भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
५३० 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कुम्भलग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। संचित धन की हानि तथा कौटुम्बिक सुख में कमी का योग भी बनता है। पाँचवीं नीच तथा शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव हूँको देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से परेशानी रहती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को देखने से विशेष परिश्रम द्वारा धन की वृद्धि होती है तथा कुटुम्ब का सुख मिलता है। नवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता के सुख में कमी आती है तथा भूमि एवं भवन का भी सामान्य सुख ही मिलता है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कुम्भलग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के भाग्य की विशेष वृद्धि होती है तथा धर्म का पालन भी होता है। कुटुम्ब तथा धन का सुख भी पर्याप्त मिलता है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक प्रभाव की वृद्धि होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम की वृद्धि होती है। नवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या-बुद्धि एवं सन्तान का श्रेष्ठ लाभ होता है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कुम्भ लग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में यथेष्ट सफलताएँ मिलती हैं। वह ठाठ का जीवन बिताता है तथा भाग्यशाली माना जाता है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का यथेष्ट सुख मिलता है। नवीं उच्चदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर अत्यन्त प्रभाव रहता है तथा झगड़े के मामलों से लाभ होता है।
५३१ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कुम्भ लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में स्वराशि में स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में पर्याप्त वृद्धि होती है। कभी-कभी आकस्मिक लाभ भी होता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान तथा विद्या, बुद्धि के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। नवी मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री का पूर्ण सुख तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में पर्याप्त सफलता की उपलब्धि होती है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से परेशानी रहती है। संचित धन नष्ट हो जाता है। कुटुम्ब में भी अशान्ति रहती है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। सातवीं उच्चदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव बना रहता है तथा झगड़ों से लाभ होता है। नवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व शक्ति की वृद्धि होती है। 'कुम्भ' लग्न में 'शुक्र' 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भ लग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को शारीरिक सुख, सौन्दर्य तथा प्रभाव की प्राप्ति होती है। माता, भूमि, भवन का सुख मिलता है तथा भाग्य एवं धर्म का पक्ष भी प्रबल बना रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री-पक्ष से तो सुख मिलता है परन्तु व्यवसाय-पक्ष में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है।
५३२ 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वितीयभाव शुक्र दूसरे भाव में सामान्य मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के शुक्र के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का विशेष सुख मिलता है। माता, भूमि तथा भवन के सुख का भी अत्यधिक लाभ होता है। वह बड़ा धनी, यशस्वी तथा प्रतिष्ठित होता है। सातवीं मित्र तथा नीचदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व की शक्ति में कुछ कमी आती है तथा दैनिक जीवन में भी कुछ चिन्ताएं बनी रहती हैं। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भ लग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में सामान्य मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को भाई- बहिनों का सुख मिलता है तथा पराक्रम में विशेष वृद्धि होती है। माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में नवम भाव को देखने से भाग्य की अत्यधिक उन्नति होती है तथा धर्म का भी यथाविधि पालन होता है। ऐसा व्यक्ति पराक्रमी, धनी, सुखी तथा धर्मात्मा होता है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भ लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में स्वराशि स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन का सुख प्राप्त होता है। भाग्य तथा धर्म की उन्नति भी होती रहती है। सातवीं सामान्य मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। ऐसा व्यक्ति सुखी तथा भाग्यवान् होता है।
५३३ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भलग्न : पंचमभाव : शुक्र पाँचवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को विद्या-बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में सफलता मिलती है। उसे माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है तथा भाग्य की निरन्तर वृद्धि होती रहती है। सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से चतुराई के बल पर लाभ खूब होता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भलग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर सफलता पाता है तथा झगड़ों से लाभ उठाता है। माता के सुख में कमी आती है। मातृभूमि से दूर भी रहना पड़ सकता है। भूमि, भवन, भाग्य तथा धर्म का पक्ष भी दुर्बल रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी सम्बन्धों से उसे सफलता मिलती है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भलग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से कुछ असंतोष युक्त सुख मिलता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में अधिक परिश्रम करने पर सफलता मिलती है। माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट सुख मिलता है। धर्म तथा भाग्य की उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, सुख, सम्मान तथा प्रभाव की वृद्धि होती है।
५३४ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भलग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित नीच के शुक्र के प्रभाव से जातक के जीवन में अशान्ति रहती हैं। आयु तथा पुरातत्त्व के सुख में कमी आती हैं। भूमि, भवन तथा माता के सुख में भी बड़ी कमजोरी रहती हैं। सातवीं उच्च तथा सामान्य मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख की परिश्रम द्वारा उन्नति होती है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भलग्न : नवमभाव : शुक्र नवमें भाव में स्वराशि स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के भाग्य की अत्यधिक वृद्धि होती है तथा धर्म का पालन भी यथाविधि होता है। माता, भूमि तथा भवन का सुख भी पर्याप्त मिलता है। सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी श्रेष्ठ रहता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भलग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में सामान्य मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में पर्याप्त सफलताएँ मिलती हैं। यह धर्मात्मा, यशस्वी तथा प्रतिष्ठित भी होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट सुख प्राप्त होता है।
५३५ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भलग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में सामान्य मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की आम- दनी में यथेष्ट वृद्धि होती है। यह धनी, न्यायी, चतुर, धार्मिक तथा यशस्वी भी होता है एवं माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख भी मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान-पक्ष से भी सुख मिलता है तथा विद्या-बुद्धि की अच्छी उन्नति होती है। १२७६ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश कुम्भलग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी सम्बन्धों से लाभ भी मिलता है। धर्म का पालन भी करता है। अल्पायु में ही माता-पिता का वियोग हो जाता है। यश में भी कमी रहती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से अपनी चतुराई के बल से शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है तथा झगड़ों से लाभ होता है। १२७७ 'कुम्भ' लग्न में 'शनि' 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य एवं प्रभाव में वृद्धि होती है। यह यशस्वी तथा ऐश्वर्यशाली जीवन बिताने वाला होता है। तीसरी नीच-दृष्टि से तृतीय भाव से देखने से भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में कमी आती है। १२७८ सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री-पक्ष से असन्तोष रहता है तथा दैनिक व्यवसाय में परेशानी रहती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ बनी रहती हैं।
५३६ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को धन-संचय के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है, परन्तु धन तथा कुटुम्ब के सुख में कमी आती है। खर्च अधिक होता है तथा बाहरी स्थानों से प्रतिष्ठा मिलती है। शारी- रिक सौन्दर्य में कमी रहती है। तीसरी मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख मिलता है, पर घरेलू सुख में कुछ कमी रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी के मार्ग में कठि- नाइयाँ आती हैं। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में कमी आती है तथा भाई-बहिनों से कष्ट मिलता है। शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में भी कमी रहती है। तीसरी मित्र- दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या-बुद्धि एवं सन्तान के सुख में वृद्धि होती है। सातवीं उच्च-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वादश भाव को देखने से खर्च की परेशानी रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ मिलता रहता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन का अपूर्व सुख मिलता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से अपनी शारीरिक शक्ति एवं बाहरी सुरक्षा के कारण शत्रु-पक्ष से रक्षा प्राप्त होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के पक्ष में परेशानी रहती है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं प्रभाव की प्राप्ति होती है।
५३७ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति चिन्ता- युक्त रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ भी उठाता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों का अनुभव होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी के मार्ग में कठिनाइयाँ आती हैं। दसवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने धन तथा कुटुम्ब के बारे में चिन्तित रहना पड़ता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक परिश्रम द्वारा अपने प्रभाव की वृद्धि करता है तथा शत्रुओं पर विजय पाता है। शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी रहती है। तीसरी मित्र- दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व शक्ति की वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। दसवीं नीचदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कमी आती है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से परेशानी रहती है तथा व्यवसाय में कठिनाइयाँ आती हैं। खर्च अधिक रहता है। तीसरी उच्च तथा मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की विशेष उन्नति होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, यश, सम्मान तथा प्रभाव की वृद्धि होती है। दसवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख प्राप्त होता है।
५३८ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है, परन्तु पुरातत्त्व की कुछ हानि होतो है । शरीर तथा खर्च के विषय में कठिनाइयाँ आती हैं । बाहरी स्थानों से भी लाभ होता है । तीसरी शत्रु-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता से वैमनस्य रहता है तथा राज्य एवं व्यवसाय-क्षेत्र की उन्नति में बाधाएँ आती हैं । सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का सुख त्रुटि- पूर्ण रहता है । दसवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान-पक्ष से सुख मिलता है तथा विद्या-बुद्धि का कुछ कमी के साथ लाभ होता है । 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित उच्च के शनि के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की यथेष्ट उन्नति होती है । शरीर सुन्दर तथा स्वस्थ रहता है । बाहरी सम्बन्धों से लाभ मिलता है । तीसरी शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है । कभी- कभी आकस्मिक लाभ होता है । सातवीं नीच दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में कमी आती है । दसवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित करने के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है । 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्न : दशमभाव : शनि दसवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शनि के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है । तीसरी दृष्टि से स्वराशि में द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है । सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख मिलता है । दसवी शत्रु-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री-पक्ष से असन्तोष रहता है तथा दैनिक आमदनी में कठिनाइयाँ आती हैं ।
५३६ 'कुम्भ' लग्न की कुंडली में 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्नः एकादशभावः शनि ग्यारहवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती है। खर्च खूब रहता है तथा बाहरी स्थानों से लाभ भी मिलता है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव तथा यश की वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या-बुद्धि की पर्याप्त वृद्धि होती है तथा सन्तान-पक्ष का कुछ त्रुटिपूर्ण लाभ होता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। ऐसे व्यक्ति का जीवन से खर्च पूर्ण रहता है। 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश कुम्भलग्नः द्वादशभावः शनि बारहवें भाव में स्वराशि स्थित शनि के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से विशेष लाभ होता है। यात्राएं भी करनी पड़ती हैं। तीसरी शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख की वृद्धि के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष से कुछ परेशानी रहती है, परन्तु बाद में उस पर प्रभाव स्थापित होता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से धर्म का पालन होता है तथा भाग्य की वृद्धि होती रहती है। 'कुम्भ' लग्न में 'राहु' 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भलग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक के शरीर में कहीं चोट लगती है तथा स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य में कमी रहती है। वह गुप्त चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है, परन्तु मस्तिष्क की शक्ति से प्रभाव भी स्थापित करता है।
५४० 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भलग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक से धन तथा कुटुम्ब के सुख में कमी आती है। कभी-कभी घोर आर्थिक संकटों का शिकार भी बनना पड़ता है। बाद में वह अपनी गुप्त युक्तियों तथा परिश्रम के बल पर धन-संचय करता है तथा धनी एवं भाग्यवान समझा जाता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती होता है। 'कुंभ' लग्न की कुंडली में 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भलग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से विरोध रहता है। ऐसा व्यक्ति अपनी चतुराई तथा गुप्त युक्तियों के बल पर सफलता एवं सुख के साधन प्राप्त करता है और समाज में सम्मानपूर्ण स्थान बनाता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भलग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की माता-पक्ष से बहुत कष्ट होता है। घरेलू जीवन अशान्तिपूर्ण रहता है। भूमि तथा भवन के सुख में भी कमी आती है। परन्तु अनेक संघर्षों से जूझने के बाद यह पर्याप्त सफलता भी प्राप्त करता है।
५४१ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भलग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव के मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित उच्च से राहु के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से पहले कुछ कष्ट होता है, बाद में सुख मिलता है। विद्या तथा बुद्धि का विशेष लाभ होता है। यह अपनी भीतरी कमजोरी छिपाने में चतुर, प्रभावशाली, मधुर-भाषी तथा चतुर होता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भलग्न : षष्ठभाव : राहु छठे भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर भारी प्रभाव रखता है तथा झगड़े-झंझट आदि के मामलों में बुद्धि- बल से सफलता पाता है। भीतरी रूप से परेशान रहने पर भी वह धैर्य तथा साहस को नहीं छोड़ता और अन्त में सभी कठिनाइयों पर विजय पा लेता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भलग्न : सप्तमभाव : राहु सातवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से बहुत कष्ट होता है तथा दैनिक आमदनी के क्षेत्र में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, परन्तु अन्त में वह अपने धैर्य, हिम्मत तथा परिश्रम के बल पर सभी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर लेता है।
५४२ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भ लग्न : अष्टमभाव : राहु आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के जीवन पर अनेक संकट आते हैं तथा पुरातत्त्व की हानि भी होती है। पेट के निम्न भाग में विकार रहता है, फिर भी यह लम्बी आयु पाता है तथा स्वविवेक एवं बुद्धि के बल पर जीवन को प्रभावशाली ढंग से व्यतीत करता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भ लग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में बाधाएँ आती हैं तथा धर्म का पालन भी यथोचित नहीं होता, परन्तु अन्त में अपने बुद्धि-चातुर्य के बल पर यह सभी कठिनाइयों पर विजय पाकर उन्नति करता है तथा अपनी कमजोरियों को प्रकट नहीं होने देता। 'कुंभ' लग्न की कुंडली में 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भ लग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को पिता से कष्ट, राज्य से परेशानी तथा व्यवसाय में हानि का शिकार होना पड़ता है। परन्तु यह अपने परिश्रम तथा युक्ति-बल द्वारा कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए अन्त में सफलता भी पा लेता है।
५४३ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भ लग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित नीच के 'राहु' के प्रभाव से जातक की आमदनी के मार्ग में बड़ी कठिनाइयाँ आती हैं, परन्तु वह अपने युक्ति-बल से उन पर थोड़ी-बहुत विजय पा लेता है और अपनी कठिनाइयों को किसी पर प्रकट भी नहीं होने देता । 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को खर्च के बारे में बड़ी कठिनाइयां उठानी पड़ती हैं। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से उसे कुछ लाभ भी होता है। अपना खर्च चलाने के लिए उसे कठोर परिश्रम करना पड़ता है। 'कुम्भ' लग्न में 'केतु' 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के शरीर में कहीं चोट या घाव का निशान बनता है तथा शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती, धैर्यवान्, गुप्त-युक्ति-सम्पन्न तथा परिश्रमी होता है और इन्हीं गुणों के आधार पर सम्मान भी प्राप्त करता है।
५४४ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की धन तथा कुटुम्ब के सुख के विषय में कष्ट उठाना पड़ता है। कुटुम्ब में नित- नये उपद्रव होते रहते हैं। वह बड़े धैर्य, परिश्रम तथा न्याय-मार्ग से धन कमाने का प्रयत्न करता है और अन्त में कुछ सफलता भी पा लेता है। 'कुंभ लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों के सुख में कमी आती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती, धैर्यवान्, परिश्रमी, उद्योगी तथा गुप्त युक्तियों वाला होता है तथा इन्हीं गुणों के बल पर अन्त में जीवन को उन्नत भी बनाता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को माता के सुख में हानि या कमी रहती है। मातृभूमि से वियोग भी होता है। भूमि तथा भवन के सुख में भी कमी आती है। परन्तु बाद में वह अपनी गुप्त युक्तियों के बल पर इन कमियों को दूर करने में थोड़ी-बहुत सफलता पा लेता है।
५४५ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को सन्तान का सुख पाने के लिए कष्ट-साध्य प्रयत्नों तथा गुप्त युक्तियों का सहारा लेना पड़ता है, फिर भी अल्प सुख ही प्राप्त होता है। विद्याध्ययन के क्षेत्र में भी बड़ी कठिनाइयाँ आती हैं। मस्तिष्क में अशान्ति रहती है तथा शील एवं विवेक भी कम होता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को शत्रुओं द्वारा अशान्ति मिलती है, परन्तु वह उन पर अपना प्रभाव स्थापित करने तथा विजय पाने में भी सफल हो जाता है। ऐसा व्यक्ति मन में भयभीत रहने पर भी प्रकट रूप में बड़ा हिम्मती तथा बहादुर होता है। वह धैर्यवान्, कठोर परिश्रमी तथा गुप्त युक्तियों का जानकार होता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से विशेष कष्ट मिलता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में संकटों का सामना करना पड़ता है। उसकी जननेन्द्रिय में विकार भी होता है। अन्त में, वह अपने परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल पर सामान्य सफलताएं भी पा लेता है।
५४६ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि तो होती है, परन्तु कई बार उसे मृत्यु-तुल्य कष्टों का सामना भी करना पड़ता है। पुरातत्त्व का सामान्य लाभ होता है तथा कई बार हानियां भी उठानी पड़ती हैं। अन्त में वह अपनी गुप्त युक्तियों के बल पर कठिनाइयों को दूर करने में सफल भी हो जाता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में बाधाएं आती हैं, धर्म की भी विशेष उन्नति नहीं हो पाती। परन्तु वह अपनी गुप्त युक्तियों, धैर्य एवं परिश्रम के बल पर भाग्य की उन्नति करता है और लगातार असफलताओं मिलने पर भी कभी निराश नहीं होता। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को अपने पिता से बहुत कष्ट मिलता है, राज्य से परेशानी तथा व्यवसाय के क्षेत्र में हानि होती है, फिर भी वह अपने धैर्य, साहस तथा युक्ति-बल से असफलताओं पर विजय प्राप्त करके ही रहता है।
५४७ 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में सामान्य मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती है तथा कभी-कभी आकस्मिक रूप से भी धन लाभ होता है। कभी कठिनाइयां आने पर भी धैर्य नहीं छोड़ता। ऐसा व्यक्ति अपनी उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहता है तथा न्याय-मार्ग से अत्यधिक धन कमाता और सुखी रहता है। 'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कुम्भ लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है, जिसके कारण परेशानी का अनुभव होता है, परन्तु वह अपनी गुप्त युक्तियों से उन पर विजय पाता है तथा निराशाओं में डूब जाने पर भी कभी हिम्मत नहीं हारता। उसे बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी होता रहता है।
५४८ 'मीन' लग्न
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| १ | १२ | ११ |
| | 'मीन' लग्न | |
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| २ | ३ | ९ | १० |
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| ४ | ५ | ७ | ८ |
| | | ६ | |
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(चार्ट के नीचे दाईं ओर: २३१४)
['मीन' लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन]
'मीन' लग्न का फलादेश
'मीन' लग्न में जन्म लेने वाला जातक सामान्य कद का, बड़ी आँखों वाला तथा बड़े मस्तिष्क वाला होता है। उसकी ठोड़ी में गड्ढा होता है। ऐसा व्यक्ति मित्र प्रकृति वाला, सतोगुणी, प्रचण्ड, विनम्र, चतुर, चंचल, धूर्त, आलसी, रोगी, अल्पभोजी, श्रेष्ठ पण्डित, यशस्वी, सुरतिवान्, स्त्री-प्रिय, जल- क्रीड़ा करने में कुशल, बहु-सन्ततिवान् तथा श्रेष्ठ रत्नाभूषणों को धारण करने वाला होता है। 'मीन' लग्न वाले जातक की प्रारम्भिक अवस्था सामान्य ढंग से व्यतीत होती है, मध्यभावस्था में वह दुःखी रहता है तथा अन्तिम अवस्था में सुख भोगता है। 'मीन' लग्न वाले जातक का भाग्योदय २१-२२ वर्ष की आयु में होता है।
५४६ 'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्म-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डली संख्या १३१५ से १४२२ के बीच देखना चाहिए। गोचर-कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए। 'मीन' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश १—'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३१५ से १३२६ के बीच देखना चाहिए। २—'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'सूर्य'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १३१५ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १३१६ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३१७ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३१८ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३१६ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३२० (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३२१ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३२२ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३२३ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३२४ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३२५ (ट) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३२६ 'मीन' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश १—'मीन' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १३२७ से १३३८ के बीच देखना चाहिए। २—'मीन' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित