आयुर्वेद का कमाल (रोगों के निदान में)
Ayurved Ka Kamaal (Rogon Ke Nidan Mein)
सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
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पानी में डालकर पीएँ।
असगन्ध का कमाल
3 ग्राम असगन्ध, 3 ग्राम खुरासानी और 13 ग्राम जटामासी लेकर 125 ग्राम पानी में पका लें। जब पानी आधा रह जाए तो उतारकर छान लें। इस दवा का सेवन बड़ा ही लाभकारी है।
अन्य और सहायक उपचार
- ❑ फलों का सेवन करें।
- ❑ दौरा आने पर हींग सुँघाएँ।
हृदय रोग है
अडूसे का कमाल
अडूसे के छोटे पेड़ को जड़ और पत्तों सहित उखाड़कर पानी से साफ कर लें और फिर कुछ देर छाया में सुखा लें। अब अच्छी तरह से पीसकर छान लें। यह चूर्ण (हथेली-भर) रोज़ खाना बहुत लाभदायक सिद्ध होता है।
पीपल का कमाल
पीपल, कचूर, हर की छाल, सोंठ, पुष्करमूल, बच और राक्षा सबको समान मात्रा में लेकर अच्छी तरह पीस लें। यह चूर्ण आपको रोज़ दूध के साथ लेना है। इसे जल के साथ भी लिया जा सकता है।
आँवले का कमाल
सूखे आँवलों को कूट-पीस लें। फिर मिश्री मिलाकर रख लें। दवा तैयार है। ढाई चम्मच यह दवा रोज़ सुबह खाली पेट पानी के साथ लें।
अन्य और सहायक उपचार
- ❑ नारंगी का सेवन करें।
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साहिब बन्दगी
- ❑ मौसमी का सेवन करें।
- ❑ अंगूर खाएँ और उसका रस निकालकर पिएँ।
- ❑ पिसे आँवले को गाय के दूध के साथ सेवन करें।
हैजा है
बेल का कमाल
बेल और सोंठ दोनों का काढ़ा बनाकर रोगी को दें।
छोटी इलायची का कमाल
गुलाबजल लेकर उसमें छोटी इलायची का 20 ग्राम छिलका डाल दें। अब इसे उबालने के लिए आग पर रखें और जब गुलाबजल लगभग आधा रह जाए तो उतार लें। यह दवा रोगी को पिलाएँ।
नीम का कमाल
- ❑ नीम की 22 पत्तियाँ लेकर पीस लें। अब आधा गिलास पानी में इसे मिलाकर रोगी को पिलाएँ।
विषधारियों ने काटा है
विषधारियों ने काटा है
कनखजूरा चिपका है
मूली का कमाल
कनखजूरे पर सरसों का तेल डालना ठीक रहता है। ऊपर से यदि मूली के पत्तों का रस भी डाल दिया जाए तो कनखजूरे के पास उतर जाने के सिवा कोई चारा नहीं रहता है। पर यह सब करने से पहले आपको एक काम कर लेना होगा और वो यह कि जहाँ कनखजूरा चिपका हो, उस जगह के चारों तरफ गीला गूँथा हुआ आटा लगा दें। यह इसलिए कि न तो कनखजूरा आगे बढ़ने पाए और न ही उसपर डाली गयी दवा उसके स्पर्श से दूसरों अंगों तक न जाने पाए।
कुत्ते ने काट लिया है
साबुन का कमाल
कुत्ते ने काट लिया हो तो उस जगह को साबुन से अच्छी तरह धो लें।
छोटे-2 कीड़े-मकौड़े, मच्छर आदि ने काटा है
नींबू का कमाल
काटे गये स्थान पर नींबू का रस मलें।
पागल कुत्ते ने काटा है
लाल मिर्च का कमाल
लाल मिर्च पीसकर उसमें सरसों का तेल मिलाएँ और काटे स्थान पर लेप कर दें।
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साहिब बन्दगी
बंदर ने काटा है
शहद का कमाल
प्राथमिक चिकित्सा के रूप में शहद में गोबर मिलाकर लगाएँ।
बिच्छू ने काटा है
लाल मिर्च का कमाल
लाल मिर्च पीसकर काटे स्थान पर लगाएँ।
नीम का कमाल
नीम के पत्ते मसलकर लगाएँ।
लौकी का कमाल
लौकी को काटकर रस निकालकर लें। लौकी को पीसकर उस स्थान पर लेप कर दें और निकाला हुआ रस रोगी को पिला दें।
फिटकरी का कमाल
फिटकरी को पत्थर पर पानी के साथ घिसकर लेप बनाकर लगाएँ।
अन्य और सहायक उपचार
❑ बिच्छू काट लेने पर सबसे पहले तुरंत नहा लेना दर्द को ऊपर चढ़ने से रोकता है।
❑ लहसुन और अमचूर को समान मात्रा में पीसकर मिला लें। इस दवा को काटे हुए स्थान पर लगाएँ।
भौरै ने काटा है
तुलसी का कमाल
तुलसी के पत्तों को पीसकर नमक मिलाकर लेप करें।
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मकड़ी ने काटा है
आम का कमाल
अमचूर को पानी के साथ घिसकर लेप बना लें। यह लेप काटे हुए स्थान पर लगाएँ।
मधुमक्खी ने काटा है
शहद का कमाल
- ❑ शहद में माचिस का मसाला मिलाकर लगाएँ।
- ❑ शहद में आक का दूध मिलाकर लगाएँ।
साँप ने काटा है
अंकोल का कमाल
अंकोल की जड़ को अच्छी तरह से पीस रस निकालकर पिलाएँ।
बेल का कमाल
बेल और कैथ-दोनों की जड़ को पानी में पीसकर पिलाएँ। बड़ी लाभकारी है।
करौंदे का कमाल
करौंदे की जड़ को पानी में उबालकर पिलाएँ।
अन्य और सहायक उपचार
- ❑ 18 ग्राम प्याज के रस में इतना ही सरसों का तेल मिलाकर रोगी को पिलाएँ। पौन घण्टे बाद फिर यही दवा दें। फिर पौन घण्टे बाद एक और दवा दें।
- ❑ नीम की पत्तियाँ खिलाएँ।
- ❑ विषखपरा का रस पिलाएँ।
- ❑ पानी में फिटकरी घोल कर पिलाएँ।
कुछ ध्यान देने योग्य बातें
कुछ ध्यान देने योग्य बातें
मल-मूत्र के विसर्जन में ध्यान दें
- ▣ मल-मूत्र को अधिक देर तक रोके रखना रोगों को आमंत्रित करना है।
- ▣ उकडू बैठकर मल-विसर्जन करें। इससे मल अच्छी तरह विसर्जित होता है।
भोजन करने में ध्यान दें
- ▣ जब मल-मूत्र का वेग हो तब भोजन नहीं करना चाहिए।
- ▣ भोजन करते समय मौन रहें।
- ▣ भोजन करते समय पानी 1-2 घूँट करके ही पिएँ। बहुत अधिक पानी भोजन के साथ मत लें। भोजन के साथ घूँट-2 पानी अमृत समान है, लेकिन बहुत अधिक पानी ठीक नहीं। भोजन के तुरंत बाद पानी मत पिएँ, यह विष समान है।
- ▣ एक बार भोजन करके दूसरी बार भोजन करने में पाँच-छः घण्टे का अंतर जरूर रखें।
- ▣ भोजन को चबा-चबाकर तरल बनाकर खाएँ।
- ▣ हो सके तो भोजन खुली-ताजी-स्वच्छ हवा और धूप में खाएँ। पर यदि कमरे में खाना हो तो ताजी हवा के आने का मार्ग बंद न करें।
- ▣ भोजन का समय भी निश्चित होना चाहिए। असमय भोजन करना भी हानिकारक हो जाता है। यदि आप शाम को 6 बजे भोजन करते हैं तो ज्यादा-से-ज्यादा साढ़े छः ही होने दें।
- ▣ सुबह पाचन-शक्ति तेज होती है, फिर यह शाम तक लगातार
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आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
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धीरे-धीरे कम होती जाती है, इसलिए भोजन का अधिक अंश सुबह ही कर लें। शाम को कम भोजन करना चाहिए और रात को सोते समय तो बिलकुल भी नहीं खाना चाहिए।
▣ शाम का भोजन सोने से कम-से-कम दो घण्टा पहले होना चाहिए। ऐसे में नींद भी अच्छी आयेगी।
▣ बहुत गर्म और बहुत ठण्डे खाद्य पदार्थ के सेवन से बचें।
▣ चखो पर चरो मत, चरो तो फरो, न फरो तो मरो। किसी ने कितना प्यारा कहा है। भोजन के मामले में अल्प आहारी बनें। यानी कुछ भी खाना हो, बहुत ज्यादा नहीं खाएँ। यदि ज्यादा खा लिया तो फिर सैर कर लो। यदि खुराक बहुत है और सैर भी नहीं करते हो तो जल्दी मरने के लिए तैयार रहो।
पानी पीने में ध्यान दें
▣ खड़े होकर पानी मत पिएँ।
▣ साधारणतया हररोज दो लीटर पानी जरूर पीना चाहिए।
▣ सुबह उठकर एक बड़े गिलास पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर पीना मल की सही सफाई के लिए बड़ा लाभाकारी होता है।
▣ जल घूँट-2 करके पीना चाहिए। दो-तीन सैकेण्ड मुँह में रखने के बाद ही नीचे उतारना चाहिए।
▣ जो जल आप पी रहे हैं, ध्यान रहे कि वो न अधिक गर्म हो और न अधिक ठण्डा। चाहे कितनी भी गर्मी हो, पर अधिक ठण्डे जल का सेवन मत करें। वो हानिकारक ही होता है।
▣ भूख लगने पर पानी मत पिएँ, इससे जलोदर रोग हो सकता है।
स्वच्छता में ध्यान दें
▣ साफ-सुथरे वस्त्र पहनें।
▣ स्वच्छ पानी पिएँ।
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साहिब बन्दशी
- □ अत्यंत स्वच्छता से बना हुआ भोजन करें। रसोई में चप्पल का प्रयोग वर्जित कर दें।
- □ आटा गूँथते समय मुँह और नाक को चुनरी से ढक लें।
- □ स्नान किए बिना भोजन न बनाएँ।
- □ किसी का जुटा बिलकुल मत खाएँ और न ही जुठी थाली में भोजन करें।
- □ तौलिया, कंघी आदि भी जुटा न हो बल्कि अपना अलग होना चाहिए।
- □ सोने का बिस्तर साफ-सुथरा होना चाहिए।
- □ घर की साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखें।
- □ मुँह ढाँपकर मत सोएँ।
स्नान में ध्यान दें
- □ जब स्नान करें तो सबसे पहले सिर पर पानी डालें।
- □ रात के समय स्नान मत करें।
सोने और जागने पर ध्यान दें
- □ दिन में सोना ठीक नहीं है।
- □ अधिक सोना भी ठीक नहीं है।
- □ सुबह सूर्योदय से पहले जगने वाले कई रोगों से बचे रहते हैं।
- □ सुबह चार बजे जगना उत्तम है।
ब्रश करने पर ध्यान दें
- □ ब्रश करते समय दाँतों पर जोर से नहीं रगड़ें।
- □ हो सके तो दातुन जरूर करें।
- □ जो ब्रश आप कर रहे हैं, ध्यान दें कि उसके रेशे कोमल हों।
प्राणायाम और योगासनों द्वारा स्वास्थ्य रक्षा
प्राणायाम और योगासनों
द्वारा स्वास्थ्य रक्षा
वस्त्रिका प्राणायाम
पद्मासन या सुखासन या कैसे भी बैठकर कमर को सीधा रखें। धीरे-धीरे दोनों नथुनों से स्वांस अंदर भरें। स्वांस नाभि तक जाना चाहिए और पेट थोड़ा अंदर की ओर जाना चाहिए। छाती स्वांस से फूली हुई नजर आनी चाहिए। बिना रोके अब धीरे-धीरे स्वांस को बाहर निकालें। इस तरह 3 से 5 मिनट तक करें।
कपालभाती प्राणायाम
पद्मासन या सुखासन में बैठकर दोनों हाथ दोनों घुटनों पर ज्ञानमुद्रा (छोटी उँगली और अंगूठे को मिलाते हुए बाकी उँगलियाँ सीधी रखें) में रखें। अब सांस को बाहर छोड़ें। ऐसे में नाभि को पीछे झटका लगेगा। सांस लेना बिलकुल नहीं है। एक बार छोड़ने और दूसरी बार छोड़ने के बीच में जो अंतर आता है, वो अपने आप ही अंदर चला जाता है।
सांस इस प्रकार छोड़ना है, मानो नाक साफ कर रहे हों और पेट को झटना लग रहा हो। यह भी 4-5 मिनट तक कर सकते हैं।
अनुलोमविलोम प्राणायाम
दाएँ नथुने को दाएँ हाथ के अंगूठे से बंद करते हुए बाएँ नथुने से धीरे-धीरे सांस ऊपर खींचें।
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साहिब बन्दगी
अब दाएँ हाथ की ही बीच वाली दो उँगलियों से बाएँ नथुने को बंद करते हुए दाएँ नथुने से धीरे-धीरे सांस छोड़ दें। ऐसे में अंगूठा हटा लें।
अब दाएँ नथुने से पहले की तरह धीरे-धीरे सांस खींचें। फिर दाएँ हाथ के अंगूठे से दाएँ नथुने को बंद करते हुए बाएँ नथुने से धीरे-धीरे सांस छोड़ें।
इस तरह से एक चक्र पूरा होगा। ऐसे आप 5 से 15 मिनट तक करें।
ध्यान रहे, शुरू करते समय बाएँ नथुने से सांस खींचनी है और समाप्त करते समय भी बाएँ नथुने से ही सांस को बाहर छोड़कर खत्म करना है।
लाभ: हृदय, मेदा, अंतर्द्वियाँ, ज्विगर, फेफड़े, दिमाग, कैंसर, लीवर आदि से संबंधित जितनी भी बीमारियाँ हैं, सबमें ये बहुत लाभकारी हैं।
भुजंगासन की विधि
पेट के बल इस तरह लेटें कि आपका माथा जमीन को छू ले और टोड़ी छाती से लग जाए। पैरों को मोड़कर बाहर की ओर करें। टाँगें एक साथ जोड़े रखें। हाथों को कंधे के पास रखें।
अब धीरे-धीरे हाथों के सहारे सिर को ऊपर उठाते जाएँ, पर बाहों पर ज्यादा भार न पड़े। ऐसा करते हुए आप अंदर की ओर सांस लें। पेड़ स्थान (नाभि के नीचे का स्थान) जमीन के साथ लगा रहे, बाकी शरीर को ऊपर उठा लें। आँखों से 90° ऊपर देखने का प्रयास करें। ऊपर जितनी देर रुक सकें, रुकें और खास बात ध्यान दें कि ऊपर जितनी देर रुकें सांस को भी रोके रखें।
अब धीरे-धीरे नीचे वापिस लाते हुए सांस को भी धीरे-धीरे
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छोड़ते जाएँ और हाथों को पीछे मोड़ लें।
अब पुनः इस प्रक्रिया को दोहराएँ। 3 बीर लगातार यह प्रक्रिया कर लें।
लाभ :
- ❑ पेट की बीमारियों को ठीक करता है
- ❑ कमर संबंधित रोग नहीं होने देता।
- ❑ गुदों से संबंधित रोगों में बहुत लाभकारी है।
मत्स्यासन की विधि
सबसे पहले पद्मासन में बैठें। दोनों पैरों को एक-दूसरी जाँघ पर रखें।
अब कोहनियों के सहारे बाकी शरीर को धीरे-धीरे पीछे ले जाते हुए लिटा दें और हाथों से पैरों के अँगूठे पकड़कर कुछ देर इसी मुद्रा में रहें।
अब कमर को धीरे-धीरे ऊपर उठाकर गर्दन को इस तरह पीछे की ओर मोड़ें कि सिर का ऊपरी भाग जमीन को स्पर्श करे और चेहरा पीछे की ओर हो जाए।
अब इस स्थिति में सांस लेते-2 कुछ देर के लिए रोक लें।
अब आपको वापिस सामान्य स्थिति में आना है। इसके लिए सबसे पहले आपने जो पैर के अँगूठे पकड़े हैं, उन्हें छोड़ें, फिर सिर और कमर को सामान्य अवस्था में लाकर लेट जाएँ। अब कोहनियों के सहारे से वापिस पद्मासन वासी स्थिति में पहुँचें। अब टोंगों को जाँघों पर से हटाएँ। यह सब क्रियाएँ धीरे-धीरे करें।
लाभ :
- ❑ टॉन्सिल को ठीक करता है।
- ❑ फेफड़े संबंधी रोग ठीक करता है।
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साहिब बन्दशी
- □ जुकाम को ठीक करता है।
- □ मुँहासे दूर करके चेहरे पर रंगत लाता है।
वज्रासन की विधि
घुटनों के बल बैठकर पाँवों को पीछे बाहर की ओर इस तरह फैलाएँ कि अँगूठे आपस में मिले रहें। अब एड़ियों पर बैठ जाएँ। अब दोनों हथेलियों को घुटनों पर रखें। अँगुलियाँ नीचे भी जा सकती हैं। सांस प्रक्रिया सामान्य ही चलती रहे। ध्यान दें कि रीढ़ की हड्डी बिलकुल सीधी रहे और सिर भी सीधा रहे। जितनी देर इस स्थिति में बैठ सकते हैं, बैठें।
लाभ :
- □ कमर दर्द ठीक करता है।
- □ पाचन क्रिया में लाभकारी है।
सिंह मुद्रासन की विधि
वज्रासन की तरह घुटनों के बल बैठें। अंतर यह रहे कि पैरों को बाहर की ओर न फैलाकर उनके अँगूठों की दिशा अंदर की ओर ही रखें और घुटनों को खुला-2 रखें।
अब शरीर को थोड़ा झुकाकर हाथों को उलटा करके जमीन पर फैलाकर रखें ताकि हाथों की उँगलियाँ घुटने को स्पर्श करें।
अब सिर को आगे की ओर झुकाकर ठोड़ी को छाती के साथ स्पर्श कराएँ और मुँह और नाक दोनों से बाहर की ओर सांस बाहर निकालते हुए जीभ को जितना हो सके बाहर निकालें।
अब इसी तरह से आँखों को चौड़ा करते हुए सामने की ओर देखें। मात्र तीन सेंकेंड बाद जीभ धीरे-धीरे वापिस अंदर करें और नाक
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से सांस लेते हुए वापिस साधारण स्थिति में आ जाएँ। यह प्रक्रिया दो-तीन बार कर सकते हैं।
लाभ :
- ❑ टॉन्सिल ठीक करता है।
- ❑ स्वांस संबंधी रोगों में लाभकारी है।
योग मुद्रासन की विधि
मृदासन में बैठ जाएँ। अब हाथों को पीछे पीठ पर ले जाएँ और एक हाथ से दूसरे की कलाई पकड़ लें। अब सांस को बाहर निकालते हुए धीरे-धीरे नीचे की ओर झुकेँ और सिर को जमीन से लगा दें। कुछ देर इस स्थिति में रहकर सांस अंदर की ओर लेते हुए धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठें। कम-से-कम 3-4 बार यह प्रक्रिया कर लें।
लाभ :
- ❑ तनाव को दूर करता है।
- ❑ पाचन संबंधी रोगों में लाभकारी है।
पद्मासन की विधि
टॉगों को सामने की ओर फैलाकर बैठें। अब दाईं टॉग को बाईं जाँघ पर रखें और फिर बाईं टॉग को दाईं जाँघ पर रख लें। पैरों की एड़ियाँ पेट से लग जाएँ। कमर, सिर, गर्दन आदि बिलकुल सीधे रहें। हाथों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर गोद में रख लें अथवा घुटनों पर रख लें। जितनी देर इस स्थिति में रह सकें, रहें और फिर वापिस आने के लिए पहले एक टॉग को पकड़कर उतारें और फिर दूसरी को।
लाभ :
- ❑ पाचन क्रिया को ठीक करता है।
- ❑ जोड़ों के दर्द में लाभकारी है।
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साहिब बन्दशी
धनुरासन की विधि
पेट के बल लेटें। अब घुटनों को मोड़कर टॉगें ऊपर की ओर ले जाएँ। अब सिर भी ऊपर की ओर उठाएँ। अब हाथों से दोनों टॉगों को पकड़ लें और धीरे-से खींचें, जिससे धनुष का आकार बन जाए। दृष्टि ऊपर की ओर रहे। जितनी देर रह सकें, रहने के बाद धीरे-से साधारण स्थिति में आएँ।
लाभ :
- □ मंदाग्नि को दूर करता है।
- □ कब्ज को दूर करता है।
- □ बवासीर में लाभकारी है।
- □ दिमाग़ तो ताक़त देता है।
नोट : प्रत्येक आसन को करने के बाद शवासन जरूरी है। इसके लिए तनावमुक्त होकर बाज़ुओं को ढीला छोड़कर आँखें बंद करके एक-डेढ़ मिनट के लिए लेट जाएँ और लंबी गहरी सांस लेते रहें।
ये आसन आपको कई छोटी-छोटी ही नहीं, बल्कि बड़ी-से-बड़ी बीमारियों से छुटकारा ही नहीं दिलाते, होने से भी बचाते हैं। इसलिए अपनी सुविधानुसार कुछ आसन और प्राणायाम आप नित्य करके अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर सकते हैं।
चिंता का जहर छोड़ें भरोसे की दवा खाएँ
चिंता का ज़हर छोड़ें; भरोसे
की दवा खाएँ
एक विश्वास ही आपको कई भयंकर बीमारियों से भी छुटकारा दिला सकता है। एक ओर जहाँ चिंता कई भयंकर रोगों का कारण बनती है तो दूसरी ओर भरोसा भयंकर-से-भयंकर रोगों का नाश करता है।
यह विश्वास हो कि आपके इष्ट, आपके गुरु आपके साथ हैं, कोई भी बीमारी आपका कोई नुकसान नहीं कर सकती है। आप डॉक्टरों इलाज जरूर करवाएँ, पर सदगुरु पर पक्का भरोसा हो तो कुछ भी हो सकता है। आप मुसीबतों से घबराएँ नहीं, केवल सदगुरु का ही ध्यान करते रहें, आपकी सब चिंता वो ले लेंगे और आप उस चिंता से बिलकुल ही मुक्त हो जायेंगे।
यह भरोसा बहुत बड़ी बात है, यह विश्वास बहुत लाजवाब चीज़ है। जब भी आप अपना सबकुछ सच्चे दिल से अपने इष्ट, अपने गुरु पर छोड़ते हैं, उनका ही भरोसा करते हैं तो उनको आपकी सहायता करनी पड़ जाती है।
Three stylized lotus flower symbols arranged horizontally, serving as a decorative separator.
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साहिब बन्दगी
आरती
आरति करहुँ संत सदगुरु की, सदगुरु सत्यनाम दिनकर की। काम, क्रोध मद, लोभ नसावन, मोह रहित करि सुरसरि पावन। हरहिं पाप कलिमल की, आरति करहुँ संत सदगुरु की॥ सदगुरु सत्यनाम.....
तुम पारस संगति पारस तब, कलिमल ग्रसित लौह प्राणी भव। कंचन करहिं सुधर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की॥ सदगुरु सत्यनाम.....
भुलेहुँ जो जिव संगति आवें, कर्म भर्म तेहि बाँधि न पावें। भय न रहे यम घर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की॥ सदगुरु सत्यनाम.....
योग अग्नि प्रगटहि तिनके घट, गगन चढ़े श्रुति खुले वज्रपट। दर्शन हों हरिहर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की॥ सदगुरु सत्यनाम.....
सहस्र कँवल चढ़ि त्रिकुटी आवें, शून्य शिखर चढ़ि बीन बजावें। खुले द्वार सतघर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की॥ सदगुरु सत्यनाम.....
अलख अगम का दर्शन पावें, पुरुष अनामी जाय समावें। सदगुरु देव अमर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की॥ सदगुरु सत्यनाम.....
एक आस विश्वास तुम्हारा, पड़ा द्वार मैं सब विधि हारा। जय, जय, जय गुरुवर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की॥ सदगुरु सत्यनाम.....
आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
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आरती
जय सदगुरु देवा, स्वामी जय सदगुरु देवा, सब कुछ तुम पर अर्पण करहूँ पद सेवा।
जय गुरुदेव दया निधि, दीनन हितकारी, स्वामी भक्तन हितकारी, जय जय मोह विनाशक, जय जय तिमिर विनाशक, भय भंजन हारी। साहिब जय.....
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, गुरु मूर्ति धारी, स्वामी प्रभु मूर्ति धारी, वेद पुराण बखानत, शास्त्र पुराण बखानत, गुरु महिमा भारी। साहिब जय.....
जप तप तीर्थ संयम, दान विधि दीन्हे, स्वामी दान बहुत दीन्हे, गुरु बिन ज्ञान न होवे, दाता बिन ज्ञान न होवे, कोटि यत्न कीन्हे। साहिब जय.....
माया मोह नदी जल, जीव बहे सारे, स्वामी जीव बहे सारे, नाम जहाज बिठाकर, शब्द जहाज चढ़ाकर, गुरु पल में तारे। साहिब जय.....
काम क्रोध, मद, लोभ, चोर बड़े भारी, स्वामी चोर बहुत भारी, ज्ञान खड़ग दे कर में, शब्द खड़ग देकर में, गुरु सब संहारे। साहिब जय.....
नाना पंथ जगत में निज-निज गुण गावें, स्वामी न्यारे-न्यारे यश गावें, सब का सार बताकर, सब का भेद लखा कर, गुरु मार्ग लावें। साहिब जय.....
गुरु चरणामृत निर्मल, सब पातक हारी, स्वामी सब दोषक हारी, वचन सुनत तम नासे, शब्द सुनत भ्रम नासे, सब संशय टारी। साहिब जय.....
तन, मन, धन सब अर्पण, गुरु चरण कीजै, स्वामी दाता अर्पण कीजै, सद्गुरु देव परमपद, सद्गुरु देव अचलपद, मोक्ष गती लीजै। साहिब जय.....
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साहिब बन्दशी
पुस्तक सूची
हिन्दी में
- 1. परा रहस्या
- 2. मासिक पत्रिका सत्यकेतु
- 3. पावन प्रार्थनाएं
- 4. सदगुरु चालीसा
- 5. वार्षिक डायरी
- 6. सदगुरु भक्ति
- 7. कहाँ से तू आया और कहाँ तूझे जाना रे ?
- 8. सत्संग सुधा रस
- 9. नाम अमृत सागर
- 10. अमृत वाणी
- 11. सदगुरु नाम जहाज हैं
- 12. चल हंसा सतलोक
- 13. कोटि नाम संसार में तिनते मुक्ति न होय।
- 14. मूल नाम गुप्त है, जाने बिरला कोय ॥
- 15. गुरु सुमित्रे सो पार
- 16. तीन लोक से न्यारा
- 17. सेहत के लिए जरूरी
- 18. सहजे सहज पाइये
- 19. रोगों से छुटकारा
- 20. सदगुरु महिमा
- 21. भक्ति के चोर
- 22. अनुरागसागर वाणी
- 23. भक्ति सागर
- 24. हरि सेवा युग चार है, गुर सेवा पल एक
- 25. सत्य नाम के सुमरते उबरे पतित अनेक
- 26. काग पलट हंसा कर दीना
- 27. कस्तूरी कुण्डल बसे मृग खोजे बन माहि
- 28. गुरु पारस गुरु परस है
- 29. गुरु अमृत की खान
- 30. शीश दिये जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान
- 31. मूल सुरति
- 32. भृंग मता होय जिहि पास, सो गुरु सत्य धर्मदासा ॥
- 33. मैं कहता हूँ ऑश्चिन देखी
- 34. गुरु संजीवन नाम बतावे
- 35. नाम बिना नर भटक मरे
- 36. रोगों की पहचान
- 37. यह संसार काल का देश
- 38. न्यारी भक्ति
- 39. साहिब तेरी साहिबी सब घट रही समाय
- 40. जाप मरे अजपा मरे अनहद भी मर जाए
- 41. आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
- 42. सुरति समानी नाम में
आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में
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सत्यपुरुष का पाँचवा पुत्र निरंजन है जो तीन लोक का राजा, चौरासी लाख योनियों व अनहद का रचयिता है
- 1. मैं सिरजों में मारऊँ, मैं जारौं में खाऊँ। जल थल नभ महँ रमि रहा, मोर निरंजन नाऊँ ॥
- 2. सात शून्य सातहि कमल, सात सुरति स्थान। इक्कीस ब्रह्माण्ड लग, काल निरंजन ज्ञान ॥
- 3. एक पाट धरती चले, एक चले असमानी। काल निरंजन पीसन लगे, सवा लाख की धानी ॥
- 4. गुप्त भयो हैं संग सबके, मन निरंजन जानिये ॥
- 5. अनहद की धुन भँवरगुफा में, अति घनघोर मचाया है। बाजे बजे अनेक भांति के, सुनि के मन ललचाया है ॥
.....
यह सब काल जाल को फँदा, मन कल्पित ठहराया है ॥
- 6. तहाँ अनहद की घोर शब्द झनकार है। लग रहे सिद्ध साधु न पावत पार है ॥
- 7. मन ही निराकार निरंजन जानिए ॥
- 8. ज्योति निरंजन लग काल पसारा। मन माया भई किया सृष्टि विस्तारा ॥
- 9. बिना जाने जो नर भक्ति करई। सो नहीं भवसागर से तरई ॥
- 10. मन ही सरूपी देव निरंजन तोहि रहा भरमाई। हे हंसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई ॥
—कबीर साहिब
106
साहिब बन्दशी
| योगमत | संतमत |
|---|---|
| 1. योगमत में काया का नाम है। | |
| 2. योग मत चाचरी, भूचरी, अगोचरी, मुद्राओं के ईर्द-गिर्द घूमता है, जो शरीर में हैं। | |
| 3. यह नाम लिखने-पढ़ने में आता है। इनसे काल-पुरुष ने पाँच तत्व पैदा किये और शरीरों की रचना की। | |
| 4. योगमत में अनहद धुनों को ही परमात्मा माना जाता है। |
5. योगमत करनी अथवा कमाई का मार्ग है। 6. योगमत में सुरति शब्द का अभ्यास किया जाता है। 7. योगमत में काल का नाम लिया जाता है। यह नाम शरीर को दिया जाता है। 8. योगमत में गुरु की भूमिका न के बराबर होती है। 9. योगमत सीमाबद्ध है, जिसमें साधक दसवें द्वार तक ही जाता है। | 1. संतमत में विदेह नाम है। 2. संतमत में पाँच मुद्राओं से आगे शीश से सवा हाथ ऊपर ध्यान रखने को कहा है। 3. यह अकह नाम है जो लिखने-पढ़ने में नहीं आता है और पाँच तत्वों से बाहर है।
4. संतमत में आत्मा किसी शब्द की मोहताज नहीं, क्योंकि आत्मा अपने आप में परिपूर्ण है। 5. यह सहज मार्ग है, गुरु कृपा का मार्ग है और भुंग-मता है। 6. संतमत सुरति को चेतन करने का मार्ग है। 7. संतमत जिंदा नाम प्रदान करता है जोकि शरीर को छोड़ आत्मा को दिया जाता है। 8. संतमत में भक्ति का सार ही संत सदगुरु है। 9. संतमत असीम है जो कि ग्यारहवें द्वार की बात करता है, जो सुरति में है।