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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र ६०—६४ ] अध्याय ३ २९९

सूत्र ६०—६४ ] अध्याय ३ २९९ सम्बन्ध—इसके सिवा— शिष्टेश्च ॥ ३ । ३ । ६२ ॥ शिष्टेः=श्रुतिके शासन ( विधान ) से; च=भी ( यही सिद्ध होता है ) । व्याख्या—जिस प्रकार उद्गीथ आदि स्तोत्रोंके समुच्चयका श्रुतिमे विधान है, उसी प्रकार उनके आश्रित उपासनाओंके समुच्चयका विधान भी उनके साथ ही हो जाता है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि कर्मोंके अङ्गोंके अनुसार उनके आश्रित रहनेवाली उपासनाओका समुच्चय हो सकता है । सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी बातको दृढ करते हैं— समाहारात् ॥ ३ । ३ । ६३ ॥ समाहारात्=कर्मोंका समाहार वताया गया है, इसलिये उनके आश्रित उपासनाओका भी समाहार ( समुच्चय ) उचित ही है । व्याख्या—उद्गीथ उपासनामे कहा है कि 'स्तोत्रगान करनेवाला पुरुष होताके कर्ममे जो स्तोत्रसम्बन्धी त्रुटि हो जाती है, उसका भी संशोधन कर लेता है।' ( छा० उ० १ । ५ । ५ ) । इस प्रकार प्रणव और उद्गीथकी एकता समझकर उद्गान करनेका महत्त्व दिखाया है । इस समाहारसे भी अङ्गाश्रित उपासनाका समुच्चय सूचित होता है । सम्बन्ध—पुनः उसी बातको दृढ़ करते हैं— गुणसाधारण्यश्रुतेश्च ॥ ३ । ३ । ६४ ॥ गुणसाधारण्यश्रुतेः=गुणोंकी साधारणता बतानेवाली श्रुतिसे; च=भी ( यही बात सिद्ध होती है ) । व्याख्या—उपासनाका गुण जो ॐकार है, उसका प्रयोग समान भावसे दिखाया है । जैसे कहा है कि 'उस ( ॐ ) अक्षरसे ही यह त्रयीविद्या (तीनो वेदोसे सम्बन्ध रखनेवाली यज्ञादि कर्मसम्बन्धी विद्या ) प्रवृत्त होती है, ॐ ऐसा कहकर ही आश्रावण कर्म करता है, ॐ ऐसा कहकर होता ( कथन ) करता है, ॐ ऐसा कहकर ही उद्गाता स्तोत्रगान करता है ।' (छा० उ० १ । १ । ९) इसी प्रकार कर्माङ्ग-सम्बन्धी गुण जो कि उद्गीथ आदि है, उनका भी समान भावसे प्रयोग श्रुतिमे विहित है । इसलिये भी उपासनाओंका उनके आश्रयभूत कर्माङ्गोंके साथ समुच्चय होना उचित सिद्ध होता है ।

सूत्रोंमें उसका उत्तर देकर इस पादकी समाप्ति की जाती है—

३०० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध-इस प्रकार चार सूत्रोंद्वारा पूर्वपक्षकी उत्थापना करके अब दो सूत्रोंमें उसका उत्तर देकर इस पादकी समाप्ति की जाती है— न वा तत्सहभावाश्रुतेः ॥ ३ । ३ । ६५ ॥ वा=किन्तु; तत्सहभावाश्रुतेः=उन-उन उपासनाओंका समुच्चय बतानेवाली श्रुति नहीं है, इसलिये; न= उपासनाओका समुच्चय सिद्ध नहीं हो सकता। व्याख्या—उन-उन उपासनाओके आश्रयभूत जो उद्गीथ आदि अङ्ग हैं, उन अङ्गोके समाहारकी भाँति उनके साथ उपासनाओका समाहार बतानेवाली कोई श्रुति नहीं है, इसलिये यह सिद्ध नहीं हो सकता कि उन-उन आश्रयोंके समुच्चयकी भाँति ही उपासनाओंका भी समुच्चय होना चाहिये; क्योकि उपासनाओका उद्देश्य भिन्न है, जिस उद्देश्यसे जिस फलके लिये यज्ञादि कर्म किये जाते हैं, उनके अङ्गोमें की जानेवाली उपासना उनसे भिन्न उद्देश्यसे की जाती है, अतः अङ्गोंके साथ उपासनाके समुच्चयका सम्बन्ध नहीं है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि उपासनाओंका समुच्चय नहीं बन सकता, उनका अनुष्ठान अलग-अलग ही करना चाहिये। सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे इसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— दर्शनाच्च ॥ ३ । ३ । ६६ ॥ दर्शनात्=श्रुतिमे उपासनाओंका समाहार न करना दिखाया गया है, इसलिये; च=भी ( उनका समाहार सिद्ध नहीं हो सकता )। व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि 'पूर्वोक्त प्रकारसे रहस्यको जाननेवाला ब्रह्मा निःसन्देह यज्ञकी, यजमानकी और अन्य ऋत्विजोकी रक्षा करता है।' (छा० उ० ४ । १७ । १०) इस प्रकार श्रुतिमें विद्याकी महिमाका वर्णन करते हुए यह दिखाया गया है कि इन उपासनाओंका कर्मके साथ समुच्चय नहीं होता है; क्योकि यदि उपासनाओंका सर्वत्र समाहार होता तो दूसरे ऋत्विक् भी उस तत्त्वके ज्ञाता होते और स्वयं ही अपनी रक्षा करते, ब्रह्माको उनकी रक्षा करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इससे यही सिद्ध होता है कि उपासनाएँ उनके आश्रयभूत कर्मसम्बन्धी अङ्गोके अधीन नहीं हैं, स्वतन्त्र हैं, अतएव समुच्चय न करके उनका अनुष्ठान अलग ही करना चाहिये। तीसरा पाद सम्पूर्ण।

चौथा पाद तीसरे पादमें परमात्माकी प्राप्तिके उपायभूत भिन्न-भिन्न विद्याओंके विषयमें प्रतीत होनेवाले विरोधको दूर किया गया तथा उन विद्याओंमेंसे किस विद्याके कौन-से गुण दूसरी विद्यामें ग्रहण किये जा सकते हैं, कौन-से नहीं किये जा सकते ? इन विद्याओंका अलग-अलग अनुष्ठान करना उचित है या इनमेंसे कुछका समुच्चय भी किया जा सकता है ? इत्यादि विषयोंपर विचार करके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया गया । अब ब्रह्मज्ञान परमात्माकी प्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है या नही ? उसके अन्तरङ्ग साधन कौन-से हैं और बहिरङ्ग कौन-से हैं ? इन सब बातोंपर विचार करके सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया जाता है । यहाँ पहले परमात्माकी प्राप्तिरूप पुरुषार्थकी सिद्धि केवल ज्ञानसे ही होती है या कर्मादिके समुच्चयसे ? इसपर विचार आरम्भ करनेके लिये वेदव्यासजी अपना निश्चित मत बतलाते हैं-- पुरुषार्थोऽतःशब्दादिति बादरायणः ॥ ३ । ४ । १ ॥ पुरुषार्थः=परब्रह्मकी प्राप्ति; अतः=इससे अर्थात् ब्रह्मज्ञानसे होती है; शब्दात्=क्योंकि शब्द ( श्रुतिके वचन ) से यही सिद्ध होता है; इति=यह; बादरायणः=बादरायण कहते हैं । व्याख्या--वेदव्यासजी महाराज सबसे पहले अपना मत बतलाते हैं कि ‘तरति शोकमात्मवित्’— आत्मज्ञानी शोक-मोहसे तर जाता है ( छा० उ० ७ । १ । ३ ); ‘तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।’—ज्ञानी महात्मा नामरूपसे मुक्त होनेपर परात्पर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ( मु० उ० ३ । २ । ८ ), ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’—‘ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त हो जाता है’ ( तै० उ० २ । १ ), ‘ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ।’— ‘परम देवको जानकर सब प्रकारके पाशों ( बन्धनों ) से मुक्त हो जाता है’ ( श्वेता० उ० ५ । १३ ) । इस प्रकार श्रुतिका कथन होनेसे यही सिद्ध होता है कि परमात्माकी प्राप्तिरूप परमपुरुषार्थकी सिद्धि इस ब्रह्मज्ञानसे ही होती है ।

३०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—उपर्युक्त सिद्धान्तसे जैमिनि ऋषिका मतभेद दिखाते हुए कहते हैं— शेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथान्येष्विति जैमिनिः ॥ ३ । ४ । २ ॥ शेषत्वात् = कर्मका अङ्ग होनेके कारण; पुरुषार्थवादः = ब्रह्मविद्याको पुरुषार्थ- का हेतु बताना अर्थवादमात्र है; यथा = जिस प्रकार; अन्येषु = यज्ञके दूसरे अङ्गोंमे फलश्रुति अर्थवाद मानी जाती है; इति = यह; जैमिनिः = जैमिनि आचार्य कहते हैं । व्याख्या—आचार्य जैमिनि यह मानते हैं कि आत्मा कर्मका कर्ता होनेसे उसके स्वरूपका ज्ञान करानेवाली विद्या भी कर्मका अङ्ग है; इसलिये उसे पुरुषार्थ- का साधन बताना उसकी प्रशंसा करना है । पुरुषार्थका साधन तो वास्तवमे कर्म ही है । जिस प्रकार कर्मके दूसरे अङ्गोंकी फलश्रुति उनकी प्रशंसामात्र समझी जाती है, वैसे ही इसे भी समझना चाहिये । सम्बन्ध—विद्या कर्मका अङ्ग है, इस बातको सिद्ध करनेके लिये कारण बतलाते हैं— आचारदर्शनात् ॥ ३ । ४ । ३ ॥ आचारदर्शनात् = श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि विद्या कर्मोंका अङ्ग है । व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे यह प्रसङ्ग आया है कि 'राजा जनकने एक समय बहुत दक्षिणावाला यज्ञ किया और उसमे कुरु तथा पाञ्चालदेशके बहुत-से ब्राह्मण एकत्र हुए थे।' इत्यादि (बृह० उ० ३ । १ । १) छान्दोग्यमें वर्णन आया है कि राजा अश्वपतिने अपने पास ब्रह्मविद्या सीखनेके लिये आये हुए ऋषियोंसे कहा— 'आपलोग सुने, मेरे राज्यमें न तो कोई चोर है, न कंजूस है, न मद्य पीनेवाला है, न अग्निहोत्र न करनेवाला है और न कोई विद्याहीन है । यहाँ कोई परस्त्रीगामी पुरुष ही नहीं है; फिर कुलटा स्त्री कैसे रह सकती है ?* हे पूज्यगण ! मैं अभी यज्ञ करनेवाला हूँ । एक-एक ऋत्विजको जितना धन दूँगा, उतना ही

  • न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः । नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुतः ॥

सूत्र २–६ ] अध्याय ३ ३०३

सूत्र २–६ ] अध्याय ३ ३०३ आपलोगोको भी दूँगा, आप यहीं ठहरिये ।' ( छा० उ० ५ । ११ । ५ ) महर्षि उद्दालक भी यज्ञकर्म करनेवाले थे, जिन्होंने अपने पुत्र श्वेतकेतुको ब्रह्म- विद्याका उपदेश दिया था । ( छा० उ० छठा अध्याय पूरा ) याज्ञवल्क्य भी जो ब्रह्मवादियोमे सर्वश्रेष्ठ माने गये हैं, गृहस्थ और कर्म करनेवाले थे । इस प्रकार श्रुतिमे वर्णित श्रेष्ठ पुरुषोका आचरण देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्या कर्मका ही अङ्ग है और कर्मोंके सहित ही वह पुरुषार्थका साधन है । सम्बन्ध—इसी बातको श्रुतिप्रमाणसे दृढ करते हैं— तच्छ्रुतेः ॥ ३ । ४ । ४ ॥ तच्छ्रुतेः = तद्विषयक श्रुतिमे भी यही बात सिद्ध होती है । व्याख्या—श्रुतिका कथन है कि 'जो ॐकाररूप अक्षरके तत्त्वको जानता है और जो नहीं जानता, वे दोनो ही कर्म करते हैं, परन्तु जो कर्म विद्या, श्रद्धा और योगसे युक्त होकर किया जाता है, वही प्रबल्तर होता है ।' ( छा० उ० १ । १ । १० ) इस प्रकार श्रुतिमें विद्याको कर्मका अङ्ग बतलाया है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि केवल ज्ञान पुरुषार्थका हेतु नहीं है । सम्बन्ध—पुनः इसी बातको दृढ करनेके लिये प्रमाण देते हैं— समन्वारम्भणात् ॥ ३ । ४ । ५ ॥ समन्वारम्भणात् = विद्या और कर्म दोनो जीवात्माके साथ जाते हैं, यह कथन होनेके कारण ( भी ) यही बात सिद्ध होती है । व्याख्या—जब आत्मा शरीरसे निकलकर जाता है, तब उसके साथ प्राण, अन्तःकरण और इन्द्रियाँ तो जाती ही हैं, विद्या और कर्म भी जाते हैं ( बृह० उ० ४ । ४ । २ ) । इस प्रकार विद्या और कर्म दोनोके सस्कारोको साथ लेकर जीवात्माका एक शरीरसे दूसरे शरीरमे गमन बताया जानेके कारण यह सिद्ध होता है कि विद्या कर्मका ही अङ्ग है । सम्बन्ध—फिर दूसरे प्रमाणसे भी इसी बातको सिद्ध करते हैं— तद्वतो विधानात् ॥ ३ । ४ । ६ ॥ तद्वतः = आत्मज्ञानयुक्त अधिकारीके लिये; विधानात् = कर्मोंका विधान होनेके कारण भी ( यही सिद्ध होता है ) ।

३०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ व्याख्या—श्रुतिने ब्रह्मविद्याकी परम्पराका वर्णन करते हुए कहा है कि 'उस ब्रह्मज्ञानका उपदेश ब्रह्माने प्रजापतिको दिया, प्रजापतिने मनुसे कहा, मनुने प्रजावर्गको सुनाया । ब्रह्मचारी नियमानुसार गुरुकी सेवा आदि कर्तव्य कर्मोंका भलीभाँति अनुष्ठान करते हुए वेदका अध्ययन समाप्त करे, फिर आचार्यकुलसे समावर्तनसंस्कारपूर्वक स्नातक बनकर लौटे और कुटुम्बमे रहता हुआ पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता रहे । पुत्र और शिष्यादिको धार्मिक बनाकर समस्त इन्द्रियोंको अपने अन्तःकरणमें स्थापित करे।' इन सब नियमोंको बताकर उनके फलका इस तरह वर्णन किया है—'इस प्रकार आचरण करनेवाला मनुष्य अन्तमें ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।' (छा० उ० ८ । १५ । १) । इस तरह विद्यापूर्वक कर्म करनेके विधानसे यह बात सिद्ध होती है कि विद्या कर्मका अङ्ग है । सम्बन्ध—इतना ही नहीं; अपि तु— नियमाच्च ॥ ३ । ४ । ७ ॥ नियमात्=श्रुतिमे नियमित किया जानेके कारण; च=भी (कर्म अवश्य कर्तव्य है, अतः विद्या कर्मका अङ्ग है, यह सिद्ध होता है) । व्याख्या—श्रुतिका आदेश है कि 'मनुष्य शास्त्रविहित श्रेष्ठ कर्मोंका अनुष्ठान करते हुए ही इस जगत्मे सौ वर्षोंतक जीवित रहनेकी इच्छा करे । इस प्रकार जीवनयात्राका निर्वाह करनेपर तुझ मनुष्यमे कर्म लिप्त नहीं होंगे । इसके सिवा दूसरे प्रकारका ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे कर्म लिप्त न होवे ।' (ईशा० २) इस प्रकार आजीवन कर्मानुष्ठानका नियम होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि केवल ज्ञान पुरुषार्थका हेतु नहीं है । सम्बन्ध—इस प्रकार जैमिनिके मतका वर्णन करके सूत्रकार अपने सिद्धान्त- को सिद्ध करनेके लिये उत्तर देते हैं— अधिकोपदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् ॥ ३ । ४ । ८ ॥ तु=किन्तु; अधिकोपदेशात्=श्रुतिमें कर्मोंकी अपेक्षा अधिक ब्रह्मविद्याके माहात्म्यका कथन होनेके कारण; बादरायणस्य=व्यासजीका मत; एवं=जैसा प्रथम सूत्रमें कहा था वैसा ही है; तद्दर्शनात्=क्योंकि श्रुतिमें विद्याकी अधिकता दिखलायी गयी है ।

सूत्र ७-८ ] अध्याय ३ ३०५

सूत्र ७-८ ] अध्याय ३ ३०५ व्याख्या-जैमिनिने जो विद्याको कर्मका अङ्ग बताया है, वह ठीक नहीं है। उन्होंने अपने कथनकी सिद्धिके लिये जो युक्तियाँ दी है, वे भी आभासमात्र ही है। अतः बादरायणने पूर्वसूत्रमे जो अपना मत प्रकट किया है, वह अब भी ज्यों-का-त्यों है। जैमिनिकी युक्तियोंसे उसमे कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यद्यपि ब्रह्मज्ञानके साथ-साथ लोकसंग्रहके लिये या प्रारब्धानुसार शरीरस्थितिके निमित्त किये जानेवाले कर्म रहें, तो उनसे कोई हानि नहीं है; तथापि परमात्माकी प्राप्तिरूप पुरुषार्थका कारण तो एकमात्र परमात्माका तत्त्वज्ञान ही है। इसके सिवा, न तो कर्म-ज्ञानका समुच्चय परमपुरुषार्थका साधन है और न केवल कर्म ही; क्योकि श्रुतिमे कहा है- इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ 'इष्ट और पूर्त कर्मोंको ही श्रेष्ठ माननेवाले मूर्खलोग उससे भिन्न वास्तविक श्रेयको नहीं जानते। वे शुभ कर्मोंके फलरूप स्वर्गलोकके उच्चतम स्थानमे वहाँके भोगोका अनुभव करके इस मनुष्यलोकमें या इससे भी अत्यन्त नीचेके लोकमे गिरते हैं।' (मु० उ० १ । २ । १०) परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ 'इस प्रकार कर्मसे प्राप्त होनेवाले लोकोंकी परीक्षा करके अर्थात् उनकी अनित्यताको समझकर द्विजको उनसे सर्वथा विरक्त हो जाना चाहिये तथा यह निश्चय करना चाहिये कि वह अमृत अर्थात् स्वतःसिद्ध परमात्मा कर्मोंके द्वारा नहीं मिल सकता। अतः जिज्ञासु पुरुष उस ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये वेदज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ गुरुके समीप हाथमें समिधा लिये हुए जाय ।' (मु० उ० १ । २ । १२) 'इस तरह अपनी शरणमे आये हुए शिष्यको ब्रह्मज्ञानी महात्मा ब्रह्मविद्याका उपदेश करे ।' (मु० उ० १ । २ । १३) । यह सब कहकर श्रुतिने वहाँ ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन किया है और उसे ज्ञानके द्वारा प्राप्त होने योग्य बतलाकर (मु० उ० २ । २ । ७) कहा है कि 'कार्य-कारणस्वरूप उस ब्रह्मको जान लेनेपर इस मनुष्यके हृदयकी चिज्जड-ग्रन्थिका भेदन हो जाता है, सब संशय नष्ट हो जाते हैं और समस्त कर्मोंका क्षय हो जाता है।' (मु० उ० २ । २ । ८) । इस प्रकार श्रुतियोमे जगह-जगह कर्मोंकी अपेक्षा ब्रह्मज्ञानका महत्त्व बहुत अधिक बताया गया है। इसलिये ब्रह्मविद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है। वे० द० २०-

३०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध-श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार देखनेसे जो विद्याको कर्मका अङ्ग बताया गया था, उसका उत्तर देते हैं— तुल्यं तु दर्शनम् ॥ ३ । ४ । ९ ॥ दर्शनम् = आचारका दर्शन; तु = तो; तुल्यम् = समान है (अतः उससे विद्या कर्मका अङ्ग है, यह नहीं सिद्ध होता)। व्याख्या-आचारसे भी यह सिद्ध नहीं होता कि विद्या कर्मका अङ्ग है; क्योंकि श्रुतिमें दोनों प्रकारका आचार देखा जाता है। एक ओर ज्ञाननिष्ठ जनकादि गृहस्थ महापुरुष लोकसंग्रहके लिये यज्ञ-यागादि कर्म करते देखे जाते हैं तो दूसरी ओर केवल भिक्षासे निर्वाह करनेवाले विरक्त संन्यासी महात्मा लोकसंग्रहके लिये ही समस्त कर्मोंका त्याग करके ज्ञाननिष्ठ हो केवल ब्रह्मचिन्तनमे रत रहते हैं। इस प्रकार आचार तो दोनों ही तरहके उपलब्ध होते हैं। इससे कर्मकी प्रधानता नहीं सिद्ध होती है। जिनको वास्तवमे ज्ञान प्राप्त हो गया है, उनको न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन है और न उसके त्यागसे ही (गीता ३ । १७)। अतएव प्रारब्ध तथा ईश्वरके विधानानुसार उनका आचरण दोनों प्रकारका ही होता है। इसके सिवा श्रुतिमे यह भी कहा है कि 'इसलिये पूर्वके विद्वानोंने अग्निहोत्रादि कर्मोंका अनुष्ठान नहीं किया' (कौ० उ० २ । ५) 'इस आत्माको जानकर ही ब्राह्मणलोग पुत्रादिकी इच्छाका त्याग करके विरक्त हो भिक्षासे निर्वाह करते हुए विचरते हैं' (बृह०उ० ३।५।१)। याज्ञवल्क्यने भी दूसरोंमे वैराग्यकी भावना उत्पन्न करनेके लिये अन्तमें संन्यास ग्रहण किया (बृह०उ० ४ । ५ । १५)। इस प्रकार श्रुतियोमे कर्म-त्यागके आचारका भी जगह-जगह वर्णन पाया जाता है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि परमपुरुषार्थका हेतु केवल ब्रह्मज्ञान ही है और वह कर्मका अङ्ग नहीं है। सम्बन्ध-पूर्वपक्षकी ओरसे जो श्रुतिका प्रमाण दिया गया था, उसका उत्तर देते हैं— असार्वत्रिकी ॥ ३ । ४ । १० ॥ असार्वत्रिकी=(वह श्रुति) एकदेशीय है—सर्वत्र सम्बन्ध रखनेवाली नहीं है।

सूत्र ९—१२ ] अध्याय ३ ३०७

सूत्र ९—१२ ] अध्याय ३ ३०७ व्याख्या—पूर्वपक्षीने जो 'यदेव विद्यया करोति' (छा० उ० १ । १ । १०) इत्यादि श्रुतिका प्रमाण दिया है, वह एकदेशीय है। उस प्रकरणमे आयी हुई उद्गीथ-विद्यासे ही उसका सम्बन्ध है, अतः उसको ही वह कर्मका अङ्ग बताती हैं; अन्य सब प्रकरणोंमें वर्णित समस्त विद्याओसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। अतः उस एकदेशीय श्रुतिमे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि विद्यामात्र कर्मका अङ्ग है। सम्बन्ध—पांचवें सूत्रमे पूर्वपक्षीने जिस श्रुतिका प्रमाण दिया है, उसके विषयमे उत्तर देते हैं— विभागः शतवत् ॥ ३ । ४ । ११ ॥ शतवत्=एक सौ मुद्राके विभागकी भाँति; विभागः=उस श्रुतिमें कहे हुए विद्या-कर्मका विभाग अधिकारिभेदसे समझना चाहिये। व्याख्या—जिस प्रकार किसीको आज्ञा दी जाय कि 'एक सौ मुद्रा उपस्थित लोगोंको दे दो।' तो सुननेवाला पुरुष पानेवाले लोगोंके अधिकारके अनुसार विभाग करके उन मुद्राओंका वितरण करेगा। उसी प्रकार इस श्रुतिके कथनका भाव भी अधिकारीके अनुसार विभागपूर्वक समझना चाहिये। जो ब्रह्मज्ञानी है, उसके कर्म तो यहां नष्ट हो जाते हैं। अत वह केवल विद्याके बलसे ही ब्रह्मलोकको जाता है। उसके साथ कर्म नहीं जाते (मु० उ० १ । २ । ११ ) और जो सांसारिक मनुष्य हैं या साधनभ्रष्ट है, उनके साथ विद्या और कर्म दोनोंके ही मस्कार जाते हैं। वहाँ विद्याका अर्थ परमात्माका अपरोक्षज्ञान नहीं; किन्तु केवल श्रवण, मनन आदिका अभ्यास समझना चाहिये। अत इससे भी विद्या कर्मका अङ्ग हैं, यह सिद्ध नहीं होता। सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसं जो छठे सूत्रमें प्रजापतिके वचनोका प्रमाण दिया गया था, उसका उत्तर देते हैं— अध्ययनमात्रवतः ॥ ३ । ४ । १२ ॥ अध्ययनमात्रवतः = जिसने विद्याका केवल अध्ययनमात्र किया है, अनुष्ठान नहीं, ऐसे विद्वान्‌के विषयमें यह कथन है। व्याख्या—प्रजापतिके उपदेशमे जो विद्यासम्पन्न पुरुषके लिये कुटुम्बमे जाने और कर्म करनेकी बात कही गयी हैं, वह कथन गुरुकुलसे अध्ययनमात्र करके

३०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ निकलनेवाले ब्रह्मचारीके लिये है। अतः जिसने ब्रह्मविद्याका केवल अध्ययन किया है, मनन और निदिध्यासनपूर्वक उसका अनुष्ठान नहीं किया, ऐसे अधिकारीके प्रति अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्मोंका विधान है, जो कि सर्वथा उचित है; किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि ब्रह्मविद्या कर्मोंका अङ्ग है। सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसे जो अन्तिम श्रुति-प्रमाण दिया गया है, उसका उत्तर चार सूत्रोंमें अनेक प्रकारसे देते हैं— नाविशेषात् ॥ ३ । ४ । १३ ॥ अविशेषात् = वह श्रुति विशेषरूपसे विद्वान्के लिये नहीं कही गयी है, इसलिये; न = ज्ञानके साथ उसका समुच्चय नहीं है। व्याख्या—वहाँ जो त्यागपूर्वक आजीवन कर्म करनेके लिये कहा है, वह कथन सभी साधकोंके लिये समानभावसे है; ज्ञानीके लिये विशेषरूपसे नहीं है। अतः उससे न तो यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्या कर्मका अङ्ग है और न यही सिद्ध होता है कि केवल ब्रह्मविद्यासे परम पुरुषार्थ प्राप्त नहीं होता। सम्बन्ध—यदि उस श्रुतिको समानभावसे सबके लिये मान लिया जाय तो फिर उसके द्वारा ज्ञानीके लिये भी तो कर्मका विधान हो ही जाता है, इसपर कहते हैं— स्तुतयेऽनुमतिर्वा ॥ ३ । ४ । १४ ॥ वा = अथवा यों समझो कि; स्तुतये = विद्याकी स्तुतिके लिये; अनुमतिः = सम्मतिमात्र है। व्याख्या = यदि इस श्रुतिको समानभावसे ज्ञानीके लिये भी माना जाय तो उसका यह भाव समझना चाहिये कि ज्ञानी लोकसंग्रहार्थ आजीवन कर्म करता रहे तो भी ब्रह्मविद्याके प्रभावसे उसमे कर्म लिप्त नहीं होते। वह उनसे सर्वथा सम्बन्धरहित रहता है। इस प्रकार ब्रह्मविद्याकी प्रशंसा करनेके लिये यह श्रुति कर्म करनेकी सम्मतिमात्र देती है, उसे कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं करती; अतः यह श्रुति विद्याको कर्मोंका अङ्ग बतलानेके लिये नहीं है। सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— कामकारेण चैके ॥ ३ । ४ । १५ ॥

सूत्र १३—१७] अध्याय ३ ३०९

सूत्र १३—१७] अध्याय ३ ३०९ च = इसके सिवा; एके = कई एक विद्वान्; कामकारेण = स्वेच्छापूर्वक (कर्मोंका त्याग कर देते हैं, इसलिये भी विद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है)। व्याख्या-श्रुति कहती है कि 'किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः ।'—'हम प्रजासे क्या प्रयोजन सिद्ध करेंगे, जिनका यह परब्रह्म परमेश्वर ही लोक अर्थात् निवासस्थान है।' (बृह० उ० ४ । ४ । २२) इत्यादि श्रुतियो- में कितने ही विद्वानोंका स्वेच्छापूर्वक गृहस्थ आश्रम और कर्मोंका त्याग करना बतलाया गया है। यदि 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि श्रुति सभी विद्वानोंके लिये कर्मका विधान करनेवाली मान ली जाय तो इस श्रुतिसे विरोध आयेगा। अतः यही समझना चाहिये कि विद्वानोमे कोई अपनी पूर्वप्रकृतिके अनुसार आजीवन कर्म करता रहता है और कोई छोड़ देता है, इसमे उनकी स्वतन्त्रता है। इसलिये भी यह सिद्ध नहीं होता कि विद्या कर्मका अङ्ग है। सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं— उपमर्दं च ॥ ३ । ४ । १६ ॥ च=इसके सिवा; उपमर्दम्=ब्रह्मविद्यासे कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाना कहा है (इससे भी पूर्वोक्त बात सिद्ध होती है)। व्याख्या-'उस परमात्माका ज्ञान हो जानेपर इसके समस्त कर्म नष्ट हो जाते है' (मु० उ० २ । २ । ८) इत्यादि श्रुतियोंमें तथा स्मृतिमें भी ज्ञानका फल समस्त कर्मोंका भलीभाँति नाश बतलाया है (गीता ४ । ३७)*। इसलिये ब्रह्मविद्या- को कर्मका अङ्ग नहीं माना जा सकता; तथा केवल ब्रह्मविद्यासे परमात्माकी प्राप्तिरूप परमपुरुषार्थकी सिद्धि नहीं होती, यह कहना भी नहीं बन सकता। सम्बन्ध-पुनः दूसरे प्रमाणसे सिद्धान्तकी पुष्टि करके यहाँतक जैमिनिद्वारा उपस्थित की हुई सब शङ्काओंका उत्तर देकर 'विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है, स्वतन्त्र साधन है।' इस बातकी पुनः पुष्टि करते हैं— ऊर्ध्वरेतस्सु च शब्दे हि ॥ ३ । ४ । १७ ॥

  • यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा ॥ 'हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित आग लकड़ियोंको भस्म कर डालती है, उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मोंको भस्म कर देती है।'

३१० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ ऊर्ध्वरेतस्सु = जिनमें वीर्यको सुरक्षित रखनेका विधान है, ऐसे तीन आश्रमोंमें; च = भी ( ब्रह्मविद्याका अधिकार है ); हि = क्योंकि; शब्दे = वेदमें ऐसा कहा है ( इसलिये ब्रह्मविद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है )। व्याख्या—जैसे गृहस्थ-आश्रममें ब्रह्मविद्याके अनुष्ठानका अधिकार है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास इन तीनों आश्रमोंमें भी उसके अनुष्ठानका अधिकार है; क्योंकि वेदमें ऐसा ही वर्णन है। मुण्डकोपनिषद् ( १ । २ । ११ ) मे कहा है कि— तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः । सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥ 'जो वनमें रहनेवाले ( वानप्रस्थ ), शान्त स्वभाववाले विद्वान् गृहस्थ तथा भिक्षासे निर्वाह करनेवाले ब्रह्मचारी और संन्यासी तप एवं श्रद्धाका सेवन करते हैं, वे रजोगुणसे रहित साधक सूर्यके मार्गसे वहाँ चले जाते हैं, जहाँ जन्म-मृत्युसे रहित नित्य अविनाशी परम पुरुष निवास करता है।' इसके सिवा, अन्य श्रुतियोंमें भी इसी प्रकारका वर्णन मिलता है। (प्र० उ० १ । १०) इससे यह सिद्ध होता है कि विद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है; क्योंकि संन्यासीके लिये वैदिक यज्ञादि कर्मोंका विधान नहीं है और उनका ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। यदि ब्रह्मविद्याको कर्मका अङ्ग मान लिया जाय तो संन्यासीके द्वारा उसका अनुष्ठान कैसे सम्भव होगा ? सम्बन्ध—अब जैमिनिकी ओरसे पुनः शङ्का उपस्थित की जाती है— परामर्शं जैमिनिरचोदना चापवदति हि ॥ ३ । ४ । १८ ॥ जैमिनिः = आचार्य जैमिनि; परामर्शम् = उक्त श्रुतिमें संन्यास-आश्रमका अनुवादमात्र मानते हैं, विधि नहीं; हि = क्योंकि; अचोदना = उसमें विधिसूचक क्रियापदका प्रयोग नहीं है; च = इसके सिवा; अपवदति = श्रुति संन्यासका अपवाद ( निषेध ) भी करती है। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कथन है कि संन्यास-आश्रम अनुष्ठेय ( पालन करनेयोग्य ) नहीं है। गृहस्थ-आश्रममें रहकर कर्मानुष्ठान करते हुए ही मनुष्यका परमपुरुषार्थ सिद्ध हो सकता है। पूर्वोक्त श्रुतिमें 'भैक्ष्यचर्यां चरन्तः' इन पदोंके द्वारा संन्यासका अनुवादमात्र ही हुआ है, विधि नहीं है; क्योंकि वहाँ विधिसूचक क्रियापदका प्रयोग नहीं है। इसके सिवा, श्रुतिने स्पष्ट शब्दोंमें

सूत्र १८-१९ ] अध्याय ३ ३११

सूत्र १८-१९ ] अध्याय ३ ३११ संन्यासका निषेध भी किया है। जैसे—'जो अग्निहोत्रका त्याग करता है, वह देवोंके वीरोंको मारनेवाला है' (तै० सं० १ । ५ । २ । १)। 'आचार्यको उनकी इच्छाके अनुरूप धन दक्षिणामें देकर संतान-परम्पराको बनाये रक्खो, उसका उच्छेद न करो।' (तै० उ० १ । ११) । इन वचनोंद्वारा संन्यास- आश्रमका प्रतिवाद होनेसे यही सिद्ध होता है कि संन्यास-आश्रम आचरणमें लाने- योग्य नहीं है। अतएव संन्यासीका ब्रह्मविद्यामें अधिकार बताकर यह कहना कि 'विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है।' ठीक नहीं है। सम्बन्ध—इसके उत्तरमें सूत्रकार अपना मत व्यक्त करते हैं— अनुष्ठेयं बादरायणः साम्यश्रुतेः ॥ ३ । ४ । १९ ॥ बादरायणः = व्यासदेव कहते हैं कि; अनुष्ठेयम् = गृहस्थकी ही भाँति अन्य आश्रमोंके धर्मोंका अनुष्ठान भी कर्तव्य है; साम्यश्रुतेः = क्योंकि श्रुतिमें समस्त आश्रमोंकी और उनके धर्मोंकी कर्तव्यताका समानरूपसे प्रतिपादन किया गया है। व्याख्या—जैमिनिके उक्त कथनका उत्तर देते हुए वेदव्यासजी कहते हैं— उक्त श्रुतिमें चारों आश्रमोंका अनुवाद है; परन्तु अनुवाद भी उसीका होता है, जो अन्यत्र विहित हो। दूसरी-दूसरी श्रुतियोंमें जैसे गृहस्थ-आश्रमका विधान प्राप्त होता है, उसी प्रकार अन्य आश्रमोंका विधान भी उपलब्ध होता है, इसमें कोई अन्तर नहीं है। अतः जिस प्रकार गृहस्थ-आश्रमके धर्मोंका अनुष्ठान उचित है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यासके धर्मोंका भी अनुष्ठान करना चाहिये। पूर्वपक्षीने जिन श्रुतियोंके द्वारा संन्यासका निषेध सूचित किया है, उनका तात्पर्य दूसरा ही है। वहाँ अग्निहोत्रका त्याग न करनेपर जोर दिया गया है। यह बात उन्हीं लोगोंपर लागू होती है, जो उसके अधिकारी हैं। गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रममें रहते हुए कभी अग्निहोत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। यही बताना श्रुतिको अभीष्ट है। इसी प्रकार संतानपरम्पराका उच्छेद न करनेका आदेश भी उन्हींके लिये है, जो पूर्णतः विरक्त नहीं हुए है। विरक्तके लिये तो तत्काल संन्यास लेनेका विधान श्रुतिमें स्पष्ट देखा जाता है। यथा 'यदहरेव विरजेत्तद- हरेव प्रव्रजेत्।' अर्थात् 'जिस दिन वैराग्य हो, उसी दिन संन्यास ले ले।' अतः संन्यासीका भी ब्रह्मविद्यामे अधिकार होनेके कारण विद्याको कर्मका अङ्ग न मानना ही ठीक है।

३१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— विधिर्वा धारणवत् ॥ ३ । ४ । २० ॥ वा=अथवा; विधिः=उक्त मन्त्रमें अन्य आश्रमोंकी विधि ही माननी चाहिये, अनुवाद नहीं; धारणवत्=जैसे समिधा-धारण-सम्बन्धी वाक्यमे 'ऊपर धारण' की क्रियाको अनुवाद न मानकर विधि ही माना गया है । व्याख्या—जैसे 'अधस्तात् समिधं धारयन्ननुद्रवेदुपरि हि देवेभ्यो धारयति ।' अर्थात् 'स्रुग्दण्डके नीचे समिधा-धारण करके अनुद्रवण करे, किन्तु देवताओंके लिये ऊपर धारण करे।' इस वाक्यमे स्रुग्दण्डके अधोभागमे समिधा-धारणकी विधिके साथ एकवाक्यताकी प्रतीति होनेपर भी 'ऊपर धारण' की क्रियाको अपूर्व होनेके कारण विधि मान लिया गया है । उसी प्रकार पूर्वोक्त श्रुतिमे जो चारो आश्रमोंका सांकेतिक वर्णन है, उसे अनुवाद न मानकर विधि ही स्वीकार करना चाहिये । दूसरी श्रुतिमे आश्रमोंका विधान करनेवाले वचन स्पष्ट मिलते है । यथा—'ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य गृही भवेद् गृही भूत्वा वनी भवेद् वनी भूत्वा प्रव्रजेत् । यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा ।....यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत् ।' (जाबा० उ० ४) अर्थात् 'ब्रह्मचर्यको पूर्ण करके गृहस्थ होना चाहिये । गृहस्थसे वानप्रस्थ होकर उसके बाद संन्यासी होना उचित है । अथवा तीव्र इच्छा हो तो दूसरे प्रकारसे—ब्रह्मचर्यसे, गृहस्थसे या वानप्रस्थसे संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिये । जिस दिन पूर्ण वैराग्य हो जाय, उसी दिन संन्यास ले लेना चाहिये ।' इसी प्रकार अन्यान्य श्रुतियोंमे भी आश्रमोंके लिये विधि देखी जाती है । अतः जहाँ केवल सांकेतिकरूपसे आश्रमोंका वर्णन हो, वहाँ संकेतसे ही उनकी विधि भी मान लेनी चाहिये । यहाँ यह बात भी ध्यानमें रखनी चाहिये कि कर्मत्यागका निषेध करनेवाली जो श्रुति है, वह कर्मासक्त मनुष्योंके लिये ही है; विरक्तके लिये नहीं है । इस विवेचनसे यह सिद्ध हो गया कि कर्मों- के बिना केवल ज्ञानसे ही ब्रह्मप्राप्तिरूप परम पुरुषार्थकी सिद्धि होती है । सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें संन्यास-आश्रमकी सिद्धि की गयी । अब यज्ञकर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिमें की जानेवाली जो उपासना है, उसकी तथा उसके लिये बताये हुए गुणोंकी विधेयता सिद्ध करके विद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है यह सिद्ध करनेके उद्देश्यसे अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—

सूत्र २०–२२ ] अध्याय ३ ३१३

सूत्र २०–२२ ] अध्याय ३ ३१३ स्तुतिमात्रमुपादानादिति चेन्नापूर्वत्वात् ॥ ३ । ४ । २१ ॥ चेत्=यदि कहो; उपादानात्=उद्गीथ आदि उपासनाओमे जो उनकी महिमाके सूचक वचन है, उनमे कर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिको लेकर वैसा वर्णन किया गया है, इसलिये; स्तुतिमात्रम्=वह सब, केवल उनकी स्तुतिमात्र है; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; अपूर्वत्वात्=क्योकि वे उपासनाएँ और उनके रसतमत्व आदि गुण अपूर्व है । व्याख्या—यदि कहो कि 'यह जो उद्गीथ है, वह रसोका भी उत्तम रस है, परमात्माका आश्रयस्थान और पृथिवी आदि रसोमे आठवाँ सर्वश्रेष्ठ रस है ।' ( छा० उ० १ । १ । ३ ) इस प्रकारसे जो उद्गीथके विषयमे वर्णन है, वह केवल स्तुतिमात्र है, क्योकि यज्ञके अङ्गभूत उद्गीथको लेकर ऐसा कहा गया है । इसी प्रकार सभी कर्माङ्गभूत उपासनाओमे जिन-जिन विशेष गुणोका वर्णन है, वह सब उस-उस अङ्गकी स्तुतिमात्र है, इसलिये विद्या कर्मका अङ्ग है; तो यह कहना उचित नहीं है, क्योंकि वे उपासनाएँ और उनके सम्बन्धसे बताये हुए गुण अपूर्व है । जो अन्य किसी प्रमाणसे प्राप्त न हो, उसे अपूर्व कहते हैं । इन उपासनाओ और उनके गुणोंका न तो अन्यत्र कहीं वर्णन है और न अनुमान आदिसे ही उनका ज्ञान होता है; अतः उन्हे अपूर्व माना गया है, इसलिये यह कथन स्तुतिके लिये नहीं, किन्तु उद्गीथ आदिको प्रतीक बनाकर उसमे उपास्यदेवकी भावना करनेके लिये स्पष्ट प्रेरणा देनेवाला विधिवाक्य है । अतः विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है । सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको पुष्ट करते हैं— भावशब्दाच्च ॥ ३ । ४ । २२ ॥ च=इसके सिवा; ( उस प्रकरणमे ) भावशब्दात्=इस प्रकार उपासना करनी चाहिये इत्यादि विधिवाचक शब्दोका स्पष्ट प्रयोग होनेके कारण भी ( यही बात सिद्ध होती है ) । व्याख्या—केवल अपूर्व होनेसे ही उसे विधि-वाक्य माना जाता हो, ऐसी बात नहीं है । उस प्रकरणमे 'उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये' ( छा० उ० १ । १ । १ ) 'सामकी उपासना करनी चाहिये' ( छा० उ० २ । २ । १ ) इत्यादि रूपसे अत्यन्त स्पष्ट विधिसूचक शब्दोंका प्रयोग भी है । जैसे उनकी

३१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ अपूर्व विधि है, उसी प्रकार उन-उन उपासनाओंका अपूर्व फल भी बतलाया गया है ( छा० उ० १ । १ । ७; १ । ७ । ९ और २ । २ । ३ ) । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि वह कथन कर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिकी स्तुतिके लिये नहीं है, उनको प्रतीक बनाकर उपासनाका विधान करनेके लिये है और इसीलिये विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है । सम्बन्ध—भिन्न-भिन्न प्रकरणोंमें जो आख्यायिकाओंका ( इतिहासोंका ) वर्णन है, उसका क्या अभिप्राय है? इसका निर्णय करके विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है यह सिद्ध करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— पारिप्लवार्था इति चेन्न विशेषितत्वात् ॥ ३ । ४ । २३ ॥ चेत् = यदि कहो; पारिप्लवार्थाः = उपनिषदोंमे वर्णित आख्यायिकाएँ पारिप्लव नामक कर्मके लिये है; इति न = तो यह ठीक नहीं है; विशेषितत्वात् = क्योंकि पारिप्लव-कर्ममे कुछ ही आख्यायिकाओंको विशेषरूपसे ग्रहण किया गया है । व्याख्या—‘उपनिषदोंमे जो यम और नचिकेता, देवता और यक्ष, मैत्रेयी और याज्ञवल्क्य, प्रतर्दन और इन्द्र, जानश्रुति और रैक तथा याज्ञवल्क्य और जनक आदिकी कथाएँ आती हैं; वे यज्ञ-सम्बन्धी पारिप्लवनामक कर्मकी अङ्गभूत है; क्योकि ‘पारिप्लवमाचक्षीत’ (‘पारिप्लव’ नामक वैदिक उपाख्यान कहे) इस विधि-वाक्यद्वारा श्रुतिमे उसका स्पष्ट विधान किया है । अश्वमेधयागमे जो रात्रिके समय कुटुम्बसहित बैठे हुए राजाको अध्वर्यु वैदिक उपाख्यान सुनाता है, वही ‘पारिप्लव’ कहलाता है । इस पारिप्लव कर्मके लिये ही उपर्युक्त कथाएँ हैं ।’ ऐसा यदि कोई कहे तो यह ठीक नहीं है; क्योकि पारिप्लवका प्रकरण आरम्भ करके श्रुतिने ‘मनुर्वैवस्वतो राजा’ इत्यादि वाक्योंद्वारा कुछ विशेष उपाख्यानोंको ही वहाँ सुनानेयोग्य कहा है । उनमे ऊपर बतायी हुई उपनिषदोंकी कथाएँ नहीं आती है । अतः वे पारिप्लव कर्मकी अङ्गभूत नहीं है । वे सब आख्यान ब्रह्मविद्याको भलीभाँति समझानेके लिये कहे हुए ब्रह्मविद्याके ही अङ्ग हैं । इसीलिये इन सब आख्यानोंका विशेष माहात्म्य बतलाया गया है ( क० उ० १ । ३ । १६ ) । सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको दृढ़ करते हैं—

सूत्र २३—२५ ] अध्याय ३ ३१५

सूत्र २३—२५ ] अध्याय ३ ३१५ तथा चैकवाक्यतोपबन्धात् ॥ ३ । ४ । २४ ॥ तथा च=इस प्रकार उन आख्यायिकाओको पारिप्लवार्थक न मानकर विद्याका ही अङ्ग मानना चाहिये; एकवाक्यतोपबन्धात्=क्योंकि इन उपाख्यानो- की वहाँ कही हुई विद्याओके साथ एकवाक्यता देखी जाती है । व्याख्या-इस प्रकार उन कथाओको पारिप्लवकर्मका अङ्ग न मानकर वहाँ कही हुई विद्याओका ही अङ्ग मानना उचित है; क्योंकि सन्निकट होनेसे इन विद्याओंके साथ ही इनका सम्बन्ध हो सकता है । विद्यामे रुचि उत्पन्न करने तथा परब्रह्मके स्वरूपका तत्त्व सरलतासे समझानेके लिये ही इन कथाओका उपयोग किया गया है । इस प्रकार इनका उन प्रकरणोमे वर्णित विद्याओके साथ एक- वाक्यतारूप सम्बन्ध है, इसलिये ये सब आख्यान ब्रह्मविद्याके ही अङ्ग है, कर्मोंके नहीं; ऐसा मानना ही ठीक है । सम्बन्ध-यहाँतक यह बात सिद्ध की गयी कि ब्रह्मविद्या यज्ञादि कर्मोंका अङ्ग नहीं है तथा वह स्वयं बिना किसीकी सहायताके परमपुरुषार्थको सिद्ध करनेमें समर्थ है। अब पुनः इसीका समर्थन करते हुए इस प्रकरणके अन्तमे कहते हैं— अतएव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ॥ ३ । ४ । २५ ॥ च=तथा; अतएव=इसीलिये; अग्नीन्धनाद्यनपेक्षा=इस ब्रह्मविद्यारूप यज्ञमें अग्नि, समिधा, घृत आदि पदार्थोंकी आवश्यकता नहीं है । व्याख्या-यह ब्रह्मविद्यारूप यज्ञ अपना ध्येय सिद्ध करनेमे सर्वथा समर्थ है। यह पूर्ण होते ही स्वयं परमात्माका साक्षात्कार करा देता है । इसीलिये इस यज्ञमे अग्नि, समिधा, घृत आदि भिन्न-भिन्न पदार्थोंका विधान न करके केवल- मात्र एक परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका ही प्रतिपादन किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीतामें भी भगवान् श्रीकृष्णने इस बातका समर्थन इस प्रकार किया है— ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ (४।२४) 'उस ब्रह्मचिन्तनरूप यज्ञमे भिन्न-भिन्न उपकरण और सामग्री आवश्यक नहीं होती, किन्तु उसमे तो स्रुवा भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप अग्निमे ब्रह्मरूप होताद्वारा ब्रह्मरूप हवनक्रिया की जाती है, उस ब्रह्मचिन्तनरूप कर्ममे

प्रकरण आरम्भ किया जाता है-

३१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ समाहित हुए साधकद्वारा जो प्राप्त किया जानेवाला फल है, वह भी ब्रह्म ही है।' इस प्रकार यह ब्रह्मविद्या उस परमपुरुषार्थकी सिद्धिमे सर्वथा स्वतन्त्र होनेके कारण कर्मकी अङ्गभूत नहीं हो सकती। सम्बन्ध-यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि क्या ब्रह्मविद्याका किसी भी यज्ञ-यागादि अथवा शम-दमादि कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नही है, क्या इसमें किसी भी कर्मकी आवश्यकता नही है ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है- सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ॥ ३ । ४ । २६ ॥ च=इसके सिवा; सर्वापेक्षा=विद्याकी उत्पत्तिके लिये समस्त वर्णाश्रमोचित कर्मोंकी आवश्यकता है; यज्ञादिश्रुतेः = क्योकि यज्ञादि कर्मोंको ब्रह्मविद्यामे हेतु बतानेवाली श्रुति है; अश्ववत् = जैसे घोड़ा योग्यतानुसार सवारीके काममे ही लिया जाता है, प्रासादपर चढ़नेके कार्यमे नहीं; उसी प्रकार कर्म विद्याकी उत्पत्तिके लिये अपेक्षित है, मोक्षके लिये नहीं। व्याख्या-'यह सर्वेश्वर है, यह समस्त प्राणियोका स्वामी है' इत्यादि वचनोसे परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करके श्रुतिमे कहा है कि 'इस परमेश्वरको ब्राह्मणलोग निष्कामभावसे किये हुए स्वाध्याय, यज्ञ, दान और तपके द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं। इसीको जानकर मनुष्य मननशील होता है, इस संन्यासियोके लोकको पानेकी इच्छासे मनुष्यगण संन्यास ग्रहण करते है।' इत्यादि (बृह० उ० ४ । ४।२२)। तथा दूसरी श्रुतिमे भी कहा है कि 'जिस परमपदका सब वेद बार-बार प्रतिपादन करते है, समस्त तप जिसका लक्ष्य कराते है अर्थात् जिसकी प्राप्तिके साधन है तथा जिसको चाहनेवाले लोग ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, उस पदको मैं तुझे संक्षेपमे कहता हूँ' (क० उ० १ । २ । १५) इत्यादि । श्रुतिके इन वचनोसे यह सिद्ध होता है कि परमात्माके तत्त्वको जाननेके लिये सभी वर्णाश्रमोचित कर्मोंकी आवश्यकता है। इसीलिये भगवान्ने भी गीता ( १८ । ५-६) में कहा है- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानिति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥

सूत्र २६-२७ ] अध्याय ३ ३१७

सूत्र २६-२७ ] अध्याय ३ ३१७ 'यज्ञ, दान और तप ये कर्म त्याज्य नहीं है। इनका अनुष्ठान तो करना ही चाहिये; क्योकि यज्ञ, दान और तप—ये मनीषी पुरुषोको पवित्र करनेवाले है। अर्जुन ! इनका तथा अन्य सब कर्मोंका भी अनुष्ठान फल और आसक्तिको त्यागकर ही करना चाहिये। यही मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है।' जिसका जैसा अधिकार है, उसीके अनुसार शास्त्रोमे वर्ण और आश्रम- सम्बन्धी कर्म बताये गये है। अतः यह समझना चाहिये कि सभी कर्म सब साधकोके लिये उपादेय नहीं होने, किन्तु श्रुतिमे बतलाये हुए ब्रह्मप्राप्तिके साधनोमेसे जिस साधनको लेकर जो साधक अग्रसर हो रहा है, उसे अपने वर्ण, आश्रम और योग्यतानुसार अन्य शास्त्रविहित कर्मोंका अनुष्ठान भी निष्कामभावसे करते रहना चाहिये। इसी उद्देश्यसे श्रुतिमे विकल्प दिखलाया गया है कि कोई तो गृहस्थमे रहकर यज्ञ, दान और तपके द्वारा उसे प्राप्त करना चाहता है, कोई संन्यास-आश्रममे रहकर उसे जानना चाहता है, कोई ब्रह्मचर्यके पालनद्वारा उसे पाना चाहता है और कोई ( वानप्रस्थमे रहकर ) केवल तपस्यासे ही उसे पानेकी इच्छा रखता है, इत्यादि । इस प्रकार ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये कर्म अत्यन्त आवश्यक हैं; परन्तु परमात्माकी प्राप्तिमे उनकी अपेक्षा नहीं है, ब्रह्मविद्यासे ही उस फलकी सिद्धि होती है। इसके लिये सूत्रकारने अश्वका दृष्टान्त दिया है। जैसे योग्यतानुसार घोडा सवारीके काममे लिया जाता है, प्रासादपर चढनेके कार्यमें नहीं, उसी प्रकार कर्म ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिमे सहायक है, ब्रह्मके साक्षात्कारमें नहीं। सम्बन्ध—परमात्माकी प्राप्तिके लिये क्या ऐसे विशेष साधन भी हैं, जो सभी वर्ण, आश्रम और योग्यतावाले साधकोंके लिये समानभावसे आवश्यक हों ? इस जिज्ञासापर कहते हैं -- शमदमाद्युपेतः स्यात्तथापि तु तद्विधेस्तदङ्गतया तेषामवश्यानुष्ठेयत्वात् ॥ ३ । ४ । २७ ॥ तथापि = अन्य कर्म आवश्यक न होनेपर भी ( साधकको ); शमदमा- द्युपेतः = शम, दम, तितिक्षा आदि गुणोसे सम्पन्न; स्यात् = होना चाहिये; तु = क्योंकि; तदङ्गतया = उस ब्रह्मविद्याके अङ्गरूपसे; तद्विधेः = उन शम-दमादिका विधान होनेके कारण; तेषाम् = उनका; अवश्यानुष्ठेयत्वात् = अनुष्ठान अवश्य कर्तव्य है। व्याख्या—श्रुतिमें पहले ब्रह्मवेत्ताके महत्त्वका वर्णन करके कहा गया है कि 'यह ब्रह्मवेत्ताकी महिमा नित्य है। यह न कर्मोंसे बढती है और न घटती है।

३१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ इस महिमाको जानना चाहिये । ब्रह्मवेत्ताकी महिमाको जाननेवाला पापकर्मोंसे लिप्त नहीं होता, इसलिये उस महिमाको जाननेवाला साधक शान्त ( अन्तः- करणका संयमी ), दान्त ( इन्द्रियोंका संयमी ), उपरत, तितिक्षु और ध्यानमे स्थित होकर आत्मामें ही आत्माको देखता है ।' ( बृह० उ० ४ । ४ । २३ ) इस प्रकार श्रुतिमे परमात्माको जाननेकी इच्छावाले साधकके लिये शम-दमादि साधनोंका ब्रह्मविद्याके अङ्गरूपसे विधान है, इस कारण उनका अनुष्ठान करना साधकके लिये परम आवश्यक हो जाता है । अतएव जिस साधकके लिये वर्ण, आश्रमके यज्ञादि कर्म आवश्यक न हों, उसको भी इन शम, दम, तितिक्षा, ध्यानाभ्यास आदि साधनोसे सम्पन्न अवश्य होना चाहिये । सूत्रमे आये हुए तथापि शब्दसे उपर्युक्त भाव तो निकलता ही है । उसके सिवा, यह भाव भी व्यक्त होता है कि अधिकांश साधकोंके लिये तो पूर्वसूत्रके कथनानुसार अपने- अपने वर्ण और आश्रमके लिये विहित सभी कर्म आवश्यक हैं, किन्तु वैराग्य और उपरति आदि किसी विशेष कारणसे किसी-किसीके लिये अन्य कर्म आवश्यक न हों तो भी शम-दमादिका अनुष्ठान तो अवश्य होना चाहिये । सम्बन्ध—श्रुतिमें कहीं-कहीं यह वर्णन भी मिलता है कि प्राणविद्याके रहस्यको जाननेवालेके लिये कोई अन्न अभक्ष्य नहीं होता ( छा० उ० ५ । २ । १ ) ( बृह० उ० ६ । १ । १४ ) । इसलिये साधकको अन्नके विषयमें भक्ष्याभक्ष्यका विचार रखना चाहिये या नही ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— सर्वान्नानुमतिश्च प्राणात्यये तद्दर्शनात् ॥ ३ । ४ । २८ ॥ सर्वान्नानुमतिः = सब प्रकारके अन्नको भक्षण करनेकी अनुमति; च = तो; प्राणात्यये = अन्न बिना प्राण न रहनेकी सम्भावना होनेपर ही है ( सदा नहीं ); तद्दर्शनात् = क्योकि श्रुतिमे वैसा ही आचार देखा जाता है । व्याख्या—श्रुतिमे एक कथा आती है—किसी समय कुरुदेशमे टिड्डियोके गिरने अथवा ओले पड़नेसे भारी अकाल पड़ गया । उस समय उषस्ति नामवाले एक विद्वान् ब्राह्मण अपनी पत्नी आटिकीके साथ इभ्य-ग्राममे रहते थे । वे दरिद्रताके कारण बड़ी दुर्गतिमे थे । कई दिनोसे भूखे रहनेके कारण उनके प्राण जानेकी सम्भावना हो गयी । तब वे एक महावतके पास गये । वह उड़द खा रहा था, उन्होंने उससे उड़द माँगा । महावतने कहा—'मेरे पास इतना ही