भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
५५० 'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस दिन 'चन्द्रमा'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३२७ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३२८ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३२६ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३३० (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३३१ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३३२ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३३३ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३३४ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३३५ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३३६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३३७ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३३८ 'मीन' लग्न में 'मंगल' का फलादेश १—'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का स्थायी फलादेश संख्या उदाहरण-कुण्डली १३३६ से १३५० के बीच देखना चाहिए। २—'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'मंगल'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३३६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३४० (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३४१ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३४२ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३४३ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३४४ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३४५ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३४६ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३४७ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३४८ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३४६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३५०.
५५१ 'मीन' लग्न में 'बुध' का फलादेश १—'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३५१ से १३६२ के बीच देखना चाहिए। २—'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'बुध'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३५१ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३५२ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३५३ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३५४ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३५५ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३५६ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३५७ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३५८ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३५६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३६० (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३६१ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३६२ 'मीन' लग्न में 'गुरु' का फलादेश १—'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३६३ से १३७४ के बीच देखना चाहिए। २—'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'गुरु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३६३ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३६४ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३६५ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३६६ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३६७
५५२ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३६८ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३६६ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३७० (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३७१ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३७२ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३७३ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३७४ 'मीन' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश १—'मीन' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३७५ से १३८६ के बीच देखना चाहिए। २—'मीन' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'शुक्र'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३७५ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३७६ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३७७ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३७८ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३७६ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३८० (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३८१ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३८२ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३८३ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३८४ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३८५ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३८६ 'मीन' लग्न में 'शनि' का फलादेश १. 'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३८७ से १३९८ के बीच देखना चाहिए। २. 'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि'
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का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए। जिस वर्ष में 'शनि'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३८७ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३८८ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३८९ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३९० (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३९१ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३९२ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३९३ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३९४ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३९५ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३९६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३९७ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३९८ 'मीन' लग्न में 'राहु का फलादेश १. 'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३६६ से १४१० के बीच देखना चाहिए। २. 'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'राहु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३६६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १४०० (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १४०१ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १४०२ (ङ) 'सिंह' राशिपर हो तो संख्या १४०३ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १४०४ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १४०५ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १४०६ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १४०७ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १४०८ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १४०६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १४१०
५५४ 'मीन' लग्न में 'केतु' का फलादेश १. 'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्म-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १४११ से १४१२ के बीच देखना चाहिए। २. 'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १४११ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १४१२ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १४१३ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १४१४ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १४१५ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १४१६ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १४१७ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १४१८ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १४१६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १४२० (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १४२१ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १४२२ 'मीन' लग्न में 'सूर्य' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : प्रथमभाव : सूर्य पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की शारीरिक शक्ति एवं प्रभाव में वृद्धि होती है, परन्तु रक्त-विकार तथा अन्य रोग होने की सम्भावना भी रहती है। शत्रु-पक्ष पर विजय पाने तथा अपना सम्मान बढ़ाने के लिए उसे विशेष दौड़धूप करनी पड़ती है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के बाद स्त्री का सुख मिलता है तथा दैनिक आमदनी के लिए भी अधिक परिश्रम करना पड़ता है।
५५५ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में 'मंगल' की राशि पर स्थित उच्च के 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के प्रभाव एवं धन में वृद्धि होती है तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है। सातवीं नीच तथा शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के पक्ष में कुछ कमी आती है तथा दैनिक जीवन में भी परेशानियां रहती हैं। १७६६ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की विशेष वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से कुछ वैमनस्य रहता रहता है। शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से शारीरिक श्रम द्वारा भाग्य की उन्नति तो होती है, परन्तु धर्म की उन्नति नहीं हो पाती। जीवन सामान्य ढंग से बीतता है। १७६७ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के सुख तथा प्रभाव में वृद्धि होती है, परन्तु माता, भूमि एवं भवन के सुख में कुछ कमी और परेशानियां भी रहती हैं। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सहयोग, यश प्रतिष्ठा एवं प्रभाव की वृद्धि होती है। १७६८
५५६ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से कुछ कष्ट होता है, परन्तु कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या- बुद्धि एवं वाणी की शक्ति में वृद्धि होती है। मस्तिष्क में चिन्ता एवं क्रोध का निवास भी रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से लाभ के मार्ग में कुछ कठिनाइयाँ आती हैं, परन्तु परि- श्रम द्वारा सफलता भी मिलती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में स्वराशि-स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक शत्रुओं पर विजय पाता है तथा झगड़े-झंझटों से लाभ उठाता है। उसे रोग आदि भी नहीं होते। वह बड़ा हिम्मती, धैर्यवान् तथा परिश्रमी होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च की परेशानी रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों से भी कुछ कष्ट होता है। खर्च की अधिकता से मन अशान्त रहता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक का स्त्री-पक्ष से कुछ वैमनस्य रहता है तथा दैनिक व्यवसाय में अधिक दौड़-धूप करने से ही सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से प्रभाव तथा सम्मान की वृद्धि होती है, परन्तु शारीरिक परेशानियां भी रहती हैं।
५५७ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित नीच के 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की आयु पर घोर संकट आते हैं तथा पुरातत्त्व-शक्ति की भी हानि होती है। शत्रु-पक्ष से भी कष्ट मिलता है। ननसाल-पक्ष दुर्बल रहता है। पेट के निम्न भाव में विकार भी होता है। सातवीं मित्र तथा उच्च-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कौटुम्बिक सुख की वृद्धि के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ता है। 'मीन' जन्म की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है तथा प्रभाव बढ़ता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों से कुछ विरोध रहता है तथा कुछ कठि- नाइयों के साथ पराक्रम, प्रभाव तथा पुरुषार्थ की वृद्धि होती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : नवमभाव : सूर्य दशवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक का अपने पिता से कुछ वैमनस्य रहता है राज्य के क्षेत्र में प्रभाव तथा सम्मान की वृद्धि होती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठि- नाइयां आती हैं। शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ माता, भूमि एवं भवन का सुख मिलता है।
५५८ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में स्वराशि-स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक कठिन परिश्रम द्वारा अपनी आमदनी की खूब बढ़ाता है। शत्रु-पक्ष पर भी विजय मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ विधा-बुद्धि एवं संतान के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। १३२५ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मीनलग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को खर्च चलाने में कुछ कठिनाइयाँ आती हैं तथा बाहरी सम्बन्धों से भी परेशानी रहती है। शत्रु-पक्ष भी कठिनाइयाँ उत्पन्न करता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से खर्च के बल पर शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति अहंकारी तथा क्रोधी भी होता है। १३२६ 'मीन' लग्न में 'चन्द्रमा' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य, सम्मान तथा यश की वृद्धि होती है। वह मधुरभाषी, सर्वप्रिय तथा प्रभावशाली होता है। उसे सन्तान तथा विद्या-बुद्धि का भी श्रेष्ठ लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से सुन्दर स्त्री मिलती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में बुद्धि- बल से अच्छा लाभ होता है। १३२७
५५६ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब की श्रेष्ठ शक्ति मिलती है। सन्तान-पक्ष से कुछ परेशानी होती है, फिर भी सन्तान तथा विद्या- बुद्धि का अच्छा लाभ होता है। सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती है तथा दैनिक जीवन आनन्दमय बना रहता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित उच्च के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक के परा- क्रम तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है तथा विद्या एवं सन्तान-पक्ष का भी पूर्ण सहयोग मिलता है। सातवीं नीच-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति में रुकावटें आती हैं। ऐसा व्यक्ति असहिष्णु होता है, अतः उसे यश भी कम मिलता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है। विद्या तथा संतान पक्ष में भी उन्नति होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से बुद्धि-बल से व्यवसाय में उन्नति होती है तथा राज्य- पक्ष से सम्मान तथा विद्या के सहयोग प्राप्त होता है। उसकी अनेक प्रकार से उन्नति होती है।
५६० 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : पंचमभाव : चन्द्र पाँचवें भाव में स्वराशि में स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का यथेष्ट लाभ होता है। वह वाक्पटु तथा मीठे स्वभाव का, गंभीर, दूर- दर्शी तथा स्थिर विचारों का व्यक्ति होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से बुद्धि-बल द्वारा उसकी आमदनी की वृद्धि होती है, यद्यपि उसे कुछ असन्तोष भी रहता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : षष्ठभाव : चन्द्र छठे भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष से अशान्ति रहती है, तथा बुद्धि-बल से उन पर प्रभाव स्थापित हो पाता है। सन्तान-पक्ष से कष्ट होता है तथा विद्याध्ययन में कठिनाइयाँ आती हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहने के कारण कष्ट होता है तथा बाहरी स्थानों से भी असन्तोषजनक लाभ होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : सप्तमभाव : चन्द्र सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को सुन्दर तथा बुद्धिमती स्त्री मिलती है। व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। सन्तान-पक्ष, घरेलू सुख तथा विद्या-बुद्धि की भी उन्नति होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, सम्मान एवं योग्यता की वृद्धि होती है।
५६१ 'मीन' लग्न की कुंडली में 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवें भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। विद्या एवं सन्तान-पक्ष में कमी रहती है। धन तथा मस्तिष्क अशान्त रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव के देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सामान्य जीवन बिताता है। १३३४ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : नवमभाव : चन्द्र नवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित नीच के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति तथा धर्म पालन में रुकावटें आती हैं। सन्तान तथा विद्या का पक्ष भी कमजोर रहता है। मन-मस्तिष्क में परेशानियां रहती हैं। सातवीं उच्च-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों का सुख मिलता है तथा पराक्रम में पर्याप्त वृद्धि होती है। १३३५ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : दशमभाव : चन्द्र दसवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में वांछित सफलताएँ प्राप्त होती हैं। वह विद्वान्, नियमों का पालक, बुद्धिमान् तथा संतति- वान भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति धनी तथा भाग्यशाली होता है। १३३६
५६२ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : एकादशभाव : चन्द्र ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक अपने बुद्धि-बल द्वारा आमदनी में पर्याप्त वृद्धि करता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव को देखने से सन्तान एवं विद्या-बुद्धि-पक्ष की उन्नति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील बना रहता है। वह स्वार्थी तथा अपनी ही उन्नति की कामना करने वाला होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों से लाभ भी मिलता है। सन्तान-पक्ष से कष्ट तथा विद्या के क्षेत्र में कमी का सामना करना पड़ता है। मन-मस्तिष्क में परेशानी भी रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से बुद्धि-बल से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है। 'मीन' लग्न में मंगल 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मीनलग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक की शारीरिक शक्ति एवं प्रभाव में वृद्धि होती है। धन, कुटुम्ब तथा भाग्य की भी समृद्धि होती है। चौथी मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का पर्याप्त सुख मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से व्यवसाय तथा घरेलू सुख की वृद्धि होती है तथा स्त्री का पक्ष उत्तम रहता है। आठवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है।
५६३ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मीनलग्न : द्वितीयभाव : मंगल दूसरे भाव में स्वराशि-स्थित मंगल के प्रभाव से जातक के धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है। चौथी नीच-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या एवं सन्तान के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि में नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की विशेष उन्नति होती है। ऐसे व्यक्ति का रहन-सहन ठाठ- बाट का होता है। १३४० 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मीनलग्न : तृतीयभाव : मंगल तीसरे भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की विशेष वृद्धि होती है तथा धन-कुटुम्ब का सुख भी मिलता
१६४ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मीन लग्न : पंचमभाव : मंगल पाँचवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित नीच के 'मंगल' के प्रभाव से जातक का सन्तान तथा विद्या का पक्ष दुर्बल रहता है। धन तथा कुटुम्ब के सुख तथा भाग्य एवं धर्म के पक्ष में भी कमी रहती है। चौथी सामान्य मित्रदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में कुछ वृद्धि होती है। सातवीं उच्चदृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी में वृद्धि होती है। बारहवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से असंतोषपूर्ण लाभ होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मीन लग्न : षष्ठभाव : मंगल छठे भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर बहुत प्रभाव रखता है। धन की कुछ कमी रहते हुए भी ठाठ से खर्च चलाता है। कुटुम्ब से थोड़ा सुख मिलता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में नवम भाव को देखने भाग्य की उन्नति तथा धर्म का पालन होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्ध भी असंतोषजनक रहते हैं। आठवीं मित्रदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक शक्ति, प्रभाव एवं सम्मान की वृद्धि होती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मीन लग्न : सप्तमभाव : मंगल सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को भाग्यशालिनी स्त्री मिलती है तथा व्यवसाय में भी लाभ होता है। वह धर्मात्मा तथा भाग्यवान् भी रहता है। चौथी मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। आमदनी खूब बढ़ती है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, यश, प्रतिष्ठा तथा स्वाभिमान की वृद्धि होती है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का पर्याप्त सुख मिलता है।
५६५ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मीन लग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है, किन्तु भाग्य, धर्म तथा यश में कमी आती है। चौथी शत्रु तथा उच्चदृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी अच्छी रहती है तथा अधिक मुनाफा उठाने की प्रवृत्ति बनती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीय भाव को देखने से परिश्रम द्वारा धन का संचय होता है तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है। आठवीं शत्रुदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख में कुछ कमी रहती है, परन्तु पराक्रम बढ़ता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश नीच लग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में स्वराशि-स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। वह भाग्यशाली, धनी तथा यशस्वी होता है। चौथी शत्रु- दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च की कठिनाई रहती है तथा बाहरी संबंधों से भी असन्तोष रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से कुछ कमी के साथ भाई-बहिनों का सुख मिलता है तथा
५६६ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मीन लग्न : एकादशभाव : मंगल \t ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक की आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती है। वह बड़ा भाग्यशाली तथा धर्मात्मा भी होता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख की वृद्धि होती है। सातवीं नीच तथा मित्रदृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या तथा सन्तान के पक्ष में कुछ कमी रहती है। आठवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है तथा झगड़ों से लाभ होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' में स्थित 'मंगल' का फलादेश मीन लग्न : द्वादशभाव : मंगल \t बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से लाभ होता है। धन तथा कुटुम्ब के सुख में भी कमी रहती है। भाग्य तथा धर्म की उन्नति में कठिनाइयां आती हैं। चौथी शत्रु- दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख में कुछ कमी रहती है, परन्तु पराक्रम में विशेष वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव बना रहता है। आठवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय से सुख एवं लाभ की प्राप्ति होती है। 'मीन' लग्न में 'बुध' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मीन लग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कुछ कमी रहती है। माता, भूमि तथा भवन का सुख भी थोड़ा ही मिलता है। सातवीं उच्च दृष्टि से स्वराशि में सप्तम भाव को देखने से स्त्री-पक्ष से सुख मिलता है तथा व्यवसाय में भी सफलता प्राप्त होती है।
५६७ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मीन लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का सुख प्राप्त होता है। माता तथा स्त्री के सुख में कुछ कमी रहती है, परन्तु भूमि एवं भवन का लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है। दैनिक जीवन भी उल्लासपूर्ण बना रहता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मीन लग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का अच्छा सुख मिलता है। माता, भूमि, भवन, स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सुष्ठु- सफलता की प्राप्ति होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। ऐसा व्यक्ति यश भी प्राप्त करता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मीन लग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में स्वराशि स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का विशेष सुख मिलता है। स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के पक्ष में भी सफलता मिलती है। घरेलू जीवन उल्लासपूर्ण रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा भाग्यशाली होता है।
५६८ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मीन लग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में विशेष उन्नति प्राप्त होती है। वह मीठी वाणी बोलने वाला तथा कार्य-कुशल होता है। माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी, विवेकी तथा यशस्वी होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मीन लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक · शत्रु-पक्ष में शान्ति से काम निकालता है। माता तथा स्त्री से कुछ विरोध रहता है। भूमि तथा भवन का सुख भी कम ही मिलता है। व्यवसाय-क्षेत्र में बुद्धि-बल से सफलता मिलती है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से लाभ होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मीन लग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में स्वराशि स्थित उच्च के 'बुध' के प्रभाव से जातक को सुन्दर स्त्री मिलती है, तथा दैनिक व्यवसाय में सफलता मिलती है घरेलू जीवन अच्छा रहता है। माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख भी मिलता है। सातवीं नीच तथा मित्रदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक स्वास्थ्य में कुछ कमी रहती है तथा गृहस्थी को चलाने में परिश्रम अधिक करना पड़ता है।
५६६ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मीन लग्न : अष्टमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्व शक्ति में वृद्धि होती है। दैनिक जीवन प्रभावपूर्ण रहता है। स्त्री के सुख में अधिक तथा माता के सुख में सामान्य कमी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का सुख प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति सामान्यतः सुखी जीवन बिताता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मीन लग्न : नवमभाव : बुध नवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। माता, भूमि, भवन, स्त्री तथा व्यवसाय का भी श्रेष्ठ सुख मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है। ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी, पराक्रमी तथा यशस्वी होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मीन लग्न : दशमभाव : बुध दसवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सहयोग, प्रतिष्ठा तथा लाभ की प्राप्ति होती है। स्त्री-पक्ष से भी सुख मिलता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि, भवन तथा घरेलू सुख की भी यथेष्ट प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति धनी, यशस्वी तथा सुखी होता है।