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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
५३८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २

| व्यास उवाच<br>एवं दत्त्वा वरं तस्मै ययौ ब्रह्मा निजालयम्।<br>सोऽपि दैत्यवरः प्राप निजं स्थानं मुदान्वितः॥ १५ | व्यासजी बोले—हे राजन्! इस प्रकार उसे वरदान देकर ब्रह्माजी अपने लोकको चले गये और वह दैत्यश्रेष्ठ महिषासुर भी प्रसन्न होकर अपने घर लौट गया॥ १५॥ | | राजोवाच<br>महिषः कस्य पुत्रोऽसौ कथं जातो महाबली।<br>कथं च माहिषं रूपं प्राप्तं तेन महात्मना॥ १६ | राजा बोले—वह महिषासुर किसका पुत्र था, वह महान् बलशाली कैसे हो गया था और उस महान् दैत्यको महिषका रूप कैसे मिला था?॥ १६॥ | | व्यास उवाच<br>दनोः पुत्रौ महाराज विख्यातौ क्षितिमण्डले।<br>रम्भश्चैव करम्भश्च द्वावास्तां दानवोत्तमौ॥ १७ | व्यासजी बोले—हे महाराज! दनुके रम्भ और करम्भ—नामक दो पुत्र थे। वे दोनों दानवश्रेष्ठ भूमण्डलपर बहुत प्रसिद्ध थे॥ १७॥ | | तावपुत्रौ महाराज पुत्रार्थं तेपतुस्तपः।<br>बहून्वर्षगणान्कामं पुण्ये पञ्चनदे जले॥ १८<br><br>करम्भस्तु जले मग्नश्चकार परमं तपः।<br>वृक्षं रसालवटं प्राप्य रम्भोऽग्निमसेवत॥ १९ | हे महाराज! वे दोनों सन्तानहीन थे, अतः वे पुत्र-प्राप्तिके लिये तपस्या करने लगे। उनमें करम्भने पवित्र पंचनदके जलमें डूबकर अनेक वर्षोंतक कठोर तप किया और रम्भ दूधवाले वटवृक्षके नीचे जाकर पंचाग्निका सेवन करने लगा॥ १८-१९॥ | | पञ्चाग्निसाधनासक्तः स रम्भस्तु यदाभवत्।<br>ज्ञात्वा शचीपतिर्दुःखमुद्ययौ दानवौ प्रति॥ २० | बहुत कालतक जब रम्भ पंचाग्नि-साधना करता रह गया, तब यह जानकर इन्द्र बहुत चिन्तित हुए और वे उन दोनों दानवोंके पास पहुँच गये॥ २०॥ | | गत्वा पञ्चनदे तत्र ग्राहरूपं चकार ह।<br>वासवस्तु करम्भं तं तदा जग्राह पादयोः॥ २१ | पंचनदके जलमें प्रविष्ट होकर इन्द्रने ग्राहका रूप धारण कर लिया और उस करम्भको दोनों पैरोंसे पकड़ लिया। इस प्रकार वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्रने उस करम्भको मार डाला॥ २१ १/२॥ | | निजघान च तं दुष्टं करम्भं वृत्रसूदनः।<br>भ्रातरं निहतं श्रुत्वा रम्भः कोपं परं गतः॥ २२<br><br>स्वशीर्षं पावके होतुमैच्छच्छित्त्वा करेण ह।<br>केशपाशे गृहीत्वाशु वामेन क्रोधसंयुतः॥ २३<br><br>दक्षिणेन करेणोग्रं गृहीत्वा खड्गमुत्तमम्।<br>छिनत्ति शीर्षं तत्तावद्वह्निना प्रतिबोधितः॥ २४ | तब अपने भाईका वध सुनकर रम्भ अत्यधिक कुपित हुआ। उसने अपने हाथसे अपना सिर काटकर उसे अग्निमें होम कर देनेकी इच्छा की। तदुपरान्त वह तत्काल अत्यन्त क्रोधके साथ बायें हाथसे अपने केशपाश पकड़कर दाहिने हाथमें तीक्ष्ण तलवार लेकर जैसे ही अपना सिर काटनेको उद्यत हुआ, तभी अग्निदेव [प्रकट होकर] उसे समझाने लगे॥ २२—२४॥ | | उक्तश्च दैत्य मूर्खोऽसि स्वशीर्षं छेत्तुमिच्छसि।<br>आत्महत्यातिदुःसाध्या कथं त्वं कर्तुमुद्यतः॥ २५ | [अग्निदेव उससे] बोले—हे दैत्य! तुम अपना ही सिर काटना चाहते हो; तुम तो बड़े मूर्ख हो। आत्महत्या अत्यन्त ही दुःसाध्य कर्म है। इसे करनेके लिये तुम कैसे तैयार हो गये?॥ २५॥ | | वरं वरय भद्रं ते यस्ते मनसि वर्तते।<br>मा म्रियस्व मृतेनाद्य किं ते कार्यं भविष्यति॥ २६ | तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनमें जो हो, वह वरदान माँग लो। मरो मत, मरनेसे तुम्हारा कौन-सा कार्य हो जायगा?॥ २६॥ |

अ० २ ]पञ्चम स्कन्ध५३९

| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं रम्भः पावकस्य सुभाषितम्।<br>ततोऽब्रवीद्वचो रम्भस्त्यक्त्वा केशकलापकम्॥ २७<br><br>यदि तुष्टोऽसि देवेश देहि मे वाञ्छितं वरम्।<br>त्रैलोक्यविजयी पुत्रः स्यान्मः परबलार्दनः॥ २८<br><br>अजेयः सर्वथा स स्याद्देवदानवमानवैः।<br>कामरूपी महावीर्यः सर्वलोकाभिवन्दितः॥ २९<br><br>पावकस्तं तथेत्याह भविष्यति तवेप्सितम्।<br>पुत्रस्तव महाभाग मरणाद्विरमाधुना॥ ३०<br><br>यस्यां चित्तं तु रम्भ त्वं प्रमदायां करिष्यसि।<br>तस्यां पुत्रो महाभाग भविष्यति बलाधिकः॥ ३१<br><br>व्यास उवाच<br>इत्युक्तो वह्निना रम्भो वचनं चित्तरञ्जनम्।<br>श्रुत्वा प्रणम्य प्रययौ वह्निं तं दानवोत्तमः॥ ३२<br><br>यक्षैः परिवृतं स्थानं रमणीयं श्रियान्वितम्।<br>दृष्ट्वा चक्रे तदा भावं महिष्यां दानवोत्तमः॥ ३३<br><br>मत्तायां रूपपूर्णायां विहायान्याञ्च योषितम्।<br>सा समागाच्च तरसा कामयन्ती मुदान्विता॥ ३४<br><br>रम्भोऽपि गमनं चक्रे भवितव्यप्रणोदितः।<br>सा तु गर्भवती जाता महिषी तस्य वीर्यतः॥ ३५<br><br>तां गृहीत्वाथ पातालं प्रविवेश मनोहरम्।<br>महिषेभ्यश्च तां रक्षन्प्रियामनुमतां किल॥ ३६<br><br>कदाचिन्महिषश्चान्यः कामार्तस्तामुपाद्रवत्।<br>स्वयमागत्य तं हन्तुं दानवः समुपाद्रवत्॥ ३७ | व्यासजी बोले— अग्निदेवका सुन्दर वचन सुनकर रम्भने अपना केशपाश छोड़कर कहा—हे देवेश! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे यही वांछित वरदान दीजिये कि मुझे तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करनेवाला तथा शत्रु-सेनाका विनाश करनेवाला पुत्र प्राप्त हो। वह देवता, दानव तथा मनुष्य—इन सभीसे सर्वथा अजेय हो। वह महापराक्रमी, अपने इच्छानुसार कोई भी रूप धारण करनेमें समर्थ तथा सभी लोगोंके लिये वन्दनीय हो॥ २७—२९॥<br><br>अग्निदेवने उससे कहा कि जैसी तुम्हारी अभिलाषा है, वैसा ही होगा। हे महाभाग! तुम्हें वैसा ही पुत्र प्राप्त होगा, किंतु अब तुम मरनेका विचार छोड़ दो॥ ३०॥<br><br>हे महाभाग! हे रम्भ! जिस भी स्त्रीके प्रति तुम्हारे मनमें आसक्ति-भाव आ जायगा, उसीसे तुम्हें वह महाबलशाली पुत्र उत्पन्न होगा॥ ३१॥<br><br>व्यासजी बोले— हे राजन्! अग्निदेवने उससे ऐसा कहा। तब उनका मनमोहक वचन सुनकर दानवश्रेष्ठ रम्भ अग्निको प्रणाम करके वहाँसे चला गया और एक ऐसे स्थानपर जा पहुँचा जो रमणीक, समृद्धियोंसे सम्पन्न तथा यक्षोंसे घिरा हुआ था॥ ३२ १/२ ॥<br><br>वहाँ एक रूपवती तथा मदमत्त महिषीको देखकर वह दानवश्रेष्ठ किसी अन्य स्त्रीको छोड़कर उसीपर आसक्त हो गया। वह महिषी भी उसे प्रसन्नतापूर्वक चाहती हुई तत्काल उसके साथ रमणके लिये तैयार हो गयी। होनहारसे प्रेरित होकर रम्भने उसके साथ समागम किया और उसके वीर्यसे वह महिषी गर्भवती हो गयी॥ ३३—३५॥<br><br>तत्पश्चात् उसे अपने साथ लेकर रम्भने मनोहर पाताललोकमें प्रवेश किया और वहाँपर महिषोंसे अपने मनोनुकूल उस प्रियतमाकी रक्षा करता हुआ वह सुखपूर्वक रहने लगा॥ ३६॥<br><br>किसी दिन एक दूसरे महिषने कामासक्त होकर उस महिषीको दौड़ा लिया। यह देखकर दानव रम्भ स्वयं वहाँ आकर उसे मारनेके लिये दौड़ा और उसके पास पहुँचकर |

५४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २

५४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २


संस्कृतहिन्दी
स्वरक्षार्थं समागत्य महिषं समताडयत्।<br>सोऽपि तं निजघानाशु शृङ्गाभ्यां काममोहितः॥ ३८अपनी रक्षाके लिये रम्भने उस महिषपर कठोर प्रहार किया। तब उस कामातुर महिषने भी अपनी सींगोंसे रम्भपर शीघ्रतासे प्रहार करना आरम्भ कर दिया॥ ३७-३८॥
ताडितस्तेन तीक्ष्णाभ्यां शृङ्गाभ्यां हृदये भृशम्।<br>भूमौ पपात तरसा ममार च विमूर्च्छितः॥ ३९उस महिषके द्वारा तीक्ष्ण सींगोंसे हृदयस्थलमें गहरी चोट पहुँचानेके कारण रम्भ शीघ्र ही मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और मर गया॥ ३९॥
मृते भर्तरि सा दीना भयार्ता विद्रुता भृशम्।<br>सा वेगात्तं वटं प्राप्य यक्षाणां शरणं गता॥ ४०पतिके मर जानेपर अत्यन्त शोकाकुल तथा भयग्रस्त वह महिषी वहाँसे भाग चली। वेगपूर्वक भागती हुई वह एक वटवृक्षके नीचे पहुँचकर वहाँ रहनेवाले यक्षोंकी शरणमें जा पहुँची॥ ४०॥
पृष्ठतस्तु गतस्तत्र महिषः कामपीडितः।<br>कामयानस्तु तां कामी बलवीर्यमदोद्धतः॥ ४१वह कामार्त और बल तथा वीर्यसे मदोन्मत्त कामासक्त महिष भी उसकी कामना करता हुआ उसके पीछे-पीछे गया॥ ४१॥
रुदती सा भृशं दीना दृष्टा यक्षैर्भयातुरा।<br>धावमानं च तं वीक्ष्य यक्षास्त्रातुं समाययुः॥ ४२यक्षोंने उस महिषसे पीड़ित तथा भयभीत होकर रोती हुई उस महिषीको देख लिया और महिषको दौड़ता हुआ देखकर उस महिषीकी रक्षाके लिये वे यक्ष वहाँ आ गये॥ ४२॥
युद्धं समभवद् घोरं यक्षाणां च हयारिणा।<br>शरेण ताडितस्तूर्णं पपात धरणीतले॥ ४३अब उस महिषके साथ यक्षोंका विकराल युद्ध होने लगा और अन्तमें बाणसे आहत होकर वह महिष शीघ्र ही भूमिपर गिर पड़ा॥ ४३॥
मृतं रम्भं समानीय यक्षास्ते परमं प्रियम्।<br>चितायां रोपयामासुस्तस्य देहस्य शुद्धये॥ ४४<br><br>महिषी सा पतिं दृष्ट्वा चितायां रोपितं तदा।<br>प्रवेष्टुं सा मतिं चक्रे पतिना सह पावकम्॥ ४५तदनन्तर उन यक्षोंने परम प्रिय मृत रम्भको लाकर उसकी देह-शुद्धिके लिये उसे चितापर रख दिया। तब उस महिषीने अपने पतिको चितापर रखा हुआ देखकर उसके साथ स्वयं भी अग्निमें प्रवेश करनेका निश्चय किया॥ ४४-४५॥
वार्यमाणापि यक्षैः सा प्रविवेश हुताशनम्।<br>ज्वालामालाकुलं साध्वी पतिमादाय वल्लभम्॥ ४६यक्षोंके मना करनेपर भी अपने प्रिय पतिके साथ वह महिषी विकराल लपटोंवाली अग्निमें प्रविष्ट हो गयी॥ ४६॥
महिषस्तु चितामध्यात्समुत्तस्थौ महाबलः।<br>रम्भोऽप्यन्यद्वपुः कृत्वा निःसृतः पुत्रवत्सलः॥ ४७<br><br>रक्तबीजोऽप्यसौ जातो महिषोऽपि महाबलः।<br>अभिषिक्तस्तु राज्येऽसौ हयारिरसुरोत्तमैः॥ ४८उसी समय एक महाबली महिष चिताके मध्यसे प्रकट हो गया तथा अन्य शरीर धारण करके वह पुत्रप्रेमी रम्भ भी चिताके मध्यभागसे निकल पड़ा। इस प्रकार रक्तबीज तथा महान् बलशाली महिषासुर उत्पन्न हुए। तदनन्तर श्रेष्ठ दानवोंने उस महिषासुरका राज्याभिषेक कर दिया॥ ४७-४८॥
एवं स महिषो जातो रक्तबीजश्च वीर्यवान्।<br>अवध्यस्तु सुरैर्दैत्यैर्मानवैश्च नृपोत्तम॥ ४९हे नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार महिषासुर तथा पराक्रमी रक्तबीज उत्पन्न हुए। वह महिषासुर देवताओं, दानवों तथा मनुष्योंसे अवध्य था॥ ४९॥
अ० ३ ]पञ्चम स्कन्ध५४१

| इत्येतत्कथितं राजन् जन्म तस्य महात्मनः।<br>वरप्रदानञ्च तथा प्रोक्तं सर्वं सविस्तरम्॥ ५० | हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपको उस महान् महिषासुरके जन्म तथा उससे सम्बन्धित वरदान-प्राप्तिका प्रसंग विस्तारपूर्वक बता दिया॥ ५०॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषासुरोत्पत्तिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥


अथ तृतीयोऽध्यायः

महिषासुरका दूत भेजकर इन्द्रको स्वर्ग खाली करनेका आदेश देना, दूतद्वारा इन्द्रका युद्धहेतु आमन्त्रण प्राप्तकर महिषासुरका दानववीरोंको युद्धके लिये सुसज्जित होनेका आदेश देना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
एवं स महिषो नाम दानवो वरदर्पितः।<br>प्राप्य राज्यं जगत्सर्वं वशे चक्रे महाबलः॥ १इस प्रकार वरदान पानेके कारण अभिमानयुक्त उस महाबली दानव महिषासुरने राज्य प्राप्त करके सम्पूर्ण जगत्को अपने अधीन कर लिया॥ १॥
पृथिवीं पालयामास सागरान्तां भुजार्जिताम्।<br>एकच्छत्रां निरातङ्कां वैरिवर्गविवर्जिताम्॥ २उसने समुद्रपर्यन्त सारी पृथिवीको अपने बाहुबलसे जीतकर शत्रु-समुदायसे रहित कर दिया तथा वह निर्भय होकर एकच्छत्र राज्य करने लगा॥ २॥
सेनानीश्चिक्षुरस्तस्य महावीर्यो मदोत्कटः।<br>धनाध्यक्षस्तथा ताम्रः सेनायुतसमावृतः॥ ३उसका सेनाध्यक्ष चिक्षुर महापराक्रमी एवं मदमत्त था। ताम्र उसका कोषाध्यक्ष था, जिसके पास दस हजार सैनिक थे॥ ३॥
असिलोमा तथोदर्को बिडालाख्यश्च बाष्कलः।<br>त्रिनेत्रोऽथ तथा कालबन्धको बलदर्पितः॥ ४<br><br>एते सैन्ययुताः सर्वे दानवा मेदिनीं तदा।<br>आवृत्य संस्थिताः काममृद्धां सागरमेखलाम्॥ ५उस समय असिलोमा, उदर्क, बिडालाख्य, बाष्कल, त्रिनेत्र तथा बलोन्मत्त कालबन्धक—इन दानवोंने अपनी-अपनी विशाल सेनाओंके साथ सागरान्त समृद्धिशालिनी पृथिवीको घेरकर राज्य स्थापित किया॥ ४-५॥
करदाश्च कृताः सर्वे भूमिपालाः पुरातनाः।<br>निहता ये बलोदग्राः क्षात्रधर्मव्यवस्थिताः॥ ६जो पुराने नरेश थे, वे भी अब महिषासुरको कर देने लगे। उनमें भी जो स्वाभिमानी थे और क्षात्र-धर्मानुसार जिन्होंने उसका सामना किया, वे मार डाले गये॥ ६॥
ब्राह्मणा वशगा जाता यज्ञभागसमर्पकाः।<br>महिषस्य महाराज निखिले क्षितिमण्डले॥ ७हे महाराज! सम्पूर्ण भूमण्डलपर ब्राह्मणलोग महिषासुरके अधीन हो गये और उसे यज्ञभाग देने लगे॥ ७॥
एकातपत्रं तद्राज्यं कृत्वा स महिषासुरः।<br>स्वर्गं जेतुं मनश्चक्रे वरदानेन गर्वितः॥ ८इस प्रकार एकच्छत्र राज्य स्थापित करके वरदानसे गर्वित वह महिषासुर स्वर्गपर भी विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषा करने लगा॥ ८॥

५४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३

५४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३

प्रणिधिं प्रेषयामास हयारिस्तु शचीपतिम्।<br>स सन्देशहरं शीघ्रमाहूयोवाच दैत्यराट् ॥ ९<br><br>गच्छ वीर महाबाहो दूतत्वं कुरु मेऽनघ ।<br>ब्रूहि शक्रं दिवं गत्वा निःशङ्कः सुरसन्निधौ ॥ १०<br><br>मुञ्च स्वर्गं सहस्राक्ष यथेष्टं गच्छ मा चिरम्।<br>सेवां वा कुरु देवेश महिषस्य महात्मनः ॥ ११महिषासुरने इन्द्रके पास अपना एक दूत भेजा। उस दैत्यराजने दूतको बुलाकर उससे कहा—हे वीर! जाओ, हे महाबाहो! तुम मेरा दूतकार्य करो। हे अनघ! तुम निडर होकर स्वर्गमें देवताओंके पास जाकर वहाँ इन्द्रसे कहो—हे सहस्राक्ष! तुम स्वर्ग छोड़ दो और अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ चाहो, शीघ्र चले जाओ। अथवा हे देवेश! महान् महिषासुरकी सेवा करो॥ ९-११॥
स त्वां संरक्षयेन्नूनं राजा शरणमागतम्।<br>तस्मात्त्वं शरणं याहि महिषस्य शचीपते ॥ १२यदि तुम राजा महिषासुरकी शरणागति स्वीकार कर लो तो वे तुम्हारी रक्षा अवश्य करेंगे। अतएव हे इन्द्र! तुम महिषासुरकी शरणमें चले जाओ ॥ १२ ॥
नोचेद्वज्रं गृहाणाशु युद्धाय बलसूदन।<br>पूर्वैर्जितोऽसि चास्माकं जानामि तव पौरुषम् ॥ १३अन्यथा हे बलसूदन! युद्धके लिये शीघ्र ही अपना वज्र उठा लो। हमारे पूर्वजोंने तुम्हें पराजित किया है, अतएव हम तुम्हारा पुरुषार्थ जानते हैं॥ १३॥
अहल्याजार विज्ञातं बलं ते सुरसङ्घप ।<br>युध्यस्व व्रज वा कामं यत्र ते रमते मनः ॥ १४अहल्याके साथ अनाचार करनेवाले तथा देवसमुदायके अधिपति हे इन्द्र! मैं तुम्हारे बलसे भलीभाँति परिचित हूँ। तुम मेरे साथ युद्ध करो अथवा जहाँ तुम्हारा मन करे, वहाँ चले जाओ ॥ १४॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य शक्रः क्रोधसमन्वितः ।<br>उवाच तं नृपश्रेष्ठ स्मितपूर्वं वचस्तदा ॥ १५<br><br>न जानेऽहं सुमन्दात्मन् यतस्त्वं मददर्पितः।<br>चिकित्सां संकरिष्यामि रोगस्यास्य प्रभोस्तव ॥ १६<br><br>अतः परं करिष्यामि मूलस्यास्य निर्मूलनम् ।<br>गच्छ दूत तथा ब्रूहि तस्याग्रे मम भाषितम् ॥ १७**व्यासजी बोले—**हे नृपश्रेष्ठ! दूतका वचन सुनकर इन्द्र कुपित हो उठे; फिर भी उन्होंने मुसकराकर दूतसे कहा—हे मन्दबुद्धि! मैं यह नहीं जान पा रहा हूँ कि तुम अभिमानके मदमें इतना चूर क्यों हो गये हो! मैं तुम्हारे स्वामी महिषासुरके अभिमानरूपी इस रोगकी चिकित्सा अवश्य करूँगा। इसके बाद मैं इस रोगको जड़से नष्ट कर दूँगा। हे दूत! अब तुम जाओ और उस महिषासुरसे मेरी कही गयी बात बता दो। शिष्टजनोंको चाहिये कि दूतोंका वध न करें, अतः मैं तुम्हें छोड़ दे रहा हूँ॥ १५-१७\frac{१}{२}॥
शिष्टैर्दूता न हन्तव्यास्तस्मात्त्वां विसृजाम्यहम् ।<br>युद्धेच्छा चेत्समागच्छ त्वरितो महिषीसुत ॥ १८[वहाँ जाकर मेरी तरफसे उससे कह देना—]<br>हे महिषीपुत्र! यदि तुम्हारी युद्ध करनेकी इच्छा हो तो शीघ्र आ जाओ।
हयारे त्वद्बलं ज्ञातं तृणादस्त्वं जडाकृतिः ।<br>शृङ्गायोस्ते करिष्यामि सुदृढं च शरासनम् ॥ १९हे महिषासुर! तुम तो घास खानेवाले जड प्रकृतिके जीव हो। अतः मुझे तुम्हारा बल ज्ञात है। मैं तुम्हारी सींगोंसे एक सुदृढ़ धनुष बनाऊँगा।
दर्पः शृङ्गबलात्तेऽस्ति विदितं कारणं मया ।<br>विषाणे ते परिच्छिद्य संहरिष्यामि तद् बलम् ॥ २०तुम्हारे अभिमानका कारण मुझे विदित है। तुम्हें अपनी सींगोंके बलपर गर्व है, अतएव तुम्हारी सींगोंको काटकर मैं उस अभिमानबलको समाप्त कर
अ० ३ ]पञ्चम स्कन्ध५४३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यद् बलेनातिपूर्णस्त्वं जातोऽसि बलदर्पितः।<br>कुशलस्त्वं तदाघाते न युद्धे महिषाधम॥ २१दूँगा। हे महिषाधम! जिन सींगोंके बलपर तुम गर्वोन्मत्त हो तथा अपनेको सर्वसमर्थ समझते हो, केवल उन्हींसे आघात करनेमें तुम कुशल हो; युद्ध करनेमें तुम दक्ष नहीं हो सकते॥ १८-२१॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्तोऽसौ सुरेन्द्रेण स दूतस्त्वरितो गतः।<br>जगाम महिषं मत्तं प्रणम्य प्रत्युवाच ह॥ २२व्यासजी बोले—देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर वह दूत तत्काल वहाँसे चल दिया। वह उन्मत्त महिषासुरके पास पहुँचा और उसे प्रणाम करके कहने लगा—॥ २२॥
दूत उवाच<br>राजन्देवाधिपः कामं न त्वां विगणयत्यसौ।<br>मन्यते स्वबलं पूर्णं देवसैन्यसमावृतः॥ २३दूत बोला—हे राजन्! वह देवराज इन्द्र आपको कुछ भी नहीं समझ रहा है। देवसेनासे सम्पन्न होनेके कारण वह अपनेको पूर्ण बलवान् मानता है॥ २३॥
यदुक्तं तेन मूर्खेण कथमन्यद् ब्रवीम्यहम्।<br>प्रियं सत्यं च वक्तव्यं भृत्येन पुरतः प्रभोः॥ २४उस मूर्खने जो कुछ कहा है, उसके अतिरिक्त दूसरी बात मैं कैसे कहूँ? सेवकको अपने स्वामीके समक्ष सत्य तथा प्रिय वाणी बोलनी चाहिये॥ २४॥
प्रियं सत्यं च वक्तव्यं प्रभोरग्रे शुभेच्छुना।<br>इति नीतिर्महाराज जागर्ति शुभकारिणी॥ २५कल्याणकी इच्छा रखनेवाले सेवकको अपने स्वामीके आगे सदा सत्य तथा प्रिय वचन बोलना चाहिये। हे महाराज! यही नीति संसारमें सदासे कल्याणप्रद होती आयी है॥ २५॥
केवलं चेत्प्रियं ब्रूयान्न ते कार्यं भविष्यति।<br>परुषं च न वक्तव्यं कदाचिच्छुभमिच्छता॥ २६किंतु यदि केवल प्रिय लगनेवाली बात ही कहूँ तो इससे आपका कार्य सिद्ध नहीं होगा। साथ ही अपना कल्याण चाहनेवाले सेवकको अपने स्वामीसे कठोर बात कभी नहीं कहनी चाहिये॥ २६॥
यथा रिपुमुखाद्वाचः प्रसरन्ति विषोपमाः।<br>तथा भृत्यमुखान्नाथ निःसरन्ति कथं गिरः॥ २७हे नाथ! शत्रुके मुखसे जिस तरहकी विषतुल्य बातें निकलती हैं, उस तरहकी बातें सेवकके मुखसे कैसे निकल सकती हैं?॥ २७॥
यादृशानीह वाक्यानि तेनोक्तानि महीपते।<br>तादृशानि न मे जिह्वा वक्तुमर्हति कर्हिचित्॥ २८हे पृथ्‍वीपते! इन्द्रने जिस प्रकारके वाक्य बोले हैं, उन्हें कह सकनेमें मेरी जिह्वा कभी भी समर्थ नहीं है॥ २८॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हेतुगर्भं तृणाशनः।<br>भृशं कोपपरीतात्मा बभूव महिषासुरः॥ २९व्यासजी बोले—उस दूतका रहस्यपूर्ण वचन सुनकर घास खानेवाले महिषासुरका मन पूर्णरूपसे क्रोधके वशीभूत हो गया॥ २९॥
समाहूयाब्रवीद्दैत्यान्क्रोधसंरक्तलोचनः ।<br>लाङ्गूलं पृष्ठदेशे च कृत्वा मूत्रं परित्यजन्॥ ३०<br><br>भो भो दैत्याः सुरेन्द्रोऽसौ युद्धकामोऽस्ति सर्वथा।<br>बलोद्योगं कुरुध्वं वै जेतव्योऽसौ सुराधमः॥ ३१सभी दैत्योंको बुलाकर क्रोधके मारे लाल आँखोंवाला महिषासुर अपनी पूँछ पीठपर रख करके मूत्र त्याग करते हुए उनसे कहने लगा—हे दैत्यो! वह इन्द्र निश्चय ही युद्ध करना चाहता है। अतः तुमलोग सेना संगठित करो। हमें उस देवाधमको जीतना है॥ ३०-३१॥

५४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३

५४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मदग्रे को भवेच्छूरः कोटिशश्चेत्तथाविधाः।<br>न बिभेम्येकतः कामं हनिष्याम्यद्य सर्वथा॥ ३२मेरे सम्मुख भला कौन पराक्रमी बन सकता है? यदि उस इन्द्रके समान करोड़ों लोग मेरे सामने आ जायँ तो भी मैं नहीं डरूँगा, तब उस अकेले इन्द्रसे कैसे डर सकता हूँ? उसको तो मैं अब निश्चितरूपसे मार डालूँगा॥ ३२॥
शूरः शान्तेष्वसौ नूनं तपस्विषु बलाधिकः।<br>बलकर्ता हि कुहको लम्पटः परदारहृत्॥ ३३वह इन्द्र शान्त स्वभाववाले लोगोंपर अपने पराक्रमका प्रदर्शन तथा तपस्वियोंपर अपने बलका प्रयोग करता है। वह मायावी, व्यभिचारी तथा दूसरेकी स्त्रीका हरण करनेवाला है॥ ३३॥
अप्सरोबलसम्मतस्तपोविघ्नकरः खलः।<br>छिद्रप्रहरणः पापो नित्यं विश्वासघातकः॥ ३४वह दुष्ट अपनी अप्सराओंके बलबूते दूसरोंकी तपस्यामें विघ्न डालता है, शत्रु की कमजोरी देखकर अवसरवादिताका लाभ उठाकर उसपर प्रहार करता है, वह सदासे पापकृत्योंमें रत रहनेवाला तथा घोर विश्वासघात करनेवाला है॥ ३४॥
नमुचिर्निहतो येन कृत्वा सन्धिं दुरात्मना।<br>शपथान्विविधानादौ कृत्वा भीतेन छद्मना॥ ३५भयके मारे उस छली इन्द्रने पहले विश्वास-प्रदर्शनके लिये अनेक प्रकारकी शपथें खाकर नमुचि नामक दैत्यसे सन्धि स्थापित की, किंतु बादमें उस दुष्टात्माने छलपूर्वक नमुचिको मार डाला॥ ३५॥
विष्णुस्तु कपटाचार्यः कुहकः शपथाकरः।<br>नानारूपधरः कामं बलकृद्दम्भपण्डितः॥ ३६<br><br>कृत्वा कोलाकृतिं येन हिरण्याक्षो निपातितः।<br>हिरण्यकशिपुर्येन नृसिंहेन च घातितः॥ ३७विष्णु तो कपटका आचार्य, मायावी, झूठी प्रतिज्ञाएँ करनेमें बड़ा ही कुशल, बहुरूपिया, सैन्य-बलका संचय करनेवाला तथा महान् पाखण्डी है। उसीने सूकरका रूप धारणकर हिरण्याक्षका वध कर डाला और नृसिंहका रूप धारणकर हिरण्यकशिपुका संहार किया॥ ३६-३७॥
नाहं तद्वशगो नूनं भवेयं दनुनन्दनाः।<br>विश्वासं नैव गच्छामि देवानां कुत्र कर्हिचित्॥ ३८अतएव हे दनुके वंशजो! मैं उसका वशवर्ती कभी भी नहीं होऊँगा और देवताओंका कहीं भी कदापि विश्वास नहीं करूँगा॥ ३८॥
किं करिष्यति मे विष्णुरिन्द्रो वा बलवत्तरः।<br>रुद्रो वापि न मे शक्तः प्रतिकर्तुं रणाङ्गणे॥ ३९<br><br>त्रिविष्टपं ग्रहीष्यामि जित्वेन्द्रं वरुणं यमम्।<br>धनदं पावकं चैव चन्द्रसूर्यौ विजित्य च॥ ४०विष्णु तथा इन्द्र—ये दोनों मेरा क्या कर लेंगे? यहाँतक कि उनसे भी अधिक शक्तिशाली रुद्र भी युद्ध-भूमिमें मेरा प्रतीकार कर पानेमें समर्थ नहीं हैं। इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर, अग्नि, चन्द्रमा तथा सूर्यको जीतकर मैं स्वर्गपर अधिकार कर लूँगा॥ ३९-४०॥
यज्ञभागभुजः सर्वे भविष्यामोऽद्य सोमपाः।<br>जित्वा देवसमूहञ्च विहरिष्यामि दानवैः॥ ४१अब हमलोग यज्ञका भाग प्राप्त करेंगे तथा सोमरसका पान करनेवाले होंगे। मैं देवसमुदायको जीतकर दानवोंके साथ विहार करूँगा॥ ४१॥
न मे भयं सुरेभ्यश्च वरदानेन दानवाः।<br>मरणं न नरेभ्यश्च नारी किं मे करिष्यति॥ ४२हे दानवो! वरदानके कारण मुझे देवताओंका भय नहीं है। पुरुषसे मेरी मृत्यु हो ही नहीं सकती; तब भला स्त्री मेरा क्या कर लेगी?॥ ४२॥

| अ० ३ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५४५ | | :--- | :--- |

| पातालपर्वतेभ्यश्च समाहूय वरान्वरान्।<br>दानवान्मम सैन्येशान्कुर्वन्तु त्वरिताश्चराः॥ ४३ | हे गुप्तचरो! पातालमें तथा पर्वतोंपर रहनेवाले बड़े-बड़े दानव-वीरोंको तत्काल यहाँ बुलाकर उन्हें मेरी सेनाओंका अध्यक्ष बना दो॥ ४३॥ | | एकोऽहं सर्वदेवान्किजेतुं दानवाः क्षमः।<br>शोभार्थं वः समाहूय नयामि सुरसङ्गमे॥ ४४ | हे दानवो! मैं तो अकेला ही समस्त देवताओंको जीतनेमें समर्थ हूँ, फिर भी शोभा बढ़ानेकी दृष्टिसे आप सबको भी बुलाकर देवताओंके साथ होनेवाले संग्राममें ले चलूँगा॥ ४४॥ | | शृङ्गाभ्यां च खुराभ्यां च हनिष्येऽहं सुरान्किल।<br>न मे भयं सुरेभ्यश्च वरदानप्रभावतः॥ ४५ | मैं अपनी सींगों तथा खुरोंसे देवताओंको निश्चितरूपसे मार डालूँगा। वरदानके प्रभावसे मुझे देवताओंसे भय नहीं है॥ ४५॥ | | अवध्योऽहं सुरगणैरसुरैर्मानवैस्तथा।<br>तस्मात्सज्जा भवन्त्वद्य देवलोकजयाय वै॥ ४६ | देवता, दानव तथा मनुष्य—सभीसे मैं अवध्य हूँ, अतः आप सब देवलोकपर विजय प्राप्त करनेके लिये अब तैयार हो जायँ॥ ४६॥ | | जित्वा सुरालयं दैत्या विहरिष्यामि नन्दने।<br>मन्दारकुसुमापीडा देवयोषित्समन्विताः॥ ४७<br>कामधेनुपयोत्सिक्ताः सुधापानप्रमोदिताः।<br>देवगन्धर्वगीतादिनृत्यलास्यसमन्विताः ॥ ४८ | हे दैत्यो! देवलोकको जीतकर मैं नन्दनवनमें विहार करूँगा। मन्दारपुष्पकी मालाएँ धारण करके आपलोग देवांगनाओंके साथ रहेंगे, कामधेनुके दुग्धका सेवन करेंगे, प्रसन्नतापूर्वक अमृत-पान करेंगे और देवताओं तथा गन्धर्वोंके गीतों तथा मनमोहक हाव-भाव-युक्त नृत्योंका आनन्द लेंगे॥ ४७-४८॥ | | उर्वशी मेनका रम्भा घृताची च तिलोत्तमा।<br>प्रम्लोचा महासेना मिश्रकेशी मदोत्कटा॥ ४९<br>विप्रचित्तिप्रभृतयो नृत्यगीतविशारदाः।<br>रञ्जयिष्यन्ति वः सर्वान्नानासवनिषेवणैः॥ ५० | उर्वशी, मेनका, रम्भा, घृताची, तिलोत्तमा, प्रम्लोचा, महासेना, मिश्रकेशी, मदोत्कटा, विप्रचित्ति आदि नृत्य तथा गायन-कलामें अति निपुण अप्सराएँ विविध प्रकारके मद्य पिलाकर आप सभीका मनोरंजन करेंगी॥ ४९-५०॥ | | सर्वे सज्जा भवन्त्वद्य रोचतां गमनं दिवि।<br>संग्रामार्थं सुरैः सार्धं कृत्वा मङ्गलमुत्तमम्॥ ५१ | देवताओंके साथ युद्ध करनेके लिये देवलोकके लिये प्रस्थान करना यदि आपलोगोंको उचित लगे तो आप सब उत्तम मंगलाचार सम्पन्न करके आज ही चलनेके लिये तैयार हो जाइये॥ ५१॥ | | रक्षणार्थं च सर्वेषां भार्गवं मुनिसत्तमम्।<br>समाहूय च सम्पूज्य स्थाप्य यज्ञे गुरुं परम्॥ ५२ | समस्त दानवोंकी रक्षाके लिये मुनिश्रेष्ठ शुक्राचार्यको बुलाकर उनका पूजन करके उन परम गुरुको यज्ञ-कार्यमें नियुक्त कीजिये॥ ५२॥ | | व्यास उवाच<br>इति संदिश्य दैत्येन्द्रान्महिषः पापधीस्तदा।<br>जगाम त्वरितो राजन्भवनं स्वं मुदान्वितः॥ ५३ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! इस प्रकार दानववीरोंको आदेश देकर वह पापबुद्धि महिषासुर प्रसन्नताके साथ शीघ्र ही अपने भवनको चला गया॥ ५३॥ |

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इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
भगवतीमाहात्म्ये दैत्यसैन्योद्योगो नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
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1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 18 A

अथ चतुर्थोऽध्यायः

५४६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४

अथ चतुर्थोऽध्यायः

इन्द्रका देवताओं तथा गुरु बृहस्पतिसे परामर्श करना तथा बृहस्पतिद्वारा जय-पराजयमें दैवकी प्रधानता बतलाना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
गते दूते सुरेन्द्रोऽपि समाहूय सुरानथ।<br>यमवायुधनाध्यक्षवरुणानिदमूचिवान् ॥ १हे राजन्! दूतके चले जानेपर इन्द्रने भी यम, वायु, कुबेर तथा वरुण—इन देवताओंको बुलाकर यह बात कही॥ १॥
महिषो नाम दैत्येन्द्रो रम्भपुत्रो महाबलः।<br>वरदर्पमदोन्मत्तो मायाशतविचक्षणः॥ २रम्भका पुत्र महाबली दैत्यराज महिषासुर इस समय वरदानके अभिमानमें मदोन्मत्त हो गया है। वह सैकड़ों प्रकारकी माया रचनेमें पारंगत है॥ २॥
तस्य दूतोऽद्य सम्प्राप्तः प्रेषितस्तेन भोः सुराः।<br>स्वर्गकामेन लुब्धेन मामुवाचेदृशं वचः॥ ३हे देवताओ! स्वर्ग-प्राप्तिकी कामना करनेवाले उस लोभी महिषासुरके द्वारा भेजा गया दूत आज ही यहाँ आया था। उसने मुझसे इस प्रकारकी बात कही—॥ ३॥
त्यज देवालयं शक्र यथेच्छं व्रज वासव।<br>सेवा वा कुरु दैत्यस्य महिषस्य महात्मनः॥ ४हे शक्र! तुम तत्काल देवलोक छोड़ दो और अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ जाना चाहो, वहाँ चले जाओ; अथवा हे वासव! महान् महिषासुरका सेवकत्व स्वीकार कर लो॥ ४॥
दयावान्दानवेन्द्रोऽसौ स ते वृत्तिं विधास्यति।<br>नतेषु भृत्यभूतेषु न कुप्यति कदाचन॥ ५वे दैत्यराज महिषासुर बड़े दयालु हैं। वे आपके लिये किसी जीविकाका प्रबन्ध अवश्य कर देंगे। विनम्र सेवकोंपर वे कभी भी क्रोध नहीं करते हैं॥ ५॥
नोचेद्युद्धाय देवेश सेनोद्योगं कुरु स्वयम्।<br>गते मयि स दैत्येन्द्रस्त्वरितः समुपेष्यति॥ ६हे देवेश! यदि आपको यह स्वीकार नहीं है तो युद्धके लिये सेनाके संगठनमें जुट जाइये। मेरे वहाँ पहुँचते ही वे दैत्येन्द्र महिषासुर [देवलोकपर आक्रमणके लिये] यहाँ शीघ्र आ पहुँचेंगे॥ ६॥
इत्युक्त्वा स गतो दूतो दानवस्य दुरात्मनः।<br>किं कर्तव्यमतः कार्यं चिन्तयध्वं सुरोत्तमाः॥ ७ऐसा कहकर दुष्टात्मा दानव महिषासुरका वह दूत यहाँसे चला गया। हे श्रेष्ठ देवगण! आपलोग विचार कीजिये कि अब क्या करना चाहिये?॥ ७॥
दुर्बलोऽपि न चोपेक्ष्यः शत्रुर्वलवता सुराः।<br>विशेषेण सदोद्योगी बलवान्बलदर्पितः॥ ८हे देवताओ! स्वयं बलवान् होते हुए भी अत्यन्त दुर्बल शत्रुको भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। अपने बलका अभिमान करनेवाले, बलशाली तथा सदा उद्यमशील शत्रुको तो विशेषरूपसे उपेक्षा नहीं करनी चाहिये॥ ८॥
उद्यमः किल कर्तव्यो यथाबुद्धि यथाबलम्।<br>दैवाधीनो भवेन्नूनं जयो वाथ पराजयः॥ ९अतः हमलोगोंको अपने बल तथा विवेकके अनुसार पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिये। जीत अथवा हार तो दैवके अधीन रहती है॥ ९॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 18 B

अ० ४ ]पञ्चम स्कन्ध५४७
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
सन्धियोगो न चात्रास्ति खले सन्धिर्निरर्थकः।<br>सर्वथा साधुभिः कार्यं विचार्य च पुनः पुनः॥ १०इस परिस्थितिमें सन्धिकी भी सम्भावना नहीं है; क्योंकि नीचके साथ की गयी सन्धि व्यर्थ सिद्ध होती है। अतएव बार-बार विचार करके केवल सज्जनोंके साथ ही सन्धि करनी चाहिये॥ १०॥
यानमप्यधुना नैव कर्तव्यं सहसा पुनः।<br>प्रेक्षकाः प्रेषणीयाश्च शीघ्रगाः सुप्रवेशकाः॥ ११<br><br>इङ्गितज्ञाश्च निःसङ्गा निःस्पृहाः सत्यवादिनः।<br>सेनाभियोगं प्रस्थानं बलसंख्यां यथार्थतः॥ १२<br><br>वीराणां च परिज्ञानं कृत्वायान्तु त्वरान्विताः।<br>ज्ञात्वा दैत्यपतेस्तस्य सैन्यस्य च बलाबलम्॥ १३<br><br>करिष्यामि ततस्तूर्णं यानं वा दुर्गसंग्रहम्।<br>विचार्य खलु कर्तव्यं कार्यं बुद्धिमता सदा।<br>सहसा विहितं कार्यं दुःखदं सर्वथा भवेत्॥ १४<br><br>तस्माद्विमृश्य कर्तव्यं सुखदं सर्वथा बुधैः।<br>नात्र भेदविधिर्न्याय्यो दानवेषु च सर्वथा॥ १५इस समय अचानक आक्रमण करना भी उचित नहीं है। अतएव सर्वप्रथम शीघ्रगामी तथा सुगमतासे प्रवेश करनेमें दक्ष गुप्तचर वहाँ भेजे जाने चाहिये, जो शत्रुओंके अभिप्राय समझनेमें समर्थ, किसीके साथ अधिक भावासक्ति न रखनेवाले, निर्लोभी तथा सत्यवादी हों। वे गुप्तचर शत्रु-सेनाकी गतिविधि, प्रस्थान, सेनाकी ठीक-ठीक संख्या और शत्रुदलके वीरोंकी वास्तविक जानकारी करके शीघ्रतापूर्वक वापस आ जाएँ। इस प्रकार दैत्यपति महिषासुरकी सेनाके बलाबलको भलीभाँति जान लेनेके पश्चात् मैं शीघ्र ही आक्रमण अथवा किलेबन्दी करनेका प्रबन्ध करूँगा। सर्वदा भलीभाँति सोच-समझकर बुद्धिमान् मनुष्यको कार्य करना चाहिये; क्योंकि बिना विचार किये अचानक किया गया कार्य हर तरहसे दुःखदायक ही होता है। अतएव बुद्धिमान् मनुष्योंको सम्यक् रूपसे विचार-विमर्श करके ऐसा कार्य करना चाहिये, जो सुखकर हो॥ ११—१४ १/२ ॥
एकचित्तेषु कार्येऽस्मिंस्तस्माच्चारा व्रजन्तु वै।<br>ज्ञात्वा बलाबलं तेषां पश्चान्नीतिर्विचार्य च॥ १६<br><br>विधेया विधिवत्तज्ज्ञैस्तेषु कार्यपरेषु च।<br>अन्यथा विहितं कार्यं विपरीतफलप्रदम्॥ १७<br><br>सर्वथा तद्भवेन्नूनमज्ञातमौषधं यथा।दानवोंमें मतभेद पैदा करनेवाली भेदनीतिका आश्रय लेना भी उचित नहीं जान पड़ता; क्योंकि उनमें पूर्ण मतैक्य है। अतएव इस कार्यके लिये पहले गुप्तचर भेजे जाएँ। उनके द्वारा उन दानवोंके बलाबलको जाननेके पश्चात् श्रेष्ठ नीतिविदोंसे भलीभाँति विचार करके उन कार्योंके लिये नीति निर्धारित की जानी चाहिये। नीतिसे हटकर किया गया कार्य अज्ञात औषधिके सेवनसे उत्पन्न होनेवाले कष्टकी भाँति विपरीत फल देनेवाला होता है॥ १५—१७ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य तैः सर्वैः प्रणिधिं कार्यवेदिनम्॥ १८**व्यासजी बोले—**हे राजन्! इस प्रकार उन सभी देवताओंसे विचार-विमर्श करके देवराज इन्द्रने शत्रुपक्षके रहस्योंकी जानकारीके उद्देश्यसे एक कार्यकुशल गुप्तचर भेजा॥ १८ १/२ ॥
प्रेषयामास देवेन्द्रः परिज्ञानाय पार्थिव।<br>दूतस्तु त्वरितो गत्वा समागम्य सुराधिपम्॥ १९उस दूतने तत्काल पहुँचकर शत्रुपक्षके सैन्य-बलाबलकी जानकारी प्राप्त की और पुनः इन्द्रके पास वापस आकर उनको सब कुछ बता दिया। शत्रुसेनाकी

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—18 C

५४८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
निवेदयामास तदा सर्वसैन्यबलाबलम्।<br>ज्ञात्वा तद्बलमुद्योगं तुराषाडतिविस्मितः॥ २०<br>देवानचोदयत्तूर्णं समाहूय पुरोहितम्।<br>मन्त्रं मन्त्रविदां श्रेष्ठं चकार त्रिदशेश्वरः॥ २१<br>उवाचाङ्गिरसश्रेष्ठं समासीनं वरासने।तैयारीके विषयमें जानकर इन्द्रको महान् आश्चर्य हुआ और उन्होंने देवताओंको तैयारीमें लगनेकी आज्ञा दे दी। तत्पश्चात् मन्त्रविदोंमें श्रेष्ठ पुरोधा देवगुरु बृहस्पतिको बुलाकर इन्द्र उनके साथ परामर्श करने लगे। उत्तम आसनपर विराजमान श्रेष्ठ अंगिरापुत्र बृहस्पतिसे इन्द्रने कहा॥ १९—२१ १/२॥
इन्द्र उवाच<br>भो भो देवगुरो विद्वन्किं कर्तव्यं वदस्व नः॥ २२<br>सर्वज्ञोऽसि समुत्पन्ने कार्ये त्वं गतिरद्य नः।<br>दानवो महिषो नाम महावीर्यो मदान्वितः॥ २३<br>योद्धुकामः समायाति बहुभिर्दानवैर्वृतः।<br>तत्र प्रतिक्रिया कार्या त्वया मन्त्रविदाधुना॥ २४<br>तेषां शुक्रस्तथा त्वं मे विघ्नहर्ता सुसंयतः।इन्द्र बोले—हे देवगुरो! हे विद्वन्! हमलोगोंको क्या करना चाहिये, हमें बताइये। आप सर्वज्ञ हैं। आज उत्पन्न इस विषम परिस्थितिमें एकमात्र आप ही हमारे अवलम्ब हैं। महाबली तथा मदोन्मत्त दानव महिषासुर बहुतसे दानवोंको अपने साथ लेकर हम सबसे युद्ध करनेके लिये यहाँ आ रहा है। आप मन्त्रणाविद् हैं, अतएव इस समय कोई प्रतिक्रियात्मक युक्ति बतानेकी कृपा करें। जैसे शुक्राचार्य दानवोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार हम देवताओंके कष्टका निवारण करने हेतु आप सदा उद्यत रहते हैं॥ २२—२४ १/२॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं प्राह तुरासाहं बृहस्पतिः॥ २५<br>विचिन्त्य मनसा कामं कार्यसाधनतत्परः।व्यासजी बोले—यह वचन सुनकर अपने मनमें भलीभाँति सोचकर सदा कार्यसिद्धिके लिये तत्पर रहनेवाले बृहस्पति इन्द्रसे कहने लगे॥ २५ १/२॥
गुरुरुवाच<br>स्वस्थो भव सुरेन्द्र त्वं धैर्यमालम्ब्य मारिष॥ २६<br>व्यसने च समुत्पन्ने न त्याज्यं धैर्यमाशु वै।<br>जयाजयौ सुराध्यक्ष दैवाधीनौ सदैव हि॥ २७<br>स्थातव्यं धैर्यमालम्ब्य तस्माद् बुद्धिमता सदा।<br>भवितव्यं भवत्येव जानन्नेव शतक्रतो॥ २८<br>उद्यमः सर्वथा कार्यो यथापौरुषमात्मनः।<br>मुनयोऽपि हि मुक्त्यर्थमुद्यमैकरताः सदा॥ २९<br>दैवाधीनं च जानन्तो योगध्यानपरायणाः।<br>तस्मात्सदैव कर्तव्यो व्यवहारोदितोद्यमः॥ ३०गुरु बोले—हे देवेन्द्र! आप निश्चिन्त हो जाइये। हे महानुभाव! धैर्य धारण कीजिये, विषम परिस्थिति आ जानेपर सहसा धैर्य नहीं खोना चाहिये। हे सुराध्यक्ष! हार तथा जीत सदा दैवाधीन होती हैं, अतएव बुद्धिमान् प्राणीको चाहिये कि वह सदैव धैर्य धारण करके स्थित रहे। हे शतक्रतो! होनी होकर रहती है, ऐसा समझते हुए मनुष्यको अपनी सामर्थ्यके अनुसार सदा उद्यम करना चाहिये। सब कुछ दैवके अधीन है—यह जानते हुए भी योगध्यानपरायण मुनिगण भी मुक्ति-प्राप्ति हेतु निरन्तर उद्यमशील रहते हैं। अतएव मनुष्यको अपने सामर्थ्यानुसार सदैव उद्योग करते रहना चाहिये॥ २६—३०॥
सुखं भवतु वा मा वा दैवे का परिदेवना।<br>विना पुरुषकारेण कदाचित्सिद्धिमाप्नुयात्॥ ३१सुख मिले अथवा न मिले—इस दैवाधीन विषयमें चिन्ताकी क्या आवश्यकता? बिना पुरुषार्थ किये ही संयोगसे सिद्धि मिल जाय—ऐसा मानकर अन्धे तथा

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—18 D

अ० ४ ] पञ्चम स्कन्ध ५४९

अ० ४ ] पञ्चम स्कन्ध ५४९

अन्धवत्पङ्गुवत्कामं न तथा मुदमावहेत्।<br>कृते पुरुषकारेऽपि यदि सिद्धिर्न जायते॥ ३२<br><br>न तत्र दूषणं तस्य दैवाधीने शरीरिणि।<br>कार्यसिद्धिर्न सैन्येऽस्ति न मन्त्रे न च मन्त्रणे॥ ३३लँगड़ेकी भाँति अकर्मण्य होकर प्रसन्नतापूर्वक पड़े रहना उचित नहीं है। पुरुषार्थ करनेपर भी यदि सिद्धि नहीं मिलती है तो इसमें उस व्यक्तिका कोई अपराध नहीं है; क्योंकि प्रत्येक शरीरधारी सदा दैवके अधीन रहता है। कार्यकी सिद्धि न सेनासे, न मन्त्रसे, न मन्त्रणासे, न रथसे और न तो आयुधसे ही मिलती है। हे सुरेन्द्र! सफलता तो निश्चितरूपसे दैवके अधीन रहती है॥ ३१—३३ १/२॥
न रथे नायुधे नूनं दैवाधीना सुराधिप।<br>बलवान्क्लेशमाप्नोति निर्बलः सुखमश्नुते॥ ३४<br><br>बुद्धिमाञ्क्षुधितः शेते निर्बुद्धिर्भोगवान्भवेत्।<br>कातरो जयमाप्नोति शूरो याति पराजयम्॥ ३५<br><br>दैवाधीने तु संसारे कामं का परिदेवना।<br>उद्यमे योजयेन्नूनं भवितव्यं सुराधिप॥ ३६[ऐसा भी देखा जाता है कि] बलशाली कष्ट पाता है तथा बलहीन सुखोपभोग करता है, बुद्धिमान् भूखा ही सो जाता है तथा बुद्धिहीन अनेक उत्तम भोज्य पदार्थोंका सेवन करता है, कायर व्यक्तिकी जीत हो जाती है तथा वीर पराजित हो जाता है। हे सुराधिप! यह समस्त जगत् ही दैवके अधीन है, तो फिर चिन्ताकी आवश्यकता ही क्या? ऐसा दृढ़ विश्वास करके भाग्यको उद्योगके साथ संयोजित कर देना चाहिये॥ ३४—३६॥
दुःखदे सुखदे वापि तत्र तौ न विचिन्तयेत्।<br>दुःखे दुःखाधिकान्पश्येत्सुखे पश्येत्सुखाधिकम्॥ ३७उद्योग करनेके बाद सुख प्राप्त हो अथवा दुःख—इन दोनोंके विषयमें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। दुःख आनेपर अपनेसे अधिक दुःखीजनोंको तथा सुख आनेपर अधिक सुखी व्यक्तिको देखना चाहिये॥ ३७॥
आत्मानं हर्षशोकाभ्यां शत्रुभ्यामिव नार्पयेत्।<br>धैर्यमेवावगन्तव्यं हर्षशोकोद्भवे बुधैः॥ ३८अपने आपको शत्रुतुल्य हर्ष तथा शोकको अर्पित नहीं करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषोंको हर्ष या शोकके उपस्थित होनेपर धैर्यका अवलम्बन करना चाहिये॥ ३८॥
अधैर्याद्यादृशं दुःखं न तु धैर्येऽस्ति तादृशम्।<br>दुर्लभं सहनत्वं वै समये सुखदुःखयोः॥ ३९अधीर हो जानेसे जैसा दुःख प्राप्त होता है, वैसा दुःख धैर्य धारण करनेसे कभी नहीं होता। किंतु सुख तथा दुःखके अवसरपर सहनशील बने रहना अति दुर्लभ है॥ ३९॥
हर्षशोकोद्भवो यत्र न भवेद् बुद्धिनिश्चयात्।<br>किं दुःखं कस्य वा दुःखं निर्गुणोऽहं सदाव्ययः॥ ४०जब हर्ष अथवा शोक उत्पन्न हों तब अपनी बुद्धिसे निश्चय करके उनसे अप्रभावित बने रहना चाहिये। वैसी परिस्थितिमें सोचना चाहिये कि दुःख क्या है; और यह दुःख किसे होता है? मैं तो सदा

५५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४ ]


चतुर्विंशातिरिक्तोऽस्मि किं मे दुःखं सुखञ्च किम्।<br>प्राणस्य क्षुत्पिपासे द्वे मनसः शोकमूर्च्छने॥ ४१<br><br>जरामृत्यू शरीरस्य षडूर्भिरहितः शिवः।<br>शोकमोहौ शरीरस्य गुणौ किं मेऽत्र चिन्तने॥ ४२गुणोंसे रहित और अविनाशी हूँ। मैं तो चौबीस तत्त्वोंसे भिन्न आत्मतत्त्व हूँ, तब सुख अथवा दुःखसे मेरा क्या प्रयोजन? भूख तथा प्यासका सम्बन्ध प्राणसे, शोक तथा मोहका सम्बन्ध मनसे एवं जरा तथा मृत्युका सम्बन्ध शरीरसे है। मैं तो इन छहों ऊर्मियोंसे रहित कल्याणस्वरूप हूँ। शोक तथा मोह शरीरके गुण हैं; इनके विषयमें सोचनेकी मुझे क्या आवश्यकता?॥ ४०—४२॥
शरीरं नाहमथवा तत्सम्बन्धी न चाप्यहम्।<br>सप्तैकषोडशादिभ्यो विभिन्नोऽहं सदा सुखी॥ ४३<br><br>प्रकृतिर्विकृतिर्नाहं किं मे दुःखं सदा पुनः।<br>इति मत्वा सुरेश त्वं मनसा भव निर्ममः॥ ४४<br><br>उपायः प्रथमोऽयं ते दुःखनाशे शतक्रतो।<br>ममता परमं दुःखं निर्ममत्वं परं सुखम्॥ ४५मैं न शरीर हूँ और न तो इससे मेरा कोई सम्बन्ध है। मैं तो महदादि सात विकृतियों, एक प्रकृति तथा सोलह विकारोंसे पृथक् रहनेवाला सदा सुखस्वरूप हूँ। मैं न प्रकृति हूँ और न तो विकृति हूँ; तब मुझे दुःख किस बातका? हे देवेश! अपने मनमें ऐसा निश्चय करके आप ममतारहित हो जाइये। हे शतयज्ञकर्ता इन्द्र! आपके दुःखनाशका यही प्रधान उपाय है; क्योंकि ममता सबसे बड़ा दुःख है तथा निर्ममता सबसे बड़ा सुख है॥ ४३—४५॥
सन्तोषादपरं नास्ति सुखस्थानं शचीपते।<br>अथवा यदि न ज्ञानं ममत्वनाशने किल॥ ४६<br><br>ततो विवेकः कर्तव्यो भवितव्ये सुराधिप।<br>प्रारब्धकर्मणां नाशो नाभोगाल्लक्ष्यते किल॥ ४७हे शचीपते! सन्तोषसे बढ़कर सुखका कोई भी स्थान नहीं है। अथवा हे देवराज! यदि आपके पास ममताको नष्ट करनेवाले ज्ञानका अभाव हो तो प्रारब्धके विषयमें विवेकका आश्रय लेना परमावश्यक है। बिना भोगके प्रारब्ध कर्मोंका नाश कभी नहीं हो सकता॥ ४६-४७॥
यद्भावि तद्भवत्येव का चिन्ता सुखदुःखयोः।<br>सुरैः सर्वैः सहायैर्वा बुद्ध्या वा तव सत्तम॥ ४८हे आर्य! सभी देवता आपके सहायक हों अथवा केवल आपकी बुद्धि सहायक बने—जो होना है वह होकर रहेगा, तब सुख अथवा दुःखके विषयमें चिन्ता क्या?॥ ४८॥
सुखं क्षयाय पुण्यस्य दुःखं पापस्य मारिष।<br>तस्मात्सुखक्षये हर्षः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः॥ ४९हे महाभाग! सुखके उपभोगसे पुण्यका क्षय होता है और दुःख भोगनेसे पापका नाश होता है। अतएव बुद्धिमान् पुरुषोंको सुख-क्षयकी स्थितिमें हर प्रकारसे प्रसन्नताका अनुभव करना चाहिये॥ ४९॥
अथवा मन्त्रयित्वाद्य कुरु यत्नं यथाविधि।<br>कृते यत्ने महाराज भवितव्यं भविष्यति॥ ५०अथवा हे महाराज! यदि आपकी इच्छा हो तो विधिवत् परामर्श करके आप यत्न करनेमें तत्पर हो जाइये। प्रयत्न करनेपर भी जो होना होगा, वही होगा॥ ५०॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भयात्तुरेन्द्रादिदेवैः सुरगुरुणा सह परामर्शवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥ $\sim\sim\circ\sim\sim$

अ० ५ ] पञ्चम स्कन्ध ५५१

अ० ५ ] पञ्चम स्कन्ध ५५१


अथ पञ्चमोऽध्यायः

इन्द्रका ब्रह्मा, शिव और विष्णुके पास जाना, तीनों देवताओंसहित इन्द्रका युद्धस्थलमें आना तथा चिक्षुर, बिडाल और ताम्रको पराजित करना

व्यास उवाच
इति श्रुत्वा सहस्राक्षः पुनराह बृहस्पतिम्।<br>युद्धोद्योगं करिष्यामि हयारेर्नाशनाय वै॥ १<br><br>नोद्यमेन विना राज्यं न सुखं न च वै यशः।<br>निरुद्यमं न शंसन्ति कातरा न च सोद्यमाः॥ २व्यासजी बोले— हे महाराज! यह सुनकर सहस्रनेत्र इन्द्रने बृहस्पतिसे कहा कि मैं महिषासुरके विनाशके लिये अब युद्धकी तैयारी अवश्य करूँगा; क्योंकि उद्योगके बिना न राज्य, न सुख और न तो यशकी ही प्राप्ति होती है। उद्यमहीनकी प्रशंसा न तो कायर लोग करते हैं और न उद्योगपरायण॥ १-२॥
यतीनां भूषणं ज्ञानं सन्तोषो हि द्विजन्मनाम्।<br>उद्यमः शत्रुहननं भूषणं भूतिमिच्छताम्॥ ३संन्यासियोंका आभूषण ज्ञान है तथा ब्राह्मणोंका आभूषण सन्तोष है; किंतु अपनी उन्नतिकी आकांक्षा रखनेवाले लोगोंके लिये उद्योगपरायण रहते हुए शत्रुसंहारका कार्य ही आभूषण है॥ ३॥
उद्यमेन हतस्त्वाष्ट्रो नमुचिर्बल एव च।<br>तथैनं निहनिष्यामि महिषं मुनिसत्तम॥ ४हे मुनिश्रेष्ठ! उद्यमका आश्रय लेकर ही मैंने वृत्रासुर, नमुचि तथा बल आदि दैत्योंका संहार किया था; उसी प्रकार मैं महिषासुरका भी वध करूँगा॥ ४॥
बलं देवगुरुस्त्वं मे वज्रमायुधमुत्तमम्।<br>सहायस्तु हरिनूंनं तथोमापतिरव्ययः॥ ५आप देवगुरु बृहस्पति तथा श्रेष्ठ आयुध वज्र मेरे महान् बलके रूपमें सुलभ हैं। साथ ही भगवान् विष्णु तथा अविनाशी शिवजी मेरी सहायता अवश्य करेंगे॥ ५॥
रक्षोघ्नान्यथ मे साधो करोम्यद्य समुद्यमम्।<br>स्वसैन्याभिनिवेशञ्च महिषं प्रति मानद॥ ६हे मानद! अब मैं महिषासुरके साथ युद्ध करनेके लिये सेनाकी तैयारीके उद्योगमें लग रहा हूँ। हे साधो! अब आप मेरे कल्याणार्थ रक्षोघ्न मन्त्रोंका पाठ कीजिये॥ ६॥
व्यास उवाच
इत्युक्तो देवराजेन वाचस्पतिरुवाच ह।<br>सुरेन्द्रं युद्धसंरक्तं स्मितपूर्वं वचस्तदा॥ ७व्यासजी बोले— हे राजन्! देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर युद्धके लिये सर्वथा तत्पर उन सुरेन्द्रसे मुसकराकर बृहस्पतिने यह वचन कहा—॥ ७॥
बृहस्पतिरुवाच
प्रेर्यामि न चाहं त्वां न च निवारयाम्यहम्।<br>सन्दिग्धेऽत्र जये कामं युध्यतश्च पराजये॥ ८बृहस्पति बोले— इस समय मैं आपको युद्धके लिये न तो प्रेरित करूँगा और न तो इससे आपको रोकूँगा ही; क्योंकि युद्ध करनेवालेकी हार तथा जीत दोनों ही अनिश्चित रहती हैं॥ ८॥
न तेऽत्र दूषणं किञ्चिद्भवितव्ये शचीपते।<br>सुखं वा यदि वा दुःखं विहितं च भविष्यति॥ ९हे शचीपते! इस होनहारके विषयमें आपका कोई दोष नहीं है। जो भी सुख-दुःख पूर्वतः निर्धारित है, वह तो अवश्य ही प्राप्त होगा॥ ९॥
५५२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न मया तत्परिज्ञातं भावि दुःखं सुखं तथा।<br>यद्भार्याहरणे प्राप्तं पुरा वासव वेत्सि हि॥ १०भविष्यमें आपको प्राप्त होनेवाले सुख या दुःखके विषयमें मुझे कोई भी ज्ञान नहीं है; क्योंकि हे वासव ! आप यह बात भलीभाँति जानते हैं कि पूर्व समयमें अपनी भार्याके हरणके अवसरपर मुझे बहुत ही कष्ट उठाना पड़ा था॥ १०॥
शशिना मे हृता भार्या मित्रेणामित्रकर्शन।<br>स्वाश्रमस्थेन सम्प्राप्तं दुःखं सर्वसुखापहम्॥ ११हे शत्रुनिषूदन! चन्द्रमाने मेरी पत्नीका हरण कर लिया था, जिसके फलस्वरूप अपने आश्रममें रहते हुए मुझे सभी सुखोंका विनाश करनेवाला महान् कष्ट झेलना पड़ा॥ ११॥
बुद्धिमान्सर्वलोकेषु विदितोऽहं सुराधिप।<br>क्व मे गता तदा बुद्धिर्यदा भार्या हृता बलात्॥ १२हे सुराधिप ! मैं सभी लोकोंमें परम बुद्धिमान्‌के रूपमें विश्रुत हूँ; किंतु जब मेरी भार्याका बलपूर्वक हरण कर लिया गया था तो उस समय मेरी बुद्धि कहाँ चली गयी थी?॥ १२॥
तस्मादुपायः कर्तव्यो बुद्धिमद्भिः सदा नरैः।<br>कार्यसिद्धिः सदा नूनं दैवाधीना सुराधिप॥ १३अतएव हे सुराधिप ! बुद्धिमान् लोगोंको सदा यत्नपरायण होना चाहिये। कार्यकी सिद्धि तो निश्चितरूपसे सदा दैवके ही अधीन रहती है॥ १३॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं सत्यं गुरोः सार्थं शचीपतिः।<br>ब्रह्माणं शरणं गत्वा नत्वा वचनमब्रवीत्॥ १४व्यासजी बोले— गुरु बृहस्पतिका यह सत्य तथा अर्थयुक्त वचन सुनकर इन्द्र ब्रह्माजीकी शरणमें जाकर उन्हें प्रणाम करके बोले—॥ १४॥
पितामह सुराध्यक्ष दैत्यो महिषसंज्ञकः।<br>ग्रहीतुकामः स्वर्गं मे बलोद्योगं करोत्यलम्॥ १५हे पितामह ! हे देवाध्यक्ष ! इस समय महिषासुर नामक दैत्य मेरे स्वर्गलोकपर अपना अधिकार स्थापित करनेकी कामनासे सैन्यबलकी तैयारी कर रहा है॥ १५॥
अन्ये च दानवाः सर्वे तत्सैन्यं समुपस्थिताः।<br>योद्धुकामा महावीर्याः सर्वे युद्धविशारदाः॥ १६अन्य दानव भी उसकी सेनामें सम्मिलित हो रहे हैं। वे सब-के-सब सदा युद्धके लिये आतुर रहनेवाले, महान् पराक्रमी तथा युद्धकलामें अत्यन्त प्रवीण हैं॥ १६॥
तेनाहं भीतभीतोऽस्मि त्वत्सकाशमिहागतः।<br>सर्वज्ञोऽसि महाप्राज्ञ साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ १७उस दानवसे भयभीत होकर मैं आपकी शरणमें यहाँ आया हूँ। हे महाप्राज्ञ ! आप तो सर्ववेत्ता हैं तथा मेरी सहायता करनेमें पूर्ण समर्थ हैं॥ १७॥
ब्रह्मोवाच<br>गच्छामः सर्व एवाद्य कैलासं त्वरिता वयम्।<br>शङ्करं पुरतः कृत्वा विष्णुं च बलिनां वरम्॥ १८<br><br>ततो युद्धं प्रकर्तव्यं सर्वैः सुरगणैः सह।<br>मिलित्वा मन्त्रमाधाय देशं कालं विचिन्त्य च॥ १९<br><br>बलाबलमविज्ञाय विवेकमपहाय च।<br>साहसं तु प्रकुर्वाणो नरः पतनमृच्छति॥ २०ब्रह्माजी बोले— हमलोग इसी समय शीघ्रतापूर्वक कैलास चलें और वहाँसे शंकरजीको आगे करके बलवानोंमें श्रेष्ठ विष्णुभगवान्‌के पास चलें। तत्पश्चात् सभी देवगणोंके साथ परस्पर मिलकर देश-कालके सम्बन्धमें भलीभाँति विचार करके एक समुचित निर्णय लेकर ही युद्ध करना चाहिये। अपनी शक्ति तथा निर्बलताका सम्यक् ज्ञान किये बिना विवेकका त्याग करके दुःसाहसपूर्ण कार्य करनेवाला व्यक्ति पतनको प्राप्त होता है॥ १८-२०॥
अ० ५ ]पञ्चम स्कन्ध५५३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>तन्निशम्य सहस्राक्षः कैलासं निर्जगाम ह।<br>ब्रह्माणं पुरतः कृत्वा लोकपालसमन्वितः॥ २१ ॥व्यासजी बोले—यह सुनकर इन्द्र ब्रह्माजीको आगे करके समस्त लोकपालोंके साथ कैलासकी ओर चल पड़े॥ २१॥
तुष्टाव शङ्करं गत्वा वेदमन्त्रैर्महेश्वरम्।<br>प्रसन्नं पुरतः कृत्वा ययौ विष्णुपुरं प्रति॥ २२ ॥कैलास पहुँचकर इन्द्रने वेदमन्त्रोंके द्वारा शिवजीकी स्तुति की। तत्पश्चात् [स्तुतिगानसे] अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त भगवान् शंकरको आगे करके वे विष्णुलोक गये॥ २२॥
स्तुत्वा तं देवदेवेशं कार्यं प्रोवाच चात्मनः।<br>महिषात्तद्भयं चोग्रं वरदानमदोद्धतात्॥ २३ ॥उन देवाधिदेव भगवान् विष्णुकी स्तुति करके उन्होंने वहाँ अपने आनेका उद्देश्य बताया तथा वरदान पानेके कारण गर्वोन्मत्त महिषासुरसे उत्पन्न उग्र भयके बारेमें उनसे कहा॥ २३॥
तदाकर्ण्य भयं तस्य विष्णुर्देवानुवाच ह।<br>करिष्यामो वयं युद्धं हनिष्यामस्तु दुर्जयम्॥ २४ ॥उनके भयको सुनकर भगवान् विष्णुने देवताओंसे कहा कि हम देवगण युद्ध करेंगे और उस दुर्जयका वध कर डालेंगे॥ २४॥
व्यास उवाच<br>इति ते निश्चयं कृत्वा ब्रह्मविष्णुहरीश्वराः।<br>स्वानि स्वानि समारुह्य वाहनानि ययुः सुराः॥ २५ ॥व्यासजी बोले—ऐसा निश्चय करके ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा इन्द्र आदि देवता अपने-अपने वाहनोंपर चढ़कर चल पड़े॥ २५॥
ब्रह्मा हंससमारूढो विष्णुर्गरुडवाहनः।<br>शङ्करो वृषभारूढो वृत्रहा गजसंस्थितः॥ २६ ॥<br>मयूरवाहनः स्कन्दो यमो महिषवाहनः।<br>कृत्वा सैन्यसमायोगं यावत्ते निर्ययुः सुराः॥ २७ ॥<br>तावद्दैत्यबलं प्राप्तं दृप्तं महिषपालितम्।<br>तत्राभूत्तुमुलं युद्धं देवदानवसैन्ययोः॥ २८ ॥ब्रह्माजी हंसपर चढ़े, विष्णुभगवान्‌ने गरुडको अपना वाहन बनाया, शंकरजी वृषभपर सवार हुए, इन्द्र ऐरावत हाथीपर बैठे, स्वामी कार्तिकेय मोरपर चढ़े और यमराज महिषपर आरूढ़ हुए। इस प्रकार अपनी सैन्य तैयारी करके देवता लोग ज्यों ही आगे बढ़े, तभी उन्हें महिषासुरके द्वारा पालित मदोन्मत्त दानवी-सेना सामने मिल गयी। इसके बाद वहींपर देवताओं तथा दानवोंकी सेनामें भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया॥ २६—२८॥
बाणैः खड्गैस्तथा प्रासैर्मुसलैश्च परश्वधैः।<br>गदाभिः पट्टिशैः शूलैश्चक्रैश्च शक्तितोमरैः॥ २९ ॥<br>मुद्गरैर्भिन्दिपालैश्च हलैश्चैवातिदारुणैः।<br>अन्यैश्च विविधैरस्त्रैर्निजघ्नुस्ते परस्परम्॥ ३० ॥वे एक-दूसरेपर बाण, तलवार, भाला, मूसल, परशु, गदा, पट्टिश, शूल, चक्र, शक्ति, तोमर, मुद्गर, भिन्दिपाल, हल तथा अन्य अति भयंकर शस्त्रोंसे प्रहार करने लगे॥ २९-३०॥
सेनानीश्चिक्षुरस्तस्य गजारूढो महाबलः।<br>मघवन्तं पञ्चभिस्तैः सायकैः समताडयत्॥ ३१ ॥महिषासुरके सेनापति महाबली चिक्षुरने हाथीपर चढ़कर इन्द्रपर पाँच बाणोंसे प्रहार किया॥ ३१॥
तुराषाडपि तांश्छित्त्वा बाणैर्बाणांस्त्वरान्वितः।<br>हृदये चार्धचन्द्रेण ताडयामास तं कृती॥ ३२ ॥युद्धकुशल इन्द्रने भी तत्काल अपने बाणोंसे उसके बाणोंको काटकर अपने अर्धचन्द्र नामक बाणसे उसके हृदय-स्थलपर आघात किया॥ ३२॥
बाणाहतस्तु सेनानीः प्राप मूर्च्छां गजोपरि।<br>करिणं वज्रघातेन स जघान करे ततः॥ ३३ ॥उस बाणसे आहत होकर सेनानायक चिक्षुर हाथीपर बैठे-बैठे ही मूर्च्छित हो गया। इसके बाद इन्द्रने हाथीकी सूँडपर वज्रसे प्रहार किया॥ ३३॥

५५४ श्रीमद्देवीभागवत [अ० ५

५५४ श्रीमद्देवीभागवत [अ० ५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तद्वज्राभिहतो नागो भग्नः सैन्यं जगाम ह।<br>दृष्ट्वा तं दैत्यराट् क्रुद्धो बिडालाख्यमथाब्रवीत्॥ ३४<br><br>गच्छ वीर महाबाहो जहीन्द्रं मदगर्वितम्।<br>वरुणादीन्यरान्देवान्हत्वागच्छ ममान्तिकम्॥ ३५उस वज्रके आघातसे हाथीकी सूँड कट गयी और वह सेनाके बीच भाग खड़ा हुआ। उसे देखकर दानवराज महिषासुर कुपित हो गया और उसने बिडाल नामक दानवसे कहा—हे महाबाहो! हे वीर! तुम जाओ और बलके अभिमानमें चूर इन्द्रको मार डालो, साथ ही वरुण आदि अन्य देवताओंका भी वध करके शीघ्र ही मेरे पास लौट आओ॥ ३४-३५॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य बिडालाख्यो महाबलः।<br>आरुह्य वारणं मत्तं जगाम त्रिदशाधिपम्॥ ३६व्यासजी बोले—उसकी बात सुनकर वह महाबली बिडाल एक मतवाले हाथीपर सवार होकर युद्धके लिये इन्द्रकी ओर चल पड़ा॥ ३६॥
वासवस्तं समायान्तं दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः।<br>जघान विशिखैस्तीक्ष्णैराशीविषसमप्रभैः॥ ३७उसे अपनी ओर आते देखकर इन्द्रने कुपित होकर विषधर सर्पतुल्य तीक्ष्ण बाणोंसे बिडालपर प्रहार किया॥ ३७॥
स तु छित्त्वा शरांस्तूर्णं स्वशरैश्चापनिःसृतैः।<br>पञ्चाशद्भिर्जघानाशु वासवञ्च शिलीमुखैः॥ ३८उस बिडालने शीघ्र ही अपने धनुषसे छूटे हुए बाणोंसे इन्द्रके बाण काटकर पुनः तत्काल अपने पचास बाणोंसे इन्द्रपर आघात किया॥ ३८॥
तथेन्द्रोऽपि च तान्बाणांश्छित्त्वा कोपसमन्वितः।<br>जघान विशिखैस्तीक्ष्णैराशीविषसमप्रभैः॥ ३९तब इन्द्रने भी क्रुद्ध होकर उसके उन बाणोंको काटकर अपने सर्पतुल्य तीक्ष्ण बाणोंसे उसपर प्रहार किया॥ ३९॥
स तु छित्त्वा शरांस्तूर्णं स्वशरैश्चापनिःसृतैः।<br>गदया ताडयामास गजं तस्य करोपरि॥ ४०अपने धनुषसे छूटे हुए बाणोंसे उसके बाणोंको काटकर इन्द्रने अपनी गदासे उसके हाथीकी सूँडपर प्रहार किया॥ ४०॥
स्वकरे निहतो नागश्चकारार्तस्वरं मुहुः।<br>परिवृत्य जघानाशु दैत्यसैन्यं भयातुरम्॥ ४१अपनी सूँडपर गदाके आघातसे वह हाथी बार-बार आर्तनाद करने लगा और पीछे घूमकर भागता हुआ वह दैत्य-सेनाको ही कुचलने लगा, जिससे दानवोंकी सेना भयाकुल हो उठी॥ ४१॥
दानवस्तु गजं वीक्ष्य परावृत्य गतं रणात्।<br>समाविश्य रथे रम्ये जगामाशु सुरान् रणे॥ ४२तत्पश्चात् हाथीको युद्धभूमिसे भागा देखकर वह दानव बिडाल लौटकर चला गया और पुनः एक सुन्दर रथपर सवार होकर देवताओंके समक्ष रणमें उपस्थित हो गया॥ ४२॥
तुराषाडपि तं वीक्ष्य रथस्थं पुनरागतम्।<br>अहनद्विशिखैस्तीक्ष्णैराशीविषसमप्रभैः ॥ ४३इन्द्रने बिडालको रथपर सवार होकर पुनः समरांगणमें आया हुआ देखकर अपने सर्पतुल्य तीक्ष्ण बाणोंसे उसपर आघात करना आरम्भ कर दिया॥ ४३॥
सोऽपि क्रुद्धश्चकारोग्रां बाणवृष्टिं महाबलः।<br>बभूव तुमुलं युद्धं तयोस्तत्र जयैषिणोः॥ ४४वह महाबली बिडाल भी अत्यन्त कुपित होकर भयंकर बाण-वृष्टि करने लगा। इस प्रकार विजयके इच्छुक उन दोनोंके बीच भीषण युद्ध होने लगा॥ ४४॥

अ० ५ ] पञ्चम स्कन्ध ५५५

इन्द्रस्तु बलिनं दृष्ट्वा कोपेनाकुलितेन्द्रियः।<br>जयन्तमग्रतः कृत्वा युयुधे तेन संयुतः॥४५क्रोधके प्रभावसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले इन्द्रने बिडालको विशेष बलवान् देखकर जयन्तको अपना अग्रणी बना लिया और अब उसके साथ मिलकर वे युद्ध करने लगे॥४५॥
जयन्तस्तु शितैर्बाणैस्तं जघान स्तनान्तरे।<br>पञ्चभिः प्रबलाकृष्टैरसुरं मदगर्वितम्॥४६जयन्तने धनुषपर चढ़ाकर प्रबलतापूर्वक खींचे गये पाँच तीक्ष्ण बाणोंसे मदोन्मत्त उस दानव बिडालके वक्षःस्थलपर आघात किया॥४६॥
स बाणाभिहतस्तावन्निपपात रथोपरि।<br>अतिवाह्य रथं सूतो निर्जगाम रणाजिरात्॥४७उन बाणोंके आघातसे मूर्च्छित होकर बिडाल रथपर गिर पड़ा, तब उसका सारथि तत्काल रथ लेकर रण-भूमिसे बाहर निकल गया॥४७॥
तस्मिन्निर्गते दैत्ये बिडालाख्येऽथ मूर्च्छिते।<br>जयशब्दो महानासीद्दुन्दुभीनां च निःस्वनः॥४८उस बिडालके मूर्च्छित होकर युद्धभूमिसे बाहर चले जानेपर देवसेनामें महान् विजय-घोष तथा दुन्दुभियोंकी ध्वनि होने लगी॥४८॥
सुराः प्रमुदिताः सर्वे तुष्टुवुस्तं शचीपतिम्।<br>जगूर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥४९सभी देवता प्रसन्न होकर इन्द्रकी स्तुति करने लगे, गन्धर्व गाने लगे तथा अप्सराएँ नाचने लगीं॥४९॥
चुकोप महिषः श्रुत्वा जयशब्दं सुरैः कृतम्।<br>प्रेषयामास तत्रैव ताम्रं परमदापहम्॥५०तत्पश्चात् देवताओंके द्वारा किये गये उस विजय-घोषको सुनकर महिषासुर कुपित हो उठा। उसने शत्रुओंके अभिमानको चूर-चूर कर देनेवाले ताम्र नामक दानवको युद्धक्षेत्रमें भेजा॥५०॥
ताम्रस्तु बहुभिः सार्धं समागम्य रणाजिरे।<br>शरवृष्टिं चकाराशु तडित्वानिव सागरे॥५१ताम्र बहुत-से सैनिकोंके साथ समरांगणमें आकर इस प्रकार वेगपूर्वक बाणोंकी वर्षा करने लगा मानो मेघ समुद्रमें जल बरसा रहा हो॥५१॥
वरुणः पाशमुद्यम्य जगाम त्वरितस्तदा।<br>यमश्च महिषारूढो दण्डमादाय निर्ययौ॥५२उस समय वरुणदेव पाश लेकर तथा यमराज हाथमें दण्ड धारण करके महिषपर चढ़कर [युद्धभूमिमें] शीघ्र ही पहुँच गये॥५२॥
तत्र युद्धमभूद् घोरं देवदानवयोरिथः।<br>बाणैः खड्गैश्च मुसलैः शक्तिभिश्च परश्वधैः॥५३अब देवताओं तथा दानवोंमें परस्पर बाणों, तलवारों, मुसलों, बछियों तथा फरसोंसे भीषण संग्राम होने लगा॥५३॥
दण्डेन निहतस्ताम्रो यमहस्तोद्यतेन च।<br>न चचाल महाबाहुः संग्रामाङ्गणतस्तदा॥५४यमराजके द्वारा अपने हाथसे फेंके गये दण्डसे ताम्र आहत हो गया, किंतु वह महाबाहु ताम्र समरांगणसे हिलातक नहीं॥५४॥
चापमाकृष्य वेगेन मुक्त्वा तीव्राञ्छिलीमुखान्।<br>इन्द्रादीनहनत्तूर्णं ताम्रस्तस्मिन् रणाजिरे॥५५ताम्र उस संग्रामभूमिमें वेगपूर्वक धनुषको खींच-खींचकर अति तीक्ष्ण बाण छोड़कर इन्द्र आदि देवताओंपर शीघ्रतासे प्रहार करने लगा॥५५॥
तेऽपि देवाः शरैर्दिव्यैर्निशितैश्च शिलाशितैः।<br>निजघ्नुर्दानवान्क्रुद्धास्तिष्ठ तिष्ठेति चुक्रुशुः॥५६वे देवता कुपित होकर पत्थरपर घिसकर नुकीले बनाये गये तीक्ष्ण दिव्य बाणोंसे दानवोंको मारने लगे और 'ठहरो-ठहरो' कहकर चिल्लाने लगे॥५६॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे दैत्यसैन्यपराजयो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

५५६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ६

| निहतस्तैः सुरैर्दैत्यो मूर्च्छामप रणाङ्गणे ।<br>हाहाकारो महानासीद्दैत्यसैन्ये भयातुरे ॥ ५७ | उन देवताओंके प्रहारसे घायल होकर दैत्य ताम्र युद्धभूमिमें मूर्च्छित हो गया। तब भयाक्रान्त दैत्यसेनामें महान् हाहाकार मच गया ॥ ५७ ॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे दैत्यसैन्यपराजयो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


अथ षष्ठोऽध्यायः

भगवान् विष्णु और शिवके साथ महिषासुरका भयानक युद्ध

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
ताम्रेऽथ मूर्च्छिते दैत्ये महिषः क्रोधसंयुतः ।<br>समुद्यम्य गदां गुर्वीं देवानुपजगाम ह ॥ १इस प्रकार दानव ताम्रके मूर्च्छित हो जानेपर महिषासुर कुपित हो गया और एक विशाल गदा लेकर देवताओंके समक्ष जा डटा ॥ १ ॥
तिष्ठन्त्वद्य सुराः सर्वे हन्म्यहं गदया किल ।<br>सर्वे बलिभुजः कामं बलहीनाः सदैव हि ॥ २<br><br>इत्युक्त्वासौ गजारूढं सम्प्राप्य मदगर्वितः ।<br>जघान गदया तूर्णं बाहुमूले महाभुजः ॥ ३हे देवताओ! तुम सब ठहरो; मैं अभी अपनी गदासे तुम सभीको मार डालूँगा। बलिभाग (हविष्य) खानेवाले तुम सब तो सदासे बलहीन रहे हो—ऐसा कहकर अभिमानके मदमें चूर वह महाबाहु महिषासुर हाथीपर बैठे हुए इन्द्रके पास पहुँचकर उसने उनके बाहुमूलपर अपनी गदासे तीव्र आघात किया ॥ २-३ ॥
सोऽपि वज्रेण घोरेण चिच्छेदाशु गदाञ्च ताम् ।<br>प्रहर्तुकामस्त्वरितो जगाम महिषं प्रति ॥ ४इन्द्रने अपने भयंकर वज्रसे उस गदाको तुरंत काट दिया और वे महिषासुरको मारनेकी इच्छासे बड़ी शीघ्रतापूर्वक उसकी ओर बढ़े ॥ ४ ॥
हयारिरपि कोपेन खड्गमादाय सुप्रभम् ।<br>ययाविन्द्रं महावीर्यं प्रहरिष्यन्निवान्तिकम् ॥ ५तत्पश्चात् वह महिषासुर भी कुपित होकर अपने हाथमें चमचमाती हुई तलवार लेकर प्रहार करते हुए महाबली इन्द्रके सामने पहुँच गया ॥ ५ ॥
बभूव च तयोर्युद्धं सर्वलोकभयावहम् ।<br>आयुधैर्विविधैस्तत्र मुनिविस्मयकारकम् ॥ ६तब उन दोनोंमें नानाविध आयुधोंके द्वारा समस्त प्राणियोंको भयभीत कर देनेवाला तथा मुनिजनोंको भी विस्मित कर देनेवाला भीषण युद्ध छिड़ गया ॥ ६ ॥
चकाराशु तदा दैत्यो मायां मोहकरीं किल ।<br>शाम्बरीं सर्वलोकघ्नीं मुनीनामपि मोहिनीम् ॥ ७तत्पश्चात् दैत्य महिषासुरने सम्पूर्ण जगत्‌को नष्ट कर देनेवाली तथा मुनियोंको भी मोहित कर देनेवाली मोहकारिणी शाम्बरी मायाका तत्काल प्रयोग किया ॥ ७ ॥
कोटिशो महिषास्तत्र तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ।<br>ददृशुः सायुधाः सर्वे निघ्नन्तो देववाहिनीम् ॥ ८उस मायाके प्रभावसे महिषासुरके ही रूपवाले तथा उसीके समान पराक्रमी करोड़ों महिषासुर अनेक प्रकारके आयुध लेकर देवसेनाका संहार करते हुए दिखायी पड़े ॥ ८ ॥

अ० ६ ] पञ्चम स्कन्ध ५५७

मघवा विस्मितस्तत्र दृष्ट्वा तां दैत्यनिर्मिताम् ।<br>बभूवातिभयोद्विग्नो मायां मोहकरीं किल ॥ ९तब दैत्य महिषासुरद्वारा उत्पन्न की गयी उस मोहकरी मायाको देखकर इन्द्र विस्मयमें पड़ गये तथा भयसे बहुत व्याकुल हो उठे ॥ ९ ॥
वरुणोऽपि सुसन्त्रस्तस्तथैव धननायकः ।<br>यमो हुताशनः सूर्यः शीतरश्मिर्भयातुरः ॥ १०<br><br>पलायनपराः सर्वे बभूवुर्मोहिताः सुराः ।<br>ब्रह्मविष्णुमहेशानां स्मरणं चक्रुरुद्यताः ॥ ११वरुण, कुबेर, यम, अग्नि, सूर्य तथा चन्द्रमा भी भयभीत हो गये और सभीके मनमें त्रास छा गया। सभी देवगण माया-विमोहित होकर भाग खड़े हुए और वे सावधान होकर ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवका स्मरण करने लगे ॥ १०-११ ॥
तत्राजग्मुश्च काजेशाः स्मृतमात्राः सुरोत्तमाः ।<br>हंसतार्क्ष्यवृषारूढास्त्रातुकामा वरायुधाः ॥ १२स्मरण करते ही उनकी रक्षाकी कामनासे श्रेष्ठ आयुध धारण करके सुरश्रेष्ठ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश अपने-अपने वाहन हंस, गरुड तथा वृषभपर आरूढ होकर वहाँ आ गये ॥ १२ ॥
शौरिस्तां मोहिनीं दृष्ट्वा सुदर्शनमथोज्ज्वलम् ।<br>मुमोच तत्तेजसैव माया सा विलयं गता ॥ १३मोहकारिणी उस आसुरी मायाको देखकर भगवान् विष्णुने अपना तेजोमय सुदर्शन चक्र चला दिया, जिसके प्रचण्ड तेजसे वह माया समाप्त हो गयी ॥ १३ ॥
वीक्ष्य तान्महिषस्तत्र सृष्टिस्थित्यन्तकारिणः ।<br>योद्धुकामः समादाय परिघं समुपाद्रवत् ॥ १४तदनन्तर सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले उन देवताओंको देखकर उनसे युद्ध करनेकी इच्छासे वह महिषासुर परिघ लेकर उनकी ओर दौड़ा ॥ १४ ॥
महिषाख्यो महावीरः सेनानीश्चिक्षुरस्तथा ।<br>उग्रास्यश्चोग्रवीर्यश्च दुद्रुवुर्युद्धकामुकाः ॥ १५<br><br>असिलोमात्रिनेत्रश्च बाष्कलोऽन्धक एव च ।<br>एते चान्ये च बहवो युद्धकामा विनिर्ययुः ॥ १६इसके बाद महावीर महिषासुर, सेनाध्यक्ष चिक्षुर, उग्रास्य, उग्रवीर्य, असिलोमा, त्रिनेत्र, बाष्कल तथा अन्धक—ये दानव एवं इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-से दानव युद्धकी अभिलाषासे निकल पड़े ॥ १५-१६ ॥
सन्नद्धा धृतचापास्ते रथारूढा मदोद्धताः ।<br>परिवव्रुः सुरान्सर्वान्वृका इव सुवत्सकान् ॥ १७उन कवचधारी, धनुष धारण करनेवाले, रथारूढ तथा मदोन्मत्त दानवोंने सभी देवताओंको उसी प्रकार घेर लिया, जिस प्रकार भेड़िये अत्यन्त कोमल बछड़ोंको घेर लेते हैं ॥ १७ ॥
बाणवृष्टिं ततश्चक्रुर्दानवा मदगर्विताः ।<br>सुराश्चापि तथा चक्रुः परस्परजिघांसवः ॥ १८तदनन्तर एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छावाले वे मदोन्मत्त दानव तथा देवता बाण-वृष्टि करने लगे ॥ १८ ॥
अन्धको हरिमासाद्य पञ्चबाणाञ्छिलाशितान् ।<br>मुमोच विषसन्दिग्धान्कर्णाकृष्टान्महाबलान् ॥ १९इसी बीच अन्धकासुरने भगवान् विष्णुके समक्ष पहुँचकर सानपर चढ़ाये गये, विषमें दग्ध किये गये तथा कानतक खींचे गये अत्यन्त शक्तिशाली पाँच बाण छोड़े ॥ १९ ॥
वासुदेवोऽप्यसंप्राप्तानविशिखानाशुगैस्तदा ।<br>चिच्छेद तान्पुनः पञ्च मुमोच रिपुनाशनः ॥ २०शत्रुदमन भगवान् विष्णुने भी बड़ी तत्परताके साथ अपने तीव्रगामी बाणोंसे अन्धकासुरके उन बाणोंको दूरसे ही काट डाला और फिर उसके ऊपर पाँच बाण छोड़े ॥ २० ॥