भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

२२० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे उसी बातको कहते हैं— अपि च सप्त ॥ ३ । १ । १५ ॥ अपि च = इसके सिवा; सप्त = पापकर्मका फल भोगनेके लिये प्रधानतः सात नरकोंका भी वर्णन आया है। व्याख्या—इसके सिवा, पापकर्मोंका फल भोगनेके लिये पुराणोंमें प्रधानतासे रौरव आदि सात नरकोंका भी वर्णन किया गया है, इससे उन पापकर्मियोंके स्वर्गगमनकी तो सम्भावना ही नहीं की जा सकती। सम्बन्ध—नरकोंमें तो चित्रगुप्त आदि दूसरे अधिकारी बताये गये हैं, फिर यह कैसे कहा कि पापीलोग यमराजके अधिकारमें दण्ड भोगते हैं ? इसपर कहते हैं— तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ॥ ३ । १ । १६ ॥ च=तथा; तत्र=उन यातनाके स्थानोंमे; अपि=भी; तद्व्यापारात्=उस यमराज- के ही आज्ञानुसार कार्य होनेसे; अविरोधः=किसी प्रकारका विरोध नहीं है। व्याख्या—यातना भोगनेके लिये जो रौरव आदि सात नरक बताये गये हैं, और वहाँ जो चित्रगुप्त आदि दूसरे अधिकारी हैं, वे यमराजके आज्ञानुसार कार्य करते हैं, इसलिये उनका किया हुआ कार्य भी यमराजका ही कार्य है। अतः यमराजके अधिकारमें पापियोंके दण्ड भोगनेकी जो बात कही गयी है, उसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—ऐसा मान लेनेपर भी पूर्वोक्त श्रुतिमें जो सबके चन्द्रलोकमें जाने- की बात कही गयी, उसकी संगति (कौ० १ । २) कैसे होगी ? इसपर कहते हैं— विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ॥ ३ । १ । १७ ॥ विद्याकर्मणोः=ज्ञान और शुभ कर्म—इन दोनोंका; तु=ही; प्रकृत- त्वात्=प्रकरण होनेके कारण; इति=ऐसा कथन उचित ही है। व्याख्या—जिस प्रकार छान्दोग्योपनिषद् (५ । १० । १) मे विद्या और शुभ कर्मोंका फल बतानेका प्रसङ्ग आरम्भ करके देवयान और पितृयान- मार्गकी बात कही गयी है, उसी प्रकार वहाँ कौषीतकि उपनिषद्मे भी ज्ञान

सूत्र १५-१९ ] अध्याय ३ २२१ .

सूत्र १५-१९ ] अध्याय ३ २२१ . और शुभ कर्मोंका फल बतानेके प्रकरणमे ही उक्त कथन है। इसलिये यह समझना चाहिये कि जो शुभ कर्म करनेवाले अधिकारी मनुष्य इस लोकसे जाते है, वे ही सब-के-सब चन्द्रलोकको जाते है; अनिष्ट कर्म करनेवाले नहीं; क्योंकि उनका प्रकरण नहीं है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'कठोपनिषद्में जो पापियोंके लिये यमलोकमे जानेकी बात कही गयी है, वह छान्दोग्य-श्रुतिमें बतायी हुई तीसरी गतिके अन्तर्गत है, या उससे भिन्न ?' इसके उत्तरमें कहते है— न तृतीये तथोपलब्धेः ॥ ३ । १ । १८ ॥ तृतीये=वहाँ कही हुई तीसरी गतिमेः न=(यमलोकगमनरूप गतिका ) अन्तर्भाव नहीं होता; तथा उपलब्धेः=क्योकि उस वर्णनमे ऐसी ही बात मिलती है। व्याख्या—वहाँ छान्दोग्योपनिषद् (५ । १० । ८) मे यह बात कही गयी है कि 'अथैतयोः पथोर्न कतरेण च तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयं स्थानम्।' अर्थात् 'देवयान और पितृयान—इन दोनो मार्गोंमेंसे किसी भी मार्गमे जो ऊपरके लोकोमे नहीं जाते, वे क्षुद्र तथा वार-वार जन्मने- मरनेवाले प्राणी होते हैं; 'उत्पन्न होओ और मरो'—यह मृत्युलोक ही उनका तीसरा स्थान है।' इत्यादि। इस वर्णनमे यह पाया जाता है कि उनका किसी भी परलोकमे गमन नहीं होता, वे इस मृत्युलोकमे ही जन्मने-मरते रहते हैं। इसलिये इस तीसरी गतिमे यमयातणारूप नरकलोकवाली गतिका अन्तर्भाव नहीं है। सम्बन्ध—इन तीन गतियोंके सिवा चौथी गति जिसमें नरकयातना आदिके भोग हैं तथा जो ऊपर कही हुई तीसरी गतिसे भी अधम गति है, उसका वर्णन कहाँ आता है, इसपर कहते है— स्मर्यतेऽपि च लोके ॥ ३ । १ । १९ ॥ स्मर्यते=स्मृतियोंमे इसका समर्थन किया गया है; च=तथा; लोके=लोकोंमे, अपि=भी ( यह बात प्रसिद्ध है )। व्याख्या—श्रीमद्भगवद्गीता ( १४ । १८) मे कहा है कि— ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥

२२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ 'सत्त्वगुणमें स्थित रहकर मरनेवाले लोग ऊपरके लोकोंमे जाते है (देवयान और पितृयान—दोनों मार्ग इसके अन्तर्गत हैं), राजसी लोग बीचमे अर्थात् इस मनुष्यलोकमें ही जन्मते-मरते रहते है (यह छान्दोग्यमे बतायी हुई तीसरी गतिके अन्तर्गत है )। निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमे स्थित तामसी जीव नीचेके लोकोमे जाते हैं' (यह इसीके अन्तर्गत उक्त तीसरी गतिसे अधम यम- यातनास्वरूप गति भी है) इसका स्पष्टीकरण गीता अध्याय १६ श्लोक २० में किया गया है। इस प्रकार इस यमयातनास्वरूप अधोगतिका वर्णन स्मृतियोमे पाया जाता है तथा लोकमें भी यह प्रसिद्ध है। पुराणोंमे तो इसका वर्णन बड़े विस्तार- से आता है। इसको अधोगति कहते है, इसलिये वहाँसे जो नारकी जीवोका पुनः मृत्युलोकमे आना है, वह उनका पूर्व कथनके अनुसार ऊपर उठना है और पुनः नरकमें जाना ही नीचे गिरना है। सम्बन्ध—अब दूसरा प्रमाण देकर उसी बातको सिद्ध करते हैं— दर्शनाच्च ॥ ३ । १ । २० ॥ दर्शनात् = श्रुतिमे भी ऐसा वर्णन देखा जाता है, इसलिये; च = भी (यह मानना ठीक है कि इस प्रकरणमे बतायी हुई तीसरी गतिमें यमयातनाका अन्तर्भाव नहीं है)। व्याख्या—ईशावास्योपनिषद्‌मे कहा है— असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः । तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ( ईशा० ३) 'जो असुरोके प्रसिद्ध लोक हैं, वे सब-के-सब अज्ञान तथा दुःख-क्लेशरूप महान् अन्धकारसे आच्छादित हैं, जो कोई भी आत्माकी हत्या करनेवाले मनुष्य हैं, वे मरनेके बाद उन्हीं भयङ्कर लोकोंको बार-बार प्राप्त होते है।' इस प्रकार उपनिषदोंमें भी उस नरकादि लोकोकी प्राप्तिरूप गतिका वर्णन देखा जाता है। इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि इस प्रसङ्गमें कही हुई तीसरी गतिमें यम- यातनावाली गतिका अन्तर्भाव नहीं है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद्में जीवोंकी तीन श्रेणियाँ बतायी गयी हैं—अण्डज—अण्डेसे उत्पन्न होनेवाले, जीवज— जेरसे उत्पन्न होनेवाले और उद्भिज्ज—पृथ्वी फोड़कर उत्पन्न होनेवाले ( छा० उ० ६ । ३ । १ ? ); किन्तु दूसरी जगह जीवोंके चार भेद सुने जाते हैं।

सूत्र २०-२३ ] अध्याय ३ २२३

सूत्र २०-२३ ] अध्याय ३ २२३ यहाँ चौथी स्वेदज अर्थात् पसीनेसे उत्पन्न होनेवाली श्रेणीको क्यों छोड़ा गया ? इसपर कहते हैं— तृतीयशब्दावरोधः संशोकजस्य ॥ ३ । १ । २१ ॥ संशोकजस्य = पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले जीवसमुदायका; तृतीयशब्दा- वरोधः = तीसरे नामवाली उद्भिज्ज-जातिमे संग्रह ( समझना चाहिये ) । व्याख्या—इस प्रकरणमे जो पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले स्वेदज जीवोका वर्णन नहीं हुआ, उसका श्रुतिमे तीसरे नामसे कही हुई उद्भिज्ज-जातिमे अन्तर्भाव समझना चाहिये; क्योकि दोनो ही पृथिवी और जलके संयोगसे उत्पन्न होते हैं । सम्बन्ध—अब स्वर्गलोकसे लौटनेकी गतिपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। छान्दोग्योपनिषद् ( ५ । १० । ५,६ ) मे कहा गया है कि स्वर्गसे लौटनेवाले जीव पहले आकाशको प्राप्त होते हैं, आकाश- से वायु, धूम, मेघ आदिके क्रमसे उत्पन्न होते हैं। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीव उन-उन आकाश आदिके रूपमें स्वयं परिणत होते हैं या उनके समान हो जाते हैं ? इसपर कहते हैं— तत्साभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ॥ ३ । १ । २२ ॥ तत्साभाव्यापत्तिः = उनके सदृश भावकी प्राप्ति होती है; उपपत्तेः = क्योकि यही बात युक्तिसे सिद्ध होती है । व्याख्या—यहाँ जो आकाश, वायु आदि बनकर लौटनेकी बात कही गयी है, इस कथनसे जीवात्माका उन-उन तत्त्वोके रूपमे परिणत होना युक्तिसंगत नहीं है, क्योकि आकाश आदि पहलेसे विद्यमान है और जीवात्मा जब एकके बाद दूसरे भावको प्राप्त हो जाते है, उसके बाद भी वे आकाशादि पदार्थ रहते ही हैं । इसलिये यही मानना युक्तिसंगत है कि वे उन आकाश आदिके सदृश आकारवाले बनकर लौटते है । उनका आकाशके सदृश सूक्ष्म हो जाना ही आकाशको प्राप्त होना है । इसी प्रकार वायु आदिके विषयमे भी समझ लेना चाहिये । सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि वे जीव उन-उन तत्त्वोंके आकारमें बहुत दिनोंतक टिके रहते हैं या तत्काल ही क्रमसे नीचे उतरते जाते हैं, इसपर कहते हैं— नातिचिरेण विशेषात् ॥ ३ । १ । २३ ॥ विशेषात् = ऊपर गमनकी अपेक्षा नीचे उतरनेकी परिस्थितिमें भेद होनेके

२२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ कारण; नातिचिरेण=जीव उन आकाश, वायु आदिके रूपमे अधिक कालतक न रहकर क्रमशः नीचे उतर आते है। व्याख्या-ऊपरके लोकमे जानेका जो वर्णन है, वह कर्मोंके फलभोगसे सम्बन्ध रखता है, इसलिये बीचमें आये हुए पितृलोक आदिमें विलम्ब होना भी सम्भव है, परन्तु लौटते समय कर्मभोग तो समाप्त हो जाते हैं, इसलिये बीचमें कहीं विलम्ब होनेका कोई कारण नहीं रहता । इस प्रकार ऊपरके लोकोंमें जाने और वहाँसे लौटनेकी गतिमे विशेषता होनेके कारण यही सिद्ध होता है कि लौटते समय रास्तेमे विलम्ब नहीं होता । सम्बन्ध-अब यह जिज्ञासा होती है कि परलोकसे लौटनेवाले उस जीवात्मा- का जो धान, जौ, तिल और उड़द आदिके रूपमें होना कहा गया है, उसका क्या भाव है ? क्या वह स्वयं वैसा बन जाता है या उस योनिको भोगनेवाला जीवात्मा कोई दूसरा होता है, जिसके साथमें यह भी रहता है, इसपर कहते हैं— अन्याधिष्ठितेषु पूर्ववदभिलापात् ॥ ३ । १ । २४ ॥ पूर्ववत्=पहलेकी भाँति ही; अभिलापात्=यह कथन है, इसलिये; अन्याधिष्ठितेषु=दूसरे जीवात्मा अपने कर्मफलभोगके लिये जिनमे स्थित हो रहे हैं, ऐसे धान, जौ आदिमें केवल सन्निधिमात्रसे इसका निवास है । व्याख्या-जिस प्रकार पूर्वसूत्रमे यह बात कही गयी है कि वह लौटनेवाला जीवात्मा आकाश आदि नहीं बनता, उनके सदृश होकर ही उनसे संयुक्त होता है, उसी प्रकार यहाँ धान आदिके विषयमे भी समझना चाहिये; क्योकि यह कथन भी पहलेके सदृश ही है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि उन धान, जौ आदिमे अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये जो दूसरे जीव पहलेसे ही स्थित हैं, उनसे संयुक्त होकर ही यह चन्द्रलोकमे लौटनेवाला जीवात्मा उनके साथ-साथ पुरुषके उदरमे चला जाता है; धान, जौ आदि स्थावर-योनियोंको प्राप्त नहीं होता। सम्बन्ध-इसपर शङ्का उपस्थित करके ग्रन्थकार उसका निराकरण करते हैं - अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ॥ ३ । १ । २५ ॥ चेत्=यदि कहा जाय कि; अशुद्धम्=यह तो अशुद्ध ( पाप ) कर्म होगा; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; शब्दात्=श्रुतिके वचनसे इसकी निर्दोषता सिद्ध होती है। व्याख्या-यदि यह शङ्का की जाय कि अनाजके प्रत्येक दानेमें जीव रहता

सूत्र २४-२७ ] अध्याय ३ २२५

सूत्र २४-२७ ] अध्याय ३ २२५ है, इस मान्यताके अनुसार अन्नको पीसना, पकाना और खाना तो बडा अशुद्ध ( पाप ) कर्म होगा, क्योकि उसमें तो अनेक जीवोकी हिंसा करनेपर एक जीवकी उदरपूर्ति होगी' तो ऐसी बात नहीं है; क्योकि इस प्रकरणमे पुरुषको 'अग्नि' बताकर उसमे अन्नका हवन करना बताया है तथा श्रुतिमे जगह-जगह अन्नके खाये जानेका वर्णन है ( छा० उ० ६ । ६ । २)। अतः श्रुतिका विधान होनेके कारण उसमे हिंसा नहीं होती तथा उन जीवोकी उस कालमे सुषुप्ति-अवस्था रहती है, जब वे पृथिवी और जलके सम्बन्धसे अङ्कुरित होते हैं, तब उनमे चेतना आती है और सुख-दुःखका ज्ञान होता है, पहले नहीं। अतः अन्नभक्षणमे हिंसा नहीं है। सम्बन्ध-अन्नसे सयुक्त होनेके बाद वह किस प्रकार कर्मफल-भोगके लिये शरीर धारण करता है, उसका क्रम बतलाते हैं--- रेतःसिग्योगोऽथ ॥ ३ । १ । २६ ॥ अथ=उसके बाद; रेतःसिग्योगः = वीर्यका सेचन करनेवाले पुरुषके साथ उसका सम्बन्ध होता है। व्याख्या-उसके अनन्तर वह जीवात्मा अन्नके साथ पुरुषके पेटमे जाकर उसके वीर्यमे प्रविष्ट हो उस पुरुषसे संयुक्त होता है, इस कथनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि आकाश आदिसे लेकर अन्नतक सभी जगह केवल संयोगसे ही उसका तदाकार होना कहा गया है; स्वरूपसे नहीं। सम्बन्ध-उसके बाद- योनेः शरीरम् ॥ ३ । १ । २७ ॥ योनेः=स्त्रीकी योनिमे प्रविष्ट होनेके अनन्तर; शरीरम् = वह जीवात्मा कर्म- फलभोगके अनुरूप शरीरको प्राप्त होता है। व्याख्या-इस प्रकार वह खर्गसे आनेवाला जीवात्मा पहले पुरुषके वीर्यके आश्रित होता है। फिर उस पुरुषद्वारा गर्भाधानके समय स्त्रीकी योनिमें वीर्यके साथ प्रविष्ट करा दिया जाता है। वहाँ गर्भाशयसे सम्बद्ध होकर उक्त जीव अपने कर्मफलोके अनुरूप शरीरको प्राप्त होता है। यहींसे उसके कर्मोंके फलका भोग आरम्भ होता है। इसके पहले खर्गसे उतरकर वीर्यमे प्रविष्ट होनेतक उसका कोई जन्म या शरीर धारण करना नहीं है, केवल उन-उन आकाश आदिके आश्रित रहनामात्र कहा गया है; उन धान आदि शरीरोंके अधिष्ठाता जीव दूसरे ही हैं। पहला पाद सम्पूर्ण । वे० द० १५-

दूसरा पाद पहले पादमें देहान्तरप्राप्तिके प्रसङ्गमें पञ्चाग्निविद्याके प्रकरणपर विचार करते हुए जीवको बारंबार प्राप्त होनेवाले जन्म-मृत्युरूप दुःखका वर्णन किया गया। इस वर्णनका गूढ़ अभिप्राय यही है कि जीवके मनमें सांसारिक पदार्थों तथा अपने नश्वर शरीरके प्रति आसक्ति कम हो और निरन्तर वैराग्यकी भावना बढ़े। अब, दूसरे पादमें वर्तमान शरीरकी भिन्न-भिन्न अवस्थाओंपर विचार करके इस जन्म- मरणरूप संसार-बन्धनसे छूटनेके लिये परमेश्वरका ध्यानरूप उपाय बताना है; अतएव पहले स्वप्नावस्थापर विचार आरम्भ करते हुए दो सूत्रोंमें पूर्वपक्षकी उत्थापना की जाती है— सन्ध्ये सृष्टिराह हि ॥ ३ । २ । १ ॥ सन्ध्ये=स्वप्नमे भी जाग्रत्की भाँति; सृष्टि:=सांसारिक पदार्थोंकी रचना होती है; हि=क्योंकि; आह=श्रुति ऐसा वर्णन करती है। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे यह वर्णन आया है कि 'स्वप्नावस्थामे यह जीवात्मा इस लोक और परलोक दोनोंको देखता है, वहाँ दुःख और आनन्द दोनोंका उपभोग करता है, इस स्थूल शरीरको स्वयं अचेत करके वासनामय नये शरीरकी रचना करके, (बृह० उ० ४ । ३ । ९) जगत्को देखता है। 'उस अवस्थामे सचमुच न होते हुए भी रथ, रथको ले जानेवाले वाहन और उसके मार्गकी तथा आनन्द, मोद, प्रमोदकी एवं कुण्ड, सरोवर और नदियोंकी रचना कर लेता है।' (बृह० उ० ४ । ३ । १०)* इत्यादि । इसी प्रकार दूसरी श्रुतियोमे भी स्वप्नमें सृष्टिका होना कहा है (प्र० उ० ४ । ५; बृह० उ० २ । १ । १८)। इसलिये यह सिद्ध होता है कि स्वप्नमें भी सांसारिक पदार्थोंकी रचना होती है और वह अत्यन्त विचित्र तथा जीवकृत है। निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च ॥ ३ । २ । २ ॥ च=तथा; एके=एक शाखावाले; निर्मातारम्=पुरुषको कामनाओंका

  • 'न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते न तत्रानन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते······वेशान्तान् पुष्करिणीः स्रवन्तीः सृजते।'

सूत्र १—३ ] अध्याय ३ २२७

सूत्र १—३ ] अध्याय ३ २२७ निर्माता भी मानते हैं; च=और (उनके मतमे); पुत्रादयः=पुत्र आदि ही 'काम' अथवा कामनाके विषय हैं। व्याख्या—कठोपनिषद्मे वर्णन आया है कि 'य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं , कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।' (२।२।८) 'यह नाना प्रकारके भोगोंकी रचना करनेवाला पुरुष अन्य सबके सो जानेपर स्वयं जागता रहता है।' इससे पुरुषको कामनाओंका निर्माता कहा है। क० उ० (१।१।२३-२४)के अनुसार पुत्र-पौत्र आदि ही 'काम' अथवा कामनाके विषय हैं। इससे भी यही सिद्ध होता है कि स्वप्नमे सृष्टि है। सम्बन्ध—इस प्रकार पूर्वपक्षीके द्वारा स्वप्नकी सृष्टिको सत्य सिद्ध करने- की चेष्टा की गयी तथा उसे जीवकर्तृक बताया गया। अब सिद्धान्तीकी ओरसे उसका उत्तर दिया जाता है— मायामात्रं तु कात्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात् ॥ ३।२।३॥ तु=किन्तु; कात्स्न्येन=पूर्णरूपसे; अनभिव्यक्तस्वरूपत्वात्=उसके स्वरूपकी अभिव्यक्ति (उपलब्धि) न होनेके कारण; मायामात्रम्=वह माया- मात्र है। व्याख्या—स्वप्नकी सृष्टिका वर्णन करते हुए श्रुतिने यह बात तो पहले ही स्पष्ट कर दी है कि जीवात्मा वहाँ जिन-जिन वस्तुओकी रचना करता है, वे वास्तवमें नहीं है। इसके सिवा, यह देखा भी जाता है कि स्वप्नमे सब वस्तुएँ पूर्णरूपसे देखनेमें नहीं आतीं; जो कुछ देखा जाता है, वह अनियमित और अधूरा ही देखा जाता है। प्रश्नोपनिषद्मे तो स्पष्ट ही कहा है कि 'जाग्रद्- अवस्थामें सुनी हुई, देखी हुई और अनुभव की हुई वस्तुओको स्वप्नमे देखता है, किन्तु विचित्र ढंगसे देखता है। देखी-सुनी हुईको और न देखी- सुनी हुईको भी देखता है तथा अनुभव की हुईको और न अनुभव की हुईको- भी देखता है। इन सब कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि स्वप्नकी सृष्टि वास्तविक नहीं, जीवको कर्मफलका भोग करानेके लिये भगवान् अपनी योगमायासे उसके कर्म-संस्कारोंकी वासनाके अनुसार वैसे दृश्य देखनेमे उसे लगा देते हैं, अतः वह स्वप्न-सृष्टि तो मायामात्र है, जाग्रत्की भाँति सच्ची नहीं है। यही कारण है कि.उस अवस्थामे किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका फल जीवात्माको नहीं

२२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ भोगना पड़ता। तथा पूर्वपक्षीने जो यह बात कही थी कि किसी-किसी शाखा- वाले लोग पुरुषको पुत्र-पौत्रादि काम्य-विषयोंकी रचना करनेवाला बताते हैं, वह ठीक नहीं है; क्योंकि वहाँ स्वप्नावस्थाका प्रकरण नहीं है और उस मन्त्रमें जीवात्माको काम्य-विषयोंका निर्माता नहीं कहा गया है, वहाँ यह विशेषण परमात्माके लिये आया है। सम्बन्ध—इससे तो यह सिद्ध होता है कि स्वप्न सर्वथा व्यर्थ है, उसकी कोई सार्थकता नहीं है, इसपर कहते हैं— सूचकश्च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ॥ ३ । २ । ४ ॥ सूचकः = स्वप्न भविष्यमें होनेवाले शुभाशुभ परिणामका सूचक; च = भी होता है; हि = क्योंकि; श्रुतेः = श्रुतिसे यह सिद्ध होता है; च = और; तद्विदः = स्वप्नविषयक शास्त्रको जाननेवाले भी; आचक्षते = ऐसी बात कहते हैं। व्याख्या—श्रुति (छा० उ० ५ । २ । ९) मे कहा है— यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने ॥ 'जब काम्य कर्मोंके प्रसङ्गमें स्वप्नोंके दृश्योंमें स्त्रीको देखे तो ऐसे स्वप्न देखनेका परिणाम यह समझना चाहिये कि उस किये जानेवाले काम्यकर्ममें भलीभाँति अभ्युदय होनेवाला है।' तथा यह भी कहा है कि 'यदि स्वप्नमे काले दाँतवाले काले पुरुषको देखे तो वह मृत्युका सूचक है।' (ऐतरेय आरण्यक ३ । २ । ४ । १७) इत्यादि, श्रुतिके प्रमाणोंसे यह सिद्ध होता है कि स्वप्न सर्वथा व्यर्थ नहीं है, वह वर्तमानके आगामी परिणामका सूचक भी होता है। इसके सिवा, जो स्वप्नविज्ञानको जाननेवाले विद्वान् हैं, वे भी इसी प्रकार स्वप्नमे देखे हुए दृश्योंको भविष्यमें होनेवाली शुभाशुभ घटनाओंके सूचक बताते हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि स्वप्नकी घटना जीवात्माकी स्वतन्त्र रचना नहीं है, वह तो निमित्तमात्र है; वास्तवमें सब कुछ जीवके कर्मानुसार उस परमेश्वरकी शक्तिसे ही होता है। सम्बन्ध—जीवात्मा भी तो ईश्वरका ही अंश है, अतः इसमें ईश्वरके ज्ञान और ऐश्वर्य आदि गुण भी आंशिक रूपसे होंगे ही। फिर यदि ऐसा मान लें कि स्वप्नकी सृष्टि जीवात्मा स्वयं करता है तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं—

सूत्र ४—६ ] अध्याय ३ २२९

सूत्र ४—६ ] अध्याय ३ २२९ पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ॥ ३ । २ । ५ ॥ ( जीवात्मामे भी ईश्वरके समान गुण है ) तु=किन्तु; तिरोहितम्=छिपे हुए ( आवृत्त ) है; पराभिध्यानात्=( अतः ) परब्रह्म परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे ( वे प्रकट हों जाते है ); हि=क्योकि; ततः=उस परमात्माके सकाशसे ही; अस्य=इसके; बन्धविपर्ययौ=बन्धन और उसके विपरीत अर्थात् मोक्ष है । व्याख्या—जीवात्मा ईश्वरका अंश है, इसलिये यह भी ईश्वरके सदृश गुणों- वाला है, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है; परन्तु इसके वे सब गुण तिरोहित है— छिपे हुए हैं; इस कारण उनका उपयोग नहीं देखा जाता । उस परब्रह्म परमेश्वरका निरन्तर ध्यान करनेसे जीवके वे छिपे हुए गुण पुनः प्रकट हो सकते हैं ( श्वे० उ० १ । ११ ) । परमेश्वरकी आराधनाके बिना अपने-आप उनका प्रकट होना सम्भव नहीं है, क्योकि इस जीवका अनादिसिद्ध बन्धन और उससे मुक्त होना उस जगत्कर्ता परमेश्वरके ही अधीन है ( श्वे० उ० ६ । १६ ) । इसलिये वह स्वयं स्वप्नकी सृष्टि आदि कुछ नहीं कर सकता ।* सम्बन्ध—इस जीवात्माके जो वास्तविक ईश्वरसम्बन्धी गुण हैं, वे क्यों छिपे हुए हैं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— देहयोगाद्वा सोऽपि ॥ ३ । २ । ६ ॥ सः=वह तिरोभाव; अपि=भी; देहयोगात्=शरीरके सम्बन्धसे; वा= ही है । व्याख्या—इस जीवात्मामे उस परब्रह्म परमात्माके स्वाभाविक गुण विद्यमान रहते हुए भी जो उन गुणोंका तिरोभाव हो रहा है, वे गुण प्रकट नहीं हो रहे हैं तथा यह जीवात्मा जो उन सब गुणोंसे सर्वथा अनभिज्ञ है, इसका मुख्य कारण जीवात्माका शरीरके साथ एकताको प्राप्त हो जाना ही है । यही इसका बन्धन है और यह अनादिकालसे है । इसीके कारण जन्म-जन्मान्तरोंके कर्म-

  • साधकको चाहिये कि इस रहस्यको समझकर उस परमदयालु, सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरके आश्रित होकर निरन्तर उसका भजन-ध्यान करे और इस बन्धनसे छुटकारा पानेके लिये भगवान्से प्रार्थना करे । इस जगत्रूप नाटकका सूत्रधार परमेश्वर जिसको उस प्रपञ्चसे अलग करना चाहे, वही इससे अलग हो सकता है ।

२३० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ संस्कारोसे परवश हुआ यह जीव नाना योनियोमे जन्म लेता और मरता है तथा भाँति-भाँतिके दुःखोंका उपभोग कर रहा है । सम्बन्ध—यहाँतक स्वप्नावस्थापर विचार किया गया, उसमें प्रसङ्गवश जीवात्माके बन्धन और उससे छूटनेके उपायका भी संक्षेपमें वर्णन हुआ । अब जीवात्माकी सुषुप्ति-अवस्थापर विचार करनेके लिये अगला प्रसङ्ग आरम्भ किया जाता है । प्रायः यह कहा जाता है कि सुषुप्ति-अवस्थामें जीवात्माका ब्रह्मसे संयोग होता है, इससे यह भ्रान्त धारणा हो सकती है कि सुषुप्ति भी समाधिके सदृश कोई सुखप्रद अवस्था है । अतः इस भ्रमका निवारण करनेके लिये कहते हैं— तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि च ॥ ३ । २ । ७ ॥ तदभावः=(सुषुप्ति-अवस्थामे ) उस स्वप्नदृश्यका अभाव हो जाता है ( उस समय जीवात्मा ); नाडीषु=नाडियोमे (.स्थित हो जाता है ); तच्छ्रुतेः=क्योकि वैसा ही श्रुतिका कथन है; च=तथा; आत्मनि=आत्मामे भी ( उसकी स्थिति बतायी गयी है ) । व्याख्या—पूर्व सूत्रोमे जो स्वप्नावस्थाका वर्णन किया गया है, उसका उपभोग करते समय यह जीवात्मा कभी तो स्वप्नसे जग जाता है और कभी फिर स्वप्नमे स्थित हो जाता है, पुनः जगता और फिर स्वप्नावस्थामें चला जाता है ( बृह० उ०-४ । ३ । १० से १८ तक ) । इस प्रकार स्वप्नगत मानसिक सुख-दुःखोंका उपभोग करते-करते कभी सुषुप्ति-अवस्था हो जानेपर स्वप्नके दृश्योका अभाव हो जाता है । इससे यह सिद्ध होता है कि वे मायामात्र हैं; क्योंकि बाह्यजगत्का अभाव नहीं होता, उसका कार्य ज्यो-का-त्यो चलता रहता है तथा जीवात्मा- का शरीर भी सुरक्षित रहता है, इसलिये उसका सत् होना सिद्ध होता है । उस समय जीवात्माको इस प्रपञ्चके उपभोगसे विश्राम मिलता है तथा शरीर और इन्द्रियोंकी थकावट दूर होती है । वह अवस्था आनेपर जीवात्माकी स्थिति कैसी और कहाँ रहती है, इस विषयमें श्रुति कहती है—'जब यह सुषुप्ति-अवस्थाको प्राप्त होता है, तब कुछ भी नहीं जानता; इसके शरीरमे जो बहत्तर हजार हिता नामकी नाडियाँ हृदयसे निकलकर समस्त शरीरमे व्याप्त हो रही है, उनमे फैलकर यह समस्त शरीरमें व्याप्त हुआ शयन करता है।' ( बृह०उ० २ । १ । १९ ) दूसरी श्रुतिमे

सूत्र ७ ] अध्याय ३ २३१

सूत्र ७ ] अध्याय ३ २३१ ऐसा भी कहा गया है कि 'जब यह शयन करता हुआ किसी तरहका स्वप्न नहीं देखता, सब प्रकारसे सुखी होकर नाड़ियोंमें व्याप्त हो जाता है, उस समय इसे कोई पाप स्पर्श नहीं कर सकते।' (छा० उ० ८। ६। ३) । भाव यह है कि उस समय अज्ञातमें इसके शरीरकी क्रियाद्वारा किसी जीवकी हिंसादि पापकर्म हो जाय तो वह नहीं लगता। तथा कहीं ऐसा भी कहा है कि 'हे सौम्य ! उस सुषुप्तिके समय यह पुरुष सत्‌से सम्पन्न होता है' (छा० उ० ६। ८। १) एक स्थान- पर ऐसा वर्णन आता है कि 'उस समय परमात्माके स्पर्शको प्राप्त हुआ यह जीवात्मा न तो बाहरकी किसी वस्तुको जानता है और न शरीरके भीतरकी ही किसी वस्तुको जान पाता है' (बृह० उ० ४। ३ । २१)। इन सब वर्णनोंसे यही मालूम होता है कि नाड़ियोंका मूल और इस जीवात्मा तथा परब्रह्म परमात्माका निवासस्थान हृदय है, उसी जगह सुषुप्तिमें जीवात्मा शयन करता है; इसलिये उसकी स्थिति हृदयस्थ नाड़ियोंमें और परमात्मामें भी बतायी जा सकती है । इसमें कोई विरोध नहीं है । स्थानकी एकताके कारण ही कहीं उसको ब्रह्मकी प्राप्ति, कहीं प्रलयकी भाँति परमात्माके साथ संयुक्त होना आदि कहा गया है; परन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिये कि यह भी 'समाधिकी भाँति मुक्तिमें सहायक है । यह तो महान् तामसी सुखका उपभोग करानेवाली अज्ञानमयी स्थिति है (गीता १८ । ३९) । अतः शरीररक्षाके लिये कम-से-कम आवश्यक समयतक ही शयन करना चाहिये, श्रेष्ठ सुखकी बुद्धिसे नहीं। प्रश्नोपनिषद्‌में स्पष्ट ही यह वर्णन है कि 'वह मन जब तेजसे अर्थात् उदानवायुसे दब जाता है—उदान-वायु इन्द्रियोंसहित मनको हृदयमें ले जाकर मोहित कर देता है, तब इसकी सुषुप्ति-अवस्था होती है, उस समय यह स्वप्नको नहीं देखता। इस शरीरमें जीवात्माको यह सुषुप्तिजनित सुख होता है' (प्र० उ० ४। ६)। इस विषयमें दूसरी श्रुतिमें जो यह बात कही है कि 'उस समय तेजसे सम्पन्न होता है।' (छा० उ० ८। ६ । ३) वहाँ भी तेजका अर्थ उदान- वायु ही समझना चाहिये, ब्रह्म नहीं; क्योंकि प्रश्नोपनिषद्‌में तीसरे प्रश्नका उत्तर देते हुए नवें और दसवें मन्त्रमें स्पष्ट ही उदानवायुकी और तेजकी एकता की गयी है । अतः ऐसा माननेसे ही वहाँ किये हुए वर्णनके साथ छान्दोग्यश्रुतिकी एकवाक्यता सिद्ध होगी।

२३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध—सुषुप्तिकालमें जो परमात्माके साथ हृदयदेशमें जीवात्माकी स्थिति बतायी गयी है, उसीकी पुष्टि करते हैं— अतः प्रबोधोऽस्मात् ॥ ३ । २ । ८ ॥ अतः = इसलिये; अस्मात् = यहाँसे; प्रबोधः = जीवात्माका जगना ( श्रुतिमे कहा गया है ) । व्याख्या—जो वस्तु जिसमें विलीन होती है, वह वहींसे प्रकट भी होती है । इस न्यायसे जीवात्मा सुषुप्तिका अन्त होनेपर जब जगता है, तब यहाँसे अर्थात् परमात्माके निवास-स्थान हृदयसे ही जाग्रत् होता है, इसलिये उसके लय होनेका स्थान भी वही है, यह अपने-आप सिद्ध हो जाता है। यह जगना उस परमात्माकी ही व्यवस्थासे होता है। जितने समयतक उसके प्रारब्धानुसार सुषुप्तिका सुखभोग होना चाहिये, उतना समय पूरा हो जानेपर उस परमेश्वरकी व्यवस्थासे जीवात्मा जाग्रत् हो जाता है; यह भाव भी यहाँ समझ लेना चाहिये । सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जो जीवात्मा सुषुप्ति-अवस्थामें विलीन होता है, वही जगकर वापस आता है या शरीरके किसी अङ्गमें पड़ा हुआ दूसरा ही कोई जीव जगता है ? इसपर कहते हैं— स एव तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ॥ ३ । २ । ९ ॥ तु = निस्संदेह; स एव = वही जगता है; कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः = क्योंकि कर्म, अनुस्मृति, वेदप्रमाण और कर्म करनेकी आज्ञा इन सबकी सिद्धि तभी होगी, इसलिये यही मानना ठीक है। व्याख्या—जो जीवात्मा सोता है, वही जागता है। सोता दूसरा है और जगता दूसरा है, ऐसा माननेमे बहुत दोष आते हैं। अतः वैसा नहीं माना जा सकता; क्योंकि यह देखा जाता है कि मनुष्य पहले दिन जिस कर्मको आरम्भ करता है, उसके शेष भागकी पूर्ति दूसरे-तीसरे दिनोंतक करता रहता है। आधा काम दूसरेने किया हो और शेष आधे कामको अपना ही छोड़ा हुआ समझकर उसकी पूर्ति दूसरा करे यह सम्भव नहीं है। तथा जगनेके बाद पहलेकी सब बातोंकी स्मृतिके साथ- साथ यह भी स्मरण अपने-आप होता ही है कि जो अबतक सोता था, वही मैं अब जगा हूँ। दूसरे जीवात्माकी कल्पना करनेसे किसी प्रकार भी इसकी सङ्गति नहीं हो

सूत्र ८—१० ] अध्याय ३ २३३

सूत्र ८—१० ] अध्याय ३ २३३ सकती; एवं श्रुतिमे भी जगह-जगह जो सोता है, उसीके जगनेकी बात कही गयी है ( बृह० उ० ४ । ३ । १६ )। और कर्म करनेकी जो वेदोंमे आज्ञा दी गयी है, उसकी सफलता भी जो सोता है, उसीके जगनेसे होगी; क्योकि एकको दी हुई आज्ञाका दूसरा कैसे पालन कर सकेगा। इन सब कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि जो जीवात्मा सुषुप्तिकालमे विलीन होता है, वही जगता है। सम्बन्ध—जब मनुष्य किसी औषध आदिसे मूर्च्छित कर दिया जाता है अथवा अन्य किन्हीं बीमारी आदि कारणोंसे अचेत हो जाता है, उस समय भी न तो बाहरी जगत्‌का ज्ञान रहता है, न स्वप्न देखता है और न सुखका ही अनुभव करता है, वह कौन-सी अवस्था है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— मुग्धेऽर्द्धसम्पत्तिः परिशेषात् ॥ ३ । २ । १० ॥ मुग्धे=मूर्च्छाकालमे; अर्द्धसम्पत्तिः=अधूरी सुषुप्ति-अवस्था माननी चाहिये; परिशेषात्=क्योकि अन्य कोई अवस्था शेष नहीं है। व्याख्या—जन्मके बाद मरनेसे पहले जीवकी पूर्वोक्त तीन अवस्थाएँ ही प्रसिद्ध हैं। किसी विशेष कारणसे कभी-कभी हो जानेवाली यह मुग्धावस्था सबकी और सदैव नहीं होती, अतः इसके लक्षण कुछ-कुछ सुषुप्तिमे ही सङ्गत हो सकते हैं। इसलिये इसे अधूरी सुषुप्ति मानना ही उचित है; क्योकि उस अवस्थामे सुषुप्तिका सुखलाभ नहीं होता, केवल अज्ञानमात्रमे ही सुषुप्तिसे इसकी समता है; अतः इसे पूर्णतया सुषुप्ति भी नहीं कहा जा सकता। सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणसे जीवात्माकी जाग्रत् आदि अवस्थाओंका निरूपण किया गया। उसमें प्रसङ्गवश यह बात भी कही गयी कि उस परब्रह्म परमेश्वरका निरन्तर चिन्तन करनेपर यह जीव कर्मबन्धनसे मुक्त हो सकता है। जिसके ध्यानका यह महान् फल बताया गया है, उस परब्रह्म परमात्माका क्या स्वरूप है ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण प्रारम्भ किया जाता है। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि श्रुतियोंमें कहीं तो उस परमेश्वरको सर्वथा निर्विशेष निर्गुण बताया गया है ( क० उ० १ । ३ । १५, मा० उ० ७ )। कहीं उसको सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी, सर्वसाक्षी तथा समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयका कारण कहा गया है ( मा० उ० ६ )। कहीं उसे सर्वव्यापी और कहीं अङ्गुष्ठमात्र बताया गया है। कहीं क्रियाशील और

प्रकरणमें नाना प्रकारके दिव्य गुणोंसे युक्त भी बताया है (श्वे० उ० ३ । १९)

२३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ कहीं अक्रिय कहा गया है; अतः उसका वास्तविक स्वरूप क्या है ? तथा हृदय आदि जिन-जिन स्थानोंमें परमात्माकी स्थिति बतायी गयी है। उनके दोषोंसे वह लिप्त होता है या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि॥ ३ । २ । ११ ॥ स्थानतः=स्थानके सम्बन्धसे; अपि=भी; परस्य=परब्रह्म परमात्माका; न= किसी प्रकारके दोषसे संसर्ग नहीं होता; हि=क्योंकि; सर्वत्र=सभी वेदवाक्योंमें उस ब्रह्मको; उभयलिङ्गम्=दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त अर्थात् सब प्रकारके दोषोंसे रहित निर्विशेष तथा समस्त दिव्य गुणोंसे सम्पन्न बताया गया है। व्याख्या—कठोपनिषद्मे कहा है कि 'अणोरणीयान् महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्' (क० उ० १ । २ । २०) इस जीवात्माके हृदयरूप गुहामे रहनेवाला परमात्मा छोटे-से-छोटा तथा बड़े-से-बड़ा है। 'वह ब्रह्म बैठा हुआ ही दूर चला जाता है, सोता हुआ ही सब ओर चला जाता है।' (क० उ० १ । २ । २१) 'वह जीवात्माके साथ उसकी हृदयगुहामे स्थित है' (क० उ० १ । ३ । १), 'वह सब धर्मोंसे रहित है।' (क० उ० १ । ३ । १५) 'भूत और भविष्यका शासक है।' (क० उ० २ । १ । १२-१३) 'उस परब्रह्ममें नाना भेद नहीं है।' (क० उ० २ । १ । ११) 'उसके भयसे अग्नि आदि देवता अपने-अपने कार्योंमें संलग्न रहते हैं।' (क० उ० २ । ३ । ३) इसी प्रकार अन्य श्रुतियोंमें भी जहाँ इसको निर्विशेष कहा है, उसी प्रकरणमें नाना प्रकारके दिव्य गुणोंसे युक्त भी बताया है (श्वे० उ० ३ । १९) तथा जो इसके दिव्य गुण बताये गये हैं, वे जीव और प्रकृति—इन दोनोंसे विलक्षण हैं। अतः यह भी नहीं कहा जा सकता कि ये दिव्य गुण जीवात्माके या जड प्रकृतिके हैं अथवा उपाधिके कारण उस परब्रह्ममें इनका आरोप किया गया है, क्योंकि परब्रह्म परमात्मा उपाधिसे रहित है। अतः यही सिद्ध होता है कि वह परमात्मा स्वभावसे ही दोनों प्रकारके लक्षणवाला है अर्थात् वह सब प्रकारके दोषोंसे रहित निर्विशेष तथा समस्त दिव्य गुणोंसे सम्पन्न है, इसलिये सर्वत्र व्याप्त और समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित रहकर भी वह परमात्मा उन-उन वस्तुओं और स्थानोंके दोषोंसे लिप्त नहीं होता। उसमे परस्परविरोधी लक्षण एक साथ रह सकते हैं; क्योकि वह सर्वशक्तिमान् और सांसारिक पदार्थोंसे सर्वथा विलक्षण है। लौकिक वस्तुओंके साथ तुलना करके उसका स्वरूप

सूत्र ११—१२ ] अध्याय ३ २३५

सूत्र ११—१२ ] अध्याय ३ २३५ समझाया नहीं जा सकता; क्योकि वह मन, वाणीका विषय नहीं है। अतः वेदने उसको दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त बताकर उसकी अपार महिमाको लक्ष्य कराया है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे शङ्का उपस्थित करके उसका निराकरण करते हुए पूर्वोक्त बातको दृढ़ करते हैं— न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात् ॥ ३ । २ । १२ ॥ चेत्=यदि कहो कि; भेदात्=सगुण (अपरब्रह्म या कार्यब्रह्म) और निर्गुण (परब्रह्म) ये ब्रह्मके पृथक्-पृथक् दो स्वरूप माने गये हैं, इसलिये; (वह एक ही परमात्मा दोनो लक्षणोंवाला) न=नहीं हो सकता; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; प्रत्येकम् अतद्वचनात्=क्योंकि प्रत्येक श्रुतिमे इसके विपरीत एक परब्रह्म परमेश्वरको ही दोनो प्रकारके लक्षणोवाला बताया गया है। व्याख्या—यदि कहा जाय कि 'जहाँ परमात्माको सब श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न बताया गया है, वहाँ मायाविशिष्ट कार्यब्रह्म या अपरब्रह्मका वर्णन है तथा जहाँ उसके निर्विशेष स्वरूपका प्रतिपादन हुआ है, वही परब्रह्मका वर्णन है, इस प्रकार दोनोका पृथक्-पृथक् वर्णन होनेके कारण दोनो एक नहीं है तथा उस परब्रह्म परमात्माको उभयलिङ्गवाला मानना ठीक नहीं है।' तो ऐसी बात नहीं है; क्योकि अन्तर्यामि-ब्राह्मणमे पृथिवीसे लेकर जीवात्मापर्यन्त सबका अन्तर्यामी और अमृत एक ही परब्रह्म परमात्माको बताया गया है (बृह० उ० ३। ७। ३ से २२ तक) तथा माण्डूक्योपनिषद्में भी एक ही परब्रह्म परमात्माका वर्णन करते हुए उसे समस्त दिव्य गुणोंसे सम्पन्न (मा० उ० ६) और सर्वथा निर्विशेष (मा० उ० ७) कहा गया है।* श्वेताश्वतरोपनिषद् (३। १, २) में उस एक ही ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसे सूर्यके समान स्वयंप्रकाश और मायासे सर्वथा अतीत बताया गया है, फिर 'उससे श्रेष्ठ, महान् तथा सूक्ष्म दूसरा कोई नहीं है' ऐसा कहकर उसे सर्वत्र परिपूर्ण बताया है (श्वे० उ० ३। ८, ९)। आगे चलकर उसीको आकार और दोषोंसे रहित कहा है (श्वे० उ० ३। १०)। फिर उसके सभी जगह मुख, सिर आदि अङ्ग बताये गये है (श्वे० उ० ३। ११) तथा उसे सबपर शासन करनेवाला, महान्, सबका प्रेरक, ज्ञानस्वरूप और निर्मल बताया है (श्वे० उ० ३। १२)। तदनन्तर उस परमेश्वर- को जगत्स्वरूप, सब जगह हाथ, पैर आदि अङ्गोवाला, सब इन्द्रियोसे युक्त

  • ये दोनो मन्त्र पृष्ठ २ और ३ की टिप्पणीमे आ गये हैं।

२३६ वेदान्त-दर्शन [.पाद २ और समस्त इन्द्रियोंसे रहित, सबका स्वामी, शासक और आश्रय बताया है।' (३ । १५-१७) । इस प्रकार वहाँ प्रत्येक श्रुति-वाक्यमे एक परब्रह्म परमेश्वरको दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त कहा गया है। उससे भिन्न अपर (कार्य) ब्रह्मका वहाँ वर्णन नहीं है; इसलिये पर और अपर ब्रह्म भिन्न-भिन्न है—यह कहना ठीक नहीं है। अतएव यही सिद्ध हुआ कि वह परब्रह्म परमात्मा ही निर्गुण-निराकार है और वही सगुण-साकार भी है। इन दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त होना उसका स्वभाव ही है; किसी उपाधिके कारण या कार्य- कारण-भेदसे नहीं। सम्बन्ध—दूसरी श्रुतिके प्रमाणसे पुनः उसके एकत्वको दृढ़ करते हैं— अपि चैवमेके ॥ ३ । २ । १३ ॥ अपि च=इसके सिवा; एके=किसी एकशाखावाले (विशेषरूपसे); एवम्= इस बातका प्रतिपादन करते हैं। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्मे उस परब्रह्म परमेश्वरको सत्य,'ज्ञान और अनन्त बतलाकर उसीसे समस्त जगत्की उत्पत्ति बतायी है (तै०उ० २। १) तथा यह भी कहा है कि 'उसने स्वयं अपने-आपको ही इस रूपमे बनाया है' तथा उसको रसरूप और सबको आनन्दयुक्त करनेवाला कहा है। फिर उसके निर्विशेष लक्षणोंका वर्णन करके उस परमात्मामे स्थिति लाभ करनेवाले साधकका निर्भय पदमे स्थित होना कहा है (तै० उ० २ । ७)। उसके बाद उसकी स्तुति करते हुए कहा है किं 'इसीके भयसे वायु चलता है, इसीके भयसे सूर्य उदय होता है, इसीके भयसे अग्नि और इन्द्र तथा पाँचवाँ मृत्यु अपने-अपने कार्यमे प्रवृत्त होते हैं।' (तै० उ० २ । ८) इस प्रकार तैत्तिरीय शाखाके मन्त्रोद्वारा भी उस एक ही परमात्माके दोनो प्रकारके लक्षणोका कथन होनेसे भी एक ही परमेश्वरका निर्गुण और सगुण रूप होना सिद्ध होता है। सम्बन्ध—पुनः उसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा कारण प्रस्तुत करते हैं— अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ॥ ३ । २ । १४ ॥ हि=क्योंकि; अरूपवत्=रूपरहित निर्विशेष लक्षणोकी भाँति; एव=ही, तत्प्रधानत्वात्=उन सगुण स्वरूपके लक्षणोकी भी प्रधानता है, इसलिये (यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म दोनो लक्षणोवाला है)।

सूत्र १३-१६ ] अध्याय ३ २३७

सूत्र १३-१६ ] अध्याय ३ २३७ व्याख्या-जिस प्रकार उस परब्रह्म परमात्माको निर्गुण-निराकार बतानेवाले वेदवाक्य मुख्य हैं, ठीक उसी प्रकार उसे सगुण साकार, सर्वदिव्यगुणसम्पन्न बतानेवाले वेदवाक्य भी प्रधान हैं; उनमेंसे किसी एकको मुख्य और दूसरेको गौण नहीं कहा जा सकता; क्योंकि एक ही प्रकरणमें और एक ही मन्त्रमें एक परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसे दोनों लक्षणोंवाला बताया गया है ( श्वे० उ० ६ । ११ ) अतएव रूपरहित निर्विशेष लक्षणोंकी भाँति ही सगुण साकाररूपकी भी प्रधानता ज्ञात होती है यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर दोनों लक्षणोंवाला है । सम्बन्ध-अब दूसरे दृष्टान्तसे उसी बातको सिद्ध करते हैं- प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात् ॥ ३ । २ । १५ ॥ च=तथा; प्रकाशवत्=प्रकाशकी भाँति; अवैयर्थ्यात्=दोनोंमेंसे कोई भी लक्षण या उसके प्रतिपादक वेदवाक्य व्यर्थ नहीं हैं, इसलिये ( यही सिद्ध होता है कि परमात्मा दोनों लक्षणोंवाला है ) । व्याख्या-जिस प्रकार अग्नि और बिजली आदिके दो रूप होते हैं- एक प्रकट और दूसरा अप्रकट-उन दोनोंमेंसे कोई भी व्यर्थ नहीं है, दोनों ही सार्थक हैं, उसी प्रकार उस ब्रह्मके भी दोनों रूप सार्थक हैं, व्यर्थ नहीं हैं; क्योंकि ऐसा माननेसे ही उसकी उपासना आदिकी सार्थकता होगी, दोनोंमेंसे किसी एक- को प्रधान और दूसरेको गौण या अनावश्यक मान लेंगे तो उसकी सार्थकता नहीं होगी । श्रुतिमें उसके दोनों लक्षणोंका वर्णन है; श्रुतिके वचन कभी व्यर्थ नहीं हो सकते; क्योंकि वे स्वतः प्रमाण हैं, अतः उन वेदवाक्योंकी सार्थकताके लिये भी ब्रह्मको सविशेष और निर्विशेष दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त मानना ही उचित है । सम्बन्ध-अब श्रुतिमें प्रतीत होनेवाले विरोधका दो सूत्रोंद्वारा समाधान किया जाता है-- आह च तन्मात्रम् ॥ ३ । २ । १६ ॥ तन्मात्रम्=( श्रुति उस परमात्माको ) केवल सत्य; ज्ञान और अनन्तमात्र; च=ही; आह=बताती है, वहाँ सगुणवाचक शब्दोंका प्रयोग नहीं है । व्याख्या-ऐसी शङ्का भी नहीं करनी चाहिये कि तैत्तिरीय-श्रुतिमें 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' ( तै० उ० २ । १ ) अर्थात् 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है'-

२३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ इस प्रकार ब्रह्मको केवल ज्ञानस्वरूप ही बताया है, सत्यसङ्कल्पत्व आदि गुणोंवाला नहीं बताया, अतः उसको दोनों लक्षणोंवाला नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—क्योंकि— दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ॥ ३ । २ । १७ ॥ अथो=उक्त कथनके अनन्तर; दर्शयति=श्रुति उसीको अनेक रूपवाला भी दिखाती है; च=इसके सिवा; स्मर्यते अपि=स्मृतिमें भी उसके सगुण खरूपका वर्णन आया है। व्याख्या—पूर्वोक्त 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्' इस मन्त्रमे आगे चलकर उस परमात्माको सबके हृदयमे निहित बताया है और उसीसे समस्त जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया है (तै० उ० २ । १); फिर उसे रस-स्वरूप, सबको आनन्द देनेवाला (२ । ७) और सबका संचालक (२ । ८) कहा है। इसलिये उस श्रुतिको केवल निर्गुणपरक मानना उचित नहीं है। इसी प्रकार स्मृतिमें भी जगह-जगह उस परब्रह्मके स्वरूपका वर्णन दोनो प्रकारसे उपलब्ध होता है। जैसे—'जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकमहेश्वर जानता है, वह मनुष्योमे ज्ञानी है और सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।'* (गीता १० । ३) 'मुझे सब यज्ञ और तपोका भोक्ता, सम्पूर्ण लोकोका महान् ईश्वर, समस्त प्राणियोका सुहृद् जानकर मनुष्य शान्तिको प्राप्त होता है।'† (गीता ५ । २९) 'ऐसे सगुण रूपवाला मैं केवल अनन्य भक्तिके द्वारा देखा जा सकता हूँ, तत्त्वसे जाननेमे आ सकता हूँ और मुझमें प्रवेश भी किया जा सकता है।'‡ (गीता ११ । ५४) । श्रीमद्भगवद्गीताके पंद्रहवें अध्यायमें क्षर और अक्षरका लक्षण बताकर यह स्पष्ट रूपसे कहा गया है कि 'उत्तम पुरुष इन दोनोंसे भिन्न है, जो कि परमात्मा नामसे कहा जाता है, जो तीनो लोकोंमे प्रविष्ट होकर सबको धारण करता है

  • यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ † भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ ‡ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥

सूत्र १७-१८] अध्याय ३ २३९

सूत्र १७-१८] अध्याय ३ २३९ तथा जो सबका ईश्वर एवं अविनाशी है ।'* ( १५ । १७ ) इस प्रकार परब्रह्म पुरुषोत्तमके सगुण स्वरूपका वर्णन करके अन्तमे यह भी कहा है कि 'जो मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह सब कुछ जाननेवाला है ।'† ( १५ । १९ ) । इस प्रकारके बहुत-से वचन स्मृतियोंमें पाये जाते हैं, जिनमे भगवान्के सगुण रूपका वर्णन है और उसे वास्तविक बताया गया है। इसी तरह श्रुतियो और स्मृतियोंमे परमेश्वरके निर्गुण-निर्विशेष रूपका भी वर्णन पाया जाता है ‡ और वह भी सत्य है; इसलिये यही सिद्ध होता है कि ब्रह्म दोनो प्रकारके लक्षणोंवाला है । सम्बन्ध—उस परब्रह्म परमेश्वरका सगुणरूप उपाधि-भेदसे नहीं, किन्तु स्वाभाविक है, इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा प्रमाण देते हैं— अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ॥ ३ । २ । १८ ॥ च=और; अत एव=इसीलिये अर्थात् उस परमेश्वरका उभय रूप स्वाभाविक हैं, यह सिद्ध करनेके लिये ही; सूर्यकादिवत्=सूर्य आदिके प्रतिबिम्बकी भाँति; उपमा=उपमा दी गयी है । व्याख्या—'सब भूतोका आत्मा परब्रह्म परमेश्वर एक है, तथापि वह भिन्न- भिन्न प्राणियोमे स्थित है. अतः जलमे प्रतिबिम्बित चन्द्रमाकी भाँति एक और अनेक रूपसे भी दीखता है ।'§ ( ब्रह्मविन्दु उ० १२ ) इस दृष्टान्तसे यह बात दिखायी गयी है कि वह सर्वान्तर्यामी परमेश्वर सगुण और निर्गुण-भेदसे अलग- अलग नहीं, किन्तु एक ही है; तथापि प्रत्येक जीवात्मामे अलग-अलग दिखायी दे रहा है। यहाँ चन्द्रमाके प्रतिबिम्बका दृष्टान्त देकर यह भाव दिखाया गया है कि जैसे सूर्य और चन्द्रमा आदिमें जो प्रकाश गुण है, वह स्वाभाविक है, उपाधिसे नहीं है; उसी प्रकार परमात्मामे भी सत्यसङ्कल्पत्व, सर्वज्ञत्व

  • उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ † यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद् ............ ॥ ‡ देखिये कठोपनिषद् १ । ३ । १५, मुण्डक० १ । १ । ६ तथा माण्डूक्य० ७ । § एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥