भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
चिकित्सा ] भाषाटीकासहित । १२०७
नीलोत्पलं शारिवे द्वे चन्दनं रजनीद्वयम् ।
कार्षिकैः पयसा तुल्यं त्रिगुणं त्रिफलारसम् ॥
घृतप्रस्थं पचेदेतत्सर्वनेत्ररुजापहम् ॥ ७७ ॥
२-त्रिफला, त्रिकुटा, दाख, मुलहठी, कुटकी, पुण्डेरिया, छोटी इलायची, वाय-विडङ्ग, नागकेशर, नीलकमल, उसवा, अनन्तमूल, लालचन्दन, हल्दी और दारु-हल्दी, इन प्रत्येक औषधियोंका कल्क, एक एक कर्ष, दूध एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ और त्रिफलेका क्वाथ तीन प्रस्थ लेवे। सबको एकत्र मिलाकर यथाविधि घृत-को सिद्ध करे। यह घृत सर्व प्रकारके नेत्ररोगोंको दूर करता है ॥ ७६ ॥ ७७ ॥
तिमिरं दोषमास्रावं कामलां काचमर्बुदम् ।
विसर्पं प्रदरं कण्डूं रक्तं श्वयथुमेव च ॥ ७८ ॥
खालित्यं पलितं चैव केशानां पतनं तथा ।
विषमजवरमर्म्माणि शुक्रं चाशु व्यपोहति ॥ ७९ ॥
अन्ये च बहवो रोगा नेत्रजा ये च वर्त्मजाः ।
तान्सर्वानाशयत्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ १८० ॥
न चैतस्मात्परं किञ्चिदृषिभिः कश्यपादिभिः ।
दृष्टिप्रसादनं दृष्टं यथा स्यात्त्रैफलं घृतम् ॥ ८१ ॥
इसके सेवनसे तिमिररोग, स्राव होना, कामला, काच, अर्बुद, विसर्प प्रदर, खुजली, रक्तविकार, सूजन, खालित्य, पलित, केशोंका गिरना, विषम-ज्वर, अर्म और शुक्र आदि रोग तत्काल नाश होते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य अनेकों प्रकारके नेत्र तथा वर्त्मजन्य रोगोंको यह घृत इस भाँति नष्ट करता है, जिस प्रकार सूर्य अन्धकारसमूहको तत्क्षण नष्ट करदेते हैं। कश्यपादि ऋषियोंने कहा है कि, दृष्टिको प्रसन्न करनेवाली इस त्रिफलाघृतसे बढकर अन्य औषधि नहीं है ॥ १७८-१८१ ॥
महात्रिफलाद्यघृत ।
त्रिफलाया रसप्रस्थं प्रस्थं भृङ्गरसस्य च ।
वृषस्य च रसप्रस्थं शतावर्याश्च तत्समम् ॥ ८२ ॥
अजाक्षीरं गुडूच्याश्च आमलक्या रसं तथा ।
प्रस्थं प्रस्थं समाहृत्य सर्वैरेभिर्घृतं पचेत् ॥ ८३ ॥
१२०८ भैषज्यरत्नावली । [ नेत्ररोग-
कल्कः कणा सिता द्राक्षा त्रिफला नीलमुत्पलम् ।
मधुकं क्षीरकाकोली मधुपर्णी निदिग्धिका ॥ ८४ ॥
तत्साधु सिद्धं विज्ञाय शुभे भाण्डे निधापयेत् ।
ऊर्ध्वपानमधःपानं मध्ये पानं च शस्यते ॥ ८५ ॥
त्रिफलेका क्वाथ १ प्रस्थ, भाँगरेका रस, १ प्रस्थ, अडूसेका रस १ प्रस्थ, शतावरका रस १ प्रस्थ, बकरीका दूध १ प्रस्थ, गिलोयका रस १ प्रस्थ और आमलौंका रस १ प्रस्थ लेवे। सबको एकत्रकर इनमें एक प्रस्थ घी तथा पीपल, चीनी, दाख, त्रिफला, नीलकमल, मुलहठी, क्षीरकाकोली, गिलोय, कटेरी, इनके समान भाग मिलित कल्कको एक सेर डालकर यत्नपूर्वक घृतको पकावे । जब अच्छे प्रकार पककर, सिद्ध होजाय तब उसको उतारकर उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे । इस घृतको भोजन करनेसे पहले, मध्यमें और अन्तमें पान करना चाहिये ॥ ८२-८५ ॥
यावन्तो नेत्ररोगास्तान् पानादेवापकर्षति ।
रक्तजे रक्तदुष्टे च रक्ते चातिस्रुतेऽपि च ॥ ८६ ॥
नक्तान्ध्ये तिमिरे काचे नीलिकापटलार्बुदे ।
अभिष्यन्देऽधिमन्थे च पक्ष्मकोपे च दारुणे ॥ ८७ ॥
नेत्ररोगेषु सर्वेषु वातपित्तकफेषु च ।
अदृष्टिं मन्ददृष्टिं च कफवातप्रदूषिताम् ॥ ८८ ॥
स्रवतो वातपित्ताभ्यां सकण्डूवासन्नदूरदृक् ।
गृध्रदृष्टिकरं सद्यो बलवर्णाग्निवर्धनम् ॥
सर्वनेत्रामयं हन्यात्त्रिफलाद्यं महद् घृतम् ॥ ८९ ॥
यह घृत नेत्रसंबंधी जितने रोग हैं उन सबको पान करतेही नष्ट करदेता है । रक्तज नेत्ररोग, दूषितरक्त, रक्तस्राव, रतौंधा, तिमिर, काच, नीलिका, पटल, अर्बुद, अभिष्यन्द, अधिमन्थ, दारुण पक्ष्मरोग, वातज, पित्तज और कफजादि सर्व प्रकार के चक्षुरोगोंमें यह घृत विशेष उपयोगी है तथा अन्धता, मन्ददृष्टि, कफ और वातसे दूषित दृष्टि, नेत्रस्राव, वातपित्तजन्य खुजली और समीपवर्ती वस्तुका दूर दीखना इत्यादि विकारोंको दूर करके तत्काल गिद्धकीसी दृष्टि करदेता है । इससे बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है । यह महात्रिफलाद्यघृत सर्वप्रकारके नेत्ररोगों को नष्ट करता है ॥ ८६-८९ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२०९
नृपवल्लभतैल और घृत ।
जीवकर्षभकौ मेदे द्राक्षांशुमती निदिग्धिकाबृहती ।
मधुकं बला विडङ्गं मञ्जिष्ठा शर्करा रास्ना ॥ ९० ॥
नीलोत्पलं श्वदंष्ट्रा प्रपौण्डरीकं पुनर्नवा लवणम् ।
पिप्पल्यः सर्वेषां भागैरक्षांशिकैः पिष्टैः ॥ ९१ ॥
तैलं यदि वा सर्पिर्दत्त्वा क्षीरं चतुर्गुणं पक्वम् ।
आत्रेयनिर्मितमिदं तैलं नृपवल्लभं सिद्धम् ॥ ९२ ॥
जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, दाख, शालपर्णी, कटेरी, बडी कटेरी, मुलहठी, खिरेंटी, वायविडङ्ग, मंजीठ, चीनी, रास्ना, नीलकमल, गोखुरू, पुण्डेरिया, पुनर्नवा, सेंधानमक और पीपल इन सबको छः छः तोले लेकर एकत्र कूटपीसकर कल्क बनालेवे । इस कल्कके साथ तिलका तेल अथवा घी एक प्रस्थ और दूध चार प्रस्थ मिलाकर उत्तम प्रकार पकावे । इस नृपवल्लभ तेलको श्रीमान् आत्रेयजीने निर्माण किया है ॥ ९०–९२ ॥
तिमिरं पटलं काचं नक्तान्ध्यं चार्बुदं दिवान्ध्यं च ।
श्वेतं च लिङ्गनाशं नाशयति च नीलिकां व्यङ्गम् ॥९३॥
मुखनासादौर्गन्ध्यं पलितं चाकालजं हनुस्तम्भम् ।
श्वासं कासं शोषं हिक्कां तथाऽत्ययं नेत्रे ॥ ९४ ॥
मुखजैह्वचमूर्ध्वभेदं रोगं बाहुग्रहं शिरस्तम्भम् ।
रोगानथोर्ध्वजत्रोः सर्वानचिरेण नाशयति ॥ ९५ ॥
पक्तव्यं कुडवं तैलं नस्यार्थं नृपवल्लभम् ।
अक्षांशैः पाणिकैः कल्कैरन्यैर्भृङ्गादितैलवत् ॥ ९६ ॥
सिद्धफलमिदम् ।
यह तेल या घी तिमिर, पटल, काच, नक्तान्ध्य, अर्बुद, दिवान्ध्य, श्वेत, लिङ्गनाश, नीलिका, व्यङ्ग, मुख और नाककी दुर्गन्धि, असमय बालोंका पकना, हनुस्तम्भ, श्वास, खाँसी, शोष, हिचकी, नेत्रोंमें अन्धकार दीखना, मुख और जीभके रोग, ऊर्ध्वभेदरोग, बाहुस्तम्भ, शिरस्तम्भ, ऊर्ध्वजत्रु एवं अन्यान्य सम्पूर्ण रोगोंको तत्काल नष्ट करता है । इस तेलको नस्यके लिये एक कुडव परिमाण लेकर पकावे, अक्षांशके कहनेसे कल्ककी प्रत्येक औषधि चार चार मासे लेवे ।
| १२१० | भैषज्यरत्नावली । | [ नेत्ररोग- |
|---|
शेष विधि भृङ्गराजादितैलकी समान करनी चाहिये । यह शीघ्र सिद्धफलकों देनेवाला है ॥ ९३–९६ ॥
भृङ्गराजतैल ।
भृङ्गराजरसप्रस्थे यष्टीमधुपलेन च ।
तैलस्य कुडवं पक्वं सद्यो दृष्टिं प्रसाद्येत् ॥
नस्याद्वलीपलीतघ्नं मासेनैतन्न संशयः ॥ ९७ ॥
भाँगरेके एक प्रस्थ रसमें मुलहठीका कल्क चार तोले और तिलका तैल एक कुडव ( १६ तोले ) डालकर विधिपूर्वक पकावे । इस तेलकी नास लेनेसे वली और पलितरोग एक मासमें ही निस्सन्देह नष्ट होजाते हैं तथा दृष्टिशक्ति प्रसन्न होती है ॥ ९७ ॥
नेत्ररोगमें पथ्य ।
आश्चयोतनं लंघनमञ्जनं च स्वेदो विरेकः प्रतिसारणं च ।
प्रपूरणं नस्यमसृग्विमोक्षः शस्त्रक्रिया लेपनमाज्यपानम् ॥ ९८॥
सेको मनोनिर्वृतिरङ्घ्रिपूजा मुद्गा यवा लोहितशालयश्च ।
लावो मयूरो वनकुक्कुटश्च कूर्मः कुलिङ्गोऽपि कपिञ्जलश्च ॥ ९९॥
कौम्भं हविर्वन्यकुलत्थयूषः पेया विलेपी लशुनं पटोलम् ।
वार्त्ताकुकर्कोटककारवेल्लं नवीनमोचं नवमूलकं च ॥ २०० ॥
पुनर्नवामार्कवकाकमाचीपत्चूरशाकानि कुमारिका च ।
द्राक्षा च कुस्तुम्बुरु माणिमन्थं लोध्रं वराक्षौद्रमुपानहश्च २०१
नारीपयश्चन्दनमिन्दुखण्डं तिक्तानि सर्वाणि लघूनि चापि ।
विजानता पथ्यमिदं प्रयुक्तं यथामलं नेत्रगदान्निहन्ति २०२ ॥
आश्च्योतन ( नेत्रोंमें औषधि टपकाना ), लंघन करना, अञ्जन आँजना, स्वेद, विरेचन, प्रतिसारण, नेत्रोंमें औषधि भरना, नस्य, रक्तमोक्षण, शस्त्र-कर्म, प्रलेप, घृतपान, परिषेचन, मनकी स्थिरता, दोनों पैरोंको जलसे धोकर और पोछकर साफ रखना, मूँग, जो लालशालिके चावल, लवा, मोर, जङ्गली मुर्गा, कछुआ, केंकडा और कपिञ्जल आदि जीवोंका मांस, पुराना घी, वन-कुलथीका यूष, पेया, विलेपी, लहसुन, परवल, बैंगन, ककोडे, करेला, केलेका नया मोचा, कच्ची मूली, पुनर्नवा, भाँगरा, मकोय, शान्तिशाक, घीग्वार, दाख, धनियाँ, सेंधानमक, लोध, त्रिफला, शहद, खडाऊँ पहनना, स्त्रीका
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२११
दूध लाल चन्दन, कपूर, सर्वप्रकारके तीखे और हल्के पदार्थ ये सब क्रियायें अन्नपान और औषधियें यथादोषानुसार सेवन करनेसे समस्त नेत्ररोगोंको नष्ट करती हैं ॥ ९८-२०२ ॥
नेत्ररोगमें अपथ्य ।
क्रोधं शुचं मैथुनमश्रुवायुविण्मूत्रनिद्रावमिवेगरोधान् । सूक्ष्मेक्षणं दन्तविघर्षणं च स्नानं निशाभोजनमातपं च ॥ ३॥ द्रवं रजोधूमनिषेवणं च दृक्स्वेदनं चापि विरुद्धमन्नम् । प्रजल्पनं छर्द्दनमम्बुपानं मधूकपुष्पं दधि पत्रशाकम् ॥ ४ ॥ कालिन्दपिण्याकविरूढकानि मत्स्यं सुरां मांसमजाङ्गलं च । ताम्बूलमम्लं लवणं विदाहि तीक्ष्णं कटूष्णं गुरु चान्नपानम् । नरो न सेवेत हिताभिलाषी रोगेषु सर्वेषु दृगाश्रयेषु ॥२०५॥
क्रोध शोक, स्त्रीप्रसङ्ग, आँसू, अपानवायु, मल, मूत्र, निद्रा, और वमन इनके वेगोंको रोकना, बहुत सूक्ष्म वस्तुको देखना, दन्तमञ्जन करना, स्नान, रात्रिमें भोजन, धूपका सेवन, पतले पदार्थ, धूल और धुएँका सेवन, नेत्रोंको स्वेद देना, विरुद्ध अन्न-पान, बहुत बोलना, वमन करना, अधिक जल पान, महुएके फूल, दही, पत्तोंवाले शाक, तरबूज, तिलकुट, जिसमें अंकुर निकल आये हों ऐसे अन्न, मछली, मदिरा, जङ्गलीजीवोंके अतिरिक्त अन्य प्राणियोंका मांस, ताम्बूल, खटाई या खट्टे पदार्थ, नमकीन, दाहकारक, तीक्ष्ण चरपरे गरम और गुरुपाकी अन्न और पानीय द्रव्य इन सबको हितकी अभिलाषा करनेवाला नेत्ररोगी सर्वप्रकारके नेत्ररोगोंमें कदापि सेवन न करे ॥ ३-२०५ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां नेत्ररोगचिकित्सा ।
शिरोरोगकी चिकित्सा ।
वातिके शिरसो रोगे स्नेहस्वेदान्सनावनान् । पानान्नमुपनाहांश्च कुर्याद्वातामयापहान् ॥१॥
वातज शिरोरोगमें तेलादिस्नेहद्रव्योंकी मालिश, वातहर द्रव्योंके द्वारा सेक नस्य और वातनाशक अन्न पान एवं प्रलेपादि उपचार करने चाहिये ॥ १ ॥
| १२१२ | भैषज्यरत्नावली । | [शिरोरोग- |
|---|
कुष्ठमेरण्डमूलं च लेपात्काञ्जिकयोजितम् ।
शिरोऽर्त्तिं नाशयत्याशु पुष्पं वा मुचुकुन्दजम् ॥ २ ॥
कूठ और अण्डकी जडको काँजीके साथ पीसकर लेप करनेसे अथवा मुचुकुन्दकें फूलोंको पीसकर लेप करनेसे शिरकी पीडा तत्काल दूर होती है ॥ २ ॥
पैत्ते घृतं पयः सेकाः शीतलेपाः सनावनाः ।
जीवनीयानि सर्पींषि पानान्नं चापि पित्तनुत् ॥ ३ ॥
पित्तज शिरोरोगमें घी और दूधका पान, शीतल द्रव्योंद्वारा सेचन, शीतल द्रव्यों का लेप, नस्य, जीवनीयगणोक्त औषधियोंके द्वारा सिद्धकियाहुआ घृतपान और पित्तनाशक अन्न-पान प्रयोग करने चाहिये ॥ ३ ॥
कफजे लङ्घनं स्वेदो रूक्षोष्णैः पाचनात्मकैः ।
तीक्ष्णावपीडधूमाश्च तीक्ष्णाश्च कवलग्रहाः ॥ ४ ॥
कफज शिरोरोगमें लङ्घन, रूक्ष और उष्ण द्रव्योंसे परिषेक, दशमूलादिपाचन तीक्ष्णद्रव्योंद्वारा नस्य, धूम और कवल धारण करना चाहिये ॥ ४ ॥
सूर्यावर्त्तकी चिकित्सा ।
सूर्यावर्त्तभवं बीजं तद्रसेन सुपेषितम् ।
वेदनानाशनो लेपः सूर्यावर्त्तार्द्धभेदयोः ॥ ५ ॥
हुरहुरके बीजोंको हुरहुरके पत्तोंके रसमें पीसकर लेप करनेसे सूर्यावर्त्त और अर्द्धावभेदक शिरोरोगकी वेदना नष्ट होती है ॥ ५ ॥
सूर्यावर्त्ते विधातव्यं नस्यकर्म्मादिभेषजम् ।
पाययेत्सगुडं सर्पिर्घृतपूरांश्च भोजयेत् ॥ ६ ॥
सूर्यावर्त्तरोगमें औषधियोंका नस्य देकर गुड मिलाहुआ घृत पान करें और घीसे भरेहुए मालपुओंको भक्षण करे ॥ ६ ॥
सूर्यावर्त्ते शिरोवेधो नावनं क्षीरसर्पिषा ।
हितः क्षीरघृताभ्यांसस्ताभ्यां चैव विरेचनम् ॥ ७ ॥
सूर्यावर्त्तनामक शिरोरोगमें शिराको वेधना, दूधमेंसे निकलेहुए मक्खनद्वारा नास लेना, दूध और घीको पीना एवं दुग्ध, घृतके साथ ही शिरोविरेचक औषधि देकर नस्य प्रयोग करना हितकारी है ॥ ७ ॥
दशमूलीकषायैस्तु सर्पिः सैन्धवसंयुक्तम् ।
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२१३
कृतमालपल्लवरसे खरमञ्जरीकल्कसिद्धं नवनीतम् ।
नस्येन जयति नित्यं सूर्यावर्त्तं सुदुर्वारम् ॥ ८ ॥
अमलतासके पत्तोंके रसमें चिरचिटेके बीजोंका कल्क और नैनी घी डालकर विधिपूर्वक पकावे । फिर इसकी प्रतिदिन नस्य लेनेसे दारुण सूर्यावर्त्तरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ ८ ॥
दशमूलीकषायैस्तु सर्पिः सैन्धवसंयुक्तम् ।
नस्यमर्द्धावभेदघ्नं सूर्यावर्त्तशिरोऽर्त्तिजित् ॥ ९ ॥
दशमूलके काढ़ेमें सेंधानमक, घृत डालकर एकत्र पकालेवे । पश्चात् उस घृतको नस्यद्वारा प्रयोग करे तो अर्द्धावभेदक सूर्यावर्त्तशिरोरोग दूर होताहै ॥ ९ ॥
शिरीषमूलबीजैरवपीडं च योजयेत् ।
अवपीड़ो हितो वा स्याद्वचापिप्पलिभिः कृतः ॥ १० ॥
सिरसकी छाल और मूलीके बीज ये प्रत्येक छः छः माशे लेकर एकत्र पीस लेवे फिर उनमेंसे रस निचोड लेवे । उस रसकी नास लेनेसे अथवा वच, पीपलके चूर्णको एकत्र मिलाकर नास लेनेसे सूर्यावर्त्तरोग नष्ट होता है ॥ १० ॥
जाङ्ग्लानि च मांसानि कारयेदुपनाहनम् ।
तेनास्य शाम्यति व्याधिः सूर्यावर्त्तः सुदारुणः ॥ ११ ॥
जङ्गलीजीवोंके मांस और वातनाशक औषधियोंको एकत्र पकाकर उसमें सेंधा-नमक और तिलका तेल डालकर मन्दोष्ण लेप करे । इससे दारुण सूर्यावर्त्त (आधाशीशी) रोग शमन होता है ॥ ११ ॥
भृङ्गराजरसच्छागक्षीरांशोऽर्कप्रतापितः ।
सूर्यावर्त्तं निहन्त्याशु नस्येनैव प्रयोगराट् ॥ १२ ॥
भाँगरेका रस और बकरीका दूध इनको समान भाग लेकर एकत्र करके धूपमें गरम कर नास लेनेसे सूर्यावर्त्तरोग तत्काल नाश होता है ॥ १२ ॥
अर्द्धावभेदककी चिकित्सा ।
एष एव विधिः कृत्स्नः कार्यश्चार्द्धावभेदके ॥ १३ ॥
यह ही उक्त सब विधि अर्द्धावभेदक शिरोरोगमें करनी चाहिये ॥ १३ ॥
पिबेत्सशर्करं क्षीरं नीरं वा नारिकेलजम् ।
सुशीतं वापि पानीयं सर्पिर्वा नस्यतस्तयोः ॥ १४ ॥
१२१४ भैषज्यरत्नावली । [ शिरोरोग-
अर्द्धावभेदक और सूर्यावर्त्तरोगमें चीनी मिलाहुआ दूध अथवा नारियलका जल पान करे अथवा शीतल पानीयद्रव्योंमें घृत मिलाकर नास लेवे तो उक्त दोनों प्रकारका शिरोरोग नष्ट होता है ॥ १४ ॥
तिलात्कल्कं सनलदं सक्षौद्रलवणान्वितम् ।
तेनास्य लेपयेच्छीर्षमर्द्धभेदो व्यपोहति ॥१५॥
कालेतिल और बालछड दोनोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर शहद, सेंधा-नमकके साथ मिश्रित करके लेपकरनेसे अर्द्धावभेदक शिरोरोग दूर होताहै ॥
सविडङ्गं तिलं कृष्णं समं कृत्वा प्रपेषयेत् ।
नस्यकर्मणि दातव्यमर्द्धभेदं विनाशयेत् ॥१६॥
वायविडङ्ग और काले तिल इनको सम भाग लेकर बारीक पिसकर इनकी नस्य लेवे तो इससे अर्द्धावभेदक रोग नाश होता है ॥ १६ ॥
दग्धचुल्लीम्मृत्तिकायाश्चूर्णं मरिचचूर्णकम् ।
समांशं मिलितं कुर्यान्नस्यमर्धावभेदके । १७ ॥
चूल्हेकी जलीहुई मिट्टी और कालीमिरच दोनों समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे। उक्त चूर्णकी नास लेनेसे आधाशीशी ) शिरोरोग शान्त होता है ॥१७॥
अनन्तवातकी चिकित्सा ।
अनन्तवाते कर्त्तव्यः सूर्यावर्त्तहितो विधिः ॥
शिरावेधश्च कर्त्तव्योऽनन्तवातप्रशान्तये ॥
आहारश्च विधातव्यो वातपित्तविनाशनः ॥ १८ ॥
अनन्तवातरोगको शान्त करनेके लिये सूर्यावर्त्तरोगनाशक औषधियोंसे चिकित्सा करनी एवं रोगीको वात-पित्तनाशक भोजन करना और शिरावेध कर रुधिर निकालना चाहिये ॥ १८ ॥
शङ्खककी चिकित्सा ।
सूर्यावर्त्ते हितं यच्च शंखके स्वेदवर्जितम् ।
क्षीरसर्पिः प्रशंसन्ति नस्यं पानं च शंखके ॥ १९ ॥
शङ्खरोगमें स्वेदक्रियाको छोडकर सूर्यावर्त्तमें कहीहुई विधिके अनुसार समस्त-चिकित्सा और क्षीरसर्पि ( मक्खन ) का पान करना तथा नासलेना ॥ १९ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२१५
शतावरीं कृष्णतिलान्मधुकं नीलमुत्पलम् ।
दूर्वां पुनर्नवां चापि लेपं साध्ववतारयेत् ॥
शीततोयावसेकांश्च क्षीरसेकांश्च शीतलान् ॥ २० ॥
शतावर, काले तिल, मुलहठी, नीलकमल, दूब और पुनर्नवा इन सबको समान भाग लेकर जलमें पीसकर शिरपर लेप करे और शीतल जल तथा शीतल दूधसे शिरपर सेचन क्रिया करे तो शंखरोग दूर होता है ॥ २० ॥
कल्कैश्च क्षीरवृक्षाणां शंखकस्य प्रलेपनम् ।
शंखकरोगमें वड, पीपल, गूलर, पाखर और बेंत आदि क्षीरीवृक्षोंकी छालके कल्कद्वारा लेप करना चाहिये ॥
क्रौञ्चकादम्बहंसानां शरायोः कच्छपस्य च ।
रसैः सुविहितस्याथ तस्य शंखकसन्धिजाः ॥
ऊर्ध्वास्तिस्रः शिराः प्राज्ञो भिन्द्यादेव न ताडयेत् २१
बगला, हंस, कलहंस, शराल ( पक्षीविशेष ) और कछुआ इनके मांसरसका पान कराकर रोगीको पुष्ट करके शंखसन्धिका उपरकी तीन शिराओंको वेधना चाहिये किन्तु उसको तोडना नहीं चाहिये ॥ २१ ॥
गिरिकर्णीफलरसं मूलं च नस्यमाचरेत् ।
मूलं वा बन्धयेत्कर्णे शीघ्रं हन्ति शिरोव्यथाम् ॥ २२ ॥
अपराजिताके फलोंके रस अथवा उसकी मूलके रसद्वारा नास लेवे किम्वा उक्त औषधिकी जडको कानमें बांध देवेतो शिरका दर्द शीघ्र नष्ट होता है ॥ २२ ॥
नागरकल्कविमिश्रं क्षीरं नस्येन योजितं पुंसाम् ।
नानादोषोद्भूतां शिरोरुजां हन्ति तीव्रतराम् ॥ २३ ॥
सोंठको दूधमें पीसकर नस्य लेनेसे अनेक दोषोंसे उत्पन्नहुई दारुण शिरकी पीडा तत्काल शमन होती है ॥ २३ ॥
शिरोबस्ति ।
आशिरो व्यायतं चर्म कृत्वाऽष्टाङ्गुलमूच्छितम् ।
तेनावेष्ट्य शिरोऽधस्तान्माषकल्केन लेपयेत् ॥ २४ ॥
निश्चलस्योपविष्टस्य तैलैः कोष्णैः प्रपूरयेत् ।
धारयेदारुजः शान्तेर्यामं यामार्द्धमेव वा ॥ २५ ॥
| १२१६ | भैषज्यरत्नावली । | [ शिरोरोग- |
|---|
शिरोवस्तिर्जयत्येष शिरोरोगं मरुद्भवम् ।
हनुमन्याक्षिकर्णार्त्तिमर्दितं मूर्द्धकम्पनम् ॥ २६ ॥
जितने चमडेसे मस्तक पूरा पूरा ढकजाय इतना लम्बा और आठ अँगुल चौडा चमडा लेकर उससे रोगीके मस्तकको बाँधकर उसके नीचे उडदोंके कल्कका लेप करदेवे । पश्चात् रोगीको निश्चल बैठाकर सुहाता सुहाता तिलका तेल उस चमडेमें भरदेवे । जबतक शिरकी पीडा शान्त न हो तबतक अथवा एक प्रहरतक किम्वा चार घडीतक तेलको धारण करे । यह शिरोबस्ति वातज शिरोरोग, हनुग्रह, मन्यास्तम्भ, नेत्र और कर्णरोग अर्दित और मस्तकका काँपना आदि रोगोंको शमन करती है ॥ २४–२६ ॥
अर्द्धनाडीनाटेश्वर ।
वराटं टङ्कणं शुद्धं पञ्चभागसमन्वितम् ।
नवभागं मरीचस्य विषभागत्रयं मतम् ॥ २७ ॥
स्तन्येन वटिकां कृत्वा नस्यं दद्याद्विचक्षणः ।
शिरोविकारान्विविधान् हन्ति श्लेष्मोत्तरानपि ॥ २८ ॥
कौडीकी भस्म २॥ भाग, सुहागेकी खील २॥ भाग, कालीमिरच ९ भाग और विष ३ भाग लेवे । इन सबको एकत्र स्त्रीके दूधके द्वारा खरल करके गोलियाँ बनालेवे । फिर इस गोलीको दूधमें घिसकर नास लेवे तो यह शिरके नानाप्रकारके कफप्रभृति दोषजनित विकारोंको नष्ट करती है ॥ २७ ॥ २८ ॥
चन्द्रकान्तरस ।
मृतसूताभ्रकं तीक्ष्णं ताम्रं गन्धं समं समम् ।
स्नुहीक्षीरैर्द्दिनं मर्द्यं भक्षयेन्माषमात्रकम् ॥ २९ ॥
मधुना मर्दितं सेव्यं लौहपात्रे दिने दिने ।
सूर्यावर्त्तादिकान्हन्ति शिरोरोगान्न संशयः ॥ ३० ॥
रससिन्दूर, अभ्रक, लोहा, ताँबा इनकी भस्म और शुद्ध गन्धक इन सबको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें एक दिनतक खरल करके उडदकी बराबर गोली बनालेवे । उस गोलीको प्रतिदिन लोहेके वर्त्तनमें शहदके साथ मिलाकर भक्षण करे तो यह सूर्यावर्त्तादि समस्त शिरके रोगोंको निसन्देह नष्टकर देता है ॥ २९ ॥ ३० ॥
शिरःशूलाद्रिवज्ररस ।
पलं रसं पलं गन्धं पलं लौहं पलं रविः ।
गुग्गुलोः पलचत्वारि तदर्द्धं त्रिफलारजः ॥ ३१ ॥
दशमूलं च प्रत्येकं तोलकं वस्त्रपेषितम् ॥ ३२ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२१७
कुष्ठं मधु कणा शुण्ठी गोक्षुरं कृमिनाशनम् । दशमूलं च प्रत्येकं तोलकं वस्त्रपेषितम् ॥ ३२ ॥ क्वाथेन दशमूल्याश्च यथास्वं परिभावयेत् । घृतयोगात्प्रकर्त्तव्या माषिका वटिका शुभा ॥ ३३ ॥
शुद्ध पारा चार तोले, शुद्ध गन्धक चार तोले, लोहभस्म चार तोले, ताम्रभस्म चार तोले, शुद्ध गूगल सोलह तोले, त्रिफलेका चूर्ण ८ तोले, एवं कूठ, शहद, पीपल, सोंठ, गोखरू, वायविडङ्ग और दशमूल ये प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेवे । सबको एकत्र कूटपीस और वस्त्रमें छानकर दशमूलके क्वाथमें सात बार भावना देवे । फिर घृतमें मिलाकर एक एक मासेकी सुन्दर गोलियाँ बना लेवे ॥ ३१–३३ ॥
छागीदुग्धानुपानेन पयसा मधुनाऽथवा । शिरःशूलाद्रिवज्रोऽयं चण्डनाथेन भाषितः ॥ ३४ ॥ एकजं द्वन्द्वजं चैव त्रिदोषजनितं तथा । वातिकं पैत्तिकं सर्वं शिरोरोगं विनाशयेत् ॥ ३५ ॥
प्रतिदिन प्रातःसमय १-१ गोली बकरीके दूध या जल अथवा शहदके साथ मिलाकर सेवन करे । इस शिरःशूलाद्रिवज्रनामक रसको श्रीचण्डनाथने निर्माण किया है । यह एकदोषज, द्विदोषज, त्रिदोषज तथा वात, पित्त, कफ इनसे उत्पन्नहुए सर्व प्रकारके शिरोरोगको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
महालक्ष्मीविलास ।
लौहमभ्रं विषं मुस्तं फलत्रयकटुत्रयम् । धुस्तूरं वृद्धदारं च बीजमिन्द्राशनस्य च ॥ ३६ ॥ गोक्षुरकद्वयं चैव पिप्पलीमूलमेव च । एतत्सर्वं समं ग्राह्यं रसो धुस्तूरकस्य च ॥ ३७ ॥ भावयित्वा वटी कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः । महालक्ष्मीविलासोऽयं सन्निपातनिवारकः ॥ ३८ ॥
लोहा, अभ्रक, मीठातेलिया, नागरमोथा, त्रिफला, त्रिकुटा, धतूरा, विधारा भाँगके बीज, गोखुरू, बडा गोखुरू और पीपलामूल इन सबको समान भाग लेकर धतूरेके पत्तोंके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बना लेवे । यह महालक्ष्मीविलासरस यथाविधि सेवन करनेसे त्रिदोषज शिरोरोग नष्ट होय ॥
७७
| १२१८ | भैषज्यरत्नावली । | [ शिरोरोग- |
|---|
मयूराद्यघृत ।
शतं मयूरमांसस्य दशमूलाबलातुलाम् ।
द्रोणेऽम्भसः पचेत्क्षुत्त्वा तस्मिन्पादस्थिते ततः ॥ ३९ ॥
निषिच्य पयसो द्रोणं पचेत्तत्र घृताढकम् ।
प्रपौण्डरीकवर्गौकैर्जीवनीयैश्च भेषजैः ॥ ४० ॥
मेधाबुद्धिस्मृतिकरमूर्द्धजत्रुगदापहम् ।
मायूरमेतन्निर्दिष्टं सर्वानिलहरं परम् ॥ ४१ ॥
मन्याकर्णशिरोनेत्ररुजापस्मारनाशनम् ।
विषवातामयश्वासविषमज्वरकासनुत् ॥ ४२ ॥
मोरका मांस १०० पल, दशमूल और खिरेंटी समान भाग मिश्रित १०० पल लेकर सबको एकत्र कुचलकर एक द्रोणजलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें एक द्रोण दूध और एक आढक घृत तथा पुण्डेरिया, मुलहठी, पीपल, लालचन्दन, नीलकमल, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, जीवन्ती, मुलहठी, मुगवन और मषवन इन समस्त औषधियोंका कल्क समान भाग मिश्रित दो सेर डालकर उत्तम प्रकार घृतको सिद्ध करे । यह घृत मेधा, बुद्धि और स्मृतिशक्तिको बढाता है तथा ऊर्ध्वजत्रुरोग, मन्यास्तम्भ, कर्ण शिर और नेत्ररोग, अपस्मार, विषज और वातजरोग, श्वास, विषमज्वर, खाँसी और सर्व प्रकारके वातविकारोंको नष्ट करता है । इसको मयूराद्यघृत कहते हैं ॥ ३९-४२ ॥
षड्बिन्दुवैल ।
एरण्डमूलं तगरं शताह्वा जीवन्ति रास्त्रा सहसैन्धवं
च । भृङ्गं विडङ्गं मधुयष्टिका च विश्वौषधं कृष्णतिलस्य
तैलम् ॥४३॥ आजं पयस्तैलविमिश्रितं च चतुर्गुणे भृङ्ग-
रसे विपक्वम् । षड्बिन्दवो नासिकया विधेया निहन्ति
शीघ्रं शिरसो विकारान् ॥४४॥ च्युतांश्च केशान् पलि-
तांश्च दन्तान्दुर्वद्धमूलांश्च दृढीकरोति । सुपर्णदृष्टिप्रतिमं
च चक्षुर्बाह्वोर्बलं चाप्यधिकं ददाति ॥ ४५ ॥
अण्डकी जड, तगर, सोया, जीवन्ती, रास्ना, सेंधानमक भाँगरा, वायविडङ्ग, मुलहठी, सोंठ और कालेतिलोंका तेल और बकरीका दूध इन सबको
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२१९
समान भाग लेकर यथाविधिसे मिश्रित करके तेलको पकावे । इस षड्बिन्दुनामक तेलको नस्यद्वारा प्रयोग करे । यह शिरके समस्त विकारोंको बहुत शीघ्र नष्ट करता है तथा बालोंका गिरना और पलितरोगको दूरकर हिलतेहुए दाँतोंकी जड़ोंकों मजबूत करता है । एवं नेत्रोंकी दृष्टिशक्तिको गरुडकी समान अत्यन्त सूक्ष्म और भुजाओंमें अनन्त बलकी वृद्धि करता है ॥ ४३–४५ ॥
दशमूलतैल १–२ ।
दशमूलक्वाथकल्काभ्यां तैलप्रस्थं विपाचयेत् ।
चतुर्गुणं पयो दत्त्वा शनैर्मृद्वग्निना भिषक् ॥ ४६ ॥
दशमूलमिति ख्यातं शोथं हन्ति सुदारुणम् ।
नस्येनाकालपलितं ज्वरारोचकनाशनम् ॥ ४७ ॥
अभ्यङ्गेनैव सर्वं च शिरःशूलं विनाशयेत् ॥ ४८ ॥
१–दशमूलकी औषधियोंके क्वाथ और कल्कके साथ कडवातैल एक प्रस्थ और दूध ४ प्रस्थ मिलाकर मन्दमन्द अग्निसे यथाविधि तेलको पकावे । इसको दशमूल तेल कहते हैं । यह तेल दारुण शोथको नष्ट करता है और नस्यद्वारा उपयोग करनेसे असमय बालोंका पकना, ज्वर, अरुचि आदि विकारोंका तथा मालिश करनेसे सर्वप्रकारके शिरःशूलको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ४६–४८ ॥
दशमूलीकषायेण अष्टाङ्गकल्कसंयुतम् ।
क्षीरं च द्विगुणं दत्त्वा तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ४९ ॥
२–दशमूलके क्वाथके साथ जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि और वृद्धि इन औषधियोंका कल्क तथा एक प्रस्थ कडवा तेल और दो प्रस्थ दूध मिलाकर विधिपूर्वक तेलको सिद्ध करे ॥ ४९ ॥
शिरोऽर्त्तिं नाशयेदेतद्भास्करस्तिमिरं यथा ।
वातशूलं पित्तशूलं कफशूलं त्रिदोषजम् ॥ ५० ॥
सूर्यावर्त्तमभिष्यन्दं जलदोषं च नाशयेत् ।
दशमूलमिदं तैलं शिरोरोगनिषूदनम् ॥ ५१ ॥
यह तेल शिरोरोगको इस प्रकार नाश करदेता है जिस प्रकार सूर्य अन्धकारपुञ्जको तत्क्षण नष्ट करता है । इससे वातज, पित्तज, कफज और त्रिदोषजशूल, सूर्यावर्त्तशिरोरोग, नेत्राभिष्यन्द और जलदोष दूर होता है । यह दशमूलतेल समस्त शिरोरोगोंका नाश करनेवाला है ॥ ५० ॥ ५१ ॥
दशमूली करञ्जश्च निर्गुण्डी च जयन्तिका ।
१२२० भैषज्यरत्नावली । [ शिरोरोग-
मध्यमदशमूलतैल ।
दशमूली करञ्जश्च निर्गुण्डी च जयन्तिका ।
धुस्तूरः षट्पलान्भागान्जलद्रोणे विपाचयेत् ।
पादशेषे रसे तस्मिन् कटुतैलं विपाचयेत् ।
तत्कल्कान्दापयेदत्र भागान्षट्स्तोलकान्पृथक् ॥ ५३ ॥
दशमूल, करंजुआ, निर्गुण्डी जयन्ती और धतूरा इनके पत्ते छः छः पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें कडवातैल एक प्रस्थ और उक्त औषधियोंका कल्क छः छः तोले डालकर यथानियम तेलको पकावे ॥ ५२ ॥ ५३ ॥
वातश्लेष्मसमुद्भूतं शिरोरोगं व्यपोहति ।
कासं पञ्चविधं शोथं जीर्णज्वरमपोहति ॥ ५४ ॥
दशमूलमिदं तैलं शिरःकर्णाक्षिरोगनुत् ।
मन्यास्तम्भमन्त्रवृद्धिं श्लीपदं च विनाशयेत् ॥
दशमूलमिदं तैलमश्विभ्यां निर्मितं पुरा ॥ ५५ ॥
यह तेल वात और कफसे उत्पन्नहुए शिरोरोगको दूर करताहै । तथा पाँच प्रकारकी खाँसी, सूजन, जीर्णज्वर, शिर, कान और नेत्रोंके रोग, मन्यास्तम्भ, अन्त्र-वृद्धि और श्लीपदरोगको नष्ट करता है । इस दशमूल तेलको पूर्वकालमें अश्विनी-कुमारोंने निर्माण किया है ॥ ५४ ॥ ५५ ॥
बृहद्दशमूलतैल १-२ ।
पञ्च पञ्च पलं नीत्वा पञ्चमूलीयुगात्पृथक् ।
विपाचयेज्जलद्रोणे चाष्टभागावशेषितम् ॥ ५६ ॥
आर्द्रकस्य रसप्रस्थं निर्गुण्ड्यास्तत्समं भवेत् ।
त्र्यूषणं पञ्चकोलं च जीरकद्वयसर्षपम् ॥ ५७ ॥
सैन्धवं च यवक्षारं त्रिवृता च निशाद्वयम् ।
तोयं च द्विगुणं दत्त्वा कल्कमक्षसमं विदुः ॥ ५८ ॥
सर्वैरेभिः पचेत्तैलं शिरोरोगं व्यपोहति ।
ऊर्ध्वजत्रुजरोगघ्नं वातश्लेष्मगदापहम् ॥ ५९ ॥
-चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२२१
एकजे द्वन्द्वजे चैव तथैव सन्निपातिके । अर्द्धावभेदके चैव सूर्यावर्त्ते प्रशस्यते ॥ पानाभ्यञ्जननस्येन कर्णरोगे च शस्यते ॥ ६० ॥
१—दशमूलकी प्रत्येक औषधिको बीस बीस तोले लेकर एक द्रोण (३२ सेर) जलमें पकावे। जब पकते २ आठवाँ हिस्सा जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे। फिर उसमें अदरखका रस १ प्रस्थ, निर्गुण्डीके पत्तोंका रस एक प्रस्थ तथा त्रिकुटा, पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, जीरा, कालाजीरा, सफेद सरसों, सैंधानमक, जवाखार, निसोंत, हल्दी और दारुहल्दी इन औषधियोंका कल्क दोदों तोले और पाकके लिये रसोंसे दुगुना जल डालकर सबको यथाविधिसे एकत्र करके तेलको पकावे। यह तेल सम्पूर्ण शिरोरोग, ऊर्ध्वजत्रुजनित रोग और वात तथा कफजन्य रोगोंको दूर करता है। इसको एकदोषज, द्विदोषज तथा त्रिदोषज अर्द्धावभेदक और सूर्यावर्त रोगमें तथा कर्णरोगमें पान, अभ्यञ्जन और नस्यद्वारा प्रयोग करना ॥
दशमूलीशतं ग्राह्यं तथा धुस्तूरकस्य च ॥ शतं पुनर्नवायाश्च निर्गुण्ड्याश्च शतं तथा ॥ ६१ ॥ एतैः कषायैर्विपचेत्कटुतैलाढकं भिषक् । वासा वचा देवदारु शठी रास्ना सयष्टिका ॥ ६२ ॥ मरिचं पिप्पली शुण्ठी कारवी कट्फलं तथा । करञ्जं शिग्रु कुष्ठं च चिञ्चा च वनशिम्बिका ॥ ६३ ॥ चित्रकं च पृथग् भागान् दत्त्वा चैषां पलोन्मितान् ॥ ६४॥
२—दशमूल, धतूरा, पुनर्नवा और निर्गुण्डी ये प्रत्येक औषधि सौ सौ पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे। चतुर्थांश शेष रहनेपर उतारकर छानलेवे। फिर उसमें कडवा तेल एक आढक तथा अडूसा, वच, देवदारु, कचूर, रास्ना, मुलहठी, मिरच पीपल, सोंठ, कालाजीरा, कायफल, करञ्ज, सहिंजना, कूठ, इमली, वनसेम और चीतेकी जड इन सबका कल्क पृथक् पृथक् चार चार तोले डालकर उत्तम प्रकार तेलको सिद्ध करे ॥ ६१-६४ ॥
श्लैष्मिकं सन्निपातोत्थं वातश्लेष्मोद्भवं तथा । कर्णशूलं शिरःशूलं नेत्रशूलं च दारुणम् ॥ निहन्ति दशमूलाख्यं तैलमेतन्न संशयः ॥ ६५ ॥
दशमूलं पलशतं जलद्रोणे विपाचयेत् ।
१२२२ भैषज्यरत्नावली । [शिरोरोग-
यह तेल कफसे, वातकफसे और त्रिदोषसे उत्पन्न हुए कर्णशूल शिरःशूल और दारुण नेत्रशूलको तत्काल नष्ट करता है । इसमें कुछ सन्देह नहीं ॥ ६५ ॥
महादशमूलतैल ।
दशमूलं पलशतं जलद्रोणे विपाचयेत् । तेन पादावशेषेण कटुतैलाढकं पचेत् ॥ ६६ ॥ जम्बीराईकधुस्तूरस्वरसं तैलतुल्यतः । कल्कं कणाऽमृता दार्वी शतपुष्पा पुनर्नवा ॥ ६७ ॥ शिग्रुपिप्पलिका तिक्ता करञ्जं कृष्णजीरकम् । सिद्धार्थकं वचा शुण्ठी पिप्पली चित्रकं शठी ॥ ६८ ॥ देवदारु बला रास्ना सूर्यावर्त्तककट्फलम् । निर्गुण्डी चविका गैरि ग्रन्थिकं शुष्कमूलकम् ॥ ६९ ॥ यमानी जीरकं कुष्ठमजमोदा च ताडकम् । एतेषां पलिकैर्भागैर्विपचेन्मतिमान् भिषक् ॥ ७० ॥ निहन्ति विविधान्व्याधीन्कफवातसमुद्भवान् । शिरोमध्यगताञ्च्रोगान्छोथान्हन्ति व्रणानपि ॥ ७१ ॥ “सिद्धफलमिदम्” ॥
दशमूलकी समस्त औषधियोंको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । चौथाई भाग जल शेष रहजानेपर उसको उतारकर छानलेवे । फिर उसमें कडवा तेल १ आढक, जम्बीरीनींबूका रस, अदरख और धतूरेका रस इनको भी एक एक आढक तथा कल्कके लिये पीपल, गिलोय, दारुहलदी, सौंफ, पुनर्नवा, सहिंजना, पीपल, कुटकी, करंजुआ, कालाजीरा, सफेद सरसों, वच, सोंठ, गजपीपल, चीता, कचूर, देवदारु, खिरेंटी, रास्ना, हुलहुल, कायफल, निर्गुण्डी, चव्य, गेरू, पीपलामूल, सूखीमूली, अजवायन, जीरा, कूठ, अजमोद और विधारके बीज बुद्धिमान् वैद्य इन औषधियोंके चार चार तोले कल्कको डालकर यथाविधि तेलको पकावे । प्रतिदिन नियमपूर्वक मर्दन करनेसे यह तेल कफ और वातसे उत्पन्न हुए अनेक प्रकारके रोगोंको तथा शिरःसम्बन्धी सब रोगों एवं सूजन और क्षतोंको तत्क्षण नष्ट करता है । यह तत्काल इष्ट फलको देनेवाला है । इसको पान करनेसे भयानक खाँसी दूर होती है ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२२३
महाकनकतैल ।
कनकस्य रसप्रस्थं प्रस्थं वर्षाभुवस्तथा ।
निर्गुण्डीस्वरसप्रस्थं दशमूलरसस्य च ॥ ७२ ॥
पारिभद्ररसप्रस्थं प्रस्थं वरुणकस्य च ।
तैलप्रस्थं समादाय भिषग् यत्नाद्विपाचयेत् ॥ ७३ ॥
कल्कैर्द्विपलिकैरेतैः शुण्ठीमरिचसैन्धवैः ।
पुनर्नवा कर्कटकशेलुत्वक्पिप्पलीयुगैः ॥
तत्साधु सिद्धं विज्ञाय शुभे पात्रे निधापयेत् ॥ ७४ ॥
धतूरेका रस, पुनर्नवेका रस, निर्गुण्डीका रस, दशमूलका क्वाथ, फरहदका रस और बरनाकी छालका क्वाथ इन सबको अलग अलग एक एक प्रस्थ लेवे। सबको एकत्रकर इनमें सरसोंका तेल १ प्रस्थ तथा सोंठ, मिरच, सेंधानमक, पुनर्नवा काकड़ासिंगी, लहसौडेके वृक्ष की छाल, पीपल और गजपीपल इन प्रत्येकका कल्क दो दो तोले डालकर तेलको पकावे। जब अच्छे प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब उतारकर स्वच्छपात्रमें भरकर रखदेवे ॥ ७२-७४ ॥
वातश्लेष्मकृतं सर्वमामवातं भगन्दरम् ।
सन्निपातभवं रोगं शोथमाशु विनाशयेत् ॥ ७५ ॥
ये केचिद्गदा वयः सन्ति श्लैष्मिकाः सान्निपातिकाः ।
तान्सर्वानाशयत्याशु सूर्यस्तम इवोदितः ॥ ७६ ॥
यह तेल वात कफजन्यरोग, आमवात, भगन्दर, सन्निपातज रोग और शोथको दूर करता है तथा कफसे और सन्निपातसे होनेवाले जितने रोग हैं उन सबको यह तेल सेवन करतेही इसप्रकार नष्ट करता है जिसप्रकार उदय हुआ सूर्य अपने तेजःपुञ्जसे अन्धकार समूहको तत्क्षण नष्ट करदेता है ॥७५॥७६ ॥
रुद्रतैल ।
जैपालद्रोणधुस्तूरशिग्रुशकाशनस्य च।
सूर्यावर्त्तस्य सूर्यस्य पत्राणां स्वरसं पृथक् ॥ ७७ ॥
जम्बीरशृङ्गवेरस्य रसं दत्त्वा समं समम्
कटुतैलस्य पात्रं तु शोषयित्वा पचेद्भिषक् ॥ ७८ ॥
रजनीद्वयमञ्जिष्ठा कट्फलं कृष्णजीरकम् ।
त्रिकटुः पिप्पलीमूलं शारिवे द्वे विडङ्गकम् ॥ ७९ ॥
१२२४ । भैषज्यरत्नावली । [ शिरोरोग-
रास्ना दारु बला निम्बं मुस्तकं चन्दनं तथा ।
परशू द्वौ स्नुहीमूलं मूर्वाऽपामार्गमूलकम् ॥ ८० ॥
स्वरसद्रव्यमेतेषां कल्कं दत्त्वा तु पादिकम् ।
मृत्पात्रे सुदृढे चैव पाचयेत्तीव्रवह्निना ॥ ८१ ॥
जमालगोटेके पत्तोंका रस, गूमाका रस, धतूरेके पत्तोंका रस, सहिंजनेके पत्तोंका, भाँगेके पत्तोंका, हुलहुलके पत्तोंका और आकके पत्तोंका रस इनको पृथक्, पृथक् आठ आठ सेर, जम्बीरीनींबूका रस, और अदरखका रस ये प्रत्येक आठ आठ सेर, कडवा तेल ३२ सेर, तथा हल्दी, दारुहल्दी, मंजीठ, कायफल, कालाजीरा त्रिकुटा पीपलामूल, उसवा, अनन्तमूल, वायविडङ्ग, रास्ना, देवदारु, खिरेंटी, नीमकी छाल, नागरमोथा, लालचन्दन, पेटारी लता, कुडलियालता, थूहरकी जड, मुर्वा, चिरचिटा, सूखीमूली, जमालगोटा, गूमा, धतूरा, सहिंजना इनकी जड, भाँग, हुलहुल, और आक इनके पत्ते, जंबीरीनींबूकी जड और सोंठ ये सब औषधियें समान भाग मिश्रित दो सेर लेवे, फिर सबको एकत्र पीसकर, यथाविधिसे मिलाकर तेलको तीव्र अग्निसे पकावे । जब उत्तम प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब अत्यन्त दृढ और चिकने मिट्टीके बर्त्तनमें भरकर रखदेवे ॥ ७७ ॥ ८१ ॥
बलासमुर्द्धगं चैव नाशयेत्रिदिनाद्ध्रुवम् ।
मुखकर्णाक्षिरोगांश्च कफशोणितसंस्स्रवान् ॥ ८२ ॥
शिरोरोगं सन्निपातं श्लीपदं गलगण्डकम् ।
अभ्यङ्गात्नाशयेदेतान्पानात्कासं व्यपोहति ॥
कालाग्निरुद्रेण प्रोक्तं रुद्रतैलमिदं पुरा ॥ ८३ ॥
इस तेलको नियमपूर्वक मर्दन करनेसे ऊर्ध्वजत्रुगत श्लेष्मा, मुखरोग, कर्णरोग, नेत्ररोग, कफजरोग, रक्तस्राव, शिरोरोग, सन्निपातज रोग, श्लीपद और गलगण्ड ये सब रोग तीन दिनमें निश्चय नष्ट होते हैं और इसको पान करनेसे खाँसी दूर होती है । पूर्वकालमें इस रुद्रतैलको कालाग्निरुद्रने वर्णन किया है ॥ ८२ ॥ ८३ ॥
तप्तराजतैल ।
धुस्तूरं पूतिकं पीता जयन्ती सिन्धुवारकम् ।
शिरीषं हिज्जलं शिग्रुर्दशमूलं समं भवेत् ॥ ८४ ॥
चिकित्सा ] | भाषाटीकासहिता । | १२३५
प्रस्थं प्रस्थं समादाय कटुतैलं समांशकम् ।
जलद्रोणे विपक्तव्यं ग्राह्यं पादावशेषितम् ॥ ८५ ॥
गोमूत्रं चाढकं दत्त्वा शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ।
मदनं त्र्यूषणं कुष्ठमजाजी विश्वभेषजम् ॥ ८६ ॥
कट्फलं वरुणं मुस्तं हिज्जलं बिल्वमेव च ।
हरितालं जवापुष्पममृतं कुनटी तथा ॥ ८७ ॥
कर्कटं चन्दनं शिग्रु यमानी व्याघ्रपादपि ।
एतेषां कार्षिकैर्भागैः समभागं प्रकल्पयेत् ॥ ८८ ॥
धतुरा, दुर्गंध करंज, पीला पियाबाँसा, जयंती, सिहाळु, सिरस, समुद्रफल, सहिं-जना; और दशमूल इन सब औषधियोंको एक एक प्रस्थ लेकर एक द्रोण जलमें पकावे। चतुर्थांश जल शेष रहनेपर उतारकर छान लेवे। फिर उस क्वाथमें तिलका तेल एक प्रस्थ, गोमूत्र एक आढक तथा मैनफल, सोंठ, मिरच, पीपल, कूठ, जीरा, सोंठ, कायफल, वरनाकी छाल, नागरमोथा, समुद्रफल, बेलगिरी, हरिताल, गुड़हल के फूल, विष, मैनासिल, काकड़ासिंगी, लालचंदन, सहिंजनेकी छाल, अजवायन और हुलहुलकी जड़ इन औषधियोंके दो दो तोले कल्कको डालकर मन्द मन्द अग्निद्वारा यथाविधि तेलको पकावे ॥ ८४-८८
तप्तराजमिति ख्यातं महादेवेन निर्मितम् ।
सन्निपातं महारोगं शिरोरोगं महोत्तरम् ॥ ८९ ॥
शिरःशूलं नेत्रशूलं कर्णशूलं च दारुणम् ।
ज्वरं दाहं महाघोरं स्वेदं चैव महोत्तरम् ॥ ९० ॥
कामलां पाण्डुरोगं च सहलीमकपीनसम् ।
त्रयोदश सन्निपातं हन्ति सद्यो न संशयः ॥ ९१ ॥
इस तेलको शिवजी महाराजने निर्माण किया है। यह तप्तराजनामसे प्रसिद्ध है। यह तेल सन्निपात, अत्यन्त प्रबल शिरोरोग, शिरःशूल, नेत्रशूल, दारुण कर्णशूल, ज्वर, दाह, अत्यन्त स्वेद आना, कामला, पाण्डु, हलीमक पीनस और तेरह प्रकारके सन्निपात इन सब रोगोंको सन्देहरहित तत्काल नष्ट करता है ८९-९१
कुमारीतैल ।
कुमार्याः स्वरसे प्रस्थे धूस्तूरस्य रसे तथा ।
| १२२६ | भैषज्यरत्नावली । | [ शिरोरोग- |
|---|
भृङ्गराजस्य च रसे प्रस्थद्वयसमायुते ॥ ९२ ॥
चतुःप्रस्थमिते क्षीरे तैलप्रस्थं विपाचयेत् ।
कल्कैर्मधुकहीबेरमञ्जिष्ठाभद्रमुस्तकैः ॥ ९३ ॥
नखकर्पूरभृङ्गेलाजीवन्तीपद्मकुष्ठकैः ।
मार्कवासकतालीससर्जनिर्यासपत्रकैः ॥ ९४ ॥
विडङ्गशतपुष्पाश्वगन्धागन्धर्वहस्तकैः ।
शोकहन्नारिकेलाभ्यां कर्षमानैर्विपाचिते ॥
उत्तार्य वस्त्रपूतं च शुभे भाण्डे सुधूपिते ॥ ९५ ॥
घीग्वारका रस १ प्रस्थ, धतुरेके पत्तोंका रस एक प्रस्थ, भाँगरेका रस दो प्रस्थ और ४ प्रस्थ दूध इनमें १ प्रस्थ तिलका तेल एवं मुलहठी, सुगन्धवाला, मंजीठ, नागरमोथा, नखद्रव्य, कपूर, दारचीनी, छोटीइलायची, जीवन्ती, पद्माख, कूठ, भाँगरा, अडूसा, तालीशपत्र, राल, तेजपात, वायविडङ्ग, सौंफ, असगन्ध, अण्डकी जड, अशोककी छाल और नारियलकी जड इन औषधियोंको अलहिदा दो दो तोले लेकर सचको एकत्र कूट पीसकर मिलालेवे । फिर विधिपूर्वक शनैः शनैः तेलको पकावे । जब उत्तम प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब उतारकर वस्त्रमें छानकर धूप आदिसे सुवासित उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे ॥ ९२–९५ ॥
त्रिरात्रमथ गुप्तं च धारयेद्विधिविद्भिषक् ।
ततस्तु तैलमभ्यङ्गे मूर्ध्नि क्षेपे नियोजयेत् ॥ ९६ ॥
फिर विधिको जाननेवाला वैद्य उस पात्रको तीन दिनतक मिट्टीमें गाडकर रक्खे, पश्चात् निकालकर उसकी शरीरपर और शिरपर मालिश करे ॥ ९६ ॥
शमयेदर्दिरतं गाढं मन्यास्तम्भशिरोगदान् ।
तालुनासाक्षिजातं तु शोषमूर्च्छाहलीमकम् ॥ ९७ ॥
हनुग्रहगदत्त्वं वा बाधिर्यं कर्णवेदनम् ॥ ९८ ॥
यह तेल घोरतर अर्दितरोग, मन्यास्तम्भ, शिरोरोग तथा तालु नासिका और नेत्रगतरोग, शोष, मूर्च्छा, हलीमक, हनुग्रह, बधिरता और कानकी पीडा आदि रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ९७ ॥ ९८ ॥
शिरोरोगमें पथ्य ।
स्वेदो नस्यं धूमपानं विरेको लेपश्चर्दिर्लङ्घनं शीर्ष-