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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

अनुक्रम अनुशीलन १-१५ कृतज्ञता ज्ञापन १७-१८ चन्दायण—परिचय १-६७ कवि १ काव्य १० रचनाकाल २१ उपलब्ध प्रतियां २४ ग्रन्थका आकार २५ लिपि २७ पाठोद्धार और पाठनिर्धारण २८ प्रति परम्परा पाठ-सम्बन्ध और संगुद्ध पाठ ३० भाषा ३१ छन्द-योजना ३६ रचना व्यवस्था ३९ कथावस्तु ४१ कथा सम्बन्धी भ्रान्त धारणाएँ ५१ कथा-स्वरूपकी विशेषता ५५ आधार भूत लोक-कथा ५७ अभिप्राय और रूढ़ियाँ ५८ वर्णनाधिक्यता ६० गुणों-दोषोंका अभाव ६१ पात्र-चित्रण ६४ परवर्ती साहित्यपर प्रभाव ६६ चन्दायण—मूल काव्य लगायन-विधि ७१ पदपार सूची ७२ काव्य ८३

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स्व० श्री मोतीचन्द जी हीरावत की पुण्य स्मृति में सादर भेंट. अनुशीलन हिन्दी साहित्य का इतिहास प्रस्तुत करनेका कार्य फ्रेंच विद्वान गार्साँ द तासी और अँगरेज विद्वान ग्रियर्सनने आरम्भ किया और उसका स्वरूप रामचन्द्र शुक्ल ने अपने हिन्दी साहित्यका इतिहास द्वारा स्थिर किया। किन्तु इन तीनों ही विद्वानों की पुस्तकों में मौलाना दाऊद अथवा उनकी कृति चन्दायतका कोई उल्लेख नहीं है। स्पष्ट है रामचन्द्र शुक्लके समयतक उनके सम्बन्धमें कोई जानकारी उपलब्ध न थी। मौलाना दाऊदका परिचय सर्व प्रथम १९२८ ई (वि सं १९७) में मिश्रबन्धुने अपने मिश्रबन्धु-विनोद द्वारा दिया। उन्होंने अपने ग्रन्थके आदि प्रकरणमें बताया कि मुल्ला दाऊद अमीर खुसरोका समकालीन था। उसका कविता काल संवत् १३८५ के लगभग था। इसने नूरक और चन्दाकी प्रेम कथा हिन्दीमें रची। यह ग्रन्थ हमारे देखनेमें नहीं आया।१ मिश्रबन्धुकी इस सूचनाका आधार क्या था, यह उन्होंने नहीं बताया। सात वर्ष पश्चात् हरिऔधका हिन्दी भाषा और उसके साहित्यका विकास प्रकाशित हुआ। उसमें दाऊदके सम्बन्धमें ये पंक्तियाँ हैं—अमीर खुसरोका समकालीन एक और मुल्ला दाऊद नामक ब्रजभाषाका कवि हुआ। कहा जाता है कि उसने नूरक एवं चन्दाकी प्रेमकथा नामक दो हिन्दी पद्य ग्रन्थोंकी रचना की। किन्तु ये दोनों ग्रन्थ अप्राप्यसे हैं। इसलिए इनकी रचनाकी भाषाके विषयमें कुछ लिखना असम्भव है। मिश्रबन्धुकी तरह ही हरिऔधने भी अपनी सूचनाका आधार नहीं दिया है। उस समय जान पड़ता है हिन्दीमें सन्दर्भ देनेकी परिपाटी नहीं थी। जो भी हो उनके शब्दोंसे यह स्पष्ट झलकत्ता है कि मिश्रबन्धु के अतिरिक्त उनकी जानकारीका कोई अन्य साधन नहीं था। उन्होंने मिश्रबन्धुसे भिन्न दो नयी बातें अवश्य कहीं—(१) दाऊदने नूरक और चन्दा नामक दो ग्रन्थोंकी रचना की। (२) वे ब्रजभाषाके कवि थे। किन्तु ये दोनों ही बातें उनकी कल्पना प्रसूत हैं यह तनिक ध्यान देनेसे ही स्पष्ट हो जाता है। दाऊदके ब्रजभाषा के कवि होनेकी बातका खण्डन उनकी अपनी ही पंक्तियोंसे हो जाता है। वे उन्हें 'ब्रज भाषाका कवि' कहते हैं; फिर उनके हिन्दी पद्य ग्रन्थोंकी बात करते हैं और अन्तमें १. मिश्रबन्धु विनोद, प्रथम भाग सं १९७१ पृ २४० । २. हिन्दी भाषा और उसके साहित्यका विकास पटना, द्वितीय संस्करण, सं १९९७ पृ २४७ ।

यह भी कहते हैं कि उसकी भाषाके विषयमें कुछ लिखना असम्भव है। कारण यह कि उन्हें दाऊदकी भाषाके सम्बन्धमें कोई जानकारी न थी। दो ग्रन्थोंकी कल्पनाका आधार तो स्पष्ट ही है। उसके सम्बन्धमें कुछ कहना अपेक्षित नहीं। १९३६ ई में हिन्दीका पहला शोध निबन्ध पीताम्बरदत्त बड़थ्वालकृत 'द निर्गुण स्कूल ऑफ हिन्दी पोएट्री' प्रकाशित हुआ। उन्होंने दाऊदकी चर्चा इन शब्दोंमें की—सबसे पुराना ज्ञात प्रेमाख्यानक कवि मुल्ला दाऊद मालूम होता है। जो अलाउद्दीनके राज्यकाल वि० सं० १४९७ (१४३९ ई०) के आसपास विद्यमान था। परन्तु मुल्ला दाऊद भी आदि प्रेमाख्यानक कवि था या नहीं कह नहीं सकते। उसकी नूरक-चन्दाकी कहानीका हमें नाम ही मालूम है।' आधुनिक पद्धतिसे शोध-निबन्ध प्रस्तुत करते हुए भी बड़थ्वाल ने पुरानी परिपाटीका ही अनुसरण किया और कोई सन्दर्भ नहीं दिया जिससे उनके कथनका सूत्र जाना जा सके। उनके कथनमें मिश्रबन्धु से इतनी ही भिन्नता है कि उन्होंने दाऊदका अस्तित्व अलाउद्दीन खिलजीके समयमें बताया और उनका समय वि सं १४९७ दिया। देखनेमें यह बात नयी और महत्वपूर्ण जान पड़ती है क्योंकि इसके अनुसार दाऊदका समय मिश्रबन्धुओंके बताये समयसे सौ बरससे अधिक पीछे ठहरता है। किन्तु ध्यानसे देखनेपर बड़थ्वालके इस कथनका ऐतिहासिक विरोध स्पष्ट झलक उठता है। वि सं १४९७ (१४३९ ई ) में अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली- के तख्तपर न विराज कर स्वर्गके दरबारमें हाजिरी दे रहा था। उस समय दिल्लीमें सैयदवंशीय सुल्तान मुबारिकशाह (द्वितीय)का शासन था। इस तिथिके अनुसार दाऊद आदि प्रेमाख्यानक कवि नहीं ठहरते। कुतबनकी मिरगावती इस तिथिसे पहलेकी रचना है। यह जानकारी रामचन्द्र शुक्ल बहुत पहले दे चुके थे। यह बात बड़थ्वालको ज्ञात न रही हो यह बुद्धिग्राह्य नहीं है। अतः अधिक सम्भावना इस बातकी है कि बड़थ्वाल ने अपने मूल निबन्ध में दाऊदके लिए अलाउद्दीनकी सम सामयिक ही कोई तिथि (वि सं १३५४-१३७४ अर्थात् १२९६-१३१६१ के बीच) दी होगी। हो सकता है कि किसीके प्रमादसे प्रकाशित ग्रन्थ में १३९७ ई में वि सं १४९७ का रूप दे दिया हो। तथ्य जो हो तिथिका किसी प्रकार समाधान कर लेने पर भी प्रश्न उठता है कि बड़थ्वालको दाऊद और अलाउद्दीनकी समसामयिकताका ज्ञान कैसे हुआ। इसका भी उत्तर कठिन नहीं है। अलाउद्दीन और अमीर खुसरोकी समसामयिकता प्रसिद्ध ही है। अतः बथ्वालने मिश्रबन्धुके तथ्यपर प्रहार कर अपनी शोध-बुद्धिका उपयोग किया और खुसरोकी जगह अलाउद्दीनका नाम लेकर मिश्रबन्धुकी बातको नया रूपमें कह दिया। बड़थ्वालके शोध निबन्धके पश्चात् १९३८ ई में रामकुमार वर्माका शोध निबन्ध 'हिन्दी साहित्यका आलोचनात्मक इतिहास' प्रकाशमें आया। राम हिन्दी काव्यमें निर्गुण सम्प्रदाय सं २ क, पृष्टक्र, १ ०-११ ।

कुमार वर्मांने अपने मूल निबन्धमे दाऊदके सम्बन्धमें क्या लिखा था, यह तो हमारे सामने नहीं है, किन्तु उसके प्रकाशित रूपका जो दूसरा संस्करण उपलब्ध है, उसमें कहा गया है कि खुसरोका नाम जब समस्त उत्तरी भारतमें एक महान् कविके रूपमें फैल रहा था, उसी समय मुल्ला दाऊदका नाम भी हिन्दी साहित्यके इतिहासमें आता है । मुल्ला दाऊदकी एक प्रेम कहानी प्रसिद्ध है, उसका नाम है चन्दायन या चम्पावत । यह ग्रन्थ अभीतक अप्राप्य है और इसके सम्बन्धमें कुछ भी प्रमाणित रूपसे ज्ञात नहीं है ।¹ साथ ही उन्होंने दाऊदको अलाउद्दीन खिलजीका समकालीन मानते हुए उनका कविता-काल वि सं० १३७५ (१३१७ ई ) ठहराया । अपने पूर्ववर्तियोंके समान ही रामकुमार वर्मांने भी अपनी सूचनाका सूत्र बतानेकी आवश्यकता नहीं समझी । पर देखनेसे लगता है कि उन्होंने मिश्रबन्धु और बर्वेवालके कथनको ही जोड़कर अपने शब्दोंमे रख दिया है । उनकी यह सूचना अवश्य नयी है कि दाऊदकी पुस्तकका नाम चन्दायण या चम्पावत था । किन्तु प्रमाणाभावमें यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उनके पास मिश्रबन्धु और बथेंवालके कथनके अतिरिक्त अपना कोई निजी सूत्र भी था । हो सकता है, यह बात पीछे ज्ञात तथ्योंके आधारपर प्रस्तुत संस्करणमें जोड दी गयी हो । मूल सूत्रोंके अभावमें इन विद्वानोंके कथनका शोधकी दृष्टिसे कोई महत्त्व नहीं है । दाऊदके सम्बन्ध में साधार कुछ कहनेका प्रयत्न पहली बार ब्रजरत्नदासने १९४० ई (वि सं १९९८) में किया । उन्होंने अपनी पुस्तक खड़ी बोली हिन्दी साहित्यका इतिहासमें मुग़लकालके सुप्रसिद्ध इतिहासकार अब्दुलक़ादिर बदा- यूनी कृत मुन्तखब उत्-तवारीखमें उल्लिखित इस तथ्यकी ओर ध्यान आकृष्ट किया कि दाऊदके चन्दायन की रचना फ़ीरोज शाह तुगलक (१३५१-१३८८ ई )के शासन कालमें हुई थी। बदायूनीका कथन इस प्रकार है :—सन् ७७२ (हिजरी) (१३७० ई०)में वजीर खानजहाँकी मृत्यु हुई और उनका जौनाशाह नामक पुत्र उसी पद पर प्रसिद्ध हुआ और उसी के नाम से मौलाना दाऊदने चन्दायन (चन्धावन) को, जो हिन्दवी भाषाका एक मसनवी है, जिसमें लोरक (नूरक) और चन्दा नामक प्रेमी-प्रेमिकाका वर्णन है और वास्तविक अनुभवसे परिपूर्ण हैं पद्यबद्ध किया। इस देशमें अत्यंत प्रसिद्ध होनेके कारण उसकी (चन्दायन) प्रशंसा अपेक्षित नहीं है। दिल्लीमें मखदूम शेख तक़ीउद्दीन वायज रब्बानी इसके कुछ सार्थक पद्य मेंबर (व्यास पीठ) से पढ़ा करते थे और उनके सुननेका लोगोंपर विशेष प्रभाव पड़ता था। उस समयके कुछ विद्वानोंने शेखसे पूछा कि इस हिन्दवी मसनवी के अपनाने का कारण क्या है तो उन्होंने उत्तर दिया कि यह लोक (सृष्टि)के समस्त तत्त्वों तथा अर्थोंसे युक्त है तथा प्रेम और भक्ति के जिज्ञासु लोगोंके उपयुक्त है। (उसमें) कुरानके १ हिन्दी साहित्यका आलोचनात्मक इतिहास, प्रयाग, द्वितीय संस्करण १९५४ ई पृ १२१। २ खड़ी बोली हिन्दी साहित्यका इतिहास काशी, सं १९९८ पृ १४-१५।

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उन्होंने अपने सूत्रसे ज्ञात ईस्वी सन् को विक्रमी संवत् मान लिया । इस विक्रम संवत्‌के साथ खुसरोकी कल्पना सहज ही है । रामकुमार वर्मा की तिथि १३७५ भी वस्तुतः विक्रमी संवत् न होकर ईस्वी सन् ही है । ईस्वी सन्‌के रूपमें मिश्रबन्धुकी तिथि १३८५ और रामकुमार वर्माकी तिथि १३७५, दोनों ही फीरोज़शाह तुगलकके समय और जौनाशाहके मन्त्रित्वकालमें पड़ते हैं । फिर भी जैसा कि हम आगे देखेंगे, ये दोनों ही तिथियाँ वास्तविक रचना तिथिसे थोड़ी भिन्न हैं । दाऊद फीरोज़शाह तुगलकके समय हुए थे, यह तथ्य गुप्तदासबके माध्यमसे ब्रजरत्नदास द्वारा प्रकाशनमें लाये जानेके पूर्व भी कुछ लोगोंको ज्ञात था । उत्तर प्रदेशके प्रादेशिक गजेटियरोंके प्रणेताओने इस बातका स्पष्ट उल्लेख किया है किन्तु हमारे अनुसन्धित्सुओंका ध्यान उस ओर जा ही नहीं सका । रायबरेली जिलेके गजेटियरमें डलमऊनगरके इतिहासके प्रसंगमें कहा गया है कि अल्तमशके शासन- कालमें इस नगर (डलमऊ) ने समृद्धि प्राप्त की । उसके समयमें यहाँ मखदूम बदरुद्दीन रहा करते थे । तत्पश्चात् फीरोज़शाह तुगलकके समय तक उन्नति पर था । उसने जनतामें मुस्लिम सिद्धांतोंके प्रसारके नियमित यहाँ एक विद्यालय स्थापित किया था । इस विद्यालयकी उपयोगिताका अनुमान डलमऊ निवासी मुल्ला दाऊद द्वारा सम्पादित 'चन्दैनी' नामक भाषा पुस्तकको देखकर किया जा सकता है ।१ अवधके प्रादेशिक गजेटियरम भी यही बात इन शब्दोंमें कही गयी है—फीरोज़शाह तुगलकने यहाँ (डलमऊ) मुसलिम धर्म और विद्याके अध्ययनके लिए एक विद्यालयकी स्थापना की । इसकी उपयोगिता इस बातसे प्रकट है कि डलमऊके मुल्ला दाऊद नामक कवि ने ७७९ हिजरीमें भाषामें 'चन्दैनी' नामक ग्रन्थका सम्पादन किया ।२ १९४४ ई में श्यामसुन्दरदासके हिन्दी साहित्य का तृतीय परिवर्द्धित संस्करण प्रकाशित हुआ । उसमें उन्होंने दाऊद और चन्दायनकी चर्चा संक्षेपमें की है; पर उसमें कोई उल्लेखनीय सूचना नहीं है । सं २ ० (१९५१ ई )में परशुराम चतुर्वेदीने सूफ़ी प्रेम-काव्योंके अवतरणोंका संग्रह सूफी-काव्य-संग्रहके नामसे प्रस्तुत किया । इसमें दाऊदके सम्बन्धमें कुछ पंक्तियाँ हैं जो अपने आपमें मनोरंजक हैं । उन्होंने लिखा—इस रचनाका सर्वप्रथम उल्लेख हि० सम् ७७२ (सं० १४२७) में अर्थात् फिरोज शाह तुगलकके शासनकाल (संवत १४०८ १४४५) में हुआ है । डाक्टर रामकुमार वर्मांने दाऊदको अलाउद्दीन खिलजी (राज्यकाल सं० १३५२ १३७३) का समकालीन समझा है और उनकी कविता काल सं० १३७५ ठहराया है, जो अनुचित नहीं कहा जा सकता । जान पड़ता है कि मुल्ला दाऊद इस प्रकार अमीर खुसरोका भी समकालीन था । मुल्ला दाऊदके सम्बन्धमें यह पता नहीं चलता कि उसका हिन्दवी रूप क्या १ डिस्ट्रिक्ट गजेटियर आव द यूनाइटेड प्राविन्सेज भाग ३९, रायबरेली पृ १९१ । २ गजेटियर आव द प्राविन्स आव अवध भाग १,पृ ३५५ ।

ध्यान वासुदेवशरण अग्रवाल का गया। उन दिनों वे मलिक मुहम्मद जायसी के पदमावत की संजीवनी व्याख्या प्रस्तुत करने में लगे थे। रामपुर के रजा पुस्तकालय में फारसी लिपि में अंकित पद्मावत की जो प्रति है, उसके प्रथम पृष्ठ पर उन्हें चन्दायण शीर्षक के साथ उक्त ग्रन्थ की चार पंक्तियाँ अंकित मिलीं। इन पंक्तियों को उन्होंने पहले एक लेख में फिर अपनी पदमावत की भूमिका में उद्धृत किया।¹ उन दिनों मैं वासुदेवशरण अग्रवाल के निकट सम्पर्क में था तथा काशी विश्वविद्यालय के भारत कला भवन में सहायक संग्रहाध्यक्ष के पद पर काम कर रहा था। अतः चन्दायण का इस प्रकार परिचय मिलने पर मेरा ध्यान तत्काल भारत कला भवन में संग्रहीत अपभ्रंश शैली के उन ६ चित्रों की ओर गया जिनकी पीठ पर फारसी लिपि में आलेख हैं। ये चित्र बीस-पचीस वर्ष पूर्व राय कृष्णदास को काशी के गुदड़ी बाजार में मिले थे। उनकी कलापारखी दृष्टि से उसका महत्व छिपा न रह सका और वे उन्हें कदाचित दो-दो आने में खरीद लाये थे। कला के इतिहास की दृष्टि से इन चित्रों का अत्यधिक महत्व है। ये भारतीय कला से सम्बन्ध रखने वाले अनेक ग्रन्थों में प्रकाशित हो चुके हैं और उनकी अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति है। राय कृष्णदास ने पृष्ठांकित आलेखों को पढ़कर इतना तो अनुमान कर लिया था कि ये किसी अवधी काव्य के पृष्ठ हैं पर किस काव्य के पृष्ठ हैं इसका उन्हें कोई अनुमान न हो सका था। फलतः कला-पुस्तकों में सर्वत्र इन चित्रों की चर्चा अज्ञात अवधी काव्य के पृष्ठों के रूप में ही हुई है। मैंने इन चित्रों के आलेखों की परीक्षा की और उन आलेखों में जहाँ-तहाँ लोरक (काव्य के नायक) और चन्दा (काव्य की नायिका) का नाम पाकर मुझे इस बात में तनिक भी सन्देह न रहा कि ये पृष्ठ चन्दायण के ही हैं। मेरे इस खोज के परिणाम स्वरूप कला-क्षेत्र में यह बात स्वीकार कर ली गयी कि ये चित्र लोरक-चन्दा की कथा के हैं।² कला के क्षेत्र में चन्दायण की जानकारी इससे भी पहले थी। पंजाब संग्रहालय में २४ चित्रों की एक माला थी जो अब पाकिस्तान और भारत के बीच बँट गयी है। (१४ चित्र लाहौर संग्रहालय में रह गये और १० चित्र भारत को मिले जो अब पटियाला स्थित पंजाब राजकीय संग्रहालय में हैं।) इन चित्रों के पीछे भी फारसी लिपि में आलेख हैं। उन आलेखों से उस संग्रहालय के संग्रहाध्यक्ष ने यह जान लिया था कि ये लौर और चन्दा नामक प्रेमी-प्रेमिका से सम्बन्ध रखने वाले किसी काव्य ग्रन्थ के पृष्ठ हैं। उन्होंने लाहौर संग्रहालय के चित्रों की सूची प्रकाशित की उसमें इन चित्रों का परिचय इसी रूप में दिया है। इन चित्रों की विस्तृत विवेचना कार्ल खण्डालावाला ने बम्बई की सुप्रसिद्ध कला पत्रिका मार्ग में की है। वहाँ उन्होंने इन चित्रों को लौर-चन्दा


१. भारतीय साहित्य (आगरा) वर्ष २ अंक १ पृ. १३४ पदमावत संजीवनी व्याख्या द्वितीय (झाँसी) १९५६ ई. पृ. ११। २. रूपिन कला, दिल्ली अंक १, पृ. ७० पा. टि. ३। ४. डेकन आर्ट एण्ड पेन्टिंग्स इन द सेन्ट्रल म्यूजियम लाहौर, चित्र सं. ०-३ ।

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لوح اول (بالائی جدول / Top Chart)

قضاء لوزدان ارضا سرابراز برورده آلتنجى كوز بر دنده بات محمد البصره نك يرى محمد ابراهیم اوغلى احمد اوغلى احمد بك احمد اریلو اویس ایلیك طام سعاری دائرنده كنج اوغزى دائرى كرويارك دائرى يداورنجى طامصار يوسفان كولی يكلجه سينانك كوزی اكمكهم جهاد ليقنده در


لوح ثانی (زیریں جدول / Bottom Chart)

در بیان سرحدات بككمز محله اسمعيلك كولى جبراك ولد بكيك طامساری مولود سونحات قارا حمزه نك يرنده ابو بكر بنك محلى مومن بن سلمان او در سطير وكيل يا ريمجه كولجه نور بر حاجي صالحك يرنده و آلبك ولدنك حصه سي

था और उसमें किन छन्दोंका प्रयोग हुआ था।१ मुन्तखब के ग्रन्थके प्रकाश- में आ जानेके बाद दाऊदके समयके सम्बन्धमें जो मिथ्या धारणाएँ फैली थीं उनका निराकरण हो जाना चाहिए था। पर परशुराम चतुर्वेदीने उसका विचित्र अर्थ लगा कर एक नया भ्रम प्रस्तुत कर दिया। कदाचित् उन्होंने मिश्रबन्धु और रामकुमार वर्माके कथनके साथ मुन्तखबके कथनका सम्बन्ध करनेका प्रयत्न किया। १९५१ ई. में कमल कुलश्रेष्ठका शोध निबन्ध हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्य प्रकाशित हुआ। इस ग्रन्थमें उन्होंने पूर्व ज्ञात उपर्युक्त अधिकांश सूचनाओं को जो उन्हें उपलब्ध हो सकीं एकत्र कर बदायूनीके कथनपर बल देते हुए मत प्रकट किया कि चन्दायत का रचनाकाल वि० सं० १४७७ के निकट था। किन्तु इस ग्रन्थमें दी गयी महत्वकी सूचना यह है कि चन्दायत की कोई प्रामाणिक प्रति अभी- तक नहीं मिल सकी। एक अप्रमाणित-सी प्रति डा० धीरेन्द्र वर्मा ने अवश्य देखी है। परन्तु उसे वे कुछ कारणोंसे विशेष ध्यानपूर्वक नहीं देख सके और इस काव्यके सम्बन्धमें कुछ निश्चयपूर्वक बतलानेमें असमर्थ हैं।२ पाद टिप्पणीमें इस सम्बन्धमें कुछ अतिरिक्त सूचना भी है जो इस प्रकार है—बीकानेरके श्री पुरुषोत्तम शर्माके पास इस ग्रन्थकी एक प्रति है। शर्माजीने यह पोथी एक सज्जन द्वारा प्रयाग भेजी थी, परन्तु उन्होंने पोथीकी परीक्षा अच्छी तरह धीरेन्द्र वर्माको नहीं करने दी।३ कुलश्रेष्ठकी इस पादटिप्पणीके अतिरिक्त अन्य सूत्रसे भी इस प्रतिके सम्बन्धमें हमें जो जानकारी प्राप्त हुई है उससे भी ज्ञात होता है कि धीरेन्द्र वर्मा ने उसकी प्रामाणिकतामें सन्देह प्रकट किया था। धीरेन्द्र वर्मा ने इस प्रतिको चाहे जिस भी दृष्टिसे देखा हो चन्दायतकी किसी प्रकारकी प्रतिके अस्तित्वका ज्ञान भी अपने आपमें महत्वका था। परवर्ती अनुसन्धित्सुओंका ध्यान इस ओर जाना चाहिए था। खेद है किसीने इस ओर ध्यान नहीं दिया। १९५५ ई. में प्रेमाख्यानक काव्य और हिन्दी सूफी साहित्यसे सम्बन्ध रखनेवाले तीन ग्रन्थ प्रायः एक साथ ही प्रकाशित हुए। ये तीनों ही ग्रन्थ शोध-निबन्ध हैं जो विभिन्न विश्वविद्यालयोंके समक्ष पी एच०डी की उपाधिके निमित्त प्रस्तुत किये गये थे। ये हैं—हरिकान्त श्रीवास्तव कृत भारतीय प्रेमाख्यानक काव्य विमलकुमार जैन कृत सूफी मत और हिन्दी साहित्य और सरला शुक्ल कृत जायसीके परवर्ती हिन्दी सूफी कवि। विषयकी दृष्टिसे श्रीवास्तवके ग्रन्थका विस्तार सबसे अधिक है। उसमें दाऊदके ग्रन्थके सम्बन्धमें विशेष रूपसे और विस्तृत जानकारी की अपेक्षा की जाती है; किन्तु श्रीवास्तवकी जानकारी इस बाततक ही सीमित है कि सर्व प्रथम मुल्ला दाऊदकी नूरक चन्दा कहाणीके बाद कुतबनकी मृगावती मिली।४ १. वही काव्य संग्रह, प्रयाग, (द्वितीय संस्करण) सं. न. १३ पृ. ६१-६३। २. हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्य, आग्रा, १९५१ ई. पृ. ८। ३. वही, पृ. ८, पा० टि. १। ४. भारतीय प्रेमाख्यानक काव्य, काशी, १९५५ ई. पृ. २२।

सरला शुक्लके शोध-निबन्धकी परिधिमें दाऊद नहीं आते। यदि उन्होंने उनके सम्बन्धमें एक शब्द भी न लिखा होता तो कोई आश्चर्यकी बात न होती, पर आश्चर्य तो यह देखकर होता है कि दाऊदके लिए उन्होंने एक लम्बा पैराग्राफ व्यय किया है।¹ फिर भी उसमें पूर्वके शोधोंसे ज्ञात तथ्योंकी कोई चर्चा नहीं है। उनकी दृष्टिमें रामकुमार वर्माका कथन बदायूनीके कथनसे अधिक महत्त्व रखता है। शुक्लजीके कथनका उद्धृत करना उनको अनावश्यक महत्त्व देना होगा। विमल- कुमार जैनने अपने निबन्धमें सरला शुक्लकी तरह विस्तारमें न जाकर, दाऊदके लिए दो-तीन पंक्तियाँ पर्याप्त माना है और उनमें उन्होंने रामकुमार वर्माके कथनको दुहरा भर दिया है।² इन शोध-निबंधोंके प्रकाशनसे अनेक वर्ष पूर्व वि. सं. २ ० ० ६ (१९५०-५१) में अगरचंद नाहटाने नागरी प्रचारिणी पत्रिका में 'मिश्रबन्धु-विनोदकी भूलें' शीर्षक एक लेख प्रकाशित किया था जिसमें मिश्रबन्धु के दाऊद सम्बन्धी कथन की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए उन्होंने सूचना दी थी कि रावतमल सारस्वत को मूरक-चन्दाकी प्रेम कहानीकी एक प्रति मिली है और उस प्रतिके एक कड़वकके अनुसार चन्तायनकी रचना ७८१ हिजरीमें हुई थी।³ इस प्रकार १९५५ ई. से बहुत पूर्व, जब कि ये सभी निबन्ध शोधकी स्थितिमें भी न आये थे, बदायूनीका प्रामाणिक कथन एवं चन्तायनकी एक प्रतिका अस्तित्व प्रकाशमें आ चुका था। पर खेदजनक आश्चर्य है कि इन अनुसन्धित्सुओंमेंसे किसीने भी उनपर ध्यान देनेकी आवश्यकता अनुभव नहीं किया। १९५६ ई. में परशुराम चतुर्वेदीने जब अपनी दूसरी पुस्तक 'भारतीय प्रेमाख्यानकी परम्परा' प्रकाशित की तब उन्होंने संदिग्ध भावसे कहा कि राजस्थानमें एक उपलब्ध अधूरी प्रतिके अनुसार चन्तायनका रचना-काल सं० १४३६ होना चाहिये। इस प्रकार १९२८ ई. से लेकर १९५६ ई. तक सूफी साहित्य और प्रेमा- ख्यानक काव्योंको लेकर शोधका डिंडोरा तो खूब पिटा, पर हिन्दी साहित्यके विद्वानों और अनुसन्धित्सुओंकी जानकारी इस बाततक ही सीमित रही कि दाऊदन चन्तायन नामक कोई प्रेमाख्यानक काव्य लिखा था। उसकी एक प्रति उन्हें ज्ञात भी हुई तो उसकी ओर समुचित ध्यान ही नहीं दिया गया। लोग रामकुमार वर्माकी धुरी पर चक्कर काटते रहे। चन्तायनकी प्रतियोंकी खोजका वास्तविक काम ऐसे लोगोंने आरम्भ किया जिनका सम्बन्ध हिन्दी साहित्यसे कम पुरातत्त्व और इतिहास से अधिक है। यह कार्य उन्होंने १९५१-५३ ई. में ही आरम्भ कर दिया था। चन्तायनकी ओर सर्वप्रथम १. जायसीके परवर्ती हिन्दी सूफी कवि और काव्य, लखनऊ, सं० २०११ पृ. ११८। २. सूफीमत और हिन्दी साहित्य, दिल्ली, १९५५ ई., पृ. ११२। ३. नागरी प्रचारिणी पत्रिका, वर्ष ५४, सं. २, ३, पृ. ४२। ४. भारतीय प्रेमाख्यान की परम्परा, प्रयाग, १९५६ ई., पृ. ८८।

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लार्ड ब्रह्मा लार्ड सरस्वती / लार्ड रुद्र पड़-पड़ कपूर सोहाथा | होरा बारल खाता होरा बारल भरी | पड़-पड़ कपूर बांह हलाई आठ अर्ड ओर तेरी जामा चहार याद आरी गहरा वीर्य मार पूरी | करोड़ कला बलपूरी द्वारों के पाठार | भेद आनंद कला विकला बिया सतीन्द्रा राज तिजोरी ताले बच्चा राज राज तिजोरी थोर


स्वा दर सर मुसहफ़ दोम सुख रखिये | आन सिखा दिया सब्र याद आये | यक यक मुद्रा मौत सोधा | फ़ारज़ख़ी मर्ग दायर कढ़ छुरा दो बेला दिखला आरमुरजा अज़लानी ७ कुरान अक्ब्रिया मोरिया

फ़ारसी प्रति कड़वक ४०

मनाज़रीफ़ प्रति पद ३१६

पचास प्रति कड़वक २५७

सीरीज़का नाम दिया है।१ फलतः कला भवनवाले चित्र भी लौर चन्दा सीरीज़के दूसरे नमूनेके रूपमें स्वीकार किये गये। रामपुर, काशी और पंजाबकी इन तीन प्रतियोंके अतिरिक्त एक चौथी प्रति की जानकारी १९५३-५४ ई. में हुई। पटना कालेजके इतिहासके प्राध्यापक सैयद् हसन असकरी इतिहासके विद्वान होनेके अतिरिक्त उर्दू-हिन्दी साहित्यके प्रति भी रुचि रखते हैं और प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थोंकी खोज उनका व्यसन है। अपने इस व्यसनके परिणाम स्वरूप उन्हें अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थोंको प्रकाशमें लानेका श्रेय प्राप्त है। उस वर्ष मनेरशरीफके खानकाहके सज्जादनशीन और उनके भाई मौलवी मुरादुल्लम्के पुराने बस्तोंके बस्तोंको टटोलते हुए उन्हें चन्दायनके ६४ पृष्ठोंकी एक खण्डित प्रति मिली। वे उस समय केवल इतना ही जान सके कि वह हिन्दीका कोई अज्ञात ग्रन्थ है। संयोगसे वासुदेवशरण अग्रवाल उन्हीं दिनों पटना गये। असकरीने उन्हें वह ग्रन्थ दिखाया। तब सूक्ष्मरीक्षण करनेपर ज्ञात हुआ कि वे चन्दायके ही पृष्ठ हैं। तदनन्तर असकरीने इस प्रतिके सम्बन्धमें अंग्रेजी और उर्दूके पत्रोंमें कई लेख प्रकाशित किये।२ इस प्रतिके ज्ञात होनेके कारण ही चन्दायनकी एक अन्य प्रतिका पता चला। यह प्रति भी खण्डित है। इसमें भी ६४ पृष्ठ हैं; किन्तु इस प्रतिकी विशेषता यह है कि उसके पृष्ठ चित्रित हैं। काशी और पंजाबवाली प्रतियोंकी तरह ही इनके एक ओर चित्र और दूसरी ओर फारसी लिपिमें आलेख हैं। यह प्रति भोपालके एक मुस्लिम परिवारमें थी। उसके स्वामी चित्रोंके कारण उसे मूल्यवान तो समझते थे पर वे चित्र वस्तुतः क्या हैं, इसका उन्हें कुछ पता न था। १९५४ ई. में जब भारतीय पुरातत्त्व विभागके अरबी फारसी अभिलेखोंके विशेषज्ञ जियाउद्दीन अहमद देसाई भोपाल गये तो उन्हें यह चित्राधार दिखाया गया। देसाई उन्हीं दिनों पटना होकर आये थे और असकरीने उन्हें अपनी चन्दायनकी प्रति दिखायी थी। अतः उन्हें भोपालवाली प्रतिको उलटते-पुलटते हुए यह समझनेमें देर न लगी कि वह भी चन्दायनकी ही प्रति है। तब चन्दायनकी सचित्र प्रतिके रूपमें उसका महत्त्व बढ़ गया और उसे १९५५ ई. में बम्बईके प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियमने क्रय कर लिया। काशीवाले पृष्ठ मेरे शोधसे प्रकाशमें आये यह ऊपर कहा जा चुका है। भोपालवाली प्रति उस संग्रहालयमें है, जहाँ मैं काम करता हूँ। अतः इन दोनों ही प्रतियोंपर काम करनेका अधिकार मेरा था ही। मनेरशरीफ वाली प्रतिका विवरण असकरी पहले ही प्रकाशित कर चुके थे। उनकी प्रतिके उपयोग करनेमें कोई बाधा थी ही नहीं। फलतः इन प्रतियोंके आधारपर चन्दायनको प्रस्तुत करनेका कार्य मैंने आरम्भ किया। १. मार्ग बम्बई, भाग ४ अंक १ पृ. २४। २. करेंट स्टडीज पटना कालेज १९५५ ई. पृ. ९-१६ पटना युनवर्सिटी जर्नल १९५ ई. पृ. १६०। प्रवाहित पटना अप्रैल १९५ ई. अंक ११ पृ. ५४-५४।

१ बम्बई (भोपाल) वाले चन्दायण के पृष्ठों के पाठोद्धार (फारसी लिपि से नागरी लिपि में रूपान्तरित करने) का काम समाप्त कर उसके पाठ के स्वरूप का अन्तिम निश्चय कर ही रहा था कि माताप्रसाद गुप्त ने प्रयाग विश्वविद्यालय के माध्यम से और विश्वनाथ प्रसाद ने आगरा विश्वविद्यालय के हिन्दी विद्यापीठ के माध्यम से बम्बई वाली प्रति के फोटो-प्रिंट की माँग की। तब ज्ञात हुआ कि वे दोनों विद्वान भी संयुक्त रूप से अन्य दो प्रतियों के सहारे चन्दायण पर काम कर रहे हैं। चूँकि मैं बम्बई वाली प्रति पर काम कर रहा था नियमान्तः संग्रहालय से उन्हें उसके फोटो प्रिंट आदि नहीं दिये जा सकते थे। किन्तु यह मानकर कि वे लोग हिन्दी साहित्य के जाने माने विद्वान हैं मेरी अपेक्षा वे इस ग्रन्थ के साथ अधिक न्याय कर सकेंगे मैंने आगे कार्य करना स्थगित कर दिया और उनकी माँगों के अनुसार प्रयाग विश्वविद्यालय को चन्दायण के पृष्ठों के फोटो नेगेटिव और आगरा हिन्दी विद्यापीठ को फोटो प्रिंट भिजवा दिये गये। कुछ काल पश्चात् माताप्रसाद गुप्त ने संग्रहालय के डायरेक्टर मोतीचन्द्र को लिखा कि बम्बई वाली प्रति का मेरा तैयार किया हुआ पाठ भी उन्हें भेज दिया जाय। मैंने उसका कार्य स्थगित कर दिया था इस कारण उसके प्रति मेरा कोई मोह न था। मैंने अपने पाठ की एक टाइप की हुई प्रति उन्हें भेज दी। कुछ दिन पश्चात् असकरी का एक लेख देखने में आया जिसमें उन्होंने बम्बई वाली प्रति (जिसकी चर्चा उन्होंने भोपाल प्रति के रूप में किया है) की एक टाइप की हुई कापी उदयशंकर शास्त्री (आगरा हिन्दी विद्यापीठ के एक अधिकारी) द्वारा प्राप्त होने की बात कही थी और उसके कुछ उद्धरण भी दिये थे। १ असकरी ने जिस टाइप की हुई प्रति से देखा वह प्रति मेरी वाली प्रति थी अथवा विश्वनाथ प्रसाद और माताप्रसाद गुप्त की अपनी तैयार की हुई कोई स्वतन्त्र प्रति इसके निर्णय और विचार में जाने की आवश्यकता नहीं। कहना केवल इतना ही है कि संग्रहालय से किसी को जब किसी वस्तु की प्रतिलिपि या फोटो आदि दी जाती है तो उस व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उसपर स्वयं काम करेगा और उस सामग्री को अपने तक ही सीमित रखेगा और प्रकाशन से पूर्व संग्रहालय के अधिकारियों से समुचित अनुमति ले लेगा। पर यह सौजन्य वे लोग निभा न सके। इसी बीच ग्वालियर के हरिहर निवास द्विवेदी बम्बई आये। वे उन दिनों चन्दायण की कथा से सम्बन्ध रखने वाले एक अन्य काव्य ग्रन्थ मैंगासत पर काम कर रहे थे। दुराग्रह करके वे भी मेरे वाचन की एक प्रति ले गये। ले जाते समय उन्होंने बार-बार आश्वासन दिया था कि वे मेरे वाचन को अपने तक ही सीमित रखेंगे और उसे प्रकाशित न करेंगे और मेरी प्रति मुझे शीघ्र ही लौटा देंगे; किन्तु ग्वालियर जाते ही वे अपना वचन भूल गये! अपनी पुस्तक में उन्होंने मेरे वाचन को अनुचित ढंग से उद्धृत तो किया ही बार-बार तकाजा करने पर भी मेरी प्रति लौटाना तो दूर पत्रोत्तर देने का सौजन्य भी उनसे न हो सका। १. पटना यूनिवर्सिटी जर्नल, १९६१ पृ. ६१।

चन्दायतकी इन प्रतियोंके मिलनेकी बात ज्ञात होनेपर राघव सारस्वतका ध्यान अपनी उस प्रतिकी ओर गया जो उनके पास बीसो बरससे पड़ी थी और जिसे धीरेन्द्र वर्माने अप्रमाणित घोषित कर दिया था। उन्होंने तत्काल अपने उस ग्रन्थका परिचय सरसम प्रकाशित कराया और उसका एक प्रति-मुद्रण मुझे भेजा। चन्दायतके सम्पादनकी इच्छा प्रकट करते हुए उन्होंने यह भी सूचित किया कि बम्बईवाली प्रतिका मेरा पाठ उन्हें कहींसे प्राप्त हो गया है और वे मुझसे तत्सम्बन्धी अन्य आव- श्यक जानकारी चाहते हैं। शालीनताकी इस प्रकार उपेक्षा देखकर मेरा चौंक उठना स्वाभाविक था। मैं क्षुब्ध हो गया। मोतीचंदजीको भी ये बातें अच्छी न लगीं। उन्होंने भी सलाह दी कि मैं अपना पाठ शीघ्रतिशीघ्र प्रकाशित कर दूँ। फलतः मैंने पुनः चन्दायतके सम्पादनमे हाथ लगाया। उसके लिए सामग्री जुटाते समय जब कमल कुलश्रेष्ठके शोध निबंध हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्यको उलट रहा था, उस समय मेरा ध्यान उनके इस कथनकी ओर गया कि गार्सा द तासीने अपनी पुस्तक हिस्तोरे द ला लितरेत्योर हिन्दुई पत हिन्दुस्तानीमें लौरक चन्दाकी कुछ अप्राप्य प्रतियोंका उल्लेख किया है। यह कथन मुझे कुछ आश्चर्यजनक साथ ही महत्वपूर्ण जान पड़ा। मैंने तत्काल उक्त ग्रन्थका लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय द्वारा प्रस्तुत अनुवाद हिन्दुई साहित्यका इतिहास देखा पर उसमें ऐसी कोई बात मुझे न मिल सकी जिससे कमल कुलश्रेष्ठके कथनका समर्थन हो सके। यह बात नहीं कि कुलश्रेष्ठने गलत सूचना प्रस्तुत की है वरन् वार्ष्णेयने अनुवाद करनेमे स्वेच्छा-नीति बरती है। जो अंश उन्हें अनावश्यक जान पड़े उन्हें उन्होंने छोड़ दिया है। ऐसे आकर ग्रन्थोंके अनुवादमें, जो मूलमें दुष्प्राप्य हों स्वेच्छाका प्रयोग किस प्रकार घातक सिद्ध हो सकता है, यह स्पष्ट सामने आया। मेरे लिए आवश्यक हो गया कि मूल ग्रन्थ देखूँ। तासीके उक्त ग्रन्थके दो संस्करण प्रकाशित हुए थे। एक तो १८४० और १८४७ के बीच और दूसरा १८७०-७१ ई० में। दूसरे संस्करणमे लेखकने काफी परिवर्तन किया है। पहले संस्करणको उलटनेपर जो कुछ मिला उसका अंग्रेजी रूप इस प्रकार है:-- रोमान्स-(दि) आव लौरक एण्ड चुरक आर द फेरी टेल्स आव द सेक- ल कार्डो-चारल्ड मैनुस्क्रिप्ट बिच मेनी कलर्ड डेकोरेझन्स। दिस मैनुस्क्रिप्ट इस रिटेन इन पिक्युलियर पर्शीयन कैरेक्टर्स। इट बिलाग्ज टु द रिच कलेक्शन आव द क्युक आव सस्पेक्ट अफिस आफ हर मजेस्टी द क्वीन आव ग्रेट ब्रिटेन।१ अर्थात्—लौरक और चुरककी प्रेम कथा अथवा फेरिन स्पिरिट परीमहल—एक चीथड़ा हस्तलिखित ग्रन्थ, जिसमें अनेक रंगीन अलंकरण हैं। यह हस्तलिखित ग्रन्थ विचित्र ढंगके पारसी लिपिमें लिखा हुआ है। यह ब्रिटेनकी महारानीके चचा क्युक आव ससेक्सके मूल्यवान संग्रहमें है। १ ग्रन्थ १ पृ ५२६

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