अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
तेन देवा देवतामग्र आयन् तेन रोहान् रुरुहुर्मेध्यासः. (१)
बकरा अग्नि के ताप से उत्पन्न हुआ था. उस ने सभी पशुओं की सृष्टि करने वाले
प्रजापति को सब से पहले देखा. सृष्टि के आदि में इंद्र आदि देव उसी बकरे के कारण देवत्व
को प्राप्त हुए. उसी बकरे को साधन बना कर अन्य ऋषि भी स्वर्ग आदि लोकों में पहुंचे. (१)
क्रमध्वमग्निना नाकमुख्यान् हस्तेषु बिभ्रतः.
दिवस्पृष्ठं स्वर्गत्वा मिश्रा देवेभिराध्वम्.. (२)
हे मनुष्यो! तुम यज्ञ के निमित्त प्रज्वलित अग्नि के द्वारा दुःख रहित स्वर्ग में पहुंचो.
अंतरिक्ष की पीठ के समान स्वर्ग में पहुंच कर तुम देवों के समान ऐश्वर्य प्राप्त करो तथा वहीं
निवास करो. (२)
पृष्ठात् पृथिव्या अहमन्तरिक्षमारुहमन्तरिक्षाद् दिवमारुहम्.
दिवो नाकस्य पृष्ठात् स्व १ ज्योतिरगामहम्.. (३)
मैं पृथ्वि की पीठ अर्थात् भूलोक से अंतरिक्षलोक पर और अंतरिक्ष से स्वर्गलोक पर
चढ़ता हूं. दुःख रहित स्वर्ग की पीठ से मैं सूर्यमंडल में स्थित हिरण्यगर्भ रूपी ज्योति को प्राप्त
करता हूं. (३)
स्व १ र्यन्तो नापेक्षन्त आ द्यां रोहन्ति रोदसी.
यज्ञं ये विश्वतोधारं सुविद्वांसो वितेनिरे.. (४)
यज्ञ के फल से प्राप्त होने वाले स्वर्ग को जाने वाले लोग पुत्र, पशु आदि संबंधी सुख की
इच्छा नहीं करते हैं. जो यजमान विश्व को धारण करने वाले यज्ञ को भलीभांति जानते हुए
उस का विस्तार करते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं. (४)
अग्ने प्रेहि प्रथमो देवतानां चक्षुर्देवानामुत मानुषाणाम्.
इयक्षमाणा भृगुभिः सजोषाः स्वर्येन्तु यजमानाः स्वस्ति.. (५)
हे अग्नि देव! तुम देवों में मुख्य होने के कारण यज्ञ करने योग्य स्थान पर पहुंचो. अग्नि
देव हवि पहुंचाने के कारण इंद्र आदि देवों को नेत्र के समान प्रिय हैं तथा मनुष्यों को यज्ञ के
द्वारा पुण्यलोक का दर्शन कराते हैं. अग्नि के प्रकाश में यज्ञ करने के इच्छुक एवं यज्ञ करने
वाले भृगुवंशी महर्षियों के साथ समान प्रीति वाले बन कर यज्ञ के फल के रूप में स्वर्ग प्राप्त
करें. (५)
अजमनज्मि पयसा घृतेन दिव्यं सुपर्णं पयसं बृहन्तम्.
तेन गेष्म सुकृतस्य लोकं स्वरारोहन्तो अभि नाकमृत्तमम्.. (६)
द्युलोक के योग्य एवं यजमान को स्वर्ग में पहुंचाने वाले बकरे को मैं रसयुक्त घी से
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चुपड़ता हूं. इस प्रकार के बकरे की सहायता से पुण्य के फल के रूप में मिलने वाले
स्वर्गलोक को जाएं तथा दुःख के स्पर्श से शून्य हो कर उत्तम सूर्य ज्योति को प्राप्त करें. (६)
पञ्चौदनं पञ्चभिरङ्गुलिभिर्दर्व्योद्धर पञ्चधैतमोदनम्.
प्राच्यां दिशि शिरो अजस्य धेहि दक्षिणायां दिशि दक्षिणं धेहि पार्श्वम्..
(७)
हे पाचक! पांच भागों में कटे हुए इस बकरे को अपनी पांच उंगलियों की सहायता से
पकड़ी हुई कलछी के सहारे बटलोई से निकाल कर कुशों पर रखो. पांच भागों में विभाजित
इस बकरे के पके हुए सिर को पूर्व दिशा में रखो तथा इस के शरीर के दाएं भाग को दक्षिण
दिशा में स्थापित करो. (७)
प्रतीच्यां दिशि भसदमस्य धेह्युत्तरस्यां दिश्युत्तरं धेहि पार्श्वम्.
ऊर्ध्वायां दिश्य१जस्यानूकं धेहि दिशि ध्रुवायां धेहि पाजस्यमन्तरिक्षे
मध्यतो मध्यमस्य.. (८)
इस बकरे की कमर के पके हुए मांस को पश्चिम दिशा में तथा इस के बाएं भाग के मांस
को उत्तर दिशा में रखो. इस की पीठ के मांस को ऊपर की दिशा में तथा पेट के मांस को नीचे
की दिशा में रखो. इस के शरीर के मध्यवर्ती मांस को आकाश में स्थापित करो. (८)
शृतमजं शृतया प्रोर्णुहि त्वचा सर्वैरङ्गैः सम्भृतं विश्वरूपम्.
स उत् तिष्ठेतो अभि नाकमृत्तमं पद्भिश्चतुर्भिः प्रति तिष्ठ दिक्षु.. (९)
अपने सभी अंगों से पूर्ण बने बकरे को सभी दिशाओं में व्याप्त करो. हे बकरे! तुम इस
लीक से चारों पैरों के द्वारा स्वर्गलोक में चढ़ते हुए चारों दिशाओं को व्याप्त करो. (९)
सूक्त-१५ देवता—दिशाएं
समुत्पतन्तु प्रदिशो नभस्वतीः समभ्राणि वातजूतानि यन्तु.
महऋषभस्य नदतो नभस्वतो वाश्रा आपः पृथिवीं तर्पयन्तु.. (१)
पूर्व आदि दिशाएं वायु एवं मेघों से युक्त हो कर उदय हों. जल से भरे हुए मेघ वायु से
प्रेरित हो कर परस्पर मिल जाएं. सांड के समान गर्जन करते हुए एवं वायु से प्रेरित मेघ द्वारा
बरसाए गए जल धरती को तृप्त करें. (१)
समीक्ष्यन्तु तविषाः सुदानवो ऽ पां रसा ओषधीभिः सचन्ताम्.
वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमिं पृथग् जायन्तामोषधयो विश्वरूपाः.. (२)
महान् एवं शोभन गान वाले मरुद्गण वर्षा के द्वारा हम पर अनुग्रह करें. जलों के रस
धरती में बोए गेहूं, जौ आदि के बीजों से मिल जाएं. वर्षा के जल की धाराएं धरती की पूजा
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करें. वर्षा द्वारा सिंचित भूमि से नाना प्रकार की जौ, गेहूं आदि फसलें जाति भेद से
अलगअलग उत्पन्न हों. (२)
समीक्ष्यस्व गायतो नभांस्यपां वेगासः पृथगुद् विजन्ताम्.
वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमिं पृथग् जायन्तां वीरुधो विश्वरूपाः.. (३)
हे मरुद्गण! तुम स्तुति करते हुए हम लोगों को मेघों के दर्शन कराओ. वेग युक्त जल
धाराएं इधरउधर बहें. वर्षा के जल की धाराएं धरती की पूजा करें. वर्षा द्वारा सिंचित भूमि से
नाना प्रकार की जौ, गेहूं आदि फसलें जाति भेद से अलगअलग उत्पन्न हों. (३)
गणास्त्वोप गायन्तु मारुताः पर्जन्य घोषिणः पृथक्.
सर्गा वर्षस्य वर्षतो वर्षन्तु पृथिवीमनु.. (४)
हे पर्जन्य अर्थात् वर्षा के देव! गर्जन करते हुए मरुतों का समूह तुम्हारी स्तुति करे. वर्षा
के जल की बूंदें अनेक रूप धारण कर के पृथ्वी को गीला करें. (४)
उदीरयत मरुतः समुद्रतस्त्वेषो अर्को नभ उत् पातयाथ.
महर्ऋषभस्य नदतो नभस्वतो वाश्रा आपः पृथिवीं तर्पयन्तु.. (५)
हे मरुतो! समुद्र से वर्षा का जल ऊपर उठाओ. दीप्तिशाली एवं जलयुक्त आकाश
बादल को ऊपर उठाएं. सांड के समान गर्जन करते हुए एवं वायु से प्रेरित मेघ द्वारा बरसाए
गए जल धरती को तृप्त करें. (५)
अभि क्रन्द स्तनयार्दयोदधिं भूमिं पर्जन्य पयसा समङ्धि.
त्वया सृष्टं बहुलमैतु वर्षमाशारैषी कृशगुरेत्वस्तम्.. (६)
हे पर्जन्य! चारों ओर गर्जन करो एवं मेघों में प्रवेश कर के शब्द करो. तुम बरसे हुए जल
से धरती को सींचो. तुम्हारे द्वारा प्रेरित गाढ़ा एवं वर्षा करने में समर्थ बादल आए. जल की
धाराओं का इच्छुक एवं कृश किरणों वाला सूर्य छिप जाए. (६)
सं वो ऽ वन्तु सुदानव उत्सा अजगरा उत.
मरुद्भिः प्रच्युता मेघा वर्षन्तु पृथिवीमनु.. (७)
हे मनुष्यो! शोभन दान वाले मरुत् तुम्हें तृप्त करें. अजगर से भी मोटी जल धाराएं
उत्पन्न हों. वायु के द्वारा प्रेरित मेघ पृथ्वी पर वर्षा करें. (७)
आशामाशां वि द्योततां वाता वान्तु दिशोदिशः.
मरुद्भिः प्रच्युता मेघाः सं यन्तु पृथिवीमनु.. (८)
प्रत्येक दिशा में बिजली चमके और बादलों को लाने वाली हवाएं चलें. वायु के द्वारा
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प्रेरित मेघ पृथ्वी पर वर्षा करें. (८)
आपो विद्युदभ्रं वर्षं सं वो ऽ वन्तु सुदानव उत्सा अजगरा उत.
मरुद्भिः प्रच्युता मेघाः प्रावन्तु पृथिवीमनु.. (९)
हे शोभन दान वाले मरुतो! तुम से संबंधित मेघों का जल, बिजली, जल से भरे हुए मेघ
तथा अजगर के समान मोटी जल धाराएं पृथ्वी पर प्रवाहित हों. (९)
अपामग्निस्तनूभिः संविदानो य ओषधीनामधिपा बभूव.
स नो वर्षं वनुतां जातवेदाः प्राणं प्रजाभ्यो अमृतं दिवस्परि.. (१०)
बादलों में स्थित जलों के शरीर से मिली हुई बिजली रूपी अग्नि पैदा होने वाली
जड़ीबूटियों की स्वामिनी है. उत्पन्न होने वाले प्राणियों के ज्ञाता अग्नि देव प्रजाओं को जीवन
देने वाली तथा स्वर्ग का अमृत प्राप्त कराने वाली वर्षा हमें प्रदान करें. (१०)
प्रजापतिः सलिलादा समुद्रादाप ईरयन्नुदधिमर्दयाति.
प्र प्यायतां वृष्णो अश्वस्य रेतो ऽ वर्डैतेन स्तनयित्नुनेहि.. (११)
प्रजाओं के पालक सूर्य व्यापक सागर से जलों को वर्षा के निमित्त प्रेरित करते हुए
पीड़ित करें. व्यापक एवं घोड़े के समान वेग वाले मेघ का वर्षा जल रूपी वीर्य वृद्धि को प्राप्त
हो. हे पर्जन्य! तुम इस शक्तिशाली मेघ के द्वारा हमारे सामने आओ. (११)
अपो निष्षिञ्चन्नसुरः पिता नः श्वसन्तु गर्गरा अपां वरुणाव नीचीरपः सृज.
वदन्तु पृश्निबाहवो मण्डूका इरिणानु.. (१२)
मेघों के जन्मदाता एवं वर्षा के जल के द्वारा सब के रक्षक सूर्य हमारे पिता हैं. वे वर्षा
के जलों को नीचे गिराएं. इस के पश्चात गड़गड़ शब्द करती हुई जल धाराएं बहें. हे वरुण!
तुम भी पृथ्वी को सींचने वाले जल मेघों से नीचे गिराओ. श्वेत भुजाओं वाले मेढक तृण रहित
भूमि पर चेतना प्राप्त कर के शब्द करें. (१२)
संवत्सरं शशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः.
वाचं पर्जन्यजिन्वितां प्र मण्डूका अवादिषुः.. (१३)
एक वर्ष तक सोए रहने वाले मेढक वर्ष के अंत में वर्षा के जल से जागृत हो कर
व्रतचारी ब्राह्मणों के समान पर्जन्य को प्रसन्न करने वाली वाणी बोलते हैं. (१३)
उपप्रवद मण्डूकि वर्षमा वद तादुरि.
मध्ये हृदस्य प्लवस्व विगृह्य चतुरः पदः.. (१४)
हे मेढकी! तू प्रसन्नता को प्राप्त कर के टर्रटर्र शब्द कर. हे दर्दुरी! तू ऐसा शब्द कर कि
तेरे घोष से वर्षा होने लगे. वर्षा के जल से भरे हुए सरोवर के मध्य में तू अपने चारों पैरों को
उछलने के अनुसार फैला कर छलांग लगा. (१४)
खण्वखा ३ इ खैमखा ३ इ मध्ये तदुरि.
वर्ष वनुध्वं पितरो मरुतां मन इच्छत.. (१५)
हे खंडख, हे खेमख और हे तादुरी नामक मेढकियो! तुम तालाब के मध्य में रह कर
अपने घोष से हमें वर्षा प्रदान करो. हे हमारे पालनकर्ता मंडूको! तुम अपने घोष से वायु का
मन वश में कर लो. (१५)
महान्तं कोशमुदचाभि षिञ्च सविद्युतं भवतु वातु वातः.
तन्वतां यज्ञं बहुधा विसृष्टा आनन्दिनीरोषधयो भवन्तु.. (१६)
हे पर्जन्य! तुम सागर से विशाल मेघ का उद्धार करो तथा मेघ की वर्षा से सारी धरती
को सींचो. तुम उस मेघ को बिजली वाला बनाओ. हवा वर्षा के अनुकूल चले तथा हवा वर्षा
के अनुकूल हो. वर्षा के द्वारा अनेक प्रकार से प्रेरित जल यज्ञ का विस्तार करे. जौ, गेहूं आदि
फसलें वर्षा के जल से हर्षित हों. (१६)
सूक्त-१६ देवता—वरुण
बृहन्नेषामधिष्ठाता अन्तिकादिव पश्यति.
यस्तायन्मन्यते चरन्त्सर्वं देवा इदं विदुः.. (१)
महान वरुण इन शत्रुओं का नियंत्रण करते हुए इन के सभी अन्यायी जनों को समीप से
देखते हैं. वरुण जगत् की स्थावर एवं जंगम सभी वस्तुओं को जानते हैं. अतींद्रिय ज्ञान के
कारण देवगण स्थिर और नश्वर सभी तत्त्वों को जानते हैं. (१)
यस्तिष्ठति चरति यश्च वञ्चति यो निलायं चरति यः प्रतङ्कम्.
द्वौ संनिषद्य यन्मन्त्रयेते राजा तद् वेद वरुणस्तृतीयः.. (२)
जो शत्रु सामने खड़ा होता है, जो चलता है, जो कुटिलतापूर्वक ठगता है, जो छिप कर
प्रतिकूल आचरण करता है तथा जो शत्रु कष्टमय जीवन पा कर विरोध करता है, महान वरुण
इन सभी शत्रुओं को समय से देखते हैं. दो व्यक्ति एकांत में बैठ कर जो गुप्त मंत्रणा करते हैं,
उसे राजा वरुण तीसरे के रूप में जानते हैं. (२)
उतेयं भूमिर्ररुणस्य राज्ञ उतासौ द्यौर्बृहती दूरेअन्ता.
उतो समुद्रौ वरुणस्य कुक्षी उतास्मिन्नल्प उदके निलीनः.. (३)
यह भूमि भी दुष्टों का निग्रह करने वाले स्वामी वरुण के वश में रहती है. समीप और दूर
तक फैली हुई धरती भी उन्हीं के अधिकार में है. पूर्व और पश्चिम में वर्तमान सागर वरुण की
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कोख में है. इस प्रकार स्वल्प जल में भी सारा जगत् छिपा हुआ है. (३)
उत यो द्यामतिसर्पात् परस्तान्न स मुच्यातै वरुणस्य राज्ञः.
दिव स्पशः प्र चरन्तीदमस्य सहस्राक्षा अति पश्यन्ति भूमिम्.. (४)
जो अनर्थकारी शत्रु पुण्य कर्मों से प्राप्त होने वाले स्वर्ग का अतिक्रमण कर के कुमार्ग
पर चलता है, वह राजा वरुण के पाशों से न छूटे. स्वर्गलोक से निकलने वाले वरुण के
गुप्तचर पृथ्वी पर घूमते हैं. वे हजार आंखों वाले होने के कारण भूलोक के सारे वृत्तांत को
देखते हैं. (४)
सर्वं तद् राजा वरुणो वि चष्टे यदन्तरा रोदसी यत् परस्तात्.
संख्याता अस्य निमिषो जनानामक्षानिव श्वघ्नी नि मिनोति तानि.. (५)
धरती और आकाश के मध्य में तथा राजा वरुण के सामने जो प्राणी रहते हैं, उन्हें वे
विशेष रूप से देखते हैं. उन के भलेबुरे कर्मों की गणना करने वाले वरुण उन के कर्मों के
अनुसार ऐसा दंड निश्चित करते हैं, जिस प्रकार जुआरी अपनी विजय के लिए पासे फेंकता
है. (५)
ये ते पाशा वरुण सप्तसप्त त्रेधा तिष्ठन्ति विषिता रुशन्तः.
छिनन्तु सर्वे अनृतं वदन्तं यः सत्यवाद्यति तं सृजन्तु.. (६)
हे वरुण! तुम्हारे उत्तम, मध्यम एवं अधम श्रेणी के सातसात पापियों के निग्रह के
निमित्त जहांत्हां बंधे हुए हैं. वे पाश पापियों की हिंसा करते हुए स्थित हैं, वे पाश असत्य
भाषण करने वाले हमारे शत्रु को काट दें और जो सत्यवादी है, उसे छोड़ दें. (६)
शतेन पाशैरभि धेहि वरुणैनं मा ते मोच्यनृतवाङ् नृचक्षः.
आस्तां जाल्म उदरं श्रंशयित्वा कोश इवाबन्धः परिकृत्यमानः.. (७)
हे वरुण! अपने सौ पाशों से इस असत्यवादी को बांधो. हे मनुष्यों के भलेबुरे कर्मों को
देखने वाले! असत्य बोलने वाला तुम से छूटने न पाए. बिना विचारे काम करने वाला अपने
उदर को जलोदर रोग से दूषित पा कर तलवार की म्यान के समान झूलता रहे. (७)
यः समाम्यो ३ वरुणो यो व्योम्यो ३ यः संदेश्यो ३ वरुणो यो विदेश्यः.
यो दैवो वरुणो यश्च मानुषः.. (८)
वरुण के सामान्य पाश समान रूप से एवं विशेष पाश विधि रूप से मनुष्यों को रोगी
बनाते हैं. वरुण का जो पाश समान देश में तथा जो विदेश में बांधने वाला है, जो पाश देवों से
संबंधित और जो मनुष्यों से संबंधित है, मैं उन सब पाशों से तुझे बांधता हूं. (८)
तैस्त्वा सर्वैरभि ष्यामि पाशैरसावामुष्यायणामुष्याः पुत्र.
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सूक्त-१७ देवता—अपामार्ग, वनस्पति
तानु ते सर्वाननुसंदिशामि.. (९)
हे अमुक शत्रु, अमुक गोत्र वाले एवं अमुक के पुत्र, मैं तुझे वरुण के इन सभी पाशों से
बांधता हूं. (९)
सूक्त-१७ देवता—अपामार्ग, वनस्पति
ईशानां त्वा भेषजानामुज्जेष आरभामहे.
चक्रे सहस्रवीर्य सर्वस्मा ओषधे त्वा.. (१)
हे सहदेवी! तू जड़ीबूटियों की स्वामिनी है. मैं शत्रु द्वारा किए गए अभिचार के दोष को
शांत करने के लिए तेरा स्पर्श करता हूं. मैं अभिचार से उत्पन्न दोषों को दूर करने के लिए तुझे
सामर्थ्य वाली बनाता हूं. (१)
सत्यजितं शपथयावनीं सहमानां पुनःसराम्.
सर्वाः समह्व्योषधीरिरतो नः पारयादिति.. (२)
वास्तव में अभिचार आदि दोषों को दूर करने वाली सत्यजित, दूसरे के आक्रोश को
मिटाने वाली शपथ योगिनी, सब को पराजित करने वाली सहमाना, बारबार व्याधि का
विनाश करने वाली पुनःसरा नामक जड़ीबूटी को अन्य जड़ीबूटियां अभिचार दोष का नाश
करने के लिए प्राप्त होती हैं. (२)
या शशाप शपनेन याघं मूरमादधे.
या रसस्य हरणाय जातमारेभे तोकमत्तु सा.. (३)
जिस पिशाची ने आक्रोश में भर कर हमें शाप दिया है, जिस ने मूर्च्छा प्रदान करने वाला
पाप हमारी ओर भेजा है और जो शरीर के रक्त आदि का हरण करने के लिए मेरे पुत्र आदि
का आलिंगन करती है, वह मेरे ऊपर अभिचार करने वाले शत्रु के पुत्र को खा जाए. (३)
यां ते चक्रुराम पात्रे यां चक्रुर्नीललोहिते.
आमे मांसे कृत्यां यां चक्रुस्तया कृत्याकृतो जहि.. (४)
हे कृत्या नाम की राक्षसी! अभिचार करने वालों ने तुझे मिट्टी के बिना पके पात्र में
धुआं उगलती हुई नीली और लाल ज्वालाओं वाली अग्नियों में तथा बिना पके मांस में
अभिमंत्रित किया है, तू उन का विनाश कर. (४)
दौष्वप्न्यं दौर्जीवित्यं रक्षो अभ्वमराय्यः.
दुर्णीम्नीः सर्वा दुर्वाचस्ता अस्मन्नाशयामसि.. (५)
हम अभिचार द्वारा सताए हुए इस पुरुष से बुरे स्वप्न संबंधी भय को, दुष्ट जीवन वाले
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लोगों संबंधी भय को, राक्षसों संबंधी भय को और महान अभिचार से उत्पन्न भय के कारण
को नष्ट करते हैं. दरिद्रता के कारण पाप लक्ष्मियां, छेदिका, भेदिका आदि दुष्ट नामों वाली जो
पिशाचियां हैं, मैं उन्हें भी इस के शरीर से दूर भगाता हूं. (५)
क्षुधामारं तृष्णामारमगोतामनपत्यताम्.
अपामार्ग त्वया वयं सर्वं तदप मृज्महे.. (६)
हे अपामार्ग! हम तेरी सहायता से भूख की पीड़ा से पुरुष को मारने वाले एवं प्यास की
अधिकता से पुरुष की मृत्यु करने वाले अभिचार का विनाश करते हैं. हम तेरी सहायता से
गायों के अभाव को और संतानहीनता को भी समाप्त करते हैं. (६)
तृष्णामारं क्षुधामारमथो अक्षपराजयम्.
अपामार्ग त्वया वयं सर्वं तदप मृज्महे.. (७)
हे अपामार्ग! हम तेरी सहायता से प्यास की पीड़ा से पुरुष को मारने वाले, भूख की
पीड़ा से पुरुष को मारने वाले अभिचार एवं जुए में पराजय को दूर भगाना चाहते हैं. (७)
अपामार्ग ओषधीनां सर्वासानेक इद वशी.
तेन ते मृज्म आस्थितमथ त्वमगदश्वर.. (८)
हे अभिचार के दोष से गृहीत पुरुष! एकमात्र अपामार्ग ही सब जड़ीबूटियों को वश में
करने वाला है. हम अपामार्ग की सहायता से तुझ में अभिचार द्वारा उत्पन्न रोग आदि को दूर
करते हैं. इस के पश्चात तू रोग रहित हो कर विचरण कर. (८)
सूक्त-१८ देवता—अपामार्ग, वनस्पति
समं ज्योतिः सूर्येणाह्ना रात्री समावती.
कृणोमि सत्यमूतये ऽ रसाः सन्तु कृत्वरीः.. (१)
सूर्य से उस का ज्योतिर्मंडल कभी अलग नहीं होता. रात्रि दिन के समान विस्तार वाली
होती है, उसी प्रकार मैं यथार्थ कर्म करता हूं. मैं अभिचार से पीड़ित पुरुष की रक्षा के लिए
विनाश करने वाली कृत्याओं को कार्य करने में असमर्थ बनाता हूं. (१)
यो देवाः कृत्यां कृत्वा हरादविदुषो गृहम्.
वत्सो धारुरिव मातरं तं प्रत्यगुप पद्यताम्.. (२)
हे देवो! जो मनुष्य मंत्रों और ओषधि के द्वारा पीड़ा पहुंचाने वाली कृत्या के निर्माण हेतु
उस के घर जाता है. जिस प्रकार बछड़ा गाय के पीछेपीछे जाता है, उसी प्रकार वह कृत्या
अभिचार करने वाले पुरुष के समीप जाए. (२)
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अमा कृत्वा पाप्मानं यस्तेनान्यं जिघांसति.
अश्मानस्तस्यां दग्धायां बहुलाः फट् करिक्रति.. (३)
जो शत्रु अनुकूल के समान साथ रह कर कृत्या निर्माण रूपी पाप करता है और उस के
द्वारा उस मनुष्य को मारना चाहता है, जिस के प्रति उस का द्वेष होता है. उस कृत्या के
प्रतिकार के द्वारा प्रभावहीन होने पर मेरे मंत्रों के सामर्थ्य से उत्पन्न पाषाण कृत्या बनाने वाले
शत्रु की हिंसा करें. (३)
सहस्रधामन् विशिखान् विग्रीवाञ्छायया त्वम्.
प्रति स्म चकृषे कृत्यां प्रियां प्रियावते हर.. (४)
हे हजार स्थानों में होने वाली सहदेवी! तू हमारे शत्रुओं के केशों एवं ग्रीवा को काट कर
उन का विनाश कर. तू हमारे शत्रुओं का हित करने वाली कृत्या को उन्हीं की ओर लौटा दे,
जिन्होंने उस का निर्माण किया है. (४)
अनयाहमोषध्या सर्वाः कृत्या अदूदुषम्.
यां क्षेत्रे चक्रुर्यां गोषु यां वा ते पुरुषेषु.. (५)
इस सहदेवी नाम की जड़ीबूटी के द्वारा मैं ने सभी कृत्याओं को दूषित एवं प्रभावहीन
बना दिया है. मेरे शत्रुओं ने जिस कृत्या को मेरे खेतों में, मेरी गोशाला में और वायु संचार
वाले स्थान में गाड़ दिया है, उन सभी कृत्याओं को मैं प्रभावहीन कर चुका हूं. (५)
यश्चकार न शशाक कर्तुं शश्रे पादमङ्गुरिम्.
चकार भद्रमस्मभ्यमात्मने तपनं तु सः.. (६)
जिस शत्रु ने कृत्या का निर्माण किया है तथा उस के द्वारा मेरे एक पैर और एक उंगली
को नष्ट करना चाहता है, वह मेरी हिंसा न कर सके. उस के द्वारा किया गया अभिचार कर्म
मेरे मंत्र और जड़ीबूटी के प्रभाव से मेरा मंगल करे तथा कृत्या निर्माण करने वाले को जला
दे. (६)
अपामार्गो ऽ प मार्ष्टु क्षेत्रियं शपथश्च यः.
अपाह यातुधानीरप सर्वा अराय्यः.. (७)
अपामार्ग जड़ी मातापिता से होने वाले संक्रामक रोग के रूप में हम को प्राप्त क्षय,
कुष्ठ, अपस्मार आदि को दूर करे. यह हमारे शत्रुओं द्वारा दिए हुए पापों को, पिशाचियों को
और दरिद्रता को भी दूर करे. (७)
अपमृज्य यातुधानानप सर्वा अराय्यः.
अपामार्ग त्वया वयं सर्वं मृज्महे.. (८)
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हे अपामार्ग! तुम सभी यक्षों, राक्षसों और दरिद्रता उत्पन्न करने वाली पिशाचियों को
मुझ से दूर करो. हम यक्ष, राक्षस एवं पिशाचियों द्वारा किए हुए सभी दुःखों को तुम्हारे द्वारा
प्रभावहीन करते हैं. (८)
सूक्त-१९ देवता—अपामार्ग वनस्पति
उतो अस्यबन्धुकृदुतो असि नु जामिकृत्.
उतो कृत्याकृतः प्रजां नडमिवा च्छिन्धि वार्षिकम्.. (१)
हे अपामार्ग अथवा सहदेवी! तू शत्रुओं और विरोधियों का विनाश करने में समर्थ है. तू
कृत्या का प्रयोग करने वाले के पुत्र, पौत्र आदि को वर्षा ऋतु में उत्पन्न होने वाली नड नाम
की घास के समान काट कर नष्ट कर दे. (१)
ब्राह्मणेन पर्युक्तासि कण्वेन नार्षदेन.
सेनेवैषि त्विषीमती न तत्र भयमस्ति यत्र प्राप्नोष्याषधे.. (२)
हे सहदेवी अथवा अपामार्ग निषाद के पुत्र कर्ण नामक मंत्रद्रष्टा ब्राह्मण ने तेरा प्रयोग
किया है. यजमान की रक्षा के लिए तू सेना के समान गमन करती है. तू जिस देश में प्राप्त
होती है, वहां अभिचार संबंधी भय नहीं रहता. (२)
अग्रमेष्योषधीनां ज्योतिषेवाभिदीपयन्.
उत त्रातासि पाकस्याथो हन्तासि रक्षसः.. (३)
हे सहदेवी अथवा अपामार्ग! तू सभी जड़ीबूटियों में उसी प्रकार श्रेष्ठ है, जिस प्रकार
प्रकाश करने वालों में सूर्य! तू दुर्बल की रक्षक और उसे बाधा पहुंचाने वाले राक्षस की
विनाशक है. (३)
यददो देवा असुरांस्त्वयाग्रे निरकुर्वत.
ततस्त्वमध्योषधे ऽ पामार्गो अजायथाः.. (४)
हे ओषधि! प्राचीन काल में इंद्र आदि देवों ने तेरे द्वारा ही राक्षसों को पराजित किया
था. इसी कारण तू ने अपामार्ग नाम प्राप्त किया था. (४)
विभिन्दती शतशाखा विभिन्दम् नाम ते पिता.
प्रत्यग् वि भिन्धि त्वं तं यो अस्मां अभिदासति.. (५)
हे अपामार्ग! तू सैकड़ों शाखाओं वाली हो कर विभिंदती नाम प्राप्त करती है. तूझे
उत्पन्न करने वाला विभिंद कहलाता है. जो शत्रु हमारा विनाश करना चाहता है, तू उस की
विरोधी बन कर उस का विनाश कर. (५)
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असद् भूम्याः समभवत् तद् यामेति महद् व्यचः.
तद् वै ततो विधूपायत् प्रत्यक् कर्तारमृच्छतु.. (६)
हे ओषधि! तेरे पास से निकल कर महान् तेज जिस भूमि तक जाता है, वहां गाड़ी गई
कृत्या किसी को हानि नहीं पहुंचा सकती. तू अपने स्थान से निकल कर विशेष रूप से
प्रज्वलित होती हुई कृत्या के निर्माण करने वाले को पीड़ा पहुंचा. (६)
प्रत्यङ् हि संबभूविथ प्रतीचीनफलस्त्वम्.
सर्वान् मच्छपथाँ अधि वरीयो यावया वधम्.. (७)
हे आत्माभिमुख फल देने वाले अपामार्ग! तू शत्रु के विनाश को मुझ से दूर कर के उसी
के पास भेज दे. शत्रु द्वारा मेरे प्रति किए गए हिंसा साधनों और कृत्या को तू मुझ से दूर कर.
(७)
शतेन मा परि पाहि सहस्रेणाभि रक्ष मा.
इन्द्रस्ते वीरुधां पत उग्र ओज्मानमा दधत्.. (८)
हे सहदेवी अथवा अपामार्ग! तू सैकड़ों और हजारों उपायों से मेरी रक्षा कर और मुझे
कृत्या के दोष से छुड़ा. हे लतारूपी जड़ीबूटियों की स्वामिनी! महा तेजस्वी इंद्र तेरा तेज मुझ
में स्थापित करें. (८)
सूक्त-२० देवता—जड़ीबूटी
आ पश्यति प्रति पश्यति परा पश्यति पश्यति.
दिवमन्तरिक्षमाद् भूमिं सर्वं तद् देवि पश्यति.. (१)
हे सदापुष्पा नाम की जड़ीबूटी! यह पुरुष तेरी मणि को धारण करने वाला होने से आने
वाले भय के कारण को, वर्तमान भय के कारण को तथा भविष्य काल में होने वाले भय के
कारण को देखता है और दूर करना जानता है. यह स्वर्ग, अंतरिक्ष एवं पृथ्वी पर निवास करने
वाले सभी प्राणियों को मणि धारण के कारण देखता है. (१)
तिस्रो दिवस्तिस्रः पृथिवीः षट् चेमाः प्रदिशः पृथक्.
त्वयाहं सर्वा भूतानि पश्यानि देव्योषधे.. (२)
हे सदापुष्पा जड़ीबूटी! तेरी मणि को धारण करने के प्रभाव से मैं तीन स्वर्गों, तीन
पृथ्वियों, छह प्रदिशाओं, अर्थात् पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे तथा इन सब में रहने
वाले सभी प्राणियों को जानता हूं. (२)
दिव्यस्य सुपर्णस्य तस्य हासि कनीनिका.
सा भूमिमा रुरोहिथ वह्यं श्रान्ता वधूरिव.. (३)
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हे सदापुष्पा जड़ीबूटी! तू दिव्य गरुड़ की कनीनिका अर्थात् आंख की पुतली के समान
है. तू गरुड़ के नेत्र से निकल कर धरती पर उसी प्रकार उगी है, जिस प्रकार थकान के कारण
चलने में असमर्थ वधू सवारी पर बैठ जाती है. (३)
तां मे सहस्राक्षो देवो दक्षिणे हस्त आ दधत्.
तयाहं सर्वं पश्यामि यश्च शूद्र उतार्थः.. (४)
हजार आंखों वाले इंद्र देव ने उस सदा पुष्पा को मेरे दाहिने हाथ में धारण कराया है. तेरे
प्रभाव से मैं सब को देखता और वश में करता हूं, चाहे वह शूद्र हो अथवा आर्य अर्थात्
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य. (४)
आविष्कृणुष्व रूपाणि मात्मानमप गूहथाः.
अथो सहस्रचक्षो त्वं प्रति पश्याः किमीदिनः.. (५)
हे ओषधि! तू अपने राक्षस, पिशाच आदि को दूर करने वाले रूप को प्रकाशित कर
तथा अपने स्वरूप को मत छिपा. हे जड़ीबूटी! हमारी रक्षा के लिए उन राक्षसों की प्रतीक्षा
कर जो छिपे हुए रूप से यह खोजते हुए घूमते हैं कि यह क्या है, यह क्या है? (५)
दर्शय मा यातुधानान् दर्शय यातुधान्यः.
पिशाचान्त्सर्वान् दर्शयेति त्वा रभ ओषधे.. (६)
हे सदापुष्पा जड़ी! मुझे राक्षसों एवं राक्षसियों के दर्शन कराओ. वे गूढ़ रूप से मुझे
बाधा न पहुंचा सकें. मैं तुम्हें इसीलिए धारण करता हूं कि तुम मुझे सभी पिशाचों को
दिखाओ. (६)
कश्यपस्य चक्षुरसि शुन्याश्च चतुरक्ष्याः.
वीध्रे सूर्यमिव सर्पन्तं मा पिशाचं तिरस्करः.. (७)
हे सदापुष्पा जड़ी! तू महर्षि कश्यप एवं चार आंखों वाली देवशुनी सरमा की आंख है
अर्थात् उन की आंख के समान आकृति वाली है. अंतरिक्ष में सूर्य जिस प्रकार विचरण करते
हैं, उसी प्रकार चलतेफिरते पिशाचों को तू मुझ से मत छिपा. (७)
उदग्रभं परिपाणाद् यातुधानं किमीदिनम्.
तेनाहं सर्वं पश्याम्युत शूद्रमुतार्यम्.. (८)
खोज करने के लिए घूमते हुए राक्षसों को मैं ने अपनी रक्षा की दृष्टि से वश में कर लिया
है. उस पिशाच की सहायता से मैं शूद्र एवं ब्राह्मण जाति वाले ग्रह को देखता हूं. (८)
यो अन्तरिक्षेण पतति दिवं यश्चातिसर्पति.
भूमिं यो मन्यते नाथं तं पिशाचं प्र दर्शय.. (९)
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जो पिशाच अंतरिक्ष से गिरता है, जो स्वर्गलोक से ऊपर गमन करता है और धरती को
अपने अधिकार में मानता है, उस पिशाच को भी मुझे दिखा, जिस से मैं उस का निराकरण
कर सकूं. (९)
सूक्त-२१ देवता—गाएं
आ गावो अग्मन्नुत भद्रमक्रन्त्सीदन्तु गोष्ठे रणयन्त्वस्मे.
प्रजा ऽ वती: पुरुरूपा इह स्युरिन्द्राय पूर्वीरुषसो दुहाना:.. (१)
गाएं हमारी ओर आएं, हमारा कल्याण करें, हमारी गोशाला में बैठें तथा हमें दूध आदि
दे कर प्रसन्न करें. श्वेत, कृष्ण आदि अनेक वर्णों की गाएं अधिक संतान वाली हो कर यजमान
के घर में समृद्ध बनें तथा अधिक समय तक इंद्र के निमित्त दूध देती रहें. (१)
इन्द्रो यज्वने गृणते च शिक्षत उपेद् ददाति न स्वं मुषायति.
भूयोभूयो रयिमिदस्य वर्धयन्नभिन्ने खिल्ये नि दधाति देवयुम्.. (२)
इंद्र स्तुति करने वाले यजमानों को गाय प्राप्त करने का उपाय बताते हैं तथा उन्हें बहुत
सी गाएं प्रदान करते हैं. इंद्र उस यजमान के धन का अपहरण नहीं करते. वे उस स्तोता और
यजमान के धन को अधिक मात्रा में बढ़ाते हुए उसे स्वर्ग में स्थान दिलाते हैं, जिस में दुःख
नहीं होता. (२)
न ता नशन्ति न दभाति तस्करो नासाममित्रो व्यथिरा दधर्षति.
देवांश्च याभिर्यजते ददाति च ज्योगित् ताभि: सचते गोपत्ति: सह.. (३)
इंद्र के द्वारा दी गई गाएं नष्ट न हों तथा उन्हें चोर न चुरा सकें. शत्रुओं के आयुध उन
गायों को पीड़ा न पहुंचाएं. जिन गायों के दूध और घी के द्वारा यज्ञ किया जाता है और जिन्हें
यज्ञ की दक्षिणा के रूप में दिया जाता है, उन गायों के साथ यजमान अधिक समय तक रहे,
उन से वियुक्त न हो. (३)
न ता अर्वा रेणुककाटो ऽ श्रुते न संस्कृतत्रमुप यन्ति ता अभि.
उरुगायमभयं तस्य ता अनु गावो मर्तस्य वि चरन्ति यज्वन:.. (४)
हिंसक एवं कमर के टुकड़े करने वाले बाघ आदि दुष्ट पशु उन गायों तक न पहुंचें. वे
गाएं मांस पकाने वाले के समीप न जाएं एवं यजमान के भय रहित स्थान को प्राप्त हों. (४)
गावो भगो गाव इन्द्रो म इच्छाद् गाव: सोमस्य प्रथमस्य भक्ष:.
इमा या गाव: स जनास इन्द्र इच्छामि हृदा मनसा चिदिन्द्रम्.. (५)
गाएं ही पुरुष का धन और सौभाग्य हैं. इंद्र ऐसी इच्छा करें, जिस से मुझे गाएं मिल
सकें. छाना गया सोमरस गायों के दूध और दही में ही सिद्ध किया जाता है. हे मनुष्यो! ये जो
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गाएं दिखाई देती हैं, वे ही इंद्र हैं. इस हेतु मैं गायों के दूध, घी आदि हवि के द्वारा हृदय और
ज्ञान से इंद्र का यज्ञ करना चाहता हूं. (५)
यूयं गावो मेदयथा कृशं चिदश्रीरं चित् कृणुथा सुप्रतीकम्.
भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो बृहद् वो वय उच्यते सभासु.. (६)
हे गायो! तुम अपने दूध, घी आदि से दुर्बल मनुष्य को भी मोटाताजा बनाओ तथा
अशोभन अंग वाले को शोभन अवयवों वाला बनाओ. हे कल्याणी वाणी वाली गाय! हमारे
घर को अलंकृत बनाओ. तुम्हारे दूध, दही, घी आदि से बना भोजन सभाओं में अधिक प्रशंसा
पाता है. (६)
प्रजावतीः सूयवसे रुशन्तीः शुद्धा अपः सुप्रपाणे पिबन्तीः.
मा व स्तेन ईशत माघशंसः परि वो रुद्रस्य हेतिर्वृणक्तु .. (७)
हे गाय! तुम उत्तम घास वाली भूमि में चलती हुई स्वच्छ जल पियो और उत्तम संतान
वाली बनो. चोर तुम्हें न चुरा सके. बाघ आदि दुष्ट पशु तुम्हारी हिंसा न करें. रुद्र का आयुध
तुम्हारा स्पर्श न करे. (७)
सूक्त-२२ देवता—इंद्र, क्षत्रिय राजा
इममिन्द्र वर्धय क्षत्रियं म इमं विशामेकवृषं कृणु त्वम्.
निरमित्रानक्ष्णुह्यस्य सर्वांस्तान् रन्धयास्मा अहमुत्तरेषु.. (१)
हे इंद्र! मेरे इस क्षत्रिय राजा को पुत्र, पौत्र, वाहन आदि से समृद्ध बनाओ. इस राजा को
तुम वीर्य वालों में प्रमुख बनाओ. जो इस के शत्रु राजा हैं, उन सब को तुम प्राण हीन कर दो.
तुम सभी को इस के वश में करो. मैं भी इसे अपने मंत्रों के सामर्थ्य से इंद्र आदि लोकपालों में
से एक बनाता हूं. (१)
एमं भज ग्रामे अश्वेषु गोषु निष्टं भज यो अमित्रो अस्य.
वर्ष्म क्षत्राणामयमस्तु राजेन्द्र शत्रुं रन्धय सर्वमस्मै.. (२)
हे इंद्र! इस राजा को जनसमूह से, घोड़ों से और गायों से संयुक्त करो, इस का जो शत्रु
है, उसे जन समूह आदि से अलग करो. यह राजा अन्य क्षत्रियों के शीश पर वर्तमान हो
अर्थात् सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय बने. इस के सभी शत्रुओं को तुम इस के वश में करो. (२)
अयमस्तु धनपतिर्धनानामयं विशां विशपतिरस्तु राजा.
अस्मिन्निन्द्र महि वर्चांसि धेह्यवर्चसं कृणुहि शत्रुमस्य.. (३)
हे इंद्र! यह राजा धनपतियों में उत्तम धनपति तथा प्रजातियों में उत्तम प्रजापालक हो.
इस राजा में महान तेज और वीर्य धारण करो तथा इस राजा के शत्रुओं को तेजहीन बनाओ.
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(३)
अस्मै द्यावापृथिवी भूरि वामं दुहाथां घर्मदुघे इव धेनू.
अयं राजा प्रिय इन्द्रस्य भूयात् प्रियो गवामोषधीनां पशूनाम्.. (४)
हे द्यावा और पृथ्वी! मेरे इस राजा के लिए धर्मदुघा गौ के समान अधिक मात्रा में धन
प्रदान करो. यह राजा इंद्र का अत्यधिक प्रिय हो जाए तथा उस के कारण मैं गायों,
जड़ीबूटियों और पशुओं का प्रिय बनूं. (४)
युनज्मि त उत्तरावन्तमिन्द्रं येन जयन्ति न पराजयन्ते.
यस्त्वा करदेकवृषं जनानामुत राज्ञामुत्तमं मानवानाम्.. (५)
हे राजन्! मैं अतिशय उत्कर्ष वाले इंद्र को तुम्हारा मित्र बनाता हूं. उन इंद्र की प्रेरणा से
तुम्हारे योद्धा विजयी होंगे, कभी पराजित नहीं होंगे. जिस इंद्र ने तुम्हें अन्य मनुष्यों के मध्य
गायों में सांड के समान उत्तम बनाया है, उसी ने तुम्हें मनुष्यों और राजाओं में श्रेष्ठ बनाया है.
(५)
उत्तरस्त्वमधरे ते सपत्ना ये के च राजन् प्रतिशत्रवस्ते.
एकवृष इन्द्रसखा जिगीवाञ्छत्रूयतामा भरा भोजनानि.. (६)
हे राजन्! तुम श्रेष्ठ बनो तथा तुम्हारे विरोधी निम्नतम बनें. वे विरोधी तुम्हारे प्रति शत्रुता
का भाव रखते हैं. तुम सर्व प्रमुख एवं इंद्र के मित्र बन कर सभी पर विजय प्राप्त करो. जो
तुम्हारे शत्रुओं के समान आचरण करते हैं, तुम उन के भोगसाधन धनों को छीन लो. (६)
सिंहप्रतीको विशो अद्धि सर्वा व्याघ्रप्रतीको ऽ व बाधस्व शत्रून्.
एकवृष इन्द्रसखा जिगीवाञ्छत्रूयतामा खिदा भोजनानि.. (७)
हे राजन्! तुम सिंह के समान पराक्रमी बन कर सभी प्रजाओं पर शासन करो तथा बाघ
के समान आक्रमणकारी बन कर सभी शत्रुओं को बाधा पहुंचाओ. तुम सर्व प्रमुख एवं इंद्र के
मित्र बन कर सभी पर विजय प्राप्त करो. जो तुम्हारे शत्रुओं के समान आचरण करते हैं, तुम
उन के भोग साधन धनों को छीन लो. (७)
सूक्त-२३ देवता—अग्नि
अग्नेर्मन्वे प्रथमस्य प्रचेतसः पाञ्चजन्यस्य बहुधा यमिन्धते.
विशोविशः प्रविशिवांसमीमहे स नो मुञ्चत्वंहसः.. (१)
मैं मुख्य विशेष ज्ञानी एवं देवयज्ञ, पितृयज्ञ, सूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और बृह्तयज्ञ नामक
पांच यज्ञ करने वाले अग्नि देव का महत्त्व जानता हूं. उन्हें अनेक प्रकार से प्रज्वलित किया
जाता है. सभी प्रजाओं में जठराग्नि के रूप में प्रवेश करने वाले अग्नि देव से मैं याचना करता
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हूं कि वह मुझे पाप से बचाएं. (१)
यथा हव्यं वहसि जातवेदो यथा यज्ञं कल्पयसि प्रजानन्.
एवा देवेभ्यः सुमतिं न आ वह स नो मुञ्चत्वंहसः.. (२)
हे जातवेद अग्नि! तुम जिस प्रकार चरु, पुरोडाश आदि हव्य को देवों तक पहुंचाते हो
तथा जिस प्रकार ज्ञान रखते हुए यज्ञ पूर्ण करते हो, उसी प्रकार हमारे विषय में देवों की उत्तम
बुद्धि को लाओ. इस प्रकार के अग्नि हमें पाप से छुड़ाएं. (२)
यामन्द्यामन्नुपयुक्तं वहिष्ठं कर्मन्कर्मन्नाभागममग्निमीड़े.
रक्षोहणं यज्ञवृधं घृताहुतं स नो मुञ्चत्वंहसः (३)
होम के आधार पर होने के कारण अनेक फल प्राप्त कराने में नियुक्त, ढोने वालों में
श्रेष्ठ, अनेक यज्ञ कर्मों के द्वारा सेवनीय, राक्षसों के विनाश कर्ता, यज्ञों की वृद्धि करने वाले
एवं घृत की आहुतियों से दीप्त अग्नि की मैं स्तुति करता हूं. इस प्रकार के अग्नि मुझे पाप से
छुड़ाएं. (३)
सुजातं जातवेदसमग्निं वैश्वानरं विभुम्.
हव्यवाहं हवामहे स नो मुञ्चत्वंहसः.. (४)
शोभन जन्म वाले, उत्पन्न होने वाले प्राणियों के ज्ञाता, संसार के मनुष्यों के हितैषी,
व्यापक एवं हव्य वहन करने वाले अग्नि का मैं आह्वान करता हूं. वह पाप से मेरी रक्षा करें.
(४)
येन ऋषयो बलमद्योतयन् युजा येनासुराणामयुवन्त मायाः.
येनाग्निना पणीनिन्द्रो जिगाय स नो मुञ्चत्वंहसः.. (५)
ऋषियों ने जिन मित्र बने हुए अग्नि की सहायता से अपना सामर्थ्य बढ़ाया, देवों ने जिन
की सहायता से असुरों की माया को नष्ट किया तथा जिन अग्नि की सहायता से इंद्र ने पणियों
को पराजित किया, वे अग्नि मुझे पाप से बचाए. (५)
येन देवा अमृतमन्वविन्दन् येनौषधीर्मधुमतीरकृण्वन्.
येन देवाः स्व १ राभरन्त्स नो मुञ्चत्वंहसः.. (६)
जिस अग्नि की सहायता से देवों ने अमृत प्राप्त किया, जिन अग्नि की सहायता से
जड़ीबूटियों ने मधुर रस प्राप्त किया तथा जिन की सहायता से स्वर्ग प्राप्त किया जाता है, वह
अग्नि देव मुझे पाप से छुड़ाएं. (६)
यस्येदं प्रदिशि यद् विरोचते यज्जातं जनितव्यं च केवलम्.
स्तौम्यग्निं नाथितो जोहवीमि स नो मुञ्चत्वंहसः.. (७)
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सूक्त-२४ देवता—इंद्र
जिस अग्नि के शासन में सारा जगत् वर्तमान है, अंतरिक्ष में ग्रह, नक्षत्र आदि प्रकाशित
हैं, उत्पन्न हुए और उत्पन्न होने वाले सभी प्राणी जिन के शासन में हैं, मैं उन अग्नि की स्तुति
करता हूं तथा फल की कामना से बार-बार हवन करता हूं. ऐसे अग्नि देव मुझे पाप से
छुड़ाएं. (७)
सूक्त-२४ देवता—इंद्र
इन्द्रस्य मन्महे शश्वदिदस्य मन्महे वृत्रघ्न स्तोमा उप मेम आगुः.
यो दाशुषः सुकृतो हवमेति स नो मुञ्चत्वंहसः.. (१)
मैं बारबार इंद्र का महत्त्व स्वीकार करता हूं. वृत्र की हत्या करने वाले इंद्र के ये स्तोत्र मेरे
समीप आ कर मुझे स्तोता बनाते हैं. जो इंद्र चरु, पुरोडाश आदि देने वाले एवं उत्तम यज्ञ
करने वाले यजमान का आह्वान स्वीकार करते हैं, वह इंद्र मुझे पाप से बचाएं. (१)
य उग्रीणामुग्रबाहुर्ययुर्यो दानवानां बलमारुरोज.
येन जिताः सिन्धवो येन गावः स नो मुञ्चत्वंहसः.. (२)
जो इंद्र ऊपर हाथ उठा कर शत्रु सेनाओं को भगा देते हैं, जिन्होंने दानवों के बल को
सभी ओर से नष्ट कर दिया है, जिन इंद्र ने मेघों में स्थित जलों को जीता था तथा जिन्होंने
पणियों के द्वारा चुराई हुई गाएं प्राप्त कीं, वह हमें पाप से छुड़ाएं. (२)
यश्चर्षणिप्रो वृषभः स्वर्विद् यस्मै ग्रावाणः प्रवदन्ति नृम्णम्.
यस्याध्वरः सप्तहोता मदिष्ठः स नो मुञ्चत्वंहसः.. (३)
जो इंद्र मनुष्यों को मनचाहा फल दे कर पूर्ण करने वाले, बैल के समान शक्तिशाली और
स्वर्ग प्राप्त करने वाले हैं, जिन इंद्र के लिए पत्थर सोमरस प्रदान करते हैं एवं सात होताओं से
युक्त जिन इंद्र से संबंधित सोमयाग प्रसन्न करने वाला होता है, वह हमें पाप से बचाएं. (३)
यस्य वशास ऋषभास उक्षणो यस्मै मीयन्ते स्वरवः स्वर्विदे.
यस्मै शुक्रः पवते ब्रह्मशुम्भितः स नो मुञ्चत्वंहसः.. (४)
जिन इंद्र के यज्ञ के निमित्त बांझ गाएं, बैल एवं सांड़ लाए जाते हैं, स्वर्ग प्राप्त करने
वाले जिन इंद्र के निमित्त यज्ञों में गांठों वाले खंभे गाड़े जाते हैं तथा जिन इंद्र के निमित्त
निचोड़ने के साधनों से युक्त एवं निर्मल सोमरस छाना जाता है, वह इंद्र हमें पाप से बचाएं.
(४)
यस्य जुष्टिं सोमिनः कामयन्ते यं हवन्त इषुमन्तं गविष्टी.
यस्मिन्नर्कः शिश्रिये यस्मिन्नोजः स नो मुञ्चत्वंहसः.. (५)
सोमरस वाले यजमान जिन की प्रीति की कामना करते हैं तथा जिन आयुध धारी इंद्र
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को पणियों द्वारा चुराई गई गायों की खोज के लिए बुलाया जाता है तथा जिन इंद्र के विषय
में अर्चना के साधन मंत्र आश्रित हैं, वह इंद्र हमें पाप से बचाएं. (५)
यः प्रथमः कर्मकृत्याय जज्ञे यस्य वीर्यं प्रथमस्यानुबुद्धम्.
येनोद्यतो वज्रो ऽ भ्यायताहिं स नो मुञ्चत्वंहसः.. (६)
जो इंद्र प्रमुख रूप से ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ करने के लिए उत्पन्न हुए थे, जिन प्रमुख
इंद्र का वृत्र हनन संबंधी शौर्य कर्म प्रसिद्ध है तथा जिन के द्वारा उठाया गया वज्र सभी ओर
हिंसा करता है, वह इंद्र देव मुझे पाप से बचाएं. (६)
यः सङ्ग्रामान् नयति सं युधे वशी यः पुष्टानि संसृजति द्वयानि.
स्तौमीन्द्रं नाथितो जोहवीमि स नो मुञ्चत्वंहसः.. (७)
जो स्वतंत्र इंद्र प्रहार करने के लिए युद्ध करते हैं, जो पुष्ट स्त्रीपुरुषों के जोड़े बनाते हैं, मैं
फल की कामना से उन्हीं इंद्र की स्तुति करता हूं और उन के निमित्त बारबार हवन करता हूं.
वह मुझे पाप से छुड़ाएं. (७)
सूक्त-२५ देवता—वायु, सविता
वायोः सवितुर्विदथानि मन्महे यावात्मन्वद् विशथो यौ च रक्षथः.
यौ विश्वस्य परिभू बभूवथुस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (१)
वायु और सविता के वेदों में वर्णन किए गए कर्मों को मैं जानता हूं. हे वायु एवं सविता
देव! तुम दोनों स्थावर और संगम जीवों में प्रवेश करते हो एवं रक्षा करते हो. तुम दोनों विश्व
की रक्षा के लिए उत्पन्न हुए हो. तुम दोनों हमें पाप से छुड़ाओ. (१)
ययोः सङ्ख्याता वरिमा पार्थिवानि याभ्यां रजो युपितमन्तरिक्षे.
ययोः प्रायं नान्वानशे कश्चन तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (२)
जिन वायु और सविता देव के महत्त्व जनों के द्वारा भलीभांति प्रसिद्ध हैं, जिन दोनों के
द्वारा आकाश में जल को धारण किया जाता है तथा कोई अन्य देव जिन वायु और सविता के
उत्तम गमन को प्राप्त नहीं कर पाता, वे दोनों हमें पाप से मुक्त करें. (२)
तव व्रते नि विशन्ते जनासस्त्वय्युदिते प्रेरते चित्रभानो.
युवं वायो सविता च भुवनानि रक्षथस्तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (३)
हे सविता! तुम से संबंधित कर्म में लोग नियम से लगे रहते हैं. हे विचित्र दीप्ति वाले
सूर्य! तुम्हारे निकलने पर सभी लोग अपनेअपने काम में लग जाते हैं. तुम दोनों अर्थात् वायु
और सविता लोकों की रक्षा करते हो. तुम दोनों हमें पाप से बचाओ. (३)
अपेतो वायो सविता च दुष्कृतमप रक्षांसि शिमिदां च सेधतम्.
सं हू ३ र्जया सृजथः सं बलेन तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (४)
हे वायु एवं सविता देव! तुम मेरे पाप को मुझ से दूर करो. उपद्रवकारी राक्षसों तथा
जलती हुई कृत्या राक्षसी को यहां से दूर भगाओ. तुम ऊर्जा और बल से मेरा सृजन करो तथा
मुझे पाप से बचाओ. (४)
रयिं मे पोषं सवितोत वायुस्तनू दक्षमा सुवतां सुशेवम्.
अयक्षमतातिं मह इह धत्तं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (५)
सविता और वायु मेरे लिए धन और पुष्टि को प्रेरित करें. ये दोनों मेरे शरीर में सुख एवं
बल प्रदान करें. इस यजमान के शरीर में ये दोनों रोगहीनता तथा तेज धारण करें और हमें
पाप से बचाएं. (५)
प्र सुमतिं सवितर्वाय ऊतये महस्वन्तं मत्सरं मादयाथः.
अर्वाग् वामस्य प्रवतो नि यच्छतं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (६)
हे सविता एवं वायु देव! हमारी रक्षा के लिए हमें उत्तम बुद्धि प्रदान करो तथा
दीप्तिशाली एवं मादक सोमरस को पी कर प्रसन्न बनो. तुम दोनों उत्तम धन को हमारी ओर
प्रेरित करो तथा हमें पाप से छुड़ाओ. (६)
उप श्रेष्ठा न आशिषो देवयोर्धामन्नस्थिरन्.
स्तौमि देवं सवितारं च वायुं तौ नो मुञ्चतमंहसः.. (७)
वायु और सविता देव के तेज के विषय में हमारी उत्तम एवं फलदायक प्रार्थनाएं
उपस्थित हैं. हम धन आदि गुणों से युक्त वायु एवं सविता देव की स्तुति करते हैं. ये दोनों हमें
पाप से छुड़ाएं. (७)
सूक्त-२६ देवता—द्यावा, पृथिवी
मन्वे वां द्यावापृथिवी सुभोजसौ सचेतसौ ये अप्रथेथाममिता योजनानि.
प्रतिष्ठे ह्यभवतं वसूनां ते नो मुञ्चतमंहसः.. (१)
हे द्यावा पृथ्वी! तुम दोनों शोभन भोगों वाले एवं समान चित्त वाले हो. मैं तुम्हारी स्तुति
करता हूं. तुम दोनों अनंत योजन विस्तार वाले हो. तुम दोनों निवास करने वाले देव मनुष्यों
अथवा धनों के उत्तम स्थान बनते हों. तुम दोनों हमें पाप से छुड़ाओ. (१)
प्रतिष्ठे ह्यभवतं वसूनां प्रवृद्धे देवी सुभगे ऊरूची.
द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (२)
सभी प्राणियों के आधार बने हुए द्यावा पृथ्वी सारे जगत् में प्रविष्ट हैं. हे दिव्य, उत्तम
सौभाग्य वाले एवं व्याप्त द्यावा पृथ्वी! मेरे सुख के कारण बनो एवं मुझे पाप से बचाओ. (२)
असन्तापे सुतपसौ हुवे ऽ हमुर्वी गम्भीरे कविभिर्नमस्ये.
द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (३)
संताप रहित, उत्तम ताप वाले, गंभीर एवं विद्वानों द्वारा नमस्कार के योग्य द्यावा पृथ्वी,
मेरे सुख के कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (३)
ये अमृतं बिभृथो ये हवींषि ये स्त्रोत्या बिभृथो ये मनुष्यान्.
द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (४)
जो द्यावा पृथ्वी अमृत को धारण करते हैं तथा जो चरु, पुरोडाश आदि को, नदियों को
एवं मनुष्यों को धारण करते हैं, वे मेरे लिए सुख के कारण बनें एवं मुझे पाप से छुड़ाएं. (४)
ये उस्रिया बिभृथो ये वनस्पतीन् ययोर्वा विश्वा भुवनान्यन्तः.
द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (५)
जो द्यावा पृथ्वी सभी गायों को धारण करते हैं, जो सभी वृक्षों को धारण करते हैं तथा
जिन दोनों के मध्य समस्त भवन हैं, वे द्यावा पृथ्वी, मेरे लिए सुख का कारण बनें एवं मुझे
पाप से छुड़ाएं. (५)
ये कीलालेन तर्पयथो ये घृतेन याभ्यामृते न किं चन शक्नुवन्तिः.
द्यावापृथिवी भवतं मे स्योने ते नो मुञ्चतमंहसः.. (६)
जो द्यावा पृथ्वी अन्न एवं घृत के द्वारा समस्त विश्व को तृप्त करते हैं, जिन दोनों के बिना
मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकते, वे द्यावा पृथ्वी मेरे लिए सुख का कारण बनें एवं मुझे पाप से
छुड़ाएं. (६)
यन्मेदमभिशोचति येनयेन वा कृतं पौरुषेयान्न दैवात्.
स्तौमि द्यावापृथिवी नाथितो जोहवीमि ते नो मुञ्चतमंहसः.. (७)
यह पाप और उस का फल मुझे सभी ओर से जलाता है एवं इसी के कारण बारबार
पाप किए जाते हैं. पुरुषों से प्रेरित पाप के समान देव कर्मों से संबंधित पाप भी मुझे जलाता
है. मैं फल की कामना से द्यावा पृथ्वी की स्तुति करता हूं. ये दोनों मुझे पाप से छुड़ाएं. (७)
सूक्त-२७ देवता—मरुत्
मरुतां मन्वे अधि मे ब्रुवन्तु प्रेमं वाजं वाजसाते अवन्तु.
आशूनिव सुयमानह्व ऊतये ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१)
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