बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
९२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ व्रणप्रायश्चित्तम्
ब्राह्मणस्य व्रणद्वारे पूयशोणितसम्भवे ।
क्रिमिरुत्पद्यते तत्र प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ॥३५॥
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् ।
त्र्यहं स्नात्वा च पीत्वा च क्रिमिदष्टः शुचिर्भवेत् ॥३६॥
यदि ब्राह्मण के मवाद और रक्त से भरे चोट या फोड़े पर क्रिमि उत्पन्न हो जाय तो उसका प्रायश्चित्त किस प्रकार से किया जायगा ? क्रिमि उत्पन्न होने पर गाय का मूत्र, गाय का गोबर, दूध, दधि, घृत, कुश के साथ ( उबाले गये ) जल तीन दिन स्नान कर पीने पर शुद्ध होता है ।
टि०— सूत्र में 'क्रिमिदष्टः' है । गोविन्द स्वामी के अनुसार यह नियम केवल क्रिमि के काटने पर ही नहीं, अपितु अपने शरीर में उत्पन्न क्रिमि के काटने पर है । अथवा यह प्रायश्चित्त फोड़े या चोट पर क्रिमि उत्पन्न होने की स्थिति में विहित है ।
नैतत्क्रिमिदंशनमात्रे चोद्यते । क्व तर्हि ? स्वशरीरोत्पन्नक्रिमिदंशे । इत-
-रथा प्रश्नोत्तरानुपपत्तेः । यद्वा—व्रणद्वारे क्रिमीणामुत्पत्तिमात्रे एतत्प्रायश्चित्तम्,
न दंशने ॥ ३५-३६ ॥
शुनोपहतस्सचेलोऽवगाहेत ३७ ॥
**अनु०—**कुत्ते के छू देने पर वस्त्रों को पहने हुए स्नान करे ॥ ३७ ॥
शुनोपहतः शुना स्पृष्टः नाभेरूर्ध्वमिति शेषः ॥ ३७ ॥
अथ वाऽऽह—
प्रक्षाल्य वा तं देशमग्निना संस्पृश्य पुनः प्रक्षाल्य पादौ चाऽऽ-
चम्य प्रयतो भवति ॥ ३८ ॥
अथवा जिस अंग का कुत्ते ने स्पर्श किया हो उसे धोकर फिर उसे अग्नि से स्पर्श कराये, पैरों को धोकर आचमन करने पर शुद्ध होता है ॥ ३८ ॥
**टि०—**गोविन्द स्वामी ने उपर्युक्त वस्त्र सहित स्नान का नियम उस अवस्था के लिए बताया है जब कुत्ते ने नाभि से ऊपर स्पर्श किया हो । गौतम ने भी कुत्ते के स्पर्श पर वस्त्र सहित स्नान का प्रायश्चित्त बताया है, २. ५. ३०, पृ० १५३ ।
किन्तु अन्य आचार्यों का मत भी उद्धृत किया है जिनके अनुसार जिस अंग को छुए हों उसे धोने से ही शुद्धि हो जाती है यदुपहन्यादित्येके २. ५. ३१.
संभवतः गोविन्द स्वामी ने नाभि से ऊपर स्पर्श पर वस्त्रसहित स्नान का नियम जातूकर्ण्य की इस व्यवस्था के आधार पर निर्दिष्ट किया हो—
एकादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ९१
एकादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ९१
ऊर्ध्वं नाभेः करो मुक्त्वा स्पृशत्यङ्गं खरो यदि ।
स्नानं तत्र विधातव्यं शेषे प्रक्षाल्य शुध्यति ॥
कुत्रचिदिदं प्रायश्चित्तं भवति ? स्नानाशक्तौ वा पादौ प्रक्षाल्य पुनराचामेदिति सम्बन्धः ॥ ३८ ॥
शुना दष्टस्य कथमित्यत आह—
अथाऽप्युदाहरन्ति—
शुना दष्टस्तु यो विप्रो नदीं गत्वा समुद्रगाम् ।
प्राणायामशतं कृत्वा घृतं प्राश्य विशुध्यति ॥
सुवर्णरजताभ्यां वा गवां शृङ्गोदकेन वा ।
नवैश्च कलशैस्स्नात्वा सद्य एव शुचिर्भवेत् ॥ ३९ ॥
इस विषय में निम्न लिखित पद्य भी उद्धृत किये जाते हैं—
जिस ब्राह्मण को कुत्ते ने काट लिया हो वह समुद्र में मिल जाने वाली नदी में स्नान कर, सौ बार प्राणायाम कर घी का भक्षण करने पर शुद्ध होता है । अथवा सोने या चाँदी के बर्तनों में लाये गये या गाय के सींग में लाये गये जल से अथवा मिट्टी के नये घड़ों में लाये गये जल से स्नान करने पर तत्काल शुद्ध हो जाता है ।
श्वाधिकारेपुनः श्वग्रहणं श्वापदादीनां प्रदर्शनार्थम् । नदीं गत्वा स्नात्वा चेति शेषः । सुवर्णरजतेति । इदमपि शुना दष्टस्यैव । कनकराजतनिर्मितेन पात्रेण नवैश्च मृन्मयैर्वा कलशैः स्नानमेकः कल्पः । गवां शृङ्गोदकेन नवैश्च कलशैरित्यपरः ॥ ३९ ॥
इति बौधायनीये धर्मसूत्रे प्रथमप्रश्ने एकादशः खण्डः ॥ ११ ॥
पञ्चमाध्याये द्वादशः खण्डः
एवं तावत्प्राणिविशेषैर्दष्टस्य प्रायश्चित्तमुक्तम् । अथेदानों प्राणिविशेषे¹ भक्षणं प्रतिषेधति—
अभक्ष्याः पशवो ग्राम्याः ॥ १ ॥
¹ १. भक्षणप्रतिषेधमाह ग. पु.
९४ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ अभक्ष्याः
अनु०— ग्राम्य (पालतू) पशु अभक्ष्य होते हैं ॥ १ ॥
सप्त ग्राम्याः पशवः गोश्वाजाविकं पुरुषश्च गर्दभश्च उष्ट्रस्सप्तमोऽश्वमुष्ट्रैके ब्रुवते ॥ १ ॥
क्रव्यादारशकुनयश्च ॥ २ ॥
अनु०— मांसभक्षी पशु ओर (पालतू) पक्षी अभक्ष्य होते हैं ॥ २ ॥
टि०— क्रव्यादाः = मांसभक्षी का संबन्ध 'शकुनयः' के साथ भी लिया जा सकता है। सूत्र में 'च' के प्रयोग के आधार पर गोविन्द स्वामी 'शकुनयः' के साथ भी 'ग्राम्याः' पद को ग्रहण करते हैं। इस प्रकार यहाँ पालतू पक्षियों से तात्पर्य है।
क्रव्यं मांसं तददन्तीति क्रव्यादाः। शकुनयः काकाः शकुन्ता वा ग्राम्यानुकर्षणार्थश्चकारः। एतेषां भक्ष्यत्वेन कामतः प्राप्तानां प्रतिषेधः। तथा च श्रुतिः—'स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति' इति मुख्यप्राणेन पृष्टे ऊचुः 'यत्किञ्चिदिदमाश्वभ्य आशकुनिभ्य इति होचुः' इति आह च मनुः—
प्राणस्याऽन्नमिदं सर्वं प्रजापतिरकल्पयत् ॥ इति ॥
अतस्सर्वमिदं भक्ष्यत्वेन प्राप्तं तन्निवारणार्थे प्रकरणारम्भः ॥ २ ॥
तथा कुक्कुटसूकरम् ॥ ३ ॥
अनु०— इसी प्रकार (ग्राम्य) कुक्कुट और सूकर का मांस अभक्ष्य होता है ॥ ३ ॥
टि०— यहाँ 'तथा' से 'ग्राम्याः' पद की अनुवृत्ति समझी जायगी। पक्षियों के विषय में गौतम ध० सू० में अलग-अलग उल्लेख किया गया है: 'काककङ्कगृध्रश्येनार जलजा रक्तपादतुण्डा ग्राम्यकुक्कुटसूकराः' २. ८. २९. मेरे अनुवाद सहित चौखम्बा संस्करण, पृ० १८६।
तथाशब्दोऽपि ग्राम्यानुकरणार्थ एव । कुक्कुटसूकरमिति द्वन्द्वैकवद्भावः ॥ ३ ॥
साम्प्रतं ग्राम्यपशुविषयप्रतिषेधापवादमाह—
अन्यत्रा¹ जाविकेभ्यः ॥ ४ ॥
अनु०— बकरा और भेड़ को छोड़कर अन्य ग्राम्य पशुओं के भक्षण के विषय में ही निषेध समझना चाहिए ॥ ४ ॥
प्रत्येकं बहुवचनं जात्याख्यायामन्यतरस्यां भवति। अजाविकौ भक्ष्यौ ॥
१. अन्यत्राऽजाविभ्यः इति क. पु. अन्यत्राऽजेभ्यः इति ख. पु.
द्वादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ९५
द्वादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ९५
भक्ष्याः श्वाविद्गोधाशशशल्यककच्छपखड्गाः खड्गवर्जं: पञ्च पञ्चनखाः ॥ ५ ॥
अनु०—श्वाविद्-गोधा ( गोह ), खरगोश, शल्यक, कच्छप और खड्ग इनमें खड्ग के अतिरिक्त पांच नखवाले पांच पशु भक्ष्य होते हैं ॥ ५ ॥
टि०—सूत्र में पहले खड्ग को एक साथ गिनाकर 'पञ्च पञ्चनखाः' 'खड्गवर्जः' कहकर विकल्प नियम प्रस्तुत किया गया है। खड्ग का मांस भक्षण करने के विषय में विवाद है, जिसका उल्लेख गोविन्द स्वामी ने अपनी व्याख्या में किया है और वसिष्ठ के वाक्य को उद्धृत किया है 'खड्गे तु विवदन्ते'। श्वाविद्-कुत्ते जैसा मृग है; शल्यक एक विशेष प्रकार का सूअर है; गोधा गोह को कहते हैं। खड्ग भी एक विशेष प्रकार का मृग है 'खड्गो मृगविशेषः' 'शल्यको वराहविशेषो यस्य नाराचाकाराणि लोमानि। गोधा कृकलासाकृतिमहाकायः'—गौतम ध० सू० पर २.८.२७ हरदत्त कृत मिताक्षरा । 'पञ्चनखाश्चाशल्यकशशश्वाविद्गोधाखड्ग कच्छपाः' वही, पृ० १८६.
¹परिसङ्ख्यैषा । कामत एवैषामपि भक्ष्यत्वे प्राप्ते भक्ष्येतरनिषेधार्थम् । 'पञ्चपञ्चनखग्रहणाच्च सजातीयपरिसंख्यैषा गम्यते । श्वाविदादीन् षडनुक्रम्य 'पञ्चग्रहणात् षष्ठस्य परिसङ्ख्यायां विकल्पः। तच्च स्पष्टीकृतम्-खड्गवर्जंा इति । तथा च वसिष्ठः—'खड्गे तु विवदन्ते' इति । आचार्येणाऽप्युक्तं 'खड्गंश्श्राद्धे पवित्रम्' इति । एवमुत्तरेष्वपि खड्गवत् यथासम्भवं योजना । श्वाविङः 'श्वसदृशमृगाः। शल्यकाः वराहविशेषाः । ऋज्यन्त्यत् ॥ ५ ॥
तथर्श्यहरिणपृषतमहिषवराह ²कुलुङ्गाः कुलुङ्गवर्जं: पञ्च द्विखुरिणः ॥ ६ ॥
अनु०—इसी प्रकार श्वेत खुर वाला मृग ( नील गाय ), सामान्य हरिण, धारीदार चर्म वाला हरिण, भैंसा, जंगली सूअर, काले रंग का मृग-इनमें काले रंग के मृग को छोड़ पांच दोखुरे जानवर भक्ष्य होते हैं ॥ ६ ॥
टि०—इस सूत्र में भी कुलुङ्ग के विषय में विवाद है अन्य दो खुर वाले पशु भक्ष्य हैं ।
भक्ष्या इत्यनुवर्तते । पूर्ववत्परिसंख्या ॥ ६ ॥
१. उभयोस्समुच्चित्य प्राप्तावितरनिवृत्तिः परिसंख्या ।
२. कुलङ्ग इति मु. पु.
| ९६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ भक्ष्याः |
|---|
पशवो गताः। पक्षिण आरभ्यन्ते—
पक्षिणस्तित्तिरिकपोतकपिञ्जलवार्ध्राणसमयूरवारणा वारणवर्ज्याः पञ्च विविष्किराः ॥ ७ ॥
**अनु०—**तित्तिर, कबूतर, कपिञ्जल, वार्ध्राणस, मयूर और वारण में वारण को छोड़ पांच तोड़-तोड़ कर खाने वाले पक्षी भक्ष्य होते हैं ॥ ७ ॥
**टि०—**यहाँ भी वारण पक्षी के भक्षण को सन्दिग्ध समझना चाहिए। 'भक्ष्याः प्रतुदविविष्किरजालपादाः' गौतम० २. ८. ३५, पृ० १८८ ।
अस्मिन्नपि षट्के वारणे विकल्पः। विकीर्य विकोर्य भक्षयन्तीति विविष्किराः। अन्यत्पूर्ववत् ॥ ७ ॥
मत्स्यास्सहस्रदंष्ट्रचिलिचिमो वर्मी बृहच्छिरोरोमशकरिरोहितराजीवाः ॥ ८ ॥
**अनु—**सहस्रदंष्ट्र, चिलिचिम, वर्मी, बृहच्छिरस्, रोमशकरि, रोहित और राजीव मछलियाँ भक्ष्य होती हैं ॥ ८ ॥
**टि०—**वसिष्ठ १४-४१-४२ में इन मत्स्यों के भक्ष्य होने का नियम है। नामों के विषय में विभिन्न पुस्तकों में कुछ अन्तर है, उदाहरण के लिए सूत्र के प्रस्तुत पाठ में 'रोमशकरि' नाम उपलब्ध है, किन्तु 'मशकरि' नाम भी कुछ लोगों ने ग्रहण किया है। द्र० व्यूहलेर की टिप्पणी। गोविन्द स्वामी ने भी इन नामों को स्पष्ट न कर लिखा है कि इनके विषय में निषादों आदि से जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।
भक्ष्या इत्यनुवर्तते। उक्तेषु पशुमृगपक्षिमत्स्येषु अप्रसिद्धनामकाः निषादेभ्योऽवगन्तव्याः ॥ ८ ॥
उक्तो जङ्गमेषु भक्षणविशेषः। अथ स्थावरेष्वाह—
अनिर्दशाहसन्धिनीक्षीरमपेयम् ॥ ६ ॥
**अनु०—**जिस गाय, भैंस, बकरी आदि को ब्याए हुए दस दिन न हुए हों अथवा जो गर्भिणी अवस्था में दुही जा रही हो उसका दूध अपेय होता है ॥ ९ ॥
**टि०—**द्रष्टव्य वसिष्ठ १४. ३४-३५; गौतम० २. ८. २२ 'गोश्च क्षीरमनिर्दशायाः सुतके' २३, अजामहिष्योश्च, २५ 'स्यन्दिनीयामसुसंधिनीनां च'। संधिनी की गोविन्द स्वामी की व्याख्या स्पष्ट है: जो गर्भिणी स्थिति में दुही जाती है और प्रातः न दुहने पर सायं दुही जाती है। स्थानीय बोलियों में ऐसी गायों के विशेष नाम होते हैं।
गोमहिष्यजानामिति शेषः। प्रसवादारभ्य नातिक्रान्तदशाहमनिर्दशाहं क्षीरम्। सन्धिनी पुनः या गर्भिणी दुह्यते या वा सायमदुग्धा प्रातर्दुह्यते प्रातर्दुग्धा वा सायंम् ॥ ९ ॥
द्वादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ९७
द्वादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ९७
विवत्साऽन्यवत्सयोश्च ॥ १० ॥
**अनु—**जिस गो का बछड़ा न हो, अथवा जो दूसरी गो के बछड़े को दूध पिलाती हो उसका दूध अपेय होता है ॥ १० ॥
**टिप्पणी—**क्षीर के निषेध के साथ ही दधि आदि क्षीर विकारों का भी निषेध समझना चाहिए । इस संबन्ध में गोविन्द स्वामी ने वसिष्ठ के वचन का उल्लेख करते हुए विस्तृत विचार किया है ।
क्षीरमपेयमित्यनुवर्तते । विवत्सा । विगतवत्सा । विवत्सान्यवत्सासन्धिनीनां क्षीरमपेयम्, न पुनस्तद्विकारं दध्याद्यपि । कुत एतत् ? वसिष्ठवचनात् । यदाह सः—‘सन्धिनीक्षीरमवत्साक्षीरम्’ इत्यभक्ष्यप्रकरणे । कथमनेन दध्याद्यनुग्रहो भवति? अयं तावत् न्यायः सर्वत्र निषेधे द्रव्यशुद्धौ वेदितव्यः-प्रकृतिग्रहणे विकारस्याऽपि ग्रहणं विकारग्रहणे च प्रकृतेरिति । यत्पुनरपण्यप्रकरणे ‘क्षीरं च सविकारम्’ इति विकारग्रहणं कृतं तत्राऽयमभिप्रायः—विकाराणां दधिघृतादीनां क्षीरजातेर्जात्यन्तरत्वात् पायसादिशब्दव्यापादेन दधिघृतनवनीतादिशब्दान्तरत्वाच्च विकारग्रहणमन्तरेण तद्बुद्धिर्न जायत इति । अन्यत्र त्वन्यतरग्रहणेऽन्यतरग्रहणं भवत्येव । इह तु वसिष्ठवचने क्षीराधिकारे सत्येव पुनः क्षीरग्रहणं तद्विकाराभ्यनुज्ञानार्थम् ॥ १० ॥
'आविकोष्ट्रिकमैकशफम् ॥ ११ ॥
**अनु०—**भेड़, ऊँटनी और एक खुरवाले पशुओं का दूध अपेय होता है ॥ ११ ॥
**टि०—**एक खुर वाले पशु जैसे अश्व । द्र० गौतम. २.८.२४: 'नित्यमाविकमपेय-मोष्ट्रमैकशफं च' ।
क्षीरमपेयमित्यनुवर्तते । एकशफा एकखुरा अश्वादयस्तेषां पय ऐकशफम्॥११॥
उक्तानामपेयानां पयसां प्रसङ्गाल्लाघवाच्च प्रायश्चित्तमाह—
अपेयपयःपाने कृच्छ्रोऽन्यत्र गव्यात् ॥ १२ ॥
**अनु०—**गो के दूध के अतिरिक्त कोई और अपेय दूध पी लेने पर प्रायश्चित्त के रूप में कृच्छ्र व्रत करे ॥ १२ ॥
अविशेषितः कृच्छ्रशब्दः प्राजापत्ये वर्तते ॥ १२ ॥
गव्ये त्रिरात्रमुपवासः ॥ १३ ॥
१. आविकमोष्ट्रिकमैकशफमपेयम् इत्येव क. पुस्तके मूलपुस्तकेषु च समुपलभ्यते पाठः, तथापि ग. पुस्तकपाठ एव स्वरसतां मन्वानैस्स एवाऽस्मभिनिवेशितः ।
१० बौ० ध०
| ९८ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ अभक्ष्याणि |
|---|
अनु०—गो का अपेय दूध पीने पर तीन (दिन और) रात्रि उपवास करे॥१३॥
द्वयमेतद्बुद्धिपूर्वविषयम्। अबुद्धिपूर्वे तु पूर्वस्मिन् त्रिरात्रं गव्ये तूपवासः। आह च मनुः—'शेषेषूपवसेदहः' इति ॥ १३ ॥
पर्युषितं शाकयूषमाससर्पिश्श्रुतधानागुडदधिमधुसक्तुवर्जम् ॥ १४ ॥
अनु०—शाक, यूष, मांस, घृत, भूने गये अन्न, गुड़, दही और सत्तू इन तैयार खाद्य वस्तुओं के अतिरिक्त अन्य बासी अन्न नहीं खाना चाहिए ॥ १४ ॥
टि०—पर्युषित का अर्थ है उषःकालान्तरित; उषाकाल से पहले का, रात्रि का, बासी।
पर्युषितमुषःकालान्तरितम्। शाकयूषादिवर्जं पक्वं पर्युषितमभक्ष्यमिति सम्बन्धः ॥ १४ ॥
'शुक्तानि ॥ १५ ॥
अनु०—खट्टी बनी हुई खाद्य वस्तुएं अभक्ष्य होती हैं ॥ १५ ॥
टि०—दधि खट्टा होने पर भी भक्ष्य होता है।
शुक्तानि च दधिवर्जम्। आह च मनुः—
दधि भक्ष्यं तु शुक्तेषु सर्वं च दधिसम्भवम् ।
यानि चैवाऽभिषूयन्ते पुष्पमूलफलैश्शुभैः ॥ इति ॥ १५ ॥
तथाजातो गुडः ॥ १६ ॥
अनु०—इसी प्रकार खट्टा हुआ गुड़ अभक्ष्य होता है ॥ १६ ॥
टि०—'भक्ष्य अभक्ष्य' का निर्देश करके भोजन की शुद्धि का नियम बताया गया है; भोजन की शुद्धि से ही सत्त्व अर्थात् आत्मा की शुद्धि होती है। आत्मा की शुद्धि से स्थिर स्मृति उत्पन्न होती है और उससे वेदाध्ययन का अधिकार होता है—गोविन्द। इसी प्रसंग में अगला सूत्र है।
सथाजातश्शुक्तत्वेन जात इत्यर्थः। गुडस्य पृथक्करणं अपक्वस्याऽपीक्षुरसस्य शुक्तस्य प्रतिषेधार्थम् ॥ १६ ॥
अभक्ष्याभक्ष्यप्रकरणेनाऽऽहारशुद्धिरुक्ता। तच्छुद्धौ हिं² सत्त्वशुद्धिर्भवति। सत्त्वशुद्धौ च ध्रुवा स्मृतिर्जायते। अतश्चाऽध्ययनेऽधिकार इत्यत आह—
१. शुक्तानि तथाजातो गुडः, इत्येकसूत्रतया चकारवर्जं पठितं मूलपुस्तकेषु ।
२. आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः। सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः, इति स्मरणात् ।
त्रयोदशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ३९
श्रावण्यां पौर्णमास्यामाषाढ्यां वोपाकृत्य तैष्यां माघ्यां वोत्सृजे- युरुत्सृजेयुः ॥ १७ ॥
**अनु०—**श्रावण या आषाढ मास की पौर्णमासी को वेदाध्ययन आरम्भ करने की उपाकर्म क्रिया कर तिष्य नक्षत्र से युक्त पौर्णमासी को या माघ की पौर्णमासी को वेदाध्ययन का उत्सर्ग करे ॥ १७ ॥
इति बौधायनीये धर्मसूत्रे प्रथमप्रश्ने दशमः खण्डः ॥ १२ ॥
श्रवणेन नक्षत्रेण श्रविष्ठया वा युक्ता पौर्णमासी श्रावणी । श्रावणशब्दोऽत्र नक्षत्रद्वयप्रदर्शनार्थः । तथाऽऽह —
चित्रादितारकाद्वन्द्वैः पूर्णपर्वेन्दुसङ्गतः । मासाश्चैत्रादिका ज्ञेयाः त्रिद्विषष्ठान्त्यसप्तमैः ॥
इति । एवमेव द्वादश पौर्णमास्यो द्रष्टव्याः । उपाकर्मोत्सर्जनं च गृह्य ( ३. १. ) एवोक्तम् ॥ १७ ॥
इति बौधायनीयधर्मसूत्रविवरणे गोविन्दस्वामिकृते पञ्चमोऽध्यायः
अथ षष्ठोऽध्यायः
एवं तावत्पुरुषार्थतया शौचाधिष्ठानमुक्तम् , अथेदानीं क्रत्वर्थतयाऽऽह—
शुचिमध्वरं देवा जुषन्ते ॥ १ ॥
**अनु०—**देवता पवित्र यज्ञ को ही ग्रहण करते हैं ॥ १ ॥
अध्वर इति यज्ञनाम । ध्वरः हिंसाकर्म तत्प्रतिषेधोऽध्वरः । जुषन्ते सेवन्ते । देवग्रहणं पितॄणामप्युपलक्षणार्थम् ॥ १ ॥
किमित्येवम् ?
शुचिकामा हि देवाश्शुचयश्च ॥ २ ॥
**अनु० —**क्योंकि देवता पवित्रता चाहते हैं और स्वयं पवित्र होते हैं ॥ २ ॥
हिशब्दो हेतौ शुचिकामत्वात् शुचित्वाच्चेत्यर्थः ॥ २ ॥
¹प्रपञ्चोऽयं भूयः तत्संग्रहार्थः—
²शुची वो हव्या मरुतश्शुचीनां शुचिं हिनोम्यध्वरं शुचिभ्यः । ऋतेन सत्यममृतसाप आयंश्शुचिजन्मानश्शुचयः पावका इति ॥ ३ ॥
१. पंक्तिरियं ग. पुस्तके नास्ति ।
२. ऋ. सं. ५. ४. २४. २.
| १०० | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ शुद्धयावश्यकता |
|---|
**अनु०—**यह इस ऋचा में कहा गया है, हे मरुतों, पवित्र तुम लोगों के लिए पवित्र हव्य है; पवित्र तुम्हारे लिए मैं पवित्र यज्ञ अर्पित करता हूँ। पवित्र यज्ञ का सेवन करने वाले, पवित्र जन्म वाले, दूसरों को पवित्र करने वाले=मरुतों या देव गणों ने ऋत द्वारा सत्य को प्राप्त किया ॥ ३ ॥
**टि०—**उपर्युक्त अर्थ गोविन्दस्वामी के अनुसार है। 'ऋतेन यज्ञेन सत्यं परं पुरुषार्थम् अमृतस्वरूपं स्वर्गापवर्गाख्यम् प्रायन् प्राप्नुयुः'—गोविन्द । ब्यूलर ने इसका अर्थ इस प्रकार किया है—'उचित प्रकार से सत्यनिष्ठ (यज्ञकर्ता) के पास आये।' यह ऋचा ऋग्वेद ७. ५६. १२ है तथा तैत्तिरीय-ब्राह्मण २.८.५.५ में भी आता है। अन्तिम वाक्य की व्याख्या सायण ने इस प्रकार की है।
ऋगेषा देवानां शुचित्वमभिवदतीति विनियते। वसिष्ठस्यार्षं त्रिष्टुप्छन्दः। मरुतो देवताः। हे मरुतः ! वो युष्माकं शुचीनां सतां हव्यान्यपि शुचीनि योग्यानि भवन्ति। तस्मात् शुचिभ्यो युष्मभ्यं शुचिमेवाऽध्वरं यज्ञं प्रहिणोमि प्रतनोमि । यस्मादेवं वयं. मरुतां कृतवन्तस्तस्मात्तेऽपि मरुतः ऋतेन यज्ञेन सत्यं परं पुरुषार्थममृतस्वरूपं स्वर्गापवर्गाख्यं आयन् प्राप्नुयुः। किंविशिष्टास्ते ? ऋतसापः शुचिजन्मानश्शुचयः पावकाश्च; ऋतसापः यज्ञसेविनः। उक्तं च 'शुचिं हिनोम्यध्वरम्' इति। शुचि जन्म येषां ते शुचिजन्मानः स्वयं शुचयः पावनहेतवश्च द्रव्याणाम् । तथा चोक्तम्—'चण्डालपतितस्पृष्टं मारुतेनैव शुध्यति' ( १, ९. ८ ) इति ॥ ३ ॥
अहतं वाससां शुचि तस्माद्यत्किञ्चेज्यासयुक्तं स्यात्सर्वं तदहतेन वाससा कुर्यात् ॥ ४ ॥
**अनु०—**नये, पहले न. धारण किये गये वस्त्रों को पहनने पर यज्ञकर्ता पवित्र रहता है, अत एव जो कुछ यज्ञिय कर्म करना हो उसे नये वस्त्र धारण कर करना चाहिए ॥ ४ ॥
अहतमनुपभुक्तं अभिनवं शुचि स्यादित्यध्याहारः । इज्या यागः यत्किञ्चिदिति वीप्सावचनात् इष्टिपशुचातुर्मास्यादीनाम् ॥ ४ ॥
'अहतेन वाससा कुर्यात्' इत्युक्तम्, तत्रानहतस्य वाससः साक्षात् करणार्थं न स्यात्, तन्निराकरणायाऽऽह—
प्रक्षालितोपवातान्यक्लिष्टानि वासांसि पत्नीयजमानाऋत्विजश्च परिदधीरन् ॥ ५ ॥
त्रयोदशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः १०१
अनु०—यजमान, उसकी पत्नी और यज्ञ कराने वाला ऋत्विज् ये सभी धोये गये, वायु से सूखे हुए तथा न फटे हुए वस्त्र पहने ॥ ५ ॥
टि०—गोविन्द स्वामी के अनुसार सूत्रस्थ ‘च’ शब्द से यज्ञक्रिया देखने वालों के लिए भी उपर्युक्त प्रकार के वस्त्र धारण करने का नियम समझना चाहिए।
तत्र संस्कारेणाऽनहतवाससोऽपि करणत्वमित्यभिप्रायः। उपवातानि शोषितानीत्यर्थः। अक्लिष्टानि अच्छिन्नानि अच्छिद्राणि वा। तानि च शुक्लानि भवन्ति, उत्तरत्र लोहितवास इति विशेषश्रवणात्। चशब्दादुपद्रष्ट्रादयोऽप्येवं-भूतानि वासांसि परिदधीरन्निति गम्यते ॥ ५ ॥
एवं प्रक्रमादूर्ध्वम् ॥ ६ ॥
अनु०—प्रक्रम ( आरम्भिक ) क्रियाओं के बाद इस प्रकार से किया जाता है ॥ ६ ॥
आपवर्गादिति शेषः। प्रक्रम उपक्रमः। उपक्रमादारभ्याऽऽपवर्गादेवंभूतै-र्वासोभिर्भवितव्यमित्यभिप्रायः ॥ ६ ॥
दीर्घसोमेषु सत्रेषु चैवम् ॥ ७ ॥
अनु०—दीर्घ सोमयज्ञों तथा सत्रों में भी इसी प्रकार किया जाता है ॥ ७ ॥
^१दीर्घसोमास्सत्राणि च प्रसिद्धानि। चशब्द एकाहाहीनोपसङ्ग्रहार्थः। एवमित्यतिदेशः। 'यत्किञ्चेन्वासंयुक्तम्' इत्यस्य विस्तरोऽयम् ॥ ७ ॥
किमेष एवोत्सर्गः ? नेत्याह—
यथा समाम्नातं च ॥ ८ ॥
अनु०—अन्य अवसरों पर उस अवसर के नियम के अनुसार अन्य प्रकार के वस्त्र धारण करने चाहिए ॥ ८ ॥
शुक्लाद्वाससोऽन्यदपि यद्यथा समाम्नातं तथा कर्तव्यमिति ॥ ८ ॥
१. उक्थ्यषोडश्यतिरात्रसंस्थाः दीर्घसोमपदवाच्याः। तासां प्रकृतिभूताग्निष्टो-मापेक्षयाऽधिककालसाध्यत्वात् । अनेकदिनसाध्याः सोमयागास्सत्राहीनपदवाच्याः। तत्र द्विरात्रप्रभृत्येकादशदिनसाध्यऋतुपर्यन्ता अहीनाः। त्रयोदशरात्रप्रभृति सहस्र-संवत्सरान्तास्सत्राणि। द्वादशरात्रस्तु सत्राहीनोभयात्मकः। तत्र सत्रे सर्वे यजमाना एव सप्तदशावरा मिलित्वा यजमानकार्यमृतृत्विक्कार्याणि च कुर्युः। अत एव तत्र दक्षि-णाऽपि नास्ति। एकाहस्तूक्तः।
| १०२ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ वस्त्रशुद्धिः |
|---|
तदाह— यथैतदभिचरणीयेष्विष्टिपशुसोमेषु लोहितोष्णीषा लोहितवासस-इचत्विजः प्रचरेयुः चित्रवाससश्चित्रासङ्गाः वृषाकपाविति च ॥ ९ ॥
अनु०—जैसे आभिचारिक इष्टियों में, पशुयज्ञों तथा सोमयज्ञों में ऋत्विज् लाल रंग की पगड़ी और लाल रंग के वस्त्र धारण कर क्रियाओं का सम्पादन करे। वृषाकपि के मन्त्रों का उच्चारण करते समय अनेक रंग वाले वस्त्र तथा बहुरंगी उत्तरीय धारण करे ॥ ९ ॥
टि०—'विहिसोतोरसृक्षत' आदि ऋग्वेद १०-८६ के मन्त्र वृषाकपि द्वारा दृष्ट हैं। चित्रासङ्ग 'आसङ्ग' अर्थात् उत्तरीय। गोविन्द के अनुसार सूत्रस्थ 'च' से अन्य प्रकार की आभिचारिक क्रियाओं का भी ग्रहण होता है।
अभिचरणयेषु अभिचारसाधनेषु उष्णीषं शिरोवेष्टनं वासः परिधानं चित्रं नानावर्णं आसङ्ग उत्तरीयम्। अभिचरणीया इष्टयः—¹ 'आग्नावैष्णवमे-कादशकपालं निर्वपेदभिचरन्' इत्याद्याः। पशवः² 'ब्राह्मणस्पत्यं तूपरमालभेत' इत्याद्याः। सोमाः श्येनादयः। वृषाकपिः 'विहि सोतोरसृक्षत' इति सूक्तम्। इतिशब्दचशब्दौ 'अभिचरन् दशहोतारं जुहुयात्' इत्येवमादीनामुपसङ्ग्रहणा-र्थौ ॥ ९ ॥
अग्न्याधाने क्षौमाणि वासांसि तेषामलाभे कार्पासिकान्यौर्णानि वा भवन्ति ॥ १० ॥
अनु०—अग्न्याधान के समय (यजमान और उसकी पत्नी) रेशमी वस्त्र धारण करे, उनके न मिलने पर कपास के या ऊन के वस्त्रों का प्रयोग होता है ॥ १० ॥
पत्नीयजमानयोरेतद्विधानम् ॥ १० ॥
'अहतं वाससां शुचि' ( १. १३. ४ ) इत्युक्तम्। इदानीमुपहतान्यपि वासांस्यभ्य³नुजानन् तेषां मूत्रादिसर्गे शौचमाह—
मूत्रपुरीषलोहितरेतःप्रभृत्युपहतानां मृदाऽद्भिरिति प्रक्षालनम् ॥११॥
१. इयमाग्नावैष्णवेष्टिः 'आग्नावैष्णवमेकादशकपालं निर्वपेदभिचरन्स्र्स्वतया-ज्यभागा स्यात् बार्हस्पत्यश्चरुः' इति विहिता वेदितव्या। सा च द्वितीयद्वितीये नवमानुवाके तैत्तिरीयसंहितायाम्।
२. तूपरः शृङ्गरहितः पशुः।
३. अभ्यनुज्ञातुम् ग. पु.।
त्रयोदशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः १०३
अनु०—मूत्र, मल, रक्त, रेतस् आदि अमेध्य द्रव्यों से अशुद्ध हुए वस्त्रों को मिट्टी जल आदि से धोना चाहिए ॥ ११ ॥
इतिशब्दः प्रकारवचनो गोशकृदादीन्यपि प्रदर्शयति । पुरुषार्थेषु वासस्स्वेतत् यथासम्भवं द्रष्टव्यम् ॥ ११ ॥
वासोवत्तार्प्यवृकलानाम् ॥ १२ ॥
अनु०—तृपा नाम के वृक्ष की छाल से तथा वृकल से बने वस्त्रों का (अपवित्र होने पर) मिट्टी जल आदि से प्रक्षालन करे ॥ १२ ॥
तृपानाम वृक्षास्स्रन्ति तेषां त्वचा निर्मितमाच्छादनं तार्प्यमित्युच्यते । वृकलाश्शककाः (वृक्षविशेषाः) । एतेषामपि मृदाऽद्भिरिति प्रक्षालनम् ॥ १२ ॥
वल्कलवत्कृष्णाजिनानाम् ॥ १३ ॥
अनु०—काले मृगचर्म की शुद्धि वल्कल वस्त्र के समान होती है ॥ १३ ॥
वल्कलशब्देनाऽप्याच्छादनविशेष उच्यते, 'चीरवल्कलधारिणाम्' इत्येवमादिषु दर्शनात् । तद्वत्कृष्णाजिनानामपि यथाशौचं वेदितव्यम् । ननु वल्कलानां शौचं नोक्तम्, अतः कथं तद्वदित्यतिदेशः ? उच्यते—इदं 'वल्कलवत्कृष्णाजिनानाम्' इत्युपमिते सति कृष्णाजिनवद्वल्कलानामित्ययमर्थ उपमानोक्त्याऽत्र विधित्सितः । अत एव तद्वदिति वतिप्रत्ययस्य षष्ठ्या सह व्यत्ययः कृष्णाजिनवद्वल्कलानामिति । 'यथा 'सह शाखया प्रस्तरं प्रहरति' इत्यत्र द्वितीयातृतीययोः । एवं च वल्कलानामपि बिल्वतण्डुलैरेव शुद्धिः ॥ १३ ॥
इदं चाऽन्यत्—
न परिहितमधिरूढमप्रक्षालितं प्रावरणम् ॥ १४ ॥
अनु०—उस उत्तरीय को जिसे कटि के नीचे पहना गया हो या जिसके ऊपर सोया या लेटा गया हो, बिना धोए ऊपर न ओढे ॥ १४ ॥
भवेदिति शेषः । परिहितं कौपीनप्रदेशे । अधिरूढं तल्पास्तरणार्थे । एतदुभयमप्रक्षालितं प्रावरणमुत्तरीयं न कुर्यात् ॥ १४ ॥
१. दर्शपूर्णमासयोर्वेद्यां हविरासादनार्थमास्तरितस्य प्रस्तराख्यस्य दर्भमुष्टिविशेषस्य कर्मान्तेऽग्निप्रक्षेपणरूपं प्रहरणं विहितं 'सूक्तवाकेन प्रस्तरं प्रहरती'ति । तेन प्राप्तेप्रहरणे 'प्रस्तरेण सह साहित्यं शाखाया विधीयते'—सह शाखया प्रस्तरं प्रहरति इति । तत्र प्रस्तरेण सह शाखां प्रहरेत् इति वक्तव्ये शाखया सह प्रस्तरं प्रहरतीति यथोक्तं तद्वदित्यर्थः । शाखा वत्सापाकरणोपयुक्ता पलाशशाखा ।
| १०४ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ द्रव्यशुद्धिः |
|---|
नाऽपल्पूलितं मनुष्यसंयुक्तं देवत्रा युञ्ज्यात् ॥ १५ ॥
अनु०— देवता के कार्य में मनुष्य द्वारा काम में लायी गयी वस्तु को शिला के ऊपर हाथ से पीटे बिना प्रयुक्त न करे ॥ १५ ॥
पल्पूलितं हस्तेन शिलायां ताडितम् । अपल्पूलितमनेवंभूतं वासश्चर्मादि मनुष्यैरुपयुक्तं देवत्रा देवेषु न कुर्यात् । देवतार्थेषु कर्मस्विति यावत्¹। यथाऽधिषवणचर्मादि । तन्न ह्नाहतं चर्म इत्यवचनात् मनुष्यैरुपयुक्तमपि पल्पूलितं चेदुपस्तार्यमित्येव ॥ १५ ॥
अधुना देशशुद्धिमाह—
घनाया भूमेरुपघात उपलेपनम् ॥ १६ ॥
अनु०— कठोर भूमि के दूषित होने पर उसको (गोबर से) लीपने पर शुद्धि हो जाती है ॥ १६ ॥
महावेदिनिर्माणावस्थायामिति शेषः । तत्र हि 'वेदिकारा वेदिं कल्पयन्ते' इति शौचं नोक्तम् । शिलातलतया घनायाः मूत्राद्युपघाते गोमयेनोपलेपनं शौचम् ॥ १६ ॥
सुषिरायाः कर्षणम् ॥ १७ ॥
अनु०— भुरभुरी मिट्टी वाली भूमि के अशुद्ध होने पर उसको जोतने से शुद्धि होती है ॥ १७ ॥
तस्मिन्नेव विषये सुषिरायाः सच्छिद्राया मृद्व्या उपघाते कर्षणाच्छुद्धिः॥१७॥
क्लिन्नायाः मेध्यमाहृत्य प्रच्छादनम् ॥ १८ ॥
अनु०— अपवित्र गीली मिट्टी की शुद्ध मिट्टी लाकर उससे प्रच्छादन करने पर शुद्धि होती है ॥ १८ ॥
क्लिन्ना आर्द्रा। तस्या उपघाते तृणादिना मृदा च प्रच्छादनं कार्यम् । किमर्थम् ? दग्धुम् । एवं हि कृते² सत्यादौ भूसंस्कारो भवति ॥ १८ ॥
चतुर्भिश्शुद्ध्यते भूमियोंमिराक्रमणात्खनाद्दहनादभिवर्षणाच्च ॥ १६ ॥
१. सोमलतातो रसनिष्कासनमभिषवकर्म। तदर्थं कृष्णाजिने सोमलतां निक्षिप्याऽऽहन्युः चूर्णीभावाय । तच्चर्माऽधिषवणचर्मोच्यते ।
२. तस्या दाहसंस्कारो भवति ग. पु. ।
त्रयोदशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः १०५
अनु०--भूमि चार प्रकार से शुद्ध होती है-गायों के पैर पड़ने, खोदने, आग जलाने तथा वर्षा होने से ॥ १९ ॥
अत्यन्तोपहताया भूमेरेतच्छौचम् । तत्र वेदिविमानकाले सन्निकर्षविप्रक- र्षापेक्षयोपघातविशेषापेक्षया चाऽभिवर्षणादीनां व्यस्तसमस्तकल्पना ॥ १९ ॥
अथेदानौमत्यन्तोपहताया आह—
पञ्चमाच्चोपलेपनात् षष्ठात्कालात् ॥ २० ॥
अनु०--पांचवे, गाय के गोबर से लीपने से तथा छठे, समय बीतने से स्वतः भूमि की शुद्धि होती है ॥ २० ॥
उपलेपनमुक्तम् । सोमसूर्यांशुमारुतैर्या शुद्धिः सा कालात् शुद्धिः ॥ २० ॥
असंस्कृतायां भूमौ न्यस्तानां तृणानां प्रक्षालनम् ॥ २१ ॥
अनु०--( जल आदि को छिड़क कर ) शुद्ध न की गयी भूमि पर रखे गये कुशादि तृणों को धोना चाहिए ॥ २१ ॥
¹प्रोक्षणादिसंस्कारविहीनायां भूमौ न्यस्तानामत्यन्ताल्पानां तृणानां बर्हि- रादीनां प्रक्षालनं कार्यम् ॥ २१ ॥
परोक्षोपहतानामभ्युक्षणम् ॥ २२ ॥
अनु०--परोक्ष में अशुद्ध हुए कुशादि तृणों पर जल छिड़कना चाहिए ॥ २२ ॥
तृणानामेव यज्ञार्थं समुपहतानामेतत्² ॥ २२ ॥
एवं क्षुद्रसमिधाम् ॥ २३ ॥
अनु०--इसी प्रकार इन्धन के छोटे-छोटे टुकड़ों को भी इसी विधि से शुद्ध करना चाहिए ॥ २३ ॥
क्षुद्रसमिधोऽङ्गुलिपरिमितः अनिध्मा इति यावत् ॥ २३ ॥
महतां काष्ठानापमुपघाते प्रक्षाल्याऽवशोषणम् ॥ २४ ॥
अनु०—लकड़ी के बड़े टुकड़ों के दूषित होने पर उन्हें धोकर सुखाने से शुद्धि होती है ॥ २४ ॥
टि०—गोविन्द स्वामी के अनुसार यज्ञोपयोगी लकड़ी के विषय में ही यह नियम है ।
१. उपलेपादीनामन्यतमेनासंस्कृतायाम् ग. पु. । २. शूद्रोपहतानामिति ग. पु. ।
१०६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ द्रव्यशुद्धिः
याज्ञिकानामेव काष्ठानां 'अथाऽभ्यादधातीध्मं प्रणयनीम्, औदुम्बरान् महापरिधीन्' इत्येवमादावुपयोक्तव्यानां पादादिभिरुपहतानामेतत् ॥ २४ ॥
बहूनां तु प्रोक्षणम् ॥ २५ ॥
अनु०—किन्तु लकड़ी के टुकड़ों का ढेरी पर जल छिड़क देने से ही शुद्धि होती है ॥ २५ ॥
टि०--'तेषामेव मूत्राद्युपघाते त्याग एव' मूत्रादि से दूषित होने पर उनका भी त्याग कर देना चाहिए।
इध्मादिव्यतिरिक्तानां पूर्वस्मिन् विषये प्रोक्षणं तद्वद्बहुत्वे। तेषामेव मूत्राद्युपघाते त्याग एव ॥ २५ ॥
दारुमयानां पात्राणामुच्छिष्टसमन्वारब्धानांमवलेखनम् ॥ २६ ॥
अनु०—काष्ठ के पात्रों के अपवित्र व्यक्तियों द्वारा छू लिये जाने पर उनको घिसने-रगड़ने से ही शुद्धि होती है ॥ २६ ॥
जुह्वादीनामुच्छिष्टपुरुषस्पृष्टानां दार्वादीनामवलेखनं घर्षणम्। अशुचिभिः समन्वारम्भः स्पर्शः। 'चमूर्णां स्रुक्स्रुवाणां च'इति मानवमपूर्वं वेदितव्यम्॥२६॥
उच्छिष्टलेपोपहतानामवतक्षणम् ॥ २७ ॥
अनु०—यदि काष्ठपात्र उच्छिष्ट से दूषित हो गये हों तो उसे बसुला आदि से खुरचने या गढ़ने पर शुद्धि होती है ॥ २७ ॥
तेषामेवाऽस्मिन्निमित्ते अवतक्षणं वाश्यादिनाऽयस्मयेनाऽनुकर्षणं तस्मिन् कृतेऽपि तत्पात्रं यदि स्वकार्यक्षम भवति। अक्षमस्य तु श्रौतेनोपायेन त्याग एव ॥ २७ ॥
मूत्रपुरीषलोहितरेतःप्रभृत्युपहतानामुत्सर्गः ॥ २८ ॥
अनु०—मूत्र, मल, रक्त, रेतस् आदि अमेध्य वस्तुओं से अपवित्र हुए (काष्ठ-पात्रों) का त्याग कर देना चाहिए ॥ २८ ॥
टिप्पणी—गोविन्द के अनुसार इन अमेध्य वस्तुओं से दूषित कुश, ईंधन आदि का भी त्याग कर देना चाहिए।
इध्माबर्हिरादीनामप्ययं विधिर्द्रष्टव्यः। प्रभृतिशब्देनाऽत्र निर्दिष्ठानां द्वाद-शमळानां ग्रहणं कृतम् ॥ २८ ॥
'दारुमयानाम्' इत्यादिसूत्रद्वयस्याऽपवादमुपक्रमते—
तदेतदन्यत्र निर्देशाद् ॥ २९ ॥
त्रयोदशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः १०७
अनु०—जहां कोई विशिष्ट नियम निर्दिष्ट न हो वहां इन नियमों का पालन करना चाहिए ॥ २९ ॥
तदेतदवलेखनादिविधानं निर्देशाद् अन्यत्राऽऽहृत्य विधानादृते न भवतीत्यर्थः । न्यायसिद्धेऽर्थे सूत्रारम्भः किमर्थ इति चेत्—समुच्चयशङ्कानिवृत्त्यर्थ इति ब्रूमः । कथं पुनर्विशेषविहिते सामान्यविहितस्याऽवलेखनादेः समुच्चयशङ्का ? शौचभूयस्त्वस्याऽपेक्षितत्वात् । तद्वा कथमिति चेत् ? 'शुचिमध्वरं देवा जुषन्ते' (१३.१.) इति सूत्रद्वयस्थऋग्दर्शनस्य प्रयोजकत्वादिति ॥ २९ ॥
निर्देशमिदानीमाह— 'अथैतदग्निहोत्रे घर्मोच्छिष्टे च दधिधर्मे च कुण्डपायिनामयने चोत्सर्पिणामयने च दाक्षायणयज्ञे चैडादधे च चतुश्चक्रे च ब्रह्मौदनेषु च तेषु सर्वेषु दर्भैरद्भिः प्रक्षालनम् ॥ ३० ॥
१. अग्निहोत्रे प्रधानाहुत्यनन्तरं "अपोदङ् पर्यावृत्य प्राचीनदण्डया स्रुचा भक्षयति" ( बो. श्रौ. ३६.) इत्यग्निहोत्रहवण्याैव शेषभक्षणं विहितम् । तत्राऽग्निहोत्रहवण्या उच्छिष्टसंस्पर्शेऽपि अद्भिः प्रक्षालनादेव तस्याश्शुद्धिः। नान्यत् शुद्ध्यर्थमपेक्ष्यत इत्यर्थः । परन्तु इदमग्निहोत्रहवण्या उच्छिष्टकरणं, 'अग्निहोत्रहवण्याश्च लेहोलीढापरिग्रहः' इति कलिवर्ज्यप्रकरणे उक्तत्वात् कलौ निषिद्धम् ॥
प्रवर्ये "यावन्तः प्रवर्येत्विजस्तेषूपहवमिष्ट्वा यजमान एव प्रत्यक्षं भक्षयति' (बौ श्रौ. ९. ११. ) इति विहितं घर्मभक्षणम् । तथैव प्रवर्ग्यवति सोमे "दधिघर्मं भक्षयन्ति" ( बो. घ. १७ ) इति विहितो दधिघर्मभक्षः ॥
कुण्डपायिनामयनाख्यः संवत्सरसाध्यः यज्ञविशेषः । तत्रर्त्विजामन्तरुर्वेश्रमसैर्भक्षणं विहितम् । एवमुत्सर्पिणामयनमपि सत्रविशेष एव । तत्र "अैन्द्रं सान्नाय्यं समुपहूय भक्षयन्ति" इति सान्नाय्यभक्षणं पात्रेणैव विहितम् । (बो. श्रौ. १६-२१, २२) ।
दाक्षायणयज्ञो नाम दर्शपूर्णमासविकृतिविशेषः । तत्राऽपि "अैन्द्रं सान्नाय्यं समुपहूय भक्षयन्ति" ( बौ. श्रौ १७.५१.) इति विहितम् ।
एवं ऐडादधचतुश्चक्रावपीष्टिविशेषावेव दर्शपूर्णमासविकृतिभूतौ । इमावपि बोधायनाचार्यैस्सप्तदशप्रश्ने ( १७-५२, ५३. ) विहितौ, तत्रापि पूर्ववत् भक्षणं "ऐन्द्रं सान्नाय्यं समुपहूय भक्षयन्ति" इति विहितम् । अत्र सर्वत्राऽपि पात्रयोरुच्छिष्टसंस्पर्शेऽपि अद्भिः प्रक्षालनादेव शुद्धिरित्यर्थः । दाक्षायणैडादधचतुश्चक्रशब्दाः-कर्मनामधेयानि । जैमिनिस्त्वाचार्यः दाक्षायणशब्देन दर्शयोगे आवृत्तिरूपगुणविधिमेव मनुते । कात्यायनोऽप्येवम् । आपस्तम्बबोधायनौ तु दर्शपूर्णमासतः कर्मान्तरमेवेच्छतः । अतश्च दाक्षायणेन दृष्टत्वात् दाक्षायणयज्ञः इति । एवमिडादधस्याऽयमैडादधः । चतुश्चक्रशब्दव्युत्पत्तिस्त्वाचार्येणैव "स एष चतुश्चक्रो भ्रातृव्यवतो यज्ञः" इत्या-
१०८ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ द्रव्यशुद्धि
**अनु०—**उदाहरण के लिए निम्नलिखित अवसरों पर कुश और जल से धोने से ही शुद्धि बतायी गयी है। अग्निहोत्र में घर्मोच्छिष्ट, दधिघर्म, कुण्डपायिनायन, उत्सगिणामयन, दाक्षायणयज्ञ, ऐडादध, चतुश्चक्र, ब्रह्मौदन ॥ ३० ॥
**टि०—**अग्निहोत्र में आहुति के बाद हवणी से ही शेष हवि का भक्षण किया जाता है। सोमयज्ञ में दधिघर्म का भक्षण होता है। कुण्डपायिनामयन नामका वर्ष भर का विशेष सत्र होता है उसमें ऋत्विज चमस से ही भक्षण करते हैं। उत्सर्गिणामयन भी एक विशेष सत्र है इसमें पात्र से ही सान्नाय्य अन्न का भक्षण होता है। दाक्षायणयज्ञ दर्शपूर्णमास का ही एक रूप है। उसमें भी सान्नाय्य अन्न का भक्षण होता है। ऐडादध चतुश्चक्र विशेष प्रकार की इष्टियाँ तथा दर्शपूर्णमास के ही रूप हैं इनमें भी सान्नाय्य का भक्षण होता है। इस प्रकार के भक्षण के बाद चमस या यज्ञपात्र की शुद्धि कुश और जल द्वारा प्रक्षालन करने से हो जाती है। बोधायन श्रौत सूत्र, तथा आश्वलायन श्रौतसूत्र में ये विशिष्ट यज्ञ तथा इष्टियाँ वर्णित हैं।
शौचमित्यनुवर्तते । चतुश्चक्रो नाम 'इष्टकोष्ठमध्ये वसन्ते यजन्ते । तथैडादधः । अन्यत् प्रसिद्धम् । यथैतदिति निपातावुदाहरणसूचनार्थौ । तेषु कर्मस्वग्निहोत्रहवण्यादीनामुच्छिष्टसमन्वारब्धे शेषोपघाते च दर्भैरद्भिः प्रक्षालनमेव शौचं नावलेखनादि । ब्रह्मौदनेष्विति बहुवचनमाश्वमेधिकानामुपसङ्ग्रहणार्थम् । तत्र यद्यपि ब्रह्मौदनभोजनपात्रस्य सकृद्भोजने कृते पुनः क्रतौ नोपयोगः । तथाऽपि दर्भैरद्भिः प्रक्षालनं शौचम्, नेतरत्, अद्भिः प्रक्षालनमेवेत्यभिप्रायः ॥ ३० ॥
किञ्च—
सर्वेष्वेव सोमभक्षेष्वद्भिरेव मार्जालीये प्रक्षालनम् ॥ ३१ ॥
**अनु०—**सभी सोमयज्ञों में चमस आदि का मार्जालीय पर जल से ही प्रक्षालन करना चाहिए ॥ ३१ ॥
ग्रहचमससोमभक्षेषु 'मार्जालीयेऽद्भिः प्रक्षालनं न दर्भैरिति ॥ ३१ ॥
तेषामेव—
मूत्रपुरीषलोहितरेतःप्रभृत्युत्सर्गः ॥ ३२ ॥
इति बौधायनधर्मसूत्रे प्रथमप्रश्ने त्रयोदशः खण्डः ॥ १३ ॥
दिना दर्शिता तत एवाऽवगन्तव्या । अस्यैव च वसिष्ठयज्ञः, केशयज्ञः, सार्वंसेनियज्ञः इत्यपि संज्ञान्तराणि ॥ (बौ. श्रौ. १७.५४.)
१. मार्जालीयो नाम सौमिकवेदेर्दक्षिणभागेऽवस्थितः स्थानविशेषः ॥
चतुर्दशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः १०९
अनु०--मूत्र, मल, रक्त, रेतस् आदि से दूषित होने पर इन चमसों या यज्ञ पात्रों का त्याग कर देना चाहिए ॥ ३२ ॥
उपहतानामित्यध्याहारः। प्रभृतीत्यनेन श्लेष्मादिसङ्ग्रहः। ननु ग्रहचमसानामध्येवंभूतानां जुह्वादिबदुत्सर्गे प्राप्ते किमर्थं प्रयत्नः ? उच्यते—'यथाहि-सोमसंयोगाच्चमसो मध्ये उच्यते' इति दृष्टान्तबलात्। ग्रहचमसानां मूत्रादिसंसर्गेऽपि सोमसंयोग एव शुद्धिकारणमित्याशङ्कानिराकरणार्थो यत्नः ॥ ३२ ॥
प्रथमप्रश्ने चतुर्दशः खण्डः
मृन्मयानां पात्राणाम् ॥
मृन्मयानां पात्राणामुच्छिष्टसमन्वारब्धानामवकूलनम् ॥ १ ॥
अनु०—अपवित्र व्यक्तियों के स्पर्श से अशुद्ध हुए, मिट्टी के पात्रों को कुश की अग्नि में दिखाना चाहिए ॥ १ ॥
आज्यस्थाल्यादीनामुच्छिष्टसमन्वारब्धानां अवकूलनं कुशाग्निना स्पर्शः ॥ १ ॥
उच्छिष्टलेपोपहतानां पुनर्द्दहनम् ॥ २ ॥
मूत्रपुरीषलोहितरेतःप्रभृत्युपहतानामुत्सर्गः ॥ ३ ॥
अनु०—उच्छिष्ट के लेप से युक्त पात्रों को पुनः जलाना चाहिए ॥ २ ॥
अनु०—मूत्र, पुरीष, रक्त, रेतस् आदि से दूषित हुए मिट्टी के पात्रों को फेंक दे ॥ ३ ॥
अतिरोहितमेव ॥ २-३ ॥
तैजसानां पात्राणां पूर्ववत्परिमृष्टानां प्रक्षालनम् ॥ ४ ॥
परिमार्जनद्रव्याणि गोशकृन्मृद्भस्मेति ॥ ५ ॥
अनु०—धातु के बने पात्रों के अपवित्र व्यक्तियों द्वारा छुए जाने पर रगड़ कर धोये ॥ ४ ॥
अनु०—उसको रगड़ने में प्रयुक्त की जाने वाली वस्तुएँ हैं : गाय का गोबर, मिट्टी और भस्म आदि ॥ ५ ॥
तैजसानां हिरण्मयादीनां उच्छिष्टसमन्वारब्धानां गोशकृन्मृद्भस्मभिः परिमृज्य प्रक्षालनम् ॥ ४-५ ॥
मूत्रपुरीषलोहितरेतःप्रभृत्युपहतानां पुनः करणम् ॥ ६ ॥
| ११० | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ द्रव्यशुद्धिः |
|---|
**अनु०—**मूत्र, मल, रक्त, रेतस् आदि से दूषित हुए धातु के बर्तनों का फिर से ढालने या बनाने पर उनकी शुद्धि होती है ॥ ६ ॥
रुक्महिरण्मयादीनां मूत्राद्युपहतानामेतत् ॥ ६ ॥
गोमूत्रे वा सप्तरात्रं परिशायनम् ॥ ७ ॥
**अनु०—**अथवा उसे सात दिन-रात गाय के मूत्र में डुबो देना चाहिए ॥ ७ ॥
अगूढार्थमिदम् ॥ ७ ॥
अस्मिन्नेव विषये—
महानद्यां चैवम् ॥ ८ ॥
**अनु०—**अथवा एक बड़ी नदी में इसी प्रकार सात दिन-रात तक डाल देना चाहिए ॥ ८ ॥
सप्तरात्रं परिशायनमित्येव । याः स्वनाम्नैव समुद्रं गच्छन्ति ता महानद्यः । 'एते विकल्पाः सन्निकर्षविप्रकर्षापेक्षया व्यवस्थाप्याः ॥ ८ ॥
एवमश्ममयानाम् ॥ ९ ॥
**अनु०—**इसी प्रकार पत्थर के पात्रों को ( जल में डालना चाहिए ) ॥ ९ ॥
**टि०—**ब्यूहलेर ने इस सूत्र को अगले सूत्र के साथ ग्रहण कर गोवाल से घर्षण से ही शुद्धि बता दिया है। इसे अलग पढ़ने पर पूर्ववर्ती सूत्र का नियम ही अनुवर्तित होगा ।
दृषदादिष्वश्ममयेषु परिशायनं द्वितीयम् । एवमिति निर्देशेन पुनः करणमपि । यद्वा—मृन्मयशौचस्यैतदनुकर्षणम् ॥ ९ ॥
अधुना यज्ञभाजनानां फलादीनां शुद्धिः—
अलाबुबिल्वविनालानां गोवालैः परिमार्जनम् ॥ १० ॥
**अनु०—**लौकी, बिल्व, बांस के विनाल नामक पात्रों के दूषित होने पर उनको गाय के केशों के गुच्छे से रगड़ना चाहिए ॥ १० ॥
अलाबुः स्रुचां भाजनम् । बिल्वं यवमतीषु प्रोक्षणीषु यूपावटादिषु चोपयोक्तव्यानां यवानाम् । विनालं वेणुविदलमयादिकं दीर्घभाजनमुच्यते । तच्च प्रणीताप्रणयनादीनाम् । उच्छिष्टसमन्वारब्धानां चैतत् ॥ १० ॥
नलवेणुशरकुशव्यूतानां गोमयेनाऽद्भिरिति प्रक्षालनम् ॥ ११ ॥
१. एतत्स्थाने, कालः रुक्मादीनामुपयोगः कालसन्निकर्षविप्रकर्षापेक्षया व्यवस्थाप्या इति पाठो. गः पु.
चतुर्दशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः १११
अनु०—नरकुल, बांस शर और कुश से बुनकर बनाये गये उपकरणों को गाय के गोबर, जल आदि से धोना चाहिए ॥ ११ ॥
टि०—गोविन्द के अनुसार इन उपकरणों के उच्छिष्ट से दूषित होने पर ही प्रक्षालन नियम है । ‘इति’ शब्द से गोमूत्र का भी ग्रहण उन्हों ने माना है ।
इदं पुनरुच्छिष्टलेपोपहतानाम् । नलशब्दो वेत्रे भाष्यते । शेषाः प्रसिद्धाः । एतैः व्यूता ओतप्रोतभावेन समं तता इतिशब्दस्तु गोमूत्रोपलक्षणार्थः ॥ ११ ॥
अथ प्रदेयद्रव्येषु—
व्रीहीणामुपघाते प्रक्षाल्याऽवशोषणम् ॥ १२ ॥
अनु०—बिना कूटे हुए धान के दूषित हो जाने पर उसे धोकर सुखाना चाहिए ॥ १२ ॥
टि०—गोविन्द के अनुसार यह नियम चण्डाल आदि के स्पर्श से एक द्रोण से अल्प धान के दूषित होने पर समझना चाहिए । धान की मात्रा अधिक होने पर केवल जल छिड़क देना पर्याप्त होता है ।
सतुषोपलक्षणमेतत् । उपघातश्चण्डालादिस्पर्शः द्रोणादल्पतरस्येदमुक्तम् । बहूनां तु प्रोक्षणं तथाविधानामेव ॥ १२ ॥
तण्डुलानामुत्सर्गः ॥ १३ ॥
अनु०—(मूत्रादि से दूषित ) चावल को फेंक देना चाहिए ॥ १३ ॥
टि०—अधिक मात्रा हो तो जितना दूषित हुआ हो उतना निकाल कर फेंकने नियम समझना चाहिए ।
मूत्राद्युपहतानामल्पानामिति शेषः । बहूनां तावन्मात्रत्याग इति ( १. १५ १५) वक्ष्यति ॥ १३ ॥
एवं सिद्धहविषाम् ॥ १४ ॥
अनु०—इसी प्रकार तैयार हवि के दूषित होने पर भी उसका त्याग कर देना चाहिए ॥ १४ ॥
एवं चरुपुरोडाशादीनामुपघाते त्याग एवाऽर्थः । स एव च हविर्दोषो भवति ॥ १४ ॥
महतां श्वायसप्रभृत्युपहतानां तं देशं पुरुषाभमुद्धृत्य “पवमा
१. “पवमानस्सुवर्जनः पवित्रेण विचर्षणिः” इत्यादिः “जातवेदा मोर्जंयन्त्या पुनातु” इत्यन्तोऽनुवाकः तैत्तिरीयब्राह्मणे प्रथमाष्टके चतुर्थप्रपाठकेऽष्टमो द्रष्टव्यः ।