बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
४०८ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ मन्त्रपुरश्चरणम्
बारह दिन तक जप करे। और केवल एक बार रात्रि में ओदन, घृत, दध और दधि का आहार करे ॥ १५ ॥
द्वादशाऽहानि सकृत्सकृत्प्राश्य जपेदिति सम्बन्धः । स च "मुखं व्यादाय स्वपिति" इतिवत् द्रष्टव्यः । सिषाधयिषुः साधयितुमिच्छन् । घृतेनेति घृतान्नेनेत्यभिप्रायः ॥ १५ ॥
'ऋग्यजुस्सामवेदानामथर्वाङ्गिरसामपि ।
दशावरं तथा होमः सर्पिषा सवनत्रयम् ॥ १६ ॥
अनु०—( ऋक्, यजुस्, सामवेद, अथर्वाङ्गिरस् से सम्बद्ध ) होम दशवार घृत से तीनों सवनकालों में करे । मन्त्रों के द्वारा अपने अभीष्ट कार्य की सिद्धि के लिए यही आरम्भिक पूजन विधि ( पुरश्चरण ) है ॥ १६ ॥
पूर्वसेवा भवेदेषा मन्त्राणां कर्मसाधने ॥
मन्त्राणां कर्मसाधन इति ॥ १७ ॥
इति बौधायनीये धर्मसूत्रे चतुर्थप्रश्नेऽष्टमः खण्डः ॥
वेदसम्बन्धिन्या मन्त्रसम्बन्धिन्याश्च षष्ठया 'वैश्वानर्यः' ( ४. ७. ५. ) इत्यनेन सम्बन्धः स च वैदिकानामेव मन्त्राणामेषा पूर्वसेवा पुरश्चरणं, नेतरदिति ज्ञापनार्थम् । मन्त्राणां कर्मसाधन इति । मन्त्रैरिष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारसिद्धावित्यर्थः । तथा च शौनकः—
'पुरश्चरणमादौ तु मन्त्राणां सिद्धिकारणम्' इति ॥ १७ ॥
इति बौधायनीयधर्मसूत्रविवरणे गोविन्दस्वामिकृते चतुर्थप्रश्नेऽष्टमोऽध्यायः ॥
अतिलोभात् प्रमादाद्वा ॥८॥ निवृत्तः पापकर्मभ्यः ॥ समाधुच्छन्दसा रुद्राः ॥ ६ ॥ अथाऽतस्संप्रवक्ष्यामि ॥ ५ ॥ प्रायश्चित्तानि वक्ष्यामः ॥ ४ ॥ प्रायश्चित्तानि वक्ष्यामः ॥३॥ प्रायश्चित्तानि वक्ष्यामः ॥ २ ॥ प्रायश्चित्तानि वक्ष्यामः ॥ १ ॥
इति बौधायनीये धर्मसूत्रे चतुर्थप्रश्नः (गृह्यसूत्रे सप्तदशः प्रश्नः) समाप्तः ।
समाप्तं चेदं बौधायनधर्मसूत्रम् ॥
१. सूत्रार्धमिदं ई. पुस्तक एवोपलभ्यते, नाऽन्येषु, परन्तु व्याख्यात्रोपात्तमिति कृत्वा परिगृहीतमस्माभिः ।
परिशिष्टम्
'विवरण' में उद्धृत वाक्यों का सन्दर्भ-निर्देश
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| अकारं चाप्युकारं च | मनु. २. ७६ | ३०२ |
| अक्षय्यं ह व चातुर्मास्य- | आप. श्रौ. ८. १. १. | २७ |
| अर्के चेन्मधु विन्देत | शाबरभाष्य १. २. ३४. | २४९ |
| अङ्गादङ्गात्सम्भवसि | तै. मं. सं. २. १४. | १७३ |
| अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं | महा. भा. व. २९७. १७. | २६३ |
| अङ्गुष्ठानासिकाभ्यान्तु | हारीत. स्मृ. ४. ३७ | ५२ |
| अग्नयेऽंहोमुचे | तै. सं. ७. ५. २२. | ३९४ |
| अग्नये पवमानाय | तै. सं. २. २. ४. | ३९४ |
| अग्नये स्वाहा | तै. मं. सं. १. १. | ३४३ |
| अग्नि जलं वा | या. स्मृ. १. ९८. | ७२ |
| अग्निं होतारम् | ऋ. सं. ३. १. १९. | २७१ |
| अग्निश्च मा मन्युश्च | याज्ञिकी. ३९. | २२४ |
| अग्निहोता | तै. आ. ३. ३. | २०५ |
| अग्नेऽभ्यावर्त्तिन् | तै. सं. ४. २. १. | ३३६ |
| अग्ने नय | तै. ब्रा. २. ८. २. | ४०० |
| अग्नेर्मन्वे | तै. सं. ४. ७. १५. | ४०० |
| अग्ने युक्ष्वाहि | ऋ. सं. ४. ५. २९. | २७१ |
| अग्ने रक्षाहः | ऋ. सं. ५. २. २०. | २७१ |
| अतिथिपूजाहानाच्च | २७८ | |
| अतोऽन्यतममास्थाय | मनु. ११. ८६. | १५९ |
| अन्नाह गोरमन्वत | तै. ब्रा. १. ५. ८. | ३४७ |
| अथ ब्रह्म वदन्ति | १०० | |
| अथाऽऽचामेत् | व. ध. २३. १९. | २२४ |
| अथाऽभ्यादधातीध्मं | आप. श्रौ. ७. ६. ४. | १०६ |
| अथैते प्राहुऋक्संहितम् | शौनकः | ३५४ |
| अग्निरैव काञ्चनम् | व. ध. ३. ५७. | ५४ |
| अध्यापनयोजनप्रतिग्रहाः | गौ. ध. ७. ३. | २०१ |
| अर्धप्रसृतिमात्रा तु | दक्ष. स्मृ. ५. ७. | ६८ |
| अनाश्रमी न तिष्ठेत | दक्ष. स्मृ. १. १०. | ३४ |
| अनिश्चयो भिक्षुः | गौ. ध. ३. ११. | २५१ |
| अनुपनीतसहभोजने | गृत्समदः | १० |
३० बौ०ध०
४१० बौधायन-धर्मसूत्रम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| अनुशिष्टं लोक्यम् | बृ. उ. १. ५. १७ | २८० |
| अनृतसम्मिता मनुष्याः | ऐ. ब्रा. १. ६. | २८९ |
| अनृतञ्च समुत्कर्षवति | ३३५ | |
| अन्नं प्राणमन्नमपानम् | तै. ब्रा. २. ८. ८. | २२१ |
| अन्नं ब्रह्म | तै. उ. २. २. | ३०२ |
| अन्नममृतम् | तै. आ. १०. १५. | २६१ |
| अन्विदनुमते त्वम् | तै. सं ३. ३. ११. | ४०१ |
| अपि यत्सुकरं कर्म | मनु. ७. ५२. | ३४२ |
| अपो निशि न गृह्णीयात् | ४१ | |
| अपोऽशान कर्म कुरु | तै. सं. सं. २. ६. | २६१ |
| अभावप्रत्ययालम्बना | यो. सू. १. १२. | २०४ |
| अभिचरन् दशहोतारं | तै. ब्रा. २. २. १. | १०२ |
| अभि त्वा शूर | साम. सं. ५. ३. १. | ३५९ |
| अभिहुत्य हुत्वा भक्षयन्ति | तै. सं. ६. २. ११ | २०० |
| अभ्यर्हितं पूर्वम् | व्याक. वा. २३४. | २२४ |
| अद्भि कार्ष्णायसीम् | मनु. ११. १३३ | ३६१ |
| अबद्धं मनो दरिद्रं | तै. सं. ३. १. १. | १२१ |
| अमन्त्रिका तु कार्येयं | मनु. २. ६६. | ८० |
| अमृतापिधानमसि | याज्ञिकी. ५०. | ३४५ |
| अमृतोपस्तरणमसि | याज्ञिकी. ४७. | २६१ |
| अलाबुं दारुपात्रं वा | मनु. ६. ५४. | २८५ |
| अयं वाव यः पवते | तै. ब्रा. ३. ११. ७. | २६९ |
| अहंकृत्य तृचञ्च | पा. सू. ३. ३. १४९ | २३४ |
| अव ते हेडः | तै. सं. १. ५. ११. | २२५ |
| अश्रद्धया हुतं दत्तम् | भगवद्गी. १७. २८. | ६६ |
| अश्रोत्रिया अननुवाक्याः | ब. ध. ३. १. | २१० |
| अश्मलवणमपण्यम् | ब. ध. २. २९. | ११ |
| असंस्थितो हि तर्हि | २५५ | |
| अज्ञानादिनियमपर्यवसानम् | शाबर भा. १. १. १ | ३५ |
| अहरेष मित्रः रात्रिर्वरुणः | तां. ब्रा. २५. १०. १०. | २२९ |
| अहमस्मि | साम. सं. पू. ६. १. | ३५९ |
| अविच्छिन्नब्राह्मण्यस्सुरां | तं. ब्रा. १. ३; ४. | १० |
| आकारजानामभ्युदितानां | शङ्खः | ६४ |
| आग्नावैष्णवमेकादशकपालं | तै. सं. २. २. ९. | १०२ |
| आग्नेयी वा एषा | तै. ब्रा. ३. ७. ३. | ३९ |
| आचम्याग्न्यादि सलिलं | या. स्मृ. ३. १३. | ८७ |
| आचार्यं स्वमुपाध्यायम् | मनु. ५. ९१ | १६१ |
परिशिष्टम्
४११
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य | छा. उ. ८. १५. १. | १८ |
| आच्छाद्य चार्चयित्वा | मनु. ३. २७. | १४० |
| आच्छेत्ता ते मारिषम् | त. सं. १. १. २. | ११४ |
| आत्मा ज्ञातव्य इत्येतत् | श्लो. वा. पृ. ६६१. श्लो. १०३. | २५७ |
| आदित्यो ब्रह्म | छा. उ. ३. १९. १. | २२७ |
| आदित्योऽग्नि | ऐ. ब्रा. ४०. ५. | ४२ |
| आपद्विहितैः कर्म्मभिः | उशनाः | ३५७ |
| आस्नानं तीर्थं क इह प्रवोचत | ऋ. सं. ८. ६. १७. | ११८ |
| आपो हिष्ठा | तै. सं. ५. ६. १. | २२५ |
| आयुर्विप्रापवादेन | मनु. ४. २३७. | २७८ |
| आयुर्दा देव जरसं | तै. मं. सं. २. २. १. | ३२ |
| आयुष्ये | तै. आ. २. ५. | ३३५ |
| आशयेष्वन्नशेषान् | बो. गृ. २. ११. ४२. | २७६ |
| आश्रमसमुच्चयं द्वितीयं | २६० | |
| आसामन्यतमां गत्वा | नार. स्मृ. १२. ७५. | १७० |
| आहवनीये सभ्यावसथ्ययोः | बो. श्रौ. २. ७. | २९५ |
| आहिताग्निश्चेत् | व. ध. ४. ३०. | २०१ |
| आहिताग्नेर्विनीतस्य | व. ध. २५. २. | ३७६ |
| इतरेभ्यो बहिर्वेदि | मनु. ११. ३. | २१३ |
| इतिहासपुराणं | छा. उ. ७. १. २. | ३७७ |
| इन्द्रं नरः | साम. सं. पू. ४. १. | ३५९ |
| इन्द्राय स्वाहा यमाय | ३४४ | |
| इमं मे वरुण | तै. सं. २. १. ११. | २२५ |
| इमं स्तोममर्हते जातवेदसे | तै. मं. सं. २. ७. | ३२ |
| उताऽसि मैत्रावरुणः | ऋ. सं. ५. ३. २४. | ८६ |
| उदके मध्यरात्रे च | मनु ४. १०९. | १५१ |
| उदगयन आपूर्यमाणपक्षे | आश्व. गृ. १. ३. १. | २० |
| उदुत्यम् | तै. सं. १. ४. ४३ | ३४७ |
| उद्दीप्यस्व जातवेदः | तै. मं. सं. १. १. | ३९ |
| उद्यन्तमस्तं यन्तं | तै. आ. २. २. | २२३ |
| उद्वयं तमसस्परि | तै. सं. ४. १. ७. | ३४७ |
| उपासने गुरूणां | आप. ध. १. १५. १. | ४७ |
| उपास्मै गायता नरः | साम. सं. उ. १. २. | ३५९ |
| उभयत्र दशाऽहानि | वृद्धमनुः | ७८ |
| उरवेऽन्तरिक्षाय | ३४४ | |
| ऋतञ्च सत्यञ्च | याज्ञिकी ८. | २३९ |
| ऋतुस्स्वाभाविकस्त्रीणाम् | मनु. ३. ४६. ४७. | १८० |
४१२ बौधायन-धर्मसूत्रम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ऋषयो दीर्घसन्ध्यत्वात् | मनु. ४. ९४. | २३० |
| एका लिङ्गे गुदे तिस्रः | मनु. ५. ३६. | ६८ |
| एका लिङ्गे तिस्रो वामे | व. ध. ६. १६. | ६८ |
| एकोऽपि वेदवित् | मनु. १२. ११३. | ५ |
| एतदक्षरमेताञ्च | मनु. २. ७८. | २२७ |
| एतदेव व्रतं कुर्युः | मनु. ११. १९७. | १३४ |
| एतदेव विपरीतं | तै. आ. २. १. | ४७ |
| एतत् खलु वाव तपः | तै. सं. ६. १. ६. | २७८ |
| एनदद्युमन्तः प्रभूतः | बौ. गृ. १. १. १. | ३०९ |
| एनपा द्वितीया | पा. सू. २. ३. ३१. | ११५ |
| एनबन्यतरस्याम् | पा. सू. ५. ३. ३५ | ११५ |
| एषां त्रिरात्रमभ्यासात् | याज्ञ. स्मृ. ३. ३२२ | ३९० |
| एष्टव्या बहवः पुत्राः | बृह. स्मृ. १. २. | २७९ |
| ऐकाश्रम्यन्त्वाचार्याः | गौ. ध. ३. ३६. | २६१ |
| ओंकारश्चाथशब्दश्च | २२२ | |
| ओं भूः ओं भुवः | याज्ञिकी ४२. | २२८ |
| ओं होतः | बो. श्रौ. १२. १६. | ३०१ |
| ओमापो ज्योतिः | याज्ञिकी ४२. | २२८ |
| कराभ्यां तोयमादाय | व्यासः | २२६ |
| कवारितर्यदङ्घ्रिवोपतिष्ठते | तै. सं. १. ५. ९. | १६५ |
| कर्तृकर्मणोः कृति | पा. सू. २. ३. ६५. | ३ |
| कर्मणैव हि संसिद्धि | भगवद्गीता. ३. २०. | २५५ |
| कर्मयोग्यो जनो नैव | ४१ | |
| कर्मादिष्वेतेर्जुहुयात् | तै. आ. २. ७. | ३३८ |
| कात्यायनाय | तै. आ. १०. १. ७. | ३७८ |
| कामकारकृतेऽपि | मनु. ११. ४५. | १५५ |
| कामतो ब्राह्मणवधे | मनु. ११. ८९. | १५५ |
| कामं मातापितरौ चैनम् | १४९ | |
| कामोदकं सपिण्डता | याज्ञ. स्मृ. ३. ४. | ८० |
| कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे | पा. सू. २. ३. ५. | ३६१ |
| (१)कुणपरेतोऽसृङ्मूत्रपुरीष- | शङ्खः | ५६ |
| कुमारजन्मदिवसं | वृद्धमनुः | ७८ |
| कुर्वन्नेवेह कर्माणि | ई. उ. २. | २५४ |
| कुशोदकं दधि | याज्ञ. स्मृ. ३. ३१४. | ३८० |
| कुश्नक्रोशो शूद्रहत्या | १३५ | |
| कृच्छ्रे, वापनं व्रतं चरेत् | गौ. ध. २७. २. ३. | ३४१ |
| कृत्यल्युटो बहुलम् | पा. सू. ३. ४. ११३. | २५२ |
परिशिष्टम्
४१३
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 'कौपीनाच्छादनार्थम् | गौ. ध. ३. १८. | २५२ |
| क्षितिस्थाश्चैव | व. ध. ३. ४६. | ६० |
| क्षीयन्ते चाऽस्य कर्माणि | मुण्ड. उ. २. २. ८. | २५८ |
| क्षारं च सविकारम् | व. ध. २. २१. | ९६ |
| 'क्षुधापरीतस्तु किंचिदेव | व. ध. १२. ३. | ३६ |
| खड्गे तु विवदन्ते | व. ध. १४. ३५. | ९५ |
| ख्यापनेनानुतापेन (वशिष्ठः) | मनु. ११. २२७. | ७७ |
| गर्भस्थैस्सदृशो ज्ञेयः | १९१ | |
| गृहस्थोऽपि विमुच्यते | या. स्मृ. ३. २०२. | २५५ |
| गोवालः परिमार्जनम् | व. ध. ३. ५०. | ५४ |
| ग्रीष्मे पञ्चतपास्तु | मनु. ६. २३. | ३२० |
| चक्रिणेऽन्धकाय समुपजीविने | २१८ | |
| (१) चण्डालाः प्रत्यवसिताः | दक्ष. स्मृ. ४. २१. | २८२ |
| चतुर्धा मेदमेके | २५४ | |
| चतुर्विधस्य मनुष्यजातस्य | गौ. ध. ८. २. | १२८ |
| चत्वार आश्रमाः | आप ध. २. २१. १. | २६० |
| चरन्नभ्यवहार्येषु | व. ध. ३. ४२. | ५३ |
| चषकां शुक्कुवाणां च | मनु. ५. ११७. | १०६ |
| चलतश्चैनान् स्वधर्म्म | गौ. ध. ११. ११ | १२८ |
| चित्तिस्स्रुक् | तै. आ. ३. १. १. | ३३९ |
| (२) चान्द्रायणं नवश्राद्ध | अत्रि. स्मृ. ३०५ | १४७ |
| चित्रं देवानाम् | साम. सं. पू० ६. ३ | ३५९ |
| चित्रादितारकाद्वन्द्वैः | ९९ | |
| चीरवल्कलधारिणां | १०३ | |
| छत्रोत्पन्नास्तु | व. ध. १८. ५. | १२० |
| छन्दसा अप उत्पुनाति | तै. ब्रा. ३. ३. ४. | ४०१ |
| 'जननेऽप्येवम् | गौ. ध. १४. १३. | ७८ |
| जपे होमे तथा दाने | दक्ष. स्मृ. १. ११. | ३४ |
| जातवेदसे | याज्ञिकी १० | ३७८ |
| जातिमात्रोपजीवी च | मनु. ८. २०. | ६ |
| जात्युक्तं पारदार्यञ्च | व्याघ्रः | १९७ |
| जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः | छा. उ. ४. १. | ३०५ |
| •तच्छन्दसा ब्रह्मणेन | २९७ | |
| 'तच्छ्रेष्ठं जन्म | आप. ध. १. १. १७. | १४९ |
| 'सजातीयमेवापतेत' | गौ. ध. १४. ६. | ८३ |
१. शातातपीयत्वेनोक्तमिदं मस्करिणा।
२. मुद्रितशङ्खस्मृतावनीदं नोपलभ्यते।
४१४ | बौधायन-धर्मसूत्रम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| तत् सवितुः | याज्ञिकी ४२. | २२७ |
| तद्यथेषीकातूलमग्नौ | छा. उ. ५. २४. | २६४ |
| तप्तकृच्छ्रं चरन् | मनु ११. २१४. | ३८६ |
| तस्माद्गुरुकुले तिष्ठन् | श्लो. वा. १. १. १. | ३५ |
| तस्मात्तद्विसः पुण्यः | वृद्धमनुः | ७८ |
| तस्माच्छ्रेयांसं पापीयान् | तै. सं. २. ५. १. २. | २ |
| तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं | भगवद्गीता १६. २४. | ६६ |
| तस्मात्प्रजननं परं | याज्ञिकी ७८ | २५४ |
| तस्मात्तेनोभयं पश्यति | छा. उ. १. २. ४. | १२१ |
| तस्मात्तेनोभयं संकल्पयन्ते | छा. उ. १. २. ६. | १२१ |
| तस्मात्स्त्रियो निरिन्द्रियाः | तैं. सं. ६. ५. ८. | १८० |
| तस्मादन्नं ददत् | याज्ञिकी. ६२. | २२३ |
| तस्माद्विनामा ब्राह्मणः | तै. सं. ६. ३. १. | १४९ |
| तस्मादुपारिष्टाद्दोषधयः | तैं. सं. ७. ५. १. | ३१५ |
| तस्माद्ब्राह्मणाय नाऽपगुरेत | तै. सं. २. ६. १० | १५४ |
| तस्मद्यज्ञवास्तु नाम्बवेत्यम् | तै. सं. ३. १. ९. | ११८ |
| तस्मिन् स्फेयेन प्रहरति | आप. श्रौ. २. २६. ५, बौ. श्रौ. १. ११. | ११४ |
| तस्मै हितम् | पा. सू. ५ १. ५. | ३५१ |
| तं यज्ञपात्रैर्दहन्ति | २५४ | |
| तं स खनति खानयति वा | बौ. आ. ४. २. (पृ. ११०. पं. ९.) | ११५ |
| तस्य वा एतस्य | तै. आ. २. १५. | १५१ |
| तस्य वाचकः प्रणवः | पात. सू. १. ३१. | २९२ |
| तस्याजिनमूर्ध्ववालं | गौ. ध. २३. १८. | १६५ |
| तस्याऽऽश्रमविकल्पमेके | गौ. ध. ३. १. | २५९ |
| तस्यैषा भवति यत्से शिश्नं | तै. आ. १. ७. | ४५ |
| तस्यैवं विदुषो यज्ञस्य | याज्ञिकी. ७९. | २६० |
| त्रीणि स्त्रियाः पातकानि | व. ध. २८. ७. | १७० |
| तृणं वा किंजारु वा | बौ. श्रौ. १. ४. (पृ. ७. पं. १०) | ११५ |
| तेभ्योऽभितप्तेभ्यः | छा. उ. २. २३. | ३०२ |
| तैलं दधि पयस्सोमः | ११२ | |
| त्रयो धर्मस्कन्धा | छा. उ. २. २३. | २१४ |
| त्यजेत् पितरम् | गौ. ध. २०. १. | १६६ |
| त्वामिद्धि हवामहे | साम. सं. पू. ३. १. | ३५९ |
| दक्षिणं बाहुं जान्वन्तरा | गौ. ध. १. ३८. | ५० |
| दक्षिणं बहुमुद्धरते | तै. आ. २. १. | ४० |
| दधिक्राव्णः | तै. सं. १. ५. ११. | २२४ |
| दधि भक्ष्यं तु शुक्तेषु | मनु. ५. १०. | ९८ |
परिशिष्टम्
४१५
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| दधि मधु घृतमापो धानाः | तै. सं. २. ३. २. | ११२ |
| दशवर्षसुखं परैस्सन्निधौ | गौ. ध. १२. ३४. | २१३ |
| दर्भ्या अन्नस्य जुहोति | बो. प. १. ६. १०. | ४०१ |
| दारामिहोत्रसंयोगं | मनु. ३. १७१. | ३९६ |
| दिग्भ्यस्स्वाहा | तै. सं. ७. १. १५. | ३५४ |
| द्विजातीनामध्ययनम् | गौ. ध. १०. १. | २ |
| द्विरेन्द्रवायवस्य भक्षयति | आप. श्रौ. १२. २५. २. | ३१ |
| दिवाकीर्त्यमुदक्यां च | मनु. ५. ८५. | ९० |
| दीक्षितश्चेदनृतं वदेत् | बौ. श्रौ. २८. ९. | १२० |
| दुहिताऽऽचार्यभार्या च | नारदस्मृ. १२. ७४. | १७० |
| देवेभ्यस्स्वाहा | तै. सं. ३. १. ४. | २४६ |
| देशकालवयश्शक्ति | या. स्मृ. २. २७५. | १३३ |
| देशजातिकुल | गौ. ध. ११. २२. | १० |
| द्वैधे बहूनां वचनं | या. स्मृ. २. ७८. | १३९ |
| द्वौ द्वौ मासौ समाहितः | आप. ध. १. १३. १९. | १७१ |
| द्रव्याणि हिंस्याद्यः | मनु. ८. २८८. | १३३ |
| धन्वन्निव प्रपा असि | तै. सं. २. ५. ११. | २ |
| ध्रुवशीलो वर्षासु | गो. गृ. ३. १३ | २५३ |
| न कर्हिचिन्मातापित्लोः | गौ. ध. २१. १५. | १९२ |
| न तस्य मायया च न | ऋ. सं. ६. २. ११ | २७१ |
| न तिष्ठति तु यः पूर्वों | मनु. २. १०३ | २३१ |
| न तु कदाचित् ज्यायसीम् | व. ध. २. २८. | २०३ |
| नदीषु देवखातेषु | मनु. ४. २०३ | २३४ |
| न दोषो हिंसायामाहवे | गौ. ध. १०. १६. | १३० |
| नमो रुद्राय | तै. ब्रा. ३. ७. ९. | ३२९ |
| न पादेन पाणिमा वा | व. ध. ६. ३३. | २७ |
| नमस्ते रुद्र | तै. सं. ४. ५. १. | ३५९ |
| नवो नवो भवति | तै. सं. २. ४. १४. | ३४७ |
| न श्रोत्रियप्रव्रजित | गौ. ध. १२.३५. | २१३ |
| न शब्दशास्त्राभिरतस्य | व. ध. १०. १४. | ३०० |
| न हि प्रभायारणस्सुशेवः | ऋ. सं. ५. २. ६. | २७७ |
| न हीदृशमनायुष्यम् | मनु. ४. १३४. १३५. | २७८ |
| नात्रिवर्षस्य कर्तव्या | मनु. ५. ७०. | ७९ |
| नाऽस्य कार्योऽग्निसंस्कारः | मनु. ५. ६९. | ७९ |
| नावेदविन्मनुते | तै. ब्रा. ३. १२. ९. | २५७ |
| न्यायार्जितधनः | या. स्मृ. ३. २०५. | १८० |
| निष्क्राम्यस्थ देवश्रुतः | तै. सं. ३. १. ८. | ३४५ |
| ४१६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् |
|---|
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| नित्यनैमित्तिके कुर्यात् | श्लो. वा. पृ. ६७१ को. ११०. | २०५ |
| नित्यं मद्यामपेयम् | गौ. ध. २. २६. | ११ |
| नेन्मे वाक्प्राणैरनुषक्ता | ३१ | |
| नर्चंतेन पूर्वेण | तै. ब्रा. १. ६. १. | ११५ |
| पञ्जिग्ध्यं गवाघ्रातं | मनु. ५. ११५. | ५९ |
| पञ्चदशग्रासान् | गौ. ध. २७. १३. | ३५१ |
| पञ्चमी मातृबन्धुभ्यः | व. ध. ८. ३. | ११ |
| पञ्चमे व्यवहार्थसकामः | १९ | |
| (१) पञ्चमे भोजनं भवेत् | दक्षः | २०४ |
| (२) पञ्चमे भोजनं स्मृतम् | दक्षः . | २०२ |
| पतितोत्पन्नः पतितः | व. ध. १३. २०. | १७४ |
| परकीयनिपानेषु | मनु. ४. २०१. | २०७ |
| परस्त्रीषु दिवा च | बो. गृ. १. ११. | १६३ |
| परिषद्यं शरणस्य | ऋ. सं. ७. २. ६. | २७७ |
| परीक्षार्थोऽपि ब्राह्मणः | आप. ध. १. २९. ७. | ११ |
| पर्युषितभोजनेऽहोरात्रोपवासः | संव. स्मृ. १. १३०. | १० |
| पवमानस्सुवर्जनः | तै. ब्रा. १. ४. ८. | २२५ |
| पवित्रं नो वृत | तै. आ. २. ७. | ३३२ |
| पशुं वेश्यां च यो गच्छेत् | सं. स्मृ. १. १६४. | १९६ |
| पादावमृश्य सर्वाभिः | ५२ | |
| पादुकामजिनं छत्रं | मनु. ६. ५४. | २८४ |
| पालाशं पद्मपत्रम् | प्रजापतिः | ३९१ |
| पिण्याकाचामतक्र- | या. स्मृ. ३. ३२१ | ३९० |
| पितुर्वा भजते शीलम् | मनु. १०. ५९. | १७४ |
| पितुर्गृहे तु या कन्या | लघु शाता. ६५ | २१९ |
| पितृभ्यः स्वधा नमः | २४७ | |
| पित्रे पितामहाय | शङ्ख. स्मृ. १३. ३. | १८६ |
| पिबा सोमम् | साम. सं. उ. ३. १. | ३५९ |
| पुनर्मा मैत्विन्द्रियम् | तै. आ. १. ३० | १६३ |
| पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः | मनु. ६. ३६. | १८९ |
| पुरश्चरणमादौ | शौनक. | ४०८ |
| पूर्वार्द्धो वै देवानाम् | श. ब्रा. २. ४. २. ८. | २६१ |
| पृथिवी च | तै. सं. ४. २. १० | ३११ |
| पृथिवी होता | तै. आ. ३. २ | ३३९ |
| पैतृष्वसेयीं भगिनीं | मनु. ११. १७१ | ११ |
१. २. मुद्रितशङ्खस्मृतावनीदं नोपलभ्यते।
परिशिष्टम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| प्रच्युतः कालः | यास्क २. ७. ३. | ३०४ |
| प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः | तै. उ. १. ११. | २५३ |
| प्रजानिःश्रेयसं | आप. गृ. १. ८. ४. ६. | १८० |
| प्रजातिस्त्रियाम् | तै. ब्रा. २. ४, ६. | १४१ |
| प्रणष्टस्वामिकं | मनु. ८. ३०. | १३२ |
| प्रचानामितरे कुर्वीरन् | व. ध. ४. १९ | ८० |
| प्रतिबध्नाति हि श्रेयः | रघु. वं. १ ७९. | २२० |
| प्रतिलोमं चरेयुस्ताः | व. ध. २१. १४. | १९४ |
| प्रत्यग्ने मिथुनादह | ऋ. सं. ८. ४. ९. | २७० |
| प्रत्यग्रहरसाहरः | सा. सं. पू. १. २. ५. | २७१ |
| प्रत्यासन्नमधीयानं | शातातपः | ७२ |
| प्रत्युद्धारः पुत्रजन्मना | व. ध. १५. १७ | १६६ |
| प्रसमित्र मर्तो अस्तु | तै. सं. ४. १. ६. | ३०१ |
| प्रदेशिन्यङ्गुष्ठयोर्मध्ये | व. ध. ३. ६१ | ४९ |
| प्रदेशिन्यङ्गुष्ठभ्यान्तु | ५२ | |
| प्रसारितं च यत्पण्यं | व, ध. ३. ४५ | ६० |
| प्रागुपनयनात्कामचारं | गौ. ध. २. १ | १९ |
| प्रागुत्तमास्त्रय आश्रमिणः | गौ. ध. २८. ५०. | ४ |
| प्राची दिगग्निदेवता | तै. ब्रा. ३. ११. ५ | ३४४ |
| प्राच्यै दिशे स्वाहा | तै. सं. ७. १. १५. | ३५४ |
| प्राणस्यान्नमिदं सर्वं | मनु. ५. २८. ९ | ९४ |
| 'प्राणायामस्तथा ध्यानम् | ३६९ | |
| प्राणापान | याज्ञिकी ६६. | ३७८ |
| प्राणे निविष्टः | याज्ञिकी, ४९. | २६१ |
| प्रायश्चित्तीयतां प्राप्य | मनु. ११. ४७. | २०९ |
| बुद्धे चेत्क्षेमप्रापणं | आप. ध. २. २१. १६. | २५८ |
| ब्रह्ममे तु माम् | याज्ञिकी. ६३. | २४९ |
| ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् | जाबालोप. ४. | २५९ |
| ब्रह्म वै चतुर्होतारः | तै. ब्रा. ३. १२. ५, | ३०१ |
| ब्रह्मा देवानाम् | तै. सं. ३. ४. ११. | ३२९ |
| ब्राह्मणं पुरोदधीत | गौ. ध. ११. १२. | १२९ |
| ब्राह्मणक्षत्रियविशां | व. ध. २१. १४. | १९४ |
| ब्राह्मणश्चेत्प्रेत्त्यापूर्वं | व. ध. २१. १७ | १९५ |
| ब्राह्मणाभिशंसने | गौ. ध. २१. १७. | १७७ |
| ब्राह्मणेषु च विद्वांसः | मनु. १. ९७. | २७० |
| ब्राह्मणो ब्राह्मणं हत्वा | सुमन्तुः | १५४ |
| ब्राह्मणो धर्मान् प्रब्रूयात् | व. ध. १. ४१. | ४ |
४१८ | बौधायन-धर्मसूत्रम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ब्राह्मणस्पत्यं तूपरमालभेत | तै. सं. २. १. ५. | १०२ |
| ब्राह्मणस्याधिकाः प्रवचन- | गौ. ध. १०. २. | ३ |
| भिक्षादानमप्सुपूर्वम् | गौ. ध. ५. १९. | २७५ |
| भिद्यते हृदयग्रन्थिः | मुण्ड. २. २. ८. | २५६ |
| भूतानां प्राणिनःश्रेष्ठाः | मनु. १. ९६. | २७० |
| भूतेभ्यो नमः | याज्ञिकी. ६७. | २४६ |
| भूमियमयज्ञियैस्तृणैः | वै. ध. १२. १०. | ६७ |
| भूरग्नये च पृथिव्यै च | याज्ञिकी ५. | २६१ |
| भृत्यानानुपरोधेन | मनु. ११. १०. | २१० |
| भूर्वृक्षिशिलावर्जम् | व. ध. २४. ६ | ३८३ |
| मद्यं नित्यं ब्राह्मणः | गौ. ध. २. २६. | १९ |
| मद्यभाण्डस्थिता आपः | व. ध. २०. २४. | १६० |
| मधुवाता ऋतायते | ऋ. सं. १. ३. १८. | २६९ |
| मनुष्यलोकः पुत्रेण | श. ब्रा. १४. ४. ३. २४. | २५३ |
| मशकैर्मक्षिकामिश्च | व. ध. ३. ४५. | २६३ |
| महाहविर्होता | तै. आ. ३. ५. | ३४० |
| मातरि पितर्याचार्ये | आप. ध. १. १०. ४ | १४८ |
| माता मातृष्वसा | नार. १२. ७३. | १६९ |
| मानस्तोके तनये | तै. सं. ४. ५. १०. | ३११ |
| मासि श्राद्धे च तामेव | शङ्खः | १४८ |
| मार्जारनकुलौ हत्वा | मनु. ११. १३१. | १३५ |
| मूर्धानं दिवः | ऋ. सं. ४. ५. ९. | २७० |
| मृतेऽपि वा सा पुनर्भूः | व. ध. १७. २१ | १९१ |
| य इन्द्रियकामो वीर्यकामः | तै. सं. २. ३. ७. | १५ |
| य उभयादत् | तै. सं. २. २. ६. | ११ |
| यः करोति तु | मनु. १२. १२. | ४६ |
| यः प्रमत्तां हन्ति | आप. ध. १. २९. २. | ३६१ |
| यं यजमानो | बौ. श्रौ. ६. २८. | ११५ |
| यं यं क्रतुमधीते | तै. आ. २. १५. | २४८ |
| यच्चाउतस्त्रिय आहुः | बौ. पितृ. १. ५. १५. | ८७ |
| यच्चिद्धि ते | तै. सं. ३. ४. ११. | २२५ |
| यत्र यत्र कामयते | बौ. गृ. २. १२. | ३५ |
| यथाकर्मर्त्विजः | १२० | |
| यथा वृक्षस्य सम्पुष्पितस्य | तै. आ. १०. ११. | ४०७ |
| (१) यथासम्भवमुत्स्वेदनं | शङ्खः | ५७ |
१. मुद्रितशंखस्मृतावित्थं नोपलभ्यते ।
परिशिष्टम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| यथैवका न पातव्या | मनु. ११. १४. | १५९ |
| यथैव न प्राक्श्वतः | छा. उ. ५. ३. ७. | १५९ |
| यथोपपादनमूत्रपुरीषः | गौ. ध. २. ४. | १८ |
| यद्योतदेकस्य सतः | ३०९ | |
| यददीव्यन्नृणं | तै. आ. २. ४. | ३३५ |
| यदि पद्भ्यामेव विशेषं | १४ | |
| यदि यजुष्टो भूर्स्वाहेति | ऐ. ब्रा. २५. ३४. | १२० |
| यद्देवत्यः पशुः | श. ब्रा. ३. ८. ३. १. | १६४ |
| यद्देवा देवहेलनम् | तै. आ. २. ३. | १३९ |
| यद्देवाः | तै. ब्रा. ३. ७. १२. | ३५९ |
| यद्वा उ विश्पतिः | सा. सं. पू. २. १. १. ८. | २७१ |
| यन्मे मनसा वाचा | तै. आ. २. ६. | ३३८ |
| यस्ततो जायते | तै. सं. २. ५. १. | ८८ |
| यस्य चैव गृहे मूर्खों | व. ध. ३. १०. | ७३ |
| यस्याग्नौ न क्रियते | आप. ध. २. १५. १३. | २१५ |
| यस्यां मनश्चक्षुषोः | आप. गृ. ३. २१. | १४३ |
| यस्मिन्कर्मण्यस्य कृते | मनु. ११. २३३. | ५८ |
| यां निधि समनुप्राप्य | बृहस्पतिः | १५० |
| यात्रामानप्रसिद्ध्यर्थम् | मनु. ४. ३. | २०१ |
| यावज्जीवं प्रेतपत्नी | १९८ | |
| यावज्जीवं जुहुयात् | ई. उ. २. | २५४ |
| या वामिन्द्रावरुणा | तै. सं. २. ३. १३. | ४०० |
| या वेदबाह्याःस्मृतयः | मनु. १२. ९५. | २८० |
| यासां राजा वरुणः | तै. स. ५. ६. १. | २३५ |
| ये अप्रथेताम् | तै. सं ४. ७. १५. | ४०१ |
| ये चत्वारः पथयो | तै. सं. ५. ७. २. | २५९ |
| ये देवाः | तै. सं. १. ८. ७. | ३२९ |
| येन सूर्यस्तपति | तै. ब्रा. १२. ३. ९. | २५७ |
| योऽनधीत्य द्विजः | मनु. २. १६८. | ३६४ |
| योऽधीतेऽहन्यहन्येताम् | मनु. १. ८२. | २३३ |
| योऽस्याऽऽत्मनः कारयिता | मनु. १२. १२. | १७३ |
| यो वा मिन्द्रावरुणा | तै. सं. २. ३. १३. | ४०० |
| रक्षसां भागोऽसि | तै. सं. १. १. ५ | ११५ |
| रजस्वलाऋतुस्नातां | व. ध. २०. ४२. | १५६ |
| रहस्यं प्रायश्चित्तं | गौ. ध. २४. १. | २०८ |
| राजा तु धर्मेणाऽनुशासन् | व. ध. १. ४३. | १२८ |
| राजा विजितसार्वभौमः | १५५ |
४२०
बौधायन-धर्मसूत्रम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| रात्रावचिरेवाऽनेदंदशे | ४२ | |
| रात्रिशेषे द्वाभ्यां | गौ. ध. १४. ७. | ८४ |
| रौरवयौधाजने नित्यं | गौ. ध. २६. ९. | २४९ |
| वचनाद्दोषतो भेदाः | नार. १. १५७. | १३८ |
| वरुणाय धर्मपतये | तै. सं. १. ८. १०. | ३२७ |
| वर्णान्तरगमनं | गौ. ध. ४. २२. | १२४ |
| वर्त्तयंस्तु सिलोञ्छाभ्याम् | मनु. ४. १०. | १७१ |
| वर्षासु रथकारः | १२५ | |
| वलीपलितकालेऽपि | १७१ | |
| वसाऽसृङ्मज्जशुक्रमजा | मनु. ५. १३५ | ५६ |
| वाग्घोता | तै. आ. ३. ६. | ३४० |
| वाचा प्रशस्तमुपयुञ्जीत | वशिष्ठः | ६२ |
| वानप्रस्थयतिब्रह्मचारिणां | याज्ञ. स्मृ. २. १३७ | २१३ |
| वायुरन्तरिक्षस्याऽधिपतिः | तै सं. ३. ४. ५. | ३४४ |
| वारुणं यवमयं | तै. सं. १. ८. ८. | ३२७ |
| विदा मघवन् | ३५९ | |
| विद्यानुष्ठानसम्पन्नः | लघुशाता. ५३. | २०९ |
| विधियज्ञाज्जपयज्ञः | मनु. २. ८५. | २४० |
| विधूमे सन्नमुसले | मनु. ६. ५६. | २५२ |
| विभागञ्चेत्पिता कुर्यात् | याज्ञ. २. ११४ | १८१ |
| विहितोरुस्रुत | ऋ. सं. ८. ४, १. | १०२ |
| विंशतिभागः शुल्कः | गौ. ध. १०. २५ | १३१ |
| विंशो भागः पणस्य | ७१ | |
| वित्र्यङ्गैर्हीनानां | मनु. २. १८४. | २२ |
| वेदसन्यासिकानान्तु | मनु. ६. ८६. | ३०२ |
| वेदानधीत्य वेदौ वा | मनु. ३. २. | १८ |
| वेदाहमेतं पुरुषं | तै आ. ३. १२. | ३७८ |
| वैदिकाश वेदिं कल्पयन्ते | १०४ | |
| वैश्वानराय प्रतिवेश्यायः | तै. आ. २. ६. | ३३७ |
| वैश्वानरो न ऊत्या | तै. सं. १. ५. ११. | ४०० |
| वैष्णवान् खनामि | तै. सं. १. ३. २. | २३९ |
| व्यभिचारेण वर्णानां | मनु. १०. २४. | १२४ |
| व्यस्तस्तपाणिना कार्यं | मनु. २. ७२. | २३ |
| शन्नो देवीः | सा. सं. पू. १. १. | ३५९ |
| शय्यासनमलङ्कारं | मनु. ९. १७. | १९३ |
| शस्त्रेण च प्रजापालनम् | व. ध. २. २२. | १२८ |
| शाखानां विप्रकीर्णत्वात् | तं. वा. १. ३. १. | ७ |
परिशिष्टम्
४२१
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| शुश्रूषा शूद्रस्य | आप. ध. १. १. ७ | १२९ |
| श्रुष्ट्यग्ने नवस्य मे | सा. सं. पू. २. १. १. १०. | २७० |
| शूद्रश्चेद्व्राह्मणमभिगच्छेत् | व. ध. २१. १. | १९५ |
| शेषेषूपवसेदहः | मनु. ५. २०. | ९८ |
| श्रेयासं श्रेयांसं | व. ध. ११. ५. | २६६ |
| श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी | मनु. २. ९०. | १७२ |
| श्वभिः खादेयद्राजा | गौ. ध. २३, १४. | १३३ |
| श्वेताश्च मृगा वन्याः | व. ध. ३. ४४ | ६० |
| षड्भिः परिहार्यो राजा | गौ. ध. ८. १२. | १३२ |
| षष्ठीं चितिम् | तै. सं. ५. ४. २. २. | ३८५ |
| सकामेन सकामायाम् | १४३ | |
| सखिभार्यां समाहृत्य | संव. स्मृ. १. १६४. | १५ |
| सङ्ग्रामे संस्थानं | गौ. ध. १०. १५. | २८३ |
| सचित्रचित्रं | ऋ. मं. ४. ५. ८. | ३४७ |
| सति प्रभूते पयसि | २३४ | |
| सत्येन शापयेद्विप्रम् | मनु. ८. ११३. | ७२ |
| सद्यः पतति मांसेन | व. ध. २. ३१. | ३६४ |
| सन्ध्यायां गायत्र्या अभि | तै. आ. २. २. | २२६ |
| सन्न्यस्य दुर्मतिः कश्चित् | संवर्त. स्मृ. १७१. | २८२ |
| सन्धिनीक्षीरमवत्साक्षीरं | व. ध. १४. २९ | ९७ |
| स पापिष्ठो विवाहानां | मनु. ३. ३४. | १४२ |
| सपिण्डाः पुत्रस्थानीया वा | व. ध. १७. ७२. | ८२ |
| सपिण्डे तु त्रिरात्रं | १४७ | |
| सम्मार्जनेनाऽञ्जनेन | मनु. ५. १२४. | ४३ |
| सम्यग्दर्शनसम्पन्नः | मुण्ड. उ. २. २. | २५६ |
| संवीतं मानुषं | तै. आ. २. १. | ४७ |
| स य इदमविद्वान् | छा. उ. ५. २४. १. | २६४ |
| सवर्णाग्रे द्विजातीनां | मनु. ३. १२. | १२२ |
| सव्याहृतिं सप्रणवां | व. ध. २५. १३. | २२८ |
| सर्वे एते पुण्यलोका भवन्ति | छा. उ. २. २३. १. | ५ |
| सर्वत एवाऽऽत्मानं गोपायेत् | गौ. ध. ९. ३५. | १६२ |
| सर्वं हि विचरेद्ग्रामम् | मनु. २. १८५. | २२ |
| सर्वान्परित्यजेदर्थान् | मनु. ४. १७. | ७४ |
| सर्वेषामपि चैतेषाम् | मनु. ६. ८९. | २५९ |
| सशिखं वपनं कृत्वा | परा. स्मृ. ८. ३९. | १८३ |
| सह शाखया प्रस्तरं | आप. श्रौ. ३. ३. ६. | १०३ |
| सहोवाच किं मेऽन्नं | छा. उ. ५. २. १. | ९४ |
४२२ | बौधायन-धर्मसूत्रम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| साऽस्य देवता | पा. सू. ४. २. २४ | ३४४ |
| सान्तानिकं यक्ष्यमाणं | मनु. ११. १. २. | २१२ |
| सार्ववर्णिकं भैक्षाचरणं | गौ. ध. २. ४२. | २२ |
| सिंहे मे मन्युः | बौ. श्रौ. २. ५. | ४०२ |
| सिंहे व्याघ्र उत | तै. ब्रा. २. ७. ७. | ३३६ |
| सुकृतं यत्त्वया किञ्चित् | याज्ञ. २. ७५. | १३७ |
| सुरां पीत्वा द्विजः | मनु. ११. ९० | १५८ |
| सुवर्णस्तेयकृद्विप्रः | मनु. ११. ९९. | १५९ |
| सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा | मनु. ३. ३४. | १४२ |
| सूर्ये ते चक्षुः | तै. आ. ३. ४. | ३४० |
| सूर्यश्च मा मन्युश्च | याज्ञिकी. २४. २५. | २२४ |
| सृष्टीरुपदधाति | तै. सं. ५. ३. ४. | १६३ |
| सोमाय पितृपीताय | बौ. गृ. १. ८. ८. | २७१ |
| स्तेनो हिरण्यस्य सुरां | छा. उ. ५. १०. ९. | १५९ |
| स्तेनस्य श्वपदः कार्यः | मनु, ९. २३७, | १३२ |
| स्नातकव्रतलोपे च | मनु. ११. २०३. | २१७ |
| स्त्रीषु चान्तं | १९७ | |
| स्त्रीभ्यस्सर्ववर्णेभ्यः | आप. ध. २. २९. १६. | ८७ |
| स्त्रीष्वनन्तरजातासु | मनु. १०. ६. | १२२ |
| स्त्रीशूद्रविट्क्षत्रवधः | मनु. ११. ६६. | १३४ |
| स्वधर्मो राज्ञः परिपालनं | व. ध. १९. १. | १२८ |
| स्वधा पितृभ्यः | तै. सं. १. १. ११. | ११५ |
| स्वप्ने सिक्त्वा | मनु. २. १८१. | ३८३ |
| स्वमातुलसुतां प्राप्य | तं. वा. १. ३. ३. | ९ |
| स्वमांसं परमांसेन | मनु. ५. ५२. | ७५ |
| स्वरादित्योभवति | निरु. २. ४. २. | २२७ |
| स्वादिष्ठया | ऋ. सं ६. ७. १६. | ३५९ |
| स्वाध्याय एवोत्सृजमानः | आप. ध. .१. २६. ११. | २८९ |
| हन्तिजातानजातांश्च | मनु. ८. ९९. | १३८ |
| हिरण्यवर्णाः | तै. सं. ५. ६. १. | २२५ |
| हिरण्यशृङ्गं वरुणं | याज्ञिकी. उ. १. ७. | २२४ |
| हिंसानुग्रहयोः | गौ. ध. ३. २५. | ३०० |
सूत्रों में आये हुए नामों एवं विषयों की अनुक्रमणिका
( संख्याएँ इस ग्रन्थ के पृष्ठ का निर्देश करती हैं । )
| अक्षर ( ओम् ), २६४ | अश्विन् देव २७७ |
| अगम्या १९९ | अष्टका होम २७६ |
| अग्नि १९७, ४०४, वैश्वानर २८८, ३२१, ३३८, उपसमाधान ३५२ | आग्नीध्र ११९ |
| अग्निहोत्र २८८, ३१७, २८७, में धर्मोच्छिष्ट १०८, के मन्त्र २९९, ३३९ | आचमन ४८, २२१, २३६, २६३, २७५, २९६, ३३० |
| अग्निहोत्री २६७, ३९२ | आचार्य ४०४ |
| अग्न्याधेय २०३ | आत्मयज्ञ २९६ |
| अघमर्षण ३२३, ३५९, ३७२, ३७५, ३७९ | आत्मयाजी २५९ |
| अङ्ग १४ | आत्रेयी १३४, १५६ का वध १३५ |
| अतिकृच्छ्र १७८, १९४, १९९, १५५, ३६२, ३८५ | आदित्य २३२ |
| अथर्ववेद ३७७, ३८२ | आमिक्षा ११२, ३३४ |
| अथर्वशिरस् ३५९ | आयोगव १२३, १२६ |
| अथर्वाङ्गिरस् ४०८ | आरट्ट प्रदेश, १४ |
| अधोवीत ४७ | आर्यावर्त १२ |
| अनशनपारायण ३५१ | आर्ष, तीर्थ ४८, विवाह १४१ |
| अन्तर्वास ३५ | आवसथ्य अग्नि २९५ |
| अन्वाहार्यपचन २९५ | आसुर, विवाह १४१ |
| अपचमानक ३१५ | आहवनीय ११९, २८६, २८८, २९५, ३०६ |
| अपविद्धपुत्र | इन्द्र २७९ |
| अभिजित् ३४९ | इन्द्रकील २१५ |
| अभ्युक्षण ६४ | उग्र १२३ |
| अम्बष्ठ १२३ | उत्तरीय ३५, २२१ |
| अरणी ३४१ | उत्सर्पिणामयन १०८ |
| अर्घ्य २२० | उदयनीय ३२ |
| अलाबु ११० | उन्मज्जक ३१८ |
| अवकीर्णी १६३ | उपनयन १५६, दुबारा १५९ |
| अवन्ति १४ | उपनिषद् ३५९ |
| अवभृथ १५४, ३२३, ३७५ | उपवास २६७ |
| अश्व ३६१ | उपाकर्म ९९ |
| अश्वमेध १५४, ३२३, ३५८, ३७५ | उपावृत् १४ |
| उशनस् २०५, ३५४ | |
| ऋक् ३८२, ४०८ |
| ४२४ | बौधायन-धर्मसूत्रम् |
|---|
| ऋग्वेद ३७२, ३९२ | गङ्गा १३ |
| ऋण २७८ | गणिका ३२८ |
| ऋतुममती, कन्या ३६६, पत्नी ३६७ | गान्धर्व १४१, १४३ |
| ऋत्विज ८२ | गायत्री २०, २२६, ३७०, ३८०, ३९३, ३९४ |
| ऐडावध १०८ | गार्हपत्य अग्नि १२०, २९५, ३०६ |
| ऐष्टिक यज्ञ २९८ | गूढज १८७ |
| ओंकार ३७०, ३७२, ३७६, ३९४ | गोमय ३८६, ३९१ |
| औपजंघनि १८९ | गोमूत्र ३८६, ३९१, ३९५ |
| औरस पुत्र १८४ | गौ, दान ३२२, ३४६ |
| कन्या अपरण ३६७ | गौतम १०, २०१ |
| कपिञ्जल ९६ | ग्रीष्म १९ |
| कमण्डलु ३५ आदि | चक्रचर ३०३ |
| कलिङ्ग १४, १५ | चण्डाल १२३, १२६, २०० |
| कश्यप १४५ | चतुश्चक्र १०८ |
| कास्य २८ | चमस ४४, ५७ |
| कानीन, अविवाहिता का पुत्र १८७ | चान्द्रायण १३४, १५५, १९४, १९९, ३४१, ३६२, ३८८ |
| कापोता वृत्ति ३०४, ३१३, ३९२ | चारण की पत्नी १९३ |
| कारस्कर प्रदेश १४ | चिलिचिम, मत्स्य ९६ |
| कारु ५९, ७१ | जगती २० |
| कुक्कुट १२३, १२७ | जघन्यसंवेशी २२ |
| कुण्डपायिनामयन १०८ | जनक १९० |
| कुम्भीधान्य ३ | तक्र ३८९ |
| कुलुङ्ग ९५ | तप्तकृच्छ्र १७७ |
| कुशीलव ७१ | तरत्समन्दीय २०८, ३७१ |
| कुशोदक ३८७ | तित्तिर ९६ |
| कुसीद ७० | तिल ३६१, ३९५, ४०३ |
| कूष्माण्ड १३९, १७६, ३५९, ३७८, ३९९ | तीर्थ २२३, ३६० |
| कृच्छ्र १५५, १५९, १६०, १७६, १९४, १९९, ३३४, ३६२ | तुलापुमान् ३८९ |
| कृच्छ्रातिकृच्छ्र १७८, ३८५ | तोयाहार ३१८ |
| कृत्रिम पुत्र १८७ | त्रिष्टुप् २० |
| कौशली वृत्ति, ३०४, ३१० | त्रैधातवीय ३०५ |
| क्षत्ता १२३, १२६ | दक्षिणापथ १४ |
| क्षत्रिय १९, का वध दण्ड १३३, उपनयन १९, वर्ण १२१, से कमण्डलु ७१, पत्नियां १२२, का पुत्र १२५, कर्त्तव्य १२८, आपत्काल में २०१ | दण्ड २९३ |
| क्षेत्रज १८६ | दत्तपुत्र १८६ |
| खुर ९७ | दधिचर्म १०८ |
| दर्श पूर्णमास ३६, १०७ | |
| दाक्षायण १०८ | |
| दार्बीहोम २७८, ३७३ |
परिशिष्टम्
| ४२५ | |
|---|---|
| दीक्षणीया इष्टि ७८ | पितृयज्ञ २४६ |
| दीर्घसत्र ३१ | पित्र्य तीर्थ ४८ |
| दुर्गा ३७८ | पिशाच २७५ |
| देवयज्ञ २४६ | पुण्ड्र प्रदेश १४ |
| दैव तीर्थ ४८, विवाह १४१ | पुत्र, अयोनिज ८५, पुत्रिकापुत्र १८४, क्रीत १८८, स्वयंदत्त १८८, निषाद १८८, पारशव १८९, पौनर्भव १८८, भरण-पोषण १९१ |
| धर्म १, के द्वारा ७, न्याय व्यवहार में १३६, आपत्कालीन २०१, चार भेद २४८ | |
| ध्रुवा वृत्ति ३०४, ३१० | पुनर्भू ३६७ |
| नर्तकी १६६ | पुनस्तोम १४, ३५८ |
| नास्तिक ७२ | पुरुषसूक्त ३५९ |
| नियोग १९९ | पुरोहित १२९ |
| निर्ऋति ११४, १६४ | पुक्कस १२३, १२७ |
| निवीत ४७ | पैशाच विवाह १४२ |
| निषाद १२३ | प्रजापति २६१, ३५६, ४०५, ४०७, परमेष्ठी ३७ |
| नृत्य २३ | प्रणव २२७, २७०, २८५, ३०१, ३०२ |
| पञ्चगव्य ३८७ | प्रवृत्ताशिन् ३१८ |
| पतनीय ३६५ | प्रह्लाद २५५ |
| पचमानक ३१५ | प्राजापत्य १४०, ३८४, ३९३ |
| पञ्चनखाः ९५ | प्राण २५९ |
| पत्नी यजमान की ११६, गुरु की १५७, की रक्षा १९० | प्राणाग्नि २६८ |
| परित्याग १९८ | प्राणायाम २२७, २२८, ३५३, ३६३, ३६८ |
| परिधा २१५ | प्रानून १४ |
| परिवित्त ३९६ | प्रायणीय ३२ |
| परिषत् ३ | पृष्ठ्या २८८ |
| पर्यग्निकरण ३८ | प्रैष्य ७१ |
| पर्वे ३६ | बलि २०९ |
| पवमान ११२ | बहिष्पवमान ३५९ |
| पवित्रेष्टि १५, ३९४ | बृहच्छिरस ९६ |
| पशु विक्रय ९, ग्राम्य १३, हत्या का प्रायश्चित्त १३५, यज्ञ २४८ | बृहस्पति ३५४ |
| पाकयज्ञ ३७ | बौधायन ३७, ४२, ४५, ३२५, ३३१ |
| पात्र, मिट्टी के ५४, बाँस के ११० | ब्रह्मकूर्च ३७३, ३९१ |
| पारशव, शूद्रा का पुत्र १२५ | ब्रह्मचर्य १९५ |
| पालनी वृत्ति ३०४, ३१३ | महायज्ञ २४०, २४७ |
| पावमानी ३५१, ३७८, ३९४, ३९९ | ब्रह्मलोक २२३ |
| पिण्डोदक ७९ | ब्रह्महत्या ३५८ |
| पिण्याक २१८ | ब्रह्महृदय १०८, २२८ |
| पिपीलिकामध्य चान्द्रायण ३४९ | ब्रह्मा, का स्थान ११९ |
| ३१ बौ०ध० |
४२६ | बौधायन-धर्मसूत्रम्
| ब्रह्मान्ववधान २८६ | यतिचान्द्रायण ३८९ |
| ब्रह्मौदन १०८ | यम १६४, ४०४ |
| ब्राह्म, तीर्थ ४८, मुहूर्त ३५५, विवाह १४० | यमुना १३ |
| ब्राह्मण, अवध्य १३२, उपनयन १९, ब्राह्मण २५५, का धन ८२, दो नाम १४९; कृषि-कर्म २०२, दण्ड १३२, वाणिज्य १७५ पंक्तिपावन २६९, ३५५, वध का दण्ड १३३, संख्या २७६, की हत्या ३७०, ३७२ विचारहित ७३, श्राद्धभोजन २७१, का वध ३२५, ३३३ | यवागू ३२६, ३३४ |
| यातुधान २७५ | |
| यायावर २५९, २८२, २९४, ३०३, ३०४, ३०६, ३९२ | |
| यावकभक्षण ३६०, ३९० | |
| योग ३६९ | |
| रक्षोदेवता १६४ | |
| रजस्वला ९० | |
| भक्ष्य ९५ | रथकार २६, १२५ |
| भरद्वाज ३९६ | राक्षस १४१ |
| भाल्लविन् १३१ | राजीव ९६ |
| भिक्षा ३३४ | रुद्र ११४, ३५९, ३९५ |
| भूतयज्ञ २४६ | रोमशकरि ९६ |
| भूतात्मा ४६ | रोहित ९६ |
| भ्रूणघ्नी ३६८ | वंग १४ |
| भ्रूणहत्या ३६६, ३६७ | वरुण ४०, २२९, २३२, २९०, २९९ |
| भ्रूणहा १५३, ३९३ | वर्मी ९६ |
| मगध १४ | वल्कल १०३ |
| मत्स्य ९६ | वसन्त १९ |
| मधु ३६४ | वस्त्र, रेशमी ५६, १०२, वृक्ष की छाल १०३, यज्ञ का १०१, उत्तरीय २२१, काषाय २५२, २७५, ३१४ संन्यासी का २९२, ३६१, नवीन ३४१, वृक्ष की छाल २५२ |
| मधुच्छन्दा ३९४ | |
| मधूदक ११२ | |
| मनुष्य यज्ञ २४६ | |
| मयूर ९६ | वान्था ३१४ |
| महाव्याहृति २६० | वायु ४०४, वायुभक्ष ३१८, ३१९ |
| महासान्तपन ३८८ | वारुणी १६० |
| मांस १५०, २१४, ३६४, ३२१, ३३३ | वार्ध्राणस ९६ |
| मागध १२३, १२६ | वार्धुषिक ७१ |
| मार्जन ३९४ | वास्तोष्पतीय ३०१ |
| मार्जलीय १०८ | विकल्पी ४ |
| मित्र २२९, २३२, २९९ | विधवा १९८ |
| मृगारेष्टि ३९४ | विधुर २८२ |
| मृग्युलाङ्गल ३७८ | विरजा, मन्त्र ३७८ |
| मौञ्जीबन्धन १८ | विवाह ३४५ अनियमितता १६७ कन्या, की अवस्था ३६५ |
| मौद्गल्य १९८ | |
| यजुर्वेद ३७७, ३८२, ३९२ | वृत्ति ३०३ |
| यजुस ४०८ | वेद ३५९ |
| यज्ञोपवीत ३५ | वेदान्त ३५९ |
परिशिष्टम्
| ४२७ | |
|---|---|
| वेश्या ३२८ | सप्तर्षि ३५६ |
| वैण १२३, १२७ | समिदाहरण ३० |
| वैतुषिक ३१६ | समूहा ३०४, ३१२ |
| वैदेहक १२३, १२६ | सम्प्रक्षालनी ३०४, ३१२ |
| वैश्य १९, वर्ण १२१, से कमण्डलु ४१, पत्नियां १२२, का पुत्र १२५, कर्तव्य १२८, के वध का दण्ड १३३, आपत्काल में २०२ | सर्वपृष्ठा १४<br>सर्वारण्यका ३१६<br>सवन ३५५, ४०१, ४०८<br>सवर्णा १८४ |
| वैश्वदेव २०९, २९४ | सहस्रदंष्ट्र ९६ |
| वैश्वानरी १५, ३०५, ३९४, ३९९ | सहस्राक्ष ४०४ |
| व्याहृति ३९, २२७, २४०, २६०, २८५, २९०, २९२, ३०२, ३७०, ३७२, ३७६, ३७८, ३८०, ३९४ | सहोढ १८७<br>सान्तपन ३८६<br>सामवेद ३७७, ३८२, ३९२, ४०८ |
| व्रत ३६१ | सामुद्र शुल्क १३१ |
| व्रतपती १५ | सावित्री २४०, २८५, २९२, ३५९ |
| व्रात्य १२७ | सिद्धेच्छा ३०४, ३१४ |
| शंखपुष्पी १६० | सिन्धु १४ |
| शरद् १९ | सिलोञ्छा ३०४, ३१३ |
| शालीन २८२, २९४, ३०३, ३०४ | सुरभिमती २९० |
| शिक्य २८४ | सुराष्ट्र १४ |
| शिशु आङ्गिरस २८ | सुवर्ण ३६१, का दान ४०३ |
| शिशु चान्द्रायण ३८९ | सूत १२६ |
| शिष्ट २, परम्परा ११ | सूर्भि १५७ |
| शूद्र, अतिथि २१०, अन्न ३६३, स्त्री ३६६, की सेवा १६९, से कमण्डलु ४१, से व्यभिचार १९४, का अन्न ३२८ शूद्र से बात नहीं ३४७ | सूर्य ३४७, ४०४<br>सोम १९७, ४०४, का पान ३६०, सोमयज्ञ २४८, २७९<br>सौवीर १४ |
| शूद्रा ३६४, ३९५, से विवाह २१८, से मैथुन ३७४ | स्त्री, ऋतुमती ३६७, की पवित्रता १९७, की परतन्त्रता १९३, की प्रतिमा १५७, के साथ भोजन ९, पिण्डोदक क्रिया नहीं ७९, पुनर्भू ३६७, से बात नहीं ३४७, ३८३ |
| श्मशान १५३ | स्नातक ३४ |
| श्रोणा ३४९ | स्वधा २४६ |
| श्रोत्रिय २१०, २१२ | स्वयंभू ४३ |
| श्वपाक १२७ | स्वाध्याय २४७, २७९, ३०० |
| षण्णिवर्तनी ३०४, ३०९ | स्वाहा २४६ |
| सङ्कीर्णयोनि १४ | हारीत १७३ |
| सकुल्य ८१ | होता ११९ |
| सन्दंशी ३११ | |
| सन्ध्योपासन २२२ | |
| सपिण्ड ७८ |