बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
प्रकाशक
चौखम्भा प्रकाशन
पोस्ट बाक्स नं. ११५०
के. ३७/११६, गोपाल मन्दिर लेन, गोलघर (समीप मैदागिन)
वाराणसी - २२१००१ (भारत)
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इस ग्रन्थ का परिष्कृत तथा परिवर्धित मूल-पाठ एवं टीका, परिशिष्ट आदि के सर्वाधिकार प्रकाशक के अधीन हैं।
संस्करण : पुर्नमुद्रित, वि० सं० २०६५
मूल्य : रु. २५०-००
पारस्करगृह्यसूत्रम् (कर्मकांड)। प्रथम दो काण्ड पर हरिहर भाष्य तथा गदाधर भाष्य एवं तृतीय कांड पर हरिहर तथा जयराम भाष्य। गोपाल शास्त्री नेन कृत भूमिका, नोट्स तथा सुधाकर मालवीय कृत हिन्दी व्याख्या (प्रथम कांड), सम्पूर्ण
(का 17)
मुद्रक : मित्तल आफसेट, वाराणसी
THE
KASHI SANSKRIT SERIES
104
BAUDHĀYANA-DHARMASŪTRA
with the ‘Vivaraṇa’ Commentary
By
ŚRĪ GOVINDA SWĀMĪ
And
Critical Notes by
M.M.A. CHINNASWĀMĪ ŚĀŚTRĪ
Edited with
Hindi Translation, Explanatory Notes,
Critical Introduction & Notes
By
Dr. UMEŚA CHANDRA PĀṆḌEYA, M.A., Ph.D.,
Department of Sanskrit & Pali,
University of Gorakhapur
CHAUKHAMBHA PRAKASHAN
Post Box No. 1150
K. 37 / 116, Gopal Mandir Lane
VARANASI
Publisher :
CHAUKHAMBHA PRAKASHAN
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© Chaukhambha Prakashan, Varanasi
Edition : Reprint, 2008
धर्मसिन्धुः (धर्मशास्त्र)। काशीनाथ उपाध्याय कृत। वशिष्ठ दत्त मिश्र कृत ‘धर्मदीपिका’ हिन्दी टीका तथा सुदामा मिश्र शास्त्री कृत ‘सुधा’ व्याख्या। सदाशिव शास्त्री मुसलगाँवकर कृत समीक्षात्मक प्रस्तावना। (का. 183)
| Chaukhambha Prakashan<br>Registration No. A-77539 |
|---|
आमुख
चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस ने 'बौधायनधर्मसूत्र' का म० म० ए० चिन्न-स्वामी शास्त्री द्वारा सटिप्पण सम्पादित प्रथम संस्करण पहले प्रकाशित किया था। यह द्वितीय संस्करण आधुनिक विद्यार्थियों तथा अनुसन्धाताओं की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर हिन्दी अनुवाद, व्याख्यात्मक टिप्पणियों, विस्तृत आलोचनात्मक भूमिका एवम् अनुक्रमणिकाओं से संवलित कर प्रस्तुत किया गया है। इसके पूर्व मेरे द्वारा सम्पादित 'गौतमधर्मसूत्र' 'आपस्तम्बधर्मसूत्र' 'आपस्तम्बगृह्यसूत्र' तथा 'याज्ञवल्क्यस्मृति' के हिन्दीव्याख्या-सहित संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और इन संस्करणों ने लोकप्रियता भी अर्जित की है। बौधायनधर्मसूत्र के इस संस्करण में सूत्रों का सरल हिन्दी अनुवाद दिया गया है और प्रायः प्रत्येक स्थल पर टिप्पणी देकर अर्थ को पूर्णतः स्पष्ट कर दिया गया है।
इस ग्रन्थ के प्रकाशन और मुद्रण का श्रेय चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस तथा चौखम्बा वि०, वाराणसी के कुशल संचालकों को है और विशेषतः मुद्रण के स्तर के लिए उन्हें धन्यवाद देना मेरा कर्त्तव्य है। प्रस्तावना की प्रेसपाण्डुलिपि तथा अनुक्रमणिका के लिए मैं अपनी सहयोगिनी का आभारी हूँ।
धर्मसूत्रों की उपयोगिता आज भी अक्षुण्ण है। परम्परागत धर्म एवम् आचार-विषयक मान्यताओं के अध्ययन तथा युगसापेक्ष व्यवहार से ही आधुनिक सन्त्रास-पूर्ण जीवन में भी सुख और शान्ति के आविर्भाव की आशा की जा सकती है और यदि भारतीय धर्म के अवबोध में मेरी यह कृति स्वल्प भी योग दे सकी, तो अपना परिश्रम सफल मानूँगा।
<br>$$\left.\begin{array}{l} \text{दीपावली, सं० २०२६} \ \quad\text{गोरखपुर} \end{array}\right}$$
$$\begin{array}{r} \text{विनीत—}\quad\quad\quad \ \text{\textbf{उमेशचन्द्र पाण्डेय}} \end{array}$$
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प्रस्तावना
सूत्र साहित्य एवं कल्प
वैदिक साहित्य के अन्तिम युग का प्रतिनिधित्व करनेवाले ग्रन्थों की शैली मुख्यतः सूत्रात्मक है। ये सूत्र रचनाएँ अनेक शताब्दियों के ज्ञान को नियमों के रूप में छोटे-छोटे वाक्यों में अभिव्यक्त करती हैं। सूत्रों की विशेषता है उनकी संक्षिप्तता।
सूत्रों का शाब्दिक अनुवाद असम्भव होता है और अनेक सूत्ररचनाओं में एक प्रकार की विशिष्ट एवं तकनीकी पारिभाषिक शब्दावली का भी व्यवहार हुआ है, जिससे उनमें स्वभावतः दुरूहता आ गयी है। सूत्र-शैली की रचनाओं में सबसे सरल धर्मसूत्र ही हैं। सूत्रों की इसी दुरूहता का प्रो० मैक्स म्यूलेर ने अपने प्राचीन संस्कृत साहित्य के इतिहास में इन शब्दों में निर्देश किया है—
"Every doctrine thus propounded, whether Grammar, metre, law or philosophy, is reduced to a mere skelton. All the important points and joints of a system are laid open with greatest precision and clearness, but there is nothing in these works like connection or development of ideas."
सूत्र-शैली की जटिलता की आलोचना अनेक पश्चिमी विद्वानों ने की है। कोलब्रुक ने भी सूत्रों में अभिप्रेत अन्विति एवं पारस्परिक सम्बन्ध के अभाव का दोष देखा है और इसका कारण निरन्तर आने वाले अपवाद नियमों को बताया है—
"The endless persuit of exceptions and limitations so disjoins the general precepts that the reader cannot keep in view their intended connection and mutual relation."
किन्तु धर्मसूत्रों की सूत्र-शैली इन जटिलताओं से मुक्त है। उनमें पारिभाषिक शब्दावली का अभाव है और वे सीधे-सादे स्वतन्त्र वाक्यों के समान हैं। इनमें विषय का विस्तार भी सम्बद्ध एवं व्यवस्थित रूप में हुआ है। प्रसंगवश दूसरे विषय भी अवश्य आ गये हैं।
वेद को समझने के लिए जिस साहित्य का उद्भव हुआ उसे वेदाङ्ग कहते हैं। "अङ्ग्यन्ते ज्ञायन्ते अमीभिरिति अङ्गानि" जिसके द्वारा किसी वस्तु के स्वरूप को जानने में सहायता मिलती है उसे अङ्ग कहते हैं।
छः वेदाङ्गों शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष के अन्तर्गत यज्ञ-क्रिया की दृष्टि से कल्प का सर्वाधिक महत्त्व है। कल्प का अर्थ है—यज्ञ के प्रयोगों का
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समर्थन करने वाला शास्त्र "कल्प्यते समर्थ्यते यागप्रयोगोऽत्र ।" कल्प के अन्तर्गत सूत्रों का विशाल भण्डार समाहित है। कल्पसूत्रों के महत्त्व के विषय में प्रो० मैक्स म्यूलेर ने ठीक ही कहा है—"कल्पसूत्रों का वैदिक साहित्य के इतिहास में अनेक कारणों से महत्त्व है। वे न केवल साहित्य के एक नये युग के द्योतक हैं और भारत के साहित्यिक एवं धार्मिक जीवन के नये प्रयोजन के सूचक हैं, अपितु उन्होंने अनेक ब्राह्मणों के लोप में योग दिया, जिनका अब केवल नाम ही ज्ञात है। यज्ञ का सम्पादन केवल वेद द्वारा, केवल कल्पसूत्र द्वारा ही हो सकता था किन्तु बिना सूत्रों की सहायता के ब्राह्मण या वेद के याज्ञिक विधान का ज्ञान पाना कठिन ही नहीं, असम्भव था।"
कल्पसूत्र के महत्त्व के विषय में कुमारिल का कथन है—
'वेदादृतेऽपि कुर्वन्ति कल्पैः कर्माणि याज्ञिकाः।
न तु कल्पैर्विना केचिन्मन्त्रब्राह्मणमात्रकात् ॥'
ये कल्पसूत्र प्रत्येक शाखा के लिए भिन्न-भिन्न होते थे, जैसा कि हिरण्यकेशिसूत्र की टीका में महादेव ने लिखा है—
"तन्न कल्पसूत्रं प्रतिशाखं भिन्नमभिन्नमपि क्वचित् शाखाभेदेऽप्यध्ययनभेदाद्वा सूत्र-भेदाद्वा। आश्वलायनीयं कात्यायनीयं च सूत्रं हि भिन्नाध्ययनयोर्द्वयोर्द्वयोः शाखयोरेकैक-मेव। तैत्तिरीयके च समाम्नाये समानाध्ययने नाना सूत्राणि। अनेन च सूत्रभेदे शाखाभेदः शाखाभेदे च सूत्रभेद इति परस्पराश्रय इति वाच्यम्।"
कल्पसूत्रों का विभाजन चार भागों में किया गया है—
१—श्रौत सूत्र—जिनमें श्रौत अग्नि से किये जाने वाले यज्ञों का विवेचन है।
२—गृह्य सूत्र—गृह्य अग्नि में किये जाने वाले संस्कारों तथा घरेलू यज्ञ-क्रियाओं का विवेचन करने वाले सूत्र।
३—धर्मसूत्र—आश्रमों तथा वर्णों के कर्त्तव्य, व्यक्ति के आचरण के नियम, प्रायश्चित्त, राजा के कर्त्तव्य, अपराध और दण्ड का विधान करने वाले सूत्र।
४—शुल्बसूत्र—यज्ञ की वेदी आदि के निर्माण की विधि का विवेचन करने वाले सूत्र।
धर्मसूत्रों की परम्परा
धर्मसूत्र कल्पवेदाङ्ग-साहित्य की परम्परा में आते हैं। जैसा कि विष्णुमित्र ने ऋग्वेद-प्रातिशाख्य की वर्गद्वयवृत्ति में कल्प की परिभाषा की है, कल्प वेद में विहित कर्मों की क्रमपूर्वक व्यवस्थित कल्पना करने वाला शास्त्र है "कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्।"
धर्मसूत्र भी अन्य ग्रन्थों के समान भिन्न-भिन्न शाखा में पृथक्-पृथक् थे। किन्तु कतिपय धर्मसूत्र ही इस समय उपलब्ध हैं। धर्मसूत्रों का श्रौत एवं गृह्यसूत्रों से भी अटूट सम्बन्ध है। जिन शाखाओं के सभी कल्पसूत्र उपलब्ध हैं उनमें प्रमुख हैं बौधायन, आपस्तम्ब और हिरण्यकेशि। ऐसा प्रतीत होता है कि कई शाखाओं में धर्मसूत्र अलग नहीं होते थे और वे शाखायें किसी प्रमुख शाखा के धर्मसूत्र को अपना लेती थीं। विभिन्न शाखाओं में एक अद्भुत सहिष्णुता थी जिसके परिणामस्वरूप
[ ८ ]
सभी शाखाओं का सूत्र-ग्रन्थ सभी आर्यों के लिए प्रामाणिक और मान्य होता था। कुमारिल ने पूर्वमीमांसा-सूत्र १.३.११ में इसी तथ्य का उल्लेख किया है—
"स्वशाखाविहितैश्चापि शाखान्तरगतान्विधीन् ।
कल्पकारा निबध्नन्ति सर्व एव विक्षिप्तान् ॥
सर्वशाखोपसंहारो जैमिनेश्चापि संमतः ॥"
सूत्रकारों का दृष्टिकोण उदार था और वे केवल अपनी ही शाखा तक सीमित होकर सन्तोष का अनुभव नहीं करते थे :—
'न च सूत्रकाराणामपि कश्चित् स्वशाखोपसंहारमात्रेणावस्थितः ।'
श्रौतसूत्र जहाँ बड़े यज्ञों से तथा गृह्यसूत्र घरेलू संस्कारों एवं यज्ञ-क्रियाओं से सम्बद्ध हैं, वहाँ धर्मसूत्र मानव के सम्पूर्ण जीवन का निर्धारण करने वाला अधिक व्यावहारिक साहित्य है। मानव के व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन के पथ का अनुलेखन ही धर्मसूत्रों का लक्ष्य है।
कतिपय उल्लेखों से ऐसा प्रतीत होता है कि श्रौत एवं गृह्यसूत्रों से पहले भी धर्मसूत्र विद्यमान थे। श्रौतसूत्र में यज्ञोपवीत-धारण की विधि नहीं बतायी गयी है और इसका संकेत किया गया है कि यह विधि धर्मसूत्र से ज्ञात है। इसी प्रकार मुखशुद्धि (आचान्त) और सन्ध्यावन्दन के नियमों के ज्ञात होने का संकेत है। इनके आधार पर कुछ लोगों का मत है कि धर्मसूत्रों का अस्तित्व श्रौतसूत्रों के भी पहले था। किन्तु ये तर्क निर्बल हैं। वस्तुतः धर्मसूत्र श्रौत एवं गृह्यसूत्रों के बाद संकलित हुए हैं। हाँ, यह सम्भव हो सकता है कि कुछ प्राचीन धर्मसूत्रों के कतिपय अंशों का उद्भव श्रौतसूत्रों के साथ-साथ हुआ हो।
धर्मसूत्रों का रचनाकाल
धर्मसूत्रों की रचना के काल के सन्दर्भ में उपर्युक्त तथ्यों के विपर्यास में उनमें प्रतिबिम्बित सामाजिक स्थिति अधिक प्रामाणिक और पुष्ट प्रमाण के रूप में विश्वसनीय है। समग्र रूप में समाज के जिन पक्षों—वर्णव्यवस्था, शूद्र की स्थिति, नारी की परतन्त्रता—का जो रूप स्मृतियों में मिलता है, वही रूप धर्मसूत्रों में भी दिखायी पड़ता है।' यही नहीं, स्मृति-ग्रन्थों की वाक्यावली भी कई धर्मसूत्रों में उसी रूप में मिल जाती है।
निरुक्त के रचयिता यास्क ने ३.४.५ में सम्पत्ति के विभाजन के सम्बन्ध में पुत्री के रिक्थाधिकार का उल्लेख किया है—'अथैतां जाम्या रिक्थप्रतिषेध उदाहरन्ति ज्येष्ठं पुत्रिकाय। इत्येके।'
इस स्थल पर यास्क ने वैदिक मन्त्रों को उद्धृत किया है और एक ऐसे श्लोक का निर्देश किया है, जिससे धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों का पहले विद्यमान होना स्पष्ट है—
"तदेतदृक् श्लोकाभ्यामभ्युक्तम् ।
अङ्गादङ्गात्सम्भवसि...स जीव शरदः शतम् ॥
अविशेषेण पुत्राणां दायो भवति धर्मतः।
मिथुनानां विसर्गादौ मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥"
[ ९ ]
इस प्रकार यास्क के पहले धर्मशास्त्र के ग्रन्थ विद्यमान थे। धर्मसूत्रों में प्राचीनतम धर्मसूत्र-गौतम, बौधायन एवम् आपस्तम्ब धर्मसूत्र— ६०० ई० पू० और ३०० ई० पू० के मध्य के माने जाते हैं। धर्मसूत्रों में धर्मशास्त्र और धर्मशास्त्रकारों का बहुशः उल्लेख हुआ है। उदाहरणार्थ गौतमधर्मसूत्र में निम्नलिखित सूत्र द्रष्टव्य हैं— 'तस्य च व्यवहारो वेदो धर्मशास्त्राण्यङ्गानि उपवेदाः पुराणम्।' १.९.२१ 'चत्वारश्चतुर्णां पारगा वेदानां प्रागुत्तमाश्रय आश्रमिणः पृथग्धर्मविदस्त्रय एतान्द- शावरान् परिषदित्याचक्षते।' ३.१०.४७ इसी प्रकार गौतमधर्मसूत्र मे मनु के मत का नामतः उल्लेख है— 'त्रीणि प्रथमान्यनिर्देश्यान्मनुः'—३.३.७ कई स्थानों पर दूसरे आचार्यों के मतों का निर्देश 'एके' कहकर किया गया है, जैसे १.२.१५, २.५८, ३.१, ४.२१, ७.२३ में। 'आचार्याः' कहकर भी धर्मशास्त्रों के मत का उल्लेख किया गया है—'ऐकाश्रम्यं त्वाचार्याः प्रत्यक्षविधानाद् गार्हस्थ्यस्य।' १.३.३५ 'वर्णान्तरगमनमुत्कर्षाभ्यां सप्तमे पञ्चमे चाऽऽचार्याः।' १.४.१८ गौतमधर्मसूत्र के अतिरिक्त अन्य धर्मसूत्रों में भी धर्मशास्त्रकारों के उल्लेख किये गये हैं। पतञ्जलि ने 'धर्मशास्त्रं च तथा' एवं जैमिनि ने भी पूर्वमीमांसा ६.७.६ में 'सूत्रञ्च धर्मशास्त्रत्वात्' कहकर धर्मशास्त्रों के अस्तित्त्व का स्पष्ट संकेत किया है। इन सभी प्रमाणों पर विचार कर महामहोपाध्याय काणे ने निष्कर्ष निकाला है : “धर्मशास्त्र यास्क के पूर्व उपस्थित थे, कम-से-कम ६००-३०० के पूर्व तो वे थे ही और ईसा की द्वितीय शताब्दी में वे मानव आचार के लिए सबसे बड़े प्रमाण माने जाते थे।” "Works on the dharmasūtra existed prior to the period 600-300 B. C. and in the 2nd century B. C. they had attained a position of supreme authority in regulating the conduct of men." —हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, पृ० ९ एक प्रश्न और विचारणीय है। सूत्रग्रन्थ प्रायः पद्यात्मक धर्मशास्त्रों से पूर्ववर्ती माने जाते हैं। प्रो० मैक्स म्यूलेर इसी विचार का प्रतिपादन करते हैं, यद्यपि वे इस प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का भी अस्तित्त्व स्वीकार करते हैं जो सूत्रों के पहले मौखिक संक्रमण की परम्परा द्वारा प्रचलित थीं और अपौरुषेय मानी जाती थीं। ये रचनाएँ ही धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों का आधार बनीं— There existed previous to the Sūtra period, a body of literary works propagated by oral tradition, which formed the basis of all later writings on sacred subjects, and which by the Brāhmanas was believed to be of divine origin. —Ancient Sanskrit Literature, p. 95. डॉ० भण्डारकर भी यही मानते हैं कि सूत्रों की रचना के बाद अनुष्टुभ् छन्द में रचित धर्मग्रन्थों की रचना हुई। महामहोपाध्याय काणे का मत है कि चूंकि प्राचीन
[ १० ]
ग्रन्थों के विषय में हमारा ज्ञान अल्प है, अतः पौर्वापर्य की स्पष्ट रेखा नहीं खींची जा सकती। श्लोकबद्व कुछ धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ जैसे मनुस्मृति सूत्रात्मक रचना विष्णुधर्मसूत्र से प्राचीन हैं तथा वसिष्ठधर्मसूत्र का समकालीन है।
कतिपय प्राचीन सूत्रग्रन्थ जैसे बौधायनधर्मसूत्र में भी श्लोकों के उद्धरण आये हैं जो स्पष्टतः सूत्रों से पहले श्लोकबद्ध रचनाओं का अस्तित्व प्रमाणित करते हैं।
"This renders it highly probable that works in the sloka metre existed before them. Besides, a large literature on dharma existed in the days of Āpastamba and Baudhāyana which has not come down to us." ( p. 10. )
धर्मसूत्र-साहित्य का परिचय
**गौतमधर्मसूत्र—**धर्मसूत्रों में प्राचीनतम गौतमधर्मसूत्र है। यह केवल गद्य में है तथा इसमें श्लोक का कोई उद्धरण नहीं दिया गया है, जबकि दूसरे धर्मसूत्रों में श्लोक का उद्धरण आ जाता है। इसकी प्राचीनता के कई प्रमाण हैं—इसका उल्लेख बौधायन- धर्मसूत्र में किया गया है। यह तीन प्रश्नों में विभक्त है, जिनमें क्रमशः नौ, नौ, दस अध्याय हैं। विस्तृत समालोचना के लिए चौखम्बा से प्रकाशित मेरे अनुवाद से युक्त संस्करण देखें।
**बौधायन-धर्मसूत्र—**बौधायन का धर्मसूत्र चार प्रश्नों में विभक्त है, इनमें अन्तिम प्रश्न परिशिष्ट माना जाता है और उसे बाद के समय की रचना मानते हैं। यह 'आपस्तम्बधर्मसूत्र से पहले का है। इसमें दो बार गौतम के नाम का तथा एक बार उनके धर्मसूत्र का उल्लेख आता है। बौधायन ने अनेक आचार्यों के नाम गिनाये हैं तथा उपनिषदों के उद्धरण दिये हैं। कुमारिल ने बौधायन को आपस्तम्ब के बाद के समय का माना है। बौधायन का काल ई० पू० २००-५०० के बीच माना जाता है।
**आपस्तम्ब-धर्मसूत्र—**इस धर्मसूत्र में दो प्रश्न हैं, जिनमें प्रत्येक में ११ पटल हैं। सभी सूत्रों में यह छोटा है और इसकी शैली बड़ी चुस्त है। भाषा भी पाणिनि से बहुत पहले की है। अधिकांश सूत्र गद्य में हैं, किन्तु यत्र-तत्र श्लोक भी हैं। इसका सम्बन्ध पूर्वमीमांसा से दिखायी पड़ता है। यह बहुत प्रामाणिक माना जाता रहा है। इसका समय ६००-३०० ई० पू० स्वीकार किया गया है।
**हिरण्यकेशिश्रौतसूत्र—**हिरण्यकेशिकल्प का २६वाँ और २७वाँ प्रश्न हिरण्यकेशिधर्मसूत्र कहलाता है। प्रायः इसे स्वतन्त्र धर्मसूत्र नहीं माना जाता, क्योंकि इसमें आपस्तम्ब- धर्मसूत्र से सैकड़ों सूत्र लिये गये हैं।
**वसिष्ठ-धर्मसूत्र—**इसके कई संस्करण हैं। जीवानन्द के संस्करण में २० अध्याय हैं तथा ३१वें अध्याय का कुछ अंश है। इसके अतिरिक्त ३० अध्यायों, ६ अध्यायों एवं २१ अध्यायों के अलग-अलग संस्करण भी हैं। इससे पता चलता है कि यह कालान्तर में परिवृंहित, परिवर्द्धित और परिवर्तित होता रहा है। इसका समय ३००-२०० ई० पू० है।
[ ११ ]
विष्णु-धर्मसूत्र—इस सूत्र में १०० अध्याय हैं, किन्तु सूत्र छोटे हैं। पहला अध्याय और अन्त के दो अध्याय पद्य में हैं। शेष में गद्य है या पद्य का मिश्रण। इसका सम्बन्ध यजुर्वेद की कठ शाखा से बताया गया है। इसमें भिन्न-भिन्न कालों के अंश दृष्टिगोचर होते हैं, जिससे इसका काल निश्चित करना कठिन है। इसके आरम्भ के अंशों का समय ३००-१०० ई० पू० के बीच माना जा सकता है। इसमें भगवद्गीता, मनुस्मृति तथा याज्ञवल्क्यस्मृति से बहुत सी बातें ली गयी हैं।
हारीत-धर्मसूत्र—इस सूत्र का ज्ञान उद्धरणों से मिलता है। अनेक धर्मशास्त्रकारों ने इसका उल्लेख किया है। इसमें गद्य के अनुष्टुप् एवं त्रिष्टुप् छन्द का प्रयोग है। हारीत का सम्बन्ध कृष्णयजुर्वेद से है, किन्तु उन्होंने सभी वेदों से उद्धरण लिये हैं। इससे यह भी ज्ञात होता है कि वे किसी एक वेद से सम्बद्ध नहीं थे।
शङ्खलिखित-धर्मसूत्र—यह शुक्लयजुर्वेद की वाजसनेयिशाखा का धर्मसूत्र था। ‘तन्त्र-वार्तिक’ में इस सूत्र के अनुष्टुप् श्लोकों का उद्धरण है। याज्ञवल्क्य और पाराशर ने इनका उल्लेख किया है। जीवानन्द के स्मृति-संग्रह में इस धर्मसूत्र के १८ अध्याय एवं शङ्खस्मृति के ३३० तथा लिखित-स्मृति के ९३ श्लोक पाये जाते हैं। यह धर्मसूत्र गौतम एवं आपस्तम्ब के बाद के काल का है और इसकी रचना का समय ई० पू० ३०० से १०० ई० के बीच है।
अन्य सूत्र ग्रन्थ—अनेक धर्मसूत्र धर्मविषयक ग्रन्थों में विकीर्ण हैं। उनमें इन आचार्यों के सूत्र-ग्रन्थ गिनाये जाते हैं—अत्रि, उशना, कण्व एवं काण्व, कश्यप एवं काश्यप, गार्ग्य, च्यवन, जातूकर्ण्य, देवल, पैठीनसि, बुध, बृहस्पति, भरद्वाज एवं भारद्वाज, शातातप, सुमन्तु आदि।
•धर्मसूत्रों का प्रतिपाद्य
धर्मसूत्रों का मुख्य विषय व्यक्ति के जीवन के आचार एवं कर्त्तव्य हैं। धर्मसूत्र मुख्यतः वर्णों एवम् आश्रमों के नियमों का विवेचन करते हैं तथा उच्चवर्णों के दैनिक धर्मकृत्यों का विधान करते हैं। सुतरां, धर्मसूत्र कभी-कभी गृह्यसूत्रों द्वारा प्रतिपाद्य विषयों के क्षेत्र में भी पहुँच जाते हैं। गृह्यसूत्रों का ध्येय गृह्ययज्ञ, प्रातः-सायं-पूजन, पाकयज्ञ, विवाह, पुंसवन, जातकर्म, उपनयन एवं दूसरे संस्कार, ब्रह्मचारी एवं स्नातक के नियम, मधुपर्क और श्राद्धकर्म का वर्णन करना तथा इनसे संबद्ध नियमों को स्पष्ट करना है। इस प्रकार गृह्यसूत्रों के विषय नितान्त वैयक्तिक जीवन से सम्बद्ध हैं। उनमें व्यक्ति के सामाजिक दायित्वों एवं कानून का विवेचन नहीं है। इसके विपरीत, धर्मसूत्र मनुष्य को समाज में लाकर खड़ा कर देता है, जहाँ उसे व्यावहारिक जगत् में दूसरों के साथ रहते हुए अपने आचार-व्यवहार को नियमित और संयमित करना है, उसे कुछ कर्त्तव्यों एवं दायित्वों का पालन करना होता है, कुछ अधिकार प्राप्त करने होते हैं और अपने अपराधों के लिए दण्ड भोगने होते हैं, इस प्रकार धर्मसूत्रों का वातावरण अधिक सामाजिक और नैतिक है। जैसा हम कह आये हैं, धर्मसूत्रों में गृह्यसूत्रों के कुछ विषयों पर भी विचार किया गया है, जैसे, विवाह, संस्कार, मधुपर्क, स्नातक का जीवन, श्राद्धकर्म आदि। संक्षेप में धर्मसूत्रों के वर्ण्य-विषय की सूची इस प्रकार दी जा सकती
[ १२ ]
है :—धर्म और उसके उपादान, चारों वर्णों के आचार कर्त्तव्य एवं जीवनवृत्तियाँ, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रमों के आचार, उपजातियाँ एवं वर्णसङ्कर, सपिण्ड और सगोत्र, पाप, उनके प्रायश्चित्त एवं व्रत, आशौच और उससे शुद्धि, ऋण, ब्याज, साक्षी और न्यायव्यवहार, अपराध और उनके दण्ड, राजा और राजा के कर्त्तव्य, स्त्री के कर्त्तव्य, पुत्र और दत्तक पुत्र, उत्तराधिकार, स्त्रीधन और सम्पत्ति का विभाजन।
धर्मसूत्र और स्मृति
धर्मसूत्र स्मृति नाम से प्रचलित रचनाओं से भिन्न तथा अधिक प्राचीन माने गये हैं। वेद के ईश्वर प्रकाशित एवम् ऋषिदृष्ट वाङ्मय को श्रुति और धर्मशास्त्र को स्मृति कहा गया है—
श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः ।—मनु० २।१०
श्रुति और स्मृति का भेद वस्तुतः महत्त्वपूर्ण है। इस महत्त्व को स्वीकारते हुए प्रो० मैक्स म्यूल्लेर ने लिखा है—
“The distinction between Sruti (revelation) and Smṛti (tradition) which is a point of such vital importance for the whole Brahmanic system will also be found significant in an historical point of view.” —p. 77.
श्रुति से भिन्न स्मृति के अन्तर्गत सूत्रात्मक एवं श्लोकबद्व दोनों प्रकार की धर्मशास्त्रीय रचनाएँ आती हैं। किन्तु संकुचित अर्थ में 'स्मृति' शब्द का प्रयोग 'मनुस्मृति' 'याज्ञवल्क्यस्मृति' जैसी पद्यात्मक धर्मशास्त्रीय रचनाओं के लिए हुआ है। इन स्मृतियों में कई सूत्ररचनाओं के ऊपर ही आधारित है।
स्मृति की प्रामाणिकता उसके श्रुति पर आदृत होने के कारण ही है—
पूर्वविज्ञानविषयं विज्ञानं स्मृतिरुच्यते ।
पूर्वज्ञानाद्विना तस्याः प्रामाण्यं नावधार्यते ॥
स्मृतियों में सबसे प्राचीन 'मनुस्मृति' है। इसका समय ईसा से कई शताब्दी पहले का है। अन्य स्मृतियाँ ४०० और १०० ई० के बीच की हैं। स्मृतियाँ अधिकांशतः पद्य में हैं और भाषा की दृष्टि से धर्मसूत्रों के बाद की रचनाएँ हैं। विषयवस्तु की दृष्टि से स्मृतियाँ धर्मसूत्रों से अधिक व्यवस्थित और सुगठित हैं।
मुख्य स्मृतिकार १८ हैं—मनु, बृहस्पति, दक्ष गौतम, यम, अङ्गिरा, योगीश्वर, प्रचेता, शातातप, पराशर, संवर्त, उशनस्, शंख, लिखित, अत्रि, विष्णु, आपस्तम्ब, हारीत।
इसके अतिरिक्त उपस्मृतियों के भी लेखकों के नाम इस प्रकार गिनाये गये हैं—
नारदः पुलहो गार्ग्यः पुलस्त्यः, शौनकः क्रतुः।
बौधायनो जातुकर्ण्यो विश्वामित्रः पितामहः ॥
जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कन्दो लौगाक्षिकश्यपौ ।
व्यासः सनत्कुमारश्च शान्तनुर्जनकस्तथा ॥
[ १३ ]
व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातूकर्ण्यः कपिञ्जलः ।
बौधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च ।
पैठीनसिर्गोभिलश्चेत्युपस्मृति विधायकाः ॥
वीरमित्रोदय के परिभाषा प्रकरण के अनुसार स्मृतिकारों की संख्या २१ है—
वसिष्ठो नारदश्चैव सुमन्तुश्च पितामहः ।
विष्णुः कार्ष्णाजिनिः सत्यव्रतो गार्ग्यश्च देवलः ॥
जमदग्निर्भरद्वाजः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
आत्रेयश्च गवेयश्च मरीचिर्वत्स एव च ॥
पारस्करश्चप्यर्य ॠक्षो बैजवापस्तथैव च ।
इत्येते स्मृतिकर्तार एकविंशतिरीरिताः ॥
सामान्यतः स्मृति नाम से अभिहित रचनाओं एवं धर्मसूत्रों में जो अन्तर हैं उनको महामहोपाध्याय काणे ने अपने धर्मशास्त्र के इतिहास में स्पष्ट किया है, जिसे हम यहाँ साभार प्रस्तुत करते हैं—
१—अनेक धर्मसूत्र किसी चरण के या किसी कल्प के अङ्ग हैं, अथवा उनका गहरा सम्बन्ध गृह्यसूत्रों से है।
२—धर्मसूत्रों में यत्र-तत्र अपने चरण के साहित्य और वेद के उद्धरण दिये गये हैं।
३—धर्मसूत्र प्रायः गद्य में हैं या कहीं-कहीं मिश्रित गद्य या पद्य में हैं, किन्तु स्मृतियाँ श्लोकों में हैं या पद्यबद्ध हैं।
४—भाषा की दृष्टि से धर्मसूत्र स्मृतियों के पहले के हैं, और स्मृतियों की भाषा अपेक्षाकृत अर्वाचीन है।
५—विषयवस्तु के विन्यास की दृष्टि से भी धर्मसूत्र और स्मृतियों में अन्तर है। धर्मसूत्रों में प्रायः विषय की व्यवस्था, क्रम का अनुसरण नहीं करतीं, किन्तु स्मृतियाँ अधिक व्यवस्थित और सुगठित हैं, उनमें विषयवस्तु मुख्यतः तीन शीर्षकों में विभक्त हैं—आचार, व्यवहार और प्रायश्चित्त।
६—बहुत बड़ी संख्या में धर्मसूत्र अधिकतम स्मृतियों से प्राचीन हैं।
भारतीय धर्म
भारतीय परम्परा में 'धर्म' शब्द के अर्थ में अद्भुत विकास हुआ है। सर्वप्रथम, ऋग्वेद में 'धर्म' का प्रयोग विशेषण या संज्ञा के रूप में हुआ है और प्रायः 'धर्मन्' के रूप में यह नपुंसकलिंग है। ऋग्वेद के अतिरिक्त अथर्ववेद, वाजसनेयि-संहिता में भी 'धर्मन्' का प्रयोग अनेकशः हुआ है। 'धर्म' शब्द का प्रयोग अथर्ववेद, तैत्तिरीय-संहिता तथा वाजसनेयिसंहिता में हुआ है। इन प्रयोगों में प्रायः स्थलों पर धर्म का अर्थ है धार्मिक विधि, धार्मिक क्रिया, शाश्वत नियम, आचरण के नियम।
संहिताओं के परवर्त्ती काल में 'धर्म' शब्द का अर्थ वर्णाश्रम की विधियों के निकट आ गया है। उपनिषद् काल में 'धर्म' का अर्थ स्पष्टतः वर्णों एवम् आश्रमों के आचार एवं संस्कार ही था, जैसा कि छान्दोग्योपनिषद् के निम्नलिखित अंश से प्रकट है—
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'त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एवेति द्वितीयो ब्रह्मचार्याकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुले अवसादयन् । सर्व एते पुण्यश्लोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ।'
धर्म को जिस रूप में धर्मशास्त्र धर्मसूत्र और स्मृतियों में विवेचित किया गया है उसके अन्तर्गत चार विषयों से संवद्ध नियमों को सम्मिलित किया गया है—१. वर्णधर्म अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के कर्त्तव्य, स्वधर्म एवम् आपद्धर्म २. आश्रमधर्म—चारों आश्रमों के विशिष्ट कर्त्तव्य एवम् वृत्तियाँ ३. नैमित्तिकधर्म—प्रायश्चित्त आदि ४. गुणधर्म—राजा के कर्त्तव्य, अपराध और दण्ड ।
धर्म की कुछ परिभाषाएँ प्रचलित हैं, जिनका यहाँ उल्लेख करना उचित है— 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्म:'—अर्थात् वेद में बताये गये कर्म की प्रेरणा देने वाले विधि-नियम धर्म है ।—जैमिनि, पूर्वमीमांसासूत्र, १-१-२
वैशेषिकसूत्र में धर्म उसे माना गया है, जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस् प्राप्त होता है । 'यतोऽभ्युदय निःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ।' 'श्रुतिप्रमाणको धर्म:'—हारीत, कुल्लूक, मनु० २-१ की टीका । 'श्रुतिस्मृतिविहितो धर्म:'—श्रुति और स्मृति द्वारा विहित आचरण धर्म है ।—वसिष्ठधर्मसूत्र १-४-६ । इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि भारतीय धर्म का मूल वेद और स्मृति हैं। इनको प्रमाण मानकर विहित नियम या आचार ही धर्म है ।
धर्म के स्रोत
धर्म के स्रोतों का उल्लेख नियमपूर्वक प्रत्येक धर्मसूत्र और स्मृति में किया गया है । गौतमधर्मसूत्र में यह स्पष्टतः कहा गया है कि वेद धर्म का मूल है। 'वेदो धर्ममूलम् । तद्विदां च स्मृतिशीले ।' आपस्तम्बधर्मसूत्र—'धर्मज्ञसमयः प्रमाणं वेदाश्च' १-१-१-२ । धर्म को जाननेवाले वेद का मर्म समझने वाले व्यक्तियों का मत ही वेद का प्रमाण है । इसी प्रकार वशिष्ठधर्मसूत्र में भी, जिसकी धर्म की परिभाषा का ऊपर उल्लेख किया गया है, श्रुति और स्मृति द्वारा विहित आचरण-नियमों को धर्म माना गया है, तथा उसके अभाव में शिष्टजनों के आचार को प्रमाण माना गया है ।
"श्रुतिस्मृतिविहितो धर्मः। तदलाभे शिष्टाचारः प्रमाणम् । शिष्टः पुनरकामात्मा ।"
बौधायनधर्मसूत्र में भी तीन प्रकार के धर्म का उल्लेख कर वेद, स्मृति और शिष्ट के आचरण को धर्म का स्रोत बताया गया है । 'उपदिष्टो धर्मः प्रतिवेदम् । स्मार्त्तो द्वितीयः । तृतीयः शिष्टागमः ।'
इसी प्रकार मनुस्मृति में वेद, स्मृति, वेदज्ञों के आचरण के अलावा आत्मा की तुष्टि को भी धर्म का मूल कहा गया है—
'वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥' २.६
'याज्ञवल्क्यस्मृति' में उपर्युक्त के साथ-साथ उचित संकल्प से उत्पन्न अभिलाषा या इच्छा को भी धर्म का मूल स्वीकारा गया है :—
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'श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः। सम्यक् संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम्॥' १.७
इस प्रकार धर्म के उपादान, स्रोत, मूल या प्रमाण स्वयं धर्मशास्त्रों की दृष्टि में ये हैं : १. वेद, २. वेद से भिन्न परम्परागत ज्ञान अर्थात् स्मृति, ३. श्रेष्ठ लोगों के आचार-विचार, ४. अपनी विवेक बुद्धि से स्वयं को हितकर लगने वाला आचरण और उचित संकल्प से उत्पन्न इच्छा।
वेद और धर्मशास्त्रों पर दृष्टिपात करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्मशास्त्रों में जो कुछ भी कहा गया है उसका आधार वेद ही है और वेद की मान्यताओं के अनुसार ही धर्मसूत्रों के नियमों की रचना हुई। वेद की संहिताओं में और ब्राह्मण ग्रन्थों में धर्मसूत्र के विषयों का प्रसंगतः उल्लेख प्रचुर मात्रा में मिलता है, जैसे विवाह, उत्तराधिकार, श्राद्ध, स्त्री की स्थिति आदि। संहिताओं और ब्राह्मणों में जिस समाज और सभ्यता का दर्शन होता है वह धर्मशास्त्र की व्यवस्थाओं की व्यावहारिक पृष्ठभूमि है। आख्यानों में भी नियमों का पोषण हुआ दिखायी पड़ता है, जिनका उपदेश धर्मशास्त्रों ने दिया है। ब्रह्मचर्य का महत्त्व, उत्तराधिकार और सम्पत्ति का विभाजन, यज्ञ और अतिथि-सत्कार ऐसे ही विषय हैं, जिन पर धर्मसूत्रों से पूर्ववर्ती वैदिक साहित्य में भी अनेक स्थलों पर विचार हुआ है। जैसा कि म० म० काणे ने कहा है : 'कालान्तर में धर्मशास्त्रों में जो विधियाँ बतलायी गयीं, उनका मूल वैदिक साहित्य में अक्षुण्ण रूप में पाया जाता है। धर्मशास्त्रों ने वेद को जो धर्म का मूल कहा है वह उचित ही है। —धर्मशास्त्र का इतिहास, पृ० ७, अनु० काश्यप।
धर्मसूत्रों में धर्म तथा आचार
भारतीय धर्म अपनी अनेक विशेषताओं के कारण अध्ययन का आकर्षक विषय बना रहा है। भारतीय विद्वानों के अतिरिक्त विदेशी विद्वानों ने भी हिन्दू धर्म को समझने और समझाने का प्रयत्न किया। कतिपय योरोपीय विद्वानों ने इसके श्रेष्ठ तत्त्वों की उपेक्षा कर केवल आलोचना ही अपना लक्ष्य बनाया है। धर्मसूत्रों में धर्म का जो स्वरूप उभरता है उसे किसी एक विशेष शब्द द्वारा व्यक्त करना कठिन है। जॉन मेकेंजी का यह कथन सर्वथा संगत है कि हिन्दू धर्म के अन्तर्गत 'रिलीजन,' 'वर्च्यू,' 'लॉ,' और 'ड्यूटी' इन चार शब्दों का अर्थ समाहित है—
“In India in those days no clear distinction was drawn between moral and religious duty, usage, customary observance and law and dharma was the term which was applied to the whole complex forms of conduct that were settled or established.”
इस प्रकार धर्म के अन्तर्गत ईश्वर के प्रति आस्था, सदाचार, सामाजिक तथा वैयक्तिक कानून एवं कर्त्तव्य सभी आ जाते हैं। हिन्दू-धर्म की यह विशेषता है कि वह जीवन के सभी पक्षों को समन्वित रूप में देखता है।
उसका कोई भी पक्ष एक दूसरे से पृथक् नहीं किया जा सकता है। पारलौकिक, लौकिक से सम्बद्ध है और चिन्तन व्यवहार के साथ चलता है। चार पुरुषार्थों की
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कल्पना जीवन के सभी पक्षों के समन्वय का आदर्श रूप है। ये सभी पुरुषार्थ परस्पर समन्वित होकर ही धर्म के उद्देश्य की पूर्ति करते हैं। हिन्दू-धर्म कोरा आदर्शवादी नहीं है। वह व्यवहार के धरातल पर स्थित है और यथार्थवादी है। धर्म मनुष्य से भिन्न नहीं है, अपितु धर्म उस प्रकार का आचरण और जीवन है जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। इस धर्म के अभाव में मनुष्य पशु से भिन्न नहीं रह जाता। अतएव धर्म मनुष्य को पशु से भिन्न करने वाली योग्यता है और इसका सम्बन्ध सम्पूर्ण व्यक्तित्व से है। व्यक्ति के जीवन, आचरण तथा छोटे-छोटे कार्य भी इस धर्म के क्षेत्र से बाहर नहीं रखे गये हैं।
धर्मसूत्र मनुष्य को सम्पूर्ण रूप में देखता है। मनुष्य की प्रत्येक अवस्था और प्रत्येक स्थिति के आचरण का विधान करता है। सुख-दुःख और सम्पत्ति-विपत्ति सभी पर धर्मसूत्र की दृष्टि है और वह व्यक्ति के सामाजिक, पारिवारिक, वैयक्तिक और पारलौकिक सभी पक्षों पर सूक्ष्म विचार करता है। वह व्यक्ति के जीवन की एक ऐसी दिशा निर्धारित करता है जिस पर चल कर वह आत्मा का और समाज का सम्मान प्राप्त कर सकता है। इसके लिए हिन्दू-धर्म ने सम्पूर्ण जीवन को संस्कारों में बाँध रखा है। प्रत्येक संस्कार व्यक्ति को कर्त्तव्यों की दिशा में आगे बढ़ाता है और जीवन के लक्ष्यों की ओर उन्मुख करता है। ये सभी संस्कार मनुष्य को जीवन की पवित्रता, महान् उपयोगिता और गरिमा का पाठ पढ़ाते रहते हैं। आश्रमों की व्यवस्था भी मनुष्य के जीवन की विविध अवस्थाओं के बदलते परिवेश के साथ समायोजन के लिए और उत्तरोत्तर लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। मनुष्य की शक्तियाँ परिवर्तनशील हैं और उसके अनुसार दायित्व और कर्त्तव्य भी परिवर्तित होने चाहिए। हिन्दू-धर्म में आश्रम-व्यवस्था इसी व्यावहारिक आवश्यकता की पूर्ति है और इसके साथ धर्म के महत्तर उद्देश्य की दिशा में एक प्रशस्त पथ तो है ही।
हिन्दू-धर्म का मनुष्य के जीवन के साथ जो स्पष्ट तादात्म्य है उसने पाश्चात्य विद्वानों और धर्म के चिन्तकों को भी प्रभावित किया है। यथा प्रो० मैक्स म्यूलर ने भारतीय धर्म की इस विशेषता को ध्यान में रखते हुए अपने विचार इन शब्दों में व्यक्त किये हैं—
'प्राचीन भारतवासियों के लिए सबसे पहले धर्म अनेक विषयों के बीच एक रुचि का विषय नहीं था, यह सबका आत्मार्पण करने वाली रुचि था। इसके अन्तर्गत न केवल पूजा और प्रार्थना आती थी, अपितु वह सब भी आता था जिसे हम दर्शन, नैतिकता, और कानून और शासन कहते हैं—सभी धर्म से व्याप्त थे। उनका सम्पूर्ण जीवन उनके लिए एक धर्म था और दूसरी चीजें मानों इस जीवन की भौतिक आवश्यकताओं के लिए निर्मित मात्र थीं।' —ह्वाट कैन इण्डिया टीच अस, पृ० १०७ ।
धर्म की रक्षा करने से ही मनुष्य के भौतिक एवं पारलौकिक जीवन की रक्षा होती है। धर्महीन जीवन अस्तव्यस्त, उच्छृङ्खल तथा उद्देश्यहीन होता है। धर्म लौकिक जीवन की समृद्धि एवं कल्याण के साथ-साथ परलोक की मंगल कामना भी पूरी करता है। परलोक की यह स्पृहा कल्पना की तरंग में बहते हुए कवि का स्वप्न नहीं है,
२ बौ० भू०
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अपि तु वास्तविक जीवन की यथार्थ अनुभूति है। इसी पारलौकिक स्पृहा को कवि वर्ड्स वर्थ ने इन शब्दों में व्यक्त किया है—
“Those obstinate questionings
Of sense and outward things
Falling form us, vanishings,
Blank misgivings of a creature
Moving about in worlds not realised.”
यह आध्यात्मिक जागरण या आस्था आज के जगत् की प्राथमिक आवश्यकता बन गयी है “जगत् का और मानव इतिहास का एकमात्र वास्तविक एवं गम्भीर चिन्तन का विषय है आस्था और अनास्था का संघर्ष। दूसरे सभी विषय इसके अधीन ही हैं।” इस आस्था के अभाव में थोड़ी देर के लिए वैभव की चकाचौंध और झूठी गरिमा प्राप्त हो सकती है लेकिन वह शीघ्र ही समय के प्रवाह में विलीन हो जाती है। मानव आस्था के सहारे जीता है और आस्था के अभाव में मर जाता है। समाज भी आस्था से जीवित रहता है और आस्था के लोप होने पर उसका विनाश हो जाता है।
यह आस्था ही भारतीय धर्म का आध्यात्मिक पक्ष है। यह आध्यात्मिकता भारतीय चरित्र की ऐसी विशेषता है, जिसने हमारी संस्कृति को अमरता प्रदान की है। इस आध्यात्मिकता का उल्लेख प्रो० माक्स म्यूहलेर ने बड़े स्पष्ट शब्दों में किया है—
“यदि मुझसे एक शब्द में भारतीय चरित्र की विशेषता बताने को कहा जाय तो मैं यही कहूँगा कि वह पारलौकिक था। —भारतीय चरित्र में इस पारलौकिक मनोवृत्ति ने अन्य किसी देश की अपेक्षा अधिक प्राधान्य प्राप्त किया।”
<p align="right">—ह्वाट कैन इण्डिया टीच अस, पृ० १०४, १०५।</p>
भारतीय धर्म की यह विशेषता है कि वह दर्शन के सिद्धान्तों से पृथक् नहीं है। वस्तुतः, धर्म और दर्शन एक सिक्के के दो पहलू बन गये हैं। यह सत्य है कि धर्म में आस्था और भावना प्रधान होती है जब कि दर्शन में विचार और तर्क। धर्मसूत्रों में भी धर्म और दर्शन का यह घनिष्ठ सम्बन्ध सर्वत्र बना हुआ है। दार्शनिक सिद्धान्त व्यक्ति के व्यावहारिक जीवन को पूर्णतः अभिव्याप्त करता है। भारतीय धर्म का मूल आधार आचार है। इसकी नींव गहरी है और उसके कुछ मौलिक तत्त्व हैं जो इसे स्थायित्व प्रदान करते हैं। एक पाश्चात्य आलोचक ने भारतीय धर्म के इन्हीं तत्त्वों की ओर स्पष्टतः संकेत किया है—“भारत का आध्यात्मिक इतिहास उसके अत्यन्त मौलिक विचार के घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है और यह बात सोची भी नहीं जा सकती कि इस प्रकार की संस्कृति जो हजारों वर्षों से भारत में फूलती-फलती रही है, इतनी गहरी जड़ों पर आधारित होती और स्वयं को इतनी दृढ़ता से बनाये रखती, अगर इसमें महान् एवं चिरस्थायी मूल्य वाले तत्त्व निहित न होते।”
भारतीय धर्म ने मानव के महत्व को पहचाना है, मनुष्य की उपयोगिता को समझा है और इस कारण उसका प्रधान लक्ष्य है जीवन के प्रत्येक क्षण का अपने और दूसरों के कल्याण के लिए उपयोग। पलायनवादिता हिन्दू धर्म की आत्मा से बिल्कुल अपरिचित है। हिन्दू धर्म ने मनुष्य में असीम शक्तियाँ और अनन्त सम्भावनाएँ देखी हैं। इस
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कारण वह व्यक्ति के जीवन को व्यवस्थित एवं संयमित करने के लिए सदैव तत्पर है। मानवजीवन की छोटी-से-छोटी समस्या पर भी यह धर्म विचार करता है, व्यवस्था देता है, मार्ग का निर्देश करता है और उसके बाद भी व्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन नहीं करता। सब कुछ कहने पर भी वह बड़ी उदारता से कहता है--तुम अपनी आत्मा से पूछो यदि वह तुम्हें स्वकल्याण का मार्ग सुझाता है तो उसी का अनुसरण करो। उसका सन्देश है "आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।" आत्मा का अनादर कहीं भी अभीष्ट नहीं है और इसीलिए धर्मसूत्रों में आत्मरक्षा और आत्मसम्मान के लिए बार-बार उद्बोधित किया गया है। हिन्दूधर्म धर्म का स्रोत वेद और स्मृति के अतिरिक्त "स्वस्य च प्रियमात्मनः" अथवा मनु के शब्दों में "आत्मनस्तुष्टिरेव च" भी मानता है।
जीवन के प्रत्येक पक्ष तथा प्रत्येक समस्या पर जिस प्रकार हिन्दू धर्म में विचार किया गया है वह विदेशी चिन्तकों को भी आश्चर्य में डाल देता है। माक्सम्यूल्लेर ने भारतीय संस्कृति की इन विशेषताओं के विषय में लिखा है—
"If I were asked under what sky the human mind has fully developed some of its choicest gifts, has most deeply pondered on the greatest problems of life, and has found solutions of some of them which well deserve the attention even of those who have studied Plato and Kant—I should point to India." —What Can India Teach us ? p. 6.
(यदि मुझसे यह पूछा जाये कि किस देश में मानव मस्तिष्क ने अपने श्रेष्ठ उपहारों का पूर्ण विकास किया है, जीवन की जटिलतम समस्याओं पर गम्भीरता से विचार किया है और प्लेटो तथा काण्ट के दर्शन का अध्ययन करने वालों के भी चिन्तन को आकृष्ट करने वाली कतिपय समस्याओं के समाधान ढूँढे हैं, तो मैं भारत की ओर संकेत करूँगा।)
भारतीय धर्म का मूल आधार आचार है। धर्मसूत्रों में आचार को ही प्रधानता दी गयी है। हिन्दू समाज का निर्माण आचार के आधार पर ही हुआ है। समाज तथा व्यक्ति की समुन्नति आचार की रक्षा से ही सम्भव है और भारतीय संस्कृति के इतिहास में जब तक आचार को प्राधान्य मिलता रहा, तब तक धर्म अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल बना रहा और समाज में सहिष्णुता, दया, दान, सद्भावना, प्रेम आदि महान् मानवीय गुण मनुष्य को शान्ति और लोककल्याण की पवित्र भावनाओं से प्रेरित करते रहे। जैसे-जैसे आचार की उपेक्षा होती गयी वैसे-वैसे अशान्ति हिंसा और अकल्याण अपना प्रभाव पसारते गये। हमारे सांस्कृतिक इतिहास के उत्थान और पतन की यही संक्षिप्त कहानी है। धर्म का व्यावहारिक पक्ष होने के कारण ही आचाररहित व्यक्ति इस लोक तथा परलोक में विनाश का ही भागी होता है। वसिष्ठधर्मसूत्र के शब्दों में—
"आचारः परमो धर्मः सर्वेषामिति निश्चयः। हीनाचारपरीतात्मा प्रेत्य चेह च नश्यति॥"—वसिष्ठधर्मसूत्र १।१
वेद या शास्त्र में पारंगत व्यक्ति भी यदि आचार से भ्रष्ट है तो उसका सम्पूर्ण धर्मज्ञान उसे कोई लाभ नहीं पहुँचा सकता, जैसे अन्धे के हृदय में उसकी सुन्दर पत्नी भी सौन्दर्यानुभूति का कोई सुख नहीं उत्पन्न करती—
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"आचारहीनस्य तु ब्राह्मणस्य वेदाः षडङ्गास्त्वखिलाः सयज्ञाः।
कां प्रीतिमुत्पादयितुं समर्था अन्धस्य दारा इव दर्शनीयाः॥"
—वसिष्ठधर्मसूत्र, ६.४
धर्मशास्त्रकारों ने सर्वत्र आचार को व्यक्ति के सम्मान, दीर्घ जीवन और सुख का कारण माना है—
"आचारो भूतिजनन आचारः कीर्तिवर्धनः।
आचाराद् वर्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम्॥"
सभी धर्मसूत्रों ने धर्म के स्रोतों के अन्तर्गत शिष्ट लोगों के आचार को भी गिनाया है जैसे—"वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः"। ज्ञान का अपने आप में कोई महत्त्व नहीं। ज्ञान का महत्त्व आचार में परिणत करने पर ही होता है। धर्मसूत्रकारों ने और भारतीय दार्शनिकों ने चिन्तन में समय नहीं गँवाया है, अपितु जीवन को दर्शन के अनुसार ढालने का प्रयत्न किया है। भारतीय संस्कृति में दर्शन और आचार का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध ऐसा ही है जैसे "विज्ञान और प्रयोग का ज्ञान और योग का।" धर्म, दर्शन और नीति एक दूसरे पर निर्भर हैं और एक दूसरे के पूरक हैं। भारतीय धर्म की इसी विशेषता की ओर जॉन केअर्ड ने अपने ग्रन्थ An Introduction to Philosophy of Religion में संकेत किया है।
"Indian Philosophers and thinkers have declared that the philosophy and ethics both are interdependent. There can be no intellectual growth without a morally elevated life. To be a good philosopher a man should be religious, moral and of good conduct."
धर्म अपने सर्वोत्तम रूप में व्यवहार पर अधिक बल देता है धर्म की व्याख्या या परिभाषा साधन मात्र है, साध्य नहीं।
धर्म का उपदेशमात्र पर्याप्त नहीं होता उसका यथार्थ रूप में आचरण महत्त्वपूर्ण है। डॉ० राधाकृष्णन् के शब्दों में—
"Religions, at their best, insist on behaviour more than on belief. Orthodoxy is not confined to the defining of faith. It includes the living of it. Definition is the means and not the end. A vehicle is not more important than the good to which it is to take us. We must live religion in truth and deed and not merely profess it in words."
—( Recovery of Faith. p. 26 )
भारतीय धर्म या दर्शन में नैतिक भावनाओं का केवल प्रतिपादन ही नहीं किया गया है, अपितु उसे वास्तविक जीवन की कसौटी पर कसा गया है। नैतिक विचारों को अभिव्यक्त करते समय तथा उनका विधान करते समय धर्मशास्त्रकार को यह पूर्ण ध्यान है कि मनुष्य में स्वाभाविक दुर्बलता होती है। वह गलतियाँ करता है। धर्मशास्त्रकार मनुष्य की स्वाभाविक दुर्बलता तथा पतनोन्मुख प्रवृत्तियों को नियन्त्रित
[ २१ ]
कर कल्याण एवं श्रेयस के मार्ग की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। मनुष्य के स्वाभाविक प्रवृत्तियों की ओर मनु ने स्पष्ट रूप से संकेत किया है—
"न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने ।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ॥"
गौतम ने भी "दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च महताम् ।" ( १-१-३ ) कह कर मनुष्य की स्वाभाविक दुर्बलता का ही संकेत किया है। महान् पुरुषों ने भी धर्मविरोधी आचरण किये हैं, इसी कारण हिन्दूधर्म में यह भी स्पष्ट कह दिया गया है कि जो भी प्राचीन है वह सभी उत्तम नहीं समझ लेना चाहिए। प्रत्येक नया काव्य भी प्रशंसनीय नहीं हो जाता। बुद्धिमान् व्यक्ति परखकर ही उत्तम वस्तु को ग्रहण करते हैं, किन्तु मूर्ख व्यक्ति दूसरे के कहने के अनुसार ही चलता है—
"पुराणमित्येव न साधु सर्वं
न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते
मूढः परप्रत्ययनेय बुद्धिः॥"
वेद और पुराणों के प्राचीन आख्यानों में तो देवताओं को भी मनुष्य के समान बुराइयों और दुष्कर्मों में लिप्त दिखाया गया है और धर्मसूत्र भी स्पष्ट रूप से कहता है कि महान् व्यक्तियों या देवों के सभी कार्य अनुकरणीय नहीं होते। प्राचीन महापुरुषों में आत्मतेज तथा पुण्य था, इस कारण वे धर्म के विपरीत आचरण करके भी पाप के भागी नहीं हुए, किन्तु मनुष्य की शक्ति सीमित होती है, अतः वह धर्म के विरुद्ध आचरण कर सुख नहीं प्राप्त कर सकता। धर्मशास्त्र की दृष्टि में आचार का इतना अधिक महत्त्व है कि आचारहीन पिता के परित्याग का भी आदेश दिया गया है—
"त्यजेत्पितरं राजघातकं शूद्रयाजकं शूद्रार्थयाजकं वेदविप्लावकं भ्रूणहनं यश्चान्त्यावसायिभिः संवसेदन्त्यावसायिन्यां वा।"—गौतमधर्मसूत्र ३,२,१, पृ० २०७ ।
आचारहीन व्यक्ति के लिए धर्मसूत्र में सामाजिक अपमान का विधान किया गया है। व्यक्ति अपने कर्मों के कारण पतित होता है और पतित व्यक्ति को समाज से बहिष्कृत करने का विधान है। धर्मसूत्र पातक कर्मों से घृणा करता है, पातकी से नहीं, पाप से घृणा करता है पापयुक्त से नहीं। इसी कारण पातक कर्मों से पतित व्यक्ति के लिए प्रायश्चित्त का विधान किया गया है, किन्तु धर्मसूत्र की दृष्टि में जीवन इस लोक तक ही सीमित नहीं है, परलोक में भी या दूसरे जन्म में भी जीवन का क्रम चलता रहता है। इस कारण घोर पातक कर्मों के प्रायश्चित्तस्वरूप शरीर का अन्त कर देने की भी व्यवस्था की गयी है। मनुष्य दूसरे जन्म में पापमुक्त होकर जन्म ग्रहण करता है। पाप और प्रायश्चित्त की धारणा के पीछे आचार के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। धर्मसूत्र में यह माना गया है कि मनुष्य बुरे कर्मों के पाप से सन जाता है—"अथ खल्वयं पुरुषो याप्येन कर्मणा लिप्यते" ( ३,१,२ ) और मनुष्य के कर्म स्थायी फल उत्पन्न करते हैं। पाप कर्म के साधन शरीर और मन हैं। इन दोनों की शुद्धि के लिए ही धर्मसूत्रों में प्रायश्चित्त की व्यवस्था की गयी है। प्रायश्चित्त मन में पश्चात्ताप उत्पन्न