ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
( १५ ) सूत्र विषय पृष्ठ १७-१९ इन्द्रियोंसे मुख्य प्राणकी भिन्नता ... ... २०५-२०७ २० ब्रह्मसे ही नाम-रूपकी रचनाका कथन ... ... २०७ २१-२२ सब तत्त्वोंका मिश्रण होनेपर भी पृथिवी आदिकी अधिकतासे उनके पृथक्-पृथक् कार्यका निर्देश ... ... २०७-२०८ तीसरा अध्याय पहला पाद १-६ शरीरके बीजभूत सूक्ष्म तत्त्वोंसहित जीवके देहान्तरमे गमन- का कथन, 'पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुषरूप हो जाता है' श्रुतिके इस वचनपर विचार, उस जलमें सभी तत्त्वोंके संमिश्रण- का कथन और अन्यान्य विरोधोंका परिहार ... २०९-२१४ ७-११ स्वर्गमे गये हुए पुरुषको देवताओंका अन्न बताना औपचारिक है, जीव स्वर्गसे कर्मसंस्कारोंको साथ लेकर लौटता है, श्रुतिमें 'चरण' शब्द कर्मसंस्कारोंका उपलक्षण और पाप-पुण्यका बोधक है, इसका उपपादन ... ... २१५-२१८ १२-१७ पापी जीव यमराजकी आज्ञासे नरकमें यातना भोगते हैं, स्वर्गमे नहीं जाते, कौषीतकिश्रुतिमे भी समस्त शुभकर्मियोंके लिये ही स्वर्गगमनकी बात आयी है; इसका वर्णन ... २१८-२२१ १८-२१ यम-यातना छान्दोग्यवर्णित तीसरी गतिसे भिन्न एव अधम चौथी गति है, इसका वर्णन तथा स्वेदज जीवोंका उद्भिजमे अन्तर्भाव २२१-२२३ २२-२७ स्वर्गसे लौटे हुए जीव किस प्रकार आकाश, वायु, धूम, मेघ, धान, जौ आदिमे स्थित होते हुए क्रमशः गर्भमें आते हैं, इसका स्पष्ट वर्णन २२३-२२५ दूसरा पाद १-६ स्वप्न मायामात्र और शुभाशुभका सूचक है, भगवान् ही जीवको स्वप्नमे नियुक्त करते हैं, जीवमें ईश्वरसदृश गुण तिरोहित हैं, परमात्माके ध्यानसे प्रकट होते हैं; उसके अनादि बन्धन और मोक्ष भी परमात्माके सकाशात्से हैं तथा जीवके दिव्य गुणोंका तिरोभाव देहके सम्बन्धसे है ... ... २२६-२३० ७-१० सुषुप्तिकालमें जीवकी नाडियोंके मूलभूत हृदयमें स्थिति, उस समय उसे परमात्मामें स्थित बतानेका रहस्य, सुषुप्तिसे पुनः उसी जीवके जाग्रत् होनेका कथन तथा मूर्च्छाकालमे अधूरी सुषुप्तावस्थाका प्रतिपादन ... ... २३०-२३३
( १६ ) सूत्र विषय पृष्ठ ११-२६ सर्वान्तर्यामी परमात्माका किसी भी स्थान-दोषसे लिप्त न होना, परमेश्वरका निर्गुण निर्विशेष, सगुण सविशेष दोनों लक्षणोंसे युक्त होना, इसमे सम्भावित विरोधका परिहार, उक्त दोनों लक्षणोंकी मुख्यता, परमात्मामे भेदका अभाव, सगुणरूपकी औपाधिकताका निराकरण, प्रतिबिम्बके दृष्टान्तका रहस्य, परमेश्वरमे शरीरके वृद्धि-ह्रास आदि दोषोंका अभाव, निषेध श्रुतियोंद्वारा इयत्तामात्रका प्रतिषेध, निर्गुण-सगुण दोनों स्वरूपोंका मन-बुद्धिसे अतीत होना तथा आराधनासे भगवान्के प्रत्यक्ष दर्शन होनेका कथन ... २३४-२४५ २७-३३ परमात्माका अपनी शक्तियोसे अभेद और भेद तथा अभेदो- पासना और भेदोपासनाके उपदेशका अभिप्राय २४५-२५१ ३४-३७ शरीर आदिके सम्बन्धसे जीवोंके परस्पर भेदकी सिद्धि, प्रकृतियोंमे भेद होनेपर भी परब्रह्ममे भेद या नानात्वका अभाव २५१-२५३ ३८-४१ कर्मोंका फल देनेवाला परमात्मा ही है, कर्म नहीं; इसका प्रतिपादन ... ... ... २५३-२५४ तीसरा पाद १-१० वेदान्तवर्णित समस्त ब्रह्मविद्याओकी एकता, भेद-प्रतीतिका निराकरण, शाखा-विशेषके लिये ही शिरोव्रत आदिका नियम, समानविद्याके प्रकरणमे एक जगह कही हुई बातोंके अन्यत्र अध्याहार करनेका कथन, उद्देश्यकी एकता होनेपर विद्याओंमे भेदका अभाव, ब्रह्मविद्यासे भिन्न विद्याओंकी एकता या भिन्नताके निर्णयमे संज्ञा आदि हेतुओके उपयोगका कथन २५५-२६२ ११-१८ ब्रह्मके 'आनन्द' आदि धर्मोंका ही अन्यत्र अध्याहार उचित- 'प्रियशिरस्त्व' रूपकगत धर्मोंका नहीं, आनन्दमयकी ब्रह्म- रूपता, विरोध-परिहार, तथा अन्न-रसमय पुरुषके ब्रह्म न होनेका प्रतिपादन ... ... ... २६२-२६७ १९-२५ एक शाखामे कही विद्याकी एकता, नेत्र एवं सूर्यमण्डलवर्ती पुरुषोंके नाम और गुणका एक दूसरेमें अध्याहारकी अनावश्यकता, उक्त पुरुषोमे ब्रह्मके सर्वाधारता और सर्व- व्यापकता आदि धर्मोंके, पुरुष-विद्यामे प्रतिपादित दिव्य गुणोंके तथा कठवर्णित वेद्यत्व आदि धर्मोंके भी अध्याहारका अनौचित्य ... ... ... २६७-२७२
( १७ ) सूत्र विषय पृष्ठ २६ ब्रह्मविद्याके फल-वर्णनमे हानि ( दुःखनाश आदि ) और प्राप्ति (परमपदकी प्राप्ति आदि ) दोनों प्रकारके फलोंका सर्वत्र सम्बन्ध ... ... ... २७२-२७४ २७-३२ ब्रह्मलोकमे जानेवाले ज्ञानी महात्माके पुण्य और पापोंकी यहीं समाप्ति, संकल्पानुसार ब्रह्मलोक-गमन या यहीं ब्रह्म- सायुज्यकी प्राप्ति सम्भव, ब्रह्मलोक जानेवाले सभी उपासकोंके लिये देवयानमार्गसे गमनका नियम, किन्तु कारक पुरुषोंके लिये इस नियमका अभाव ... ... २७४-२७८ ३३-४१ अक्षरब्रह्मके लक्षणोंका सर्वत्र ब्रह्मके वर्णनमे अध्याहार आवश्यक, मुण्डक, कठ और श्वेताश्वतर आदिमे जीव और ईश्वरको एक साथ हृदयमे स्थित बतानेवाली विद्याओकी एकता, ब्रह्म जीवात्माका भी अन्तर्यामी आत्मा है, इसमे विरोधका परिहार, जीव और ब्रह्मके भेदकी औपाधिकताका निराकरण एवं विरोध-परिहार ... ... २७८-२८६ ४२-५२ ब्रह्मलोकमे जानेवाले सभी पुरुषोंके लिये भोग भोगनेका अनिवार्य नियम नहीं, बन्धनसे मोक्ष ही विद्याका मुख्य फल, कर्मसे मुक्तिका प्रतिपादन करनेवाले पूर्वपक्षका उल्लेख और खण्डन, ब्रह्मविद्यासे ही मुक्तिका प्रतिपादन तथा साधकोंके भावानुसार विद्याके फलमे भेद ... ... २८६-२९४ ५३-५४ शरीरसे भिन्न आत्माकी सत्ता न माननेवाले नास्तिक-मतका खण्डन ... ... २९४-२९५ ५५-६० यज्ञाङ्गसम्बन्धी उपासना प्रत्येक वेदकी शाखावालोके लिये अनुष्ठेय है, एक-एक अङ्गकी अपेक्षा, सब अङ्गोंसे पूर्ण उपासना श्रेष्ठ है, शब्दादि भेदसे विद्याओंमे भिन्नता है, फल एक होनेसे साधककी इच्छाके अनुसार उनके अनुष्ठानमे विकल्प है; किंतु भिन्न-भिन्न फलवाली उपासनाओंके अनुष्ठानमे कामनाके अनुसार एकाधिक उपासनाओंका समुच्चय भी हो सकता है— इन सब बातोका वर्णन ... ... २९५-२९८ ६१-६६ यज्ञाङ्ग-सम्बन्धी उपासनाओमे समुच्चय या समाहारका खण्डन ... २९८-३०० चौथा पाद १ ज्ञानसे ही परम पुरुषार्थकी सिद्धि .. ३०१ २-७ ‘विद्या कर्मका अङ्ग है’ जैमिनिके इस मतका उल्लेख ... ३०२-३०४ ८-१७ जैमिनिके उक्त मतका खण्डन तथा ‘विद्याकर्मका अङ्ग नहीं, ब्रह्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है’ इस सिद्धान्तकी पुष्टि ३०५-३१० —
( १८ ) सूत्र विषय पृष्ठ १८-२० पूर्वपक्षके खण्डनपूर्वक संन्यास-आश्रमकी सिद्धि ... ३१०-३१२ २१-२२ अपूर्व फलदायिनी उद्गीथ आदि उपासनाओंका विधान ... ३१३-३१४ २३-२४ { उपनिषद्वर्णित कथाएँ विद्याका ही अङ्ग हैं, यज्ञका नहीं; इसका प्रतिपादन ... ... ३१४-३१५ २५ ब्रह्मविद्यारूप यज्ञमें अग्नि ईंधन आदिकी अपेक्षाका अभाव ३१५-३१६ २६-२७ { विद्याकी प्राप्तिके लिये वर्णाश्रमोचित कर्मोंकी अपेक्षा तथा शम-दम आदिकी अनिवार्य आवश्यकता ... ३१६-३१८ २८-३१ { प्राणसङ्कटके सिवा अन्य समयमें आहार-शुद्धिविषयक सदाचारके त्यागका निषेध ... ... ३१८-३२० ३२-३३ ज्ञानीके लिये लोकसंग्रहार्थ आश्रमकर्मके अनुष्ठानकी आवश्यकता ३२१ ३४-३९ { भक्तिसम्बन्धी श्रवण-कीर्तन आदि कर्मोंके अनुष्ठानकी अनिवार्य आवश्यकता तथा भागवतधर्मकी महत्ताका प्रतिपादन ... ३२१-३२७ ४०-४३ { वानप्रस्थ, संन्यास आदि ऊँचे आश्रमोंसे वापस लौटनेका निषेध, लौटनेवालेका पतन और ब्रह्मविद्या आदिमें अनधिकार ... ३२७-३२९ ४४-४६ { उद्गीथ आदिमे की जानेवाली उपासनाका कर्ता तो ऋत्विक् है किंतु उसके फलमें यजमानका अधिकार है, इसका वर्णन ३२९-३३० ४७-५० संन्यास, गृहस्थ आदि सब आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार ३३१-३३४ ५१-५२ { मुक्तिरूप फल इस जन्ममें मिलता है या जन्मान्तरमें, इसी लोक- मे मिलता है, या लोकान्तरमे ? इसका नियम नहीं है यह कथन ३३४-३३५ चौथा अध्याय पहला पाद १-२ { उपदेश-ग्रहणके पश्चात् ब्रह्मविद्याके निरन्तर अभ्यासकी आवश्यकता ... ... ... ३३६-३३७ ३ आत्मभावसे परब्रह्मके चिन्तनका उपदेश ... ३३७-३३८ ४-५ प्रतीकमे आत्मभावनाका निषेध और ब्रह्मभावनाका विधान ... ३३८-३३९ ६ उद्गीथ आदिमे आदित्य आदिकी भावना ... ३३९ ७-१० आसनपर बैठकर उपासना करनेका विधान ... ३४०-३४१ ११ जहाँ चित्त एकाग्र हो, वही स्थान उपासनाके लिये उत्तम ३४१-३४२ १२ आजीवन उपासनाकी विधि ... ३४२-३४३ १३-१४ { ब्रह्मसाक्षात्कारके पश्चात् ज्ञानीका भूत और भावी शुभाशुभ कर्मोंसे असम्बन्ध ... ... ... ३४३-३४४ १५ शरीरके हेतुभूतप्रारब्ध कर्मका भोगके लिये नियत समयतक रहना ३४५
( १९ ) सूत्र विषय पृष्ठ १६-१७ ज्ञानीके लिये अग्निहोत्र आदि तथा अन्य विहित कर्मोंका लोकसंग्रहार्थ विधान ... ... ३४५-३४६ १८ कर्माङ्ग उपासनाका ही कर्मके साथ समुच्चय ... ३४७ १९ प्रारब्धका भोगसे नाश होनेपर ज्ञानीको ब्रह्मकी प्राप्ति ... ३४७ दूसरा पाद १-४ उत्क्रमणकालमे वाणीकी अन्य इन्द्रियोंके साथ मनमे, मनकी प्राणमे और प्राणकी जीवात्मामें स्थितिका कथन ... ३४८-३४९ ५-६ जीवात्माकी सूक्ष्मभूतोंमें स्थिति ... ... ३५०-३५१ ७ ब्रह्मलोकका मार्ग आरम्भ होनेसे पूर्वतक ज्ञानी और अज्ञानी- की समान गतिका प्रतिपादन ... ... ३५१ ८ अज्ञानी जीवका परब्रह्ममे स्थित रहना प्रलयकालकी भाँति है ... ३५१-३५२ ९-११ जीवात्मा उत्क्रमणके समय जिस आकाश आदि भूतसमुदाय- मे स्थित होता है, वह सूक्ष्मशरीर है, इसका प्रतिपादन ... ३५२-३५३ १२-१६ निष्काम ज्ञानी महात्माओंका ब्रह्मलोकमे गमन नहीं होता, वे यहीं परमात्माको प्राप्त हो जाते है, इसका निरूपण ... ३५४-३५६ १७ सूक्ष्मशरीरमें स्थित जीव किस प्रकार ब्रह्मलोकमे जानेके लिये सुषुम्ना नाडीद्वारा शरीरसे निकलता है, इसका वर्णन ... ३५७-३५८ १८ शरीरसे निकलकर जीवात्माका सूर्य-रश्मियोंमे स्थित होना ३५८ १९-२० रात्रि और दक्षिणायनकालमे भी सूर्यरश्मियोंसे उसका बाधारहित सम्बन्ध ... ... ३५८-३६० २१ योगीके लिये गीतोक्त कालविशेषका नियम ३६० तीसरा पाद १ ब्रह्मलोकमे जानेके लिये 'अर्चिरादि' एक ही मार्गका कथन ३६१-३६२ २ संवत्सरमे ऊपर और सूर्यलोकके नीचे वायुलोककी स्थिति ३६२-३६३ ३ 'विद्युत्' से ऊपर वरुणलोककी स्थिति ... ३६३ ४ 'अर्चिः', 'अहः', 'पक्ष', 'मास', 'अयन' आदि आतिवाहिक पुरुष हैं, इसका प्रतिपादन ... ... ३६३-३६४ ५ अर्चि आदिको अचेतन माननेमे आपत्ति ... ३६४ ६ विद्युत्लोकसे ऊपर ब्रह्मलोकतक अमानव पुरुषके साथ जीवात्माका गमन ... ... ३६४-३६५ ७-११ 'ब्रह्मलोकमे कार्यब्रह्मकी प्राप्ति होती है', इस बादरिके मतका वर्णन ... ... ३६५-३६७ १२-१४ 'ब्रह्मलोकमे परब्रह्मकी प्राप्ति होती है' इस जैमिनिमतका उपपादन ... ... ३६७-३६९
( २० ) सूत्र विषय पृष्ठ १५-१६ प्रतीकोपासना करनेवालोंके सिवा अन्य सभी उपासक ब्रह्मलोकमे जाकर संकल्पानुसार कार्यब्रह्म अथवा परब्रह्मको प्राप्त होते हैं, यह बादरायणका सिद्धान्त ... ३६९-३७० चौथा पाद १-३ परब्रह्मपरायण जीवके लिये परमधाममे पहुँचकर अपने वास्तविकस्वरूपसे सम्पन्न होने एवं सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो विशुद्ध आत्मरूपसे स्थित होनेका कथन ... ३७१-३७२ ४-६ ब्रह्मलोकमें पहुँचनेवाले उपासकोंकी तीन गति—(१)अभिन्न- रूपसे ब्रह्ममे मिल जाने, (२) पृथक् रहकर परमात्माके सदृश दिव्यस्वरूपसे सम्पन्न होने तथा (३) केवल चैतन्यमात्र स्वरूपसे स्थित होनेका वर्णन ... ३७३-३७४ ७ उपासकके भावानुसार तीनो ही स्थितियोको माननेमे कोई विरोध नहीं है, यह बादरायणका सिद्धान्त ... ३७४-३७५ ८-९ प्रजापति ब्रह्माके लोकमे जानेवाले उपासकोंको संकल्पसे ही वहाँके भोगोकी प्राप्ति ... ३७५-३७६ १० उन उपासकोंके शरीर नहीं होते; यह बादरिका मत ... ३७६ ११ 'उन्हें शरीरकी प्राप्ति होती है' यह जैमिनिका मत ... ३७६ १२ संकल्पानुसार उनके शरीरका होना और न होना दोनों ही बाते सम्भव हैं—यह बादरायणका सिद्धान्त ... ३७७ १३-१४ वे बिना शरीरके स्वप्नकी भाँति और शरीर धारण करके जाग्रत्की भाँति भोगोका उपभोग करते है, यह कथन ... ३७७-३७८ १५-१६ सुषुप्ति-प्रलय एवं ब्रह्मसायुज्यकी प्राप्तिके प्रसंगमे ही नाम- रूपके अभावका कथन ... ३७८-३७९ १७-१८ ब्रह्मलोकमे गये हुए उपासक वहाँके भोग भोगनेके उद्देश्यसे अपने लिये इच्छानुसार शरीर-निर्माण कर सकते है, संसारकी रचना नहीं, इसका प्रतिपादन ... ३७९-३८० १९-२० ब्रह्मलोकमें जानेवाले मुक्तात्माको निर्विकार ईश्वररूप फलकी प्राप्तिका कथन ... ३८१-३८२ २१ निर्लिप्तभावसे भोगमात्रमे उसे ब्रह्माकी समता प्राप्त होती है, सृष्टिरचनामे नहीं ... ३८२ २२ ब्रह्मलोकसे पुनरावृत्ति नहीं होती, इसका प्रतिपादन ... ३८२-३८३ सूत्रोंकी वर्णानुक्रम-सूची ... ... १ से १२ (अन्तमें)
The provided image is completely blank. There is no text to transcribe.
ॐ श्रीपरमात्मने नमः वेदान्त-दर्शन ( ब्रह्मसूत्र ) ( साधारण भाषा-टीकासहित ) पहला अध्याय पहला पाद अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १ । १ । १ ॥ अथ=अब; अतः=यहाँसे; ब्रह्मजिज्ञासा=ब्रह्मविषयक विचार ( आरम्भ किया जाता है ) । व्याख्या—इस सूत्रमे ब्रह्मविषयक विचार आरम्भ करनेकी बात कहकर यह सूचित किया गया है कि ब्रह्म कौन है ? उसका स्वरूप क्या है ? वेदान्तमे उसका वर्णन किस प्रकार हुआ है ?—इत्यादि सभी ब्रह्मविषयक बातोंका इस ग्रन्थ- मे विवेचन किया जाता है । सम्बन्ध—पूर्व सूत्रमें जिस ब्रह्मके विषयमें विचार करनेकी प्रतिज्ञा की गयी है, उसका लक्षण बतलाते हैं— जन्माद्यस्य यतः ॥ १ । १ । २ ॥ अस्य=इस जगत्के; जन्मादि=जन्म आदि ( उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय ); यतः=जिससे ( होते हैं, वह ब्रह्म है ) । व्याख्या—यह जो जड़-चेतनात्मक जगत् सर्वसाधारणके देखने, सुनने और अनुभवमें आ रहा है, जिसकी अद्भुत रचनाके किसी एक अंशपर भी विचार करनेसे बड़े-बड़े वैज्ञानिकोको आश्चर्यचकित होना पड़ता है, इस विचित्र विश्वके जन्म आदि जिससे होते हैं अर्थात् जो सर्वशक्तिमान् परात्पर परमेश्वर अपनी अलौकिक शक्तिसे इस सम्पूर्ण जगत्की रचना करता है, इसका धारण, पोषण तथा नियमितरूपसे सञ्चालन करता है; फिर प्रलयकाल आनेपर जो इस समस्त विश्वको अपनेमें विलीन कर लेता है, वह परमात्मा ही ब्रह्म है । वे० द० १—
२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ भाव यह है कि देवता, दैत्य, दानव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि अनेक जीवो- से परिपूर्ण, सूर्य, चन्द्रमा, तारा तथा नाना लोक-लोकान्तरोसे सम्पन्न इस अनन्त ब्रह्माण्डका कर्ता-हर्ता कोई अवश्य है, यह हरेक मनुष्यकी समझमे आ सकता है; वही ब्रह्म है। उसीको परमेश्वर, परमात्मा और भगवान् आदि विविध नामोसे कहते हैं; क्योकि वह सबका आदि, सबसे बड़ा, सर्वाधार, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वव्यापी और सर्वरूप है। यह दृश्यमान जगत् उसकी अपार शक्तिके किसी एक अंशका दिग्दर्शनमात्र है। शङ्का—उपनिषदोमे तो ब्रह्मका वर्णन करते हुए उसे अकर्ता, अभोक्ता, असङ्ग, अव्यक्त, अगोचर, अचिन्त्य, निर्गुण, निरञ्जन तथा निर्विशेष बताया गया है और इस सूत्रमें उसे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलयका कर्ता बताया गया है। यह विपरीत बात कैसे ? समाधान—उपनिषदोमे वर्णित परब्रह्म परमेश्वर इस सम्पूर्ण जगत्का कर्ता होते हुए भी अकर्ता है (गीता ४। १३)। अतः उसका कर्तापन साधारण जीवोकी भाँति नहीं है; सर्वथा अलौकिक है। वह सर्वशक्तिमान्* एवं सर्वरूप होनेमे समर्थ होकर भी सबसे सर्वथा अतीत और असङ्ग है। सर्वगुणसम्पन्न होते हुए भी निर्गुण है† तथा समस्त विशेषणोसे युक्त होकर भी निर्विशेष‡ है। इस
- परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च । ( श्वेता० ६ । ८ ) 'इस परमेश्वरकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक दिव्य शक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है।' † एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ ( श्वेता० ६ । ११ ) 'वह एक देव ही सब प्राणियोमे छिपा हुआ, सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोका अन्तर्यामी परमात्मा है; वही सबके कर्मोंका अधिष्ठाता, सम्पूर्ण भूतोका निवास-स्थान, सबका साक्षी, चेतनस्वरूप, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत है।' ‡ एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्॥ ( मा० उ० ६ ) 'यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह सबका अन्तर्यामी है, यह सम्पूर्ण जगत्का कारण है; क्योकि समस्त प्राणियोकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका स्थान यही है।' नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्य-
सूत्र ३-४ ] अध्याय १ ३
सूत्र ३-४ ] अध्याय १ ३ प्रकार उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरमें विपरीत भावोंका समावेश स्वाभाविक होनेके कारण यहाँ शङ्काके लिये स्थान नहीं है। सम्बन्ध-कर्तापन और भोक्तापनसे रहित, नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्मको इस जगत्का कारण कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं— शास्त्रयोनित्वात् ॥ १ । १ । ३ ॥ शास्त्रयोनित्वात् = शास्त्र (वेद-) में उस ब्रह्मको जगत्का कारण बताया गया है, इसलिये (उसको जगत्का कारण मानना उचित है)। व्याख्या-वेदमें जिस प्रकार ब्रह्मके सत्य, ज्ञान और अनन्त (तै० उ० - २ । १) आदि लक्षण बताये गये हैं, उसी प्रकार उसको जगत्का कारण भी बताया गया है। * इसलिये पूर्वसूत्रके कथनानुसार परब्रह्म परमेश्वरको जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण मानना सर्वथा उचित ही है। सम्बन्ध-मृत्तिका आदि उपादानोंसे घट आदि वस्तुओंकी रचना करने- वाले कुम्भकार आदिकी भाँति ब्रह्मको जगत्का निमित्त कारण बतलाना तो युक्तिसङ्गत है; परन्तु उसे उपादान कारण कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं— तत्तु समन्वयात् ॥ १ । १ । ४ ॥ चह्वार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ (मा० उ० ७) 'जो न भीतरकी ओर प्रज्ञावाला है, न बाहरकी ओर प्रज्ञावाला है, न दोनों ओर प्रज्ञावाला है; न प्रज्ञानघन है, न जाननेवाला है, न नहीं जाननेवाला है; जो देखा नहीं गया है, जो व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता, जो पकड़नेमें नहीं आ सकता, जिसका कोई लक्षण नहीं है, जो चिन्तन करनेमें नहीं आ सकता, जो बतलानेमें नहीं आ सकता, एकमात्र आत्माकी प्रतीति ही जिसका सार है, जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है, ऐसा सर्वथा शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्त्व परब्रह्म परमात्माका चतुर्थ पाद है, इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी मानते हैं। वह परमात्मा है; वह जाननेयोग्य है।'
- 'एष योनिः सर्वस्य' (मा० उ० ६) 'यह परमात्मा सम्पूर्ण जगत्का कारण है।' 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति ।' (तै० उ० ३ । १) 'ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं तथा अन्तमें प्रयाण करते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं, उसको जाननेकी इच्छा कर, वही ब्रह्म है।'
४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ तु=तथा; तत्=वह ब्रह्म; समन्वयात्=समस्त जगत्में पूर्णरूपसे अनुगत (व्यास) होनेके कारण (उपादान भी है)। व्याख्या—जिस प्रकार अनुमान और शास्त्र-प्रमाणसे यह सिद्ध होता है कि इस विचित्र जगत्का निमित्त कारण परब्रह्म परमेश्वर है, उसी प्रकार यह भी सिद्ध है कि वही इसका उपादान कारण भी है; क्योंकि वह इस जगत्मे पूर्णतया अनुगत (व्यास) है, इसका अणुमात्र भी परमेश्वरसे शून्य नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीतामे भी भगवान्ने कहा है कि 'चर या अचर, जड या चेतन, ऐसा कोई भी प्राणी या भूतसमुदाय नहीं है, जो मुझसे रहित हो।' (१० । ३९) 'यह सम्पूर्ण जगत् मुझसे व्याप्त है।' (गीता ९ । ४) उपनिषदोंमें भी स्थान-स्थानपर यह बात दुहरायी गयी है कि 'उस परब्रह्म परमेश्वरसे यह समस्त जगत् व्याप्त है।'* सम्बन्ध—सांख्यमतके अनुसार त्रिगुणात्मिका प्रकृति भी समस्त जगत्में व्याप्त है, फिर व्याप्तिरूप हेतुसे जगत्का उपादान कारण ब्रह्मको ही क्यों मानना चाहिये, प्रकृतिको क्यों नहीं ? इसपर कहते हैं— ईक्षतेर्नाशब्दम् ॥ १ । १ । ५ ॥ ईक्षतेः=श्रुतिमे 'ईक्ष' धातुका प्रयोग होनेके कारण; अशब्दम्=शब्द- प्रमाण-शून्य प्रधान-(त्रिगुणात्मिका जड प्रकृति); न=जगत्का कारण नहीं है। व्याख्या—उपनिषदोंमे जहाँ सृष्टिका प्रसङ्ग आया है, वहाँ 'ईक्ष' धातुकी क्रियाका प्रयोग हुआ है; जैसे 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छा० उ० ६ । २ । १) इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजा- येय' (छा० उ० ६ । २ । ३) अर्थात् 'उस सत्ने ईक्षण—सङ्कल्प किया कि मै बहुत हो जाऊँ, अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ।' ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार दूसरी जगह भी 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीत्' इस प्रकार आरम्भ करके 'स ईक्षत लोकान्नु सृजै' (ऐ० उ० १ । १ । १) अर्थात् उसने ईक्षण—विचार किया कि निश्चय ही मै लोकोंकी रचना करूँ।' ऐसा कहा है। परन्तु त्रिगुणात्मिका प्रकृति जड है, उसमे ईक्षण या सङ्कल्प नहीं
- ईशावास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । ( ईशा० १ )
सूत्र ५-७ ] अध्याय १ ५.
सूत्र ५-७ ] अध्याय १ ५. बन सकता; क्योंकि वह चेतनका धर्म है; अतः शब्दप्रमाणरहित प्रधान ( जड प्रकृति ) को जगत्का उपादान कारण नहीं माना जा सकता । सम्बन्ध—ईक्षण या सङ्कल्प चेतनका धर्म होनेपर भी गौणीवृत्तिसे अचेतन- के लिये प्रयोगमें लाया जा सकता है, जैसे लोकमें कहते हैं 'अमुक मकान अब गिरना ही चाहता है।' इसी प्रकार यहाँ भी ईक्षण-क्रियाका सम्बन्ध गौणरूपसे त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिके साथ मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं— गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ॥ १ । १ । ६ ॥ चेत् =यदि कहो; गौणः = ईक्षणका प्रयोग गौणवृत्तिसे ( प्रकृतिके लिये ) हुआ है; न = तो यह ठीक नहीं है; आत्मशब्दात् = क्योंकि वहाँ 'आत्म' शब्दका प्रयोग है। व्याख्या—ऊपर उद्धृत की हुई ऐतरेयकी श्रुतिमें ईक्षणका कर्ता आत्माको बताया गया है; अतः गौण-वृत्तिसे भी उसका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ नहीं हो सकता। इसलिये प्रकृतिको जगत्का कारण मानना वेदके अनुकूल नहीं है। सम्बन्ध—'आत्म' शब्दका प्रयोग तो मन, इन्द्रिय और शरीरके लिये भी आता है; अतः उक्त श्रुतिमें 'आत्मा' को गौणरूपसे प्रकृतिका वाचक मानकर उसे जगत्का कारण मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं— तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ॥ १ । १ । ७॥ तन्निष्ठस्य = उस जगत्कारण ( परमात्मा ) में स्थित होनेवालेकी; मोक्षोपदेशात् = मुक्ति बतलायी गयी है; इसलिये (वहाँ प्रकृतिको जगत्कारण नहीं माना जा सकता)। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्की दूसरी वल्लीके सातवे अनुवाकमे जो सृष्टिका प्रकरण आया है, वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि 'तदात्मानं स्वयमकुरुत'—'उस ब्रह्मने स्वयं ही अपने आपको इस जड-चेतनात्मक जगत्के रूपमे प्रकट किया।' साथ ही यह भी बताया गया है कि 'यह जीवात्मा जब उस आनन्दमय परमात्मामे निष्ठा करता—स्थित होता है, तब यह अभय पदको पा लेता है।' इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्मे भी श्वेतकेतुके प्रति उसके पिताने उस परम कारणमे स्थित होनेका फल मोक्ष बताया है; किन्तु प्रकृतिमे स्थित होनेसे मोक्ष होना कदापि सम्भव
६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ नहीं है, अतः उपर्युक्त श्रुतियोंमे 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं है; इसीलिये प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता । सम्बन्ध—उक्त श्रुतियोंमें आया हुआ 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता, इसमें दूसरा कारण बतलाते हैं— हेयत्वावचनाच्च ॥ १ । १ । ८ ॥ हेयत्वावचनात्=त्यागनेयोग्य नहीं बताये जानेके कारण; च=भी (उस प्रसङ्गमें 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं है) । व्याख्या—यदि 'आत्मा' शब्द वहाँ गौणवृत्तिसे प्रकृतिका वाचक होता तो आगे चलकर उसे त्यागनेके लिये कहा जाता और मुख्य आत्मामें निष्ठा करनेका उपदेश दिया जाता; किन्तु ऐसा कोई वचन उपलब्ध नहीं होता है। जिसको जगत्का कारण बताया गया है, उसीमें निष्ठा करनेका उपदेश किया गया है; अतः परब्रह्म परमात्मा ही 'आत्म'शब्दका वाच्य है और वही इस जगत्का निमित्त एवं उपादान कारण है । सम्बन्ध—'आत्मा' की ही भाँति इस प्रसङ्गमें 'सत्' शब्द भी प्रकृतिका वाचक नहीं है; यह सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— स्वाप्ययात् ॥ १ । १ । ९ ॥ स्वाप्ययात्=अपनेमें विलीन होना बताया गया है, इसलिये (सत् शब्द भी जड प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता)। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (६ । ८ । १) मे कहा है कि 'यत्रैतत् पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते' अर्थात् 'हे सोम्य ! जिस अवस्थामे यह पुरुष (जीवात्मा) सोता है, उस समय यह सत् (अपने कारण) से सम्पन्न (संयुक्त) होता है; स्व— अपनेमें अपीत—विलीन होता है, इसलिये इसे 'स्वपिति' कहते हैं।'*
- यहाँ स्व (अपने) में विलीन होना कहा गया है; अतः यह सन्देह हो सकता है कि 'स्व' शब्द जीवात्माका ही वाचक है, इसलिये वही जगत्का कारण है, परन्तु ऐसा समझना ठीक नहीं है, क्योकि पहले जीवात्माका सत् (जगत्के कारण) से संयुक्त होना बताकर उसी सत्को पुनः 'स्व' नामसे कहा गया है और उसीमे जीवात्माके विलीन
सूत्र ८-११ ] अध्याय १ ७
सूत्र ८-११ ] अध्याय १ ७ इस प्रसङ्गमे जिस सत्को समस्त जगत्का कारण बताया है, उसीमे जीवात्माका विलीन होना कहा गया है और उस सत्को उसका स्वस्वरूप बताया गया है । अतः यहाँ 'सत्' नामसे कहा हुआ जगत्का कारण जडतत्त्व नहीं हो सकता । सम्बन्ध—यही बात प्रकारान्तरसे पुनः सिद्ध करते हैं— गतिसामान्यात् ॥ १।१।१० ॥ गतिसामान्यात्=सभी उपनिषद्-वाक्योका प्रवाह समानरूपसे चेतनको ही जगत्का कारण बतानेमे है, इसलिये ( जड प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता ) । व्याख्या—'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः' ( तै० उ० २ । १ ) 'निश्चय ही सर्वत्र प्रसिद्ध इस परमात्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ।' 'आत्मत एवेदं सर्वम्' ( छा० उ० ७ । २६ । १ )—'परमात्मासे ही यह सब कुछ उत्पन्न हुआ है।' 'आत्मन एष प्राणो जायते' ( प्र० उ० ३ । ३ )—'परमात्मासे यह प्राण उत्पन्न होता है।' 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी।' ( मु० उ० २ । १ । ३ )—'इस परमेश्वरसे प्राण उत्पन्न होता है; तथा मन ( अन्तःकरण ), समस्त इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल और सम्पूर्ण प्राणियोको धारण करनेवाली पृथिवी—ये सब उत्पन्न होते हैं।' इस प्रकार सभी उपनिषद्-वाक्योंमे समानरूपसे चेतन परमात्माको ही जगत्का कारण बताया गया है; इसलिये जड प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता । सम्बन्ध—पुनः श्रुति-प्रमाणसे इसी बातको दृढ करते हुए इस प्रकरणको समाप्त करते हैं— श्रुतत्वाच्च ॥ १।१।११ ॥ श्रुतत्वात्=श्रुतियोद्वारा जगह-जगह यही बात कही गयी है, इसलिये; च= भी ( परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का कारण सिद्ध होता है ) । होनेकी बात कही गयी है। विलीन होनेवाली वस्तुसे लयका अधिष्ठान भिन्न होता है, अतः यहाँ लीन होनेवाली वस्तु जीवात्मा है और जिसमे वह लीन होता है, वह परमात्मा है। इसलिये यहाँ परमात्माको ही 'सत्' के नामसे जगत्का कारण बताया गया है, यही मानना ठीक है।
८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—'स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः।' ( श्वेता० उ० ६ । ९)—'वह परमात्मा सबका परम कारण तथा समस्त करणोंके अधिष्ठाताओंका भी अधिपति है। कोई भी न तो इसका जनक है और न स्वामी ही है।' 'स विश्वकृत्' ( श्वेता० ६ । १६ )—'वह परमात्मा समस्त विश्वका स्रष्टा है।' 'अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे' (मु० उ० २ । १ । ९)— 'इस परमेश्वरसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं।'—इत्यादिरूपसे उपनिषदोंमे स्थान-स्थानपर यही बात कही गयी है कि सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का कारण है; अतः श्रुति-प्रमाणसे यही सिद्ध होता है कि सर्वाधार परमात्मा ही सम्पूर्ण जगत्का अभिन्न निमित्तोपादान कारण है; जड प्रकृति नहीं। सम्बन्ध—'स्वाप्ययात्' १ । १ । ९ सूत्रमें जीवात्माके स्व ( परमात्मा ) मे विलीन होनेकी बात कहकर यह सिद्ध किया गया कि जड प्रकृति जगत्का कारण नहीं है। किन्तु 'स्व' शब्द प्रत्यक्चेतन ( जीवात्मा ) के अर्थमें भी प्रसिद्ध है; अतः यह सिद्ध करनेके लिये कि प्रत्यक्चेतन भी जगत्का कारण नहीं है, आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है। तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीमें सृष्टिकी उत्पत्ति का वर्णन करते हुए सर्वात्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरसे ही आकाश आदिके क्रमसे सृष्टि बतायी गयी है। (अनु० १, ६, ७)। उसी प्रसङ्गमें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय इन पाँचोंका वर्णन आया है। वहाँ क्रमशः अन्नमयका प्राणमय- को, प्राणमयका मनोमयको, मनोमयका विज्ञानमयको और विज्ञानमयका आनन्दमय- को अन्तरात्मा बताया गया है। आनन्दमयका अन्तरात्मा दूसरे किसीको नहीं बताया गया है; अपि तु उसीसे जगत्की उत्पत्ति बताकर आनन्दकी महिमाका वर्णन करते हुए सर्वात्मा आनन्दमयको जाननेका फल उसीकी प्राप्ति बताया गया और वहीं ब्रह्मानन्दवल्लीको समाप्त कर दिया गया है। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि इस प्रकरणमे आनन्दमय नामसे किसका वर्णन हुआ है, परमेश्वरका? या जीवात्माका? अथवा अन्य किसीका? इसपर कहते हैं— आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥ १ । १ । १२ ॥
सूत्र १२-१३ ] अध्याय १ ९
सूत्र १२-१३ ] अध्याय १ ९ अभ्यासात् = श्रुतिने वारंवार 'आनन्द' शब्दका ब्रह्मके लिये प्रयोग होनेके कारण; आनन्दमयः = 'आनन्दमय' शब्द (यहाँ परब्रह्म परमेश्वरका ही वाचक है)। व्याख्या—किसी बातको दृढ़ करनेके लिये वारंवार दुहरानेको 'अभ्यास' कहते हैं। तैत्तिरीय तथा बृहदारण्यक आदि अनेक उपनिषदोंमे 'आनन्द' शब्द- का ब्रह्मके अर्थमे वारंवार प्रयोग हुआ है; जैसे—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मवल्लीके छठे अनुवाकमे 'आनन्दमय' का वर्णन आरम्भ करके सातवे अनुवाकमे उसके लिये 'रसो वै सः। रसꣳह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयाति' (२।७) अर्थात् 'वह आनन्दमय ही रसस्वरूप है, यह जीवात्मा इस रसस्वरूप परमात्माको पाकर आनन्द- युक्त हो जाता है। यदि वह आकाशकी भाँति परिपूर्ण आनन्दस्वरूप परमात्मा नहीं होता तो कौन जीवित रह सकता, कौन प्राणोंकी क्रिया कर सकता ! सचमुच यह परमात्मा ही सबको आनन्द प्रदान करता है।' ऐसा कहा गया है। तथा 'सैषाऽऽनन्दस्य मीमाꣳसा भवति,' 'एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति।' (तै० उ० २।८) 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन।' (तै० उ० २।९) 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' (तै० उ० ३।६) 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (बृह० उ० ३।९।२८)—इत्यादि प्रकारसे श्रुतियोंमें जगह-जगह परब्रह्मके अर्थमें 'आनन्द' एवं 'आनन्दमय' शब्दका प्रयोग हुआ है। इसलिये 'आनन्दमय' नामसे यहाँ उस सर्वशक्तिमान्, समस्त जगत्के परम कारण, सर्वनियन्ता, सर्वव्यापी, सबके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं। सम्बन्ध—यहाँ यह शङ्का होती है कि 'आनन्दमय' शब्दमे जो 'मयट्' प्रत्यय है, वह विकार अर्थका बोधक है और परब्रह्म परमात्मा निर्विकार है। अतः जिस प्रकार अन्नमय आदि शब्द ब्रह्मके वाचक नहीं हैं, वैसे ही, उन्हीं- के साथ आया हुआ यह 'आनन्दमय' शब्द भी परब्रह्मका वाचक नहीं होना चाहिये। इसपर कहते हैं— विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ॥ १। १। १३ ॥ चेत्=यदि कहो; विकारशब्दात्=मयट् प्रत्यय विकारका बोधक होनेसे; न=आनन्दमय शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता, इति=तो यह कथन; न=
सूत्रके अनुसार प्रचुरताके अर्थमें भी 'मयट्' प्रत्यय होता है; अतः यहाँ 'आनन्द-
१० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ठीक नहीं है; प्राचुर्यात् = क्योंकि 'मयट्' प्रत्यय यहाँ प्रचुरताका बोधक है ( विकारको नहीं ) । व्याख्या—'तत्प्रकृतवचने मयट्' ( पा० सू० ५ । ४ । २१ ) इस पाणिनि- सूत्रके अनुसार प्रचुरताके अर्थमें भी 'मयट्' प्रत्यय होता है; अतः यहाँ 'आनन्द- मय' शब्दमे जो 'मयट्' प्रत्यय है, वह विकारका नहीं, प्रचुरता-अर्थका ही बोधक है अर्थात् वह ब्रह्म आनन्दघन है, इसीका द्योतक है । इसलिये यह कहना ठीक नहीं है कि 'आनन्दमय' शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता । परब्रह्म परमेश्वर आनन्दघनस्वरूप है, इसलिये उसे 'आनन्दमय' कहना सर्वथा उचित है । सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जब 'मयट्' प्रत्यय विकारका बोधक भी होता है, तब यहाँ उसे प्रचुरताका ही बोधक क्यों माना जाय ? विकारबोधक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— तद्धेतुव्यपदेशाच्च ॥ १ । १ । १४ ॥ तद्धेतुव्यपदेशात् = ( उपनिषदोंमे ब्रह्मको ) उस आनन्दका हेतु बताया गया है, इसलिये; च = भी (यहाँ मयट् प्रत्यय विकार-अर्थका बोधक नहीं है ) । व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकरणमे आनन्दमयको आनन्द प्रदान करनेवाला बताया गया है (तै० उ० २ । ७ ) । जो सबको आनन्द प्रदान करता है, वह स्वयं आनन्दघन है, इसमें तो कहना ही क्या है; क्योंकि जो अखण्ड आनन्दका भण्डार होगा, वही सदा सबको आनन्द प्रदान कर सकेगा । इसलिये यहाँ मयट् प्रत्ययको विकारका बोधक न मानकर प्रचुरताका बोधक मानना ही ठीक है । सम्बन्ध—केवल मयट् प्रत्यय प्रचुरताका बोधक होनेसे ही यहाँ 'आनन्द- मय' शब्द ब्रह्मका वाचक है, इतना ही नहीं, किन्तु— मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॥ १ । १ । १५ ॥ च = तथा; मान्त्रवर्णिकम् = मन्त्राक्षरोंमे जिसका वर्णन किया गया है, उस ब्रह्मका; एव = ही; गीयते = (यहाँ) प्रतिपादन किया जाता है ( इसलिये भी आनन्दमय ब्रह्म ही है ) । व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीके आरम्भमे जो यह मन्त्र आया है कि—'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ।' अर्थात् 'ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप
सूत्र १६-१७ ] अध्याय १ ११
सूत्र १६-१७ ] अध्याय १ ११ और अनन्त है। वह ब्रह्म विशुद्ध आकाशस्वरूप परम धाममे रहते हुए ही सब- के हृदयरूप गुफामे छिपा हुआ है। जो उसको जानता है, वह सबको भली- भाँति जाननेवाले ब्रह्मके साथ समस्त भोगोका अनुभव करता है।' इस मन्त्रद्वारा वर्णित ब्रह्मको यहाँ 'मान्त्रवर्णिक' कहा गया है। जिस प्रकार उक्त मन्त्रमे उस परब्रह्मको सबका अन्तरात्मा बताया गया है, उसी प्रकार ब्राह्मण-ग्रन्थमे 'आनन्द- मय'को सबका अन्तरात्मा कहा है; इस प्रकार दोनो स्थलोकी एकताके लिये यही मानना उचित है कि 'आनन्दमय' शब्द यहाँ ब्रह्मका ही वाचक है, अन्य किसी- का नहीं। सम्बन्ध—यदि 'आनन्दमय' शब्दको जीवात्माका वाचक मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं— नेतरोऽनुपपत्तेः ॥ १।१।१६ ॥ इतरः = ब्रह्मसे भिन्न जो जीवात्मा है, वह; न = आनन्दमय नहीं हो सकता; अनुपपत्तेः = क्योंकि पूर्वापरके वर्णनसे यह बात सिद्ध नहीं होती। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीमें आनन्दमयका वर्णन करनेके अनन्तर यह बात कही गयी है कि 'उस आनन्दमय परमात्माने यह इच्छा की कि मैं बहुत होऊँ; फिर उसने तप (सङ्कल्प) किया। तप करके इस समस्त जगत्की रचना की।' (तै० उ० २। ६) यह कथन जीवात्माके लिये उपयुक्त नहीं है; क्योकि जीवात्मा अल्पज्ञ और परिमित शक्तिवाला है; जगत्की रचना आदि कार्य करनेकी उसमें सामर्थ्य नहीं है। अतः 'आनन्दमय' शब्द जीवात्मा- का वाचक नहीं हो सकता। सम्बन्ध—यही बात सिद्ध करनेके लिये दूसरा कारण बतलाते हैं— भेदव्यपदेशाच्च ॥ १।१।१७ ॥ भेदव्यपदेशात् = जीवात्मा और परमात्माको एक दूसरेसे भिन्न बतलाया गया है, इसलिये; च = भी ('आनन्दमय' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं हो सकता)। व्याख्या—उक्त वल्लीमें आगे चलकर (सातवे अनुवाकमे) कहा है कि 'यह जो ऊपरके वर्णनमे 'सुकृत'नामसे कहा गया है, वही रसस्वरूप है। यह जीवात्मा इस रसस्वरूप परमात्माको पाकर आनन्दयुक्त हो जाता है।' इस प्रकार यहाँ
१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ परमात्माको आनन्ददाता और जीवात्माको उसे पाकर आनन्दयुक्त होनेवाला बताया गया है। इससे दोनोंका भेद सिद्ध होता है। इसलिये भी 'आनन्दमय' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं है। सम्बन्ध-आनन्दका हेतु जो सत्त्वगुण है, वह त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिमें भी विद्यमान है ही; अतः 'आनन्दमय' शब्दको प्रकृतिका ही वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— कामाच्च नानुमानापेक्षा ॥ १ । १ । १८ ॥ च=तथा; कामात्=( 'आनन्दमय'मे ) कामनाका कथन होनेसे; अनुमाना- पेक्षा=(यहाँ ) अनुमान-कल्पित जड प्रकृतिको 'आनन्दमय' शब्दसे ग्रहण करने- की आवश्यकता; न=नहीं है। व्याख्या—उपनिषद्मे जहाँ 'आनन्दमय'का प्रसङ्ग आया है, वहाँ 'सोऽकाम- यत' इस वाक्यके द्वारा आनन्दमयमे सृष्टिविषयक कामनाका होना बताया गया है, जो कि जड प्रकृतिके लिये असम्भव है। अतः उस प्रकरणमें वर्णित 'आनन्द मय' शब्दसे जड प्रकृतिको नहीं ग्रहण किया जा सकता। सम्बन्ध—परब्रह्म परमात्माके सिवा, प्रकृति या जीवात्मा कोई भी 'आनन्द- मय' शब्दसे गृहीत नहीं हो सकता; इस बातको दृढ़ करते हुए प्रकरणका उपसंहार करते हैं— अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १ । १ । १९ ॥ च=इसके सिवा; अस्मिन्=इस प्रकरणमे ( श्रुति ); अस्य=इस जीवात्माका; तद्योगम्=उस आनन्दमयसे संयुक्त होना ( मिल जाना ); शास्ति=बतलाती है ( इसलिये जड तत्त्व या जीवात्मा आनन्दमय नहीं है ) । व्याख्या—तै० उ० ( २ । ८ ) मे श्रुति कहती है कि 'इस आनन्दमय परमात्माके तत्त्वको इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् अन्नमयादि समस्त शरीरोके आत्मस्वरूप आनन्दमय ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।' बृहदारण्यकमे भी श्रुतिका कथन है कि '(ब्रह्मको जाननेवाला पुरुष ) ब्रह्मरूप होकर ही ब्रह्ममे लीन होता है' ( बृह० उ० ४ । ४ । ६)। श्रुतिके इन वचनोसे यह स्वत सिद्ध हो जाता है' कि जड प्रकृति या जीवात्माको 'आनन्दमय' नहीं माना जा सकता; क्योकि चेतन जीवात्मा-
सूत्र १८-२१ ] अध्याय १ १३
सूत्र १८-२१ ] अध्याय १ १३ का जड प्रकृतिमे अथवा अपने ही-जैसे परतन्त्र दूसरे किसी जीवमे लय होना नहीं बन सकता। इसलिये एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही 'आनन्दमय' शब्दका वाच्यार्थ है और वही सम्पूर्ण जगत्का कारण है; दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध—तैत्तिरीय-श्रुतिमें जहाँ आनन्दमयका प्रकरण आया है, वह 'विज्ञानमय' शब्दसे जीवात्माको ग्रहण किया गया है, किन्तु बृहदारण्यक ( ४ । ४ । २२ ) में 'विज्ञानमय' को हृदयाकाशमें शयन करनेवाला अन्तरात्मा बताया गया है। अतः जिज्ञासा होती है कि वहाँ 'विज्ञानमय' शब्द जीवात्मा- का वाचक है अथवा ब्रह्मका ? इसी प्रकार छान्दोग्य ( १ । ६ । ६ ) में जो सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुषका वर्णन आया है, वहाँ भी यह शङ्का हो सकती है कि इस मन्त्रमें सूर्यके अधिष्ठाता देवताका वर्णन हुआ है या ब्रह्मका ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ १ । १ । २० ॥ अन्तः = हृदयके भीतर शयन करनेवाला विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलके भीतर स्थित हिरण्मय पुरुष ब्रह्म है; तद्धर्मोपदेशात् = क्योकि ( उसमे ) उस ब्रह्मके धर्मोंका उपदेश किया गया है। व्याख्या—उपर्युक्त बृहदारण्यक-श्रुतिमे वर्णित विज्ञानमय पुरुषके लिये इस प्रकार विशेषण आये हैं—'सर्वस्य वशी सर्वस्येशान. सर्वस्याधिपतिः' एष सर्वेश्वर एष भूतपालः' इत्यादि। तथा छान्दोग्यवर्णित सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती पुरुषके लिये 'सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः' ( सब पापोंसे ऊपर उठा हुआ ) यह विशेषण दिया गया है। ये विशेषण परब्रह्म परमेश्वरमें ही सम्भव हो सकते हैं। किसी भी स्थिति- को प्राप्त देव, मनुष्य आदि योनियोंमें रहनेवाले जीवात्माके ये धर्म नहीं हो सकते। इसलिये वहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष समझना चाहिये; अन्य किसीको नहीं। सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— भेदव्यपदेशाच्चान्यः ॥ १ । १ । २१ ॥ च=तथा; भेदव्यपदेशात् = भेदका कथन होनेसे; अन्यः = सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भिन्न है।