दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
४२८ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri. Funding: MIDF ४२८ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां यति, न मे गृहवार्तां पृच्छति, न मत्पक्षान्प्रत्यवेक्षते, न मामासन्नकार्य्ये- ष्त्वभ्यन्तरीकरोति, न मामन्तःपुरं प्रवेशयति । अपि च मामनर्हेषु कर्मसु नियुङ्क्ते, मदास नमन्यैरवष्टभ्यमानमनुजानाति, मद्वैरिषु विश्रम्भं दर्शयति, मदुक्तस्योत्तरं न ददाति, मत्समानदोषान्विगर्हति, मर्मणि मामुपहसति, स्वमतमपि मया वर्ण्यमानं प्रतिक्षिपति, महार्हाणि वस्तूनि मत्प्रहितानि नाभिनन्दति, नयज्ञानां स्खलितानि मत्स समक्षं मूर्खैरुद्धोषयति । सत्य- माह चाणक्यः—'चित्तज्ञानानुवर्तिनोऽनर्था अपि प्रियाः स्युः । दक्षिणा अपि तद्भावबहिष्कृता द्वेष्या भवेयुः' इति । तथापि का गतिः । अविनी- तोऽपि न परित्याज्यः पितृपैतामहैरस्माद्दृशैरयमधिपतिः । अपरित्यज- न्तोऽपि कम्पुपकारमश्रूयमाणवाचः कुर्मः । सर्वथा नयज्ञस्य वसन्तभानो- दोषान् । चित्तज्ञानेत्यादि—अनर्था अपि यदि दुर्जनानां स्वमतानुकूलाः स्युस्तर्हि प्रिया एव । दक्षिणा अनुकूलाः सरला वा यदि तद्भावविरुद्धातदा तेऽपि द्वेष्याः स्युरित्यर्थः । तथापि एवं सत्यपि । का गतिः—उपायान्तरं नास्तीत्यर्थः । पितृपैता- महैः पितृपितामहक्रमागतैः । न श्रूयमाणा वाक् येषां ते— वयमिति शेषः । अपि- ही पूछते न हमारे उपकारों की ओर ध्यान ही देते हैं । यहां तक कि हमारे पक्ष- पातियों की ओर भी विरक्ति दिखाते हैं । हमारे भरोसे अपना कोई विशेष कार्य भी नहीं सौंपते । अन्तःपुरमें भी अब कभी नहीं भेजते हैं। हमें वे सर्वथा अयोग्य समझते हैं। दूसरे लोग हमारे अधिकार प्राप्त करना चाहते हैं तो वे अपनी मौन भाषा से मानो उसकी स्वीकृति दे देते हैं—ऐसा भासता है। वे हमारे शत्रुओं की बातों पर विश्वास करने लगे हैं । यदि हम कुछ कहते हैं तो उसका उत्तर ही नहीं देते । हमारे निर्दोष मित्रों की निन्दाएँ हमारे समक्ष करते हैं। हमारी रहस्यभरी मार्मिक बातें कह कर हमारी हँसी उड़ाते हैं। यदि कभी हम अपना विचार दर्शाते हैं तो वे उसके विरुद्ध ही बोलते हैं। यदि हम बहुमूल्य वस्तुओं का उपहार भी उनके समीप प्रेषित करते हैं तो वे उसे विनम्रता से स्वीकार तक नहीं करते हैं। प्रख्यात-प्रख्यात नीतिज्ञों के वाक्यों को वे हमारे समक्ष मूर्खों का प्रलाप बतलाते हैं । महानीतिज्ञ चाणक्य ने उचित ही कहा है कि मनोभिलाष के अनुकूल अनुसरणकर्ता दुराचारी भी राजाओं के प्रियपात्र हो जाते हैं तथा मनोभिलाष के अननुकूल चलनेवाले प्रियजन भी उनके अप्रिय हो जाते हैं। अतः अब क्या किया जाय ? ये महाराज चाहे जैसे भी उद्धण्ड हों परन्तु अपने पिता-पितामहादि से सेवित हैं तथा हमारे स्वामी भी हैं इसलिए उन्हें त्याग भी नहीं सकते हैं। परन्तु, न त्यागने पर भी यदि हम इनकी कोई आज्ञा न मानेंगे तो इनका उपकार भी न होगा। मालूम होता है यह Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४२६ रश्मकेन्द्रस्य हस्ते राज्यमिदं पतितम्। अपि नामापदो भाविन्यः प्रकृतिस्थमेनमापादयेयुः। अनर्थेषु सुलभव्यलीकेषु कचिदुत्पन्नोऽपि द्वेषः, सद्वृत्तमस्मै न रोचयेत् । भवतु भविता तावदनर्थः। स्तम्भित- पिशुनजिह्वो यथाकथंचिदभ्रष्टपदस्तिष्ठेयम् इति । (१७) एवं गते मन्त्रिणि, राजनि च कामवृत्ते, चन्द्रपालितो नामा- श्मकेन्द्रामात्यस्येन्द्रपालितस्य सूनुः, असद्वृत्तः पितृनिर्वासितो नाम भूत्वा, बहुभिश्चारणगणैर्बहीभिरनलपकौशलाभिः शिल्पकारिणीभिरनेक- च्छन्नकिंकरैश्च गूढपुरुषैः परिवृतोऽभ्येत्य विविधाभिः क्रीडाभिर्विहारभद्र- मात्मसादकरोत् । अमुना चैव संक्रमेण राजन्यास्पदमलभत । लब्धर- नामेति सम्भावनायाम् । आपादयेयुः कुर्युः। सुलभं व्यलीकमपराधो येषु, तेषु । स्तम्भिता पिशुनानां खलानां जिह्वा येन सः। अभ्रष्टपदः अनष्टाधिकारः । (१७) कामवृत्ते यथेच्छाचारे । पितृनिर्वासितो नाम भूत्वा—असद्वृत्त इति हेतोः पित्रा निर्वासितो राज्यान्निष्काशित इतिच्छद्मना । नामेत्यलीके । शिल्प- कारिणीभिश्चित्रकारिणीभिः । आत्मसात् स्ववशीभूतम् । अमुना विहारभद्रेण सह । संक्रमेण सम्मेलनेन । राजनि नृपेऽनन्तवर्मण्यपि । आस्पदं स्थानं प्रतिष्ठामिति साम्राज्य अब नीतिज्ञ महाराज अश्मकेश्वरके अधीन हो जायगा। क्या भविष्यत्में आने- वालो आपत्तियां इन्हें सुधारेंगी ? । जो लोग अनायास विपत्ति मोल लेते हैं उनमें यदि अपराधके चिह्न प्रत्यक्ष दिखाई भी देने लगें तो भी वे उन्हें नहीं देखते। अतएव निःसन्देह अब कोई न कोई आपत्ति अवश्य आवेगी। जो भी हो, हमारा कर्त्तव्य अब यही है कि हम अपनी जीभमें ताला लगाकर अपने पदों पर आरूढ़ रहें। (१७) इस रीतिसे विचार कर जब मन्त्री तटस्थ रह गये तब राजा स्वेच्छ्यापूर्वक राजकार्य करने लगा । इस बात को देखकर अश्मकेन्द्रके सचिव इन्द्रपालितके दुराचारी पुत्र चन्द्रपालितने, जो पिताके द्वारा गृहसे निष्कासित था, अनेक दूतों तथा वन्दीजनोंके द्वारा नाना प्रकार के कौतूहलपूर्ण खेल दिखाकर एवं वेश्याओंकी कौशलपूर्ण कलाओं द्वारा अनेक गुप्तचरोंके सहयोगसे उस राजाको वशीभूत कर लिया। विहारभद्र जब चन्द्र- पालितके चंगुलमें पूर्णतया आ गया तब उसने उसी विहारभद्र राजारूपी सेतु (पुल) के सहारे समस्त राज्यपद प्राप्त कर लिया। चन्द्रपालितने छिद्रोंके अन्वेषणसे जिन-जिन दुर्व्यसनोंमें उन्हें फँसाया उन-उन दुर्व्यसनोंकी राजाने प्रचुर प्रशंसा की। उसने एकवार
४३० दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां न्ध्रश्च स यद्यद्व्यसनमारभते तत्तथेत्यवर्णयत्—'देव, यथा मृगया ह्यौप- कारिकी न तथान्यत् । अत्र हि व्यायामोत्कर्षादापत्सूपकर्ता दीर्घाध्वल- ङ्घनक्षमो जङ्घाजवः, कफापचयादारोग्यैकमूलमाशयाग्निदीप्तिः, मेदोपक- र्षादङ्गानां स्थैर्यकार्कश्यतिलाघवादीनि, शीतोष्णवातवर्षक्षुत्पिपासासह्- त्वम्, सत्त्वानांमवस्थान्तरेषु चित्तचेष्टितज्ञानम्, हारिणगवलगवयादि- वधेन सस्यलोपप्रतिक्रिया, वृकव्याघ्रादिघातेन स्थलपथशल्यशोधनम् , शैलाटवीप्रदेशानां विविधकर्मक्षमाणामालोचनम् , आटविकवर्गविश्रम्भ- णम् , उत्साहशक्ति-संधुक्षणेन प्रत्यनीकवित्रासनमिति बहुतमा गुणाः । यावत् । व्यसनं मृगयादिकम्—स्त्रियोऽक्षा मृगया पानं वाक्पारुण्यार्थदूषणे । दण्ड- पारुष्यमित्येतन्महाव्यसनसप्तकमिति वैजयन्ती । तथा युक्तम् । औपकारिकी उप- कारायार्हा । अत्र मृगयायाम् । जङ्घाजवो जङ्घावेगः । कफस्य श्लेष्मणः अपचयात् क्षयात् । आरोग्यस्यैकमद्वितीयं मूलं निदानम् आशयाग्नेर्दीप्तिः सन्धुक्षणम् । मेदसां भाषायां चर्बीति ख्यातानां धातुविशेषाणाम् अपकर्षादपचयात् । सत्त्वानां प्राणिनाम् । अवस्थान्तरेषु अवस्थाविशेषेषु । गवलो महिषः । गवयो गोसदृशः पशुः । सस्यलोपप्रतिक्रिया सस्यरक्षा । वृकः 'हुड़ार' इति भाषा । स्थलपथेति- स्थलपथस्य शल्यानां कण्टकभूतानां शोधनमपनयनम् । शैलाटवीति—पार्वत्य- वनभूमिषु बहवः प्रदेशा निरर्थकास्तिष्ठन्ति तेषां सार्थकीकरणम् । आटविका आरण्यकाः । निश्रम्भं विश्वासोत्पादनम् । प्रत्यनीकः शत्रुः । महाराजसे कहा—आखेटसे जितने उपकार होते हैं उतने दूसरे से नहीं होते हैं । देखिये, आखेटसे व्यायाम होता है अतः शरीर में बल बढ़ता है । शरीरमें बल रहने पर किसी समय आपत्ति आने पर मनुष्य आत्मरक्षा कर सकता है । जांघोंमें पैदल रास्ता समाप्त करनेकी शक्ति आती है । कफ दबा रहता है अतः उदराग्नि उद्दीपित रहती है । मेद ( चर्बी ) के न बढ़नेसे अङ्ग-प्रत्यङ्ग फुर्तीले रहते हैं । शीत-वायु-उष्ण-भूख-प्यास आदि सहन करनेकी शक्ति रहती है-एवं हर एक प्राणीके मनोभाव ज्ञात करनेका ज्ञान प्राप्त होता है । हिरण-साँभर आदि पशुओंको मार देनेसे खेतोंके अन्नोंकी चर जानेसे रक्षा होत हैं । सिंह-भेड़ियों आदि चौपायोंके मारनेसे स्थलमार्ग निष्कण्टक हो जाता है । स्थल मार्ग साफ रहनेसे मनुष्य निर्भय होकर पर्वत-अरण्योंमें घूमकर नदियोंकी सैर कर सकते हैं जिनसे ज्ञानवृद्धिके साथ भौगोलिक एवं भौतिक वस्तुओंका भी बोध होता है यथा यह भी विदित हो जाता है कि अमुक स्थान अमुक जगह है । बार-बार आवागमनसे बनैले पशुओंको उस शिकारीके प्रति मनमें प्रतीति हो जाती है अतः फिर वे कष्ट भी नहीं देते ।
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४३१ ( १८) द्यूतेऽपि द्रव्यराशेस्तृणवत्त्यागादनुपमानमाशयौदार्यम्, जयपराजययानवस्थानाद्धर्षविषादयोरविधेयत्वम्, पौरुषैकनिमित्तस्याम- र्षस्य वृद्धिः, अक्षहस्तभूम्यादिगोचराणामत्यन्तदुरुपलक्ष्याणां कूटकर्म- णामुपलक्षणादनन्तबुद्धिनैपुण्यम्, एकविषयोपसंहाराच्चित्तस्यातिचित्र- मैकाग्रथम्, अध्यवसायसहचरेषु साहसेष्वरतिः, अतिकर्कशपुरुषप्रतिसं- सर्गादनन्यधर्षणीयता मानावधारणमकृपणं च शरीरवापनमिति । ( १६) उत्तमाङ्गोपभोगेऽप्यर्थधर्मयोः सफलीकरणम्, पुष्कलः पुरुषाभिमानः, भावज्ञानकौशलम्, अलोभक्लिष्टमाचेष्टितम्, अखिलासु ( १८) अनुपमानमतुलनीयम् । आशयस्य चिंदौचित्तस्यम् । जयपराजययोः अनवस्थानात् अनिश्चितत्वात् । अविधेयत्वम् अवशीभूतत्वम् । एकस्मिन् विषये उपसंहारात् अभिनिवेशात् । एकाग्रस्य भाव एकाग्रथम् । साहसेषु साहसकर्मसु अरतिः अप्रीतिः । अनन्यधर्षणीयता अन्यानभिभवनीयता । अकृपणं दैन्यरहितम्, शरीरवापनं शरीरधारणम् । ( १९) पुष्कलः अतिशोभनः । अलब्धोपलब्धीत्यादि—अलब्धस्य वस्तुनो लब्धिर्लाभः, लब्धस्य अनुरक्षणं पालनं, रक्षितस्योपभोगः, भुक्तस्यानुसन्धानं स्मरणं, रुष्टस्य क्रुद्धस्य च अनुनयः समाधानमित्यादिषु विषयेषु अजस्रं निरन्तरम् आखेटसे उत्साहशक्ति भी बढ़ती जाती है जिससे रिपुगणोंमें भय उत्पन्न करनेके अनेक तरीके ज्ञात हो जाते हैं। (१८) इसी रीतिसे द्यूत-क्रीडासे भी संसारकी सभी वस्तुओंको तृणके सदृश त्यागने की शक्ति प्राप्त होती है। जय-पराजयका भी कोई निश्चय नहीं रहता कि कौन कब विजित होगा अथवा किसकी कब जय होगी ? जुआ खेलने वाला हर्ष-विमर्षके विषादोंसे दूर रहता है। इससे पौरुष बढ़ानेवाले अमर्षकी उत्पत्ति होती है। जुआ खेलनेसे हस्त- कौशल आदि पाण्डित्य का अनुभव होता है। ये बातें ऐसे जानना अति कठिन है। बुद्धिमें नैपुण्य आता है। एक ही कार्यमें मन लगानेसे मनमें आश्चर्यसे एकाग्रता-स्रोत उत्पन्न होता है। उद्योगके सहायक कामोंमें बुद्धिकी लगन बढ़ती है। जुआ खेलनेमें एकसे एक कठोर पुरुषोंका संपर्क हो जाता है जिससे मन इतना दृढ़ हो जाता है कि किसीके विचलित करने पर भी विचलित नहीं होता है। जुआ खेलने से स्वाभिमानका भाव उदय होता है एवं दीनतारहित जीवन व्यतीत करनेकी क्षमता आती है। अतः जुआ खेलना श्रेयस्कर है। (१९) इसी प्रकारसे अच्छी-अच्छी अंगनाओंके साथ रमण करनेसे भी धर्म और अर्थकी प्राप्ति होती है, जीवन सफल होता है। ऐसा करनेसे प्रबल पौरुषाभिमान बढ़ता है। Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
४३२ दशकुमारचरितम् ! [ उत्तरपीठिकायां
४३२ दशकुमारचरितम् ! [ उत्तरपीठिकायां कलासु वैचक्षण्यम्, अलब्धोपलब्धिलब्धानुरक्षणरक्षितोपभोगभुक्तानुसं- धानरुष्टानुनयादिष्वजस्रमभ्युपायरचनया बुद्धिवाचोः पाटवम्, उत्कृष्ट- शरीरसंस्कारात्सुभगवेषतया लोकसम्भावनीयतया परं सुहृत्प्रियत्वम्, गरीयसी परिजनव्यपेक्षा, स्मितपूर्वाभिभाषित्त्वम्, उद्रिक्तसत्त्वता, दाक्षि- ण्यानुवर्तनम् । अपत्योत्पादनेनोभयलोकश्रेयस्करत्वमिति । (२०) पानेऽपि नानाविधरोगभङ्गपटीयसामासवानामासेवनात्स्पृ- हणीयवयोव्यवस्थापनम्, अहंकारप्रकर्षादशेषदुःखतिरस्करणम्, अङ्ग- जरागदीपनादङ्गानोपभोगशक्तिसंधुक्षणम्, अपराधप्रमार्जनान्मनःशल्यो- अभ्युपायरचनया बुद्धिवाचोः मतिवचनयोः पाटवं कौशलम् । शरीरस्य संस्कारः शुद्धिः सम्भावनीयता सम्माननीयता । परिजनव्यपेक्षा परिजनेषु दाक्षिण्यम् । उद्रिक्तसत्त्वता समधिकसारत्वम् । (२०) पाने मद्यपाने । नानाविधानां रागाणां विषयाभिलाषाणां भङ्गे तरङ्गे विच्छित्तौ वा पटीयसाम् । आसवानां मद्यानाम् । आसेवनात् पानात् । स्पृहणी- यवयो यौवनं तस्य व्यवस्थापनं संरक्षणम् । अङ्गजस्य कामस्य रागः इच्छा तस्य दीपनाद् वृद्धेः । सन्धुक्षणमुत्तेजनम् । अपराधस्य अन्यकृतापराधस्य मार्जनाद् दूसरोंके मानसिक भावोंका ज्ञान होता हैं । निर्लोभ काममें प्रवृत्तिके भाव जागते हैं । सभी कलाओंमें नैपुण्य प्राप्त होता है । लब्ध वस्तुकी रक्षा', अलब्ध वस्तुके लाभका, रक्षित वस्तुके उपभोग का एवं भोगी हुई वस्तुओंसे उत्पन्न सुख-दुःखोंके विवेचनका ज्ञान प्राप्त होता है । रूठे हुए प्राणियोंके मनानेमें नित्य जो अनुनय-विनय करना पड़ता हैं उससे बुद्धि और वचनमें प्रगल्भता आती हैं । ऐसी स्थितिमें शारीरिक संस्कारों की ओर पूर्ण ध्यान रखना चाहिये तथा वेश-भूषा की ओर भी पर्याप्त ध्यान रखना चाहिये । इससे सर्व-साधारणके समक्ष सम्मान-प्राप्तिका अवसर मिलता है । मित्रोंमें अनुराग बढ़ता है तथा प्रीतिकी भी प्राप्ति होती है। हँस-हँस कर बातें करने का अभ्यास होता हैं । परिजनों पर संकोच न करनेका ज्ञान होता है । औदार्यका उदय एवं बलकी अभिवृद्धि होती है । सन्तानोत्पत्तिका लाभ होता है जिससे दोनों लोकोंमें कीर्ति बढ़ती है । यह मार्ग भी श्रेयस्कर है । (३२) इसी प्रकारसे मद्यपानसे भी अनेक लाभ होते हैं । मद्यपानसे विविध प्रकारके रोग दूर हो जाते हैं। मद्योंके सेवनसे मनुष्य मनचाही अवस्था प्राप्त कर लेता है । मद्यसे अहंकार बढ़ जाता है तिससे सभी तरहके क्लेश नष्ट हो जाते हैं । मदिरापानसे वासनाएँ उद्दीपित होती हैं जिससे स्त्रियोंके साथ सम्भोग करनेकी शक्ति प्रबल होती है !
अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४३३ न्मार्जनम् , अश्राव्यशंसिभिरनर्गलप्रलापैर्विश्वासोपबृंहणम् , मत्सराननु- बन्धादानन्दैकतानता, शब्दादीनामिन्द्रियार्थानां सातत्येनानुभवः, संवि- भागशीलतया सुहृद्वर्गसंवर्गणम् , अनुपमानमङ्गलावण्यम् , अनुत्तराणि विलसितानि, भयार्तिहरणाच्च साङ्ग्रामिकत्वमिति । ( २१ ) वाक्पारुष्यं दण्डो दारुणो दूषणानि चार्थनामेव यथावका- शमौपकारिकाणि । नहि मुनिरिव नरपतिरुपशमरतिरभिभवितुमरिकुल- मलम् , अवलम्बितं च लोकतन्त्रम्' इति । विस्मरणात् । अश्राव्यं श्रावयितुमयोग्यं यत्तस्यापि शंसिभिः सूचकैः । अनर्गल- प्रलापैर्यथेच्छमनर्थकवचनैः । विश्वासस्योपबृंहणं वर्द्धनम् । मत्तः सन्नश्राव्यमपि श्रावयति तेन च जनानां विश्वासः समुत्पद्यते । यदयं सारल्येनास्माभिरश्राव्यमपि वक्तीति भावः । मत्सरस्य मात्सर्यस्य अननुबन्धादधारणात् । आसवपानेन मात्सर्ये न तिष्ठतीति प्रसिद्धिः । एकतानता तत्परता । इन्द्रियार्थानां चक्षुरादीन्द्रियविषया- णाम् । सातत्येन नैरन्तर्येण । आगतेभ्यः सर्वेभ्योऽपि मद्यस्य सम्यग् वण्टनं संवि- भागः तच्छीलतया सुहृद्वर्गस्य संवर्गणमेकत्रीकरणम् । अनुत्तराणि अलौकिकानि । संग्रामे साधुः सांग्रामिकः तस्य भावः । युद्धपटुत्वमित्यर्थः । ( २१ ) एतावता व्यसनसप्तके मृगयादीनां चतुर्णामुपकारकत्वं प्रतिपादित- मघुना अवशिष्टं वाक्पारुष्यादित्रयमपि राज्ञामुपकारकमिति वक्ति वाक्पारुष्येति— वाक्पारुष्यमेकं, दारुणो दण्डो दण्डपारुष्यं द्वितीयम्, अर्थानां दूषणानि चेति तृतीयं, तान्यपि यथावकाशं यथावसरमुपकारकाणीति । नहीति—उपशमे शान्तौ रतिरनु- रागो यस्यासौ—तादृशो मुनिर्यथा अरिकुलं कामादिशत्रुवर्गं जेतुं समर्थस्तथा शान्तो नरपतिररिकुलं पराजेतुं लोकतन्त्रं राष्ट्रसाधनमवलम्बितुं धारयितुञ्च नालमित्यर्थः । अनेकों अपराधोंको क्षमा करनेके कारण चित्तके उद्वेग दूर हो जाते हैं। रहस्य एवं गुप्त बातों की सूचनासे और व्यर्थकी बकवादसे भी विश्वास उत्पन्न करा देनेकी क्षमता आ जाती है । राग-द्वेष दूर हो जानेके कारण परमानन्द ही परमानन्द दिखायी पड़ता है । शब्द स्पर्श रूप रस आदिके अनुभव होते रहते हैं । परस्पर बाँट कर खाने-पीनेसे अपने परिजनों और सगे-सम्बन्धियोंमें एकता बनी रहती है । शरीरकी सुन्दरता भी असाधारण- तया बढ़ जाती है । भोग-विलासों का सर्वोत्कृष्ट सुख प्राप्त होता रहता है । युद्ध-कौशल भी प्राप्त होता है तथा भयके कारण उत्पन्न होनेवाला सकट टालते रहनेसे समर-नैपुण्य भी प्राप्त होता है । ( २१ ) इसी प्रकारसे कटु वचन, कठोर दण्ड और अर्थापहरण ( दूसरेके धनके
( २२ ) असावपि गुरूपदेशमिवात्यादरेण तस्य मतमन्ववर्तत । तच्छीलानुसारिण्यश्च प्रकृतयो विशृङ्खलमसेवन्त व्यसनानि । सर्वश्च समानदोषतया न कस्यचिच्छिद्रान्वेषणायायतिष्ट । समानभर्तृप्रकृतय- स्तन्त्राध्यक्षाः स्वानि कर्मफलान्यभक्षयन् । ततः क्रमादायद्वाराणि व्यशी- र्यन्त । व्ययमुखानि विटवैधेयतया विभोरहरहर्व्यवर्धन्त । सामन्तपौर- जानपदमुख्याश्च समानशीलतयोपारूढविश्रम्भेण राज्ञा सजायाः पानगो- ष्ठीष्वभ्यन्तरीकृताः स्वं स्वमाचारमत्यचारिषुः । ( २३ ) तदङ्गनासु चानेकापदेशपूर्वमपाचरन्नरेन्द्रः । तदन्तःपुरेषु ( २२ ) असौ अनन्तवर्मापि । तस्य चन्द्रपालितस्य । अन्ववर्त्तत अन्वसरत् । तच्छीलानुसारिण्यः नृपस्वभावानुवर्त्तिन्यः । छिद्रान्वेषणाय दोषानुसन्धानाय । समाना भर्तुः प्रकृतिर्येषां ते तन्त्राध्यक्षाः सेनापतयः । कर्मफलानि पूर्वसुकृतफल- न्यभक्षयन् खादितवन्तः—तेऽपि दुर्वृत्ता अभवन्नित्यर्थः । आयद्वाराणि अर्थागमो- पायाः । व्यशीर्यन्त क्षीणाः बभूवुः । विटेति—विटत्वेन परदारासक्तत्वेन वैधेयतया मूर्खतया च विभोः स्वामिनः । विटविधेयतयेति पाठे विटानां धूर्त्तानां विधेयतया वशीभूततया । उपारूढविश्रम्भेण उत्पन्नविश्वासेन । सजायाः सस्त्रीकाः । पानगोष्ठीषु मद्यपानसभासु । अभ्यन्तरीकृताः प्रवेशिताः । अत्यचारिषुः लंघयामासुः । ( २३ ) तदङ्गनेति—तेषां सामन्तादीनामङ्गनासु स्त्रीषु । अनेकापदेशपूर्वं ाहरण ) से भी लाभ होता है । ऋषिके समान शान्तिप्रिय राजा न कभी अपने शत्रुओं को ही जीत सकता है और न प्रजाकी स्थिति ही अपने काबूमें रख सकता है । ( २२ ) उस धूर्त्त की सम्मति महाराज ने स्वीकार कर ली और उसीके अनुसार काम करने लगे । 'यथा राजा तथा प्रजा' के अनुसार राजाके अनुसरणसे प्रजा भी सुरा-पान आदि करने लगी । इस प्रकारसे राजासे लेकर नौकर तक सभी लोग उस राज्यवर्गके दुराचारी, स्वेच्छाचारी तथा मद्यप हो गये अतः ऐसी दशामें कोई किसीका दोष कैसे कहे । जब राजा तथा राजसेवक समान-व्यसनी हो गये तब राज्यके अधिकारी प्रजासे धन लेकर स्वयं लूटने-खाने लगे । धीरे-धीरे आयके सारे दरवाजे बन्द हो गये । इधर धूर्तोंके वशीभूत, मदिरापान तथा वेश्यागमनमें अनुरक्त रहनेसे राजाका व्यय बढ़ता गया । उस धूर्तने राज्यके सामन्तों, धनिकों तथा रईसोंकी भी स्त्रियोंको विश्वास दिलाकर अपनी ओर मिला लिया और अपने जमावड़े, पानगोष्ठी एवं रंगशालामें सम्मिलित कर लिया । यहाँ तक कि उन स्त्रियोंसे भी विविध प्रकारके दुराचार करने-कराने लगा । ( २३ ) जब अगणित प्रकारके छलोंसे उस धूर्त्तने अपने सामन्तों की स्त्रियोंको भी न
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चामी भिन्नवृत्तेषु मन्दत्रासो बहुसुखैरवर्तन्त । सर्वश्च कुलाङ्गनाजनः सुलभभङ्गिभाषणरतो भग्नचारित्र्यन्त्रणस्तृणायापि न गणयित्वा भर्तृ- न्धातृगणमन्त्रणान्यशृणोत् । तन्मूलाश्च कलहाः सामर्षाणामुदभवन् । अहन्यन्त दुर्बला बलिभिः । अपहृतानि धनवतां धनानि तस्करादिभिः । अपहृतपरिभूतयः प्रहताश्च पातकपथाः । हतबान्धवा हतवित्ता वध- बन्धातुराश्च मुक्तकण्ठमाक्रोशन्नश्रुकण्ठ्यः प्रजाः । (२४) दण्डश्चायथाप्रणीतो भयक्रोधावजनयत् । कृशकुटुम्बेषु लोभः पदमधत्त । विमानिताश्च तेजस्विनोऽमानेनादह्यन्त । तेषु तेषु चाकृत्येषु
बहुकपटपूर्वकम् । अपाचरत् असदाचरत् । तदन्तःपुरेति-तस्य नृपस्यान्तःपुरेषु स्त्रीषु । अमी सामन्तादयः । भिन्नं विनष्टं वृत्तं चरित्रं येषां तेषु भिन्नवृत्तेष्विति तदन्तःपुरेश्विरस्यस्य विशेषणम् । मन्दत्रासा निर्भयाः-अमी इत्यस्य विशेषणम् । भग्नं भिन्नं चारित्र्यन्त्रणं वृत्तबन्धनं यस्येति कुलाङ्गनाजन इत्यस्य विशेषणम् । धातॄणां जाराणां गणः समूहस्तस्य मन्त्रणानि वचनानि । धाता जारे विधातरि इति कोषः । सामर्षाणाम् असहिष्णूनाम् । अपहृता दूरीकृता परिभूतिस्तिरस्क्रिया येभ्य- स्ते । प्रहता वितताः विस्तारं गता वा पातकपथाः पापमार्गाः । पापमार्गप्रवृत्ता- नपि न कश्चित्तिरस्करोतीत्यर्थः । आक्रोशन् चक्रन्दुः । अश्रुकण्ठ्यः बाष्पगद्गदस्वराः । (२४) अयथाप्रणीतोऽन्यायकृतः । लघुपापेन गुरुदण्डो गुरुपापेन च लघु- दण्ड इत्यर्थः । कृशकुटुम्बेषु दरिद्रपरिवारेषु । पदं स्थानम् । अकृत्येषु अन्यायेषु ।
छोड़ा तब सामन्तगण भी कुमार्गी होकर निर्भीकभावसे अन्तःपुरकी सुन्दरियोंके साथ भोग-विलास करने लगे । कुछ ही दिनोंमें अन्तःपुरकी सब महिलाएं चरित्रहीन होकर राजाको तृणवत् भी न गिनकर उन धूर्तोंके कथनानुसार आचरण करने लगीं। इसके पश्चात् उन छैलोंमें कलह की आग भड़की जिससे सबल निर्बल को मारने-पीटने लगे । चोर-डाकू धनिकोंका धन लूटने लगे । राज्य की सारी सम्पत्ति तहस-नहस हो गयी । पापके सभी दरवाजे खुल गये । उसकी सारी प्रजाके बन्धु-बान्धव मार डाले गये । उनका बहुत सा द्रव्य हर लिया गया । उच्छृङ्खल अधिकारियों द्वारा कितने ही सीधे-सादे भी मार डाले गये तथा कारागार में ठूंस दिये गये । खुलकर अराजकता फैल गयी । ऐसी दशामें बची-खुची प्रजा सौ-सौ आँसू बहाकर क्रन्दन करने लगी । (२४) जब अपराधियों को उचित रूप में दण्ड न मिला तो प्रजामें भय, क्रोधका सञ्चार बढ़ गया । धनहीन परिवारोंमें लोभ फैल गया । राज्यके स्वाभिमानी पुरुषोंके
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४३६ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां
४३६ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां प्रासरन्परोपजापाः । तदा च मृगयुवेषमृगबाहुल्यवर्णनेनाद्रिद्रोणीरनपसा- रमार्गाः शुष्कतृणवंशगुल्माः प्रवेश्य द्वारतोऽग्निविसर्गैः, व्याघ्रादिवधे प्रोत्साह्य तन्मुखपातनैः, इष्टकूपतृष्णोत्पादनेनातिदूरहारितानां प्राणहा- रिभिः क्षुत्पिपासाभिवर्धनैः तृणगुल्मगूढच्छन्नतटप्रदरपातहेतुभिर्विषम- मार्गप्रधावनैः विषमुखीभिः क्षुरिकाभिश्चरणकण्टकोद्धरणैः विष्वग्विसर- विच्छिन्नानुयातृतयैकाकीकृतानां यथेष्टघातनैः, मृगदेहापराद्धैर्नामेषुमो- क्षणैः, सपणबन्धमधिरुह्याद्रिशृङ्गाणि दुरधिरोहाण्यनन्यलक्ष्यैः प्रभ्रंशनैः, आटविकच्छद्मना विपिनेषु विरलसैनिकानां प्रतिरोधनैः, अक्षद्यूतपक्षि- परोपजापाः भेदाः । तदा भेदे समुत्पन्ने । मृगयुवेषेति—मृगयुवेषेण व्याधरूपधा- रिणा यन्मृगबाहुल्यवर्णनं तेन । विश्वासोत्पादनाय स्वयं मृगयुर्भूत्वा अत्र बहवो मृगा वर्त्तन्त इति कथयित्वेत्यर्थः । अद्रिद्रोणीः पर्वतमध्यपद्धतीः । द्रोणिः स्यान्म- ध्यपद्धतिरिति कोपात् । नास्ति अपसारमार्गो निर्गमनमार्गो यासु ताः । शुष्काणि तृणानि वंशगुल्मानि च यासु ताः । अद्रिद्रोणीरित्यस्य विशेषणद्वयम् । प्रवेश्य जनानिति शेषः । अग्निविसर्गैरनलप्रदानैः अनन्तवर्मकटकं जर्जरमकुर्वन् इत्यने- नान्त्रयः । एवं सर्वत्रापि । तन्मुखपातनैः व्याघ्रमुखपातनैः । इष्टेषु मनोज्ञेषु कूपेषु तृष्णोत्पादनेन तत्र मनोज्ञः कूपोऽस्ति तस्यैव जलं पातव्यमिति तृष्णामुत्पाद्य । अतिदूरहारितानां दूरं नीतानाम् । तृणगुल्मेति—तृणगुल्मैर्गूढच्छन्नानामाच्छादितानां तटानामुच्चैःप्रदेशानां प्रदरेषु निम्नमार्गेषु पातहेतुभिः पतनकारणैः । विषमु- खीभिः विषलिप्ताग्राभिः । विष्वगिति—विष्वक् समन्ताद् विसरेण प्रसरणेन विच्छिन्ना अष्टा अनुयातारोऽनुसारिणो येषां तेषां भावस्तया । हेतौ तृतीया । यथेष्टघातनै- र्यथेच्छमारणैः, मृगदेहे मृगशरीरे अपराद्धैर्लक्ष्यभ्रष्टैः । इषुमोक्षणैर्बाणक्षेपैः । सपणबन्धं पणं कृत्वा । प्रभ्रंशनैः पातनैः । आटविक आरण्यकस्तस्य कपटेन । निरादरसे जनता शोकातुर क्षुभित हो गयो । तरह-तरहके अनाचारोंसे शनैः शनैः शत्रुओं द्वारा प्रचारित भेदनीति फलित हो गयी । इस कारण कितने शत्रुगणोंके दूत बहेलियो व अन्य लोगोंके स्वरूप धारण कर अनन्तवर्माकी सेनामें प्रविष्ट हो गये और उन्हें वनके किसी प्रदेशमें अन्य जन्तुओंकी अधिकता तथा सहज ही में उनकी प्राप्ति का प्रलोभन देकर पर्वतों की ऐसी कण्टकाकीर्ण वोहड़ गुफाओंमें ले गये जहां से निकल भागने का कोई सीधा मार्ग ही न था । वहां उन्हें पहुँचाकर उन लोगोंने गुफाओं के दरवाजों पर घास- फूस-लकड़ियों की राशि एकत्र करके आग जला दी जिससे वे सब वहीं जलकर मर गये । कुछ शत्रुके दूत छलसे अन्य सेना को दूसरे जंगलमें यह कह कर ले गये कि 'अमुक Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्योपेतम् । ४३७
युद्धयात्रोत्सवादिसंकुलेषु बलवदनुप्रवेशनैः इतरेषां हिंसोत्पादनैः, गूढो- त्पादितव्यलीकेभ्योऽप्रियाणि प्रकाशं लब्ध्वा साक्षिषु तद्विख्याप्याकीर्ति- गुप्तिहेतुभिः पराक्रमैः, परकलत्रेषु सुहृत्त्वेनाभियोज्य जारान्भर्तृभयमप-
विरलसैनिकानां स्वल्पसैन्यानाम्। गूढेत्यादि-गूढं गुप्तमुत्पादितं व्यलीकं दुःखं येषां तेभ्यः तत्सकाशमित्यर्थः। प्रकाशं सर्वसमक्षं अप्रियाणि अप्रियवाक्यानि लब्ध्वा श्रुत्वा अकीर्तेरयशसो गुप्तेर्गोपनस्य हेतुभिः कारणैः पराक्रमैः साक्षिषु द्रष्टृषु तद् विख्याप्य ख्यापयित्वा। अभियोज्य नियोज्य। तत्साहसेति-तेषां 'जाराणां
अरण्यमें एक सिंह है जो बड़ा उपद्रव मचा रहा है, उसे मारना धर्म है' और वहाँ ले जाकर उन्होंने उसी सिंहसे तथा स्वयं भी उस सेनाके लोगोंको मरवा डाला। कितने ही प्यासे सिपाहियोंको किसी कूपका पता बताकर भेज दिया और मार्गमें बड़ी-बड़ी सुरंगें पहले ही जाकर खोद दीं तथा उनपर घास बिछा दी, जिस कारण वे प्यासे सिपाही उधरसे जाते हुए उन्हीं सुरंगोंमें गिरकर मर गये। ऐसे-ऐसे कौशल उन लोगोंने रचे कि कितने सिपाही पर्वतोंके दुर्गम प्रदेशमें इधर-उधर भटक कर मर गये। वनोंके प्रदेशमें जब सैनिकोंको काँटे गड़ जाते तो उन्हें निकालनेके लिए वे लोग विषभरी सूइयाँ देते, जिनसे रक्त का संस्पर्श होते ही कितने यमलोक चले गये। अथवा उनके घाव सड़ गये जिससे वे सड़ सड़कर मरे। कभी-कभी कुछ सैनिकोंकी टोलियोंको बहकाकर जंगलमें ले जाकर स्वयं ही मार डालते, वन-जन्तुओंके शिकारके बहाने तो अगणितोंको मार डाला। कभी-कभी पहाड़को चोटीपर दौड़की बाजी लगाकर ले जाते और एकान्त पाकर वहाँसे उन्हें ढकेलकर मार डालते थे। कितने सैनिकोंको वनवासीका वेष धारण कर छिपकर शत्रुदूतोंने मार डाला। कभी-कभी सैनिकोंके आमोद-प्रमोदके समय शत्रुदूत एकाएक छापा मारकर उन्हें मार डालते थे। कभी-कभी कोल भीलोंके रूपोंमें सहायताके बहाने कुटियामें ले जाकर शत्रुदूत सैनिकोंको मार देते। कभी-कभी वे लोग कोई ऐसा झमेला खड़ा कर देते थे कि सैनिक गण परस्पर ही लड़कर कट मरते थे। कभी-कभी वे लोग झूठी-ूठी अफवाहें उड़ाकर लोगोंमें आतंक फैला देते थे, जिस कारण साधारण जनतामें महाराज अनन्तवर्माकी बदनामी फैल जाती थी। फिर समय पाकर सेनाके वीरों को वे लोग मारके यमलोक भेज देते थे। कभी-कभी वे लोग किसी स्त्रीसे किसी अधिकारी का अनुचित सम्बन्ध झूठ-मूठ जोड़कर लड़ा देते और तत्पक्षके वीरोंको मार डालते। कभी-कभी किसी सुन्दरीको प्रलोभन देकर उसके द्वारा सैनिकों तथा मन- चले लोगों को पूर्व संकेतित स्थान पर बुला लेते और वहाँ पर पहलेसे ही छिपे शत्रु पक्षी लोग उन्हें मार डालते। कभी-कभी वे लोग अमुक कन्दरा वा गुफामें धन गड़ा है ऐसा
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४३८ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां
४३८ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां हृत्य तत्साहसोपन्यासैः योग्यनारीहारितानां संकेतेषु प्रागुपनितीय पश्चादभिद्रुत्याकीर्तनीयैः प्रमापणैः, उपप्रलोभ्य बिलप्रवेषेषु निधानखन- नेषु च विघ्नव्याजसाध्यैर्ध्यापादनैः, मत्तगजाधिरोहणाय प्रेर्य प्रत्यवाय- निर्वर्तनैः, व्यालहस्तिनं कोपयित्वा लक्ष्यीकृतमुख्यमण्डलेष्वपक्रमणैः, दायाद्यर्थे विवदमानानुपांशु हत्वा प्रतिपक्षेष्वयशःपातनैः, सामन्तपुर- जनपदेष्वयथावृत्तानप्रकाशमभिप्रहृत्य तद्वैरिनामघोषणैः, योग्याङ्गनाभि- रहर्निशमभिरमय्य राजयक्ष्मोत्पादनैः, वस्त्रामरणमाल्याङ्गरागादिषु रसवि- साहसोपन्यासैः साहसोत्पादनैः । योग्यनारीति-योग्याभिनारीभिर्हारितानामाकर्षि- तानां सङ्केतेषु सङ्केतस्थानेषु प्राक् प्रथममुपनिलीय प्रच्छन्नो भूत्वा पश्चादभिद्रुत्य धावित्वा अकीर्त्तनीयैर्निन्दनीयैः प्रमापणैर्मारणैः । प्रत्यवायनिर्वर्तनैः हिंसोत्पा- दनैः । व्यालहस्तिनं दुष्टगजम् । अपक्रमणैः प्रेरणैः । दायाद्यर्थे धनादिविषये । अयथावृत्तान् असद्वृत्तान् । राजयक्ष्मा रोगविशेषः । रसविधानकौशलैः विष- प्रदानचातुर्यैः । चिकित्सामुखेन चिकित्साच्छलेन । आमयोपबृंहणैः रोगवर्धनैः । प्रलोभन देकर सैनिकों सहित अधिकारियों को ले जाकर धोखा दे कर वहीं समाप्त कर देते। कभी-कभी वे लोग अमुक वनमें अमुक सिद्ध रहता है, उससे सारी मनोकामनाओं की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ऐसा कहकर राज्यके वीरों तथा अधिकारियों को ले जाते और वहाँ पर मन्त्र-तन्त्रका ढोंग दिखाकर शनैः शनैः उन लोगों की इहलीला समाप्त कर देते। कभी-कभी किसी-किसी को किसी मतवाले हाथी पर चढ़ा देते और ऊपर-ऊपर उस मतवाले हाथी को सम्हालने का प्रदर्शन दिखाते तथा भीतर से उसे भड़का देते जिससे वह बिगड़कर उस वीर को ही मार डालता। कभी-कभी वे लोग किसी हाथी को मतवाला करके क्रोधित बना देते और भीड़ में उस ओर भगाते जिधर राज्याधिकारी खड़े रहते। बस, वह मतवाला-आगबबूला उन्मत्त हाथी उन सभी को रौंदकर मार देता। राजा के वंश वालों में पुराने झगड़े का आपसी मनमुटाव जानकर वे लोग उनमें से एक पक्ष के लोगों को मार डालते और उनके मारने के आरोप दूसरे पक्ष वालों पर प्रसिद्ध करके और भी लड़ाई बढ़ा देते। कभी-कभी वे लोग धनिकों की बस्तियों में जाकर दुराचारी गुण्डों को मार डालते और इस बात की प्रसिद्धि कर देते कि उनको मारने वाले शत्रुगण वे ही धनिकगण हैं जिससे दुराचारी वर्ग कुपित हो धनिकों-कुलीनों पर चढ़ाई कर बैठता था। कभी-कभी किसी रोगिणी महिला के साथ वीरों का धोके से सम्बन्ध कराकर उन्हें आजीवन रोगी-क्षय आदि रोगों का सर्टिफिकेट दिला देते। कभी-कभी वीरों को वे लोग तेल, फल, फूल, इत्र, वस्त्र, आभूषण विषाक्त पदार्थों से युक्त दे देते जिनका
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अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४३६ धानकौशलैः, चिकित्सामुखेनामयोपबृंहणैरन्यैश्चाभ्युपायैरश्मकेन्द्रप्रयुक्ता- स्तीक्ष्णरसदायः प्रक्षपितप्रवीरमनन्तवर्मकटकं जर्जरमकुर्वन् । ( २५ ) अथ वसन्तभानुर्भानुवर्माणं नाम वानवास्यं प्रोत्साह्यान- न्तवर्म्मणा व्यग्राहयत् । तत्परामृष्टराष्ट्रपर्यन्तञ्चानन्तवर्मा तमभियोक्तुं बल- समुत्थानमकरोत् । सर्वसामन्तेभ्यश्चाश्मकेन्द्रः प्रागुपेत्यास्य प्रियतरोऽ- भूत् । अपरेऽपि सामन्ताः समगंसत । गत्वा चाभ्यर्णे नर्मदारोधसि न्यविशन् । तस्मिंश्चावसरे महासामन्तस्य कुन्तलपतेरवन्तिदेवस्यात्म- नाटकीयां क्ष्मातलोर्वशीं नाम चन्द्रपालितादिभिरतिप्रशस्तनृत्यकौशला- माहूयानन्तवर्मा नृत्यमद्राक्षीत् । अतिरक्तश्च भुक्तवानिमां मधुमत्ताम् । तीक्ष्णरसं विषं ददातीति तीक्ष्णरसद्ः स आदिर्येषां ते । प्रक्षपिता विनाशिताः प्रवीरा योधा यस्य तत् । जर्जरं शिथिलम् । ( २५ ) वसन्तभानुः अश्मकेन्द्रः । वानवास्यो वनप्रदेशाधिपतिः । व्यग्राहयत् विग्रहं कारितवान् । तत्परामृष्टेति-तेन वानवास्येन परामृष्टो गृहीतो राष्ट्रस्य स्वरा- ज्यस्य पर्यन्तः प्रान्तभागो यस्य सः । तम् अश्मकेन्द्रम् । सर्वसामन्तेभ्य इत्यत्र पञ्चमीविभक्तिः । अस्य वानवास्यस्य । समगंसत मिलिता अभवन् । अभ्यर्णे समीपवर्त्तिनि । नर्मदारोधसि नर्मदातीरे । आत्मनाटकीयां स्वनर्त्तकीम् । मधुमत्तां मद्यपानप्रमत्ताम् । इस्तेमाल करते ही वे लोग मर जाते थे। इस रीति से अश्मकेश के द्वारा प्रेषित राजदूतों ने गुप्तारूपेण तीक्ष्ण विषाक्त रसों से तथा कुटिल नीतियों से अनेक धोखेवाली चालों से अनन्तवर्मा के समस्त सैन्य-बल को एवं राज्याधिकारी समुदाय को जर्जर बनाकर नष्ट भ्रष्ट कर दिया । ( २५ ) तत्पश्चात्—वसन्तभानु ने भीलों के अधिपति भानुवर्मा को उभाड़ कर अनन्तवर्मासे लड़ा दिया । अनन्तवर्माने सम्पूर्ण राष्ट्रकी शक्ति भानुवर्माको पराजित करनेमें लगा दी । इधर अपने सभी सामन्तों को साथ लेकर वसन्तभानु अनन्तवर्मा से मिल गया और उसे हाथमें करके उसका प्रियपात्र हो गया । तब अन्य सामन्तगण भी अनन्तवर्मा की सहायता करने आ गये । सभी सामन्तों ने रेवा नदी के पुण्य तट पर अपनी छावनियाँ फेंकीं । उस समय वहाँ पर महासामन्त कुन्तलदेशाधिपति अवन्तिदेवकी रङ्गशालाओं बनायीं वेश्या नर्तन कर रही थी। वह वेश्या सुन्दरता में भूतल पर उर्वशी के समान थी । अनन्तवर्मा उसका नृत्य देखने में तल्लीन था । चन्द्रपालित आदि भी उसी के समीप बैठे हुए थे । मधुपान करके मदोन्मत्त होकर उस समय वे सब उस पर आसक्त हो रहे थे । उसी समय अश्मकेश ने कुन्तलपति अवन्तिदेव को अलग एकान्त में ले जाकर कहा—
४४० | दशकुमारचरितम् । | [ उत्तरपीठिकायां
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF ४४० | दशकुमारचरितम् । | [ उत्तरपीठिकायां ( ३६ ) अश्मकेन्द्रस्तु कुन्तलपतिमेकान्ते समभ्यधत्त—'प्रमत्त एष राजा कलत्राणि नः परामृशति । कियत्यवज्ञा सोढव्या । मम शतमस्ति हस्तिनाम् , पञ्चशतानि च ते । तदावां संभूय मुरलेशं वीरसेनमृचीके- शमेकवीरं कोङ्कणपतिं कुमारगुप्तं सासिक्यनाथं च नागपालमुपजपाव । ते चावश्यमस्याविनयमसहमाना अस्मन्मतेनैवोपावर्तेरन् । अयं च वान- वास्यः प्रियं मे मित्रम् । अमुनैवं दुर्विनीतमग्रतो व्यतिषक्तं पृष्ठतः प्राह- रेम । कोशवाहनं च विभज्य गृह्णीमः' इति हृष्टेन चामुनाभ्युपेते, विंशतिं वरांशुकानाम् , पञ्चविंशतिं काञ्चनकुङ्कुमकम्बलानाम् , प्राभृतीकृत्याप्तमु- खेन तैः सामन्तैः संमन्त्र्य तानपि स्वमतावस्थापयत् । उत्तरेद्युस्तेषां सामन्तानां वानवास्यस्य च अनन्तवर्मा नयद्वेषादामिषत्वमगच्छत् । वस- ( २६ ) परामृशति धर्षयति । सम्भूय मिलित्वा । उपजपाव विघटयाव । लोट् । ते वीरसेनादयः । अस्य अनन्तवर्मणः अविनयं दुराचरणम् । उपावर्त्तेरन् आगच्छेयुः । अमुना वानवास्येन । एनम् अश्मकेन्द्रम् । अग्रतः सम्मुखे । व्यति- षक्तं प्रतिरुद्धम् । अमुना कुन्तलपतिना । अभ्युपेते स्वीकृते । वरांशूकानां श्रेष्ठ- वस्त्राणाम् । काञ्चनेति—काञ्चनवर्णकुङ्कुमवासितकम्बलानामित्यर्थः । प्राभृतीकृत्य उपायनीकृत्य । आप्तमुखेन विश्वस्तपुरुषद्वारा । स्वमतौ स्वामिमते । उत्तरेद्युः ( २६ ) 'यह राजा आजकल पागल सा हो गया है तथा हमारी बहू-बेटियों पर बलात्कार किया करता है । आखिरकार हम लोग कब तक ऐसे निरादरों तथा अपमानों को सहें । मेरे समीप एक सौ हाथी हैं तथा आपके समीप पाँच सौ हैं । अतः हम लोग चलकर मुरलेश वीरसेन, ऋचीक देश के शासक एकवीर, कोंकण के अधिपति कुमारगुप्त तथा सासिक्य के स्वामी नागपाल को इससे फोड़कर अपनी ओर मिला लें तथा अनन्तवर्मा से उनका वैर करा दें । वे लोग इसके उच्छृङ्खल व्यवहारों से अवश्य अपनी ओर आ जायेंगे—क्योंकि ऐसा ज्ञात हो चुका है कि वे लोग इस पर क्षुब्ध रहते हैं । भीलों का अधिपति हमारा मित्र है ही अतः उसे आगे भेजकर अनन्तवर्मा को रुकवा दें । पीछे से हम लोग इस पर आक्रमण करके मार डालें । ततः इसके कोष और राज्य-वाहनादि को परस्पर बाँट लें।' जब अवन्तिदेव ने यह योजना मान ली तब बीस अच्छे वस्त्र, पचीस सुनहले तथा कुङ्कुम की सुगन्ध से युक्त कम्बलों को देकर उसने उसके विश्वासपात्र सचिवों के साथ मन्त्रणादि करके उन सबको भी अपनी ओर कर लिया । तत्पश्चात् दूसरे दिन भीलों के स्वामी की तथा उन सामन्तों की कला-कुशलता से अनन्तवर्मा मार डाला गया । तब वसन्तभानु ने उस अनन्तवर्मा के कोश-वाहन और विध्वस्त सैन्य-बल को अपने Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४४१ न्तभानुश्च तत्कोशवाहनमवशीर्णमात्माधिष्ठितमेव कृत्वा 'यथान्यासं यथाबलं च विभज्य गृह्णीत । युष्मदनुज्ञया येनकेनचिदंशेनाहं तुष्यामि' इति शाठ्यात्सर्वानुवर्ती, तेनैवामिषेण निमित्तीकृतेनोत्पादितकलहः सर्व- सामन्तान्ध्वंसयत् । तदीयं च सर्वस्वं स्वयमेवाग्रसत् । वानवास्यं केन- चिदंशेनागृह्य प्रत्यावृत्य सर्वमनन्तवर्मराज्यमात्मसादकरोत् । (२७) अस्मिंश्चान्तरे मन्त्रिवृद्धो वसुरक्षितः कैश्चिन्मौलैः संभूय बालमेनं भास्करवर्माणम् , अस्यैव ज्यायसीं भगिनीं त्रयोदशवर्षां मञ्जु- वादिनीम् , अनयोश्च मातरं महादेवीं वसुंधरामादायापसर्पन्नापदोऽस्या आवितया दाहज्वरेण देहमजहात् । अस्मादृशैर्मित्रैस्तु नीत्वा माहिष्मतीं परदिने । नयद्वेषात् दुर्नयात् । आमिषत्वं भोग्यवस्तुत्वम् । तैर्हत इति भावः । तत्कोशेति-तस्यानन्तवर्मणः कोशवाहनं धनरत्नगजाश्वादिकम् । अवशीर्णं विध्व- स्तम् । आत्माधिकृतं स्वाधिकृतम् । यथाप्रयासं स्वस्वचेष्टानुरूपम् । यथाबलं स्वस्वशक्त्यनुसारेण । सर्वानुवर्त्ती सर्वेषां मनोरञ्जकः । (२७) मौलैः भूयादिमूलज्ञातृभिः । 'मुखिया' इति भाषा । भास्करवर्मा विश्रुतेन पूर्वदृष्टाऽष्टवर्षदेशीयो बालकः अनन्तवर्मणः पुत्रः । ज्यायसीं ज्येष्ठांम् । अधिकारमें कर लिया तथा लोगों से कहा—'आप लोग अपनी शक्तिके और परिश्रमके अनुसार इसमें से हिस्सा बाँट कर लें । हमें आप लोग जो प्रसन्नतासे देंगे वही लेने में हम राजी हो जायेंगे—हमें कोई आपत्ति नहीं है । इस प्रकार के भुलावे दे देकर वसन्तभानुने सबको अपनी ओर राजी कर लिया । परन्तु बटवारेमें से सब सामन्त परस्पर झगड़ गये । वसन्तभानुने ऐसे मौके से लाभ उठाया और सभी सामन्तोंको मार डाला । तदनन्तर उन सबके समस्त धनको उसने ले लिया। मीलोंके अधिपति को जो उसका मित्र था उसमेसे हिस्सा दे दिया और वहां से लौटकर बेखटके अनन्तवर्मा के सारे साम्राज्य पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया । (२७) इसी बीचमें सचिवोंमें श्रेष्ठ वसुरक्षित इस आपत्तिसे व्याकुल होकर कुछ पुराने दासोंको लेकर तथा अपनी त्रयोदशवर्षीया भगिनी मंजुवादिनी एवं अपनी माता महादेवी वसुन्धराके साथ भागा । परन्तु, थोड़े ही दिनों पश्चात् वह ज्वरपीड़ित होकर मर गया । तब कुछ सुहृदोंने बालकोंके साथ महादेवी वसुन्धराको उसकी सौतके पुत्रके समीप भेजवा दिया । किन्तु, उस सुचरित्रा विमाता को उसने भ्रष्टाचारिणी समझा और यह भी सोचा कि सम्भव है विमाता का विचार अपने पुत्र को राजा बनाने का होवे । इस बात का विचार कर वह बहुत घबराया तथा इसी विचार से मित्रवर्मा
४४२ | दशकुमारचरितम् । | [ उत्तरपीठिकायां
४४२ | दशकुमारचरितम् । | [ उत्तरपीठिकायां भर्तुर्द्वैमातुराय भ्रात्रे मित्रवर्मणे सापत्न्या देवी दर्शिताभूत् । तां चार्याम- नार्योऽसावन्यथाभ्यमन्यत । निर्भत्सितश्च तया 'सुतमियमखण्डचारित्रा राज्यार्हं चिकीर्षति' इति नैर्घृण्यात्तमेनं बालमजिघांसीत् । इदं तु ज्ञात्वा देव्याहमाज्ञप्तः—'तात, नालीजङ्घ, जीवतानेनार्भकेण यत्र क्वचिदवधाय जीव । जीवेयं चेदहमप्येनमनुसरिष्यामि । ज्ञापय मां क्षेमप्रवृत्तः स्ववा- र्ताम्' इति । अहं तु संकुले राजकुले कथंचिदेनं निर्गमय्य विन्ध्याटवीं व्यगाहिषि । पादचारिणं चैनमाश्वासयितुं घोषे क्वचिदहानि कानिचिद्वि- श्रमय्य, तत्रापि राजपुरुषसंपातभीतो दूराध्वमपासरम् । तत्रास्य दारुण- पिपासापीडितस्य वारि दातुकामः कूपेऽस्मिन्नपभ्रश्य पतितस्त्वयैवमनुगृ- हीतः। त्वमेवास्यातः शरणमेधि विशरणस्य राजसूनोः' इत्यञ्जलिमबध्नात् । अपसर्पन् पलायमानः । भर्तुः पत्युर्द्वैमातुराय वैमात्रेयभ्रात्रे । आर्यां सुचरित्राम् । अन्यथा दुश्चरित्रामित्यर्थः । अखण्डचारित्रा अक्षतचरित्रा । राज्यार्हं राज्यप्राप्ति- योग्यम् । इति हेतोः नैर्घृण्यात् निष्करुणत्वात् । अजिघांसीत् हन्तुमैच्छत् । सन्नन्ताद् हन्धातोलूँङ् । अहम्—अस्येतिवृत्तस्य वक्ता वृद्धो नालीजङ्घनामा । अव- धाय व्यवहितो भूत्वा । संकुले जनाकीर्णे । व्यगाहिषि प्राविक्षम् । घोषे आभीरप- ल्ल्याम् । विश्रमय्य विश्रामं कारयित्वा । तत्रापि घोषेऽपि । राजपुरुषेति-राजपुरु- षाणां सम्पातात् आगमनाद् भीतः शङ्कितः । दूराध्वं दूरमार्गम् । अपभ्रश्य भ्रष्टो भूत्वा त्वया विश्रुतेनेत्यर्थः । अतः अस्मात्परम् । विशरणस्य शरणरहितस्य । एधि भव । अस् धातोर्लोटि रूपम् । ने अपने सौतले भाई की हत्या नृशंसतापूर्वक करानी चाही। परन्तु जब महारानी को यह बात ज्ञात हुई तो उन्होंने नालीजंघ से कहा—'हे नालीजंघ ! तुम उस बालक को कहीं ले जाकर छिपा दो और इसी के साथ तुम भी छिपकर रहो। यदि मैं जीवित रह जाऊँगी तो तुम लोंगों से मिलूँगी अन्यथा हरिइच्छा । यहां से जाकर जहां पर तुम रहो उसकी सूचना गुप्त रीति से मेरे समीप भेज देना तथा कुशल वृत्त भी भेज देना ।' महारानी की आज्ञानुसार हम सब बालक को साथ लेकर राजदरवार से बाहर होकर विन्ध्याचल के सघन वनों में जाकर छिप गये। पैदल चलने के कारण थके हुए बालक का श्रम मिटाने के लिए हम लोग कई दिनों तक एक ग्वाले की गोशाला में जाकर रहे। किन्तु, वहां पर राजपुरुषों के आने की आशंका थी अतः वहां से हम आगे चल पड़े। मार्ग में इस बालक को बड़ी तेजी से प्यास लगी । अतः जल लेने के लिए इस कूप पर हम आये और इसमें गिर पड़े। बड़ी दया करके आपने हमें इसमें से निकाल लिया
अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४४३ ( २८ ) 'किमीया जात्यास्य माता' इत्यनुयुक्ते मयामुनोक्तम्-'पाट- लिपुत्रस्य वणिजो वैश्रवणस्य दुहितरि सागरदत्तायां कोसलेन्द्रात्कुसुम- धन्वनोऽस्य माता जाता' इति । 'यद्येवमेतन्मातुर्मत्पितुश्चैको मातामहः' इति सस्नेहं तमहं सस्वजे । वृद्धेनोक्तम्-'सिन्धुदत्तपुत्राणां कतमस्ते पिता' इति । 'सुश्रुतः' इत्युक्ते सोऽत्यहृष्यत् । अहं तु 'तं नयावलिप्तम- श्मकनयेनैवोन्मूल्य बालमेनं पित्र्ये पदे प्रतिष्ठापयेयम्' इति प्रतिज्ञाय 'कथमस्यैनां क्षुधं क्षपयेयम्' इत्यचिन्तयम् । तावदापतितौ च कस्यापि व्याधस्य त्रीनिषूनतीत्य द्वौ मृगौ स च व्याधः । तस्य हस्तादवशिष्ट- ( २८ ) किमीया जात्येति-कस्येयमिति किमीया कस्या जातेरुत्पन्नेत्यर्थः । अनुयुक्ते पृष्टे । मया विश्रुतेनेत्यर्थः । अमुना नालीजङ्घेन । तं बालकम् । सिन्धु- दत्तेति सिन्धुदत्तस्य बहवः पुत्रास्तेषु तव पिता कतमः किंनामक इति । तम् अश्मकेन्द्रम् । नयावलिप्तम् नीतिगर्वितम् । अश्मकनयेन पाषाणोन्मूलनन्यायेन । अश्मकमिति पाठे तु नयेन नीत्येति सम्बन्धः अस्य बालस्य । क्षुधं क्षुधाम् । क्षपयेयम् नाशयेयम् । तावत्-एतस्मिन्नन्तरे । त्रीन् इषून् बाणत्रयमित्यर्थः । जिससे हमारे प्राण बच गये । अब इस अनाथ राजकुमार के आप ही संरक्षक हैं, आप ही इसे पालें ।' इतना कह कर वह खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर तकने लगा । ( २८ ) हमने पूछा-'यह बालक किस जाति का है ?' तब उसने उत्तर दिया- 'पाटलिपुत्र के वैश्य वैश्रवण की पुत्री सागरदत्ता के साथ कोशल देश के स्वामी महाराज कुसुमधन्वा का संसर्ग होने पर इसकी माता का जन्म हुआ था।' इस बात को श्रवण कर हमने कहा- 'तब तो इसकी माता और हमारे पिता दोनों के मातामह एक ही थे।' बस, हमने उस बालक को छाती से लगा लिया । वृद्ध ने पूछा-'सिन्धुदत्त के पुत्रों में से कौन व्यक्ति आपके पिता थे ।' हमने कहा- 'सुश्रुत' यह बात श्रवण कर वह परम मुदित हो गया । तब हमने मन ही मन में प्रतिज्ञा की कि 'मैं इस नीति से दर्पित अश्मक देश के स्वामी को नीति की शक्ति से नष्ट कर डालूंगा तथा इस बालक को इसके पिता के सिंहासन पर अवश्य बैठाऊँगा।' उसी समय दो हिरण दौड़ते हुए हमारे पास आये । वे एक बहेलिये के तीन बाणों से बचकर भाग निकले थे । उसी समय वह व्याध भी वहाँ पर आकर उपस्थित हो गया । उसके पास दो बाण और भी शेष बचे थे । बस हमने उससे धनुष-बाण ले लिए और उन मृगों पर चला दिये । उनमें से एक की देह पर वह बाण ऊपर लगे हुए पक्ष तक छिद गया तथा दूसरे की देह में हमारा बाण ऐसा छिदा कि आर-पार कर गया । उन दोनों मृगों में से एक मृग हमने बहेलिये को दे दिया और २६ द० कु० उ० Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
४५४ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri. Funding: MIDF ४५४ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां मिषुद्वयं कोदण्डं चाक्षिप्यावधिषम् । एकश्च सपत्राकृतोऽन्यश्च निष्पत्रा- कृतोऽपतत् । तं चैकं मृगं दत्त्वा मृगयवे, अन्यस्यापलोमत्वचः क्लोमा- पोह्य, निष्कुलाकृत्य विकृत्यार्वङ्गि ग्रीवादीनि शूलाकृत्य दावाङ्गारेषु, तप्ते- नामिषेण तयोरात्मनश्च क्षुधमतार्षम् । एतस्मिन्कर्मणि मत्सौष्ठवेनाति- हृष्टं किरातम्मम्नि पृष्टवान्—'अपि जानासि माहिष्मतीवृत्तान्तम्' इति । असावाचष्ट—'तत्र व्याघ्रत्वचो दृतीश्च विक्रीयाद्यैवागतः किं न जानामि । प्रचण्डवर्मा नाम चण्डवर्मानुजो मित्रवर्मदुहितरं मञ्जुवादिनीं विलिप्सु- रभ्येतीति तेनोत्सवोत्तरा पुरी' इति । अतीत्योल्लङ्घ्य । स च व्याध आपतित इत्यध्याहारेणान्वयः । अवधिषं प्राह- रम् । सपत्राकृतो निष्पत्राकृतश्च 'सपत्रनिष्पत्रादतिव्यथने' इति डाच् । अनयोर- र्थस्तु-सपत्रः शरो मृगस्य शरीरे प्रवेशित इति सपत्राकृतः-मृगस्य पार्श्वद्वयं- भित्त्वा निष्पत्रः शरो वहिष्कृत इति निष्पत्राकृतः । मृगयवे व्याधाय । अपलो- मत्वचो निर्लोमचर्मणः । अन्यस्येत्यस्य विशेषणम् । क्लोम फुफ्फुसम् । 'फेफड़ा' इति भाषा । अपोह्य निःसार्य । निष्कुलाकृत्य निस्त्वचीकृत्य । विकृत्य विच्छिद्य । शूलाकृत्य शूलेन पाचयित्वा । दावाङ्गारेषु वनाग्निषु । तप्तेन उष्णेन भर्जितेन वा । आमिषेण मांसेन । तयोः बालवृद्धयोः । अतार्षं न्यवारयम् । मत्सौष्ठवेन मम पाट- वेन दक्षतयेति यावत् । किरातं पूर्वागतं व्याधम् । व्याघ्रत्वचो व्याघ्रचर्माणि । दृतीः चर्मपुटिकान् । किं न जानामीत्यस्यार्थः । सर्वमेव जानामीति विलिप्सुर्लब्धुमिच्छुः । उत्सवोत्तरा उत्सवभूयिष्ठा । दूसरे मृग के रोयें, चमड़ी तथा क्लोम ( अन्तःकरण के समीप रहने वाला पिपासा का उत्पत्ति स्थान ) एवं अँतड़ियाँ आदि निकालकर पृथक् कर दीं और काट-छाँट दिया । तत्पश्चात्—उसकी जाँघें, हड्डियाँ, गला आदि सलाई की लकड़ियों में बाँधकर अरण्याग्नि में रखकर उसके अङ्गारों पर भूना । इस प्रकार उसके पके हुए मांस द्वारा हमने उस बालक की और नालीजङ्घ की एवं अपनी क्षुधा की निवृत्ति की । हमारे इस कौशल पर वह बहेलिया बहुत प्रसन्न हुआ । हमने उससे पूछा- 'माहिष्मती का कुछ समाचार जानते हो ?' उसने उत्तर दिया-'वहीं से तो बाघ के चमड़े की पिटारियों को बेचकर लौट रहा हूँ । भला, वहाँ का वृत्त क्यों न जानूंगा । चण्डवर्मा का छोटा भाई प्रचण्डवर्मा मित्रवर्मा की कन्या मंजुवादिनी को लेने आ रहा है । इसलिए उस नगरी में आज बड़ा भारी महोत्सव मनाया जा रहा है ।' Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri. Funding: MIDF अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४४५ (२६ अथ कर्णे जीर्णमब्रवम् 'धूर्तो मित्रवर्मा दुहितरि सम्यक्प्रतिपत्त्या मातरं विश्वास्य तन्मुखेन प्रत्याकृष्य बालकं जिघांसति । तत्प्रतिगत्य कुशलमस्य मद्वार्ता च देव्यै रहो निवेद्य पुनः कुमारः शार्दूलभक्षित इति प्रकाशमाक्रोशनं कार्यम् । स दुर्मतिरन्तःप्रीतो बहिर्दुःखं दर्शयन्देवीम- नुनेष्यति । पुनस्तया त्वन्मुखेन स वाच्यः- 'यदपेक्षया त्वन्मतमत्य- क्रमिष सोऽपि बालः पापेन मे परलोकमगात् । अद्य तु त्वंदादेशकारि- ण्येवाहम्' इति । स तथोक्तः प्रीति प्रतिपत्त्याभिपत्स्यति । पुनरनेन वत्सनाभनाम्ना महाविषेण संनीय तोयं तत्र मालां मज्जयित्वा तया स वक्षसि मुखे च हन्तव्यः । 'स एवायमसिप्रहारः पापीयसस्तव भवतु यद्यस्मि पतिव्रता' । पुनरनेनागदेन संगमितेऽम्भसि तां मालां मज्ज- (२९) जीर्णं वृद्धं नालीजंघमित्यर्थः । दुहितरि मंजुवादिन्याम् । सम्य- क्प्रतिपत्त्या अनुकंपया । प्रत्याकृष्य आनीय । तत् तस्मात् कारणात् । अस्य भास्करवर्मणः । रहो निर्जने । पुनः पश्चात् । आक्रोशनं क्रन्दनम् । त्वन्मुखेन त्वां सम्प्रेष्येत्यर्थः । स मित्रवर्मा । अत्यक्रमिषम् अतिक्रान्तवती । प्रपिपद्य प्राप्य । अभिपत्स्यते अनुग्रहीष्यति देवीमिति शेषः । वत्सनाभो विषभेदः । दारदो वत्स- नाभश्चेत्यमरः । संनीय मिश्रयित्वा । तया देव्या । स मित्रवर्मा । अगदेन ओष- धिना । सङ्गमिते मिश्रिते । स्वदुहित्रे मंजुवादिन्यै । तस्मिन् मित्रवर्मणि । तस्यां (२९) तत्पश्चात् हमने उस बूढ़े नालीजंघ के कान में कहा- 'वह कपटी मित्रवर्मा अपनी कन्या मंजुवादिनी के ऊपर प्रेम दरसा तथा उसके द्वारा माता को विश्वास दिलवा करके इस बालक को अपने समीप बुलाकर मार डालना चाहता है । अतः आप हमारा तथा इस बालक का कुशल समाचार लेकर देवी वसुन्धरा के समीप जायँ तथा वहाँ यह कह कर रोने लगें कि बालक को सिंह खा गया ।' इस बात पर दुराचारी मित्रवर्मा मन में मुदित होकर ऊपरी दुःख प्रकट करता हुआ महारानी को सान्त्वना देगा । तत्पश्चात् महारानी आपके द्वारा उस दुष्ट से यह कहला भेजे कि जिसके लिए मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी वह बालक ही मर गया, अब तो आप जो आज्ञा दें वही मैं करूँ । यह श्रवण कर वह अति हर्षित हो जायगा और महादेवी वसुन्धरा के समीप आवेगा । उस समय इस वत्सनाभ नामक महाविष को पानी में घोलकर उसमें पुष्पों की माला भिगो कर रखे रहें तथा उस मित्रवर्मा के आते ही उसकी छाती और मुख पर बार-बार उसी माला को प्रेम से मारें तथा कहें- 'यदि मैं पतिव्रता होऊँ तो मेरी माला की मार तुम्हारे लिए तलवार के Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
४४६ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां
४४६ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां यित्वा स्वदुहित्रे देया । मृते तु तस्मिंस्तस्यां च निर्विकारायां सत्याम् , सतीत्येवैनां प्रकृतयोऽनुवर्तिष्यन्ते । पुनः प्रचण्डवर्मणे संदेश्यम्—'अना- यकमिदं राज्यम् । अनेनैव सह बालिकेयं स्वीकर्तव्या' इति । तावदावां कापालिकवेषच्छन्नौ देव्याैव दीयमानभिक्षौ पुरो बहिरुपश्मशानं वत्स्यावः । पुनरार्यप्रायान्पौरवृद्धानाप्तांश्च मन्त्रिवृद्धानेकान्ते ब्रवीतु देवी- स्वप्नेऽद्य मे देव्या विन्ध्यवासिन्या कृतः प्रसादः । अद्य चतुर्थेऽहनि प्रचण्डवर्मा मरिष्यति । पञ्चमेऽहनि रेवातटवर्तिनि मद्भवने परीक्ष्य वैज- न्यम् , जनेषु निर्गतेषु कपाटमुद्घाट्य त्वत्सुतेन सह कोऽपि द्विजकुमारो निर्यास्यति । स राज्यमिदमनुपाल्य बालं ते प्रतिष्ठापयिष्यति । ख खलु बालो मया व्याघ्रीरूपया तिरस्कृत्य स्थापितः । सा चेयं वत्सा मञ्जुवा- मञ्जुवादिन्याम् । निर्विकारायां विकाररहितायाम् । सतीति पतिव्रतेति । एनां देवीम् । अनुवर्त्तिष्यन्ते अनुसरिष्यन्ति । सन्देश्यं वाचिकं प्रेषणीयम् । अनायकं नायकशून्यम् । अनेन राज्येन । स्वीकर्त्तव्या विग्राह्या । तावत् तावता कालेन । आवाम् अहं भास्करवर्मा च । दीयमाना भिक्षा याभ्यां तौ । पुरो बहिर्नगराद्वहिः । उपश्मशानं श्मशानसमीपे । आर्यप्रायान् साधून् सच्चरित्रान् । वैजन्यं जनशून्य- सदृश हो।' इसके पश्चात् हमारी इस औषध में वह माला धो लेवें तथा निर्विष करके उसे अपनी कन्या मंजुवादिनी को दे दें । ऐसा कार्य करने से मित्रवर्मा मर जायगा और मंजुवादिनी बच जायगी । ऐसी स्थिति में लोग महादेवी को सती समझने लगेंगे और उसकी पूजा करेंगे । तदनन्तर प्रचण्डवर्मा के समीप यह सन्देश भेजा जाय कि यह साम्राज्य अधुना राजा से से रहित है । अतः आप इस साम्राज्य के साथ-साथ इस बालिका को भी स्वीकारिये । तब तक हम दोनों कापालिक साधु का वेश धर कर महारानी की भिक्षा पर जीवन व्यतीत करते हुए नगर के बाहर श्मशान में रहेंगे । समय पाकर महादेवी अपने निर्जा नगरवासियों और वृद्ध सचिवोंको बुलाकर एकान्त में कहें—'आज भगवती विन्ध्यवासिनी देवी ने स्वप्न में मुझसे आकर कहा है कि आज के चौथे दिन प्रचण्डवर्मा मर जायगा । पाँचवें दिन नर्मदा के तट पर एकान्त में वर्तमान मेरे मन्दिर में सन्नाटा हो जायगा तब तक एक विप्र का बालक तुम्हारे बालक के साथ फाटक खोलकर बाहर आवेगा । वह ब्राह्मण इस साम्राज्य को लेकर तुम्हारे पुत्र को राज्यसिंहासन पर आरूढ़ कर देगा । इस समय मैं व्याघ्री बनकर तुम्हारे पुत्र की रक्षा कर रही हूँ । मंजुवादिनी उस वि
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४५७ दिनी तस्य द्विजातिदारकस्य दारत्वेनैव कल्पिता' इति । तदेतदतिरहस्यं युष्मास्वेव गुप्तं तिष्ठतु यावदेतदुपपत्स्यते' इति । ( ३० ) स सांप्रतमतिप्रीततः प्रयातोऽर्थश्चायं यथाचिन्तितमनुष्ठितोऽ- भूत् । प्रतिदिशं च लोकवादः प्रासर्पत्—'अहो माहात्म्यं पतिव्रतानाम् । असिप्रहार एव हि स मालाप्रहारस्तस्मै जातः । न शक्यमुपधियुक्तमेत- त्कर्मेति वक्तुम् । यतस्तदेव दत्तं दाम दुहित्रे स्तनमण्डनमेव तस्यै जातं न मृत्युः । योऽस्याः पतिव्रतायाः शासनमतिवर्तते स भस्मैव भवेत्'इति । ( ३१ ) अथ महाव्रतिवेषेण मां च पुत्रं च भिक्षायै प्रविष्टौ दृष्ट्वा प्रस्नुतस्तनी प्रत्युत्थाय हर्षाकुलमब्रवीत्—'भगवन्, अयमञ्जलिः । ताम् । अतिरहस्यमतिगोपनीयम् । यावत् यत्काळपर्यन्तम् । उपपत्स्यते सिद्धं भविष्यति । ( ३० ) सः नालीजंघः । अर्थः मदुक्तो विषयः । प्रासर्पत् प्राचरत् । तस्मै तदर्थम् मित्रवर्मणे इत्यर्थः । उपधियुक्तं कपटायुक्तम् । दाम माला । अतिव- र्त्तते लंघयति । ( ३१ ) महाव्रतिवेषेण कापालिकच्छद्मना । भिक्षायै भिक्षार्थम् । प्रस्नुतस्तनी स्रवत्पयोधरा । यद्येवं भवद्वचनं सत्यं स्यात् । अस्याः ममेत्यर्थः । अस्याः कुमार की परिणीता भार्या होगी । हमने जो मद्गुप्त की बात बतायी है, उसे तब तक आप लोग गुप्त रखें जब तक यह बात ठीक न हो जाय । ( ३० ) इन बातों को सुनने के पश्चात्—वह बूढ़ा नालीजंघ अति आनन्द के साथ विदा हुआ तथा हमने जो योजनाएँ बनायी थीं उसने उन्हें सम्पादित भी कर दी । अब चारों ओर यह हल्ला हो गया कि, 'देखो पातिव्रत धर्म की कितनी बड़ी महिमा है कि देवी ने मित्रवर्मा पर माला का प्रहार किया और वह प्रहार उसके लिए खङ्ग प्रहार हो गया। यदि यह कहा जाय कि उक्त माला में कोई विष मिला था तो ऐसी कल्पना करना भी भ्रममात्र है, क्योंकि उसी माला द्वारा मित्रवर्मा को मारकर देवी ने वही माला मंजुवादिनी को दे दी है और उसने तुरन्त धारण भी कर लिया । परन्तु वह तो न मरी अपितु, वह माला उसके स्तनों की भूषण बन गयी अतः जो कोई भी इस पतिव्रता की आज्ञाओं को न मानेगा वह जलकर भस्म हो जायगा।' ( ३१ ) तदनन्तर हम उसके साथ संन्यासियों का रूप धरकर उसके यहाँ भिक्षा माँगने गये । हम दोनों को देखकर वह अति हर्षित हुई। उसके स्तनों से दुग्ध की धारा बह चली । वह गद्गद स्वर में बोली—'हे भगवन् ! मैं आपसे हाथ जोड़कर विनय Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu