भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
३८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
| विषया: | पृ० | विषया: | पृ० | विषया: | पृ० |
|---|---|---|---|---|---|
| म | मुण्डी | ५७८ | राजावर्त्त (रेवटी) | ७७४ | |
| मकर तेन्दुआ | ७२५ | मुद्रपर्णी | ४७३ | राजीव (मृग) | ८६१ |
| मकोय | ६०१ | मुरा | ४२८ | रामदाना | ८१९ |
| मखाना | ७३४ | मूँग | ७९६ | राल | ३९५ |
| मञ्जिष्ठा (मजीठ) | ३०५ | मूँगा | ७८२ | रास्ना | २७७ |
| मटर | ८०२, ८२९ | मूँज (भद्रमुंज) | ५४८ | रीठा | ६८८ |
| मण्डूकपर्णी | ६२४ | मूत्र | ९२५ | रूपामाखी | ७६५ |
| मत्स्य (मछली) | ८६० | मूर्वा | ५९७ | रेणुका | ४३२ |
| मत्स्याक्षी | ६१४ | मूसली काली | ५५७ | रेह का नमक | ३५२ |
| मदन (मैनफल) | २७५ | मूसली सफेद | ५५८ | रोहिस घास | ५५१ |
| मद्गुर मत्स्य | ८७० | मूसा | ८५६ | रोहू मछली | ८६८ |
| मदिरा | ९३२ | मूसाकर्णी | ६३७ | रोहेड़ा | ६८६ |
| मधु | ९३५ | मेथी | २३९ | ल | |
| मयूरशिखा | ६३९ | मेढ़ाशिंगी | ६०६ | लक्ष्मणा | ५४२ |
| महुआ | ७३६ | मैनसिल | ७७३ | लज्जालु | ६१९ |
| मरिच | २२० | मोखा | ७०२ | लता कस्तूरी | ३७१ |
| मरसा लाल-सफेद | ८१७ | मोचरस | ६९६ | लहसुन | ३२३ |
| मल्लिका | ६५७ | मोचिका (मोथ) | ८६९ | लाख | ३०७ |
| मसूरी | ८०० | मोठ | ७९९ | लामज्जक | ४४१ |
| महानिम्ब (बकायन) | ५०५ | मोती | ७८१ | लाल चन्दन | ३७७ |
| महाबला (सहदेई) | ५३८ | मोखा | ७०२ | लाल चिरचिरा | ५८१ |
| महाभरी वच | २४८ | मोरशिखा | ६३८ | लाल चीता | २२६ |
| महाशफरी (मछली) | ८७० | मोसंबी | ७५२ | लिसोड़ा | ७४० |
| माचिका (मोइया) | २८३ | मौलसिरी | ६५४ | लोणा छोटी-बड़ी | ८२२ |
| माधवी | ६५७ | य | लोध | ३२१ | |
| मानकन्द | ८४९ | यष्टीमधु (मुलेठी) | २६४ | लोहबान | ३९८ |
| मांस वर्ग | ८५५ | र | लौंग | ४०३ | |
| माँसरोहिणी | ५२९ | रक्तपुष्प अडूसा | ४९५ | व | |
| मानिक (चुन्नी) | ७८१ | रक्तशालि | ७९१ | वनमेथी | २४० |
| माषपर्णी | ४७४ | रक्तार्क (अर्क) | ४७९ | वङ्गम (राँगा) | ७६१ |
| मीठा नींबू | ७५२ | रक्तालू | ८४६ | वंशपत्री | ६१४ |
| मुचुकुन्द | ६६३ | रसौत | ३१५ | वंशलोचन | २५८ |
| मुण्डी | ५७९ | राई | ८०८ | वच | २४४ |
| राजमाष (लोबिया) | ७९८ | वटपत्री | ६१३ |
निघण्टु-विवरण में आये हुए द्रव्यों की अकाराद्यनुक्रमणिका ३१ विषया: पृ० | विषया: पृ० | विषया: पृ० वत्सनाभ ७८३ | शालिधान्य ७८९ | सर्जक ६७९ वनककोड़ा ६२८ | शिम्बीधान्य ७९६ | सर्पाक्षी ६१५ वनतुलसी ६७० | शिलाजीत ७६६ | सहदेवी ५३९ वनहलदी ३११ | शिलारस ३९९ | सहिजना ५१२ वर्मीमत्स्य ८७० | शिलीन्ध्र (शिलिन्द मछली) ८६९ | सागोन ७०६ वर्षाभू (पथरी) ५८७ | शीतलचीनी ४३९ | सांभर मृग ८६१ वायविडङ्ग २५२ | शीसम ६८१ | सातला ४८५ वाराही कंद ५५४, ८५० | शुक्लजीरक २३३ | साम्भर नमक ३४८ विकङ्कत (कंटाई) ७३४ | शृङ्गिक विष ७८५ | सालई ६८० विजयसार ६८२ | शृङ्गी (सींगी मछली) ८६९ | साँवा ८१० विडङ्ग भेद २५४ | श्वेतदूर्वा ५५४ | सिंघाड़ा ७३५ विदारीकन्द ५५५ | श्वेतार्क ४७९ | सितोपला (मिश्री) ९४३ विदारीकन्द (क्षीरविदारी) ५५७ | श्वेतसारिवा ५९१ | सेन्दुरिया ६६६ विशाला ५७२ | ष | सिन्दूर ७६६ विक्किर (पक्षी) ८६२ | षष्टिक धान्य ७९२ | सिरस ६७७ वीरतरु ६३४ | स | सिवार ६४७ विष्णुक्रान्ता ६१६ | सत्तुक विष ७८४ | सिहोरा ७०० वीरण खस ४२० | सज्जी ३५४ | सीसा ७६१ वृद्धदारक ५७५ | सतौना ७०४ | सुगन्धबाला ४१९ वृद्धदारु ५७५ | सत्तू ८९१ | सुगन्धवास्तुक . ८१६ वेतस (वेदमूश्क) ५३१ | सनाय ६२९ | सुदर्शन ६३७ वैदूर्यम ७८१ | सन्तानिका (मलाई) ९११ | सुरमा ७३३ व्याघ्रेरण्ड ४७७ | सपादमत्स्य ८७१ | सुपारी ७२० श | सप्तला (तितली) ४८७ | सुहागा ३५८, ७७४ शङ्ख ७७६ | सफेद खैर ६८५ | सूरनकन्द ८४४ शङ्खपुष्पी ६१६ | सफेद पाढ़ल (घंटापाढ़र) ४५८ | सेंधानमक ३४५ शङ्खालुक ८४५ | सफेद सुरमा ७७३ | सेम ८३९ शणपुष्पी ५९४ | समुद्र नमक ३४८ | सेमर ६९५, ८३० शतावरी ५५९ | समुद्रफेन २५९ | सेव ७४५ शर्करा ९४३ | सम्हालू-निर्गुण्डी ५१६ | सोआ २३७ शल्लकी ३९७ | सरफोंका ५७३ | सोंचर नमक ३५१ शष्कुलीमत्स्य (सौरी) ८७० | सरसों ८०७, ८२९ | सोंठ २१६ शाल ६७९ | सरल निर्यास ३९३ | सोया २३७ शालपर्णी ४६३ | | सोनापाठा ४६१
४० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे विषयाः पृ० । विषयाः पृ० । विषयाः पृ० सोनामाखी ७६४ । स्वर्णवल्ली ५४३ । हस्तिकर्ण ८५१ सोम ६०८ । ह । हंसराज ६०७ सोमलता ६०८ । हड़संघारी ५८३ । हपुषा (हाऊबेर) २५० सोरा (सुवर्चिका) ३५६ । हरताल ७७२ । हारिद्र विष ७८४ सोहागा ७७४ । हरफारेवड़ी ७३१ । हालाहल (हलाहल विष) ७८६ सौंफ २३८ । हरसिंगार ५०८ । हिङ्गुपत्री ६१४ सौराष्ट्रिकविष (सौराष्ट्रविष) ७८४ । हरिन ८६१ । हिङ्घोट ६८९ स्थलपद्म ६४३ । हरिया शुकचिन २५० । हिल्सा मछली ८६९ स्पृक्का ४४५ । हरीतकी २०७ । हींग २४२ सुवर्णकेतकी (पीला केवड़ा) ६५८ । हलदी ३०८ । हुरकुच ८२५ सुवर्णगैरिक (सोनागेरु) ७७४ । हस्त्यालुक ८४५ । होलक ८९३
द्वितीयो भागः विषय-सूची मानपरिभाषाप्रकरणम् मागध मान ९५५ गीले तथा सूखे द्रव्यों के मान के विषय में परिभाषा ९५७ कुडवसंज्ञक मानपात्र का लक्षण ९५७ कालिङ्गमान ९५७ भेषजविधानप्रकरणम् कषाय के भेद ९५९ स्वरस बनाने की विधि ९५९ चावल के धोवन की विधि ९६० हिम बनाने की विधि ९६० मन्थ बनाने की विधि ९६० फाण्ट बनाने की विधि ९६१ कल्क बनाने की विधि ९६१ चूर्ण बनाने की विधि ९६१ अनुपान की मात्रा ९६१ भावना की विधि ९६२ पुटपाक की विधि ९६२ उष्णोदक की विधि ९६२ क्षीरपाक की विधि ९६२ क्वाथ बनाने की विधि ९६२ क्वाथ पीने की मात्रा ९६३ क्वाथ में साफ शक्कर आदि डालने की मात्रा ९६४ औषध भक्षण की विधि ९६४ अवलेह बनाने की विधि ९६४ गोली बनाने की विधि ९६४ घृत और तेल बनाने की विधि ९६५ सिद्ध हुए स्नेह के लक्षण ९६७ स्नेह परिपाक के लक्षण पूर्वक तीन प्रकार ९६७ दुग्धपाक तथा आमपाक के दोष ९६८ मृदु आदि पाकों के विषय ९६८ घी, तेल तथा गुड़ के बासी होने की महत्ता ९६८ सन्धानविधि ९६८ आसव तथा अरिष्ट के लक्षण ९६८ सामान्य रूप से अरिष्ट की विधि ९६८ सुरा तथा सुरा की जातियाँ ९६९ वारुणी के लक्षण ९६९ शुक्त का लक्षण ९६९ चुक्र का लक्षण ९६९ तुषोदक, सौवीर, आरनल, काञ्जिक तथा शिण्डाकी के लक्षण ९७० धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् मारण करने के योग्य सुवर्ण का लक्षण ९७० मारण के अयोग्य सुवर्ण ९७० सुवर्ण की शोधन विधि ९७० अशुद्ध सुवर्ण के दोष ९७१ सुवर्ण के मारण की विधि ९७१ मारे हुए सोने का गुण ९७३ नहीं मारे हुए सोने के दोष ९७३ महापुट का प्रकार ९७३ गजपुट का प्रकार ९७३ वाराह तथा कौक्कुट पुट का प्रकार ९७४ कपोतपुट का प्रकार ९७४ गोबर का लक्षण ९७४ गोबर के पुट का प्रकार ९७४ भाण्डपुट का प्रकार ९७५ यन्त्र के प्रकार बालुकायन्त्र का प्रकार ९७५ दोलायन्त्र ९७५ स्वेदनयन्त्र ९७५ विद्याधरयन्त्र ९७५ भूधरयन्त्र ९७६ डमरुयन्त्र ९७६ मारणयोग्य चांदी के लक्षण ९७६ मारण के अयोग्य चांदी ९७६ चांदी के शोधने की विधि ९७६ अशुद्ध चाँदी के दोष ९७६ चाँदी मारने के विधि ९७७ मारी हुई चाँदी के गुण ९७७ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
४२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मारण के योग्य तामा के लक्षण ९७७ | शुद्ध किये हुए शिलाजीत के गुण ९८८ मारण के योग्य तामा के लक्षण ९७७ | रस की स्वेदन विधि ९८८ तामा के शोधने की विधि ९७८ | रस की मर्दन विधि ९८९ तामे के ८ दोष ९७८ | रस की मूर्च्छन विधि ९८९ तामे के मारने की विधि ९७८ | मूर्च्छन विधि ९९० मारे हुए तामे के गुण ९७९ | रस की ऊर्ध्वपातन विधि ९९० रांगा का स्वरूप ९७९ | रस की अधःपात विधि ९९० अशुद्ध वङ्ग के दोष ९७९ | पारे के दोषों को दूर करने की शोधन विधि ९९१ रांगा तथा सीसा के शोधन की विधि ९७९ | पारे के मारने की विधि ९९१ रांगा के मारण की विधि ९८० | रसकर्पूर बनाने की विधि ९९२ मारे हुए रांगा के गुण ९८० | सिन्दूररस बनाने की विधि ९९३ सीसे का स्वरूप ९८० | मारित-मूर्च्छित पारे के गुण ९९३ सीसा के शोधन की विधि ९८० | हिङ्गुल की शोधन विधि ९९४ सीसा के मारने की विधि ९८१ | शुद्ध हिङ्गुल के गुण ९९४ मारे हुए सीसा के गुण ९८१ | सिंगरफ से पारा निकालने की विधि ९९४ अशुद्ध लोहा के दोष ९८१ | अशुद्ध गन्धक के दोष ९९५ लोहा के दोष की शान्ति के लिये शोधनविधि ९८१ | गन्धक शोधने की विधि ९९५ लोहा के मारणविधि ९८१ | शुद्ध गन्धक के गुण ९९५ मारे हुए लोह के गुण ९८२ | अशुद्ध अभ्रक के दोष ९९५ लौहभस्म खाने की मात्रा ९८३ | अभ्रक शोधन-मारण विधि ९९५ लौहभस्म खाने के समय त्याज्य द्रव्य ९८३ | धान्याभ्रक बनाने की विधि ९९६ धातुओं के मारने की साधारण विधि ९८३ | मारे हुये अभ्रक के गुण ९९६ अशुद्ध स्वर्णमाक्षिक के दोष ९८३ | अशुद्ध हरताल के दोष ९९६ सोनामाखी शोधने की विधि ९८३ | हरताल शोधने की विधि ९९६ सोनामाखी मारने की विधि ९८३ | हरताल मारने की विधि ९९७ रूपामाखी शोधने की विधि ९८४ | शुद्धाशुद्ध हरताल के गुण ९९७ रूपामाखी मारने की विधि ९८४ | अशुद्ध मैनसिल का स्वरूप ९९७ सोनामाखी तथा रूपामाखी के विशेष गुण ९८४ | मैनसिल शोधने की विधि ९९८ अशुद्ध तूतिया के शोधन की विधि . ९८४ | शुद्ध की हुई मैनसिल के गुण ९९८ शुद्ध तूतिया के गुण ९८४ | खपरिया के शोधन की विधि ९९८ कांसा तथा पीतल के शोधन की विधि ९८५ | शुद्ध खपरिया के गुण ९९८ कांसा तथा पीतल के मारने की विधि ९८५ | उपरसों के शोधन की साधारण विधि ९९८ मारे हुए कांसा तथा पीतल के गुण ९८५ | अशुद्ध हीरे के दोष ९९९ सिन्दूर के शोधने की विधि ९८५ | हीरा शोधने की विधि ९९९ सिन्दूर के गुण ९८५ | हीरा मारने की विधि ९९९ शिलाजीत के लक्षण ९८६ | मारे हुए हीरे के गुण ९९९ शिलाजीत के शोधन की विधि ९८६ | शेष रत्नों की शोधन-मारण विधि १०००
द्वितीयो भागः विषय-सूची ४३ वत्सनाभ विष के लक्षण १००० । ऋतुभेद से विरेचन द्रव्यों में भेद १०१३ विष शोधने की विधि १००० । अभयादिमोदक १०१४ विष के गुण १००० । विरेचन लेने के बाद कर्तव्य १०१४ उपविषों का निरूपण १००१ । न्यूनाधिक विरेचन का लक्षण और औषध १०१५ द्रव्यों के पूर्ण गुणयुक्त रहने की अवधि १००१ । अनुवासन तथा निरूह के भेद १०१६ घी तथा तैल के विषय में विशेषता १००१ । स्नेहबस्ति की विधि १०१६ स्नेहपानविधिप्रकरणम् । सभी प्रकार के विकारों को दूर करने वाली स्नेह के भेद तथा विशेष नाम १००२ । अनुवासन बस्ति १०२१ घी तथा तेल पिलाने योग्य व्यक्ति १००४ । निरूहबस्ति की विधि १०२२ मज्जा तथा घी पिलाने योग्य व्यक्ति १००४ । उत्क्लेशन बस्ति १०२४ शीतादि समयों तथा वातादि दोषों के भेद १००५ । दोषहर बस्ति १०२४ नस्य आदि लेने में तेल तथा घृत का प्रयोग १००५ । शमन बस्ति १०२४ घी आदि के पीने में अनुपान १००५ । लेखन बस्ति १०२४ स्नेह से द्वेष रखने वालों के लिये स्नेह-पान-विधि १००५ । बृंहणबस्ति १०२५ स्नेहन करने वाले अन्य भी पदार्थ १००५ । पिच्छिलबस्ति १०२५ स्नेह के न पचने पर कर्तव्य १००५ । निरूह बस्ति की मात्रा १०२५ स्नेह न पचने की आशङ्का में कर्तव्य १००६ । मधुतैलकबस्ति १०२५ स्नेह पीने से उत्पन्न प्यास की शान्ति १००६ । यापनबस्ति १०२६ स्नेह पीने के अयोग्य लोग १००६ । युक्तरथबस्ति १०२६ स्नेहपान के योग्य लोग १००६ । उत्तरबस्ति १०२७ स्नेहपान द्वारा भली भाँति स्निग्ध हुए लोगों । फलवर्ति की विधि १०२७ के लक्षण १००६ । नस्यग्रहण की विधि १०२८ अधिक मात्रा में स्निग्ध हुए लोंगों के लक्षण १००७ । रेचन नस्य की मात्रा १०२८ रूक्ष तथा अत्यन्त स्निग्ध हुए लोगों के । रेचन नस्य की विधि १०२९ लिये कर्तव्य १००७ । नस्य औषध का प्रमाण १०२९ स्नेह सेवन करने के गुण १००७ । रेचन नस्य के भेद १०२९ स्नेह सेवन करने के समय त्याज्य कर्म १००७ । रेचन नस्य के भेदों के लक्षण १०२९ पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् । रेचन तथा स्नेहन नस्य के उपयोग १०२९ । रेचन औषधियों के गुण १०३० पञ्चकर्म के नाम १००७ । प्रधमन नस्य की औषधियाँ १०३० वमन कर्म में प्रथम वमन के योग्य समय और । स्नेहननस्य की कल्पना १०३० रोगियों का निर्देश १००८ । बृंहण नस्य की विधि १०३१ वमन कराने के अयोग्य लोगों का निर्देश १००८ । प्रतिमर्श की मात्रा १०३२ वमन कराने की विधि १००९ । प्रतिमर्श का समय १०३२ विरेचन के योग्य समय तथा व्यक्ति का निर्देश १०११ । प्रतिमर्श के विषय तथा गुण १०३२ मृदु, मध्यम तथा क्रूर कोष्ठ वाले मनुष्यों तथा । प्रतिमर्श के विषय तथा गुण १०३२ उनके योग्य मात्रा एवं द्रव्यों का वर्णन १०१२ । नस्य की सामान्य विधि १०३३ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
४४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे नस्य देने के पश्चात् निषिद्ध कर्म १०३३ | उत्तम रीति से रक्तस्राव के लक्षण १०५१ नस्य के हीनयोग तथा अतियोग की चिकित्सा १०३४ | रक्तस्राव कराने के बाद त्याज्य १०५१ षष्ठंधूमपानादिविधिप्रकरणम् | नेत्र को स्वच्छ करने की विधि १०५१ धूमपान की विधि १०३४ | नेत्र को सेक करने की विधि १०५२ धूमपान में ओषधि का कल्क १०३७ | नेत्र के आश्च्योतन विधि १०५२ गृह में देने योग्य धूम १०३७ | पिण्डी की विधि १०५३ धूमपान में त्याग करने योग्य कार्य १०३७ | विडालक विधि १०५३ गण्डूष की विधि १०३७ | तर्पण विधि १०५३ गण्डूष के भेद १०३८ | तर्पण के योग्य नेत्रों के लक्षण १०५३ गण्डूष तथा कवल की औषधियों का मान १०३८ | रोगभेद से तर्पण धारण करने के काल का भेद १०५४ गण्डूष तथा कवल धारण करने में अवस्था | यथार्थ तर्पण के चिह्न १०५४ की मर्यादा १०३८ | अतितर्पित नेत्र के लक्षण १०५४ गण्डूष धारण के गुण १०३८ | पुटपाक की विधि और भेद १०५५ कवलधारण की विधि १०३८ | पुटपाकों के धारण काल की अवधि १०५५ प्रतिसारण की विधि १०३९ | तिक्तक द्रव्य १०५६ स्वेद की विधि १०३९ | तर्पण तथा पुटपाक धारण किये हुये लोगों के स्वेद के अयोग्य व्यक्ति १०४० | लिये त्याज्य कर्म १०५६ तापस्वेद की विधि १०४१ | अञ्जन की विधि और भेद १०५६ ऊष्मस्वेद की विधि १०४१ | लेखनकारिणी वर्ति १०५८ उपनाहस्वेद की विधि १०४२ | रोपणकारिणी वर्ति १०५८ द्रवस्वेद की विधि १०४३ | स्नेहनकारिणी वर्ति १०५८ सिर में तेल डालने की विधि १०४४ | लेखनकारिणी रसक्रिया १०५८ कान में तेल डालने की विधि १०४५ | रोपणकारिणी रसक्रिया १०५८ लेप की विधि १०४५ | स्नेहनकारिणी रसक्रिया १०५८ दोषघ्न लेप १०४६ | लेखन चूर्ण १०५९ विषहा लेप १०४६ | रोपण चूर्ण १०५९ मुखकान्तिदायक लेपं १०४६ | स्नेहन चूर्ण १०५९ लेप के दो भेद १०४७ | प्रत्यञ्जन सेवन विधि १०५९ शोणितस्राव की विधि १०४८ | नयनामृत चूर्ण १०६० वातादि से दूषित रक्तों के लक्षण १०४८ | दृष्टि को स्वच्छ करने वाली शलाका १०६० शुद्ध रक्त के लक्षण १०४८ | औषध खाने के पांच समय १०६० रक्तस्राव के विषय १०४९ | निरन्न कोष्ठ में ओषधि सेवन के गुण १०६१ रक्तस्राव के साधन १०४९ | अन्न के साथ ओषधि सेवन के गुण १०६२ सिरामोक्षण के अयोग्य जन १०४९ | ओषधि के पाकापाक का लक्षण १०६२ अधिक रक्त निकलने के दोष १०५० | रोगिपरीक्षाप्रकरणम् रक्त के अधिक निकल जाने पर वायु के | वाग्भटोक्त रोगी की परीक्षा १०६३ कुपित होने की चिकित्सा १०५१ | नेत्र की परीक्षा १०६३ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
द्वितीयो भागः विषय-सूची ४५ जिह्वा की परीक्षा १०६४ | अत्यन्त बढ़े हुए दोषादि के कारण तथा लक्षण १०७६ मूत्र की परीक्षा १०६४ | मेदोवृद्धि के लक्षण १०७७ स्पर्शद्वारा नाडी की परीक्षा १०६४ | दोष, धातु तथा मलों के कम होने के कारण १०७८ रोग जानने के कारण १०६५ | क्षीण हुए दोषादि के लक्षण १०७८ हेतु का लक्षण १०६५ | ओज के क्षय होने का कारण १०७९ सम्प्राप्ति के लक्षण तथा भेद १०६६ | ओज के क्षय होने के लक्षण १०७९ विकल्पसम्प्राप्ति १०६७ | मल के क्षय होने के लक्षण १०७९ प्राधान्यसम्प्राप्ति १०६७ | मूत्रादि के क्षय होने के लक्षण १०७९ बलसम्प्राप्ति का व्याख्यान १०६७ | क्षीण हुये दोष, धातु तथा मलों को बढ़ाने कालसम्प्राप्ति का व्याख्यान १०६७ | की विधि १०८० वातादि दोषों में कौन दोष किस ऋतु में | वात से क्षीण हुआ मनुष्य १०८० प्रकुपित होता है १०६८ | मांस से क्षीण हुआ मनुष्य १०८० पूर्वरूप के लक्षण १०६८ | भेद से क्षीण हुआ मनुष्य १०८१ लक्षण के लक्षण १०६९ | बल का क्षय होने में कारण १०८१ उपशय के लक्षण १०६९ | बलक्षय के लक्षण १०८२ वायु के उपशय १०७० | बलवृद्धि के कारण १०८२ पित्त के उपशय १०७० | बलवान् तथा निर्बल के प्रधान लक्षण १०८२ कफ के उपशय १०७० | परिशिष्ट- १ रोगों के निदान का विवेचन १०७० | अस्थियों के विषय में-संक्षिप्त विवरण १०८३ वायु के प्रकुपित होने के कारण १०७१ | मांस धातु १०८६ पित्त के प्रकुपित होने के कारण १०७२ | नारी-जननेन्द्रियों का संक्षिप्त विवरण १०८९ विदाही के लक्षण १०७२ | पुरुष-जननेन्द्रियों का संक्षिप्त विवरण १०९२ कफ के प्रकुपित होने के कारण १०७३ | आर्त्तव-गर्भाधान तथा बन्ध्यत्व का संक्षिप्त रोग के कारण स्वरूप रोग की विचित्रता १०७४ | विवरण १०९४ बढ़े तथा क्षीण हुए दोष, धातु तथा मल की | परिशिष्ट- २ सुश्रुतोक्त चिकित्सा १०७४ | अकारादि-क्रमानुसार निघण्टुभाग-स्थित द्रव्यों के स्वस्थ मनुष्य के लक्षण १०७५ | व्यवहारोपयोगी अङ्ग तथा उनकी मात्राएँ ११०१
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भावप्रकाशः प्रथम भाग (पूर्वार्द्ध) CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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॥ शक्तितन्त्रम् ॥ ( ... )
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श्रीमद्भावमिश्रप्रणीतः भावप्रकाशः 'विद्योतिनी' हिन्दीव्याख्योपेतः [ पूर्वखण्डम् ] अथ प्रथमप्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणम् गजमुखममरप्रवरं सिद्धिकरं विघ्नहर्त्तारम्। गुरुमवगमनयनप्रदमिष्टकरीमिष्टदेवतां वन्दे ।।१।। श्रीमद्गुरोर्गुरुपदं बहुशोऽभिवन्द्यायुर्वेदमाप्तुमनसोऽद्य शिशोर्हृदीमाम्। 'भावप्रकाश'गतभावविभावनार्थं विद्योतिनीं ननु तनोत्यतनुं मुदाऽयम् ।। देवताओं में सर्वश्रेष्ठ, अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, इन आठ सिद्धियों के देनेवाले और विघ्नों को दूर करनेवाले तथा हाथी के समान जिनका मुख है, ऐसे श्री गणेशजी और ज्ञानरूपी नेत्रों को देनेवाले श्रीगुरुदेव तथा अभीष्ट सिद्ध करनेवाले श्री इष्टदेव को मैं प्रणाम करता हूँ ।।१।। कवेरुक्तिः- आयुर्वेदागमनं क्रमेण येनाभवद्भूमौ। प्रथमं लिखामि तमहं नानातन्त्राणि संदृश्य ।।२।। जिस क्रमसे पृथ्वी पर आयुर्वेद अर्थात् वैद्यकशास्त्र का अवतरण हुआ, सबसे पहिले उसी (क्रम) को मैं अनेक महर्षिप्रणीत तन्त्रों (ग्रन्थों) को देखकर लिख रहा हूँ ।।२।। अथायुर्वेदस्य लक्षणमाह- आयुर्हिताहितं व्याधेर्निदानं शमनं तथा। विद्यते यत्र विद्वद्भिः स आयुर्वेद उच्यते ।।३।। आयुर्वेद का लक्षण—जिस शास्त्र में आयुष्य के लिये हितकारक और अहितकारक पदार्थों का उल्लेख हो और रोगों के निदान अर्थात् उत्पन्न होने का प्रधान कारण और उनकी शान्ति का उपाय अर्थात् चिकित्सा का वर्णन किया गया हो उसे विद्वान् लोग आयुर्वेद कहते हैं ।।३।। अथायुर्वेदस्य निरुक्तिमाह- अनेन पुरुषो यस्मादायुर्विन्दति वेत्ति च। तस्मान्मुनिवरैरेष आयुर्वेद इति स्मृतः ।।४।। आयुर्वेद की निरुक्ति—इस शास्त्र के द्वारा प्राणिमात्र को दीर्घायुष्यत्व की प्राप्ति तथा आयुर्विज्ञान विषयक सभी ४ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तथ्यों का ज्ञान होने के कारण दूसरों की आयु का परिज्ञान होता है, इसी से मुनिश्रेष्ठों ने इसे ‘आयुर्वेद’ संज्ञा दी है। शरीरजीवयोर्योगो जीवनं तेनावच्छिन्नः काल आयुः, आयुर्वेदद्वारा आयुष्याणयनायुष्याणि च द्रव्यगुणकर्माणि ज्ञात्वा तेषां सेवनत्यागाभ्यामारोग्येणायुविंदति, तेनैव हेतुना परस्याप्यायुर्वेत्ति च ।।४।। शरीर और जीव का जो संयोग है, उसे 'जीवन' कहते हैं और जितने समय तक वह संयोग बना रहता है, उतने समय का नाम आयु है। आयुर्वेद के द्वारा आयु के लिये हितकर तथा अहितकर द्रव्य, गुण और कर्मों को जानकर तथा उनके सेवन और त्याग द्वारा अर्थात् आयु के लिये हितकर द्रव्य-गुण-कर्मों का सेवन और अहितकर द्रव्य-गुण-कर्मों का परित्याग करने के द्वारा, आरोग्य लाभ करने से मनुष्य दीर्घायु लाभ कर सकता है, तथा उक्त कारणों से दूसरे की आयु को भी जानने में समर्थ हो सकता है ॥४॥ क्रममाह, तत्रादौ ब्राह्मणः प्रादुर्भावः- विधाताऽथर्वसर्वस्वमायुर्वेदं प्रकाशयन् । स्वनाम्ना संहिता चक्रे लक्षश्लोकमयीमृजुम् ।।५।। आयुर्वेद का उत्पत्ति क्रम—सबसे पहले ब्रह्माजी ने अथर्ववेद का सर्वस्व अर्थात् सारभूत जो आयुर्वेद है, उसका प्रकाश करते हुए, अपने नामकी अर्थात् 'ब्रह्मसंहिता' इस नामकी एक १ लाख श्लोक वाली एक सरल संहिता बनाई ॥५॥ ततः प्रजापतिं दक्षं दक्षं सकलकर्मसु । विधिर्धीनीरधिः साङ्गप्रायुर्वेदमुपादिशत् ।।६।। इसके बाद बुद्धि के समुद्र ब्रह्माजी ने सभी कार्यों के करने में निपुण दक्ष नामक प्रजापति को अङ्ग तथा उपाङ्गों के सहित यह (सम्पूर्ण) आयुर्वेद पढ़ाया ॥६॥ अथ दक्षप्रादुर्भावः- अथ दक्षः क्रियादक्षः स्वर्वैद्यौ वेदमआयुषः । वेदयामास विद्वांसौ सूर्यांशौ सुरसत्तमौ ।।७।। दक्षप्रजापति से आयुर्वेद की उत्पत्ति—इसके (ब्रह्माजी से आयुर्वेद प्राप्त करने के) बाद सब क्रियाओं में निपुण दक्ष नामक प्रजापति ने स्वर्ग के वैद्य, देवगणों में श्रेष्ठ, सूर्य के पुत्र और विद्वान् दोनों अश्विनी-कुमारों को आयुर्वेद सिखाया ॥७॥ अथाश्विनीसुतप्रादुर्भावः- दक्षादधीत्य दस्रौ वितनुतः संहितां स्वीयाम् । सकलचिकित्सकलोकप्रतिपत्तिविवृद्धये धन्याम् ।।८।। अश्विनी-कुमारों से आयुर्वेद की उत्पत्ति—दोनों अश्विनी-कुमारों ने दक्ष नामक प्रजापति से आयुर्वेद पढ़कर सभी चिकित्सक लोगों के ज्ञान की वृद्धि के लिए अपनी प्रशंसनीय संहिता (अश्विनीकुमारसंहिता) बनाई ॥८॥ स्वयम्भुवः शिरश्छिन्नं भैरवेण रुषाऽथ तत् । अश्विभ्यां संहितं तस्मात्तौ जातौ यज्ञभागिनौ ।।९।। इसके बाद जब क्रुद्ध होकर भैरवजी ने ब्रह्माजी का शिर काट डाला था, तब अश्विनीकुमारों ने उसे फिर से जोड़ दिया था। इस प्रकार उसी दिन से वे दोनों यज्ञ में भाग पाने के अधिकारी हुए ।। देवासुरणे देवा दन्त्यैर्यै सक्षताः कृताः । अक्षतास्ते कृताः सद्यो दस्राभ्यामद्भुतं महत् ।।१०।। जब देवता तथा दैत्यों का युद्ध हुआ, तब उसमें जिन देवताओं को दैत्यों ने घायल कर दिया था, उन सबों को अश्विनी-कुमारों ने तत्क्षण (चिकित्सा करके) क्षत (घाव) से रहित (चङ्गा) कर दिया, उस समय उन दोनों का वह कार्य अत्यन्त अद्भुत प्रतीत हुआ ॥१०॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ प्रथमप्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणम् ३ वज्रिणोऽभूद् भुजस्तम्भः स दस्राभ्यां चिकित्सितः । सोमान्निपतितश्चन्द्रस्ताभ्यामेव सुखीकृतः ।।११।। जब इन्द्र की भुजा का स्तम्भन हो गया था तथा चन्द्रमा जब सोम्लोक से गिर पढ़े थे, तब इन्हीं अश्विनी-कुमारों ने (चिकित्सा करके) उन्हें सुखी किया था ।।११।। विशीर्णा दशनाः पूष्णो नेत्रे नष्टे भगस्य च । शशिनो राजयक्ष्माऽभूद्द्द्विभ्यां ते चिकित्सिताः ।।१२।। जब पूषा नामक सूर्य के दाँत टूट गये और भग नामक सूर्य के नेत्र फूट गये थे तथा चन्द्रमा को राजयक्ष्मा हो गया था, तब इन लोगों की भी चिकित्सा अश्विनी-कुमारों ने ही की थी ।।१२।। भार्गवश्च्यवनः कामी वृद्धः सन् विकृतिं गतः । वीर्यवर्णस्वरोपेतः कृतोऽश्विभ्यां पुनर्युवा ।।१३।। भृगु महर्षि के गोत्र में उत्पन्न कामी च्यवन ऋषि जब वृद्ध होने से कुरूप हो गये थे, तब अश्विनी-कुमारों ने (चिकित्सा द्वारा) वीर्य, वर्ण ओर स्वर से युक्त करके फिर से उन्हें युवा कर दिया था ।।१३।। एतैश्चान्यैश्च बहुभिः कर्मभिर्भिषजां वरौ । बभूवतुर्भृशं पूज्याविन्द्रादीनां दिवौकसाम् ।।१४।। इन्हीं सब कार्यों एवं और-और भी बहुत से कार्यों के द्वारा वैद्यों में श्रेष्ठ ये दोनों अश्विनीकुमार इन्द्रादिक देवताओं के अत्यन्त पूज्य हुए ।।१४।। अथेन्द्रप्रादुर्भावः- संदृश्य दस्रयोरिन्द्रः कर्माण्येतानि यत्नवान् । आयुर्वेदं निरुद्वेगं तौ ययाचे शचीपतिः ।।१५।। इन्द्र से आयुर्वेद की उत्पत्ति-शची (इन्द्र की स्त्री) पति इन्द्र ने अश्विनी-कुमारों के पूर्वोक्त कार्यों को देखकर अतिशय यत्नशील होते हुए उन दोनों से निरुद्वेग होकर आयुर्वेद प्राप्त करने की प्रार्थना की ।।१५।। नासत्यौ सत्यसन्धेन शक्रेण किल याचितौ । आयुर्वेदं यथाऽधीतं ददतुः शतमन्यवे ।।१६।। तब सत्यसन्ध (दृढ़प्रतिज्ञ) इन्द्र के प्रार्थना करने पर अश्विनी-कुमारों ने जितना पढ़ा था, उतना सम्पूर्ण आयुर्वेद इन्द्र को पढ़ा दिया ।।१६।। नासत्याभ्यामधीत्यैव आयुर्वेदं शतक्रतुः । अध्यापयामास बहूनात्रेयप्रमुखान्मुनीन् ।।१७।। अश्विनी-कुमारों से आयुर्वेद पढ़कर इन्द्र ने भी आत्रेयादिक बहुत से मुनियों को पढ़ाया ।।१७।। अथात्रेयप्रादुर्भावः- एकदा जगदालोक्य गदाकुलभितस्ततः । चिन्तयामास भगवानात्रेयो मुनिपुङ्गवः ।।१८।। आत्रेय से आयुर्वेद की उत्पत्ति-एक समय मुनियों में श्रेष्ठ भगवान् आत्रेयजी इधर उधर (चारों तरफ) संसार के प्राणी को रोग से व्याकुल देखकर विचार करने लगे ।।१८।। किं करोमि क्व गच्छामि कथं लोका निरामयाः । भवन्ति साम्यानेतान्न शक्नोमि निरीक्षितुम् ।।१९।। मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? और किस उपाय से संसार के प्राणी रोग रहित हों ? मैं इन सबको इस तरह रोग से युक्त अब अधिक देखने के लिये समर्थ नहीं हूँ ।।१९।। दयालुरहमत्यर्थं स्वभावो दुरतिक्रमः । एतेषां दुःखतो दुःखं ममापि हृदयेऽधिकम् ।।२०।। क्योंकि मैं अत्यन्त दयालु स्वभाव का हूँ और स्वभाव दुरतिक्रम होता है अर्थात् स्वभाव को कोई कभी बदल नहीं सकता । अस्तु, इन सबों को दुःख होने से मेरे भी हृदय में दुःख हो रहा है ।।२०।।
आयुर्वेदं पठिष्यामि नैरुज्याय शरीरिणाम्। इति निश्चित्य गतवानात्रेयस्त्रिदशालयम् ।। २१।। अतः इन प्राणियों के आरोग्यार्थ अब मैं आयुर्वेद पढूंगा। ऐसा निश्चय करके आत्रेय मुनि स्वर्गलोक (इन्द्रपुरी अमरावती) को गये ॥२१॥ तत्र मन्दिरमिन्द्रस्य गत्वा शक्रं ददर्श सः। सिंहासनसमासीनं स्तूयमानं सुरर्षिभिः ।।२२।। भासयन्तं दिशो भासा भास्करप्रतिभं त्विषा। आयुर्वेदमहाऽऽचार्यं शिरोधार्यं दिवौकसाम् ।।२३।। वहाँ इन्द्र के भवन में जाकर देवर्षि लोगों से स्तुति किये जाते, सिंहासन पर बैठे, सूर्य के समान अपने प्रकाश से दर्शों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए, आयुर्वेद के महान् आचार्य और देवताओं के शिरोमणि इन्द्र भगवान् को उन्होंने देखा ॥२२-२३॥ शक्रस्तु तं निरीक्ष्यैव त्यक्तसिंहासनः स्थितः। तमग्रे पूजयामास भृशं भूरितपःकृशम् ।।२४।। कुशलं परिपप्रच्छ तथाऽऽगमनकारणम् । स मुनिर्वक्तुमारेभे निजागमनकारणम् ।।२५।। इन्द्र भगवान् भी उन आत्रेयमुनि को देखते ही सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और तपस्या करने से जिनका शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया था, ऐसे उन (आत्रेयमुनि) का पहले भली भाँति पूजन किया, तत्पश्चात् कुशल तथा आने का कारण पूछा। तदनन्तर आत्रेय मुनि भी अपने आने का जो कारण था, उसे कहने लगे ॥२४-२५॥ देवराज ! न राजाऽसि दिव एव यतो भवान्। विधात्रा विहितो यत्नात्त्रिलोकीलोकपालकः ।।२६।। व्याधिभिर्व्यथिता लोकाः शोकाकुलितचेतसः । भूतले सन्ति सन्तापं तेषां हन्तुं कृपां कुरु ।।२७।। आत्रेय ने कहा—हे देवेन्द्र ! आप केवल स्वर्गलोक के ही राजा नहीं हैं, किन्तु विधाता ने आपको तीनों लोकों के लोगों का भी पालन करने के लिये राजा बनाया है। अतएव इस समय पृथ्वीतल में रोगों से पीड़ित तथा शोक से व्याकुल चित्तवाले जो प्राणी हैं, उन सबों का सन्ताप दूर करने की कृपा करें ॥२६-२७॥ आयुर्वेदोपदेशं मे कुरु कारुण्यतो नृणाम्। तथेत्युक्त्वा सहस्राक्षोऽध्यापयाभास तं मुनिम् ।।२८।। मुनीन्द्र इन्द्रतः साङ्गमायुर्वेदमधीत्य सः । अभिनन्द्य तमाशीर्भिराजगाम पुनर्महीम् ।।२९।। आत्रेय ने कहा—हे देवेन्द्र ! प्राणियों के कल्याण के लिये दया करके आप मुझे आयुर्वेद का उपदेश कीजिये। यह सुन इन्द्र ने 'तथास्तु' कहकर आत्रेय को आयुर्वेद पढ़ाया। तदनुसार मुनिश्रेष्ठ आत्रेयजी इन्द्र से शल्य-शालाक्य- कायचिकित्सा-भूतविद्या-कौमारतन्त्र-अगदतन्त्र-रसायनतन्त्र और वाजीकरणतन्त्र इन ८ अङ्गों के सहित आयुर्वेद का अध्ययन कर और उन (इन्द्र) का आशीर्वाद द्वारा अभिनन्दन करके फिर पृथिवी पर लौट आये ॥२८-२९॥ अथात्रेयो मुनिश्रेष्ठो भगवान् करुणाऽऽकरः । स्वनाम्ना संहितां चक्र नरवर्गानुकम्पया ।।३०।। ततोऽग्निवेशं भेडञ्च जातूकर्णं पराशरम्। क्षीरपाणिञ्च हारीतमायुर्वेदमपाठयत् ।।३१।। इसके बाद करुणा-निधान मुनिश्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने मनुष्य वर्ग पर कृपा करके अपने नाम से आत्रेयसंहिता नामक ग्रन्थ बनाया। और अग्निवेश-भेड-जातूकर्ण-पराशर-क्षीरपाणि और हारीत इन ६ ऋषियों को आयुर्वेद पढ़ाया ॥३०-३१॥ तन्त्रस्य कर्त्ता प्रथममग्निवेशोऽभवत्पुरा। ततो भेडादयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं कृतानि च ।।३२।। श्रावयामासुरात्रेयं मुनिवृन्देन वन्दितम्। श्रुत्वा च तानि तन्त्राणि हृष्टोऽभूदत्रिनन्दनः ।।३३।। यथावत्सूत्रितं दृष्ट्वा प्रहृष्टा मुनयोऽभवन्। दिवि देवर्षयो देवाः श्रुत्वा साध्विति चाब्रुवन् ।।३४।। प्राचीन समय में उन ६ ऋषियों में से प्रथम तन्त्र (ग्रन्थ) के कर्त्ता अग्निवेश हुए। उनके बाद भेडादिक ऋषियों ने
भी अपने-अपने नामसे एक-एक तन्त्र बनाया और उन बनाये हुये अपने-अपने तन्त्रों को मुनिवृन्द से वन्दित महर्षि आत्रेयजी को सुनाया। उन तन्त्रों को सुन कर अत्रि महर्षि के पुत्र (आत्रेय) अत्यन्त प्रसन्न हुये और जैसे चाहिए वैसे बने हुये अपने- अपने तन्त्रों को देखकर तन्त्रकर्ता अग्निवेशादि ऋषिवृन्द भी अत्यन्त हर्षित हुए और स्वर्ग में देवर्षि तथा देवता लोगों ने भी उन तन्त्रों को सुनकर साधु-साधु अर्थात् 'बहुत अच्छा हुआ-बहुत अच्छा हुआ' ऐसा कहा ॥३२-३४॥ अथ भरद्वाजप्रादुर्भावः- एकदा हिमवत्पार्श्वे दैवादागत्य सङ्गताः । मुनयो बहवस्तेषां नामभिः कथयाम्यहम् ।।३५।। भरद्वाजो मुनिवरः प्रथमं समुपागतः । ततोऽङ्गिरास्ततो गर्गो मरीचिर्भृगुभार्गवौ ।।३६।। पुलस्त्योऽगस्तिरसतो वसिष्ठः सपराशरः । हारीतो गौतमः सांख्यो मैत्रेयश्च्यवनोऽपि च ।।३७।। जमदग्निश्च गार्ग्यश्च कश्यपः काश्यपोऽपि च
६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे है। अतः उन रोगों को दूर करने के लिये आप सब योग्य विद्वानों को कोई उपाय सोचना चाहिये। इस प्रकार सभा में कह कर उन लोगों ने भरद्वाज मुनि से कहा—हे भगवन् ! आप इस कार्य को करने के योग्य हैं। अतः इन्द्र से आप ही आयुर्वेद पाने के लिये प्रार्थना करें। फिर इन्द्र से प्राप्त किया हुआ जो आयुर्वेद होगा, उसे हम लोग क्रम से पढ़कर रोगसम्बन्धी भय से मुक्त हो जावेंगे ॥ ४५-४६॥ इत्थं स मुनिभिर्योर्ग्यैः प्रार्थितो विनयान्वितैः । भरद्वाजोमुनिश्रेष्ठो जगाम त्रिदशालयम् ।।४७।। तत्रेन्द्रभवनं गत्वा सुरर्षिगणमध्यगम् । दृष्टवान् वृत्रहन्तारं दीप्यमानभिवानलम् ।।४८।। दृष्ट्वैव स मुनि प्राह भगवान् मघवा मुदा । धर्मज्ञ ! स्वागतं तेऽथ मुनिं तं समपूजयत् ।।४९।। इस प्रकार जब विनय से युक्त हो श्रेष्ठ मुनिवरों ने प्रार्थना की, तब मुनियों में श्रेष्ठ भरद्वाजजी स्वर्गलोक को गये। वहाँ इन्द्र के भवन में पहुँच कर उन्होंने प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाशमान, देवर्षिगणों के मध्य में स्थित, वृत्रासुर को मारनेवाले इन्द्र को देखा। भरद्वाज मुनि को देखते ही भगवान् इन्द्र ने प्रसन्नता के साथ कहा—हे धर्म के जाननेवाले मुने ! आपका स्वागत है। इसके बाद उन भरद्वाज मुनि का विधिपूर्वक पूजन किया ॥४७-४९॥ सोऽभिगम्य जयाशीर्भिरभिनन्द्य सुरेश्वरम् । वचनं सम्यक् श्रावयामास तत्त्वतः ।।५०।। व्याधयो हि समुत्पन्नाः सर्वप्राणिभयङ्कराः । तेषां प्रशमनोपायं यथावद्वक्तुमर्हसि ।।५१।। अपाठयन् मुनि साङ्गमायुर्वेदं शतक्रतुः । जीवेद्धर्षसहस्राणि देही नीरुङ्निशम्य यम् ।।५२।। तदनन्तर उन भरद्वाज मुनि ने भी समीप जाकर जयशब्द युक्त आशीर्वादों से इन्द्र का अभिनन्दन करके ऋषियों के कहे हुये वचनों को यथार्थ रूप से भली-भाँति कह सुनाया और कहा कि हे देवेन्द्र ! इस समय संसार में सब प्राणियों के लिये भयङ्कर अनेक रोग उत्पन्न हुये हैं। उनके दूर करने का उपाय जिस तरह से हो, उस तरह से कहिये अर्थात् मुझे आयुर्वेद पढ़ाइये। भरद्वाज के इस वचन के सुनने के बाद इन्द्र ने मुनि को अङ्गों के सहित उस आयुर्वेद को पढ़ाया, जिसे सुनकर प्राणी रोग से रहित होकर हजारों वर्षों तक जी सकें ॥५०-५२॥ सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामुनिः । यथावदचिरात्सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः ।।५३।। तेनायुःसुचिरं लेभे भरद्वाजो निरामयम् । अन्यानपि मुनींश्चक्रे नीरजः सुचिरायुषः ।।५४।। महामुनि भरद्वाजजी ने तन्मनस्क होकर जिसके पार का अन्त नहीं है तथा जिसके हेतु-लिङ्ग और औषधरूपी तीन स्कन्ध हैं, ऐसे आयुर्वेद को जैसा का तैसा थोड़े ही दिनों में पूर्णरूपेण (इन्द्र से) समझ लिया और उसी से रोगरहित होकर दीर्घ आयु को प्राप्त किया तथा दूसरे मुनियों को भी रोग से रहित दीर्घ आयुवाला बना दिया ॥५३-५४॥ तत्तन्त्रजनितज्ञानचक्षुषा ऋषयोऽखिलाः । गुणान्द्रव्याणि कर्माणि दृष्ट्वा तद्विधिमाश्रितः ।।५५।। आरोग्यं लेभिरे दीर्घमायुश्च सुखसंयुतम् । आयुर्वेदोक्तविधिनाऽन्येऽपि स्युर्मुुनयो यथा ।।५६।। तदनन्तर भरद्वाज मुनि के बनाये हुये तन्त्र (ग्रन्थ) से उत्पन्न ज्ञानरूपी नेत्रों के द्वारा सम्पूर्ण ऋषियों ने भी गुण-द्रव्य और कर्मों को देखकर तथा उस तन्त्र में कही हुई विधियों का आश्रय लेकर आरोग्य तथा सुख से युक्त दीर्घ आयु प्राप्त किया और उसी तरह अन्यान्य मुनियों ने भी आयुर्वेद में कही हुई विधियों के द्वारा आरोग्यता तथा सुख से युक्त दीर्घ आयु पायी ॥५५-५६॥ अथ चरकप्रादुर्भावः- यदा मत्स्यावतारेण हरिणा वेद उद्धृतः । तदा शेषश्च तत्रैव वेदं साङ्गमवाप्तवान् ।।५७।। अथर्वान्तर्गतं सम्यगायुर्वेदं च लब्धवान् । एकदा स महीवृत्तं द्रष्टुंचर इवागतः ।।५८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA
तत्र लोकानादैर्ग्यस्तान्व्यथया परिपीडितान् । स्थलेषु बहुषुव्यग्रान् म्रियमाणांश्च दृष्टवान् ।।५९।। तान्दृष्ट्वाऽतिदयायुक्तास्तेषां दुःखेन दुःखितः । अनन्तश्चिन्तयामास रोगोपशमकारणम् ।।६०।। सञ्चिन्त्य स स्वयं तत्र मुनेः पुत्रो बभूव ह । प्रसिद्धस्य विशुद्धस्य वेदवेदाङ्गवेदिनः ।।६१।। चरक से आयुर्वेद की उत्पत्ति-जिस समय मत्स्यावतार द्वारा भगवान् विष्णु ने वेदों का उद्धार किया था। उस समय शेष भगवान् ने उसी स्थान पर अङ्गों के सहित वेदों को प्राप्त किया और अथर्ववेद के अन्तर्गत जो आयुर्वेद था, उसे भी भली-भाँति से प्राप्त किया। एक समय वही शेषजी चर (जासूस) की भाँति छिपे तौर से भूलोक (संसार) का वृत्तान्त जानने के लिये पृथिवी पर आये और यहाँ उन्होंने बहुत से स्थानों पर लोगों को रोगों से ग्रस्त एवं व्यथा से अत्यन्त पीड़ित तथा व्यग्र एवं मरते हुये देखा। उन लोगों को देखकर वे अत्यन्त दया से युक्त हो उन सबों के दुःख से दुःखित होते हुये रोगों से निवृत्त होने का उपाय सोचने लगे। इस भाँति सोच-विचार कर स्वयं शेष भगवान् इसी भूलोक में वेद और वेद के व्याकरणादि छः अङ्गों के जाननेवाले 'विशुद्ध' नामक प्रसिद्ध मुनि के पुत्र हुए ।।५७-६१।। यतश्चर इवायातो न ज्ञातः केनचिद्यतः । तस्माच्चरकनाम्नाऽसौ ख्यातश्च क्षितिमण्डले ।।६२।। स भाति चरकाचार्यो देवाक्षार्यो यथा दिवि । सहस्त्रवदनस्यांशो येन ध्वंसो रुजां कृतः ।।६३।। आत्रेयस्य मुनेः शिष्या अग्निवेशादयोऽभवन् । मुनयो बहवस्तैश्च कृतं तन्त्रं स्वकं स्वकम् ।।६४।। तेषां तन्त्राणि संस्कृत्य समाहृत्य विपश्चिता । चरकेणात्मनो नाम्ना ग्रन्थोऽयं चरकः कृतः ।।६५।। यतः शेष भगवान् चर की भाँति छिप कर आये और किसी ने उनको नहीं पहचाना। अतः वे 'चरक' नाम से भूमण्डल में विख्यात हुए जिन्होंने रोगों का नाश कर दिया वे शेषजी के अंश चरकाचार्य स्वर्ग में देवताओं के आचार्य बृहस्पति के समान संसार में सुशोभित हुए। पूर्वोक्त आत्रेय महर्षि के शिष्य अग्निवेशादि मुनिवरों ने अपने-अपने जिन- जिन तन्त्रों की रचना की थी उन सभी का प्रतिसंस्कार तथा सङ्ग्रह करके आचार्य चरक ने अपने नाम से 'चरक' ग्रन्थ बनाया ।।६२-६५।। अथ धन्वन्तरिप्रादुर्भावः- एकदा देवराजस्य दृष्टिनिपतिता भुवि । तत्र तेन नरा दृष्टा व्याधिभिर्भृशपीडिताः ।।६६।। तान्दृष्ट्वा हृदयं तस्य दयया परिपीडितम् । दयाऽऽर्द्रहृदयः शक्रो धन्वन्तरिमुवाच ह ।।६७।। धन्वन्तरे! सुरश्रेष्ठ! भगवन् ! किञ्चिदुच्यते । योग्यो भवसि भूतानामुपकारपरो भव ।।६८।। उपकाराय लोकानांकेन किं न कृतं पुरा । त्रैलोक्याधिपतिर्विष्णुरभून्मत्स्यादिरूपवान् ।।६९।। तस्मात्त्वं पृथिवीं याहि काशीमध्ये नृपो भव । प्रतीकाराय रोगाणामायुर्वेदं प्रकाशय ।।७०।। इत्युक्त्वा सुरशार्दूलाः सर्वभूतहितेप्सया । समस्तमायुषो वेदं धन्वन्तरिमुपादिशत् ।।७१।। धन्वन्तरि से आयुर्वेद की उत्पत्ति-एक समय देवताओं के राजा इन्द्र की दृष्टि भूलोक पर पड़ी तो उन्होंने मनुष्यों को रोगों से अत्यन्त पीड़ित देखा। यह देख उनका हृदय दया से अत्यन्त पीड़ा युक्त हो गया और उन्होंने धन्वन्तरि से कहा-हे देवताओं में श्रेष्ठ, भगवान् धन्वन्तरि ! मैं आप से कुछ कहता हूँ। क्योंकि उसके योग्य आप ही हैं। आप प्राणियों के उपकार करने में तत्पर हों। पहले समय में लोगों के उपकार के लिये किसने क्या नहीं किया, यहाँ तक कि त्रिलोकी के स्वामी विष्णु भगवान् ने भी (परोपकार के लिये) मछली आदि का रूप धारण किया था। इसलिये आप पृथ्वीतल पर जावें और काशीपुरी में वहाँ के राजा होवें एवं रोगों को दूर करने के लिये आयुर्वेद का प्रकाश करें। ऐसा कह कर देवताओं में श्रेष्ठ भगवान् इन्द्र ने सकल प्राणियों को कल्याण प्राप्त कराने की इच्छा से धन्वन्तरि को समस्त आयुर्वेद सिखा दिया ।।६६-७१।।
८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अधीत्य चायुषो वेदमिन्द्राद्धन्वन्तरिः पुरा। आगत्य पृथिवीं काश्यां जातो बाहुजवेश्मनि ।।७२।। नाम्ना तु सोऽभवत्ख्यातो दिवोदास इति क्षितौ। बाल एव विरक्तोऽभूच्चचार सुमहत्तपः ।।७३।। यत्नेन महता ब्रह्मा तं काश्यामकृन्नृपम्। ततो धन्वन्तरिलोकेः काशिराजोऽभिधीयते ।।७४।। हिताया देहिनां स्वीया संहिता विहिताऽमुना। अथ विद्यार्थिनो लोकान्संहितां तामपाठयत् ।।७५।। इस प्रकार इन्द्र भगवान् से आयुर्वेद का अध्ययन करके धन्वन्तरि पृथ्वीतल पर काशीपुरी में क्षत्रिय के घर में उत्पन्न हुये और 'दिवोदास' इस नाम से भूमण्डल में विख्यात हुये। वे लड़कपन से ही वैराग्य धारण कर बहुत बड़ा तप करने लगे। उसके बाद बड़े-बड़े यत्नों से (किसी भाँति) ब्रह्मा ने उन्हें काशीपुरी का राजा बनाया। उसी दिन से लोक धन्वन्तरि को काशी का राजा कहने लगे। इन्होंने प्राणियों के हित के लिये अपने नाम से धन्वन्तरि नामक संहिता बनाई और विद्यार्थी लोगों को वही संहिता पढ़ाई ॥७२-७५॥ अथ सुश्रुतप्रादुर्भावः- अथ ज्ञानदृशा विश्वामित्रप्रभृतयोऽविदन्। अयं धन्वन्तरिः काश्यां काशिराजोऽयमुच्यते ।।७६।। विश्वामित्रो मुनिस्तेषु पुत्रं सुश्रुतमुक्तवान्। वत्स ! वाराणसीं गच्छ त्वं विश्वेश्वरवल्लभाम् ।।७७।। तत्र नाम्ना दिवोदासः काशिराजोऽस्ति बाहुजः। स हि धन्वन्तरिः साक्षादायूर्वेदविदां वरः ।।७८।। आयुर्वेदं पठस्व त्वं लोकोपकृतिहेतवे। सर्वप्राणिदया तीर्थमुपकारो महामखः ।।७९।। पितुर्वचनमाकर्ण्य सुश्रुतः काशिकां गतः। तेन सार्द्धं समध्येतुं मुनिसूनुशतं ययौ ।।८०।। सुश्रुत से आयुर्वेद की उत्पत्ति-जब विश्वामित्र आदि ऋषियों ने अपनी-अपनी ज्ञानदृष्टि से देखा कि ये तो साक्षात् धन्वन्तरि हैं और ये काशीपुरा में 'काशिराज' नाम से कहे जाते हैं। तब विश्वामित्र ने सुश्रुत नामक पुत्र से कहा-हे वत्स ! तुम विश्वनाथजी की प्यारी वाराणसी (बनारस) जाओ। वहाँ पर 'दिवोदास' नाम से प्रसिद्ध जो क्षत्रिय काशी के राजा हैं, वे आयुर्वेद के जाननेवालों में श्रेष्ठ साक्षात् धन्वन्तरि हैं। अतः लोगों के उपकार के निमित्त तुम (उनसे) आयुर्वेद पढ़ो। क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों पर दया रखना ही तीर्थ है और उपकार करना ही बहुत भारी यज्ञ है। इस भाँति पिता का वचन सुन कर 'सुश्रुत' और उनके साथ पढ़ने के लिए और भी मुनियों के १०० पुत्र काशी गये ॥७६-८०॥ अथ धन्वन्तरिं सर्वे वानप्रस्थाश्रमे स्थितम्। भगवन्तं सुरश्रेष्ठं मुनिभिर्बहुभिः स्तुतम् ।।८१।। काशिराजं दिवोदासं तेऽपश्यन्विनयान्विताः। स्वागतं च तदा चाह दिवोदासो यशोधनः ।।८२।। कुशलं परिपप्रच्छ तथाऽऽगमनकारणम्। ततस्ते सुश्रुतद्वारा कथयामासुरुत्तरम् ।।८३।। भगवन्मानवाद्दृष्ट्वाव्याधिभिः परिपीडितान्। क्रन्दतो म्रियमाणांश्च जाताऽस्माकं हृदिव्यथा ।।८४।। आमयानां शमोपायं विज्ञातुं वयमागताः। आयुर्वेदं भवानस्मानध्यापयतु यत्नतः ।।८५।। (काशी में) विनय से युक्त होते हुए उन सबों ने जिनकी स्तुति बहुत से मुनि लोग कर रहे थे, ऐसे देवताओं में श्रेष्ठ भगवान् धन्वन्तरि को वानप्रस्थाश्रम में स्थित काशिराज दिवोदास के रूप में वर्त्तमान देखा। यशोधन (यश को ही धन मानने वाले) राजा दिवोदास ने उन सबों का स्वागत किया और कुशल तथा आने का कारण भी पूछा। उसके बाद उन सब मुनि के पुत्रों ने सुश्रुत के द्वारा उत्तर के रूप में यह कहा कि—हे भगवन् ! रोगों से अत्यन्त पीड़ित अतएव क्रन्दन करते तथा मृत्यु को प्राप्त होते हुए मनुष्यों को देख कर हम लोगों के हृदय में व्यथा उत्पन्न हुई और उन लोगों के रोगों के शान्त होने का उपाय जानने के लिये हम सब यहाँ आये हैं। अतः आप यत्नपूर्वक हम लोगों को आयुर्वेद का अध्ययन करावें ॥८१-८५॥
? It's तेनं. Wait, is it यत्नाज्जगृहुर्मुनयोorयत्लाज्जगृहुर्मुनयो? It's यत्नाज्जगृहुर्मुनयो`.
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अथ प्रथमप्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणम् ९
अङ्गीकृत्य वचस्तेषां नृपतिस्तानूपादिशत्... -> `नृपतिस्तानुपादिशत् । व्याख्यातं तेनं ते यत्नाज्जगृहुर्मुनयो मुदा ।।८६।।`
काशिराजं जयाशीर्भिरभिनन्द्य मुदाऽन्विताः । सुश्रुताद्याः सुसिद्धार्था जग्मुर्गेहं स्वकं स्वकम् ।।८७।।
प्रथमं सुश्रुतस्तेषु स्वतन्त्रं कृतवान्स्फुटम् । सुश्रुतस्य सखायोऽपि पृथक्तन्त्राणि तेनिरे ।।८८।।
सुश्रुतेन कृतं तन्त्रं सुश्रुतं बहुभिर्यतः । तस्मात्तत्सुश्रुतं नाम्ना विख्यातं क्षितिमण्डले ।।८९।।
इति भावप्रकाशे पूर्वखण्डे आयुर्वेदप्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणं समाप्तम् ।।१।।
उन लोगों की बात मान कर राजा दिव