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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ
  • मध्यमपर्व, तृतीय भाग *

२६९

मन्त्रसे वृक्षोंका कर्णवेध संस्कार करे। एक तीखी सूर्यसे वृक्षके दक्षिण तथा वाम भागके दो पत्तोंका छेदन करे। नवग्रहोंकी तुसिके लिये लडू आदिका भोग लगाये तथा बालक और कुमारियोंको मालपूआ खिलाये। रंजित सूत्रोंसे उद्यानके वृक्षोंको आवेष्टित करे। उन वृक्षोंको जलादिका प्राशन कराये और यह प्रार्थना-मन्त्र पढ़े—

वृक्षाग्रात् पतितस्यापि आरोहात् पतितस्य च। मरणे वास्ति भङ्गे वा कर्ता पापैर्न लिप्यते ॥

(मध्यमपर्व ३।१।३१)

तात्पर्य यह कि विधिपूर्वक उद्यान आदिमें लगाये गये वृक्षके ऊपरसे यदि कोई गिर जाय, गिरकर मर जाय या अस्थि टूट जाय तो उस पापका भागी वृक्ष लगानेवाला नहीं होता।

उद्यानके निमित्त पूजा आदि कर्म करानेवाले आचार्यको स्वर्ण, धान, गाय तथा दक्षिणा प्रदान कर उनकी प्रदक्षिणा करे। ऋत्विक्को भी स्वर्ण, रजत आदि दक्षिणामें दे। ब्रह्माको भी दक्षिणा देकर संतुष्ट करे एवं अन्य सदस्योंको भी प्रसन्न करे। अनन्तर यजमान स्थापित अधिकलशके जलसे स्नान करे। सूर्यास्तसे पूर्व ही पूर्णाहुति सम्पन्न करे। सम्पूर्ण कार्य पूर्णकर अपने घर जाय और विप्राके द्वारा वहाँ बल, काम, हयग्रीव, माधव, पुरुषोत्तम, वासुदेव, धनाध्यक्ष और नारायण—इन सबका विधिवत् स्मरण कर पूजन कराये और पञ्चगव्यमिश्रित दधि-भातका नैवेद्य समर्पित करे।

बल आदि देवताओंकी पूजा करनेके पश्चात् दक्षिणकी ओर 'स्योना पृथिवी' (यजु० ३५।२१) इस मन्त्रसे पृथ्वीदेवीका पूजन करे। मधुमिश्रित पायसात्रका नैवेद्य अर्पित करे। पृथ्वीदेवी शुद्ध

काञ्चन वर्णकी आभासे युक्त हैं। हाथमें वरद और अभयमुद्रा धारण किये हुए हैं। सम्पूर्ण अलंकारोंसे अलंकृत हैं। घरके वाम भागमें विश्वकर्माका यजन करे। 'विश्वकर्मन्' (ऋ० १०।८१।६) यह मन्त्र उनके पूजनमें विनियुक्त है। भगवान् विश्वकर्माका वर्ण शुद्ध स्फटिकके समान है, ये शूल और टंकको धारण करनेवाले हैं तथा शान्तस्वरूप हैं। इन्हें मधु और पिष्टककी बलि दे। अनन्तर कौष्माण्डसूक्त तथा पुरुषसूक्तका पाठ करे। इसी पृथ्वी-होम-कर्ममें मधु और पायस-युक्त हविष्यसे आठ आहुतियाँ दे तथा अन्य देवताओंको एक-एक आहुति दे।

उद्यानके चारों ओर अथवा बीच-बीचमें उद्यानकी रक्षाके लिये मेड़ोंका निर्माण करे, जिन्हें धर्मसेतु कहा जाता है। उद्यानकी दृढ़ताके लिये विशेष प्रबन्ध करे। धर्मसेतुका निर्माण कर उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे—

पिच्छले पतितानां च उच्छ्रितेनाङ्गसंगतः ॥ प्रतिष्ठिते धर्मसेतौ धर्मो मे स्यान्न पातकम्। ये चात्र प्राणिनः सन्ति रक्षां कुर्वन्ति सेतवः। वेदागमेन यत्पुण्यं यथैव हि समर्पितम् ॥

(मध्यमपर्व ३।१।४४-४६)

तात्पर्य यह कि यदि कोई व्यक्ति इस धर्मसेतु (मेड़)-पर चलते समय गिर जाय, फिसल जाय तो इस धर्मसेतुके निर्माणका कोई पाप मुझे न लगे। क्योंकि इस धर्मसेतुका निर्माण मैंने धर्मकी अभिवृद्धिके लिये ही किया है। इस स्थानपर आनेवाले प्राणियोंकी ये धर्मसेतु रक्षा करते हैं। वेदाध्ययन आदिसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य इस धर्म-सेतुके निर्माण करनेपर प्राप्त होता है। (अध्याय १)

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२७०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

गोचर-भूमिके उत्सर्ग तथा लघु उद्यानोंकी प्रतिष्ठा-विधि

[भारतमें पहले सभी ग्राम-नगरोंकी सभी दिशाओंमें कुछ दूरतक गोचर-भूमि रहती थी। उसमें गाये स्वच्छन्द-रूपसे चरती थीं और वह भूमि सर्वसामान्यके भी घूमने-फिरनेके उपयोगमें आती थी। छोटे-छोटे बालक भी उसमें क्रीड़ा करते थे। यह प्रथा अभी कुछ दिनों पहलेतक थी, पर अब वह सर्वथा लुप्त हो गयी है, इससे गो-धनकी बड़ी हानि हुई है। जिसका फल प्रकृति अनावृष्टि, भीषण महर्घता (महँगरी), दुष्कालकी स्थिति, भूकम्प, महायुद्ध और सर्वत्र निर्दोष लोगोंकी हत्याके रूपमें परोक्ष तथा प्रत्यक्ष-रूपसे दे रही है। इसकी निवृत्तिका एकमात्र समाधान है प्राचीन पुराणोक्त सदाचार, गो-सेवा और आस्तिकतापूर्ण आध्यात्मिक दृष्टिका पुनः अनुसंधान और अनुसरण करना। भला, आजकी दशासे, जहाँ किसीको भी किसी भी स्थितिमें तनिक भी शान्ति नहीं है, इससे अधिक और चिन्ताकी बात क्या हो सकती है। इस दृष्टिसे यह अध्याय विशेष महत्त्वका है और सभी पाठकोंको अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक अपने-अपने ग्राम-नगरोंके चतुर्दिक गोचरका या गो-प्रचार-भूमिका उत्सर्ग कर गो-संरक्षणमें हाथ बँटाना चाहिये।—सम्पादक]

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं गोचर-भूमिके विषयमें बता रहा हूँ, आप सुनें। गोचर-भूमिके उत्सर्ग-कर्ममें सर्वप्रथम लक्ष्मीके साथ भगवान् विष्णुकी विधिके अनुसार पूजा करनी चाहिये। इसी तरह ब्रह्मा, रुद्र, करालिका, वराह, सोम, सूर्य और महादेवजीका क्रमशः विविध उपचारोंसे पूजन करे। हवन-कर्ममें लक्ष्मीनारायणको तीन-तीन आहुतियाँ घीसे दे। क्षेत्रपालोंको मधुमिश्रित एक-एक लाजाहुति दे। गोचरभूमिका उत्सर्ग करके विधानके अनुसार यूपकी स्थापना करे तथा उसकी अर्चना करे। वह यूप तीन हाथका ऊँचा और नागफणोंसे युक्त होना चाहिये। उसे एक हाथसे भूमिके मध्यमें गाड़ना चाहिये। अनन्तर 'विश्वेषा' (ऋ० १०।२।६) इस मन्त्रका उच्चारण करे और 'नागाधिपतये नमः', 'अच्युताय नमः' तथा 'भीमाय नमः' कहकर यूपके लिये लाजा निवेदित करे। 'मधि गृह्णाभ्य' (यजु० १३।१) इस मन्त्रसे रुद्रमूर्तिस्वरूप उस यूपकी पञ्चोपचार-पूजा करे। आचार्यको अन्न, वस्त्र और दक्षिणा दे तथा होता एवं अन्य ऋत्विजोंको भी अभीष्ट दक्षिणा दे। इसके बाद उस गोचरभूमिमें रत्न छोड़कर इस मन्त्रको पढ़ते हुए गोचरभूमिका उत्सर्ग कर दे—

शिवलोकस्तथा गावः सर्वदेवसुपूजिताः ॥ गोभ्य एषा मया भूमिः सम्प्रदत्ता शुभाधिन।

(मध्यमपर्व ३।२।१२-१३)

'शिवलोकस्वरूप यह गोचरभूमि, गोलोक तथा गौएँ सभी देवताओंद्वारा पूजित हैं, इसलिये कल्याणकी कामनासे मैंने यह भूमि गौओंके लिये प्रदान कर दी है।'

इस प्रकार जो समाहित-चित्त होकर गौओंके लिये गोचरभूमि समर्पित करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें पूजित होता है। गोचरभूमिमें जितनी संख्यामें तृण, गुल्म उगते हैं, उतने हजारों वर्षतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। गोचरभूमिकी सीमा भी निश्चित करनी चाहिये। उस भूमिकी रक्षाके लिये पूर्वमें वृक्षोंका रोपण करे। दक्षिणमें सेतु (मेड़) बनाये। पश्चिममें कँटीले वृक्ष लगाये और उत्तरमें कूपका निर्माण करे। ऐसा करनेसे कोई भी गोचरभूमिकी सीमाका लङ्घन नहीं कर सकेगा। उस भूमिको जलधारा और घाससे परिपूर्ण करे। नगर या ग्रामके दक्षिण दिशामें गोचरभूमि छोड़नी चाहिये। जो व्यक्ति किसी अन्य प्रयोजनसे गोचरभूमिको जोतता, खोदता या नष्ट करता है, वह अपने कुलोंको पातकी बनाता है और अनेक ब्रह्म-हत्याओंसे आक्रान्त हो जाता है।

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  • मध्यमपर्व, तृतीय भाग *

२७१

जो भलीभाँति दक्षिणाके साथ गोचर्म-भूमिका* दान करता है, वह उस भूमिमें जितने तृण हैं, उतने समयतक स्वर्ग और विष्णुलोकसे च्युत नहीं होता। गोचरभूमि छोड़नेके बाद ब्राह्मणोंको संतुष्ट करे। वृषोत्सर्गमें जो भूमि-दान करता है, वह प्रेतयोनिको प्राप्त नहीं होता। गोचर-भूमिके उत्सर्गके समय जो मण्डप बनाया जाता है, उसमें भगवान् वासुदेव और सूर्यका पूजन तथा तिल, गुड़की आठ-आठ आहुतियोंसे हवन करना चाहिये। 'देहि मे०' (यजु० ३।५०) इस मन्त्रसे मण्डपके ऊपर चार शुक्ल घट स्थापित करे। अनन्तर सौर-सूक्त और वैष्णव-सूक्तका पाठ करे। आठ वटपत्रोंपर आठ दिक्पाल देवताओंके चित्र या प्रतिमा बनाकर उन्हें पूर्वदि आठ दिशाओंमें स्थापित करे और पूर्वदि दिशाओंके अधिपतियों—इन्द्र, अग्नि, यम, निर्वृति आदिसे गोचरभूमिकी रक्षाके लिये प्रार्थना करे। प्रार्थनाके बाद चारों वर्णोंकी, मृग एवं पक्षियोंकी अवस्थितिके लिये विशेषरूपसे भगवान् वासुदेवकी प्रसन्नताके लिये गोचरभूमिका उत्सर्जन करना चाहिये। गोचरभूमिके नष्ट-भ्रष्ट हो जानेपर, घासके जीर्ण हो जानेपर तथा पुनः घास उगानेके लिये पूर्ववत् प्रतिष्ठा करनी चाहिये, जिससे गोचरभूमि अक्षय बनी रहे। प्रतिष्ठाकार्यके निमित्त भूमिके खोदने आदिमें कोई जीव-जन्तु मर जाय तो उससे मुझे पाप न लगे, प्रत्युत धर्म ही हो और इस गोचरभूमिमें निवास करनेवाले मनुष्यों, पशु-पक्षियों, जीव-जन्तुओंका आपके अनुग्रहसे निरन्तर कल्याण हो ऐसी भगवान्से प्रार्थना करनी चाहिये। अनन्तर

गोचरभूमिको त्रिगुणित पवित्र धागेद्वारा सात बार आवेष्टित कर दे। आवेष्टनके समय 'सुत्रामार्ण पृथिवीं०' (ऋ० १०।६३।१०) इस ऋचाका पाठ करे। अनन्तर आचार्यको दक्षिणा दे। मण्डपमें ब्राह्मणोंको भोजन कराये। दीन, अन्ध एवं कृपणोंको संतुष्ट करे। इसके बाद मङ्गल-ध्वनिके साथ अपने घरमें प्रवेश करे। इसी प्रकार तालाब, कुआँ, कूप आदिकी भी प्रतिष्ठा करनी चाहिये, विशेषरूपसे उसमें वरुणदेवकी और नागोंकी पूजा करनी चाहिये।

ब्राह्मणो! अब मैं छोटे एवं साधारण उद्यानोंकी प्रतिष्ठाके विषयमें बता रहा हूँ। इसमें मण्डल नहीं बनाना चाहिये। बल्कि शुभ स्थानमें दो हाथके स्थाण्डिलपर कलश स्थापित करना चाहिये। उसपर भगवान् विष्णु और सोमकी अर्चना करनी चाहिये। केवल आचार्यका वरण करे। सूत्रसे वृक्षोंको आवेष्टित कर पुष्प-मालाओंसे अलंकृत करे। अनन्तर जलधारासे वृक्षोंको सींचे। पाँच ब्राह्मणोंको भोजन कराये। वृक्षोंका कर्णवेध संस्कार करे और संकल्पपूर्वक उनका उत्सर्जन कर दे। मध्य देशमें यूप स्थापित करे और दिशा-विदिशाओं तथा मध्य देशमें कदली-वृक्षका रोपण करे एवं विधानपूर्वक घीसे होम करे। फिर स्विष्टकृत हवन कर पूर्णाहुति दे। वृक्षके मूलमें धर्म, पृथ्वी, दिशा, दिक्पाल और यक्षकी पूजा करे तथा आचार्यको संतुष्ट करे। दक्षिणामें गाय दे। सब कार्य विधानके अनुसार परिपूर्ण कर भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे।

(अध्याय २-३)

  • गर्वां शतं वृषश्वेको यत्र तिष्ठत्ययन्त्रितः । तद्गोचर्मिति विख्यातं दत्तं सर्वाधनाशनम् ॥

जिस गोचरभूमिमें सौ गायें और एक बैल स्वतन्त्र रूपसे विचरण करते हों, वह भूमि गोचर्म-भूमि कहलाती है। ऐसी भूमिका दान करनेसे सभी पापोंका नाश होता है। अन्य बृहस्पति, वृद्धहारीत, शातातप आदि स्मृतियोंके मतसे प्रायः ३,००० हाथ लम्बी-चौड़ी भूमिकी संज्ञा गोचर्म है।

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२७२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अश्वत्थ, पुष्करिणी तथा जलाशयके प्रतिष्ठाकी विधि

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! अश्वत्थ-वृक्षकी प्रतिष्ठा करनी हो तो उसकी जड़के पास दो हाथ लम्बी-चौड़ी एक वेदीका निर्माण कर चन्दन आदिसे प्रोक्षित करे। उसपर कमलकी रचना कर अर्घ्य प्रदान करे। प्रथम दिनकी रात्रिमें 'तद्विष्णोः' (यजु० ६।५) इस मन्त्रद्वारा कलश-स्थापन कर गन्ध, चन्दन, दूर्वा तथा अक्षत समर्पण करे। चन्दन-लिस श्वेत सूत्रोंसे कलशोंको आवेष्टित करे। प्रथम कलशके ऊपर गणेशजीका, दूसरे कलशपर ब्रह्माजीका पूजन करे। दिशाओंमें दिक्पाल और वृक्षके मूलमें नवग्रहोंका पूजन-अर्चन करे। वृक्षके मूलमें विष्णु, मध्यमें शंकर तथा आगे ब्रह्माकी पूजा कर हवन करे। पिष्टकात्र-बलि दे। आचार्यको दक्षिणा देकर वृक्षको जलधारासे सींचे, उसकी प्रदक्षिणा करे और भगवान् सूर्यको अर्घ्य निवेदित कर घर आ जाय।

बावली आदिकी प्रतिष्ठामें प्रथम भूतशुद्धि करके सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे। तदनन्तर गणेश, गुरुपादुका, जय और भद्रका समाहित होकर पूजन करे। मण्डलके मध्यमें आधार-शक्ति, अनन्त तथा कूर्मकी पूजा करे। चन्द्र, सूर्य आदिका भी मण्डलमें पूजन करे। दूसरे पात्रमें पुष्पादि उपचारोंसे भगवान् वरुणका पूजन करे। कमलके पूर्वादि पत्रोंमें इन्द्रादि दिक्पालोंकी, उनके आयुधोंकी तथा मध्यमें ब्रह्माकी पूजा करे। 'भूर्भुवः स्वः' इन तत्त्वोंकी भी पूजा करे। मण्डलके उत्तर भागमें नागरूप अनन्तकी पूजा करे। इसके बाद हवन करे। प्रथम आहुति वरुणदेवको दे फिर दिक्पालों, नारायण, शिव, दुर्गा, गणेश, ग्रहों और ब्रह्माको प्रदान करे। स्विष्टकृत् हवन करके बलि प्रदान करे। एक अष्टदल कमलके ऊपर वरुणकी रजत-प्रतिमा स्थापित करे और पुष्करिणी (बावली)-

की प्रतिमा स्वर्णकी बनाये तथा उसका पूजनकर जलाशयमें छोड़ दे। जलाशयके मध्यमें नौका आरोपित करे। जलाशयके बीचमें ऋत्विक् होम करे। शेषनागकी मूर्ति भी जलाशयमें छोड़ दे। सम्पूर्ण कार्योंको सम्पन्न कर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। जलाशयमें मकर, ग्राह, मीन, कूर्म एवं अन्य जलचर प्राणी तथा कमल, शैवाल आदि भी छोड़े। अनन्तर जलाशयकी प्रदक्षिणा करे। लावा और सीपी भी छोड़े। दूधकी धारा भी दे। पुष्करिणीको चारों ओरसे रक्तसूत्रसे आवेष्टित करे। दीनोंको संतुष्ट कर घरमें प्रवेश करे।

ब्राह्मणो! अब मैं नलिनी (जिस तालाबमें कमल हो,) वापी तथा हृद (गहरे जलाशय)-की प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि बतला रहा हूँ। इन सबकी प्रतिष्ठा करनेके पहले दिन भगवान् वरुणदेवकी सुवर्ण-प्रतिमा बनाकर 'आपो हि घ्ना' (यजु० ११।५०) इस मन्त्रसे उसका जलाधिवास करे, अनन्तर एक सौ कमल-पुष्पोंसे प्रतिमाका पुष्पाधिवास करे। तत्पश्चात् मण्डलमें आकर पूर्वमुख बैठे और कलशपर गणेश, वरुण, शंकर, ब्रह्मा, विष्णु एवं सूर्यकी पूजा करे। वरुणके लिये घी और पायसकी आहुति दे। अन्य देवताओंको खुवाद्वारा एक-एक आहुति प्रदान कर पायस-बलि दे। फिर नलिनी-वापी आदिका संकल्पपूर्वक उत्सर्जन कर दे। मध्यमें यूपकी स्थापना करे। तदनन्तर गोदान दे और दक्षिणा प्रदान करे। पूर्णाहुतिके अनन्तर भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे और अपने घरमें प्रवेश करे।

द्विजो! अब मैं वृक्षोंके प्रतिष्ठा-विधानका वर्णन करता हूँ। वृक्षकी स्थापना कर सूत्रसे परिवेष्टित करे, फिर उसके पश्चिम भागमें कलश-स्थापना

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  • मध्यमपर्व, तृतीय भाग *

२७३

करे। कलशमें ब्रह्मा, सोम, विष्णु और वनस्पतिका पूजन करे। अनन्तर तिल और यवसे आठ-आठ आहुतियाँ दे। कदली-वृक्ष तथा यूपका उत्सर्जन करे, फिर लगाये गये वृक्षके मूलमें धर्म, पृथ्वी,

दिशा, दिक्पाल एवं यक्षकी पूजा करे तथा आचार्यको संतुष्ट करे। आचार्यको गोदान दे, दक्षिणा प्रदान करे। वृक्ष-पूजनके बाद भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे। (अध्याय ४-८)

वट, बिल्व तथा पूगीफल आदि वृक्ष-युक्त उद्यानकी प्रतिष्ठा-विधि

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! वट-वृक्षकी प्रतिष्ठामें वृक्षके दक्षिण दिशामें उसकी जड़के पास तीन हाथकी एक वेदी बनाये और उसपर तीन कलश स्थापित करे। उन कलशोंपर क्रमशः गणेश, शिव तथा विष्णुकी पूजा कर चरुसे होम करे। वट-वृक्षको त्रिगुणित रक्त सूत्रोंसे आवेष्टित करे। बलिमें यव-क्षीर प्रदान करे और यूपस्तम्भ आरोपित करे। वट-वृक्षके मूलमें यक्ष, नाग, गन्धर्व, सिद्ध और मरुदगणोंकी पूजा करे। इस प्रकार सम्पूर्ण क्रियाएँ विधिके अनुसार पूर्ण करे।

बिल्व-वृक्षकी प्रतिष्ठामें पहले दिन वृक्षका अधिवासन करे। त्र्यम्बकं (यजु० ३।६०) इस मन्त्रसे वृक्षको पवित्र स्थानपर स्थापित कर ‘सुनावमा’ (यजु० २१।७) इस मन्त्रसे गन्धोदकद्वारा उसे स्नान कराये। ‘मे गृह्णाभि’ इस मन्त्रसे वृक्षपर अक्षत चढ़ाये। ‘कथा नक्षित्र’ (यजु० २७।३९) इस मन्त्रसे धूप, वस्त्र तथा माला चढ़ाये। तदनन्तर रुद्र, विष्णु, दुर्गा और धनेश्वर—कुबेरका पूजन करे। दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर शास्त्रानुसार नित्यक्रियासे निवृत्त होकर घरमें सात ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराये। फिर बिल्वके मूलप्रदेशमें

दो हाथकी वर्तुलाकार वेदीका निर्माण करे। उसको गेरु तथा सुन्दर पुष्प-चूर्णादिसे रञ्जित कर उसपर अष्टदल-कमलकी रचना करे। वृक्षको लाल सूत्रसे पाँच, सात या नौ बार वेष्टित करे। वृक्ष-मूलमें उत्तराभिमुख होकर व्रीहि रोपे तथा शिव, विष्णु, ब्रह्मा, गणेश, शेष, अनन्त, इन्द्र, वनपाल, सोम, सूर्य तथा पृथ्वी—इनका क्रमशः पूजन करे। तिल और अक्षतसे हवन करे तथा घी एवं भातका नैवेद्य दे। यक्षोंके लिये उड़द और भातका भोग लगाये। ग्रहोंकी तुष्टिके लिये बाँसके पात्रपर नैवेद्य दे। बिल्व-वृक्षको दक्षिण दिशासे दूधकी धारा प्रदान करे। यूपका आरोपण करे, वृक्षका कर्णवेध-संस्कार करे और भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे।

यदि सौ हाथकी लम्बाई-चौड़ाईका उद्यान हो, जिसमें सुपारी या आम्र आदिके फलदायक वृक्ष लगे हों तो ऐसे उद्यानकी प्रतिष्ठामें वास्तुमण्डलकी रचना कर वास्तु आदि देवताओंका पूजन करके यजन-कर्म करे। विशेषरूपसे विष्णु एवं प्रजापति आदि देवताओंका पूजन करे। हवनके अन्तमें ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। (अध्याय ९-११)

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२७४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

मण्डप, महायूप और पौसले आदिकी प्रतिष्ठा-विधि

सूतजी कहते हैं—द्विजगणो! अब मैं यागादिके निमित्त निर्मित होनेवाले मण्डपोंकी प्रतिष्ठा-विधि बतलाता हूँ। वह मण्डप शिलामय हो या काष्ठमय अथवा तृण-पत्रादिसे निर्मित हो। ऐसी स्थितिमें अधिवासनके प्रारम्भमें शुभ-लग्न-मुहूर्तमें घट-स्थापन करे। उस कलशपर सूर्य, सोम और विष्णुकी अर्चना करे। 'आपो हि घ्नाः' (यजु० ११।५०) इस मन्त्रद्वारा कुशोदकसे तथा 'आप्यायस्वः' (यजु० १२।११४) इस मन्त्रद्वारा सुगन्ध-जलसे प्रोक्षण करे। 'गन्धद्वाराः' (श्रीसूक्त ९) इस ऋचासे चन्दन, सिन्दूर, आलता और अञ्जन समर्पण करे। फिर दूसरे दिन प्रातः वृद्धि-श्राद्ध करे। शुभ लक्षणवाले मण्डपमें दिवपालोंकी स्थापना करे। मध्यमें वेदीके ऊपर मण्डल चित्रित करे। उसमें सूर्य, सोम, विष्णुकी तथा कलशपर गणेश, नवग्रह आदिकी पूजा करे। सूर्यके लिये १०८ बार पायस-होम करे। विष्णु और सोमका उद्देश्य कर बारह आहुतियाँ एवं पायस-बलि दे। वास्तु-देवताका पूजन करे और उनको अर्घ्य देकर विधिवत् आहुति प्रदान करे, फिर उस मण्डलको संकल्पपूर्वक योग्य ब्राह्मणके लिये समर्पित कर दे। उसे विधिवत् दक्षिणा दे और सूर्यके लिये अर्घ्य प्रदान करे। तृण-मण्डपमें विशेषरूपसे वासुदेवके साथ भगवान् सूर्यकी पूजा करे। एक घटके ऊपर वरदायक भगवान् गणेशजीकी पूजा कर विसर्जन करे। ईशानकोणमें यूप स्थापित कर सभी दिशाओंमें ध्वजा फहराये।

ब्राह्मणो! अब मैं चार हाथसे लेकर सोलह हाथके प्रमाणमें निर्मित महायूपकी एवं पौसला

तथा कुर्ण आदिकी प्रतिष्ठा-विधि बतला रहा हूँ। इनकी प्रतिष्ठामें गर्ग-त्रिरात्र यज्ञ करना चाहिये। पौसलेके पश्चिम भागमें श्वेत कुम्भपर भगवान् वरुणको स्थापित कर 'गायत्री' मन्त्र तथा 'आपो हि घ्नाः' (यजु० ११।५०) इन मन्त्रोंसे उन्हें स्नान कराना चाहिये। उसके बाद गन्ध, तेल, पुष्प और धूप आदिसे मन्त्रपूर्वक उनकी अर्चना कर उन्हें वस्त्र, नैवेद्य, दीप तथा चन्दन आदि निवेदित करना चाहिये। प्रतिष्ठाके अन्तमें श्राद्ध कर एक ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराना चाहिये। आठ हाथका एक मण्डप बनाकर उसमें कलशकी स्थापना करे। उसपर नारायणके साथ वरुण, शिव, पृथ्वी आदिका तत्तद् मन्त्रोंसे पूजन करे, उसके बाद स्थालीपाक-विधानसे हवनके लिये कुशकण्डिका करे। भगवान् वरुणका पूजन कर खुवाद्वारा उन्हें 'वरुणस्यः' (यजु० ४।३६) इत्यादि मन्त्रोंसे दस आहुतियाँ प्रदान करे। अन्य देवताओंके लिये क्रमशः एक-एक आहुति दे। उसके बाद स्वष्टकृत् हवन करे और अग्निकी सप्तजिह्वाओंके नामसे चरुका हवन करे। तदनन्तर सभीको नैवेद्य और बलि प्रदान करे। इसके पश्चात् संकल्प-वाक्य पढ़कर कूपका उत्सर्जन कर दे। ब्राह्मणोंको पयस्विनी गाय एवं दक्षिणा प्रदान करे। यदि छोटे कूपकी प्रतिष्ठा करनी हो तो गणेश तथा वरुणदेवताकी कलशके ऊपर विधिवत् पूजा करनी चाहिये। लाल सूत्रसे कलशको वेष्टित करना चाहिये। यूप स्थापित करनेके पश्चात् संकल्पपूर्वक कूपका उत्सर्जन करना चाहिये। ब्राह्मणोंको विधिवत् सम्मानपूर्वक दक्षिणा देनी चाहिये। (अध्याय १२-१३)

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  • मध्यमपर्व, तृतीय भाग *

२७५

पुष्पवाटिका तथा तुलसीकी प्रतिष्ठा-विधि

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! पुष्पवाटिकाकी प्रतिष्ठामें तीन हाथकी एक वेदीका निर्माण कर उसपर घटकी स्थापना करे। पुष्पाधिवाससे एक दिन पूर्व ब्राह्मण-भोजन कराये। कलशपर गणेश, सूर्य, सोम, अग्निदेव तथा नारायणका आवाहन कर पूजन करे। वेदीपर मधु तथा पायससे हवन करे। ईशानकोणमें विधिवत् यूपका समारोपण कर उसके मूलमें गुरुवारके दिन गेहूँओंका रोपण कर उन्हें सींचे। वाटिकाको रक्त सूत्रसे आवेष्टित करे। वाटिकाके पुष्प-वृक्षोंका कर्णवेध कराकर उन्हें कुशोदकसे स्नान कराये और ब्राह्मणोंको धान्य, यव और गेहूँ दक्षिणारूपमें प्रदान करे और वाटिकाको जलधारासे सींचे।

तुलसीकी प्रतिष्ठा ज्येष्ठ और आषाढ़ मासमें विधिपूर्वक करनी चाहिये। प्रतिष्ठाके लिये शुद्ध दिन अथवा एकादशी तिथि होनी चाहिये। रात्रिमें घटकी स्थापना कर विष्णु, शिव, सोम, ब्रह्मा तथा इन्द्रका पूजन करे। गायत्री-मन्त्र तथा पूर्वोक्त देवताओंके मन्त्रोंद्वारा उन्हें स्नान कराये। 'कया नक्षित्रः' (यजु० २७।३९) इस मन्त्रसे गन्ध, 'अःशुनाः' (यजु० २०।२७) इस मन्त्रसे इत्र, 'त्वां गन्धर्वाः' (यजु० १२।१८) तथा 'मा नस्तोकेः' (यजु० १६।१६) आदि मन्त्रोंसे पुष्प, 'श्रीश्च तैः' (यजु० ३१।२२) तथा 'वैश्वदेवीः' (यजु० १९।४४) इन मन्त्रोंसे दूर्वा, 'रूपेण वोः' (यजु० ७।४५) इस मन्त्रसे दर्पण और 'याः फलिनीयाः' (यजु० १२।८९) इस मन्त्रसे फल अर्पण करे तथा

'समिन्द्वोः' (यजु० २९।१) इस मन्त्रसे अञ्जन लगाये। तुलसीको पीले सूत्रसे आवेष्टित कर उसके चारों ओर दूध और जलकी धारा दे। कलश तथा तुलसीको वस्त्रसे भलीभाँति आच्छादित कर घर आ जाय। दूसरे दिन 'तद्विष्णोः' (यजु० ६।५) इस मन्त्रसे सुहागिनी स्त्रियोंद्वारा मङ्गल-गानपूर्वक उसे स्नान कराये। मातृ-पूजापूर्वक वृद्धि-श्राद्ध करे। गन्ध आदि पदार्थोंद्वारा आचार्य, होता और ब्रह्मा आदिका वरण करे। दस हाथके मण्डपमें गोलाकार वेदीका निर्माण करे और वहाँ भगवान् नारायणका पूजन करे। वेदीके मध्य ग्रह, लोकपाल, सूर्य और मरुदग्णोंकी पूजा करे। कलशके चारों ओर रुद्र और वसुओंका पूजन करे। कुश-कण्डिका करके तिल-यवसे हवन करे। विष्णुको उद्दिष्ट कर १०८ आहुतियाँ दे। अन्य देवताओंको यथाशक्ति आहुति प्रदान करे। यूप स्थापित कर चरुकी बलि दे। चतुर्दिक् कदली-स्तम्भ स्थापित कर ध्वजाएँ फहराये। दक्षिणामें स्वर्ण, तिल-धान्य एवं पयस्विनी गाय प्रदान करे। तुलसीको क्षीरधारा दे।

कुछ ऐसे भी वृक्ष हैं, जिनकी प्रतिष्ठा नहीं होती। जैसे—जयन्ती, सोमवृक्ष, सोमवट, पनस (कटहल), कदम्ब, निम्ब, कनकपाटला, शाल्मलि, निम्बक, बिम्ब, अशोक आदि। इनके अतिरिक्त भद्रक, शमीकोण, चंडातक, बक तथा खदिर आदि वृक्षोंकी प्रतिष्ठा तो करनी चाहिये, किंतु इनका कर्णवेध-संस्कार नहीं करना चाहिये।

(अध्याय १४—१७)

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२७६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

एकाह-प्रतिष्ठा तथा काली आदि देवियोंकी प्रतिष्ठा-विधि

सूतजीने कहा—ब्राह्मणो! कलियुगमें अल्प सामर्थ्यवान् व्यक्ति देवता आदिकी प्रतिष्ठा एक दिनमें भी कर सकता है। जिस दिन प्रतिष्ठा करनी हो उसी दिन विद्वान् ब्राह्मण घृताधिवास कराये। जब सूर्यभगवान् उत्तरायणके हों, तब प्रतिष्ठादि कार्य करने चाहिये। शरत्काल व्यतीत हो जानेपर वसन्त-ऋतुमें यज्ञका आरम्भ करना चाहिये। नारायण आदि मूर्तियोंके बत्तीस भेद हैं। गजानन आदि देवताओंकी प्रतिष्ठा विहित कालमें ही करनी चाहिये। बुद्धिमान् मनुष्य नित्य-क्रियासे निवृत्त होकर आभ्युदयिक कर्म करे। अनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर यज्ञ-गृहमें प्रवेश करे। वहाँ प्रत्येक कुम्भके ऊपर भगवान् गणेश, नवग्रह तथा दिक्पालोंका विधिवत् पूजन करे। वेदीपर भगवान् विष्णु और उनके परिवारका पूजन करे। सर्वप्रथम भगवान् विष्णुको विभिन्न तीर्थ, समुद्र, नदियों आदिके जल, पञ्चामृत, पञ्चगव्य, सप्त-मृत्तिकाभिन्न जल, तिलके तेल, कषाय-द्रव्य और पुष्पोदकसे स्नान कराये। तुलसी, आम्र, शमी, कमल तथा करवीरके पत्र-पुष्पोंसे उनकी पूजा करे। इसके बाद मूर्तियोंमें प्राण-प्रतिष्ठा सम्पन्न करे। तत्पश्चात् विधिपूर्वक हवन करे। ब्राह्मणोंको दक्षिणाद्वारा संतुष्टकर पूर्णाहुति प्रदान करे।

ब्राह्मणो! अब मैं काली आदि महाशक्तियोंकी प्रतिष्ठा एवं अधिवासनकी संक्षिप्त विधि बतला रहा हूँ। प्रतिष्ठाके पूर्व दिन देवीकी प्रतिमाका अधिवासन कर आभ्युदयिक श्राद्ध करे। सर्वप्रथम

भगवतीकी प्रतिमाको कमलयुक्त जलसे, फिर पञ्चगव्यसे स्नान कराये। कुम्भके ऊपर भगवती दुर्गाकी अर्चना करे। तदनन्तर मूर्तिकी प्राण-प्रतिष्ठा करे। बिल्व-पत्र और बिल्व-फलोंसे सौ आहुतियाँ दे। दक्षिणामें सुवर्ण प्रदान करे। भगवती कालिका और ताराकी प्रतिमाओंका अलग-अलग अर्चन करे। भगवतीको नाना प्रकारके सुगन्धित द्रव्योंसे तीन दिनतक स्नान कराये और नैवेद्य अर्पण करे। ताँबेके कलशपर तीन दिनतक प्रातःकालमें देवीकी अर्चना करे, फिर कन्याओंद्वारा सुगन्धित जलसे भगवतीको स्नान कराये। आठवें दिन भी रात्रिमें विशेष पूजन करे एवं पायस-होम करे।

आगमोंके अनुसार शिवलिङ्गकी प्रतिष्ठामें तीन ब्राह्मणोंको भोजन कराये और विशेषरूपसे भगवान्की प्रतिमाका अधिवासन करे। नित्य-क्रिया करके आभ्युदयिक श्राद्ध करे। दूसरे दिन प्रातः आचार्यका वरण करे। विधिके अनुसार प्रतिमाको स्नान कराकर शिवलिङ्गका परिवारके साथ पूजन करे। विधिपूर्वक तिलमयी या स्वर्णमयी अथवा साक्षात् गौका दान करे। हवनकी समाप्तिपर शुद्ध घृतसे वसुधारा प्रदान करे। इसी तरह सूर्य, गणेश, ब्रह्मा आदि देवताओं तथा वाराही एवं त्रिपुरादेवी और भुवनेश्वरी, महामाया, अम्बिका, कामाक्षी, इन्द्राक्षी तथा अपराजिता आदि महाशक्तियोंकी प्रतिमाओंकी प्रतिष्ठा भी विधिपूर्वक करनी चाहिये और रात्रि-जागरण कर महान् उत्सव करना चाहिये। देवीकी प्रतिष्ठामें कुमारी-पूजन भी करना चाहिये।

(अध्याय १८-१९)

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  • मध्यमपर्व, तृतीय भाग *

२७७

दिव्य, भौम एवं अन्तरिक्षजन्य उत्पात तथा उनकी शान्तिके उपाय१

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं विविध प्रकारके अपशकुनो, उत्पातों एवं उनके फलोंका वर्णन कर रहा हूँ। आपलोग सावधान होकर सुनें। जिस व्यक्तिकी लगन-कुण्डली अथवा गोचरमें पाप-ग्रहोंका योग हो तो उसकी शान्ति करानी चाहिये। दिव्य, अन्तरिक्ष और भौम—ये तीन प्रकारके उत्पात होते हैं। ग्रह, नक्षत्र आदिसे जो अनिष्टकी आशंका होती है वह दिव्य उत्पात कहलाता है। उल्कापात, दिशाओंका दाह (मण्डलोंका उदय, सूर्य-चन्द्रके ईर्द-गिर्द पड़नेवाले घेरैका दिखायी देना), आकाशमें गन्धर्वनगरका दर्शन, खण्डवृष्टि, अनावृष्टि या अतिवृष्टि आदि अन्तरिक्षजन्य उत्पात हैं। जलाशयों, वृक्षों, पर्वतों तथा पृथ्वीसे प्रकट होनेवाले भूकम्प आदि उत्पात भौम उत्पात कहलाते हैं। अन्तरिक्ष एवं दिव्य उत्पातोंका प्रभाव एक ससाहतक रहता है। इसकी शान्तिके लिये तत्काल उपाय करना चाहिये अन्यथा वे बहुत कालतक प्रभावी रहते हैं। देवताओंका हँसना, रुधिर-खाव होना, अकस्मात् बिजली एवं वज्रका गिरना, हिंसा और निर्दयताका बढ़ना, सर्पोंका आरोहण करना—ये सब दैव दुर्निमित्त हैं। मेघसे उत्पन्न वृष्टि केवल शिलातलपर ही गिरे तो एक ससाहेके अंदर उत्पन्न प्राणी नष्ट हो जाते हैं। एक राशिपर शनि, मंगल और सूर्य—ये पापग्रह स्थित हो जायँ और पृथ्वी अकस्मात् धुएँसे ढकी दीखे तो भारी जनसंहारकी सम्भावना होती है। यदि बृहस्पति अपनी राशिका अतिचार२ करे और शनि वहाँ स्थित न हो तो राज्य-नष्ट होनेकी सम्भावना रहती है। यदि सूर्य कुछ समयतक न दिखायी दे और दिशाओंमें दाह

होने लगे, धूमकेतु दिखायी दे और बार-बार भूकम्प होता हो तथा राजाके जन्म-दिनमें इन्द्रधनुष दिखायी पड़े तो वह उसके लिये भारी दुर्निमित्त है। भयंकर आँधी-तूफान आ जाय, ग्रहोंका आपसमें युद्ध दिखलायी दे, तीन महीनेमें ही दूसरा ग्रहण लग जाय अथवा उल्कापात हो, आकाश और भूमिपर मेढ़क दौड़ने लगे, हल्दीके समान पीली वृष्टि हो, पत्थरोंमें सिंह और बिल्लीकी आकृति दिखलायी पड़े तो राष्ट्रमें दुर्भिक्ष और राजाका विनाश होता है। चैत्रमें अथवा कुम्भके सूर्यमें (फाल्गुन मासमें) नदीका वेग अकस्मात् बहुत बढ़ जाय तो राष्ट्रमें विप्लव होता है। ये सब सूर्यजन्य अद्भुत उत्पात हैं। हवन आदिद्वारा इनकी शान्ति करानी चाहिये। 'आ कृष्णोन्' (यजु० ३३।४३) इस सूर्यमन्त्रद्वारा हवन कराना चाहिये। धान्यादिका निस्सार हो जाना, गौओंका निस्तेज हो जाना, कुओंका जल सहसा सूख जाना—ये सब भी सूर्यजनित उत्पात हैं, इनकी शान्तिके लिये कमल-पुष्पोंसे एक सहस्र आहुतियाँ देनी चाहिये। विकृत पक्षी, पाण्डुवर्ण कपोत, श्वेत उल्लू, काला कौआ और कराकुल पक्षी यदि घरमें गिरें तो उस घरमें महान् उत्पात मच जाता है। गलेकी मालाएँ आपसमें टकराने लगे, सद्यः उत्पन्न बालकको दाँत हो, देवताओंकी मूर्तियाँ हँसती हों, मूर्तियोंमें पसीना दीख पड़े और घड़ेमें अथवा घरमें सर्प और मण्डूकका प्रसव हो जाय तो उस घरकी गृहिणी छः मासके अंदर नष्ट हो जाती है। घरपर या वृक्षपर बिजली कड़कड़ाकर गिरने और आगकी ज्वालाएँ दिखायी देनेपर महान् उत्पात होता है। इन सबकी

१-इन उत्पातोंका तथा इनकी शान्तियोंका विस्तृत विधान आथर्वण शाक्तिकल्प एवं अथर्वपरिशिष्टादिमें दिया गया है। मत्स्यपुराणके २२८ से २३८ तकके अध्यायोंमें भी यह विषय विवेचित है।

२-एक राशिका भोगकाल समाप्त हुए बिना तीव्रगतिसे आगे चला जाना। यह स्थिति केवल मंगलसे लेकर शनितकके ग्रहोंकी होती है।

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२७८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

शान्तिके लिये रविवारके दिन भगवान् सूर्यकी प्रसन्नता-हेतु उनकी पूजा करे। तिल एवं पायसकी दस हजार आहुतियाँ प्रदान करे। गो-दान करे और ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। इससे शीघ्र शान्ति होती है। अचानक ध्वज, चामर, छत्र तथा सिंहासनसे विभूषित रथपर राजाका दिखलायी देना तथा स्त्री-पुरुषोंकी लड़ाई—ये भी महान् उत्पात हैं। पृथ्वीका काँपना, पहाड़ोंका टकराना, कोयल और उल्लूका रोना आदि सुनायी पड़े तो राजा, मन्त्री, राजपुत्र, हाथी आदि विनष्ट होते हैं।

ताड़ एवं सुपारीके वृक्ष एक साथ उत्पन्न हो जायँ तो उस घरमें रहनेवालोंपर विपत्तिकी सम्भावना होती है। दूसरे वृक्षोंमें अन्य वृक्षोंके फूल-फल लगे हुए दीखें तो ये सोमग्रहजन्य उत्पात है। इसकी शान्तिके लिये सोमवारके दिन सोमके निमित्त दधि, मधु, घृत तथा पलाश आदिसे 'इमं देवाः' (यजु० १।४०) इस मन्त्रसे एक हजार आहुतियाँ दे और चरुसे भी हवन करे।

उड़द और जौकी ढेरियाँ सहसा लुप्त हो जायँ, दही, दूध, घी और पक्कात्रोंमें रुधिर दिखलायी पड़े, एकाएक घरमें आग-जैसा लगना दिखायी दे, बिना बादलके ही बिजली चमकने लगे, घरके सभी पशु तथा मनुष्य रुग्ण-से दिखायी पड़ें तो मङ्गल ग्रहसे उत्पन्न उत्पात समझने चाहिये। इनसे राजा, अमात्य तथा घरके स्वामियोंका विनाश होता है। ऐसे भयंकर उपद्रवोंको देखकर मङ्गलकी शान्तिके लिये दही, मधु, घीसे युक्त खैर और गूलरकी समिधासे 'अग्निर्मूर्धोः' (यजु० ३।१२) इस मन्त्रसे दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये। तीन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दक्षिणामें लाल वस्तुएँ देनी चाहिये तथा सोने या ताँबेकी मङ्गलकी प्रतिमा बनाकर दानमें देनी चाहिये। इससे शान्ति होती है।

गौएँ यदि घरमें पूँछ उठाकर स्वयं दौड़ने लगे और कुत्ते तथा सूअर घरपर चढ़ने लगे तो उस घरकी स्त्रियोंको भीषण क्लेशकी आशंका होती है। गृहस्वामीका पूर्णतः मिथ्यावादी होना तथा राजाका वाद-विवादमें फँसना, घरमें गौओंका चिल्लाना, पृथ्वीका हिलना, घरमें मेढक तथा साँपका जन्म लेना—ये सभी उत्पात बुधग्रहजन्य हैं। इसमें राज्य तथा घरके नष्ट होनेकी सम्भावना होती है। इन उत्पातोंकी शान्तिके लिये बुधवारके दिन बुधग्रहके उद्देश्यसे दही, मधु, घी तथा अपामार्गकी समिधा एवं चरुसे 'उदबुध्चस्वः' (यजु० १५।५४) इस मन्त्रद्वारा दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये। बुधकी सुवर्णकी प्रतिमा तथा पयस्विनी गाय ब्राह्मणको दानमें देनी चाहिये।

पशुओंका असमयमें समागम और उनसे यमल संततियोंकी उत्पत्ति, जौ, ब्रीहि आदिका सहसा लुप्त हो जाना, गृहस्तम्भका सहसा टूटना, आँगनमें बिल्ली तथा मेढकका नखोंसे जमीन कुरेदना और इनका घरपर चढ़ना, ये सभी दोष जहाँ दिखायी दें, वहाँ छः महीनेके भीतर ही घरका विनाश होता है—कोई प्राणी मर जाता है या कुटुम्बमें कलह होता है तथा अनेक व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। बिल्व-वृक्षपर गृध्र और गृध्रीका एक साथ दिखलायी देना राजाके लिये विश्रमकारक तथा प्रासादके लिये हानिकारक होता है। इस दोषसे अमात्यवर्ग राजाके विपरीत हो जाता है। ये सभी बृहस्पतिजनित दोष हैं। इनकी शान्तिके लिये बृहस्पतिके निमित्त शान्ति-होम करना चाहिये तथा पयस्विनी गाय एवं स्वर्णकी बृहस्पतिकी प्रतिमाका दान करना चाहिये।

राक्षसद्वारा घड़ेका जल पीनेका आभास होना; सिंह, शर्करा, तेल, चाँदी, ताण्डवनृत्य, उड़द-

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  • मध्यमपर्व, तृतीय भाग *

२७९

भात, धान्य आदिका आभास होना; घरमें ताँबा, काँसा, लोहा, सीसा तथा पीतल आदिका रखा दिखायी देनेका आभास होना; ऐसे उत्पातपर धनके नाश होनेकी सम्भावना रहती है और अनेक व्याधियाँ होती हैं, राजा भयंकर उपद्रव तथा बन्धनमें पड़ जाता है। गौ, अश्व तथा सेवकोंका विनाश होता है। दन्तपंक्तिको छोड़कर दाँतोंके ऊपर दाँतोंका निकलना, शलाकाके समान दाँत निकलना—ये भी दोषकारक हैं। बर्तनोंमें, घड़ोंमें यदि बादलके गरजनेकी आवाज सुनायी दे तो गृहस्वामीपर विपत्तिकी सम्भावना होती है—ये शुक्रग्रहजनित दोष हैं। इनकी शान्तिके लिये शुक्रवारके दिन दही, मधु, घृतयुक्त शमीपत्रसे हवन करे तथा दो सफेद वस्त्र, पयस्विनी श्वेत गौ और सुवर्णकी शुक्रकी प्रतिमाका दान करना चाहिये।

मन्दिरकी जमीन यदि रक्त वर्णकी अथवा पुष्पित दिखलायी दे तो वहाँ भी उत्पातकी सम्भावना होती है। आकाशमें जलती हुई आग दिखायी दे तो स्त्री-पुरुषोंकी हानि और राष्ट्रमें विप्लवकी सम्भावना होती है। सभी ओषधियाँ और सस्य रसविहीन हो जायँ; हाथी, घोड़े, मतवाले होकर हिंसक हो जायँ; राजाके लिये नगर तथा गाँवमें सभी शत्रु हो जायँ; गौ, महिष आदि पशु अनायास उत्पात मचाने लगे; घरके दरवाजेमें गोह और शंखिनी प्रवेश करे तो अशुभ समझना चाहिये; इससे राज-पीड़ा और धन-हानि होती है। ये सभी उत्पात शनिग्रहजनित समझने चाहिये। इनकी शान्तिके लिये विविध सस्यों तथा समिधाओंसे शनिवारके दिन 'शं नो देवी' (यजु० ३६।१२) इस मन्त्रसे दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये और चरुसे भी हवन करना चाहिये। नीली सवत्सा पयस्विनी गाय, दो वस्त्र, सोना, चाँदी, शनिकी

प्रतिमा आदि दक्षिणामें ब्राह्मणको देनी चाहिये।

बादलके गरजे बिना लाल-पीली शिलावृष्टिका दिखलायी देना, बिना हवाके वृक्षका हिलना-डुलना दिखलायी देना, इन्द्रध्वज तथा इन्द्रधनुषका गिरना, दिनमें सियारोंका तथा रात्रिमें उलूकका रोना, एक बैलका दूसरे बैलके ककुदपर मुँह रखकर रँभाना, ऐसे दोष होनेपर देशमें पापकी वृद्धि होती है तथा राजा राज्य एवं धर्मसे च्युत हो जाता है। गौ और ब्राह्मणमें परस्पर द्वन्द्व मच जाता है, वाहन नष्ट हो जाते हैं। यदि आकाशमें ध्वजकी छाया दिखलायी पड़े तो राष्ट्रमें महान् विप्लव होता है। यदि जलमें जलती हुई आग दिखलायी दे और सिर अथवा शरीरपर बिजली गिर जाय तो उसका जीवन दुर्लभ हो जाता है। दरवाजोंके किनारेपर अथवा स्तम्भपर अग्नि अथवा धूम दिखलायी दे तो मृत्युका भय होता है। आकाशमें वज्राघात, अग्निकी ज्वालाके मध्य धुआँ, नगरके मध्य किसी अनहोनी घटनाका दिखलायी देना, शव ले जाते समय उस शवका उठकर बैठ जाना; स्थापित लिङ्गका गमन करना; भूकम्प, आँधी-तूफान, उल्कापात होना; बिना समय वृक्षोंमें फल-फूल लगना—ये सभी उत्पात राहुजन्य हैं। इनकी शान्तिके लिये दही, मधु, घी, दूब, अक्षत आदिसे 'कया नश्चित्र' (यजु० २७।३९) इस मन्त्रद्वारा रविवारके दिन दस हजार आहुतियाँ राहुके लिये दे, चरुसे भी हवन करे। पयस्विनी कपिला गौ, अतसी, तिल, शंख और युग्मवस्त्र ब्राह्मणको दानमें दे। वारुणहोम भी करे। इससे सारे दोष-पाप नष्ट हो जाते हैं।

यदि जम्बूक, गृध्र, कौए आदि भीषण ध्वनि करते हों तथा भयंकर नृत्य करते हों तो मृत्युकी आशंका होती है, जलती हुई आगके समान

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२८० * संक्षिप्त भविष्यपुराण * धूमकेतुका दिखलायी पड़ना, जमीनका खिसकना | राहुजन्य उत्पात हैं। इनकी शान्तिके लिये शनिवारके मालूम होना—ऐसी स्थितिमें राजा पीड़ित होता | दिन शनिके निमित्त दस हजार आहुतियाँ देनी है, राज्यमें अकाल पड़ता है तथा अनेक प्रकारके | चाहिये। अर्क-पुष्पसे शनिकी पूजा करे तथा अनिष्ट होते हैं। इनकी शान्तिके लिये स्वर्णछत्रयुक्त | चरुसे सौ बार आहुति दे। वाम और दक्षिणके सात घोड़ोंसे युक्त सूर्यमण्डप बनाकर ब्राह्मणको | क्रमसे यदि बाहु, पैर तथा आँखमें स्पन्दन हो तो दान करे। बिल्वपत्र भी दे, ऐन्द्र मन्त्रसे हवन | इससे मृत्युका भय होता है। यह सोमग्रहजनित करे। यदि अकस्मात् शाल, ताल, अक्ष, खदिर, | दुर्निमित्त है। पुस्तक, यज्ञोपवीत, चरु तथा इन्द्र- कमल आदि घरके अंदर ही उत्पन्न हों तो ये | ध्वजमें आग लग जाय तो यह सूर्यजन्य दुर्निमित्त सभी केतुग्रहजन्य दोष हैं। इनकी शान्तिके लिये | है। इसकी शान्तिके लिये सूर्यके निमित्त त्रिमधुयुक्त 'त्र्यम्बकं ० ' (यजु० ३।६०) इस मन्त्रसे दही, | कनेरके पुष्पोंसे आहुतियाँ देनी चाहिये। जिन मधु, घृतसे दस हजार आहुतियाँ दे तथा चरु भी | ग्रहोंका दुर्निमित्त दिखलायी दे, उसकी शान्तिके प्रदान करे। नीली सवत्सा पयस्विनी गाय, वस्त्र, | लिये ग्रहों तथा उसके अधिदेवता और प्रत्यधिदेवताके केतुकी प्रतिमा आदि ब्राह्मणको दान करे। | निमित्त भी विधिपूर्वक पूजन-हवन-स्तवन, दान दक्षिण दिशामें अपनी छाया अपने पैरके | आदि करना चाहिये। विधिके अनुसार क्रिया न एकदम समीप आ जाय और छायामें दो या पाँच | करनेसे दोष होता है। अतः ये सभी शान्त्यादि- सिर दिखलायी दें अथवा छिन्न-भिन्न रूपमें सिर | कर्म शास्त्रोक्त विधानके अनुसार ही करने चाहिये। दिखलायी दे तो देखनेवालेकी सप्ताहके भीतर ही | इससे शान्ति प्राप्त होती है और सर्वविध कल्याण- मृत्युकी आशंका होती है। कौआ, बिल्ली, तोता | मङ्गल होता है। तथा कपोतका मैथुन दिखलायी दे तो ये दुर्निमित्त | (अध्याय २०)

॥ मध्यमपर्व, तृतीय भाग सम्पूर्ण ॥

॥ भविष्यपुराणान्तर्गत मध्यमपर्व सम्पूर्ण ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

प्रतिसर्गपर्व

(प्रथम खण्ड)

[वास्तवमें भविष्यपुराणके भविष्य नामकी सार्थकता प्रतिसर्गपर्वमें ही चरितार्थ हुई दीखती है। वंशानुकीर्तन सभी पुराणोंका मुख्य लक्षण है—‘वंशानुकीर्तनं चेति पुराणं पञ्चलक्षणम्।’ यह विषय सभी पुराणोंमें प्राप्त होता है। भविष्यपुराणमें तो कई स्थानोंपर आया है, पर प्रतिसर्गपर्वने आधुनिक इतिहासका मार्ग प्रशस्त कर दिया है। अरबी-फारसी और उर्दूमें इतिहासको तवारीख (तारीख) कहते हैं। सभी घटनाओंका उल्लेख तारीख (तिथि, वर्ष) क्रमपूर्वक हुआ है। अंग्रेजीमें भी इतिहासका सही नाम ‘क्रानिकल्स’ है। भारतीय दृष्टिमें कालका प्रवाह अनन्त है। एक सृष्टिके बाद दूसरी सृष्टिमें कल्प-महाकल्प लगे हुए हैं—जैसे—‘इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कल्प सात अरु बीसा ॥’ इसलिये किसी एक कल्पका ही वर्णन एक पुराणमें सम्भव होता है। प्रतिसर्गपर्व अपनेको वाराह-कल्पमें वैवस्वत मन्वन्तरका ही इतिहास-निर्देशक बतला रहा है और बड़ी सावधानीसे सत्ययुग, त्रेतायुग आदिके दीर्घायु राजाओंके राज्य आदिका उल्लेख कर रहा है। बादमें कलियुगी राजाओंके वंशका भी वर्णन करता है। प्रस्तुत विवरणमें नामोंकी विशेष शुद्धिके लिये वाल्मीकीय रामायण, विष्णुपुराण, वायुपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, श्रीमद्भागवतके साथ अन्य ग्रन्थों एवं ऐतिहासिक, पौराणिक कोषोंसे भी सहायता ली गयी है।—सम्पादक]

सत्ययुगके राजवंशका वर्णन

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥

‘भगवान् नर-नारायणके अवतारस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण एवं उनके सखा नरश्रेष्ठ अर्जुन, उनकी लीलाओंको प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती तथा उनके चरित्रोंका वर्णन करनेवाले वेदव्यासको नमस्कार कर अष्टादश पुराण, रामायण और महाभारत आदि जय नामसे व्यपदिष्ट ग्रन्थोंका वाचन करना चाहिये।’

महामुनि आचार्य शौनकजीने पूछा—मुने! ब्रह्माकी आयुके उत्तरार्धमें भविष्य नामके महाकल्पमें प्रथम वर्षके तीसरे दिन वैवस्वत नामक मन्वन्तरके अट्टाईसवें सत्ययुगमें कौन-कौन राजा हुए? आप उनके चरित्र तथा राज्यकालका वर्णन करें।

सूतजी बोले—श्वेतवाराहकल्पमें ब्रह्माके वर्षके तीसरे दिन सातवें मुहूर्तके प्रारम्भ होनेपर महाराज वैवस्वत मनु उत्पन्न हुए। उन्होंने सरयू नदीके तटपर दिव्य सौ वर्षांतक तपस्या की और उनकी छींक्से उनके पुत्ररूपमें राजा इक्ष्वाकुका जन्म हुआ।

ब्रह्माके वरदानसे उन्होंने दिव्य ज्ञानकी प्राप्ति की। राजा इक्ष्वाकु भगवान् विष्णुके परम भक्त थे। उन्हींकी कृपासे उन्होंने छत्तीस हजार वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र विकुक्षि हुए, अपने पिता इक्ष्वाकुसे सौ वर्ष कम अर्थात् पैंतीस हजार नौ सौ वर्षांतक राज्य करके वे स्वर्ग पधार गये। उनके पुत्र रिपुञ्जय हुए और उन्होंने भी पिता विकुक्षिसे सौ वर्ष कम अर्थात् पैंतीस हजार आठ सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र ककुत्स्थ हुए। उन्होंने पैंतीस हजार सात सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र अनेना हुए, उन्होंने पैंतीस हजार छः सौ वर्षांतक राज्य किया। अनेनाके पुत्र पृथु नामसे विख्यात हुए। उन्होंने पैंतीस हजार पाँच सौ वर्षांतक राज्य किया और उनके पुत्र विष्ण्वश्व हुए, उन्होंने पैंतीस हजार चार सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र अद्वि हुए, उन्होंने पैंतीस हजार तीन सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र भद्राश्व हुए, जिन्होंने पैंतीस हजार दो सौ वर्षांतक राज्य किया। राजा भद्राश्वके पुत्र युवनाश्व हुए, उन्होंने पैंतीस

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२८२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

हजार एक सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र श्रावस्त हुए। (इन्होंने श्रावस्ती नामकी नगरी बसायी थी।) उस समय सत्ययुगमें समग्र भारतवर्षमें धर्म अपने तप, शौच, दया तथा सत्य चारों चरणोंसे* विद्यमान था। इन सभी इक्ष्वाकुवंशी राजाओंने उदयाचलसे अस्ताचलपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीपर नीति एवं धर्मपूर्वक राज्य किया। महाराज श्रावस्तने पैंतीस हजार वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र बृहदश्च हुए, उन्होंने चौतीस हजार नौ सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र कुवलयाश्च हुए, उन्होंने चौतीस हजार आठ सौ वर्षांतक राज्य किया।

महाराज कुवलयाश्चके पुत्र दृढाश्च हुए, जिन्होंने अपने पितासे एक हजार वर्ष कम अर्थात् तैंतीस हजार आठ सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र निकुम्भक हुए, उन्होंने पितासे एक हजार वर्ष कम अर्थात् बत्तीस हजार आठ सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र संकटाश्च हुए, उन्होंने एक हजार वर्ष कम अर्थात् इकत्तीस हजार आठ सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र प्रसेनजित् हुए, उन्होंने तीस हजार आठ सौ वर्षांतक राज्य किया। इसके बाद रवणाश्च हुए, उन्होंने उनतीस हजार आठ सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र मान्धाता हुए, उन्होंने अपने पितासे एक सौ वर्ष कम अर्थात् उनतीस हजार सात सौ वर्षांतक राज्य किया। महाराज मान्धाताके पुत्र पुरुकुत्स हुए, उन्होंने उनतीस हजार छः सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र त्रिशदश्च हुए, उनके रथमें तीस श्रेष्ठ घोड़े जुते रहते थे, इसीलिये वे त्रिशदश्चके नामसे विख्यात हुए। राजा त्रिशदश्चके पुत्र अनरण्य हुए, उन्होंने अट्टाईस हजार वर्षांतक शासन किया। महाराज

अनरण्यके पुत्र पृषदश्च हुए, वे छः हजार वर्षांतक राज्य करके अन्तमें पितृलोकको चले गये। अनन्तर हर्यश्च नामके राजा हुए, उन्होंने राजा पृषदश्चसे एक हजार वर्ष कम अर्थात् पाँच हजार वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र वसुमान् हुए, उन्होंने उनसे एक हजार वर्ष कम अर्थात् चार हजार वर्षांतक राज्य किया। तदनन्तर उनको त्रिधन्वा नामका पुत्र हुआ, उसने अपने पितासे एक हजार वर्ष कम अर्थात् तीन हजार वर्षांतक राज्य किया। तबतक भारतमें सत्ययुगका द्वितीय पाद समाप्त हो गया।

महाराज त्रिधन्वाके पुत्र त्रय्यारुणि हुए, वे अपने पितासे एक हजार वर्ष कम अर्थात् दो हजार वर्षांतक राज्य करके स्वर्ग चले गये। उनके पुत्र त्रिशंकु हुए और उन्होंने मात्र एक हजार वर्ष राज्य किया। छद्मके कारण राजा त्रिशंकु हीनताको प्राप्त हुए। उनके पुत्र हरिश्चन्द्र हुए, इन्होंने बीस हजार वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र रोहित हुए, उन्होंने पिताके समान ही राज्य किया। उनके पुत्रका नाम हारीत था। राजा हारीतने भी पिताके समान ही दीर्घकालतक राज्य किया। उनके पुत्र चंचुभूप हुए। पिताके तुल्य वर्षांतक उन्होंने राज्य किया। उनके पुत्र विजय हुए। इन्होंने भी पिताके तुल्य वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र रुक हुए, उन्होंने भी पिताके तुल्य वर्षांतक राज्य किया। ये सभी राजा विष्णुभक्त थे एवं इनकी सेना बहुत विशाल थी। उनके राज्यमें मणि-स्वर्णकी समृद्धि तथा प्रचुर धन-सम्पत्ति सभीको सुलभ थी। उस समय सत्ययुगका पूर्ण धर्म विद्यमान था।

सत्ययुगके तृतीय चरणके मध्यमें राजा रुक्कके पुत्र महाराज सगर हुए। वे शिवभक्त तथा सदाचार-

  • मनुस्मृति (१।८६)-में तप, ज्ञान, यज्ञ तथा दान—ये धर्मके चार पाद बताये गये हैं।

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  • प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड *

२८३

सम्पन्न थे। उनके (एक रानीसे उत्पन्न साठ हजार) पुत्र सागर नामसे प्रसिद्ध हुए। मुनियोंने तीस हजार वर्षांतक उनका राज्य-काल माना है। (कपिल मुनिके शापसे) सगर-पुत्र नष्ट हो गये। दूसरी रानीसे असमंजस नामका एक पुत्र हुआ। उनके पुत्र अंशुमान् हुए। उनके दिलीप और दिलीपके पुत्र भगीरथ हुए, जिनके द्वारा पृथ्वीपर लायी गयी गङ्गा भागीरथी नामसे प्रसिद्ध हुई। भगीरथके पुत्र श्रुतसेन हुए। महाराज सगरसे श्रुतसेनतक सभी राजा शैव थे। श्रुतसेनके पुत्र नाभाग तथा नाभागेके पुत्र राजा अम्बरीष अत्यन्त प्रसिद्ध विष्णुभक्त हुए, जिनकी रक्षामें सुदर्शनचक्र रात-दिन नियुक्त रहता था। तबतक भारतमें सत्ययुगका तीसरा चरण समाप्त हो चुका था।

सत्ययुगके चतुर्थ चरणमें महाराज अम्बरीषके पुत्र सिन्धुद्वीप हुए, उनके पुत्र अयुताश्व, अयुताश्वके पुत्र ऋतुर्पण, उनके पुत्र सर्वकाम तथा उनके पुत्र कल्माषपाद हुए। कल्माषपादके पुत्र सुदासको वसिष्ठजीके आशीर्वादसे मदयन्तीसे उत्पन्न अश्वमक (सौदास) नामका पुत्र प्राप्त हुआ। सौदासतकके ये सात राजा वैष्णव कहे गये हैं। गुरुके शापसे सौदासने अङ्गोंसहित अपना सम्पूर्ण राज्य गुरुको समर्पित कर दिया। गोकर्ण लिङ्ग-भक्त शैव कहा जाता है। राजा अश्वमकके पुत्र हरिवर्मा साधुओंके पूजक थे। उनके पुत्र दशरथ (प्रथम) हुए, उनके पुत्र दिलीप (प्रथम) हुए, उनके पुत्र विश्वासह हुए, उन्होंने दस हजार वर्षांतक राज्य किया। उनके अधर्म-आचरणके कारण उस समय सौ

वर्षांतक भयंकर अनावृष्टि हुई, जिससे उनका राज्य विनष्ट हो गया और रानीके आग्रह करनेपर महर्षि वसिष्ठने यज्ञकर यज्ञके द्वारा खट्वाङ्ग नामक पुत्र उत्पन्न किया। राजा खट्वाङ्गने शस्त्र धारण कर इन्द्रकी सहायतासे तीस हजार वर्षांतक राज्य किया। तदनन्तर देवताओंसे वर प्राप्त कर मुक्ति प्राप्त की। उनके पुत्र दीर्घबाहु हुए, उन्होंने बीस हजार वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र सुदर्शन हुए। महामनीषी सुदर्शनने राजा काशीराजकी पुत्रीसे विवाह कर देवीके प्रसादसे राजाओंको जीतकर धर्मपूर्वक सम्पूर्ण भरतखण्डपर पाँच हजार वर्षांतक राज्य किया।

एक दिन स्वप्नमें महाकालीने राजा सुदर्शनसे कहा—‘वत्स! तुम अपनी पत्नीके साथ तथा महर्षि वसिष्ठ आदिसे समन्वित होकर हिमालयपर जाकर निवास करो; क्योंकि शीघ्र ही भीषण झंझावातके प्रभावसे भरतखण्डका प्रायः क्षय हो जायगा। पूर्व, पश्चिम आदि दिशाओंके अनेक उपद्वीप झंझावातोंके कारण समुद्रके गर्तमें विलीन-से हो गये हैं। भारतवर्षमें भी आजके सातवें दिन भीषण झंझावात आयेगा।’ स्वप्नमें भगवतीद्वारा प्रलयका निर्देश पाकर महाराज सुदर्शन प्रधान राजाओं, वैश्यों तथा ब्राह्मणों और अपने परिकरोंके साथ हिमालयपर चले गये और भारतका बड़ा-सा भूभाग समुद्री-तूफान आदिके प्रभावसे नष्ट हो गया। सम्पूर्ण प्राणी विनष्ट हो गये और सारी पृथ्वी जलमग्न हो गयी। पुनः कुछ समयके अनन्तर भूमि स्थलरूपमें दिखलाई देने लगी। (अध्याय १)

*

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२८४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

त्रेतायुगके सूर्य एवं चन्द्र-राजवंशोंका वर्णन

सूतजी बोले—महामुने! वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिमें बृहस्पतिवारके दिन महाराज सुदर्शन अपने परिकरोंके साथ हिमालयपर्वतसे पुनः अयोध्या लौट आये। मायादेवीके प्रभावसे अयोध्यापुरी पुनः विविध अन्न-धनसे परिपूर्ण एवं समृद्धिसम्पन्न हो गयी। महाराज सुदर्शनने१ दस हजार वर्षोंतक राज्यकर नित्यलोकको प्राप्त किया। उनके पुत्र दिलीप (द्वितीय) हुए, उन्हें नन्दिनी गौके वरदानसे श्रेष्ठ रघु नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। राजा दिलीपने दस हजार वर्षोंतक भलीभाँति राज्य किया। दिलीपके बाद पिताके ही समान महाराज रघुने भी राज्य किया। भृगुनन्दन! त्रेतामें ये सूर्यवंशी क्षत्रिय रघुवंशी नामसे प्रसिद्ध हुए। ब्राह्मणके वरदानसे उनके अज नामक पुत्र हुआ, उन्होंने भी पिताके समान ही राज्य किया। उनके पुत्र महाराज दशरथ (द्वितीय) हुए, दशरथके पुत्ररूपमें (भगवान् विष्णुके अवतार) स्वयं राम उत्पन्न हुए। उन्होंने ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य किया। श्रीरामके पुत्र कुशने दस हजार वर्षोंतक राज्य किया। कुशके पुत्र अतिथि, अतिथिके निषध, निषधके पुत्र नल२ हुए, जो शक्तिके परम उपासक थे। नलके पुत्र नभ, नभके पुत्र पुण्डरीक, उनके पुत्र क्षेमधन्वा, क्षेमधन्वाके देवानीक और देवानीकके पुत्र अहीनग तथा अहीनगके पुत्र कुरु हुए। इन्होंने त्रेतामें सौ योजना विस्तारका कुरुक्षेत्र बनाया। कुरुके पुत्र पारियात्र, उनके बलस्थल, बलस्थलके पुत्र उकथ, उनके वज्रनाभि, वज्रनाभिके पुत्र शङ्खनाभि और उनके व्युत्थनाभि हुए। व्युत्थनाभिके पुत्र विश्वपाल, उनके स्वर्णनाभि और स्वर्णनाभिके पुत्र पुष्पसेन

हुए। पुष्पसेनके पुत्र ध्रुवसन्धि तथा ध्रुवसन्धिके पुत्र अपवर्मा हुए। अपवर्माके पुत्र शीघ्रगन्ता, शीघ्रगन्ताके पुत्र मरुपाल और उनके पुत्र प्रसुश्रुत हुए। प्रसुश्रुतके पुत्र सुसंधि हुए। उन्होंने पृथ्वीके एक छोरसे दूसरे छोरतक राज्य किया। उनके पुत्र अमर्षण हुए। उन्होंने पिताके समान राज्य किया। उनके पुत्र महाक्ष, महाक्षके पुत्र बृहद्दल और इनके पुत्र बृहद्दशन हुए। बृहद्दशानके पुत्र मुरुक्षेप, उनके वत्सपाल और उनके पुत्र वत्सव्यूह हुए। वत्सव्यूहके पुत्र राजा प्रतिव्योम हुए। उनके पुत्र देवकर और उनके पुत्र सहदेव हुए। सहदेवके पुत्र बृहदक्ष, उनके भानुरत्न तथा भानुरत्नके सुप्रतीक हुए। उनके मरुदेव३ और मरुदेवके पुत्र सुनक्षत्र हुए। सुनक्षत्रके पुत्र केशीनर, उनके पुत्र अन्तरिक्ष और अन्तरिक्षके पुत्र सुवर्णाङ्ग हुए। सुवर्णाङ्गके पुत्र अमित्रजित्, उनके पुत्र बृहद्राज और बृहद्राजके पुत्र धर्मराज हुए। धर्मराजके पुत्र कृतञ्जय और उनके पुत्र रणञ्जय हुए। रणञ्जयके पुत्र सञ्जय, उनके पुत्र शाक्यवर्धन और शाक्यवर्धनके पुत्र क्रोधदान हुए। क्रोधदानके पुत्र अतुलविक्रम, उनके पुत्र प्रसेनजित् और प्रसेनजित्के पुत्र शूद्रक हुए। शूद्रकके पुत्र सुरथ हुए। ये सभी महाराज रघुके वंशज तथा देवीकी आराधनामें रत रहते थे। यज्ञ-यागादिमें तत्पर रहकर अन्तमें इन सभी राजाओंने स्वर्गलोक प्राप्त किया। जो बुद्धके वंशज हुए, वे सब पूर्ण शुद्ध क्षत्रिय नहीं थे।

त्रेतायुगके तृतीय चरणके प्रारम्भसे नवीनता आ गयी। देवराज इन्द्रने रोहिणी-पति चन्द्रमाको पृथ्वीपर भेजा। चन्द्रमाने तीर्थराज प्रयागको अपनी राजधानी

१-राजा सुदर्शनकी विस्तृत कथा देवीभागवतके तृतीय स्कन्धमें प्राप्त होती है।

२-ये नल दमयन्तीके पति अत्यन्त प्रसिद्ध महाराज नलसे भिन्न हैं।

३-अन्य सभी पुराणोंमें सूर्यवंशका यहाँतक वर्णन है। पुराणोंके अनुसार मरु देवापिके साथ कलाप ग्राममें निवासकर साधना कर रहे हैं, किंतु इस पुराणके अनुसार सूर्यवंशका वर्णन सुदूर आगेतक हुआ है, जो प्रायः कलियुगतक पहुँच जाता है।

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  • प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड * २८५ बनाया। वे भगवान् विष्णु तथा भगवान् शिवकी | कमलांशु हुए। उनके पुत्र पारावत हुए, उन्हें ज्यामघ आराधनामें तत्पर रहे। भगवती महामायाकी प्रसन्नताके | नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। ज्यामघके पुत्र विदर्भ लिये उन्होंने सौ यज्ञ किये और अट्ठारह हजार | हुए। उनको क्रथ नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। उनके वर्षोंतक राज्यकर वे पुनः स्वर्गलोक चले गये। | पुत्र कुन्तिभोज हुए। कुन्तिभोजने पातालमें निवास चन्द्रमाके पुत्र बुध हुए। बुधका विवाह इलाके साथ | करनेवाली पुरु दैत्यकी पुत्रीसे विवाह किया, जिससे विधिपूर्वक हुआ, जिससे पुरूरवाकी उत्पत्ति हुई। | वृषपर्वण नामका पुत्र हुआ। उनके पुत्र मायाविद्य राजा पुरूरवाने चौदह हजार वर्षोंतक पृथ्वीपर शासन | हुए, जो देवीके भक्त थे। उन्होंने प्रयागके प्रतिष्ठानपुर किया। उनको भगवान् विष्णुकी आराधनामें तत्पर | (झूँसी)-में दस हजार वर्षोंतक राज्य किया फिर रहनेवाला आयु नामका एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न | वे स्वर्ग सिधार गये। मायाविद्यके पुत्र जनमेजय हुआ। महाराज आयु छत्तीस हजार वर्षोंतक राज्यकर | (प्रथम) हुए और उनका पुत्र प्रचिन्वान् हुआ। गन्धर्वलोकको प्राप्त करके पुनः स्वर्गमें देवताके | प्रचिन्वान्के पुत्र प्रवीर हुए। उनके पुत्र नभस्य हुए, समान आनन्द भोग रहे हैं। आयुके पुत्र हुए नहुष, | नभस्यके पुत्र भवद और उनके सुद्युम्न नामका पुत्र जिन्होंने अपने पिताके समान ही धर्मपूर्वक पृथ्वीपर | हुआ। सुद्युम्नके पुत्र, बाहुगर, उनके पुत्र संयाति राज्य किया। तदनन्तर उन्होंने इन्द्रत्वको प्राप्तकर | और संयातिके पुत्र धनयाति हुए। धनयातिके पुत्र तीनों लोकोंको अपने अधीन कर लिया। फिर | ऐन्द्राश्व, उनके पुत्र रन्तीनर और रन्तीनरके पुत्र बादमें महर्षि दुर्वासाके शापसे¹ राजा नहुष अजगर | सुतपा हुए। सुतपाके पुत्र संवरण हुए, जिन्होंने हो गये। इनके पुत्र ययाति हुए। ययातिके पाँच पुत्र | हिमालय पर्वतपर तपस्या करनेकी इच्छा की और हुए, जिनमेंसे तीन पुत्र म्लेच्छ देशोंके शासक हो | सौ वर्षोंतक तपस्या करनेपर भगवान् सूर्यने अपनी गये²। शेष दो पुत्रोंने आर्यत्वको प्राप्त किया। उनमें | तपती नामकी कन्यासे इनका विवाह कर दिया। यदु ज्येष्ठ थे और पुरु कनिष्ठ। उन्होंने तपोबल तथा | संतुष्ट होकर राजा संवरण सूर्यलोक चले गये। भगवान् विष्णुके प्रसादसे एक लाख वर्षोंतक राज्य | तदनन्तर कालके प्रभावसे त्रेतायुगका अन्त समय किया, अनन्तर वे वैकुण्ठ चले गये। | उपस्थित हो गया, जिससे चारों समुद्र उमड़ आये यदुके पुत्र क्रोष्टुने साठ हजार वर्षोंतक राज्य | और प्रलयका दृश्य उपस्थित हो गया। दो वर्षोंतक किया। क्रोष्टुके पुत्र वृजिनघ्न हुए, उन्होंने बीस | पृथ्वी पर्वतोंसहित समुद्रमें विलीन रही। झंझावातोंके हजार वर्षोंतक पृथ्वीपर शासन किया। उनको | प्रभावसे समुद्र सूख गया, फिर महर्षि अगस्त्यके स्वाहार्चन नामका एक पुत्र हुआ। उनके पुत्र चित्ररथ | तेजसे भूमि स्थलीभूत होकर दीखने लगी और हुए और उनके अरविन्द हुए। अरविन्दको | पाँच वर्षके अंदर पृथ्वी वृक्ष, दूर्वा आदिसे सम्पन्न विष्णुभक्तिपरायण श्रवस् नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। | हो गयी। भगवान् सूर्यदेवकी आज्ञासे महाराज संवरण उनके तामस हुए, तामसके उशन नामका पुत्र हुआ। | महारानी तपती, महर्षि वसिष्ठ और तीनों वर्णोंके उनके पुत्र शीतांशुक हुए तथा शीतांशुकके पुत्र | लोगोंके साथ पुनः पृथ्वीपर आ गये। (अध्याय २) ⁓⁓⁓⁓⁓⁓⁓⁓⁓⁓⁓⁓⁓⁓⁓⁓ १-महाभारत आदिमें ये अगस्त्य ऋषिके शापसे अजगर हुए थे। २-इनका पूरा विवरण मत्स्यपुराणके प्रारम्भिक अध्यायोंमें प्राप्त होता है। In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

२८६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

द्वापरयुगके चन्द्रवंशीय राजाओंका वृत्तान्त

महर्षि शौनकने पूछा—लोमहर्षणजी! आप यह बताइये कि महाराज संवरण* किस समय पृथ्वीपर आये और उन्होंने कितने समयतक राज्य किया तथा द्वापरमें कौन-कौन राजा हुए, यह सब भी बतायें।

सूतजी बोले—महर्षे! महाराज संवरण भाद्रपदके कृष्ण पक्षकी त्रयोदशी तिथिको शुक्रवारके दिन मुनियोंके साथ प्रतिष्ठानपुर (झूँसी)-में आये। विश्वकर्माने वहाँ एक ऐसे विशाल प्रासादका निर्माण किया, जो ऊँचाईमें आधा कोस या डेढ़ किलोमीटरके लगभग था। महाराज संवरणने पाँच योजना या बीस कोसके क्षेत्रमें प्रतिष्ठानपुरको अत्यन्त सुन्दरता एवं स्वच्छतापूर्वक बसाया। एक ही समयमें (चन्द्रमाके पुत्र) बुधके वंशमें उत्पन्न प्रसेन और यदुवंशीय राजा सात्वत शूरसेन मथुरा (मथुरा)-के शासक हुए। म्लेच्छवंशीय शमश्रुपाल (दाढ़ी रखनेवाला) मरुदेश (अरब, ईरान और ईराक)-के शासक हुए। क्रमशः प्रजाओंके साथ राजाओंकी संख्या बढ़ती गयी। राजा संवरणने दस हजार वर्षोंतक राज्य किया। इसके बाद उनके पुत्र अर्चाज्ञ हुए, उन्होंने भी दस हजार वर्षोंतक शासन किया। उनके पुत्र सूर्यजापीने पिताके शासनकालके आधे समयतक राज्य किया। उनके पुत्र सौरयज्ञपरायण सूर्ययज्ञ हुए। उनके पुत्र आदित्यवर्धन, आदित्यवर्धनके पुत्र द्वादशात्मा और उनके पुत्र दिवाकर हुए। इन्होंने भी प्रायः अपने पितासे कुछ कम ही दिनोंतक राज्य किया। दिवाकरके पुत्र प्रभाकर और प्रभाकरके पुत्र भास्वदात्मा हुए। भास्वदात्माके पुत्र विवस्वज्ज, उनके पुत्र हरिदक्षार्चन और उनके पुत्र वैकर्तन हुए। वैकर्तनके पुत्र अर्कष्टिमान्, उनके पुत्र मार्तण्डवत्सल और मार्तण्डवत्सलके पुत्र मिहिर्श

तथा उनके अरुणपोषण हुए। अरुणपोषणके पुत्र घुमणि, घुमणिके पुत्र तरणि यज्ञ और उनके पुत्र मैत्रेष्टिवर्धन हुए। मैत्रेष्टिवर्धनके पुत्र चित्रभानूर्जक, उनके वैरोचन और वैरोचनके पुत्र हंसन्यायी हुए। उनके पुत्र वेदप्रवर्धन, वेदप्रवर्धनके पुत्र सावित्र और इनके पुत्र धनपाल हुए। धनपालके पुत्र म्लेच्छहन्ता, म्लेच्छहन्ताके आनन्दवर्धन, इनके धर्मपाल और धर्मपालके पुत्र ब्रह्मभक्त हुए। उनके पुत्र ब्रह्मोष्टिवर्धन, उनके पुत्र आत्मप्रपूजक हुए और उनके परमेश्वी नामक पुत्र हुए। परमेश्वीके पुत्र हैरण्यवर्धन, उनके धातुयाजी, उनके विधातृप्रपूजक और उनके पुत्र द्रुहिणक्रतु हुए। द्रुहिणक्रतुके पुत्र वैरंच्य, उनके पुत्र कमलासन और कमलासनके पुत्र शमवर्ती हुए। शमवर्तीके पुत्र श्राद्धदेव और उनके पितृवर्धन, उनके सोमदत्त और सोमदत्तके पुत्र सौमदत्ति हुए। सौमदत्तिके पुत्र सोमवर्धन, उनके अवतंस, अवतंसके पुत्र प्रतंस और प्रतंसके पुत्र परातंस हुए। परातंसके पुत्र अयतंस, उनके पुत्र समातंस, उनके पुत्र अनुतंस और अनुतंसके पुत्र अधितंस हुए। अधितंसके अधितंस, उनके पुत्र समुतंस, उनके तंस और तंसके पुत्र दुष्यन्त हुए।

महाराज दुष्यन्तकी पत्नी शकुन्तलासे भरत नामके पुत्र हुए, जो सदा सूर्यदेवकी पूजामें तत्पर रहते थे। महाराज भरतने महामाया भगवतीकी कृपासे सम्पूर्ण पृथ्वीपर छत्तीस हजार वर्षोंतक चक्रवर्ती सम्राट्के रूपमें राज्य किया और उनके पुत्र महाबल हुए। महाबलके पुत्र भरद्वाज हुए। भरद्वाजके पुत्र मन्युमान् हुए, जिन्होंने अद्वाह्र हजार वर्षोंतक पृथ्वीपर शासन किया। उनके पुत्र बृहत्क्षेत्र, उनके पुत्र सुहोत्र और सुहोत्रके पुत्र वीतिहोत्र हुए, इन्होंने दस हजार वर्षोंतक राज्य

  • इनकी विस्तृत कथा महाभारतके आदिपर्व (अ० १४)-में विस्तारसे, किंतु १७२ तक प्रायः आती रही है।

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  • प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड *

२८७

किया। वीतिहोत्रके पुत्र यज्ञहोत्र, यज्ञहोत्रके पुत्र शक्रहोत्र हुए। इन्द्रदेवने प्रसन्न होकर इन्हें स्वर्ग प्रदान किया। उस समय अयोध्यामें महाबली प्रतापेन्द्र नामक राजा हुए, उन्होंने दस हजार वर्षांतक भारतपर शासन किया। इनके पुत्र मण्डलीक हुए। मण्डलीकके पुत्र विजयेन्द्र, विजयेन्द्रके पुत्र धनुर्दीप्त हुए।

महाराज शक्रहोत्र इन्द्रकी आज्ञासे घृताचीके साथ पुनः भूतलपर आये और उन्होंने राजा धनुर्दीप्तको जीतकर पृथ्वीपर शासन किया। शक्रहोत्रके घृताचीसे हस्ती नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। हस्तीने ऐरावत हाथीके बच्चेपर आरूढ़ होकर पश्चिममें अपने नामसे हस्तिना नामक नगरीका निर्माण किया। यह दस योजना विस्तृत है तथा स्वर्गङ्गाके तटपर अवस्थित है। वहाँ उन्होंने दस हजार वर्षांतक निवासकर राज्य किया। महाराज हस्तीके पुत्र अजमीढ, अजमीढके पुत्र रक्षपाल, रक्षपालके पुत्र सुशाम्यर्ण और उनके पुत्र कुरु हुए। इन्द्रके वरदानसे वे सदेह स्वर्ग चले गये।

उस समय मथुरामें सात्वत-वंशमें वृष्णि नामके एक महाबली राजा हुए। उन्होंने भगवान् विष्णुके वरदानसे पाँच हजार वर्षांतक सम्पूर्ण राज्यको अपने अधीन रखा। राजा वृष्णिके पुत्र निरावृत्ति हुए, निरावृत्तिके पुत्र दशारी, दशारीके पुत्र व्यामुन और व्यामुनके पुत्र जीमूत और इनके पुत्र विकृति हुए। विकृतिके पुत्र भीमरथ, उनके पुत्र नवरथ और नवरथके दशरथ हुए। उनके पुत्र शकुनि, उनके कुशुम्भ और कुशुम्भके पुत्र देवरथ हुए। देवरथके पुत्र देवक्षेत्र, उनके पुत्र मधु और मधुके पुत्र नवरथ और उनके कुरुवत्स हुए। इन सभी लोगोंने अपने-अपने पिताके तुल्य वर्षांतक राज्य किया। कुरुवत्सके पुत्र अनुरथ, उनके पुरुहोत्र और पुरुहोत्रके पुत्र विचित्राङ्ग हुए, उनके सात्वतवान्

और उनके पुत्र भजमान हुए। उनके पुत्र विदूरथ, उनके सुरभक्त और सुरभक्तके सुमना हुए। इन सभीने अपने-अपने पिताके तुल्य वर्षांतक राज्य किया। सुमनाके पुत्र ततिक्षेत्र, उनके स्वायम्भुव, उनके हरिदीपक और हरिदीपकके देवमेधा हुए। इन सभीने अपने-अपने पिताके तुल्य वर्षांतक राज्य किया। देवमेधाके पुत्र सुरपाल हुए।

द्रापरके तृतीय चरणके समाप्त होनेपर देवराज इन्द्रकी आज्ञासे आयी सुकेशी नामकी अप्सराके स्वामी कुरु राजा हुए। इन्होंने कुरुक्षेत्रका निर्माण किया जो बीस योजना विस्तृत है। विद्वानोंने उसे पुण्यक्षेत्र बताया है। महाराज कुरुने बारह हजार वर्षांतक राज्य किया। इनके पुत्र जहु, जहुके सुरथ और सुरथके पुत्र विदूरथ हुए। विदूरथके पुत्र सार्वभौम, इनके जयसेन और उनके पुत्र अर्णव हुए। महाराज अर्णवका शासन-क्षेत्र चारों समुद्रतक था और इन्होंने अपने पिताके तुल्य वर्षांतक राज्य किया। अर्णवके पुत्र अयुतायु हुए, जिन्होंने दस हजार वर्षांतक राज्य किया। अयुतायुके पुत्र अक्रोधन, उनके ऋक्ष, उनके पुत्र भीमसेन और भीमसेनके पुत्र दिलीप हुए। इन सभी राजाओंने अपने-अपने पिताके तुल्य वर्षांतक राज्य किया। दिलीपके पुत्र प्रतीप हुए, इन्होंने पाँच हजार वर्षांतक शासन किया। प्रतीपके पुत्र शन्तनु हुए और उन्होंने एक हजार वर्षांतक राज्य किया, उन्हें विचित्रवीर्य नामका पुत्र उत्पन्न हुआ, जिन्होंने दो सौ वर्षांतक राज्य किया। उनके पुत्र पाण्डु हुए, उन्होंने पाँच सौ वर्षांतक राज्य किया, उनके पुत्र युधिष्ठिर हुए, उन्होंने पचास वर्षांतक राज्य किया। सुयोधन (दुर्योधन)-ने साठ वर्षांतक राज्य किया और कुरुक्षेत्रमें (युधिष्ठिरके भाई भीमसेन)-के द्वारा उसकी मृत्यु हुई।

प्राचीन कालमें दैत्योंका देवताओंद्वारा भारी संहार

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२८८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

हुआ था। वे ही सब दैत्य शन्तनुके राज्यमें पुनः भूलोकमें उत्पन्न हुए। दुर्घोधनकी विशाल सेनाके भारसे परिव्याप्त वसुन्धरा इन्द्रकी शरणमें गयी, तब भगवान् श्रीहरिका अवतार हुआ। सौरि वसुदेवके द्वारा देवकीके गर्भसे उन्होंने अवतार लिया। वे एक सौ पैंतीस वर्षोंतक१ पृथ्वीपर रहकर उसके बाद गोलोक चले गये। भगवान् श्रीकृष्णका अवतार द्वापरके चतुर्थ चरणके अन्तमें हुआ था।

इसके बाद हस्तिनापुरमें अभिमन्युके पुत्र परीक्षितने राज्य किया। परीक्षितके राज्य करनेके बाद उनके पुत्र जनमेजयने राज्य किया। तदनन्तर उनके पुत्र महाराज शतानीक पृथ्वीके शासक हुए। उनके पुत्र यज्ञदत्त (सहस्रानीक) हुए। उनके पुत्र निश्चक्र२ (निचकनु) हुए। उनके पुत्र उष्ट्र (उष्ण)- पाल हुए। उनके पुत्र चित्ररथ और

चित्ररथके पुत्र धृतिमान् और उनके पुत्र सुषेण हुए, सुषेणके पुत्र सुनीथ, उनके मखपाल, उनके चक्षु और चक्षुके पुत्र सुखवन्त (सुखावल) हुए। सुखवन्तके पुत्र पारिप्लव हुए। पारिप्लवके पुत्र सुनय, सुनयके पुत्र मेधावी, उनके नृपञ्जय और उनके पुत्र मदु हुए। मदुके पुत्र तिग्मज्योति, उनके बृहद्रथ और उनके पुत्र वसुदान हुए। इनके पुत्र शतानीक हुए, उनके पुत्र उदयन, उदयनके अहीनर, अहीनरके निरमित तथा निरमितके पुत्र क्षेमक हुए। महाराज क्षेमक राज्य छोड़कर कलापग्राम चले गये। उनकी मृत्यु म्लेच्छोंके द्वारा हुई। नारदजीके उपदेश एवं सत्प्रयाससे उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम प्रद्योत हुआ। राजा प्रद्योतने मलेच्छ-यज्ञ किया, जिसमें म्लेच्छोंका विनाश हुआ। (अध्याय ३)

*

म्लेच्छवंशीय राजाओंका वर्णन तथा म्लेच्छ-भाषा आदिका संक्षिप्त परिचय

शौनकने पूछा—त्रिकालज्ञ महामुने! उस प्रद्योतने कैसे म्लेच्छ-यज्ञ किया? मुझे यह सब बतलायें।

श्रीसूतजीने कहा—महामुने! किसी समय क्षेमकके पुत्र प्रद्योत हस्तिनापुरमें विराजमान थे। उस समय नारदजी वहाँ आये। उनको देखकर प्रसन्न हो राजा प्रद्योतने विधिवत् उनकी पूजा की। सुखपूर्वक बैठे हुए मुनिने राजा प्रद्योतसे कहा—‘म्लेच्छोंके द्वारा मारे गये तुम्हारे पिता यमलोकको चले गये हैं। म्लेच्छ-यज्ञके प्रभावसे उनकी नरकसे मुक्ति होगी और उन्हें स्वर्गीय गति प्राप्त होगी। अतः तुम म्लेच्छ-यज्ञ करो।’

यह सुनकर राजा प्रद्योतकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। तब उन्होंने वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलाकर कुरुक्षेत्रमें म्लेच्छ-यज्ञको तत्काल आरम्भ करा दिया। सोलह योजनमें चतुष्कोण यज्ञ-कुण्डका निर्माण कर देवताओंका आवाहन कर उस राजाने म्लेच्छोंका हनन किया। ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर अभिषेक कराया। इस यज्ञके प्रभावसे उनके पिता क्षेमक स्वर्गलोक चले गये। तभीसे राजा प्रद्योत सर्वत्र पृथ्वीपर म्लेच्छहन्ता (म्लेच्छोंको मारनेवाले) नामसे प्रसिद्ध हो गये। उनका पुत्र वेदवान् नामसे प्रसिद्ध हुआ।

१-विभिन्न पुराणोंमें भगवान् श्रीकृष्णकी स्थितिकालका उल्लेख कुछ अन्तरसे प्राप्त होता है, विशेषकर महाभारत, भागवत, हरिवंश, विष्णुपुराण तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण और गर्गसंहितामें भी उनका विस्तृत चरित्र प्राप्त होता है। अधिकांश स्थलोंपर उनका स्थितिकाल एक सौ पचीस वर्ष ही निर्दिष्ट है।

२-इनके शासनकालमें ही गङ्गा हस्तिनापुरके अधिकांश भागको बहा ले गयीं। अतः इन्होंने कौशाम्बीको राजधानी बनाया, जो प्रयागसे चार योजन पश्चिम थीं। (विष्णुपुराण अंश ४। अ० २१)

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