बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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कर धर्म के मार्ग पर प्रवृत्त होने की प्रेरणा देते हैं और शारीरिक यातना भी इसी मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि को तैयार करती है। तप, उपवास, जप और होम धर्म में पुनः आस्था उत्पन्न करने के लिए विहित किये गये हैं। धर्मसूत्रों में एक बात स्पष्ट है, यह यह कि सभी प्रकार के प्रायश्चित्त का लक्ष्य परलोक भी है। धर्मसूत्र लोक के साथ-साथ परलोक से भी अधिक भीत है। यह परलोकभीरुता मनुष्य के आचरण को सही दिशा की ओर प्रेरित करने में आज तक सक्षम बनी हुई है।
कर्म का सिद्धान्त वस्तुतः आचार को गौरव प्रदान करता है। सदाचार से इस लोक में प्रतिष्ठा एवं मृत्यु के बाद भी उत्तम लोक की प्राप्ति होने की घोषणा धर्मसूत्र में बार-बार की गयी है। इसके विपरीत आचारहीन व्यक्ति अपने कर्मफल के कारण यहाँ और परलोक में भी विनष्ट होता है। प्रायश्चित्तों का विधान करते समय धर्मसूत्रों ने स्पष्ट रूप से कर्मफल के ऊपर विचार किया है। कर्मसिद्धान्त मनुष्य को सदैव उत्तम कर्म की प्रेरणा देता है। जीवन के अन्तिम दिनों में भी मनुष्य उत्तम कर्मों का आचरण कर दुष्कर्मों के बुरे परिणामों से बच सकता है और धर्मसूत्र भी प्रायश्चित्तों का विधान कर सदाचार की निरन्तर प्रेरणा देते रहते हैं। कर्म के इस सिद्धान्त की विशेषता का उल्लेख डा० राधाकृष्णन् ने इन शब्दों में किया है—
"The law of Karma encourages the sinner that it is never too late to mend. It does not shut the gates of hope against despair and suffering, guilt and peril." —The Hindu View of Life, p. 76.
बौधायनधर्मसूत्र
बौधायनधर्मसूत्र का सम्बन्ध कृष्णयजुर्वेद से है। जिस प्रकार आपस्तम्ब शाखा के सम्पूर्ण कल्प-साहित्य उपलब्ध है, उसी प्रकार बौधायन के भी सभी प्रकार के सूत्र होने के संकेत मिलते हैं। आपस्तम्ब और हिरण्यकेशी शाखाओं के समान बौधायन का सम्पूर्ण साहित्य इस समय सुरक्षित नहीं है। डॉ० बर्नल ने बौधायन के सूत्रों का संकलन किया है। उनके अनुसार श्रौतसूत्र १९ प्रश्नों में, कर्मान्तसूत्र २० अध्यायों में, द्वैधसूत्र ४ प्रश्नों में, गृह्यसूत्र ४ प्रश्नों में, धर्मसूत्र ४ प्रश्नों में तथा शुल्बसूत्र ३ अध्यायों में है। गृह्यसूत्र के पश्चिम भारतीय संस्करण में ४ के स्थान पर ९ प्रश्न मिलते हैं। बौधायन के श्रौत, कर्मान्त और द्वैधसूत्रों पर भवस्वामी की 'कल्पविवरण' नाम की व्याख्या है। बौधायन के ६ प्रकार के सूत्रों में पारस्परिक क्रम का निर्धारण करना कठिन है। सामान्यतः डॉ० बर्नल द्वारा प्रस्तुत क्रम ही प्रामाणिक माना जाता है। आपस्तम्ब के समान बौधायन के कल्पसूत्रों में भी धर्मसूत्रों का स्थान गृह्यसूत्र के बाद माना जा सकता है। धर्मसूत्र मूलतः कितने प्रश्नों में था इस विषय में विवाद है जिस पर आगे विस्तृत विचार किया जायगा।
बौधायन धर्मसूत्र के रचयिता के विषय में यह उल्लेखनीय है कि स्वयं इस धर्मसूत्र में ही बौधायन के नाम का कई स्थानों पर उल्लेख है और २,५,२७ में ऋषितर्पण के सन्दर्भ में कण्व बौधायन का नाम भी आया है। इससे यह स्पष्ट है कि बौधायन धर्मसूत्र की रचना के पहले कण्व बौधायन नाम के आचार्य हो चुके थे, जो पर्याप्त
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प्राचीन माने जाते थे। धर्मसूत्र में ही कई बार बौधायन का उल्लेख होने से भी यह स्पष्ट है इस धर्मसूत्र का रचयिता कण्व बौधायन का वंशज था। गोविन्दस्वामी ने भी बौधायन को काण्वायन कहा है।
बौधायन के निवासस्थान का निर्धारण करना भी कठिन है। बौधायन शाखा के अनुयायी दक्षिण भारत में मिलते हैं। किन्तु धर्मसूत्र में जो भौगोलिक विवरण मिलते हैं उनके आधार पर बौधायन दक्षिण भारतीय थे यह कहना कठिन है। १. १. २ में दक्षिण और उत्तर के आचारों की भिन्नता का उल्लेख है और दक्षिण भारत के देशों को गिनाया गया है, किन्तु उनसे बौधायन के संबद्ध न होने का ही संकेत अधिक मिलता है। बौ. १. २. ४ में "अथोत्तरतः ऊर्णाविक्रयः शीधुपानमुभयतोदद्भिर्व्यवहारः आयुधीयकं समुद्रसंयानमिति" में समुद्रयात्रा को उत्तरभारतीय विशिष्ट आचारों के अन्तर्गत बताया गया है और २. २. २ में 'समुद्रसंयान' को पतनीय कर्मों में प्रथम बताया गया है। इससे बौधायन का दक्षिण भारतीय होना ही सिद्ध होता है। किन्तु जैसा कि ब्यूह्लर ने लिखा है, बौधायनीय शाखा के दक्षिण भारतीय होने का सर्वाधिक निर्णायक प्रमाण यही है कि आपस्तम्बीय शाखा के समान बौधायनीय शाखा भी दक्षिण भारत में मिलती है।
“But the most conclusive argument in favour of the southern origin of Baudhayaniyas is that they, like the Apastambiyas and all other adherents of the Taittiriya schools are entirely confined to the Dekhan, and are not found among the indigenous subdivisions of the “Brahmanas in Central and Northern India.” (p. 42)
दक्षिण भारत के अनेक राजाओं ने बौधायनीय शाखा के ब्राह्मणों के नाम कई दानपत्र लिखे हैं। इससे भी बौधायनीयों का दक्षिण भारतीय होना सिद्ध होता है। बौधायन धर्मसूत्र की अधिकांश पाण्डुलिपियाँ दक्षिण भारत में ही उपलब्ध होती हैं यह भी बौधायनीय शाखा के दक्षिण भारतीय होने का प्रमाण है। परम्परया माधवाचार्य तथा सायण को बौधायनीय मानते हैं। इससे भी इस शाखा का दक्षिणी होना सिद्ध है।
“Besides, the interesting tradition which asserts that Madhava-Sayana, the great commentator of the Vedas, was a Baudhayaniya is another point which may be brought forward as evidence for the location of the school in southern India.
बौधायन ने समुद्र यात्रा तथा समुद्र के व्यापार पर लगने वाले कर का उल्लेख किया है। इससे उनसे समुद्रतट के प्रदेश और विशेषतः आन्ध्र का निवासी कहा जाता है। उन्होंने तैत्तिरीय आरण्यक के आन्ध्र पाठ का ही उपयोग किया है।
बौधायनधर्मसूत्र में प्रक्षिप्त अंश
बौधायनधर्मसूत्र में विषयवस्तु के विभाजन की जो अस्तव्यस्तता है वह स्पष्टतः इस तथ्य का संकेत करती है कि इसमें बाद के समय में भी समय-समय पर प्रक्षेप
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हुए हैं। यथा, चतुर्थ प्रश्न अपनी शैली के कारण बाद में जोड़ा गया माना जाता है। प्रथम चार अध्यायों में प्रायश्चित्त का विवेचन किया गया है, शेष अध्यायों में सिद्धि-प्राप्ति के उपायों का वर्णन है, जिसके अन्तर्गत गणहोम का वर्णन है। ब्यूह्लर के शब्दों में प्रथम ४ अध्याय अनावश्यक और पिष्टपेषण मात्र है—
“The first part is perfectly superfluous, as the subject of penances has already been discussed in the first sections of the second Prasna, and again in chapters 4–10 of the third Prasna.
सिद्धिविषयक अध्याय भी धर्मसूत्रों के विषय क्षेत्र से परे है। इसकी शैली स्पष्टतः पूर्ववर्ती सम्पूर्ण अंशों से भिन्न है। कण्डिका या खण्ड के स्थान पर अध्यायों में विभाजन भी चतुर्थ प्रश्न के क्षेपक होने का प्रमाण है। चतुर्थ प्रश्न की शैली के विषय में ब्यूह्लर ने उचित ही कहा है—
“The epic sloka nearly throughout replaces the aphoristic prose, and the common slip-shod Sanskrit of the Puranas appears instead of the archaic forms.”
तृतीय और चतुर्थ प्रश्नों में यह समानता है कि प्रश्न का विभाजन केवल अध्याय में है, खण्ड या कण्डिका में नहीं। किन्तु शैली की दृष्टि से तृतीय प्रश्न पहले के दो प्रश्नों के समान है। वस्तुतः तृतीय प्रश्न भी धर्मसूत्र के किसी महत्त्वपूर्ण विषय का विवेचन नहीं करता, अपितु पूर्ववर्ती प्रश्नों में विवेचित विषयों पर ही कुछ अतिरिक्त नियम देता है। इस प्रश्न में दूसरे धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों से लिये गये उद्धरणों की मात्रा भी अधिक है। इसका १० वां अध्याय गौतमधर्मसूत्र से ही उद्धृत है और छठा अध्याय विष्णु-धर्मसूत्र के ४८ वें अध्याय के समकक्ष है। ऐसी स्थिति में कतिपय विद्वानों ने बौधायन धर्मसूत्र को मूलतः दो प्रश्नों का माना है। ब्यूह्लर के शब्दों में—
“These Circumstances justify, it seems to me, the assumption that Baudhayana’s original Dharma-sutra consisted, like Apastamba’s of two Prasnas only, and that it received through followers of his school, two separate additions, first in very ancient times Prasna III, where the style of the master is strictly followed, and later Prasna IV, where the language and phraseology of the metrical Smritis are adopted.”
बौधायन-धर्मसूत्र की शैली
बौधायनधर्मसूत्र की शैली अन्य धर्मसूत्रों की अपेक्षा सरल है। इसमें अक्षरों को बचाने का आग्रह नहीं दिखायी पड़ता। कई स्थलों पर एक सूत्र में बात को न कह कर बौधायन ने दो सूत्रों में उसी अभिप्राय को स्पष्ट किया है। १. ३. १९. “ते ब्राह्मणा-द्यास्त्वकर्मंस्याः” सूत्र की टीका में गोविन्दस्वामी ने भी इस तथ्य की ओर निर्देश किया है कि बौधायनलाघव प्रिय नहीं हैं “सत्यम्, अयं ह्याचार्यो नातीव ग्रन्थलाघवप्रियो भवति ।”
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बौधायनधर्मसूत्र में सभी प्रकार की शैली का प्रयोग है—लम्बे गद्यात्मक अंश, पद्यात्मक अंश, ब्राह्मणग्रन्थों की शैली और छोटे चुस्त सूत्र भी मिलते हैं। "अथाप्यु-दाहरन्ति" कहकर ही उद्धरण दिये गये हैं और उद्धरणों के अन्त में 'इति' का प्रयोग है। 'इति श्रुतिः' द्वारा वैदिक अंशों का निर्देश किया गया है। वैदिक अंशों को 'इति विज्ञायते' द्वारा भी व्यक्त किया गया है—
'साध्वस्त्रिपुरुषमार्षाद् दश दैवाद् दश प्राजापत्याद् दश पूर्वान् दशाऽपरानात्मानं च ब्राह्मीपुत्र इति विज्ञायते।' १. २१. २.
"पर्वसु हि रजः पिशाचाश्चाष्टमीचारवन्तो भवन्तीति विज्ञायते।" १. २१. २१.
प्रथम तथा द्वितीय प्रश्न का विभाजन दो प्रकार से किया गया है—अध्यायों और खण्डों में। प्रथम प्रश्न में ११ अध्याय २१ खण्ड हैं द्वितीयप्रश्न में १० अध्याय १८ खण्ड हैं। तृतीय प्रश्न में १० अध्याय और १० ही खण्ड हैं और इसी प्रकार चतुर्थ प्रश्न में ८ अध्याय और ८ ही खण्ड हैं। इस प्रकार अन्तिम दो प्रश्नों में अध्याय और खण्ड का विभाजन एक ही है। सबसे अधिक अस्तव्यस्तता विषयवस्तु के विभाजन के संबन्ध में है। एक ही विषय का भिन्न-भिन्न अध्यायों में विवेचन है। एक ही स्थल पर सभी नियमों को समाप्त नहीं कर दिया गया है। उदाहरणार्थ, उत्तराधिकार, प्रायश्चित्त, शुद्धि, अनध्याय और पुत्रों के भेद भिन्न-भिन्न स्थलों पर विकीर्ण हैं। इसी संबन्ध में ब्यूहेर ने उचित ही कहा है—
"In other cases we find a certain awkwardness in the distribu-tion of the subject matter, which probably finds its explantion through the fact that Baudhayana fiirst attempted to bring the teaching of the Taittiriyas on the Dharma into a systematic form."
यही नहीं, ऐसे अनेक स्थल हैं जहाँ एक विषय के बीच दूसरे विषय से सम्बद्ध नियमों द्वारा व्यवधान आ जाता है। कुछ सूत्र ऐसे भी हैं जिनका प्रमुख विवेच्य विषय से कोई सम्बन्ध नहीं है।
चौथे प्रश्न की एक प्रमुख विशेषता है पद्यों का बहुत अधिक प्रयोग। शैली की दृष्टि से यह प्रश्न अन्य तीन प्रश्नों से भिन्न है। तीसरे प्रश्न में विष्णुधर्मसूत्र से बहुत कुछ गृहीत है। बौधायनधर्मसूत्र की भाषा प्राचीनता की ओर संकेत करती ह।
बौधायन-धर्मसूत्र का वर्ण्यविषय
बौधायन-धर्मसूत्र चार प्रश्नों में है। अन्तिम प्रश्न को परिशिष्ट माना गया है। प्रश्न का विभाजन अध्यायों और खण्डों में किया गया है। प्रथम प्रश्न में ११ अध्याय और २१ खण्ड हैं। द्वितीय प्रश्न में १० अध्याय और १८ खण्ड हैं। तृतीय प्रश्न में १० अध्याय और १० खण्ड हैं। इस प्रश्न में अध्याय और खण्ड का विभाजन एक-सा ही है। चतुर्थ प्रश्न आठ खण्डों में है। इसमें विषय का विवेचन खण्ड या अध्याय के व्यव-च्छेद से बाधित नहीं होता, अपितु एक ही विवेचन कई अध्यायों में चलता रहता है। कई स्थलों पर विषय का विवेचन क्रमबद्ध नहीं दिखायी पड़ता। ऐसे अनेक स्थल हैं
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जहाँ किसी एक विषय पर कुछ नियम देने के बाद भिन्न विषय का विवेचन करने वाले अध्यायों द्वारा व्यवधान हो गया है और फिर उसी विषय को दुबारा ग्रहण किया गया है। जैसे शुद्धि के नियम प्रथम प्रश्न के पञ्चम अध्याय में विवेचित है और फिर मांसभक्षण के विषय में नियम दिये गये हैं और उसके बाद शुद्धिविषयक नियम पुनः षष्ठ अध्याय में विहित हैं।
बौधायनधर्मसूत्र में प्रतिपादित विषयों को संक्षेप में इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है।
प्रथम प्रश्न—अध्याय १-धर्म, आर्यावर्त, विभिन्न प्रदेशों के आचार, ब्रह्मचर्य तथा उपनयन, अभिवादन के नियम। अध्याय २-शिष्य की योग्यता तथा ब्रह्मचर्य का महत्त्व। ३-स्नातक के कर्त्तव्य। ४-कमण्डलु का महत्त्व। ५-आचमन तथा वस्त्रों एवं पात्रों की शुद्धि, शुद्ध, वस्तुएँ, ब्याज का नियम, आशौच एवं अस्पृश्यता, भक्ष्याभक्ष्य। ६-भूमि एवं पात्र की शुद्धि। ७-यज्ञ के नियम। ८ एवं ९ पत्नी, विवाह, पुत्र के प्रकार। १०-कर का अंश, वर्णधर्म, वर्णानुसार मनुष्य वध का दण्ड, साक्षी की योग्यता। ११-विवाह के भेद और अनध्याय।
द्वितीय प्रश्न—अध्याय १-पातक कर्मों के प्रायश्चित्त, पतनीय कर्म कृच्छ्रव्रत के भेद। २-सम्पत्तिविभाजन तथा पुत्र के भेद, स्त्री की परतन्त्रता एवं स्त्रीधर्म। ३-स्नान, दान एवं भोजन की विधि, निवासयोग्य स्थान एवं पूज्य व्यक्ति। ४-सन्ध्योपासन, गायत्री एवं प्राणायाम। ५-शारीरिक शुद्धि एवं तर्पण। ६-गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यासी के कर्त्तव्य। ७-आत्मज्ञान। ८-श्राद्ध एवं दान की विधि। ९-सन्तानोत्पत्ति का महत्त्व। १०-संन्यास तथा आत्मयज्ञ।
तृतीय प्रश्न—अध्याय १-परिव्राजक के भेद। २-छः प्रकार की जीवनवृत्तियाँ, ३-वानप्रस्थ के भेद। ४-व्रतभङ्ग का प्रायश्चित्त। ५-९-अघमर्षण, यावकव्रत, कूश्माण्ड-होम, चान्द्रायण, अनश्नत्पारायण। १०-प्रायश्चित्त के नियम।
चतुर्थ प्रश्न—अध्याय १-प्रायश्चित्त, कन्यादान का काल, ऋतुगमन का महत्त्व, प्राणायाम। २-भ्रूणहत्या का प्रायश्चित्त, अवकीर्णी का प्रायश्चित्त। ३-रहस्यप्रायश्चित्त। ४-शास्त्रसम्प्रदाय। ५-जप तथा विविध व्रत। ६-प्रायश्चित्त के नियम। ७-धर्मपालन की प्रशंसा। ८-गणहोम।
इस संक्षिप्त विषयसूची से यह स्पष्ट हो जाता है कि बौधायनधर्मसूत्र में किसी एक अध्याय में एक ही प्रकार के विषय का विवेचन न होकर भिन्न-भिन्न प्रकार के विषयों का विवेचन हुआ है जो विषय आपस में पूर्णतः असम्बद्ध हैं अथवा यदि सम्बद्ध हैं भी तो बहुत शिथिल। इस प्रकार किसी एक विशिष्ट विषय से संबद्ध नियम इस धर्मसूत्र के आदि से अन्त तक बिखरे हुए हैं। उदाहरणार्थ—विवाह, पुत्र एवं पत्नीविषयक नियम प्रथम प्रश्न के अध्याय ८ एवं ९ में, द्वितीय प्रश्न के अध्याय २ और ९ में तथा चतुर्थ प्रश्न के प्रथम अध्याय में विवेचित है। बौधायनधर्मसूत्र की अपेक्षा गौतमधर्मसूत्र एवम् आपस्तम्बधर्मसूत्र में वर्णनविषयक क्रमबद्धता अधिक दिखायी पड़ती है।
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बौधायनधर्मसूत्र का रचना-काल
बौधायनधर्मसूत्र निश्चित रूप से गौतमधर्मसूत्र के बाद की रचना है। गौतम के नाम का दो बार उल्लेख तो हुआ ही है उनके धर्मसूत्र के कई सूत्रों को भी बौधायन ने अपने धर्मसूत्र में ग्रहण कर लिया है। आपस्तम्ब और बौधायनधर्मसूत्रों में भी कई स्थानों पर समानता दिखायी पड़ती है। किन्तु यह निर्णय करना कठिन है कि किस धर्मसूत्र ने किससे उद्धरण लिये हैं, क्योंकि यह भी सम्भव है कि बौधायन और आपस्तम्ब ने एक ही स्रोत से इन सूत्रों को ग्रहण किया हो। बौधायन ने कतिपय सूत्रों में जो आपस्तम्ब में भी मिलते हैं 'इति' लगाकर स्पष्टतः उनके उद्धृत होने का संकेत किया है। इससे यह भी प्रतीत होता है कि बौधायन ने ये उद्धरण आपस्तम्ब से ही लिये हों। ब्यूह्लर ने इन समानताओं के आधार पर बौधायन को आपस्तम्ब से पूर्ववर्ती माना है। उनका तर्क यह है कि आपस्तम्ब द्वारा प्रतिपादित मत बौधायन के मतों की अपेक्षा बाद के समय के हैं। आपस्तम्ब ने बौधायन के मतों की आलोचना भी की है। दूसरी ओर आपस्तम्ब को बौधायन से पूर्ववर्ती मानने के पक्ष में भी विद्वानों ने कुछ तर्क प्रस्तुत किये हैं, यथा भाषा और शैली की दृष्टि से आपस्तम्बधर्मसूत्र अधिक अव्यवस्थित है। इसमें शब्दों का प्रयोग भी पुराने अर्थों में किया गया है। महामहोपाध्याय काणे ने इसी तथ्य की ओर निम्नलिखित पंक्तियों में संकेत किया है "यह बात कही जा सकती है कि बौधायन, वसिष्ठ एवं मनु ने किसी एक ही ग्रन्थ से ये बातें ली हों या कालान्तर में इन ग्रन्थों में ये बातें क्षेपक रूप में आ गयी हों। किन्तु क्षेपक छोटा हुआ करता है और यहाँ जो बातें या उद्धरण सम्मिलित हैं, वे बहुत लम्बे-लम्बे हैं।" सामान्यतः बौधायनधर्मसूत्र का समय ई० पू० २००-५०० के बीच माना गया है। ब्यूह्लर ने बौधायनधर्मसूत्र को आपस्तम्ब की अपेक्षा लगभग २०० वर्ष पहले का माना है। यह भी सम्भव है कि ये दोनों रचनाएँ समकालीन हों।
व्याख्याकार गोविन्दस्वामी
बौधायनधर्मसूत्र के व्याख्याकार गोविन्दस्वामी हैं। गोविन्दस्वामी की व्याख्याओं में अनेक स्मृतियों के उद्धरण आये हैं। इससे उनकी विद्वत्ता का स्पष्ट आभास मिलता है। उन्होंने शातातप, शङ्खलिखित महाभाष्य गृत्समद, योगसूत्र, शाबरभाष्य तथा भगवद्गीता से भी उद्धरण दिये हैं। उपनिषदों के अतिरिक्त श्रौतसूत्रों के भी उद्धरण इनके भाष्य में आये हैं। उन्हें सम्पूर्ण धर्मशास्त्र-साहित्य का ज्ञान है। अपनी व्याख्या में उन्होंने सूत्रों में उद्धृत मन्त्रों के सन्दर्भ का भी निर्देश दिया है। प्रस्तुत विषयों पर दूसरे धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों पर के जो उद्धरण उन्होंने दिये हैं, उससे धर्मशास्त्र के तुलनात्मक अध्ययन की दृष्टि से उनकी व्याख्या का महत्त्व और बढ़ गया है।
बौधायनधर्मसूत्र के संस्करण
सर्वप्रथम १८८४ ई० में डॉ० हूत्स ने लाइपत्सिंग से बौधायनधर्मसूत्र प्रकाशित किया। मैसूर से इसका एक संस्करण १९०७ ई० में प्रकाशित हुआ। इस संस्करण में गोविन्दस्वामी की 'विवरण' नाम की टीका का समावेश है। इसका अँग्रेजी अनुवाद ब्यूह्लर ने किया है, जो सेक्रेड बुक्स ऑफ दि ईस्ट सीरिज भाग-१४ में प्रकाशित है।
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वाराणसी से १९३४ में चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस ने भी गोविन्दस्वामी की टीका के साथ इसे प्रकाशित किया है।
बौधायनधर्मसूत्र तथा गौतमधर्मसूत्र
बौधायनधर्मसूत्र गौतमधर्मसूत्र के बाद के समय की रचना है। इसका सबल प्रमाण यही है कि बौधायनधर्मसूत्र में गौतम के मत का उल्लेख है। उदाहरणार्थ दक्षिण तथा उत्तर के विशिष्ट आचारों का उल्लेख कर बौधायनधर्मसूत्र में यह मत प्रतिपादित किया गया है कि जिस प्रदेश में जो आचार प्रचलित हैं वे प्रामाणिक हैं, किन्तु इसके विरोध में गौतम का मत उद्धृत किया गया है—
‘मिथ्यैतदिति गौतमः’ १.२.७.
ब्राह्मण के लिए क्षत्रिय वर्ण का कर्म उचित है या नहीं इस सम्बन्ध में भी गौतम का मत उद्धृत किया गया है—
‘नेतिगौतमोऽप्युग्रो हि क्षत्रधर्मो ब्राह्मणस्य’ २. ४. १७.
बौधायन ने गौतमधर्मसूत्र के १९ वें अध्याय के अनेक सूत्रों को उधार ले लिया है। इन सूत्रों की समानता द्रष्टव्य है—
| बौधायन ३. १० | गौतम ३. १ |
|---|---|
| उक्तो वर्णधर्मश्चाश्रमधर्मश्च ॥ १ ॥ | उक्तो वर्णधर्मश्चाऽऽश्रमधर्मश्च ॥ |
| अथ खल्वयं पुरुषो याप्येन कर्मणा ॥२॥ | अथ खल्वयं पुरुषो याप्येन कर्मणा लिप्यते...॥ २ ॥ |
| तत्र प्रायश्चित्तं कुर्यान्न कुर्यादिति ॥३॥ | तत्र प्रायश्चित्तं कुर्यान्न कुर्यादिति मीमांसन्ते ॥ ३ ॥ |
| न हि कर्म क्षीयते इति ॥ ५ ॥<br>कुर्यात्स्वेव ॥ ६ ॥<br>पुनस्तोमेन यजेत पुनस्सवनमायन्तीति विज्ञायते ॥ ७ ॥ | न हि कर्म क्षीयत इति ॥ ५ ॥<br>कुर्यादित्यपरम् ॥ ६ ॥<br>पुनः स्तोमेनेष्ट्वा पुनः सवनमायान्तीति विज्ञायते ॥ ७ ॥ |
| सर्वं पाप्मानं तरति, तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजत इति ॥ ८ ॥<br>अग्निष्टुता वाऽभिशस्यमानो यजेतेति च ॥ ९ ॥ | तरति सर्वं पाप्मानं तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजते ॥ ९ ॥<br>अग्निष्टुतामभिशस्यमानं याजयेदिति च ॥ |
| तस्य निष्क्रयणानि जपस्तपो होम उपवास दानम् ॥ १० ॥ | तस्य निष्क्रयणानि जपस्तपो होम उपवासो दानम् ॥ ११ ॥ |
| उपनिषदो वेदादयो वेदान्ताः सर्वच्छन्दस्सु संहिता मधून्यघमर्पणमथर्वशिरसो रुद्राः पुरुषसूक्तं महादिवाकीर्त्यं ज्येष्ठसाम्नामन्यतमं बर्हिष्यवमानं कूष्माण्ड्यः पावमान्यः सावित्री चेति पावनानि ॥११॥ | उपनिषदो वेदान्तः सर्वच्छन्दस्सु... कूष्माण्डानि...चेति पावनानि ॥ १२ ॥ |
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| बौधायन ३. १० | गौतम ३. १ |
|---|---|
| उपसन्न्यायेन पयोव्रतता शाकभक्षता फलभक्षता मूलभक्षता प्रसृतयावको··· ॥१२॥ | पयोव्रता शाकभक्षता फलभक्षता प्रसृतयावको हिरण्यप्राशनं घृतप्राशनं सोमपानमिति मेध्यानि ॥ १३ ॥ |
| सर्वे शिलोञ्चयाः सर्वाःस्रवन्त्यः सरितः पुण्याह्रदास्तीर्थान्यृषिनिकेतनानि गोष्ठक्षेत्र-परिक्वन्दा इति देशाः ॥ १३ ॥ | सर्वे शिलोञ्चयाः सर्वाः स्रवन्त्यः पुण्या ह्रदास्तीर्थान्यृषिनिवासा गोष्ठपरिकस्कन्धा इति देशाः ॥ १४ ॥ |
| अहिंसा सत्यमस्तेन्यं सवनेषूदको-पस्पर्शनं गुरुशुश्रूषा ब्रह्मचर्यमधश्शयन-मेकवस्त्रताऽनाशक इति तपांसि ॥ १४ ॥ | ब्रह्मचर्यं सत्यवचनं सवनेषूदकोस्पर्शन-मार्द्रवस्त्रताऽधः शयिताऽनाशक इति तपांसि ॥ १५ ॥ |
| हिरण्यं गौर्वासोऽश्वो भूमितिला घृतमन्नमिति देयानि ॥ १५ ॥ | हिरण्यं गौवासोश्वोभूमस्तिला घृत-मन्नमिति देयानीति ॥ १६ ॥ |
| संवत्सरः षण्मासाश्चत्वारस्त्रयो द्वावेक-श्चतुर्विंशत्यहो द्वादशाहष्षडहस्त्र्यहोऽहो-रात्रमेकाह इति कालाः ॥ १६ ॥ | संवत्सरः षण्मासाश्चत्वारस्त्रयो वा द्वौ वौकश्चतुर्विंशत्यहो द्वादशाह षडहस्त्र्यहोऽहो रात्र इति कालाः ॥ १७ ॥ |
| एतान्यनादेशे क्रियेरन्नेनस्सु गुरुषु गुरूणि लघुषु लघूनि ॥ १७ ॥ | एतान्येवानादेशे विकल्पनेन क्रियेरन् ॥ |
| कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ चान्द्रायणमिति सर्व-प्रायश्चित्तिः सर्वप्रायश्चित्तिः ॥ १८ ॥ | कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ चान्द्रायणमिति सर्व-प्रायश्चित्तं सर्वप्रायश्चित्तम् ॥ २० ॥ |
उपर्युक्त सूत्रों की समानता से यह स्पष्ट है कि बौधायन ने गौतम के सूत्रों को प्रायः ज्यों-के-त्यों ग्रहण कर लिया है और समूचा अध्याय उद्धृत कर दिया है, केवल दो ही सूत्र छूट गये हैं और सूत्रों में एकाध शब्दों का ही अन्तर दिखायी पड़ता है।
इसके अतिरिक्त 'बौधायनधर्मसूत्र' के २. ११. १७ से २३ तक के सूत्र गौतमधर्मसूत्र १. ३. २५–३४ तक के सूत्रों से मिलते-जुलते हैं —
| गौतम १. ३ | बौधायन २. ११ |
|---|---|
| वैखानसो वने मूलफलाशी तपः-शीलः ॥ २५ ॥<br>श्रावणकेनाग्निमाधाय ॥ २६ ॥<br>अग्राम्यभोजी ॥ २७ ॥<br>देवपितृमनुष्यभूतर्षिपूजकः ॥ २८ ॥<br>सर्वातिथिः प्रतिषिद्धवर्जम् ॥ २९ ॥<br>भैक्षमप्युपयुञ्जीत ॥ ३० ॥<br>न फलकृष्टमधितिष्ठेत् ॥ ३१ ॥<br>ग्रामं च न प्रविशेत् ॥ ३२ ॥<br>जटिलश्चीराजिनवासाः ॥ ३३ ॥<br>नातिसंवत्सरं भुञ्जीत ॥ ३४ ॥ | वैखानसो वने मूलफलाशी तपःशीलः सवनेषूदसमुपस्पृशञ्श्रामणकेनाग्निमाधायाऽग्राम्यभोजी देवपितृभूतमनुष्यर्षिपूजकः सर्वातिथिः प्रतिषिद्धवर्जं भैक्षमप्युपयुञ्जीत न फालकृष्टमधितिष्ठेद् ग्रामं च न प्रविशेज-टिलश्चीराजिनवासा नातिसंवत्सरं भुञ्जीत ॥ १७ ॥ |
इसी प्रकार गौतम १. ३. ३५ तथा बौधायन २. ११. २९ में समानता है।
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गौतम—‘ऐकाश्रम्यं त्वाचार्याः प्रत्यक्षविधानाद् गार्हस्थ्यस्य।’ बौधा० ‘ऐकाश्रम्यं त्वाचार्या अप्रजननत्वादितरेषाम् ॥’
उपर्युक्त दोनों समानताओं का उल्लेख करते हुए ब्यूह्लर ने अपने बौधायनधर्मसूत्र के अनुवाद की भूमिका में लिखा है —
"The almost literal identity of the first long passage makes it not improbable that Baudhayana borrowed in this instance also from Gautama without noting the source from which he drew"
किन्तु चूंकि ब्यूह्लर का यह मत है कि मूलतः बौधायनधर्मसूत्र में दो ही प्रश्न थे अतः वे तृतीय प्रश्न के ऊपर उद्धृत १०वें अध्याय को गौतम से लिया गया नहीं मानते—
"On the other hand the argument drawn from the fact that the tenth Adhyaya of Prasna III has been taken from Gautama's Sutra loses its face since, as I have shown above it is improbable that the third Prasna formed part of Baudhayana's original work"
बौधायनधर्मसूत्र तथा आपस्तम्बधर्मसूत्र
बौधायनधर्मसूत्र को आपस्तम्बधर्मसूत्र से पहले की रचना मानते हैं। बौधायन के अनेक सूत्र आपस्तम्ब में मिल जाते हैं।
उदाहरणार्थ—
| बौधायन २. १. २ | आपस्तम्ब १. २९ |
|---|---|
| अथ पतितास्समवाय धर्मांश्चरेयुरितरेतरयाजका इतरेतराध्यापका मिथो विवहमानाः पुत्रान् सन्निष्पाद्य ब्रूयुर्विप्रव्रजताऽस्मत्त एवमार्यान् सम्प्रतिपत्स्यथेति । अथापि न सेन्द्रियः पतति । तदेतेन वेदितव्यमङ्गहीनोऽपि हि साङ्गं जनयतीति ॥ १० ॥ | अथाभिशस्ताः समवसाय चरेयुर्धर्म्यमिति मांशित्येतरेतरयाजका इतरेतराध्यापका मिथो विवहमानाः ॥ ८ ॥<br><br>पुत्रान् सन्निष्पाद्य ब्रूयुर्विप्रव्रजताऽस्मदेवं ह्वास्मत्स्वार्थामिम्प्रश्यत्यस्यतेति ॥ ९ ॥<br><br>अथापि न सेन्द्रियः पतति ॥ १० ॥<br><br>तदेतेन वेदितव्यमङ्गहीनोऽपि साङ्गं जनयति ॥ ११ ॥ |
| मिथ्यैतदिति हारीतो दधिधानीसधर्माः स्त्रियस्त्युर्यो हि दधिधान्यामप्रयतं पय आतञ्च्य मन्थति न तच्छिष्टा धर्मकृत्येषूपयोजयन्ति । एवमशुचि शुक्लं यन्निर्वर्तते न तेन सह सम्प्रयोगो विद्यते ॥ ११ ॥ | मिथ्यैतदिति हारीतः ॥ १२ ॥<br><br>दधिधानीसधर्मा स्त्री भवति ॥ १३ ॥<br><br>यो हि दधिधान्यामप्रयतं पय आतञ्च्य मन्थति न तेन धर्मकृत्यं क्रियेत एवमशुचि शुक्लं यन्निर्वर्तते न तेन सह सम्प्रयोगो विद्यते ॥ १४ ॥ |
| १. २. ३. ४० नाप्सु श्लघमानस्स्नायात् ।<br>४१. दण्ड इव प्लवेत् । | १. २. ३० नाप्सु श्लाघमानः स्नायाद्यदि स्नायाद्दण्डवत् प्लवेत् ॥ |
| बौधायन २. १. २ | आपस्तम्ब १. २९ |
|---|---|
| १. २. ३. ३९ धावन्तमनुधावेद्गच्छ-न्तमनुगच्छेत्तिष्ठन्तमनुतिष्ठेत् । | १. ६. ८ गच्छन्तमनुगच्छेत् ।<br>९. धावन्तमनुधावेत् । |
| १. १५. २० नाऽप्रोक्षितमप्रपन्नं क्लिन्नं काष्ठं समिधं चाऽग्न्यादध्यात् । | १. १५. १२ नाऽप्रोक्षितमिन्धनमग्नावा-दध्यात् । |
| १. २१. १ यथायुक्तो विवाहस्तथायुक्ता प्रजा भवतीति विज्ञायते । | २. १२. ४ यथायुक्तो विवाहस्तथायुक्ता भवति । |
| १. २१. ८ स्तनयित्नुवर्षाविद्युत्सन्निपाते त्र्यहमनध्यायोऽन्यत्र वर्षाकालात् । | १. ११. २३ विद्युतस्तनयित्नुर्वृष्टिश्चा-पतौ यत्र सन्निपतेयुस्त्र्यहमनध्यायः । |
| २. २. ३ चतुर्थकाल' न्दकाम्यवायी त्रिभिर्वर्षै स्तदपहन्ति पापम् । | १. २७. ११ उदकाभ्यवायी त्रिभिर्वर्षैस्त-दपहन्ति पापम् । |
| २. २. ९ तेषां तु निर्वेषो द्वादशमासान् द्वादशाऽर्धमासान् द्वादश द्वादशाहान् द्वादश षडहान् द्वादश त्र्यहान् द्वादशाहं षडहं त्र्यहमहोरात्रमेकाहमिति यथाकर्मभ्यासः । | १. २९ १७ पतनीयवृत्तिस्त्वशुचिकराणां द्वादश मासान् द्वादशार्धमासान् द्वादश द्वादशाहान् द्वादश सप्ताहान् द्वादश त्र्यहान् द्वादशं द्वयहान् द्वादशाहे सप्ताहं त्र्यहं द्व्य-हमेकाहम् ।<br>१८. इत्यशुचिकरानिर्वेषो यथा कर्मा-भ्यासः । |
| २. ३. ३४-३५ इदानीमहमीर्ष्यामि स्त्रीणां जनक नो पुरा यतो यमस्य मदने जनयितुः पुत्रमब्रुवन् । रेतोधाः पुत्रं नयति परेत्य यमसादने । तस्माद्भार्यां रक्षन्ति बिभ्यन्तः पररेतसः । | २. १३. ६ इदानीमेवाहं जनकः स्त्रीणा-मीर्ष्यामि नो पुरा यदा यमस्य सादने जनयितुः पुत्रमब्रुवन् रेतोधाः पुत्रं नयति परेत्य यमसादने । तस्माद्भार्यां रक्षन्ति बिभ्यन्तः पररेतसः ॥ |
| २. १४. २ त्रिमधुस्त्रिणाचिकेतस्त्रिसुपर्ण-पञ्चाग्निश्चषडङ्गविच्छीर्षकोज्येष्ठसामिक स्स्ना-तक इति पङ्क्तिपावनाः । | २. १७. २२ त्रिमधुस्त्रिसुपर्णस्त्रिणाचि-केतचतुर्मेधः पञ्चाग्निज्येष्ठसामिको वेदाध्या-य्यनूचानपुत्रः पङ्क्तिपावना भवन्ति । |
बौधायनधर्मसूत्र आपस्तम्ब से पूर्ववर्ती है, इसका एक प्रबल प्रमाण यह है कि आपस्तम्ब ने बौधायन के कई मतों की आलोचना की है। यद्यपि आपस्तम्ब बौधायन के नाम का उल्लेख नहीं करते, तथापि आपस्तम्ब द्वारा उपदिष्ट विचार बौधायन के विचारों की अपेक्षा अधिक अर्वाचीन और विकसित हैं। उदाहरणार्थ, पुत्र के उत्तरा-धिकार के विषय में बौधायन ने जो मत व्यक्त किये हैं उसकी आलोचना आपस्तम्ब ने की है। नियोग के सम्बन्ध में भी बौधायन का मत आपस्तम्ब की अपेक्षा अधिक प्राचीन है। विवाह का विवेचन करते हुए बौधायन ने सभी भेदों का उल्लेख किया है, किन्तु आपस्तम्ब ने पैशाचविवाह को अत्यन्त गर्हित समझकर उसका उल्लेख नहीं किया है।
बौधायनधर्मसूत्र और आपस्तम्बधर्म की तुलना के आधार पर ब्यूह्लर ने आपस्तम्ब को परवर्ती माना है—
[ ३२ ]
'The three points which have been just discussed, viz. the identity of a number of Sutras in the works of the two authors, the fact that the Apastampa advocates on some points more refined or puritan opinions, and that he labours to controvert doctrine contained in Baudhayana's sturas, give a powerful support to the traditional statement that he is younger than that teacher."
बौधायनधर्मसूत्र तथा वसिष्ठधर्मसूत्र
बौधायनधर्मसूत्र वसिष्ठ के धर्मसूत्र से, जिसे प्रायः धर्मशास्त्र नाम से अभिहित किया जाता है, पूर्ववर्ती है। इन दोनों धर्मसूत्रों में भी ऐसे अनेक सूत्र मिल जाते हैं जिनमें स्पष्टतः समानता है।
यथा—
| बौधायन | वसिष्ठ |
|---|---|
| १. २१. १५ द्वयमु ह वै सुश्रवसोऽनूचानस्य रेतो ब्राह्मणस्योर्ध्वं नामेरघस्तादन्यत् स यदूर्ध्वं नामेस्तेन हैतद् प्रजायते यद् ब्राह्मणानुपनेयति यदध्यापयति यथाजयति यत्साधु करोति सर्वाऽस्यैषा प्रजा भवति अथ यदवाचीनं नामेस्तेन हास्यौरसी प्रजा भवति तस्माच्छ्रोत्रियमनूचानमप्रजोऽसीति न वदन्ति। | २. ५ तथाप्युदाहरन्ति द्वयमुह वै पुरुषस्य रेतो ब्राह्मणस्योर्ध्वं नामेरघस्तादवाचीनमन्यत्तद्यदूर्ध्वंनाभेस्तेन हैतत्प्रजा जायते यद् ब्राह्मणानुपनेयति यदध्यापयति यद्याजयतियत्साधुकरोति। अथ यदवाचीनं नामेस्तेन हास्यौरसी प्रजा जायते। तस्माच्छ्रोत्रियमनूचानमप्रजोसीति न वदन्तीति। |
| २. ३. ३६ अप्रमत्ता रक्षथ तन्तुमेतं मा वः क्षेत्रे परबीजानि वप्सुः। जनयितुः पुत्रो भवति साम्पराये मोघं वेत्ता कुरुते तन्तुमेतमिति। | १७. ९ अप्रमत्ता रक्षथ तन्तुमेतं मा वः क्षेत्रे परबीजानि वाप्सुः। जनयितुः पुत्रो भवति सांपराये मोघं वेत्ता कुरुते तन्तुमेतमिति॥ |
| २. १३. १८ अथाप्युदाहरन्ति अष्टौ ग्रासा मुनेर्भक्ष्याः षोडशारण्यवासिनः। द्वात्रिंशतं गृहस्थस्याऽपरिमितं ब्रह्मचारिणः। | ६. २० अष्टौ ग्रासा मुनेर्भक्तं वानप्रस्थस्य षोडश। द्वात्रिंशत्तु गृहस्थस्यापरिमितं ब्रह्मचारिणः॥ |
| २. ११. ९ आहिताग्निरनड्वांश्च ब्रह्मचारी च ते त्रयः। अश्नन्त एव सिद्ध्यन्ति नैषां सिद्धिरनश्नतामिति॥ | ६. २१ आहिताग्निरनड्वां |
इन समानताओं से यह स्पष्ट है कि वसिष्ठधर्मसूत्र ने बौधायनधर्मसूत्र से उद्धरण लिये हैं अथवा बौधायन के सूत्रों का अनुकरण किया है।
बौधायनधर्मसूत्र में प्राचीन वाङ्मय
बौधायनधर्मसूत्र में सभी वेदों का नामतः उल्लेख किया गया है। यथा—
"ऋचो यजूंषि-समानीति भाद्धस्य महिमा।" २. १४. ४
[ ३३ ]
"विज्ञायते च—परिमिता वा ऋचः परिमितानि सामानि परिमितानि यजूंष्यथै- तस्यैवाऽन्तो नाऽस्ति यद्ब्रह्म तत्प्रतिगृणत आचक्षीत स प्रतिगर इति ।" २. १८. २८
"उपनिषदो वेदादयो वेदान्ताः सर्व्वच्छन्दस्सु संहिता मधून्यघमर्षणमथर्वशिरो रुद्राः पुरुषसूक्तं राजनरौहिणे सामनी बृहद्रथन्तरे पुरुषगतिमहानाम्यो महावैराजं महादिवा- कीर्त्यं ज्येष्ठसाम्नामन्यतमं बहिष्पवमानं कूश्माण्डयः पावमान्यः सावित्री चेति पावनानि ।" ३. १०. ११
ऋग्वेद संहिता के कई मन्त्र बौधायनधर्मसूत्र में उद्धृत हैं। सबसे अधिक संख्या तैत्तिरीयसंहिता से उद्धृत मन्त्रों की है। यथा—
बौ० २. १७. १८ समिद्धती अर्थात् तै० सं० १.५.३.२ का संकेत ।
बौ० २. १७. २५ में 'भवतं नस्समनसौ' तै० सं० १. ३. ७ का २. १७. २६ में “या ते अग्ने यज्ञिया तनू' तै० सं० ६. ३. १०. १ का, बौ० २. १७. ३२ में तैत्तिरीयसंहिता के मन्त्रों 'सखा मे गोपाय' 'यदस्य पारे रजसः' 'येन देवा पवित्रेण', 'येन देवा ज्योतिषोर्ध्वा उदायन्' के उद्धरण आये हैं।
बौ० २. १८. ७ में तै० सं० का 'ब्रह्म जज्ञानम्' ( ४. २. ८. २ ) मन्त्र उद्धृत है।
बौ० ३. १. ११ में तैत्तिरीयसंहिता के मन्त्र 'वास्तोष्पते ! प्रतिजानीह्यस्मे' तथा "वास्तोष्पते शग्मया संसदा ते" उद्धृत है। तैत्तिरीयसंहिता का ही ३. ४. ११. २ मानस्तोकीय मन्त्र भी उद्धृत है। बौ० ३. २. ६
इस प्रकार के अनेक उद्धरण इस धर्मसूत्र में उपलब्ध हैं। ब्राह्मण ग्रंथों के अन्तर्गत भी विशेषतः तैत्तिरीय ब्राह्मण के ही उद्धरण इस धर्मसूत्र में आये हैं। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३. १२. ९ के भाव को बौधायन २. १७. ८ में निम्नलिखित रूप में अभिव्यक्त किया गया है—
"एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्। तस्यैवाऽऽत्मा पदवित्तं विदित्वा न कर्मणा लिप्यते पापकेनेति ।"
बौधायन २. १७. ३२ में भी तैत्तिरीय ब्राह्मण का उद्धरण है—"येन देवाः पवि- त्रेणाऽऽत्मानं पुनते सदा । तेन सहस्रधारेण पावमान्यः पुनन्तु मा ॥"
तै० ब्रा० ३. ७. ३ के अर्थ को बौधायन १. ६. २ में अभिव्यक्त किया गया है—
छागस्य दक्षिणे कर्णे पाणौ विप्रस्य दक्षिणे ।
अप्सु चैव कुशस्तम्बे पावकः परिपण्यते ॥
तैत्तिरीय ब्राह्मण १२. ३९ बौधायन २. ११. ३४ में उद्धृत है—'स यत् ब्रूयात्— येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः पिता पुत्रेण पितृमान् योनियोनौ। नाऽवेदविन्मनुते तं बृहन्तं सर्वानुभुमात्मानं साम्पराये इति ।'
तैत्तिरीय ब्राह्मण २. ८. ८३ को ही बौ० २. १३. २ "केवलाघो भवति केवलादी। मोघमन्नं विदन्ते इति ।" में व्यक्त किया गया है।
तैत्तिरीय आरण्यक से भी अनेक उद्धरण इस सूत्र में उपलब्ध हैं। बौ० १. २. १३ का "गङ्गायमुनयोरन्तरमित्येके" तैत्तिरीयारण्यक प्र० २ के "गङ्गायमुनयोर्मुनिभ्यः नमः"
३ बौ० मू०
[ ३४ ]
की ओर संकेत करता है। तैत्तिरीय आरण्यक १०. १. १२ की ऋचा का उद्धरण बौ० २. ८. ३ में दिया गया है।
अन्य ब्राह्मणग्रन्थों के अन्तर्गत शतपथब्राह्मण से भी एक उद्धरण बौ. २. ११. ८ में है 'तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मयज्ञस्य वागेव जुहूर्मन उपभृच्चक्षुर्ध्रुवा मेधा स्रुवः सत्यमवभृथ-स्स्वर्गोलोक उदयनम्।'
गोपथब्राह्मण १. २. ६ का उद्धरण बौ० १. ४. ४ में द्रष्टव्य है—
'ब्रह्म वै मृत्यवे प्रजाः प्रायच्छत् तस्मै ब्रह्मचारिणमेव न प्रायच्छत्सोऽब्रवीदस्तु मह्यम-प्येतस्मिन् भाग इति यामेव रात्रिं समिधं नाऽऽहराता इति।'
आपस्तम्बयज्ञपरिभाषा के मन्त्रों को १. १७. १ में उद्धृत किया गया है।
इस प्रकार बौधायनधर्मसूत्र में श्रुति के प्रायः सभी अङ्गों के उद्धरण मिलते हैं।
प्राचीन आचार्यों के उल्लेख
बौधायन ने दूसरे धर्मसूत्रकारों और आचार्यों के उल्लेख भी किये हैं। बौ० १. २१. ४ में कश्यप के विचार का निर्देश है—
'क्रीता द्रव्येण या नारी सा न पत्नी विधीयते।
सा न दैवे न सा पित्र्ये दासीं तां कश्यपोऽब्रवीत्॥
इसी प्रकार हारीत के मत का निर्देश बौ० २. २. ११ में किया गया है : 'मिथ्यैतदिति हारीतः।'
औपजङ्घनि के विचार भी २. ३. ३३-३४ में अभिव्यक्त हैं। गौतम के मतों का भी इस धर्मसूत्र में दो बार उल्लेख है। प्रथमतः उत्तर और दक्षिण की प्रथाओं के सन्दर्भ में गौतम के इस मत को उद्धृत किया गया है कि देश में प्रचलन के आधार पर नियम प्रामाणिक नहीं होते। बौ० २. ४-१७ में भी गौतम का मत उद्धृत है—
'नेति गौतमोऽप्युग्रो हि क्षत्रधर्मो ब्राह्मणस्य।'
गौतम के धर्मसूत्र से कई स्थानों पर बौधायन ने उद्धरण भी लिये हैं। जनक के नाम का उल्लेख भी इस सूत्र में हुआ है, और इसमें स्वयं बौधायन के नाम का उल्लेख कई स्थानों पर किया गया है जैसे १. ७. १६ में 'अपि वा प्रतिशौचमामणिबन्धाच्छुद्धिरिति बौधायनः।' तथा
१. ७. ९ 'यदिच्छुद्धर्मसन्ततिमिति बौधायनः तथा १. ५. १३ 'एतेन विधिना प्रजापतेः परमेष्ठिनः परमर्षयः परमां काष्ठां गच्छन्तीति बौधायनः।'
आचार्य मौद्गल्य के मत का उल्लेख भी विधवा स्त्री के धर्म के सन्दर्भ में किया गया है, बौ. २. ४. ८ और कम अवस्था वाले ऋत्विक् आदि के अभिवादन के सन्दर्भ में कात्य का मत भी बौ. १. ३. ४७ में उद्धृत है।
बौधायनधर्मसूत्र और स्मृतिग्रन्थ
बौधायनधर्मसूत्र में मनुस्मृति और याज्ञवल्क्यस्मृति के अनेक पद्यों और पद्यों के भावों को व्यक्त किया गया है। विशेषतः मनुस्मृति से तो बहुत से पद्यों को ज्यों के त्यों ले लिया गया है। बौ० १. ८. १८ में निम्नलिखित सूत्र मनु से उद्धरण ही है—
[ ३५ ]
अथाप्युदाहरन्ति— गताभिर्हृदयं विप्रः कण्ठगाभिः क्षत्रियश्शुचिः । वैश्योऽद्भिः प्राशिताभिस्स्यात् स्त्रीशूद्रौ स्पृश्य चान्तत इति ॥ इसी प्रकार बौ० १. ८. २० का सूत्र मनु ५. १९ के समान ही है। अथाप्युदाहरन्ति दन्तवद्दन्तलग्नेषु यच्चाऽप्यन्तर्मुखे भवेत् । आचान्तस्याऽवशिष्टं स्यान्निगिरन्नेव तच्छुचिरिति ॥ बौधायन० दन्तवद्दन्तलग्नेषु जिह्वास्पर्शे शुचिर्न तु । परिच्युतेषु यत्स्थानान् निगिरन्नेव तच्छुचिः ॥ मनु०
बौ० १. ९. १ का 'नित्यं शुद्धः कारुहस्तः पण्यं यच्च प्रसारितम्' भी मनु ५. १२९ के समान है।
बौ० १. ९. २ 'वत्सः प्रस्नवने मेध्यः शकुनिः फलशातने' भी मनु ५. ११० के समान है।
बौधा० १. ९. ९ 'त्रीणि देवाः पवित्राणि ब्राह्मणानाममकल्पयन्' मनु ५. १२७ की ही अनुकृति है। १. ९. १० आपः पवित्रं भूमिगताः गोतृप्तिर्यासु जायते' भी मनु ५. १२८ के तुल्य है।
बौ० १. १०. २५ 'गोरक्षकान् वाणिजकान् तथा कारुकुशीलवान्' भी मनु० ८. १०२ का अनुकरण है। बौ० १०. २९ मनुस्मृति ३. ६३-६६ के तुल्य है। बौ० १. १८. १२ अध्यापकं कुले जातं यो हन्यादाततायिनम् । न तेन भ्रूणहा भवति मन्युस्तं मन्युमृच्छतीति ॥ मनुस्मृति ८. ३५०-३५१ से उद्धृत है।
बौधायनधर्मसूत्र में उद्धृत गाथा
बौधायनधर्मसूत्र में गीत और गाथाएँ भी उद्धृत हैं। २. ५. १८ में अङ्गगीत के दो श्लोक उद्धृत हैं—
'यो मामदत्त्वा पितृदेवताभ्यो भृत्यातिथीनां च सुहृज्जनस्य । सम्पन्नमश्नन्विषमत्ति मोहात्तमद्ममहं तस्य च मृत्युरस्मि ॥ हुताग्निहोत्रः कृतवैश्वदेवः पूज्यातिथीन् भृत्यजना- वशिष्टम् । तुष्टश्शुचिश्श्रद्दधदत्ति यो मां तस्याऽमृतं स्यां स च मां भुनक्तीति ॥
उशना और वृषपर्वा की पुत्रियों की गाथा भी बौ० २. ४. २६-२७ में उद्धृत है—
'स्तुवतो दुहिता त्वं वैयाचतः प्रतिगृह्णतः । अथाऽहं स्तूयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः ॥
बौ० २. ७. १५ के प्रजापतिगीतश्लोक भी उद्धरणयोग्य हैं—
अपि चाऽत्र प्रजापतिगीतौ श्लोकौ भवतः— अनागतां तु ये पूर्वामनतीतां तु पश्चिमाम् । सन्ध्यां नोपासते विप्राः कथं ते ब्राह्मणास्मृताः ॥ सायं प्रातस्सदा सन्ध्यां ते विप्रा नो उपासते । कामं तान् धार्मिको राजा शूद्रकर्मंसु योजयेदिति ॥
[ ३६ ]
इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि बौधायन के समय बहुत से नीतिविषयक श्लोक, जो संभवतः स्मृतिग्रन्थों के अङ्ग थे, प्रचलित थे ।
बौधायनधर्मसूत्र में भौगोलिक उल्लेख
बौधायनधर्मसूत्र में कतिपय भौगोलिक उल्लेख भी महत्त्वपूर्ण हैं । उदाहरण के लिए इस धर्मसूत्र को दक्षिण भारत और उत्तर भारत की प्रथाओं और आचार में भेद का स्पष्ट ज्ञान है । १२ में कहा गया है ।
"पञ्चधा विप्रतिपत्तिर्दक्षिणतस्तथोत्तरतः" दक्षिण और उत्तर की सीमा स्पष्ट करते हुए व्याख्याकार गोविन्दस्वामी ने लिखा है : "दक्षिणेन नर्मदामुत्तरेण कन्यातीर्थम् । उत्तरस्तु दक्षिणेन हिमवन्तमुदग्विन्ध्यस्य ।"
शिष्टों के देश अथवा आर्यावर्त की सीमा बौ० १. २. १० में बतायी गयी है— "प्रागदर्शनात् प्रत्यक्कालकवनाद्दक्षिणेन हिमवन्तमुदक्पारियात्रमेतदार्यावर्तं तस्मिन् य आचारस्स प्रमाणम् ।"
अर्थात् सरस्वती नदी के लुप्त होने के स्थान से पूर्व की ओर कालकवन नाम के वन से पश्चिम, हिमालय पर्वत से दक्षिण का और परियात्र पर्वत के उत्तर का भूभाग आर्यावर्त है ।
बौ० १. २. ११ के अनुसार गङ्गा और यमुना नदियों के बीच के प्रदेश को ही कुछ आचार्यों के मतानुसार आर्यावर्त बताया गया है—"गङ्गायमुनयोरन्तरमित्येके ।"
इसी सन्दर्भ में भाल्लविशाखा में प्रचलित एक गाथा का भी उद्धरण दिया गया है—
"पश्चात् सिन्धुर्विसरणी सूर्यस्योदयनं पुरः ।
यावत् कृष्णो विधावति तावद्धि ब्रह्मवर्चसमिति ॥ बौ० १. २. १३
पश्चिम में लुप्त होने वाली नदी, पूर्व में सूर्य के उदय का स्थान—इसके बीच जहां तक कृष्णमृग पाया जाता है, वहाँ तक ब्रह्मतेज भी पाया जाता है ।
बौधायन ने कई प्रदेशों को भी उल्लिखित किया है । सङ्कीर्णयोनि अथवा मिश्रित उत्पत्ति वाले प्रदेशों को गिनाते हुए उन्होंने निम्नलिखित प्रदेशों का उल्लेख किया है—
अवन्तयोऽङ्गमगधाः सुराष्ट्रा दक्षिणापथाः ।
उपावृत्सिन्धुसौवीरा एते सङ्कीर्णयोनयः ॥
अवन्ति, अङ्ग, मगध, सुराष्ट्र, दक्षिणापथ, उपावृत्, सिन्धु और सौवीर—ये सङ्कीर्ण-योनि प्रदेश हैं । इसी प्रकार आरह्य, कारस्कर, पुण्ड्र, सौवीर, वङ्ग, कलिङ्ग, प्रानून की यात्रा को दोषपूर्ण मानते हुए पुनस्तोम या सर्वपृष्ठा इष्टि करने का विधान निम्नलिखित सूत्र में है—
"आरट्टान् कारस्करान् पुण्ड्रान् सौवीरान्, वङ्गान् कलिङ्गान् प्रानूनानिति च गत्वा पुनस्तोमेन यजेत सर्वपृष्ठया वा ।” बौ० १. २. १५ कलिङ्ग प्रदेश के प्रति बौधायन में
[ ३७ ]
अधिक तिरस्कार झलकता है। कलिङ्ग की यात्रा का पाप वैश्वानरी इष्टि करने पर ही दूर होता है—
पद्भ्यां स कुरुते पापं यः कलिङ्गान् प्रपद्यते ।
ऋषयो निष्कृतिं तस्य प्राहुर्वैश्वानरं हविः ॥ बौ० १. २. १६
प्रस्तुत संस्करण
यह संस्करण पहली बार हिन्दी अनुवाद के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है। चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस ने बौधायनधर्मसूत्र का प्रथम संस्करण १९३४ ई० में प्रकाशित किया था। प्रथम संस्करण का सम्पादन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के तत्कालीन प्रधान मीमांसाध्यापक पंडितप्रवर श्रीचिन्नस्वामी शास्त्री ने किया था। उन्होंने चार मूल पुस्तकों के संस्करण के आधार पर अत्यन्त श्रमपूर्वक चौखम्बा संस्करण सम्पादित किया। इस ग्रन्थ को उन्होंने मैसूर संस्करण को संशोधित कर अधिक प्रामाणिक रूप प्रदान किया। अपने "किञ्चित् प्रास्ताविकम्" शीर्षक प्रथम संस्करण के प्राक्कथन में उन्होंने उन स्थलों का निर्देश किया है, जहाँ, मैसूर संस्करण में संशोधन किया गया है। श्रीचिन्नस्वामी शास्त्री द्वारा सम्पादित प्रथम संस्करण के अन्त में गोविन्दस्वामी की व्याख्या विवरण में उद्धृत दूसरे ग्रन्थों के वाक्यों का निर्देश 'स्वस्थाननिर्देशिनी सूची' के अन्तर्गत किया गया था। उस सूची को प्रस्तुत संस्करण में भी स्थान दिया गया है। गोविन्दस्वामी के विषय में अध्ययन करने के लिए यह सूची उपयोगी सिद्ध हो सकती है। प्रथम संस्करण के अन्त में बौधायन-धर्मसूत्र के सूत्रों में आये हुए प्रत्येक पद की सूची प्रकाशित थी। उसके स्थान पर प्रस्तुत द्वितीय संस्करण में सूत्रों में आये हुए नामों और विषयों की अनुक्रमणिका दी गयी है जो अनुसन्धाताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।
इस संस्करण में सूत्रों का सरल और स्पष्ट हिन्दी अनुवाद देने के साथ-साथ प्रायः टिप्पणियों द्वारा सूत्रार्थ को पूर्णतः स्पष्ट कर दिया गया है। प्रस्तावना में बौधायन-धर्मसूत्र की रचना तथा प्रत्येक पक्ष पर विचार किया गया है। धर्मसूत्र साहित्य तथा भारतीय धर्म की विशेषताओं पर भी प्रकाश डाला गया है।
धर्मसूत्रों का यह संस्करण प्रस्तुत करते हुए मैं इसी आशा से प्रेरित हूँ कि भारतीय धर्म का नये सन्दर्भों में मूल्याङ्कन और व्यावहारिक जीवन में विनियोग आधुनिक मानव जीवन को सन्त्रास से उबार कर व्यवस्था और शान्ति के पथ पर पहुँचा सकता है।
$$\text{—}\textbf{उमेशचन्द्र पाण्डेय}$$
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किञ्चित् प्रास्ताविकम्
इदमधुना भगवद्बौधायनमहर्षिप्रणीतं धर्मसूत्रं श्रीगोविन्दस्वामिरचितेन विवरणेन साकं मुद्राप्य प्रकाशं नीयते । ग्रन्थोऽयमितः पूर्वं Leipzig नगरे 1848. ई० वर्षे, महीशूरपुरे १६०५ ई० वर्षे १६०९ ई० वर्षे पुण्यपत्तने च मुद्रितः । अतश्चतुर्थमिदं मुद्रणमास्माकीनम् । तत्र प्राथमिकं तार्तीयीकं मुद्रणं च मूलमात्रविश्रान्तमिति न तेन व्याख्याकांक्षाऽपनीता । द्वितीयेन तु मुद्रणेन साऽपनीता यद्यपि, तथाऽपि तत् संस्करणमिदानीमनुपलब्धिगोचरतामनुभवति । अतस्तदुद्धरणाय प्रवृत्तः श्रीमान् चौखम्बाग्रन्थमालाधिपः अस्माननुरुरोधाऽस्य पुनस्संस्करणाय । अत्र च प्रवृत्तैरस्माभिरधोनिर्दिष्टान्यादर्शपुस्तकान्यासादितानि—
( मूलपुस्तकानि )
( अ ) मदीयमेव मद्रपुरे ग्रन्थाक्षरमुद्रितमेकं मूलमात्रम् ।
( आ ) लवपुरीयसंस्कृतपुस्तकभवनाध्यक्षैः श्रीभगवद्दत्तशास्त्रिभिस्सादरं प्रहितं ग्रन्थाक्षरलेखितमपरं तादृशमेव ।
( इ ) लिप्सिग्नगरे नागराक्षरैर्मुद्रितं मूलमात्रम् ।
( ई ) पूनानगरे अष्टाविंशतिस्मृत्यन्तर्गतत्वेन मुद्रितमेकम् ।
( व्याख्यानपुस्तकानि )
( क ) श्रौतिकुलतिलकभूतानां मणक्काल् श्रीमुद्दुदीक्षितमहोदयानां पुस्तकं नवीनं अशुद्धप्रायं ग्रन्थाक्षरलेखितम् ।
( ख ) तेषामेव प्राचीनतरं शुद्धप्रायं आदौ किञ्चित् खण्डितं च ।
( ग ) श्रीभगवद्दत्तशास्त्रिमहोदयैरेव प्रेषितं ग्रन्थाक्षरलेखितं शुद्धंसमग्रं च ।
( घ ) श्रीकल्याणसुन्दरशास्त्रिमहोदयानां महीशूरपुरमुद्रितम् ।
( ङ ) तदेव काशिकसरस्वतीभवनतः प्राप्तम् ,
इति व्याख्यादर्शपुस्तकानि । एवं चतुःप्रकाराणि मूलादर्शपुस्तकानि चतुर्विधानि व्याख्यादर्शपुस्तकानि चाऽवलम्ब्य शोधितोऽयं यथामति ।
तत्र महीशूरपुरमुद्रितं पुस्तकमादर्शपञ्चकमवलम्ब्य शोधितमपि सर्वेषामादर्शानामैकरूप्येणाऽशुद्धबहुलतया च स्थितत्वात् तदपि तथैवाऽशुद्धिपूरितमेव सन्मनस्तुदति स्मैव महासनसामपिसुमनसाम् । तत्र च परिचयार्थमधः काश्चनाऽशुद्धयः प्रदर्श्यन्ते—
[ ४० ]
| मैसूरपुस्तकपाठः | शोधितोऽस्मत्पुस्तकपाठः |
|---|---|
| ( १ ) खङ्गे तु विषदन्तः पृ० ६६. पं० ५. | ( १ ) खड्गे तु विवदन्ते चौ. सं. ६५. ४. |
| ( २ ) एकाशौचे तद्द्रष्टव्यम् पृ० १०५. पं० १३. | ( २ ) एकाग्नौ चैतद्द्रष्टव्यम् ७७. ११. |
| ( ३ ) अस्थिसंस्रावहोमादि पृ० १०७. पं० १४. | ( ३ ) मन्थिसंस्रावहोमादि ७६. ५. |
| ( ४ ) अप्याचमनं तीर्थं क इह प्रवोच इत्यनेन पथा प्रविशेत्तैर्मतस्य पृ० १०६. पं० ८. | ( ४ ) आप्रान तीर्थं क इह प्रवोचद्येन पथा प्रपिवन्ते सुतस्य पृ० ८१. पं० ५. |
| ( ५ ) स्वापराधनिमित्ते तु मरणादेशं वक्तुमिति पृ० १४५ पं० ३. | ( ५ ) स्वापराधनिमित्ते तु मरणे नेदं युक्तमिति पृ० १२७. पं० १४. |
| ( ६ ) सत्सुअन्येषु देवरेषु, द्वितीयोऽवरश्च पत्युर्भूतः पृ० १६३. पं० ४. | ( ६ ) तत्सुतेषु देवरो द्वितीयो वरः। स पत्युर्भाता। पृ० १३८. पं० २० |
| ( ७ ) तथा दाररक्षणमप्युक्तम् पृ० २५५. पं० ६. | ( ७ ) तथा दत्तेणाऽप्युक्तम् पृ० १८५. पं० ६. |
| ( ८ ) अपि तु अदन्तदंशननिन्दैषा पृ० २६३. पं० १७. | ( ८ ) अस्ति तु। तस्माद् ( अतो ) नशननिन्दैषा पृ० १६०. पं० १६ |
| ( ६ ) अत औपवसन्तीत्यौपवसम्। ते न तत्सन्निकर्षे पृ० २८२ पं० ४. | ( ६ ) तेनौपासनाग्निकेनाऽपि तत्सन्निकाशे (तत्सन्निकर्षे) पृ० २०५. पं० ३. |
एवमनन्विता असम्बद्धाः पंक्तीर्बहुशोऽवलोक्याऽस्माकं प्रवृत्तिरुत्तेजिता। पुनर्मुद्रणेऽस्य बभूव। तत्र च 'ग'चिह्नितं पुस्तकमस्माकं शोधने महोपकारायोऽकल्पत इति तत्प्रेषयित्रेव प्रथममर्हति धन्यवादम्।
पुस्तकेऽत्र शोधनादौ यश्च यावांश्च परिश्रमः कृतोऽस्माभिः स विदुषां पुरतस्तिष्ठत्येव। अत्र हि टिप्पणी विषमस्थलविवेचिनी मीमांसापदार्थतत्त्वावेदिनिका लघ्वी काचन संयोजिता। सूत्रगृहीतप्रतीकानां मन्त्राणामनुवाकानां च सामग्रथं टिप्पण्यां प्रायेण सम्पादितम्। व्याख्योद्धृतानां प्रमाणवाक्यानामाकरो ग्रन्थान्ते प्रदर्शितः। पदसूच्यपि काचित् महीशूरपुस्तकविलक्षणा निर्मिता ग्रन्थान्ते संयोजिता च। किञ्चाऽत्र कृतो विभागः प्रश्नखण्डसूत्ररूपात्मना विशेषता ध्यानमर्हति। अयं हि भागो धर्मसूत्रात्मकः अदसीयगृह्ये चतुर्दशादिसप्तदशान्तप्रभतया परिगणितः। गृह्ये तु प्रश्नखण्डसुत्रात्मना विभागः कृतः यद्यपि तत्र क्वचित् प्रश्नेषु अध्यायविभागोऽपि दृश्यते, तथाऽपि न स सर्वत्र,
[ ४१ ]
खण्डविभागस्तु सर्वत्राऽनुगतः । अतोऽत्र धर्मसूत्रेऽपि खण्डविभागेनैव भाव्यम् । अत एव देशान्तरमुद्रितमूलपुस्तके ग्रन्थाक्षरमुद्रितमूलपुस्तके च खण्डविभाग एव प्राधान्येनाऽऽहृतः । अध्यायविभागस्तु गौणतया । हस्तलिखितमूलपुस्तके तु अध्यायविभागस्सर्वथा परित्यक्तः । अतो लिखितमुद्रितमूलपुस्तकापलभ्यमान एव खण्डादिविभागे प्राचीनतां सूत्रकाराभिमततामौचितीं च मन्वानैस्तत्संरक्षणे बद्धादरैस्स एव विभागस्समाहृतः । व्याख्यानुरोधात्तु अध्यायविभागोऽपि कृतः । स तु परं न प्रधानया, न वा सूत्रसम्बन्धेन । महीशूरपुस्तके गृह्यसूत्रेऽप्यध्यायविभागमवलम्ब्य खण्डविभागस्सर्वथा परित्यक्तस्सोऽध्येतृशिष्टपरम्पराविरोधी । पदसूच्यपि तामेवरीतिमनुसरत्यत्र ।
एवमत्र संस्करणेऽध्ययनाध्यापनादौ पूर्वसंस्करणापेक्षया विशेषोपकारमभिलषता मया परिश्रान्तम् । साफल्यं परं प्राप्तं मया न वेति विद्वन्मनांस्येव निकषोपलाः ।
अत्र च यैः पण्डितप्रवरैः पुस्तकालयाध्यक्षैरन्यैश्चाऽस्मन्निकटं पुस्तकानि प्रेषितानि सानुकम्पं स्थापितानि च यावच्छोधनसमाप्ति स्वपुस्तकालयनियमोल्लङ्घनमस्माकीनं सोढ्वाऽपि, तेषामातृण्यमशक्नुवन् सम्पादयितुं केवलं कृतज्ञतामाविष्करोमि पुनः पुनः ।
शोधनादिकार्ये सूचीनिर्माणादौ च यदस्मत्प्रियशिष्येण हिन्दूविश्वविद्यालये पूर्वमीमांसायास्सहायाध्यापकेन श्रीपट्टाभिरामशर्मणा मीमांसाचार्येण, अन्यैश्च शिष्यवरैः सुबहु परिश्रान्तमुपकृतं च, तत् सर्वथा प्रशंसनीयम् । अतस्तानाशीर्वचोभिरभिपूरयामि ।
सूत्रकारस्याऽस्य कालनिर्णयविषये आपस्तम्बाद्यपेक्षया पौर्वापर्यविषयादौ च यन्मया विचारितं यथामति, तदवसरे सति समनन्तरमेव निरूपयिष्यामि । अन्ततो विबुधवरानधीतिनश्च सानुनयमभ्यर्थये—ग्रन्थमिमं यथावदुपयुज्य सफलयन्तु मदीयं परिश्रमं प्रकाशयितुर्तुलमुत्साहं, वर्धयन्तु च तमाशीर्भिः पुनःपुनरेतादृशकार्यकरणे सर्वाङ्गीणसाहाय्यप्राप्तये इति—
| वाराणसी हनुमद्घट्टः <br> मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी <br> वि० सं० १९९१ | सुधीजनविधेयः <br> चिन्नस्वामिशास्त्री <br> ( महामहोपाध्यायः ) |
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