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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

ब्रह्मखण्ड ७५

जाता है। भयभीत पुरुष भयसे छुटकारा पा जाता है। जिसका धन नष्ट हो गया है, उसे धनकी प्राप्ति होती है। जो विशाल वनमें डाकुओं अथवा हिंसक जन्तुओंसे घिर गया है, दावानलसे दग्ध होनेकी स्थितिमें आ गया है अथवा जलके समुद्रमें डूब रहा है, वह भी इस स्तोत्रका पाठ करके विपत्तिसे छुटकारा पा जाता है।

(अध्याय १८)


ब्रह्माण्डपावन नामक कृष्णकवच, संसारपावन नामक शिवकवच और शिवस्तवराजका वर्णन तथा इन सबकी महिमा

**सौति कहते हैं—**मालावती ब्राह्मणोंको धन देकर बहुत प्रसन्न हुई। उसने स्वामीकी सेवाके लिये नाना प्रकारसे अपना शृङ्गार किया। वह प्रतिदिन पतिकी सेवा-शुश्रूषा और समयोचित पूजा करने लगी। उत्तम व्रतका पालन करनेवाली उस पतिव्रताने स्वयं एकान्तमें पतिको भूले हुए महापुरुषके स्तोत्र, पूजन, कवच और मन्त्रका बोध कराया। पूर्वकालमें वसिष्ठजीने पुष्करतीर्थमें गन्धर्व और मालावतीको इस श्रीहरिके स्तोत्र, पूजन आदिका तथा एक मन्त्रका उपदेश दिया था। इसी तरह शंकरजीका स्तोत्र और कवच भी गन्धर्वको भूल गया था। कृपानिधान वसिष्ठने एकान्तमें गन्धर्वराजको उसका भी बोध कराया।

इस प्रकार बोधसम्पन्न हो परमानन्दमय गन्धर्वने अपने कुबेरभवनसदृश आश्रममें रहकर बन्धु-बान्धवोंके साथ राज्य किया। उपबर्हणकी अन्य स्त्रियाँ भी जैसे-तैसे वहाँ आयीं और आकर उन्होंने बड़े आनन्दके साथ पुनः अपने स्वामीको प्राप्त किया।

**शौनकने पूछा—**सूतनन्दन! पूर्वकालमें वसिष्ठजीने उन दोनों दम्पतिको भगवान् विष्णुके किस स्तोत्र, कवच, मन्त्र और पूजा-विधिका उपदेश किया था—यह आप बतानेकी कृपा करें। पूर्वकालमें वसिष्ठजीने गन्धर्वराजको भगवान् शिवके जिस द्वादशाक्षर-मन्त्र और कवच आदिका उपदेश दिया था, वह भी मुझे बताइये। यह सब सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है; क्योंकि शंकरका स्तोत्र, कवच और मन्त्र दुर्गतिका नाश करनेवाला है।

**सौति बोले—**शौनकजी! मालतीने जिस स्तोत्रके द्वारा परमेश्वर श्रीकृष्णका स्तवन किया था, वही स्तोत्र वसिष्ठजीने उन गन्धर्व-दम्पतिको दिया था। अब उनके दिये हुए मन्त्र और कवचका वर्णन सुनिये।

'ॐ नमो भगवते रासमण्डलेशाय स्वाहा'

—यह षोडशाक्षर-मन्त्र उपासकोंके लिये कल्पवृक्ष-स्वरूप है। इसीका उपदेश वसिष्ठजीने दिया था। पूर्वकालमें श्रीहरिके पुष्करधाममें ब्रह्माजीने कुमारको यह मन्त्र दिया था तथा श्रीकृष्णने गोलोकमें भगवान् शंकरको इसका ज्ञान

११- एक हजार वर्षतक बिना कुछ खाये-पीये कठोर तपस्यामें तत्पर बालक नारदद्वारा ध्यानमें एक दिव्यलोकमें रत्नमय सिंहासनपर आसीन दिव्य बालक—नित्य नवकिशोरका दर्शन

७६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

प्रदान किया था। यहाँ भगवान् विष्णुके वेदवर्णित स्वरूपका ध्यान किया जाता है, जो सनातन एवं सबके लिये परम दुर्लभ है। पूर्वोक्त मूल मन्त्रसे उत्तम नैवेद्य आदि सभी उपचार समर्पित करने चाहिये। भगवान्‌का जो कवच है, वह अत्यन्त गुप्त है। उसे मैंने अपने पिताजीके मुखसे सुना था। विप्रवर! पूर्वकालमें त्रिशूलधारी भगवान् शंकरने ही पिताजीको गङ्गाके तटपर इसका उपदेश दिया था। भगवान् शंकरको, ब्रह्माजीको तथा धर्मको गोलोकके रासमण्डलमें गोपीवल्लभ श्रीकृष्णने कृपापूर्वक यह परम अद्भुत कवच प्रदान किया था।

ब्रह्मोवाच
राधाकान्त महाभाग कवचं यत् प्रकाशितम्।
ब्रह्माण्डपावनं नाम कृपया कथय प्रभो॥ १७॥
मां महेशं च धर्मं च भक्तं च भक्तवत्सल।
त्वत्प्रसादेन पुत्रेभ्यो दास्यामि भक्तिसंयुतः॥ १८॥
ब्रह्माजी बोले—महाभाग! राधाकान्त! प्रभो! ब्रह्माण्डपावन नामक जो कवच आपने प्रकाशित किया है, उसका उपदेश कृपापूर्वक मुझको, महादेवजीको तथा धर्मको दीजिये। भक्तवत्सल! हम तीनों आपके भक्त हैं। आपकी कृपासे मैं अपने पुत्रोंको भक्तिपूर्वक इसका उपदेश दूँगा॥ १७-१८॥

श्रीकृष्ण उवाच
शृणु वक्ष्यामि ब्रह्मोश धर्मेदं कवचं परम्।
अहं दास्यामि युष्मभ्यं गोपनीयं सुदुर्लभम्॥ १९॥
यस्मै कस्मै न दातव्यं प्राणतुल्यं ममैव हि।
यत्तेजो मम देहेऽस्ति तत्तेजः कवचेऽपि च॥ २०॥
श्रीकृष्णने कहा—ब्रह्मन्! महेश्वर! और धर्म! तुमलोग सुनो! मैं इस उत्तम कवचका वर्णन कर रहा हूँ। यद्यपि यह परम दुर्लभ और गोपनीय है तथापि तुम्हें इसका उपदेश दूँगा। परंतु ध्यान रहे, जिस-किसीको भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये; क्योंकि यह मेरे लिये प्राणोंके समान है। जो तेज मेरे शरीरमें है, वही इस कवचमें भी है॥ १९-२०॥

कुरु सृष्टिमिमं धृत्वा धाता त्रिजगतां भव।
संहर्त्ता भव हे शम्भो मम तुल्यो भवे भव॥ २१॥
हे धर्म त्वमिमं धृत्वा भव साक्षी च कर्मणाम्।
तपसां फलदाता च यूयं भवत मद्गरात्॥ २२॥
ब्रह्मन्! तुम इस कवचको धारण करके सृष्टि करो और तीनों लोकोंके विधाताके पदपर प्रतिष्ठित रहो। शम्भो! तुम भी इस कवचको ग्रहण करके संहारका कार्य सम्पन्न करो और संसारमें मेरे समान शक्तिशाली हो जाओ। धर्म! तुम इस कवचको धारण करके कर्मोंके साक्षी बने रहो। तुम सब लोग मेरे वरसे तपस्याके फलदाता हो जाओ॥ २१-२२॥

ब्रह्माण्डपावनस्यास्य कवचस्य हरिः स्वयम्।
ऋषिश्छन्दश्च गायत्री देवोऽहं जगदीश्वरः॥ २३॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः।
त्रिलक्षवारपठनात् सिद्धिदं कवचं विधे॥ २४॥
इस ब्रह्माण्डपावन कवचके स्वयं श्रीहरि ऋषि हैं, गायत्री छन्द हैं, मैं जगदीश्वर श्रीकृष्ण ही देवता हूँ तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिके लिये इसका विनियोग* कहा गया है। विधे! तीन लाख बार पाठ करनेपर यह कवच सिद्धिदायक होता है॥ २३-२४॥

यो भवेत् सिद्धकवचो मम तुल्यो भवेत्तु सः।
तेजसा सिद्धियोगेन ज्ञानेन विक्रमेण च॥ २५॥
प्रणवो मे शिरः पातु नमो रासेश्वराय च।
भालं पायान्नेत्रयुग्मं नमो राधेश्वराय च॥ २६॥
कृष्णः पायाच्छ्रोत्रयुग्मं हे हरे घ्राणमेव च।
जिह्विकां वह्निजाया तु कृष्णायेति च सर्वतः॥ २७॥


* इस कवचका विनियोगवाक्य संस्कृतमें इस प्रकार है—
ॐ अस्य श्रीब्रह्माण्डपावनकवचस्य साक्षात् श्रीहरिः ऋषिः, गायत्री छन्दः, स एव जगदीश्वरः श्रीकृष्णो देवता धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः।

२१- ब्रह्माजीके पुत्रोंके नामोंकी व्युत्पत्ति

ब्रह्मखण्ड ७७

श्रीकृष्णाय स्वाहेति च कण्ठं पातु षडक्षरः।
ह्रीं कृष्णाय नमो वक्त्रं क्लीं पूर्वश्च भुजद्वयम्॥ २८॥
नमो गोपाङ्गनेशाय स्कन्धावष्टाक्षरोऽवतु।
दन्तपंक्तिमोष्ठयुग्मं नमो गोपीश्वराय च॥ २९॥
ॐ नमो भगवते रासमण्डलेशाय स्वाहा।
स्वयं वक्षःस्थलं पातु मन्त्रोऽयं षोडशाक्षरः॥ ३०॥
ऐं कृष्णाय स्वाहेति च कर्णयुग्मं सदाऽवतु।
ॐ विष्णवे स्वाहेति च कङ्कालं सर्वतोऽवतु॥ ३१॥
ॐ हरये नम इति पृष्ठं पादं सदाऽवतु।
ॐ गोवर्द्धनधारिणे स्वाहा सर्वशरीरकम्॥ ३२॥
प्राच्यां मां पातु श्रीकृष्ण आग्नेय्यां पातु माधवः।
दक्षिणे पातु गोपीशो नैर्ऋत्यां नन्दनन्दनः॥ ३३॥
वारुण्यां पातु गोविन्दो वायव्यां राधिकेश्वरः।
उत्तरे पातु राशेश ऐशान्यामच्युतः स्वयम्॥ ३४॥
सन्ततं सर्वतः पातु परो नारायणः स्वयम्।
इति ते कथितं ब्रह्मन् कवचं परमाद्भुतम्॥ ३५॥
मम जीवनतुल्यं च युष्मभ्यं दत्तमेव च।

जो इस कवचको सिद्ध कर लेता है, वह तेज, सिद्धियोंके योग, ज्ञान और बल-पराक्रममें मेरे समान हो जाता है।

प्रणव (ओंकार) मेरे मस्तककी रक्षा करे, 'नमो रासेश्वराय' (रासेश्वरको नमस्कार है) यह मन्त्र मेरे ललाटका पालन करे। 'नमो राधेश्वराय' (राधापतिको नमस्कार है) यह मन्त्र दोनों नेत्रोंकी रक्षा करे। 'कृष्ण' दोनों कानोंका पालन करें। 'हे हरे' यह नासिकाकी रक्षा करे। 'स्वाहा' मन्त्र जिह्वाको कष्टसे बचावे। 'कृष्णाय स्वाहा' यह मन्त्र सब ओरसे हमारी रक्षा करे। 'श्रीकृष्णाय स्वाहा' यह षडक्षर-मन्त्र कण्ठको कष्टसे बचावे। 'ह्रीं कृष्णाय नमः' यह मन्त्र मुखकी तथा 'क्लीं कृष्णाय नमः' यह मन्त्र दोनों भुजाओंकी रक्षा करे। 'नमो गोपाङ्गनेशाय' (गोपाङ्गनावल्लभ श्रीकृष्णको नमस्कार है) यह अष्टाक्षर-मन्त्र दोनों कंधोंका पालन करे। 'नमो गोपीश्वराय' (गोपीश्वरको नमस्कार है) यह मन्त्र दन्तपंक्ति तथा ओष्ठयुगलकी रक्षा करे। 'ॐ नमो भगवते रासमण्डलेशाय स्वाहा' (रासमण्डलके स्वामी सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। उनकी प्रसन्नताके लिये मैं अपने सर्वस्वकी आहुति देता हूँ—त्याग करता हूँ) यह षोडशाक्षर-मन्त्र मेरे वक्षःस्थलकी रक्षा करे। 'ऐं कृष्णाय स्वाहा' यह मन्त्र सदा मेरे दोनों कानोंको कष्टसे बचावे। 'ॐ विष्णवे स्वाहा' यह मन्त्र मेरे कङ्गाल (अस्थिपञ्जर)-की सब ओरसे रक्षा करे। 'ॐ हरये नमः' यह मन्त्र सदा मेरे पृष्ठभाग और पैरोंका पालन करे। 'ॐ गोवर्द्धनधारिणे स्वाहा' यह मन्त्र मेरे सम्पूर्ण शरीरकी रक्षा करे। पूर्व दिशामें श्रीकृष्ण, अग्निकोणमें माधव, दक्षिण दिशामें गोपीश्वर तथा नैर्ऋत्यकोणमें नन्दनन्दन मेरी रक्षा करें। पश्चिम दिशामें गोविन्द, वायव्यकोणमें राधिकेश्वर, उत्तर दिशामें रासेश्वर और ईशानकोणमें स्वयं अच्युत मेरा संरक्षण करें तथा परमपुरुष साक्षात् नारायण सदा सब ओरसे मेरा पालन करें। ब्रह्मन्! इस प्रकार इस परम अद्भुत कवचका मैंने तुम्हारे सामने वर्णन किया। यह मेरे जीवनके तुल्य है। यह मैंने तुमलोगोंको अर्पित किया॥ २५—३५ १/२॥

अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च।
कलां नार्हन्ति तान्येव कवचस्यैव धारणात्॥ ३६॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवद्वस्त्रालङ्कारचन्दनैः।
स्नात्वा तं च नमस्कृत्य कवचं धारयेत् सुधीः॥ ३७॥
कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः।
यदि स्यात् सिद्धकवचो विष्णुरेव भवेद् द्विज॥ ३८॥

इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे ब्रह्मखण्डे महापुरुषब्रह्माण्डपावनं नाम श्रीकृष्णकवचं सम्पूर्णम्।

इस कवचको धारण करनेसे जो पुण्य होता है, सहस्रों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय-यज्ञ उसकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि स्नान करके वस्त्र-अलङ्कार और चन्दनद्वारा विधिवत् गुरुकी पूजा और वन्दना करनेके पश्चात् कवच धारण

७८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

करे। इस कवचके प्रसादसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। शौनकजी! यदि किसीने इस कवचको सिद्ध कर लिया तो वह विष्णुरूप ही हो जाता है॥ ३६—३८॥

इस प्रकार श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराणके ब्रह्मखण्डमें महापुरुषब्रह्माण्डपावन नामक श्रीकृष्णकवच पूरा हुआ।

सौति कहते हैं— शौनक! अब शिवका कवच और स्तोत्र सुनिये, जिसे वसिष्ठजीने गन्धर्वको दिया था। शिवका जो द्वादशाक्षर-मन्त्र है, वह इस प्रकार है, 'ॐ नमो भगवते शिवाय स्वाहा'। प्रभो! इस मन्त्रको पूर्वकालमें वसिष्ठजीने पुष्करतीर्थमें कृपापूर्वक प्रदान किया था। प्राचीन कालमें ब्रह्माजीने रावणको यह मन्त्र दिया था और शंकरजीने पहले कभी बाणासुरको और दुर्वासाको भी इसका उपदेश दिया था। इस मूलमन्त्रसे इष्टदेवको नैवेद्य आदि सम्पूर्ण उत्तम उपचार समर्पित करना चाहिये। इस मन्त्रका वेदोक्त ध्यान 'ध्यायेन्नित्यं$^१$ महेशं' इत्यादि श्लोकके अनुसार है, जो सर्वसम्मत है।

'ॐ नमो महादेवाय'

बाणासुर उवाच
महेश्वर महाभाग कवचं यत् प्रकाशितम्।
संसारपावनं नाम कृपया कथय प्रभो॥ ४३॥

सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीमहादेवजीको नमस्कार है।

बाणासुरने कहा— महेश्वर! महाभाग! प्रभो! आपने संसारपावन नामक जो कवच प्रकाशित किया है, उसे कृपापूर्वक मुझसे कहिये॥ ४३॥

महेश्वर उवाच
शृणु वक्ष्यामि हे वत्स! कवचं परमाद्भुतम्।
अहं तुभ्यं प्रदास्यामि गोपनीयं सुदुर्लभम्॥ ४४॥

पुरा दुर्वाससे दत्तं त्रैलोक्यविजयाय च।
ममैवेदं च कवचं भक्त्या यो धारयेत् सुधीः॥ ४५॥
जेतुं शक्नोति त्रैलोक्यं भगवानिव लीलया॥ ४६॥

महेश्वर बोले— बेटा! सुनो, उस परम अद्भुत कवचका मैं वर्णन करता हूँ। यद्यपि वह परम दुर्लभ और गोपनीय है तथापि तुम्हें उसका उपदेश दूँगा। पूर्वकालमें त्रैलोक्य-विजयके लिये वह कवच मैंने दुर्वासाको दिया था। जो उत्तम बुद्धिवाला पुरुष भक्तिभावसे मेरे इस कवचको धारण करता है, वह भगवान्‌की भाँति लीलापूर्वक


१. ध्यायेन्नित्यं महेशं' इत्यादि श्लोक इस प्रकार है—
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं दिव्याकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
रत्नासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववन्द्यं सकलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
'प्रतिदिन महेश्वरका ध्यान करे। उनकी अङ्गकान्ति चाँदीके पर्वत अथवा कैलासके समान है, मस्तकपर मनोहर चन्द्रमाका मुकुट शोभा पाता है, दिव्य वेश-भूषा एवं शृङ्गारसे उनका प्रत्येक अङ्ग उज्ज्वल—जगमगाता हुआ जान पड़ता है, उनके एक हाथमें फरसा, दूसरेमें मृगछौना तथा शेष दो हाथोंपर अभयकी मुद्राएँ हैं, वे सदा प्रसन्न रहते हैं, रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं, देवता लोग चारों ओरसे खड़े होकर उनकी स्तुति करते हैं। वे बाघम्बर पहने बैठे हैं, सम्पूर्ण विश्वके आदिकारण और वन्दनीय हैं, सबका भय दूर कर देनेवाले हैं, उनके पाँच मुख हैं और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र हैं।

ब्रह्मखण्ड ७९


तीनों लोकोंपर विजय पा सकता है।
संसारपावनस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः।
ऋषिश्च्छन्दश्च गायत्री देवोऽहं च महेश्वरः।
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ ४७ ॥
पञ्चलक्षजपेनैव सिद्धिदं कवचं भवेत् ॥ ४८ ॥
यो भवेत् सिद्धकवचो मम तुल्यो भवेद् भुवि।
तेजसा सिद्धियोगेन तपसा विक्रमेण च ॥ ४९ ॥
शम्भुर्मे मस्तकं पातु मुखं पातु महेश्वरः।
दन्तपंक्तिं च नीलकण्ठोऽप्यधरोष्ठं हरः स्वयम् ॥ ५० ॥
कण्ठं पातु चन्द्रचूडः स्कन्धौ वृषभवाहनः।
वक्षःस्थलं नीलकण्ठः पातु पृष्ठं दिगम्बरः ॥ ५१ ॥
सर्वाङ्गं पातु विश्वेशः सर्वदिक्षु च सर्वदा।
स्वप्ने जागरणे चैव स्थाणुर्मां पातु संततम् ॥ ५२ ॥
इति ते कथितं बाण कवचं परमाद्भुतम्।
यस्मै कस्मै न दातव्यं गोपनीयं प्रयत्नतः ॥ ५३ ॥
यत् फलं सर्वतीर्थानां स्नानेन लभते नरः।
तत् फलं लभते नूनं कवचस्यैव धारणात् ॥ ५४ ॥
इदं कवचमज्ञात्वा भजेन्मां यः सुमन्दधीः।
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ॥ ५५ ॥
इति श्रीब्रह्मवैवर्ते संसारपावनं नाम शङ्करकवचं सम्पूर्णम्।

इस संसारपावन नामक शिवकवचके प्रजापति ऋषि, गायत्री छन्द तथा मैं महेश्वर देवता हूँ। धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षके लिये इसका विनियोग है। (विनियोग-वाक्य यों समझना चाहिये—'ॐ अस्य श्रीसंसारपावननामधेयस्य शिवकवचस्य प्रजापतिर्ऋषिर्गायत्री छन्दो महेश्वरो देवता धर्मार्थकाममोक्षसिद्धौ विनियोगः।') पाँच लाख बार पाठ करनेसे यह कवच सिद्धिदायक होता है। जो इस कवचको सिद्ध कर लेता है, वह तेज, सिद्धियोग, तपस्या और बल-पराक्रममें इस भूतलपर मेरे समान हो जाता है ॥ ४७—४९ ॥

शम्भु मेरे मस्तककी और महेश्वर मुखकी रक्षा करें। नीलकण्ठ दाँतोंकी पाँतका और स्वयं हर अधरोष्ठका पालन करें। चन्द्रचूड कण्ठकी और वृषभवाहन दोनों कंधोंकी रक्षा करें। नीलकण्ठ वक्षःस्थलका और दिगम्बर पृष्ठभागका पालन करें। विश्वेश सदा सब दिशाओंमें सम्पूर्ण अङ्गोंकी रक्षा करें। सोते और जागते समय स्थाणुदेव निरन्तर मेरा पालन करते रहें ॥ ५०—५२ ॥

बाण! इस प्रकार मैंने तुमसे इस परम अद्भुत कवचका वर्णन किया। इसका उपदेश जो ही आवे, उसीको नहीं देना चाहिये, अपितु प्रयत्नपूर्वक इसको गुप्त रखना चाहिये। मनुष्य सब तीर्थोंमें स्नान करके जिस फलको पाता है, उसको अवश्य इस कवचको धारण करनेमात्रसे पा लेता है। जो अत्यन्त मन्दबुद्धि मानव इस कवचको जाने बिना मेरा भजन करता है, वह सौ लाख बार जप करे तो भी उसका मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता ॥ ५३—५५ ॥

इस प्रकार श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणमें संसारपावन नामक कवच पूरा हुआ।

सौति कहते हैं—शौनक! यह तो कवच कहा गया। अब स्तोत्र सुनिये। मन्त्रराज कल्पवृक्ष-स्वरूप है। इसे पूर्वकालमें वसिष्ठजीने दिया था।

ॐ नमः शिवाय
बाणासुर उवाच
वन्दे सुराणां सारं च सुरेशं नीललोहितम्।
योगीश्वरं योगबीजं योगिनां च गुरोर्गुरुम् ॥ ५६ ॥
ज्ञानानन्दं ज्ञानरूपं ज्ञानबीजं सनातनम्।
तपसां फलदातारं दातारं सर्वसम्पदाम् ॥ ५७ ॥
तपोरूपं तपोबीजं तपोधनधनं वरम्।
वरं वरेण्यं वरदमीड्यं सिद्धगणैर्वरैः ॥ ५८ ॥
कारणं भुक्तिमुक्तीनां नरकार्णवतारणम्।
आशुतोषं प्रसन्नास्यं करुणामयसागरम् ॥ ५९ ॥
हिमचन्दनकुन्देन्दुकुमुदाम्भोजसंनिभम् ।
ब्रह्मज्योतिःस्वरूपं च भक्तानुग्रहविग्रहम् ॥ ६० ॥
विषयाणां विभेदेन विभ्रतं बहुरूपकम्।
जलरूपमग्निरूपमाकाशरूपमीश्वरम् ॥ ६१ ॥
वायुरूपं चन्द्ररूपं सूर्यरूपं महत्प्रभुम्।
आत्मनः स्वपदं दातुं समर्थमवलीलया ॥ ६२ ॥

२२- ब्रह्माजीसे सृष्टिके लिये दारपरिग्रहकी प्रेरणा पाकर डरे हुए नारदका स्त्री-संग्रहके दोष बताकर तपके लिये जानेकी आज्ञा माँगना

८० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भक्तजीवनमीशं च भक्तानुग्रहकातरम्।
वेदा न शक्ता यं स्तोतुं किमहं स्तोमि तं प्रभुम्॥ ६३ ॥
अपरिच्छिन्नमीशानमहो वाङ्मनसोः परम्।
व्याघ्रचर्माम्बरधरं वृषभस्थं दिगम्बरम्।
त्रिशूलपट्टिशधरं सस्मितं चन्द्रशेखरम्॥ ६४ ॥
इत्युक्त्वा स्तवराजेन नित्यं बाणः सुसंयतः।
प्रणामच्छंकरं भक्त्या दुर्वासाश्च मुनीश्वरः॥ ६५ ॥

सच्चिदानन्दस्वरूप शिवको नमस्कार है।

बाणासुर बोला— जो देवताओंके सार-तत्त्वस्वरूप और समस्त देवगणोंके स्वामी हैं, जिनका वर्ण नील और लोहित है, जो योगियोंके ईश्वर, योगके बीज तथा योगियोंके गुरुके भी गुरु हैं, उन भगवान् शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो ज्ञानानन्दस्वरूप, ज्ञानरूप, ज्ञानबीज, सनातन देवता, तपस्याके फलदाता तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंको देनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो तपःस्वरूप, तपस्याके बीज, तपोधनोंके श्रेष्ठ धन, वर, वरणीय, वरदायक तथा श्रेष्ठ सिद्धगणोंके द्वारा स्तवन करने-योग्य हैं, उन भगवान् शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो भोग और मोक्षके कारण, नरकसमुद्रसे पार उतारनेवाले, शीघ्र प्रसन्न होनेवाले, प्रसन्नमुख तथा करुणासागर हैं, उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनकी अङ्गकान्ति हिम, चन्दन, कुन्द, चन्द्रमा, कुमुद तथा श्वेत कमलके सदृश उज्ज्वल है, जो ब्रह्मज्योतिःस्वरूप तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये विभिन्न रूप धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो विषयोंके भेदसे बहुतेरे रूप धारण करते हैं, जल, अग्नि, आकाश, वायु, चन्द्रमा और सूर्य जिनके स्वरूप हैं, जो ईश्वर एवं महात्माओंके प्रभु हैं और लीलापूर्वक अपना पद देनेकी शक्ति रखते हैं, जो भक्तोंके जीवन हैं तथा भक्तोंपर कृपा करनेके लिये कातर हो उठते हैं, उन ईश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। वेद भी जिनका स्तवन करनेमें असमर्थ हैं, जो देश, काल और वस्तुसे परिच्छिन्न नहीं हैं तथा मन और वाणीकी पहुँचसे परे हैं, उन परमेश्वर प्रभुकी मैं क्या स्तुति करूँगा! जो बाघम्बरधारी अथवा दिगम्बर हैं, बैलपर सवार हो त्रिशूल और पट्टिश धारण करते हैं, उन मन्द मुसकानकी आभासे सुशोभित मुखवाले भगवान् चन्द्रशेखरको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ५६–६४॥

यों कहकर बाणासुर प्रतिदिन संयमपूर्वक रहकर स्तवराजसे भगवान्‌की स्तुति करता था और भक्तिभावसे शंकरजीके चरणोंमें मस्तक झुकाता था। मुनीश्वर दुर्वासा भी ऐसा ही करते थे॥ ६५॥

मुने! वसिष्ठजीने पूर्वकालमें त्रिशूलधारी शिवके इस परम महान् अद्भुत स्तोत्रका गन्धर्वको उपदेश दिया था। जो मनुष्य भक्तिभावसे इस परम पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है, वह निश्चय ही सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नानका फल पा लेता है। जो संयमपूर्वक हविष्य खाकर रहते हुए जगद्गुरु शंकरको प्रणाम करके एक वर्षतक इस स्तोत्रको सुनता है, वह पुत्रहीन हो तो अवश्य ही पुत्र प्राप्त कर लेता है। जिसको गलित कोढ़का रोग हो या उदरमें बड़ा भारी शूल उठता हो, वह यदि एक वर्षतक इस स्तोत्रको सुने तो अवश्य ही उस रोगसे मुक्त हो जाता है। यह बात मैंने व्यासजीके मुँहसे सुनी है। जो कैदमें पड़कर शान्ति न पाता हो, वह भी एक मासतक इस स्तोत्रको श्रवण करके अवश्य ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जिसका राज्य छिन गया हो, ऐसा पुरुष यदि भक्तिपूर्वक एक मासतक इस स्तोत्रका श्रवण करे तो अपना राज्य प्राप्त कर लेता है। एक मासतक संयमपूर्वक इसका श्रवण करके निर्धन मनुष्य धन पा लेता है। राजयक्ष्मासे ग्रस्त होनेपर जो आस्तिक पुरुष एक वर्षतक इसका श्रवण करता है, वह भगवान् शंकरके प्रसादसे निश्चय ही रोगमुक्त हो

नारदका पिताकी आज्ञा ले शिवलोकको जाना

ब्रह्मखण्ड
८१


जाता है। द्विज शौनक! जो सदा भक्तिभावसे इस स्तवराजको सुनता है उसके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता। भारतवर्षमें उसको कभी अपने बन्धुओंसे वियोगका दुःख नहीं होता। वह अविचल एवं महान् ऐश्वर्यका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। जो पूर्ण संयमसे रहकर अत्यन्त भक्तिभावसे एक मासतक इस स्तोत्रका श्रवण करता है, वह यदि भार्याहीन हो तो अति विनयशील सती-साध्वी सुन्दरी भार्या पाता है। जो महान् मूर्ख और खोटी बुद्धिका है, ऐसा मनुष्य यदि इस स्तोत्रको एक मासतक सुनता है तो वह गुरुके उपदेशमात्रसे बुद्धि और विद्या पाता है। जो प्रारब्ध-कर्मसे दुःखी और दरिद्र मनुष्य भक्तिभावसे इस स्तोत्रका श्रवण करता है, उसे निश्चय ही भगवान् शंकरकी कृपासे धन प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन तीनों संध्याओंके समय इस उत्तम स्तोत्रको सुनता है, वह इस लोकमें सुख भोगता, परम दुर्लभ कीर्ति प्राप्त करता और नाना प्रकारके धर्मका अनुष्ठान करके अन्तमें भगवान् शंकरके धामको जाता है, वहाँ श्रेष्ठ पार्षद होकर भगवान् शिवकी सेवा करता है।
(अध्याय १९)


गोपपत्नी कलावतीके गर्भसे एक शिशुके रूपमें उपबर्हणका जन्म, शूद्रयोनिमें उत्पन्न बालक नारदकी जीवनचर्या, नामकी व्युत्पत्ति, उसके द्वारा संतोंकी सेवा, सनत्कुमारद्वारा उसे उपदेशकी प्राप्ति, उसके द्वारा श्रीहरिके स्वरूपका ध्यान, आकाशवाणी तथा उस बालकके देह-त्यागका वर्णन

**सौति कहते हैं—**उपबर्हण गन्धर्व अपनी पत्नी मालावतीके साथ तथा अन्य पत्नियोंके साथ भी निर्जन वनमें आनन्दपूर्वक विहार करने लगे। उन्होंने अपनी आयुका शेष काल सानन्द बिताना आरम्भ किया। उपबर्हणके पिता गन्धर्वराज भी स्त्री-पुत्रोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे। उन्होंने नाना प्रकारके श्रेष्ठ कर्म तथा बड़े-बड़े पुण्य कर्म किये। वे कुबेर-भवनके समान वैभवशाली गृहमें राजा होकर राजसुखका उपभोग करने लगे। उन्होंने अपनी सुस्थिरयौवना सुशीला पत्नीके साथ कुछ कालतक विहार किया। फिर समय आनेपर गङ्गाजीके मनोहर तटपर पत्नीसहित गन्धर्वराज प्राणोंका परित्याग करके सानन्द वैकुण्ठधामको चले गये। वे शैव थे, इसलिये उनपर शिवजीकी कृपा हुई तथा उनके पुत्रने श्रीविष्णुकी सेवा की थी, इसलिये भगवान् विष्णुकी भी उनपर कृपादृष्टि हुई। इससे वे वैकुण्ठमें श्रीविष्णुके श्याम-चतुर्भुजरूपधारी पार्षद हुए। माता-पिताका संस्कार करके गन्धर्व उपबर्हणने ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके धन दिये। शौनकजी! फिर अन्तकाल आनेपर ब्रह्माजीके शापसे प्राणोंका परित्याग करके उस विद्वान् गन्धर्वने ब्राह्मणके वीर्य और शूद्राके गर्भसे जन्म ग्रहण किया। सती मालावतीने मनमें उत्तम संकल्प ले भारतभूमिके पुष्कर तीर्थमें अग्निकुण्डके भीतर अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया। वह साध्वी मनुवंशी राजा सृंजयकी पत्नीसे उत्पन्न हुई। उसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण रहता था। उस सुन्दरीके मनमें यही संकल्प था कि उपबर्हण गन्धर्व मेरे पति हों।

**शौनकजीने पूछा—**सूतनन्दन! उपबर्हण गन्धर्व ब्राह्मणके वीर्य और शूद्र-पत्नीके गर्भसे किस प्रकार उत्पन्न हुए? यह आप बतानेकी कृपा करें।

शौनकजीके यों पूछनेपर सूतजीने 'गोपराज द्रुमिलकी पत्नी कलावतीने मुनिवर काश्यपके स्खलित शुक्रको ग्रहण कर लिया था, इससे उसको पुत्रकी प्राप्ति हुई थी'—इस प्रकार

१३- ब्रह्माजीका नारदको गृहस्थ-धर्मका महत्त्व बताते हुए उन्हें मनुवंशी सृञ्जयके घरमें उत्पन्न रत्नमाला (पूर्वजन्मकी पत्नी मालती)-से विवाह करनेके लिये राजी करना

८२ || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उपबर्हणके जन्मकी कथा सुनाकर कहा कि गोपराज बदरिकाश्रममें जाकर योगबलसे शरीरको त्यागनेके पश्चात् विमानद्वारा वैकुण्ठधाममें चले गये। तत्पश्चात् शोकविह्वला कलावतीको अपनी माता कहकर एक दयालु ब्राह्मण अपने घर ले गये। साध्वी कलावतीने ब्राह्मणके ही घरमें रहकर एक श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दिया, जिसकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान दमक रही थी। वह ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान हो रहा था। उस घरमें रहनेवाली सभी स्त्रियोंने उस सुन्दर बालकको देखा। वह अपने ब्रह्मतेजसे ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक प्रचण्ड सूर्यकी प्रभाको पराजित कर रहा था। उसका रूप कामदेवसे भी अधिक सुन्दर तथा मुख चन्द्रमासे भी अधिक मनोहर था। उसके मुखकी शोभासे शरत्पूर्णिमाका चन्द्र लज्जित हो रहा था। उसके नेत्र शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको छीने लेते थे। ललित हाथ-पैर, सुन्दर कपोल और मनोहर आकृति थी। पद्म और चक्रसे चिह्नित उसके चरणारविन्द अनुपम परम उज्ज्वल प्रतीत होते थे। उसके दोनों हाथोंकी भी कहीं तुलना नहीं थी। वह स्तन पीनेके लिये रो रहा था। स्त्रियाँ उस बालकको देखकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने-अपने आश्रमको गयीं। पुत्र और स्त्रीसहित ब्राह्मण भी बड़े प्रसन्न हुए और नृत्य करने लगे। वह बालक शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिनोंदिन बढ़ने लगा। ब्राह्मण पुत्रसहित कलावतीका पुत्रीकी भाँति पालन करने लगा।

सौति कहते हैं— शौनकजी! समयके अनुसार क्रमशः बढ़ता हुआ वह बालक पाँच वर्षका हो गया। उसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था। वह सदा ज्ञानसे सम्पन्न रहता था। उसे पूर्वजन्ममें जपे हुए मन्त्रका सदा स्मरण बना रहा। अतः वह निरन्तर श्रीकृष्णके नाम, यश और गुण आदिका गान किया करता था। क्षणभरमें रोने लगता और दूसरे ही क्षण नृत्य करते हुए उसका सारा शरीर रोमाञ्चित हो उठता था। वह बालक जहाँ-जहाँ श्रीकृष्णसे सम्बन्ध रखनेवाली गाथा तथा तत्सम्बन्धी पुराण सुनता, वहीं ठहरता था। उसके सारे अङ्ग धूलसे धूसरित रहते थे। वह धूलमें भगवान्‌की प्रतिमा बनाकर धूलसे ही श्रीहरिका पूजन करता और धूलका ही अभीष्ट नैवेद्य अर्पित करता था। मुने! यदि माता सबेरे कलेवेके लिये बेटेको बुलाती तो वह माताको यही उत्तर देता था कि ‘मैं श्रीहरिका पूजन करता हूँ।’

शौनकने पूछा— सूतनन्दन! इस बालकका इस नये जन्ममें क्या नाम हुआ? संज्ञा और व्युत्पत्तिके साथ आप उसे बतानेकी कृपा करें।

सौतिने कहा— शौनकजी! अनावृष्टिके अन्तमें वह बालक उत्पन्न हुआ था। अतः जन्मकालमें जगत्‌को नार (जल) प्रदान किया। इसीसे उसका नाम ‘नारद’ हुआ। पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण रखनेवाला वह महाज्ञानी बालक दूसरे बालकोंको नार अर्थात् ज्ञान देता था, इसलिये भी नारद नामसे विख्यात हुआ। मुने! वह मुनीन्द्र नारदसे ही उत्पन्न हुआ था, इस कारण भी उसका नाम नारद रखा गया।

शौनकजीने पूछा— शिशुका जो नारद नाम रखा गया था, वह तो व्युत्पत्तिके अनुसार उचित जान पड़ा। परंतु उसके उत्पादक मुनीन्द्रका मङ्गलमय नाम नारद किस प्रकार हुआ?

सौतिने कहा— शौनकजी! धर्मपुत्र मुनिवर नरने पुत्रहीन ब्राह्मण कश्यपको पुत्र प्रदान किया था, अतः नरप्रदत्त होनेके कारण उसका नाम नारद हुआ।

शौनक बोले— सूतनन्दन! अब मैंने शिशुके भी नारद नामकी व्युत्पत्ति सुन ली। अब यह बताइये कि शूद्रयोनिमें तथा ब्रह्मपुत्र-अवस्थामें उनका नाम नारद कैसे सम्भव हुआ?

सौतिने कहा— कल्पान्तरमें ब्रह्माजीके कण्ठसे

२४- नारदजीको भगवान् शिवका दर्शन, शिवद्वारा नारदजीका सत्कार तथा उनकी मनोवाञ्छापूर्तिके लिये आश्वासन

ब्रह्मखण्ड ८३

बहुसंख्यक नर उत्पन्न हुए थे। उनके कण्ठने नरका दान किया था, इसलिये वह 'नरद' कहलाया। उस नरद अर्थात् कण्ठसे बालककी उत्पत्ति हुई, इसलिये ब्रह्माजीने उसका मङ्गलमय नाम नारद रखा। अब आप सावधान होकर उस शिशुका वृत्तान्त सुनिये। बालकके नारद नामकी उपलब्धिमें क्या रहस्य है, इस बातकी जानकारी होनेसे कौन-सा विशिष्ट प्रयोजन सिद्ध होता है। वह गोपीका बालक ब्राह्मणके घरमें प्रतिदिन बढ़ने और हृष्ट-पुष्ट होने लगा। ब्राह्मण पुत्रसहित उस गोपीका अपनी पुत्रीकी भाँति पालन करते थे, इसी बीचमें कुछ महातेजस्वी ब्राह्मण, जो देखनेमें पाँच वर्षके बालकोंकी भाँति जान पड़ते थे, उस ब्राह्मणके घर आये। वे अपने तेजसे ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सूर्यकी प्रभाको तिरस्कृत कर रहे थे। गृहस्थ ब्राह्मणने मधुपर्क आदि देकर उन सबको प्रणाम किया। भोजनके समय उन चारों मुनिवरोंने ब्राह्मणके दिये हुए फल-मूल आदिका आहार ग्रहण किया। उनकी जूठन उस शिशुने खायी। उनमें जो चौथे मुनि थे, उन्होंने उस बालकको प्रसन्नतापूर्वक श्रीकृष्ण-मन्त्रका उपदेश दिया। ब्राह्मण और अपनी माताकी आज्ञासे वह बालक उन चारों महात्माओंका दास बनकर उनकी सेवा-टहल करता रहा। एक दिन उस शिशुकी माता रातके समय मार्गपर चल रही थी। इतनेहीमें एक साँपने उसे डँस लिया और वह श्रीहरिका स्मरण करती हुई तत्काल चल बसी। वह सती साध्वी गोपी उत्तम रत्नोंद्वारा निर्मित वैष्णव विमानपर बैठकर विष्णु-पार्षदोंके साथ उसी क्षण वैकुण्ठधाममें जा पहुँची। प्रातः-काल वह बालक उन ब्राह्मणोंके साथ गृहस्थ ब्राह्मणके घरसे चल दिया। उन कृपालु ब्राह्मणोंने उस बालकको तत्त्वज्ञान प्रदान किया। इसके बाद वे सब ब्रह्मकुमार उस शिशुको वहीं छोड़कर अपने स्थानको चले गये। वह शिशु बड़ा ज्ञानी था। अतः गङ्गाजीके मनोहर तटपर ठहर गया। वहाँ स्नान करके उसने ब्राह्मणोंके दिये हुए विष्णु-मन्त्रका जप किया, जो क्षुधा, पिपासा, रोग तथा शोकको हर लेनेवाला है और वेदोंमें भी दुर्लभ है। घोर विशाल वनमें पीपलके नीचे योगासन लगाकर वह बालक वहाँ सुदीर्घकालतक बैठा रहा।

**शौनकने पूछा—**सूतनन्दन! उस बालकको किस मन्त्रकी प्राप्ति हुई? बुद्धिमान् सनत्कुमारके दिये हुए श्रीहरिके उस उत्तम मन्त्रको आप मुझे बतानेकी कृपा करें।

**सौति बोले—**शौनकजी! पूर्वकालमें भगवान् श्रीकृष्णने गोलोक-धामके भीतर ब्रह्माजीको कृपापूर्वक जिस बाईस अक्षरवाले मन्त्रका उपदेश दिया था, वह वेदोंमें भी परम दुर्लभ है। ब्रह्माजीने बुद्धिमान् सनत्कुमारको उनके भक्तिभावसे प्रभावित होकर वह मन्त्र दिया तथा सनत्कुमारने उक्त गोपी-बालकको उस मन्त्रका उपदेश दिया। वह मन्त्र इस प्रकार है—

ॐ श्रीं नमो भगवते रासमण्डलेश्वराय श्रीकृष्णाय स्वाहा।

—यह मन्त्र कल्पवृक्षस्वरूप है। इसके साथ ही महापुरुषस्तोत्र तथा पूर्वोक्त कवच भी दिया। इस मन्त्रके लिये उपयोगी जो सामवेदोक्त ध्यान है, उसका भी उपदेश कर दिया। करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान तेजोमण्डलस्वरूप जो अनिर्वचनीय चिन्मय प्रकाश है, उसमें ध्यान लगाकर योगी, सिद्धगण तथा देवता मनोवाञ्छित रूपका साक्षात्कार करते हैं। वैष्णवजन उस ज्योतिःपुञ्जके भीतर अपने निकट ही जिस रूपका ध्यान करते हैं, वह अत्यन्त कमनीय, अनिर्वचनीय एवं मनोहर है। नूतन जलधरके समान उसकी श्याम कान्ति है। नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल पङ्कजकी शोभाको छीने लेते हैं। मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति आह्लादजनक है। अधर कटे हुए बिम्बफलसे भी अधिक अरुण है। मोतियोंकी पंक्तिको तिरस्कृत

२५- ब्राह्मणोंके आह्निक आचार तथा भगवान्‌के पूजनकी विधिका वर्णन

८४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


करनेवाली दन्तावलीके कारण वे बड़े मनोहर जान पड़ते हैं। उनके मुखपर मुस्कराहट खेलती रहती है। उनके हाथमें मुरली शोभा पाती है। श्रीअङ्गोंमें करोड़ों कामदेवोंका लावण्य संचित है। वे लीलाके मनोहर धाम हैं। लाखों चन्द्रमाओंकी प्रभा उनके श्रीविग्रहकी सेवा करती है। उनका प्रत्येक अङ्ग परिपुष्ट तथा श्रीसम्पन्न है। वे त्रिभंगी छबिसे सुशोभित होते हैं, उनके दो बाँहें हैं। शरीरपर पीताम्बर शोभा पाता है। रत्नोंके बने हुए बाजूबंद और कंगन तथा रत्ननिर्मित नूपुर उनके विभिन्न अङ्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं। दोनों कपोलोंपर रत्नमय कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं। मस्तकपर मोरपंखका मुकुट शोभा पाता है। रत्नमयी माला कण्ठदेशको विभूषित करती है। मालतीकी वनमालासे घुटनोंतकका भाग सुशोभित है। उनके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित हैं तथा वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। श्रेष्ठ कौस्तुभमणिकी प्रभासे उनका वक्षःस्थल उद्भासित होता है। सुस्थिर यौवनसे युक्त तथा सदा सब ओर घेरकर खड़ी हुई भूषण-भूषित गोपिकाएँ सदा बाँकी चितवनसे उनकी ओर देखा करती हैं। वे श्रीराधाके वक्षःस्थलमें विराजमान हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवता नित्य-निरन्तर उनकी पूजा, वन्दना और स्तुति करते हैं। उनकी अवस्था किशोर है। वे श्रीराधाके प्राणनाथ, शान्तस्वरूप एवं परात्पर हैं। वे निर्लिप्त एवं साक्षीरूप हैं। निर्गुण तथा प्रकृतिसे परे हैं। वे सर्वेश्वर परमात्मा एवं ऐश्वर्यशाली हैं। इस प्रकार उन भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करे।

मुने! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान्‌के ध्यान, स्तोत्र, कवच तथा मन्त्रोपयोगी सत्यका वर्णन किया है। उनका मन्त्र भी कल्पवृक्षस्वरूप है। शौनक! उस समय वह बालक एक हजार दिव्य वर्षोंतक बिना कुछ खाये-पीये ध्यानमें बैठा रहा। उसका पेट सटकर अत्यन्त कृश हो गया था। फिर भी वह सिद्ध मन्त्रके प्रभावसे परिपुष्ट एवं शक्तिमान् था। उसने ध्यानमें देखा—एक दिव्य लोक है, जहाँ रत्नमय सिंहासनपर एक दिव्य बालक विराजमान है। रत्नमय आभूषण उसके अङ्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं। किशोर-अवस्था, श्याम-कान्ति, गोप-वेष और मुखपर मन्द-मन्द मुस्कान है। वह पीताम्बरधारी द्विभुज किशोर गोपों और गोपाङ्गनाओंसे घिरा हुआ है। उसके हाथमें मुरली है। चन्दनसे उसके श्रीअङ्गोंका शृङ्गार किया गया है तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता उस चिर-शान्त परात्पर पुरुषकी स्तुति कर रहे हैं।

वह शान्त स्वभाववाला गोपिका बालक श्यामसुन्दरकी उस मनोहर झाँकीको देखकर ध्यानसे विरत हो गया। ध्यान टूटनेपर जब फिर वह उनका दर्शन न कर सका तब शोकसे पीड़ित हो गया। ध्यानगत बालकको पुनः न देखनेपर वह गोपीकुमार पीपलकी जड़पर बैठकर रोने लगा। तब उस रोते हुए बालकको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई। आकाशवाणीका कथन सत्य, प्रबोधयुक्त, हितकर एवं संक्षिप्त था। आकाशवाणी बोली—‘बालक! एक बार जो रूप तेरे दृष्टिपथमें आ चुका है, वही इस समय पर्याप्त

ब्रह्मखण्ड ८५


है। अब फिर तुझे उसका दर्शन नहीं हो सकता; क्योंकि जिनके अन्तःकरणकी वासना परिपक्व नहीं हुई है, ऐसे कुयोगियोंको उस स्वरूपका दर्शन होना अत्यन्त कठिन है। तेरे इस शरीरका अन्त होनेपर जब तुझे दिव्य शरीर प्राप्त होगा, तब तू पुनः जन्म, मृत्यु और जराका नाश करनेवाले गोविन्दका दर्शन करेगा।'

यह सुनकर वह बालक बड़ी प्रसन्नताके साथ पुनः ध्यानके प्रयाससे विरत हो गया। उसने समय आनेपर मन-ही-मन श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए तीर्थभूमिमें अपने शरीरको त्याग दिया। उस समय स्वर्गलोकमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। आकाशसे पृथ्वीपर फूलोंकी वर्षा होने लगी। इस प्रकार महामुनि नारद शापमुक्त हो गये। गोप-शरीरका त्याग करके वह जीव ब्रह्म-विग्रहमें विलीन हो गया। वह नित्यस्वरूप तो है ही, पूर्वकालमें उसका आविर्भाव हुआ और भिन्न कालमें वह तिरोहित हो गया। नित्यरूपधारी जो भक्तजन हैं, उनका अपनी इच्छासे आविर्भाव अथवा तिरोभाव होता है। उन्हें जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधिका स्पर्श नहीं होता।

(अध्याय २०-२१)


ब्रह्माजीके पुत्रोंके नामोंकी व्युत्पत्ति

सौति कहते हैं— शौनकजी ! तदनन्तर कुछ कल्प व्यतीत होनेपर जब ब्रह्माजी पुनः सृष्टि-कार्यमें संलग्न हुए, तब उनके 'नरद' नामक कण्ठदेशसे मरीचि आदि मुनियोंके साथ वे शापमुक्त मुनि प्रकट हुए। इसी कारणसे उन मुनीन्द्रकी 'नारद' नामसे ख्याति हुई। ब्रह्माजीका जो पुत्र उनके चेतस् (चित्त)-से प्रकट हुआ, उसका नाम उन्होंने 'प्रचेता' रखा। जो उनके दक्षिण पार्श्वसे सहसा उत्पन्न हुआ, वह सब कर्मोंमें दक्ष होनेके कारण 'दक्ष' कहलाया। वेदोंमें कर्दम शब्द छायाके अर्थमें विद्यमान है। जो बालक ब्रह्माजीके कर्दम अर्थात् छायासे प्रकट हुआ, उसका नाम 'कर्दम' रखा गया। इसी तरह मरीचि शब्द वेदोंमें तेजोभेदके अर्थमें आता है। अतः जो बालक तत्काल अत्यन्त तेजस्वी रूपमें प्रकट हुआ, वह 'मरीचि' कहलाया। जिस बालकने जन्मान्तरमें ऋतुसंघ (यज्ञसमूह)-का सम्पादन किया था, वह वर्तमान जन्ममें ब्रह्माजीका पुत्र होनेपर भी उसी ऋतुके नामपर 'ऋतु' कहलाया। ब्रह्माजीका मुख प्रधान अङ्ग है। उस अङ्गसे उत्पन्न हुआ बालक इर अर्थात् तेजस्वी था, इसलिये 'अङ्गिरा' नामसे प्रसिद्ध हुआ। शौनक! भृगु शब्द अत्यन्त तेजस्वीके अर्थमें विद्यमान है। ब्रह्माजीसे उत्पन्न जो बालक अत्यन्त तेजस्वी हुआ, उसका नाम 'भृगु' हुआ। जो बालक होनेपर भी तत्काल अत्यन्त तेजके कारण अरुण वर्णका हो गया और उच्च कोटिकी तपस्याके कारण तेजसे प्रज्वलित होने लगा, वह 'अरुण' नामसे विख्यात हुआ। जिस योगीके योगबलसे हंस उसके अधीन रहते थे, वह परम

(८६)


सुतपा ब्राह्मण


शिशु नारद

ब्रह्मखण्ड ८७

योगीन्द्र बालक 'हंसी' नामसे विख्यात हुआ। तत्काल प्रकट हुआ जो बालक वशीभूत और शिष्य होकर विधाताका अत्यन्त प्रीतिपात्र हुआ, उसका नाम 'वसिष्ठ' रखा गया। जिस बालकका तपमें सदा प्रयत्न देखा गया तथा जो सम्पूर्ण कर्मोंमें संयत रहा, वह अपने उसी गुणके कारण 'यति' कहलाया। वेदोंमें 'पुल' शब्द तपस्याके अर्थमें आता है और 'ह' स्फुट-अर्थमें। जिस बालकमें स्फुटरूपसे तपस्याका समूह लक्षित हुआ, वह उसी लक्षणसे 'पुलह' कहलाया। (पुलका अर्थ है—तप:-समूह और 'स्त्य' शब्द अस्ति—'है' के अर्थमें आया है) जिसके पूर्वजन्मोंके तपःसमूह विद्यमान हैं; इसी कारण जो तपः-संघस्वरूप है; वह इसी व्युत्पत्तिके द्वारा 'पुलस्त्य' के नामसे विख्यात हुआ। 'त्रि' शब्द त्रिगुणमयी प्रकृतिके अर्थमें आता है और 'अ' विष्णुके अर्थमें। जिसकी उन दोनोंके प्रति समान भक्ति है, उस बालकको 'अत्रि' कहा गया। जिसके मस्तकपर तपस्याके तेजसे प्रकट हुई अग्निशिखास्वरूपिणी पाँच जटाएँ थीं, उसका नाम 'पञ्चशिख' हुआ। जिसने दूसरे जन्ममें आन्तरिक अन्धकारसे रहित प्रदेशमें तप किया था, उस शिशुका नाम 'अपान्तरतमा' हुआ। जो स्वयं तपस्या करता और दूसरोंको भी उसकी प्राप्ति करा सकता था तथा जो तपस्याका भार वहन करनेमें पूर्ण समर्थ था, वह अपनी इसी योग्यताके कारण 'वोढु' कहलाया। मुने! जो बालक तपस्याके तेजसे सदा दीप्तिमान् रहता था तथा तपस्यामें जिसके चित्तकी स्वाभाविक रुचि थी, वह 'रुचि' नामसे प्रसिद्ध हुआ। जो ब्रह्माजीके क्रोधके समय ग्यारहकी संख्यामें प्रकट हुए और रोने लगे, वे रोदनके ही कारण 'रुद्र' कहलाये।

सौति [फिर] बोले—जिनमें सत्त्वगुणकी प्रधानता है, वे भगवान् विष्णु पालक हैं। रजोगुणप्रधान ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हैं तथा जिनमें तमोगुणकी प्रधानता है, वे 'रुद्र' कहे गये हैं। उनके वेगको रोकना कठिन है। वे बड़े भयंकर हैं। उन रुद्रोंमेंसे एकका नाम कालाग्नि रुद्र है, जो भगवान् शंकरके अंश हैं। वे ही जगत्‌का संहार करनेवाले हैं। शुद्ध सत्त्वस्वरूप जो शिव हैं, वे सत्पुरुषोंको कल्याण प्रदान करनेवाले हैं। अन्य रुद्र श्रीकृष्णकी कलामात्र हैं। केवल भगवान् विष्णु और शंकर उन परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णके दो अंश हैं। वे दोनों ही समान सत्त्वस्वरूप हैं। ब्रह्मन्! यह बात मैंने रुद्रकी उत्पत्तिके प्रसंगमें बतायी है। आप उसे भूल क्यों रहे हैं। सच है, सभी लोग भगवान्‌की मायासे मोहित हो जाते हैं। मुनियोंको भी मतिभ्रम हो जाया करता है। 'सनक' ब्रह्माके प्रथम, 'सनन्दन' द्वितीय, 'सनातन' तृतीय और भगवान् 'सनत्कुमार' चतुर्थ पुत्र हैं। मुने! ब्रह्माजीने उन प्रथम चार पुत्रोंसे सृष्टि करनेके लिये कहा। परंतु उनके लिये यह कार्य असह्य हो गया। इससे ब्रह्माजीको बड़ा क्रोध हुआ। उसी क्रोधसे रुद्रोंकी उत्पत्ति हुई। सनक और सनन्दन—ये दोनों शब्द आनन्दके वाचक हैं। वे दोनों बालक भक्तिभावसे परिपूर्ण होनेके कारण सदा आनन्दित रहते हैं, इसलिये सनक और सनन्दन नामसे विख्यात हुए। नित्य परिपूर्णतम साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण ही सनातन पुरुष हैं। जो उनका भक्त है, वह भी वास्तवमें उन्हींके समान है। इसीलिये वह तीसरा कृष्ण-भक्त बालक सनातन नामसे विख्यात हुआ। 'सनत्' का अर्थ है नित्य और 'कुमार' का अर्थ है शिशु। नित्य शैशवावस्थासे सम्पन्न होनेके कारण इस बालकको ब्रह्माजीने सनत्कुमार नाम दिया। मुने! इस प्रकार मैंने ब्रह्माजीके पुत्रोंके नामोंकी व्युत्पत्ति बतायी। अब आप क्रमशः नारदजीके आख्यानको सुनिये।

(अध्याय २२)

८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ब्रह्माजीसे सृष्टिके लिये दारपरिग्रहकी प्रेरणा पाकर डरे हुए नारदका स्त्री-संग्रहके दोष बताकर तपके लिये जानेकी आज्ञा माँगना

सौति कहते हैं— सृष्टिकर्ता ब्रह्माने अपने सब बालकोंको सृष्टिके कार्यमें लगाकर नारदजीको भी सृष्टि करनेके लिये प्रेरित किया। उन्होंने वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् नारदसे यह सत्य, हितकर, वेदसारस्वरूप और परिणाममें सुख देनेवाली बात कही।

ब्रह्माजी बोले— कुलमें श्रेष्ठ मेरे प्राणवल्लभ पुत्र नारद! आओ। तुम ज्ञानदीपकी शिखासे अज्ञानान्धकारका निवारण करनेवाले हो। तुमसे यह बात छिपी नहीं है कि जन्मदाता पिता परम गुरु है। वह सभी वन्दनीय पुरुषोंमें सबसे श्रेष्ठ है। विद्यादाता और मन्त्रदाता दोनों समान हैं तथा पितासे भी बढ़कर हैं। बेटा! मैं तुम्हारा पिता, पालक, विद्यादाता एवं मन्त्रदाता भी हूँ। तुम मेरी आज्ञासे मेरी ही प्रसन्नताके लिये विवाह कर लो।

ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर मुनिवर नारदके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये। वे भयभीत होकर विनयपूर्वक बोले।

नारदजीने कहा— तात! वही पिता, वही गुरु, वही बन्धु, वही पुत्र और वही मेरा ईश्वर है, जो भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें सुदृढ़ भक्ति उत्पन्न करा दे*। यदि बालक अज्ञानवश कुमार्गपर चल रहे हों तो उन्हींको जो उस मार्गसे हटाता है, वही करुणानिधान पिता है। जो श्रीकृष्ण-चरणोंमें लगी हुई भक्तिका त्याग कराकर पुत्रको दूसरे किसी विषयमें लगाये, वह कैसा पिता है? स्त्रीसंग्रह केवल दुःखका ही कारण है। उससे सुख नहीं मिलता। वह तपस्या, स्वर्ग, भक्ति, मुक्ति एवं सत्कर्मोंमें विघ्न उपस्थित करनेवाला है। ब्रह्मन्! मूढ़चित्त गृहस्थोंके घरोंमें तीन प्रकारकी स्त्रियाँ पायी जाती हैं—साध्वी, भोग्या और कुलटा। वे सब-की-सब स्वार्थपरायणा होती हैं। साध्वी स्त्री परलोकके भयसे, इस लोकमें अपनेको यश मिलनेके लोभसे तथा कामासक्तिसे भी निरन्तर स्वामीकी सेवा करती है। भोग्या स्त्री भोगकी अभिलाषिणी होती है। वह सदा केवल कामासक्तिसे ही प्रियतम पतिकी सेवा करती है। भोगके सिवा और किसी हेतुसे वह क्षणभर भी सेवा नहीं करती। भोग्या स्त्री जबतक वस्त्र, आभूषण, सम्भोग तथा सुस्निग्ध एवं उत्तम आहार पाती है, तबतक ही स्वामीके वशमें रहकर प्यारी बनी रहती है। कुलटा नारी कुलमें अंगारके समान है। वह कुलका नाश करनेवाली है। कुलटा स्त्री कपटसे ही स्वामीकी सेवा करती है, भक्तिसे नहीं। वे अपने स्वार्थकी सिद्धिके लिये सुधाके समान मधुर वचन बोलती हैं। क्रोध होनेपर उनके मुखसे विषके समान दुःसह वचन निकलता है। यदि उनकी बातपर विश्वास किया जाय तब तो सर्वनाश ही हो जाता है। उनके अभिप्रायको समझना बहुत कठिन है। केवल उनका कर्म छिपा होता है। सर्वज्ञ! आप सब कुछ जानते हैं; क्योंकि आत्माराम पुरुषोंके ईश्वर हैं। प्रभो! मुझपर अनुग्रह कीजिये और अब मुझे विदा दीजिये। आप कल्पवृक्षसे भी बढ़कर हैं। मैं आपसे श्रीकृष्ण-भक्तिकी याचना करता हूँ।

ऐसा कहकर नारदजीने पिताके चरण-कमलोंको पकड़कर मङ्गलमय तपके निमित्त जानेके लिये आज्ञा माँगी। फिर दोनों हाथ जोड़कर भक्तिभावसे मस्तक झुका ब्रह्माजीकी परिक्रमा एवं प्रणाम करके वे वहाँसे जानेको उद्यत हुए। (अध्याय २३)


* स पिता स गुरुर्बन्धुः स पुत्रः स मदीश्वरः। यः श्रीकृष्णपादपद्मे दृढां भक्तिं च कारयेत्॥
(ब्रह्मखण्ड २३। १७)

२६- ब्राह्मणोंके लिये भक्ष्याभक्ष्य तथा कर्तव्या-कर्तव्यका निरूपण

ब्रह्मखण्ड ८९ ब्रह्माजीका नारदको गृहस्थधर्मका महत्त्व बताते हुए विवाहके लिये राजी करना और नारदका पिताकी आज्ञा ले शिवलोकको जाना सौति कहते हैं- नारदको इस प्रकार जाते देख ब्रह्माजी उदास हो गये और इस प्रकार बोले। ब्रह्माजीने कहा- अच्छी बात है। बेटा! तुम तपस्याके लिये जाओ। अब संसारकी सृष्टि करनेसे मेरा भी क्या प्रयोजन है? मैं सर्वेश्वर श्रीकृष्णको जाननेके लिये गोलोकको जाऊँगा। सनक, सनन्दन, सनातन तथा चौथा बेटा सनत्कुमार- ये चारों वैरागी हैं ही। यति, हंसी, आरुणि, वोढु तथा पञ्चशिख - ये सब पुत्र तपस्वी हो गये। फिर संसारकी रचनासे मेरा क्या प्रयोजन? मरीचि, अङ्गिरा, भृगु, रुचि, अत्रि, कर्दम, प्रचेता, ऋतु और मनु- ये मेरे आज्ञापालक हैं। समस्त पुत्रोंमें केवल वसिष्ठ ऐसे हैं, जो सदा मेरी आज्ञाके अधीन रहते हैं। उपर्युक्त पुत्रोंके सिवा अन्य सब-के-सब अविवेकी तथा मेरी आज्ञासे बाहर हैं। ऐसी दशामें मेरा संसारकी सृष्टिसे क्या प्रयोजन है? बेटा ! सुनो। मैं तुम्हें वेदोक्त मङ्गलमय वचन सुना रहा हूँ। वह वचन परम्परा- क्रमसे पालित होता आ रहा है तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षरूप चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला है। समस्त विद्वान् धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी इच्छा रखते हैं; क्योंकि ये वेदोंमें विहित तथा विद्वानोंकी सभाओंमें प्रशंसित हैं। वेदोंमें जिसका विधान है वह धर्म है और जिसका निषेध है वह अधर्म है। ब्राह्मणको चाहिये कि वह पहले सुखपूर्वक यज्ञोपवीत धारण करके फिर वेदोंका अध्ययन करे। अध्ययन समाप्त होनेपर गुरुको दक्षिणा दे। इसके बाद उत्तम कुलमें उत्पन्न एवं परम विनीत स्वभाववाली कन्याके साथ विवाह करे। उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई नारी साध्वी तथा पतिसेवामें तत्पर होती है। अच्छे कुलकी स्त्री कभी उद्दण्ड नहीं हो सकती। पद्मरागमणिकी खानमें काँच कैसे पैदा हो सकता है? नारद! नीच कुलमें उत्पन्न हुई नारी ही माता-पिताके दोषसे उद्दण्ड होती है। वही दुष्टा तथा सब कर्मोंमें स्वतन्त्र होती है। बेटा ! सभी स्त्रियाँ दुष्ट नहीं होती हैं; क्योंकि वे लक्ष्मीकी कलाएँ हैं। जो अप्सराओंके अंशसे तथा नीच कुलमें उत्पन्न होती हैं, वे ही स्त्रियाँ कुलटा हुआ करती हैं। साध्वी स्त्री गुणहीन स्वामीकी सेवा एवं प्रशंसा करती है और कुलटा सद्गुणशाली पतिकी भी सेवा नहीं करती। उलटे उसकी निन्दा करती है। अतः साधुपुरुष प्रयत्नपूर्वक उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई कन्याके साथ विवाह करे। उसके गर्भसे अनेक पुत्रोंको जन्म देकर वृद्धावस्थामें तपस्याके लिये जाय। आगमें निवास करना उत्तम है, साँपके मुखमें तथा काँटेपर भी रह लेना अच्छा है, परंतु मुँहसे दुर्वचन निकालनेवाली स्त्रीके साथ निवास करना कदापि अच्छा नहीं है। वह इन अग्नि, सर्प और कण्टकसे भी अधिक दुःखदायिनी होती है। बेटा! मैंने तुम्हें वेद पढ़ाया है। अब तुम मुझे यही गुरुदक्षिणा दो कि विवाह कर लो। वत्स! तुम्हारी पूर्वजन्मकी पत्नी मालती उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई है। तुम किसी मङ्गलमय दिन और क्षणमें उसके साथ विवाह करो। वह सती तुम्हें पानेके लिये ही मनुवंशी संजयके घरमें जन्म लेकर भारतवर्षमें तपस्या कर रही है। इस समय उसका नाम रत्नमाला है। वह लक्ष्मीकी कला है। तुम उसे ग्रहण करो। भारतवर्षमें लोगोंकी तपस्याका फल व्यर्थ नहीं होता। मनुष्यको अध्ययनके पश्चात् पहले गृहस्थ होना चाहिये, फिर वानप्रस्थ । तत्पश्चात् मोक्षके निमित्त तपस्याका आश्रय लेना चाहिये। वेदमें यही क्रम सुना गया है। श्रुतिमें यह भी सुना गया है कि वैष्णवोंके लिये श्रीहरिकी पूजा ही तपस्या है। तुम वैष्णव हो। अतः घरमें रहो और श्रीकृष्ण-चरणोंकी अर्चना करो। बेटा ! जिसके भीतर और बाहर

९० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण श्रीहरि ही विद्यमान हैं, उसे तपस्यासे क्या लेना है? जिसके बाहर और भीतर श्रीहरि नहीं हैं अर्थात् जो श्रीहरिको अपने बाहर और भीतर व्यास नहीं देखता, उसे भी व्यर्थकी तपस्यासे क्या लेना-देना है? तपस्याके द्वारा श्रीहरिकी ही आराधना की जाती है, दूसरा कोई आराध्य नहीं है। बेटा ! जहाँ-तहाँ कहीं भी रहकर की हुई श्रीकृष्णकी सेवा सर्वोत्तम तप है। अतः तुम मेरे कहनेसे ही घरमें रहकर श्रीहरिका भजन करो। मुनिश्रेष्ठ ! गृहस्थ बनो; क्योंकि गृहस्थोंको सदा ही सुख मिलता है। पत्नीके परिग्रहका प्रयोजन है पुत्रकी प्राप्ति; क्योंकि पुत्र सैकड़ों प्राणवल्लभा पत्नियोंसे भी अधिक प्रिय होता है। पुत्रसे बढ़कर कोई बन्धु नहीं है तथा पुत्रसे बढ़कर कोई प्रिय नहीं है। सबसे जीतनेकी इच्छा करे। एकमात्र पुत्रसे ही पराजयकी कामना करे। कोई भी प्रिय पदार्थ अपने लिये नहीं (पुत्रके लिये) रखा जाता है; इसलिये भी पुत्र प्रिय होता है। अतः प्रियतम पुत्रको अपना श्रेष्ठ धन सौंप देना चाहिये। शौनक ! ऐसा कहकर ब्रह्माजी चुप हो गये। तब ज्ञानिशिरोमणि नारदने पितासे यह बात कही। नारदजी बोले-तात ! जो स्वयं सब कुछ जानकर अपने पुत्रको कुमार्गमें लगाता है, वह पिता दयालु कैसे माना जा सकता है? ब्रह्मन् ! सारा संसार पानीके बुलबुलेके समान नश्वर है। जैसे जलकी रेखा मिथ्या होती है, उसी प्रकार तीनों लोक मिथ्या हैं। जिसका मन श्रीहरिकी दासता छोड़कर विषयके लिये चञ्चल रहता है, उसका दुर्लभ मानव तन व्यर्थ हो गया। भवसागरमें कौन किसकी प्रिया है और कौन किसका पुत्र या बन्धु है? कर्ममयी तरङ्गोंके उठनेसे इन सबका संयोग हो जाता है और उन तरङ्गोंके शान्त होनेपर ये एक-दूसरेसे बिछुड़ जाते हैं। जो सत्कर्म करवाता है, वही मित्र है, वही पिता और गुरु है। जो दुर्बुद्धि उत्पन्न करता है, वह तो शत्रु है। उसे पिता कैसे कहा जा सकता है? तात ! इस प्रकार मैंने शास्त्रके अनुसार वेदका बीज (सारतत्त्व) बताया। यद्यपि यह ध्रुव सत्य है, तथापि मुझे आपकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। भगवन् ! पहले मैं नर- नारायणके आश्रमपर जाऊँगा। वहाँ नारायणकी वार्ता सुननेके पश्चात् पत्नी-परिग्रह करूँगा। ऐसा कहकर नारदमुनि पिताके सामने चुप हो रहे, उसी क्षण उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी। पिताके सामने क्षणभर खड़े रहकर मुनिवर नारदने फिर यह मङ्गलदायक वचन कहा। श्रीनारद बोले-पिताजी ! पहले मुझे कृष्णमन्त्रका उपदेश दीजिये, जो मेरे मनको अभीष्ट है। श्रीकृष्णमन्त्र-सम्बन्धी जो ज्ञान है तथा जिसमें उनके गुणोंका वर्णन है, वह सब भी मुझे बताइये। इसके बाद आपकी प्रसन्नताके लिये मैं दार-संग्रह करूँगा; क्योंकि मनकी इच्छा पूर्ण हो जानेपर ही मनुष्यको कोई काम करनेमें सुख मिलता है। नारदकी यह बात सुनकर ज्ञानवेत्ताओंमें श्रेष्ठ कमलजन्मा ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए और अपने पुत्रसे फिर इस प्रकार बोले।

२७- परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका निरूपण

ब्रह्मखण्ड ९१


ब्रह्माजीने कहा—वत्स! भगवान् शंकर तुम्हारे पूर्वजन्मके गुरु हैं और हमारे भी पुरातन गुरु हैं। अतः तुम उन्हीं ज्ञानियोंके गुरु कल्याणदाता शान्तस्वरूप शिवके पास जाओ। वहीं उन पुरातन गुरुसे भगवन्मन्त्रका ज्ञान प्राप्त करके नारायणकी कथा-वार्ता सुनो और शीघ्र ही मेरे घर लौट आओ। शौनक! ऐसा कहकर तीनों लोकोंका धारण-पोषण करनेवाले ब्रह्माजी चुप हो गये और नारदमुनि पिताको भक्तिभावसे प्रणाम करके शिवलोकको चले गये। (अध्याय २४)


नारदजीको भगवान् शिवका दर्शन, शिवद्वारा नारदजीका सत्कार तथा उनकी मनोवाञ्छापूर्तिके लिये आश्वासन

सौति कहते हैं—शौनक! तदनन्तर विप्रवर नारद क्षणभरमें बड़ी प्रसन्नताके साथ शिवके मनोहर धाममें जा पहुँचे। भगवान् शिवका वह अभीष्ट लोक ध्रुवसे एक लाख योजन ऊपर था। त्रिशूलधारी शिवने दिव्य रत्नोंद्वारा उसका निर्माण किया है। आधारशून्य आकाशमें योगबलसे शम्भुद्वारा धारण किया गया वह विचित्र लोक भाँति-भाँतिके दिव्य भवनोंसे सुशोभित है तथा दिन-रात तेजसे उद्भासित होता रहता है। पवित्र अन्तःकरणवाले श्रेष्ठ साधक तथा मुनीन्द्रशिरोमणि महात्माजन ही उस लोकका दर्शन कर पाते हैं।

मुने! वहाँ सूर्य और चन्द्रमाकी किरणें नहीं पहुँच पातीं। परकोटोंके रूपमें प्रकट हुए अत्यन्त ऊँचे, बहुत बढ़े हुए तथा ज्वालाओंसे जगमगाते हुए असंख्य पावक उस लोकको चारों ओरसे घेरकर स्थित हैं। उस श्रेष्ठ धामका विस्तार एक लाख योजन है। उसमें श्रेष्ठ रत्नोंके बने हुए तीन हजार गृह हैं। हीरेके सार-तत्त्वसे बने हुए भाँति-भाँतिके चित्र-विचित्र मनोहर भवन उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ माणिक्य तथा मुक्तामणिके दर्पण हैं। विश्वकर्माने उस लोकको सपनेमें भी नहीं देखा होगा। एकमात्र शिवसेवी महात्माजन ही उसमें कल्पपर्यन्त निरन्तर वास करते हैं। वह शिवलोक करोड़ों-करोड़ों सिद्धों तथा शिव-पार्षदोंसे युक्त है। वहाँ लाखों विकट भैरव निवास करते हैं। सैकड़ों लाख क्षेत्र उसे घेरे हुए हैं।

सुन्दर फूलोंसे भरे हुए मन्दार आदि देववृक्षोंसे वह सदा आवेष्टित है। सुन्दर कामधेनुएँ उस धामकी उसी तरह शोभा बढ़ाती हैं, जैसे सैकड़ों बलाकाएँ आकाशकी। उस लोकको देखकर नारदमुनि मन-ही-मन बड़े विस्मित हुए और सोचने लगे—'जहाँ ज्ञानियों तथा योगियोंके गुरु निवास करते हैं, वहाँ ऐसी विचित्रताका होना क्या आश्चर्य है? यह सृष्टिलोक त्रिलोकीसे अत्यन्त विलक्षण है और भय, मृत्यु, रोग, पीड़ा तथा जरावस्थाको हर लेनेवाला है।

नारदजीने देखा, दूर सभा-मण्डपके मध्य-भागमें शान्तस्वरूप, कल्याणदाता एवं मनोहर शिव विराजमान हैं। उनके पाँच मुख पाँच चन्द्रमाओंके समान आह्लाददायक जान पड़ते हैं। प्रत्येक मुखमें प्रफुल्ल कमलके समान तीन-तीन नेत्र हैं। उन्होंने मस्तकपर गङ्गाजीको धारण कर रखा है तथा उनके भालदेशमें निर्मल चन्द्रमाका मुकुट शोभा पा रहा है। तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमती पीली जटा धारण करनेवाले दिगम्बर भगवान् शिव उस समय आकाशगङ्गामें उत्पन्न कमलोंके बीज (पद्माक्ष)-की मालासे सानन्द 'श्रीकृष्ण' नामका जप कर रहे थे। उनकी अङ्गकान्ति गौर वर्णकी है, वे अनन्त और अविनाशी हैं। उनके कण्ठमें सुन्दर नील चिह्न शोभा पाता है। वे नागराजके हारसे अलंकृत हैं। बड़े-बड़े योगीन्द्र, सिद्धेन्द्र और मुनीन्द्र उनके

९२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

चरणोंकी वन्दना करते हैं। वे सिद्धेश्वर हैं, सिद्धिविधानके कारण हैं, मृत्युञ्जय हैं तथा काल और यमका भी अन्त करनेवाले हैं। उनका मुख प्रसन्नतासूचक हास्यसे अत्यन्त मनोहर जान पड़ता है। वे सम्पूर्ण आश्रितोंको कल्याण तथा अभीष्ट वर प्रदान करनेवाले हैं। सदा शीघ्र ही संतुष्ट होनेवाले, भवरोगसे रहित, भक्तजनोंके प्रिय तथा भक्तोंके एकमात्र बन्धु हैं।

दूरसे देखनेके पश्चात् निकट जाकर मुनिने भगवान् शूलपाणिको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। उस समय मुनिके शरीरमें रोमाञ्च हो आया था। वे तीन तारवाली वीणा बजाते हुए कलहंसके समान मधुर कण्ठसे पुनः श्रीकृष्णका गुणगान करने लगे। ब्रह्माजीके पुत्र और वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीन्द्रशिरोमणि नारदको आया देख भगवान् शंकर योगीन्द्र, सिद्धेन्द्र और महर्षियोंके साथ मुस्कराते हुए सिंहासनसे वेगपूर्वक उठकर खड़े हो गये। फिर उन्होंने मुनिको बड़े वेगसे पकड़कर हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद तथा आसन आदि दिये। साथ ही उन तपोधनसे आनेका प्रयोजन और कुशल-मङ्गल पूछा। इसके बाद भगवान् शम्भु उत्तम रत्नोंके बने हुए श्रेष्ठ एवं सुन्दर सिंहासनपर अपने प्रमुख पार्षदोंके साथ बैठे। किंतु ब्रह्माजीके पुत्र नारद नहीं बैठे। उन्होंने भक्तिभावसे प्रभुको प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की। गन्धर्वराजके द्वारा किये गये शुभदायक वेदोक्त स्तोत्रसे स्तुति करके पुनः प्रणाम करनेके अनन्तर भगवान् शिवकी आज्ञा ले नारदजी उनके वाम-भागमें बैठे। वहीं उन्होंने जगत्की वाञ्छा पूर्ण करनेवाले भगवान् शिवसे अपनी हार्दिक अभिलाषा बतायी। मुनिका वह वचन सुनकर कृपानिधान शंकरने तुरंत प्रतिज्ञापूर्वक कहा—'बहुत अच्छा, तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण होगी।' (अध्याय २५)


ब्राह्मणोंके आह्निक आचार तथा भगवान्‌के पूजनकी विधिका वर्णन

**सौति कहते हैं—**शौनकजी! देवर्षि नारदने भगवान् शंकरसे श्रीहरिके स्तोत्र, कवच, मन्त्र, उत्तम पूजाविधान, ध्यान तथा उनके तत्त्वज्ञानकी याचना की। महेश्वरने उन्हें स्तोत्र, कवच, मन्त्र, ध्यान, पूजाविधि तथा उनके पूर्वजन्म-सम्बन्धी ज्ञानका उपदेश दिया। वह सब कुछ पाकर मुनिश्रेष्ठ नारदका मनोरथ पूर्ण हो गया। उन्होंने अपने शरणागतवत्सल गुरु भगवान् शिवको भक्तिभावसे प्रणाम किया और इस प्रकार कहा।

**नारदजी बोले—**वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! आप ब्राह्मणोंके आह्निक आचार (दिनचर्या या नित्य-कर्म)-का वर्णन कीजिये, जिससे प्रतिदिन स्वधर्मपालन हो सके।

**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर रात्रिमें पहने हुए कपड़ेको बदल दे और अपने ब्रह्मरन्ध्रमें स्थित सूक्ष्म, निर्मल, ग्लानिरहित सहस्रदल-कमलपर विराजमान गुरुदेवका चिन्तन करे। ध्यानमें यह देखे कि ब्रह्मरन्ध्रवर्ती सहस्रदल-कमलपर गुरुजी प्रसन्नतापूर्वक बैठे हैं, मन्द-मन्द मुस्करा रहे हैं, व्याख्याकी मुद्रामें उनका हाथ उठा हुआ है और शिष्यके प्रति उनके हृदयमें बड़ा स्नेह है। मुखपर प्रसन्नता छा रही है। वे शान्त तथा निरन्तर संतुष्ट रहनेवाले हैं और साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हैं। सदा इसी प्रकार उनका चिन्तन करना चाहिये। इस तरह ध्यान करके मन-ही-मन गुरुकी आराधना करे। तदनन्तर निर्मल, श्वेत, सहस्रदलभूषित, विस्तृत हृदयकमलपर विराजमान इष्टदेवका चिन्तन करे। जिस देवताका जैसा ध्यान और जो रूप बताया गया है, वैसा ही चिन्तन करना चाहिये। गुरुकी आज्ञा ले समयोचित कर्तव्यका पालन करना चाहिये। क्रम यह है कि पहले गुरुका ध्यान करके उन्हें प्रणाम करे। फिर उनकी विधिवत् पूजा करनेके

ब्रह्मखण्ड ९३

पश्चात् उनकी आज्ञा ले इष्टदेवका ध्यान एवं पूजन करे। गुरु ही देवताके स्वरूपका दर्शन कराते हैं। वे ही इष्टदेवके मन्त्र, पूजाविधि और जपका उपदेश देते हैं। गुरुने इष्टदेवको देखा है; किंतु इष्टदेवने गुरुको नहीं देखा है। इसलिये गुरु इष्टदेवसे भी बढ़कर हैं। गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं, गुरु महेश्वरदेव हैं, गुरु आद्या प्रकृति-ईश्वरी (दुर्गा देवी) हैं, गुरु चन्द्रमा, अग्नि और सूर्य हैं, गुरु ही वायु और वरुण हैं, गुरु ही माता-पिता और सुहृद् हैं तथा गुरु ही परब्रह्म परमात्मा हैं। गुरुसे बढ़कर दूसरा कोई पूजनीय नहीं है। इष्टदेवके रुष्ट होनेपर गुरु शिष्य अथवा साधककी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। परंतु गुरुदेवके रुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता मिलकर भी उस साधककी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हैं। जिसपर गुरु सदा संतुष्ट हैं, उसे पग-पगपर विजय प्राप्त होती है और जिसपर गुरुदेव रुष्ट हैं, उसके लिये सदा सर्वनाशकी ही सम्भावना रहती है। जो मूढ़ भ्रमवश गुरुकी पूजा न करके इष्टदेवका पूजन करता है, वह सैकड़ों ब्रह्महत्याओंके पापका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। सामवेदमें साक्षात् भगवान् श्रीहरिने भी ऐसी बात कही है। इसलिये गुरु इष्टदेवसे भी बढ़कर परम पूजनीय हैं।

मुने! इस प्रकार गुरुदेव तथा इष्टदेवका ध्यान एवं स्तवन करके साधक वेदमें बताये हुए स्थानपर पहुँचकर प्रसन्नतापूर्वक मल और मूत्रका त्याग करे। जल, जलके निकट का स्थान, बिलयुक्त भूमि, प्राणियोंके निवासके निकट, देवालयके समीप, वृक्षकी जड़के पास, मार्ग, हलसे जोती हुई भूमि, खेतीसे भरे हुए खेत, गोशाला, नदी, कन्दराके भीतरका स्थान, फुलवाड़ी, कीचड़युक्त अथवा दलदलकी भूमि, गाँव आदिके भीतरकी भूमि, लोगोंके घरके आसपासका स्थान, मेख या खम्भेके पास, पुल, सरकंडोंके वन, श्मशानभूमि, अग्निके समीप, क्रीडास्थल (खेल-कूदके मैदान), विशाल वन, मचानके नीचेका स्थान, पेड़की छायासे युक्त स्थान, जहाँ भूमिके भीतर प्राणी रहते हों वह स्थान, जहाँ ढेर-के-ढेर पत्ते जमा हों वह भूमि, जहाँ घनी दूब उगी हो अथवा कुश जमे हों वह स्थान, बाँबी, जहाँ वृक्ष लगाये गये हों वहाँकी भूमि तथा जो किसी विशेष कार्यके लिये झाड़-बुहारकर साफ की गयी हो, वह भूमि-इन सबको छोड़कर सूर्यके तापसे रहित स्थानमें गड्ढा खोद उसीमें मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये।

दिनमें उत्तराभिमुख होकर मल-मूत्रका त्याग करे; रातमें पश्चिमकी ओर मुँह करके और संध्याकालमें दक्षिणकी ओर मुँह रखते हुए मलोत्सर्ग तथा मूत्रोत्सर्ग करना उचित है। मौन रहकर, जोर-जोरसे साँस न लेते हुए मलत्याग करे, जिससे उसकी दुर्गन्ध नाकमें न जाय। मलत्यागके पश्चात् उस मलको मिट्टी डालकर ढक दे। तदनन्तर बुद्धिमान् पुरुष गुदा आदि अङ्गोंको शुद्ध करे। पहले ढेले या मिट्टीसे गुदा आदिकी शुद्धि करे। तत्पश्चात् उसे जलसे धोकर शुद्ध करे। मृत्तिकायुक्त जो जल शौचके उपयोगमें आता है, उसका परिमाण सुनो। मूत्रत्यागके पश्चात् लिङ्गमें एक बार मिट्टी लगाये और धोये। फिर बायें हाथमें चार बार मिट्टी लगाकर धोये। तत्पश्चात् दोनों हाथोंमें दो बार मिट्टी लगाकर धोना चाहिये, यह मूत्र-शौच कहा गया। यदि मैथुनके अनन्तर मूत्र-शौच करना हो तो उसमें मिट्टी लगाने और धोनेकी संख्या दुगुनी कर दे अथवा मैथुनके अनन्तरका शौच मूत्र-शौचकी अपेक्षा चौगुना होना चाहिये। मलत्यागके पश्चात् लिङ्गमें एक बार, गुदामें तीन बार, बायें हाथमें दस बार तथा दोनों हाथोंमें सात बार मिट्टी देनी चाहिये। छठे बार मिट्टी लगाकर धोनेसे पैरोंकी शुद्धि होती है। गृहस्थ ब्राह्मणोंके लिये मलत्यागके अनन्तर यही शौच बताया गया है। विधवाओंके लिये इस शौचका परिमाण दुगुना बताया गया है।

२८- बदरिकाश्रममें नारायणके प्रति नारदजीका प्रश्न

९४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

यतियों, वैष्णवों, ब्रह्मर्षियों एवं ब्रह्मचारियोंके लिये गृहस्थोंकी अपेक्षा चौगुने शौचका विधान किया गया है। उपनयनरहित द्विज, शूद्र तथा स्त्रीके लिये उतने ही शौचका विधान है, जितनेसे उन-उन अङ्गोंमें लगे हुए मलके लेप और दुर्गन्ध मिट जायँ। क्षत्रिय और वैश्यके लिये भी गृहस्थ ब्राह्मणोंके समान शौचका विधान है। वैष्णव आदि मुनियोंके लिये दुगुना शौच कहा गया है। शुद्धिकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको शौचके उपर्युक्त नियममें न्यूनता या अधिकता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि विहित नियमका उल्लङ्घन करनेपर प्रायश्चित्तका भागी होना पड़ता है।

नारद! अब तुम मुझसे शौच तथा उसके नियमके विषयमें सावधान होकर सुनो! मिट्टीसे शुद्धि करनेपर ही वास्तविक शुद्धि होती है। ब्राह्मण भी इस नियमका उल्लङ्घन करे तो वह अशुद्ध ही है। बाँबीकी मिट्टी, चूहोंकी खोदी हुई मिट्टी और पानीके भीतरकी मिट्टी भी शौचके उपयोगमें न लाये। शौचसे बची हुई मिट्टी, घरकी दीवारसे ली हुई मिट्टी तथा लीपने-पोतनेके काममें लायी हुई मिट्टी भी शौचके लिये त्याज्य है। जिसके भीतर प्राणी रहते हों, जहाँ पेड़से गिरे हुए पत्तोंके ढेर लगे हों तथा जहाँकी भूमि हलसे जोती गयी हो, वहाँकी भी मिट्टी न ले। कुश और दूर्वाके जड़से निकाली गयी, पीपलकी जड़के निकटसे लायी गयी तथा शयनकी वेदीसे निकाली गयी मिट्टीको भी शौचके काममें न लाये। चौराहेकी, गोशालाकी, गायकी खुरीकी, जहाँ खेती लहलहा रही हो, उस खेतकी तथा उद्यानकी मिट्टीको भी त्याग दे।

ब्राह्मण नहाया हो अथवा नहीं, उपर्युक्त शौचाचारके पालनमात्रसे शुद्ध हो जाता है तथा जो शौचसे हीन है, वह नित्य अपवित्र एवं समस्त कर्मोंके अयोग्य है। विद्वान् ब्राह्मण इस शौचाचारका पालन करके मुँह धोये। पहले सोलह बार कुल्ला करके मुख शुद्ध करनेके पश्चात् दँतुवनसे दाँतकी सफाई करे। फिर सोलह बार कुल्ला करके मुँह शुद्ध करे। नारद! दाँत माँजनेके लिये जो काठकी लकड़ी ली जाती है, उसके विषयमें भी कुछ नियम है, उसे सुनो। सामवेदमें श्रीहरिने आह्निक प्रकरणमें इसका निरूपण किया है। अपामार्ग (चिड़चिड़ा या ऊँगा), सिन्धुवार (सँभालू या निर्गुण्डी), आम, करवीर (कनेर), खैर, सिरस, जाति (जायफल), पुन्नाग (नागकेसर या कायफल), शाल (साखू), अशोक, अर्जुन, दूधवाला वृक्ष, कदम्ब, जामुन, मौलसिरी, उड़्र (अढ़उल) और पलाश—ये वृक्ष दँतुवनके लिये उत्तम माने गये हैं। बेर, देवदारु, मन्दार (आक), सेमर, कँटीले वृक्ष तथा लता आदिको त्याग देना चाहिये। पीपल, प्रियाल (पियाल), तिन्तिडीक (इमली), ताड़, खजूर और नारियल आदि वृक्ष दँतुवनके उपयोगमें वर्जित हैं। जिसने दाँतोंकी शुद्धि नहीं की, वह सब प्रकारके शौचसे रहित है। शौचहीन पुरुष सदा अपवित्र होता है। वह समस्त कर्मोंके लिये अयोग्य है। शौचाचारका पालन करके शुद्ध हुआ ब्राह्मण स्नानके पश्चात् दो धुले हुए वस्त्र धारण करके पैर धो आचमनके पश्चात् प्रातः-कालकी संध्या करे।

इस प्रकार जो कुलीन ब्राह्मण तीनों संध्याओंके समय संध्योपासना करता है, वह समस्त तीर्थोंमें स्नानके पुण्यका भागी होता है। जो त्रिकाल संध्या नहीं करता, वह अपवित्र है। समस्त कर्मोंके अयोग्य है। वह दिनमें जो काम करता है, उसके फलका भागी नहीं होता। जो प्रातः और सायं संध्याका अनुष्ठान नहीं करता, वह शूद्रके समान है। उसको समस्त ब्राह्मणोचित कर्मसे बाहर निकाल देना चाहिये।* प्रातः, मध्याह्न और सायं-


* नोपतिष्ठति यः पूर्वां नोपास्ते यस्तु पश्चिमाम्। स शूद्रवद्बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ॥
(ब्रह्मखण्ड २६।५३)