशाओं को प्रकाशित करो. (५)
सूक्त-३४ देवता—जंगिड़ वनस्पति
जङ्गिडो ऽ सि जङ्गिडो रक्षितासि जङ्गिड:.
द्विपाच्चतुष्पादस्माकं सर्वं रक्षतु जङ्गिड:.. (१)
हे जंगिड़ नाम की ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी! तुम कृत्या नाम की राक्षसी को तथा उस
के द्वारा किए हुए कर्मों को निगल लेती हो. इस आधार पर तुम सभी भयों से रक्षा करने वाली
होती हो. हे जंगिड़! तुम हमारे दो पैरों वाले पुत्र, पौत्र आदि की तथा चार पैरों वाले गाय, अश्व
आदि पशुओं की रक्षा करो. (१)
या गृत्स्यस्त्रिपञ्चाशी: शतं कृत्याकृतश्च ये.
सर्वान् विनक्तु तेजसो ऽ रसांजङ्गिडस्करत्.. (२)
तिरेपन प्रकार की जो हानि पहुंचाने वाली राक्षसियां, कृत्याएं है तथा पुतलियां बनाने
वाले जो सैकड़ों जादूटोना करने वाले हैं, जंगिड नाम की ओषधि से बनी हुई मणि उन सभी
को नष्ट शक्ति वाला तथा रसहीन करे. (२)
अरसं कृत्रिमं नादमरसा: सप्त विस्रस:.
अपेतो जङ्गिडामतिमिशुमस्तेव शातय.. (३)
अभिचार अर्थात् जादूटोना करने वाले के द्वारा उत्पन्न की गई हानि को यह जंगिड मणि
सारहीन करे. सात छेदों—नाक, नेत्र, कान तथा मुख में उत्पन्न किए गए अभिचार कर्म को
यह जंगिड मणि नष्ट करे. बाण फेंकने वाला शत्रुओं को जिस प्रकार नष्ट कर देता है, उसी
प्रकार जंगिड मणि हम से दुर्बुद्धि और दरिद्रता को दूर करे. (३)
कृत्यादूषण एवायमथो अरातिदूषण:.
अथो सहस्वाज्जङ्गिड: प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (४)
यह जंगिड़ मणि शत्रु के द्वारा उत्पन्न कृत्या राक्षसी का निराकरण करने वाली है तथा
शत्रु को नष्ट करने का साधन है. यह जंगिड़ मणि ऊपर बताए हुए कार्यों की शक्ति से युक्त है.
यह हमारी आयु को बढ़ाए. (४)
स जङ्गिडस्य महिमा परि ण: पातु विश्वतः.
विष्कन्धं येन सासह संस्कन्धमोज ओजसा.. (५)
जंगिड़ मणि का यह महत्त्व सभी ओर से हमारी रक्षा करे. यह मणि विस्कंद नाम के
वातरोग को अपने बल से नष्ट करती है. (५)
ebook converter DEMO Watermarks*
त्रिष्ट्वा देवा अजनयन् निष्ठितं भूम्यामधि.
तमु त्वाङ्गिरा इति ब्राह्मणाः पूर्व्या विदुः.. (६)
इस समय धरती पर स्थित तुम को इंद्र आदि देवों ने तीन बार उत्पन्न किया था. इस
प्रकार के तुम को अंगिरा गोत्रीय ऋषि एवं ब्राह्मण जानते थे. (६)
न त्वा पूर्वा ओषधयो न त्वा तरन्ति या नवाः.
विबाध उग्रो जङ्गिडः परिपाणः सुमङ्गलः.. (७)
हे जंगिड़ मणि! सृष्टि के आदि में उत्पन्न ओषधियां अर्थात् जड़ीबूटियां तुम से श्रेष्ठ नहीं
हैं. नई ओषधियां भी तुम से श्रेष्ठ नहीं हैं. हे शत्रुसेना आदि को बाधा उत्पन्न करने वाली
जंगिड मणि! तुम उग्र, चारों ओर से रक्षा करने वाली तथा भलीभांति मंगलकारी हो. (७)
अथोपदान भगवो जङ्गिडामितवीर्य. पुरा त उग्रा ग्रसत उपेन्द्रो वीर्यं ददौ..
(८)
हे कृत्या राक्षसी को दूर करने में स्वीकृत! हे अधिक माहात्म्य वाली! हे असीमित शक्ति
वाली जंगिड़ मणि! अधिक शक्ति वाले प्राणी तुम्हें खा लेंगे, ऐसा जान कर इंद्र ने तुम्हें अधिक
बल प्रदान किया है. (८)
उग्र इत् ते वनस्पत इन्द्र ओज्मानमा दधौ.
अमीवाः सर्वाश्चातयंजहि रक्षांस्योषधे.. (९)
हे जंगिड़ नाम की वनस्पति अर्थात् जड़ीबूटी! तुम अधिक शक्ति वाली ही हो. इंद्र ने तुम
में बल धारण किया है, इस कारण हे जंगिड़ ओषधि! तुम सभी रोगों का नाश करती हुई
राक्षसों को नष्ट करो. (९)
आशीरीकं विशिरीकं बलासं पृष्ट्यामयम्.
तक्मानं विश्वशारदमरसां जङ्गिडस्करत्.. (१०)
सभी प्रकार से हिंसक आशीरीक रोग को, विशेष रूप से हिंसक विशिरीक रोग को, बल
का नाश करने वाले बलास रोग को, सभी अंगों में व्याप्त पृष्ठम रोग को, तक्मा रोग को तथा
विश्वशारद रोग को जंगिड मणि पीड़ा पहुंचाने में असमर्थ बनाए. (१०)
सूक्त-३५ देवता—जंगिड़ वनस्पति
इन्द्रस्य नाम गृह्णन्त ऋषयो जङ्गिडं ददुः.
देवा यं चक्रुर्भेषजमग्रे विष्कन्धदूषणम्.. (१)
प्राचीन ऋषियों ने इंद्र का नाम लेते हुए रक्षा के इच्छुक मनुष्यों को जंगिड़ मणि दी.
ebook converter DEMO Watermarks*
सृष्टि को आदि में इंद्र आदि देवों ने जंगिड़ ओषधियों को विष्कंध नाम के महारोग नष्ट करने
वाली बनाया था. (१)
स नो रक्षतु जङ्गिडो धनपालो धनेव.
देवा यं चक्रुर्ब्राह्मणाः परिपाणमरातिहम्.. (२)
राजा का धनाध्यक्ष जिस प्रकार धन की रक्षा करता है, उसी प्रकार जंगिड मणि हमारी
रक्षा करे. जंगिड मणि को देवों तथा ब्राह्मणों ने सभी प्रकार से रक्षक और शत्रुओं का विनाश
करने वाला बनाया है. (२)
दुर्हार्दः संघोरं चक्षुः पापकृत्वानमागमम्.
तांस्त्वं सहस्रचक्षो प्रतीबोधेन नाशय परिपाणो ऽ सि जङ्गिडः.. (३)
हे जंगिड़ मणि! तुम दुष्ट हृदय वाले शत्रु का नाश करो. तुम अति भयानक व्यक्ति का
नाश करो. हिंसा आदि पाप करने वाले का तुम नाश करो. हे हजार नेत्रों वाली जंगिड़ मणि!
तुम उन शत्रुओं को अपनी प्रतिकूल बुद्धि से नष्ट करो. हे जंगिड़! तुम सभी प्रकार से रक्षा
करने वाली हो. (३)
परि मा दिवः परि मा पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षात् परि मा वीरुद्भ्यः.
परि मा भूतात् परि मोत भव्याद् दिशोदिशो जङ्गिडः पात्वस्मान्.. (४)
यह जंगिड़ मणि मुझे द्युलोक अर्थात् स्वर्ग से होने वाले भय से, पृथ्वी से होने वाले भय
से, अंतरिक्ष के राक्षसों आदि के भय से तथा वृक्षों से होने वाले भय से बचाएं. यह जंगिड़
मणि मुझे अतीत काल के प्राणियों से एवं भविष्य में होने वाले प्राणियों से बचाए. जंगिड़
मणि सभी दिशाओं में होने वाले भयों से हमारी रक्षा करे. (४)
य ऋष्णावो देवकृता य उतो ववृते ऽ न्यः.
सर्वांस्तान् विश्वभेषजो ऽ रसां जङ्गिडस्करात्.. (५)
देवों के द्वारा बनाए हुए जो हिंसक पुरुष हैं तथा मनुष्य आदि के द्वारा प्रेरित जो बाधक
हैं, उन सभी भेषजों अर्थात् ओषधियों को जंगिड़ मणि शक्तिहीन करे. (५)
सूक्त-३६ देवता—शतवार
शतवारो अनीनशद् यक्ष्मान् रक्षांसि तेजसा.
आरोहन् वर्चसा सह मणिर्दुर्णामचातनः.. (१)
शतवार नाम की विशेष ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी अपनी महिमा से यक्ष्मा अर्थात् टी.
बी. रोग को नष्ट करे. यह मणि राक्षसों का भी विनाश करे. त्वचा के दोषों को नष्ट करने वाली
शतवार मणि अपनी दीप्ति के साथ पुरुष की भुजा पर विराजमान हो. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*
शृङ्गाभ्यां रक्षो नुदते मूलेन यातुधान्यः.
मध्येन यक्ष्मं बाधते नैनं पाप्माति तत्रति.. (२)
यह शतवार मणि! अपने सींगों अर्थात् अगले भागों से अंतरिक्ष में स्थित राक्षसों को
भगाती है तथा अपनी जड़ अर्थात् नीचे वाले भाग से राक्षसियों को दूर करती है. यह मणि
अपने मध्य भाग से यक्ष्मा अर्थात् टी. बी. रोग को दूर करती है. पाप इस का अतिक्रमण नहीं
कर पाता. (२)
ये यक्ष्मासो अर्भका महान्तो ये च शब्दिनः.
सर्वान् दुर्नामहा मणिः शतवारो अनीनशत्.. (३)
जो उत्पन्न हुए अर्थात् प्रारंभिक अवस्था वाले यक्ष्मा अर्थात् टी. बी. रोग हैं, जो बढ़े हुए
यक्ष्मा तथा जो कष्ट से चिकित्सा योग्य यक्ष्मा रोग हैं, इन सभी बुरे नाम वाले रोगों को शतवार
मणि नष्ट कर देती है. (३)
शतं वीरानजनयच्छतं यक्ष्मानपावपत्.
दुर्नाम्नः सर्वान् हत्वाव रक्षांसि धुनुते.. (४)
धारण की जाती हुई यह शतवार मणि सौ वीर पुत्रों को जन्म देती है तथा यक्ष्मा नाम के
सौ रोगों को दूर भगाती है. यह सभी बुरे नाम वाले राक्षसों को नष्ट कर के ऐसा कर देती है
कि ये पुनः उपद्रव न कर सकें. (४)
हिरण्यशृङ्ग ऋषभः शातवारो अयं मणिः.
दुर्नाम्नः सर्वांस्तृड्ढवाव रक्षांस्यक्रमीत्.. (५)
सोने के समान चमकने वाले अग्र भाग वाली शतवार ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी सभी
ओषधियों में श्रेष्ठ है. यह सभी अयश वाले जनों को तिनके के समान नष्ट कर के राक्षसों पर
आक्रमण करे. (५)
शतमहं दुर्नाम्नीनां गन्धर्वाप्सरसां शतम्.
शतं शश्वन्वतीनां शतवारेण वारये.. (६)
मैं कोढ़, दाद आदि सौ व्याधियों, सौ गंधर्वों तथा सौ अप्सराओं को दूर करता हूं.
बारबार पीड़ा देने के लिए आने वाली सैकड़ों अपस्मार अर्थात पागलपन आदि व्याधियों को
शतवार ओषधि से दूर करता हूं. (६)
सूक्त-३७ देवता—अग्नि
इदं वर्चो अग्निना दत्तमागन् भर्गो यशः सह ओजो वयो बलम्.
त्रयस्त्रिंशद् यानि च वीर्याणि तान्यग्निः प्र ददातु मे.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*
अग्नि देव के द्वारा दी हुई यह दीप्ति आए. तेज एवं यश के साथ ओज, यौवन और बल
आए. तैंतीस प्रकार के जो कार्य अर्थात् वीरतापूर्ण सामर्थ्य हैं, अग्नि उन्हें मुझे प्रदान करें. (१)
वर्च आ धेहि मे तन्वां ३ सह ओजो वयो बलम्.
इन्द्रियाय त्वा कर्मणे वीर्याय प्रति गृह्णामि शतशारदाय.. (२)
हे अग्नि! मेरे शरीर में शत्रुओं को पराजित करने वाला तेज हो तथा तेज के साथ मुझे
पूर्ण आयु और बल प्रदान करो. मैं ज्ञानेंद्रियों तथा कर्मेंद्रियों की दृढ़ता के लिए तुझे स्वीकार
करता हूं. मैं अग्निहोत्र आदि कर्म के लिए वायु पर विजय प्राप्त करने वाले कार्य के लिए तथा
सौ वर्ष का जीवन प्राप्त करने के लिए तुझे ग्रहण करता हूं. (२)
ऊर्जे त्वा बलाय त्वौजसे सहसे त्वा.
अभिभूयाय त्वा राष्ट्रभृत्याय पर्यूहामि शतशारदाय.. (३)
हे स्वीकार किए गए पदार्थ! मैं तुम्हें अन्न प्राप्ति के लिए, बल प्राप्ति के लिए, तेज प्राप्ति
के लिए, धन प्राप्ति के लिए, शत्रु जय के लिए तथा राज्य के भरणपोषण के लिए सौ वर्षों की
अवधि हेतु ग्रहण करता हूं. (३)
ऋतुभ्यष्ट्वार्तवेभ्यो माद्भ्यः संवत्सरेभ्यः.
धात्रे विधात्रे समृधे भूतस्य पतये यजे.. (४)
हे पदार्थ! मैं तुझे ग्रीष्म आदि ऋतुओं को प्रसन्न करने के लिए, ऋतु संबंधी देवताओं
को प्रसन्न करने के लिए, चैत्र आदि मासों को प्रसन्न करने के लिए, संवत्सरों को प्रसन्न करने
के लिए, धाता और विधाता तथा सभी प्राणियों के स्वामी समृध को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ
करता हूं. (४)
सूक्त-३८ देवता—गुग्गुलु
न तं यक्ष्मा अरुन्धते नैनं शपथो अश्नुते.
यं भेषजस्य गुल्गुलोः सुरभिर्गन्धो अश्नुते.. (१)
उस राजा को यक्ष्मा अर्थात् टी. बी. नाम का रोग पीड़ित नहीं करता और दूसरों के द्वारा
अभिशाप उस पर प्रभाव डालता है, जिस राजा को गूगल नाम की ओषध की सुखदायक गंध
व्याप्त करती है. (१)
विष्वञ्चस्तस्माद् यक्ष्मा मृगा अश्वा इवेरते.
यद् गुल्गुलु सैन्धवं यद् वाप्यासि समुद्रियम्.. (२)
गूगल की गंध सूंघने वाली यह यक्ष्मा अर्थात् टी. बी. नाम की व्याधि हिरन और घोड़े के
समान सभी दिशाओं में तीव्र गति से भागती है. गुग्गुल या तो सिंधु देश में उत्पन्न हो अथवा
ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-३९ देवता—कुष्ठ
समुद्र में उत्पन्न हो. (२)
उभयोरग्रभं नामास्मा अरिष्टतातये.. (३)
हे गुग्गुलु! मैं तुझे दोनों प्रकार के रोगों का नाम बताता हूं. दुःख देने वाले वर्तमान रोग
के विनाश हेतु मैं तुझ से प्रार्थना करता हूं. (३)
सूक्त-३९ देवता—कुष्ठ
ऐतु देवस्त्रायमाणः कुष्ठो हिमवतस्परि.
तक्मानं सर्वं नाशय सर्वांश्च यातुधान्यः.. (१)
कूठ नाम की विशेष ओषधि द्युलोक में उत्पन्न हुई है. यह हमारी रक्षा करती हुई
हिमवान पर्वत से आए. वह सभी क्लेशकारी रोगों का नाश करे तथा सभी राक्षसियों को नष्ट
करे. (१)
त्रीणि ते कुष्ठ नामानि नद्यमारो नद्यारिषः.
नद्यायं पुरुषो रिषत्.
यस्मै परिब्रवीमि त्वा सायंप्रातरथो दिवा.. (२)
हे कुष्ठ! तुम्हारे तीन नाम नद्यमार, नद्यारिष और नद्य हैं. तुम्हारा नाम लेने के अभाव में
यह पुरुष हिंसित हुआ है. मैं रोग से दुःखी पुरुष के लिए तुम्हारा नाम मंत्र के रूप में बता रहा
हूं. वह सायंकाल, प्रातः और दिन में तुम्हारे नाम का उच्चारण करे. (२)
जीवला नाम ते माता जीवन्तो नाम ते पिता.
नद्यायं पुरुषो रिषत्.
यस्मै परिब्रवीमि त्वासायंप्रातरथो दिवा.. (३)
हे कुष्ठ नाम की ओषधि! जीवला तेरी माता है और जीवंत तेरे पिता हैं. तुम्हारा नाम न
लेने के कारण इस पुरुष की हिंसा हुई है. मैं रोग से दुःखी पुरुष को तुम्हारा नाम मंत्र के रूप
में प्रातः, सायं और दिन में उच्चारण हेतु बताता हूं. (३)
उत्तमो अस्योषधीनामनड्वाण् जगतामिव व्याघ्रः श्वपदामिव.
नद्यायं पुरुषो रिषत्.
यस्मै परिब्रवीमि सायंप्रातरथो दिवा.. (४)
हे कुष्ठ ओषधि! जिस प्रकार गति करने वाला बैल श्रेष्ठ है उसी प्रकार ओषधियों में तुम
श्रेष्ठ हो. जंगली पशुओं में बाघ जिस प्रकार श्रेष्ठ है. उसी प्रकार तुम ओषधियों में श्रेष्ठ हो.
(४)
ebook converter DEMO Watermarks*
त्रिः शाम्बुभ्यो अङ्गिरेभ्यस्त्रिरादित्येभ्यस्परि.
त्रिर्जातो विश्वेदेवेभ्यः.
स कुष्ठो विश्वभेषजः साकं सोमेन तिष्ठति.
तक्मानं सर्वं नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः.. (५)
हे कुष्ठ ओषधि! तुम अंगिरा गोत्रीय ऋषियों की संतान शांबु नाम के ऋषियों से तीन
बार उत्पन्न हुए, आदित्यों से तीन बार उत्पन्न तथा विश्वे देवों से तीन बार उत्पन्न कहे जाते हो.
सभी रोगों की ओषधि कुष्ठ सोम के साथ स्थित होती हैं. तुम सभी रोगों तथा सभी राक्षसियों
का नाश करो. (५)
अश्वत्थो देवसदनस्तृतीयस्यामितो दिवि.
तत्रामृतस्य चक्षणं ततः कुष्ठो अजायत.
स कुष्ठो विश्वभेषजः साकं सोमेन तिष्ठति.
तक्मानं सर्वं नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः.. (६)
इस भूलोक से तीसरे द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में देवों का घर पीपल का वृक्ष है. उस पीपल
पर मरण रहित सोम उत्पन्न हुआ है. उस सोम से कुष्ठ ओषधि उत्पन्न हुई है. सभी रोगों की
ओषधि यह कुष्ठ सोम के साथ स्थित होता है. हे कुष्ठ! तुम सभी रोगों और सभी राक्षसियों
का नाश करो. (६)
हिरण्ययी नौरचरद्धिरण्यबन्धना दिवि.
तत्रामृतस्य चक्षणं ततः कुष्ठो अजायत.
स कुष्ठो विश्वभेषजः साकं सोमेन तिष्ठति.
तक्मानं सर्वं नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः.. (७)
स्वर्ग में सोने से बनी रस्सी से बंधी हुई सोने की नाव घूमती रहती है. वहां मरणरहित
सोम की उत्पत्ति हुई है. उस सोम से कुष्ठ उत्पन्न हुआ है. सभी रोगों की ओषधि यह कुष्ठ सोम
के साथ स्थित रहता है. हे कुष्ठ! तुम सभी रोगों और राक्षसियों का विनाश करो. (७)
यत्र नावप्रभ्रंशनं यत्र हिमवतः शिरः.
तत्रामृतस्य चक्षणं ततः कुष्ठो अजायत.
स कुष्ठो विश्वभेषजः साकं सोमेन तिष्ठति.
तक्मानं सर्वं नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः.. (८)
जिस स्वर्ग से उत्तम कर्म करने वालों का पतन नहीं होता तथा जहां हिमवान पर्वत शीश
अर्थात् सब से ऊंचा शिखर है वहां अमृत की स्थिति है. उस अमृत से कुष्ठ उत्पन्न हुआ है.
सभी रोगों की ओषधि कुष्ठ वहां स्वर्ग में सोम से संबंधित रहता है. हे कुष्ठ! सभी रोगों और
राक्षसियों का विनाश करो. (८)
ebook converter DEMO Watermarks*
यं त्वा वेद पूर्व इक्ष्वाको यं वा त्वा कुष्ठ काम्यः.
यं वा वसो यमात्स्यस्तेनासि विश्वभेषजः.. (९)
हे कुष्ठ नाम की ओषधि! तुम को इक्ष्वाकु वंश के प्राचीन राजा जानते थे तथा तुझ को
कामदेव का पुत्र जान गया था. तुम्हें वसु नाम का देवता जानता था. इस कारण तुम सभी
रोगों की ओषधि हो, तुम्हें सभी रोगों के विनाश के रूप में जाना जाता है. (९)
शीर्षलोकं तृतीयकं सदन्दिर्यश्च हायनः.
तक्मानं विश्वधायीर्याधराञ्चं परा सुव.. (१०)
तृतीय लोक अर्थात् स्वर्ग को तुम्हारा शीश कहा जाता है. वह सभी रोगों का खंडन
करने वाला हो. हे सभी प्रकार की शक्तियों से युक्त कुष्ठ! तुम सभी रोगों को तथा नीचे होने
वाले पतन को हम से दूर करो. (१०)
सूक्त-४० देवता—विश्वे देव, बृहस्पति
यन्मे छिद्रं मनसो यच्च वाचः सरस्वती मन्युमन्तं जगाम.
विश्वैस्तद् देवैः सह संविदानः सं दधातु बृहस्पतिः.. (१)
जो मेरे मन का छिद्र अर्थात् दोष है तथा वाणी का दोष है, उस के कारण सरस्वती क्रोध
से युक्त मुझ को छोड़ कर चली गई है. सभी देवों के साथ एकमत हुए बृहस्पति मेरे इन दोषों
को दूर करें. (१)
मा न आपो मेधां मा ब्रह्म प्र मथिष्टन.
सुष्यदा यूयं स्यन्धध्वमुपहूतो ऽ हं सुमेधा वर्चस्वी.. (२)
हे जल देवता! तुम मेरी बुद्धि को भ्रष्ट मत करो. ब्रह्मा मेरे द्वारा अध्ययन किए गए वेद
को भ्रष्ट न करें. मेरा जो जो कर्म सूख रहा है अर्थात् नष्ट हो रहा है, उसे लक्ष्य बना कर तुम
सभी ओर से उसे गीला बनाओ अर्थात् सुरक्षित करो. आप सभी की अनुमति से मैं उत्तम
बुद्धि वाला बनूं तथा ब्रह्म के तेज से युक्त हो जाऊं. (२)
मा नो मेधां मा नो दीक्षां मा नो हिंसिष्टं यत् तपः.
शिवा नः शं सन्त्वायुषे शिवा भवन्तु मातरः.. (३)
हे द्यावा पृथ्वी! तुम मेरी बुद्धि को तथा दीक्षा को नष्ट मत करो. जल देवता मेरे लिए
सुखकारी हों तथा मेरी आयु वृद्धि के लिए कहें. माता के समान हितकारी जल मेरे लिए
कल्याणकारी हों. (३)
या नः पीपरदश्विना ज्योतिष्मती तमस्तिरः. तामस्मे रासतामिषम्.. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*
हे अश्विनीकुमारो! सभी व्यवहारों को बाधा पहुंचाने वाला अंधकार हमारे पास आए.
प्रकाश वाली रात उस अंधकार का तिरस्कार करे. हमें इस प्रकार की प्रकाश युक्त रात्रि प्रदान
करो. (४)
सूक्त-४१ देवता—तप
भद्रमिच्छन्त ऋषयः स्वर्विदस्तपो दीक्षामुपनिषेदुरग्रे.
ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै देवा उपसंनमन्तु.. (१)
सृष्टि के आदि में सब के कल्याण की इच्छा करते हुए ऋषियों ने स्वर्ग प्राप्त करते हुए
तप की दीक्षा प्राप्त की. उस से राष्ट्र, बल और ओज उत्पन्न हुए. देव उस राष्ट्र आदि को इस
पुरुष के लिए प्रदान करें. (१)
सूक्त-४२ देवता—ब्रह्म
ब्रह्म होता ब्रह्म यज्ञा ब्रह्मणा स्वरवो मिताः.
अध्वर्युर्ब्रह्मणो जातो ब्रह्मणो ऽ न्तर्हितं हिवः.. (१)
जगत् की उत्पत्ति का कारण ब्रह्म होता है, ब्रह्म ही यज्ञ है. ब्रह्म ने उदात्त, अनुदात्त,
स्वरित आदि स्वरों का गमन निश्चित किया है. ब्रह्म से ही अध्वर्यु उत्पन्न हुए. यज्ञ का साधन
हवि ब्रह्म में ही स्थित है. (१)
ब्रह्म सुचो घृतवतीर्ब्रह्मणा वेदिरुद्धिता.
ब्रह्म यज्ञस्य तत्त्वं च ऋत्विजो ये हविष्कृतः. शमिताय स्वाहा.. (२)
घृत से पूर्ण तथा होम का साधन सुवा भी ब्रह्म है. ब्रह्म ने ही यज्ञवेदी को खोदा है. ब्रह्म
यज्ञ का तत्त्व है. हवि तैयार करने वाले ऋत्विज् भी ब्रह्म ही हैं. अभेद को प्राप्त ब्रह्म के लिए
आहुति उत्तम हो. (२)
अंहोमुचे प्र भरे मनीषामा सुत्राव्णे सुमतिमावृणानः.
इममिन्द्र प्रति हव्यं गृभाय सत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः.. (३)
पापों से छुटकारा दिलाने वाले तथा भलीभांति रक्षा करने वाले इंद्र के लिए मैं उत्तम
स्तुति बोलता हुआ उपासना पूर्ण करता हूं. हे इंद्र! तुम मेरा हव्य स्वीकार करो. तुम्हारी कृपा
से यजमान की इच्छाएं पूर्ण हों. (३)
अंहोमुचं वृषभं यज्ञियानां विराजन्तं प्रथममध्वराणाम्.
अपां नपातमश्विना हुवे धिय इन्द्रियेण त इन्द्रियं दत्तमोजः.. (४)
यज्ञ के योग्य देवों में श्रेष्ठ, पाप से मुक्त कराने वाले तथा यज्ञों में प्रमुख रूप में
विराजमान इंद्र का मैं आह्वान करता हूं. जलों की वर्षा करने वाले अग्नि तथा अश्विनीकुमारों
का मैं आह्वान करता हूं. वे अश्विनीकुमार इंद्रियों की सामर्थ्य से तुम्हें बुद्धि, ओज और बल
प्रदान करें. (४)
सूक्त-४३ देवता—मंत्रों में कहे गए अग्नि
आदि
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
अग्निर्मा तत्र नयत्वग्निर्मेधा दधातु मे. अग्नये स्वाहा.. (१)
जिस स्थान में सगुण ब्रह्म के स्वरूप को जानने वाले दीक्षा और तप के द्वारा जाते हैं,
अग्नि देव मुझे वहां ले जाएं. अग्नि देव मुझे बुद्धि प्रदान करें. यह आहुति अग्नि को
भलीभांति प्राप्त हो. (१)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
वायुर्मा तत्र नयतु वायुः प्राणान् दधातु मे. वायवे स्वाहा.. (२)
सगुण ब्रह्म के स्वरूप को जानने वाले दीक्षा और तप के कारण जहां जाते हैं, वायु मुझे
वहां ले जाएं तथा वायु मुझ में प्राणों का आधान करें. यह आहुति भलीभांति वायु को प्राप्त
हो. (२)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
सूर्यो मा तत्र नयतु चक्षुः दधातु मे. सूर्याय स्वाहा.. (३)
सगुण ब्रह्म के स्वरूप को जानने वाले दीक्षा और तप की सहायता से जहां जाते हैं, सूर्य
देव मुझे वहां ले जाएं. सूर्य देव मुझे नेत्र प्रदान करें. यह आहुति सूर्य देव को भलीभांति प्राप्त
हो. (३)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
चन्द्रो मा तत्र नयतु मनश्चन्द्रो दधातु मे. चन्द्राय स्वाहा.. (४)
सगुण ब्रह्म का स्वरूप जानने वाले दीक्षा और तप की सहायता से जहां जाते हैं, चंद्र
मुझे वहां पहुंचाएं. चंद्र देव मुझ में मन धारण करें. यह आहुति चंद्र देव को भलीभांति प्राप्त
हो. (४)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
सोमो मा तत्र नयतु पयः सोमो दधातु मे. सोमाय स्वाहा.. (५)
सगुण ब्रह्म के स्वरूप को जानने वाले दीक्षा और तप की सहायता से जहां जाते हैं,
सोम मुझे वहां ले जाएं. सोम मुझे दूध प्रदान करें. यह आहुति सोम को भलीभांति प्राप्त हो.
ebook converter DEMO Watermarks*
(५)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
इन्द्रो मा तत्र नयतु बलमिन्द्रो दधातु मे. इन्द्राय स्वाहा.. (६)
सगुण ब्रह्म का स्वरूप जानने वाले दीक्षा और तप की सहायता से जहां जाते हैं, इंद्र देव
मुझे वहां ले जाएं. इंद्र देव मुझ में बल धारण करें. यह आहुति इंद्र को भलीभांति प्राप्त हो.
(६)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
आपो मा तत्र नयन्त्वमृतं मोप तिष्ठतु. अद्भ्यः स्वाहा.. (७)
सगुण ब्रह्म का स्वरूप जानने वाले अपनी दीक्षा और तप की सहायता से जहां जाते हैं,
जल देवता मुझे वहां ले जाएं. जल देवता मुझ में अमृत धारण करें. यह आहुति जल देवता
को भलीभांति प्राप्त हो. (७)
यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह.
ब्रह्मा मा तत्र नयतु ब्रह्मा ब्रह्म दधातु मे. ब्रह्मणे स्वाहा.. (८)
सगुण ब्रह्म का स्वरूप जानने वाले दीक्षा और तप की सहायता से जहां पहुंचते हैं,
ब्रह्मा मुझे वहां ले जाएं. ब्रह्मा मुझ में ब्रह्म की उपासना करें. यह आहुति ब्रह्मा को भलीभांति
प्राप्त हो. (८)
सूक्त-४४ देवता—आंजन, वरुण
आयुषो ऽ सि प्रतरणं विप्रं भेषजमुच्यसे.
तदाञ्जन त्वं शंताते शमापो अभयं कृतम्.. (१)
हे आंजन! तुम सौ वर्ष की आयु देने वाले हो. तुम प्रसन्न करने वाली ओषधि कहे जाते
हो, इसलिए हे आंजन! तुम सुख रूप कहे जाते हो. हे जल के लक्षण आंजन! तुम और जल
देवता मुझे सुख प्रदान करें तथा अभय प्रदान करें. (१)
यो हरिमा जायान्यो ऽ ङ्गभेदो विसल्पकः.
सर्वं ते यक्ष्ममङ्गेभ्यो बहिर्निर्हन्त्वाञ्जनम्.. (२)
हल्दी के समान पीले रंग का जो पांडु रोग कठिनता से चिकित्सा करने योग्य है, वह
अंगों को भिन्न करता है और अनेक प्रकार के घाव कर देता है. यह आंजन के अंगों से सभी
रोगों को बाहर निकाल कर नष्ट करे. (२)
आञ्जनं पृथिव्यां जातं भद्रं पुरुषजीवनम्.
ebook converter DEMO Watermarks*
कृणोत्वप्रमायुकं रथजूतिमनागसम्.. (३)
पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ आंजन कल्याण करने वाला तथा पुरुषों को जीवित करने वाला
है. यह आंजन हमें मरण रहित, रथ के समान तीव्र गति वाला तथा पाप रहित करे. (३)
प्राण प्राणं त्रायस्वासो असवे मृड. निर्ऋते निर्ऋत्या नः पाशेभ्यो मुञ्च..
(४)
हे प्राण रूप आंजन! तुम मेरे प्राण की रक्षा करो तथा अकाल में नष्ट न होने वाला
बनाओ. हे प्राणरूप आंजन! तुम प्राणों को सुखी बनाओ. हे निर्ऋति रूप आंजन! हमें
निर्ऋति के फंदों से छुड़ाओ. (४)
सिन्धोगर्भो ऽ सि विद्युतां पुष्पम्.
वातः प्राणः सूर्यश्चक्षुर्दिवस्पयः.. (५)
हे आंजन! तुम सागर के गर्भ और बिजली के फूल हो. तुम वायु के प्राण, सूर्य के नेत्र
और आकाश के जल हो. (५)
देवाञ्जन त्रैककुद परि मा पाहि विश्वतः.
न त्वा तरन्त्योषधयो बाह्याः पर्वतीया उत.. (६)
हे त्रिककुद पर्वत पर उत्पन्न एवं देवों के द्वारा अपनी रक्षा के लिए धारण किए जाते हुए
आंजन! सभी ओर से हमारी रक्षा करो. पर्वत से अधिक ऊंचे स्थान पर उत्पन्न ओषधियां
अर्थात् जड़ीबूटियां तुम्हारे प्रभाव को नहीं लांघ सकतीं. (६)
वी ३ दं मध्यमवास्पद् रक्षोहामीवचातनः.
अमीवाः सर्वाश्चातयन् नाशयदभिभा इतः.. (७)
राक्षसों का विनाश करने वाला तथा रोगों को नष्ट करने वाला यह आंजन सभी रोगों का
विनाश करता हुआ तथा सभी रोगों को पराजित करता हुआ प्रसिद्ध हो. (७)
बह्वी ३ दं राजन् वरुणानृतमाह पूरुषः.
तस्मात् सहस्रवीर्य मुञ्च नः पर्यंहसः.. (८)
हे राजा वरुण! यह मनुष्य सवेरे से शाम तक अनेक प्रकार का असत्य भाषण करता है.
इस के असत्य भाषण को क्षमा करो. हे हजारों प्रकार की शक्ति वाले आंजन! इस असत्य
भाषण रूप बाण से हमें सभी ओर से छुड़ाओ. (८)
यदापो अघ्न्या इति वरुणेति यदूचिम.
तस्मात् सहस्रवीर्य मुञ्च नः पर्यंहसः.. (९)
ebook converter DEMO Watermarks*
हे वरुण! हम ने जो कहा था, तुम जल के स्वामी होने के कारण उसे जानते हो. हे
गायो! तुम मेरे चित्त को जानती हो. हे वरुण! मैं ने जो कहा है, उसे तुम जानते हो. हे हजार
गुणी शक्ति वाले आंजन! हमें उस पाप से मुक्ति दिलाओ. (९)
मित्रश्च त्वा वरुणश्चानुप्रेयतुराञ्जन.
तौ त्वानुगत्य दूरं भोगाय पुनरोहतुः.. (१०)
हे आंजन! मित्र देव और वरुण देव तुम्हारे पीछेपीछे भूमि पर पहुंचे तथा बाद में स्वर्ग
को गए. तुम सुख का उपभोग करने के लिए उन्हें लाओ. (१०)
सूक्त-४५ देवता—आंजन
ऋणादृणमिव संनयन् कृत्यां कृत्याकृतो गृहम्.
चक्षुर्मन्त्रस्य दुर्हर्दः पृष्टीरपि शृणाञ्जन.. (१)
हे आंजन! जिस प्रकार ऋण लेने वाला धन ऋण दाता को लौटा देता है, उसी तरह मुझे
पीड़ा पहुंचाने वाली कृत्या नाम की राक्षसी को उसी के घर भेज दो, जिस ने उसे मेरे पास
भेजा है. हे आदित्य के चक्षु आंजन! दुष्ट हृदय वालों के समीपवर्तियों का भी विनाश करो.
(१)
यदस्मासु दुष्षप्न्यं यद् गोषु यच्च नो गृहे.
अनामगस्तं च दुर्हर्दः प्रियः प्रति मुञ्चताम्.. (२)
हमारे पुत्र, पौत्र आदि में जो बुरा स्वप्न है, हमारी गायों से संबंधित जो बुरा स्वप्न है,
हमारे घर में स्थित दास आदि का जो बुरा स्वप्न है, उसे नाम रहित शत्रुओं के लिए छोड़ दो.
(२)
अपामूर्ज ओजसो वावृधानमग्नेर्जातमधि जातवेदसः.
चतुर्वीरं पर्वतीयं यदाञ्जनं दिशः प्रदिशः करदिच्छिवास्ते.. (३)
हे जल के सार, ओज को बढ़ाने वाले तथा जातवेद अग्नि से उत्पन्न तथा त्रिककुद नाम
के पर्वत पर जन्म लेने वाले आंजन! मेरे लिए दिशाओं और प्रदिशाओं को मंगलकारी
बनाओ. (३)
चतुर्वीरं बध्यत आञ्जनं ते सर्वा दिशो अभयास्ते भवन्तु.
ध्रुवस्तिष्ठासि सवितेव चार्य इमा विशो अभि हरन्तु ते बलिम्.. (४)
हे रक्षा रूपी फल की कामना करने वाले पुरुष! तेरे हाथ में चारों दिशाओं में शक्ति का
प्रदर्शन करने वाली आंजन मणि रूपी ओषधि अर्थात् जड़ी बांधी जाती है. इस मणि को
धारण करने से तेरी दिशाएं और प्रदिशाएं भय रहित हो जाएं. हे अधिकार संपन्न आंजन! तुम
ebook converter DEMO Watermarks*
सूर्य के समान चारों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए स्थिर रूप में रहो. ये सभी दिशाएं तुम्हें
बल प्रदान करें. (४)
आङ्क्ष्वैकं मणिमेकं कृणुष्व स्नाह्येकेना पिबैकमेषाम्.
चतुर्वीरं नैर्ऋतेभ्यश्चतुर्भ्यो ग्राह्या बन्धेभ्यः परि पात्वस्मान्.. (५)
हे पुरुष! एक आंजन को अपनी आंख में धारण करो तथा दूसरे आंजन को मणि
बनाओ. एक आंजन से स्नान करो. इस प्रकार पर्वत की तीन चोटियों पर उत्पन्न तीन आंजनों
का उपयोग करो. ये तीनों वहां धारण की जाएं. इस का ज्ञान न कर के इच्छानुसार इन का
प्रयोग करो. चार शक्तियों वाले इस आंजन को ग्रहण करने के योग्य ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी
के साथ निर्ऋति देवता से संबंधित बंधनों से हमारी रक्षा करो. (५)
अग्निर्माग्निनावतु प्राणायापानायुषे वर्चस ओजसे तेजसे स्वस्तये सुभूतये
स्वाहा.. (६)
अग्नि अपने अग्नित्व धर्म के द्वारा मेरी रक्षा करें. अग्नि प्राण की स्थिरता के लिए,
अपान की स्थिरता के लिए, आयु की वृद्धि के लिए, वेद के अध्ययन से उत्पन्न तेज के लिए,
बल के लिए, शरीर की कांति के लिए, कुशल के लिए तथा शोभन संपत्ति के लिए मेरी रक्षा
करें. यह आहुति भलीभांति अग्नि को प्राप्त हो. (६)
इन्द्रो मेन्द्रियेणावतु प्राणायापानायायुषे वर्चस ओजसे तेजसे स्वस्तये
सुभूतये स्वाहा.. (७)
इंद्र अपनी असाधारण शक्ति से मेरी रक्षा करें. इंद्र प्राण की स्थिरता के लिए, अपान की
स्थिरता के लिए, आयु की वृद्धि के लिए, शरीर की कांति के लिए, कुशल के लिए तथा
शोभन संपत्ति के लिए मेरी रक्षा करें. यह आहुति भलीभांति इंद्र को प्राप्त हो. (७)
सोमो मा सौम्येनावतु प्राणायापानायायुषे वर्चस ओजसे तेजसे स्वस्तये
सुभूतये स्वाहा.. (८)
सोम अपनी शक्ति प्राण की स्थिरता के लिए, अपान की स्थिरता के लिए, आयु की
वृद्धि के लिए, शरीर की कांति के लिए, कुशल के लिए तथा शोभन संपत्ति के लिए मेरी रक्षा
करें. यह आहुति सोम को भलीभांति प्राप्त हो. (८)
भगो मा भगेनावतु प्राणायापानायायुषे वर्चस ओजसे तेजसे स्वस्तये
सुभूतये स्वाहा.. (९)
भग देव अपनी शक्ति से प्राण की स्थिरता के लिए, अपान की स्थिरता के लिए, आयु
की वृद्धि के लिए, शरीर की कांति के लिए, कुशल के लिए तथा शोभन संपत्ति के लिए मेरी
ebook converter DEMO Watermarks*