भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
४० ५. गुरु—'कर्क' राशि के ५ अंश पर । ६. शुक्र—'मीन' राशि के २७ अंश पर । ७. शनि—'तुला' राशि के २० अंश पर । टिप्पणी—कुछ विद्वान् मिथुन राशि के १५ अंश पर तथा कुछ वृष राशि में 'राहु' को उच्च मानते हैं। इसी प्रकार, कुछ के मत में धनु राशि के १५ अंश पर तथा कुछ वृश्चिक राशि में 'केतु' को उच्च का मानते हैं। ग्रहों की नीच स्थिति जिस ग्रह को जिस राशि के जितने अंशों पर उच्च का माना जाता है, उससे सातवीं राशि पर उतने ही अंशों में वह नीच का माना जाता है। यथा— १. सूर्य—'तुला' राशि के १० अंश पर । २. चन्द्र—'वृश्चिक' राशि के ३ अंश पर । ३. मंगल—'कर्क' राशि के २८ अंश पर । ४. बुध—'मीन' राशि के १५ अंश पर । ५. गुरु—'मकर' राशि के ५ अंश पर । ६. शुक्र—'कन्या' राशि के २७ अंश पर । ७. शनि—'मेष' राशि के २० अंश पर । टिप्पणी—कुछ विद्वानों के मतानुसार 'राहु' धनु राशि के १५ अंश पर तथा कुछ के मतानुसार वृश्चिक राशि में नीच का माना जाता है। इसी प्रकार, कुछ के मत में मिथुन राशि के १५ अंश तक तथा कुछ वृष राशि में 'केतु' को नीच का मानते हैं। ग्रहों का बलाबल ग्रहों के बल चार प्रकार के कहे गये हैं— १. सर्वोच्चबली—उच्च का होने पर । २. उच्च बली—मूल त्रिकोण में होने पर । ३. बली—स्वक्षेत्री (अपने घर) का होने पर । ४. निर्बल—नीच का होने पर । टिप्पणी—जो ग्रह जिस राशि का स्वामी होता है, यदि वह उसी राशि में बैठा हो तो उसे 'स्वग्रही' अथवा 'स्वक्षेत्री' कहा जाता है। विभिन्न ग्रहों के उच्च क्षेत्रीय, मूल त्रिकोणस्थ, स्वक्षेत्री तथा नीच का होने के सम्बन्ध में और अधिक स्पष्टता को नीचे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए—
४१ १. सूर्य—'सिंह' राशि स्थित सूर्य स्वक्षेत्री होता है। सिंह राशि के १ से २० अंश तक उसका मूलत्रिकोण, तथा २१ से ३० अंश तक स्वक्षेत्र माना जाता है। मेष राशि के १० अंश तक उच्च का और तुला राशि के १० अंश तक नीच का होता है। २. चन्द्र—'कर्क' राशि स्थित चन्द्र स्वक्षेत्री होता है। वृष राशि के ३ अंश तक उच्च का, एवं वृष राशि के ४ से ३० अंश तक मूलत्रिकोण स्थित माना जाता है। वृश्चिक राशि के ३ अंश तक नीच का होता है। ३. मंगल—'मेष' अथवा 'वृश्चिक' राशि में स्थित मंगल स्वक्षेत्री होता है, परन्तु मेष राशि के १ से १० अंश तक मूलत्रिकोणगत तथा ११ से ३० अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है। मकर राशि के २८ अंश तक उच्च का तथा कर्क राशि के २८ अंश तक नीच का होता है। ४. बुध—'कन्या' अथवा 'मिथुन' राशि में स्थित बुध स्वक्षेत्री होता है, परन्तु कन्या राशि के १ से १५ अंश तक मूलत्रिकोणगत तथा १६ से ३० अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है। कन्या राशि के १५ अंश तक उच्च का तथा मीन राशि के १५ अंश तक नीच का होता है। इसी प्रकार कन्या राशि स्थित बुध १ से १५ अंश तक उच्च का, साथ ही १ से १५ अंश तक मूलत्रिकोणगत तथा १६ से ३० अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है। ५. गुरु—'धनु' अथवा 'मीन' राशि में स्थित स्वक्षेत्री होता है, परन्तु धनु राशि के १ से १३ अंश तक उसे मूलत्रिकोणगत तथा १४ से ३० अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है। कर्क राशि के ५ अंश तक उच्च का तथा मकर राशि के ५ अंश तक नीच का होता है। ६. शुक्र—'वृष' अथवा 'तुला' राशि स्थित शुक्र स्वक्षेत्री होता है, परन्तु तुला राशि के १ से १० अंश तक उसका मूलत्रिकोण तथा ११ से ३० अंश तक स्वक्षेत्र माना जाता है। मीन राशि के २७ अंश तक उच्च का तथा कन्या राशि के २७ अंश तक नीच का होता है। ७. शनि—'मकर' अथवा 'कुम्भ' राशि स्थित शनि स्वक्षेत्री होता है, परन्तु कुम्भ राशि के १ से २० अंश तक उसका मूलत्रिकोण तथा २१ के ३० अंश तक स्वक्षेत्र माना जाता है। तुला राशि के २० अंश तक उच्च का तथा मेष राशि के २० अंश तक नीच का होता है। ८. राहु—कन्या राशि में स्थित राहु स्वक्षेत्री होता है। मिथुन राशि के १५ अंश तक उच्च का तथा धनु राशि के १५ अंश तक नीच का माना जाता है। इसके विपरीत कुछ विद्वानों की राय में राहु वृष राशि में उच्च का तथा वृश्चिक राशि में नीच का होता है। कर्क राशि को राहु का मूल त्रिकोण माना जाता है। ९. केतु—मिथुन राशि में स्थित केतु स्वक्षेत्री होता है। धनु राशि के १५
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अंश तक उच्च का, मिथुन राशि के १५ अंश तक नीच का माना जाता है। इसके विपरीत कुछ विद्वानों की राय में केतु वृश्चिक राशि में उच्च का तथा वृष राशि में नीच का होता है। मकर राशि को केतु का मूलत्रिकोण माना जाता है।
ग्रहों के पद
नवग्रहों में सूर्य तथा चन्द्र को राजा, बुध को युवराज, मंगल को सेनापति, गुरु तथा शुक्र को मन्त्री एवं शनि को सेवक का पद दिया गया है। अस्तु, जिस जातक के ऊपर जिस ग्रह का जितना अधिक प्रभाव होता है, वह उसे अपने ही अनुरूप बनाने की चेष्टा करता है।
ग्रहों के ६ प्रकार के बल
ग्रहों के बल ६ प्रकार के कहे गये हैं, उन्हें निम्नानुसार समझ लेना चाहिए— (१) स्थान बल—उच्च, स्वग्रही, मित्रग्रही अथवा मूल त्रिकोणस्थ ग्रह को 'स्थान बली' माना जाता है। चन्द्र तथा शुक्र 'सम राशि' अर्थात् वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर एवं मीन राशि में स्थित होने पर तथा सूर्य, मंगल, गुरु, गुरु, शनि, राहु एवं केतु 'विषम राशि' अर्थात् मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु एवं कुम्भ में स्थित होने पर भी 'स्थान बली' कहे जाते हैं ।
स्थान-बल निरूपण चक्र
+-------------------------------------------------------------+
| सू. \ शु. · च. / शु. · च. |
| मं. · बु. \ २ / १२ |
| गु. · श. \ सू. · मं. · बु. · गु. · श. / सू. |
| रा. · के. \ रा. · के. / मं. · बु. |
| ३ \ १ / गु. · श. |
| \ / रा. · के. |
| \ / ११ |
|-------------------------------------------------------------|
| ४ \ / १० |
| शु. · च. \ / शु. · च. |
| \ ७ / |
| सू. · मं. \ सू. · मं. · बु./ सू. · मं. |
| बु. · गु. · श. \ गु. · श. · रा./ बु. · गु. · श.|
| रा. · के. \ के. / रा. · के. |
| ५ \ / ९ |
|-------------------------------------------------------------|
| / \ |
| / \ |
| ६ / ८ \ ३७ |
| शु. · च. / शु. · च. \ |
+-------------------------------------------------------------+
उक्त उदाहरण कुण्डली की भाँति ही अन्य कुण्डलियों में भी ग्रहों के स्थानबल के विषय में समझ लेना चाहिए।
४३ (२) दिग्बल—जन्मकुण्डली में प्रथम भाव की पूर्व, चतुर्थ की उत्तर, सप्तम की पश्चिम तथा दशमभाव को दक्षिण दिशा माना जाता है । गुरु तथा गुरु प्रथमभाव अर्थात् लग्न (पूर्व दिशा) में, चन्द्रमा तथा शुक्र चतुर्थभाव (उत्तर दिशा) में, शनि सप्तमभाव (पश्चिम दिशा) में तथा मंगल दशम- भाव (दक्षिण दिशा) में स्थित हों तो उन्हें 'दिग्बली' माना जाता है। निम्नांकित उदाहरण कुण्डली में दिशाओं तथा दिग्बली ग्रहों की स्थिति को प्रदर्शित किया गया है—
+-----------------------------------------------+
| २ \ पूर्व दिशा / १२ |
| \ गु॰-बु॰ / |
| ३ \ १ / ११ |
|--------------\------------------/-------------|
| उत्तर दिशा \ / दक्षिण दिशा |
| च॰ शु॰ \ ७ / मं॰ |
| ४ \ शनि॰ / १० |
| \ पश्चिम दिशा / |
|-------------------X------------X--------------|
| ५ / \ ९ |
| / \ |
| ६ / \ ८ |
+-----------------------------------------------+
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(३) कालबल—यदि जातक का जन्म रात्रि के समय हुआ हो तो उसकी जन्मकुण्डली के ग्रहों में से (१) चन्द्रमा, (२) मंगल और (३) शनि—ये तीनों ग्रह कालबली होते हैं और यदि जातक का जन्म दिन में हुआ हो तो (१) सूर्य, (२) बुध और (३) शुक्र—ये तीनों ग्रह कालबली होते हैं। मतान्तर में, 'बुध' को दिन-रात्रि दोनों ही समय में कालबली माना जाता है । (४) नैसर्गिक बल—शनि, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, चन्द्र तथा सूर्य—ये ग्रह उत्तरोत्तर एक दूसरे से अधिक बली होते हैं। अर्थात् शनि से मंगल अधिक बलवान होता है, मंगल से बुध, बुध से गुरु, गुरु से शुक्र, शुक्र से चन्द्र तथा चन्द्र से सूर्य अधिक बलवान होता है। इसी क्रम की विपरीत स्थिति में ग्रह एक दूसरे से उत्तरोत्तर कम बलवान होते हैं अर्थात् सूर्य से चन्द्रमा कम बलवान है तथा चन्द्र से शुक्र, शुक्र से गुरु, गुरु से बुध, बुध से मंगल तथा मंगल के शनि कम बली होता है।
४४ (५) चेष्टाबल—मकर से मिथुन तक (मकर, कुंभ, मीन, मेष, वृष और मिथुन) किसी भी राशि में स्थित सूर्य तथा चन्द्रमा चेष्टाबली होते हैं और मंगल, बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि—ये पाँचों ग्रह चन्द्रमा के साथ रहने पर चेष्टाबली होते हैं । निम्नांकित उदाहरण कुण्डली में ग्रहों के 'चेष्टाबल' को प्रदर्शित किया गया है इसी भाँति अन्य कुण्डलियों में भी समझ लें । ग्रहों का चेष्टाबल निरूपण चक्र [कुण्डली चक्र: १ भाव: चं. सू., चं. मं. बु. गु. शु. श.; २ भाव: चं. सू.; ३ भाव: चं. सू.; ४ भाव; ५ भाव; ६ भाव; ७ भाव; ८ भाव; ९ भाव; १० भाव: चं. सू.; ११ भाव: चं. सू.; १२ भाव: चं. सू.] (६) दृग्बल—जन्मकुण्डली में जिन क्रूर (दुष्ट या पाप) ग्रहों के ऊपर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ती है, वे उनकी शुभ दृष्टि को पाकर 'दृग्बली' हो जाते हैं । जैसे—किसी जातक की कुण्डली में शनि पंचम भाव में बैठा हो तथा बुध लग्न में बैठा हो तो क्रूर-ग्रह शनि के ऊपर शुभ ग्रह गुरु की पूर्ण दृष्टि पड़ने के कारण शनि दृग्बली हो जाएगा । किस ग्रह की दृष्टि किन-किन भावों पर पड़ती है इसका वर्णन आगे किया गया है । नीचे का उदाहरण कुण्डली में क्रूर-ग्रहों के ऊपर शुभ ग्रहों की दृष्टि को प्रदर्शित किया गया है। इसी के अनुसार अन्यत्र भी समझ लेना चाहिए ।
४५ ग्रहों का दृग्बल निरूपण चक्र [कुण्डली चक्र: १ गुरु, २ चन्द्र, ४ मंगल, ५ शनि, ८ सूर्य, १० शुक्र] आवश्यक ज्ञातव्य—पूर्वोक्त ६ प्रकार के बलों में से किसी भी प्रकार के बल को प्राप्त बलवान ग्रह जिस भाव में बैठा होता है जातक को उस भाव का विशेष फल अपने स्वभावानुसार देता है। किसी भाव स्थित किसी भी ग्रह के फलाफल की यथार्थ जानकारी के लिए उस भाव में स्थित राशि तथा ग्रह के स्वभाव एवं बल आदि का समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए। ग्रहों की दृष्टि ग्रहों की दृष्टियाँ चार प्रकार की मानी गई हैं— (१) एक पाद या एक चरण दृष्टि (चतुर्थांश दृष्टि)। (२) द्विपाद या दो चरण दृष्टि (अर्धांश दृष्टि)। (३) त्रिपाद या तीन चरण दृष्टि (तीन चौथाई दृष्टि)। (४) पूर्ण दृष्टि (सम्पूर्ण दृष्टि)। जन्मकुण्डली में जो ग्रह जिस भाव में बैठा होता है, उस भाव से तृतीय तथा दशम भाव को एकपाद दृष्टि से, पंचम तथा नवम भाव को द्विपाद दृष्टि से, चतुर्थ तथा अष्टम भाव को त्रिपाद दृष्टि से तथा सप्तम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है। यह नियम सभी ग्रहों पर समान रूप से लागू होता है। परन्तु इन दृष्टियों के अतिरिक्त मंगल जिस भाव में बैठा होता है, वहाँ से सप्तम भाव के अतिरिक्त चतुर्थ तथा अष्टम भाव को भी पूर्ण दृष्टि से देखता है। इसी प्रकार गुरु जिस भाव में बैठा हो, वहाँ से सप्तम भाव के अतिरिक्त पंचम तथा नवम भाव को भी पूर्ण दृष्टि से देखता है एवं शनि जिस भाव में बैठा हो, वहाँ के सप्तम भाव के अतिरिक्त
४६ तृतीय तथा दशम भाव को भी पूर्ण दृष्टि से देखता है। अपूर्ण दृष्टि को 'खण्ड दृष्टि' भी कहते हैं। राहु तथा केतु की दृष्टि अन्य ग्रहों के समान सीधी न पड़कर उल्टी पड़ती है। जैसे लग्न में बैठा हुआ मंगल तृतीय तथा दशम भाव को एक पाद दृष्टि से देखेगा तो लग्न में बैठे हुए राहु-केतु एकादश तथा चतुर्थ भाव को एक पाद दृष्टि से देखेंगे। आगे दी गई मेष राशि की उदाहरण कुण्डलियों में लग्न (प्रथम भाव) स्थित विभिन्न ग्रहों की विभिन्न भावों पर पड़ने वाली एक पाद, द्विपाद, त्रिपाद तथा पूर्ण दृष्टि को अलग-अलग प्रदर्शित किया गया है। इसी भाँति अन्यत्र भी समझ लेना चाहिए। 'सूर्य' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [कुण्डली चक्र: लग्न (१) सूर्य; ३ भाव - एकपाद; ४ भाव - त्रिपाद; ५ भाव - द्विपाद; ७ भाव - पूर्ण; ८ भाव - त्रिपाद; ९ भाव - द्विपाद; १० भाव - एकपाद] टिप्पणी—जिस भाव में भी 'सूर्य' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
४७ 'चन्द्रमा' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [कुण्डली चक्र: चन्द्रमा प्रथम भाव में स्थित है; तृतीय एवं दशम भाव पर एकपाद दृष्टि, चतुर्थ एवं अष्टम भाव पर त्रिपाद दृष्टि, पञ्चम एवं नवम भाव पर द्विपाद दृष्टि तथा सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि दर्शायी गई है।] टिप्पणी—जिस भाव में भी 'चन्द्रमा' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए। 'मंगल' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [कुण्डली चक्र: मंगल प्रथम भाव में स्थित है; तृतीय एवं दशम भाव पर एकपाद दृष्टि, पञ्चम एवं नवम भाव पर द्विपाद दृष्टि, अष्टम भाव पर त्रिपाद व पूर्ण दृष्टि, चतुर्थ भाव पर त्रिपाद व पूर्ण दृष्टि तथा सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि दर्शायी गई है।] टिप्पणी—जिस भाव में भी मंगल बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
४८ 'बुध' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[कुण्डली चित्र विवरण:]
- १ भाव (लग्न): बुध
- ३ भाव: एकपाद
- ४ भाव: त्रिपाद
- ५ भाव: द्विपाद
- ७ भाव: पूर्ण
- ८ भाव: त्रिपाद
- ९ भाव: द्विपाद
- १० भाव: एकपाद
**टिप्पणी—**जिस भाव में भी 'बुध' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
'गुरु' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[कुण्डली चित्र विवरण:]
- १ भाव (लग्न): गुरु
- ३ भाव: एकपाद
- ४ भाव: त्रिपाद
- ५ भाव: द्विपाद, पूर्ण
- ७ भाव: पूर्ण
- ८ भाव: त्रिपाद
- ९ भाव: द्विपाद, पूर्ण
- १० भाव: एकपाद
**टिप्पणी—**जिस भाव में भी 'गुरु' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर उसका खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
४६ 'शुक्र' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [कुण्डली १: लग्न (१) में शुक्र] ३ भाव: एकपाद दृष्टि ४ भाव: त्रिपाद दृष्टि ५ भाव: द्विपाद दृष्टि ७ भाव: पूर्ण दृष्टि ८ भाव: त्रिपाद दृष्टि ९ भाव: द्विपाद दृष्टि १० भाव: एकपाद दृष्टि २६ टिप्पणी—जिस भाव में भी 'शुक्र' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए। 'शनि' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [कुण्डली २: लग्न (१) में शनि] ३ भाव: एकपाद, पूर्ण दृष्टि ४ भाव: त्रिपाद दृष्टि ५ भाव: द्विपाद दृष्टि ७ भाव: पूर्ण दृष्टि ८ भाव: त्रिपाद दृष्टि ९ भाव: द्विपाद दृष्टि १० भाव: पूर्ण, एकपाद दृष्टि २६ टिप्पणी—जिस भाव में भी 'शनि' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
५० 'राहु' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [चक्र: राहु की दृष्टि — भाव १: राहु; भाव ४: एकपाद; भाव ५: द्विपाद; भाव ६: त्रिपाद; भाव ७: पूर्ण; भाव ९: द्विपाद; भाव १०: त्रिपाद; भाव ११: एकपाद] टिप्पणी—जिस भाव में भी 'राहु' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए। 'केतु' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [चक्र: केतु की दृष्टि — भाव १: केतु; भाव ४: एकपाद; भाव ५: द्विपाद; भाव ६: त्रिपाद; भाव ७: पूर्ण; भाव ९: द्विपाद; भाव १०: त्रिपाद; भाव ११: एकपाद] टिप्पणी—जिस भाव में भी 'केतु' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए। विशेष टिप्पणी—कुछ विद्वानों के मतानुसार राहु तथा केतु की खण्ड दृष्टियाँ एकपाद, द्विपाद तथा त्रिपाद होती ही नहीं हैं। प्राचीन भारतीय ज्योतिष में राहु- केतु की न तो ग्रहों के अन्तर्गत गणना की गई है और न इनके दृष्टि-सम्बन्ध का ही
५१ उच्चराशिस्थ ग्रहों का फलादेश उच्चराशिस्थ ग्रहों का संक्षिप्त विशिष्ट फलादेश निम्नानुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण कुण्डलियां मेष लग्न की हैं। अन्य लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। उच्चराशिस्थ 'सूर्य' उच्चराशिस्थ 'सूर्य' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'सूर्य' उच्च (मेष) राशि का हो, वह गौरवर्ण, भाग्यवान, धैर्यवान, धनी, सम्पन्न, यशस्वी, सुखी, विद्वान्, दण्डाधिकारी, सेनापति, शूरवीर तथा बलवान् होता है। उच्चराशिस्थ 'चन्द्र' उच्चराशिस्थ 'चन्द्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'चन्द्र' उच्च (वृष) राशि का हो, वह सुखी, यशस्वी, सम्मानित, स्त्री-वियोगी, अलंकार-प्रिय, विलासी, मिष्ठान्न भोजी, चपल स्वभाव, लोकप्रिय तथा उदार हृदय वाला होता है। उच्चराशिस्थ 'मंगल' उच्चराशिस्थ 'मंगल' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'मंगल' उच्च (मकर) राशि का हो, वह उग्र स्वभाव, अस्त्रविद्या में निष्णात, संग्रामजयी, साहसी, कर्तव्यनिष्ठ, शूर-वीर, बलिष्ठ, क्रोधी तथा राज्य द्वारा सम्मान प्राप्त करने वाला होता है।
५२ उच्चराशिस्य 'बुध' उच्चराशिस्थ 'बुध' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'बुध' उच्च (कन्या) राशि का हो, वह बड़ा विद्वान्, अत्यन्त बुद्धिमान, लेखक, सम्पादक, सुखी, राजा अथवा राजमान्य, शत्रु- नाशक तथा अपने वंश की वृद्धि करने वाला, निष्पाप, धैर्यवान, परन्तु आलसी स्वभाव का होता है। उच्चराशिस्थ 'बुध' उच्चराशिस्थ 'गुरु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'गुरु' उच्च (कर्क) राशि का हो, वह सुन्दर, विद्वान्, चतुर, सुशील, सद्गुणी, सुखी, राजप्रिय, मन्त्री, शासक, ऐश्वर्य- शाली, सत्कर्म करने वाला, अनेक सेवकों से युक्त तथा सदाचारी होता है। उच्चराशिस्थ 'शुक्र' उच्चराशिस्थ 'शुक्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र' उच्च (मीन) राशि का हो, वह सुखी, भाग्यवान, संगीतप्रिय, कामी, विलासी, कला-प्रेमी, यन्त्र-मंत्र का ज्ञाता, ज्योतिषी, कवि, संगीतज्ञ तथा यशस्वी होता है। उच्चराशिस्य 'शनि' उच्चराशिस्य 'शनि' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' उच्च (तुला) राशि का हो, वह सुखी, यशस्वी, ऐश्वर्यशाली, पृथ्वीपति, राजा, कृषक, सम्पन्न, मायावी, वाहनों से युक्त, साहसी, दुष्टमति करने वाला, लोक-प्रसिद्ध सम्मानित तथा धूर्त होता है।
५३ उच्चराशिस्थ 'राहु' उच्चराशिस्थ 'राहु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'राहु' उच्च (मिथुन, मतान्तर से वृष) राशि का हो, वह धनी, साहसी, लम्पट, सरदार, शूर-वीर, गुप्त- स्वभाव वाला, दुष्ट, क्रूर, राजा द्वारा सम्मान प्राप्त करने वाला, प्रतापी तथा धैर्यवान होता है। उच्चराशिस्थ 'केतु' उच्चराशिस्थ 'केतु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' उच्च (धनु, मतान्तर से वृश्चिक) राशि का हो वह भ्रमण-प्रिय, सरदार, नीच प्रकृति वाला, सुखी, अधिकार सम्पन्न व मिथ्यावादी, नीच तथा वृद्धों जैसा आचरण करने वाला होता है। टिप्पणी— किसी ग्रह का केवल उच्च होना ही पूर्ण फलदायक नहीं होता, उसके साथ ही अन्य विषयों पर भी विचार करके निष्कर्ष निकालना चाहिए। मूलत्रिकोणस्थ ग्रहों का फलादेश मूल त्रिकोणस्थ ग्रहों का संक्षिप्त विशिष्ट फलादेश निम्नानुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण कुण्डलियाँ मेष लग्न की हैं। अन्य लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। मूलत्रिकोणस्थ 'सूर्य' मूल त्रिकोणस्थ 'सूर्य' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'सूर्य' मूल त्रिकोणस्थ (सिंह राशि के २० अंश तक) हो, वह सम्मानित, पूज्य, यशस्वी, सुखी, धनी तथा सब कार्यों में कुशल होता है।
५४ मूल त्रिकोणस्थ 'चन्द्र' मूल त्रिकोणस्थ 'चन्द्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'चन्द्रमा' मूल त्रिकोणस्थ (वृष राशि के ४ से ३० अंश तक) हो, वह सुन्दर, भाग्यवान्, ऐश्वर्यशाली, धन- वान, भोगी तथा सुखी जीवन व्यतीत करने वाला होता है। मूल त्रिकोणस्थ 'मंगल' मूल त्रिकोणस्थ 'मंगल' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'मंगल' मूल त्रिकोणस्थ (मेष राशि के १८ अंश तक) हो, वह सामान्य धनी, अपयशी, स्वार्थी, क्रोधी, दुष्ट, निर्दय, लम्पट, खल, चरित्रहीन, क्रूर, धर्मी तथा साहसी होता है। मूलत्रिकोणस्थ 'बुध' मूल त्रिकोणस्थ 'बुध' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'बुध' मूल त्रिकोणस्थ (कन्या राशि के १६ से २० अंश तक) हो, वह विद्वान्, राजमान्य, धनवान्, प्राध्यापक चिकित्सक, सैनिक, व्यवसायी, महत्त्वाकांक्षी, विजयी, विनोदी तथा बुद्धिमान होता है। मूलत्रिकोणस्थ 'गुरु' मूल त्रिकोणस्थ 'गुरु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'गुरु' मूल त्रिकोणस्थ (धनु राशि के १३ अंश तक) हो, वह तपस्वी, सुखी, यशस्वी, सम्मानित, राजप्रिय, भोगी, उच्च अधिकारी, परम बुद्धिमान तथा नगर या मठ का स्वामी होता है।
५५ मूलत्रिकोणस्थ 'शुक्र' मूलत्रिकोणस्थ 'शुक्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र' मूल त्रिकोणस्थ (तुला राशि के १० अंश तक) हो, वह अनेक पुरस्कारों का विजेता, स्त्रियों को प्रिय, जागीरदार तथा वाहन, भूमि, भवन आदि के सुखों से सम्पन्न, राजा के समान ऐश्वर्यवान्, प्रतापी तथा यशस्वी होता है। मूलत्रिकोणस्थ 'शनि' मूलत्रिकोणस्थ 'शनि' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' मूल- त्रिकोणस्थ कुम्भ (राशि के २० अंश तक) हो, वह कर्त्तव्य- निष्ठ, वैज्ञानिक, अस्त्र-शस्त्रों का निर्माता एवं ज्ञाता, यान-चालक, शूर-वीर, साहसी, सेनापति, कुल का पालन करने वाला, सुखी तथा धन-धान्य से पूर्ण होता है। मूलत्रिकोणस्थ 'राहु' मूलत्रिकोणस्थ 'राहु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'राहु' मूल त्रिकोणस्थ (कर्क राशि में) हो, वह धनी, लोभी तथा वाचाल होता है। टिप्पणी—प्राचीन ज्योतिषी 'राहु' का मूलत्रिकोण नहीं मानते। मूलत्रिकोणस्थ 'केतु' मूलत्रिकोणस्थ 'केतु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' मूल- त्रिकोणस्थ (मकर राशि में) हो, वह सुखी, धनी, वाचाल, प्रवासी तथा गुप्त युक्तियों वाला होता है। टिप्पणी—प्राचीन ज्योतिषी 'केतु' का मूलत्रिकोण नहीं मानते।
५६ स्वक्षेत्रस्थ ग्रहों का फलादेश स्वक्षेत्री अर्थात् अपनी राशि में स्थित विभिन्न ग्रहों का संक्षिप्त फलादेश निम्नानुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण कुण्डलियां मेष लग्न की हैं। अन्य लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। स्वक्षेत्रस्थ 'सूर्य' स्वक्षेत्रस्थ 'सूर्य' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'सूर्य' स्वक्षेत्री (सिंह राशि का) हो, वह सुन्दर, सुखी, ऐश्वर्यवान्, पराक्रमी, व्यभिचारी, निरन्तर उद्योग तथा परिश्रम करने वाला, धैर्यवान, साहसी, तेजस्वी तथा अत्यन्त उग्रस्वभाव का होता है। स्वक्षेत्रस्थ 'चन्द्र' स्वक्षेत्रस्थ 'चन्द्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'चन्द्र' स्वक्षेत्री (कर्क राशि का) हो, वह सुन्दर, धनी, तेजस्वी, भाग्यवान्, विनम्र, साधु चरित्र, परोपकारी, दयालु, मनस्वी, यशस्वी तथा सहृदय होता है। स्वक्षेत्रस्थ 'मंगल' स्वक्षेत्रस्थ 'मंगल' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'मंगल' स्वक्षेत्री (मेष अथवा वृश्चिक राशि का) हो, वह साहसी, बलवान, यशस्वी, कृषक, भूस्वामी अथवा सैनिक, धनी तथा मध्यम स्वभाव वाला होता है।
५७ स्वक्षेत्रस्थ 'बुध' स्वक्षेत्रस्थ 'बुध' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'बुध' स्वक्षेत्री (कन्या अथवा मिथुन राशि का) हो, वह विद्वान्, बुद्धि- मान्, सम्पादक, शास्त्रज्ञ, लेखक तथा अनेक कलाओं का ज्ञाता होता है। स्वक्षेत्रस्थ 'गुरु' स्वक्षेत्रस्थ 'गुरु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'गुरु' स्वक्षेत्री (धनु अथवा मीन राशि का) हो, वह सुखी, शास्त्रज्ञ, वैद्य, काव्य-प्रेमी, कवि, विद्वान्, आत्मबली तथा धनवान होता है। स्वक्षेत्रस्थ 'शुक्र' स्वक्षेत्रस्थ 'शुक्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र' स्वक्षेत्री (वृष अथवा तुला राशि का) हो, वह विद्वान्, गुणी, विचारक, धनवान्, स्वतन्त्र प्रकृति का, कृषि-सम्बन्धी व्यवसाय करने वाला तथा सुन्दर होता है। स्वक्षेत्रस्थ 'शनि' स्वक्षेत्रस्थ 'शनि' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' स्वक्षेत्री (मकर अथवा कुम्भ राशि का) हो, वह पराक्रमी, कष्ट- सहिष्णु, उग्र स्वभाववाला, सुन्दर नेत्रोंवाला, यशस्वी तथा लोकप्रिय होता है।
५८ स्वक्षेत्रस्थ 'राहु' स्वक्षेत्रस्थ 'राहु' जिस जातक की जन्मकुण्डली से 'राहु' स्वक्षेत्री (कन्या राशि का) हो, वह सुन्दर, यशस्वी तथा भाग्य- वान् होता है । स्वक्षेत्रस्थ 'केतु' स्वक्षेत्रस्थ 'केतु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' स्वक्षेत्री (मिथुन राशि का) हो, वह धैर्यवान्, कष्ट-सहिष्णु, कर्मठ, चिन्ताशील तथा गुप्त-युक्तियों वाला होता है। मित्र क्षेत्रस्थ ग्रहों का फलादेश अपने मित्रग्रह की राशि में स्थित विभिन्न ग्रहों का संक्षिप्त फलादेश निम्ना- नुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण-कुण्डलियां मेष लग्न की हैं। अन्य लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए । मित्रक्षेत्रस्थ 'सूर्य' मित्रक्षेत्रस्थ 'सूर्य' जिस जातक की कुण्डली में 'सूर्य' अपने मित्रग्रहों (चन्द्रमा, मंगल अथवा गुरु) की राशि (कर्क, मेष, धनु, वृश्चिक अथवा मीन) में स्थित हो, वह व्यवहारकुशल, यशस्वी, दानी, सौभाग्यवान्, शास्त्रज्ञ, सुप्रसिद्ध तथा दृढ़मैत्री करने वाला होता है ।
५६ मित्रक्षेत्रस्थ 'चन्द्र' मित्रक्षेत्रस्थ 'चन्द्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'चन्द्रमा' अपने मित्रग्रहों (सूर्य अथवा बुध) की राशि (सिंह, कन्या अथवा मिथुन) में बैठा हो, वह सुखी, धनी, गुणी, चतुर तथा भाग्यवान होता है। मित्रक्षेत्रस्थ 'मंगल' मित्रक्षेत्रस्थ 'मंगल' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'मंगल' अपने मित्र ग्रहों (सूर्य, चन्द्र अथवा गुरु) की राशि (सिंह, कर्क, धनु अथवा मीन) में बैठा हो, वह धनी, मित्र-प्रेमी, तेजस्वी, पराक्रमी, शक्तिशाली, शस्त्र द्वारा जीविकोपार्जन करने वाला तथा उग्र स्वभाव वाला होता है। मित्रक्षेत्रस्थ 'बुध' मित्रक्षेत्रस्थ 'बुध' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'बुध' अपने मित्रग्रहों (सूर्य अथवा शुक्र) की राशि (सिंह, वृष अथवा तुला) में बैठा हो, वह शास्त्रज्ञ, विनोदी-स्वभाव का, कार्यदक्ष, सुन्दरस्वरूप वाला, यशस्वी, ज्ञानी तथा धनवान् होता है। मित्रक्षेत्रस्थ 'गुरु' मित्रक्षेत्रस्थ 'गुरु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'गुरु' अपने जिस ग्रहों (सूर्य, चन्द्र अथवा मंगल) की राशि (सिंह, कर्क, मेष अथवा वृश्चिक) में बैठा हो, वह सुखी, उन्नतिशील, बुद्धिमान, प्रसिद्ध यशस्वी, सत्कर्म करने वाला तथा श्रेष्ठ लोगों द्वारा पूजित होता है।