ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
गणपतिखण्ड ३१९
प्राप्ति होती है। महेश्वरि! यह व्रत प्रत्येक जन्ममें समस्त वाञ्छित सिद्धियोंका बीज है, जिसका मैंने इस प्रकार वर्णन किया है; अतः देवि! तुम भी इस व्रतका अनुष्ठान करो। साध्वि! तुम्हें पुत्र उत्पन्न होगा। यों कहकर शिवजी चुप हो गये। (अध्याय ४)
पुण्यक-व्रतकी माहात्म्य-कथाका कथन
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! इस प्रकार व्रतके विधानको सुनकर दुर्गाका मन प्रसन्नतासे खिल उठा। तत्पश्चात् उन्होंने अपने स्वामी शिवजीसे दिव्य एवं शुभकारिणी व्रत-कथाके विषयमें जिज्ञासा प्रकट की।
श्रीपार्वतीजीने पूछा—नाथ! यह व्रत तथा इसका फल और विधान बड़ा ही अद्भुत है। भला, किसने इस व्रतको प्रकाशित किया है? इसकी श्रेष्ठ कथाका वर्णन कीजिये।
अथ व्रतमाहात्म्यकथा
श्रीमहादेवजी बोले—प्रिये! मनुकी पत्नी शतरूपा, जो पुत्रके दुःखसे दुःखी थी, ब्रह्मलोकमें आकर ब्रह्माजीसे बोली।
शतरूपाने कहा—ब्रह्मन्! आप जगत्का धारण-पोषण करनेवाले तथा सृष्टिके कारणोंके भी कारण हैं। अतः आप मुझे यह बतलानेकी कृपा करें कि किस उपायसे वन्ध्याको पुत्र उत्पन्न हो सकता है; क्योंकि ब्रह्मन्! उसका जन्म, ऐश्वर्य और धन सब निष्फल ही होता है। पुत्रवानोंके घरमें पुत्रके बिना अन्य किसी वस्तुकी शोभा नहीं होती। तपस्या और दानसे उत्पन्न हुआ पुण्य जन्मान्तरमें सुखदायक होता है, परंतु पुत्र पिताको (इसी जन्ममें) सुख, मोक्ष और हर्ष प्रदान करता है। निश्चय ही पुत्र 'पुत्' नामक नरकसे रक्षा करनेका हेतु होता है। ब्रह्मन्! आप पुत्रतापसे संतप्त हुई मुझ अबलाको पुत्र-प्राप्तिका उपाय बतला दें, तभी कल्याण है; अन्यथा मैं पतिके साथ वनमें चली जाऊँगी। आप प्रजाको धारण करनेवाली पृथ्वी, धन, ऐश्वर्य और राज्य आदि ग्रहण कीजिये; क्योंकि तात! हम दोनों पुत्रहीनोंको पुत्रके बिना इन सबसे क्या प्रयोजन है? साक्षात् ब्रह्माजीसे यों कहकर शतरूपा फूट-फूटकर रुदन करने लगी। तब उसकी ओर देखकर कृपालु ब्रह्माजीने कहा।
ब्रह्माजी बोले—वत्से! जो समस्त ऐश्वर्य आदिका कारणरूप, सम्पूर्ण मनोरथोंका दाता तथा शुभकारक है, उस सुखदायक पुत्र-प्राप्तिके उपायका वर्णन करता हूँ, सुनो। सुव्रते! माघमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशीके दिन शुद्ध कालमें सर्वस्व प्रदान करनेवाले श्रीकृष्णकी आराधना करके इस उत्तम पुण्यक-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। कण्वशाखामें इस व्रतका वर्णन किया गया है। इसे पूरे वर्षभरतक करना चाहिये। यह सारी अभीष्ट-सिद्धियोंका प्रदाता तथा सम्पूर्ण विघ्नोंका विनाशक है। व्रतकालमें वेदोक्त द्रव्योंका दान करना चाहिये। शुभे! तुम भी इस व्रतका अनुष्ठान करके विष्णुके समान पराक्रमी पुत्र प्राप्त करो।
ब्रह्माजीका कथन सुनकर शतरूपाने इस उत्तम व्रतका अनुष्ठान किया, जिससे उन्हें प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो मनोहर पुत्र प्राप्त हुए। देवहूतिने इस पुण्यप्रद एवं शुभ पुण्यक-व्रतको करके कपिल नामक पुत्र प्राप्त किया, जो सर्वश्रेष्ठ सिद्ध तथा नारायणके अंशसे प्रकट हुए थे। शुभलक्षणा अरुन्धतीने इस व्रतको करके शक्तिको पुत्र-रूपमें पाया। शक्ति-पत्नीको इस व्रतके पालनसे पराशर नामक पुत्रकी प्राप्ति हुई। अदितिने इस व्रतका अनुष्ठान करके वामन नामक पुत्र प्राप्त किया। ऐश्वर्यशालिनी शचीने इस व्रतको
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करके जयन्त नामक पुत्रको जन्म दिया। इस व्रतके करनेसे उत्तानपादकी पत्नीने ध्रुवको और कुबेरकी भार्याने नलकूबरको पुत्ररूपमें प्राप्त किया। इस उत्तम व्रतके पालनसे सूर्यपत्नीको मनु तथा अत्रिपत्नीको चन्द्रमा पुत्ररूपमें मिले। अङ्गिराकी पत्नीने भी इस उत्तम व्रतका अनुष्ठान किया था, जिसके प्रभावसे उनके पुत्र बृहस्पति हुए, जो देवताओंके आचार्य कहलाते हैं। भृगुपत्नीने इस व्रतका पालन करके शुक्रको पुत्ररूपमें प्राप्त किया, जो नारायणके अंश और समस्त तेजस्वियोंमें परमोत्कृष्ट हैं। ये ही दैत्योंके गुरु हुए। देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे व्रतोंमें उत्तम पुण्यक-व्रतका वर्णन कर दिया। कल्याणमयी गिरिराजनन्दिनि! तुम भी इस व्रतको करो। शुभे! यह व्रत राजेन्द्रपत्नियोंके लिये सुखसाध्य है, देवियोंके लिये सुखप्रद है और साध्वी नारियोंके लिये तो यह प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय है। महासाध्वि! इस व्रतके प्रभावसे सम्पूर्ण देवताओंके ईश्वर स्वयं गोपाङ्गनेश्वर श्रीकृष्ण तुम्हारे पुत्र होंगे।
नारद! यों कहकर शंकरजी चुप हो गये। तत्पश्चात् परम प्रसन्न हुई पार्वतीदेवीने शंकरजीकी आज्ञासे उस व्रतका अनुष्ठान किया। इस प्रकार मैंने तुमसे गणेशजीके जन्मका कारण, जो सुखदायक, मोक्षप्रद और साररूप है, वर्णन कर दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय ५)
पार्वतीजीका व्रतारम्भके लिये उद्योग, ब्रह्मादि देवों तथा ऋषि आदिका आगमन, शिवजीद्वारा उनका सत्कार तथा श्रीविष्णुसे पुण्यक-व्रतके विषयमें प्रश्न, श्रीविष्णुका व्रतके माहात्म्य तथा गणेशकी उत्पत्तिका वर्णन करना
**नारदजीने पूछा—**मुनिश्रेष्ठ! पार्वतीजीने पतिकी आज्ञासे किस प्रकार उस शुभदायक व्रतका पालन किया था, वह मुझे बतलाइये। ब्रह्मन्! तत्पश्चात् उत्तम व्रतवाली पार्वतीके द्वारा उस व्रतके पूर्ण किये जानेपर गोपीश श्रीकृष्णने किस प्रकार जन्म धारण किया, वह मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये।
**श्रीनारायणने कहा—**नारद! शिवजी यद्यपि स्वयं ही तपके विधाता हैं तथापि वे पार्वतीसे व्रतकी विधि तथा उसकी दिव्य कथाका वर्णन करके तप करनेके लिये चले गये। यद्यपि शिवजी श्रीहरिके ही पृथक् स्वरूप हैं तथापि वे वहाँ श्रीहरिकी आराधनामें संलग्न होकर उन्हींके ध्यानमें तत्पर हो श्रीहरिकी भावना करने लगे। वे सनातनदेव ज्ञानानन्दमें निमग्न तथा परमानन्दसे परिपूर्ण थे और प्रकटरूपसे विष्णुमन्त्रके स्मरणमें इस प्रकार तल्लीन थे कि उन्हें रात-दिनका आना-जाना ज्ञात नहीं होता था। इधर शुभदायिनी पार्वतीदेवीने पतिके आज्ञानुसार हर्षपूर्ण मनसे व्रतकार्यके लिये ब्राह्मणों तथा भृत्योंको प्रेरित किया और व्रतोपयोगी सभी वस्तुओंको मँगवाकर शुभ मुहूर्तमें व्रत करना आरम्भ किया। उसी समय ब्रह्माके पुत्र भगवान् सनत्कुमार वहाँ आ पहुँचे। वे तेजके मूर्तिमान् राशि थे और ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। तदनन्तर पत्नीसहित ब्रह्मा भी प्रसन्नतापूर्वक ब्रह्मलोकसे वहाँ पधारे। अत्यन्त भयभीत हुए भगवान् महेश्वर भी वहाँ आये। नारद! जो क्षीरसागरमें शयन करते हैं तथा जगत्के शासक और पालन-पोषण करनेवाले हैं, जिनके गलेमें वनमाला लटकती रहती है, जो रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित हैं तथा जिनके शरीरका वर्ण श्याम है, वे चार भुजाधारी भगवान् विष्णु लक्ष्मी तथा पार्षदोंके साथ बहुत-सी सामग्री लिये हुए रत्नजटित
गणपतिखण्ड ३२१
विमानपर आरूढ हो वहाँ उपस्थित हुए। तत्पश्चात् सनक, सनन्दन, कपिल, सनातन, आसुरि, क्रतु, हंस, वोढु, पञ्चशिख, आरुणि, यति, सुमति, अनुयायियोंसहित वसिष्ठ, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, भृगु, अङ्गिरा, अगस्त्य, प्रचेता, दुर्वासा, च्यवन, मरीचि, कश्यप, कण्व, जरत्कारु, गौतम, बृहस्पति, उतथ्य, संवर्त, सौभरि, जाबालि, जमदग्नि, जैगीषव्य, देवल, गोकामुख, वक्ररथ, पारिभद्र, पराशर, विश्वामित्र, वामदेव, ऋष्यशृङ्ग, विभाण्डक, मार्कण्डेय, मृकण्डु, पुष्कर, लोमश, कौत्स, वत्स, दक्ष, बालाग्रि, अघमर्षण, कात्यायन, कणाद, पाणिनि, शाकटायन, शङ्कु, आपिशालि, शाकल्य, शङ्ख—ये तथा और भी बहुत-से मुनि शिष्योंसहित वहाँ पधारे। मुने! धर्मपुत्र नर-नारायण भी आये। पार्वतीके उस व्रतमें दिक्पाल, देवता, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर और गणोंसहित सभी पर्वत भी उपस्थित हुए। शैलराज हिमालय, जो अनन्त रत्नोंके उद्भवस्थान हैं, कौतुकवश अपनी कन्याके व्रतमें रत्नाभरणोंसे अलंकृत हो पत्नी, पुत्र, गण और अनुयायियोंसहित पधारे। उनके साथ नाना प्रकारके द्रव्योंसे संयुक्त बहुत बड़ी सामग्री थी। उसमें व्रतोपयोगी मणि-माणिक्य और रत्न थे। अनेक प्रकारकी ऐसी वस्तुएँ थीं, जो संसारमें दुर्लभ हैं। एक लाख गज-रत्न, तीन लाख अश्व-रत्न, दस लाख गो-रत्न, एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ, चार लाख मुक्ता, एक सहस्र कौस्तुभमणि और अत्यन्त स्वादिष्ट तथा मीठे पदार्थोंके एक लाख भार थे। इसके अतिरिक्त पार्वतीके व्रतमें ब्राह्मण, मनु, सिद्ध, नाग और विद्याधरोंके समुदाय तथा संन्यासी, भिक्षुक और बंदीगण भी आये। उस समय कैलासपर्वतके राजमार्गोंपर चन्दनका छिड़काव किया गया था। पद्मरागमणिके बने हुए शिवमन्दिरमें आमके पल्लवोंकी बंदनवारें बँधी थीं। कदलीके खंभे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह दूब, धान्य, पत्ते, खील, फल और पुष्पोंसे सुसज्जित था। उपस्थित सारा जन-समुदाय आनन्दपूर्वक उसे निहार रहा था। सारे कैलासवासी परमानन्दमें निमग्न थे।
तदनन्तर शंकरजीने समागत अतिथियोंको ऊँचे-ऊँचे सिंहासनोंपर बैठाकर उनका आदर-सत्कार किया। पार्वतीके इस व्रतमें इन्द्र दानाध्यक्ष, कुबेर कोषाध्यक्ष, स्वयं सूर्य आदेश देनेवाले और वरुण परोसनेके कामपर नियुक्त थे। उस समय दही, दूध, घृत, गुण, चीनी, तेल और मधु आदिकी लाखों नदियाँ बहने लगी थीं। इसी प्रकार गेहूँ, चावल, जौ और चिउरे आदिके पहाड़ों-के-पहाड़ लग गये थे। महामुने ! पार्वतीके व्रतमें कैलास पर्वतपर सोना, चाँदी, मूँगा और मणियोंके पर्वत-सरीखे ढेर लगे हुए थे। लक्ष्मीने भोजन तैयार किया था, जिसमें परम मनोहर खीर, पूड़ी, अगहनीका चावल और घृतसे बने हुए अनेकविध व्यञ्जन थे। देवर्षिगणोंके साथ स्वयं नारायणने भोजन किया। उस समय एक लाख ब्राह्मण परोसनेका काम कर रहे थे। (भोजन कर लेनेके पश्चात्) जब वे रत्नसिंहासनोंपर विराजमान हुए, तब परम चतुर लाखों ब्राह्मणोंने उन्हें कर्पूर आदिसे सुवासित पानके बीड़े समर्पित किये। ब्रह्मन्! देवर्षियोंसे भरी हुई उस सभामें जब क्षीरसागरशायी भगवान् विष्णु रत्नसिंहासनपर आसीन थे, प्रसन्न मुखवाले पार्षद उनपर श्वेत चँवर डुला रहे थे, ऋषि, सिद्ध तथा देवगण उनकी स्तुति कर रहे थे, वे गन्धर्वोंके मनोहर गीत सुन रहे थे, उसी समय ब्रह्माकी प्रेरणासे शंकरजीने हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक उन ब्रह्मेशसे अपने अभीष्ट कर्तव्य व्रतके विषयमें प्रश्न किया।
**श्रीमहादेवजीने पूछा—**प्रभो! आप श्रीनिवास, तपःस्वरूप, तपस्याओं और कर्मोंके फलदाता, सबके द्वारा पूजित, सम्पूर्ण व्रतों, जप-यज्ञों और पूजनोंके बीजरूपसे वाञ्छाकल्पतरु और पापोंका हरण करनेवाले हैं। नाथ! मेरी एक प्रार्थना
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सुनिये। ब्रह्मन्! पुत्रशोकसे पीड़ित हुई पार्वतीका हृदय दुःखी हो गया है, अतः वह पुत्रकी कामनासे परमोत्तम पुण्यक-व्रत करना चाहती है। वह सुव्रता व्रतके फलस्वरूपमें उत्तम पुत्र और पति-सौभाग्यकी याचना कर रही है। इनके बिना उसे संतोष नहीं है। प्राचीन कालमें इस मानिनीने अपने पिताके यज्ञमें मेरी निन्दा होनेके कारण अपने शरीरका त्याग कर दिया था और अब पुनः हिमालयके घरमें जन्म धारण किया है। यह सारा वृत्तान्त तो आप जानते ही हैं, आप सर्वज्ञको मैं क्या बतलाऊँ। तत्त्वज्ञ! इस विषयमें आपकी क्या आज्ञा है? आप परिणाममें शुभप्रदायिनी अपनी वह आज्ञा बतलाइये। नाथ! मैंने सब कुछ निवेदन कर दिया है, अब जो कर्तव्य हो, उसे बतानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि परामर्शपूर्वक किया हुआ सारा कार्य परिणाममें सुखदायक होता है।
श्रीनारायणजी कहते हैं— नारद! उस सभामें यों कहकर भगवान् शंकरने कमलापति विष्णुकी स्तुति की और फिर ब्रह्माके मुखकी ओर देखकर वे चुप हो गये। शंकरजीका वचन सुनकर जगदीश्वर विष्णु ठठाकर हँस पड़े और हितकारक तथा नीतिपूर्ण वचन कहने लगे।
श्रीविष्णुने कहा— पार्वतीश्वर! आपकी पत्नी सती संतान-प्राप्तिके लिये जिस उत्तम पुण्यक-व्रतको करना चाहती है, वह व्रतोंका सारतत्त्व, स्वामि-सौभाग्यका बीज, सबके द्वारा असाध्य, दुराराध्य, सम्पूर्ण अभीष्ट फलका दाता, सुखदायक, सुखका सार तथा मोक्षप्रद है। जो सबके आत्मा, साक्षीस्वरूप, ज्योतिरूप, सनातन, आश्रयरहित, निर्लिप्त, उपाधिहीन, निरामय, भक्तोंके प्राणस्वरूप, भक्तोंके ईश्वर, भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले, दूसरोंके लिये दुराराध्य, परंतु भक्तोंके लिये सुसाध्य, भक्तिके वशीभूत, सर्वसिद्ध और कलारहित हैं, ये ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर जिन पुरुषकी कलाएँ हैं, महान् विराट् जिनका एक अंश है, जो निर्लिप्त, प्रकृतिसे परे, अविनाशी, निग्रहकर्ता, उग्रस्वरूप, भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रहस्वरूप, ग्रहोंमें उग्र ग्रह और ग्रहोंका निग्रह करनेवाले हैं, वे भगवान् आपके बिना करोड़ों जन्मोंमें भी साध्य नहीं हो सकते।
सूर्य, शिव, नारायणी माया, कला आदिकी दीर्घकालतक उपासना करनेके बाद मनुष्य भक्त-संसर्गकी हेतुस्वरूपा कृष्णभक्तिको पाता है। शिवजी! उस निष्पक्व भक्तिको पाकर भारतवर्षमें बारंबार भ्रमण करते हुए जब भक्तोंकी सेवा करनेसे उसकी भक्ति परिपक्व हो जाती है, तब भक्तोंकी कृपासे तथा देवताओंके आशीर्वादसे उसे श्रीकृष्णमन्त्र प्राप्त होता है, जो परमोत्कृष्ट निर्वाणरूप फल प्रदान करनेवाला है। कृष्णव्रत और कृष्णमन्त्र सम्पूर्ण कामनाओंके फलके प्रदाता हैं। चिरकालतक श्रीकृष्णकी सेवा करनेसे भक्त श्रीकृष्ण-तुल्य हो जाता है। महाप्रलयके अवसरपर समस्त प्राणियोंका विनाश हो जाता है—यह सर्वथा निश्चित है; परंतु जो कृष्णभक्त हैं, वे अविनाशी हैं। उन साधुओंका नाश नहीं होता। शिवजी! श्रीकृष्णभक्त अत्यन्त निश्चिन्त होकर अविनाशी गोलोकमें आनन्द मनाते हैं। महेश्वर! आप सबका संहार करनेवाले हैं, परंतु कृष्णभक्तोंपर आपका वश नहीं चलता। उसी प्रकार माया सबको मोहग्रस्त कर लेती है, परंतु मेरी कृपासे वह भक्तोंको नहीं मोह पाती। नारायणी माया समस्त प्राणियोंकी माता है। वह कृष्णभक्तिका दान करनेवाली है, वह नारायणी माया मूलप्रकृति, अधीश्वरी, कृष्णप्रिया, कृष्णभक्ता, कृष्णतुल्या, अविनाशिनी, तेजःस्वरूपा और स्वेच्छानुसार शरीर धारण करनेवाली है। (दैत्योंद्वारा) सुरनिग्रहके अवसरपर वह देवताओंके तेजसे प्रकट हुई थी। उसने दैत्यसमूहोंका संहार करके दक्षके अनेक जन्मोंकी तपस्याके फलस्वरूप भारतवर्षमें दक्षपत्नीके
गणपतिखण्ड ३२३
गर्भसे जन्म लिया। फिर वह सतीदेवी, जो सनातनी कृष्णशक्ति हैं पिताके यज्ञमें आपकी निन्दा होनेके कारण शरीरका त्याग करके गोलोकको चली गयीं। शंकर! तब पूर्वकालमें आप उनके रूप तथा गुणके आश्रयभूत परम सुन्दर शरीरको लेकर भारतवर्षमें भ्रमण करते हुए दुःखी हो गये थे। उस समय श्रीशैलपर नदीके किनारे मैंने आपको समझाया था। फिर उसी देवीने शीघ्र ही शैलराजकी पत्नीके गर्भसे जन्म लिया।
शंकर! उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली साध्वी शिवा पुण्यक नामक उत्तम व्रतका अनुष्ठान करें। इस व्रतके पालनसे सहस्रों राजसूय-यज्ञोंका पुण्य प्राप्त होता है। त्रिलोचन ! इस व्रतमें सहस्रों राजसूय-यज्ञोंके समान धनका व्यय होता है, अतः यह व्रत सभी साध्वी महिलाओंद्वारा साध्य नहीं है। इस पुण्यक-व्रतके प्रभावसे स्वयं गोलोकनाथ श्रीकृष्ण पार्वतीके गर्भसे उत्पन्न होकर आपके पुत्र होंगे। वे कृपानिधि स्वयं समस्त देवगणोंके ईश्वर हैं, इसलिये त्रिलोकीमें 'गणेश' नामसे विख्यात होंगे। जिनके स्मरणमात्रसे निश्चय ही जगत्के विघ्नोंका नाश हो जाता है, इस कारण उन विभुका नाम 'विघ्ननिघ्न' हो गया। चूँकि पुण्यक-व्रतमें उन्हें नाना प्रकारके द्रव्य समर्पित किये जाते हैं, जिन्हें खाकर उनका उदर लंबा हो जाता है; अतः वे 'लम्बोदर' कहलायेंगे। शनिकी दृष्टि पड़नेसे सिरके कट जानेपर पुनः हाथीका सिर जोड़ा जायगा, इस कारण उन्हें 'गजानन' कहा जायगा। परशुरामजीके फरसेसे जब इनका एक दाँत टूट जायगा, तब ये अवश्य ही 'एकदन्त' नामवाले होंगे। वे ऐश्वर्यशाली शिशु सम्पूर्ण देवगणोंके, हमलोगोंके तथा जगत्के पूज्य होंगे। मेरे वरदानसे उनकी सबसे पहले पूजा होगी। सम्पूर्ण देवोंकी पूजाके समय सबसे पहले उनकी पूजा करके मनुष्य निर्विघ्नतापूर्वक पूजाके फलको पा लेता है, अन्यथा उसकी पूजा व्यर्थ हो जाती है।
मनुष्योंको चाहिये कि गणेश, सूर्य, विष्णु, शम्भु, अग्नि और दुर्गा—इन सबकी पहले पूजा करके तब अन्य देवताका पूजन करे। गणेशका पूजन करनेपर जगत्के विघ्न निर्मूल हो जाते हैं। सूर्यकी पूजासे नीरोगता आती है। श्रीविष्णुके पूजनसे पवित्रता, मोक्ष, पापनाश, यश और ऐश्वर्यकी वृद्धि होती है। शंकरका पूजन तत्त्वज्ञानके विषयमें परम तृप्तिका बीज है। अग्निका पूजन अपनी बुद्धिकी शुद्धिका उत्पादक कहा गया है। ब्रह्माद्वारा संस्कृत अग्निकी पूजासे मनुष्य अन्तसमयमें ज्ञान-मृत्युको प्राप्त करता है तथा शंकराग्निके सेवनसे दाता और भोक्ता होता है। दुर्गाकी अर्चना हरिभक्ति प्रदान करनेवाली तथा परम मङ्गलदायिनी होती है। इनकी पूजाके बिना अन्यकी पूजा करनेसे वह पूजन विपरीत हो जाता है। महादेव ! त्रिलोकीके लिये यही क्रम प्रत्येक कल्पमें निश्चित है। ये देव निरन्तर विद्यमान रहनेवाले, नित्य तथा सृष्टिपरयण हैं। इनका आविर्भाव और तिरोभाव ईश्वरकी इच्छापर ही निर्भर है। उस सभाके बीच यों कहकर श्रीहरि मौन हो गये। उस समय देवता, ब्राह्मण तथा पार्वतीसहित शंकर परम प्रसन्न हुए।
(अध्याय ६)
३२४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पार्वतीद्वारा व्रतारम्भ, व्रत-समाप्तिमें पुरोहितद्वारा शिवको दक्षिणारूपमें माँगे जानेपर पार्वतीका मूर्च्छित होना, शिवजी तथा देवताओं और मुनियोंका उन्हें समझाना, पार्वतीका विषाद, नारायणका आगमन और उनके द्वारा पतिके बदले गोमूल्य देकर पार्वतीको व्रत समाप्त करनेका आदेश, पुरोहितद्वारा उसका अस्वीकार, एक अद्भुत तेजका आविर्भाव और देवताओं, मुनियों तथा पार्वतीद्वारा उसका स्तवन श्रीनारायणजी कहते हैं—नारद ! तदनन्तर हर्षसे गद्गद हुए मनवाले शिवजीने श्रीहरिकी आज्ञा स्वीकार करके श्रीहरिके साथ किये गये माङ्गलिक वार्तालापको प्रेमपूर्वक पार्वतीसे कह सुनाया। तब पार्वतीका मन प्रसन्न हो गया। फिर तो उन्होंने शिवजीकी आज्ञा मानकर उस मङ्गलव्रतके अवसरपर माङ्गलिक बाजा बजाया। फिर सुन्दर दाँतोंवाली पार्वतीने भलीभाँति स्नान करके शरीरको शुद्ध किया और स्वच्छ साड़ी तथा चद्दर धारण किया। तत्पश्चात् जो चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे विभूषित, फल और अक्षतसे सुशोभित तथा आमके पल्लवसे संयुक्त था, ऐसे रत्नकलशको चावलकी राशिपर स्थापित किया। फिर रत्नोंके उद्भवस्थान हिमालयकी कन्या सती पार्वतीने, जो रत्नोंसे विभूषित तथा रत्नजटित आसनपर विराजमान थी, रत्नसिंहासनोंपर समासीन मुनिश्रेष्ठोंकी पूजा करके चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और रत्नाभरणोंसे भूषित तथा रत्नसिंहासनपर विराजमान पुरोहितकी समर्चना की। इसके बाद विधि-विधानके अनुसार रत्नभूषित दिक्पालों, देवताओं, मनुष्यों और नागोंको आगे स्थापित करके भक्तिपूर्वक उनका भलीभाँति पूजन किया। फिर पुण्यक-व्रतमें, जिनकी अग्निमें तपाकर शुद्ध किये गये बहुमूल्य रत्नोंके भूषणों, उत्तम-उत्तम वस्त्रों तथा पूजनोपयोगी नाना प्रकारकी सामग्रियोंसे पूजा की गयी थी और जो चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे सुशोभित थे, उन ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरकी परम भक्तिपूर्वक समर्चना की। मुने ! तत्पश्चात् पार्वतीदेवीने स्वस्तिवाचनपूर्वक व्रत आरम्भ किया। तदनन्तर उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली सतीने उस मङ्गल-कलशपर अपने अभीष्ट देवता श्रीकृष्णका आवाहन करके उन्हें भक्तिपूर्वक क्रमशः षोडशोपचार समर्पित किया। फिर व्रतमें जिन अनेक प्रकारके द्रव्योंके देनेका विधान है, एक-एक करके उन सभी फलदायी पदार्थोंको प्रदान किया। पुनः व्रतके लिये कहा गया उपहार, जो त्रिलोकीमें दुर्लभ है, वह सब भी भक्तिसहित अर्पण किया। इस प्रकार उस सतीने वेदमन्त्रोच्चारणपूर्वक सभी पदार्थोंको अर्पित करके तिल और घीसे तीन लाख आहुतियोंका हवन कराया और ब्राह्मणों, देवताओं तथा पूजित अतिथियोंको भोजनसे तृप्त किया। इस प्रकार उत्तम व्रतवाली सतीने उस पालनीय पुण्यक-व्रतमें सारे कर्तव्यको वर्षपर्यन्त प्रतिदिन विधानके साथ पूर्ण किया। समाप्तिके दिन विप्रवर पुरोहितने उनसे कहा—'सुव्रते ! इस उत्तम व्रतमें तुम मुझे अपने पतिको दक्षिणारूपमें दे दो।' पुरोहितके इस कथनको सुनकर महामाया पार्वती उस देव-सभाके मध्य विलाप करके मूर्च्छित हो गयी; क्योंकि उस समय मायाने उनके चित्तको मोह लिया था। नारद ! उन्हें मूर्च्छित देखकर उन मुनिवरोंको तथा ब्रह्मा और विष्णुको हँसी आ गयी। तब उन्होंने शंकरजीको पार्वतीके पास भेजा। उस समय पार्वतीको होशमें लानेके लिये सभासदोंद्वारा प्रेरित किये जानेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ शिवजी कहने लगे।
·· गणपतिखण्ड ·· ३२५
श्रीमहादेवजीने कहा— भद्रे! उठो, निस्संदेह तुम्हारा कल्याण होगा। तुम होशमें आकर मेरी बात सुनो। फिर जिनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे, उन पार्वतीसे यों कहकर शिवजीने उन्हें हृदयसे लगा लिया और चेतनायुक्त कर दिया। तत्पश्चात् हितकर, सत्य, परिमित, परिणाममें सुखप्रद, यशस्कर और फलदायक वचन कहना आरम्भ किया। देवि! जिसका वेदने निरूपण किया है, जो सर्वसम्मत और इष्ट है, उस धर्मार्थका इस धर्मसभामें मैं वर्णन करता हूँ, सुनो। देवि! दक्षिणा समस्त कर्मोंकी सारभूता है। धर्मिष्ठे! वह धर्म-कर्ममें नित्य ही यश और फल प्रदान करनेवाली है। प्रिये! देवकार्य, पितृकार्य अथवा नित्य-नैमित्तिक जो भी कर्म दक्षिणासे रहित होता है, वह सब निष्फल हो जाता है और उस कर्मसे निश्चय ही दाता कालसूत्र नामक नरकमें जाता है। तत्पश्चात् वह शत्रुओंसे पीड़ित होकर दीनताको प्राप्त होता है। ब्राह्मणके उद्देश्यसे संकल्प की हुई दक्षिणा यदि उसी समय नहीं दे दी जाती है तो वह बढ़ते-बढ़ते अनेक गुनी हो जाती है।
श्रीविष्णुने कहा— धर्मिष्ठे! धर्मकर्मके विषयमें तुम अपने धर्मकी रक्षा करो; क्योंकि धर्मज्ञे! अपने धर्मका पूर्णतया पालन करनेपर सबकी रक्षा हो जाती है।
ब्रह्माने कहा— धर्मज्ञे! जो किसी कारणवश धर्मकी रक्षा नहीं करता है तो धर्मके नष्ट हो जानेपर उसके कर्त्ताका विनाश हो जाता है।
धर्मने कहा— साध्वि! पतिको दक्षिणारूपमें देकर यत्नपूर्वक मेरी रक्षा करो। महासाध्वि! मेरे सुरक्षित रहनेपर सब कुछ कल्याण ही होगा।
देवताओंने कहा— महासाध्वि! तुम धर्मकी रक्षा करके अपने व्रतको पूर्ण करो। सती! तुम्हारे व्रतके पूरा हो जानेपर हमलोग तुम्हारे मनोरथको पूर्ण कर देंगे।
मुनियोंने कहा— पतिव्रते! हवनको पूरा करके ब्राह्मणोंको दक्षिणा प्रदान करो। धर्मज्ञे! हमलोगोंके उपस्थित रहते अमङ्गल कैसे होगा?
सनत्कुमारने कहा— शिवे! या तो तुम मुझे शिवको दक्षिणारूपमें दे दो, अन्यथा इस व्रतके फलको तथा चिरकालसे संचित अपनी तपस्याके फलको भी छोड़ दो। साध्वि! इस प्रकार कर्मके दक्षिणारहित हो जानेपर मैं इस व्रतके फलको तथा यजमानके सारे कर्मोंके फलको पा जाऊँगा।
तब पार्वतीजी बोलीं— देवेश्वरो! जिस कर्ममें पतिकी ही दक्षिणा दी जाती है, उस कर्मसे मुझे क्या लाभ? मुने! दक्षिणा देनेसे तथा धर्म और पुत्रकी प्राप्तिसे भी मेरा कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा? भला, यदि भूमिकी पूजा न की जाय तो वृक्षके पूजनसे क्या फल मिलेगा? क्योंकि कारणके नष्ट हो जानेपर कार्यकी स्थिति कहाँ और फिर अन्न तथा फल कहाँसे प्राप्त हो सकते हैं? यदि स्वेच्छानुसार प्राणोंका ही त्याग कर दिया जाय तो फिर शरीरसे क्या प्रयोजन है? जिसकी दृष्टिशक्ति ही नष्ट हो गयी है, उस आँखसे क्या लाभ? सुरेश्वरो! पतिव्रताओंके लिये पति सौ पुत्रोंके समान होता है। ऐसी दशामें यदि व्रतमें पतिको ही दे देना है तो उस व्रतसे अथवा (व्रतके फलस्वरूप) पुत्रसे क्या सिद्ध होगा? माना कि पुत्र पतिका वंश होता है, किंतु उसका एकमात्र मूल तो पति ही है। भला, जहाँ मूलधन ही नष्ट हो जाय वहाँ उसका सारा व्यापार तो निष्फल हो ही जायगा।
इस प्रकार वाद-विवाद चल ही रहा था, इसी बीच उस सभामें स्थित देवताओं और मुनियोंने आकाशमें बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए एक रथको देखा, जो पार्षदोंद्वारा घिरा हुआ था। वे सभी पार्षद श्याम रंगवाले तथा चार भुजाधारी थे। उनके गलेमें वनमाला शोभा पा रही थी और वे रत्नाभरणोंसे विभूषित थे। तत्पश्चात्
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वैकुण्ठवासी भगवान् उस विमानसे उतरकर हर्षपूर्वक उस सभामें आये। फिर तो सुरेश्वरोंने उनकी स्तुति करना आरम्भ किया। तदनन्तर जिनके चार भुजाएँ थीं; जो शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए थे; जो लक्ष्मी और सरस्वतीके स्वामी, शान्तस्वरूप, परम मनोहर और सुखपूर्वक दर्शन करने योग्य थे, परंतु भक्तिहीनोंके लिये जिनका दर्शन करोड़ों जन्मोंमें भी नहीं हो सकता; जिनके नील रंगकी आभा करोड़ों कामदेवोंको मात कर रही थी; जिनका प्रकाश करोड़ों चन्द्रमाओंके समान था; जो अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित सुन्दर भूषणोंसे विभूषित थे, जो ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा सेवनीय हैं, भक्तगण सदा जिनका स्तवन करते हैं; जो अपने प्रकाशसे आच्छादित देवर्षियोंद्वारा घिरे हुए थे—उन परमेश्वरको ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओंने एक श्रेष्ठ रत्नसिंहासनपर बैठाया और सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। उस समय उन सबकी अञ्जलियाँ बँधी हुई थीं, शरीर रोमाञ्चित थे और आँखोंमें आँसू छलक आये थे। तब परम बुद्धिमान् भगवान्ने मुस्कराते हुए मधुर वाणीद्वारा उनसे सारा वृत्तान्त पूछा और उनके द्वारा सब जान लेनेपर कहना आरम्भ किया।
**श्रीनारायण बोले—**सुरगणो! मेरे सिवा ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त यह सारा जगत् प्रकृतिसे उत्पन्न हुआ है—यह सर्वथा सत्य है। विश्वमें सारे प्राणी जिस शक्तिसे शक्तिमान् हुए हैं, उस शक्तिको मैंने ही प्रकाशित किया है। सृष्टिके आदिमें मेरी इच्छासे वह प्रकृतिदेवी मुझसे ही प्रकट हुई हैं और मेरे सृष्टिका संहार कर लेनेपर वह अन्तर्हित होकर शयन करती हैं। प्रकृति ही सृष्टिकी विधायिका और समस्त प्राणियोंकी परा जननी है। वह मेरी माया मेरे समान है, इसी कारण नारायणी कहलाती है। शम्भुने चिरकालतक मेरा ध्यान करते हुए तपस्या की है, इसलिये तपकी फलस्वरूप मायाको मैंने उन्हें प्रदान किया है। मायारूपा पार्वतीका यह व्रत लोकशिक्षाके लिये ही है, अपने लिये नहीं है; क्योंकि त्रिलोकीमें व्रतों और तपस्याओंका फल देनेवाली तो ये स्वयं ही हैं। इनकी मायासे सभी प्राणी मोहित हैं। फिर प्रत्येक कल्पमें पुन-पुनः इनके स्तवन, व्रत और व्रत-फलकी साधनासे क्या लाभ? देवताओंमें श्रेष्ठ जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं, वे मेरे ही अंश हैं तथा जीवधारी प्राणी और देवता आदि मेरी ही कलाएँ तथा कलांशरूप हैं। जैसे कुम्हार मिट्टीके बिना घटका निर्माण नहीं कर सकता तथा सोनार स्वर्णके बिना कुण्डल बनानेमें असमर्थ है, उसी तरह मैं भी शक्तिके बिना अपनी सृष्टिकी रचना करनेमें असमर्थ हूँ। अतः सृष्टिके सृजनमें शक्तिकी ही प्रधानता है—यह सभी दर्शनशास्त्रोंको मान्य है। मैं समस्त देहधारियोंका आत्मा, निर्लेप, अदृश्य और साक्षी हूँ। प्रकृतिसे उत्पन्न सभी पाञ्चभौतिक शरीर नश्वर हैं, परंतु सूर्यके समान प्रकाशमान शरीरवाला मैं नित्य हूँ। जगत्में प्रकृति सबकी आधारस्वरूपा है और मैं सबका आत्मा हूँ। वेदमें ऐसा निरूपण किया गया है कि मैं आत्मा हूँ, ब्रह्मा मन हैं, महेश्वर ज्ञानरूप हैं, स्वयं विष्णु पञ्चप्राण हैं, ऐश्वर्यशालिनी प्रकृति बुद्धि है, मेधा, निद्रा आदि ये सभी प्रकृतिकी कलाएँ हैं और वह प्रकृति ही ये शैलराजकन्या पार्वती हैं। मैं सनातनदेव ही वैकुण्ठका अधिपति हूँ और मैं ही गोलोकका भी स्वामी हूँ। वहाँ गोलोकमें मैं दो भुजाधारी होकर गोप और गोपियोंसे घिरा रहता हूँ तथा यहाँ वैकुण्ठमें मैं देवेश्वर और लक्ष्मीपतिके रूपमें चार भुजाएँ धारण करता हूँ और मेरे पार्षद मुझे घेरे रहते हैं। वैकुण्ठसे ऊपर पचास करोड़ योजनकी दूरीपर स्थित गोलोकमें मेरा निवास-स्थान है, वहाँ मैं 'गोपीनाथ' रूपसे रहता हूँ। उन्हीं द्विभुजधारी गोपीनाथकी व्रतद्वारा आराधना की
४९- पार्वतीजीके निवेदन करनेपर शिवजीका प्रियतमा (पार्वती)-के साथ घरमें जाकर अपने पुत्रको देखना
गणपतिखण्ड
जाती है और वे ही उसका फल प्रदान करते हैं। जो जिस रूपसे उनका ध्यान करता है, उसे उसी रूपसे उसका फल देते हैं। अतः शिवे! तुम शिवको दक्षिणारूपमें देकर अपना व्रत पूर्ण करो। फिर समुचित मूल्य देकर अपने स्वामीको वापस कर लेना। शुभे! जैसे गौएँ विष्णुकी देहस्वरूपा हैं, उसी प्रकार शिव भी विष्णुके शरीर हैं; अतः तुम ब्राह्मणको गोमूल्य प्रदान करके अपने स्वामीको लौटा लेना। यह बात श्रुतिसम्मत है; क्योंकि जैसे स्वामी यज्ञपत्नीका दान करनेके लिये सदैव समर्थ है, उसी तरह यज्ञपत्नी भी स्वामीको दे डालनेकी अधिकारिणी है।
सभाके बीच यों कहकर नारायण वहीं अन्तर्धान हो गये। इसे सुनकर सभी सभासद् हर्षविभोर हो गये तथा हर्ष-गद्गद हुई पार्वती दक्षिणा देनेको उद्यत हुईं। तदनन्तर शिवाने हवनकी पूर्णाहुति करके शिवको दक्षिणारूपमें दे दिया और उधर सनत्कुमारजीने उस देवसभामें 'स्वस्ति' ऐसा कहकर दक्षिणा ग्रहण कर ली। उस समय भयभीत होनेके कारण दुर्गाका कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गया था, वे हाथ जोड़कर दुःखी हृदयसे ब्राह्मणसे बोलीं।
**पार्वतीजीने कहा—**विप्रवर! 'गौका मूल्य मेरे पतिके बराबर है'—ऐसा वेदमें कहा गया है, अतः मैं आपको एक लाख गौएँ प्रदान करूँगी। आप मेरे स्वामीको लौटा दीजिये। पतिके मिल जानेपर मैं ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारकी दक्षिणाएँ बाँटूँगी। (अभी तो मैं आत्महीन हूँ, ऐसी दशामें) भला, आत्मासे रहित शरीर कौन-सा कर्म करनेमें समर्थ हो सकता है?
**सनत्कुमारजी बोले—**देवि! मैं ब्राह्मण हूँ। मुझे एक लाख गौओंसे क्या प्रयोजन है और इस अमूल्य रत्नको गौओंके बदले देनेसे भी क्या लाभ होगा? त्रिलोकीमें सभी लोग स्वयं अपने-अपने कर्मके कर्ता हैं। क्या कर्ताका अभीष्ट कर्म कहीं दूसरेकी इच्छासे होता है? मैं इन दिगम्बरको आगे करके तीनों लोकोंमें भ्रमण करूँगा। उस समय ये बालक-बालिकाओंके समुदायके लिये हँसीके कारण होंगे।
मुने! उस देवसभामें यों कहकर ब्रह्माके पुत्र तेजस्वी सनत्कुमारने शंकरजीको अपने संनिकट बैठा लिया। इस प्रकार कुमारद्वारा शंकरजीको ग्रहण किये जाते देखकर पार्वतीके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये। वे शरीर छोड़ देनेके लिये उद्यत हो गयीं। उस समय वे मन-ही-मन सोचने लगीं कि यह कैसी कठिन बात हुई कि न तो अभीष्टदेवका दर्शन मिला और न व्रतका फल ही प्राप्त हुआ। इसी बीच पार्वतीसहित देवताओंने आकाशमें एक परमोत्कृष्ट तेजसमूह देखा। उसकी प्रभा करोड़ों सूर्योंकी प्रभासे उत्कृष्ट थी, वह दसों दिशाओंको प्रज्वलित कर रहा था और सम्पूर्ण देवताओंसे युक्त कैलास पर्वतको तथा सबको आच्छादित कर रहा था। उसकी मण्डलाकृति बड़ी विस्तृत थी। भगवान्के उस तेजको देखकर देवता लोग क्रमशः उनकी स्तुति करने लगे।
**विष्णुने कहा—**भगवन्! यह जो महाविराट् है, जिसके रोमछिद्रोंमें सभी ब्रह्माण्ड वर्तमान हैं, वह जब आपका सोलहवाँ अंश है, तब हम लोगोंकी क्या गणना है?
**ब्रह्माने कहा—**परमेश्वर! जो वेदोंके उपयुक्त दृश्य है, उसका प्रत्यक्ष दर्शन करने, स्तवन करने तथा वर्णन करनेमें मैं समर्थ हूँ; परंतु जो वेदोंसे परे है, उसकी मैं क्या स्तुति करूँ?
**श्रीमहादेवजीने कहा—**भगवन्! जो सबके लिये अनिर्वचनीय, स्वेच्छामय, व्यापक और ज्ञानसे परे हैं, उन आपका मैं ज्ञानका अधिष्ठातृदेवता होकर किस प्रकार स्तवन करूँ?
**धर्मने कहा—**जो अदृश्य होते हुए भी अवतारके समय सभी प्राणियोंके लिये दृश्य हो
३२८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
जाते हैं, उन भक्तोंके मूर्तिमान् अनुग्रहस्वरूप तेजोरूपकी मैं कैसे स्तुति करूँ?
देवताओंने कहा—देवेश्वर! भला जिनका गुणगान करनेमें वेद समर्थ नहीं हैं तथा सरस्वतीकी शक्ति कुण्ठित हो जाती है, उन आपका स्तवन करनेके लिये हमलोग कैसे समर्थ हो सकते हैं; क्योंकि हम तो आपके कलांश हैं।
मुनियोंने कहा—देव! वेदोंको पढ़कर विद्वान् कहलानेवाले हमलोग वेदोंके कारणस्वरूप आपकी स्तुति कैसे कर सकते हैं? आप मन-वाणीके परे हैं; आपका स्तवन सरस्वती भी नहीं कर सकतीं।
सरस्वतीने कहा—अहो! यद्यपि वेदवादी लोग मुझे वाणीकी अधिष्ठातृदेवी कहते हैं, तथापि आपकी स्तुति करनेके लिये मुझमें कुछ भी शक्ति नहीं है; क्योंकि आप वाणी और मनके अगोचर हैं।
सावित्रीने कहा—नाथ! प्राचीनकालमें मेरी उत्पत्ति आपकी कलासे हुई थी। मैं वेदोंकी जननी हूँ। अतः स्त्रीस्वभाववश मैं सम्पूर्ण कारणोंके भी कारणस्वरूप आपकी किस प्रकार स्तुति करूँ?
लक्ष्मीने कहा—भगवन्! मैं आपके अंशभूत विष्णुकी पत्नी हूँ, जगत्का पालन-पोषण करनेवाली हूँ और आपकी कलासे उत्पन्न हुई हूँ। ऐसी दशामें जगत्की उत्पत्तिके कारणस्वरूप आपका स्तवन कैसे कर सकती हूँ?
हिमालयने कहा—नाथ! मैं कर्मसे स्थावर हूँ, अतः मुझे स्तुति करनेके लिये उद्यत देखकर सत्पुरुष मेरा उपहास कर रहे हैं। मैं क्षुद्र हूँ और स्तवन करनेके लिये सर्वथा अयोग्य हूँ; फिर किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ?
मुने! इस प्रकार जब सभी देवता, देवियाँ और मुनिगण क्रमशः उन नारायणकी स्तुति करके चुप हो गये, तब जो उत्तमव्रतपरायणा, तपस्याओं और सम्पूर्ण कर्मोंका फल प्रदान करनेवाली और जगन्माता हैं, वे पार्वतीदेवी शिवजीकी प्रेरणासे व्रतके आराध्यदेव परमात्माकी स्तुति करनेको उद्यत हुईं। उस व्रतकालमें उन सतीका शरीर धौतवस्त्रसे आच्छादित था। वे सिरपर जटाका भार धारण किये हुए थीं। उनका रूप धधकती हुई अग्निकी लपटके समान प्रकाशमान था और वे तेजकी मूर्तिमान् विग्रह जान पड़ती थीं।
पार्वतीजी बोलीं—श्रीकृष्ण! आप तो मुझे जानते हैं; परंतु मैं आपको जाननेमें असमर्थ हूँ। भद्र! आपको वेदज्ञ, वेद अथवा वेदकर्ता—इनमेंसे कौन जानते हैं? अर्थात् कोई नहीं। भला, जब आपके अंश आपको नहीं जानते, तब आपकी कलाएँ आपको कैसे जान सकती हैं? इस तत्त्वको आप ही जानते हैं। आपके अतिरिक्त दूसरे लोग कौन इसे जाननेमें समर्थ हैं? आप सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतम, अव्यक्त, स्थूलसे भी महान् स्थूलतम हैं। आप सनातन, विश्वके कारण, विश्वरूप और विश्व हैं। आप ही कार्य, कारण, कारणोंके भी कारण, तेजःस्वरूप, षडैश्वर्योंसे युक्त, निराकार, निराश्रय, निर्लिप्त, निर्गुण, साक्षी, स्वात्माराम, परात्पर, प्रकृतिके अधीश्वर और विराट्के बीज हैं। आप ही विराट्रूप भी हैं। आप सगुण हैं और सृष्टि-रचनाके लिये अपनी कलासे प्राकृतिक रूप धारण कर लेते हैं। आप ही प्रकृति हैं, आप ही पुरुष हैं और आप ही वेदस्वरूप हैं। आपके अतिरिक्त अन्य कहीं कुछ भी नहीं है। आप जीव, साक्षीके भोक्ता और अपने आत्माके प्रतिबिम्ब हैं। आप ही कर्म और कर्मबीज हैं तथा कर्मोंके फलदाता भी आप ही हैं। योगीलोग आपके निराकार तेजका ध्यान करते हैं तथा कोई-कोई आपके चतुर्भुज, शान्त, लक्ष्मीकान्त मनोहर रूपमें ध्यान लगाते हैं। नाथ! जो वैष्णव भक्त हैं, वे आपके उस तेजस्वी, साकार, कमनीय, मनोहर, शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी,
गणपतिखण्ड ३२९
पीताम्बरसे सुशोभित, रूपका ध्यान करते हैं और आपके भक्तगण परमोत्कृष्ट, कमनीय, दो भुजावाले, सुन्दर, किशोर-अवस्थावाले, श्यामसुन्दर, शान्त, गोपीनाथ तथा रत्नाभरणोंसे विभूषित रूपका निरन्तर हर्षपूर्वक सेवन करते हैं। योगीलोग भी जिस रूपका ध्यान करते हैं, वह भी उस तेजस्वी रूपके अतिरिक्त और क्या है? देव! प्राचीनकालमें जब असुरोंका वध करनेके लिये ब्रह्माजीने मेरा स्तवन किया, तब मैं आपके उस तेजको धारण करनेवाले देवताओंके तेजसे प्रकट हुई। विभो! मैं अविनाशिनी तथा तेजःस्वरूपा हूँ। उस समय मैं शरीर धारण करके रमणीय रमणीरूप बनाकर वहाँ उपस्थित हुई। तत्पश्चात् आपकी मायास्वरूपा मैंने उन असुरोंको मायाद्वारा मोहित कर लिया और फिर उन सबको मारकर मैं शैलराज हिमालयपर चली गयी। तदनन्तर तारकाक्षद्वारा पीड़ित हुए देवताओंने जब मेरी सम्यक् प्रकारसे स्तुति की, तब मैं उस जन्ममें दक्ष-पत्नीके गर्भसे उत्पन्न होकर शिवजीकी भार्या हुई और दक्षके यज्ञमें शिवजीकी निन्दा होनेके कारण मैंने उस शरीरका परित्याग कर दिया। फिर मैंने ही शैलराजके कर्मोंके परिणामस्वरूप हिमालयकी पत्नीके गर्भसे जन्म धारण किया। इस जन्ममें भी अनेक प्रकारकी तपस्याके फलस्वरूप शिवजी मुझे प्राप्त हुए और ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे उन सर्वव्यापी योगीने मेरा पाणिग्रहण किया; परंतु देवमायावश मुझे उनके शृङ्गारजन्य तेजकी प्राप्ति नहीं हुई। परमेश्वर! इसी कारण पुत्र-दुःखसे दुःखी होकर मैं आपका स्तवन कर रही हूँ और इस समय आपके सदृश पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ; परंतु अङ्गोंसहित वेदमें आपने ऐसा विधान बना रखा है कि इस व्रतमें अपने स्वामीकी दक्षिणा दी जाती है (जो बड़ा दुष्कर कार्य है)। कृपासिन्धो! यह सब सुनकर आपको मुझपर कृपा करनी चाहिये।
नारद! वहाँ ऐसा कहकर पार्वती चुप हो गयीं। जो मनुष्य मनको पूर्णतया एकाग्र करके भारतवर्षमें इस पार्वतीकृत स्तोत्रको सुनता है, उसे निश्चय ही विष्णुके समान पराक्रमी उत्तम पुत्रकी प्राप्ति होती है। जो वर्षभरतक हविष्यान्नका भोजन करके भक्तिभावसे श्रीहरिकी अर्चना करता है, वह इस उत्तम पुण्यक-व्रतके फलको पाता है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। ब्रह्मन्! यह विष्णुका स्तवन सम्पूर्ण सम्पत्तियोंकी वृद्धि करनेवाला, सुखदायक, मोक्षप्रद, साररूप, स्वामीके सौभाग्यका वर्धक, सम्पूर्ण सौन्दर्यका बीज, यशकी राशिको बढ़ानेवाला, हरि-भक्तिका दाता और तत्त्वज्ञान तथा बुद्धिकी विशेषरूपसे उन्नति करनेवाला है।*
(अध्याय ७)
* पार्वत्युवाच—
कृष्ण जानासि मां भद्र नाहं त्वां ज्ञातुमीश्वरी। के वा जानन्ति वेदज्ञा वेदा वा वेदकारकाः॥
त्वदंशास्त्वां न जानन्ति कथं ज्ञास्यन्ति त्वत्कलाः। त्वं चापि तत्त्वं जानासि किमन्ये ज्ञातुमीश्वराः॥
सूक्ष्मात् सूक्ष्मतमोऽव्यक्तः स्थूलात् स्थूलतमो महान्। विश्वस्त्वं विश्वरूपश्च विश्वबीजं सनातनः॥
कार्यं त्वं कारणं त्वं च कारणानां च कारणम्। तेजःस्वरूपो भगवान् निराकारो निराश्रयः॥
निर्लिप्तो निर्गुणः साक्षी स्वात्मारामः परात्परः।
प्रकृतीशो विराड्बीजं विराड्रूपस्त्वमेव च। सगुणस्त्वं प्राकृतिकः कलया सृष्टिहेतवे॥
प्रकृतिस्त्वं पुमांस्त्वं च वेदान्यो न क्वचिद् भवेत्। जीवस्त्वं साक्षिणो भोगी स्वात्मनः प्रतिबिम्बकः॥
कर्म त्वं कर्मबीजं त्वं कर्मणां फलदायकः।
ध्यायन्ति योगिनस्तेजस्त्वदीयशरीरिणम्। केचिच्चतुर्भुजं शान्तं लक्ष्मीकान्तं मनोहरम्॥
वैष्णवाश्चैव साकारं कमनीयं मनोहरम्। शङ्खचक्रगदापद्मधरं पीताम्बरं परम्॥
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पार्वतीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए श्रीकृष्णका पार्वतीको अपने रूपके दर्शन कराना, वर प्रदान करना और बालकरूपसे उनकी शय्यापर खेलना
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! पार्वतीद्वारा किये गये उस स्तवनको सुनकर करुणानिधि श्रीकृष्णने पार्वतीको अपने उस स्वरूपके, जो सबके लिये अदृश्य और परम दुर्लभ है, दर्शन कराये। उस समय पार्वतीदेवी स्तुति करके अपने मनको एकमात्र श्रीकृष्णमें लगाकर ध्यानमें संलग्न थीं। उन्होंने उस तेजोराशिके मध्य सबको मोहित करनेवाले श्रीकृष्णके स्वरूपका दर्शन किया। वह एक रत्नपूर्ण मनोरम आसनपर, जो बहुमूल्य रत्नोंका बना हुआ था, जिसमें हीरे जड़े हुए थे और जो मणियोंकी मालाओंसे शोभित था, विराजमान था। उसके शरीरपर पीताम्बर सुशोभित था, हाथमें वंशी शोभा दे रही थी। गलेमें वनमालाकी निराली छटा थी। शरीरका रंग श्याम था। रत्नोंके आभूषण उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसकी किशोर-अवस्था तथा वेश-भूषा विचित्र थी। उसके ललाटपर चन्दनकी खौर लगी थी।
मुखपर मनोहर मुस्कान खेल रही थी। वह वन्दनीय स्वरूप शरद्-ऋतुके चन्द्रमाका उपहासक तथा मालतीकी मालाओंसे युक्त था। उसके मस्तकपर मयूरपिच्छकी अनोखी छवि थी। गोपाङ्गनाएँ उसे घेरे हुए थीं। वह राधाके वक्षःस्थलको उद्भासित कर रहा था, उसकी लावण्यता करोड़ों कामदेवोंको मात कर रही थी, वही लीलाका धाम, मनोहर, अत्यन्त प्रसन्न, सबका प्रेमपात्र और भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाला था। ऐसे उस रूपको देखकर सुन्दरी पार्वतीने मन-ही-मन उसीके अनुरूप पुत्रकी कामना की और उसी क्षण उन्हें वह वर प्राप्त भी हो गया। इस प्रकार वरदानी परमात्माने पार्वतीके मनमें जिस-जिस वस्तुकी कामना थी, उसे पूर्ण करके देवताओंका भी अभीष्ट सिद्ध किया। तत्पश्चात् यह तेज अन्तर्धान हो गया। तब देवताओंने कृपापरवश हो सनत्कुमारको समझाया और
द्विभुजं कमनीयं च किशोरं श्यामसुन्दरम्। शान्तं गोपाङ्गनाकान्तं रत्नभूषणभूषितम्॥
एवं तेजस्विनं भक्ताः सेवन्ते सततं मुदा। ध्यायन्ति योगिनो यत् तत् कुतस्तेजस्विनं विना॥
तत् तेजो बिभ्रतां देव देवानां तेजसा पुरा। आविर्भूतासुराणां च वधाय ब्रह्मणः स्तुता॥
नित्या तेजःस्वरूपांहं विधृत्य विग्रहं विभो। स्त्रीरूपं कमनीयं च विधाय समुपस्थिता॥
मायया तव मायाहं मोहयित्वासुरान् पुरा। निहत्य सर्वान् शैलेन्द्रमगमं तं हिमाचलम्॥
ततोऽहं संस्तुता देवैस्तारकाक्षेण पीडितैः। अभवं दक्षजायायां शिवस्त्री तत्र जन्मनि॥
त्यक्त्वा देहं दक्षयज्ञे शिवाहं शिवनिन्दया। अभवं शैलजायायां शैलाधीशस्य कर्मणा।
अनेकतपसा प्राप्तः शिवश्चात्रापि जन्मनि। पाणिं जग्राह मे योगी प्रार्थितो ब्रह्मणा विभुः॥
शृङ्गारजं च तत्तेजो नालभं देवमायया। स्तौमि त्वामेव तेनेश पुत्रदुःखेन दुःखिता॥
व्रते भवद्विधं पुत्रं लब्धुमिच्छामि साम्प्रतम्। देवेन विहिता वेदे साङ्गे स्वस्वामिदक्षिणा॥
श्रुत्वा सर्वं कृपासिन्धो कृपां मां कर्तुमर्हसि। इत्युक्त्वा पार्वती तत्र विरराम च नारद॥
भारते पार्वतीस्तोत्रं यः शृणोति सुसंयतः। सत्पुत्रं लभते नूनं विष्णुतुल्यपराक्रमम्॥
संवत्सरं हविष्याशी हरिमभ्यर्च्य भक्तितः। सुपुण्यकव्रतफलं लभते नात्र संशयः॥
विष्णुस्तोत्रमिदं ब्रह्मन् सर्वसम्पत्तिवर्धनम्। सुखदं मोक्षदं सारं स्वामिसौभाग्यवर्धनम्॥
सर्वसौन्दर्यबीजं च यशोराशिविवर्धनम्। हरिभक्तिप्रदं तत्त्वज्ञानबुद्धिविवर्धनम्॥
(गणपतिखण्ड ७।१०९–१३१)
५०- पार्वतीजीके कहनेपर शनैश्चरका गणेशपर दृष्टिपात करना तथा शिशुके मस्तकका धड़से अलग हो जाना
गणपतिखण्ड ३३१
उन्होंने उन उमारहित दिगम्बर शिवको प्रसन्नचित्तवाली पार्वतीको लौटा दिया। फिर तो विश्वको आनन्दित करनेवाली दुर्गाने ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके रत्न तथा भिक्षुओं और वन्दियोंको सुवर्ण दान किये। ब्राह्मणों, देवताओं तथा पर्वतोंको भोजन कराया। सर्वोत्तम उपहारोंद्वारा शंकरजीकी पूजा की, बाजा बजवाया, माङ्गलिक कार्य कराये और श्रीहरिसे सम्बन्ध रखनेवाले सुन्दर गीत गवाये। इस प्रकार दुर्गाने व्रतको समाप्त करके परम उल्लासके साथ दान देकर सबको भोजन कराया। तत्पश्चात् अपने स्वामी शिवजीके साथ स्वयं भी भोजन किया। इसके बाद उत्तम पानके सुन्दर बीड़े, जो कपूर आदिसे सुवासित थे, क्रमशः सबको देकर कौतुकवश शिवजीके साथ स्वयं भी खाया। तदनन्तर पार्वतीदेवी एकान्तमें भगवान् शंकरके साथ विहार करने लगीं। इसी बीचमें एक ब्राह्मण दरवाजेपर आया। मुने! उस भिक्षुक ब्राह्मणका रूप तैलाभावके कारण रूखा था, शरीर मैले वस्त्रसे आच्छादित था, उसके दाँत अत्यन्त स्वच्छ थे, वह तृष्णासे पूर्णतया पीड़ित था, उसका शरीर कृश था, वह उज्ज्वल वर्णका तिलक धारण किये हुए था, उसका स्वर बहुत दीन था और दीनताके कारण उसकी मूर्ति कुत्सित थी। इस प्रकारके उस अत्यन्त वृद्ध तथा दुर्बल ब्राह्मणने अन्नकी याचना करनेके लिये दरवाजेपर डंडेके सहारे खड़े होकर महादेवजीको पुकारा।
ब्राह्मणने कहा—महादेव! आप क्या कर रहे हैं? मैं सात राततक चलनेवाले व्रतके समाप्त होनेपर भूखसे व्याकुल होकर भोजनकी इच्छासे आपकी शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये। हे तात! आप तो करुणाके सागर हैं, अतः मुझ जराग्रस्त तथा तृष्णासे अत्यन्त पीड़ित वृद्धकी ओर दृष्टि डालिये। अरे ओ महादेव! आप क्या कर रहे हैं ? माता पार्वती! उठो और मुझे सुवासित जल तथा अन्न प्रदान करो। गिरिराजकुमारी! मुझ शरणागतकी रक्षा करो। माता! ओ माता! तुम तो जगत्की माता हो, फिर मैं जगत्से बाहर थोड़े ही हूँ; अतः शीघ्र आओ। भला, अपनी माताके रहते हुए मैं किस कारण तृष्णासे पीड़ित हो रहा हूँ? ब्राह्मणकी दीन वाणी सुनकर शिव-पार्वती उठे। इसी समय शिवजीका शुक्रपात हो गया। वे पार्वतीके साथ द्वारपर आये। वहाँ उन्होंने उस वृद्ध तथा दीन ब्राह्मणको देखा जो वृद्ध-अवस्थासे अत्यन्त पीड़ित था। उसके शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी थीं। वह डंडा लिये हुए था और उसकी कमर झुक गयी थी। वह तपस्वी होते हुए भी अशान्त था। उसके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे और वह बड़ी शक्ति लगाकर उन दोनोंको प्रणाम तथा उनका स्तवन कर रहा था। उसके अमृतसे भी उत्तम वचन सुनकर नीलकण्ठ महादेवजी प्रसन्न हो गये। तब वे मुस्कराकर परम प्रेमके साथ उससे बोले।
शंकरजीने कहा—वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर! इस समय मैं यह जानना चाहता हूँ कि आपका घर कहाँ है और आपका नाम क्या है? इसे शीघ्र बतलाइये।
पार्वतीजी बोलीं—विप्रवर! कहाँसे आपका आगमन हुआ है? मेरा परम सौभाग्य था जो आप यहाँ पधारे। आप ब्राह्मण अतिथि होकर मेरे घरपर आये हैं, अतः आज मेरा जन्म सफल हो गया। द्विजश्रेष्ठ! अतिथिके शरीरमें देवता, ब्राह्मण और गुरु निवास करते हैं; अतः जिसने अतिथिका आदर-सत्कार कर लिया, उसने मानो तीनों लोकोंकी पूजा कर ली। अतिथिके चरणोंमें सभी तीर्थ सदा वर्तमान रहते हैं, अतः अतिथिके चरण-प्रक्षालनके जलसे निश्चय ही गृहस्थको तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। जिसने अपनी शक्तिके अनुसार यथोचितरूपसे अतिथिकी पूजा कर ली, उसने मानो सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया तथा सभी यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली। जिसने
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भारतवर्षमें भक्तिपूर्वक अतिथिका पूजन कर लिया, उसके द्वारा मानो भूतलपर सम्पूर्ण महादान कर लिये गये; क्योंकि वेदोंमें वर्णित जो नाना प्रकारके पुण्य हैं, वे तथा उनके अतिरिक्त अन्य पुण्यकर्म भी अतिथि-सेवाकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। इसलिये जिसके घरसे अतिथि अनादृत होकर लौट जाता है, उस गृहस्थके पितर, देवता, अग्नि और गुरुजन भी तिरस्कृत हो उस अतिथिके पीछे चले जाते हैं। जो अपने अभीष्ट अतिथिकी अर्चना नहीं करता, वह बड़े-बड़े पापोंको प्राप्त करता है।
ब्राह्मणने कहा— वेदज्ञे! आप तो वेदोंके ज्ञानसे सम्पन्न हैं, अतः वेदोक्त विधिसे पूजन कीजिये। माता! मैं भूख-प्याससे पीड़ित हूँ। मैंने श्रुतियोंमें ऐसा वचन भी सुना है कि जब मनुष्य व्याधियुक्त, आहाररहित अथवा उपवास-व्रती होता है, तब वह स्वेच्छानुसार भोजन करना चाहता है।
पार्वतीजीने पूछा— विप्रवर! आप क्या भोजन करना चाहते हैं? वह यदि त्रिलोकीमें परम दुर्लभ होगा तो भी आज मैं आपको खिलाऊँगी। आप मेरा जन्म सफल कीजिये।
ब्राह्मणने कहा— सुव्रते! मैंने सुना है कि उत्तम व्रतपरायणा आपने पुण्यक-व्रतमें सभी प्रकारका भोजन एकत्रित किया है, अतः उन्हीं अनेक प्रकारके मिष्ठान्नोंको खानेके लिये मैं आया हूँ। मैं आपका पुत्र हूँ। जो मिष्ठान्न तीनों लोकोंमें दुर्लभ हैं, उन पदार्थोंको मुझे देकर आप सबसे पहले मेरी पूजा करें। साध्वि! वेदवादियोंका कथन है कि पिता पाँच प्रकारके होते हैं। माताएँ अनेक तरहकी कही जाती हैं और पुत्रके पाँच भेद हैं। विद्यादाता (गुरु), अन्नदाता, भयसे रक्षा करनेवाला, जन्मदाता (पिता) और कन्यादाता (श्वशुर)—ये मनुष्योंके वेदोक्त पिता कहे गये हैं। गुरुपत्नी, गर्भधात्री (जननी), स्तनदात्री (धाय), पिताकी बहिन (बुआ), माताकी बहिन (मौसी), माताकी सपत्नी (सौतेली माता), अन्न प्रदान करनेवाली (पाचिका) और पुत्रवधू—ये माताएँ कहलाती हैं। भृत्य, शिष्य, दत्तक, वीर्यसे उत्पन्न (औरस) और शरणागत—ये पाँच प्रकारके पुत्र हैं। इनमें चार धर्मपुत्र कहलाते हैं और पाँचवाँ औरस पुत्र धनका भागी होता है*। माता! मैं आप पुत्रहीनाका ही अनाथ पुत्र हूँ, वृद्धावस्थासे ग्रस्त हूँ और इस समय भूख-प्याससे पीड़ित होकर आपकी शरणमें आया हूँ। गिरिराजकिशोरी! अन्नोंमें श्रेष्ठ पूड़ी, उत्तम-उत्तम पके फल, आटेके बने हुए नाना प्रकारके पदार्थ, काल-देशानुसार उत्पन्न हुई वस्तुएँ, पक्वान्न, चावलके आटेका बना हुआ तिकोना पदार्थविशेष, दूध, गन्ना, गुड़के बने हुए द्रव्य, घी, दही, अगहनीका भात, घृतमें पका हुआ व्यञ्जन, गुड़मिश्रित तिलोंके लड्डू, मेरी जानकारीसे बाहर सुधा-तुल्य अन्य वस्तुएँ, कर्पूर आदिसे सुवासित सुन्दर श्रेष्ठ ताम्बूल, अत्यन्त निर्मल तथा स्वादिष्ट जल—इन सभी सुवासित पदार्थोंको, जिन्हें खाकर मेरी सुन्दर तोंद हो जाय, मुझे प्रदान कीजिये।
आपके स्वामी सारी सम्पत्तियोंके दाता तथा त्रिलोकीके सृष्टिकर्ता हैं और आप सम्पूर्ण ऐश्वर्योंको प्रदान करनेवाली महालक्ष्मीस्वरूपा हैं; अतः आप मुझे रमणीय रत्नसिंहासन, अमूल्य रत्नोंके आभूषण, अग्निशुद्ध सुन्दर वस्त्र, अत्यन्त दुर्लभ श्रीहरिका मन्त्र, श्रीहरिमें सुदृढ़ भक्ति,
* विद्यादातान्नदाता च भयत्राता च जन्मदः। कन्यादाता च वेदोक्ता नराणां पितरः स्मृताः॥
गुरुपत्नी गर्भधात्री स्तनदात्री पितुः स्वसा। स्वसा मातुः सपत्नी च पुत्रभार्यान्नदायिका॥
भृत्यः शिष्यश्च पोष्यश्च वीर्यजः शरणागतः। धर्मपुत्राश्च चत्वारो वीर्यजो धनभागिति॥
(गणपतिखण्ड ८। ४७–४९)
गणपतिखण्ड
३३३
मृत्युञ्जय नामक ज्ञान, सुखप्रदायिनी दानशक्ति और सर्वसिद्धि दीजिये। सतीमाता! आप ही सदा श्रीहरिकी प्रिया तथा सर्वस्व प्रदान करनेवाली शक्ति हैं; अतः अपने पुत्रके लिये आपको कौन-सी वस्तु अदेय है? मैं उत्तम धर्म और तपस्यामें लगे हुए मनको अत्यन्त निर्मल करके सारा कार्य करूँगा, परंतु जन्महेतुक कामनाओंमें नहीं लगूँगा; क्योंकि मनुष्य अपनी इच्छासे कर्म करता है, कर्मसे भोगकी प्राप्ति होती है। वे भोग शुभ और अशुभ दो प्रकारके होते हैं और वे ही दोनों सुख-दुःखके हेतु हैं। जगदम्बिके! न किसीसे दुःख होता है न सुख, सब अपने कर्मका ही भोग है; इसलिये विद्वान् पुरुष कर्मसे विरत हो जाते हैं। सत्पुरुष निरन्तर आनन्दपूर्वक बुद्धिद्वारा हरिका स्मरण करनेसे, तपस्यासे तथा भक्तोंके सङ्गसे कर्मको ही निर्मूल कर देते हैं; क्योंकि इन्द्रिय और उनके विषयोंके संयोगसे उत्पन्न हुआ सुख तभीतक रहता है, जबतक उनका नाश नहीं हो जाता, परंतु हरिकीर्तनरूप सुख सब कालमें वर्तमान रहता है।
सतीदेवि! हरिध्यानपरायण भक्तोंकी आयु नष्ट नहीं होती; क्योंकि काल तथा मृत्युञ्जय उनपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते—यह ध्रुव है। वे चिरजीवी भक्त भारतवर्षमें चिरकालतक जीवित रहते हैं और सम्पूर्ण सिद्धियोंका ज्ञान प्राप्त करके स्वच्छन्दतापूर्वक सर्वत्रगामी होते हैं। हरिभक्तोंको पूर्वजन्मका स्मरण बना रहता है। वे अपने करोड़ों जन्मोंको जानते हैं और उनकी कथाएँ कहते हैं; फिर आनन्दके साथ स्वेच्छानुसार जन्म धारण करते हैं। वे स्वयं तो पवित्र होते ही हैं, अपनी लीलासे दूसरोंको तथा तीर्थोंको पवित्र कर देते हैं। इस पुण्यक्षेत्र भारतमें वे परोपकार और सेवाके लिये भ्रमण करते रहते हैं। वे वैष्णव जिस तीर्थमें गोदोहन-कालमात्र भी ठहर जाते हैं तो उनके चरणस्पर्शसे वसुन्धरा तत्काल ही पवित्र हो जाती है। जिन मनुष्योंको भक्तोंका दर्शन अथवा आलिङ्गन प्राप्त हो जाता है, वे मानो समस्त तीर्थोंमें भ्रमण कर चुके और उन्हें सम्पूर्ण यज्ञोंकी दीक्षा मिल चुकी। जैसे सब कुछ भक्षण करनेपर भी अग्नि और समस्त पदार्थोंका स्पर्श करनेपर भी वायु दूषित नहीं कहे जाते, उसी प्रकार निरन्तर हरिमें चित्त लगानेवाले भक्त पापोंसे लिप्त नहीं होते। करोड़ों जन्मोंके अन्तमें मनुष्य-जन्म मिलता है। फिर मनुष्य-योनिमें बहुत-से जन्मोंके बाद उसे भक्तोंका सङ्ग प्राप्त होता है।
सती पार्वति! भक्तोंके सङ्गसे प्राणियोंके हृदयमें भक्तिका अंकुर उत्पन्न होता है और भक्तिहीनोंके दर्शनसे वह सूख जाता है। पुनः वैष्णवोंके साथ वार्तालाप करनेसे वह प्रफुल्लित हो उठता है। तत्पश्चात् वह अविनाशी अंकुर प्रत्येक जन्ममें बढ़ता रहता है। सती! वृद्धिको प्राप्त होते हुए उस वृक्षका फल हरिकी दासता है। इस प्रकार भक्तिके परिपक्व हो जानेपर परिणाममें वह श्रीहरिका पार्षद हो जाता है। फिर तो महाप्रलयके अवसरपर ब्रह्मा, ब्रह्मलोक तथा सम्पूर्ण सृष्टिका संहार हो जानेपर भी निश्चय ही उसका नाश नहीं होता। अम्बिके! इसलिये मुझे सदा नारायणके चरणोंमें भक्ति प्रदान कीजिये; क्योंकि विष्णुमाये! आपके बिना विष्णुमें भक्ति नहीं प्राप्त होती। आपकी तपस्या और पूजन तो लोकशिक्षाके लिये हैं; क्योंकि आप नित्यस्वरूपा सनातनी देवी हैं और समस्त कर्मोंका फल प्रदान करनेवाली हैं। प्रत्येक कल्पमें श्रीकृष्ण गणेशरूपसे आपके पुत्र बनकर आपकी गोदमें आते हैं।
यों कहकर वे ब्राह्मण तुरंत ही अन्तर्धान हो गये। वे परमेश्वर इस प्रकार अन्तर्हित होकर बालरूप धारण करके महलके भीतर स्थित पार्वतीकी शय्यापर जा पहुँचे और जन्मे हुए बालककी भाँति घरकी छतके भीतरी भागकी ओर देखने लगे। उस बालकके शरीरकी आभा
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शुद्ध चम्पकके समान थी। उसका प्रकाश करोड़ों चन्द्रमाओंकी भाँति उद्दीप्त था। सब लोग सुखपूर्वक उसकी ओर देख सकते थे। वह नेत्रोंकी ज्योति बढ़ानेवाला था। कामदेवको विमोहित करनेवाला उसका अत्यन्त सुन्दर शरीर था। उसका अनुपम मुख शारदीय पूर्णिमाका उपहास कर रहा था। सुन्दर कमलको तिरस्कृत करनेवाले उसके सुन्दर नेत्र थे। ओष्ठ और अधरपुट ऐसे लाल थे कि उसे देखकर पका हुआ बिम्बाफल भी लज्जित हो जाता था। कपाल और कपोल परम मनोहर थे। गरुड़के चोंचकी भी निन्दा करनेवाली रुचिर नासिका थी। उसके सभी अङ्ग उत्तम थे। त्रिलोकीमें कहीं उसकी उपमा नहीं थी। इस प्रकार वह रमणीय शय्यापर सोया हुआ शिशु हाथ-पैर उछाल रहा था।
(अध्याय ८)
श्रीहरिके अन्तर्धान हो जानेपर शिव-पार्वतीद्वारा ब्राह्मणकी खोज, आकाशवाणीके सूचित करनेपर पार्वतीका महलमें जाकर पुत्रको देखना और शिवजीको बुलाकर दिखाना, शिव-पार्वतीका पुत्रको गोदमें लेकर आनन्द मनाना
श्रीनारायण कहते हैं—मुने! इस प्रकार जब श्रीहरि अन्तर्धान हो गये, तब दुर्गा और शंकर ब्राह्मणकी खोज करते हुए चारों ओर घूमने लगे।
उस समय पार्वतीजी कहने लगीं—हे विप्रवर! आप तो अत्यन्त वृद्ध और भूखसे व्याकुल थे। हे तात! आप कहाँ चले गये? विभो! मुझे दर्शन दीजिये और मेरे प्राणोंकी रक्षा कीजिये। शिवजी! शीघ्र उठिये और उन ब्राह्मणदेवकी खोज कीजिये। वे क्षणमात्रके लिये उदास मनवाले हमलोगोंके सामने आये थे। परमेश्वर! यदि भूखसे पीड़ित अतिथि गृहस्थके घरसे अपूजित होकर चला जाता है तो क्या उस गृहस्थका जीवन व्यर्थ नहीं हो जाता? यहाँतक कि उसके पितर उसके द्वारा दिये गये पिण्डदान और तर्पणको नहीं ग्रहण करते तथा अग्नि उसकी दी हुई आहुति और देवगण उसके द्वारा निवेदित पुष्प एवं जल नहीं स्वीकार करते। उस अपवित्रका हव्य, पुष्प, जल और द्रव्य—सभी मदिराके तुल्य हो जाता है। उसका शरीर मल-सदृश और स्पर्श पुण्यनाशक हो जाता है।
इसी बीच वहाँ आकाशवाणी हुई, जिसे शोकसे आतुर तथा विकलतासे युक्त दुर्गाने सुना। (आकाशवाणीने कहा—) जगन्माता! शान्त हो जाओ और मन्दिरमें अपने पुत्रकी ओर दृष्टिपात करो। वह साक्षात् गोलोकाधिपति परिपूर्णतम परात्पर श्रीकृष्ण है तथा सुपुण्यक-व्रतरूपी वृक्षका सनातन फल है। योगी लोग जिस अविनाशी तेजका प्रसन्नमनसे निरन्तर ध्यान करते हैं; वैष्णवगण तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता जिसके ध्यानमें लीन रहते हैं; प्रत्येक कल्पमें जिस पूजनीयकी सर्वप्रथम पूजा होती है, जिसके स्मरणमात्रसे समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं, तथा जो पुण्यकी राशिस্বরূপ है, मन्दिरमें विराजमान अपने उस पुत्रकी ओर तो दृष्टि डालो। प्रत्येक कल्पमें तुम जिस सनातन ज्योति रूपका ध्यान करती हो, वही तुम्हारा पुत्र है। यह मुक्तिदाता तथा भक्तोंके अनुग्रहका मूर्त रूप है। जरा उसकी ओर तो निहारो। जो तुम्हारी कामनापूर्तिका बीज, तपरूपी कल्पवृक्षका फल और लावण्यतामें करोड़ों कामदेवोंकी निन्दा करनेवाला है, अपने उस सुन्दर पुत्रको देखो। दुर्गे! तुम क्यों विलाप कर रही हो? अरे, यह क्षुधातुर ब्राह्मण नहीं है, यह तो विप्रवेषमें जनार्दन
गणपतिखण्ड ३३५
हैं। अब कहाँ वह वृद्ध और कहाँ वह अतिथि ? नारद! यों कहकर सरस्वती चुप हो गयीं।
तब उस आकाशवाणीको सुनकर सती पार्वती भयभीत हो अपने महलमें गयीं। वहाँ उन्होंने पलंगपर सोये हुए बालकको देखा। वह आनन्दपूर्वक मुस्कराते हुए महलकी छतके भीतरी भागको निहार रहा था। उसकी प्रभा सैकड़ों चन्द्रमाओंके तुल्य थी। वह अपने प्रकाशसमूहसे भूतलको प्रकाशित कर रहा था। हर्षपूर्वक स्वेच्छानुसार इधर-उधर देखते हुए शय्यापर उछल-कूद रहा था और स्तनपानकी इच्छासे रोते हुए ‘उमा’ ऐसा शब्द कर रहा था। उस अद्भुत रूपको देखकर सर्वमङ्गला पार्वती त्रस्त हो शंकरजीके संनिकट गयीं और उन प्राणेश्वरसे मङ्गल-वचन बोलीं।
पार्वतीने कहा—प्राणपति! घर चलिये और मन्दिरके भीतर चलकर प्रत्येक कल्पमें आप जिसका ध्यान करते हैं तथा जो तपस्याका फलदाता है, उसे देखिये। जो पुण्यका बीज, महोत्सवस्वरूप, ‘पुत्’ नामक नरकसे रक्षा करनेका कारण और भवसागरसे पार करनेवाला है, शीघ्र ही उस पुत्रके मुखका अवलोकन कीजिये; क्योंकि समस्त तीर्थोंमें स्नान तथा सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा-ग्रहणका पुण्य इस पुत्रदर्शनके पुण्यकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकता। सर्वस्व दान कर देनेसे जो पुण्य होता है तथा पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करनेसे जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, वे सभी इस पुत्रदर्शन जन्य पुण्यके सोलहवें अंशके भी बराबर नहीं हैं।
पार्वतीके ये वचन सुनकर शिवजीका मन हर्षमग्न हो गया। वे तुरंत ही अपनी प्रियतमाके साथ अपने घर आये। वहाँ उन्होंने शय्यापर अपने पुत्रको देखा। उसकी कान्ति तपाये हुए स्वर्णके समान उद्दीप्त थी। (फिर सोचने लगे—) मेरे हृदयमें जो अत्यन्त मनोहर रूप विद्यमान था, यह तो वही है। तत्पश्चात् दुर्गाने उस पुत्रको शय्यापरसे उठा लिया और उसे छातीसे लगाकर वे उसका चुम्बन करने लगीं। उस समय वे आनन्द-सागरमें निमग्न होकर यों कहने लगीं—‘बेटा! जैसे दरिद्रका मन सहसा उत्तम धन पाकर संतुष्ट हो जाता है, उसी तरह तुझ सनातन अमूल्य रत्नकी प्राप्तिसे मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया। जैसे चिरकालसे प्रवासी हुए प्रियतमके घर लौटनेपर स्त्रीका मन पूर्णतया हर्षमग्न हो जाता है, वही दशा मेरे मनकी भी हो रही है। वत्स! जैसे एक पुत्रवाली माता चिरकालसे बाहर गये हुए अपने इकलौते पुत्रको आया हुआ देखकर परितुष्ट होती है, वैसे ही इस समय मैं भी संतुष्ट हो रही हूँ। जैसे मनुष्य चिरकालसे नष्ट हुए उत्तम रत्नको तथा अनावृष्टिके समय उत्तम वृष्टिको पाकर हर्षसे फूल उठता है, उसी प्रकार तुझ पुत्रको पाकर मैं भी हर्ष-गद्गद हो रही हूँ। जैसे चिरकालके पश्चात् आश्रयहीन अंधेका मन परम निर्मल नेत्रकी प्राप्तिसे प्रसन्न हो जाता है, वही अवस्था (तुझे पाकर) मेरे मनकी भी हो रही है। जैसे दुस्तर अगाध सागरमें गिरे हुए अथवा विपत्तिमें फँसे हुए नौका आदि
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साधनविहीन मनुष्यका मन नौकाको पाकर आनन्दसे भर जाता है, वैसे ही मेरा मन भी आनन्दित हो रहा है। जैसे प्याससे सूखे हुए कण्ठवाले मनुष्योंका मन चिरकालके पश्चात् अत्यन्त शीतल एवं सुवासित जलको पाकर प्रसन्न हो जाता है, वही दशा मेरे मनकी भी है। जैसे दावाग्निसे घिरे हुएको अग्निरहित स्थान और आश्रयहीनको आश्रय मिल जानेसे मनकी इच्छा पूरी हो जाती है, उसी प्रकार मेरी भी इच्छापूर्ति हो रही है। चिरकालसे व्रतोपवास करनेवाले भूखे मनुष्योंका मन जैसे सामने उत्तम अन्न देखकर प्रसन्न हो उठता है, उसी तरह मेरा मन भी हर्षित हो रहा है।' यों कहकर पार्वती ने अपने बालकको गोदमें लेकर प्रेमके साथ उसके मुखमें अपना स्तन दे दिया। उस समय उनका मन परमानन्दमें निमग्न हो रहा था। तत्पश्चात् भगवान् शंकरने भी प्रसन्नमनसे उस बालकको अपनी गोदमें उठा लिया।
(अध्याय ९)
शिव, पार्वती तथा देवताओंद्वारा अनेक प्रकारका दान दिया जाना, बालकको देवताओं एवं देवियोंका शुभाशीर्वाद और इस मङ्गलाध्यायके श्रवणका फल
श्रीनारायणजी कहते हैं—नारद ! तदनन्तर उन दोनों पति-पत्नी—शिव-पार्वती ने बाहर जाकर पुत्रकी मङ्गलकामनासे हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न दान किये तथा भिक्षुओं और वन्दियोंको विभिन्न प्रकारकी वस्तुएँ बाँटीं। उस अवसरपर शंकरजीने अनेक प्रकारके बाजे बजवाये। हिमालयने ब्राह्मणोंको एक लाख रत्न, एक हजार श्रेष्ठ हाथी, तीन लाख घोड़े, दस लाख गौएँ, पाँच लाख स्वर्णमुद्राएँ तथा और भी जो मुक्ता, हीरे और रत्न आदि श्रेष्ठ मणियाँ थीं, वे सभी दान कीं। इसके अतिरिक्त दूसरे प्रकारके भी दान—जैसे वस्त्र, आभूषण और क्षीरसागरसे उत्पन्न सभी तरहके अमूल्य रत्न आदि दिये। कौतुकी विष्णुने ब्राह्मणोंको कौस्तुभमणिका दान दिया। ब्रह्माने हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको ऐसी विशिष्ट वस्तुएँ दान कीं जो सृष्टिमें परम दुर्लभ थीं तथा वे ब्राह्मण जिन्हें पाना चाहते थे। इसी तरह धर्म, सूर्य, इन्द्र, देवगण, मुनिगण, गन्धर्व, पर्वत तथा देवियोंने क्रमशः दान दिये। ब्रह्मन् ! उस अवसरपर क्षीरसागरने हर्षित होकर कौतुकवश एक हजार माणिक्य, एक सौ कौस्तुभमणि, एक सौ हीरक, एक सहस्र हरे रंगकी श्रेष्ठ मणियाँ, एक लाख गो-रत्न, एक सहस्र गज-रत्न, श्वेतवर्णके अन्यान्य अमूल्य रत्न, एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ और अग्निमें तपाकर शुद्ध किये हुए वस्त्र ब्राह्मणोंको प्रदान किये। सरस्वतीदेवीने अमूल्य रत्नोंका बना हुआ एक ऐसा हार दिया, जो तीनों लोकोंमें दुर्लभ था। वह अत्यन्त निर्मल, साररूप और अपनी प्रभासे सूर्यके प्रकाशकी निन्दा करनेवाला, मणिजटित और हीरेके नगोंसे सुशोभित था। उस रमणीय हारके मध्यमें कौस्तुभमणि पिरोयी हुई थी। सावित्रीने हर्षित होकर एक बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित त्रिलोकीका साररूप हार और सब तरहके आभूषण प्रदान किये। आनन्दमग्न कुबेरने एक लाख सोनेकी सिलें, अनेक प्रकारके धन और एक सौ अमूल्य रत्न दान किये। मुने ! शिवपुत्रके जन्मोत्सवमें उपस्थित सभी लोगोंने इस प्रकार ब्राह्मणोंको दान देकर तत्पश्चात् उस शिशुका दर्शन किया। उस समय वे सब परमानन्दमें निमग्न थे। मुने ! उस दानमें ब्राह्मणों तथा वन्दियोंको इतना धन मिला था कि वे उसका भार ढोनेमें असमर्थ थे, इसलिये बोझसे घबराकर मार्गमें ठहर-ठहरकर चलते थे। वे सभी विश्राम कर चुकनेपर पूर्वकालके दाताओंकी कथाएँ कहते थे, जिसे वृद्ध एवं युवा भिक्षुक प्रेमपूर्वक सुनते थे।
गणपतिखण्ड ३३७
नारद! उस अवसरपर विष्णुने आनन्दमग्न होकर दुन्दुभिका शब्द कराया, गीत गवाया, नाच कराया, वेदों और पुराणोंका पाठ कराया। फिर मुनिवरोंको बुलवाकर हर्षपूर्वक उनका पूजन किया, माङ्गलिक कार्य कराया और उनसे आशीर्वाद दिलाया। तत्पश्चात् देवी तथा देवगणोंके साथ वे स्वयं भी उस बालकको शुभाशीर्वाद देने लगे।
विष्णुने कहा—बालक! तुम दीर्घायु, ज्ञानमें शिवके सदृश, पराक्रममें मेरे तुल्य और सम्पूर्ण सिद्धियोंके ईश्वर होओ।
ब्रह्माने कहा—वत्स! तुम्हारे यशसे जगत् पूर्ण हो जाय, तुम शीघ्र ही सर्वपूज्य हो जाओ और सबसे पहले तुम्हारी परम दुर्लभ पूजा हो।
धर्मने कहा—पार्वतीनन्दन! तुम मेरे समान परम धार्मिक, सर्वज्ञ, दयालु, हरिभक्त और श्रीहरिके समान परम दुर्लभ होओ।
महादेवने कहा—प्राणप्रिय पुत्र! तुम मेरी भाँति दाता, हरिभक्त, बुद्धिमान्, विद्यावान्, पुण्यवान्, शान्त और जितेन्द्रिय होओ।
लक्ष्मीने कहा—बेटा! तुम्हारे घरमें तथा शरीरमें मेरी सनातनी स्थिति बनी रहे और मेरी ही तरह तुम्हें शान्त एवं मनोहर रूपवाली पतिव्रता पत्नी प्राप्त हो।
सरस्वतीने कहा—पुत्र! मेरे ही तुल्य तुम्हें परमोत्कृष्ट कवित्वशक्ति, धारणाशक्ति, स्मरणशक्ति और विवेचनशक्तिकी प्राप्ति हो।
सावित्रीने कहा—वत्स! मैं वेदमाता हूँ, अतः तुम मेरे मन्त्रजपमें तत्पर होकर शीघ्र ही वेदवादियोंमें श्रेष्ठ तथा वेदज्ञानी हो जाओ।
हिमालयने कहा—बेटा! तुम्हारी बुद्धि सदा श्रीकृष्णमें लगी रहे, श्रीकृष्णमें ही तुम्हारी सनातनी भक्ति हो, तुम श्रीकृष्णके समान गुणवान् होओ और सदा श्रीकृष्णपरायण बने रहो।
मेनकाने कहा—वत्स! तुम गम्भीरतामें समुद्रके समान, सुन्दरतामें कामदेवके सदृश, लक्ष्मीवानोंमें श्रीपतिके तुल्य और धर्ममें धर्मकी तरह होओ।
वसुन्धराने कहा—वत्स! तुम मेरी तरह क्षमाशील, शरणदाता, सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न, विघ्नरहित, विघ्नविनाशक और शुभके आश्रयस्थान होओ।
पार्वतीने कहा—बेटा! तुम अपने पिताके समान महान् योगी, सिद्ध, सिद्धियोंके प्रदाता, शुभकारक, मृत्युञ्जय, ऐश्वर्यशाली और अत्यन्त निपुण होओ।
तदनन्तर समागत सभी ऋषियों, मुनियों और सिद्धोंने आशीर्वाद दिया और ब्राह्मणों तथा वन्दियोंने सब प्रकारकी मङ्गल-कामना की। वत्स नारद! इस प्रकार मैंने गणेशका जन्मवृत्तान्त, जो सम्पूर्ण मङ्गलोंका मङ्गल करनेवाला तथा समस्त विघ्नोंका विनाशक है, पूर्णतया तुमसे वर्णन कर दिया। जो मनुष्य अत्यन्त समाहित होकर इस सुमङ्गलाध्यायको सुनता है, वह सम्पूर्ण मङ्गलोंसे युक्त होकर मङ्गलोंका आवासस्थान हो जाता है। इसके श्रवणसे पुत्रहीनको पुत्र, निर्धनको धन, कृपणको निरन्तर धन प्रदान करनेकी शक्ति, भार्यार्थीको भार्या, प्रजाकामीको प्रजा और रोगीको आरोग्य प्राप्त होता है। दुर्भगा स्त्रीको सौभाग्य, भ्रष्ट हुआ पुत्र, नष्ट हुआ धन और प्रवासी पति मिल जाता है तथा शोकग्रस्तको सदा आनन्दकी प्राप्ति हो जाती है, इसमें संशय नहीं है। मुने! गणेशाख्यानके श्रवणसे मनुष्यको जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, वह फल निश्चय ही इस अध्यायके श्रवणसे मिल जाता है। यह मङ्गलाध्याय जिसके घरमें विद्यमान रहता है, वह सदा मङ्गलयुक्त रहता है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। यात्राकालमें अथवा पुण्यपर्वपर जो मनुष्य एकाग्रचित्तसे इसका श्रवण करता है, वह श्रीगणेशकी कृपासे अपने सभी मनोरथोंको पा जाता है।
(अध्याय १०)
३३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
गणेशको देखनेके लिये शनैश्चरका आना और पार्वतीके पूछनेपर अपने द्वारा किसी वस्तुके न देखनेका कारण बताना
श्रीनारायणजी कहते हैं— नारद ! इस प्रकार उस बालकको आशीर्वाद देकर श्रीहरि उस सभामें देवताओं और मुनियोंके साथ एक रत्ननिर्मित श्रेष्ठ सिंहासनपर विराजमान हुए। उनके दक्षिणभागमें शंकर, वामभागमें प्रजापति ब्रह्मा और आगे धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तथा जगत्के साक्षी धर्मने आसन ग्रहण किया। ब्रह्मन् ! फिर धर्मके समीप सूर्य, इन्द्र, चन्द्रमा, देवगण, मुनिसमुदाय और पर्वतसमूह सुखपूर्वक आसनोंपर बैठे। इसी बीच महायोगी सूर्यपुत्र शनैश्चर शंकरनन्दन गणेशको देखनेके लिये वहाँ आये। उनका मुख अत्यन्त नम्र था, आँखें कुछ मुँदी हुई थीं और मन एकमात्र श्रीकृष्णमें लगा हुआ था; अतः वे बाहर-भीतर श्रीकृष्णका स्मरण कर रहे थे। वे तपःफलको खानेवाले, तेजस्वी, धधकती हुई अग्निकी शिखाके समान प्रकाशमान, अत्यन्त सुन्दर, श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी और श्रेष्ठ थे। उन्होंने वहाँ पहले विष्णु, ब्रह्मा, शिव, धर्म, सूर्य, देवगणों और मुनिवरोंको प्रणाम किया। फिर उनकी आज्ञासे वे उस बालकको देखनेके लिये गये। भीतर जाकर शनैश्चरने सिर झुकाकर पार्वतीदेवीको नमस्कार किया। उस समय वे पुत्रको छातीसे चिपटाये रत्नसिंहासनपर विराजमान हो आनन्दपूर्वक मुस्करा रही थीं। पाँच सखियाँ निरन्तर उनपर श्वेत चँवर डुलाती जाती थीं। वे सखीद्वारा दिये गये सुवासित ताम्बूलको चबा रही थीं। उनके शरीरपर अग्निसे तपाकर शुद्ध की हुई सुन्दर साड़ी शोभायमान थी। रत्नोंके आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। सहसा सूर्यनन्दन शनैश्चरको सिर झुकाये देखकर दुर्गाने उन्हें शीघ्र ही शुभाशीर्वाद दिया और फिर उनसे वार्तालाप करके उनका कुशल-मङ्गल पूछा।
पार्वतीने पुनः पूछा— ग्रहेश्वर ! इस समय तुम्हारा मुख नीचेकी ओर क्यों झुका हुआ है तथा तुम मुझे अथवा इस बालककी ओर देख क्यों नहीं रहे हो? साधो ! मैं इसका कारण सुनना चाहती हूँ।
शनैश्चरने कहा— साध्वि ! सारे जीव स्वकर्मानुसार अपनी करनीका फल भोगते हैं; क्योंकि जो भी शुभ अथवा अशुभ कर्म होता है, उसका करोड़ों कल्पोंमें भी नाश नहीं होता। जीव कर्मानुसार ब्रह्मा, इन्द्र और सूर्यके भवनमें जन्म लेता है। कर्मसे ही वह मनुष्यके घरमें और कर्मसे ही पशु आदि योनियोंमें उत्पन्न होता है। कर्मसे वह नरकमें जाता है और कर्मसे ही उसे वैकुण्ठकी प्राप्ति होती है। स्वकर्मानुसार वह चक्रवर्ती राजा हो जाता है और अपने ही कर्मसे वही नौकर भी होता है। माता ! कर्मसे ही वह सुन्दर होता है और अपने कर्मके फलस्वरूप वह सदा रोगग्रस्त बना रहता है। कर्मानुसार ही वह विषयप्रेमी और अपने कर्मसे ही विषयोंसे निर्लिप्त रहता है। कर्मसे ही वह लोकमें धनवान्, कर्मसे ही दरिद्र, कर्मसे ही उत्तम कुटुम्बवाला और कर्मसे ही बन्धुओंके लिये कण्टकरूप हो जाता है। अपने कर्मसे ही जीवको उत्तम पत्नी, उत्तम पुत्र और निरन्तर सुखकी प्राप्ति होती है तथा स्वकर्मसे ही वह पुत्रहीन, दुष्ट स्वभावा स्त्रीका स्वामी अथवा स्त्रीहीन होता है।
शंकरवल्लभे ! मैं एक परम गोपनीय इतिहास, यद्यपि वह लज्जाजनक तथा माताके समक्ष कहने योग्य नहीं है, कहता हूँ, सुनिये। मैं बचपनसे ही श्रीकृष्णका भक्त था। मेरा मन सदा एकमात्र श्रीकृष्णके ध्यानमें ही लगा रहता था। मैं विषयोंसे विरक्त होकर निरन्तर तपस्यामें रत रहता था।