अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सारे कर्म ब्राह्मण की पत्नी ही करती है. (७) उत यत् पतयो दश स्त्रियाः पूर्वे अब्राह्मणाः. ब्रह्मा चेद्धस्तमग्रहीत् स एव पतिरेकधा.. (८) ब्राह्मण की पत्नी के पूर्व अब्राह्मण बालक चाहे दस हों, पर जो ब्राह्मण उस का पाणि ग्रहण करता है, वही उस का पति होता है. (८) ब्राह्मण एव पतिर्न राजन्यो ३ न वैश्यः. तत् सूर्यः प्रब्रुवन्नेति पञ्चभ्यो मानवेभ्यः.. (९) ब्राह्मणी का पति ब्राह्मण ही हो सकता है, क्षत्रिय और वैश्य नहीं. सूर्य देव पांच प्रकार के मानव—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद यह कहते हुए दमन करते हैं. (९) पुनर्वे देवा अददुः पुनर्मनुष्या अददुः. राजानः सत्यं गृह्नाना ब्रह्मजायां पुनर्ददुः.. (१०) ब्राह्मण पत्नी को देवों, मनुष्यों और राजाओं ने सत्य को ग्रहण कर के प्रदान किया. (१०) पुनर्दाय ब्रह्मजायां कृत्वा देवैर्नािकल्बिषम्. ऊर्जं पृथिव्या भक्त्वोरुगायमुपासते.. (११) हम देवों द्वारा स्वच्छ किए हुए शक्तिदायक अन्न का विभाग कर के ब्राह्मण पत्नी को देते हैं तथा अत्यधिक कीर्तिशाली परमात्मा की उपासना करते हैं. (११) नास्य जाया शतवाही कल्याणी तल्पमा शये. यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१२) जिस राज्य में ब्राह्मण की पत्नी और गाय को बाधा पहुंचाई जाती है, वहां भांतिभांति के कल्याण करने वाली पत्नी शैय्या पर शयन नहीं करती. (१२) न विकर्णः पृथुशिरास्तस्मिन् वेश्मनि जायते. यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१३) जिस राज्य में ब्राह्मण की पत्नी को अचेत कर के रोका जाता है, उस राज्य में विशाल मस्तक वाले पुरुष जन्म नहीं लेते. (१३) नास्य क्षत्ता निष्कग्रीवः सूनानामेत्यग्रतः. यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*
जिस राज्य में ब्राह्मण की पत्नी को मोहित कर के रोका जाता है, उस राज्य का वीर निष्क नाम का सोने का आभूषण धारण कर के भी सूना से आगे नहीं जा पाता. (१४) नास्य श्वेतः कृष्णकर्णो धुरि युक्तो महीयते. यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१५) जिस राज्य में ब्राह्मण की पत्नी को चेतनाहीन कर के रोका जाता है, उस राज्य में राजा का श्वेत कानों वाला घोड़ा रथ के आगे जुत कर भी प्रशंसित नहीं होता. (१५) नास्य क्षेत्रे पुष्करिणी नाण्डीकं जायते बिसम्. यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१६) जिस राष्ट्र में ब्राह्मण की पत्नी को अचेत कर के रोका जाता है, उस राष्ट्र की पुष्करिणी में कमल और कमल तंतु उत्पन्न नहीं होते. (१६) नास्मै पृश्निं वि दुहन्ति ये ऽ स्या दोहमुपासते. यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१७) जिस राष्ट्र में ब्राह्मण की पत्नी अचेत कर के रोकी जाती है, उस राष्ट्र में दूध दुहने की इच्छा करने वाले थोड़ा दूध भी नहीं दुह पाते. (१७) नास्य धेनुः कल्याणी नानड्वान्सहते धुरम्. विजानिर्यत्र ब्राह्मणो रात्रिं वसति पापया.. (१८) जिस राष्ट्र में जाया अर्थात् पत्नी से रहित ब्राह्मण पाप की भावना से रात्रि निवास करता है, उस राष्ट्र के स्वामी के यहां गाय कल्याण करने वाली नहीं होती और बैल गाड़ी या रथ के जुए को नहीं खींचते. (१८) सूक्त-१८ देवता—ब्राह्मण की गाय नैतां ते देवा अददुस्तुभ्यं नृपते अत्तवे. मा ब्राह्मणस्य राजन्य गां जिघत्सो अनाद्याम्.. (१) हे राजन्! देवों ने यह गाय तुम को भक्षण करने के लिए नहीं दी है. ब्राह्मण की गाय अखाद्य है. इसे खाने की इच्छा मत कर. (१) अक्षद्रुग्धो राजन्यः पाप आत्मपराजितः. स ब्राह्मणस्य गामद्यादद्य जीवानि मा श्वः.. (२) इंद्रियों को वश में न करने वाला एवं आत्मपराजित जो राजा ब्राह्मण की गाय का ebook converter DEMO Watermarks*
भक्षण करता है, वह पापी राजा जीवित नहीं रहता. (२) आविष्टिाघविषा पृदाकूरिव चर्मणा. सा ब्राह्मणस्य राजन्य तृष्टैषा गौरनाद्या.. (३) ब्राह्मण की चर्म से ढकी हुई गाय केंचुली से ढकी हुई व्यानी सर्पिणी के समान है. हे राजन्! यह भक्षण करने योग्य नहीं है. (३) निर्वै क्षत्रं नयति हन्ति वर्चो ऽग्निरिव रब्धो वि दुनोति सर्वम्. यो ब्राह्मणं मन्यते अन्नमेव स विषस्य पिबति तैमातस्य.. (४) जो राजा ब्राह्मण के पदार्थों का भक्षण करता है, वह विष पीता है और अपना क्षात्र तेज गवां देता है. जिस प्रकार क्रोध में भरे हुए अग्नि देव सब कुछ नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण के पदार्थों को खाने योग्य समझने वाला राजा नष्ट हो जाता है. (४) य एनं हन्ति मृदुं मन्यमानो देवपीयुर्धनकामो न चित्तात्. सं तस्येन्द्रो हृदये ऽग्निमिन्ध उभे एनं द्विषो नभसी चरन्तम्.. (५) ब्राह्मण को मृदु समझने वाला जो अज्ञानी उसे नष्ट करना चाहता है, वह देव हिंसक है. इंद्र उस पापी के हृदय में अग्नि प्रज्वलित कर देते हैं और आकाश तथा पृथ्वी दोनों उस के प्रति वैर भाव रखते हैं. (५) न ब्राह्मणे हिंसितव्यो ३ ग्निः प्रियतनोरिव. सोमो ह्यस्य दायाद इन्द्रो अस्याभिशस्तिपाः.. (६) जिस प्रकार अपने शरीर को कोई नष्ट नहीं करना चाहता, उसी प्रकार अग्नि के समान तेजस्वी ब्राह्मण का नाश भी नहीं करना चाहिए. सोम ब्राह्मण का संबंधी हैं और इंद्र ब्राह्मण के शाप को पूर्ण करते हैं. (६) शतापाष्ठां नि गिरति तां न शक्नोति निःखिदम्. अन्नं यो ब्रह्मणं मल्वः स्वाद्व१द्मीति मन्यते.. (७) जो पापी ब्राह्मण के अन्न को स्वादिष्ट समझ कर भक्षण करता है, वह पापी मानव सैकड़ों विपत्तियों को निगलता है. (७) जिह्वा ज्या भवति कुल्मलं वाङ्नाडीका दन्तास्तपसाभिदिग्धाः. तेभिर्ब्रह्मा विध्यति देवपीयून हृदबलैर्धनुर्भिर्देवजूतैः.. (८) ब्राह्मण की जीभ धनुष की प्रत्यंचा, वाणी धनुष की लकड़ी और तपस्या के कारण पवित्र दांत तीर हैं. ब्राह्मण देवताओं से प्रेरित इन्हीं धनुष बाणों से देव हिंसकों को बींधता है. ebook converter DEMO Watermarks*
(८) तीक्ष्णेषवो ब्राह्मणा हेतिमन्तो यामस्यन्ति शरव्यां ३ न सा मृषा. अनुहाय तपसा मन्युना चोत दूरादव भिन्दन्त्येनम्.. (९) ब्राह्मण अपने तप और क्रोध रूप बाणों को जिस की ओर फेंकता है, वे बेकार नहीं जाते. वे बाण दूर से ही शत्रु को वेध देते हैं. (९) ये सहस्रमराज्ञानासन् दशशता उत. ते ब्राह्मणस्य गां जग्ध्वा वैतहव्याः पराभवन्.. (१०) वीरहव्य के वशंज हजारों राजा पृथ्वी पर राज्य करते थे. ब्राह्मण की गाय का अपहरण करने के कारण वे पराभव को प्राप्त हुए. (१०) गौरैव तान् हन्यमाना वैतहव्याँ अवातिरत्. ये केसरप्राबन्धायाश्चरमाजामपेचिरन्.. (११) वीरहव्य के वशंज जिन राजाओं ने केशर प्राबंधा नाम की चरम अजा का मांस पकाया था, उन राजाओं की मार खाते हुए गाय ने ही उन्हें छिन्नभिन्न कर दिया था. (११) एकशतं ता जनता या भूमिर्व्यधूनुत. प्रजां हिंसित्वा ब्राह्मणीमसंभव्यं पराभवन्.. (१२) जो सैकड़ों लोग अपने चलने से धरती को कंपित कर देते थे, वे ब्राह्मण की संतान की हिंसा करने के कारण ही पराजित हुए. (१२) देवपीयुश्चरति मर्त्येषु गरगीर्णो भवत्यस्थिभूयान्. यो ब्राह्मणं देवबन्धुं हिनस्ति न स पितृयाणमप्येति लोकम्.. (१३) जो देवबंधु ब्राह्मण की हिंसा करता है, वह देवशस्त्र मनुष्यों के मध्य विष खाने वाले के समान चलता फिरता है और अस्थि मात्र रह जाता है. वह पितृयान द्वारा मिलने वाले लोक को प्राप्त नहीं करता. (१३) अग्निर्वे नः पदवायः सोमो दायाद उच्यते. हन्ताभिशस्तेन्द्रस्तथा तद् वेधसो विदुः.. (१४) अग्नि हमें हमारे पदों तक पहुंचाता है और सोम हमारा दायाद कहा जाता है. इंद्र हमारी ओर से मारने वाले एवं घायल करने वाले हैं. (१४) इषुरिव दिग्धा नृपते पृदाकूरिव गोपते. सा ब्राह्मणस्येषुर्धोरा तया विध्यति पीयतः.. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे राजन्! ब्राह्मण की वाणी रूपी बाण विष में बुझे बाण एवं सर्पिणी के समान भयानक होता है. जो पापी ब्राह्मण को कष्ट देते हैं, ब्राह्मण उन्हें उन्हीं के द्वारा नष्ट करता है. (१५) सूक्त-१९ देवता—ब्रह्मगवी अतिमात्रमवर्धन्त नोदिव दिवमस्पृशन्. भृगुं हिंसित्वा सृञ्जया वैतहव्या: पराभवन्.. (१) संजय के पुत्र एवं वीतहव्य के वंशजों की बहुत वृद्धि हुई. उन्होंने भृगुवंशी ब्राह्मणों की हत्या कर दी, इसलिए उन की पराजय हुई तथा वे स्वर्ग को नहीं पा सके. (१) ये बृहत्सामानमाङ्गिरसमार्पयन् ब्राह्मणं जना:. पेत्वस्तेषामुभयादमविस्तोकान्यावयत्.. (२) जिन लोगों ने बृहत् साम वाले अंगिरा गोत्री ब्राह्मणों को आपत्तियों और विपत्तियों से ढक दिया था, ब्रह्मा ने उन्हें ऐसा पुत्र दिया जो उन्हें नष्ट करने वाला था. देवों ने उन की संतान को दूर फेंक दिया. (२) ये ब्राह्मणं प्रत्यष्ठीवन् ये वास्मिञ्छुल्कमषीषिरे. अस्रस्ते मध्ये कुल्याया: केशान् खादन्त आसते.. (३) जिन्होंने ब्राह्मणों पर थूका और जिन्होंने ब्राह्मणों से धन लेने की इच्छा की, वे रक्त की सरिता में पड़े हैं और बालों को खा रहे हैं. (३) ब्रह्मगवी पच्यमाना यावत् साभि विजङ्गहे. तेजो राष्ट्रस्य निर्हन्ति न वीरो जायते वृषा.. (४) ब्राह्मण की पकाई जाती हुई गाय जिस राष्ट्र में तड़पती है, वह उस राष्ट्र का तेज समाप्त कर देती है और उस में वीर्य को सींचने वाले वीर पुरुष जन्म नहीं लेते. (४) क्रूरमस्या आशनं तृष्टं पिशितमस्यते. क्षीरं यदस्या: पीयते तद् वै पितृषु किल्बिषम्.. (५) ब्राह्मण की गाय को काटना क्रूर कर्म है. इस का मांस खाने के बाद प्यास प्यास करता है. जो लोग मारने की इच्छा से रखी हुई ऐसी गाय का दूध पीते हैं, उन के पितरों को वह दूध पाप का भागी बनाता है. (५) उग्रो राजा मन्यमानो ब्राह्मणं यो जिघत्सति. परा तत् सिच्यते राष्ट्रं ब्राह्मणो यत्र जीयते.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
जो राजा अपनेआप को उग्र मानता हुआ ब्राह्मण की हत्या करता है एवं ब्राह्मण जिस राज्य में दुःखी रहता है, वह राजा और राष्ट्र दोनों समाप्त हो जाते हैं. (६) अष्टापदी चतुरक्षी चतुःश्रोता चतुर्हनुः. द्व्यास्या द्विजिह्वा भूत्वा सा राष्ट्रमव धूनुते ब्रह्मज्यस्य.. (७) राजा के द्वारा ब्राह्मण पर डाली गई विपत्ति आठ पैरों, चार आंखों, चार कानों, चार ठोड़ियों, दो मुखों और दो जीभों वाली राक्षसी बन कर उन के राज्य को समाप्त कर देती है. (७) तद् वै राष्ट्रमा स्रवति नावं भिन्नामिवोदकम्. ब्रह्माणं यत्र हिंसन्ति तद् राष्ट्रं हन्ति दुच्छुना.. (८) जिस राष्ट्र में ब्राह्मण की हिंसा होती है, उस राष्ट्र का ब्रह्मरूपी पाप उसे छेद वाली नौका के साथ डुबा देता है. ब्राह्मण पर डाली गई विपत्ति ही उस राष्ट्र को डुबा देती है. (८) तं वृक्षा अप सेधन्ति छायां नो मोपगा इति. यो ब्राह्मणस्य सद्धनमभि नारद् मन्यते.. (९) हे नारद! जो ब्राह्मण के धन को अपना धन समझता है, उस से वृक्ष भी द्वेष मानते हैं और उसे अपनी छाया में नहीं आने देना चाहते. (९) विषमेतद् देवकृतं राजा वरुणोऽब्रवीत्. न ब्राह्मणस्य गां जग्ध्वा राष्ट्रे जागार कश्चन.. (१०) राजा वरुण ने कहा है कि ब्राह्मण का धन देवों द्वारा निर्मित विष ही है. ब्राह्मण की गाय को मार कर राष्ट्र में कोई भी जीवित नहीं रहता. (१०) नवैव ता नवतयो या भूमिर्व्यधूनुत. प्रजां हिंसित्वा ब्राह्मणीमसंभव्यं पराभवन्.. (११) जिन आठ सौ दस पुरुषों से धरती कांपती थी, वे ब्राह्मण की संतान की हिंसा कर के असंभव पराजय को प्राप्त हुए. (११) यां मृतायानुबध्नन्ति कूहं पदयोपनीम्. तद् वै ब्रह्मज्य ते देवा उपस्तरणमब्रुवन्.. (१२) हे ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले पुरुष! जो रस्सी मरे हुए पुरुष के शव में बांधी जाती है, उसी से देवों ने तेरा बिछौना बनाया है. (१२) अश्रूणि कृपमाणस्य यानि जीतस्य वावृतुः. ebook converter DEMO Watermarks*
तं वै ब्रह्मज्य ते देवा अपां भागमधारयन्.. (१३) हे ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले पुरुष! कृपा के पात्र ब्राह्मणों के आंसुओं का जो जल होता है, वही जल देवों ने तेरे लिए निश्चित किया है. (१३) येन मृतं स्नपयन्ति श्मश्रूणि येनोन्दते. तं वै ब्रह्मज्य ते देवा अपां भागमधारयन्.. (१४) हे ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले पुरुष! जो जल मृतक को स्नान करने के लिए एवं मूंछें भिगोने से बचता है, वही जल देवों ने तेरे पीने के लिए निश्चित किया है. (१४) न वर्षं मैत्रावरुणं ब्रह्मज्यमभि वर्षति. नास्मै समितिः कल्पते न मित्रं नयते वशम्.. (१५) जिस राज्य में ब्राह्मण को दुःख दिया जाता है, उस में वरुण वर्षा नहीं करते. उस राष्ट्र की सभा सामर्थ्य हीन होती है तथा उस की सेना शत्रुओं को वश में नहीं रख पाती है. (१५) सूक्त-२० देवता—वानस्पत्य उच्चैर्घोषो दुन्दुभिः सत्वनायन् वानस्पत्यः संभृत उस्रियाभिः. वाचं क्षुगुवानो दमयन्त्सपत्नान्त्सिंह इव जेष्यन्नभि तंस्तनीहि.. (१) हे दुंदुभि! तू वनस्पतियों से बनाई गई है तथा उच्च स्वर करती है. तू शक्तिशाली जनों के समान आचरण कर तथा उच्च घोष से शत्रुओं का मान मर्दन कर. (१) सिंह इवास्तानीद् द्रुवयो विबद्धोऽभिक्रन्दन्नृषभो वासितामिव. वृषा त्वं वध्रयस्ते सपत्ना ऐन्द्रस्ते शुष्मो अभिमातिषाहः.. (२) हे दुंदुभि! तू सिंह के समान गर्जन कर. हे वृक्ष के समान अधिक आयु वाली दुंदुभी! तू गाय को देख कर रंभाने वाले बैल के समान शब्द करती है. विशेष रूप से बंधी हुई तू वीर्य वर्षा करने वाली है, इस कारण तेरे शत्रु शक्ति रहित हो जाते हैं. तेरा बल इंद्र के समान है, इसलिए उसे वीर्य ही सहन कर पाता है. (२) वृषेव यूथे सहसा विदानो गव्यन्नभि रुव सन्धनाजित्. शुचा विध्य हृदयं परेषां हित्वा ग्रामान् प्रच्युता यन्तु शत्रवः.. (३) जिस प्रकार गाय की कामना करने वाला बैल अपने शब्द के कारण झुंड में भी पहचान लिया जाता है, उसी प्रकार हे दुंदुभी! शत्रुओं को जीतने की इच्छा से शब्द कर के उन के हृदयों में संताप भर दे. वे शत्रु हमारे गांवों को छोड़ कर चले जाएं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
संजयन् पृतना ऊर्ध्वमायुर्गृह्या गृहणानो बहुधा वि चक्ष्व. दैवीं वाचं दुन्दुभ आ गुरस्व वेधाः शत्रूणामुप भरस्व वेदः.. (४) हे दुदुंभि! तू उच्च शब्द करती हुई शत्रु सेनाओं को जीत लेती है. तू उन्हें पकड़ कर युद्ध में विजय प्राप्त करती है. तू दैवी वाणी का उच्चारण कर और शत्रुओं का धन मुझे प्राप्त करा. (४) दुन्दुभेर्वाचं प्रयतां वदन्तीमाशृण्वती नाथिता घोषबुद्धा. नारी पुत्रं धावतु हस्तगृह्यामित्री भीता समरे वधानाम्.. (५) दुदुंभि की घोर गर्जना से शत्रुओं की नारियां होश में आ जाती हैं. वे युद्ध में मारे गए शत्रुओं को देख कर भयभीत होती हैं और अपने पुत्र का हाथ पकड़ कर भाग जाती हैं. (५) पूर्वो दुन्दुभे प्र वदासि वाचं भूम्याः पृष्ठे वद रोचमानः. अमित्रसेनाम्अभिजज्जभानो द्युमद् वद दुन्दुभे सूनृतावत्.. (६) हे दुदुंभि! तेरी ध्वनि सब से पहले निकलती है, इसलिए तू शत्रु सेना का विनाश कर तथा पृथ्वी के ऊपर सत्य वचनों का प्रचार कर. (६) अन्तरेमे नभसी घोषो अस्तु पृथक् ते ध्वनयो यन्तु शीभम्. अभि क्रन्द स्तनयोत्पिपानः श्लोककृन्मित्रतूर्याय स्वर्धी.. (७) हे दुदुंभि! धरती और आकाश के मध्य तेरी ध्वनियां अनेक रूपों में व्याप्त हों तथा शोभन प्रतीत हों. तू उच्च शब्द से समृद्ध हो तथा मित्रों में वेग व्याप्त करने के लिए उच्च स्वर से गर्जन कर. (७) धीभिः कृतः प्र वदाति वाचमुद्धर्षय सत्वनामायुधानि. इन्द्रमेदी सत्वनो नि ह्वयस्व मित्रैरमित्राँ अव जङ्घनीहि.. (८) हे दुदुंभि! कुशलतापूर्वक बजाने पर तू मोहक शब्द निकालती है. शक्तिशाली मनुष्यों के आयुधों को ऊंचा कर के तू उन्हें प्रसन्न बना. तू वीरों का आह्वान करती हुई हमारे मित्रों द्वारा हमारे शत्रुओं का विनाश करा, क्योंकि तू इंद्र की प्रिया है. (८) संक्रन्दनः प्रवदो धृष्णुषेणः प्रवेदकृद् बहुधा ग्रामघोषी. श्रेयो वन्वानो वयुनानि विद्वान् कीर्तिं बहुभ्यो वि हर द्विराजे.. (९) हे दुदुंभि! तू गर्जन करने वाले गौवों को गुंजित करने वाली, धनदात्री और सेना को साहस प्रदान करने वाली है. तू कल्याण करने वाली एवं उत्तम पुरुषों को जानने वाली है. तू इन दो राजाओं के युद्ध के मध्य अनेक वीरों को कीर्ति प्रदान कर. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
श्रेयःकेतो वसुजित् सहीयान्त्सङ्ग्रामजित् संशितो ब्रह्मणासि. अंशूनिव ग्रावाधिषवणे अद्रिर्गव्यन् दुन्दुभेऽधि नृत्य वेदः.. (१०) हे संग्राम में विजय प्राप्त करने वाली दुदुंभी! तू कल्याणी, धन जीतने वाली, शक्तिशालिनी एवं मंत्र के द्वारा तीक्ष्ण बनाई हुई है. अधिश्श्रवण काल में पर्वत अपने पाषाण खंडों को दबाता हुआ नृत्य करता है, उसी प्रकार तू भी शत्रुओं के धन पर अधिकार करती हुई नृत्य कर. (१०) शत्रुषाणीषादभिमातिषाहो गवेषणः सहमान उद्भिद्. वाग्वीव मन्त्रं प्र भरस्व वाचं सांग्रामजित्यायैषमुद् वदेह.. (११) हे दुदुंभि! तू ऐसा शब्द निकालती है, जो शत्रुओं की वाणी से टक्कर ले सके. तू गवेषणा करने वाले बातूनी पुरुष के समान युद्ध जीतने के निमित्त शब्द करती हुई गूंज. (११) अच्युतच्युत् समदो गमिष्ठो मृधो जेता पुरएतायोध्यः. इन्द्रेण गुप्तो विदथा निचिक्यद्धृद्द्योतनो द्विषतां याहि शीघ्रम्.. (१२) हे युद्ध में विजय प्राप्त करने वाली दुदुंभी! तू हर्ष से पूर्ण है एवं डिगती नहीं है. तू आगे युद्ध में जा कर योद्धाओं की प्रेरक और युद्ध जीतने वाली है. इंद्र के द्वारा रक्षित तू शत्रुओं के हृदयों को जलाती हुई उन के समीप जा. (१२) सूक्त-२१ देवता—वानस्पत्य विहृदयं वैमनस्यं वदामित्रेषु दुन्दुभे. विद्वेषं कश्मशं भयममित्रेषु नि ध्मस्यवैनान् दुन्दुभे जाहि.. (१) हे दुदुंभि! तू शत्रुओं में वैमनस्य फैला एवं उन के हृदयों में एकदूसरे के प्रति द्वेष भर दे. हम अपने शत्रुओं में द्वेष की भावना फैलाना चाहते हैं. तू उन का तिरस्कार करती हुई उन्हें समाप्त कर दे. (१) उद्वेपमाना मनसा चक्षुषा हृदयेन च. धावन्तु बिभ्यतो ऽ मित्राः प्रत्रासेनाज्ये हुते.. (२) हमारे द्वारा होम किए गए घृत से हमारे शत्रु कंपित हों और मन, नेत्र तथा हृदय से भयभीत हो कर भाग जाएं. (२) वानस्पत्यः संभृत उस्रियाभिर्विश्वगोत्र्यः. प्रत्रासममित्रेभ्यो वदाज्येनाभिघारितः.. (३) हे वनस्पति से बनी हुई दुदुंभी! तू चमड़े से मढ़ी हुई है तथा मेघ घटा के समान घोर ebook converter DEMO Watermarks*
शब्द करती है. घी से चुपड़ी हुई तू शत्रुओं को भय उत्पन्न करने वाला शब्द कर. (३) यथा मृगाः संविजन्त आरण्याः पुरुषादधि. एवा त्वं दुन्दुभे ऽ मित्रानभि क्रन्द प्र त्रासयाथो चित्तानि मोहय.. (४) हे दुंदुभि! वनचारी शिकारी पुरुष से जिस प्रकार वन के पशु भयभीत होते हैं, उसी प्रकार तू अपने गर्जन से शत्रुओं को भयभीत करती हुई, उन के चित्तों को मोहित बना. (४) यथा वृकादजावयो धावन्ति बहु बिभ्यतीः. एवा त्वं दुन्दुभे ऽ मित्रानभि क्रन्द प्र त्रासयाथो चित्तानि मोहय.. (५) जिस प्रकार भेड़ें और बकरियां भेड़िए के कारण अधिक भयभीत हो कर भागती हैं, उसी प्रकार तू गड़गड़ाहट करती हुई शत्रुओं को भयभीत कर के उन का चित्त मोहित कर. (५) यथा श्येनात् पतत्रिणः संविजन्ते अहर्दिवि सिंहस्य स्तनथोर्यथा. एवा त्वं दुन्दुभे ऽ मित्रानभि क्रन्द प्र त्रासयाथो चित्तानि मोहय.. (६) हे दुंदुभि! जिस प्रकार बाज से सभी पक्षी और सिंह से सभी प्राणी भयभीत रहते हैं, उसी प्रकार तू शत्रुओं के प्रति गड़गड़ाहट कर के उन्हें भयभीत कर के उन के चित्तों को मोहित कर. (६) परामित्रान् दुन्दुभिना हरिणस्याजिनेन च. सर्वे देवा अतित्रसन् ये संग्रामस्येशते.. (७) जो संग्राम के देवता हैं, उन्होंने हिरण के चमड़े से मढ़ी हुई दुंदुभि बजा कर शत्रुओं को भयभीत कर के पराजित किया. (७) यैरिन्द्रः प्रक्रीडते पद्घोषैश्छायया सह. तैरमित्रास्त्रसन्तु नो ऽ मी ये यन्त्यनीकशः.. (८) इंद्र जिन पदघोषों से खेलते हैं, उन से अधिक संख्या वाले शत्रु भयभीत हों. (८) ज्याघोषा दुन्दुभयो ऽ भि क्रोशन्तु या दिशः. सेना पराजिता यतीरमित्राणामनीकशः.. (९) शत्रुओं की पराजित सेनाएं जिस ओर भाग रही हैं, हमारे बाणों की डोरी और दुंदुभि का शब्द मिल कर उधर ही उन को भयभीत करें और हरा दें. (९) आदित्य चक्षुरा दत्स्व मरीचयो ऽ नु धावत. पत्सङ्गिनीरा सजन्तु विगते बाहुवीर्ये.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
हे सर्प! तुम शत्रुओं के नेत्रों की देखने की शक्ति छीन लो. हे सूर्य किरणो! तुम दौड़ते हुए शत्रुओं की पीठ पर पड़ो. भुजाओं की शक्ति क्षीण होने पर जब शत्रु भागने लगे तो उन का साथ मत दो. (१०) यूयमुग्रा मरुतः पृश्निमातर इन्द्रेण युजा प्र मृणीत शत्रून्. सोमो राजा वरुणो राजा महादेव उत मृत्युुरिन्द्रः.. (११) हे मरुतो! तुम उग्र कर्म करने वाले हो. तुम इंद्र के साथ मिल कर शत्रुओं का मर्दन करो. सोम राजा, वरुण राजा, महादेव और मृत्युदेव इंद्र का सहयोग करें. (११) एता देवसेनाः सूर्यकेतवः सचेतसः. अमित्रान् नो जयन्तु स्वाहा.. (१२) ये देव सेनाएं समान चित्त वाली हैं और इन के झंडे में सूर्य विराजमान हैं. ये सेनाएं शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें. मेरी यह आहुति ग्रहण करने योग्य हो. (१२) सूक्त-२२ देवता—तक्मानाशन अग्निस्तक्मानमप बाधतामितः सोमो ग्रावा वरुणः पूतदक्षाः. वेदिर्बर्हिः समिधः शोशुचाना अप द्वेषांस्यमुया भवन्तु.. (१) अग्नि देव ज्वर को बाधा पहुंचाएं. पत्थर के समान दृढ़ सौम्य, पवित्र और दक्ष वरण, वेल्वी, कुश तथा प्रज्वलित समिधाएं ज्वर से द्वेष करने वाली हों. (१) अयं यो विश्वान् हरितान् कृणोष्युच्छोचयन्नग्निरिवाभिदुन्वन्. अधा हि तक्मन्नरसो हि भूया अधा न्य ङ्ङधराङ् वा परेहि.. (२) हे देह को नष्ट कर देने वाले ज्वर! तू सभी मनुष्यों को संताप देता है. इसलिए तू तिरस्कृत, निर्बल एवं अधम स्थान को चला जा. (२) यः परुषः पारुषेयो ऽ वध्वंस इवारुणः. तक्मानं विश्वधावीर्याधराज्चं परा सुवा.. (३) हे शक्तिशाली! तुम कठोर एवं अवध्वंस के समान लाल रंग वाले ज्वर को मुझ से दूर हटाओ. (३) अधराज्चं प्र हिणोमि नमः कृत्वा तक्मने. शकम्भरस्य मुष्टिहा पुनरेतु महावृषान्.. (४) मैं ज्वर को नमस्कार कर के उसे निम्न स्थान में जाने के लिए प्रेरित करता हूं. मुक्के के eBook converter DEMO Watermarks*
समान प्रहार करने वाला ज्वर महावृषभ को पुनः प्राप्त हो. (४) ओको अस्य मूजवन्त ओको अस्य महावृषा:. यावज्जातस्तक्मंस्तावानसि बह्लिकेषु न्योचर:.. (५) मूंज से युक्त स्थान इस ज्वर का घर है तथा वीर्य की महान वर्षा करने वाले इस के स्थान हैं. हे तक्मा! तू बाह्लीक देश में जितना है, उतना ही उत्पन्न हुआ है. (५) तक्मन् व्याल वि गद व्यङ्ग भूरि यावय. दासीं निष्क्व्रीमिच्छ तां वज्रेण समर्पय.. (६) हे जीवन को सर्प के समान कष्ट देने वाले ज्वर! तू चोरी कर ने वाली दासी से वज्र रूप में मिल और हम से अपनेआप को दूर रख. (६) तक्मन् मूजवतो गच्छ बह्लिकान् वा परस्तराम्. शूद्रामिच्छ प्रफर्व्यं १ तां तक्मन् वीव धूनुहि.. (७) हे तक्मा! तू मूंज वाले प्रदेश को अथवा बाह्लीक देश को अथवा उस से भी दूर चला जा. तू प्रसव अवस्था वाली दासी से मिल और उसे कंपित कर. (७) महावृषान् मूजवतो बन्ध्वद्धि परेत्य. प्रैतानि तक्मने ब्रूमो अन्यक्षेत्राणि वा इमा.. (८) हम मूंज वाले एवं अधिक वर्षा वाले स्थानों पर जाने के लिए ज्वर से निवेदन करते हैं कि तू वहां जा कर अथवा अन्य स्थानों पर जा कर वहां की वस्तुओं का भक्षण कर. (८) अन्यक्षेत्रे न रमसे वशी सन् मृडयासि न:. अभूदु प्रार्थस्तक्मा स गमिष्यति बह्लिकान्.. (९) हे ज्वर! तू अन्य स्थानों में क्यों रमण नहीं करता है? तू हमारे वश में हो कर हमें सुखी बना. हम तुझ से बाह्लीक देश में जाने की प्रार्थना करते हैं. (९) यत् त्वं शीतो ऽ थो रूर: सह कासावेपय:. भीमास्ते तक्मन् हेतयस्ताभि: स्म परि वृङ्ग्धि न:.. (१०) हे ज्वर! तू शीत के साथ रहता है तथा खांसी के साथ कंपित करने वाला है. तेरे आयुध भयंकर हैं. इन के साथ तू हम से दूर चला जा. (१०) मा स्मैतान्त्सखीन् कुरुथा बलासं कासमुद्युगम्. मा स्मातो ऽ वर्डै: पुनस्तत् त्वा तक्मन्नुप ब्रुवे.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
हे ज्वर! तू खांसी और शक्ति क्षीण करने वाले रोगों को हमारा मित्र मत बना. मैं तुझसे बारबार निवेदन करता हूं कि तू उस निचले स्थान से यहां मत आ. (११) तक्मन् भ्रात्रा बलासेन स्वस्रा कासिकया सह. पाप्मा भ्रातृव्येण सह गच्छामुमरणं जनम्.. (१२) हे ज्वर! शक्ति क्षीण करने वाले रोग तुम्हारे भाई और खांसी तुम्हारी बहन है. पाप तुम्हारा भतीजा है. इन सब के साथ तुम दुष्ट पुरुष के पास जाओ. (१२) तृतीयकं वितृतीयं सदन्दिमुत शारदम्. तक्मानं शीतं रूरं ग्रैष्मं नाशय वार्षिकम्.. (१३) हे देव! तिजारी, चौथइया, वर्षा संबंधी, शरद, ग्रीष्मकाल में होने वाले ज्वर के साथसाथ शीत ज्वर का विनाश करो. (१३) गन्धारिभ्यो मूजवद्भ्यो ऽ ङ्गेभ्यो मगधेभ्यः. प्रैष्यन् जनमिव शेवधिं तक्मानं परि दद्मसि.. (१४) हम मूंज वाले स्थान से, अंग देश से, मध्य देश से और गांधार देश से कष्ट वाले रोग ज्वर को भगाते हुए सुखी बनते हैं. (१४) सूक्त-२३ देवता—इंद्र ओते मे द्यावापृथिवी ओता देवी सरस्वती. ओतौ म इन्द्रश्चाग्निश्च क्रिमिं जम्भयतामिति.. (१) द्यावा पृथ्वी, सरस्वती देवी, इंद्र और अग्नि मुझ में ओतप्रोत हैं. वे कृमियों का विनाश करें. (१) अस्येन्द्र कुमारस्य क्रिमीन् धनपते जहि. हता विश्वा अरातय उग्रेण वचसा मम.. (२) हे धन के स्वामी इंद्र! इस बालक के शत्रु रूप कृमियों का विनाश करो. इन्हें मेरे उग्र वचनों के साथ पूरी तरह नष्ट करो. (२) यो अक्ष्यौ परिसर्पति यो नासे परिसर्पति. दतां यो मध्यं गच्छति तं क्रिमिं जम्भयामसि.. (३) जो कृमि आंखों में घूमते हैं जो नाखूनों में चलतेफिरते हैं तथा जो दांतों के मध्य निवास करते हैं, उन कृमियों को हम नष्ट करते हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
सरूपौ द्वौ विरूपौ द्वौ कृष्णौ द्वौ रोहितौ द्वौ. बभ्रुश्च बभ्रुकर्णश्च गृध्रः कोकश्च ते हताः.. (४) दो समान रूप वाले, दो भिन्न रूप वाले, दो काले, दो लाल रंग के, एक खाकी रंग वाला, एक खाकी रंग के कान वाला, एक गिद्ध और कोक—हम इन सभी कृमियों को मंत्र की शक्ति से नष्ट करते हैं. (४) ये क्रिमयः शितिकक्षा ये कृष्णाः शितिबाहवः. ये के च विश्वरूपास्तान् क्रिमीन् जम्भयामसि.. (५) जो कृमि तीखी कोख वाले हैं, जो काले हैं, जो तीखी भुजाओं वाले एवं जो अनेक रूपों वाले हैं, उन सब को हम मंत्र की शक्ति से नष्ट करते हैं. (५) उत् पुरस्तात् सूर्य एति विश्वदृष्टो अदृष्टहा. दृष्टांश्च घ्नन्नदृष्टांश्च सर्वांश्च प्रमृणन् क्रिमीन्.. (६) सभी को दिखाई देने वाले सूर्य अदृश्य कृमियों को नष्ट करते हैं. वे दृश्य और अदृश्य कृमियों को नष्ट करते हुए पूर्व दिशा से उदय हो रहे हैं. (६) येवाषासः कष्कषास एजत्काः शिपवित्नुकाः. दृष्टश्च हन्यतां क्रिमिरुतादृष्टश्च हन्यताम्.. (७) हे इंद्र! तुम शीघ्र गमन करने वाले, कष्ट देने वाले, कंपित करने वाले, तीक्ष्ण कृमि, दिखाई देने वाले अथवा दिखाई न देने वाले सभी कृमियों को नष्ट करो. (७) हतो येवाषः क्रिमीणां हतो नदनिमोत. सर्वान् नि मष्मषाकरं दृषदा खल्वाँ इव.. (८) तीव्रगामी कृमि मेरी मंत्र शक्ति से नष्ट हो गए. नदमिना नाम के कीड़ों को मैं ने इस प्रकार पीस डाला है, जिस प्रकार चने पत्थरों से पीसे जाते हैं. (८) त्रिशीर्षाणं त्रिककुदं क्रिमिं सारङ्गमर्जुनम्. शृणाम्यस्य पृष्टीरपि वृश्चामि यच्छिरः.. (९) मैं तीन सिरों वाले, तीन ककुदों वाले, चितकबरे रंग वाले और श्वेत वर्ण वाले कृमियों को मंत्र की शक्ति से नष्ट करता हुआ, उन की पसलियों और सिरों को कुचलता हूं. (९) अत्रिवद् वः क्रिमयो हन्मि कण्ववज्जमदग्निवत्. अगस्त्यस्य ब्रह्मणा सं पिनष्यहं क्रिमीन्.. (१०) मैं अत्रि ऋषि, कण्व ऋषि और जमदग्नि ऋषि के समान मंत्र बल से कृमियों का विनाश ebook converter DEMO Watermarks*
करता हूं. हे कृमियो! मैं अगस्त्य ऋषि के समान मंत्र शक्ति से तुम्हें मारता हूं. (१०) हतो राजा क्रिमीणामुतैषां स्थपतिर्हतः. हतो हतमाता क्रिमिर्हतभ्राता हतस्वसा.. (११) हमारे मंत्रों और ओषधि की शक्ति से कृमियों के राजा और मंत्री नष्ट हो गए हैं. माता, भाई और बहनों सहित कृमियों का पूरा कुटुंब नष्ट हो गया है. (११) हतासो अस्य वेशसो हतासः परिवेश सः. अथो ये क्षुल्लका इव सर्वे ते क्रिमयो हताः.. (१२) इन कृमियों के बैठने के स्थान नष्ट हो गए और इन के आसपास के स्थान भी नष्ट हो गए. जो कृमि बीज रूप में थे, वे भी नष्ट हो गए. (१२) सर्वेषां च क्रिमीणां सर्वासां च क्रिमीणाम्. भिनद्म्यश्मना शिरो दहाम्यग्निना मुखम्.. (१३) मैं सभी नर कृमियों और मादा कृमियों को पत्थर से नष्ट करता हूं एवं उन का मुंह अग्नि से नष्ट करता हूं. (१३) सूक्त-२४ देवता—सविता सविता प्रसवानामधिपतिः स मावतु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (१) सविता सभी उत्पन्न पदार्थों के अधिपति हैं. वे इस ब्रह्म कर्म में, इस पुरोधा में, इस संकल्प में, इस देवाव्हान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (१) अग्निर्वनस्पतीनमधिपतिः स मावतु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिनाकर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (२) अग्नि वनस्पतियों के अधिपति हैं. वह इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाव्हान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (२) द्यावापृथिवी दातॄणामधिपत्नीः ते मावताम्. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (३)
द्यावा और पृथ्वी दाताओं के अधिपति हैं. वे इसे वेदोक्त, पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (३) वरुणो ऽ पामधिपतिः स मावतु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (४) वरुण जलों के अधिपति हैं. वह इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (४) मित्रावरुणौ वृष्ट्याधिपती तौ मावताम्. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (५) मित्र और वरुण वर्षा के अधिपति हैं. वे इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (५) मरुतः पर्वतानामधिपतयस्ते मावन्तु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (६) मरुद्गण पर्वतों के अधिपति हैं. वे इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (६) सोमो वीरुधामधिपतिः स मावतु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (७) सोम लताओं के स्वामी हैं, वह इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (७) वायुरन्तरिक्षस्याधिपतिः स मावतु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (८) वायु देव अंतरिक्ष के अधिपति हैं. वे इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (८) सूर्यश्चक्षुषामधिपतिः स मावतु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां ebook converter DEMO Watermarks*
चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (९) सूर्य देव अंतरिक्ष के अधिपति अर्थात् हमारे स्वामी हैं. वह हमारी रक्षा करें. वह इस वेदोक्त सहित कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, वेदों के आह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप में हमारी रक्षा करें. (९) चन्द्रमा नक्षत्राणामधिपतिः स मावतु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (१०) चंद्रमा नक्षत्रों के अधिपति हैं. वह इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (१०) इन्द्रो दिवो ऽ धिपतिः स मावतु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (११) इंद्र स्वर्ग के राजा हैं. वह इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (११) मरुतां पिता पशूनामधिपतिः स मावतु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (१२) मरुतों के पिता पशुओं के अधिपति हैं. वह इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद कर्म में मेरी रक्षा करें. (१२) मृत्युः पितॄणामधिपतिः स मावतु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (१३) मृत्यु प्रजाओं के स्वामी है. वह इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (१३) यमः प्रजानामधिपतिः स मावतु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (१४) यम पितरों के अधिपति हैं. वह मेरे इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी सहायता करें. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*
पितरः परे ते मावन्तु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (१५) सात पीढ़ियों के ऊपर के पितर इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, संकल्प में प्रतिष्ठा में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (१५) तता अवरे ते मावन्तु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (१६) सपिंड पितर इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, संकल्प में, प्रतिष्ठा में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (१६) ततस्ततामहास्ते मावन्तु. अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (१७) पितरों के पितामह मेरे इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (१७) सूक्त-२५ देवता—योनि पर्वताद् दिवो योनेरङ्गादङ्गात् समाभृतम्. शेपो गर्भस्य रेतोधाः सरौ पर्वमिवा दधत्.. (१) पर्वत की ओषधि, स्वर्ग के पुण्य और अंगों की शक्ति से पुष्ट वीर्य धारण करने वाला पुरुष जल में पत्ते के समान गर्भाधान करता है. (१) यथेयं पृथिवी मही भूतानां गर्भमादधे. एवा दधामि ते गर्भं तस्मै त्वामवसे हुवे.. (२) जिस प्रकार विशाल पृथ्वी सभी भूतों अर्थात् प्राणियों का गर्भ धारण करती हैं, उसी प्रकार मैं तेरा गर्भ धारण करती हूं और उस की रक्षा के निमित्त तुझे बुलाती हूं. (२) गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वती. गर्भं ते अश्विनोभा धत्तां पुष्करस्रजा.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
हे सिनीवाली एवं सरस्वती! मेरे गर्भ को पुष्ट बनाओ. फूलों की माला धारण करने वाले अश्विनीकुमार मेरे गर्भ की रक्षा करें. (३) गर्भं ते मित्रावरुणौ गर्भं देवो बृहस्पतिः. गर्भं त इन्द्रश्चाग्निश्च गर्भं धाता दधातु ते.. (४) मित्र, वरुण, बृहस्पति देव, इंद्र, अग्नि और धाता देव तेरे गर्भ को पुष्ट करें. (४) विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु. आ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते.. (५) विष्णु तेरी योनि की कल्पना करें, त्वष्टा तेरे रूप की रचना करें, प्रजापति तेरा सिंचन करें और धाता तेरे गर्भ को पुष्ट करें. (५) यद् वेद राजा वरुणो यद् वा देवी सरस्वती. यदिन्द्रो वृत्रहा वेद तद् गर्भकरणं पिब.. (६) राजा वरुण, देवी सरस्वती एवं वृत्र नाशक इंद्र जिस गर्भपोषक वस्तु को जानते हैं, उसे तू पी ले. (६) गर्भो अस्योषधीनां गर्भो वनस्पतीनाम्. गर्भो विश्वस्य भूतस्य सो अग्ने गर्भमेह धाः.. (७) हे अग्नि! तुम ओषधियों के, वनस्पतियों के तथा सभी प्राणियों के गर्भ हो. अतएव तुम मेरे गर्भ को पुष्ट करो. (७) अधि स्कन्द वीरयस्व गर्भमा धेहि योन्याम्. वृषासि वृष्णयावन् प्रजायै त्वा नयामसि.. (८) हे वृषणों अथवा अंडकोषों वाले! तू वर्षण अर्थात् सेचन करता है. तू योनि में गर्भ स्थापित कर. तू ऊपर हो कर चलता हुआ वीरता का प्रदर्शन कर. हम तुझे प्रजा के निमित्त ग्रहण करते हैं. (८) वि जिहीष्व बार्हत्सामे गर्भस्ते योनिमा शयाम्. अदुष्टे देवाः पुत्रं सोमपा उभयाविनम्.. (९) हे सांत्वनामयी साध्वी! तू विशेष गति वाली हो. मैं तुझ में गर्भाधान करता हूं. सोमपान करने वाले देवों ने इस लोक में और परलोक में रक्षा करने वाला पुत्र प्रदान किया है. (९) धातः श्रेष्ठेन रूपेणास्या नार्या गवीन्योः. पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
हे धाता! इस नारी की आंतों से निकले मूत्र को मूत्राशय में ले जाने वाली जो नालियां दोनों पसलियों की ओर स्थित हैं, उन में स्थित पुत्र गर्भ को पुष्ट करो, जिस से यह दसवें मास में प्रसव कर सके. (१०) त्वष्टः श्रेष्ठेन रूपेणास्या नार्या गवीन्योः. पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे.. (११) हे त्वष्टा! इस नारी की आंतों से निकले मूत्र को मूत्राशय में ले जाने वाली जो नाड़ियां दोनों पसलियों की ओर स्थित हैं, उन में स्थित पुत्र गर्भ को पुष्ट करो. जिस से यह दसवें मास में प्रसव कर सके. (११) सवितः श्रेष्ठेन रूपेणास्या नार्या गवीन्योः. पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे.. (१२) हे सविता! इस नारी की आंतों से निकले मूत्र को मूत्राशय में ले जाने वाली जो नालियां दोनों पसलियों की ओर स्थित हैं, उन में स्थित पुत्र गर्भ को पुष्ट करो, जिस से यह दसवें मास में प्रसव कर सके. (१२) प्रजापते श्रेष्ठेन रूपेणास्या नार्या गवीन्योः. पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे.. (१३) हे प्रजापति! इस नारी की आंतों से निकले मूत्र को मूत्राशय तक ले जाने वाली जो नाड़ियां दोनों पसलियों की ओर स्थित हैं, उन में स्थित पुत्र गर्भ को पुष्ट करो, जिस से यह दसवें मास में प्रसव कर सके. (१३) सूक्त-२६ देवता—अग्नि यजूंषि यज्ञे समिधः स्वाहाग्निः प्रविद्वानिह वो युनक्तु.. (१) यजुर्वेद के मंत्रो और समिधाओ! सब कुछ जानने वाले अग्नि देव इस यज्ञ में तुम से मिलें. (१) युनक्तु देवः सविता प्रजानन्नस्मिन् यज्ञे महिषः स्वाहा.. (२) सब को उत्पन्न करने वाले सविता देव इस यज्ञ में तुम से मिलें. उन के लिए यह आहुति सुंदर हो. (२) इन्द्र उक्थामदान्यस्मिन् यज्ञे प्रविद्वान् युनक्तु सुयुजः स्वाहा.. (३) हे उक्त कर्म करने वालो! सब कुछ जानने वाले इंद्र इस यज्ञ में तुम से मिलें. उन के ebook converter DEMO Watermarks*