ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ४६६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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और भी बालक-बालिकाएँ थीं। उस दिन नन्दजीके यहाँ आभ्युदयिक कर्मका सम्पादन हुआ था। उस अवसरपर गोपियोंको आती देख सती यशोदाने अतृप्त बालक श्रीकृष्णको शीघ्र ही शय्यापर सुला दिया और स्वयं उठकर प्रसन्नतापूर्वक उनको प्रणाम किया। इतना ही नहीं, आनन्दित हुई गोपी यशोदाने उन सबको तेल, सिन्दूर, पान, मिष्ठान्न, वस्त्र और आभूषण भी दिये। इस बीचमें मायाके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण मायासे भूखे बनकर दोनों चरण ऊपर फेंक-फेंककर रोने लगे। मुने ! उनके पास ही गोरसके मटकोंसे भरा हुआ छकड़ा खड़ा था। श्रीकृष्णका एक पैर उससे जा लगा। विश्वम्भरके पैरका आघात लगनेसे वह छकड़ा चूर-चूर हो गया। उस छकड़ेके टुकड़े-टुकड़े हो गये। उसके टूटे काठ वहीं बिखर गये। उसपर लदा हुआ दही, दूध, माखन, घी और मधु धरतीपर गिरकर बह चला। यह आश्चर्य देख भयसे व्याकुल हुई गोपियाँ बालकके पास दौड़ी हुई आयीं। उन्होंने देखा छकड़ा टूट चुका है और बालक उसकी बिखरी हुई लकड़ियोंके भीतर दबा है। टूटे-फूटे मटकोंका समूह तथा बहुत-सा गोरस भी वहाँ गिरा दिखायी दिया। लकड़ियोंको दूर फेंककर भयसे व्याकुल हुई यशोदाने बालकको गोदमें उठा लिया। योगमायाकी कृपासे उसके सारे अङ्ग सुरक्षित थे। वह भूखसे व्याकुल हो रो रहा था। यशोदाजीने उसके मुखमें स्तन दे दिया और स्वयं शोकसे व्याकुल हो फूट-फूटकर रोती रहीं। गोपोंने वहाँ खेलते हुए बालकोंसे पूछा—‘छकड़ा कैसे टूटा है? इसके टूटनेका कोई कारण तो नहीं दिखायी देता है। सहसा यह अद्भुत काण्ड कैसे घटित हुआ?’ उनकी बात सुनकर सब बालक बोले—‘गोपगण! सुनो। अवश्य ही श्रीकृष्णके चरणोंका धक्का लगनेसे यह छकड़ा टूटा है।’ बालकोंकी यह बात सुनकर गोप और गोपियाँ हँसने लगीं। उन्हें उनकी बातपर विश्वास नहीं हुआ। वे बोलीं—‘बच्चोंकी बातें सत्य नहीं हैं।’ तुरंत ही श्रेष्ठ ब्राह्मण आये और उन्होंने शिशुकी रक्षाके लिये स्वस्तिवाचन किया। एक ब्राह्मणने शिशुके शरीरपर हाथ रखकर कवच पढ़ा। विप्रवर! वह समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त कवच मैं तुम्हें बता रहा हूँ। यह वही कवच है, जिसे पूर्वकालमें श्रीविष्णुके नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माजीको भगवती योगमायाने दिया था। उस समय जलमें शयन करनेवाले त्रिलोकीनाथ विष्णु जलके भीतर नींद ले रहे थे और ब्रह्माजी मधु-कैटभके भयसे डरकर योगनिद्राकी स्तुति कर रहे थे। उसी अवसरपर योगनिद्राने उन्हें कवचका उपदेश दिया था।
योगनिद्रा बोली— ब्रह्मन्! तुम अपना भय दूर करो। जगत्पते! जहाँ श्रीहरि विराजमान हैं और मैं मौजूद हूँ, वहाँ तुम्हें भय किस बातका है? तुम यहाँ सुखपूर्वक रहो। श्रीहरि तुम्हारे मुखकी रक्षा करें। मधुसूदन मस्तककी, श्रीकृष्ण दोनों नेत्रोंकी तथा राधिकापति नासिकाकी रक्षा करें। माधव दोनों कानोंकी, कण्ठकी और कपालकी रक्षा करें। कपोलकी गोविन्द और केशोंकी स्वयं
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४६७ केशव रक्षा करें। हृषीकेश अधरोष्ठकी, गदाग्रज दन्तपंक्तिकी, रासेश्वर रसनाकी और भगवान् वामन तालुकी रक्षा करें। मुकुन्द तुम्हारे वक्षःस्थलकी रक्षा करें। दैत्यसूदन उदरका पालन करें। जनार्दन नाभिकी और विष्णु तुम्हारी ठोढ़ीकी रक्षा करें। पुरुषोत्तम तुम्हारे दोनों नितम्बों और गुह्य भागकी रक्षा करें। भगवान् जानकीश्वर तुम्हारे युगल जानुओं (घुटनों) - की सर्वदा रक्षा करें। नृसिंह सर्वत्र संकटमें दोनों हाथोंकी और कमलोद्भव वराह तुम्हारे दोनों चरणोंकी रक्षा करें। ऊपर नारायण और नीचे कमलापति तुम्हारी रक्षा करें। पूर्व दिशामें गोपाल तुम्हारा पालन करें। अग्निकोणमें दशमुखहन्ता श्रीराम तुम्हारी रक्षा करें। दक्षिण दिशामें वनमाली, नैर्ऋत्यकोणमें वैकुण्ठ तथा पश्चिम दिशामें सत्पुरुषोंकी रक्षा करनेवाले स्वयं वासुदेव तुम्हारा पालन करें। वायव्यकोणमें अजन्मा विष्टरश्रवा श्रीहरि सदा तुम्हारी रक्षा करें। उत्तर दिशामें कमलासन ब्रह्मा अपने तेजसे सदा तुम्हारी रक्षा करें। ईशानकोणमें ईश्वर रक्षा करें। शत्रुजित् सर्वत्र पालन करें। जल, थल और आकाशमें तथा निद्रावस्थामें श्रीरघुनाथजी रक्षा करें। ब्रह्मन् ! इस प्रकार परम अद्भुत कवचका वर्णन किया गया। पूर्वकालमें मेरे स्मरण करनेपर भगवान् श्रीकृष्णने कृपापूर्वक मुझे इसका उपदेश दिया था। शुम्भके साथ जब निर्लक्ष्य, घोर एवं दारुण संग्राम चल रहा था, उस समय आकाशमें खड़ी हो मैंने इस कवचकी प्राप्तिमात्रसे तत्काल उसे पराजित कर दिया था। इस कवचके प्रभावसे शुम्भ धरतीपर गिरा और मर गया। पहले सैकड़ों वर्षोंतक भयंकर युद्ध करके जब शुम्भ मर गया, तब कृपालु गोविन्द आकाशमें स्थित हो कवच और माल्य देकर गोलोकको चले गये। मुने ! इस प्रकार कल्पान्तरका वृत्तान्त कहा गया है। इस कवचके प्रभावसे कभी मनमें भय नहीं होता है। मैंने प्रत्येक कल्पमें श्रीहरिके साथ रहकर करोड़ों ब्रह्माओंको नष्ट होते देखा है। ऐसा कह कवच देकर देवी योगनिद्रा अन्तर्धान हो गयी और कमलोद्भव ब्रह्मा भगवान् विष्णुके नाभिकमलमें निःशंकभावसे बैठे रहे। जो इस उत्तम कवचको सोनेके यन्त्रमें मढ़ाकर कण्ठ या दाहिनी बाँहमें बाँधता है, उसकी बुद्धि सदा शुद्ध रहती है तथा उसे विष, अग्नि, सर्प और शत्रुओंसे कभी भय नहीं होता। जल, थल और अन्तरिक्षमें तथा निद्रावस्थामें भगवान् सदा उसकी रक्षा करते हैं*। *हस्तं दत्त्वा शिरोगात्रे पपाठ कवचं द्विजः। वदामि तत्ते विप्रेन्द्र कवचं सर्वलक्षणम् ॥ यदत्तं मायया पूर्वं ब्रह्मणे नाभिपङ्कजे ॥ निद्रिते जगतीनाथे जले च जलशायिनि। भीताय स्तुतिकर्त्रे च मधुकैटभयोर्भयात् ॥ योगनिद्रोवाच दूरीभूतं कुरु भयं भयं किं ते हरौ स्थिते। स्थितायां मयि च ब्रह्मन् सुखं तिष्ठ जगत्पते ॥ श्रीहरिः पातु ते वक्त्रं मस्तकं मधुसूदनः। श्रीकृष्णश्चक्षुषी पातु नासिकां राधिकापतिः ॥ कर्णयुग्मं च कण्ठं च कपालं पातु माधवः। कपोलं पातु गोविन्दः केशांश्च केशवः स्वयम् ॥ अधरोष्ठं हृषीकेशो दन्तपंक्तिं गदाग्रजः। रासेश्वरश्च रसनां तालुकं वामनो विभुः ॥ वक्षः पातु मुकुन्दस्ते जठरं पातु दैत्यहा। जनार्दनः पातु नाभिं पातु विष्णुश्च ते हनुम् ॥ नितम्बयुग्मं गुह्यं च पातु ते पुरुषोत्तमः। जानुयुग्मं जानकीशः पातु ते सर्वदा विभुः ॥ हस्तयुग्मं नृसिंहश्च पातु सर्वत्र सङ्कटे। पादयुग्मं वराहश्च पातु ते कमलोद्भवः ॥ ऊर्ध्वं नारायणः पातुह्यधस्तात् कमलापतिः। पूर्वस्यां पातु गोपालः पातु वह्नौ दशास्यहा ॥ वनमाली पातु याम्यां वैकुण्ठः पातु नैर्ऋतौ। वारुण्यां वासुदेवश्च सतो रक्षाकरः स्वयम् ॥ पातु ते सन्ततमजो वायव्यां विष्टरश्रवाः। उत्तरे च सदा पातु तेजसा जलजासनः ॥
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ब्राह्मणने नन्दशिशुके कण्ठमें वह कवच बाँध दिया। इस प्रकार साक्षात् श्रीहरिने अपना ही कवच अपने कण्ठमें धारण किया। मुने! श्रीहरिके इस कवचका सम्पूर्ण प्रभाव बताया गया। भगवान् अनन्त हैं। वे अपनी महिमासे कभी च्युत नहीं होते। उनके प्रभावकी कहीं तुलना नहीं है।
(अध्याय १२)
मुनि गर्गजीका आगमन, यशोदाद्वारा उनका सत्कार और परिचय-प्रश्न, गर्गजीका उत्तर, नन्दका आगमन, नन्द-यशोदाको एकान्तमें ले जाकर गर्गजीका श्रीराधा-कृष्णके नाम-माहात्म्यका परिचय देना और उनकी भावी लीलाओंका क्रमशः वर्णन करना, श्रीकृष्णके नामकरण एवं अन्नप्राशन-संस्कारका बृहद् आयोजन, ब्राह्मणोंको दान-मान, गर्गद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा गर्ग आदिकी विदाई
भगवान् नारायण कहते हैं—महामुने! अब श्रीकृष्णका कुछ और माहात्म्य सुनो, जो विघ्नविनाशक, पापहारी, महान् पुण्य प्रदान करनेवाला तथा परम उत्तम है। एक दिनकी बात है। सोनेके सिंहासनपर बैठी हुई नन्दपत्नी यशोदा भूखे हुए श्रीकृष्णको गोदमें लेकर उन्हें स्तन पिला रही थीं। उसी समय एक श्रेष्ठ ब्राह्मण शिष्यसमूहसे घिरे हुए वहाँ आये। वे ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे और शुद्ध स्फटिककी मालापर परब्रह्मका जप कर रहे थे। दण्ड और छत्र धारण किये श्वेत वस्त्र पहने वे महर्षि अपनी धवल दन्तपंक्तियोंके कारण बड़ी शोभा पा रहे थे। वेद और वेदाङ्गोंके पारंगत तो वे थे ही, ज्योतिर्विद्याके मूर्तिमान् स्वरूप थे। उन्होंने अपने मस्तकपर तपाये हुए सुवर्णके समान पिङ्गल जटाभार धारण कर रखा था। उनका मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रदेवकी कान्तिको लज्जित कर रहा था। गोरे-गोरे अङ्ग और कमल-जैसे नेत्रवाले वे योगिराज भगवान् शंकरके शिष्य थे तथा गदाधारी श्रीविष्णुके प्रति विशुद्ध भक्ति रखते थे। वे श्रीमान् महर्षि प्रसन्नतापूर्वक शिष्योंको पढ़ाते थे। उनके एक हाथमें व्याख्याकी मुद्रा सुस्पष्ट दिखायी देती थी। वे वेदोंकी अनेक प्रकारकी व्याख्या लीलापूर्वक करते थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था
ऐशान्यामीश्वरः पातु सर्वत्र पातु शत्रुजित् । जले स्थले चान्तरिक्षे निद्रायां पातु राघवः ॥
इत्येवं कथितं ब्रह्मन् कवचं परमाद्भुतम् । कृष्णेन कृपया दत्तं स्मृतेनैव पुरा मया ॥
शुम्भेन सह संग्रामे निर्लक्ष्ये घोरदारुणे । गगने स्थितया सद्यः प्राप्तिमात्रेण सो जितः ॥
कवचस्य प्रभावेण धरण्यां पतितो मृतः । पूर्वं वर्षशतं खे च कृत्वा युद्धं भयावहम् ॥
मृते शुम्भे च गोविन्दः कृपालुर्गगनस्थितः । माल्यं च कवचं दत्त्वा गोलोकं स जगाम ह ॥
कल्पान्तरस्य वृत्तान्तं कृपया कथितं मुने । अभ्यन्तरभयं नास्ति कवचस्य प्रभावतः ॥
कोटिशः कोटिशोनष्टामया दृष्टाश्च वेधसः । अहं च हरिणा सार्द्धं कल्पे कल्पे स्थिरा सदा ॥
इत्युक्त्वा कवचंदत्त्वा सान्तर्धानं चकार ह । निःशङ्को नाभिकमले तस्थौ स कमलोद्भवः ॥
सुवर्णगुटिकायां तु कृत्वेदं कवचं परम् । कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ बध्नीयाद् यः सुधीः सदा ॥
विषाग्निसर्पशत्रुभ्यो भयं तस्य न विद्यते । जले स्थले चान्तरिक्षे निद्रायां रक्षतीश्वरः ॥
( श्रीकृष्णजन्मखण्ड १२ । १४–३६)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४६९
मानो चारों वेदोंका तेज मूर्तिमान् हो गया हो। उनके कण्ठमें साक्षात् सरस्वतीका वास था। वे शास्त्रीय सिद्धान्तके एकमात्र विशेषज्ञ थे और दिन-रात श्रीकृष्णचरणारविन्दोंके ध्यानमें तत्पर रहते थे। उन्हें जीवन्मुक्त अवस्था प्राप्त थी। वे सिद्धोंके स्वामी, सर्वज्ञ और सर्वदर्शी थे।
उन्हें देखकर यशोदाजी खड़ी हो गयीं। उन्होंने मस्तक झुकाकर मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और उन्हें बैठनेके लिये सोनेका सिंहासन देकर आतिथ्यके लिये पाद्य, अर्घ्य, गौ तथा मधुपर्क निवेदन किया। मुस्कराती हुई नन्दरानीने अपने बालकसे मुनीन्द्रकी वन्दना करवायी।
मुनिने भी मन-ही-मन श्रीहरिको सौ-सौ प्रणाम किये और प्रसन्नतापूर्वक वेदमन्त्रोंके अनुकूल आशीर्वाद दिया। यशोदाजीने मुनिके शिष्योंको भी प्रणाम किया तथा भक्तिभावसे उन सबके लिये पृथक्-पृथक् पाद्य आदि अर्पित किये। उन शिष्योंने यशोदाजीको आशीर्वाद दिया। मुनि अपने शिष्योंके साथ पैर धोकर जब सिंहासनपर बैठे, तब सती-साध्वी यशोदा बालकको गोदमें ले भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर दोनों हाथ जोड़ मुनिके आगमनका कारण पूछनेको उद्यत हुईं। वे बोलीं—'मुने! आप स्वात्माराम महर्षि हैं, आपसे कुशल-मङ्गल पूछना यद्यपि उचित नहीं है, तथापि इस समय मैं आपका कुशल-समाचार पूछ रही हूँ। अबला बुद्धिहीना होती है। अतः आप मेरे इस दोषको क्षमा कर देंगे। साधुपुरुष सदा ही मूढ़ मनुष्योंके दोषोंको क्षमा करते रहते हैं।'
तदनन्तर अङ्गिरा, अत्रि, मरीचि और गौतम आदि बहुत-से ऋषि-मुनियोंके नाम लेकर यशोदाने पूछा—'प्रभो! इन पुण्यश्लोक महात्माओंमेंसे आप कौन हैं। कृपया मुझे बताइये। यद्यपि आपसे उत्तर पानेके योग्य मैं नहीं हूँ, तथापि आप मुझे मेरी पूछी हुई बात बताइये। आप-जैसे महात्मा पुरुष प्रसन्नमनसे शिशुको आशीर्वाद देने योग्य हैं। निश्चय ही ब्राह्मणोंका आशीर्वाद तत्काल पूर्ण मङ्गलकारी होता है।'
ऐसा कहकर नन्दरानी भक्तिभावसे मुनिके सामने खड़ी हो गयीं। उस सतीने नन्दरायजीको बुलानेके लिये चर भेजा। यशोदाजीकी पूर्वोक्त बातें सुनकर मुनिवर गर्ग हँसने लगे। उनके शिष्य-समूह भी हास्यकी छटासे दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए जोर-जोरसे हँस पड़े। तब उन शुद्धबुद्धि महामुनि गर्गने यथार्थ हितकर, नीतियुक्त एवं अत्यन्त आनन्ददायक बात कही।
श्रीगर्गजी बोले—देवि! तुम्हारा यह समयोचित वचन अमृतके समान मधुर है। जिसका जिस कुलमें जन्म होता है, उसका स्वभाव भी वैसा ही होता है। समस्त गोपरूपी कमलवनोंके विकासके लिये गोपराज गिरिभानु सूर्यके समान हैं। उनकी पत्नीका नाम सती पद्मावती है, जो साक्षात् पद्मा (लक्ष्मी)-के समान हैं। उन्हींकी कन्या तुम यशोदा हो, जो अपने यशकी वृद्धि करनेवाली हो। भद्रे! नन्द और तुम जो कुछ भी हो, वह मुझे ज्ञात है। यह बालक जिस प्रयोजनसे भूतलपर अवतीर्ण हुआ है, वह सब मैं जानता हूँ। निर्जन स्थानमें नन्दके समीप मैं सब बातें बताऊँगा। मेरा नाम गर्ग है। मैं
४७० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण चिरकालसे यदुकुलका पुरोहित हूँ। वसुदेवजीने मुझे यहाँ ऐसे कार्यके लिये भेजा है, जिसे दूसरा कोई नहीं कर सकता। इसी बीचमें गर्गजीका आगमन सुनते ही नन्दजी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर माथा टेक उन मुनीश्वरको प्रणाम किया। साथ ही उनके शिष्योंको भी मस्तक झुकाया। उन सबने उन्हें आशीर्वाद दिये। इसके बाद गर्गजी आसनसे उठे और नन्द-यशोदाको साथ ले सुरम्य अन्तःपुरमें गये। उस निर्जन स्थानमें गर्ग, नन्द और पुत्रसहित यशोदा इतने ही लोग रह गये थे। उस समय गर्गजीने यह गूढ़ बात कही। श्रीगर्गजी बोले- नन्द ! मैं तुम्हें मङ्गलकारी वचन सुनाता हूँ। वसुदेवजीने जिस प्रयोजनसे मुझे यहाँ भेजा है, उसे सुनो। वसुदेवने सूतिकागारमें आकर अपना पुत्र तुम्हारे यहाँ रख दिया है और तुम्हारी कन्या वे मथुरा ले गये हैं। ऐसा उन्होंने कंसके भयसे किया है। यह पुत्र वसुदेवका है और जो इससे ज्येष्ठ है, वह भी उन्हींका है। यह निश्चित बात है। इस बालकका अन्नप्राशन और नामकरण-संस्कार करनेके लिये वसुदेवने गुप्तरूपसे मुझे यहाँ भेजा है। अतः तुम ब्रजमें इन बालकोंके संस्कारकी तैयारी करो। तुम्हारा यह शिशु पूर्ण ब्रह्मस्वरूप है और मायासे इस भूतलपर अवतीर्ण हो पृथ्वीका भार उतारनेके लिये उद्यमशील है। ब्रह्माजीने इसकी आराधना की थी। अतः उनकी प्रार्थनासे यह भूतलका भार हरण करेगा। इस शिशुके रूपमें साक्षात् राधिकावल्लभ गोलोकनाथ भगवान् श्रीकृष्ण पधारे हैं। वैकुण्ठमें जो कमलाकान्त नारायण हैं तथा श्वेतद्वीपमें जो जगत्पालक विष्णु निवास करते हैं, वे भी इन्हींमें अन्तर्भूत हैं। महर्षि कपिल तथा इनके अन्यान्य अंश ऋषि नर-नारायण भी इनसे भिन्न नहीं हैं। ये सबके तेजोंकी राशि हैं। वह तेजोराशि ही मूर्त्तिमान् होकर उनके यहाँ अवतीर्ण हुई है। भगवान् श्रीकृष्ण वसुदेवको अपना रूप दिखाकर शिशुरूप हो गये और सूतिकागारसे इस समय तुम्हारे घरमें आ गये हैं। ये किसी योनिसे प्रकट नहीं हुए हैं; अयोनिज रूपमें ही भूतलपर प्रकट हुए हैं। इन श्रीहरिने मायासे अपनी माताके गर्भको वायुसे पूर्ण कर रखा था। फिर स्वयं प्रकट हो अपने उस दिव्य रूपका वसुदेवजीको दर्शन कराया और फिर शिशुरूप हो वे यहाँ आ गये। गोपराज ! युग-युगमें इनका भिन्न-भिन्न वर्ण और नाम है; ये पहले श्वेत, रक्त और पीतवर्णके थे। इस समय कृष्णवर्ण होकर प्रकट हुए हैं। सत्ययुगमें इनका वर्ण श्वेत था। ये तेजःपुञ्जसे आवृत होनेके कारण अत्यन्त प्रसन्न जान पड़ते थे। त्रेतामें इनका वर्ण लाल हुआ और द्वापरमें ये भगवान् पीतवर्णके हो गये। कलियुगके आरम्भमें इनका वर्ण कृष्ण हो गया। ये श्रीमान् तेजकी राशि हैं, परिपूर्णतम ब्रह्म हैं; इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। 'कृष्णः' पदमें जो 'ककार' है, वह ब्रह्माका वाचक है। 'ऋकार' अनन्त (शेषनाग) - का वाचक है। मूर्धन्य 'षकार' शिवका और 'णकार' धर्मका बोधक है। अन्तमें जो 'अकार' है, वह श्वेतद्वीपनिवासी विष्णुका वाचक है तथा विसर्ग नर-नारायण-अर्थका बोधक माना गया है। ये श्रीहरि उपर्युक्त सब देवताओंके तेजकी राशि हैं। सर्वस्वरूप, सर्वाधार तथा सर्वबीज हैं; इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। 'कृष्' शब्द निर्वाणका वाचक है, 'णकार' मोक्षका बोधक है और 'अकार' का अर्थ दाता है। ये श्रीहरि निर्वाण मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं; इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। 'कृष्' का अर्थ है निश्चेष्ट, 'ण' का अर्थ है भक्ति और 'अकार' का अर्थ है दाता। भगवान् निष्कर्म भक्तिके दाता हैं; इसलिये उनका नाम 'कृष्ण' है। 'कृष्' का
श्रीकृष्णजन्मखण्ड | ४७१
अर्थ है कर्मोंका निर्मूलन, 'ण' का अर्थ है दास्यभाव और 'अकार' प्राप्तिका बोधक है। वे कर्मोंका समूल नाश करके भक्तिकी प्राप्ति कराते हैं; इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। नन्द! भगवान्के अन्य करोड़ों नामोंका स्मरण करनेपर जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह सब केवल 'कृष्ण' नामका स्मरण करनेसे मनुष्य अवश्य प्राप्त कर लेता है। 'कृष्ण' नामके स्मरणका जैसा पुण्य है, उसके कीर्तन और श्रवणसे भी वैसा ही पुण्य होता है। श्रीकृष्णके कीर्तन, श्रवण और स्मरण आदिसे मनुष्यके करोड़ों जन्मोंके पापका नाश हो जाता है। भगवान् विष्णुके सब नामोंमें 'कृष्ण' नाम ही सबकी अपेक्षा सारतम वस्तु और परात्पर तत्त्व है। 'कृष्ण' नाम अत्यन्त मङ्गलमय, सुन्दर तथा भक्तिदायक है$^१$।
'ककार' के उच्चारणसे भक्त पुरुष जन्म-मृत्युका नाश करनेवाले कैवल्य मोक्षको प्राप्त कर लेता है। 'ऋकार' के उच्चारणसे भगवान्का अनुपम दास्यभाव प्राप्त होता है। 'षकार' के उच्चारणसे उनकी मनोवाञ्छित भक्ति सुलभ होती है। 'णकार' के उच्चारणसे तत्काल ही उनके साथ निवासका सौभाग्य प्राप्त होता है और विसर्गके उच्चारणसे उनके सारूप्यकी उपलब्धि होती है, इसमें संशय नहीं है। 'ककार' का उच्चारण होते ही यमदूत काँपने लगते हैं। 'ऋकार' का उच्चारण होनेपर वे ठहर जाते हैं, आगे नहीं बढ़ते। 'षकार' के उच्चारणसे पातक, 'णकार' के उच्चारणसे रोग तथा 'अकार' के उच्चारणसे मृत्यु—ये सब निश्चय ही भाग खड़े होते हैं; क्योंकि वे नामोच्चारणसे डरते हैं। व्रजेश्वर! श्रीकृष्ण-नामके स्मरण, कीर्तन और श्रवणके लिये उद्योग करते ही श्रीकृष्णके किंकर गोलोकसे विमान लेकर दौड़ पड़ते हैं। विद्वान् लोग शायद भूतलके धूलिकणोंकी गणना कर सकें; परंतु नामके प्रभावकी गणना करनेमें संतपुरुष भी समर्थ नहीं हैं। पूर्वकालमें भगवान् शंकरके मुखसे मैंने इस 'कृष्ण' नामकी महिमा सुनी थी। मेरे गुरु भगवान् शंकर ही श्रीकृष्णके गुणों और नामोंका प्रभाव कुछ-कुछ जानते हैं। ब्रह्मा, अनन्त, धर्म, देवता, ऋषि, मनु, मानव, वेद और संतपुरुष श्रीकृष्ण-नाम-महिमाकी सोलहवीं कलाको भी नहीं जानते हैं।
नन्द! इस प्रकार मैंने तुम्हारे पुत्रकी महिमाका अपनी बुद्धि और ज्ञानके अनुसार वर्णन किया है। इसे मैंने गुरुजीके मुखसे सुना था। कृष्ण, पीताम्बर, कंसध्वंसी, विष्टरश्रवा, देवकीनन्दन, श्रीश, यशोदानन्दन, हरि, सनातन, अच्युत, विष्णु, सर्वेश, सर्वरूपधृक्, सर्वाधार, सर्वगति, सर्वकारणकारण, राधाबन्धु, राधिकात्मा, राधिकाजीवन, रािकासहचरी, राधामानसपूरक, राधाधन, राधिकाङ्ग, रािकासक्त-मानस, राधाप्राण, राधिकेश, राधिकारमण, राधिकाचित्तचोर, राधाप्राणाधिक, प्रभु, परिपूर्णतम, ब्रह्म, गोविन्द और गरुडध्वज—नन्द! ये श्रीकृष्णके नाम जो तुमने मेरे मुखसे सुने हैं, हृदयमें धारण करो। शुभेक्षण! ये नाम जन्म तथा मृत्युके कष्टको हर लेनेवाले हैं। तुम्हारे कनिष्ठ पुत्रके नामोंका महत्त्व जैसा मैंने सुना था, वैसा यहाँ बताया है$^२$। अब ज्येष्ठ पुत्र हलधरके नामका संकेत
१. नाम्नां भगवतो नन्द कोटीनां स्मरणेन यत् । तत्फलं लभते नूनं कृष्णेति स्मरणान्नरः॥
यद्द्विधं स्मरणे पुण्यं वचनाच्छ्रवणात् तथा। कोटिजन्मांहसां नाशो भवेद् यत्स्मरणादिकात् ॥
विष्णोर्नाम्नां च सर्वेषां सर्वात् सारंपरात्परम्। कृष्णेति मङ्गलं नाम सुन्दरं भक्तिदायकम्॥
(श्रीकृष्णजन्मखण्ड १३। ६३–६५)
२. कृष्णः पीताम्बरः कंसध्वंसी च विष्टरश्रवाः। देवकीनन्दनः श्रीशो यशोदानन्दो हरिः॥
सनातनोऽच्युतो विष्णुः सर्वेशः सर्वरूपधृक् । सर्वाधारः सर्वगतिः सर्वकारणकारणः॥
४७२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
मेरे मुँहसे सुनो। ये जब गर्भमें थे, उस समय उस गर्भका संकर्षण किया गया था; इसलिये इनका नाम 'संकर्षण' हुआ। वेदोंमें यह कहा गया है कि इनका कभी अन्त नहीं होता; इसलिये ये 'अनन्त' कहे गये हैं। इनमें बलकी अधिकता है; इसलिये इनको 'बलदेव' कहते हैं। हल धारण करनेसे इनका नाम 'हली' हुआ है। नील रंगका वस्त्र धारण करनेसे इन्हें 'शितिवासा' (नीलाम्बर) कहा गया है। ये मूसलको आयुध बनाकर रखते हैं; इसलिये 'मुसली' कहे गये हैं। रेवतीके साथ इनका विवाह होगा; इसलिये ये साक्षात् 'रेवतीरमण' हैं। रोहिणीके गर्भमें वास करनेसे इन महाबुद्धिमान् संकर्षणको 'रौहिणेय' कहा गया है। इस प्रकार ज्येष्ठ पुत्रका नाम जैसा मैंने सुना था, वैसा बताया है। नन्द! अब मैं अपने घरको जाऊँगा। तुम अपने भवनमें सुखपूर्वक रहो।
ब्राह्मणकी यह बात सुनकर नन्दजी स्तब्ध रह गये। नन्दपत्नी भी निश्चेष्ट हो गयीं और वह बालक स्वयं हँसने लगा। तब नन्दने गर्गजीको प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ लिये और भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर विनयपूर्वक कहा।
नन्द बोले- ब्रह्मन्! यदि आप चले गये तो कौन महात्मा इस कर्मको करायेंगे; अतः आप स्वयं ही शुभ-दृष्टि करके इन बालकोंका नामकरण एवं अन्नप्राशन-संस्कार कराइये। राधा-बन्धुसे लेकर राधाप्राणाधिकतक जो नाम-समूह बताये गये हैं, उनमें जो राधा नाम आया है, वह राधा कौन है और किसकी पुत्री है?
नन्दकी यह बात सुनकर मुनिवर गर्ग हँसने लगे और बोले-'यह परम निगूढ़ तत्त्व एवं रहस्यकी बात है, जिसे तुम्हें बताऊँगा।'
श्रीगर्गजी बोले-नन्द! सुनो। मैं पुरातन इतिहास बता रहा हूँ। यह वृत्तान्त पहले गोलोकमें घटित हुआ था। उसे मैंने भगवान् शंकरके मुखसे सुना है। किसी समय गोलोकमें श्रीदामाका राधाके साथ लीलाप्रेरित कलह हो गया। उस कलहके कारण श्रीदामाके शापसे लीलावश गोपी राधाको गोकुलमें आना पड़ा है। इस समय वे वृषभानु गोपकी बेटी हैं और कलावती उनकी माता हैं। राधा श्रीकृष्णके अर्द्धाङ्गसे प्रकट हुई हैं और वे अपने स्वामीके अनुरूप ही परम सुन्दरी सती हैं। ये राधा गोलोकवासिनी हैं; परंतु इस समय श्रीकृष्णकी आज्ञासे यहाँ अयोनिसम्भवा होकर प्रकट हुई हैं। ये ही देवी मूल-प्रकृति ईश्वरी हैं। इन सती-साध्वी राधाने मायासे माताके गर्भको वायुपूर्ण करके वायुके निकलनेके समय स्वयं शिशु-विग्रह धारण कर लिया। ये साक्षात् कृष्ण-माया हैं और श्रीकृष्णके आदेशसे पृथ्वीपर प्रकट हुई हैं। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी कला बढ़ती है, उसी प्रकार व्रजमें राधा बढ़ रही हैं। श्रीकृष्णके तेजके आधे भागसे वे मूर्तिमती हुई हैं। एक ही मूर्ति दो रूपोंमें विभक्त हो गयी है। इस भेदका निरूपण वेदमें किया गया है। ये स्त्री हैं, वे पुरुष हैं, किंवा वे ही स्त्री हैं और ये पुरुष हैं। इसका स्पष्टीकरण नहीं हो पाता। दो रूप हैं और दोनों ही स्वरूप, गुण एवं तेजकी दृष्टिसे समान हैं। पराक्रम, बुद्धि, ज्ञान और सम्पत्तिकी दृष्टिसे भी उनमें न्यूनता अथवा अधिकता नहीं है। किंतु वे गोलोकसे यहाँ पहले आयी हैं; इसलिये अवस्थामें श्रीकृष्णसे
राधाबन्धू राधिकात्मा राधिकाजीवनः स्वयं। राधिकासहचारी च राधामानसपूरकः॥
राधाधनो राधिकाङ्गो राधिकासक्तमानसः। राधाप्राणो राधिकेशो राधिकारमणः स्वयम्॥
राधिकाचित्तचौरश्च राधाप्राणाधिकः प्रभुः। परिपूर्णतमं ब्रह्म गोविन्दो गरुडध्वजः॥
नामान्येतानि कृष्णस्य श्रुतानि साम्प्रतं व्रज। जन्ममृत्युहराण्येव रक्ष नन्द शुभक्षणे॥
(१३।७५–८०)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४७३
कुछ अधिक हैं। श्रीकृष्ण सदा राधाका ध्यान करते हैं और राधा भी अपने प्रियतमका निरन्तर स्मरण करती हैं। राधा श्रीकृष्णके प्राणोंसे निर्मित हुई हैं और ये श्रीकृष्ण राधाके प्राणोंसे मूर्तिमान् हुए हैं। श्रीराधाका अनुसरण करनेके लिये ही इनका गोकुलमें आगमन हुआ है। पूर्वकालमें गोलोकमें श्रीहरिने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे सार्थक बनानेके लिये कंसके भयका बहाना लेकर इनका गोकुलमें आगमन हुआ है। केवल प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये ही ये व्रजमें आये हैं। भय तो छलनामात्र है। जो भयके भी स्वामी हैं, उन्हें किससे भय हो सकता है? सामवेदमें 'राधा' शब्दकी व्युत्पत्ति बतायी गयी है। पहले नारायणदेवने अपने नाभि-कमलपर बैठे हुए ब्रह्माजीको वह व्युत्पत्ति बतायी थी। फिर ब्रह्माजीने ब्रह्मलोकमें भगवान् शंकरको उसका उपदेश दिया। नन्द ! तत्पश्चात् पूर्वकालमें कैलास-शिखरपर विराजमान महेश्वरने मुझको वह व्युत्पत्ति बतायी, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। मैं उसका वर्णन करता हूँ।
'राधा' शब्दकी व्युत्पत्ति देवताओं, असुरों और मुनीन्द्रोंको भी अभीष्ट है तथा वह सबसे उत्कृष्ट एवं मोक्षदायिनी है। राधाका 'रेफ' करोड़ों जन्मोंके पाप तथा शुभाशुभ कर्मभोगसे छुटकारा दिलाता है। 'आकार' गर्भवास, मृत्यु तथा रोगको दूर करता है। 'धकार' आयुकी हानिका और 'आकार' भवबन्धनका निवारण करता है। राधा नामके श्रवण, स्मरण और कीर्तनसे उक्त सारे दोषोंका नाश हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। राधा नामका 'रेफ' श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें निश्चल भक्ति तथा दास्य प्रदान करता है। 'आकार' सर्ववाञ्छित, सदानन्दस्वरूप, सम्पूर्ण सिद्धसमुदायरूप एवं ईश्वरकी प्राप्ति कराता है। 'धकार' श्रीहरिके साथ उन्हींकी भाँति अनन्त कालतक सहवासका सुख, समान ऐश्वर्य, सारूप्य तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करता है। 'आकार' श्रीहरिकी भाँति तेजोराशि, दानशक्ति, योगशक्ति, योगमति तथा सर्वदा श्रीहरिकी स्मृतिका अवसर देता है। श्रीराधा नामके श्रवण, स्मरण और कीर्तनका सुयोग मिलनेसे मोहजाल, पाप, रोग, शोक, मृत्यु और यमराज सभी काँप उठते हैं; इसमें संशय नहीं है*।
श्रीराधा-माधवके नामकी यत्किञ्चित् व्याख्या जो गुरु-मुखसे सुनी थी, वह मैंने यथाज्ञान यहाँ बतायी है। इन नामोंकी सम्पूर्णरूपसे व्याख्या करनेमें मैं असमर्थ हूँ। नन्द ! यहाँ पास ही वृन्दावनमें श्रीराधा और माधवका विवाह होगा। साक्षात् जगत्स्रष्टा ब्रह्मा पुरोहित हो अग्निदेवको साक्षी बनाकर प्रसन्नतापूर्वक यह वैवाहिक कार्य सम्पन्न करेंगे। श्रीकृष्णके द्वारा जो बाललीलाएँ होनेवाली हैं, उसमेंसे मुख्यतः ये हैं—कुबेरपुत्रका उद्धार, गोपियोंके घरोंसे माखन चुराकर उसका भक्षण, तालवनमें तालफलका भोजन और धेनुकासुरका वध, बकासुर, केशी और प्रलम्बासुरका खेल-खेलमें ही विनाश, द्विजपत्नियोंका उद्धार, उनके दिये हुए मिष्टान्न और पानका भोजन,
* रेफो हि कोटिजन्माघं कर्मभोगं शुभाशुभम् ॥
आकारो गर्भवासं च मृत्युं च रोगमुत्सृजेत् । धकार आयुषो हानिमाकारो भवबन्धनम् ॥
श्रवणस्मरणोक्तिभ्यः प्रणश्यति न संशयः । रेफो हि निश्चलां भक्तिं दास्यं कृष्णपदाम्बुजे ॥
सर्वेप्सितं सदानन्दं सर्वसिद्धौघमीश्वरम् । धकारः सहवासं च तत्तुल्यकालमेव च ॥
ददाति सार्टिसारूप्यं तत्त्वज्ञानं हरेः समम् । आकारस्तेजसां राशिं दानशक्तिं हरौ यथा ॥
योगशक्तिं योगमतिं सर्वकालं हरिस्मृतिम् । श्रुत्युक्तिस्मरणाद्योगान्मोहजालं च किल्बिषम् ॥
रोगशोकमृत्युयमा वेपन्ते नात्र संशयः। (१३। १०५—१११)
४७४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
इन्द्रयागकी परम्पराका भंजन, इन्द्रके कोपसे गोकुलकी रक्षा, गोपियोंके वस्त्रोंका अपहरण, उनके व्रतका सम्पादन, पुनः उन्हें वस्त्र अर्पण तथा मनोवाञ्छित वरदान देनेका कार्य करके ये श्यामसुन्दर अपनी लीलाओंसे उनके चित्तको चुरा लेंगे और उन्हें सर्वथा अपने अधीन कर लेंगे। तदनन्तर इनके द्वारा अत्यन्त रमणीय रासोत्सवका आयोजन होगा, जो सबका आनन्दवर्धन करेगा। शरद् और वसन्त-ऋतुमें रातके समय पूर्ण चन्द्रमाका उदय होनेपर रासमण्डलमें गोपियोंको नूतन प्रेम-मिलनका सुख प्रदान करके ये श्यामसुन्दर उनका मनोरथ पूर्ण करेंगे। फिर कौतूहलवश उनके साथ जल-विहार भी करेंगे। तत्पश्चात् श्रीदामाके शापके कारण इनका गोप-गोपियों तथा श्रीराधाके साथ (पार्थिव) सौ वर्षोंके लिये वियोग हो जायगा। उस समय ये मथुरा चले जायँगे और वहाँ इनका जाना गोपियोंके लिये शोकवर्द्धक होगा। उस समय पुनः ये उनके पास आकर उन्हें समझा-बुझाकर धैर्य बँधायेंगे और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करेंगे। उस प्रबोधन और आध्यात्मिक ज्ञानके द्वारा ये रथ तथा सारथि अक्रूरकी रक्षा करेंगे। फिर रथपर आरूढ़ हो पिता, भाई एवं ब्रजवासियोंके साथ यमुनाजीको लाँघकर ब्रजसे मथुराको पधारेंगे। मार्गमें यमुनाजीके जलके भीतर अक्रूरको अपने स्वरूपका दर्शन कराकर उन्हें ज्ञान देंगे। फिर सायंकाल मथुरामें पहुँचकर कौतूहलवश नगरमें घूम-घूमकर सबको दर्शन देंगे। माली, दर्जी और कुब्जाको भवबन्धनसे मुक्त करेंगे। शंकरजीके धनुषको तोड़कर यज्ञभूमिका दर्शन करेंगे। फिर कुवलयापीड़ हाथी और मल्लोंका वध करनेके पश्चात् अपने सामने राजा कंसको देखेंगे और तत्काल उसका विध्वंस करके माता-पिताको बन्धनसे छुड़ायेंगे। तदनन्तर तुम सब गोपोंको समझा-बुझाकर लौटायेंगे। कंसके राज्यपर उग्रसेनका अभिषेक करेंगे। कंसके बन्धु-बान्धवोंको ज्ञानोपदेश देकर उनका शोक दूर करेंगे। इसके बाद अपने भाईका और अपना उपनयन-संस्कार कराकर गुरुके मुखसे विद्या ग्रहण करेंगे। गुरुजीको उनका मरा हुआ पुत्र लाकर देंगे और फिर घर लौट आयेंगे। इसके बाद राजा जरासंधके सैनिकोंको चकमा देकर दुरात्मा कालयवनका वध, द्वारकापुरीका निर्माण, मुचुकुन्दका उद्धार तथा यादवोंसहित द्वारकापुरीको प्रस्थान करेंगे। वहाँ कौतूहलवश स्त्रीसमूहोंके साथ विवाह करके उनके साथ क्रीडा-विहार करेंगे। उनका तथा उनके पुत्र-पौत्रादिका सौभाग्यवर्धन करेंगे। मणिसम्बन्धी मिथ्या कलङ्कका मार्जन, पाण्डवोंकी सहायता, भूभार-हरण, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके राजसूययज्ञका लीलापूर्वक सम्पादन, पारिजातका अपहरण, इन्द्रके गर्वका गंजन, सत्यभामाके व्रतकी पूर्ति, बाणासुरकी भुजाओंका खण्डन, शिवके सैनिकोंका मर्दन, महादेवजीको जृम्भणास्त्रसे बाँधना, बाणपुत्री उषाका अपहरण, अनिरुद्धको बाणासुरके बन्धनसे छुटकारा दिलाना, वाराणसीपुरीका दहन, ब्राह्मणकी दरिद्रताका दूरीकरण, एक ब्राह्मणके मरे हुए पुत्रोंको लाकर उसे देना, दुष्टोंका दमन आदि करना तथा तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे तुम ब्रजवासियोंके साथ पुनः मिलना इत्यादि कार्य करके ये श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ फिर ब्रजमें आयेंगे। तदनन्तर अपने नारायण-अंशको द्वारकापुरीमें भेजकर ये जगदीश्वर गोलोकनाथ यहाँ राधाके साथ समस्त आवश्यक कार्य पूर्ण करेंगे तथा ब्रजवासियों एवं राधाको साथ लेकर शीघ्र ही गोलोकधाममें पधारेंगे। नारायणदेव तुम्हें साथ लेकर वैकुण्ठ पधारेंगे। नर-नारायण नामक जो दोनों ऋषि हैं, वे धर्मके घरको चले जायँगे तथा श्वेतद्वीपनिवासी विष्णु क्षीरसागरको पधारेंगे।
नन्द! इस प्रकार भविष्यमें होनेवाली लीलाओंका वर्णन मैंने किया है। यह वेदका निश्चित मत है। अब इस समय जिस उद्देश्यसे मेरा आना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४७५ हुआ है, उसे बताता हूँ; सुनो। माघ शुक्ल चतुर्दशीकी शुभ बेलामें इन बालकोंका संस्कार करो। उस दिन गुरुवार है। रेवती नक्षत्र है। चन्द्र और तारा शुद्ध हैं। मीनके चन्द्रमा हैं। उसपर लग्नेशकी पूर्ण दृष्टि है। उत्तम वणिज नामक करण है और मनोहर शुभ योग है। वह दिन परम दुर्लभ है। उसमें सभी उत्कृष्ट एवं उपयोगी योगोंका उदय हुआ है। अतः पण्डितोंके साथ विचार करके उसी दिन प्रसन्नतापूर्वक संस्कार- कर्मका सम्पादन करो। ऐसा कह मुनीश्वर गर्ग बाहर आकर बैठ गये। नन्द और यशोदाको बड़ा हर्ष हुआ और वे संस्कार-कर्मके लिये तैयारी करने लगे। इसी समय गर्गजीको देखनेके लिये गोप-गोपियाँ और बालक-बालिकाएँ नन्दभवनमें आयीं। उन्होंने देखा - मुनिश्रेष्ठ गर्ग मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं। शिष्यसमूहोंसे घिरकर ब्रह्मतेजसे उद्भासित हो रहे हैं और प्रश्न पूछनेवाले किसी सिद्धपुरुषको वे प्रसन्नतापूर्वक गूढ़योगका रहस्य समझा रहे हैं। नन्दभवनकी एक-एक सामग्रीको मुस्कराते हुए देख रहे हैं और योगमुद्रा धारण किये स्वर्णसिंहासनपर बैठे हैं। ज्ञानमयी दृष्टिसे भूत, वर्तमान और भविष्यको भी देख रहे हैं। वे मन्त्रके प्रभावसे अपने हृदयमें परमात्माके जिस सिद्ध स्वरूपको देखते हैं, उसीको मुस्कराते हुए शिशुके रूपमें बाहर यशोदाकी गोदमें देख रहे हैं। महेश्वरके बताये हुए ध्यानके अनुसार जिस रूपका उन्हें साक्षात्कार हुआ था, उसी पूर्णकाम परमात्मस्वरूपका अत्यन्त प्रीतिपूर्वक दर्शन करके नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए वे पुलकित शरीरसे भक्तिके सागरमें निमग्न दिखायी देते थे। योगचर्याके अनुसार मन-ही-मन भगवान्की पूजा और प्रणाम करते थे। गोप-गोपियोंने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और गर्गजीने भी उन सबको आशीर्वाद दिया। तदनन्तर मुनि अपने आसनपर विराजमान हुए और वे समागत स्त्री-पुरुष अपने-अपने घरको गये। नन्दने आनन्दित होकर निकटवर्ती तथा दूरवर्ती बन्धुजनोंके पास शीघ्र ही मङ्गलपत्रिका पठायी। इसके बाद उन्होंने दूध, दही, घी, गुड़, तेल, मधु, माखन, तक्र और चीनीके शर्बतसे भरी हुई बहुत-सी नहरें लीलापूर्वक तैयार करायीं। इसके बाद उन्होंने अगहनीके चावलोंके सौ ऊँचे-ऊँचे पर्वताकार ढेर लगवाये। चिउरोंके सौ पर्वत, नमकके सात, शर्कराके भी सात, लड्डुओंके सात तथा पके फलोंके सोलह पर्वत खड़े कराये। जौ, गेहूँके आटेके पके हुए लड्डुक, पिण्ड, मोदक तथा स्वस्तिक (मिष्टान्न- विशेष) -के अनेक पर्वत खड़े किये गये थे। कपर्दकोंके बहुत ही ऊँचे-ऊँचे सात पर्वत खड़े दिखायी देते थे। कर्पूर आदिसे युक्त ताम्बूलके बीडोंसे घर भरा हुआ था। सुवासित जलके चौड़े-चौड़े कुण्ड भरे गये थे, जिनमें चन्दन, अगुरु और केसर मिलाये गये थे। नन्दजीने कौतूहलवश नाना प्रकारके रत्न, भाँति-भाँतिके सुवर्ण, रमणीय मोती-मूँगे, अनेक प्रकारके मनोहर वस्त्र और आभूषण भी पुत्रके अन्न- प्राशन-संस्कारके लिये संचित किये थे। आँगनको झाड़-बुहारकर सुन्दर बनाया गया। उसमें चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया। केलेके खंभों, आमके नये पल्लवोंकी बन्दनवारों और महीन वस्त्रोंसे उस आँगनको कौतुकपूर्वक सब ओरसे घेर दिया गया। यथास्थान मङ्गल-कलश स्थापित किये गये। उन्हें फलों और पल्लवोंसे सजाया गया तथा चन्दन, अगुरु, कस्तूरी एवं फूलोंके गजरोंसे सुशोभित किया गया। सुन्दर पुष्पहारों और मनोहर वस्त्रोंकी राशियोंसे नन्द-भवनके आँगनको सजाया गया था। उसमें गौओं, मधुपर्कों, आसनों, फलों और सजल कलशोंके
| ४७६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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समूह यथास्थान रखे गये थे। वहाँ नाना प्रकारके अत्यन्त दुर्लभ और मनोहर वाद्य बज रहे थे। ढक्का, दुन्दुभि, पटह, मृदङ्ग, मुरज, आनकसमूह, वंशी, ढोल और झाँझ आदिके शब्द हो रहे थे। विद्याधरियोंके नृत्य, भाव-भंगी तथा भ्रमणसे नन्दप्राङ्गणकी अपूर्व शोभा हो रही थी। उसके साथ ही गन्धर्वराजोंके मूर्छनायुक्त संगीत तथा स्वर्ण-सिंहासनों एवं रथोंके सम्मिलित शब्द वहाँ गूँज रहे थे।
इसी समय संदेशवाहकने प्रसन्नतापूर्वक आकर नन्दरायजीसे कहा—'प्रभो! आपके भाई-बन्धु गोपराज एवं गोपगण पधारे हैं। उनमेंसे कुछ लोग घोड़ोंपर चढ़कर आये हैं, कुछ हाथियोंपर सवार हैं और कितने ही रथोंपर आरूढ़ हो शीघ्रतापूर्वक पधारे हैं। रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित कितने ही राजपुत्रोंका भी यहाँ शुभागमन हुआ है। पत्नी और सेवकोंसहित गिरिभानुजी पधारे हैं। उनके साथ चार-चार लाख रथ और हाथी हैं। घोड़े और शिविकाओंकी संख्या एक-एक करोड़ है। ऋषीन्द्र, मुनीन्द्र, विद्वान्, ब्राह्मण, बन्दीजन और भिक्षुकोंके समूह भी निकट आ गये हैं। गोप और गोपियोंकी गणना करनेमें कौन समर्थ हो सकता है? आप स्वयं बाहर चलकर देखें।'
आँगनमें खड़े हुए दूतने जब ऐसी बात कही, तब उसे सुनकर व्रजराज नन्दजी स्वयं उन समागत अतिथियोंके पास आये। उन सबको साथ ले आकर उन्होंने आँगनमें बिठाया और तत्काल ही उनका पूजन किया। ऋषि आदिके समुदायको उन्होंने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया और एकाग्रचित्त हो उन सबके लिये पाद्य आदि समर्पित किये। उस समय नन्दगोकुल विभिन्न प्रकारकी वस्तुओं तथा गोपबन्धुओंसे परिपूर्ण हो रहा था। वहाँ कोई किसीके शब्दको नहीं सुन सकता था। साक्षात् कुबेरने श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये वहाँ तीन मुहूर्ततक सुवर्णकी वर्षा करके गोकुलको सोनेसे भर दिया। नन्दकी यह सम्पत्ति देखकर उनके सभी भाई-बन्धु लज्जासे नतमस्तक हो गये। उन्होंने अपने कौतूहलको छिपा लिया। नन्दजीने नित्यकर्म करके पवित्र हो दो धुले वस्त्र धारण किये। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरसे अपने ललाट आदि अङ्गोंमें तिलक किया। इसके बाद गर्गजी तथा मुनीश्वरोंकी आज्ञा ले व्रजेश्वर नन्द दोनों पैर धोकर सोनेके मनोहर पीढ़ीपर बैठे। उन्होंने श्रीविष्णुका स्मरण करके आचमन किया। फिर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर वेदोक्त कर्मका सम्पादन करनेके अनन्तर बालकको भोजन कराया। आनन्दमग्न हुए नन्दजीने मुनिवर गर्गके कथनानुसार शुभ बेलामें बालकका मङ्गलमय नाम रखा—'कृष्ण'। इस प्रकार जगदीश्वरको सघृत भोजन कराकर उनका नामकरण करनेके अनन्तर नन्दरायने बाजे बजवाये और मङ्गल-कृत्य करवाये। उन्होंने ब्राह्मणोंको प्रसन्नतापूर्वक नाना प्रकारके सुवर्ण, भाँति-भाँतिके धन, भक्ष्य पदार्थ और वस्त्र दिये। बन्दीजनों और भिक्षुकोंको इतनी अधिक मात्रामें उन्होंने सुवर्ण बाँटा कि सुवर्णके भारी भारसे आक्रान्त होनेके कारण वे सब-के-सब चल नहीं पाते थे। ब्राह्मणों, बन्धुजनों और विशेषतः भिक्षुकोंको भी उन्होंने पूर्णतया मनोहर मिष्टान्नका भोजन कराया। उस समय नन्दगोकुलमें बड़े जोर-जोरसे निरन्तर यही शब्द सुनायी देता था कि 'दो और दो।' 'खाओ-खाओ'। परिपूर्ण रत्न, वस्त्र, आभूषण, मूँगे, सुवर्ण, मणिसार तथा विश्वकर्माके बनाये हुए मनोहर सुवर्णपात्र वहाँ ब्राह्मणोंको बाँटे गये। व्रजराज नन्दने गर्गजीके पास जाकर विनयपूर्वक अपनी इच्छा प्रकट की और नम्रतापूर्वक उनके शिष्योंको तथा शेष द्विजोंको सुवर्णके अनेक भार पूर्ण मात्रामें प्रदान किये।
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! श्रीहरिको
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४७७
गोदमें लेकर गर्गजी एकान्त स्थानमें गये और बड़ी भक्ति एवं प्रसन्नतासे उन परमेश्वरको प्रणाम करके उनका स्तवन करने लगे। उस समय उनके नेत्रोंसे आँसू बह रहे थे। शरीरमें रोमाञ्च हो आया था। मस्तक भक्तिभावसे झुक गया था और श्रीकृष्णचरणारविन्दोंमें दोनों हाथ जोड़कर वे इस प्रकार बोल रहे थे।
गर्गजीने कहा— हे श्रीकृष्ण! हे जगन्नाथ! हे भक्तभयभञ्जन! आप मुझपर प्रसन्न होइये। परमेश्वर! मुझे अपने चरणकमलोंकी दास्य-भक्ति दीजिये। भक्तोंको अभय देनेवाले गोविन्द! आपके पिताजीने मुझे बहुत धन दिया है; किंतु उस धनसे मेरा क्या प्रयोजन है? आप मुझे अपनी अविचल भक्ति प्रदान कीजिये। प्रभो! अणिमादि सिद्धियोंमें, योगसाधनोंमें, अनेक प्रकारकी मुक्तियोंमें, ज्ञानतत्त्वमें अथवा अमरत्वमें मेरी तनिक भी रुचि नहीं है। इन्द्रपद, मनुपद तथा चिरकालतक स्वर्गलोकरूपी फलके लिये भी मेरे मनमें कोई इच्छा नहीं है। मैं आपके चरणोंकी सेवा छोड़कर कुछ नहीं चाहता। सालोक्य, सार्ष्टि, सारूप्य, सामीप्य और एकत्व—ये पाँच प्रकारकी मुक्तियाँ सभीको अभीष्ट हैं। परंतु परमात्मन्! मैं आपके चरणोंकी सेवा छोड़कर इनमेंसे किसीको भी ग्रहण करना नहीं चाहता। मैं गोलोकमें अथवा पातालमें निवास करूँ, ऐसा भी मेरा मनोरथ नहीं है; परंतु मुझे आपके चरणारविन्दोंका निरन्तर चिन्तन होता रहे, यही मेरी अभिलाषा है। कितने ही जन्मोंके पुण्यके फलका उदय हुआ, जिससे भगवान् शंकरके मुखसे मुझे आपके मन्त्रका उपदेश प्राप्त हुआ। उस मन्त्रको पाकर मैं सर्वज्ञ और समदर्शी हो गया हूँ। सर्वत्र मेरी अबाध गति है। कृपासिन्धो! दीनबन्धो! मुझपर कृपा कीजिये। मुझे अभय देकर अपने चरणकमलोंमें रख लीजिये। फिर मृत्यु मेरा क्या करेगी? आपके चरणारविन्दोंकी सेवासे ही भगवान् शंकर सबके ईश्वर, मृत्युञ्जय, जगत्का अन्त करनेवाले तथा योगियोंके गुरु हुए हैं। ब्रह्मन्! जिनके एक दिनमें चौदह इन्द्रोंका पतन होता है, वे जगत्-विधाता ब्रह्मा आपके चरणकमलोंकी सेवासे ही उस पदपर प्रतिष्ठित हुए हैं। आपके चरणोंकी सेवा करके ही धर्मदेव समस्त कर्मोंके साक्षी हुए हैं; सुदुर्जय कालको जीतकर सबके पालक और फलदाता हुए हैं। आपके चरणारविन्दोंकी सेवाके प्रभावसे ही सहस्र मुखोंवाले शेषनाग सम्पूर्ण विश्वको सरसोंके एक दानेकी भाँति सिरपर धारण करते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे भगवान् शिव कण्ठमें विष धारण करते हैं। जो सम्पूर्ण सम्पदाओंकी सृष्टि करनेवाली तथा देवियोंमें परातपरा हैं, वे लक्ष्मीदेवी अपने केश-कलापोंसे आपके चरणोंका मार्जन करती हैं। जो सबकी बीजरूपा हैं, वे शक्तिरूपिणी प्रकृति आपके चरणकमलोंका चिन्तन करते-करते उन्हींमें तत्पर हो जाती हैं। सबकी बुद्धिरूपिणी एवं सर्वरूपा पार्वतीने आपके चरणोंकी सेवासे ही महेश्वर शिवको प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त किया है। विद्याकी अधिष्ठात्री देवी जो ज्ञानमाता सरस्वती हैं, वे आपके चरणारविन्दोंकी आराधना करके ही सबकी पूजनीया हुई हैं। जो ब्रह्माजी तथा ब्राह्मणोंकी गति हैं, वे वेदजननी सावित्री आपकी चरणसेवासे ही तीनों लोकोंको पवित्र करती हैं। पृथ्वी आपके चरणकमलोंकी सेवाके प्रभावसे ही जगत्को धारण करनेमें समर्थ, रत्नगर्भा तथा सम्पूर्ण शस्योंको उत्पन्न करनेवाली हुई है। आपकी अंशभूता तथा आपके ही तुल्य तेजस्विनी राधा आपके वक्षःस्थलमें स्थान पाकर भी आपके चरणोंकी सेवा करती हैं; फिर दूसरेकी क्या बात है? ईश! जैसे शिव आदि देवता और लक्ष्मी आदि देवियाँ आपसे सनाथ हैं, उसी तरह मुझे भी सनाथ कीजिये; क्योंकि ईश्वरकी सबपर समान कृपा होती है। नाथ! मैं घरको नहीं जाऊँगा।
| ४७८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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आपका दिया हुआ यह धन भी नहीं लूँगा। मुझ अनुरागी सेवकको अपने चरणकमलोंकी सेवामें रख लीजिये।
इस प्रकार स्तुति करके गर्गजी नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए श्रीहरिके चरणोंमें गिर पड़े और जोर-जोरसे रोने लगे। उस समय भक्तिके उद्रेकसे उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया था। गर्गजीकी बात सुनकर भक्तवत्सल श्रीकृष्ण हँस पड़े और बोले—'मुझमें तुम्हारी अविचल भक्ति हो।'
जो मनुष्य गर्गजीद्वारा किये गये इस स्तोत्रका तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है, वह श्रीहरिकी सुदृढ़ भक्ति, दास्यभाव और उनकी स्मृतिका सौभाग्य अवश्य प्राप्त कर लेता है। इतना ही नहीं, वह श्रीकृष्णभक्तोंकी सेवामें तत्पर हो जन्म, मृत्यु, जरा, रोग, शोक और मोह आदिके संकटसे पार हो जाता है। श्रीकृष्णके साथ रहकर सदा आनन्द भोगता है और श्रीहरिसे कभी उसका वियोग नहीं होता।
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! श्रीहरिकी इस प्रकार स्तुति करके गर्गमुनिने उन्हें नन्दजीको दे दिया और प्रशंसापूर्वक कहा—'गोपराज! अब मैं घर जाता हूँ, आज्ञा दो। अहो! कैसी विचित्र बात है कि संसार मोहजालसे जकड़ा हुआ है। जैसे समुद्रमें फेन उठता और मिटता रहता है, उसी प्रकार इस भवसागरमें मनुष्योंको संयोग और वियोगका अनुभव होता रहता है।'
गर्गकी यह बात सुनकर नन्दजी उदास हो गये; क्योंकि साधु पुरुषोंके लिये सत्पुरुषोंका वियोग मरणसे भी अधिक कष्टदायक होता है। सम्पूर्ण शिष्योंसे घिरे हुए मुनिवर गर्ग जब जानेको उद्यत हुए, तब रोते हुए नन्द आदि सब गोप-गोपियोंने अत्यन्त प्रीतिपूर्वक विनीतभावसे उन्हें प्रणाम किया। उन सबको आशीर्वाद देकर मुनिश्रेष्ठ गर्ग सानन्द मथुराको पधारे। ऋषि-मुनि तथा प्रिय बन्धुवर्ग सभी धनसे सम्पन्न हो प्रसन्न-मनसे अपने-अपने घरोंको गये। समस्त बन्दीजन भी पूर्णमनोरथ होकर अपने घरको लौट गये। उन सबको मीठे पदार्थ, वस्त्र, उत्तम श्रेणीके अश्व तथा सोनेके आभूषण प्राप्त हुए थे। आकण्ठ भोजन करके तृप्त हुए भिक्षुकगण बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने घरको लौटे। वे सुवर्ण और वस्त्रोंके भारी भारसे थककर चलनेमें असमर्थ हो गये थे। कोई धीरे-धीरे चलते, कोई विश्रामके लिये धरतीपर सो जाते और कुछ लोग मार्गमें उठते-बैठते जाते थे। कोई वहाँ सानन्द हँसते हुए टिक जाते थे। कपर्दकों तथा अन्य वस्तुओंके जो बहुत-से शेष भाग बच गये थे, उन्हें कुछ लोग ले लेते थे। कुछ लोग खड़े हो दूसरोंको वे वस्तुएँ दिखाते थे। कुछ लोग नृत्य करते थे और कितने ही लोग वहाँ गीत गाते थे। कोई नाना प्रकारकी प्राचीन गाथाएँ कहते थे। राजा मरुत्त, श्वेत, सगर, मान्धाता, उत्तानपाद, नहुष और नल आदिकी जो कथाएँ हैं, उन्हें सुनाते थे। श्रीरामके अश्वमेधयज्ञकी तथा राजा रन्तिदेवके दान-कर्मकी भी गाथाएँ गाते थे। कोई ठहर-ठहरकर और कोई सो-सोकर यात्रा करते थे। इस प्रकार सब लोग प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घरोंको गये। हर्षसे भरे हुए नन्द और यशोदा दोनों दम्पति बालकृष्णको गोदमें लेकर कुबेरभवनके समान रमणीय अपने भव्य भवनमें रहने लगे। इस प्रकार वे दोनों बालक शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी कलाकी भाँति बढ़ने लगे। अब वे गौओंकी पूँछ और दीवाल पकड़कर खड़े होने लगे। प्रतिदिन आधा शब्द या चौथाई शब्द बोल पाते थे। मुने! आँगनमें चलते हुए वे दोनों भाई माता-पिताका हर्ष बढ़ाने लगे। अब बालक श्रीहरि दो-एक पग चलनेमें समर्थ हो गये। घरमें और आँगनमें वे घुटनोंके बलसे चलने-फिरने लगे। संकर्षणकी अवस्था बालक श्रीकृष्णसे एक साल अधिक थी। वे दोनों भाई माता-पिताका आनन्दवर्धन करते हुए दिन-दिन बड़े होने लगे।
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४७९ मायासे शिशुरूपधारी वे दोनों बालक गोकुलमें विचरते हुए अच्छी तरह चलनेमें समर्थ हो गये। अब वे स्फुट वाक्य बोल लेते थे। मुने ! गर्गजी मथुरामें वसुदेवजीके घर गये। उन्होंने पुरोहितजीको प्रणाम किया और अपने दोनों पुत्रोंका कुशल-समाचार पूछा। गर्गजीने उनका कुशल-मङ्गल सुनाया और नामकरण- संस्कारके महान् उत्सवकी चर्चा की। वह सब सुननेमात्रसे वसुदेवजी आनन्दके आँसुओंमें निमग्न हो गये। देवकीजी बड़े प्रेमसे बारंबार बच्चोंका समाचार पूछने लगीं। वे आनन्दके आँसू बहाती हुई बार-बार रोने लगती थीं। गर्गजी उन दोनों दम्पतिको आशीर्वाद दे सानन्द अपने घरको गये तथा वे दोनों पति-पत्नी अपने कुबेरभवनोपम गृहमें निवास करने लगे। नारद ! जिस कल्पमें यह कथा घटित हुई थी, उस समय तुम पचास कामिनीयोंके पति गन्धर्वराज उपबर्हणके नामसे प्रसिद्ध थे। वे सब सुन्दरियाँ तुम्हें प्राणोंसे बढ़कर प्रिय मानती थीं और तुम शृङ्गारमें निपुण नवयुवक थे। तदनन्तर ब्रह्माजीके शापसे एक द्विजकी दासीके पुत्र हुए। उसके बाद वैष्णवोंकी जूठन खानेसे अब तुम ब्रह्माजीके पुत्र हुए हो। श्रीहरिकी सेवासे सर्वदर्शी और सर्वज्ञ हो गये हो तथा पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेमें समर्थ हो। श्रीकृष्णका यह चरित्र - उनके नामकरण और अन्नप्राशन आदिका वृत्तान्त कहा गया। यह जन्म, मृत्यु और जराका नाश करनेवाला है। अब उनकी अन्य लीलाएँ बता रहा हूँ, सुनो। (अध्याय १३) यशोदाके यमुनास्नानके लिये जानेपर श्रीकृष्णद्वारा दही-दूध-माखन आदिका भक्षण तथा बर्तनोंको फोड़ना, यशोदाका उन्हें पकड़कर वृक्षसे बाँधना, वृक्षका गिरना, गोप-गोपियों तथा नन्दजीका यशोदाको उपालम्भ देना, नल-कूबर और रम्भाको शाप प्राप्त होने तथा उससे मुक्त होनेकी कथा भगवान् नारायण कहते हैं- नारद ! एक दिन नन्दरानी यशोदा स्नान करनेके लिये यमुनातटपर गयीं। इधर मधुसूदन श्रीकृष्ण दही-माखन आदिसे भरे-पूरे घरको देखकर बड़े प्रसन्न हुए। घरमें जो दही, दूध, घी, तक्र और मनोहर मक्खन रखा हुआ था, वह सब आप भोग लगा गये। छकड़ेपर जो मधु, मक्खन और स्वस्तिक (मिष्टान्नविशेष) लदा था, उसे भी खा-पीकर आप कपड़ोंसे मुँह पोंछनेकी तैयारी कर रहे थे। इतनेमें ही गोपी यशोदा नहाकर अपने घर लौट आयीं। उन्होंने बालकृष्णको देखा। घरमें दही, दूध आदिके जितने मटके थे, वे सब फूटे और खाली दिखायी दिये। मधु आदिके जो बर्तन थे, वे भी एकदम खाली हो गये थे। यह सब देखकर यशोदामैयाने बालकोंसे पूछा- 'अरे ! यह तो बड़ा अद्भुत कर्म है। बच्चो! तुम सच-सच बताओ, किसने यह अत्यन्त दारुण कर्म किया है?' यशोदाकी बात सुनकर सब बालक एक साथ बोल उठे - 'मैया ! हम सच कहते हैं, तुम्हारा लाला ही सब खा गया, हमलोगोंको तनिक भी नहीं दिया है।' बालकोंका यह वचन सुनकर नन्दरानी कुपित हो उठीं और लाल-लाल आँखें किये बेंत लेकर दौड़ीं। इधर गोविन्द भाग निकले। मैया उन्हें पकड़ न सकीं। भला, जो शिव आदिके ध्यानमें भी नहीं आते, योगियोंके लिये भी जिन्हें पकड़ पाना अत्यन्त कठिन है; उन्हें यशोदाजी कैसे पकड़ पातीं ? यशोदाजी पीछा करके थक गयीं। शरीर पसीनेसे लथपथ हो गया। वे मनमें ही क्रोध भरकर खड़ी हो गयीं। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे।
४८० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
माताको यों थकी हुई देख कृपालु पुरुषोत्तम जगदीश्वर श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए उनके सामने खड़े हो गये। नन्दरानी उनका हाथ पकड़कर अपने घर ले आयीं। उन्होंने मधुसूदनको वस्त्रसे वृक्षमें बाँध दिया। श्रीकृष्णको बाँधकर यशोदा अपने घरमें चली गयीं तथा जगत्पति परमेश्वर श्रीहरि वृक्षकी जड़के पास खड़े रहे। नारद! श्रीकृष्णके स्पर्शमात्रसे वह पर्वताकार वृक्ष सहसा भयानक शब्द करके वहाँ गिर पड़ा। उस वृक्षसे सुन्दर वेषधारी एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ। वह रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित, गौरवर्ण तथा किशोर-अवस्थाका था। सुवर्णमय शृङ्गारसे विभूषित जगदीश्वर श्रीकृष्णको प्रणाम करके वह दिव्य पुरुष मुस्कराता हुआ दिव्य रथपर आरूढ़ हुआ और अपने घरको चला गया। वृक्षको गिरते देख व्रजेश्वरी यशोदा भयसे त्रस्त हो उठीं। उन्होंने रोते हुए बालक श्यामसुन्दरको उठाकर छातीसे लगा लिया। इतनेमें ही गोकुलके गोप और गोपियाँ उनके घरमें आ पहुँचीं। वे सब-की-सब यशोदाको फटकारने लगीं। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक शिशुकी रक्षाके लिये शान्तिकर्म किया।
सब गोपियाँ यशोदासे कहने लगीं— नन्दरानी! अत्यन्त वृद्धावस्थामें तुम्हें यह पुत्र प्राप्त हुआ है। संसारमें जो भी धन, धान्य तथा रत्न है, वह सब पुत्रके लिये ही है। आज हमने सचमुच यह जान लिया कि तुम्हारे भीतर सुबुद्धि नहीं है। जो खाद्यपदार्थ पुत्रने नहीं खाया, वह सब इस भूतलपर निष्फल ही है। ओ निष्ठुरे! तुमने दही-दूधके लिये अपने लालाको वृक्षकी जड़में बाँध दिया और स्वयं घरके काम-काजमें लग गयीं। दैववश वृक्ष गिर पड़ा; किंतु हम गोपियोंके सौभाग्यसे वृक्षके गिरनेपर भी बालक जीवित बच गया। अरी मूढ़े! यदि बालक नष्ट हो जाता तो इन वस्तुओंका क्या प्रयोजन था?
श्रीनन्दजीने भी यशोदाको उलाहना दिया। ब्राह्मणों और बन्दीजनोंने बालकको शुभ आशीर्वाद दिये। सबने मिलकर ब्राह्मणोंसे श्रीहरिका नाम-कीर्तन करवाया।
नारदजीने पूछा— भगवन्! वह सुन्दर वेषधारी पुरुष कौन था, जो गोकुलमें वृक्ष होकर रहता था? किस कारणसे उसे वृक्ष होना पड़ा था?
भगवान् नारायण बोले— एक बार कुबेरपुत्र नलकूबर अप्सरा रम्भाके साथ नन्दनवनमें चला गया। वहाँ उसने भाँति-भाँतिसे विहार किये। इसी समय महर्षि देवल उधरसे निकले। उनकी दृष्टि नलकूबर और रम्भापर पड़ गयी। इधर मुनिको देखकर भी नलकूबर-रम्भाने उठकर उनका सम्मान नहीं किया। मुनिवर देवल उन दोनोंकी ऐसी दुर्वृत्ति देखकर कुपित हो गये और उन्हें शाप देते हुए बोले—'नलकूबर! तुम गोकुलमें जाकर वृक्षरूप धारण करो। फिर श्रीकृष्णका स्पर्श पानेपर अपने भवनमें लौट आओगे और रम्भा! तुम भी मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर राजा जनमेजयकी सौभाग्यशालिनी पत्नी बनो। अश्वमेधयज्ञमें इन्द्रका स्पर्श पाकर तुम पुनः स्वर्गमें चली जाओगी।'
वह नलकूबर ही यह वृक्ष बना और रम्भाने भारतमें राजा सुचन्द्रकी कन्यारूपसे जन्म लेकर जनमेजयकी महारानी बननेका सौभाग्य प्राप्त किया। जनमेजयके अश्वमेधयज्ञमें इन्द्रने महारानीको स्पर्श कर लिया। इससे उसने योगावलम्बन करके देहको त्याग दिया और वह स्वर्गधामको चली गयी। महामुने! इस प्रकार मैंने अर्जुन-वृक्षके भङ्ग होने तथा नलकूबर एवं रम्भाके शापमुक्त होनेका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। श्रीकृष्णका पुण्यदायक चरित्र जन्म, मृत्यु एवं जराका नाश करनेवाला है। उसका इस रूपमें वर्णन किया गया। अब उनकी दूसरी लीलाओंका वर्णन करता हूँ। (अध्याय १४)
६९- श्रीकृष्णद्वारा दैत्यराज प्रलम्बका वध
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४८१ नन्दका शिशु श्रीकृष्णको लेकर वनमें गो-चारणके लिये जाना, श्रीराधाका आगमन, नन्दसे उनकी वार्ता, शिशु कृष्णको लेकर राधाका एकान्त वनमें जाना, वहाँ रत्नमण्डपमें नवतरुण श्रीकृष्णका प्रादुर्भाव, श्रीराधा-कृष्णकी परस्पर प्रेमवार्ता, ब्रह्माजीका आगमन, उनके द्वारा श्रीकृष्ण और राधाकी स्तुति, वर-प्राप्ति तथा उनका विवाह कराना, नवदम्पतिका प्रेम-मिलन तथा आकाशवाणीके आश्वासन देनेपर शिशुरूपधारी श्रीकृष्णको लेकर राधाका यशोदाजीके पास पहुँचाना भगवान् नारायण कहते हैं- नारद ! एक | थी। उनका मुख शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी दिन नन्दजी श्रीकृष्णको साथ लेकर वृन्दावनमें | आभाको छीने लेता था। नेत्र शरत्कालके मध्याह्नमें गये और वहाँ भाण्डीर उपवनमें गौओंको चराने | खिले हुए कमलोंकी शोभाको तिरस्कृत कर रहे लगे। उस भूभागमें स्वच्छ तथा स्वादिष्ट जलसे | थे। दोनों आँखोंमें तारा, बरौनी तथा अञ्जनसे भरा हुआ एक सरोवर था। नन्दजीने गौओंको | विचित्र शोभाका विस्तार हो रहा था। उनकी उसका जल पिलाया और स्वयं भी पीया। इसके | नासिका पक्षिराज गरुड़की चोंचकी मनोहर सुषमाको बाद वे बालकको गोदमें लेकर एक वृक्षकी | लज्जित कर रही थी। उस नासिकाके मध्यभागमें जड़के पास बैठ गये। मुने ! इसी समय मायासे | शोभनीय मोतीकी बुलाक उज्ज्वल आभाकी सृष्टि मानव-शरीर धारण करनेवाले श्रीकृष्णने अपनी | कर रही थी। केश-कलापोंकी वेणीमें मालतीकी मायाद्वारा अकस्मात् आकाशको मेघमालासे | माला लिपटी हुई थी। दोनों कानोंमें ग्रीष्म-ऋतुके आच्छादित कर दिया। नन्दजीने देखा - आकाश | मध्याह्नकालिक सूर्यकी प्रभाको तिरस्कृत करनेवाले बादलोंसे ढक गया है। वनका भीतरी भाग और | कान्तिमान् कुण्डल झलमला रहे थे। दोनों ओठ भी श्यामल हो गया है। वर्षाके साथ जोर-जोरसे | पके बिम्बाफलकी शोभाको चुराये लेते थे। हवा चलने लगी है। बड़े जोरकी गड़गड़ाहट हो | मुक्तापंक्तिकी प्रभाको फीकी करनेवाली दाँतोंकी रही है। वज्रकी दारुण गर्जना सुनायी देती है। | पंक्ति उनके मुखकी उज्ज्वलताको बढ़ा रही थी। मूसलधार पानी बरस रहा है और वृक्ष काँप रहे | मन्द मुस्कान कुछ-कुछ खिले हुए कुन्द- हैं। उनकी डालियाँ टूट-टूटकर गिर रही हैं। यह | कुसुमोंकी सुन्दर प्रभाका तिरस्कार कर रही थी। सब देखकर नन्दको बड़ा भय हुआ। वे सोचने | कस्तूरीकी बिन्दुसे युक्त सिन्दूरकी बेंदी भालदेशको लगे- 'मैं गौओं तथा बछड़ोंको छोड़कर अपने | विभूषित कर रही थी। शोभाशाली कपालपर घरको कैसे जाऊँगा और यदि घरको नहीं जाऊँगा | मल्लिका-पुष्प धारण करके सती राधा बड़ी सुन्दरी तो इस बालकका क्या होगा ?' नन्दजी इस प्रकार | दिखायी देती थीं। सुन्दर, मनोहर एवं गोलाकार कह ही रहे थे कि श्रीहरि उस समय जलकी | कपोलपर रोमाञ्च हो आया था। उनका वक्षःस्थल वर्षाके भयसे रोने लगे। उन्होंने पिताके कण्ठको | मणिरत्नेन्द्रके सारतत्त्वसे निर्मित हारसे विभूषित जोरसे पकड़ लिया। | था। उनका उदर गोलाकार, सुन्दर और अत्यन्त इसी समय राधा श्रीकृष्णके समीप आयीं। | मनोहर था। विचित्र त्रिवलीकी शोभासे सम्पन्न वे अपनी गतिसे राजहंस तथा खञ्जनके गर्वका | दिखायी देता था। उनकी नाभि कुछ गहरी थी। गंजन कर रही थीं। उनकी आकृति बड़ी मनोहर | कटिप्रदेश उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे रचित मेखला-
७०- श्रीकृष्णके तेजसे दग्ध होकर दैत्यराज केशीका प्राण-परित्याग करना
४८२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
जालसे विभूषित था। टेढ़ी भौंहें कामदेवके अस्त्रोंकी सारभूता जान पड़ती थीं, जिनसे वे योगिराजोंके चित्तको भी मोह लेनेमें समर्थ थीं। वे स्थलकमलोंकी कान्तिको चुरानेवाले दो सुन्दर चरण धारण करती थीं। वे चरण रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे। उनमें महावर लगा हुआ था। श्रेष्ठ मणियोंकी शोभा छीन लेनेवाले लाक्षारागरञ्जित नखोंसे उन चरणोंकी अपूर्व शोभा हो रही थी। उत्तम रत्नोंके सारभागसे रचित मञ्जीरकी झनकारसे वे अनुरञ्जित जान पड़ते थे। उनकी भुजाएँ रत्नमय कङ्कण, केयूर और शङ्खकी मनोहर चूड़ियोंसे विभूषित थीं। रत्नमयी मुद्रिकाओंसे अंगुलियोंकी शोभा बढ़ी हुई थी। वे अग्निशुद्ध दिव्य एवं कोमल वस्त्र धारण किये हुए थीं। उनकी अङ्गकान्ति मनोहर चम्पाके फूलोंकी प्रभाको चुराये लेती थी। उनके एक हाथमें सहस्र दलोंसे युक्त उज्ज्वल क्रीड़ाकमल सुशोभित था और वे अपने श्रीमुखकी शोभा देखनेके लिये हाथमें रत्नमय दर्पण लिये हुए थीं।
उस निर्जन वनमें उन्हें देखकर नन्दजीको बड़ा विस्मय हुआ। वे करोड़ों चन्द्रमालाओंकी प्रभासे सम्पन्न हो दसों दिशाओंको उद्भासित कर रही थीं। नन्दरायजीने उन्हें प्रणाम किया। उनके नेत्रोंसे अश्रु झरने लगे और मस्तक भक्तिभावसे झुक गया। वे बोले—‘देवि! गर्गजीके मुखसे तुम्हारे विषयमें सुनकर मैं यह जानता हूँ कि तुम श्रीहरिकी लक्ष्मीसे भी बढ़कर प्रेयसी हो। साथ ही यह भी जान चुका हूँ कि ये श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण महाविष्णुसे भी श्रेष्ठ, निर्गुण एवं अच्युत हैं; तथापि मानव होनेके कारण मैं भगवान् विष्णुकी मायासे मोहित हूँ। भद्रे! अपने इन प्राणनाथको ग्रहण करो और जहाँ तुम्हारी मौज हो, चली जाओ। अपना मनोरथ पूर्ण कर लेनेके पश्चात् मेरा यह पुत्र मुझे लौटा देना।'
यों कहकर नन्दने भयसे रोते हुए बालकको राधाके हाथमें दे दिया। राधाने बालकको ले लिया और मुखसे मधुर हास प्रकट किया। वे नन्दसे बोलीं—बाबा! यह रहस्य दूसरे किसीपर प्रकट न हो, इसके लिये यत्नशील रहना। नन्द! अनेक जन्मोंके पुण्यफलका उदय होनेसे तुमने आज मेरा दर्शन प्राप्त किया है। गर्गजीके वचनसे तुम इस विषयके ज्ञाता हो गये हो। हमारे अवतारका सारा कारण जानते हो। हम दोनोंके गोपनीय चरित्रको कहीं कहना नहीं चाहिये। अब तुम गोकुलमें जाओ। ब्रजेश्वर! तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो, वह मुझसे माँग लो। उस देवदुर्लभ वरको भी मैं तुम्हें अनायास ही दे सकती हूँ।'
श्रीराधिकाका यह वचन सुनकर ब्रजेश्वरने उनसे कहा—देवि! तुम प्रियतमसहित अपने चरणोंकी भक्ति मुझे प्रदान करो। दूसरी किसी वस्तुकी इच्छा मेरे मनमें नहीं है। जगदम्बिके! परमेश्वरि! तुम दोनोंके संनिधानमें रहनेका सौभाग्य हम दोनों पति-पत्नीको कृपापूर्वक दो। नन्दजीका यह वचन सुनकर परमेश्वरी श्रीराधा बोलीं—‘ब्रजेश्वर! मैं भविष्यमें तुम्हें अनुपम दास्यभाव प्रदान करूँगी। इस समय हमारी भक्ति तुम्हें प्राप्त हो। हम दोनों (प्रिया-प्रियतम)-के चरणकमलोंमें तुम दोनोंकी दिन-रात भक्ति बनी रहे। तुम दोनोंके प्रसन्नहृदयमें हमारी परम दुर्लभ स्मृति निरन्तर होती रहे। मेरे वरके प्रभावसे माया तुम दोनोंपर अपना आवरण नहीं डाल सकेगी। अन्तमें मानवशरीरका त्याग करके तुम दोनों ही गोलोकमें पधारोगे।'
ऐसा कह श्रीकृष्णको दोनों बाँहोंसे सानन्द गोदमें लेकर श्रीराधा अपनी रुचिके अनुसार वहाँसे दूर ले गयीं। उन्हें प्रेमातिरेकसे वक्षः-स्थलपर रखकर वे बार-बार उनका आलिङ्गन और चुम्बन करने लगीं। उस समय उनका सर्वाङ्ग पुलकित हो उठा और उन्होंने रासमण्डलका स्मरण किया। इसी बीचमें राधाने मायाद्वारा निर्मित उत्तम रत्नमय मण्डप देखा, जो सैकड़ों
· श्रीकृष्णजन्मखण्ड · ४८३
रत्नमय कलशोंसे सुशोभित था। भाँति-भाँतिके विचित्र चित्र उस मण्डपकी शोभा बढ़ा रहे थे। विचित्र काननोंसे वह सुशोभित था। सिन्दूरकी-सी कान्तिवाली मणियोंद्वारा निर्मित सहस्रों खम्भे उस मण्डपकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। उसके भीतर चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरके द्रवसे युक्त मालती-मालाओंके समूहसे पुष्पशय्या तैयार की गयी थी। वहाँ नाना प्रकारकी भोगसामग्री संचित थी। दीवारोंमें दिव्य दर्पण लगे हुए थे। श्रेष्ठ मणियों, मुक्ताओं और माणिक्योंकी मालाओंके जालसे उस मण्डपको सजाया गया था। उसमें मणीन्द्रसाररचित किवाड़ लगे हुए थे। वह भवन बेल-बूटोंसे विभूषित वस्त्रों और श्रेष्ठ पताका-समूहोंसे सुसज्जित था। कुंकुमके समान रंगवाली मणियोंद्वारा उसमें सात सीढ़ियाँ बनायी गयी थीं। उस भवनके सामने एक पुष्पोद्यान था, जो भ्रमरोंके गुञ्जारवसे युक्त पुष्पसमूहोंद्वारा शोभा पा रहा था। देवी राधा उस मण्डपको देखकर प्रसन्नतापूर्वक उसके भीतर चली गयीं। वहाँ उन्होंने कर्पूर आदिसे युक्त ताम्बूल तथा रत्नमय कलशमें रखा हुआ स्वच्छ, शीतल एवं मनोहर जल देखा। नारद! वहाँ सुधा और मधुसे भरे हुए अनेक रत्नमय कलश शोभा पा रहे थे। उस भवनके भीतर पुष्पमयी शय्यापर एक किशोर अवस्थावाले श्यामसुन्दर कमनीय पुरुष सो रहे थे, जो अत्यन्त मनोहर थे। उनके मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। वे चन्दनसे चर्चित तथा करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्यलीलासे अलंकृत थे। उन्होंने पीताम्बर पहन रखा था। उनके मुख और नेत्रोंमें प्रसन्नता छा रही थी। उनके दोनों चरण मणीन्द्रसारनिर्मित मञ्जीरकी झनकारसे अनुरञ्जित थे। हाथोंमें उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे बने हुए केयूर और कंगन शोभा दे रहे थे। उत्तम मणियोंद्वारा रचित कान्तिमान् कुण्डलोंसे उनके गण्डस्थलकी अपूर्व शोभा हो रही थी। मणिराज कौस्तुभ उनके वक्षःस्थलमें अपनी उज्ज्वल आभा बिखेर रहा था। दोनों नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको छीने लेते थे। मालतीकी मालाओंसे संयुक्त मोरपंखका मुकुट उनके मस्तकको सुशोभित कर रहा था। त्रिभङ्ग चूड़ा (चोटी) धारण किये वे उस रत्नमण्डपको निहार रहे थे। राधाने देखा मेरी गोदमें बालक नहीं है और उधर वे नूतन यौवनशाली पुरुष दृष्टिगोचर हो रहे हैं। यह देखकर सर्वस्मृतिस्वरूपा होनेपर भी राधाको बड़ा विस्मय हुआ। रासेश्वरी उस परम मनोहर रूपको देखकर मोहित हो गयीं। वे प्रेम और प्रसन्नताके साथ अपने लोचन-चकोरोंके द्वारा उनके मुखचन्द्रकी सुधाका पान करने लगीं। उनकी पलकें नहीं गिरती थीं। मनमें प्रेमविहारकी लालसा जाग उठी। उस समय राधाका सर्वाङ्ग पुलकित हो उठा। वे मन्द-मन्द मुस्कराती हुई प्रेम-वेदनासे व्यथित हो उठीं। तब तिरछी चितवनसे अपनी ओर देखती हुई, मुस्कराते मुखारविन्दवाली श्रीराधासे वहाँ श्रीहरिने इस प्रकार कहा।
**श्रीकृष्ण बोले—**राधे! गोलोकमें देवमण्डलीके भीतर जो वृत्तान्त घटित हुआ था, उसका तुम्हें स्मरण तो है न? प्रिये! पूर्वकालमें मैंने जो कुछ स्वीकार किया है, उसे आज पूर्ण करूँगा। सुमुखि राधे! तुम मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतमा हो। जैसी तुम हो, वैसा मैं हूँ; निश्चय ही हम दोनोंमें भेद नहीं है। जैसे दूधमें धवलता, अग्निमें दाहिका शक्ति और पृथ्वीमें गन्ध होती है; इसी प्रकार तुममें मैं व्याप्त हूँ। जैसे कुम्हार मिट्टीके बिना घड़ा नहीं बना सकता तथा जैसे स्वर्णकार सुवर्णके बिना कदापि कुण्डल नहीं तैयार कर सकता; उसी प्रकार मैं तुम्हारे बिना सृष्टि करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। तुम सृष्टिकी आधारभूता हो और मैं अच्युत बीजरूप हूँ। साध्वि! जैसे आभूषण शरीरकी शोभाका हेतु है, उसी प्रकार तुम मेरी शोभा हो। जब मैं तुमसे अलग रहता
| ४८४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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हूँ, तब लोग मुझे कृष्ण (काला-कलूटा) कहते हैं और जब तुम साथ हो जाती हो तो वे ही लोग मुझे श्रीकृष्ण (शोभाशाली श्रीकृष्ण)-की संज्ञा देते हैं। तुम्हीं श्री हो, तुम्हीं सम्पत्ति हो और तुम्हीं आधारस्वरूपिणी हो। तुम सर्वशक्तिस्वरूपा हो और मैं अविनाशी सर्वरूप हूँ। जब मैं तेजःस्वरूप होता हूँ, तब तुम तेजोरूपिणी होती हो। जब मैं शरीररहित होता हूँ, तब तुम भी अशरीरिणी हो जाती हो। सुन्दरि! मैं तुम्हारे संयोगसे ही सदा सर्व-बीजस्वरूप होता हूँ। तुम शक्तिस्वरूपा तथा सम्पूर्ण स्त्रियोंका स्वरूप धारण करनेवाली हो। मेरा अङ्ग और अंश ही तुम्हारा स्वरूप है। तुम मूलप्रकृति ईश्वरी हो। वरानने! शक्ति, बुद्धि और ज्ञानमें तुम मेरे ही तुल्य हो। जो नराधम हम दोनोंमें भेदबुद्धि करता है, उसका कालसूत्र नामक नरकमें तबतक निवास होता है, जबतक जगत्में चन्द्रमा और सूर्य विद्यमान हैं। वह अपने पहले और बादकी सात-सात पीढ़ियोंको नरकमें गिरा देता है। उसका करोड़ों जन्मोंका पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है। जो नराधम अज्ञानवश हम दोनोंकी निन्दा करते हैं, वे जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता है, तबतक घोर नरकमें पकाये जाते हैं।
'रा' शब्दका उच्चारण करनेवाले मनुष्यको मैं भयभीत-सा होकर उत्तम भक्ति प्रदान करता हूँ और 'धा' शब्दका उच्चारण करनेवालेके पीछे-पीछे इस लोभसे डोलता फिरता हूँ कि पुनः 'राधा' शब्दका श्रवण हो जाय। जो जीवनपर्यन्त सोलह उपचार अर्पण करके मेरी सेवा करते हैं, उनपर मेरी जो प्रीति होती है, वही प्रीति 'राधा' शब्दके उच्चारणसे होती है। बल्कि उससे भी अधिक प्रीति 'राधा' नामके उच्चारणसे होती है। राधे! मुझे तुम उतनी प्रिया नहीं हो, जितना तुम्हारा नाम लेनेवाला प्रिय है। 'राधा' नामका उच्चारण करनेवाला पुरुष मुझे 'राधा' से भी अधिक प्रिय है। ब्रह्मा, अनन्त, शिव, धर्म, नर-नारायण ऋषि, कपिल, गणेश और कार्तिकेय भी मेरे प्रिय हैं। लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, सावित्री, प्रकृति—ये देवियाँ तथा देवता भी मुझे प्रिय हैं; तथापि वे राधा नामका उच्चारण करनेवाले प्राणियोंके समान प्रिय नहीं हैं। उपर्युक्त सब देवता मेरे लिये प्राणके समान हैं; परंतु सती राधे! तुम तो मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर हो। वे सब लोग भिन्न-भिन्न स्थानोंमें स्थित हैं; किंतु तुम तो मेरे वक्षःस्थलमें विराजमान हो। जो मेरी चतुर्भुज मूर्ति अपनी प्रियाको वक्षःस्थलमें धारण करती है, वही मैं श्रीकृष्णस्वरूप होकर सदा स्वयं तुम्हारा भार वहन करता हूँ।
यों कहकर श्रीकृष्ण उस मनोरम शय्यापर विराजमान हुए, तब राधिका भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर अपने प्राणनाथसे बोलीं।
राधिकाने कहा—'प्रभो! मुझे गोलोककी सारी बातें याद हैं। मैं सब जानती हूँ। मैं उन बातोंको भूल कैसे सकती हूँ? तुम जो मुझे सर्वरूपिणी बता रहे हो, वह सब तुम्हारे चरण-कमलोंकी कृपासे ही सम्भव है। ईश्वरको कुछ लोग अप्रिय होते हैं और कहीं कुछ लोग प्रिय भी होते हैं। जैसे जो मेरा स्मरण नहीं करते हैं, उसी तरह उनपर तुम्हारी कृपा भी नहीं होती है। तुम तृणको पर्वत और पर्वतको तृण बनानेमें समर्थ हो; तथापि योग्य-अयोग्यमें तथा सम्पत्ति और विपत्तिमें भी तुम्हारी समान कृपा होती है। मैं खड़ी हूँ और तुम सोये हो। इस समय बातचीतमें जो समय निकल गया, वह एक-एक क्षण मेरे लिये एक-एक युगके समान है। मैं उसकी गणना करनेमें असमर्थ हूँ। तुम मेरे वक्षःस्थल और मस्तकपर अपना चरण-कमल रख दो। तुम्हारे विरहकी आगसे मेरा हृदय शीघ्र ही दग्ध होना चाहता है। सामने तुम्हारे चरण-कमलपर जब मेरी दृष्टि पड़ी तो वह वहीं रम
•• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४८५
गयी। फिर मैं क्लेश उठाकर भी उसे दूसरे अङ्गोंको देखनेके लिये वहाँसे अन्यत्र न ले जा सकी; तथापि धीरे-धीरे प्रत्येक अङ्गका दर्शन करके ही मैंने तुम्हारे शान्त मुखारविन्दपर दृष्टि डाली है। इस मुखारविन्दको देखकर अब मेरी दृष्टि अन्यत्र जानेमें असमर्थ है।
राधिकाका यह वचन सुनकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण हँसने लगे। फिर वे श्रुतियों और स्मृतियोंके मतानुसार तथ्य एवं हितकर वचन बोले।
श्रीकृष्णने कहा— भद्रे! मैंने पूर्वकालमें वहाँ गोलोकमें जो निश्चय किया था, उसका खण्डन नहीं होना चाहिये। प्रिये! तुम क्षणभर ठहरो। मैं तुम्हारा मङ्गल करूँगा। तुम्हारे मनोरथकी पूर्तिका समय स्वयं आ पहुँचा है। राधे! पहले मैंने जिसके लिये जो कुछ लिख दिया है और जिस समय उस मनोरथकी प्राप्तिका निश्चय कर दिया है; उस पूर्व-निश्चयका खण्डन मैं स्वयं ही नहीं कर सकता। फिर विधाताकी क्या विसात है, जो उसे मिटा सके? मैं विधाताका भी विधाता हूँ। मैंने जिनके लिये जो कुछ विधान कर दिया है, उसका ब्रह्मा आदि देवता भी कदापि खण्डन नहीं कर सकते।
इसी बीचमें ब्रह्मा श्रीहरिके सामने आये। उनके हाथोंमें माला और कमण्डलु शोभा पा रहे थे। चारों मुखोंपर मन्द मुस्कान खेल रही थी। निकट जाकर उन्होंने श्रीकृष्णको नमस्कार किया और आगमके अनुसार उनकी स्तुति की। उस समय उनके नेत्रोंसे आँसू झर रहे थे। सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था और भक्तिभावसे उनका मस्तक झुका हुआ था। स्तुति और नमस्कार करके जगद्धाता ब्रह्मा श्रीहरिके और निकट गये। उन्होंने अपने प्रभुको भक्तिभावसे पुनः प्रणाम किया। फिर वे श्रीराधिकाके समीप गये और माताके चरण-कमलमें मस्तक रखकर उन्होंने भक्तिभावसे नमस्कार किया। शीघ्रतापूर्वक माता राधिकाके चरणारविन्दोंको अपने जटाजालसे वेष्टित करके ब्रह्माजीने कमण्डलुके जलसे प्रसन्नतापूर्वक उनका प्रक्षालन किया। फिर दोनों हाथ जोड़कर वे आगमके अनुसार श्रीराधाकी स्तुति करने लगे।
ब्रह्माजी बोले— हे माता! भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे मुझे तुम्हारे चरणकमलोंके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त हुआ है। ये चरण सर्वत्र और विशेषतः भारतवर्षमें सभीके लिये परम दुर्लभ हैं। मैंने पूर्वकालमें पुष्करतीर्थमें सूर्यके प्रकाशमें बैठकर परमात्मा श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की। तब वरदाता श्रीहरि मुझे वर देनेके लिये स्वयं पधारे। उनके 'वर माँगो' ऐसा कहनेपर मैंने प्रसन्नतापूर्वक अभीष्ट वर माँगते हुए कहा—'हे गुणातीत परमेश्वर! जो सबके लिये परम दुर्लभ है, उन राधिकाके चरण-कमलका मुझे इसी समय शीघ्र दर्शन कराइये।' मेरी यह बात सुनकर ये श्रीहरि मुझ तपस्वीसे बोले—'वत्स! इस समय क्षमा करो। उपयुक्त समय आनेपर मैं तुम्हें श्रीराधाके चरणारविन्दोंके दर्शन कराऊँगा।' ईश्वरकी आज्ञा निष्फल नहीं होती; इसीलिये मुझे तुम्हारे चरणकमलोंके दर्शन प्राप्त हुए हैं। माता! तुम्हारे ये चरण गोलोकमें तथा इस समय भारतमें भी सबकी मनोवाञ्छाके विषय हैं। सब देवियाँ प्रकृतिकी अंशभूता हैं; अतः वे निश्चय ही जन्य और प्राकृतिक हैं। तुम श्रीकृष्णके आधे अङ्गसे प्रकट हुई हो; अतः सभी दृष्टियोंसे श्रीकृष्णके समान हो। तुम स्वयं श्रीकृष्ण हो और ये श्रीकृष्ण राधा हैं अथवा तुम राधा हो और ये स्वयं श्रीकृष्ण हैं। इस बातका किसीने निरूपण किया हो, ऐसा मैंने वेदोंमें नहीं देखा है। अम्बिके! जैसे गोलोक ब्रह्माण्डसे बाहर और ऊपर है, उसी तरह वैकुण्ठ भी है। माँ! जैसे वैकुण्ठ और गोलोक अजन्य हैं; उसी प्रकार तुम भी अजन्मा हो। जैसे समस्त ब्रह्माण्डमें सभी