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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

२१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ है, उसीको वहाँ श्रद्धाके नामसे कहा गया है। यह कथन गतिमे सङ्कल्पकी प्रधानता दिखानेके लिये है । इस प्रकार पहले-पहल जो बात श्रद्धाके नामसे कही गयी है, उसीका अन्तिम वाक्यमें जलके नामसे वर्णन किया है; अतः पूर्वापरमे कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध-पहलेकी भाँति दूसरे विरोधकी उत्थापना करके उसका निराकरण करते हैं- अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणां प्रतीतेः ॥ ३ । १ । ६ ॥ चेत्=यदि ऐसा कहा जाय कि; अश्रुतत्वात्=श्रुतिमें तत्त्वोंके साथ जीवात्माके गमनका वर्णन नहीं है, इसलिये ( उनके सहित जीवात्मा जाता है, यह कहना युक्तिसंगत नहीं है ); इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; इष्टादिकारिणाम्=( क्योकि ) उसी प्रसंगमें अच्छे-बुरे कर्म करनेवालोका वर्णन है; प्रतीतेः=अतः इस श्रुतिमे उन शुभाशुभकारी जीवात्माओके वर्णनकी प्रतीति स्पष्ट है, इसलिये ( उक्त विरोध यहाँ नहीं है ) । व्याख्या-यदि कहो कि उस प्रकरणमे जीवात्मा उन तत्त्वोंको लेकर जाता है, ऐसी बात नहीं कही गयी है, केवल जलके नामसे तत्त्वोंका ही पुरुष- रूपमें हो जाना बताया गया है, इसलिये यह कहना विरुद्ध है कि तत्त्वोंसे युक्त जीवात्मा एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जाता है; तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि उसी प्रकरणमें आगे चलकर कहा है कि 'जो अच्छे आचरणवाले होते है, वे उत्तम योनिको प्राप्त होते है और जो नीच कर्म करनेवाले होते हैं, वे नीच योनियोंको प्राप्त होते हैं।' * (छा० उ० ५ । १० । ७) । इस वर्णनसे अच्छे-बुरे कर्म करनेवाले जीवात्माका उन तत्त्वोंके साथ एक शरीरसे दूसरे शरीरको प्राप्त होना सिद्ध होता है, इसलिये कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध-इसी प्रकरणमें जहाँ सकामभावसे शुभ कर्म करनेवालोंके लिये धूममार्गसे स्वर्गमें जानेकी बात कही गयी है, वहाँ ऐसा वर्णन आता है कि 'वह स्वर्गमें जानेवाला पुरुष देवताओंका अन्न `है, देवता लोग उसका भक्षण करते हैं' (बृह० उ० ६ । २ । १६) । अतः यह कहना कैसे संगत होगा कि

  • 'तद् य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् ।'

सूत्र ६—७ ] अध्याय ३ २१५

सूत्र ६—७ ] अध्याय ३ २१५ पुण्यात्मालोग अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये स्वर्गमें जाते हैं। जब वे स्वयं ही देवताओंके भोग्य बन जाते हैं, तब उनके द्वारा स्वर्गका भोग भोगना कैसे सिद्ध होगा ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भाक्तं वानात्मवित्त्वात्तथा हि दर्शयति ॥ ३ । १ । ७ ॥ अनात्मवित्त्वात् = वे लोग आत्मज्ञानी नहीं है, इस कारण (आत्मज्ञानीकी अपेक्षा उनकी हीनता दिखानेके लिये ); वा = ही; भाक्तम् = उनको देवताओं- का अन्न बतानेवाली श्रुति गौण है; हि = क्योंकि; तथा = उस प्रकारसे (उनका हीनत्व और स्वर्गलोकमे नाना प्रकारके भोगोको भोगना ) भी; दर्शयति = श्रुति दिखलाती है । व्याख्या—वे सकामभावसे शुभ कर्म करनेवाले लोग आत्मज्ञानी नहीं हैं, अतः आत्मज्ञानकी स्तुति करनेके लिये गौणरूपसे उनको देवताओका अन्न और देवताओंद्वारा उनका भक्षण किया जाना कहा गया है, वास्तवमे तो, श्रुति यह कहती है कि 'देवतालोग न खाते हैं और न पीते हैं, इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते है।' (छा० उ० ३ । ६ । १)* अतः इस कथनका यह भाव है कि राजाके नौकरोकी भाँति वह देवताओंके भोग्य यानी सेवक होते है। इस भावके वचन श्रुतिमे दूसरी जगह भी पाये जाते हैं—'जो उस परमेश्वरको न जानकर दूसरे देवताओंकी उपासना करता है, वह जैसे यहाँ लोगोंके घरोंमे पशु होते हैं, वैसे ही देवताओंका पशु होता है।' (बृह० उ० १ । ४ । १०)† आत्म- ज्ञानकी स्तुतिके लिये इस प्रकार कहना उचित ही है। इसके सिवा, वे शुभ कर्मवाले लोग देवताओके साथ आनन्दका उपभोग करते हैं, इसका श्रुतिमें इस तरह वर्णन किया गया है—'पितृलोकपर विजय पानेवालोंकी अपेक्षा सौगुना आनन्द कर्मोंसे देवभावको प्राप्त होनेवालोंको होता है‡।' तथा गीतामें भी इस प्रकार कहा गया है— 'ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥

  • 'न ह वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ।' † 'अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते••••••यथा पशुरेवँ स देवानाम्।' ‡ अथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः • स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसंपद्यन्ते । ( बृह० उ० ४ । ३ । ३३ )

२१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ 'वे वहाँ विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मृत्युलोकमे लौट आते हैं। इस प्रकार वेदोक्त धर्मका आचरण करनेवाले वे भोगकामी मनुष्य आवागमनको प्राप्त होते रहते हैं' ( गीता ९ । २१ ) । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि उनको देवताओका अन्न कहना वहाँ गौणरूपसे है, वास्तवमें वहाँ जाकर वे अपने कर्मोंका ही फल भोगते है और फिर वहाँसे वापस लौट आते हैं। अतः जीवात्मा- का एक शरीरसे दूसरे शरीरमे सूक्ष्म तत्त्वोके सहित जाना सर्वथा सुसङ्गत है; इसमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है। सम्बन्ध—“उक्त प्रकरणमें कहा गया है कि 'जबतक उसके कर्मोंका क्षय नही हो जाता, तबतक वह वहीं रहता है, फिर वहाँसे इस लोकमें लौट आता है।' अतः प्रश्न होता है कि उसके सभी पुण्यकर्म पूर्णतया समाप्त हो जाते हैं या कुछ कर्म शेष रहता है, जिसे साथ लेकर वह लौटता है?” इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं- कृतात्ययेऽनुशयवान्दृष्टस्मृतिभ्यां यथेत- मनेवं च ॥ ३ । १ । ८ ॥ कृतात्यये=किये हुए पुण्य कर्मोंका क्षय होनेपर; अनुशयवान् =शेष कर्म- संस्कारोंसे युक्त (जीवात्मा); यथेतम् =जैसे गया था उसी मार्गसे; च= अथवा; अनेवम् =इससे भिन्न किसी दूसरे प्रकारसे लौट आता है; दृष्टस्मृतिभ्याम्= श्रुति और स्मृतियोंसे (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या-उस जीवके द्वारा किये हुए कर्मोंमेंसे जिनका फल भोगनेके लिये उसे स्वर्गलोकमे भेजा गया है, उन पुण्यकर्मोंका पूर्णतया क्षय हो जानेपर वह स्वर्गस्थ जीवात्मा अनुशयसे अर्थात् शेष कर्मसंस्कारोंसे युक्त होकर जिस मार्गसे गया था, उसीसे अथवा किसी दूसरे प्रकारसे लौट आता है। इस प्रकरणमें जो यह बात कही गयी है कि 'तद् य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्........अथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनि- मापद्येरन्।' अर्थात् 'अच्छे आचरणोंवाले अच्छी योनिको प्राप्त होते हैं और बुरे आचरणोवाले बुरी योनियोंको प्राप्त होते हैं' (छा० उ० ५ । १० । ७) इस वर्णनसे यही सिद्ध होता है तथा स्मृतिमे जो यह कहा गया है कि 'जो वर्णाश्रमी मनुष्य अपने कर्मोंमें स्थित रहनेवाले हैं, वे यहाँसे स्वर्गलोकमें जाकर वहाँ कर्मोंका फल भोगकर बचे हुए कर्मोंके अनुसार अच्छे जन्म, कुल, रूप आदिको प्राप्त होते हैं' (गौतमस्मृति ११ । १) इस स्मृतिवाक्यसे भी यही बात सिद्ध होती है।

सूत्र ८—१०] अध्याय ३ २१७

सूत्र ८—१०] अध्याय ३ २१७ सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे विरोधकी उत्थापना करके उसका निराकरण करते हैं— चरणादिति चेन्नोपलक्षणार्थेति कार्ष्णा- जिनिः॥ ३ । १ । ९ ॥ चेत्=यदि ऐसा कहो कि; चरणात्=चरण शब्दका प्रयोग है, इसलिये ( यह कहना उचित नहीं है कि वह शेष कर्मसंस्कारोको साथ लेकर आता है ); इति न=तो ऐसी बात नहीं है; उपलक्षणार्था=क्योंकि वह श्रुति अनुशय ( शेष कर्म-संस्कारो ) का उपलक्षण करानेके लिये है; इति=यह बात; कार्ष्णा- जिनिः='कार्ष्णाजिनि'नामक आचार्य कहते हैं ( इसलिये कोई विरोध नहीं है )। व्याख्या—उपर्युक्त शङ्काका उत्तर अपनी ओरसे न देकर आचार्य कार्ष्णाजिनिका मत उपस्थित करते हुए सूत्रकार कहते हैं—यदि पूर्व- पक्षीद्वारा यह कहा जाय कि "यहाँ 'रमणीयचरणाः' इत्यादि श्रुतिमे तो चरण शब्दका प्रयोग है, जो कर्मसंस्कारका वाचक नहीं है; इसलिये यह सिद्ध नहीं होता कि जीवात्मा स्वर्गलोकसे लौटते समय बचे हुए कर्मसंस्कारोंको साथ लिये हुए लौटता है" तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि वहाँ जो 'चरण' शब्द है, वह अनुशयका उपलक्षण करानेके लिये है अर्थात् यह सूचित करनेके लिये है कि जीवात्मा भुक्तशेष कर्मसंस्कारको साथ लेकर लौटता है, अतः कोई दोष नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनमें पुनः शङ्का उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं— आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ॥ ३ । १ । १० ॥ चेत्=यदि कहो; आनर्थक्यम्=(बिना किसी कारणके उपलक्षणके रूपमें 'चरण' शब्दका प्रयोग करना ) निरर्थक है; इति न=तो यह ठीक नहीं, क्योंकि; तदपेक्ष- त्वात्=कर्माशयमें आचरण आवश्यक है । व्याख्या—यदि यह कहा जाय कि यहाँ 'चरण' शब्दको बिना किसी कारण- के कर्मसंस्कारका उपलक्षग मानना निरर्थक है, इसलिये उपर्युक्त उत्तर ठीक नहीं है, तो ऐसी बात नहीं है, उपर्युक्त उत्तर सर्वथा उचित है; क्योंकि कर्म- संस्काररूप अनुशय पूर्वकृत शुभाशुभ आचरणोंसे ही बनता है, अतः कर्माशयके लिये आचरण अपेक्षित है, इसलिये 'चरण' शब्दका प्रयोग निरर्थक नहीं है।

२१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सम्बन्ध—अब पूर्वोक्त शङ्काके उत्तरमें महर्षि बादरिका मत प्रस्तुत करते हैं— सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ॥ ३ । १ । ११ ॥ बादरिः तु = बादरि आचार्य तो; इति = ऐसा ( मानते हैं कि ); सुकृत- दुष्कृते = इस प्रकरणमें 'चरण' नामसे शुभाशुभ कर्म; एव = ही कहे गये हैं। व्याख्या—आचार्य श्रीबादरिका कहना है कि यहाँ उपलक्षण माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है; यहाँ 'रमणीयचरण' शब्द पुण्यकर्मोंका और 'कपूयचरण' शब्द पापकर्मका ही वाचक है। अतः यह समझना चाहिये कि जो रमणीयचरण हैं, वे शुभ कर्माशयवाले हैं और जो कपूयचरण हैं वे पाप कर्माशयवाले हैं। इसलिये यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा बचे हुए कर्मसंस्कारोंको साथ लिये हुए ही लौटता है। सम्बन्ध—अब पूर्वपक्षी पुनः शङ्का उपस्थित करता है— अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ॥ ३ । १ । १२ ॥ च = किन्तु; अनिष्टादिकारिणाम् = अशुभ आदि कर्म करनेवालोंका; अपि = भी ( चन्द्रलोकमें जाना ); श्रुतम् = वेदमें सुना गया है। व्याख्या—कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्मे कहा है कि 'ये वैके चास्माल्लोकात् प्रयन्ति, चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति।' ( १ । २ ) अर्थात् 'जो कोई भी इस लोकसे जाते हैं, वे सब चन्द्रमाको ही प्राप्त होते हैं।' इस प्रकार यहाँ कोई विशेषण न देकर सभीका चन्द्रलोकमें जाना कहा गया है। इससे तो बुरे कर्म करनेवालोंका भी स्वर्गलोकमें जाना सिद्ध होता है, अतः श्रुतिमें जो यह कहा गया है कि इष्टापूर्त्त और दानादि शुभ कर्म करनेवाले धूममार्गसे चन्द्रलोकको जाते हैं, उसके साथ उपर्युक्त श्रुतिका विरोध प्रतीत होता है; उसका निराकरण कैसे होगा ? सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें उपस्थित की हुई शङ्काका सूत्रकार उत्तर देते हैं— संयमने त्वनुभूयेतरेषामारोहावरोहौ तद्गति- दर्शनात् ॥ ३ । १ । १३ ॥ तु = किन्तु; इतरेषाम् = दूसरोंका अर्थात् पापकर्म करनेवालोंका; संयमने = यमलोकमें; अनुभूय = पापकर्मोंका फल भोगनेके बाद; आरोहावरोहौ = चढ़ना-उतरना होता है; तद्गतिदर्शनात् = क्योंकि उनकी गति श्रुतिमें इसी प्रकार देखी जाती है।

सूत्र ११-१४ ] अध्याय ३ २१९

सूत्र ११-१४ ] अध्याय ३ २१९ व्याख्या—यहाँ पापीलोगोंका चन्द्रलोकमें जाना नहीं कहा गया है, क्योंकि पुण्यकर्मोंका फल भोगनेके लिये ही स्वर्गलोकमें जाना होता है; चन्द्रलोकमें बुरे कर्मोंका फल भोगनेकी व्यवस्था नहीं है; इसलिये यही समझना चाहिये कि अच्छे कर्म करनेवाले ही चन्द्रलोकमें जाते हैं। उनसे भिन्न जो पापीलोग हैं, वे अपने पापकर्मका फल भोगनेके लिये यमलोकमें जाते हैं, वहाँ पापकर्मोंका फल भोग लेनेके बाद उनका पुनः कर्मानुसार गमनागमन यानी नरकसे मृत्युलोकमें आना और पुनः नये कर्मानुसार स्वर्गमें जाना या नरक आदि अधोगतिको पाना होता रहता है। उन लोगोंकी गतिका ऐसा ही वर्णन श्रुतिमें देखा जाता है। कठोपनिषद्‌में यमराजने स्वयं कहा है कि— न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ 'सम्पत्तिके अभिमानसे मोहित हुए, निरन्तर प्रमाद करनेवाले अज्ञानीको परलोक नहीं दीखता। वह समझता है कि यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला लोक ही सत्य है, दूसरा कोई लोक नहीं, इस प्रकार माननेवाला मनुष्य बार-बार मेरे वशमें पड़ता है।' (कठ० १। २। ६) इससे यही सिद्ध होता है कि शुभ कर्म करनेवाला ही पितृयानमार्गसे या अन्य मार्गसे स्वर्गलोकमें जाता है, पापीलोग यमलोकमें जाते हैं। कौषीतकि-ब्राह्मणमें जिनके चन्द्रलोकमें जानेकी बात कही गयी है, वे-सब पुण्यकर्म करनेवाले ही हैं; क्योंकि उसी श्रुतिमें चन्द्रलोकसे लौटनेवालोंकी कर्मानुसार गति बतायी गयी है। इसलिये दोनों श्रुतियोंमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—इसी बातको दृढ़ करनेके लिये स्मृतिका प्रमाण देते हैं— स्मरन्ति च ॥ ३ । १ । १४ ॥ च=तथा; स्मरन्ति=स्मृतिमें भी इसी बातका समर्थन किया गया है। व्याख्या—गीतामें सोलहवें अध्यायके ७ वें श्लोकसे १५ वें श्लोकतक आसुरी प्रकृतिवाले पापी पुरुषोंके लक्षणका विस्तारपूर्वक वर्णन करके अन्तमें कहा है कि 'वे अनेक प्रकारके विचारोंसे भ्रान्त हुए, मोहजालमें फँसे हुए और भोगोंके उपभोगमें रचे-पचे हुए मूढ़लोग कुम्भीपाक आदि अपवित्र नरकोंमें गिरते हैं' (गीता १६। १६)। इस प्रकार स्मृतिके वर्णनसे भी उसी बातका समर्थन होता है। अतः पापकर्मियोंका नरकमें गमन होता है; यही मानना ठीक है।

२२० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे उसी बातको कहते हैं— अपि च सप्त ॥ ३ । १ । १५ ॥ अपि च = इसके सिवा; सप्त = पापकर्मका फल भोगनेके लिये प्रधानतः सात नरकोंका भी वर्णन आया है। व्याख्या—इसके सिवा, पापकर्मोंका फल भोगनेके लिये पुराणोंमें प्रधानतासे रौरव आदि सात नरकोंका भी वर्णन किया गया है, इससे उन पापकर्मियोंके स्वर्गगमनकी तो सम्भावना ही नहीं की जा सकती। सम्बन्ध—नरकोंमें तो चित्रगुप्त आदि दूसरे अधिकारी बताये गये हैं, फिर यह कैसे कहा कि पापीलोग यमराजके अधिकारमें दण्ड भोगते हैं ? इसपर कहते हैं— तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ॥ ३ । १ । १६ ॥ च=तथा; तत्र=उन यातनाके स्थानोंमे; अपि=भी; तद्व्यापारात्=उस यमराज- के ही आज्ञानुसार कार्य होनेसे; अविरोधः=किसी प्रकारका विरोध नहीं है। व्याख्या—यातना भोगनेके लिये जो रौरव आदि सात नरक बताये गये हैं, और वहाँ जो चित्रगुप्त आदि दूसरे अधिकारी हैं, वे यमराजके आज्ञानुसार कार्य करते हैं, इसलिये उनका किया हुआ कार्य भी यमराजका ही कार्य है। अतः यमराजके अधिकारमें पापियोंके दण्ड भोगनेकी जो बात कही गयी है, उसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—ऐसा मान लेनेपर भी पूर्वोक्त श्रुतिमें जो सबके चन्द्रलोकमें जाने- की बात कही गयी, उसकी संगति (कौ० १ । २) कैसे होगी ? इसपर कहते हैं— विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ॥ ३ । १ । १७ ॥ विद्याकर्मणोः=ज्ञान और शुभ कर्म—इन दोनोंका; तु=ही; प्रकृत- त्वात्=प्रकरण होनेके कारण; इति=ऐसा कथन उचित ही है। व्याख्या—जिस प्रकार छान्दोग्योपनिषद् (५ । १० । १) मे विद्या और शुभ कर्मोंका फल बतानेका प्रसङ्ग आरम्भ करके देवयान और पितृयान- मार्गकी बात कही गयी है, उसी प्रकार वहाँ कौषीतकि उपनिषद्मे भी ज्ञान

सूत्र १५-१९ ] अध्याय ३ २२१ .

सूत्र १५-१९ ] अध्याय ३ २२१ . और शुभ कर्मोंका फल बतानेके प्रकरणमे ही उक्त कथन है। इसलिये यह समझना चाहिये कि जो शुभ कर्म करनेवाले अधिकारी मनुष्य इस लोकसे जाते है, वे ही सब-के-सब चन्द्रलोकको जाते है; अनिष्ट कर्म करनेवाले नहीं; क्योंकि उनका प्रकरण नहीं है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'कठोपनिषद्में जो पापियोंके लिये यमलोकमे जानेकी बात कही गयी है, वह छान्दोग्य-श्रुतिमें बतायी हुई तीसरी गतिके अन्तर्गत है, या उससे भिन्न ?' इसके उत्तरमें कहते है— न तृतीये तथोपलब्धेः ॥ ३ । १ । १८ ॥ तृतीये=वहाँ कही हुई तीसरी गतिमेः न=(यमलोकगमनरूप गतिका ) अन्तर्भाव नहीं होता; तथा उपलब्धेः=क्योकि उस वर्णनमे ऐसी ही बात मिलती है। व्याख्या—वहाँ छान्दोग्योपनिषद् (५ । १० । ८) मे यह बात कही गयी है कि 'अथैतयोः पथोर्न कतरेण च तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयं स्थानम्।' अर्थात् 'देवयान और पितृयान—इन दोनो मार्गोंमेंसे किसी भी मार्गमे जो ऊपरके लोकोमे नहीं जाते, वे क्षुद्र तथा वार-वार जन्मने- मरनेवाले प्राणी होते हैं; 'उत्पन्न होओ और मरो'—यह मृत्युलोक ही उनका तीसरा स्थान है।' इत्यादि। इस वर्णनमे यह पाया जाता है कि उनका किसी भी परलोकमे गमन नहीं होता, वे इस मृत्युलोकमे ही जन्मने-मरते रहते हैं। इसलिये इस तीसरी गतिमे यमयातणारूप नरकलोकवाली गतिका अन्तर्भाव नहीं है। सम्बन्ध—इन तीन गतियोंके सिवा चौथी गति जिसमें नरकयातना आदिके भोग हैं तथा जो ऊपर कही हुई तीसरी गतिसे भी अधम गति है, उसका वर्णन कहाँ आता है, इसपर कहते है— स्मर्यतेऽपि च लोके ॥ ३ । १ । १९ ॥ स्मर्यते=स्मृतियोंमे इसका समर्थन किया गया है; च=तथा; लोके=लोकोंमे, अपि=भी ( यह बात प्रसिद्ध है )। व्याख्या—श्रीमद्भगवद्गीता ( १४ । १८) मे कहा है कि— ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥

२२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ 'सत्त्वगुणमें स्थित रहकर मरनेवाले लोग ऊपरके लोकोंमे जाते है (देवयान और पितृयान—दोनों मार्ग इसके अन्तर्गत हैं), राजसी लोग बीचमे अर्थात् इस मनुष्यलोकमें ही जन्मते-मरते रहते है (यह छान्दोग्यमे बतायी हुई तीसरी गतिके अन्तर्गत है )। निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमे स्थित तामसी जीव नीचेके लोकोमे जाते हैं' (यह इसीके अन्तर्गत उक्त तीसरी गतिसे अधम यम- यातनास्वरूप गति भी है) इसका स्पष्टीकरण गीता अध्याय १६ श्लोक २० में किया गया है। इस प्रकार इस यमयातनास्वरूप अधोगतिका वर्णन स्मृतियोमे पाया जाता है तथा लोकमें भी यह प्रसिद्ध है। पुराणोंमे तो इसका वर्णन बड़े विस्तार- से आता है। इसको अधोगति कहते है, इसलिये वहाँसे जो नारकी जीवोका पुनः मृत्युलोकमे आना है, वह उनका पूर्व कथनके अनुसार ऊपर उठना है और पुनः नरकमें जाना ही नीचे गिरना है। सम्बन्ध—अब दूसरा प्रमाण देकर उसी बातको सिद्ध करते हैं— दर्शनाच्च ॥ ३ । १ । २० ॥ दर्शनात् = श्रुतिमे भी ऐसा वर्णन देखा जाता है, इसलिये; च = भी (यह मानना ठीक है कि इस प्रकरणमे बतायी हुई तीसरी गतिमें यमयातनाका अन्तर्भाव नहीं है)। व्याख्या—ईशावास्योपनिषद्‌मे कहा है— असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः । तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ( ईशा० ३) 'जो असुरोके प्रसिद्ध लोक हैं, वे सब-के-सब अज्ञान तथा दुःख-क्लेशरूप महान् अन्धकारसे आच्छादित हैं, जो कोई भी आत्माकी हत्या करनेवाले मनुष्य हैं, वे मरनेके बाद उन्हीं भयङ्कर लोकोंको बार-बार प्राप्त होते है।' इस प्रकार उपनिषदोंमें भी उस नरकादि लोकोकी प्राप्तिरूप गतिका वर्णन देखा जाता है। इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि इस प्रसङ्गमें कही हुई तीसरी गतिमें यम- यातनावाली गतिका अन्तर्भाव नहीं है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद्में जीवोंकी तीन श्रेणियाँ बतायी गयी हैं—अण्डज—अण्डेसे उत्पन्न होनेवाले, जीवज— जेरसे उत्पन्न होनेवाले और उद्भिज्ज—पृथ्वी फोड़कर उत्पन्न होनेवाले ( छा० उ० ६ । ३ । १ ? ); किन्तु दूसरी जगह जीवोंके चार भेद सुने जाते हैं।

सूत्र २०-२३ ] अध्याय ३ २२३

सूत्र २०-२३ ] अध्याय ३ २२३ यहाँ चौथी स्वेदज अर्थात् पसीनेसे उत्पन्न होनेवाली श्रेणीको क्यों छोड़ा गया ? इसपर कहते हैं— तृतीयशब्दावरोधः संशोकजस्य ॥ ३ । १ । २१ ॥ संशोकजस्य = पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले जीवसमुदायका; तृतीयशब्दा- वरोधः = तीसरे नामवाली उद्भिज्ज-जातिमे संग्रह ( समझना चाहिये ) । व्याख्या—इस प्रकरणमे जो पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले स्वेदज जीवोका वर्णन नहीं हुआ, उसका श्रुतिमे तीसरे नामसे कही हुई उद्भिज्ज-जातिमे अन्तर्भाव समझना चाहिये; क्योकि दोनो ही पृथिवी और जलके संयोगसे उत्पन्न होते हैं । सम्बन्ध—अब स्वर्गलोकसे लौटनेकी गतिपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। छान्दोग्योपनिषद् ( ५ । १० । ५,६ ) मे कहा गया है कि स्वर्गसे लौटनेवाले जीव पहले आकाशको प्राप्त होते हैं, आकाश- से वायु, धूम, मेघ आदिके क्रमसे उत्पन्न होते हैं। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीव उन-उन आकाश आदिके रूपमें स्वयं परिणत होते हैं या उनके समान हो जाते हैं ? इसपर कहते हैं— तत्साभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ॥ ३ । १ । २२ ॥ तत्साभाव्यापत्तिः = उनके सदृश भावकी प्राप्ति होती है; उपपत्तेः = क्योकि यही बात युक्तिसे सिद्ध होती है । व्याख्या—यहाँ जो आकाश, वायु आदि बनकर लौटनेकी बात कही गयी है, इस कथनसे जीवात्माका उन-उन तत्त्वोके रूपमे परिणत होना युक्तिसंगत नहीं है, क्योकि आकाश आदि पहलेसे विद्यमान है और जीवात्मा जब एकके बाद दूसरे भावको प्राप्त हो जाते है, उसके बाद भी वे आकाशादि पदार्थ रहते ही हैं । इसलिये यही मानना युक्तिसंगत है कि वे उन आकाश आदिके सदृश आकारवाले बनकर लौटते है । उनका आकाशके सदृश सूक्ष्म हो जाना ही आकाशको प्राप्त होना है । इसी प्रकार वायु आदिके विषयमे भी समझ लेना चाहिये । सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि वे जीव उन-उन तत्त्वोंके आकारमें बहुत दिनोंतक टिके रहते हैं या तत्काल ही क्रमसे नीचे उतरते जाते हैं, इसपर कहते हैं— नातिचिरेण विशेषात् ॥ ३ । १ । २३ ॥ विशेषात् = ऊपर गमनकी अपेक्षा नीचे उतरनेकी परिस्थितिमें भेद होनेके

२२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ कारण; नातिचिरेण=जीव उन आकाश, वायु आदिके रूपमे अधिक कालतक न रहकर क्रमशः नीचे उतर आते है। व्याख्या-ऊपरके लोकमे जानेका जो वर्णन है, वह कर्मोंके फलभोगसे सम्बन्ध रखता है, इसलिये बीचमें आये हुए पितृलोक आदिमें विलम्ब होना भी सम्भव है, परन्तु लौटते समय कर्मभोग तो समाप्त हो जाते हैं, इसलिये बीचमें कहीं विलम्ब होनेका कोई कारण नहीं रहता । इस प्रकार ऊपरके लोकोंमें जाने और वहाँसे लौटनेकी गतिमे विशेषता होनेके कारण यही सिद्ध होता है कि लौटते समय रास्तेमे विलम्ब नहीं होता । सम्बन्ध-अब यह जिज्ञासा होती है कि परलोकसे लौटनेवाले उस जीवात्मा- का जो धान, जौ, तिल और उड़द आदिके रूपमें होना कहा गया है, उसका क्या भाव है ? क्या वह स्वयं वैसा बन जाता है या उस योनिको भोगनेवाला जीवात्मा कोई दूसरा होता है, जिसके साथमें यह भी रहता है, इसपर कहते हैं— अन्याधिष्ठितेषु पूर्ववदभिलापात् ॥ ३ । १ । २४ ॥ पूर्ववत्=पहलेकी भाँति ही; अभिलापात्=यह कथन है, इसलिये; अन्याधिष्ठितेषु=दूसरे जीवात्मा अपने कर्मफलभोगके लिये जिनमे स्थित हो रहे हैं, ऐसे धान, जौ आदिमें केवल सन्निधिमात्रसे इसका निवास है । व्याख्या-जिस प्रकार पूर्वसूत्रमे यह बात कही गयी है कि वह लौटनेवाला जीवात्मा आकाश आदि नहीं बनता, उनके सदृश होकर ही उनसे संयुक्त होता है, उसी प्रकार यहाँ धान आदिके विषयमे भी समझना चाहिये; क्योकि यह कथन भी पहलेके सदृश ही है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि उन धान, जौ आदिमे अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये जो दूसरे जीव पहलेसे ही स्थित हैं, उनसे संयुक्त होकर ही यह चन्द्रलोकमे लौटनेवाला जीवात्मा उनके साथ-साथ पुरुषके उदरमे चला जाता है; धान, जौ आदि स्थावर-योनियोंको प्राप्त नहीं होता। सम्बन्ध-इसपर शङ्का उपस्थित करके ग्रन्थकार उसका निराकरण करते हैं - अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ॥ ३ । १ । २५ ॥ चेत्=यदि कहा जाय कि; अशुद्धम्=यह तो अशुद्ध ( पाप ) कर्म होगा; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; शब्दात्=श्रुतिके वचनसे इसकी निर्दोषता सिद्ध होती है। व्याख्या-यदि यह शङ्का की जाय कि अनाजके प्रत्येक दानेमें जीव रहता

सूत्र २४-२७ ] अध्याय ३ २२५

सूत्र २४-२७ ] अध्याय ३ २२५ है, इस मान्यताके अनुसार अन्नको पीसना, पकाना और खाना तो बडा अशुद्ध ( पाप ) कर्म होगा, क्योकि उसमें तो अनेक जीवोकी हिंसा करनेपर एक जीवकी उदरपूर्ति होगी' तो ऐसी बात नहीं है; क्योकि इस प्रकरणमे पुरुषको 'अग्नि' बताकर उसमे अन्नका हवन करना बताया है तथा श्रुतिमे जगह-जगह अन्नके खाये जानेका वर्णन है ( छा० उ० ६ । ६ । २)। अतः श्रुतिका विधान होनेके कारण उसमे हिंसा नहीं होती तथा उन जीवोकी उस कालमे सुषुप्ति-अवस्था रहती है, जब वे पृथिवी और जलके सम्बन्धसे अङ्कुरित होते हैं, तब उनमे चेतना आती है और सुख-दुःखका ज्ञान होता है, पहले नहीं। अतः अन्नभक्षणमे हिंसा नहीं है। सम्बन्ध-अन्नसे सयुक्त होनेके बाद वह किस प्रकार कर्मफल-भोगके लिये शरीर धारण करता है, उसका क्रम बतलाते हैं--- रेतःसिग्योगोऽथ ॥ ३ । १ । २६ ॥ अथ=उसके बाद; रेतःसिग्योगः = वीर्यका सेचन करनेवाले पुरुषके साथ उसका सम्बन्ध होता है। व्याख्या-उसके अनन्तर वह जीवात्मा अन्नके साथ पुरुषके पेटमे जाकर उसके वीर्यमे प्रविष्ट हो उस पुरुषसे संयुक्त होता है, इस कथनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि आकाश आदिसे लेकर अन्नतक सभी जगह केवल संयोगसे ही उसका तदाकार होना कहा गया है; स्वरूपसे नहीं। सम्बन्ध-उसके बाद- योनेः शरीरम् ॥ ३ । १ । २७ ॥ योनेः=स्त्रीकी योनिमे प्रविष्ट होनेके अनन्तर; शरीरम् = वह जीवात्मा कर्म- फलभोगके अनुरूप शरीरको प्राप्त होता है। व्याख्या-इस प्रकार वह खर्गसे आनेवाला जीवात्मा पहले पुरुषके वीर्यके आश्रित होता है। फिर उस पुरुषद्वारा गर्भाधानके समय स्त्रीकी योनिमें वीर्यके साथ प्रविष्ट करा दिया जाता है। वहाँ गर्भाशयसे सम्बद्ध होकर उक्त जीव अपने कर्मफलोके अनुरूप शरीरको प्राप्त होता है। यहींसे उसके कर्मोंके फलका भोग आरम्भ होता है। इसके पहले खर्गसे उतरकर वीर्यमे प्रविष्ट होनेतक उसका कोई जन्म या शरीर धारण करना नहीं है, केवल उन-उन आकाश आदिके आश्रित रहनामात्र कहा गया है; उन धान आदि शरीरोंके अधिष्ठाता जीव दूसरे ही हैं। पहला पाद सम्पूर्ण । वे० द० १५-

दूसरा पाद पहले पादमें देहान्तरप्राप्तिके प्रसङ्गमें पञ्चाग्निविद्याके प्रकरणपर विचार करते हुए जीवको बारंबार प्राप्त होनेवाले जन्म-मृत्युरूप दुःखका वर्णन किया गया। इस वर्णनका गूढ़ अभिप्राय यही है कि जीवके मनमें सांसारिक पदार्थों तथा अपने नश्वर शरीरके प्रति आसक्ति कम हो और निरन्तर वैराग्यकी भावना बढ़े। अब, दूसरे पादमें वर्तमान शरीरकी भिन्न-भिन्न अवस्थाओंपर विचार करके इस जन्म- मरणरूप संसार-बन्धनसे छूटनेके लिये परमेश्वरका ध्यानरूप उपाय बताना है; अतएव पहले स्वप्नावस्थापर विचार आरम्भ करते हुए दो सूत्रोंमें पूर्वपक्षकी उत्थापना की जाती है— सन्ध्ये सृष्टिराह हि ॥ ३ । २ । १ ॥ सन्ध्ये=स्वप्नमे भी जाग्रत्की भाँति; सृष्टि:=सांसारिक पदार्थोंकी रचना होती है; हि=क्योंकि; आह=श्रुति ऐसा वर्णन करती है। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे यह वर्णन आया है कि 'स्वप्नावस्थामे यह जीवात्मा इस लोक और परलोक दोनोंको देखता है, वहाँ दुःख और आनन्द दोनोंका उपभोग करता है, इस स्थूल शरीरको स्वयं अचेत करके वासनामय नये शरीरकी रचना करके, (बृह० उ० ४ । ३ । ९) जगत्को देखता है। 'उस अवस्थामे सचमुच न होते हुए भी रथ, रथको ले जानेवाले वाहन और उसके मार्गकी तथा आनन्द, मोद, प्रमोदकी एवं कुण्ड, सरोवर और नदियोंकी रचना कर लेता है।' (बृह० उ० ४ । ३ । १०)* इत्यादि । इसी प्रकार दूसरी श्रुतियोमे भी स्वप्नमें सृष्टिका होना कहा है (प्र० उ० ४ । ५; बृह० उ० २ । १ । १८)। इसलिये यह सिद्ध होता है कि स्वप्नमें भी सांसारिक पदार्थोंकी रचना होती है और वह अत्यन्त विचित्र तथा जीवकृत है। निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च ॥ ३ । २ । २ ॥ च=तथा; एके=एक शाखावाले; निर्मातारम्=पुरुषको कामनाओंका

  • 'न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते न तत्रानन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते······वेशान्तान् पुष्करिणीः स्रवन्तीः सृजते।'

सूत्र १—३ ] अध्याय ३ २२७

सूत्र १—३ ] अध्याय ३ २२७ निर्माता भी मानते हैं; च=और (उनके मतमे); पुत्रादयः=पुत्र आदि ही 'काम' अथवा कामनाके विषय हैं। व्याख्या—कठोपनिषद्मे वर्णन आया है कि 'य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं , कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।' (२।२।८) 'यह नाना प्रकारके भोगोंकी रचना करनेवाला पुरुष अन्य सबके सो जानेपर स्वयं जागता रहता है।' इससे पुरुषको कामनाओंका निर्माता कहा है। क० उ० (१।१।२३-२४)के अनुसार पुत्र-पौत्र आदि ही 'काम' अथवा कामनाके विषय हैं। इससे भी यही सिद्ध होता है कि स्वप्नमे सृष्टि है। सम्बन्ध—इस प्रकार पूर्वपक्षीके द्वारा स्वप्नकी सृष्टिको सत्य सिद्ध करने- की चेष्टा की गयी तथा उसे जीवकर्तृक बताया गया। अब सिद्धान्तीकी ओरसे उसका उत्तर दिया जाता है— मायामात्रं तु कात्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात् ॥ ३।२।३॥ तु=किन्तु; कात्स्न्येन=पूर्णरूपसे; अनभिव्यक्तस्वरूपत्वात्=उसके स्वरूपकी अभिव्यक्ति (उपलब्धि) न होनेके कारण; मायामात्रम्=वह माया- मात्र है। व्याख्या—स्वप्नकी सृष्टिका वर्णन करते हुए श्रुतिने यह बात तो पहले ही स्पष्ट कर दी है कि जीवात्मा वहाँ जिन-जिन वस्तुओकी रचना करता है, वे वास्तवमें नहीं है। इसके सिवा, यह देखा भी जाता है कि स्वप्नमे सब वस्तुएँ पूर्णरूपसे देखनेमें नहीं आतीं; जो कुछ देखा जाता है, वह अनियमित और अधूरा ही देखा जाता है। प्रश्नोपनिषद्मे तो स्पष्ट ही कहा है कि 'जाग्रद्- अवस्थामें सुनी हुई, देखी हुई और अनुभव की हुई वस्तुओको स्वप्नमे देखता है, किन्तु विचित्र ढंगसे देखता है। देखी-सुनी हुईको और न देखी- सुनी हुईको भी देखता है तथा अनुभव की हुईको और न अनुभव की हुईको- भी देखता है। इन सब कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि स्वप्नकी सृष्टि वास्तविक नहीं, जीवको कर्मफलका भोग करानेके लिये भगवान् अपनी योगमायासे उसके कर्म-संस्कारोंकी वासनाके अनुसार वैसे दृश्य देखनेमे उसे लगा देते हैं, अतः वह स्वप्न-सृष्टि तो मायामात्र है, जाग्रत्की भाँति सच्ची नहीं है। यही कारण है कि.उस अवस्थामे किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका फल जीवात्माको नहीं

२२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ भोगना पड़ता। तथा पूर्वपक्षीने जो यह बात कही थी कि किसी-किसी शाखा- वाले लोग पुरुषको पुत्र-पौत्रादि काम्य-विषयोंकी रचना करनेवाला बताते हैं, वह ठीक नहीं है; क्योंकि वहाँ स्वप्नावस्थाका प्रकरण नहीं है और उस मन्त्रमें जीवात्माको काम्य-विषयोंका निर्माता नहीं कहा गया है, वहाँ यह विशेषण परमात्माके लिये आया है। सम्बन्ध—इससे तो यह सिद्ध होता है कि स्वप्न सर्वथा व्यर्थ है, उसकी कोई सार्थकता नहीं है, इसपर कहते हैं— सूचकश्च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ॥ ३ । २ । ४ ॥ सूचकः = स्वप्न भविष्यमें होनेवाले शुभाशुभ परिणामका सूचक; च = भी होता है; हि = क्योंकि; श्रुतेः = श्रुतिसे यह सिद्ध होता है; च = और; तद्विदः = स्वप्नविषयक शास्त्रको जाननेवाले भी; आचक्षते = ऐसी बात कहते हैं। व्याख्या—श्रुति (छा० उ० ५ । २ । ९) मे कहा है— यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने ॥ 'जब काम्य कर्मोंके प्रसङ्गमें स्वप्नोंके दृश्योंमें स्त्रीको देखे तो ऐसे स्वप्न देखनेका परिणाम यह समझना चाहिये कि उस किये जानेवाले काम्यकर्ममें भलीभाँति अभ्युदय होनेवाला है।' तथा यह भी कहा है कि 'यदि स्वप्नमे काले दाँतवाले काले पुरुषको देखे तो वह मृत्युका सूचक है।' (ऐतरेय आरण्यक ३ । २ । ४ । १७) इत्यादि, श्रुतिके प्रमाणोंसे यह सिद्ध होता है कि स्वप्न सर्वथा व्यर्थ नहीं है, वह वर्तमानके आगामी परिणामका सूचक भी होता है। इसके सिवा, जो स्वप्नविज्ञानको जाननेवाले विद्वान् हैं, वे भी इसी प्रकार स्वप्नमे देखे हुए दृश्योंको भविष्यमें होनेवाली शुभाशुभ घटनाओंके सूचक बताते हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि स्वप्नकी घटना जीवात्माकी स्वतन्त्र रचना नहीं है, वह तो निमित्तमात्र है; वास्तवमें सब कुछ जीवके कर्मानुसार उस परमेश्वरकी शक्तिसे ही होता है। सम्बन्ध—जीवात्मा भी तो ईश्वरका ही अंश है, अतः इसमें ईश्वरके ज्ञान और ऐश्वर्य आदि गुण भी आंशिक रूपसे होंगे ही। फिर यदि ऐसा मान लें कि स्वप्नकी सृष्टि जीवात्मा स्वयं करता है तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं—

सूत्र ४—६ ] अध्याय ३ २२९

सूत्र ४—६ ] अध्याय ३ २२९ पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ॥ ३ । २ । ५ ॥ ( जीवात्मामे भी ईश्वरके समान गुण है ) तु=किन्तु; तिरोहितम्=छिपे हुए ( आवृत्त ) है; पराभिध्यानात्=( अतः ) परब्रह्म परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे ( वे प्रकट हों जाते है ); हि=क्योकि; ततः=उस परमात्माके सकाशसे ही; अस्य=इसके; बन्धविपर्ययौ=बन्धन और उसके विपरीत अर्थात् मोक्ष है । व्याख्या—जीवात्मा ईश्वरका अंश है, इसलिये यह भी ईश्वरके सदृश गुणों- वाला है, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है; परन्तु इसके वे सब गुण तिरोहित है— छिपे हुए हैं; इस कारण उनका उपयोग नहीं देखा जाता । उस परब्रह्म परमेश्वरका निरन्तर ध्यान करनेसे जीवके वे छिपे हुए गुण पुनः प्रकट हो सकते हैं ( श्वे० उ० १ । ११ ) । परमेश्वरकी आराधनाके बिना अपने-आप उनका प्रकट होना सम्भव नहीं है, क्योकि इस जीवका अनादिसिद्ध बन्धन और उससे मुक्त होना उस जगत्कर्ता परमेश्वरके ही अधीन है ( श्वे० उ० ६ । १६ ) । इसलिये वह स्वयं स्वप्नकी सृष्टि आदि कुछ नहीं कर सकता ।* सम्बन्ध—इस जीवात्माके जो वास्तविक ईश्वरसम्बन्धी गुण हैं, वे क्यों छिपे हुए हैं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— देहयोगाद्वा सोऽपि ॥ ३ । २ । ६ ॥ सः=वह तिरोभाव; अपि=भी; देहयोगात्=शरीरके सम्बन्धसे; वा= ही है । व्याख्या—इस जीवात्मामे उस परब्रह्म परमात्माके स्वाभाविक गुण विद्यमान रहते हुए भी जो उन गुणोंका तिरोभाव हो रहा है, वे गुण प्रकट नहीं हो रहे हैं तथा यह जीवात्मा जो उन सब गुणोंसे सर्वथा अनभिज्ञ है, इसका मुख्य कारण जीवात्माका शरीरके साथ एकताको प्राप्त हो जाना ही है । यही इसका बन्धन है और यह अनादिकालसे है । इसीके कारण जन्म-जन्मान्तरोंके कर्म-

  • साधकको चाहिये कि इस रहस्यको समझकर उस परमदयालु, सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरके आश्रित होकर निरन्तर उसका भजन-ध्यान करे और इस बन्धनसे छुटकारा पानेके लिये भगवान्से प्रार्थना करे । इस जगत्रूप नाटकका सूत्रधार परमेश्वर जिसको उस प्रपञ्चसे अलग करना चाहे, वही इससे अलग हो सकता है ।

२३० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ संस्कारोसे परवश हुआ यह जीव नाना योनियोमे जन्म लेता और मरता है तथा भाँति-भाँतिके दुःखोंका उपभोग कर रहा है । सम्बन्ध—यहाँतक स्वप्नावस्थापर विचार किया गया, उसमें प्रसङ्गवश जीवात्माके बन्धन और उससे छूटनेके उपायका भी संक्षेपमें वर्णन हुआ । अब जीवात्माकी सुषुप्ति-अवस्थापर विचार करनेके लिये अगला प्रसङ्ग आरम्भ किया जाता है । प्रायः यह कहा जाता है कि सुषुप्ति-अवस्थामें जीवात्माका ब्रह्मसे संयोग होता है, इससे यह भ्रान्त धारणा हो सकती है कि सुषुप्ति भी समाधिके सदृश कोई सुखप्रद अवस्था है । अतः इस भ्रमका निवारण करनेके लिये कहते हैं— तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि च ॥ ३ । २ । ७ ॥ तदभावः=(सुषुप्ति-अवस्थामे ) उस स्वप्नदृश्यका अभाव हो जाता है ( उस समय जीवात्मा ); नाडीषु=नाडियोमे (.स्थित हो जाता है ); तच्छ्रुतेः=क्योकि वैसा ही श्रुतिका कथन है; च=तथा; आत्मनि=आत्मामे भी ( उसकी स्थिति बतायी गयी है ) । व्याख्या—पूर्व सूत्रोमे जो स्वप्नावस्थाका वर्णन किया गया है, उसका उपभोग करते समय यह जीवात्मा कभी तो स्वप्नसे जग जाता है और कभी फिर स्वप्नमे स्थित हो जाता है, पुनः जगता और फिर स्वप्नावस्थामें चला जाता है ( बृह० उ०-४ । ३ । १० से १८ तक ) । इस प्रकार स्वप्नगत मानसिक सुख-दुःखोंका उपभोग करते-करते कभी सुषुप्ति-अवस्था हो जानेपर स्वप्नके दृश्योका अभाव हो जाता है । इससे यह सिद्ध होता है कि वे मायामात्र हैं; क्योंकि बाह्यजगत्का अभाव नहीं होता, उसका कार्य ज्यो-का-त्यो चलता रहता है तथा जीवात्मा- का शरीर भी सुरक्षित रहता है, इसलिये उसका सत् होना सिद्ध होता है । उस समय जीवात्माको इस प्रपञ्चके उपभोगसे विश्राम मिलता है तथा शरीर और इन्द्रियोंकी थकावट दूर होती है । वह अवस्था आनेपर जीवात्माकी स्थिति कैसी और कहाँ रहती है, इस विषयमें श्रुति कहती है—'जब यह सुषुप्ति-अवस्थाको प्राप्त होता है, तब कुछ भी नहीं जानता; इसके शरीरमे जो बहत्तर हजार हिता नामकी नाडियाँ हृदयसे निकलकर समस्त शरीरमे व्याप्त हो रही है, उनमे फैलकर यह समस्त शरीरमें व्याप्त हुआ शयन करता है।' ( बृह०उ० २ । १ । १९ ) दूसरी श्रुतिमे

सूत्र ७ ] अध्याय ३ २३१

सूत्र ७ ] अध्याय ३ २३१ ऐसा भी कहा गया है कि 'जब यह शयन करता हुआ किसी तरहका स्वप्न नहीं देखता, सब प्रकारसे सुखी होकर नाड़ियोंमें व्याप्त हो जाता है, उस समय इसे कोई पाप स्पर्श नहीं कर सकते।' (छा० उ० ८। ६। ३) । भाव यह है कि उस समय अज्ञातमें इसके शरीरकी क्रियाद्वारा किसी जीवकी हिंसादि पापकर्म हो जाय तो वह नहीं लगता। तथा कहीं ऐसा भी कहा है कि 'हे सौम्य ! उस सुषुप्तिके समय यह पुरुष सत्‌से सम्पन्न होता है' (छा० उ० ६। ८। १) एक स्थान- पर ऐसा वर्णन आता है कि 'उस समय परमात्माके स्पर्शको प्राप्त हुआ यह जीवात्मा न तो बाहरकी किसी वस्तुको जानता है और न शरीरके भीतरकी ही किसी वस्तुको जान पाता है' (बृह० उ० ४। ३ । २१)। इन सब वर्णनोंसे यही मालूम होता है कि नाड़ियोंका मूल और इस जीवात्मा तथा परब्रह्म परमात्माका निवासस्थान हृदय है, उसी जगह सुषुप्तिमें जीवात्मा शयन करता है; इसलिये उसकी स्थिति हृदयस्थ नाड़ियोंमें और परमात्मामें भी बतायी जा सकती है । इसमें कोई विरोध नहीं है । स्थानकी एकताके कारण ही कहीं उसको ब्रह्मकी प्राप्ति, कहीं प्रलयकी भाँति परमात्माके साथ संयुक्त होना आदि कहा गया है; परन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिये कि यह भी 'समाधिकी भाँति मुक्तिमें सहायक है । यह तो महान् तामसी सुखका उपभोग करानेवाली अज्ञानमयी स्थिति है (गीता १८ । ३९) । अतः शरीररक्षाके लिये कम-से-कम आवश्यक समयतक ही शयन करना चाहिये, श्रेष्ठ सुखकी बुद्धिसे नहीं। प्रश्नोपनिषद्‌में स्पष्ट ही यह वर्णन है कि 'वह मन जब तेजसे अर्थात् उदानवायुसे दब जाता है—उदान-वायु इन्द्रियोंसहित मनको हृदयमें ले जाकर मोहित कर देता है, तब इसकी सुषुप्ति-अवस्था होती है, उस समय यह स्वप्नको नहीं देखता। इस शरीरमें जीवात्माको यह सुषुप्तिजनित सुख होता है' (प्र० उ० ४। ६)। इस विषयमें दूसरी श्रुतिमें जो यह बात कही है कि 'उस समय तेजसे सम्पन्न होता है।' (छा० उ० ८। ६ । ३) वहाँ भी तेजका अर्थ उदान- वायु ही समझना चाहिये, ब्रह्म नहीं; क्योंकि प्रश्नोपनिषद्‌में तीसरे प्रश्नका उत्तर देते हुए नवें और दसवें मन्त्रमें स्पष्ट ही उदानवायुकी और तेजकी एकता की गयी है । अतः ऐसा माननेसे ही वहाँ किये हुए वर्णनके साथ छान्दोग्यश्रुतिकी एकवाक्यता सिद्ध होगी।

२३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध—सुषुप्तिकालमें जो परमात्माके साथ हृदयदेशमें जीवात्माकी स्थिति बतायी गयी है, उसीकी पुष्टि करते हैं— अतः प्रबोधोऽस्मात् ॥ ३ । २ । ८ ॥ अतः = इसलिये; अस्मात् = यहाँसे; प्रबोधः = जीवात्माका जगना ( श्रुतिमे कहा गया है ) । व्याख्या—जो वस्तु जिसमें विलीन होती है, वह वहींसे प्रकट भी होती है । इस न्यायसे जीवात्मा सुषुप्तिका अन्त होनेपर जब जगता है, तब यहाँसे अर्थात् परमात्माके निवास-स्थान हृदयसे ही जाग्रत् होता है, इसलिये उसके लय होनेका स्थान भी वही है, यह अपने-आप सिद्ध हो जाता है। यह जगना उस परमात्माकी ही व्यवस्थासे होता है। जितने समयतक उसके प्रारब्धानुसार सुषुप्तिका सुखभोग होना चाहिये, उतना समय पूरा हो जानेपर उस परमेश्वरकी व्यवस्थासे जीवात्मा जाग्रत् हो जाता है; यह भाव भी यहाँ समझ लेना चाहिये । सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जो जीवात्मा सुषुप्ति-अवस्थामें विलीन होता है, वही जगकर वापस आता है या शरीरके किसी अङ्गमें पड़ा हुआ दूसरा ही कोई जीव जगता है ? इसपर कहते हैं— स एव तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ॥ ३ । २ । ९ ॥ तु = निस्संदेह; स एव = वही जगता है; कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः = क्योंकि कर्म, अनुस्मृति, वेदप्रमाण और कर्म करनेकी आज्ञा इन सबकी सिद्धि तभी होगी, इसलिये यही मानना ठीक है। व्याख्या—जो जीवात्मा सोता है, वही जागता है। सोता दूसरा है और जगता दूसरा है, ऐसा माननेमे बहुत दोष आते हैं। अतः वैसा नहीं माना जा सकता; क्योंकि यह देखा जाता है कि मनुष्य पहले दिन जिस कर्मको आरम्भ करता है, उसके शेष भागकी पूर्ति दूसरे-तीसरे दिनोंतक करता रहता है। आधा काम दूसरेने किया हो और शेष आधे कामको अपना ही छोड़ा हुआ समझकर उसकी पूर्ति दूसरा करे यह सम्भव नहीं है। तथा जगनेके बाद पहलेकी सब बातोंकी स्मृतिके साथ- साथ यह भी स्मरण अपने-आप होता ही है कि जो अबतक सोता था, वही मैं अब जगा हूँ। दूसरे जीवात्माकी कल्पना करनेसे किसी प्रकार भी इसकी सङ्गति नहीं हो

सूत्र ८—१० ] अध्याय ३ २३३

सूत्र ८—१० ] अध्याय ३ २३३ सकती; एवं श्रुतिमे भी जगह-जगह जो सोता है, उसीके जगनेकी बात कही गयी है ( बृह० उ० ४ । ३ । १६ )। और कर्म करनेकी जो वेदोंमे आज्ञा दी गयी है, उसकी सफलता भी जो सोता है, उसीके जगनेसे होगी; क्योकि एकको दी हुई आज्ञाका दूसरा कैसे पालन कर सकेगा। इन सब कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि जो जीवात्मा सुषुप्तिकालमे विलीन होता है, वही जगता है। सम्बन्ध—जब मनुष्य किसी औषध आदिसे मूर्च्छित कर दिया जाता है अथवा अन्य किन्हीं बीमारी आदि कारणोंसे अचेत हो जाता है, उस समय भी न तो बाहरी जगत्‌का ज्ञान रहता है, न स्वप्न देखता है और न सुखका ही अनुभव करता है, वह कौन-सी अवस्था है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— मुग्धेऽर्द्धसम्पत्तिः परिशेषात् ॥ ३ । २ । १० ॥ मुग्धे=मूर्च्छाकालमे; अर्द्धसम्पत्तिः=अधूरी सुषुप्ति-अवस्था माननी चाहिये; परिशेषात्=क्योकि अन्य कोई अवस्था शेष नहीं है। व्याख्या—जन्मके बाद मरनेसे पहले जीवकी पूर्वोक्त तीन अवस्थाएँ ही प्रसिद्ध हैं। किसी विशेष कारणसे कभी-कभी हो जानेवाली यह मुग्धावस्था सबकी और सदैव नहीं होती, अतः इसके लक्षण कुछ-कुछ सुषुप्तिमे ही सङ्गत हो सकते हैं। इसलिये इसे अधूरी सुषुप्ति मानना ही उचित है; क्योकि उस अवस्थामे सुषुप्तिका सुखलाभ नहीं होता, केवल अज्ञानमात्रमे ही सुषुप्तिसे इसकी समता है; अतः इसे पूर्णतया सुषुप्ति भी नहीं कहा जा सकता। सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणसे जीवात्माकी जाग्रत् आदि अवस्थाओंका निरूपण किया गया। उसमें प्रसङ्गवश यह बात भी कही गयी कि उस परब्रह्म परमेश्वरका निरन्तर चिन्तन करनेपर यह जीव कर्मबन्धनसे मुक्त हो सकता है। जिसके ध्यानका यह महान् फल बताया गया है, उस परब्रह्म परमात्माका क्या स्वरूप है ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण प्रारम्भ किया जाता है। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि श्रुतियोंमें कहीं तो उस परमेश्वरको सर्वथा निर्विशेष निर्गुण बताया गया है ( क० उ० १ । ३ । १५, मा० उ० ७ )। कहीं उसको सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी, सर्वसाक्षी तथा समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयका कारण कहा गया है ( मा० उ० ६ )। कहीं उसे सर्वव्यापी और कहीं अङ्गुष्ठमात्र बताया गया है। कहीं क्रियाशील और