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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

५७० 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मीनलग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती है। माता, भूमि, भवन, स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या-बुद्धि एवं सन्तान-पक्ष को विशेष उन्नति होती है। ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान्, मधुर-भाषी, धनी, सुखी तथा यशस्वी होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मीनलग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। माता, भूमि, भवन, घरेलू सुख, स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में परे- शानियों का सामना करना पड़ता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु- पक्ष पर विजय प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति धैर्यवान् तथा हिम्मत वाला होता है। 'मीन' लग्न में 'गुरु' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मीनलग्न : प्रथमभाव : गुरु पहले भाव में स्वराशि स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। उसे पिता, राज्य तथा व्यवसाय के पक्ष में भी सफलताएँ मिलती हैं। वह बड़ा धनी तथा व्यवसायी होता है। पांचवीं उच्च दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या-बुद्धि तथा सन्तान का यथेष्ट लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री सुन्दर मिलती है तथा दैनिक व्यवसाय की वृद्धि होती है। नवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की विशेष उन्नति होती है।

५७१ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मीनलग्न : द्वितीयभाव : गुरु दूसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के धन तथा कौटुम्बिक सुख की पर्याप्त वृद्धि होती है, परन्तु शारीरिक स्वास्थ्य में कुछ कमी आती है। पांचवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से धन की शक्ति से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है तथा झगड़े के मामलों में धैर्य से काम लेकर सफलता पाता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में यथेष्ट सफलताएं मिलती हैं। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा यशस्वी होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मीनलग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की भाई-बहिनों का सुख कुछ मतभेद के साथ प्राप्त होता है तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। पिता से भी सामान्य मतभेद रहता है, परन्तु राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में उन्नति होती है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री-पक्ष से सुख मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय में सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। नवीं नीच-दृष्टि से शत्रु राशि में एकादश भाव को देखने से आमदनी के मार्ग में रुकावटें आती हैं। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मीनलग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है। शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, यश तथा घरेलू सुख की वृद्धि होती है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में दशमभाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएं मिलती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च के कारण परेशानी रहती है तथा बाहरी स्थानों से भी असन्तोषजनक सम्बन्ध रहते हैं।

५७२ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मीनलग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित उच्च के 'गुरु' के प्रभाव से जातक को सन्तान, विद्या-बुद्धि तथा वाणी का श्रेष्ठ लाभ होता है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय-पक्ष में भी सफलताएँ मिलती हैं। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। सातवीं नीच-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी के मार्ग में कठिनाइयाँ आती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, स्वाभिमान, प्रतिष्ठा तथा स्वास्थ्य की वृद्धि होती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मीनलग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर प्रभावशाली रहता है, परन्तु शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी आती है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में नवम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफल- ताएँ मिलती हैं। वह अपने शारीरिक परिश्रम के बल पर उन्नति करता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादश भाव से देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से असंतोष होता है। नवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख की वृद्धि होती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मीनलग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को सुन्दर स्त्री मिलती है तथा स्त्री एवं दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में सुख सफलता की प्राप्ति होती है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्रों की उन्नति होती है। पाँचवीं नीच- तथा शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी कम रहती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य, यश, प्रतिष्ठा तथा प्रभाव की वृद्धि होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि होती है तथा कुछ असन्तोष के साथ भाई-बहिनों का सुख मिलता है।

५७३ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मीनलग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्त्व- शक्ति में वृद्धि होती है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयाँ आती हैं। शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में भी कमी रहती है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन-कुटुम्ब की वृद्धि होती है। नवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख भी प्राप्त होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मीनलग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की विशेष उन्नति होती है। राज्य, पिता एवं व्यवसाय-पक्ष से भी लाभ होता है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, यश तथा स्वाभिमान की वृद्धि होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख मिलता है। नवीं उच्च तथा मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान-पक्ष से यथेष्ट सुख का लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति वाणी का धनी तथा कलात्मक रुचि वाला होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मीनलग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में स्वराशि-स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय-के क्षेत्र में यथेष्ट सफलताओं तथा लाभ की प्राप्ति होती है। पाँचवीं मित्र दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख की वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है। नवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर अत्यधिक प्रभाव रहता है तथा झगड़ों में विजय मिलती है। ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी पराक्रमी शूरवीर, हुकूमत करने वाला तथा यशस्वी होता है।

५७४ 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मीनलग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में बहुत कमी आती है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी हानि होती है। भाग्योन्नति में रुकावटें आती हैं। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम की अल्प वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों के सुख में कमी आती है। सातवीं उच्च-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान तथा विद्या-बुद्धि के सुख में उन्नति होती है। नवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री सुन्दर मिलती है तथा उससे सुख- सहयोग मिलता है। दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश मीनलग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से भी असन्तोष होता है। शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य, पिता, राज्य तथा व्यवसाय के सुख तथा लाभ में भी कमी रहती है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख प्राप्त होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु पक्ष में सफलता मिलती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम- भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है परन्तु दैनिक जीवन प्रभावपूर्ण बना रहता है। 'मीन' लग्न में 'शुक्र' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में सामान्य मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। आयु भी लम्बी होती है। भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व शक्ति का लाभ होता है। दैनिक जीवन आनन्दमय बना रहता है। सातवीं मित्र तथा नीच-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री के सुख में कमी आती है, गृहस्थ जीवन असन्तोषपूर्ण रहता है तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती हैं।

५७५ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में सामान्य मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक पुरुषार्थ द्वारा धन-वृद्धि का प्रयत्न करता है, परन्तु पूर्ण सफलता नहीं मिलती । कुटुम्ब के सुख में भी कुछ कमी रहती है । सातवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टम भाव को देखने से आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व-शक्ति का लाभ होता है । ऐसा व्यक्ति अपनी समझदारी से रईसी ढंग का जीवन बिताता है । 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में स्वराशि में स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों की शक्ति तो मिलती है, परन्तु उनसे कुछ परेशानी भी रहती है । पराक्रम की वृद्धि होती है । जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है । सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति में कुछ रुकावटें आती हैं, परन्तु वह अपने परिश्रम के बल पर पर्याप्त सुखी तथा समृद्ध जीवन बिताता है । 'मीन' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का सुख कुछ कमी के साथ प्राप्त होता है, परन्तु आयु एवं पुरातत्त्व की वृद्धि होती है । पराक्रम बढ़ता है तथा भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है । सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के द्वारा सुख, सह- योग सम्मान तथा प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है, परन्तु लाभ में कुछ कमी रहती है ।

५७६ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : पंचमभाव : शुक्र पांचवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को विद्या-बुद्धि तथा सन्तान- पक्ष का यथेष्ट सुख मिलता है। भाई-बहिनों की शक्ति भी मिलती है। आयु तथा पराक्रम की वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती रहती है। वह धन के बल पर अपना प्रत्येक कार्य पूरा करता रहता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष से कठिनाइयां मिलती हैं, परन्तु अपनी चतुराई द्वारा वह उन पर विजय पा लेता है। भाई-बहिनों से कष्ट होता है तथा पराक्रम, पुरातत्त्व एवं आयु में कमी आती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से शक्ति प्राप्त होती रहती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित नीच के 'शुक्र' के प्रभाव से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में परेशानियां आती हैं तथा भाई-बहिनों का सुख एवं पराक्रम भी कमजोर रहता है। आयु एवं पुरातत्त्व में भी कमी आती है। सातवीं उच्च-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य, शक्ति, स्वाभिमान तथा प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।

५७७ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। दैनिक जीवन प्रभावपूर्ण रहता है। भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी आती है। ऐसा व्यक्ति लापरवाह किस्म का होता है। सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन की वृद्धि होती है, परन्तु कुटुम्ब से परेशानी रहती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्नः नवमभाव : शुक्र नवें भाव में सामान्य मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित अष्टमेश 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की वृद्धि में रुकावटें आती हैं, परन्तु जीवन आनन्दमय बना रहता है। आयु तथा पुरातत्त्व का श्रेष्ठ लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है, परन्तु पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि होती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : दशमभावः शुक्र दसवें भाव में सामान्य मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित अष्टमेश 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को पिता के सुख में कुछ कमी रहती है तथा राज्य एवं व्यवसाय पक्ष में भी त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है। आयु एवं पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख कुछ कमी के साथ प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति अपनी चतुराई के बल पर उन्नति करता है।

५७८ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक कुछ कठिनाइयों के साथ अपनी आमदनी में अत्यधिक वृद्धि करता है। आयु, पुरातत्त्व शक्ति तथा पराक्रम की भी विशेष वृद्धि होती है। भाई-बहिनों के सुख में कुछ कमी रहती है। स्वार्थ-साधन में चतुर होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या-बुद्धि का तो लाभ होता है, परन्तु सन्तान पक्ष में प्रयत्नों से ही सफलता मिलती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश मीनलग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से उसे लाभ होता है। आयु तथा पुरातत्त्व की कुछ हानि होती है। भाई- बहिन के सुख तथा पराक्रम में भी कमी आती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से चतुराई के बल पर शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति झगड़ों से बचे रहने का प्रयत्न करता है। 'मीन' लग्न में 'शनि' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मीनलग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित व्ययेश शनि के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी आती है। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी होता है। तीसरी मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में न्यूनाधिकता बनी रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री-पक्ष से सुख-दुःख तथा व्यवसाय में हानि-लाभ की प्राप्ति होती रहती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से नवम भाव को देखने के कारण पिता से वैमनस्य रहता है, राज्य से परेशानी होती है तथा व्यवसाय में संघर्षों का सामना करना पड़ता है।

५७६ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मीनलग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित नीच के प्रभाव से जातक को धन-संचय में कठिनाई आती है तथा हानि भी होती है। कुटुम्ब का अल्प सुख मिलता है। बाहरी सम्बन्ध हानिकारक सिद्ध होते हैं। तीसरी मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन के सुख में न्यूनाधिकता बनी रहती है। सातवीं उच्च तथा मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की यथेष्ट शक्ति प्राप्त होती है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में एकादश भाव को देखने से आमदनी खूब रहती है, परन्तु धन का संचय नहीं हो पाता। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मीनलग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से भाई-बहिनों द्वारा सुख-दुःख दोनों ही प्राप्त होते हैं तथा पराक्रम की वृद्धि होती है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान- पक्ष से कठिनाई रहती है तथा विद्या-बुद्धि की कमी रहती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति में कुछ कमी रहती है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मीनलग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष से परे- शानी रहती है तथा झगड़े के मामलों में लाभ-हानि दोनों होते हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयाँ आती रहती हैं। दसवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी रहती है तथा बाहरी स्थानों से लाभ होता है।

५८० 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मीनलग्न : पंचमभाव : शनि | पाँचवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को सन्तानपक्ष से हानि- लाभ दोनों की प्राप्ति होती है तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयोंके बाद उन्नति होती है। बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। तीसरी मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री-पक्ष से सुख-दुःख तथा व्यवसाय-पक्ष से हानि-लाभ दोनों होते हैं। सातवीं दृष्टि से स्वराशि मे एकादश भाव को देखने से बाहरी सम्बन्धों से आमदनी में वृद्धि होती रहती है। दसवीं नीच-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन-संचय की शक्ति में वृद्धि होती है, परन्तु कुटुम्ब से क्लेश मिलता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मीनलग्न : षष्ठभाव : शनि | छठे भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर अधिक प्रभाव रखता है तथा झगड़े के मामलों में खर्च करके लाभ उठाता है। बीमारी में भी काफी खर्च होता है। तीसरी उच्च-दृष्टि से मित्र राशि में अष्टम भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। दसवीं मित्र दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कुछ कमी रहती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मीनलग्न : सप्तमभाव : शनि | सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय में सुख-दुःख तथा हानि-लाभ दोनों प्राप्त होते हैं। खर्च की परेशानी रहती है, परन्तु बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति में उतार-चढ़ाव आते हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शरीर में कुछ कमजोरी रहती है। दसवीं मित्र- दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता के सुख में हानि-लाभ दोनों के योग रहते हैं तथा भूमि-भवन के सुख में कमी आती है।

५८१ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मीनलग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्त्व में वृद्धि होती है तथा बाहरी स्थानों से विशेष लाभ होता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता से असन्तोष तथा राज्य एवं व्यवसाय-पक्ष से सामान्य लाभ होता है। सातवीं नीच-दृष्टि से शत्रु-राशि में द्वितीय भाव को देखने से धन का संचय नहीं हो पाता तथा कुटुम्ब से परेशानी रहती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में कमी रहती है और मस्तिष्क में चिन्ताओं का निवास रहता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मीनलग्न: नवमभाव: शनि नवेंभाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक के भाग्य उन्नति की कुछ कठिनाइयों के साथ बाहरी सम्बन्धों के कारण होती है। धर्म-पालन में भी कमी रहती है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में एकादश भाव की देखने से आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कमी आती है। दसवीं शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा झगड़े-टंटों से लाभ भी होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मीनलग्न : दशमभाव : शनि दसवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में हानि और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, परन्तु आमदनी अच्छी रहती है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में द्वादश भाव को देखने से खर्च खूब रहता है तथा बाहरी स्थानों 'के सम्बन्ध से लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से कुछ कमी के साथ माता, भूमि एवं भवन का सुख प्राप्त होता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री-पक्ष से कुछ परेशानी रहती है तथा व्यवसाय में हानि-लाभ दोनों रहते हैं।

५८२ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मीनलग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में स्वराशि में स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी रहती है तथा बाहरी स्थानों से पर्याप्त लाभ होता है। खर्च भी खूब रहता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी आती है तथा धन की प्राप्ति के लिए बहुत दौड़-धूप करनी पड़ती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से सन्तान तथा विद्या-पक्ष में कुछ कमी आती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति स्वार्थी तथा रूखी बोली बोलने वाला होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश मीनलग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में स्वराशि-स्थित शनि के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। तीसरी नीच-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब की ओर से चिन्ता रहती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखनेसे शत्रु-पक्ष पर कुछ कठिनाइयों के बाद ही सफलता मिलती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्योन्नति में कठिनाइयां आती हैं तथा यश एवं धर्म की थोड़ी ही उन्नति हो पाती है। 'मीन' लग्न में 'राहु' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीनलग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी आती है, परन्तु वह युक्ति-बल से अपने प्रभाव तथा सम्मान की वृद्धि करता है तथा सभी कठिनाइयों पर विजय भी पा लेता है। वह अपने परिश्रम से तरक्की प्राप्त करता है।

५८३ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीनलग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का सुख प्राप्त नहीं होता। वह गुप्त युक्तियों के बल पर अपनी उन्नति के लिए प्रयत्न- शील रहता है तथा थोड़ी-बहुत सफलता भी पा लेता है, परन्तु कभी-कभी आर्थिक कष्ट उसे बहुत परेशान भी करते हैं। १४०० 'मीन लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीनलग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी तथा कष्ट का अनुभव होता है। वह बुद्धि एवं पुरुषार्थ द्वारा सफलता-प्राप्ति के प्रयत्न करता है तथा बहादुर और हिम्मती होता है। १४०१ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीनलग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित उच्च के 'राहु' के प्रभाव से जातक को माता का विशेष सुख मिलता है तथा गुप्त युक्तियों एवं परिश्रम के बल पर भूमि तथा भवन का सुख भी प्राप्त हो जाता है। कभी-कभी आकस्मिक रूप में भी सुख के साधन मिलते रहते हैं। १४०२

५८४ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीन लग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को विद्याध्ययन में कठिनाइयाँ आती हैं तथा सन्तान-पक्ष से भी उसे कष्ट का अनुभव होता है। ऐसे व्यक्ति की वाणी में रूखापन होता है तथा मस्तिष्क में चिन्ताएँ घिरी रहती हैं। वह स्वार्थ-सिद्धि के लिए उचित-अनुचित एवं सत्यासत्य का विचार भी नहीं रखता। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीन लग्न : षष्ठभाव : राहु छठे भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर भारी प्रभाव रखता है तथा युक्ति-बल से शत्रुओं को परास्त करता है। फिर भी, शत्रु-पक्ष उसे बार-बार परेशान करता रहता है। ननसाल-पक्ष से भी कुछ हानि होती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती, बहादुर, चतुर, धैर्यवान् तथा सावधान होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीन लग्न : सप्तमभाव : राहु सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की स्त्री-पक्ष से कुछ कष्ट मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय में भी कुछ कठिनाइयों का अनुभव होता, परन्तु वह अपने युक्ति-बल एवं चातुर्य से उन पर विजय प्राप्त करता रहता है। गृहस्थ- जीवन में बार-बार आने वाले संकटों को भी दूर करता रहता है।

५८५ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीन लग्न : अष्टमभाव : राहु आठवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के जीवन पर अनेक बार कष्ट आते हैं, परन्तु आयु की वृद्धि में कमी नहीं आती। पुरातत्त्व के विषय में भी कठिनाई के योग उपस्थित होते हैं। परन्तु वह अपनी चतुराई से उन सबका निराकरण करके लाभ उठाता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीन लग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की उन्नति में बाधाएँ आती रहती हैं तथा यश की प्राप्ति भी नहीं होती। परन्तु वह कठिन परिश्रम, गुप्त युक्ति तथा हिम्मत के साथ भाग्योन्नति के लिए प्रयत्नशील बना रहता है। कभी-कभी उसे आकस्मिक लाभ भी होता है और कभी-कभी अत्यधिक कष्ट भी उठाने पड़ते हैं। लम्बे संघर्ष के बाद ही भाग्योन्नति ही पाती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीन लग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित मीन के 'राहु' के प्रभाव से जातक को पिता के पक्ष में महान् कष्ट, राज्य से परेशानी तथा व्यवसाय में बार- बार हानि का सामना करना पड़ता है। मान-प्रतिष्ठा में भी कमी रहती है। परन्तु वह अपने युक्ति-बल तथा परिश्रम से कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करता रहता है और कुछ सफलता भी पा लेता है।

५८६ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीन लग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में विशेष वृद्धि होती है। वह अधिक मुनाफा कमाता है। कई बार धनो- पार्जन के क्षेत्र में कठिनाइयां भी आती हैं, परन्तु वह हिम्मत नहीं हारता तथा परिश्रम एवं धैर्य के साथ उन पर सफलता प्राप्त करता है। कभी-कभी आकस्मिक लाभ के अवसर भी मिलते हैं। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीन लग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को अपना खर्च चलाने में बड़ी कठिनाइयां आती हैं, परन्तु वह अपनी हिम्मत, धैर्य, परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के द्वारा उन सब पर विजय पाने का प्रयत्न करता है। उसे बाहरी स्थानों के संबंधों से भी कठिनाइयों का अनुभव होता है। 'मीन' लग्न में 'केतु' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के शरीर में सांघातिक चोट लगती है तथा कभी मृत्यु-तुल्य कष्ट का सामना भी करना पड़ता है। शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में भी कमी रहती है किन्तु वह गुप्त युक्तियों तथा कठिन परि- श्रम के बल पर अपने व्यक्तित्व का विकास करता है।

५८८ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष में बड़े कष्ट तथा कर्म का सामना करना पड़ता है। मस्तिष्क में चिन्ताएँ घिरी रहती हैं। विद्याध्ययन में भी अनेक कठि- नाइयाँ आती हैं, परन्तु वह अपनी गुप्त युक्तियों, धैर्य तथा परिश्रम के बल पर सब कमियों को दूर करने के लिए प्रयत्नशील बना रहता है। १४५५ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर निरन्तर विजय प्राप्त करता है तथा झगड़ों के मामलों में सफलता पाता है। शत्रु-पक्ष से परेशानी होने पर भी वह अपने हौसले को बनाए रखता है तथा बहादुरी से काम लेकर उस पर अपना प्रभाव स्थापित करता है। १४५६ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ अशान्ति एवं कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। कभी-कभी स्त्री-पक्ष से घोर कष्ट मिलता है तो कभी सुख भी मिलता है। ऐसा व्यक्ति साहसपूर्वक अपनी उन्नति के लिए प्रयत्नशील बना रहता है। १४५७

५८६ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आयु पर अनेक बार मृत्यु-तुल्य संकट आते हैं, परन्तु जीवन की रक्षा भी होती रहती है। पुरातत्त्व की हानि के योग भी उप- स्थित होते हैं, परन्तु वह अपनी गुप्त युक्तियों, चातुर्य तथा परिश्रम के बल पर लाभ उठा लेता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी तथा धैर्यवान् होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म के पक्ष में कठिनाइयां आती रहती हैं, परन्तु वह साहस, धैर्य, चातुर्य, गुप्त युक्ति तथा परिश्रम के बल पर उन पर विजय पाता है तथा उन्नति करता है। ऐसा व्यक्ति घोर संकटों के अवसर पर भी विचलित नहीं होता। अन्ततः उसके भाग्य तथा धर्म की कुछ उन्नति होती है, परन्तु यश में कमी बनी रहती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के 'केतु' के प्रभाव से जातक को पिता से सुख, राज्य से सम्मान तथा व्यवसाय से लाभ की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति अपनी उन्नति के लिए कठोर परिश्रम करता है तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है।

५६० 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में अत्य- धिक वृद्धि होती है। कभी-कभी कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है, परन्तु वह साहस एवं धैर्य के साथ उन पर विजय पा लेता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा बहादुर, धैर्यवान्, हिम्मती तथा स्वार्थी होता है।

'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को खर्च के कारण कष्टों का अनुभव होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्धों से भी असन्तोष मिलता है। परन्तु वह अपनी गुप्त युक्तियों, धैर्य तथा परिश्रम के बल पर कठिनाइयों का साहस के साथ मुकाबला करता है तथा उन पर विजय पाकर उन्नति लाभ करता है।