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धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

भूमिका समर्पण कर दिया। पाठकगण! यह ‘वासिष्ठी धनुर्वेदसंहिता’ मूलमात्र मुझको इलाका जयपुर के सनथला बनथली कोढ़ा के मोलकराम ब्राह्मण के पास से लिखने को संवत् १९३३ में चुरू रामगढ़ में मिली जब से यह धरी थी। अब एक प्रति खड्गविलासयंत्रालय की छपी हुई देखने में आई तथा १ पुस्तक अलीगढ़ के जिले में छपी। इसको देखकर हमने भी अपनी पुस्तक पण्डित ईश्वरीप्रसादजी पाण्डे को दिखाई। इनकी आज्ञानुसार इसकी भाषा अति परिश्रम करके बनाई। परिश्रम का फल यथाशक्ति पण्डितजी से पाया। अब इस पुस्तक का सर्वाधिकार श्रीमान् खेमराज श्रीकृष्णदास “श्रीवेङ्कटेश्वर” (स्टीम्) यन्त्रालयाधिप को समर्पण कर दिया। पण्डित हरदयालु स्वामी, ग्राम कंबाली निवासी रिवाडी-गुडगांव.

धनुर्वेदसंहितास्थविषानुक्रमणिका विषय पृष्ठांक | विषय पृष्ठांक विश्वामित्रजी का वसिष्ठजी से | दूरपात २६ धनुर्विद्या माँगना १ | दृढ़भेद २६ धनुर्वेद का अधिकार २ | हीनगति २७ धनुर्दानविधिः ३ | शुद्धगति २८ आचार्यलक्षण ३ | दृढ़चतुष्क २९ वेधविधिः ५ | चित्रविधि ३० चापप्रमाण ७ | काष्ठछेदन ३१ शुभचापलक्षणम् ८ | धावल्लक्ष्य ३१ निषिद्ध धनु ८ | उसकी विधि ३२ गणलक्षण १० | शब्दवेधित्व ३२ बाणलक्षण ११ | प्रत्यागमन ३३ फललक्षण १३ | अस्त्रविधि ३३ बाणों के कर्म १३ | औषधि ३८ बाणों के स्वरूप १४ | संग्रामविधि ४० बाण पायन १५ | स्वरबलयुद्धम् ४१ नाराचनालीकतशघ्नी वर्णन १६ | राहुयोगिनी ४४ स्थानमुष्टाकर्षणलक्षण १६ | व्यूहाः ४५ गुणमुष्टि १८ | व्यूहों के आकार ४८ धनुर्मुष्टिसंधान १९ | सेनानय ५६ व्याय १९ | धातुपाठ ६० अथ लक्ष्यम् २० | धावनकर ६० श्रमक्रिया २१ | पदातिक्रम ६१ शूरप्रमाण २२ | उदाहरणम् ६२ नाराचप्रमाण २२ | अथाश्वक्रम ६३ अनध्याय २२ | अथहस्तिक्रम ६४ श्रमक्रिया २४ | रथक्रम ६५ लक्ष्यास्खलन २५ | शिक्षा ६५ शीघ्र संधान २६ | हन्तव्याऽहन्तव्योपदेश ६६ इत्यनुक्रमणिका समाप्ता

ॐ साम्बसदाशिवाय नमः अथ वासिष्ठीधनुर्वेदसंहिताप्रारम्भः अथैकदा विजिगीषुुर्विश्वामित्रो राजर्षिर्गुरुं वसिष्ठमभ्यु- पेत्य प्रणम्योवाच ब्रूहि भगवन् धनुर्विद्यां श्रोत्रियाय दृढचेतसे शिष्याय दुष्टशत्रुविनाशाय च । तमुवाच महर्षिर्ब्रह्मर्षिप्रवरो वसिष्ठः शृणु भो राजन्विश्वामित्र यां सरहस्यधनुर्विद्यां भगवान्सदाशिवः परशुरामायो- वाच तामेव सरहस्यां वच्मि ते हिताय गोब्राह्मणसाधु- वेदरक्षणाय च यजुर्वेदाथर्वसम्मितां संहिताम् ॥ एक समय विजय के आकांक्षी राजर्षि विश्वामित्र वसिष्ठ गुरुजी के पास जाकर प्रणाम कर बोले, हे भगवन्! श्रोत्रिय, दृढ़चित्त, मुझशिष्य को दुष्ट स्वभाव वाले शत्रुओं का नाश करने के लिए धनुर्विद्या कहिए। महर्षिब्रह्मऋषियों में श्रेष्ठ वसिष्ठजी बोले कि हे राजन् विश्वामित्र! सुनिए, जिस सरहस्य धनुर्वेदविद्या को भगवान् महादेवजी ने परशुराम- जी को कहा था। उसी यजुर्वेद और अथर्ववेद से मिली हुई रहस्य सहित धनुर्विद्या को मैं आपसे गौ, ब्राह्मण, वेद और साधुओं की रक्षा के लिये कहता हूँ॥ अथोवाच महादेवो भार्गवाय च धीमते । तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि याथातथ्येन संशृणु ॥१॥ महादेवजी ने बुद्धिमान् परशुरामजी से जो कहा था। ठीक वही मैं आपसे कहता हूँ, सुनिये॥१॥ २

२ धनुर्वेदसंहिता तत्र चतुष्टयपादात्मको धनुर्वेदः यस्य प्रथमे पादे दीक्षा- प्रकारः । द्वितीये संग्रहः । तृतीये सिद्धप्रयोगाः । चतुर्थे प्रयोगविधयः ॥२॥ महादेवजी के कहे हुए धनुर्वेद में चार पाद हैं। पहिले पाद में धनुर्वेद की दीक्षा (उपदेश) की विधि है। दूसरे पाद में अभ्यास करने की विधि है। तीसरे में प्रक्षेपणादि प्रकार हैं। चौथे पाद में अस्त्रसंधानादि प्रयोग विधि हैं॥२॥ अथ कस्य धनुर्वेदाधिकारः इत्यपेक्षायामाह धनुर्वेदगुरुर्विप्रः प्रोक्तो वर्णद्वयस्य च । युद्धाधिकारः शूद्रस्य स्वयं व्यापादिशिक्षया ॥३॥ धनुर्वेद सिखाने में ब्राह्मण तो गुरु होता है और धनुर्वेद से युद्ध का अधिकार दो ही वर्णों के लिये कहा है, शूद्र को तो अपने आप ही शिकार आदि करने का अधिकार है॥३॥ चतुर्विधमायुधम् । मुक्तममुक्तं मुक्तामुक्तं यन्त्रमुक्तं चेति ॥४॥ मुक्त अर्थात् चक्र आदि जो हाथ से छोड़े जायँ उनको अस्त्र कहते हैं। अमुक्त खड्ग आदि। मुक्ताऽमुक्त बरछी आदि। यन्त्रमुक्त शर, गोली आदि। ये चार प्रकार के आयुध कहलाते हैं॥४॥ दुष्टदस्युचौरादिभ्यः साधुसंरक्षणं धर्मतः । प्रजापालनं धनुर्वेदस्य प्रयोजनम् ॥५॥ बुरे मनुष्य डाकू चोर आदिकों से श्रेष्ठों की रक्षा करना, धर्म से प्रजा का पालन करना, यही धनुर्वेद का प्रयोजन है॥५॥ एकोऽपि यत्र नगरे प्रसिद्धः स्याद्धनुर्धरः । ततो यान्त्यरयो दूरान्मृगाः सिंहगृहादिव ॥६॥ जिस नगर में एक भी प्रसिद्ध धनुर्धारी हो उस नगर से शत्रु दूर ही चले जाते हैं जैसे सिंह के घर से अरण्य पशु दूर चले जाते हैं॥६॥

हिन्दीटीकासमेता ३ अथ धनुर्दानविधिः आचार्येण धनुर्देयं ब्राह्मणे सुपरीक्षिते । लुब्धे धूर्ते कृतघ्ने च मन्दबुद्धौ न दापयेत् ॥७॥ धनुर्विद्या देने की विधि यह है कि, आचार्य को चाहिये कि अच्छी परीक्षा किये हुए ब्राह्मण को धनुर्विद्या दें। लोभी और धूर्त, जो दी हुई विद्या का अहसान न माने ऐसे पुरुष को तथा मन्दबुद्धि को धनुर्विद्या न दे॥७॥ ब्राह्मणाय धनुर्देयं खड्गं वै क्षत्त्रियाय च । वैश्याय दापयेत्कुन्तं गदां शूद्राय दापयेत् ॥८॥ ब्राह्मण को धनुष दे, क्षत्रिय को तलवार, वैश्य को भाला और शूद्र को गदायुद्ध सिखावे॥८॥ धनुश्चक्रं च कुन्तं च खड्गं च क्षुरिका गदा । सप्तमं बाहुयुद्धं स्यादेवं युद्धानि सप्तधा ॥९॥ धनुष १ चक्र २ भाला ३ खड्ग ४ छुरी ५ गदा ६ सातवां हाथों से मल्ल युद्ध इस प्रकार से सात प्रकार का युद्ध है॥९॥ अथाचार्यलक्षणम् आचार्यः सप्तयुद्धः स्याच्चतुर्भिर्भार्गवः स्मृतः । द्वाभ्यां चैव भवेद्योद्धा एकेन गणको भवेत् ॥१०॥ अब आचार्य के लक्षण कहते हैं। जो सातों प्रकारके युद्ध जानता है वह आचार्य होता है। जो चार प्रकारके युद्ध जाने, वह भार्गव कहलाता है। दो प्रकारके युद्ध को जानने वाला योद्धा होता है, और एक प्रकारके युद्ध से गणकसंज्ञा वाला होता है॥१०॥ हस्तः पुनर्वसुः पुष्यो रोहिणी चोत्तरात्रयम् । अनुराधाश्विनी चैव रेवती दशमी तथा ॥११॥ धनुर्विद्या का मुहूर्त हस्त, पुनर्वसु, पुष्य, रोहिणी, और तीनों उत्तरा, अनुराधा, अश्विनी और दशवीं रेवती॥११॥ जन्मस्थे च तृतीये च षष्ठे वै सप्तमे तथा । दशमैकादशे चन्द्रे सर्वकार्याणि कारयेत् ॥१२॥

४ धनुर्वेदसंहिता प्रथम, तीसरे, छठे, सातवें, दशवें, ग्यारहवें चन्द्रमा में आचार्य धनुर्विद्या के सारे काम करवावे॥१२॥ तृतीया पंचमी चैव सप्तमी दशमी तथा । त्रयोदशी द्वादशी च तिथयस्तु शुभा मताः ॥१३॥ तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी और द्वादशी ये तिथियां शुभ हैं॥१३॥ रविवारः शुक्रवारो गुरुवारस्तथैव च । एतद्वारत्रयं धन्यं प्रारम्भे शस्त्रकर्मणाम् ॥१४॥ रवि, शुक्र, गुरु, शस्त्रों के प्रारम्भ कर्म में ये तीन वार सराहने योग्य हैं॥१४॥ एभिर्दिनैस्तु शिष्याय गुरुः शस्त्राणि दापयेत् । संतर्प्य दानहोमाभ्यां सुरान्स्वाहाविधानतः ॥१५॥ गुरु इन दिनों में दान और होम करके देवताओं को तृप्त कर शिष्य को शस्त्र दे॥१५॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्तत्र कुमारीश्चाप्यनेकंशः । तापसानर्चयेद्भक्त्या ये चान्ये शिवयोगिनः ॥१६॥ वहां अनेक ब्राह्मण और कन्याओं को जिमावे और जो शिव के भक्त योगी हों उनको भक्ति से अर्चन पूजन करै॥१६॥ अन्नपानादिभिश्चैव वस्त्रालङ्कारभूषणैः । गन्धमाल्यैर्विचित्रैश्च गुरुं तत्र प्रपूजयेत् ॥१७॥ पीछे गन्ध माला अन्नादि वस्त्र गहने आदि से गुरुजी का पूजन करे॥१७॥ कृतोपवासः शिष्यस्तु धृताजिनपरिग्रहः । बद्धांजलिपुटस्तत्र याचयेद्गुरुतो धनुः ॥१८॥ उपवास किया हुआ शिष्य मृगचर्म धारण किये हुए हाथ जोड़कर गुरु से धनुष की याचना करे॥१८॥ अङ्गन्यासस्ततः कार्यः शिवोक्तः सिद्धिमिच्छता । आचार्येण च शिष्यस्य पापघ्नो विघ्ननाशनः ॥१९॥

१. चतुर्विध धनुर्वेद, धनुष-प्रमाण, गुण, बाण-लक्षण एवं प्रत्यञ्चा-विधान

हिन्दीटीकासमेता ५ फिर आचार्य को शिष्य की सिद्धि की इच्छा से शिवजी का कहा हुआ पाप और विघ्नों का नाश करनेवाला अङ्गन्यास करना चाहिये।।१९।। शिखास्थाने न्यसेदीशं बाहुयुग्मे च केशवम् । ब्रह्माणं नाभिमध्ये तु जङ्घयोश्च गणाधिपम् ॥२०॥ चोटी के स्थान पर जहाँ ब्रह्मरन्ध्र है वहाँ श्रीमहादेवजी को स्थापन करे और दोनों बाहुओं पर भगवान् को और नाभि के बीच में ब्रह्माजी और जंघाओं पर गणेशजी को स्थापन करे।।२०।। ॐ ह्रौं शिखास्थाने शंकराय नमः । ॐ ह्रौं बाह्वोः केशवाय नमः । ॐ ह्रौं नाभिमध्ये ब्रह्मणे नमः । ॐ ह्रौं जङ्घयोर्गणपतये नमः ॥२१॥ इन पूर्वोक्त चार मंत्रों से चारों देवताओं का ध्यान करता जाय और शिखादि को हाथ से छूता जाय।।२१।। ईदृशं कारयेन्न्यासं येन श्रेयो भविष्यति । अन्येऽपि दुष्टमंत्रेण न हिंसन्ति कदाचन ॥२२॥ इस प्रकार अङ्गन्यास करावे और शिष्य करे, जिससे कल्याण हो। इस न्यास के करने से और भी मारण आदि दुष्ट मंत्रों से नहीं मार सकते।।२२।। शिष्याय मानुषं चापं धनुर्मंत्राभिमंत्रितम् । काण्डात्काण्डाभिमंत्रेण दद्याद्वेदविधानतः ॥२३॥ गुरु शिष्य को “काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ति परुषः परुषः परि” इस वेद के मंत्र से वेदविधि के साथ मनुष्य सम्बन्धी धनुष को धनुष के मंत्र से मन्त्रित करके दे।।२३।। प्रथमं पुष्पवेधं च फलहीनेन पत्रिणा । ततः फलयुतेनैव मत्स्यवेधं च कारयेत् ॥२४॥ मांसवेधं ततः कुर्यादेवं वेधो भवेत्त्रिधा । एतैर्विधेः कृतैः पुंसां शराः स्युः सर्वसाधकाः ॥२५॥

६ धनुर्वेदसंहिता इसके उपरान्त पहिले फूल के ऊपर फल रहित बाण से वेध करावे पश्चात् फल सहित बाण से मत्स्य का छेदन करावे, इसके उपरान्त मांस पर निशाना लगवावे, हे विश्वामित्र! इस प्रकार से तीन प्रकार का वेध होता है इन वेधों के करने पर सर्वसाधक बाण हो जाते हैं, अर्थात् सब प्रकार का निशाना आ जाता है और सब वस्तुओं को वेध सकता है॥२४-२५॥ वेधने चैव मांसस्य शरपातो यदा भवेत् । पूर्वदिग्भागमाश्रित्य तदा स्याद्विजयी सुखी ॥२६॥ दक्षिणे कलहो घोरो विदेशगमनं पुनः । पश्चिमे धनधान्यं च सर्वं चैवोत्तरे शुभम् ॥२७॥ ऐशान्यां पवनं दुष्टं विदिशोऽन्याश्च शोभनाः । हर्षपुष्टिकराश्चैव सिद्धिदाः सर्वकर्मणि ॥२८॥ अब वेध का शकुन कहते हैं, यदि मांस का वेध करते समय, वा शमी पूजा में पुतला वेध करते समय वेधन होकर बाण पूर्व दिशा में गिर पड़े तो उस योद्धा की विजय हो और सुख हो, दक्षिण दिशा में गिरे तो बहुत क्लेश हो और परदेश में गमन हो, पश्चिम में बाण गिरे तो धन और धान्य मिले और उत्तर में गिरे तो सब काम उत्तम हों, ईशान में बाण गिरे तो बुरा वायु चले और सारी विदिशा श्रेष्ठ हैं, आनन्द और पुष्टिकी करने वाली और सब कामों में सिद्धि देने वाली हैं॥२६-२८॥ एवं वेधत्रयं कुर्याच्छङ्खदुंदुभिनिस्वनैः । ततः प्रणम्य गुरवे धनुर्बाणान्निवेदयेत् ॥२९॥ ऐसे वेधत्रय करै, शंख और नगारों के शब्द के साथ, पीछे गुरु को प्रमाण करके धनुष और बाण उनके आगे रख दे फिर उनको गुरुदक्षिणा देकर धनुष बाण ले ले॥२९॥ इति धनुर्दानविधिः

हिन्दीटीकासमेता ७ अथ चापप्रमाणम् प्रथमं योगिकं चापं युद्धचापं द्वितीयकम् । निजबाहुबलोन्मानात्किंचिदूनं शुभं धनुः ॥३०॥ अब धनुष का प्रमाण कहते हैं, पहिले तो अभ्यास करने के लिये (योगिक) धनुष अर्थात् लेजम आदि जिससे बाहुबल बँधे और साधारण धनुष से निशाना आदि सीखना चाहिये, जैसे गुलेल आदि, फिर दूसरा सींग आदि का (युद्धचाप) अपने हाथों के बल के अनुमान से कुछ छोटा धनुष धारण करना श्रेष्ठ है॥३०॥ वरं प्राणाधिको धन्वी न तु प्राणाधिकं धनुः । धनुषा पीड्यमानस्तु धन्वी लक्ष्यं न पश्यति ॥३१॥ प्राणों से भी प्यारा धनुषधारी होता है, प्राणों से अधिक धनुष नहीं है, इस कारण ऐसे बल का धनुष धारण करे कि, जिससे सुखपूर्वक बाण फेंकता रहे, ऐसा बोझिल धनुष न धारण करे कि जिससे छाती फट जाय। क्योंकि धनुष से पीड़ित धनुषधारी लक्ष्य को भली भाँति नहीं ताक सकता, उसके ख

८ धनुर्वेदसंहिता अथ शुभचापलक्षणम् त्रिपर्वं पञ्चपर्वं वा सप्तपर्वं तथा पुनः । नवपर्वं च कोदण्डं सर्वदा शुभकारकम् ॥३५॥ श्रेष्ठ धनुष के लक्षण, तीन पोरी वा पांच पोरी और फिर सात पोरी नव पोरी का धनुष सदा शुभकारक है॥३५॥ चतुष्पर्वं च षट्पर्वमष्टपर्वं विवर्जयेत् ॥३६॥ चार पोरी छः पोरी और आठ पोरियों का धनुष वर्जित है॥३६॥ केषांचिच्च भवेच्चापं वितस्तिनवसंमितम् ॥३७॥ कितने ही के मत में ९ नौ बालिशत का धनुष होता है॥३७॥ अथ वर्जितधनुः अतिजीर्णमपक्वं च ज्ञातिधृष्टं तथैव च । दग्धं छिद्रं न कर्तव्यं बाह्याभ्यन्तरहस्तकम् ॥३८॥ गुणहीनं गुणाक्रान्तं काण्डदोषसमन्वितम् । गलग्रन्थि न कर्तव्यं तलमध्ये तथैव च ॥३९॥ वर्जित धनुष को न धारण करे, बहुत पुराना कच्चा और जो जाति के बाँस का न हो, जला हुआ और छेद वाला बींधा हुआ और जिसके खेंचने से हाथ बाहर चला जाय अथवा भीतर रह जाय, गुणरहित और गुणसे ढका हुआ अर्थात् बहुत मोटी चौड़ी गुणसे ढका हुआ काण्डदोषके साथ अर्थात् अच्छे स्थान में उत्पन्न हुए बांस का न हो जिसके गले में गांठ हो और वैसे ही जिसके तले में गांठ हो ऐसा धनुष वर्जित है॥३८-३९॥ अपक्वं भङ्गमायाति ह्यतिजीर्णं तु कर्कशम् । ज्ञातिधृष्टं तु सोद्वेगं कलहो बांधवैः सह ॥४०॥ दग्धेन दह्यते वेश्म छिद्रं युद्धविनाशनम् । बाह्ये लक्ष्यं न लभ्येत तथैवाभ्यन्तरेपि च ॥४१॥ हीने तु संधिते बाणे संग्रामे भङ्गकारकम् । आक्रान्ते तु पुनः क्वापि लक्ष्यं न प्राप्यते दृढम् ॥४२॥

हिन्दीटीकासमेता ९ गलग्रन्थि तलग्रन्थि धनहानिकरं धनुः ॥ एभिर्दोषैर्विनिर्मुक्तं सर्वकार्यकरं स्मृतम् ॥४३॥ विना पके बांस वा सींग, सोना, चांदी, तांबा, लोहा इस्पात आदि का धनुष टूट जाता है, इसलिये पहिले अजमाया हुआ धनुष न हो तो भंग हो जाता है और बहुत पुराना तो कैड़ा हो जाता है और जाति के बांस का न हो तो मन में युद्ध के समय उद्वेग करता है, अर्थात् मन को उलट पुलट कर देता है, और भाइयों कें साथ लड़ाई, जले हुए धनुष के धारण करने से घर जल जाता है, छिद्र सहित से युद्ध का नाश हो जाता है, क्योंकि मन में यही चिन्ता लगी रहती कि, कभी टूट न जाय, युद्ध समय अन्य चिन्ता होने से शीघ्र बाण नहीं चल सकते इसलिये हार जाता है और जिस धनुष के बाहर हाथ चला जाय तो निशाना नहीं दीखे और वैसे ही भीतर हाथ रह जाय तो भी निशाना नहीं दीखे, यदि ओछा बाण चढ़ावे तो संग्राम में भंगकारक है और गुणा से टका हुआ हो तो फिर दृढ़ निशाना नहीं लगे और गलग्रंथि तथा तलग्रंथि ये दोनों धनुष धन की हानि करने वाले हैं, इन दोषों से रहित धनुष सब कामों का करने वाला होता है॥४०-४३॥ शार्ङ्गं पुनर्धनुर्दिव्यं विष्णोः परममायुधम् । वितस्तिसप्तमं मानं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥४४॥ फिर विष्णु भगवान् का परम दिव्य आयुध शार्ङ्गधनुष विश्वकर्मा ने सात बालिशत का बनाया॥४४॥ न स्वर्गे न च पाताले न भूमौ कस्यचित्करे । तद्धनुर्वशमायाति मुक्त्वैकं पुरुषोत्तमम् ॥४५॥ स्वर्ग में न पाताल में न पृथ्वीपर किसी के हाथ में वह है और न वह किसी के वश में आता है, एक भगवान् को छोड़कर॥४५॥ पौरुषेयं तु यच्छाङ्गं बहुवत्सरशोभितम् । वितस्तिभिः सार्द्धषड्भिर्निर्मितं चार्थसाधनम् ॥४६॥ एक पुरुष का जो धनुष है वह अच्छा बहुत वर्षों का है और छः बालिशत और छः अंगुलका बनाया हुआ धनुष धनका साधन देने वाला है॥४६॥

१० धनुर्वेदसंहिता प्रायो योज्यं धनुःशार्ङ्गं गजारोहाश्वसादिनाम् । रथिनां च पदातीनां वांशं चापं प्रकीर्त्तितम् ॥४७॥ बहुत करके शार्ङ्ग धनुष हाथी के सवार और घोड़ों के सवारों को धारण करना चाहिये, रथियों और पैदलों को बांस का चाप धारण करना योग्य है॥४७॥ विश्वामित्र शृणुष्वाथ धनुर्द्रव्यत्रयं क्रमात् । लोहं शृंगं च काष्ठं च गदितं शंभुना पुरा ॥४८॥ हे विश्वामित्र! अब धनुष के तीन द्रव्य क्रम से सुनो, एक तो लोह, दूसरा सींग तीसरा काष्ठ का धनुष श्रीमहादेवजी ने कहे हैं॥४८॥ लोहानि स्वर्णरजतताम्रकृष्णायसानि । शृङ्गाणि महिषशरभरोहितानाम् । शरभोऽष्टपाच्चतुरूर्ध्वपादो महाविषाण उष्ट्रमितो वनस्थः काश्मीरदेशप्रसिद्धो मृगाख्यः । दारूणि चन्दनवेतसधान्वन शालशाल्मलि- साकककुभवंशांजनानाम् ॥४९॥ लोह का अर्थ, सोना, चांदी, तांबा और कालालोहा इस्पात, सींग भैंस का शरभ (रोही) मृग का जिसके आठ पैर होते हैं चार ऊपर को चार नीचे और बड़े २ सींग होते हैं ऊँट के समान ऊँचा होता है वन में रहने वाला काश्मीर देश में उसको सब जानते हैं और काठ ये ग्रहण करने चंदन, वेत, धान्वन, शाल, सेमल, साक, ककुभ और बांस तथा अंजन वृक्ष इतनी वस्तुओं का धनुष बनता है॥४९॥ अथ गुणलक्षणानि गुणानां लक्षणं वक्ष्ये यादृशं कारयेद्गुणम् । पट्टसूत्रो गुणः कार्यः कनिष्ठामानसंमितः ॥५०॥ धनुःप्रमाणो निःसंधिः शुद्धैस्त्रिगुणतन्तुभिः । वर्तितः स्याद्गुणः श्लक्ष्णः सर्व- कर्मसहो युधि ॥५१॥ अभावे पट्टसूत्रस्य हरिणीस्नायु- रिष्यते । गुणाथमाप च ग्राह्याः स्नायवो महिषीभवाः

हिन्दीटीकासमेता ११ ॥५२॥ तत्कालहतच्छागस्य तन्तुना वा गुणाः शुभाः । निर्लोमतन्तुसूत्रेण कुर्याद्वा गुणमुत्तमम् ॥५३॥ पक्ववं- शत्वचः कार्यो गुणस्तु स्थावरो दृढः । पट्टसूत्रेण सन्नद्धः सर्वकर्मसहो युधि ॥५४॥ प्राप्ते भाद्रपदे मासि त्वगर्कस्य प्रशस्यते । तस्यास्तत्र गुणः कार्यो पवित्रः स्थावरो दृढः ॥५५॥गुणाः कार्याः सुमुञ्जानां भंगस्नाय्वर्कवर्मिणाम् । अब गुणों के लक्षण कहते हैं हे विश्वामित्र! अब जैसी गुण करनी चाहिये उस गुण के लक्षण कहते हैं रेशम के सूतकी गुण करनी चाहिये छोटी अंगुली के समान मोटी धनुष के प्रमाण के अनुपात से स्वच्छ साफ किये तिहरा डोरों को बांटकर चिकनी गुणा बनाई हुई युद्ध में सब कामों को सहने वाली होती है चाहे उसको कितनी ही खैंचो टूटती नहीं यदि रेशम की डोरी न मिले तो हिरन की स्नायु नाड़ियों की तांत गुण के लिये लेले वा भैंस की आंतों की तांत ले अथवा उसी समय मारे हुए बकरे की तांत की गुण श्रेष्ठ होती है, रोम रहित तांत के सूत से गुण उत्तम बनती है, अथवा पके हुए बांस की छाल की दृढ़ गुण करे रेशम के सूत से बनी हुई गुण युद्ध में सब काम देती है, भादों का महीना आने पर आक की त्वचा भी गुण का काम दे सकती है, उसका वहां तथा सूत बांटकर गुण करे और क्षत्रियों को कपास मूंज भंग नाड़ी आक आदि की बनानी चाहिये॥५०-५५॥ अथ शरलक्षणानि अतः परं प्रवक्ष्यामि शराणां लक्षणं शुभम् । स्थूलं न चापि सूक्ष्मं च नापक्वं न कुभूमिजम् ॥५६॥ अब बाणों के लक्षण कहते हैं इससे आगे बाणों के शुभ लक्षण कहते हैं, न मोटे न पतले न कच्चे और न खोटी भूमि के उत्पन्न हुए सरकंडे ग्रहण करे॥५६॥ हीनग्रंथिविदीर्णं च वर्जयेदीदृशं शरम् । पूर्णग्रंथिसुपक्वं च पाण्डुरं समयाहृतम् ॥५७॥

१२ धनुर्वेदसंहिता हीन गांठवाला कुवला हुआ हो तो ऐसा शर नहीं ले पूरी गांठवाला अच्छा पका हुआ पीले रंग का समय पर ले॥५७॥ शरवंशा गृहीतव्या शरत्काले च गाधिज ॥५८॥ हे गाधिके पुत्र विश्वामित्र! वृश्चिक राशि के सूर्य मार्गशीर्ष में शर के बांस बाण बनाने को लेनी चाहिये॥५८॥ कठिनं वर्तुलं काण्डं गृह्णीयात्सुप्रदेशजम् । द्वौ हस्तौ मुष्टिहीनौ च दैर्घ्यं स्थौल्येकनिष्ठिका॥५९॥ कैड़े गोल अच्छे देश में उत्पन्न हुए शर लेवे, एक बाण दो हाथ लंबा हो, एक मुट्ठी कम अर्थात् पांच अंगुल न्यून दो हाथ लंबा एक बाण हो और कनिष्ठा (छोटी) अंगुली सा मोटा हो॥५९॥ विधेया शरमानेषु यत्नेष्वाकर्षयेत्ततः । इतने अनुमान के बाण बनावे पीछे यंत्र अर्थात् धनुष पर चढ़ावे॥ काकहंसशशादानां मत्स्यादक्रौंचकेकिनाम् । गृध्राणां कुरराणां च पक्षा एते सुशोभनाः ॥६०॥ कौवे, हंस, शशाद, बगुले, क्रौंचपक्षी, मोर, गीध, टटीहरी इनके पर बाण के बांधने में श्रेष्ठ हैं॥६०॥ षडंगुलप्रमाणेन पक्षच्छेदं च कारयेत् । दशांगुलमिताः पक्षाः शार्ङ्गिचापस्य मार्गणे ॥६१॥ योज्या दृढाश्चतुःसंख्याः सन्नद्धाः स्नायुतन्तुभिः । छः अंगुल के मान परों को काटे और शार्ङ्गधनुष पर चढ़ाने के बाण के लिये दश २ अंगुल के पर चार २ प्रत्येक बाण के खड़े तांत के तारों से वांधे॥६१॥ जैसे :- शरश्च त्रिविधो ज्ञेयः स्त्री पुमांश्च नपुंसकः ॥६२॥ अग्रस्थूलो भवेन्नारी पश्चात्स्थूलो भवेत्पुमान् ॥ समो नपुंसको ज्ञेयस्तल्लक्ष्यार्थे प्रशस्यते ॥ दूरपातो युवत्या च पुरुषो भेदयेद्दृढम् ॥६३॥ तीन प्रकारके बाण जानने चाहिये स्त्री पुरुष और नपुंसक जो आगे से भारी हो वह स्त्री बाण कहाता है, और पीछे जो भारी हो वह पुरुष,

हिन्दीटीकासमेता १३ और जो एकसार हो वह नपुंसक होता है वह नपुंसक बाण केवल निशाना सीखने के लिये ही है और जो स्त्री बाण आगे से भारी होता है, वह दूर जाकर मारता है, और जो पुरुष बाण होता है, वह दृढ़ अर्थात् (मजबूत) पदार्थ को भी छेद देता है और काट देता है॥६२-६३॥ अथ फललक्षणम् आरामुखं क्षुरप्रं च गोपुच्छं चार्द्धचन्द्रकम् ॥ सूचीमुखं च भल्लं च वत्सदंतं द्विभल्लकम् ॥६४॥ कर्णिकं काकतुण्डं च तथान्यान्यप्यनेकशः । फलानि देशभेदेन भवन्ति बहुरूपतः ॥६५॥ अब फल के लक्षण यह हैं, आरीकेसा मुखवाला १ खुरपेकासा २, गऊकी पूंछ के समान आकार वाला ३, आधे चांदक आकार ४, सुईकेसे मुखवाला ५ वरछड़ी के से मुखवाला ६, बछड़े के दांत के आकार वाला ७, दोभाल वाला ८ कर्णिक फूलकी पंखडीसा ९, कौवे की चोंच के आकार वाला १० ये दश प्रकार आकार बाण के लोहे की भाल के होते हैं और भी देश भेद से अनेक प्रकार के होते हैं॥६४-६५॥ अथैतेषां कर्माणि आरामुखेन चर्मच्छेदनम् क्षुरप्रेण बाणकर्तनम् वा बाहुक- र्तनम् गोपुच्छेन लक्ष्यसाधनम् अर्धचन्द्रेण ग्रीवामस्तकध- नुरादीनां छेदनम् सूचीमुखेन कवचभेदनम् भल्लेन हृदय- भेदनम् वत्सदन्तेन गुणचर्वणम् द्विभल्लेन बाणाव- रोधनम् कर्णिकेन लोहमयबाणानां छेदनम् काकतुण्डेन वेध्यानां वेधं कुर्यात् ॥६६॥ आरामुख से ढालछेदन, क्षुरप्रसे हाथ काटना, गोपुच्छ से निशाना मारना, अर्द्धचन्द्र से माथा गरदन बाण काटना, धनुष काटना, सूचीमुख से बस्तर छेदन, भल्ल से हृदय को फोड़ना, वत्सदन्त से धनुष की गुण काटना, द्विभल्ल से बाण रोकना, कर्णिक से लोहे के बाण काटना, काकतुण्ड से वेधन के योग्यों को वेध विचार से करे॥६६॥

१४ धनुर्वेदसंहिता अथैषां स्वरूपाणि आरामुख क्षुरप्र गोपुच्छ अर्द्धचन्द्र सूचीमुख भल्ल वत्सदन्त द्विभल्ल कर्णिक काकतुण्ड अण्य तोमर प्रास दीप्ताग्र नतपर्व झिल्लम टोप-शिरस्त्राण

हिन्दीटीकासमेता १५ अन्यद्गोपुच्छकं ज्ञेयं शुद्धकाष्ठविनिर्मितम् । मुखे च लोहकंटेन विद्धं त्र्यंगुलसंमितम् ॥६७॥ और गोपुच्छ बाण जानना शुद्ध काष्ठ का बना हुआ उसके मुख पर तीन अंगुल का लोह का कांटा विंधा हुआ होता है॥६७॥ बाणस्य फलकस्थाने (सेह) कंटकयोजनाद्गोपुच्छबाणो भवति । अनेन शराभ्यासस्तथा लक्ष्याभ्यासो वा कर्तव्यः ॥६८॥ बाण के फलक स्थान में (साई) का कांटा लगाकर गोपुच्छ बाण होता है, इससे निशाना और बाण फेंकने का अभ्यास करना चाहिये॥६८॥ अथ पायनम् इषुफलशरवशामूललेपनाद्व्रणोऽसाध्यो भवति । तच्चि- ह्नमेतत् । यस्मिञ्छरवंशासमूहे स्वातिबिन्दुर्निपतति स पीतवर्णो भवति तस्य मूले विषमुत्पद्यते तन्मूलं ग्राह्यं स च सर्वदा पवनाभावेपि कम्पते इदमेव तल्लक्ष्मेति॥६९॥ अब फलों का पायन लिखते हैं, बाण के फल पर सरकण्डे की जड़ के लेप से घाव असाध्य होता है, उसकी पहिचान यह है कि, जिस झूँडे के समूह पर स्वाति की बूँद पड़ती है, वह पीले रंग का हो जाता है, उसकी जड़ में विष उत्पन्न होता है, वह जड़ लेनी चाहिये और वह सदा पवन भी न चलता हो तो भी कांपता रहता है, यही उसका चिह्न है॥६९॥ फलस्य पायनं वक्ष्ये दिव्यौषधिविलेपनैः । येन दुर्भेद्यवर्माणि भेदने तरुपर्णवत् ॥७०॥ फलों का पायन कहेंगे, दिव्य औषधियों के लेपन से जो किसी से भी न कटे, ऐसे कवचों को वृक्ष के पत्तों की तरह काट देवे॥७०॥ पिप्पली सैंधवं कुष्ठं गोमूत्रे तु सुपेषयेत् ॥ अनेन लेपयेच्छस्त्रं लिप्तं चाग्नौ प्रतापयेत् ॥७१॥ शिखिग्रीवानुवर्णाभं तप्तपीतं तथौषधम् ।

१६ धनुर्वेदसंहिता ततस्तु विमलं तोयं पाययेच्छस्त्रमुत्तमम् ॥७२॥ पीपल, सेंधानमक, कूठ, इन तीनों को गोमूत्र में अच्छी पीसे, फिर इससे शस्त्र को लीपे पीछे उसको अग्नि में तपावे, वह मोर की गरदन के सदृश नीला हो जाय तपाने से औषधि को पी जाय पीछे स्वच्छ जल में बुझा दे॥७१-७२॥ अथ नाराचनालीकशतघ्नीनां च वर्णनम् । सर्वलोहास्तु ये बाणा नाराचास्ते प्रकीर्तिताः । पञ्चभिः पृथुलैः पक्षैर्युक्ताः सिद्धयंति कस्यचित् ॥७३॥ अथ नाराच और नालीक और शतघ्नी का वर्णन करते हैं, जो बाण सब लोह के होते हैं वे नाराच कहे हैं, वे पांच मोटे पर बांधने से किसी को सिद्ध होते हैं॥७३॥ नालीका लघवो बाणा नलयंत्रेण नोदिताः । अत्युच्चदूरपातेषु दुर्गयुद्धेषु ते मताः ॥७४॥ जो कि नलयंत्र से फेंके जाते हैं, छोटे छोटे बाण कहाते हैं उनका नाम नालीक है अर्थात् गोली का नाम नालीक बाण हैं, और नलयंत्र नाम बन्दूक का है, सो बहुत ऊंचे और दूर फेंकने में तथा गढ़युद्ध में काम आते हैं ॥७४॥ सिंहासनस्य रक्षार्थं शतघ्नीः स्थापयेद्गढे । रंजकं बहुलं तत्र स्थाप्यं च बहु धीमता ॥७५॥ तख्तकी रक्षा के लिये गढ़ में तोपें स्थापन करे और बहुत सी बारूद और गोले गोली भी स्थापन करे॥७५॥ अथ स्थानमुष्टचाकर्षणलक्षणम् स्थानान्यष्टौ विधेयानि योजने भिन्नकर्मणाम् । मुष्टयः पंच समाख्याता व्यायाः पञ्च प्रकीर्तिताः ॥७६॥ इनके अनन्तर स्थान मुष्टि आकर्षण के लक्षण कहते हैं, अलग अलग काम में बाण प्रयोग करने के लिये स्थान आठ प्रकारके करने और पांच प्रकार की मुट्टी कही है, तथा पांच प्रकार के व्याय कहे हैं॥७६॥

हिन्दीटीकासमेता १७ अग्रतो वामपादश्च दक्षिणे चानुकुञ्चितम् । प्रत्यालीढं प्रकर्तव्यं हस्तद्वयसविस्तरम् ॥७७॥ बायां पैर आगे और दाहिना पीछे सुकड़ा हुआ यह दो हाथ की प्रत्यालीढ गति कहाती है॥७७॥ आलीढे तु प्रकर्तव्यं सव्यं चैवानुकुञ्चितम् । दक्षिणन्तु पुरस्ताद्वा दूरपाते विशिष्यते ॥७८॥ आलीढ गति में धनुषधारी को बायां पैर सकोड़ना, और दाहिना आगे कर बाण फेंके तो बाण दूर जाय॥७८॥ पादौ सविस्तरौ कार्यों समौ हस्तप्रमाणतः । विशाखस्थानकं ज्ञेयं कूटलक्ष्यस्य वेधने ॥७९॥ एक हाथ के प्रमाण से पैरों को विस्तार के साथ करे, उसका नाम विशाख गति है, कूटलक्ष्य के वेधने में इसका उपयोग होता है॥७९॥ समपादैः समौ पादौ निष्कम्पौ च सुसंगतौ । असमे च पुरो वामे हस्तमात्रनतं वपुः ॥८०॥ समपादों से बराबर दोनों पैर बिना ही लिये खड़ा हो बाण फेंके, और असमगति में आगे बायां पैर एक हाथ आगे रहे और शरीर झुका हुआ॥८०॥ आकुञ्चितोरुद्वौ यत्र जानुभ्यां धरणीं गतौ । दर्दुरक्रममित्याहुः स्थानकं दृढभेदने ॥८१॥ जहां दोनों ऊरू सिकोड़ कर जानुओं को धरती पर टेके, वह दर्दुरक्रम कहा है। दृढ़स्थान को भेद करने के लिये॥८१॥ सव्यं जानु गतं भूमौ दक्षिणं च सुकुञ्चितम् । अग्रतो यत्र दातव्यं तं विद्याद्गरुडक्रमम् ॥८२॥ बायां तो पृथिवी पर हो और दंहिना सुकड़ा हुआ हो, आगे से जो दे उसको गरुड़क्रम जानना॥८२॥ पद्मासनं प्रसिद्धन्तु उपविश्य यथाक्रमम् । धन्विनां तत्तु विज्ञेयं स्थानकं शुभलक्षणम् ॥८३॥ पद्मासन प्रसिद्ध है, इसका जैसा क्रम है वैसे बैठकर बाण मारे, ३

१८ धनुर्वेदसंहिता धनुषधारी को जानना चाहिये, यह शुभलक्षण वाला स्थानक है॥८३॥ अथ गुणमुष्टयः पताका वज्रमुष्टिश्च सिंहकर्णस्तथैव च । मत्सरी काकतुण्डी च योजनीया यथाक्रमम् ॥८४॥ अब गुणकी मुष्टि कहते हैं, पताका, वज्रमुष्टि, सिंहकर्ण, मत्सरी और काकतुण्डी ये पांच प्रकार गुण के हैं॥८४॥ दीर्घा तु तर्जनी यत्र ह्याश्रितोऽङ्गुष्ठमूलकम् । पताका सा च विज्ञेया नलिकादूरमोक्षणे ॥८५॥ जहां तर्जनी दीर्घ की जाय और अँगुठे को जड़ के पास हो, वह पताका जाननी, यह नलिका नाम वाण जिसमें रंजक और लोहकण भरे हों, उसके छोड़ने के लिये है॥८५॥ तर्जनीमध्यमामध्यमंगुष्ठो विशते यदि । वज्रमुष्टिस्तु सा ज्ञेया स्थले नाराचमोक्षणे ॥८६॥ तर्जनी और मध्यमा के बीच में यदि अँगूठा प्रवेश हो, वह वज्रमुष्टि जाननी, मोटा लोह का वाण छोड़ने के लिये इसका उपयोग करना॥८६॥ अंगुष्ठमध्यदेशन्तु तर्जन्यग्रं सुसंस्थितम् । सिंहकर्णः स विज्ञेयो दृढलक्ष्यस्य वेधने ॥८७॥ अँगूठे के बीच में तर्जनी का अग्र रखे, वह सिंहकर्ण जानना, दृढ़ लक्ष्य के वेधने में उपयोगी है॥८७॥ अंगुष्ठनखमूले तु तर्जन्यग्रं च संस्थितम् । मत्सरी सा च विज्ञेया चित्रलक्ष्यस्य वेधने ॥८८॥ अँगूठे के नख की जड़ में तर्जनी का अग्रभाग धरे; वह मत्सरी जाननी, चित्रकारी के निशाने के वेधने में यह उपयोगी है॥८८॥