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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ७] विमानस्थानम् ५४३

अ० ७] विमानस्थानम् ५४३
समुत्थान-स्थान-संस्थान-वर्ण-नाम-प्रभाव-चिकित्सित-विशेषान् पप्रच्छो-
पसंगृह्य पादौ ॥ ८ ॥
इस प्रकार से इस व्याधित रूपाधिकार में रोगी के रूप, संख्या, परिमाण,
गुरु व्याधित, लघु व्याधित, संख्या गुरु-व्याधित और लघु-व्याधित में कारण
( सत्त्वादि का उत्कर्ष और अपकर्ष ), रोग के बलाबल ज्ञान में प्रमाद ( मोह ),
इस प्रमाद के कारण ( एक प्रत्यक्ष प्रमाण से ही ज्ञान करना ), सापवाद
( दोष सहित, ) सम्प्रतिपत्ति ( सम्यक् ज्ञान तीनों प्रमाणों से परीक्षा करने का
ज्ञान ), और अनपवाद ( निर्दोष ), इनको सम्पूर्ण रूप में सुनकर अग्निवेश
ने भगवान् आत्रेय के चरणों में नमस्कार कर, सब प्रकार के कृमियों के समु-
त्थान ( निदान ), स्थान संस्थान ( लक्षण ), वर्ण, नाम, प्रभाव और चि-
कित्सा को पूछा ॥ ८ ॥
अथास्मै प्रोवाच भगवानात्रेयः—इह खल्वग्निवेश ! विंशतिविधाः
कृमयः पूर्वमुद्दिष्टा नानाविधेन प्रविभागेनान्यत्र सहजेभ्यः, ते पुनः
प्रकृतिभिर्भिद्यमानाश्चतुर्विधा भवन्ति । तद्यथा—पुरीषजाः श्लेष्मजाः
शोणितजा मलजाश्चेति ॥ ९ ॥
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा, हे अग्निवेश ! पीछे अष्टोदरीय
अध्याय में सहज ( सहजन्म ) कृमियों को छोड़ कर नाना प्रकार के विभाग
से बीस प्रकार के ( मलजन्य दो प्रकार के, रक्तजन्य छः प्रकार के, कफजन्य
सात प्रकार के और पुरीषजन्य पांच प्रकार के ) कृमि कहे हैं। ये बीस प्रकार
के कृमि प्रकृति की भिन्नता के कारण चार प्रकार के हैं। यथा—पुरीषजन्य,
श्लेष्मजन्य, रक्तजन्य और मलजन्य ॥ ६ ॥
तत्र मलो बाह्यश्चाऽऽभ्यन्तरश्च । तत्र बाह्ये मले जातान्मलजांस्-
चक्ष्महे । तेषां समुत्थानं—मृजावर्जनम् । स्थान—केश-श्मश्रु-लोम-
पक्ष्म-वासांसि । संस्थानं-अणवस्तिलाकृतयो बहुपादाः । वर्णः कृष्णः
शुक्लश्च । नामानि-यूकाः पिपीलिकाश्च । प्रभावः कण्डूजननं कोठपिड-
काभिनिर्वर्तनं च । चिकित्सितं त्वेषामपकर्षणं मलोपघातो मलकराणां
च भावानामनुपसेवनमिति ॥ १० ॥
इनमें मल दो प्रकार का है—( १ ) बाह्य और ( २ ) आभ्यन्तर । इनमें
शरीर के बाह्यमल ( पसीना आदि से ) उत्पन्न होने वाले कृमियो को
मलजन्य कृमि कहते हैं । इनकी उत्पत्ति का कारण शरीर शुद्धि का न
करना है। इनका स्थान केश ( शिर के बाल ), दाढ़ी मूंछ, शरीर के लोम,
आंखों की पलकों के बाल और वस्त्र हैं।

५४४ चरकसंहिता [ अ० ७
इनका संस्थान अर्थात् (रूप या आकृति) ये अणु (सूक्ष्म), तिल के
समान आकृति और बहुत पांव वाले होते हैं। इनका वर्ण (रंग) काला और
श्वेत है। इनके नाम यूक (जूं) और पिपीलिका (लिक्खा), लीख है।
इनका प्रभाव—खाज उत्पन्न करना और कोठ, पिडका आदि फुन्सियों को
शरीर पर उत्पन्न करना है।
इनकी चिकित्सा—इनको चिमटी से पकड़ कर खींचना, मल का नाश
करना और मलोत्पादक वस्तुओं का परित्याग करना है ॥१०॥
शोणितजानां तु खलु कुष्ठैः समानं समुत्थानम्, स्थानं रक्तवाहिन्यो
धमन्यः। संस्थानं अणवो वृत्ताश्चापादाश्च सूक्ष्मत्वाच्चैके भवन्त्यदृश्याः।
वर्णस्ताम्रः। नामानि केशादा लोमादा लोमद्वीपाः सौरसा औदुम्बरा
जन्तुमातरश्चेति। प्रभावः केश-श्मश्रु-नख-लोम-पक्ष्मपापध्वंसो व्रणगतानां
च हर्ष-कण्डू-तोद-संसर्पणान्यतिवृद्धानां च त्वक्-शिरा-स्नायु-मांस-तरु-
णास्थि-भक्षणमिति, चिकित्सितमप्येषां कुष्ठैः समानं तदुत्तरकालमुपदे-
क्ष्यामः ॥ ११ ॥
रक्तजन्य कृमियों का निदान कुष्ठ रोग के निदान के समान ही है। कृमियों
का स्थान—रक्तवाहिनी धमनियां (शिरायें भी) हैं। इनका रूप सूक्ष्म होने से
कुछ कृमि अदृश्य होते हैं। वे आंख से नहीं देखे जाते, इनका रंग ताम्र वर्ण है;
इनके नाम केशाद (केशों को खाने वाला), लोमाद, लोमद्वीप, सौरस, औदु-
म्बर और जन्तुमाता हैं। इनका प्रभाव केश श्मश्रु, लोम और पलक के बालों
को नाश करना है, व्रण में प्रवेश करके ये हर्ष ✳, खाज, तोद (चुनचुना) और
संसर्पण की सी प्रतीति कराते हैं। बहुत बढ़के ये त्वचा सिरा, स्नायु, मांस
और तरुण अस्थि को भी खाने लगते हैं। इनकी चिकित्सा भी कुष्ठ-रोग के
समान है, इसका वर्णन आगे कुष्ठ-चिकित्सा में करेंगे ॥ ११ ॥
श्लेष्मजाः क्षीर-गुड-तिल-मत्स्याानूपमांस-पिष्टान्न-परमान्न-कुसुम्भ-
स्नेहाजीर्ण-पूति-क्लिन्न-संकीर्ण-विरुद्ध्रासात्म्य-भोजनसमुत्थानाः। तेषामा-
माशयः स्थानं। ते प्रवर्धमानास्तूष्र्ध्वमधो वा बिसर्पन्त्युभयतो वा।
संस्थानवर्ण-विशेषास्तु श्वेताः पृथुब्रध्नसंस्थानाः केचित्, केचिद्वृत्तपरि-
णाहा गण्डूपदाकृतयश्च श्वेतास्ताम्रावभासाः, केचिदणवो दीर्घास्तन्तवा-
कृतयः श्वेताः। *तेषां त्रिविधानां श्लेष्मनिमित्तानां कृमीणां नामानि—
✳ हर्ष—जिस प्रकार दाद में खुजाने से आनन्द, हर्ष वा रोमाञ्च होता है।
इस को भी कृमि उत्पन्न करते हैं।

अ० ७ ] ३२ विमानस्थानम् ५४५

अ० ७ ] ३२ विमानस्थानम् ५४५
अन्त्रादाः, उदारादाः, हृदयचराः, चुरवः, दर्भपुष्पाः, सौगन्धिकाः,
महागुदाश्चेति । प्रभावो हृल्लासास्यसंस्रवणमरोचकाविपाको ज्वरो
मूर्च्छा जम्भा क्षवथुरानाहोऽङ्गमर्दश्छर्दिः कार्श्यं पारुष्यमिति ॥ १२ ॥
कफजन्य कृमि—क्षीर-भोजन, गुड़, तिल मछली, जलचर प्राणियों के मांस
पिष्टान्न और परमान्न (खीर आदि) का भोजन, कुसुम्भ का तेल, अजीर्ण में
भोजन, पूति (सड़े), क्लिन्न (क्लेदकारक द्रव्यों के) संकीर्ण (हित और अहित
बेमेल मिले भोजन) और विरुद्ध एवं असात्म्य भोजनों से उत्पन्न होते हैं।
इनका स्थान आमाशय है। ये आमाशय से बढ़ कर यहीं से ही ऊपर या नीचे
अथवा दोनों तरफ फैल जाते हैं। इनका रूप और वर्ण श्वेत तथा कुछ बड़ी
मासपेशी के से, बद के आकार के, कुछ गोल आकार वाले, (वेष्टन) वाले,
गिंडोये की आकृति के, श्वेत और लाल रंग की आभा वाले होते हैं। कुछ अणु
(पतले), लम्बे और सूत के समान आकृति वाले, श्वेत होते हैं। इन तीनों
प्रकार के कफजन्य कृमियों के नाम ये हैं। जैसे—अन्त्राद, उदराद, हृदयचर,
चुरु, दर्भपुष्प, सौगन्धिक और महागुद । इन का प्रभाव—हृल्लास वमनकी रुचि
होना, मुख से लार का बहना, अरुचि, अविपाक, ज्वर, मूर्च्छा, जम्भाई का आना,
छींकें आना, अफरा, शरीर के अंगों का टूटना, वमन, कृशता और शरीर में
रूक्षता वा कठोरता होना है ॥ १२ ॥
पुरीषजास्तुल्यसमुत्थानाः श्लेष्मजैस्तेषां स्थानं पक्वाशयः । प्रवर्धमा-
नास्त्वधो विसर्पन्ति, यस्य पुनरामाशयाभिमुखाः स्युर्यदन्तरम्; तद-
न्तरं तस्योद्गारनिश्वासाः पुरीषगन्धिनः स्युः; संस्थानवर्णविशेषास्तु
सूक्ष्मवृत्तपरीणाहाः श्वेता दीर्घा ऊर्णाशुकसंकाशाः केचित्, केचित्पुनः
स्थूलवृत्तपरीणाहाः श्यावनीलहरितपीताः । तेषां नामानि ककेरुका
मकेरुका लेलिहाः सशूलकाः सौसुरादाश्चेति । प्रभावः पुरीषभेदः
कार्श्यं पारुष्यं लोमहर्षोऽभिनिर्वर्तनं च, त एवास्य गुदमुखं परितुदन्तः
कण्डूं चोपजनयन्तो गुदमुखं पर्यासते, त एव जातहर्षा गुदनिष्क्रमण-
मतिवेलं कुर्वन्ति-इत्येष श्लेष्मजानां पुरीषजानां च कृमीणां समुत्थाना-
दिविशेषः ॥ १३ ॥
पुरीषजन्य (मल से उत्पन्न) कृमियों का निदान कफजन्य कृमियों के
समान है। इन कृमियों का स्थान पक्वाशय है। ये कृमि बढ़कर नीचे को ओर
फैलते हैं। जिस पुरुष में ये कृमि आमाशय की ओर जाने लगते हैं, उस पुरुष
के उद्गार (डकार) और श्वास में मल की गन्ध आती है। इनका रूप
वर्ण—सूक्ष्म, गोल वेष्टन वाले तथा श्वेत और भेड़ के लम्बे बालो के समान

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होते हैं। कुछ स्थूल, गोल वेष्टन वाले, काले, नीले, हरे या पीले रंग के होते
हैं। इन के नाम—ककेरुक, मकेरुक, लेलिह, ससूलक, सौसुराद हैं। इनका
प्रभाव—मल का पतला आना, शरीर में कृशता, परुषता और रोमांच होना
है। ये कृमि रोगी की गुदा के मुख पर रहते हैं। ये हर्ष उत्पन्न होने पर बार
बार गुदा से बाहर (मल के साथ) निकलते हैं। यह कफजन्य और पुरीष-
जन्य कृमियों में उत्पत्ति आदि का भेद है ॥ १३ ॥
चिकित्सितं तु खल्वेषां समासेनोपदेक्ष्य पश्चाद्विस्तरेणोपदेक्ष्यामः ।
तत्र सर्वकृमीणामपकर्षणमेवाऽऽदितः कार्यं; ततः प्रकृतिविघातोऽनन्तरं
निदानोक्तानां भावानामनुपसेवनमिति ॥ १४ ॥
कफ और मल से उत्पन्न कृमियों की चिकित्सा संक्षेप में कहकर
फिर पीछे से विस्तार से कहेंगे। इन कृमियों का प्रथम अपकर्षण (खींचना
शोधन) करना चाहिये, फिर प्रकृति-विघात (उपशम) और पीछे से निदान-
रूप पदार्थों का अनुपसेवन अर्थात् त्याग करना चाहिये ॥ १४ ॥
तत्रापकर्षणं हस्तेनाभिगृह्य विमृश्योपकरणवताऽपनयनमनुपक-
रणेन वा, स्थानगतानां तु कृमीणां भेषजेनापकर्षणं; न्यायतस्तु तच्चतु-
र्विधम्। तद्यथा—शिरोविरेचनं वमनं विरेचनमास्थापनमित्यपक-
र्षणविधिः ॥ १५ ॥
अपकर्षण विधि—उपकरण (संदंश, चिमटी आदि) से अथवा बिना
उपकरण के हाथ से पकड़ कर बाहर निकालने का नाम 'अपकर्षण' है। यह
कार्य बाह्य मलजन्य (पुरीषजन्य) और श्लेष्मजन्य कृमियों के स्थान से
निकले होने पर ही हो सकता है और जो कृमि अपने स्थान में स्थित हों,
उनको औषध द्वारा निकालना उचित है और यह औषध चार प्रकार का है।
यथा—शिरोविरेचन, वमन, विरेचन और आस्थापन । यह अपकर्षण-
विधि है ॥ १५ ॥
प्रकृतिविघातस्तेषां—कटु-तिक्त-कषाय-क्षारोष्णानां द्रव्याणामुपयोगो
यच्चान्यदपि किंचिच्छ्लेष्मपुरीषप्रत्यनीकभूतं तत्स्यादिति प्रकृति-
विघातः ॥ १६ ॥
प्रकृति-विघात—प्रकृति (कफ और पुरीष) का उपघात अर्थात् नाश या
शमन करना। इस के लिये कटु, तिक्त, कषाय, क्षार और उष्ण पदार्थों का
उपयोग करना चाहिये। इसके अतिरिक्त और भी जो कुछ श्लेष्मा और मल के
विरुद्ध आहार-विहार हो उसका सेवन करना चाहिये। यह प्रकृति-विघात-
विधि है ॥ १६ ॥

अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४७

अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४७
अनन्तरं निदानोक्तानां भावानामनुपसेवनमिति यदुक्तं निदा-
नविधौ तस्य विसर्जनं तथाप्रायाणां चापरेषां द्रव्याणामिति लक्षणतश्चि-
कित्सितमनुव्याख्यातमेतदेव पुनर्विस्तरेणोपदेक्ष्यते ॥ १७ ॥
इसके आगे निदान में कहे पदार्थों का सेवन का त्यागना आवश्यक है।
ऐसा निदान विधि में जिन जिन द्रव्यों को निदान रूप से कहा है, उनका
परित्याग करना चाहिये । इसी प्रकार न कहे हुए निदान के अनुरूप द्रव्यों
का भी परित्याग करना चाहिये । इस प्रकार संक्षेप से चिकित्साक्रम कह दिया
है, अब इसी को विस्तार से कहते हैं ॥ १७ ॥
अथैनं कृमिकोष्ठमातुरमग्रे षड्रात्रं सप्तरात्रं वा स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य
श्वोभूते एनं संशोधनं पाययितास्मीति क्षीर-दधि-गुड-तिल-मत्स्यानू-
पमांस-पिष्टान्न-परमान्न-कुसुम्भस्नेह-संयुक्तैर्भोज्यैः सायं प्रातश्चोपपादये-
त्समुदीरणार्थं चैव कृमीणां कोष्ठाभिसरणार्थं च भिषक् । अथ व्युष्टायां
रात्रौ सुखोषितं सुप्रजीर्णभुक्तं च विज्ञाय।ऽऽस्थापन-वमन-विरेचनैस्तवह-
रेवोपपादयेदुपपादनीयश्चेत्स्यात्सर्वान् परीक्ष्यविशेषान् परीक्ष्य सम्यक्।
इस कृमि-कोष्ठ वाले रोगी को संशोधन देने से पूर्व छः या सात रात तक
स्नेहन और स्वेदन देना चाहिये । फिर सातवें वा आठवें दिन ( अगले दिन )
इस को संशोधन दूंगा ऐसा निश्चय करके सायं-प्रातः दोनों समय क्षीर ( दूध ),
गुड़, दही, तिल, मछली, जलचर प्राणियों का मांस, पिष्टान्न, कुसुम्भ तैल से
बने भोजन खिलावे । इस प्रकार के भोजनों से कोष्ठ के क्रिमि भली प्रकार से
उत्क्लेशित हो जाते हैं ( निकल आते हैं ) और अन्यत्र गये हुए कृमि भी
कोष्ठ की ओर आने लगते हैं । इस के अनन्तर रात्रि के बीतने पर ( प्रातः
काल होने पर ) भली प्रकार नींद आई तथा खाया हुआ भोजन भली प्रकार
जीर्ण हो गया यह देखकर उस दिन ( नवम दिन ) आस्थापन, वमन, विरेचन
( इन में से कोई एक क्रिया ) देना चाहिये । क्रिया करने से पूर्व रोगी की
सब प्रकार से ( प्रकृति-सात्म्य, सत्त्व आदि से ) परीक्षा कर लेनी चाहिये ।
अथाऽऽहरेति ब्रूयात्-मूलक-सर्षप-लशुन-करञ्ज-शिग्रु-मधुशिग्रु-कमठ -
खर पुष्पा-भूस्तृण-सुमुख-सुरस-कुठेरक-गण्डीर-कालमालक-पर्णास-क्षवक-
फणिज्जकानि सर्वाण्यथवा यथालाभं, तान्याहृतान्यभिसमीक्ष्य खण्ड-
शश्छेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेन सुप्रक्षालितायां स्थाल्यां समावाप्य
गोमूत्रेणार्धोदकेनाभ्यासिच्य साधयेत् सततमवघट्टयन् दर्व्या। तस्मिन्
शीतीभूते तूपयुक्तभूयिष्ठेऽम्भसि गतरसेष्वोषधेषु स्थालीमवतार्य, सुप-
रिपूतं कषायं सुखोष्णं मदनपिप्पलीफलं विडङ्गकल्कतैलोपहितं, सर्जि-

कालवणितमभ्यासिच्य बस्तौ विधिवदास्थापयेदेनं, तथाऽर्काऽलर्क-कुट-
जाढकी-कुष्ठ-कैडर्य-कषायेण वा, तथा शिग्रु-पीलु-कुस्तुम्बुरु-कटुकासर्षप-
कषायेण, तथाऽऽमलक-शृङ्गवेर-दारुहरिद्रा-पिचुमर्द-कषायेण मदनफल-
संयोगसंयोजितेन त्रिरात्रं सप्तरात्रं वाऽऽस्थापयेत् ॥ १८ ॥
आस्थापन आदि क्रिया करने की विधि—अनन्तर कहे कि निम्न सब
वस्तुओ को अथवा इन में से जितनी प्राप्त हो सकें उन वस्तुओं को लावे—
मूलक ( मूली ), सरसों, लशुन, नाटा करञ्ज, शिग्रु ( शोभांजन ), मधुशिग्रु
( मीठा सहजन ), कमठ ( कोई लाल फूल का कचनार मानते हैं ), खर-
पुष्पा ( अजवायन ), भूस्तृण, सुमुख, सुरस, कुठेरक, गण्डीर, कालमाल,
पर्णास, क्षवक और फणिज्जक ( ये सब तुलसी के भेद हैं ) इन सब को अथवा
इन में से जो मिलें उनको लाकर, टुकड़े टुकड़े करके, पानी से भली प्रकार
धोकर, अच्छी प्रकार धुली हांडी में रखकर, आधे, पानी मिले गोमूत्र में भिगो
कर ( डालकर ) निरन्तर कड़छो ( खोंचे ) से चलाते हुए अग्नि पर पकाना
चाहिये। जब औषधियों का सम्पूर्ण रस जल में आ जाय तब हांडी को उतार
कर वस्त्र में से भली प्रकार छान ले। इस कुछ गरम क्वाथ में मॅनफल, पिप्पली,
वायविडंग इन का कल्क और तैल मिश्रित सर्जक्षार ( सज्जी खार ) एवं नमक
मिलाकर विधिपूर्वक इस रोगी को आस्थापन बस्ति देनी चाहिये। इसी
प्रकार आक, अलर्क ( मदार ), कुटज, आढकी, ( अरहर ), कुष्ठ ( कूठ )
और कैटर्य ( पर्वतनिम्ब्र ) कषाय से बस्ति देनी चाहिये, ( तैल मिश्रत नमक
एवं मैनफल आदि पूर्व की भाँति डाले )। इसी प्रकार शिग्रु, पीलु,
कुस्तुम्बुरु, कुटकी और सरसों के कषाय से, इसी प्रकार आंवला, अदरक
( सोंठ ), दारुहल्दी, पिचुमर्द ( नीम ) के कषाय से, मैनफल आदि डालकर
लवण युक्त तैल मिलाकर तीन बार अथवा सात बार आस्थापन-कर्म करना
चाहिये ॥ १८ ॥
प्रत्यागते च पश्चिमे बस्तौ प्रत्याश्वस्तं तदहरेवोभयतोभागहरणं
संशोधनं पाययेद्युक्त्या। तस्य विधिरुपदेक्ष्यते। मदनफलपिप्पलीकषा-
यस्यार्धाञ्जलिमात्रेण त्रिवृत्कल्काक्षमात्रमालोड्य पातुमस्मै प्रयच्छेत्,
तदस्य दोषमुभयतो निर्हरति साधु, एवमेव कल्पोक्तानि वमनविरे-
चनानि संसृज्य पाययेदेनं बुद्ध्या सर्वविशेषानवेक्षमाणो भिषक् ॥१९॥
शेष बस्ति के गुदा द्वारा बाहर निकल आने पर रोगी को आश्वासन
देकर उसी दिन ( जिस दिन बस्ति दी है ) दोनों ऊर्ध्व एवं अधोमागों से

अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४६

अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४६
दोष निकालने के लिये वमन, विरेचन रूपी संशोधन, देश, काल, मात्रादि
की अपेक्षा से देना चाहिये ।
विधि—मदनफल, पिप्पली कषाय की आधी अंजलि, को त्रिवृत् (निशोथ)
के कल्क की एक अक्ष मात्रा में मिलाकर रोगी को पीने के लिये देना चाहिये ।
इस प्रकार से रोगी के दोष दोनों मागों से भली प्रकार निकलते हैं । इस प्रकार
से कल्प-स्थान में कहे जाने वाले वमन, विरेचन योगों को परस्पर मिला कर
रोगी की सब बातों को देख कर बुद्धि से भली प्रकार विचार कर रोगी को पीने
के लिये देवे ॥ १६ ॥
अथैनं सम्यग्वि॒रिक्तं विज्ञायापराह्ने शैखरिककषायेण सुखोष्णेन
परिषेचयेत्, तेनैव च कषायेण बाह्याभ्यन्तरान् सर्वोदकार्थान् कार-
येच्छश्वत् । तदभावे वा कटुतिक्तकषायाणामौषधानां क्वाथैर्मूत्रक्षारैर्वा
परिषेचयेत् । परिषिक्तं चैनं निर्वातमागारमनुप्रवेश्य पिप्पली-पिप्पली-
मूल-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेर-सिद्धेन यवाग्वादिना क्रमेणोपक्रमयेत्।
बिलेप्याः क्रमागतं चैनमनुवासयेद्विडङ्गतैलेनैकान्तरं द्वित्रिर्वा ॥ २० ॥
इसके पश्चात्(दोनों भागों से संशोधन होने पर) भली प्रकार संशोधन
हुआ जान कर शैखरिक कषाय ( अपामार्ग के थोड़े गरम कषाय ) से परिषेचन
करे । इसी कषाय को पानी के स्थान पर पीने के लिये और बाह्य ( स्नान
आदि में ) निरन्तर बरतना चाहिये । इस अपामार्ग के कषाय के अभाव में
कटु, तिक्त, कषाय रसवाली औषधियों के क्वाथों से, मूत्रमिश्रित यवक्षार
( जवाखार ) आदि से परिषेचन करना चाहिये । परिषिक्त इस रोगी को वायु-
रहित घर में प्रविष्ट करके पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और सोंठ इस पंचकोल
द्वारा सिद्ध यवागू को उपकल्पनीय अध्याय में कहे पेयादि क्रम से देना चाहिये ।
विलेपी तक पहुंच जाने पर रोगी को विडंग-तैल द्वारा एक दिन के अन्तर से
दो बार तीन बार अनुवासन देना चाहिये । ( अनुवासन में पेया का निषेध है,
क्योंकि पेया अभिष्यन्दी है ) ॥ २० ॥
यदि पुनरस्यातिप्रवृद्धाञ्शीर्षादान्कृमीन्मन्येत शिरस्येवाभिसर्पतः
काँश्चित्, ततः स्नेहस्वेदाभ्यामस्य शिर उपपाद्य विरेचयेदपामार्गतण्डु-
लादिना शिरोविरेचनेन ॥ २१ ॥
शिरो-विरेचन—इस रोगी के शिर को खाने वाले कृमियों को बहुत बढ़ा
हुआ जाने और देखे कि कृमि शिर में फिरते हों, ऐसा वैद्य को अनुभव हो तो
रोगी के शिर को स्नेहन और स्वेदन देकर अपामार्ग के तण्डुलों (चावलों )
आदि शिरो-विरेचन योग्य द्रव्यों से शिरोविरेचन देवे ॥ २१ ॥

५५० चरकसंहिता [ अ० ७
यस्त्वभ्यवहार्यविधिः प्रकृतिविघातायोक्तः कृमीणां, सोऽनुव्या-
ख्यास्यते—मूषिकपर्णीं समूलामप्रतानामाहृत्य खण्डशश्छेदयित्वा,
उलूखले क्षोदयित्वा पाणिभ्यां पीडयित्वा रसं गृह्णीयात्, तेन रसेन
ऽोदितशालितण्डुलपिष्टं समालोड्य पूपलिकाः कृत्वा विधूमेष्वङ्गारेषु
विपाच्य विडङ्गतैललवणोपहिताः कृमिकोष्ठाय भक्षयितुं प्रयच्छेत्;
अनन्तरं चाम्लकाञ्जिकमुदश्विद्वा पिप्पल्यादिपञ्चवर्गसंसृष्टं सलवण-
मनुपापयेत् ॥ २२ ॥
अनेन कल्पेन मार्कवार्क-सहचर-नीप-निर्गुण्डी-सुमुख-सुरस-कुठेरक-
गण्डीर-कालमालक-पर्णास-क्षवक-फणिज्जक-बकुल-कुटज-सुवर्णक्षीरी-
स्वरसा नामन्यतमस्मिन्कारयेत्पूपलिकाः, तथा किणिही-किरात-तिक्तक-
सुवहामलक-हरीतकी-बिभीतक-स्वरसेषु कारयेत्पूपलिकाः । स्वरसांश्चै-
तेषामेकैकशो द्वन्द्वशः सर्वशो वा मधुविलुलितान् प्रातरनन्नाय पातुं
प्रयच्छेत् ॥ २३ ॥
कृमियों के प्रकृति-विघात के लिये जो आहार-विधि कही है, उस को
व्याख्या करते हैं । जल और कोमल पत्तों के साथ मूषापर्णी को लाकर इसको
टुकड़े २ करके, ऊखल में कूटकर, हाथों से दबाकर रस निकाल ले । इस रस
में लाल धानों के चावलों की पिष्ठी को मिलाकर इससे पूरी ( पूप ) बनावे ।
इन पूरियों को धूम रहित अंगारों पर पकावे । फिर विडंग तैल और लवण के
. साथ मिलाकर कृमि कोष्ठवाले रोगी को खाने के लिये दे । पूरी खाने के
पीछे खट्टी कांजी ( धान्य-काञ्जिक ) में या उदश्वित् ( आधे विलोये मठे, या
छाछ ) में पिप्पली आदि पंचकोल को लवण के साथ मिला कर पीने के लिये
दे । इसी विधि से मार्कव ( भृंगराज ), अर्क (आंक ), सहचर (झण्टि ),
नीप ( कदम्ब ), निर्गुण्डी ( सिन्धुवार सम्हालू ), सुमुख, सुरस, कुठेरक,
गण्डीर, (सेहुण्ड ), कालमाल ( कुठेरक के भेद ), पर्णास, क्षवक, फणिजक
(तुलसी के भेद ), बकुल (मौलसरी ) कुटज, स्वर्णक्षीरी ( सत्यानाशी ) इन
में से किसी एक के रस के साथ पूरी तैयार करनी चाहिये। इसी प्रकार किणिही
( अपामार्ग ), किराततिक्त (चिरायता), आम की, हरड़, बिभीतक (बहेड़ा ),
सुवहा (शेफालिका ) इनके रसों में पूरियां बनानी चाहियें । इन ( मण्डूक-
पर्णी आदि ) में से एक एक को या दो दो को अथवा सब को मिलाकर स्वरस
निकाल कर इस स्वरस में मधु मिला कर प्रातःकाल खाली पेट पीने के
लिये दे ॥ २२-२३ ॥
अथापशराफूदाहृत्य महति किलिञ्चके प्रस्तीर्याऽऽतपे शोषयित्वोदूखले

क्षोदयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा विडङ्गकषायेण
त्रिफलाकषायेण वाऽष्टकृत्वो दशकृत्वो वाऽऽतपे सुपरिभावितानि
भावयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा नवे कलशे समा-
वाप्यानुगुप्तं निधापयेत् । तेषां तु खलु चूर्णानां पाणितलं चूर्णं यावद्वा
साधु मन्येत, तत् क्षौद्रेण संसृज्य कृमिकोष्ठाय लेढुं यच्छेत् ॥ २४ ॥
इसके पीछे घोड़े की शकृत (लीद) को लाकर बड़ी चटाई पर फैलाकर
धूप में सुखा ले। फिर ऊखल में कूटकर शिला पर पीसकर बारीक बनाले
इस चूर्ण को विडंग के कषाय से या त्रिफला-कषाय से आठ बार अथवा दस
बार धूप में भावना देकर शुष्क कर ले। फिर इसको पत्थर पर पीसकर नये
घड़े में रखकर, वायु आदि न जा सके इस प्रकार से मुख को ढांप कर गुप्त
स्थान पर रख दे। इसमें से कर्ष परिमाण (चार माशा) अथवा रोग के
अनुसार जितनी मात्रा उचित समझे उतनी मात्रा को शहद में मिलाकर कृमि
रोगी को खाने के लिये दे ॥ २४ ॥
तथा भल्लातकास्थीन्याहृत्य कलशप्रमाणेन संपोथ्य स्नेहभाविते
दृढ़े कलशे सूक्ष्मानेकच्छिद्रप्रध्‍ने शरीरमुपवेष्ट्य मृदावलिप्ते समावाप्यो-
ल्‍पेन पिधाय भूमावाकण्ठं निखातस्य स्नेहभावितस्यैवान्यस्य दृढस्य
कुम्भस्योपरि समारोप्य समन्ताद् गोमयैरुपचित्य दाहयेत्; स यदा
जानीयात् साधु दग्धानि गोमयानि गलितस्नेहानि भल्लातकास्थीनीति,
ततस्तं कुम्भमुद्घाटयेत् । अथ तस्माद् द्वितीयात्कुम्भात्तं स्नेहमादाय
विडङ्गतण्डुलचूर्णैः स्नेहार्धमात्रैः प्रतिसंसृज्याऽऽतपे सर्वमहः स्थाप-
यित्वा ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत्पानाय, तेन साधु विरिच्यते, विरिक्तस्य
चाऽऽनुपूर्वी यथोक्ता ॥ २५ ॥
दूसरा प्रयोग—घड़े में जितने भिलावे के फल आ सकें, उतने फलों को
कूट कर तैलादि स्नेह से चिकने, मजबूत एक घड़े में भरे। इस घड़े के
निचले भाग में अनेक सूक्ष्म छिद्र बना दे तथा घड़े पर मिट्टी का लेप कर
दे। इस घड़े में भिलावे भर कर ढक्कन से मुंह ढांप दे। फिर स्नेह से भावित
एक दूसरे घड़े को ले कर जमीन में गले तक गाड़ दे। इस गड़े हुए घड़े के
ऊपर भिलावे वाला घड़ा रख कर चारों ओर उपले रख कर जलावे। जब
उपले भली प्रकार जल जावें, तब ऊपर के घड़े को पृथक् करे। जब इस
दूसरे घड़े में से तेल (स्नेह) ले कर स्नेह से आधी मात्रा में विडंग-तण्डुल
चूर्ण को स्नेह में मिला कर धूप में चार प्रहर तक रखे। पीछे इस स्नेह को

५५२ चरकसंहिता [ अ० ७
कृमि-कोष्ठ रोगी को पीने के लिये दे । इससे भली प्रकार विरेचन होता है।
विरेचन के पीछे पूर्व की भांति पेया आदि देने का क्रम है ॥२५॥
एवमेव भद्रदारु-सरलकाष्ठस्नेहानुपकल्प्य पातुं प्रयच्छेत्। अनुवा-
सयेच्चैनमनुवासनकाले ॥ २६ ॥
इसी भल्लात के स्नेह-विधि से देवदारु, सरल (राल-सर्ज), वृक्षों से स्नेह
बना कर रोगी को पीने के लिये देना चाहिये और अनुवासन के योग्य समय
में कहे हुए स्नेहों से अनुवासन देना चाहिये ॥ २६ ॥
अथ 'आहर' इति ब्रूयात् शारदान्नावांस्तिलान्संपदुपपेतान्। तानाहृत्य
सुनिष्पूय सुशुद्धान् शोधयित्वा विडङ्गकषाये सुखोष्णे निर्वापयेदाश्लेष-
गमनात्, गतदोषानभिसमीक्ष्य सुप्रलूनान्प्रलुञ्च्य पुनरेव सुनिष्पूतान्
सुनिष्पूय सुशुद्धान् शोधयित्वा विडङ्गकषायेण त्रिःसप्तकृत्वः सुपरिभा-
वितान्भावयित्वाऽऽतपे शोषयित्वोलूखले संक्षुद्य दृषदि पुनः श्लक्ष्णपिष्टा-
न्कारयित्वा द्रोण्यामभ्यवधाय विडङ्गकषायेण मुहुर्मुहुरवसिञ्चन् पाणि-
मर्दमेव मर्दयेत् । तस्मिन्खलु प्रपीड्यमाने यत्तैलमुदियात्तत्पाणिभ्यां
पर्यादाय शुचौ दृढे कलशे समासिच्यानुगुप्तं निधापयेत् ।
अन्ययोग—वैद्य रोगी से कहे कि 'आगे कहे पदार्थ लाओ'। अच्छी
प्रकार पके, रस-वीर्य युक्त, शरद ऋतु में होने वाले नये तिलों को ला कर,
भली प्रकार मिट्टी आदि से साफ़ करके सुखा ले । फिर सुखोष्ण, कुछ गरम
बिडंग-कषाय में भिगो दे, जब तक कि छिलके में लगा मैल दूर न हो जाय तब
तक भिगो कर रखे । दोष निकलने पर इन तिलों को तुष रहित करके, सुखा
लेवे । फिर छाज से साफ़ करके धोले । फिर सूखने पर बिडंग कषाय में
इक्कीस बार भावना दे कर धूप में सुखा लेवे । इन तिलों को ऊखल में कूट
कर पत्थर की शिला पर रख बारीक पीस लेवे । अब इनको द्रोणी (थाली,
कड़ाही) में रखकर विडंग कषाय को थोड़ा थोड़ा डालते हुए हाथों से खूब
मले, इस प्रकार हाथों से मलने पर जो तैल निकलता है, हाथ पर लगे हुए
उस तैल को ले कर पवित्र, दृढ़ घड़े में रखकर गुप्त स्थान में सुरक्षित रख देवे ।
इस को खाने के लिये कहे ।
अथ 'आहार' इति ब्रूयात्-तिल्वकोदालकयोर्द्वौ बिल्वमात्रौ पिण्डौ
श्लक्ष्णपिष्टौ विडङ्गकषायेण, ततोऽर्धमात्रौ श्यामात्रिवृतोस्ततोऽर्धमात्रौ
दन्तीद्रवन्त्योरतोऽर्धमात्रौ चव्यचित्रकयोरित्येतं सम्भारं विडङ्गकषा-
यस्याऽऽढकमात्रेण प्रतिसंसृज्य ततस्तैलप्रस्थमावाप्य सर्वमालोड्य महति
पयोगे समासिच्याग्नावधिश्रित्य महत्यासने सुखोपविष्टः सर्वतः स्नेह-

मवलोकयन्नजस्रं मृद्वग्निना साधयेद्दर्व्या सतत मवघट्टयन् । स यदा
जानीयाद्विरमति शब्दः, प्रशाम्यति च फेनः, प्रसादमापद्यते स्नेहो
यथास्वं गन्धवर्णरसोत्पत्तिः, संवर्तते च भेषजमंगुलिभ्यां मृद्यमानमति-
मृदुनतिदारुणमनंगुलिप्राद्दि चेति, स कालस्तस्यावतारणाय । ततस्तम-
वतीर्णशीतीभूत महतेन वाससा परिपूय शुचौ दृढे कलशे समासिच्य
पिधानेन पिधाय शुक्लेन बद्धपट्टेनावच्छाद्य सूत्रेण सुबद्धं सुनिगुप्तं
निधापयेत् । ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत्पानाय, तेन साधु विरिच्यते,
सम्यगपहृतदोषस्य चास्याऽऽनुपूर्वी यथोक्ता । ततश्चैनमनुवासयेदनु-
वासनकाले ।

फिर वैद्य आगे कहे पदार्थ लाने को कहे—तिल्वक और उद्दालक
ये दो बिल्व भर (पल भर, ४ तोला) लेकर विडंग कषाय के साथ खूब बारीक
पीस ले । इनसे आधी मात्रा (२ तोला) श्यामा (काली निशोथ) और त्रिवृत्
(सफेद निशोथ), इन से आधी (१ तोला) दन्ती और द्रवन्ती, इनसे आधे (½
तोला) चव्य और चित्रक इन सबको अर्धाढक (दो प्रस्थ) विडंग कषाय, में तथा
एक प्रस्थ पूर्वोक्त तिलों से तैयार किये तैल के साथ मिलाकर एक बड़े कड़ाहे में
रख कर आग पर रख कर आराम से बैठ कर, चारों ओर स्नेह को देखते हुए
कि गिरे नहीं, निरन्तर मृदु अग्नि से पकावे । और पकाते समय कड़छी द्वारा
बराबर हिलाता रहे। जिस समय शब्द होना बन्द हो जाय, झाग उठना भी
रुक जाय, तथा स्नेह (तैल) भी स्वच्छ हो जावे, एवं तैल में उचित गन्ध,
वर्ण और रस की उत्पत्ति हो जाय तब समझे कि तैल बन गया । औषध
(कल्क) अंगुली से मलने पर न तो बहुत कोमल और न बहुत कठोर हो
तथा अंगुली पर चिपटे नहीं, (कल्क की बत्ती बन जावे)। तब समझ ले कि
तैल सिद्ध हो गया यह समय है, तैल उतारने का; अब इसको उतार कर ठण्डा
होने पर बड़े भारी वस्त्र से छान कर एक शुद्ध, मजबूत पात्र में डाल कर,
ढक्कन से टांप कर, सफेद वस्त्र से बांध कर तागे से कस कर, गुप्त (सुरक्षित)
स्थान पर रख देवे । इस तैल की मात्रा को रोग के अनुसार पीने के लिये
(कृमि-रोगी को) देवे। इससे भली प्रकार विरेचन होता है। दोषों के भली
प्रकार निकल जाने पर पहिले कही विधि करनी चाहिये। अनुवासन योग्य समय
में उस तैल से अनुवासन देना चाहिये ।

एतेनैव च पाकविधिना सर्षपातसी-करञ्ज-कोषातकी-स्नेहानुपकल्प्य
पाययेत्सर्वविशेषानवेक्ष्यमाणः। तेनागदो भवतीति ॥ २७ ॥

५५४ चरकसंहिता [ अ० ७
इसी पूर्वोक्त विधि से सरसो, अलसी, करञ्ज, कोषातकी ( तुरई ) का तैल
बना कर सब परीक्षणीय वस्तुओं को देख कर कृमि-रोगी को तैल पिलावे। इस
से रोगी नीरोग हो जाता है ॥ २७ ॥
इत्येतत् द्वयानां श्लेष्मपुरीषसंभवानां कृमीणां समुत्थान-संस्थान-
स्थान-वर्ण-नाम-प्रभाव-चिकित्सित-विशेषा व्याख्याताः सामान्यतः ॥२८॥
इस प्रकार से कफजन्य और पुरीषजन्य कृमियों के निदान, संस्थान,
स्थान, वर्ण, प्रभाव और चिकित्सा सामान्य रूप में कह दी है ॥ २८ ॥
विशेषतस्त्वल्पमात्रमास्थापनानुवासनानुलोमहरणभूयिष्ठं तेष्वौष-
धेषु पुरीषजानां कृमीणां चिकित्सितं कार्यमिति । मात्राधिकं पुनः
शिरोविरेचन-वमनोपशमन-भूयिष्ठं तेष्वेवौषधेषु श्लेष्मजानां कृमीणां
चिकित्सितं कार्यमिति । एष कृमिघ्नो भेषजविधिरनुव्याख्यातो
भवतीति ॥ २९ ॥
विशेष रूप से पुरीषजन्य कृमियों के लिये कही हुई वमन, विरेचन, आस्था-
पन, अनुवासन, शिरोविरेचन, ओषधियों में अल्पमात्रा में आस्थापन, अनुवा-
सन और अनुलोम-हरण, विरेचन बरतना चाहिये। मलजन्य कृमियों में बस्ति,
विरेचन अधिक बरतना चाहिये। कफजन्य कृमियों में शिरोविरेचन, वमन
और शमन अधिक देना चाहिये ॥ २९ ॥
तमनुतिष्ठता यथास्वहेतुवर्जने प्रयत्नितव्यम् ॥ ३० ॥
यथोद्देशमेवमिदं कृमिकोष्ठचिकित्सितं यथावदनुव्याख्यातं
भवतीति ॥ ३१ ॥
इस विधि को बरतते हुए वैद्य को चाहिये कि रोगी को कृमि निदान से भी
बचाये। इस प्रकार से पूर्व कथितानुसार कृमि-कोष्ठ चिकित्सा ( शोधन-शमन
रूप ) को यथावत् पूर्ण रूप से कह दिया है ॥ ३०-३१ ॥
भवन्ति चात्र—अपकर्षणमेवाऽऽदौ कृमीणां भेषजं स्मृतम्।
ततो विघातः प्रकृतेर्निदानस्य च वर्जनम् ॥ ३२ ॥
अयमेव विकाराणां सर्वेषामपि निग्रहे।
विधिर्दृष्टस्त्रिधा योऽयं कृमीनूद्दिश्य कीर्तितः ॥ ३३ ॥
संशोधनं संशमनं निदानस्य च वर्जनम्।
एतावद्भिषजा कार्यं रोगे रोगे यथाविधि ॥ ३४ ॥
कृमियों को प्रथम खींच कर निकालना ही औषध है। फिर प्रकृति
का नाश, निदान का छोड़ना है यह विधि सब प्रकार के कृमियों के लिये है।
इतना ही नहीं, अपितु सब रोगों के लिये है। इसलिये वैद्य को चाहिये कि

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५५५

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५५५
प्रत्येक रोग में सब विकारों में संशोधन, संशमन और निदान का त्याग यह
तीन प्रकार की चिकित्सा करे ॥ ३२-३४ ॥
तत्र श्लोकौ—व्याधितौ पुरुषौ ज्ञाज्ञौ भिषजौ सप्रयोजनौ ।
विशतिः कृमयस्तेषां हेत्वादिः सप्तको गणः ॥ ३५ ॥
उक्तो व्याधितरूपीये विमाने परमर्षिणा ।
शिष्यसंबोधनार्थं च व्याधिप्रशमनाय च ॥ ३६ ॥
व्याधि से पीड़ित दो प्रकार के पुरुष विज्ञ (जानने वाले) और अज्ञ
(मूढ), इनका प्रयोजन (जानने बाल से सिद्धि और मूढ से रोगवृद्धि या
मृत्यु), बीस प्रकार के कृमि, इन के हेतु, संस्थान वर्ण, प्रभाव, नाम और
चिकित्सा ये सात बातें, भगवान् आत्रेय ने शिष्य को समझाने के लिये तथा
रोग की शान्ति के लिये इस विमान स्थान में कह दी हैं ॥ ३५-३६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने
व्याधितरूपीयविमानं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः।
अथातो रोगभिषग्जितीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इस के आगे 'रोगभिषग्जितीय' नामक अध्याय को व्याख्यान करेंगे।
जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
बुद्धिमानात्मनः कार्यगुरुलाघवे कर्मफलमनुबन्धं देशकालौ च
विदित्वा युक्तिदर्शनाद् भिषग्बुभूषुः शास्त्रमेवाऽऽदितः परीक्षेत । विवि-
धानि हि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके । तत्र यन्मन्येत सुमहद्यश-
स्विधीरपुरुषासेवितमर्थबहुलमाप्तजनपूजितं त्रिविधशिष्यबुद्धिहितमप-
गतपुनरुक्तदोषमार्षं सुप्रणीतसूत्रभाष्यसंग्रहक्रमं स्वाधारमनवपतित-
शब्दमकष्टशब्दं पुष्कलाभिधानं क्रमागतार्थमर्थतत्त्वविनिश्चयप्रधानं
संगतार्थमसंकुलप्रकरणमाशुप्रबोधकं लक्षणवच्चोदाहरणवच्च, तदभिप्रप-
द्येत शास्त्रम् । शास्त्रं ह्येवंविधममल इवाऽऽदित्यस्तमो विधूय प्रकाशयति
सर्वम् ॥ ३ ॥
शास्त्र-परीक्षा—बुद्धिमान् पुरुष अपने कार्य के गौरव (बहुत प्रयास से
साध्य) एवं लाघव (अल्प प्रयास से साध्य), कर्मों के फल, अनुबन्ध

५५६ चरकसंहिता [अ० ८
(कर्मजन्य शुभ-अशुभ फल), देश एवं काल को जान कर तथा युक्ति को
देख कर यदि वैद्य बनने की इच्छा करे तो सब से प्रथम शास्त्र की ही परीक्षा
करे, क्योंकि वैद्यों के नाना प्रकार के शास्त्र लोक में प्रचलित हैं। इन में से
जो शास्त्र निम्नलिखित गुणों वाला हो, उसे पढ़ने के लिये स्वीकार करे।
शास्त्र के गुण—शास्त्र खूब बड़ा, असंक्षिप्त, यशस्वी, धीर पुरुषों से उप-
सेवित, माननीय, थोड़े से शब्दों में बहुत अर्थ को बतलाने वाला, आप्त जनों
से अनुमत (निर्दोष), उत्तम, मध्यम और अधम इन तीन प्रकार के शिष्यों
की तीनों प्रकार की बुद्धि के लिये योग्य, सब जिस को समझ सकें, पुनरुक्ति
दोष से रहित, ऋषियों से बनाया, सुप्रीत (अच्छी प्रकार ग्रथित किया हो),
जिस में सूत्र (संक्षेप में अर्थों का ग्रहण) भाष्य (विस्तार से वर्णन), और
प्रतिपाद्य विषयों को क्रम से कहा हो, सुन्दर अधिकरणों वाली, ग्राम्य
शब्दों से रहित, कठिन दुर्बोध या बोलने में कठिन शब्दों से रहित, भली
प्रकार से बहुत तत्त्व बतलाने वाला, (क्रम से उद्देश्य क्रम से अर्थों को
बतलाने वाला), वस्तुतत्त्व को सन्देह से रहित, निश्चित तत्त्व को बतलाने
वाला, संगतियुक्त अर्थों को बतलाने वाला, अव्यवस्थित, बेमेल मिले
हुए प्रकरणों से रहित; सुनते ही स्पष्ट अर्थज्ञान कराने वाला,
लक्षण और उदाहरण वाला हो, ऐसा शास्त्र अध्ययन के लिये चुनना चाहिये।
क्योंकि जिस प्रकार बादल आदि से रहित, निर्मल सूर्य अन्धकार को दूर करके
सब पदार्थों को प्रकाशित कर देता है उसी प्रकार शास्त्र अज्ञान को दूर करके
सब अर्थ-तत्त्व को प्रकाशित कर देता है ॥ ३ ॥
ततोऽनन्तरमाचार्यं परीक्षेत। तद्यथा—पर्यवदातश्रुतं परिदृष्टक-
र्माणं दक्षं दक्षिगं शुचिं जितहस्तमुपकरणवन्तं सर्वेन्द्रियोपपन्नं प्रकृ-
तिज्ञं प्रतिपत्तिज्ञमनुपस्कृतविद्यमनहङ्कृतमनसूयकमकोपनं क्लेशक्षमं
शिष्यवत्सलमध्यापकं ज्ञापनसमर्थं चेति। एवंगुणो ह्याचार्यः सुक्षेत्रमा-
र्तवो मेघ इव सस्यगुणैः सुशिष्यमाशु वैद्यगुणैः संपादयति ॥ ४ ॥
आचार्य का लक्षण—शास्त्र की परीक्षा करने के अनन्तर आचार्य की परीक्षा
करे। यथा-वह निर्मल शास्त्रज्ञान से सम्पन्न हो, जिसने कर्म को उचित रीति
से देखा हो, केवल शास्त्र ही न पढ़ा हो, प्रत्युत वह कर्म में कुशल, शुचि
(पवित्र), शस्त्र आदि क्रिया में वशी, सिद्धहस्त, नाना उपयोगी उपकरणों
वाला सब इन्द्रियों से युक्त, रोगी की प्रकृति को पहिचानने वाला, उत्तम सूझ
वाला, रोगों की चिकित्सा को समझने वाला, अन्य शास्त्रों के ज्ञान से प्रकट
स्वच्छ विद्या वाला, अभिमान से रहित, गुणों में दोष न देखने वाला, क्रोध-

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५५७

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५५७
रहित क्लेश सहन करने वाला, शिष्य से प्रेम-भाव रखने वाला, शास्त्र के तत्त्व
को बतलाने में समर्थ आचार्य होना चाहिये । जिस प्रकार ठीक ऋतु अनुसार
बरसा हुआ मेघ उत्तम क्षेत्र को धान्यों से सम्पन्न कर देता है उसी प्रकार उक्त
गुणों वाला आचार्य शिष्य को निर्मल ज्ञान आदि वैद्य के गुणों से शीघ्र सम्पन्न
कर देता है ॥ ४ ॥
तमुपसृत्यारिराधयिषुरुपचरेदग्निवच्च देववच्च राजवच्च पितृवच्च
भर्तृवच्चाप्रमत्तः । ततस्तत्प्रसादात्कृत्स्नं शास्त्रमधिगम्य, शास्त्रस्य दृढ-
तायामभिधानसौष्ठवेऽर्थस्य विज्ञाने वचनशक्तौ च भूयो भूयः प्रयतेत
सम्यक् ॥ ५ ॥
उपरोक्त गुणों वाले आचार्य के पास जाकर सेवा करने की इच्छा से शिष्य
अग्नि, देव, राजा, माता, पिता और स्वामी के समान प्रमादरहित होकर उस
की सेवा करे । तब उस की प्रसन्नता से सम्पूर्ण शास्त्र को जान कर शास्त्र
को दृढ़ करने में, शास्त्र को उत्तम रीति से प्रवचन करने में, शास्त्र के अर्थ
जानने में और वाक्-चातुर्य ( बोलने की पटुता प्राप्त करने ) में लगातार
भली प्रकार से प्रयत्न करे ॥ ५ ॥
तत्रोपाया व्याख्यास्यन्ते—अध्ययनमध्यापनं तद्विद्यसंभाषा
चेत्युपायाः ॥ ६ ॥
शास्त्र को दृढ़ करने आदि के उपायों का वर्णन करते हैं । वे उपाय ये
हैं—( १ ) अध्ययन ( पढ़ना ), ( २ ) अध्यापन ( पढ़ाना ) और ( ३ )
उस विद्या के विद्वानों से वार्तालाप करना ॥ ६ ॥
तत्रायमध्ययनविधिः—कल्यः कृतक्षणः प्रातरुत्थायोपव्यूषं वा कृत्वाऽऽ-
वश्यकमपस्पृश्योदकं देव-गो-ब्राह्मण-गुरु-वृद्ध-सिद्धाचार्येभ्यो नम-
स्कृत्य समे शुचौ देशे सुखोपविष्टो मनःपुरःसरीभिर्वाग्भिः सूत्रमनुपरि-
क्रामन्पुनःपुनरावर्तयेद् बुद्ध्या सम्यगनुप्रविश्यार्थतत्त्वं स्वदोषपरिहार-
परदोषप्रमाणार्थम् । एवं मध्यन्दिनेऽपराह्ने रात्रौ च शश्वदपरिहापयन्न-
ध्ययनमभ्यस्येदित्यध्ययनविधिः ॥ ७ ॥
इस शास्त्र की अध्ययन विधि यह है—नीरोग, समय में, नियम-पूर्वक
प्रातःकाल उषःकाल में उठ कर शौचादि आवश्यक कर्मों को करके, पानी का
आचमन स्नान आदि जलकार्य करे, पीछे देव, परमेश्वर ऋषि, गौ, ब्राह्मण,
गुरु, वृद्ध, सिद्ध एवं आचार्य इनको नमस्कार करके समान ( न ऊंचे और न
नीचे ) एवं पवित्र स्थान पर सुखपूर्वक बैठकर मनोयोग पूर्वक वाणी से बार-
बार सूत्रों का उच्चारण करता हुआ खूब समझ कर, अर्थ-तत्त्व में बुद्धि द्वारा

५५८ चरकसंहिता [अ० ८
प्रवेश करके, ( भली प्रकार समझ कर ) अपने अध्ययन के दोष को त्यागने
और दूसरे के अध्ययन के दोषों के ज्ञान लिये एकान्त में बैठ कर अध्ययन करे।
इस प्रकार से मध्याह्न और रात्रि में निरन्तर अध्ययन ( किसी दिन को भी बिना
त्याग किये, ) प्रतिषिद्ध दिनों को छोड़कर, अभ्यास करे ॥ ७ ॥
अथाध्यापनविधिः—अध्यापने कृतबुद्धिराचार्यः शिष्यमादितः
परीक्षेत । तद्यथा—प्रशान्तमार्यप्रकृतिमक्षुद्रकर्माणमृजुचक्षुर्मुखनासा-
वंशं तनुरक्तविशदजिह्वमविकृतदन्तौष्ठममिन्मिणं धृतिमन्तममहङ्कृतिं
मेधाविनं वितर्कस्मृतिसंपन्नमुदारसत्त्वं तद्विद्यकुलजमथवा तद्विद्यवृत्तं
तत्त्वाभिनिवेशिनमव्यङ्गमव्यापन्नेन्द्रियं निभृतमनुद्धतवेशमन्यसनिनं
शील-शौचाचारानुराग-दाक्ष्य-प्रादक्षिण्योपपन्नमव्यसनाभिकाममर्थवि-
ज्ञाने कर्मदर्शने चानन्यकार्यमलुब्धमनलसं सर्वभूतहितेषिणमाचार्य सर्वा-
नुशिष्टप्रतिकरमनुरक्तमेवंगुणसमुदितमध्याप्यमेवमाहुः ।
अब अध्यापन-विधि कहते हैं—पढ़ाने की इच्छा करने वाले आचार्य को
सबसे प्रथम शिष्य की परीक्षा करनी चाहिये। यथा—शिष्य सौम्य आकृति,
शान्त, नीच स्वभाव से रहित, कमीने स्वभाव का न हो, नीच कर्म न करने
वाला, सरल मुख, आँख और नासिका वाला, पतली लाल वर्ण, स्पष्ट जिह्वा
वाला, दांत और ओष्ठों के विकार से रहित, नाक से अनुनासिक न बोलने वाला,
संतोषी या धैर्यवान्, अहंकार रहित, मेधावी, वितर्क ( ऊहापोह ) स्मृति
(याददास्त) से युक्त, उदारचित्त वाला, वैद्यकुल में या वैद्य वृत्ति करने वाले माता
पिता से उत्पन्न, वैद्य के समान आचार वाला, तत्त्व के ग्रहण में दत्तचित्त,
अविकल अंगो वाला, सम्पूर्ण इन्द्रियों से युक्त, निभृत ( विनीत ), अनुद्धत,
अर्थ-तत्त्व को विचारने वाला, अक्रोधी, व्यसनरहित, शील ( सच्चरित्रता ) शौच
( शुद्धि ) आचार, अनुराग ( पढ़ने से स्नेह ) रखने वाला, दक्षता, प्रादक्षिण्‍य
सर्वत्र अनुकूलता इन गुणों से युक्त, कर्म दर्शन और अर्थ के जानने में अन्य
कर्म रहित, दत्तचित्त लोभरहित, अप्रमादी, सब प्राणियों में मंगल कामना करने
वाला, आचार्य के सब उपदेशों को यथावत् करने वाला और भक्तिमान् हो;
इन गुणों से युक्त शिष्य को पढ़ाना चाहिये । ( इन गुणों से रहित शिष्य को
पढ़ाने में आचार्य को भी यश नहीं मिलता ।)
एवंविधमध्ययनार्थमुपस्थितमारिराधयिषुमाचार्यश्चानुभाषेत—
अथोदगयने शुक्लपक्षे प्रशस्तेऽहनि तिष्य-हस्त-श्रवणाश्वयुजामन्यतमेन
नक्षत्रेण योगमुपगते भगवति शशिनि कल्याणे; कल्याणे च करणे मैत्रे
मुहूर्ते मुण्डः स्नातः कृतोपवासः कषायवस्त्रसंवीतः समिधोऽग्निमाज्य-

मुपलेपनमुदकुम्भांश्चगन्धहस्तो माल्य-दाम-प्रदीप-हिरण्य-हेम-रजत-मणि-
मुक्ता-विद्रुम-क्षौम-परिधि-कुश-लाज-सर्षपाक्षतांश्च शुक्लांश्च सुमनसोप्रथि-
ताप्रथितांश्च मेध्यांश्च भक्ष्यान् गन्धांश्च घृष्टानादायोपतिष्ठस्वेति । अथ
सोऽपि तथा कुर्यात् ॥ ८ ॥
इन उपरोक्त गुणों से युक्त अध्ययनार्थ शिष्य के सेवा में उपस्थित होने पर
आचार्य उसे कहे—कि "तू उत्तरायण ( माघ आदिके शुक्ल पक्ष में, प्रशस्त दिव्य
उत्तम तिथि, बार से युक्त दिन में, तिष्य, हस्त, श्रवण, अश्विनी इनमें से किसी
एक नक्षत्र के साथ कल्याणकारी करण और सुखप्रद मुहूर्त्त के अनुकूल होने
पर, मुण्डन करा, उपवास और स्नान करके, कषाय वस्त्र धारण करके, हाथों में
सुगन्ध ( धूप ) , समिधा, अग्नि, घी, उपलेपन ( चन्दन आदि ), जल के घड़े,
माला, हार, स्वर्ण, रजत, मोती, प्रवाल ( मूँगा ), क्षौम ( रेशम ), हवनकुण्ड
के चारों पाश्र्वों में रखने योग्य हस्तप्रमाण के पलाशदि समिधा, कुशा, लाजा,
सरसों, अक्षत, श्वेत, गुंथे और ग्रन्थन रहित ( छुटे, अनबिधे ) पुष्प-माला,
पवित्र खाद्य पदार्थ ( तिल से बने लड्डू आदि ), घिसे हुई चन्दन, आदि
सुगन्धों को लेकर उपस्थित हो।"
वह शिष्य उसी प्रकार से करे ॥ ८ ॥
तमपस्थितमाज्ञाय शुभे शुचौ देशे प्राक्प्रवणे उदक्प्रवणे वा चतु-
ष्किष्कुमात्रं चतुरस्रं स्थण्डिलं गोमयादकेनोपलिप्तं कुशास्तीर्णं सुपरिहितं
परिधिभिश्चतुर्दिशंयथोक्त-चन्दनोदक-कुम्भ-क्षौम-हेम-हिरण्य-रजत-मणि-
मुक्ता-विद्रुमालङ्कृतं मेध्य-भक्ष्य-गन्ध-शुक्ल-पुष्प-लाज-सर्षपाक्षतोपशो-
भितं कृत्वा, तत्र पालाशीभिरैङ्गुदीभीर्माधुकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमा-
धाय प्राङ्मुखः शुचिरध्ययनार्थाधमनुविधाय मधुसर्पिर्भ्यां त्रिस्त्रिर्जुहु-
यादग्निमाशीःसंप्रयुक्तैर्मन्त्रैर्ब्रह्माणमग्निं धन्वन्तरिं प्रजापतिमश्विनाव-
न्द्रमृषींश्च सूत्रकारानभिमन्त्रयमाणः पूर्वं स्वाहेति ॥ ९ ॥
दीक्षा—जिस समय अध्ययनार्थी शिष्य समिधा आदि वस्तुओं को लेकर
आचार्य के पास उपस्थित हो उस समय एक समान एवं पवित्र स्थान में
पूर्व या उत्तर दिशा में चार हाथ प्रमाण चौकोर जगह को गोबर और पानी
से लेप कर इस पर कुशा बिछा दे । इसके चारों ओर से भली प्रकार वेष्टित
कर दे । इसके चारों ओर चन्दन, पानी के घड़े, रेशम, स्वर्ण, चांदी, मणि,
मुक्ता, मूँगा आदि पवित्र भक्ष्य, गन्ध, श्वेतपुष्प, लाजा, सरसों, अक्षत आदि
वस्तुएं सजा देवे । इसमें पलाश ( ढाक ), इंगुदी ( हिंगोट ), गूलर,

५६० चरकसंहिता [ अ० ८
महुए आदि किसी एक वृक्ष की समिधाओं से अग्नि प्रज्वलित करके पवित्र
एवं पूर्वमुख बैठ कर अध्ययन विधि ( वेदारम्भ विधि ) के अनुकूल आशीर्वाद
में प्रयुक्त मन्त्रों द्वारा ब्राह्मण, अग्नि, धन्वन्तरि, प्रजापति, दो अश्वी, इन्द्र,
और सूत्रकार ऋषियों ( भरद्वाज आदि ) को पहिले मन्त्रों से आह्वान करके
स्वाहा शब्द के साथ मधु ( शहद ) और घी प्रत्येक से तीन तीन बार
आहुति दे ॥ ६ ॥
शिष्यश्चैनमन्वालभेत, हुत्वा च प्रदक्षिणमग्निमनुपरिक्रामेत् ।
ततोऽनुपरिक्रम्य ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयेत्, भिषजश्चाभिपूजयेत् ॥ १०॥
आचार्य के होम कर चुकने पर पीछे शिष्य भी होम करे । हवन करके
अग्नि की तीन परिक्रमा करे । पीछे ब्राह्मणों की परिक्रमा करके स्वस्तिवाचन
करे और वैद्यों की पूजा करे ॥ १० ॥
अथैनमग्निसकाशे ब्राह्मणसकाशे भिषक्सकाशे चानुशिष्यात्—
ब्रह्मचारिणा श्मश्रुधारिणा सत्यवादिनाऽमांसादेन मेध्यसेविना निर्म-
त्सरेणाशस्त्रधारिणा च भवितव्यं, न च ते मद्वचनात्किंचिदकार्यं
स्यादन्यत्र राजद्विष्टात्प्राणहराद्विपुलादधर्म्यादनर्थसंप्रयुक्ताद्वाऽप्यर्थात्
मदर्पणेन मत्प्रधानेन मदधीनेन मत्प्रियहितानुवर्तिना च शश्वद्
भवितव्यं, पुत्रवद्दासवर्द्धर्थिवच्चोपचरताऽनुवस्तव्योऽहमनुत्सुकेनावहिते-
नानन्यमनसा विनीतेनावेक्ष्यकारिणाऽनसूयकेन, न चानभ्यनुज्ञातेन
प्रविचरितव्यं, अनुज्ञातेन प्रविचरता पूर्वं गुर्वर्थोपान्वाहरणे यथा-
शक्ति प्रयतितव्यं, कर्मसिद्धिमर्थसिद्धिं यशोलाभं प्रेत्य च स्वर्गमि-
च्छता त्वया गोब्राह्मणमादौ कृत्वा सर्वप्राणभृतां शर्म्माऽऽशासितव्यम-
हरहरुत्तिष्ठता चोपविशता च, सर्वात्मना चाऽऽतुराणामारोग्यं प्रयति-
तव्यं, जीवितहेतोरपि चाऽऽतुरेभ्यो नाभिद्रोग्धव्यं, मनसाऽपि च पर-
स्त्रियो नाभिगमनीयास्तथा सर्वमेव परस्वं, निभृतवेशपरिच्छदेन
भवितव्यमशौण्डेनापापेनापापसहायेन च श्लक्ष्ण-शुक्ल-धर्म्य-धन्य-सत्य-
शर्म्म-हित-मित-वचसा देशकालविचारिणा स्मृतिमत्ता ज्ञानोत्थानोपक-
रणसंपत्सु नित्यं यत्नवता, नच कदाचिद्राजद्विष्टानां राजद्वेषिणां वा
महाजनद्विष्टानां महाजनद्वेषिणां वाऽप्यौषधमनुविधातव्यं तथा सर्वे-
षामत्यर्थ-विकृत-दुष्ट-दुःख-शीलाचारोपचाराणामनपवादप्रतीकाराणां
मुमूर्षूणां च तथैवासंन्निहितेश्वराणां स्त्रीणामनध्यक्षाणां वा, नच कदा-
चित्स्त्रीदत्तमामिषमादातव्यमननुज्ञातं भर्त्राऽथवाऽध्यक्षेण, आतुर-
कुलं चानुप्रविशता त्वया विदितेनानुमतप्रवेशिना सार्धं पुरुषेण

अ० ८ ] ३६ विमानस्थानम् ५६१

अ० ८ ] ३६ विमानस्थानम् ५६१

सुसंवीतेनावाक्शिरसा स्मृतिमतो स्तिमितेनावेक्ष्यावेक्ष्य मनसा सर्व-
माचरता बुद्ध्या सम्यगनुप्रवेष्टव्यं, अनुप्रविश्य च वाङ्मनोबुद्धीन्द्रि-
याणि न क्वचित्प्रणिधातव्यान्यन्यत्राऽऽतुरादातुरोपकारार्थाद्वाऽऽतुरगतेष्व-
न्येषु वा भावेषु, न चाऽऽतुरकुलप्रवृत्तयो बहिर्निश्चारयितव्याः, हसितं
चाऽऽयुषः प्रमाणमातुरस्य न वर्णयितव्यं जानताऽपि तत्र यत्रोच्यमा-
नमातुरस्यान्यस्य वाऽप्युपघाताय संपद्यते, विज्ञानवताऽपि च नात्यर्थ-
मात्मानो ज्ञाने विकत्थितव्यं, आप्तादपि हि विकत्थमानादित्यर्थमुद्वि-
जन्त्यनेके ॥ ११ ॥

आचार्य का शिष्य को उपदेश—इसके अनन्तर आचार्य उस शिष्य को
अग्नि, ब्राह्मण और वैद्यों के समक्ष (इनके साक्षि रूप में) निम्न उपदेश देवे ।
तुझको ब्रह्मचारी, श्मश्रुधारी, सत्यवादी, पवित्रभोजी, मात्सर्यरहित, निरामिष-
भोजी, निःशस्त्र होकर रहना चाहिये। तुझको मेरी आज्ञा से ही सब कुछ करना
चाहिये, परन्तु राजविरुद्ध, प्राणनाशक, बहुत बड़ा अधर्म या अनर्थ का काम
हो तो वह काम मेरी आज्ञा से भी नहीं करना चाहिये। तुझको मुझको अर्पण
करके, मेरी प्रधानता से, मेरे अधीन रह कर, मेरे प्रिय और मेरे हितकारी रह
कर सदा बरतना चाहिये। पुत्र पिता की, भृत्य स्वामी को, अर्थी धनी की
जिस प्रकार से सेवा करते हैं, वैसे तुझे मेरी सेवा करनी चाहिये। उत्सुकता-
रहित, दत्तचित्त, सावधान, एकाग्र मन से, नम्र होकर, बार २ देख कर कार्य
करना चाहिये। तुझे निन्दा से रहित और मेरी आज्ञा से विचरना-घूमना
चाहिये। मेरी आज्ञा से या बिना मेरी आज्ञा के घूमने पर भी तुझे प्रथम मुझ
गुरु के लिये अर्थ (धन) लाने का प्रयत्न करना चाहिये। चिकित्सा कर्म में
सफलता, धनप्राप्ति, यश-लाभ और परलोक में स्वर्ग की कामना से तुझे गो-
ब्राह्मण का प्रथम संस्कार कर अन्य सब प्राणियों की मंगल कामना करना
चाहिये। प्रति दिन उठते-बैठते, जागते सब अवस्थाओ में, सब समय में,
सम्पूर्णरूप से रोगियों के कल्याण के लिये यत्नवान् रहना चाहिये (रोगी को
दुःखित करके जीविका नहीं कमानी चाहिये)। मन से भी पर स्त्री की चाह न
करनी चाहिये। इसी प्रकार दूसरे के धन को मन से भी नहीं चाहना चाहिये।
विनीत (नम्र वेश) वस्त्रों वाला होना चाहिये (उद्धत वेश नहीं पहिनना
चाहिये)। प्रमाद रहित, स्वयं पापरहित, तथा पापकर्म में साथी
नहीं होना चाहिये। कोमल, निर्दोष, धर्मानुकूल, सुखकारक, सत्य, हितकारी,
परिमित वाणी बोलने वाला तथा, देशकाल को विचार कर काम करने वाला,

१६२ चरकसंहिता [ अ० ८
स्मृतिमान् होना चाहिये। ज्ञान और अभ्युदय के उपकरणों को प्राप्त करने में
सदा यत्नवान् रहना चाहिये। राजा जिनसे द्वेष करता है, अथवा जो राजा से
द्वेष करते हैं, महाजन (बड़े आदमी), जिनसे द्वेष करते हैं, अथवा जो महाजनों
से द्वेष करते हैं, उनकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार जिनके
शील (स्वभाव) और आचार अत्यन्त निकृष्ट और दुष्ट हों, अल्पवाद, प्रतिकार,
धनरहित (जनपदोद्ध्वंस में कहे हुए) लोगों की तथा मरणोन्मुख रोगियों की
चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार जिन स्त्रियों का पति अथवा संरक्षक
पास में न हो, उन की भी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। स्त्रियों से दिये धन
को पति या संरक्षक के पूछे बिना कभी भी ग्रहण नहीं करना चाहिये, (उनकी
आज्ञा से ही ग्रहण करना चाहिये)। रोगी के घर जाते समय चेतावनी देकर,
आज्ञा मिलने पर दूसरे पुरुष के साथ उत्तम विनम्र वेश को पहिने हुए शिर
को नीचे किये जाना चाहिये। जाते समय स्मृतिमान्, स्थिर मन से भली
प्रकार-सोच विचार कर जो कुछ करना हो, भली प्रकार से घर में पहुंच कर
करना चाहिये। घर में जा कर रोगी के उपकार के सिवाय रोगी से सम्बन्धित
अथवा चिकित्सा से अतिरिक्त अन्य स्थानों में वाणी, मन, बुद्धि और इन्द्रियों
को नहीं लगाना चाहिये। रोगी के घर के रहस्यों को बाहर नहीं करना चाहिये।
जहाँ पर कहने से किसी अन्य प्राणी के मरने की सम्भावना हो, वहाँ पर
मरणोन्मुख लक्षणों से रोगी की आयु का क्षय जानने पर भी नहीं कहना
चाहिये। ज्ञानवान् होने पर भी अपने ज्ञान की प्रशंसा नहीं करनी चाहिये,
क्योकि सत्यभाषी, आप्त, विद्वान् होकर भी अपने मुख से अपनी प्रशंसा करने
वाले से अनेक लोग बहुत उद्विग्न हो जाते हैं ॥ १३ ॥
न चैव ह्यस्ति सुतरमायुर्वेदस्य पारं, तस्मादप्रमत्तः शश्वदभियो-
गमस्मिन् गच्छेत्। एतच्च कार्यं, एवं भूयश्च वृत्तसौष्ठवमनसूयता
परेभ्योऽप्यागमयितव्यं, कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमतामाचार्यः। शत्रुश्चा-
बुद्धिमताम्, अतश्चाभिसमीक्ष्य बुद्धिमताऽमित्रस्यापि धन्यं यशस्यमा-
युष्यं पौष्टिकं लोकमभ्युपदिशतो वचः श्रोतव्यमनुविधातव्यं चेति।१४।
आयुर्वेद ज्ञान की कहीं पर समाप्ति नहीं है। इसलिये इस आयुर्वेद के ज्ञान
उपलब्ध करने में सदा प्रमादरहित होकर निरन्तर मनोयोग देवे। यहाँ कहे
हुए कार्य सम्पूर्ण रूप से करने चाहिये। इस प्रकार करते हुए निन्दारहित होकर
दूसरे लोगों से भी (शास्त्र के सिवाय) अन्य ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। क्योंकि
बुद्धिमानों का सम्पूर्ण संसार आचार्यवत् है और मूर्खों का वह शत्रु है। अतः