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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

३५४ भैषज्यरत्नावली । [ अर्शोरोग-


न स रोगोऽस्ति यं चापि न निहन्यादिदं क्षणात् ।
करीरकाञ्जिकादीनि ककारादीनि वर्ज्जयेत् ॥
स्रवत्यतोऽन्यथा लौहं देहात् किट्टं च दुर्ज्जयम् ॥ २८ ॥

यह अग्निमुखनामक लोह बावासीरको नष्ट करनेवाला और मन्दाग्निको दीपन करनेवाला है । इसके खानेसे मनुष्यको पत्थरतक हजम हो सकते हैं। इसपर भारी और पुष्टिकारक अन्न पान, दूध और मांसरस ये पदार्थ हितकारी हैं। यह बवासीर, पाण्डुरोग, सूजन, कुष्ठ, प्लीहा, उदररोग, असमयमें बालोंका पकना, आमवात और गुदाके रोग इन सब रोगोंको एवं अन्यान्य और कोईभी ऐसा रोग नहीं है जिसको यह तत्क्षण ही नष्ट न करता हो । इसपर करीर, कांजी, ककडी आदि समस्त ककाराद्य पदार्थ सर्वथा त्यागदेने चाहिये । इस प्रकार न करनेसे शरीरसे लोहेका दुर्जय मैल टपकने लगता है ॥ २५–२८ ॥

चन्द्रप्रभावटिका ।

कृमिरिपुदहनव्योषत्रिफलासुरदारुचव्यभूनिम्बम् ।
मागधिमूलं मुस्तं सशठी वचा धातुमाक्षिकं चैव ॥ २९ ॥
लवणक्षारनिशायुगकुस्तुम्बुरुगजकणातिविषाः ॥ १३० ॥
कर्षांशकान्येव समानि कुर्यात्पलाष्टकं चाश्मजतोर्विदध्यात् ।
निष्पत्रशुद्धस्य पुरस्य धीमान् पलद्वयं लौहरजस्तथैव ॥
सिताचतुष्कं पलमत्र वांश्यानिकुम्भकुम्भीत्रिसुगन्धियुक्तम् ३१

वायविडंग, चीतेकी जड, सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, आमला, बहेडा, देवदारु, चव्य, चिरायता, पीपलामूल, नागरमोथा, कचूर, वच, सोनामाखी, सैंधानमक, कालानमक, जवाखार, सज्जी, हल्दी, दारुहल्दी, धनियाँ, गजपीपल और अतीस ये प्रत्येक एक एक कर्ष और शिलाजीत ३२ तोले, शोधित गूगल ८ तोले, लोहभस्म ८ तोले, मिश्री १६ तोले, वंशलोचन ४ तोले, दन्तीकी जड ४ तोले, निसोध ४ तोले, एवं दालचीनी, तेजपात और इलायची ये तीनों मिश्रित ४ तोले लेवे। सबको यथाविधिसे एकत्र मिलाकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ २९–१३१ ॥

चन्द्रप्रभेयं गुटिका विधेया ह्यर्शांसि निर्नाशयते षडेव ।
भगन्दरं कामलपाण्डुरोगं विनष्टवह्नेः कुरुते च दीप्तिम् ॥
हन्त्यामयान् पित्तकफानिलोत्थान्नाडीगते मर्मगते व्रणे च ॥ ३२

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३५५

ग्रन्थ्यर्बुदे विद्रधिराजयक्ष्ममेहे भगारुये प्रदरे च योज्या । शुक्रक्षये चाश्मरीमूत्रकृच्छ्रे मूत्रप्रवाहेऽप्युदरामये च ॥३३॥ तक्रानुपानं त्वथ मस्तुपानमाजो रसो जाङ्गलजो रसो वा । पयोऽथवा शीतजलानुपानं बलेन नागस्तुरगो जवेन ॥ ३४ ॥ दृष्ट्या सुपर्णः श्रवणे वराहःकान्त्या रतीशो धिषणश्च बुद्ध्या । न पानभोज्ये परिहार्यमस्ति न शीतवातातपमैथुनेषु ॥३५॥

यह चन्द्रप्रभानामवाली गुटिका छहों प्रकारके अर्शरोग, भगन्दर, कामला और पाण्डुरोग इनको जडसहित नष्ट करदेती है और नष्ट हुई जठराग्निको फिरसे दीपन करती है। इसको पित्त कफ और वायुसे उत्पन्न हुए विकार, नाडीगतरोग, मर्म-स्थानसम्बन्धी विकार, व्रण, ग्रन्थि, अर्बुद, विद्रधि, राजयक्ष्मा, प्रमेह, भगरोग, प्रदर, शुक्रक्षय, पथरी, मूत्रकृच्छ्र, मूत्रप्रवाह और उदररोग इन सबमें सेवन कराना चाहिये । इसपर मट्ठा, दहीका तोड, बकरेके मांसका रस, जंगली जीवोंका मांभरस, दूध अथवा शीतल जल इनमेंसे किसीएक वस्तुका अनुपान करना चाहिये । इस वटीके सेवन करनेवाला बलमें हाथीके समान, वेगमें घोडेके समान, दृष्टिमें गरुडके समान, सुननेमें वराहके समान, कान्तिमें कामदेवके समान, और बुद्धिमें वृहस्पतिके समान होजाता है। इसपर खान पानके शीत, वायु, धूप और मैथुन आदिका कुछ भी परहेज नहीं है ॥ ३२-३५ ॥

शम्भुं समभ्यर्च्य कृतप्रणामं प्राप्ता गुटी चन्द्रमसः प्रसादात ॥ संमर्च्य मधुसर्पिर्भ्यामादौ रक्तिचतुष्टयम् । भक्ष्यं वृद्ध्या युथाक्ति यावन्माषचतुष्टयम् ॥ ३७ ॥ त्रिवृद्दन्तीत्रिजातानां कर्षमानं पृथक् पृथक् । शुक्रदोषान् निहन्त्याशु प्रमेहानपि दारुणान् ॥ ३८ ॥ वलीपलितनिर्मुक्तो वृद्धोऽपि तरुणायते ॥ ३९ ॥ “ वृद्धवैद्योपदेशेन पलार्द्ध रसगन्धकम् । केवलं मूच्छितं वापि पलं वा दापयेद्रसम् ॥ अभ्रकं च क्षिपेत् कश्चित पलमानं भिषग्वरः ” ॥४०॥

यह वटी शिवजी महाराजका पूजन करके और उनको प्रणाम करके चन्द्रदेवकी कृपासे प्राप्त की है। अतःप्रतिदिन शिवजीकी अर्चना और वन्दना करके पहले इस

३५६भैषज्यरत्नावली ।[ अर्शोरोग-

वटीको चार रत्ती प्रमाण लेकर शहद और घीमें अच्छे प्रकारसे खरल करके सेवन करे फिर यथाक्रमसे बढाते २ चार माशेतक इसकी मात्राको बढावे। औषध सेवनके पश्चात यदि निसोत, दन्ती, दारचीनी, तेजपात और इलायची इनके एक एक कर्षप्रमाण चूर्णको भक्षण करे तो यह सम्पूर्ण शुक्रगत दोष और दारुण प्रमेहोंको तत्काल दूर करती है। वली ( शरीरमें वलिका पडना ) और पलित ( असमय बालोंका पकना ) इन विकारोंसे रहित होकर वृद्धपुरुष भी तरुण होजाता है। “ वृद्धवैद्योंके उपदेशसे कोई २ वैद्य इसमें दो तोले शुद्ध पारा और दो तोले शुद्ध गन्धक अथवा केवल मूर्च्छित पारेको ही ४ तोले किंवा कोई कोई चार तोले अभ्रक कोही डालते हैं ” ॥ ३६-१४० ॥

रसगुडिका ।

रसस्तु पादिकस्तुल्या विडङ्गमरिचाभ्रकाः ।
गङ्गापालङ्कजरसे खल्लयित्वा पुनः पुनः ॥ ४१ ॥
रक्तिमात्रा गुदार्शोघ्नी वह्नेरत्यर्थदीपनी ॥ ४२ ॥

रससिन्दूर १ भाग एव वायविडंग, कालीमिरच और अभ्रक ये प्रत्येक एक एक भाग लेवे। सबको एकत्र मिलाकर शालिञ्चशाक बड़ी पालकके रसमें खरलकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। यह वटी अर्शरोगको नष्ट करती है और अग्निको अत्यन्त दीपन करती है ॥ ४१ ॥ ४२ ॥

तीक्ष्णमुखरस ।

मृतसूतार्कहेमाभ्रं तीक्ष्णं मुण्डं च गन्धकम् ।
मण्डूरं च समं ताप्यं मर्द्यं कन्याद्रवैर्दिनम् ॥ ४३ ॥
अन्धमूषागतं सर्वं ततः पाच्यं दृढाग्निना ।
चूर्णितं सितया माषं खादेत्तच्चार्शसां हितम् ।
रसस्तीक्ष्णमुखो नाम चासाध्यमपि साधयेत् ॥ ४४ ॥

रससिन्दूर, ताम्रभस्म, सुवर्णभस्म, अभ्रकभस्म, तीक्ष्ण लोहभस्म, लोहभस्म, शुद्ध गन्धक, मण्डूरभस्म और सोनामाखीकी भस्म इन सबको समान भाग लेकर एक एक दिनतक घीगुवारके रसमें खरल करे फिर उसको अन्धमूषायन्त्रमें रखकर तीक्ष्ण अग्निके द्वारा पकावे । जब पककर स्वयं शीतल होजाय तब उसमेंसे औषधिको निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे। इसमेंसे एक एक माशे परिमाण लेकर मिश्रीके साथ सेवन करे तो यह तीक्ष्णमुख नामक रस

चिकित्सा ] भाषाटीकासाहता : ३६७


असाध्य अर्शरोगको भी दूर करदेता है । अर्शरोगियोंके लिये यह अत्यन्त हितकारी है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥

अर्शकुठाररस ।

शुद्धसूतं द्विधा गन्ध मृतलौहं च ताम्रकम् ।
प्रत्येकं द्विपलं दन्ती व्यूषणं शूरणं तथा ॥ ४५ ॥
शुभाटङ्कयवक्षारसैन्धवं पलपञ्चकम् ।
पलाष्टकं स्नुहीक्षीरं द्वात्रिंशच्च गवां जलैः ॥ ४६ ॥
आपिण्डितं पचेदग्नौ खादेन्माषद्वयं ततः ।
रसश्चार्शःकुठारोऽयं सर्वरोगकुलान्तकः ॥ ४७ ॥

शुद्ध पारा ४ तोले एवं शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, ताम्र भस्म दन्तीकी जड, साँठ, पीपल, मिरच और जिमीकन्द ये प्रत्येक ८-८ तोले, वंशलोचन, सुहागा, जवाखार और सेंधानमक प्रत्येक २०-२०तोले थूहरका दूध ३२ तोले और गोमूत्र १२८ तोलें लेवे । इन सबको एकत्र कूट पीसकर गोमूत्रमें मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब उत्तम प्रकारसे पकजाय तब औषधिको सुखाकर चूर्ण करलेवे । फिर इस अर्शकुठारनामक रसको प्रतिदिन दो दो माशेकी मात्रासे सेवन करे तो इससे सर्वप्रकारके रोग नष्ट होते हैं ॥ ४५–४७ ॥

चक्राख्यरस ।

मृतसूताभ्रवैक्रान्तं ताम्रं कांस्यं समं समम् ।
सर्वतुल्येन गन्धेन दिनं भल्लातकद्रवैः ॥ ४८ ॥
मर्दयेद् यत्नतः पश्चाद् वटीं कुर्याद्द्विगुञ्जिकाम् ।
भक्षणाद् गुदजान् हन्ति द्वन्द्वजान् सर्वजानपि ॥ ४९ ॥

रससिन्दूर, अभ्रक, वैक्रान्तमणि, ताँबा, और कांसा पत्येककी भस्म समान भाग और सबकी समान भाग शुद्ध गन्धक लेवे । सबको एकत्र मिलाकर भिलावेके रसमें एक दिनतक उत्तम प्रकारसे खरलकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंके खानेसे द्विदोषज अथवा त्रिदोषज सभी प्रकारके अर्शरोग नष्ट होते हैं ॥ ४८ ॥ ४९ ॥

चञ्चुत्कुठाररसँ ।

रसगन्धकलौहानां प्रत्येकं भागयुग्मकम् ।
दन्तीतत्रिकटुकुष्ठैकं षड्भागं लाङ्गलस्य च ॥ १५० ॥

३६८भैषज्यरत्नावली ।[ अर्शोरोग-

क्षारसैन्धवटङ्कानां प्रत्येकं भागपञ्चकम् ।
गोमूत्रस्य च द्वात्रिंशत् स्नुहीक्षीरं तथैव च ॥ ५१ ॥
यावच्च पिण्डितं सर्वं तावन्मृद्वग्निना पचेत् ।
माषद्वयं ततः खादेद् दिवास्वप्नादि वर्ज्जयेत् ॥
रसश्चञ्चूत्कुठारोऽयमर्शांसां कुलनाशनः ॥ ५२ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और लोहा ये प्रत्येक दो दो भाग, दन्ती, सोंठ, पीपल मिरच और कूट ये प्रत्येक एक एक भाग, कलिहारीकी जड ६ भाग, जवाखार, सैंधानमक और सुहागा प्रत्येक ५-५ भाग, गोमूत्र और थूहरका दूध प्रत्येक बत्तीस बत्तीस भाग लेवे । सबको एकत्र मिलाकर तबतक मन्द २ अग्निसे पकावे जबतक पकते पकते सब औषधि पिण्डकी समान होजाय । फिर उसका चूर्ण करके उसमेंसे दो दो माशे परिमाण सेवन करे । इसपर दिनमें सोना आदि त्याग देना चाहिये । यह चञ्चूत्कुठाररस सम्पूर्ण उपद्रवोंसहित अर्शोरोगको नष्ट करता है ॥ ५०-५२ ॥

चक्रेश्वररस ।

चतुर्भागं शुद्धसूतं पञ्च टङ्कणमभ्रकम् ।
त्रिदिनं भावयेद् घर्में द्रवैः श्वेतपुनर्नवैः ॥ ५३ ॥
द्विगुञ्जं भक्षयेन्नित्यं वातदुर्नामशान्तये ।
सिद्धश्चक्रेश्वरो नाम रसश्चार्शःकुलान्तकः ॥ ५४ ॥

शुद्ध पारा ४ भाग एवं सुहागा और अभ्रक प्रत्येक ५-५ भाग लेवे । सबको सफेद पुनर्नवैके रसमें धूपमें रखकर तीन दिनतक भावना देवे । पश्चात् दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनाकर नित्य एक एक गोली सेवन करे । वातज बवासीरको नष्ट करनेके लिये तो यह चक्रेश्वर नामक रस प्रसिद्ध ही है । एवं अन्यान्य अर्शोंको भी समूल नष्ट करता है ॥ ५३ ॥ ५४ ॥

शिलागन्धकवटी ।

शिलागन्धकयोश्चूर्णे पृथग् भृङ्गरसाप्लुतम् ।
सप्ताहं भावयेत् सर्पिर्मधुभ्यां च विमर्दयेत् ॥ ५५ ॥
अर्शंसश्चानुलोम्यार्थं हुताग्निवलवर्द्धनम् ।
रक्तिकाद्वितयं खादेत् कुष्ठादिरहितो नरः ॥ ५६ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३६९

मैनसिल और गन्धकके चूर्णको अलग अलग भाँगरेके रसमें १ सप्ताह तक भावना देकर घी और शहदके साथ खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ प्रस्तुत करलेवे। इसके खानेसे अर्शरोगीके वायुका अनुलोमन होता है, नष्ट हुई अग्नि पुनः दीपन होती है और कुष्ठादि उपसर्गोंसे रहित होकर मनुष्य आरोग्य होता है ॥ ५५ ॥ ५६ ॥

जातीफलादिवटी ।

जातीफलं लवङ्गं च पिप्पली सैन्धवं तथा । शुण्ठी धुस्तूरबीजं च दरदं टङ्कणं तथा ॥ ५७ ॥ समं सर्वे विचूर्ण्याथ जम्भीराम्भसा विमर्दयेत् । जातीफलवटी चेयमर्शोऽग्निमान्द्यनाशिनी ॥ ५८ ॥

जायफल, लौंग, पीपल, सेंधानमक, सोंठ, धतूरेके बीज, सिंगरफ और सुहागा इन सबको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर जम्बीरी नींबूके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ तैयार करलेवे । यह जातीफलाद्यवटी सर्वप्रकारके अर्शरोग और मन्दाग्निको नष्ट करती है ॥ ५७ ॥ ५८ ॥

पञ्चाननवटी ।

मृतसूताभ्रलोहानि मृतार्कगन्धकैः सह । सर्वाणि समभागानि भल्लातं सर्वतुल्यकम् ॥ ५९ ॥ वन्यशूरणकन्दोत्थर्द्रवैः पलप्रमाणतः । मर्दयेद्दिनमेकं च माषमात्रं पिबेद् घृतैः ॥ १६० ॥ भक्षणाद्धन्ति सर्वाणि चार्शांसि च न संशयः । असाध्येष्वपि कर्त्तव्या चिकित्सा शङ्करोदिता ॥ कुष्ठरोगं निहन्त्याशु मृत्युरोगविनाशिनी ॥ ६१ ॥

रससिन्दूर, अभ्रक, लोहा, ताँबा और शुद्ध गन्धक ये सब समान भाग और शुद्ध भिलावे सबकी बराबर भाग लेवे । फिर सबको एकत्र पीसकर ४ तोले प्रमाण जंगली जिमीकन्दके रसमें खरल करके एक एक माशेकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे प्रतिदिन एक एक गोली घृतके साथ पान करे । इस वटीके सेवन करनेसे सर्वप्रकारके अर्शरोग निस्सन्देह नष्ट होते हैं। इस वटीके द्वारा असाध्य रोगोंमें भी चिकित्सा करनी चाहिये ऐसा शंकरने कहा है । यह वटी कुष्ठरोग और मृत्युरोगको तत्काल नाश करनेवाली है ॥ ५९-१६१ ॥

३६०भैषज्यरत्नावली ।[ अर्शोरोग-

नित्योदित रस ।

शुद्धसूताभ्रलोहार्कविषं गन्धं समं समम् ।
सर्वतुल्यं तु भल्लातफलमेकत्रः चूर्णयेत् ॥ ६२ ॥
द्रवैः शूरणकन्दोत्थैः खल्ले मर्द्यं दिनत्रयम् ।
माषमात्रं लिहेदाज्यं रसश्चार्शांसि नाशयेत् ॥
रसो नित्योदितो नाम गुदोद्भवकुलान्तकः ॥ ६३ ॥

शुद्ध पारा, अभ्रक, लोहा, ताँबा, शुद्ध मीठातेलिया और शुद्ध गन्धक ये सब समान भाग और सबकी बराबर भाग भिलावे लेकर सबको एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर जिमीकन्द और मानकन्दके रसमें तीन दिनतक उत्तम प्रकारसे खरल करके इसमेंसे प्रतिदिन एक एक माशे परिमाण रसको घीके साथ मिलाकर चाटे तो सर्व प्रकारके अर्शरोग नष्ट होते हैं । विशेषकर यह नित्योदित नामक रस बवासीरको समूल नष्ट करते हैं ॥ ६२ ॥ ६३ ॥


अष्टाङ्गरस ।

गन्धं रसेन्द्रं मृतलौहकिट्टं फलत्रयं त्र्युषणवह्निभृङ्गरम् ।
कृत्वा समं शाल्मलिकागुडूचीरसेन यामत्रितयं विमर्द्य ॥
निष्कप्रमाणं गदितानुपानैः सर्वाणि चार्शांसि हरेद्रसस्य ॥६४

शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा, लोहभस्म, मण्डूरभस्म, हरड, आमला, बहेडा, सोंठ, पीपल, मिरच, चीता और भाँगरा इन सबको समान भाग लेकर सेमलकी मूसली और गिलोय प्रत्येकके रसमें तीन प्रहरतक खरल करके ४-४ माशेकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसकी एक एक गोली प्रतिदिन घृतके साथ खानेसे सम्पूर्ण अर्शरोग दूर होता है ॥ ६४ ॥


उदकषट्पलकघृत ।

सक्षारैः पञ्चकोलैस्तु पलिकैस्त्रिगुणोदकैः ।
समं क्षीरं घृतं प्रस्थं ज्वरार्शःप्लीहकासनुत् ॥ ६५ ॥

जवाखार, पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीतेकी जड और सोंठ ये प्रत्येक ४-४ तोले, जल सब औषधियोंसे तिगुना, दूध एक प्रस्थ और घी एक प्रस्थ लेवे सबको एकत्र मिलाकर यथाविधि घृतको सिद्ध करे । यह घृत ज्वर, बवासीर प्लीहा, खांसी आदि विकारोंकों दूर करता है ॥ ६५ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३६१


व्योषाद्यघृत ।

व्योषगर्भे पलाशस्य त्रिगुणे भस्मवारिणि ।
साधितं पिबतः सर्पिः पतन्त्यर्शांस्यसंशयम् ॥ ६६ ॥

सोंठ, पीपल और मिरच इनके समान भाग मिश्रित कल्कसे तिगुने ढाककी भस्मके जलमें घृतको सिद्ध करके पान करनेसे अर्शके अंकुर निश्चय गिरजाते हैं ॥

चव्याद्यघृत ।

चव्यं त्रिकटुकं पाठां क्षारं कुस्तुम्बुरूणि च ।
यमानी पिप्पलीमूलमृते च विडसैन्धवे ॥ ६७ ॥
चित्रकं बिल्वमभयां पिष्ट्वा सर्पिर्विपाचयेत् ।
शकृद्वातानुलोम्यार्थं जाते दध्नि चतुर्गुणे ॥ ६८ ॥
प्रवाहिकां गुदभ्रंशं मूत्रकृच्छ्रं परिस्रवम् ।
गुदवङ्क्षणशूलं च घृतमेतद् व्यपोहति ॥ ६९ ॥

चव्य, सोंठ, पीपल, मिरच, पाठ, जवाखार, धनियां, अजवायन, पीपलामूल, नागरमोथा, बिरियासंचर नमक, सेंधानमक, चीतेकी जड, बेलगिरी और हरड इन सबको समान भाग लेकर एकत्र पीसलेवे फिर इनके कल्क और कल्कसे चौगुने दहीके पानीमें १ प्रस्थ घृतको पकावे इस घृतको पान करनेसे मल और वायुका अनुलोमन होता है । एवं यह घृत प्रवाहिका, गुदभ्रंश, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, रक्तस्राव, गुदा और वंक्षणका शूल इन सबको दूर करता है ॥ ६७-६९ ॥

कुटजाद्यघृत ।

कुटजफलवल्कलकेशरनीलोत्पललोध्रधातकीकल्कैः ।
सिद्धं घृत विधेयं शूलं रक्तार्शसां भिषजा ॥ १७० ॥

इन्द्रजौ, कुडेकी जडकी छाल, नागकेशर, नीलकमल, लोध आर धायके फूल इनके समान भाग मिश्रित कल्कैक द्वारा घृतको यथाविधि सिद्ध करके शूल और रुधिरकी बवासीरवाले रोगियोंको सेवन कराना चाहिये ॥ १७० ॥

। सह्यमृतघृत ।

पचेद्वारिचतुर्द्रोणे कण्टकार्यामृताशतम् ।
तत्राभित्रिफलाव्योषपूतीकत्वक्कलिङ्गकैः ॥ ७१ ॥
सकाश्मर्यविडङ्गांस्तु सिद्धं दुर्नाममेहजित् ।
घृत सिंहामृतं नाम बोधिसत्त्वेन भाषितम् ॥ ७२ ॥

३६२भैषज्यरत्नावली ।[ अर्शोरोग

कटेरी और गिलोय इन दोनोंको सौ सौ पल लेकर ४ द्रोण परिमाण जलमें पकावे जब चतुर्थांश जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें चीतेकीं जड, हरड, आमला, बहेडा, सोंठ, पीपल, मिरच, दुर्गन्ध करंजकी छाल, इन्द्रजौ, कुम्भेरु और वायविडंग इनके समान भाग मिश्रित कल्क और १ प्रस्थ घृतकों डालकर विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे । यह सिंह्यामृतनामक घृत बवासीर और प्रमे-हको नष्ट करता है ऐसा बोधिसत्त्वमुनिने कहा है ॥ ७१ ॥ ७२ ॥

सुनिषण्णक चांगेरीघृत ।

अवाक्पुष्पी बला दार्बी पृश्निपर्णी त्रिकण्टकः ।
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थशुङ्गाश्च द्विपलोन्मिताः ॥ ७३ ॥
कषाय एषां पेष्यास्तु जीवन्ती कटुरोहिणी ।
पिप्पली पिप्पलीमूलं मरिचं देवदारु च ॥ ७४ ॥
कलिङ्गं शाल्मलीपुष्पं वीरा चन्दनमञ्जनम् ।
कट्फलं चित्रको मुस्तं प्रियङ्ग्वतिविषे स्थिरा ॥ ७५ ॥
पद्मोत्पलानां किञ्जल्कः समङ्गा सनिदिग्धिका ।
बिल्वं मोचरसः पाठा भागाः स्युः कार्षिकाः पृथक् ॥ ७६ ॥
चतुःप्रस्थशृतं प्रस्थं कषायमवतारयेत् ।
"त्रिंशत्पलानि तु प्रस्थो विज्ञेयो द्विपलाधिकः" ॥ ७७ ॥
सुनिषण्णकचाङ्गेर्योः प्रस्थौ द्वौ स्वरसस्य च ।
सर्वैरेतैैर्यथोद्दिष्टैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ७८ ॥

सोया, खिरैंटी, दारुहल्दी, पृश्निपर्णी, गोखरू, वड, गूलर और पीपलके अंकुर ये प्रत्येक आठ आठ तोले लेकर एक द्रोण जलमें पकावे जब चौथाई भाग जल शेष रह जाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इस क्वाथमें जीवन्ती, कुटकी, पीपल पीपला-मूल, मिरच, देवदारू, इन्द्रजौ, सेमलके फूल, क्षीरकाकोली, लालचन्दन, रसौंत, कांयफल, चीता, नागरमोथा, फूलप्रियंगु, अतीस, शालपर्णी, कमलकेशर, नीले कमलकी केशर, लज्जावन्ती, कटेरी, मोचरस और पाठ इन प्रत्येक औषधिको एक-एक कर्ष प्रमाण लेकर बारीक पीसकर औषधियोंके ४ प्रस्थ क्वाथमें डालकर जब पकते २ एक-प्रस्थ क्वाथ शेष रहजाय तब उतारलेवे । ( यहाँपर प्रस्थ ३२ पलका मानना चाहिये ) । फिर उसमें शिरियारीके शाकका स्वरस और नोनियाका स्वरस एक एक प्रस्थ एवं घृत एक प्रस्थ डालकर विधिपूर्वक घृतको पकावे ॥ ७३-७८ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३६३


एतदर्शस्स्वतीसारे त्रिदोषे रुधिरस्रुतौ ।
प्रवाहणे गुदभ्रंशे पिच्छासु विविधासु च ॥ ७९ ॥
उत्थाने चातिबहुशः शोथशूले गुदाश्रये ।
मूत्रग्रहे मूढवाते मन्देऽग्नावरुचावपि ॥ १८० ॥
प्रयोज्य विधिवत् सर्पिर्बलवर्णाग्निवर्द्धनम् ।
विविधेष्वनुपानेषु केवलं वा निरत्ययम् ॥ ८१ ॥

इस घृतको सर्वप्रकारके अर्शरोग, अतिसार, त्रिदोषज रक्तस्राव, प्रवाहिका, गुदभ्रंश, नानाप्रकारकी पिच्छिलता, बारबार मलका निकालना, गुदागत शोथ अथवा शूल, मूत्राशयसम्बन्धी रोग, मूढवात, मन्दाग्नि, अरुचि आदि रोगोंमें विविधप्रकारके अनुपानोंके साथ अथवा केवल घृतको ही विधिपूर्वक सेवन करानेसे उक्त समस्त विकार दूर होते हैं एवं बल वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है ॥ ८१ ॥

कासीसाद्यतैल ।

कासीस दन्तिसिन्धूत्थकरवीरानलैः पचेत् ।
तैलमर्कपयोमिश्रमभ्यङ्गात् पायुकीलजित् ॥ ८२ ॥

कसीस, दन्तीकी जड, सैंधानमक, कनेरकी जड और चीतेकी जड इन प्रत्येकके एकएक तोले कल्कके द्वारा एक प्रस्थ प्रमाण तिलके तैलको पकावे। फिर आकके दूधमें मिलाकर मालिश करनेसे अर्शके अंकुरोंको दूर करता है ॥ ८२ ॥

बृहत्कासीसाद्यतैल ।

कासीसं सैन्धवं कृष्णा शुण्ठी कुष्ठं च लाङ्गली ।
शिलाभिदश्वमारश्च दन्ती जन्तुघ्नचित्रकम् ॥
तालकं कुनटी स्वर्णक्षीरी चैतैः पचेद्भिषक् ॥ ८३ ॥
तैलं स्नुह्यर्कपयसा गवां मूत्र चतुर्गुणम् ।
एतदभ्यङ्गतोऽर्शांसि क्षारेणेव पतन्ति हि ॥
क्षारकम्मकरं ह्येतन्न च सन्दूषयेद्वलिम् ॥ ८४ ॥

कसीस, सेंधानमक, पीपल, सोंठ, कूठ, कलिहारीकी जड, पाषाणभेद, कनेरकी जड, दन्तीकी जड, वायविडङ्ग, चीतेकी जड, हरताल, मैनासिल, पीले फूलकी सत्यानासी, कटेरी इन सबको समान भाग एवं तिलका तैल एक प्रस्थ थूहरका दूध १ प्रस्थ, आकका दूध १ प्रस्थ और गोमूत्र ४ प्रस्थ लेवे। सबको एकत्र मिलाकर

३६४ भैषज्यरत्नावली । [ अर्शोरोग-

विधिपूर्वक तैलको पकावे । इस तैलकी मालिश करनेसे अर्शके अंकुर इस प्रकार निस्सन्देह गिरजाते हैं, जिसप्रकार क्षारसे गुदाके अंकुर नष्ट होजाते हैं । क्षारकी समान कार्य करनेवाला यह तैल अर्शकी वलिको दूषित नहीं करता है ॥८३॥८४॥

पिप्पल्याद्यतैल ।

पिप्पलीं मधुकं बिल्वं शताह्वां मदनं वचाम् । कुष्ठं शुण्ठीं पुष्कराख्यं चित्रकं देवदारु च ॥ ८५ ॥ पिष्ट्वा तैलं विपक्तव्यं द्विगुणक्षीरसंयुतम् । अर्शसां मूढवातानां तच्छ्रेष्ठमनुवासनम् ॥८६॥ गुदनिस्सरणं शूलं मूत्रकृच्छ्रं प्रवाहिकाम् । कट्यूरुपृष्ठदौर्बल्यमानाहं वङ्क्षणाश्रयम् ॥ ८७ ॥ पिच्छास्रावं गुदे शोथं वातवर्चोविनिग्रहम् । उत्थानं बहुशो यच्च जयेच्चैवानुवासनात् ॥ ८८ ॥

पीपल, मुलहठी, बेलगिरी, सोया, मैनफल, वच, कूठ, सोंठ, पुहकरमूल, चीता और देवदारु इन सबको समान भाग लेकर एकत्र पीस लेवे । इस कल्कके द्वारा १ प्रस्थ तेलको दुगुने दूधके साथ मिलाकर पकावे । इस तेलको अर्शरोगियों और वातसे पीडित रोगियोंके अनुवासनबस्तिद्वारा प्रयोग करना श्रेष्ठ है । एवं गुदाका बाहर निकलना, शूल, मूत्रकृच्छ्र प्रवाहिका, कमर, पीठ और जंघाओंकी दुर्बलता, अफारा, वंक्षणकी पीडा, पिच्छिलतायुक्त स्राव, गुदाकी सूजन, वायु और मलका अवरोध ये लक्षण यदि बारबार उत्पन्न हों तो इस तेलकी अनुवासनबस्तिसे इन सब विकारोंको जीतना चाहिये ॥ ८५-८८ ॥

दन्त्यरिष्ट ।

दन्तीचित्रकमूलानामुभयोः पञ्चमूलयोः । भागान् पलांशानायोज्य जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ८९ ॥ त्रिपलं त्रिफलायाश्च दलानां तत्र दापयेत् । रसे चतुर्थशेषे तु पूतशीते प्रदापयेत् ॥ ९० ॥ तुलां गुडस्य तिष्ठेन्मासार्द्धं घृतभाजने । तन्मात्रया पिबेन्नित्यमर्शोभ्यः प्रविमुच्यते ॥ ९१ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३६५

ग्रहणीपाण्डुरोगघ्नं वातवर्चोऽनुलोमनम् ।
दीपनं चारुचिघ्नं च दन्त्यरिष्टमिदं विदुः ॥
पात्रेऽरिष्टादिसन्धान धातकीलोध्रलेपिते ॥ ९२ ॥

दन्तीकी जड, चीतेकी जड और दशमूलकी समस्त औषधियाँ प्रत्येकको चार चार तोले लेकर एकत्र कूटकर १ द्रोण जलमें पकावे और पाक होते समय उसमें हरड आमला और बहेडा इन तीनोंके पत्तोंको तीन पल प्रमाण डाल देवे । जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रह जाय तब उतारकर कपडेमें छानलेवे । फिर शीतल होनेपर उसमें पुराना गुड सौ पल प्रमाण डालकर घीके चिकने बर्तनमें भरकर और उसके मुँहको अच्छे प्रकारसे बन्द करके पन्द्रह दिनतक रक्खा रहनेदेवेँ तत्पश्चात् इसको उचित मात्रासे प्रतिदिन पान करनेसे मनुष्य अर्शारोगसे सर्वथा मुक्त होजाता है । यह अरिष्ट ग्रहणी और पाण्डुरोगनाशक, वायु और मलका अनुलोमन करनेवाला, अग्निदीपक और अरुचिको दूर करनेवाला है । इसको पूर्वाचार्यगण दन्त्यरिष्ट कहते हैं । धायके फूल और लोधके द्वारा लेप कियेहुए पात्रमें अरिष्टादि रखने चाहिये ॥ १८९-१९२ ॥

क्षार ।

प्रशस्तेऽहनि नक्षत्रे कृतमङ्गलपूर्वकम् ।
कालमुष्ककमाहृत्य दग्ध्वा भस्म समाहरेत् ॥ ९३ ॥
आढकं त्वेकमादाय जलद्रोणे पचेद्भिषक् ।
चतुर्भागावशिष्टेन वस्त्रपूतेन वारिणा ॥ ९४ ॥
शंखचूर्णस्य कुडवं प्रक्षिप्य विपचेत पुनः ।
शनैः शनैर्मृदावग्नौ यावत् सान्द्रतनुर्भवेत् ॥ ९५ ॥
सर्ज्जिकायावशूकाभ्यां शुण्ठी मरिचपिप्पली ।
वचा चातिविषा चैव हिङ्गुचित्रकयोस्तथा ॥ ९६ ॥
एषां चूर्णानि निक्षिप्य पृथक्त्वेनाष्टमाषकम् ।
दर्ग्या संघट्टितं चापि स्थापयेदायसे घटे ॥
एष वह्निसमः क्षारः कीर्त्तितः कश्यपादिभिः ॥ ९७ ॥

उत्तम दिन और शुभ नक्षत्रमें पहले मांगलिक कार्य करके काले फलके घण्टा-पाटलवृक्षकी शाखा लाकर उसको अग्निमें जलाकर भस्म करलेवे फिर उस भस्मको १ आढक परिमाण लेकर १ द्रोण जलमें पकावे जब पकते २ चौथाई भाग जल

३६६ भेषज्यरत्नावली । [अर्शोरोग-

शेष रहजाय तब उतारकर वस्त्रमें छानलेवे । फिर उसमें शंखका चूर्ण १ कुडव परि- माण डालकर धीरे २ मन्द अग्निने पकावे जब पकते २ पाक गाढा होजाय तब उसको नीचे उतारकर उसमें सज्जी, जवाखार, सोंठ मिरच, पीपल, वच, अतीस, हींग और लालचीतेकी जड इन औषधियाके आठ आठ मासे चूर्णको डालकर करछीसे अच्छीतरह घोटकर लोहंके पात्रमें भरकर रखदेवे । यह क्षार अग्निकी समान तीक्ष्ण है ऐसा कश्यपादि ऋषियोंने कहा है ॥ ९३-९७॥

क्षारपाकविधिः

तोये कालकमुष्ककस्य विपचेद्भस्माढकं षड्गुणे पात्रे लौहमये दृढे विपुलधीर्द्वर्व्या शनैर्घट्टयन् । दग्ध्वाऽग्नौ बहुशंखनाभिशकलान् पूतावशेषे क्षिपे- द्यद्येरण्डजनालमेष दहति क्षारो वरो वाक्शतात् ॥९८॥ प्रायस्त्रिभागशिष्टेऽस्मिंस्वच्छपैच्छिल्यरक्तता । सञ्जायते तदास्राव्य क्षारको ग्राह्यमिष्यते ॥ ९९ ॥ तुर्येणाष्टमकेन षोडशगुणेनांशेन संव्यूहिमो मध्यः श्रेष्ठ इति क्रमेण विहितः क्षारोदकाच्छङ्कः॥२०० नातिसान्द्रो नातितनुः क्षारपाक उदाहृतः । दुर्नामकादौ निर्दिष्टः क्षारोऽय प्रतिसारणः ॥ १ ॥ पानीयो यस्तु गुल्मादौ तं वारानेकविंशतिम् । स्रावयेत् षड्गुणे तोये केचिदाहुश्चतुर्गुणे ॥ २ ॥

काले फूलके घण्टापाढलवृक्षकी भस्मको १ आढक परिमाण लेकर छःगुने जलमें डालकर लोहेके पात्रमें मन्द २ अग्निसे पकावे और करछीसे धीरे धीरे चलाता जाय और उसमें शंखनाभिके टुकडोंको अग्निमें दग्ध करके, और वस्त्रमें छानकर डालदेवे सौकी गिनती गिननेमें जितनी देर लगे उतनी देरमें यह क्षार यदि अण्डकी नालको जलादेवे तो उत्तम क्षार हुआ जानना चाहिये । प्रायः तीसरा भाग जल अवशेष रहनेपर इस क्षारमें पिच्छिलता और लालिमा उत्पन्न होजाय तो उसको टपकाकर क्षार जल ग्रहण करना चाहिये । मृदु, मध्य और तीक्ष्ण इन भेदोंसे क्षार तीन प्रकारका होता है । पूर्वोक्त क्षार जलसे चौथाई भाग शंखभस्म डालकर बनायाहुआ क्षार मृदु क्षार, जलसे आठवाँ भाग शंखभस्म डालकर बनायाहुआ क्षार मध्यम और

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३६७


जलसे सोलहवाँ भाग शंखभस्म डालकर बनायाहुआ क्षार तीक्ष्ण वा श्रेष्ठ होता है। क्षारका पाक न अत्यन्त गाढा और न अत्यन्त पतला होना चाहिये । किन्तु जिससे अर्शके अंकुरोंपर सहजही मालिश की जासके इस प्रकारका क्षार पाक करना चाहिये । बवासीर आदि रोगोंमें प्रतिसारण क्षार उत्तम कहागया है और पानीयक्षार गुल्मादिरोगोंमें हितकर है। इस पानीयक्षारको क्षारसे ६ गुने, किसी २ के मतसे ४ गुने जलमें डालकर २१ बार टपकाना चाहिये ॥१९८-२०२ ॥

अर्शरोगमें पथ्य ।

विरेचनं लेपनमस्रमोक्षः क्षाराग्निशस्त्राचरितं च कर्म ।
पुरातना लोहितशालयश्च षष्टिकाश्चापि यवाःकुलित्थाः ॥३
पटोलपत्तूररसोनवह्निपुनर्नवाशूरणवास्तुकानि ।
जीवन्तिका दन्तिशठी सुरा च त्रुटिर्वयःस्था नवनीततक्रम्॥४
कक्कोलधात्रीरुचकं कपित्थमौष्ट्राणि मूत्राज्यपयांसि चापि ।
भल्लातकं सार्षपजं च तैलं गोमूत्रसौवीरतुषोदकानि ॥
वातापहं यच्च यदग्निकारि तदन्नपानं हितमर्शसेभ्यः ॥ ५ ॥

अर्शरोगियोंके लिये विरेचन, प्रलेप, रक्तमोक्षण, क्षार, अग्नि और शस्त्रकर्म, पुराने लाल शालिधानोंके चावल, सांठीके चावल, जौ, कुलथी, परवल, शालिंचशाक, लहसुन, चीता, लालविषखपरा, जिमीकन्द, बथुआ, जीवन्तीका शाक, दन्तीकी जड, कचूर, मद्य, छोटी इलायची, हरड, नैनीघी, मट्ठा, शीतलचीनी, आमला, कालानमक, कैथ, ऊँटका मूत्र घी और दूध, भिलावे, सरसोंका तैल, गोमूत्र, सौवीर-नामक काँजी और तुषोदक नामक काँजी एवं वायुनाशक और अग्निवर्द्धक समस्त अन्न पान हितकारी हैं ॥ ३–५ ॥

अर्शरोगमें अपथ्य ।

आनूपमामिषं मत्स्यं पिण्याकं दधि पिष्टकम् ।
माषान् करीरं निष्पावं बिल्वं तुम्बीमुपोदिकाम् ॥ ६ ॥
पक्वाम्रं शालुकं सर्वं विष्टम्भीनि गुरूणि च ।
आतपं जलपानानि वमनं वस्तिकर्म च ॥ ७ ॥
विरुद्धानि च सर्वाणि मारुतं पूर्वदिग्भवम् ।
वेगरोधं स्त्रियं पृष्ठयानमुत्कटकासनम् ॥
यथास्वं दोषलं चान्नमर्शसः परिवर्जयेत् ॥ ८ ॥

३६८भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

यत्त पथ्यं यदपथ्यं च वक्ष्यते रक्तपित्तिनाम् ॥
रक्तार्शोरोगिणां तत्तदपि विद्याद्विशेषतः ॥ ९ ॥

आनूपदेशके पशुपक्षियोंका मांस, मछली, तिलकूट, दही, पिष्टीके बने पदार्थ, उड़द, बाँसके अंकुर, सेमकी फली, बेल, लाकी, पोईका शाक, पक्का आम, भसींडा एवं सर्व प्रकारके विबन्धकारक गुरुपाकी पदार्थ, धूप, जलपान, वमन, वस्तिकर्म, सर्वप्रकारके प्रकृतिविरुद्ध, देश काल और संयोगविरुद्ध पदार्थ, पूर्वदिशाकी वायु, मलमूत्रादिके वेगको रोकना, स्त्रीप्रसंग, घोडे आदिकी सवारी करना, टेढे तिरछे होकर बैठना, एवं अर्शके दोषको बढानेवाले यथेच्छ अन्न पानादि पदार्थ अर्शरोग-वालेको त्यागदेने चाहिये । रक्तपित्तरोगियोंके लिये जो पथ्यापथ्य कहा गया है वह सब पथ्यापथ्य अर्शमें भी विशेषरूपसे सेवन कराना चाहिये ॥ २०६-२०९ ॥

इति अर्शोरोगचिकित्सा ॥


अग्निमान्द्यचिकित्सा ।

सारमेतच्चिकित्सायाः परमग्नेश्च पालनम् ।
तस्माद्यत्नेन कर्त्तव्यं वन्हेस्तु प्रतिपालनम् ॥ १ ॥
'अस्तु दोषशतं क्रुद्धं सन्तु व्याधिशतानि च ।
कायाग्निमेव मतिमान् रक्षन् रक्षति जीवितम् ॥ २ ॥

जठराग्निको समान भावसे रक्षा करना ही इस रोगकी चिकित्साका प्रधान कर्त्तव्य है, इसलिये सैकड़ों दोषों और सैकड़ों व्याधियोंके कुपित होनेपर भी सबसे पहले यत्नपूर्वक अग्निकी रक्षा करनी चाहिये । कारण, अग्निके क्षीण होजानेपर कोई भी औषधि गुण नहीं करती है । जठराग्निकी रक्षा करताहुआ बुद्धिमान् वैद्य जीवनकी रक्षा करता है ॥ १ ॥ २ ॥

समस्य रक्षणं कार्यं विषमे वातनिग्रहः ।
तीक्ष्णे पित्तप्रतीकारो मन्दे श्लेष्मविशोधनम् ॥ ३ ॥

समाग्निकी सदैव रक्षा करनी चाहिये । विषमाग्निमें वायुकी शान्ति, तीक्ष्णाग्निमें पित्तको शमन करनेवाली और मन्दाग्निमें कफको प्रशमन करनेवाली क्रिया एवं लंघनादि करने चाहिये ॥ ३ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३६९


हरीतकी भक्ष्यमाणा नागरेण गुडेन वा ।
सैन्धवोपहिता वापि सातत्येनाग्निदीपनी ॥ ४ ॥
हरड और सोंठके चूर्णको गुड वा सैन्धानमकके साथ प्रतिदिन सेवन करनेसे अग्नि दीपन होती है ॥ ४ ॥

समयावशूकमहौषधचूर्णं लीढं घृतेन गोसर्गे ।
कुरुते क्षुधां सुखोदकं पीतं विश्वौषधं वैकम् ॥ ५ ॥
जवाखार और सोंठके चूर्णको समान भाग लेकर अथवा केवल सोंठके चूर्णको गौके घीमें मिलाकर प्रतिदिन प्रातःकाल चाटे और ऊपरसे कुछ गरम जल पीवे तो क्षुधाकी वृद्धि होती है ॥ ५ ॥

अन्नमण्डं पिबेदुष्णं हिङ्गुसौवर्चलान्वितम् ।
विषमोऽपि समस्तेन मन्दो दीप्येत पावकः ॥ ६ ॥
हींग और काला नमक मिलाकर भातका सुहाता २ मांड पीनेसे विषमाग्नि सम और मन्दाग्नि दीपन होती है ॥ ६ ॥

भोजनाग्रे सदा पथ्यं जिह्वाकण्ठावशोधनम् ।
अग्निसन्दीपनं हृद्यं लवणाईकभक्षणम् ॥ ७ ॥
भोजन करनेसे पहले प्रतिदिन सैंधानमक और अदरखको भक्षण करनेसे जीभ और कण्ठकी शुद्धि होती है। अग्नि दीपन होती है और यह प्रयोग हृदयको हितकारी है ॥ ७ ॥

तीक्ष्णाग्निचिकित्सा ।

नारीक्षीरेण संयुक्तां पिबेत्तौदुम्बरीं त्वचम् ।
आभ्यां वा पायसं सिद्धं पिबेदत्यग्निशान्तये ॥ १ ॥
यत् किञ्चिद् गुरु मेध्यं च श्लेष्मकारि च भेषजम् ।
सर्वं तदत्यग्निहितं भुक्त्वा प्रस्वपनं दिवा ॥ २ ॥
तीक्ष्णाग्निको शान्त करनेके लिये गूलरकी छालको स्त्रीके दूधमें पीसकर पान करे अथवा स्त्रीके दूध और गूलरकी छालकी खीर बनाकर सेवन करे। एवं गुरुपाकी मेध्य और कफकारक जितने पदार्थ या औषध हैं, उन सबको सेवन करना और दिनमें सोना ये सब तीक्ष्णाग्निवाले रोगीके लिये हितकर है ॥ १ ॥ २ ॥

मुहुर्मुहुरजीर्णेऽपि भोज्यमस्योपकल्पयेत् ।
निरिन्धनोऽन्तरं लब्ध्वा यथैनं न निपातयेत् ॥ ३ ॥

२४

३७०भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य--

तीक्ष्ण अग्निवाले मनुष्यको अजीर्ण होनेपर भी बारबार भोजन कराना चाहिये । कारण जिससे भोजनरूपी ईंधनके बिना जठराग्नि अवसर पाकर शरीरके रसादिको सुखाकर रोगीको नष्ट न करदेवे ॥ ३ ॥

आमाजीर्णचिकित्सा ।

तत्रामे वमनं कार्यं विदग्धे लंघन हितम् ॥ १ ॥
आमके अजीर्णमें वमन और विदग्धाजीर्णमें लंघन कराने उपयोगी हैं ॥ १ ॥

वचालवणतोयेन वान्तिरामे प्रशस्यते ।
कणासिन्धुवचाकल्कं पीत्वा च शिशिराम्भसा ॥ २ ॥
आमयुक्त अजीर्णमें वच और सैंधेनमकके चूर्णको गरम जल डालकर पान करानेसे अथवा पीपल सैंधानमक और वच इनके कल्कको शीतल जलके साथ पान करानेसे वमन होकर आम शान्त होती है ॥ २ ॥

धान्यनागरसिद्धं तु तोयं दद्याद्विचक्षणः ।
आमाजीर्णप्रशमनं दीपनं वस्तिशोधनम् ॥ ३ ॥
धनियाँ और सोंठका क्वाथ सेवन करनेसे अमाजीर्ण शमन होता है, अग्निदीपन होती है और मूत्राशय शुद्ध होता है ॥ ३ ॥

भवेद्यदा प्रातरजीर्णशङ्का तदाऽभयां नागरसैन्धवाभ्याम् ।
विचूर्णितां शीतजलेन भुक्त्वा भुञ्ज्यादशङ्कं मितमन्नकाले ॥
यदि प्रातःसमय अजीर्णकी आशंका हो तो हरड, सोंठ और सैंधानमक इनको एकत्र पीसकर शीतल जलके साथ पान करके भोजनके समय थोडा भोजन कराना चाहिये ॥ ४ ॥

चित्रकगुडिका ।

चित्रकं पिप्पलीमूलं द्वौ क्षारौ लवणानि च ।
व्योषं हिङ्ग्वजमोदां च चव्यं चैकत्र चूर्णयेत् ॥ ५ ॥
सौवर्चलं सैन्धवं च विडमौद्भिदमेव च ।
सामुद्रेण समं पञ्चलवणान्यत्र योजयेत् ॥ ६ ॥
गुडिका मातुलुङ्गस्य दाडिमस्य रसेन वा ।
कृत्वा विपाचयत्यामं दीपयत्याशु चानलम् ॥ ७ ॥
[ दृष्टफलोऽयम् ]

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३७१

चीतेकी जड, पीपलामूल, जवाखार, सजी, काला नमक, सैन्धानमक, विरिया-संचर नमक, साम्भर नमक, सामुद्र नमक, पीपल, मिरच, हींग, अजमोद और चव्य इन सब को समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे अथवा बिजौरे नीम्बूके रसमें किंवा अनारके रसमें खरल करक एक एक माशेकी गोलियां बनाकर सेवन करे तो यह गोली आमको तत्काल पचाती है और अग्निको दीपन करती है । यह अनुभवसिद्ध प्रयोग है ॥ ५-७ ॥

विदग्धाजीर्णचिकित्सा ।

अन्नं विदग्धं हि नरस्य शीघ्रं शीताम्बुना वै परिपाकमेति ।
तत्तस्य शैत्येन निहन्ति पित्तमाक्लेदिभावाच्च नयत्यधस्तात् ॥ १ ॥

शीतल जल पान करनेसे मनुष्यके विदग्ध अन्न शीघ्र पचजाता है एवं जलकी शीतलताके कारण पित्त प्रशमित होता है और क्लेद्युक्त (द्रव) होनेसे भोजनको नीचे गेरदेता है ॥ १ ॥

विदह्यते यस्य च भुक्तमात्रं दह्येत हृत्कोष्ठगलं च यस्य ।
द्राक्षासितामाक्षिकसंप्रयुक्तां लीढ्वाऽभयां वै स सुखं लभेत ॥ २ ॥

जिसके भोजन करते ही दाह उत्पन्न हो एवं हृदय, कोष्ठ और गलेमें जलन हों तो दाख, मिश्री, शहद और हरड इन सब को एकत्र मिलाकर सेवन करनेसे सुख प्राप्त होता है ॥ २ ॥

हरीतकी धान्यतुषोदसिद्धा सपिप्पली सैन्धवहिङ्गुयुक्ता ।
सोद्गारधूमं भृशमप्यजीर्णं विभज्य सद्यो जनयेत्क्षुधां च ॥ ३ ॥

हरड धान्य तुषोदकनामक काँजीमें पकाकर उसमें पीपल, सैंधानमक और हींग मिलाकर सेवन करे तो यह धुएँकी समान डकारोंका आना और अत्यन्त प्रबल अजीर्णको नष्ट करके क्षुधाको तत्काल उत्पन्न करता है ॥ ३ ॥

विष्टब्धरसशेषाजीर्णचिकित्सा ।

विष्टब्धे स्वेदनं पथ्यं पेयं च लवणोदकम् ।
रसशेषे दिवास्वप्नो लङ्घनं वातवर्जनम् ॥ १ ॥

विष्टब्ध अजीर्णमें पसीना निकलवाना और सैंधानमक मिला हुआ जल पान करना हितकारी है ! एवं रसशेषाजीर्णमें दिनमें सोना, लंघन करना और वातरहित स्थानमें रहना उत्तम है ॥ १ ॥

३७२भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

व्यायामप्रमदाध्ववाहनरतान् क्लान्तानतीसारिणः शूलश्वासवतस्तृषापरिगतान् हिक्कामरुत्पीडितान् । क्षीणान् क्षीणकफाञ्छिशून्मदहतान् वृद्धान् रसाजीर्णिनो रात्रौ जागरितान्नरान् निरशनान् कामं दिवा स्वापयेत् ॥ २ ॥

रसशेषाजीर्णमें व्यायाम, दण्ड कसरत आदि परिश्रम, स्त्रीप्रसङ्ग, मार्ग चलने और घोड़े आदिकी सवारीपर चढ़नेसे थकेहुए मनुष्योंको एवं अतीसार, शूल, श्वास, तृषा, हिचकी और वायुसे पीड़ित रोगियोंको तथा क्षीणकफवाले, बालक, मद्यपीनेसे बेहोश, वृद्ध, अजीर्णरसवाले, रात्रिम जागनेवाले और लंघन करनेवाले ऐसे मनुष्योंको दिनमें यथेच्छ शयन करानाही श्रेष्ठ है ॥ २ ॥

आलिप्य जठरं प्राज्ञो हिङ्गुत्र्यूषणसैन्धवैः । दिवास्वप्नं प्रकुर्वीत सर्वाजीर्णप्रणाशनम् ॥ ३ ॥

हींग, सोंठ, पीपल, मिरच और सेंधानमक इनको पीसकर पेटपर लेप करके दिनमें शयन करानेसे सर्वप्रकारका अजीर्ण नष्ट होता है ॥ ३ ॥

पथ्यात्रिक ।

पथ्यापिप्पलिसंयुक्तं चूर्णं सौवर्चलं पिबेत् । मस्तुनोष्णोदकेनाथ बुद्ध्वा दोषगतिं भिषक् ॥ ४ ॥ चतुर्विधमजीर्णं च मंदानलमथारुचिम् । आध्मानं वातगुल्मं च मलं चाशु नियच्छति ॥ ५ ॥

हरड, पीपल और कालानमक इनके चूर्णको समान भाग लेकर दहीके पानी अथवा उष्णजलके साथ दोषोंकी गतिको जानकर वैद्य पान करानेसे चारों प्रकारका अजीर्ण, मन्दाग्नि, अरुचि, अफाग, वातगुल्म और शूल ये सब तत्काल दूर होते हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥

विशिष्टद्रव्याजीर्णकी विधि ।

फलं पनसपाकाय फलं कदलसम्भवम् । कदलस्य तु पाकाय बुधैरपि घृतं हितम् ॥ घृतस्य परिपाकाय जम्बीरस्य रसो हितः ॥ ६ ॥ नारिकेलफलतालबीजयोः पाचकं सपदि तण्डुलं विदुः । क्षीरमेव सहकारपाचनं चारमज्जनि हरीतकी हिता ॥ ७ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३७३

मधूकमालूरनृपादनानां परूषकखज्जूरकपित्थकानाम् ।
पाकाय पेयं पिचुमर्दबीजं घृतेऽपि तक्रेऽपि तदेव पथ्यम् ॥८॥
खर्ज्जूरशृङ्गाटकयोः प्रशस्तं विश्वौषधं कुत्र च भद्रमुस्तम् ।
यज्ञाङ्गबोधिद्रुफलेषु शस्तं प्लक्षे तथा पर्युषितः प्रपीतम् ॥९॥
तण्डुलेषु च पयः पयस्स्वथो दीपकं तु चिपिटे कणायुतः ।
षष्टिका दधिजलेन जीर्य्यते ककटी च सुमनेषु जीर्य्यते ॥१०॥

कटहलके खानेसे अजीर्ण हुआ हो तो उसको पचानेके लिये केला खाना चाहिये । यदि केलेके खानेसे अजीर्ण हुआ हो तो घृत पान कराना चाहिये । घृतके अजीर्णमें जम्बीरीनींबूका रस पीना चाहिये । नारियल और ताडके फलोंके अजीर्णमें भात चावलोंका खाना चाहिये । आमको पचानेके लिये दूध सर्वश्रेष्ठ है । चिरौंजीके अजीर्णम हरड सेवन करना हितकारी है । महुआ, बेल, खिरनी, फालसे खजूर और कैथको पचानेके लिये नीमके बीजों (निबोलियों) को पीसकर पीना चाहिये । घृत और मट्ठेके अजीर्णम भी नीमके बीजों (निबोलियों) को सेवन करना चाहिये । खजूर और सिंघाडेके अजीर्णमें सोंठ और किसी किसी मतसे नागरमोथेको सेवन करना चाहिये । गूलर, पीपलके फल और पाखरके-फलको खानेसे हुए अजीर्णम बासीजल पान करना चाहिये । चावलोंके अजीर्णम दूध, दूधके अजीर्णम अजवायन और चिबिडे अर्थात् चौलोंके अजीर्णमें पीपल और अजवायनका चूर्ण सेवन करना चाहिये । सांठीके चावल दहीके तोडको पीनेसे पचते हैं और ककडी-गहूक पदार्थ खानेसे पचजाती ह ॥ ६-१० ॥

गोधूममाषहरिमन्थसतीनमुद्ग-
पाको भवेज्झटिति मातुलपुत्रकेण ।
खज्जूरिकाबिसकशेरुसितासु शस्तः
शृंगाटके मधुफलेष्वपि भद्रमुस्तम् ॥ ११ ॥

कङ्गुश्यामाकनीवाराः कुलित्थाश्चाविलम्बितम् ।
दध्नो जलेन जीर्य्यन्ति वैदलः काञ्जिकेन तु ॥ १२ ॥
पिष्टान्नं शीतलं वारि कृसरां सैन्धवं पचेत् ।
माषेण्डरीं निम्बुफलं पायसं मुद्गयूषकः ॥ १३ ॥