चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १ ] सूत्रस्थानम् २१ है (२) सौवर्चल ( संचल ), (३) (विड) काला नमक, (४) ( औद्भिद ) काच नमक और (५) सामुद्र, समुद्र के पानी से तैयार किया हुआ, ये पांच प्रकार के लवण या नमक हैं॥ ८८ ॥ लवणों के कर्म - स्निग्धान्युष्णानि तीक्ष्णानि दीपनीयतमानि च ॥ ८९ ॥ आलेपनार्थे युज्यन्ते स्नेहस्वेदविधिषु तथा । अधोभागोर्ध्वभागेषु निरूहेष्वनुवासने ॥ ९० ॥ अभ्यञ्जने भोजनार्थे शिरसश्च विरेचने । शस्त्रकर्मणि वस्त्यर्थमञ्जनोत्सादनेषु च ॥ ९१ ॥ अजीर्णानाहवार्तेषु गुल्मे शूले तथोदरे । उक्तानि लवणानि, ऊर्ध्वं मूत्राण्यष्टौ निबोध मे ॥ ९२ ॥ ये नमक स्निग्ध, उष्ण, तीक्ष्ण और दीपनीय अर्थात् विशेष रूप से अग्नि बढ़ानेवाले हैं। ये नमक आलेपन में, स्नेहन में, और स्वेदन कार्य में, अधोभाग- विरेचन और ऊर्ध्व-विरेचन द्वारा दोषों को बाहर निकालने में, निरूहण में, अनु- वासन में, अभ्यङ्ग में, भोजन में, और शिर के विरेचन में, शस्त्र कर्म में, वर्त्ति अर्थात् फल वर्त्ति आदि में, अञ्जन में, उबटन में, अजीर्ण में, अफारे में, वायु रोग में, गुल्म में, शूल रोग में, और उदर रोगों में प्रयोग किये जाते हैं। ये पांचों प्रकार के नमक कह दिये ॥ ८९-९२ ॥ आठ मूत्र— मुख्यानि यानि ह्यष्टानि सर्याण्यात्रेयशासने । अविमूत्रमजामूत्रं गोमूत्रं माहिषं तथा ॥ ९३ ॥ हस्तिमूत्रमथोष्ट्रस्य हयस्य च खरस्य च । अब जो मुख्य आठ मूत्र आत्रेय ऋषि ने कहे हैं वे सुनिये— (१) भेड़ का मूत्र, (२) बकरी का मूत्र, (३) गाय का मूत्र, (४) भैंस का मूत्र, (५) हाथी का मूत्र, (६) ऊँट का मूत्र, (७) घोड़े का मूत्र और (८) गधे का मूत्र ये आठ प्रकार के मूत्र हैं१ ॥ ९३ ॥ मूत्रों के सामान्य गुण— उष्णं तीक्ष्णमथो रूक्षं कटुकं लवणान्वितम् ॥ ९४ ॥ मूत्रमुत्सादने युक्तं युक्तमालेपनेषु च । १. गोऽजाविमहिषीणां तु स्त्रीणां मूत्रं प्रशस्यते । खरोष्ट्रेभनराश्वानां पुंसां मूत्रं हितं स्मृतम्॥” भावप्रकाश ।
२२ चरकसंहिता [ अ० १ युक्तमास्थापने मूत्रं युक्तं चापि विरेचने ॥ ९५ ॥ स्वेदेष्वपि च तद्युक्तमानाहेष्वगदेषु च । उदरेष्वथ चार्शःसु गुल्मकुष्ठकिलासिपु ॥ ९६ ॥ तद्युक्तमुपनाहेषु परिषेके तथैव च । दीपनीयं विषघ्नं च क्रिमिघ्नं चोपद्दिश्यते ॥ ९७ ॥ पाण्डुरोगोपसृष्टानामुत्तमं सर्वथोच्यते । श्लेष्माणं शमयेत्पीतं मारुतं चानुलोमयेत् ॥ ९८ ॥ कर्षेत्पित्तमधोभागमित्यस्मिन् गुणसंग्रहः । सामान्येन मयोक्तस्तु, पृथक्त्वेन प्रवक्ष्यते ॥ ९९ ॥ ये आठों प्रकार के मूत्र गरम, तीक्ष्ण, रूखे, कटु रस, और लवण रस से युक्त हैं। आठों प्रकार के मूत्र उत्सादन में, आलेपन में, प्रलेपन में, आस्थापन में निरूह में, विरेचन में, स्वेदन में, नाडीस्वेद में, आनाह अर्थात् अफारे में, अगद अर्थात् विषनाशक औषधियों में प्रयुक्त होते हैं। उदर रोगों में, अर्श रोग में, गुल्म, कुष्ठ (कोढ़) और किलास (कुष्ठ का भेद), उपनाह, पुल्टीस आदि में, परिषेक अर्थात् सेचन कार्य में, प्रयुक्त होते हैं। ये मूत्र (दीपन) अग्निदीपक, (विषघ्न) विषनाशक, और (क्रिमिघ्न) कृमि- नाशक कहे जाते हैं। ये पाण्डु रोगियों के लिये पान, आहार और भेषज आदि कल्पना में उत्तम, हितकारी हैं। पिया हुआ मूत्र श्लेष्मा (कफ) को शमन करता है, वायुको अनुलोमन करता है, और पित्त को अधोमार्ग में खींचता है, पित्त का विरेचन करता है। ये आठों मूत्रोंके सामान्य से गुण कह दिये हैं ॥९५-९९॥ आठों मूत्रोंमें से एक एक के जो पृथक् २ गुण हैं वह आगे कहे जाते हैं— अविमूत्रं सतिक्तं स्यात्स्निग्धं पित्ताविरोधि च । आजं कषायमधुरं पथ्यं दोषांस्त्रिहन्ति च ॥ १०० ॥ गव्यं समधुरं किंचिद्दोषघ्नं क्रिमिकुष्ठनुत् । कण्डूलं शमयेत्पीतं सम्यग्दोषोदरे हितम् ॥ १०१ ॥ अर्शःशोफोदरघ्नं तु सक्षारं माहिषं सरम् ! हास्तिकं लवणं मूत्रं हितं तु क्रिमिकुष्ठिनाम् ॥ १०२ ॥ प्रशस्तं बद्धविण्मूत्रविषश्लेष्मामयार्शसाम् । सतिक्तं श्वासकासघ्नमर्शोघ्नं चौष्ट्रमुच्यते ॥ १०३ ॥ वाजिनां तिक्तकटुकं कुष्ठव्रणविषापहम् । खरमूत्रमपस्मारोन्मादग्रहविनाशनम् ॥ १०४ ॥
अ० १ ] सूत्रस्थानम् २३
अ० १ ] सूत्रस्थानम् २३ १. भेड़ का मूत्र थोड़ा तिक्त, स्निग्ध एवं पित्त का अविरोधी है, वह न तो पित्त को बढ़ाता है, और न पित्त को शमन करता है । २. बकरी का मूत्र कषाय और मधुर रस, शोथों के लिये हितकारी है, और त्रिदोषनाशक है । ३. गाय का मूत्र कुछ मधुर, दोषनाशक, कृमि, और कुष्ठ का नाशक है । इसके पीने से खाज शमन होती है, एवं वात आदि से उत्पन्न पेट के रोगों में हितकर है । ४. भैंस का मूत्र बवासीर, शोथ, और उदर रोगों को नाश करने वाला, थोड़ा खारा और मलभेदक है । ५. हाथी का मूत्र नमकीन, कृमि और कुष्ठ रोग वाले पुरुषों के लिये हितकारी है । अवरुद्ध मल और मूत्र रोग अलसक रोग, विष रोग, श्लेष्म जन्य रोगों और बवासीर में श्रेष्ठ है । ६. ऊँट का मूत्र थोड़ा तिक्त, श्वास, कास और अर्श रोग का नाशक है । ७. घोड़ों का मूत्र तिक्त और कटु, कुष्ठ, विष और व्रण का नाशक है । ८. गधे का मूत्र अपस्मार, (मृगी, हिस्टीरिया) उन्माद आदि (पागल- पन ) का नाशक है ॥ १००-१०४ ॥ आठ प्रकार के दूध— इतीहोक्तानि मूत्राणि यथासामर्थ्ययोगतः । अतः क्षीराणि वक्ष्यन्ते कर्म चैषां गुणाश्च ये ॥ १०५ ॥ अविशीरमजाक्षीरं गोक्षीरं माहिषं च यत् । उष्ट्रीणामथ नागीनां वडवायाः स्त्रियास्तथा ॥ १०६ ॥ इस प्रकार से इस शास्त्र में सामान्य और विशेष दोनों प्रकार से यथा- सामर्थ्य अर्थात् मूत्रों की जैसी जैसी शक्ति है, वैसे गुण कह दिये हैं । अब आठ प्रकार के दूध, इन के कर्म और गुण भी कहे जाते हैं:— १. भेड़ का, २. बकरी का, ३. गाय का, ४. भैंस का, ५. ऊँटनी का, ६. हथिनो का, ७. घोड़ी का और ८. स्त्रियों का दूध ॥१०५-१०६॥ सब दूधों के सामान्य गुण— प्रायशो मधुरं स्निग्धं शीतं स्तन्यं पयः स्मृतम् । प्रीणनं बृंहणं वृष्यं मेध्यं बल्यं मनस्करम् ॥ १०७ ॥ जीवनीयं श्रमहरं श्वासकासनिबर्हणम् । हन्ति शोणितपित्तं च संधानं विहतस्य च ॥ १०८ ॥ सर्वप्राणभृतां सात्म्यं शमनं शोधनं तथा ।
तृष्णाघ्नं दीपनीयं च श्रेष्ठं क्षीणक्षतेषु च ॥ १०६ ॥ पाण्डुरोगेऽम्लपित्ते च शोषे गुल्मे तथोदरे । अतीसारे ज्वरे दाहे श्वयथौ च विधीयते ॥ ११० ॥ योनिशुक्रप्रदोषेषु मूत्रेषु प्रदरेषु च । पुरीषे ग्रथिते पथ्यं वातपित्तविकारिणाम् ॥ १११ ॥ सब दूध प्रायः १ मधुर रस, स्निग्ध, शीत, (स्तन्य) दूध बढ़ाने वाले, (प्रीणन) पुष्टि देने वाले, (बृंहण) शरीर को बढ़ाने वाले; (वृष्य) वीर्य- वर्धक, (मेध्य) बुद्धि के लिये हितकारी, (बल्य) शरीर को बल देने वाले, (मनस्कर) मन को प्रसन्न करने वाले, (जीवनीय) जीवन के लिये हितकारी, (श्रमहर) थकावट को मिटाने वाले, श्वास और कास (कफ, कास को छोड़- कर शेष समस्त कासों को) मिटाने वाले हैं। दूध रक्त पित्त को नाश करता और टूटे हुए को जोड़ने वाला है, सब प्राणियों के लिये सात्म्य दोषों को शमन अर्थात् स्वस्थान में स्थित दोषों को शान्त करने वाला है, प्यास को नाश करने वाला, अग्नि वर्धक, क्षीण और क्षत रोगियों के लिये हितकारी, पाण्डु रोग वातपित्त, शोष, गुल्म, उदर अतीसार ज्वर (जीर्ण ज्वर), दाह, (श्वयथु) शोथ रोग में विशेष करके पथ्य है। योनि रोगों में, शुक्र दोषों में, मूत्रकृच्छ्र रोग में, मलावरोध में; पथ्य और हितकारी है। वह वात-पित्त रोगियों के लिये भी पथ्य है ॥ १०७-१११॥ दूध के कर्म कहते हैं:— नस्यालेपावगाहेषु वमनास्थापनेषु च । विरेचने स्नेहने च पयः सर्वत्र युज्यते ॥ ११२ ॥ यथाक्रमं क्षीरगुणानेकैकस्य पृथक्पृथक् । अन्नपानादिकेऽध्याये भूयो वक्ष्याम्यशेषतः ॥ ११३ ॥ यह दूध नस्य कर्म में, अवगाहन क्रिया में, आलेपन में, वमन में, आस्था- पन में, बस्ति में, विरेचन में, स्नेह कर्म में, सब स्थानों पर रसायन अर्थात् वाजीकरण आदि में भी प्रयुक्त होता है। यहां पर आठों प्रकार के दूधों के गुण-कर्म सामान्य रूप में कह दिये हैं। आगे 'अन्न पान विधि' नामक अध्याय (सूत्रस्थान अ० २७) में क्रमानुसार प्रत्येक दूध के गुण-कर्म पृथक् पृथक् सम्पूर्ण रूप से कहेंगे ॥११२-११३॥ अथापरे त्रयो वृक्षाः पृथग्ये फलमूलिभिः । १ प्रायः शब्द से ऊँटनी के दूध का निषेध है। ऊँटनी का दूध नमकीन है।
अ० १ ] सूत्रस्थानम् २५
अ० १ ] सूत्रस्थानम् २५ स्नुह्यर्काश्मन्तकास्तेषामिदं कर्म पृथक्पृथक् ॥ ११४ ॥ वमनेऽश्मन्तकं विद्यात्स्नुहीक्षीरं विरेचने । क्षीरमर्कस्य विज्ञेयं वमने सविरेचने ॥ ११५ ॥ अब शोधन के लिये कहे हुए छः वृक्षों में तीन का दूध और तीन की त्वचा ग्रहण की जाती है । इनमें प्रथम दूधवाले तीन वृक्ष फलिनी और मूलिनी वनस्पतियों से पृथक् हैं, उन के नाम १. स्नुही (थोर); २. अर्क (आक) और ३. अश्मन्तक हैं । अश्मन्तक का दूध वमन के लिये; स्नुही का दूध विरेचन के लिये और आक का दूध वमन और विरेचन दोनों कार्यों के लिये जानना चाहिये * ॥ ११४-११५ ॥ इमांस्त्रीनपरान् वृक्षानाहुर्येषां हितास्त्वचः । पूतीकः कृष्णगन्धा च तिल्वकश्च तथा तरुः ॥ ११६ ॥ विरेचने प्रयोक्तव्यः पूतीकस्तिल्वकस्तथा । कृष्णगन्धा परिसर्पे शोथेऽर्शःसु चोच्यते ॥ ११७ ॥ दद्रुविद्रधिगण्डेषु कुष्ठेष्वप्यलजीषु च । षड्वृक्षाञ्छोधनानेतानपि विद्याद्विचक्षणः ॥ ११८ ॥ दूसरे-शेष तीन वृक्ष हैं-जिनकी त्वचा हितकारी है । उन वृक्षों के नाम— पूतीक (करंज), कृष्णगन्धा और तिल्वक (लोध्र) हैं। इन में करंज और लोध्र वृक्ष की छाल विरेचन कार्य में प्रयुक्त होती है, और कृष्णगन्धा की छाल परिसर्प (वीसर्प, एक्ज़ीमा, त्वग् रोग में), शोथ, अर्श रोग, दद्रु (दाद), विद्रधि, गण्डमाला, कुष्ठ और अलजी नामक नाना रोगों में प्रयुक्त होती है । शिरोविरेचन में इसका प्रयोग रोग-भिषग्जितीय अध्याय (विमानस्थान अ० ८) में कहेंगे ॥ ११६-११८ ॥ इन ऊपर कहे हुए छः वृक्षों को शोधनकारक जाने । उपसंहार— इत्युक्ताः फलमूलिन्यः स्नेहाश्च लवणानि च । मूत्रं क्षीराणि वृक्षाश्च षड्ये दृष्टाः पयस्त्वचः ॥ ११९ ॥ फलिनी १६, मूलिनी १६, स्नेह ४, लवण ५, मूत्र ८, दूध ८, और शोधन वृक्ष ६, जिनके दूध और त्वचा काम में आते हैं वे कह दिये हैं ॥११९ ॥
- अश्मन्तक के समान कार्य करने वाला वृक्ष अष्टा है जो महाराष्ट्रों में होता है, इसका दूध वामक है ।
२६ चरकसंहिता [ अ० १ ओषधीर्नामरूपाभ्यां जानते ह्यजपा वने । अविपाश्चैव गोपाश्च ये चान्ये वनवासिनः ॥ १२० ॥ बकरियां चराने वाले, भेंड़े चराने वाले, गौवें चराने वाले और अन्य तपस्वी या भील आदि जो कि जंगल में रहते हैं ये लोग ओषधियों को नाम रूप और आकृति से पहिचानते हैं ॥ १२० ॥ न नामज्ञानमात्रेण रूपज्ञानेन वा पुनः । ओषधीनां परां प्राप्तिं कश्चिद्वेदितुमर्हति ॥ १२१ ॥ योगवित्त्वामरूपज्ञस्तासां तत्त्वविदुच्यते । किं पुनर्यो विजानीयादोषधीः सर्वथा भिषक् ॥ १२२ ॥ योगमासां तु यो विद्याद्देशकालोपपादितम् । पुरुषं पुरुषं वीक्ष्य स विज्ञेयो भिषक्तमः ॥ १२३ ॥ ओषधियों के नाम जान लेने मात्र से, अथवा रूप से पहिचान लेने से भी कोई ओषधि के सम्यक् प्रयोग को नहीं जान सकता । इसीलिये शास्त्र में इनका वर्णन किया जाता है । जो वैद्य ओषधियों को नाम, रूप, और उनके योग और प्रयोगों सहित जानता है, वह तो तत्त्ववित् है ही, जो वैद्य ओषधियों को सभी प्रकार से समझता है; उसके लिये कहना ही क्या ? और जो व्यक्ति प्रत्येक पुरुष के बल, शरीर, आहार, सार, सात्म्य, सत्त्व प्रकृति और वयस का विचार करके देश, काल, मात्रा के अनुसार ओषधि को जानता है वह वैद्यों में श्रेष्ठ है ॥१२१-१२३॥ न जानी हुई औषधियों से हानियाँ- यथा विषं यथा शस्त्रं यथाग्निरशनिर्यथा । तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतं यथा ॥ १२४ ॥ औषधं ह्यनभिज्ञातं नामरूपगुणैस्त्रिभिः । विज्ञातमपि दुर्युक्तमनर्थायोपपद्यते ॥ १२५ ॥ जिस प्रकार न जाना हुआ ( मूढ़ आदमी से प्रयुक्त किया हुआ ) विष, जिस प्रकार शस्त्र, जिस प्रकार अग्नि और जिस प्रकार अशनि ( वज्र ) या ( बिजली ) मृत्यु के कारण बनते हैं, उसी प्रकार नाम रूप गुण से न जानी हुई औषधि भी मृत्यु का कारण हो सकता है और नामरूप और गुण से जानी हुई औषधि अमृत के समान है । नाम, रूप एवं गुण से न
अ० १ ] सूत्रस्थानम् २७
अ० १ ] सूत्रस्थानम् २७ जानी हुई औषध या जाना हुई भी देश काल आ.दे का विचार न करके देने से अनिष्ट के लिए होती है, वह भारी अनर्थ-उत्पन्न करती है ॥ १२४-१२५ ॥ योगादपि विषं तीक्ष्णमुत्तमं भेषजं भवेत् । भेषजं चापि दुर्युक्तं तीक्ष्णं संपद्यते विषम् ॥ १२६ ॥ तस्मान्न भिषजा युक्तं युक्तिबाह्येन भेषजम् । धीमता किञ्चिदादेयं जीबितारोग्यकाङ्क्षिणा ॥ १२७ ॥ तीक्ष्ण प्राणनाशक विष भी सम्यक् प्रकार से प्रयोग करने पर उत्तम औषध का कार्य करता है। औषध भी अनुचित प्रकार से प्रयोग करने पर तीक्ष्ण-प्राण नाशक विष-सा काम करती है। इसलिये अनुचित रूप में प्रयोग की जाने वाली ओषधि के विष के समान होने के कारण आयु एवं आरोग्य को चाहने वाले बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि, देश काल-मात्रा आदि का विचार न करके देने वाले मूढ वैद्य से दी हुई औषध को कभी ग्रहण न करे ॥ १२६-१२७ ॥ कुर्यान्निपतितो मूर्ध्नि सशेषं वासवाशनिः । सशेषमातुरं कुर्यान्न त्वज्ञमतमौषधम् ॥ १२८॥ इन्द्र के हाथ से छूटा हुआ वज्र यदि मनुष्य के सिर पर गिर पड़े तो उससे बचना सम्भव हो सकता है, परन्तु मूर्ख वैद्य से दी हुई औषधि रोगी को समाप्त ही कर डालती है, उससे बचना असम्भव है ॥ १२८ ॥ दुःखिताय शयानाय श्रद्दधानाय रोगिणे । यो भेषजमविज्ञाय प्राज्ञमानी प्रयच्छति ॥ १२९ । त्यक्तधर्मस्य पापस्य मृत्युभूतस्य दुर्मतेः । नरो नरकपाती स्यात्तस्य संभापणादपि ॥ १३० ॥ जो प्राज्ञमानी-अपने को बुद्धिमान् गिनने वाला वैद्य, औषध को न जान- कर दुःखी, अचेत पड़े, वैद्य में श्रद्धा करने वाले रोगी को औषध देता है, ऐसे धर्म को छोड़ देने वाले विश्वासघाती, मृत्यु के समान साक्षात् यम और दुर्मति, अज्ञ, मूढ़ वैद्य के साथ बोलने से भी मनुष्य नरकगामी होता है, फिर स्पर्श आदि से क्यों नहीं होगा ॥ १२६-१३० ॥ वरमाशीविषविषं कथितं ताम्रमेव वा । पीतमत्यग्निसंतप्ता भक्षिता वाऽप्ययोगुडाः ॥ १३१ ॥ न तु श्रुतवतां वेषं बिभ्रता शरणागतात् । गृहीतमन्नं पानं वा वित्तं वा रोगपीडितात् ॥ १३२ ॥
२८ चरकसंहिता [ अ० १ साँप का विष अथवा ताम्बे को उबाल कर पीना या आग में लाल किये हुए लोहे के गोले खा लेना, कहीं अधिक अच्छा है, परन्तु वैद्य का वेष पहिनकर शरण में आये हुए रोगी से, अन्न, पान अथवा धन ग्रहण करना अच्छा नहीं ॥ १३१-१३२ ॥ वैद्य को क्या करना चाहिये ? भिषग्बुभूषुर्मतिमानतः स्वगुणसंपदि । परं प्रयत्नमातिष्ठेत् प्राणदः स्याद्यथा नृणाम् ॥ १३३ ॥ इसलिये वैद्य बनने की इच्छा करने वाले, बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि, वैद्य के गुणों को प्राप्त करने में अत्यधिक प्रयत्न करे जिससे कि वह मनुष्यों के रोगों को दूर करके प्राण देने वाला सिद्ध हो १ ॥ १३३ ॥ तदेव युक्तं भैषज्यं यदारोग्याय कल्पते । स चैव भिषजां श्रेष्ठो रोगेभ्यो यः प्रमोचयेत् ॥ १३४ ॥ जो औषध रोग को शान्त करने में समर्थ है; वही ठीक प्रकार से प्रयुक्त की हुई औषध है और जो रोगों से रोगियों को मुक्त करे, वह ही वैद्यों में श्रेष्ठ वैद्य है ॥ १३४ ॥ सम्यक्प्रयोगं सर्वेषां सिद्धिराख्याति कर्मणाम् । सिद्धिराख्याति सर्वैश्च गुणैर्युक्तं भिषक्तमम् ॥ १३५ ॥ सब प्रकार के कर्मों की सिद्धि, सफलता, उन कर्मों के सम्यक् प्रयोग को बतलाती है। सफलता ही सब गुणों से युक्त वैद्य की श्रेष्ठता को भी बतलाती है । अर्थात् सफलता से ही वैद्य का नाम चमकता है । ॥ १३५ ॥ अध्याय का संग्रह -- तत्र श्लोकाः । आयुर्वेदागमो हेतुरागमस्य प्रवर्तनम् । सूत्रणस्याभ्यनुज्ञानमायुर्वेदस्य निर्णयः ॥ १३६ ॥ सम्पूर्णं कारणं कार्यमायुर्वेदप्रयोजनम् । हेतवश्चैव दोषाश्च भेषजं संग्रहेण च ॥ १३७ ॥ रसाः संप्रत्ययद्रव्यास्त्रिविधो द्रव्यसंग्रहः । मूलिन्यश्च फलिन्यश्च स्नेहाश्च लवणानि च ॥ १३८ ॥ मूत्रं क्षीराणि वृक्षाश्च षड्ये क्षीरत्वगाश्रयाः । कर्माणि चैषां सर्वेषां योगायोगगुणागुणाः ॥ १३९ ॥ १. वैद्यगुण-सम्पत्—श्रुतेः पर्य्यवदातत्वं बहुशो दृष्टकर्मता । दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम् ॥
अ० २ ] सूत्रस्थानम २६
अ० २ ] सूत्रस्थानम २६ वैद्यापवादो यन्त्रस्थाः सर्वे च भिषजां गुणाः । सर्वमेतत्समाख्यातं पूर्वाध्याये महर्षिणा ॥ १४० ॥ आयुर्वेद का मर्त्यलोक में आना, हेतु-रोगों का उत्पन्न होना, भरद्वाज मुनि द्वारा मर्त्यलोक में शास्त्रों का प्रचार, अग्निवेशादि का तन्त्र बनाना, अग्निवेशादि द्वारा बनाये हुए तन्त्रों के लिये ऋषियों से दी हुई आज्ञा, हिताहित आदि लक्षण रूप सामान्यादि छः कारण, कार्य्य-धातुओं को समान करना आयुर्वेद का प्रयोजन है, संक्षेप से रोगों के कारण, काल, बुद्धि, इन्द्रियार्थ का अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग हो; दोष वात, पित्त, कफ, इनकी औषध; आकाश आदि तीन, द्रव्य, जल और पृथिवी, इनके साथ, रसमधुर आदि, द्रव्यसंग्रह; शमन आदि; एवं जंगम आदि के भेद से, मूलिनां-हस्तिदन्ती आदि सोलह; फलिनी-शंखिनी आदि उन्नीस; स्नेह घी आदि चार, महास्नेह; लवण-सौवर्चल आदि पांच; मूत्र आठ; क्षीर आठ, दूध वाले वृक्ष, छाल वाले स्नुही, पूतीक आदि छः वृक्ष; इनके वमन-विरेचन आदि सब कर्म; औषध के सम्यक् योग से जो गुण और असम्यक् योग से जो दुर्गुण हैं; मूढ़ वैद्य की निन्दा और सब गुणों से युक्त वैद्य के लक्षण; यह सब इस प्रथम 'दीर्घञ्जीवितीय' नामक अध्याय में महर्षि भगवान् आत्रेय ने सम्यक् प्रकार से कह दिया है ॥१३६-१४०॥ इत्याग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने सभाभाष्ये भेषज- चतुष्के दीर्घञ्जीवितीयो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः अथातोऽपामार्गतण्डुलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ वमन आदि पांच कर्म स्वस्थ एवं रोगी दोनों व्यक्तियों के लिये उपयोगी हैं। इसलिये पूर्व अध्याय में कहे हुए वमन आदि के द्रव्यों को अन्य द्रव्यों के साथ मिला कर इस अध्याय का अवतरण करते हैं। अपामार्ग (चिरचिटा) के बीजों का तुष रहित करके, तण्डुल बना कर काम में लाना चाहिए, यह बताने के लिये 'अपामार्ग-तण्डुलीय' अध्याय है। अपामार्गस्य बीजानि पिप्पलीर्मरिचानि च । विडङ्गान्यथ शिग्रूणि सर्षपांस्तुम्बुरूणि च ॥ ३ ॥
३० चरकसंहिता [ अ० २ अजाजीं चाजगन्धां च पीलून्येलां हरेणुकाम् । पृथ्वीकां सुरसां श्वेतां कुठेरकफणिज्जकौ ॥ ४ ॥ शिरीषबीजं लशुनं हरिद्रे लवणद्वयम् । ज्योतिष्मतीं नागरं च दद्याच्छीर्षविरेचने ॥ ५ ॥ गौरवे शिरसः शूले पीनसेऽर्धावभेदके । क्रिमिव्याधावपस्मारे घ्राणनाशे प्रमोहके ॥ ६ ॥ अपामार्ग (चिरचिटे) के तण्डुल, पिप्पली, मरिच, वायविडंग, सहंजन के बीज, श्वेत सरसों, तेजबल के बीज, जीरा, अजमोदा (तिलवन), पीलू, एला (छोटी इलायची), हरेणु (रेणुका, मेंहदी के बीज), पृथ्वीका (कलौंजी), सुरसा (काली तुलसी), श्वेता (अपराजिता), कुठेरक (मरवा), फणिज्जक (तुलसी का भेद), शिरीष बीज (सिरस के बीज), लशुन (लहसन), दोनों हरिद्रा (हल्दी और दारु हल्दी), दोनों लवण (सैन्धव और सौवर्चल), ज्योतिष्मती (मालकंगनी), और नागर (सोंठ) ये शिरोविरेचन के लिये उपयोग में लानी चाहिये । इन उपरोक्त ओषधियों में 'श्वेता' और 'ज्योतिष्मती' ये दो द्रव्य 'मूलिनी' ओषधियों में गिने गये हैं। इसलिये इनका मूल ग्रहण करना चाहिये, और अपा- मार्ग (चिरचिटा) के तण्डुल उपयोग में लाने चाहिये । (गौरव) शिर के भारीपन में (शिरःशूल) शिर के दुखने में, (पीनस) नाक से दुर्गन्ध युक्त स्राव, कफ आता हो, (अर्द्धावभेदक) आधा शिर दुःखता हो, (कृमिव्याधि) कृमि जन्य शिरो रोग में, (अपस्मार) मृगी में, (घ्राण नाश) घ्राण शक्ति के नष्ट होने पर और (प्रमोहक) मूर्छा इन रोगों में शिरो विरेचन के रूप में प्रयोग करना चाहिये ॥ ३-६ ॥ वमनकारक द्रव्य— मदनं मधुकं निम्बं जीमूतं कृतवेधनम् । पिप्पलीकुटजेक्ष्वाकूण्येला धामार्गवाणि च ॥ ७ ॥ उपस्थिते श्लेष्मपित्ते व्याधावामाशयाश्रये । वमनार्थं प्रयुञ्जीत भिषग् देहमदूषयन् ॥ ८ ॥ मदन (मैनफल), मधुक (मुलहेठी), नीम (नीम की छाल), जीमूत (कडुवी तुरई), कृतबेधन (कडुवा तुम्बा), पिप्पली, कुटज (कुड़ा), इक्ष्वाकु (कडुवी घिया या आल), एला (छोटी इलायची) धामार्गव (तुरई
अ० २ ] सूत्रस्थानम् ३१
अ० २ ] सूत्रस्थानम् ३१
कडुवी ) ये दस वस्तुएँ कफपित्त जन्य व्याधि में अथवा आमाशय में आश्रित व्याधि की अवस्था में, शरीर को हानि किये बिना वैद्य वमन के लिये देवे । इनमें मदन, मधुक, जीमूत, कृतवेधन, कुटज, इक्ष्वाकु और धामार्गव इनका फल लेना चाहिये और पिप्पली इलायची का भी फल तथा नीम की छाल लेनी चाहिये ॥ ७-८ ॥ विरेचन द्रव्य— त्रिवृतां त्रिफलां दन्तीं नलिनीं सप्तलां वचाम् । कम्पिल्लकं गवाक्षीं च क्षीरिणीमुदकीर्यकाम् ॥ ९ ॥ पीलून्द्यारग्वधं द्राक्षां द्रवन्तीं निचुलानि च । पक्वाशयगते दोषे विरेकार्थं प्रयोजयेत् ॥ १० ॥ त्रिवृत ( निशोथ ) त्रिफला ( हरड, बहेड़ा, आंवला ), दन्ती ( जमाल- गोटा ), नीलिनी ( नील का मूल ), सप्तला ( शिकाकाई ), वच, कम्पिल्लक ( कमीला ), गवाक्षी ( इन्द्रायण ), क्षीरिणी ( दूधी ) उदकीर्य्या ( नाटा करञ्ज ), पीलू फल, आरग्वध ( अमलतास ), द्रवन्ती ( बड़ा जमाल गोटा ), निचुल ( हिज्जल फल ), ये वस्तुएं दोष के पक्वाशय में स्थित होने पर विरेचन के लिये देनी चाहिये ( शरीर में अन्यत्र स्थित होने पर नहीं ) । इन में त्रिवृत, नागदन्ती, सप्तला गवाक्षी, क्षीरिणी, और द्रवन्ती का मूल लेना चाहिये, और नलिनी, तथा वच का भी मूल और शेषों का फल ग्रहण करना चाहिये ॥ ९-१० ॥ आस्थापन और अनुवासन के द्रव्य— पाटलां चाग्निमन्थं च बिल्वं श्योनाकमेव च । काश्मर्यं शालपर्णीं च पृश्निपर्णीं निदिग्धिकाम् ॥ ११ ॥ बलां श्वदंष्ट्रां बृहतीमेरण्डं सपुनर्नवम् । यवान् कुलत्थान् कोलानि गुडूचीं मदनानि च ॥ १२ ॥ पलाशं कत्तृणं चैव स्नेहांश्च लवणानि च । उदावर्ते विबन्धेषु युञ्ज्यादास्थापने सदा । अत एवौषधगणात्संकल्प्यमनुवासनम् । मारुतघ्नमिति प्रोक्तः संग्रहः पाञ्चकर्मिकः ॥ १३ ॥ पाटला ( पाढल ), अग्निमन्य ( अरणी ), बिल्व ( बेल ), श्योनाक ( टेंटू, सोनापाठा ), काश्मरी ( गम्भारी ), शालपर्णी ( सलवन ), पृश्निपर्णी ( पोठा- पर्णी ), निदिग्धिका ( कटेरी, भटकटैया ), बला ( खरैंटी ), श्वदंष्ट्रा ( गोखरू)
३२ चरकसंहिता [ अ० २ बृहती ( बड़ी कटेरी ), एरण्ड ( एरण्डमूल ), पुनर्नवा ( सांठी घास ), यव ( जौ ), कुलत्थ ( कुलथी ), कोल (बेर), गुडूचा (गिलोय), मदन ( मैनफल ), पलाश (ढाक), कत्तृण ( रोहिष तृण ), स्नेह ( चारों स्नेह घी आदि ), लवण ( पांचों नमक ) ये उनतीस द्रव्य ( उदावर्त्त ) अपान वायु की ऊर्ध्व गति होने पर, विबन्ध मल मूत्र आदि के अवरोध में और आस्थापन नामक बस्ति कर्म में प्रयोग करने चाहिये। इन्हीं औषधियों से अनुवासन बस्ति बना कर वायु को नष्ट करने के लिये प्रयोग करनी चाहिये। यह संक्षेप में पंच कर्म ( वमन, विरे- चन, नस्य, आस्थापन और अनुवासन ) कह दिये हैं ॥ ११-१४ ॥ तान्युपस्थितदोषाणां स्नेहस्वेदोपपादनैः। पञ्च कर्माणि कुर्वीत मात्राकालौ विचारयन् ॥ १५ ॥ प्रवृत्त होने के लिये तैयार दोष वालों को स्नेहन और स्वेदन कराके, शरीर-बल की अपेक्षा से मात्रा और काल का विचार करके वैद्य पंच कर्मों को करावे ॥ १५ ॥ मात्रा और काल के विचार करने की आवश्यकता : मात्राकालाश्श्रया युक्तिः, सिद्धिर्युक्तौ प्रतिष्ठिता । तिष्ठत्युपरि युक्तिज्ञा द्रव्यज्ञानवतां सदा ॥ १६ ॥ पदार्थों की योजना मात्रा और काल पर अवलम्बित है। शरीरबल, अग्नि- बल, आयु, व्याधिबल, दोषबल आदि के अनुकूल मात्रा और विशेष समय में प्रयुक्त हुआ द्रव्य भली प्रकार अपने कार्य को कर सकता है ।¹ सिद्धि चिकि- त्सित क्रिया की सफलता युक्ति में आश्रित है । योजना का जानने वाला वैद्य द्रव्य-औषध को जानने वालों में से सदा श्रेष्ठ है। ऊपर स्वस्थ तथा आतुर पुरुषों के लिये पंच कर्मों का उपदेश कर चुके ॥ १६ ॥ रोगियों के लिये आहार विशेष यवागूः— अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि यवागूर्विविधौषधाः । विविधानां विकाराणां तत्साध्यानां निवृत्तये ॥ १७ ॥ इसके आगे यवागू से अच्छे होने वाले नाना प्रकार के रोगों के नाश के लिये नाना प्रकार की औषधियों से सिद्ध यवागू ( लप्सी ) कहेंगे ॥ १७ ॥ पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः । यवागूर्दीपनीया स्याच्छूलघ्नी चोपसाधिता ॥ १८ ॥ १. जिस प्रकार मृदु-विरेचक ओषधियां रात्रि को सोते समय लेने से उत्तम गुण करती हैं।
अ० २ ] ३ सूत्रस्थानम् ३३
चूंकि आरोग्य का मूल साधन कोष्ठाग्नि है, इस लिये सब से मुख्य वस्तु कोष्ठाग्नि है। अतः अग्नि को सन्दीपन करने के लिये यवागू कहते हैं, (१) पिप्पली, पिप्पली मूल (पीपला मूल), (चव्य) चविका, (चित्रक) चीता, सोंठ इन से बनाई हुई यवागू (दीपनी) अग्निवर्धक और शूलनाशक होती है ॥ १८ ॥ यवागू तीन प्रकार की है, १. यवागू जो छः गुने जल में पकती है, २. मण्ड चौदह गुने जल में और ३. विलेपी चार गुने जल में पकाई जाती है। दधित्थ-बिल्व-चाङ्गेरी-तक्र-दाडिम-साधिता । पाचनी ग्राहिणी पेया, सवाते पञ्चमूलिकी ॥ १९ ॥ (२) दधित्थ (कैथ), विल्व (बेलागरी-गूदा), चांगरी (चोपत्तिया), तक्र (छाछ), दाडम (अनारदाना) इन से बनाई हुई यवागू 'पाचनी' पाचन करने वाली 'ग्राहिणी' अर्थात् स्तम्भक वा मल को रोकने वाली है। (३) पंच मूल बृहत्पञ्चमूल-शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बड़ी कटेरी और गोखरू-यह पांच वातहर हैं इनसे साधित यवागू वातविकार के लिये उप- योगी है ॥ १६ ॥ शालपर्णी-बला-बिल्वैः पृश्निपर्ण्या च साधिता । दाडिमाम्ला हिता पेया पित्तश्लेष्मातिसारिणाम् ॥ २० ॥ (४) शालपर्णी (सालवन), बला (खरैंटी), बिल्व (बेलगिरी), और पृश्निपर्णी (पीतापर्णी) इन से बनाई तथा अनार के रस से खट्टी की हुई यवागू पित्त-श्लेष्म जन्य अतिसार रोग में हितकारी है ॥ २० ॥ पयस्यर्धोदके छागे ह्रीबेरोत्पलनागरैः । पेया रक्तातिसारघ्नी पृश्निपर्ण्या च साधिता ॥ २१ ॥ (५) बकरी का जितना दूध हो, उससे आधा पानी इस में मिला कर (मिलित परिमाण छः गुना), ह्रींबेर (नेत्रवाला), उत्पल (कमलगट्टा) और सोंठ, और पृष्ठपर्णी (पिठवन) ये एक कर्ष मात्रा लेकर यवागू सिद्ध करनी चाहिये। यह यवागू रक्तातिसार को नष्ट करती है ॥ २१ ॥ १. पिप्पली आदि सब साधन द्रव्य मिलकर एक कर्ष अर्थात् चार मासे लेने चाहिये। इसको थोड़ा कूट लेना चाहिये, पकाने में आधा पानी जलाना चाहिये, पानी की मात्रा के भेद से नाना भेद हो जाते हैं।
३४ चरकसंहिता [ अ० २
दद्यात्सातिविषां पेयां सामे साम्लां सनागराम् । श्वदंष्ट्राकण्टकारीभ्यां मूत्रकृच्छ्रे सफाणिताम् ॥ २२ ॥ (६) अतिविषा (अतीस), नागर (सोंठ) इनके कषाय अथवा कल्क से छः गुने जल में यवागू सिद्ध करे, इसे अनार के रस से खट्टी कर के आमा- तिसार (रक्तातिसार) में दे । (७) मूत्र कृच्छ्र रोग में श्वदंष्ट्रा (गोखरू) और कण्टकारी (कटेरी) इन के कषाय या कल्क से छः गुने जल में यवागू सिद्ध करके इस में फाणित (राब, आधा पका गुड़) डाल दे ॥ २२ ॥ विडङ्ग-पिप्पलीमूल-शिग्रुभिर्मरिचेन च । तक्रसिद्धा यवागूः स्यात्कृमिघ्नी ससुवर्चिका ॥ २३ ॥ (८) वायविडंग, पिप्पलीमूल, शिग्रु (सहजना) और मरिच इनके कल्क से छः गुने तक्र में सिद्ध की हुई यवागू में सुवर्चिका (सौंर्चल नमक) डालकर रोगी को देने से कृमि नष्ट होते हैं। यहाँ पानी के स्थान पर तक्र का प्रयोग करे ॥ मृद्वीका-सारिवा-लाजा-पिप्पली-मधुनागरैः । पिपासाघ्नी, विषघ्नी च सोमराजीविपाचिता ॥ २४ ॥ (६) मृद्वीका (द्राक्षा दाख) सारिवा (अनन्त मूल) लाजा (खीलें), पिप्पली, और सोंठ इन के कल्क या कषाय से यवागू को छः गुने जल में सिद्ध करे । ठण्डा होने पर इस में शहद मिला कर पीने से प्यास शान्त होती है । (१०) सोमराजी (बावची) से सिद्ध की हुई यवागू 'विषघ्नी' अर्थात् खाये हुए विष को नष्ट करने वाली है ॥ २४ ॥ सिद्धा वराहनियूहे यवागूर्बृंहणी मता । गवेधुकानां भृष्टानां कर्षणीया समाक्षिका ॥ २५ ॥ (११) सुअर के मांस रस में सिद्ध की हुई यवागू पुष्टि कारक होती है । (१२) भूने हुए गेहुओं के सत्तू से बनाई हुई यवागू में शहद मिला कर लेने से शरीर पतला होता है ॥ २५ ॥ सर्पिष्मती बहुतिला स्नेहनी लवणान्विता । कुशामलकनियूहे श्यामाकानां विरूक्षणी ॥ २६ ॥ (१३) घी वाली, तिलयुक्त नमकीन यवागू स्नेहकारक है। यह शरीर को स्निग्ध करती है। तिलों के साथ कुछ चावल मिला लें। यवागू सिद्ध करके फिर इस में घी और नमक मिलावें ।
अ० २ ] सूत्रस्थानम् ३५
अ० २ ] सूत्रस्थानम् ३५ ( १४ ) कुश ( दाभ ) की जड़ और आमलक ( आंवले का फल ) इनको एक २ कर्ष लेकर छः गुने जल में कषाय करे इसमें श्यामाक तण्डुल पाक कर के सिद्ध करनी चाहिये । यह पान करने योग्य यवागू शरीर में रूक्षता उत्पन्न करती है ॥ २६ ॥ दशमूलोभृता कास-हिक्का-श्वास-कफापहा । यमके मदिरासिद्धा पक्वाशयरुजापहा ॥ २७ ॥ ( १५ ) दशमूल ( शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बृहती, गोखरू, बिल्व, श्योनाक, अरणी, गम्भारी, पाठा ) से सिद्ध की हुई यवागू कास, हिक्का, श्वास और कफ को नष्ट करती है । ( १६ ) यमक अर्थात् समान भाग घी और तैल लेकर इन में भूनी हुई एवं पानी के स्थान पर मदिरा लेकर उनमें सिद्ध की हुई यवागू ( मदिरा मिलाकर देने से ) पक्वाशय की पीड़ा को मिटाती है १ ॥ २७ ॥ शाकैर्मासैस्तिलैर्माषैः सिद्धा वर्चो निरस्यति । जम्बवाम्रास्थि-दधित्थाम्ल-बिल्वैः सांग्राहिकी मता ॥ २८ ॥ ( १७ ) 'शाक' ( हरी सब्जियाँ ) मांस, तिल, माष ( उड़द ) इन के कल्क और कषाय से सिद्ध की हुई यवागू मल को बाहर निकालती है । ( १८ ) जम्बु-अस्थि ( जामुन की गुठली ) आम्रास्थि ( आम की गुठली की गिरी ) दधित्थाम्ल ( कैथ कच्चा, खट्टी अवस्था में ), बिल्व ( बेलगिरी कच्चे हरे ), इनसे सिद्ध की हुई यवागू 'स्तम्भक' है ॥ २८ ॥ क्षार-चित्रक-हिङ्ग्वम्ल-वेतसैर्भेदिनी मता । अभया-पिप्पलीमूल-विश्वैर्वातानुलोमनी ॥ २६ ॥ ( १६ ) क्षार ( जवाखार २ ), चित्रक ( चीतामूल ), हींग, अम्लवेतस (अमलवेत), इन से सिद्ध की हुई यवागू मल को भेदन करके बाहर निकालती है । ( २० ) अभया ( जंगी हरड़ ), पीपल मूल और विश्व ( सोंठ ) इन से १ 'यमक' एक भाग घी और एक भाग तैल परस्पर समान और एक भाग मदिरा लेनी चाहिये । अथवा मूंग की दाल और सांठी के चावल परस्पर समान भाग मिलाकर मदिरा में यवागू सिद्ध करनी चाहिये । ( जल्प कल्प-तरु ) २. जवाखार बनाने के लिये हरे जवों को आग में स्वच्छ स्थान में जला लेना चाहिये । फिर इस को पानी में घोलकर वस्त्र में से छान लेना चाहिये । छाने हुए पदार्थ को आग पर गरम करके शुष्क कर लेना चाहिये ।
३६ चरकसंहिता [ अ० २ सिद्ध की हुई यवागू वात का अनुलोमन अर्थात् कफ वातादि दोषों का परिपाक करके मल को अच्छी प्रकार से बाहर करती है ॥ २६ ॥ तक्रसिद्धा यवागूः स्याद् घृतव्यापत्तिनाशिनी। तैलव्यापदि शस्ता तु तक्रपिण्याकसाधिता ॥ ३० ॥ (२१) छाछ में सिद्ध की हुई यवागू घी के अधिक खाने से उत्पन्न विकार को नष्ट करती है । (२२) छाछ और पिण्याक (खल) से सिद्ध की हुई यवागू तैल के अधिक खाने से उत्पन्न व्याधि में देने योग्य है ॥ ३० ॥ गव्यमांसरसैः साम्ला विषमज्वरनाशिनी । कण्ठ्या यवानां यमके पिप्पल्यामलकैः शृता ॥ ३१ ॥ (२३) गाय के मांस के रस में सिद्ध की हुई यवागू को अनार, आंवला आदि ज्वर नाशक खटाई से खट्टा करके देने पर विषम ज्वर नष्ट होता है । (२४) जौ को समान भाग लेकर घी और तैल में भूनकर पिप्पली और आंवले इनके कषाय या कल्क से सिद्ध की हुई यवागू कण्ठ के रोगों के लिये हितकर है ॥ ३१ ॥ ताम्रचूड़रसे सिद्धा रेतोमार्गरुजापहा । समाषत्रिदला वृष्या घृतक्षीरोपसाधिता ॥ ३२ ॥ (२५) 'ताम्रचूड़' अर्थात् कुक्कुट के मांस के रस में सिद्ध की हुई यवागू शुक्र मार्ग की पीड़ा को मिटाती है। (२६) जल के स्थान पर दूध और घृत यथापरिमाण में लेकर उनमें उड़द की दाल या इसकी पिसी हुई पिट्ठी को पहिले घी में भूनकर दूध में यवागू सिद्ध करनी चाहिये । यह शुक्रवर्धक है ॥ ३२ ॥ उपोदिकादधिभ्यां तु सिद्धा मदविनाशिनी । क्षुधं हन्यादपामार्गक्षीरगोधारसै शृता ॥ ३३ ॥ (२७) उपोदिका अर्थात् पोई को कल्क रूप में तथा दही को पानी के स्थान में लेकर यवागू सिद्ध करनी चाहिये । यह यवागू धतूरे आदि के विष को नष्ट करती है । पोई और दही से सिद्ध की यवागू मद नाशक है । (२८) चिरचिटे के चावलों को दूध और गोह के मांस में पकाकर यवागू सिद्ध करे । इस से भूख का नाश होता है। यहां पर जल वा सादे चावल नहीं प्रयुक्त होते ॥ ३३ ॥
अ० ३ सूत्रस्थानम् ३७
अ० ३ सूत्रस्थानम् ३७ उपसंहार— तत्र श्लोकाः । अष्टाविंशतिरित्येता यवाग्वः परिकीर्तिताः । पञ्चकर्माणि चाश्रित्य प्रोक्ता भैषज्यसंग्रहः ॥ ३४ । पूर्वं मूलफलज्ञानहेतोरुक्तं यदौषधम् । पञ्चकर्माश्रयज्ञानहेतोस्तत्कीर्तितं पुनः ॥ ३५ ॥ इस अध्याय में अट्ठाईस प्रकार की यवागू कह दी हैं और पंच कर्म (वमन, विरेचन, नस्य, आस्थापन और अनुवासन) इन के योग्य ओषधियां भी कह दी हैं। मूलिनी, फलनी आदि का ज्ञान कराने के लिये जो औषधियां प्रथम अध्याय में कही हैं, वे औषधियां पंचकर्मों में आद्य व्याधियों में उपयुक्त हैं, इसलिये यहां पर फिर लिखी हैं ॥ ३४-३५ ॥ स्मृतिमान् युक्तिहेतुज्ञो जितात्मा प्रतिपत्तिमान् । भिषगौषधसंयोगैश्चिकित्सां कर्तुमर्हति ॥ ३६ ॥ (स्मृतिमान्) स्मरण शक्ति वाला, (हेतुज्ञ) रोग के कारण का जानने वाला, (युक्तिज्ञ) योजना, व्याधि के साधन रूप भैषज्य की कल्पना को जानने वाला, अथवा मात्रा की भांति द्रव्य, व्याधि बल और व्याधि रूप को जानने वाला, (जितात्मा) भ्रम-प्रमाद रहित, (प्रतिपत्तिमान्) उत्तम सूझ वाला, वैद्य औषधियों के योग से उपचार करने में समर्थ हो सकता है ॥ ३६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने सभाषाभाष्ये भेषज- चतुष्केऽपामार्गतण्डुलीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ अथ तृतीयोऽध्यायः । अथात आरग्वधीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ रोगों की हितकामना से यवागू कहकर उसी प्रसंग में प्रदेह चूर्ण आदि कहते हैं। इसके लिये 'आरग्वधीय' नामक तीसरे अध्याय का व्याख्यान करते हैं ऐसा भगवान् आत्रेय कहते हैं। इस अध्याय का आरम्भ 'आरग्वध' से हुआ है, इसलिये इस अध्याय का नाम आरग्वधीय है ॥१-२॥
३८ चरकसंहिता [ अ० ३ आरग्वधः सैडगजः करञ्जो वासा गुडूची मदनं हरिद्रे । श्याह्वः सुराह्वः खदिरो धवश्च निम्बो विडङ्गं करवीरकत्वक् ॥३॥ ग्रन्थिश्च भौर्जो लशुनः शिरीषः सलोमशो गुग्गुलुकृष्णगन्धे । फणिज्जको वत्सकसप्तपर्णौ पीलूनि कुष्ठं सुमनःप्रवालाः ॥४॥ वचा हरेणुस्त्रिवृता निकुम्भो भल्लातकं गैरिकमञ्जनञ्च । मनःशिलाले गृहधूम एला काशीसलोध्रार्जुनमुस्तसर्जाः ॥ ५ ॥ इत्यर्धरूपैर्विहिताः षडेते गोपित्तपीताः पुनरेव पिष्टाः । सिद्धाः परं सर्षपतैलयुक्ताश्चूर्णप्रदेहा भिषजा प्रयोज्याः ॥ ६ ॥ कुष्ठानि कृच्छ्राणि नवं किलासं सुरेन्द्रलुप्तं किटिभं सदद्रु । भगन्दराशांस्यपचीं सपामां हन्युः प्रयुक्तास्त्वचिरान्नराणाम् ॥ ७ ॥ 'आरग्वध' से लेकर 'सर्ज' इस शब्द तक तीन श्लोकों में कहे हुए छः योग हैं, इनको गाय के पित्त में पीस कर काम में लाना चाहिये । यथा— (१) आरग्वध (अमलतास), ऐडगज (पनवाड़), करञ्ज ( नाटा करंज ), वासा (वासे के पत्ते), गुडूची (गिलोय), मदन ( मैनफल ), दो हरिद्रा ( हल्दी और दारु हल्दी ) । ( २ ) श्याह्व ( गन्दा विरांजा ), सुरा ( देवदार ), खदिर ( खैर ), और धव ( धावन ), निम्ब ( नीम के पत्ते ), विडंग ( बायविडंग ), करवीरत्वक् ( कनेर की छाल ) यह दूसरा । ( ३ ) भोजपत्र की गाठें, लशुन ( लहसन ), शिरीष (सिरस की छाल), लोमशा ( जटामांसी ), गूगल, कृष्ण- गन्धा ( सहजना ) यह तीसरा । ( ४ ) फणिज्जक ( मरवा ) वत्सक (इन्द्र जौ) सप्तपर्ण ( सातवन ), पीलू कुष्ठ ( कूठ ), सुमनःप्रवाल (चमेली के कोमल पत्ते) यह चौथा । ( ५ ) वचा ( वच ), हरेणु ( रेणुका बीज, मँहदी के बीज ), त्रिवृत् ( निशोथ ), निकुम्भ ( जमाल गोटा ), भल्लातक ( भिलावा ), गैरिक ( गेरू), अंजन (•रसाञ्जन), यह पांचवां, ( ६ ) मनःशिला ( मैनसिल ), आल ( हरिताल ), गृहधूम ( घरका धुंआसा ), एला ( छोटी इलायची ), काशीस ( पुष्प कासीस ), लोध्र ( पठानी लोध ), अर्जुन ( अर्जुन वृक्ष की छाल ),मुस्ता (नागरमोथा), सर्ज ( राल ) यह छठा योग हुआ । इनमें से किसी योग को चूर्ण के रूप में तैयार करके गाय के पित्त के साथ फिर पीसे । फिर इसको सरसों के तेल में मिला कर द्रव रूप बनाकर लगाने से कष्टसाध्य कुष्ठरोग, नया किलास इन्द्रलुप्त बालों का गिरना किटिभ ( कुष्ठ भेद ) दद्रु ( दाद ), भगन्दर बवासीर, चर्मकील, अपची ( न पकने वाली गाठें ) और पामा ( खाज ) शीघ्र ही मनुष्यों के नष्ट होते हैं ॥ ३-७ ॥
अ० ३ ] सूत्रस्थानम् ३६
अ० ३ ] सूत्रस्थानम् ३६ अथ सातवां योग कहते हैं— कुष्ठं हरिद्रे सुरसं पटोलं निम्बाश्वगन्धे सुरदारु शिग्रु । ससर्षपं तुम्बुरुधान्यवन्यं चण्डां च चूर्णानि समानि कुर्यात् ॥८॥ तैस्तक्रयुक्तैः प्रथमं शरीरं तैलाक्तमुद्वर्तयितुं यतेत । तेनास्य कण्डूः पिडकाः सकोठाः कुष्ठानि शोफाश्च शमं व्रजन्ति ॥६॥ कुष्ठ (कूठ), दोनों हल्दी (दारुहल्दी और हल्दी), सुरसा (तुलसी), पटोल (परवल), निम्ब (नीम के पत्ते), अश्वगन्धा (असमन्ध), सुरदारु (देवदार), शिग्रु (सहजना), सर्षप (श्वेत सरसों), तुम्बुरु, धान्य (धनिया) वन्य (कैवर्त्त मुस्ता), चण्डा (चांरक) इन पन्द्रह औषधियों को परस्पर समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को छाछ में पीसकर शरीर पर लगाना चाहिए । शरीर पर लगाने से पूर्व तैल का उबटन लगा लेना चाहिये । इस लेप के लगाने से कण्डू (खाज़), पिडका (छोटी २ फुन्सियां), कोठ (न दबने वाली फुन्सियां), कुष्ठ कोढ और शोफ (सूजन) नष्ट होते हैं ॥८-६॥ आठवां योग--- कुष्ठामृतासङ्घटकटङ्कटेरीकाशीसकम्पिल्लकलोध्रमुस्ताः सौगन्धिकं सर्जरसो विडङ्गं मनःशिलाले करवीरत्वक् ॥ १० ॥ तैलाक्तगात्रस्य कृतानि चूर्णान्येतानि दद्यादवचूर्णनार्थम् । दद्रुः सकण्डूः किटिभानि पामा विचर्चिका चैव तथेति शान्तिम्॥११॥ कुष्ठ (कूठ), अमृता (गिलोय), संग (नीला तुत्थ), कटंकटेरी (दारु हल्दी), काशीस (हीरा कसीस), कम्पिल्लक (कमीला), मुस्त (नागर मोथा), लोध्र (पठानी लोध), सौगन्धिक (, कह्लार पुष्प, सुगन्धि), सर्जरस (राल), मनःशिला (मैनसिल), आल (हरताल), करवीरत्वक् (कनेर की छाल), इन चौदह ओषधियों का चूर्ण करके अवचूर्णन (अर्थात् मलने) के लिए देना चाहिये । प्रथम शरीर पर तैल की मालिश कर लेनी चाहिये । इस से दाद, कण्डू, खाज़, किटिभ, कुष्ठ, पामा, विसर्प, बिर्चर्चिका स्रावयुक्त फुन्सियां, नष्ट होती हैं । कोई अमृतासंग एक वस्तु मानकर नीला थोथ अर्थ करते हैं ॥१०-११॥ नवां योग— मनःशिलाले मरिचानि तैलमार्कं पयः कुष्ठहरः प्रदेहः । मनःशिला (मैनसिल), आल (हरताल), मरिच, तैल (सरसों का तेल कुष्ठहर होने से), 'आर्कंपयस्' (आक का दूध) इनको परस्पर मिला कर लेप बना कर लगाने से कुष्ठ अच्छा होता है ।
४० चरकसंहिता [ अ० ३ इस योग में पानी को मिलाना नहीं चाहिये, अपितु आक के दूध में ही सब बनाना चाहिये । दसवां योग— तुत्थं विडङ्गं मरिचानि कुष्ठं लोध्रं च तद्वन् समनःशिलं स्यात् ॥ १२ ॥ तुत्थ ( नीला थोथा ), विडंग (वायविडंग), मरिच (काली मरिच), कुष्ठ ( कूट ), लोध्र (पटानी लोध्र ), मनःशिला (मनसिल) इनके चूर्ण को पूर्व की भांति आक के दूध में मिलाकर लगाना चाहिये ॥१२॥ ग्यारहवां लेप— रसाञ्जनं सप्रपुनाडबीजं युक्तः कपित्थस्य रसेन लेपः । रसाञ्जन ( रसौंत ), प्रपुनाडबीज ( पनवाड़ के बीज ), इन को कैथ के पत्तों के रस में मिलाकर लगाने से कुष्ठ रोग नष्ट होता है । पानी का उपयोग नहीं करना चाहिये । बारहवां योग— करञ्जबीजैडगजं सकुष्ठं गोमूत्रपिष्टं च परः प्रदेहः ॥ १३ ॥ करंज ( नाटा करंज बीज ), ऐडगज ( चक्रमर्द ) और कुष्ठ ( कूट ), इनको गोमूत्र में पीस कर लेप करने से कुष्ठ नष्ट होता है ॥ १३ ॥ तेरहवां योग— उभे हरिद्रे कुटजस्य बीजं करञ्जबीजं सुमनःप्रवालान् । त्वचं समध्यां हयमारकस्य लेपं तिलक्षारयुतं विदध्यात् ॥ १४ ॥ दोनों प्रकार की हल्दी ( साधारण हल्दी और दारू हल्दी ), कुटज बीज (इन्द्रजौ), करंज बीज ( करंजुए का बीज ), सुमनःप्रवाल ( चमेली के कोमल नये पत्ते ), हयमारक ( कनेर ) की अन्दर की त्वचा, और तिल क्षार (तिलकी नाल का क्षार भस्म) इनका लेप बनाकर लगाने से कुष्ठ रोग मिटता है ॥१४॥ चौदहवां योग— मनःशिला त्वक्कुटजात्सकुष्ठात् सलोमशः सैडगजः करञ्जः । ग्रन्थिश्च भौर्जः करवीरमूलं चूर्णानि साध्यानि तुषोदकेन ॥१५॥ पलाशक्षारोदकरसेन चापि सर्पोद्धृतान्याढकसंमितेन । दर्वीप्रलेपं प्रवदन्ति लेपमेतत्परं कुष्ठनिषूदनाय ॥ १६ ॥ मनःसिल, कुटजत्वक् ( कूड़े की छाल ), कुष्ठ ( कूट ) लोमश, ( जटा- मांसी ), ऐडगज ( चक्रमर्द ), करंज, ( करंजुआ ), भौर्ज ( भोजपत्र की गांठें ), करवीर (कनेर की जड़), ये आठो द्रव्य प्रत्येक एक एक कर्ष ( दो २