भारतकोश
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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

काण्ड ] चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन तथा अठारह विद्याओंके नाम १४३


अष्टनागदेवकी पूजा करके प्राणी सर्पदंशसे मुक्त हो जाता है। ब्रह्माकी पूजा करके ब्रह्मलोकका पुण्य अर्जित करना चाहिये।

भगवान् बलभद्रकी सम्यक् पूजा करके शक्ति और आरोग्य तथा सुभद्रादेवीकी विधिवत् पूजा करके परम सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। भगवान् पुरुषोत्तम जगन्नाथकी पूजा करनेसे सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति होती है। भगवान् नारायणकी पूजा करके वह मनुष्योंका अधिपति होता है।

नृसिंहदेवके चरणोंका स्पर्श एवं नमन करके मनुष्य संग्राममें विजयी होता है। वराहदेवकी पूजा करके वह पृथिवीका राज्य प्राप्त करता है तथा मालाधर एवं विद्याधरका स्पर्श करके विद्याधरोंके पदको प्राप्त कर लेता है।

भगवान् आदिगदाधरकी सम्यक् पूजा करके प्राणी समस्त अभिलाषाओंको पूर्ण कर लेता है। भगवान् सोमनाथकी पूजासे शिवलोकको प्राप्त करता है। रुद्रदेवको नमस्कार करके रुद्रलोकमें प्रतिष्ठापित होता है।

रामेश्वर-शिवको प्रणाम करके मनुष्यको रामके समान अतिशय प्रिय बनना चाहिये। भगवान् ब्रह्मोश्वरकी पूजा करके ब्रह्मलोक-प्राप्तिकी योग्यता प्राप्त करनी चाहिये। कालेश्वरकी भलीभाँति पूजा करके कालजयी बनना चाहिये। केदारनाथकी पूजा करके शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करनी चाहिये और भगवान् सिद्धेश्वरकी पूजा करके मनुष्यको ब्रह्मलोक प्राप्त करना चाहिये।

आद्यदेव रुद्र आदिके साथ भगवान् आदिगदाधर विष्णुका दर्शन करके अपने सौ कुलोंका उद्धार कर उन्हें ब्रह्मलोक प्राप्त कराये। आदिगदाधरकी पूजासे धर्मार्थी धर्मको, धनार्थी धनको, कामार्थी कामको तथा मोक्षार्थी मोक्षको प्राप्त करता है। इनकी पूजासे राज्य चाहनेवाला पुरुष राज्य और शान्तिका इच्छुक शान्ति प्राप्त कर लेता है। सब प्रकारकी कामना करनेवाला सब कुछ प्राप्त कर लेता है। इन भगवान् आदिगदाधरकी अर्चनासे पुत्रकी कामना करनेवाली स्त्रीको पुत्र, सौभाग्य चाहनेवालीको सौभाग्य तथा वंशाभिवृद्धिकी इच्छुक स्त्रीको वंशाभिवृद्धिका पुण्य प्राप्त करना चाहिये। मनुष्य श्राद्ध, पिण्डदान, अन्नदान और जलदानके द्वारा भगवान् गदाधरदेवकी विधिवत् पूजा करके ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। पृथिवीपर अवस्थित सभी तीर्थोंकी अपेक्षा जिस प्रकार गयापुरी श्रेष्ठ है, उसी प्रकार शिलाके रूपमें विराजमान गदाधर श्रेष्ठ हैं। उनकी मूर्तिका दर्शन करनेसे सम्पूर्ण शिलाका दर्शन हो जाता है; क्योंकि सब कुछ तो भगवान् गदाधर विष्णु ही हैं—

श्राद्धेन पिण्डदानेन अन्नदानेन वारिदः॥
ब्रह्मलोकमवाप्नोति सम्पूज्यादिगदाधरम्।
पृथिव्यां सर्वतीर्थेभ्यो यथा श्रेष्ठा गयापुरी॥
तथा शिलारूपश्च श्रेष्ठश्चैव गदाधरः।
तस्मिन् दृष्टे शिला दृष्टा यतः सर्वं गदाधरः॥
(८६। ३८-४०)
(अध्याय ८६)


चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन तथा अठारह विद्याओंके नाम

श्रीहरिने कहा— हे रुद्र! अब मैं चौदह मनु और उनके पुत्रोंका वर्णन करूँगा। पूर्वकालमें सर्वप्रथम स्वायम्भुव मनु हुए। उनके अग्नीध्र आदि अनेक पुत्र थे। मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु तथा वसिष्ठ—ये इस मन्वन्तरके सात ऋषि (सप्तर्षि) कहे गये हैं। इस मन्वन्तरमें जय, अमित, शुक्र एवं याम नामक (देवताओंके) बारह गण थे, जिनमें चार सोमपायी थे। इसीमें

१४४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

विश्वभुक् और वामदेव इन्द्रपदसे प्रसिद्ध हुए। वाष्कलि नामक दैत्य उनका शत्रु था, वह भगवान् विष्णुके द्वारा चक्रसे मारा गया।

तदनन्तर स्वारोचिष मनुका प्रादुर्भाव हुआ। उनके चैत्रक, विनत, कर्णान्त, विद्युत्, रवि, बृहद्गुण और नभ नामसे विख्यात महाबली मण्डलेश्वर एवं पराक्रमशाली पुत्र हुए थे। ऊर्ज, स्तम्ब, प्राण, ऋषभ, निश्चल, दत्तोति और अर्वरीवान्—ये सात ऋषि सप्तर्षिरूपमें प्रसिद्ध हुए। इस मन्वन्तरमें द्वादश तुषित और पारावतदेवगण हुए। विपश्चित् नामक इन्द्र थे। उनका शत्रु पुरुकुत्सर नामक दैत्य था। मधुसूदन भगवान् विष्णुने हाथीका रूप धारण करके उसे मारा था।

हे रुद्र! स्वारोचिष मनुके पश्चात् औत्तम मनु हुए। इस मनुके अज, परशु, विनीत, सुकेतु, सुमित्र, सुबल, शुचि, देव, देवावृध, महोत्साह और अजित नामक पुत्र थे। इस मन्वन्तरमें रथौजा, ऊर्ध्वबाहु, शरण, अनघ, मुनि, सुतप और शंकु—ये सप्तर्षि हुए। वशवर्ति, स्वधाम, शिव, सत्य तथा प्रतर्दन नामके पाँच देवगण हुए। इन सभी देवगणोंके प्रत्येक गणमें बारह देवता थे। स्वशान्ति नामक इन्द्र हुए, जिनका शत्रु प्रलम्बासुर दैत्य था। भगवान् विष्णुने मत्स्यावतार धारण करके उस दैत्यका वध किया।

उस मनुके बाद तामस मनु हुए। उनके जानुजङ्घ, निर्भय, नवख्याति, नय, विप्रभृत्य, विविक्षिप, दृढेषुधि, प्रस्तलाक्ष, कृतबन्धु, कृत, ज्योतिर्धाम, पृथु, काव्य, चैत्र, चेताग्नि और हेमक नामक पुत्र थे। इस मन्वन्तरमें सुरागा तथा सुधी आदि सात ऋषि कहे गये हैं। इसमें हरि आदि देवताओंके चार गण थे, प्रत्येकमें पचीस देवता हुए। उसी गणमें शिवि इन्द्र हुए। उनका शत्रु भीमरथ नामक असुर हुआ। भगवान् विष्णुने कूर्मावतार लेकर उसका वध किया।

तदनन्तर रैवत मनुका आविर्भाव हुआ। उनके महाप्राण, साधक, वनबन्धु (वलबन्धु), निरमित्र, प्रत्यङ्ग, परहा, शुचि, दृढ़व्रत और केतुशृंग नामक ऋषि कहे गये हैं। इस मन्वन्तरमें वेदश्री, वेदबाहु, ऊर्ध्वबाहु, हिरण्यरोम, पर्जन्य, सत्यनेत्र और स्वधाम—ये सात ऋषि हुए। इस मन्वन्तरमें अभूतरजस्, अश्वमेधस्, वैकुण्ठ तथा अमृत नामक चार देवगण हुए, जिनमें चौदह देव हुए। विभु नामक इन्द्र हुए। उनका शत्रु शान्त नामक दैत्य था। भगवान् विष्णुने हंसरूप धारण करके उसका विनाश किया।

इसके बाद चाक्षुष मनुका प्रादुर्भाव हुआ। इनके ऊरु, पूरु, महाबल, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यबाहु, कृति, अग्निष्णु, अतिरात्र, सुद्युम्न तथा नर नामक पुत्र हुए। हविष्मान्, उत्तम, स्वधामा, विरज, अभिमान, सहिष्णु तथा मधुश्री नामक—ये सात ऋषि हुए। आर्य, प्रभूत, भव्य, लेख और पृथुक नामवाले पाँच गणोंमें आठ-आठ देवता कहे गये हैं। इस मन्वन्तरके इन्द्र मनोजव थे, उनका शत्रु महान् भुजाओंवाला महाबली महाकाल कहा गया है। जगदाधार भगवान् विष्णुने अश्वरूप धारण करके उसका वध किया था।

तत्पश्चात् वैवस्वत मनु हुए। उनके इक्ष्वाकु, नाभाग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, पांसु, नभ, नेदिष्ठ, करूष, पृषध्र और सुद्युम्न नामक विष्णुपरायण पुत्र हुए। इस मन्वन्तरमें अत्रि, वसिष्ठ, जमदग्नि, कश्यप, गौतम, भरद्वाज तथा विश्वामित्र नामक सात ऋषि (सप्तर्षि) कहे गये हैं। इसमें उनचास मरुद्गण, द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र, साध्यगण आठ वसु, अश्विनीकुमारद्वय, दस विश्वेदेव, दस आंगिरसदेव तथा नौ देवगण कहे गये हैं। इस मनुके समयमें तेजस्वी नामक इन्द्र हैं। उनका शत्रु हिरण्याक्ष माना गया है। भगवान् विष्णुने वराह

७१- प्रम्लोचा नामक अप्सराकी दिव्य कन्या मानिनीसे प्रजापति रुचिका विवाह

काण्ड ] चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन तथा अठारह विद्याओंके नाम १४५

अवतार धारण करके उस दैत्यका विनाश किया था।

अब मैं भविष्यमें होनेवाले सावणि मनुके पुत्रोंका वर्णन कर रहा हूँ। उन मनुके विजय, आर्ववीर, निर्मोह, सत्यवाक्, कृति, वरिष्ठ, गरिष्ठ, वाच, संगति नामक पुत्र होंगे। इस मन्वन्तरमें अश्वत्थामा, कृपाचार्य, व्यास, गालव, दीप्तिमान्, ऋष्यशृंग और परशुराम—ये सात ऋषि कहे गये हैं। सुतपा, अमिताभ तथा मुख्य नामक तीन देवगण हैं, जिनके प्रत्येक गणमें बीस-बीस देव माने गये हैं। विरोचन-पुत्र बलि इन्द्र होंगे, जो वामनरूपधारी भगवान् विष्णुके द्वारा याचित तीन पग भूमिदान देनेसे ऐश्वर्यसम्पन्न इन्द्रपदको छोड़कर सिद्धि प्राप्त करेंगे।

हे ब्रह्मा ! नवें वरुणपुत्र दक्षसावर्णि मनुके पुत्रोंको सुनें। धृतिकेतु, दीप्तिकेतु, पञ्चहस्त, निरामय, पृथुश्रवा, बृहद्द्युम्न, ऋचीक तथा बृहद्गुण नामके पुत्र हुए। इस मन्वन्तरमें मेधातिथि, द्युति, सवस, वसु, ज्योतिष्मान् हव्य और कव्य तथा विभु—ये सप्तर्षि हुए। पर, मरीचिगर्भ तथा सुधर्मा—ये तीन देवता हुए। इस मन्वन्तरमें कालकाक्ष नामक देवशत्रु हुआ, जिसका वध पद्मनाभ विष्णुने किया था।

दसवें मनु (धर्म)-के पुत्र धर्मसावर्णिके पुत्रोंको सुनो—सुक्षेत्र, उत्तमौजा, भूरिश्रेण्य, शतानीक, निरमित्र, वृषसेन, जयद्रथ, भूरिद्युम्न, सुवर्चा, शान्ति एवं इन्द्र नामक महाप्रतापी पुत्र थे। इस मन्वन्तरमें अयोमूर्ति, हविष्मान्, सुकृति, अव्यय, नाभाग, अप्रतिमौजा और सौरभ नामक सप्तर्षि हुए। इसमें देवताओंके प्राण नामके एक सौ गण विद्यमान थे। उन गणोंके इन्द्र महाबलशाली शान्त नामक देवपुरुष थे। उनका शत्रु बलि नामक असुर होगा। भगवान् विष्णु अपनी गदासे उसका वध करेंगे।

हे रुद्र ! अब मैं आपके पुत्र एकादश मनु (रुद्रसावर्णि)-की संतानोंका वर्णन करता हूँ। इनके सर्वत्रग, सुशर्मा, देवानीक, पुरु, गुरु, क्षेत्रवर्ण, दृढेषु, आर्द्रक तथा पुत्र नामक पुत्र होंगे। इस मन्वन्तरमें हविष्मान्, हविष्य, वरुण, विश्व, विस्तर, विष्णु और अग्नितेज नामक सप्तर्षि कहे गये हैं और इसमें विहङ्गम, कामगम, निर्माण तथा रुचि नामक चार देवगण हुए। एक-एक गणमें तीस-तीस देवता कहे गये हैं। उन समस्त देवगणोंके इन्द्र वृषभ हुए; जिनका शत्रु दशग्रीव नामक राक्षस होगा। लक्ष्मीका रूप धारण करके विष्णु उसका विनाश करेंगे।

इसके पश्चात् दक्षके पुत्र दक्षसावर्णि बारहवें मनु हुए। उनके पुत्रोंका वर्णन सुनें—इन मनुके देववान्, उपदेव, देवश्रेष्ठ, विदूरथ, मित्रवान्, मित्रदेव, मित्रबिन्दु, वीर्यवान्, मित्रवाह, प्रवाह नामक पुत्र हैं। इस मन्वन्तरमें तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्ति, तपोरति, तपोघृति, द्युति तथा तपोधन नामसे विख्यात सप्तर्षि हुए। स्वधर्मा, सुतपस, हरित और रोहित नामक देव सुरगण हैं। उनके प्रत्येक गणोंमें दस-दस देव हुए। हे शिव ! इस मन्वन्तरमें ऋतधामा नामके इन्द्र होंगे। उनका शत्रु तारकासुर होगा। विष्णु नपुंसकस्वरूप धारण करके उसका वध करेंगे।

तदनन्तर रौच्य नामक त्रयोदश मनुके पुत्रोंको मुझसे सुनें। इन मनुके चित्रसेन, विचित्र, तप, धर्मरत, धृति, सुनेत्र, क्षेत्रवृत्ति तथा सुनय नामक पुत्र कहे गये हैं। इस मन्वन्तरमें धर्म, धृतिमान्, अव्यय, निशारूप, निरुत्सक, निर्मोह और तत्त्वदर्शी नामक सप्तर्षि कहे गये हैं। इस मन्वन्तरमें सुरोम, सुधर्म तथा सुकर्म—तीन देवगणोंका उद्भव हुआ। इन सभी गणोंमें तैंतीस-तैंतीस देवगण कहे गये हैं। इन देवगणोंका इन्द्र दिवस्पति और शत्रु त्वष्टिभ नामक दानव था। भगवान् विष्णु मयूरका स्वरूप

७२- भगवान् विष्णुका अमूर्त ध्यानस्वरूप

१४६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

धारण करके उस दैत्यका वध करेंगे।

हे शिव! अब मेरे पुत्र चौदहवें मनु भौत्यके पुत्रोंका श्रवण करें—इन मनुके ऊरु, गभीर, धृष्ट, तरस्वी, ग्राह, अभिमानी, प्रवीर, जिष्णु, संक्रन्दन, तेजस्वी तथा दुर्लभ नामक पुत्र होंगे। इस मन्वन्तरमें अग्नीध्र, अग्निबाहु, मागध, शुचि, अजित, मुक्त और शुक्र—ये सप्तर्षि होंगे। इस मन्वन्तरमें चाक्षुष, कर्मनिष्ठ, पवित्र, भ्राजिन तथा वचोवृद्ध नामक पाँच देवगणोंके प्रत्येक गणको सात-सात देवगणोंसे समन्वित कहा गया है। इस मन्वन्तरमें शुचि नामसे प्रसिद्ध इन्द्र होंगे तथा महादैत्य उनका शत्रु होगा। स्वयं भगवान् विष्णु ही उस महादानवका वध करेंगे।

उन्हीं भगवान् विष्णुने व्यासरूपमें अवतरित होकर एक ही वेदसंहिताको चतुर्धा विभाजित किया। तदनन्तर अठारह पुराणोंका प्रणयन किया। उन्होंने ही चारों वेद, छः वेदाङ्ग और मीमांसा, न्याय, पुराण, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, अर्थवेद, धनुर्वेद और गन्धर्ववेद—इन अष्टादश विद्याओंका विस्तार किया।
(अध्याय ८७)

प्रजापति रुचि और उनके पितरोंका संवाद

**सूतजीने कहा—**भगवान् हरिने ब्रह्मा और भगवान् शिवको चौदह मन्वन्तरोंका जो वर्णन सुनाया था, मैंने आपको वह सुना दिया। अब मार्कण्डेयजीने क्रौष्टुकि मुनिको जो पितृस्तोत्र सुनाया था, वह आप सभीको सुना रहा हूँ। आप सब उसे श्रवण करें।

**मार्कण्डेयजीने कहा—**प्राचीनकालमें रुचि नामक प्रजापति मायामोहको छोड़कर, निर्भय होकर, स्वल्प शयन करते हुए निरहंकारभावसे इस पृथिवीपर विचरण करने लगे। उन्होंने अग्निहोत्रका परित्याग कर दिया। घरमें रहना छोड़ दिया। वे एक बार भोजन करते और गृहस्थादिक आश्रमके नियमोंसे रहित हो संगरहित होकर इधर-उधर अकेले ही विचरण करते थे। उन्हें देखकर उनके पितृजनोंने उनसे कहा—

हे वत्स! तुमने किस कारण दार-परिग्रह (विवाह) नहीं किया। यह दार-परिग्रह स्वर्ग एवं मोक्ष-प्राप्तिका हेतु है। गृहस्थाश्रमके बिना प्राणीको शाश्वत बन्धन होता है; क्योंकि गृहस्थ समस्त देवताओं, पितरों, ऋषियों और याचकोंकी पूजा करके उत्तम लोकोंको प्राप्त करता है। वह देवताओंको स्वाहा एवं पितरोंको स्वधा शब्दके उच्चारणसे तथा अतिथि एवं भृत्यादि जनोंको अन्न-दानसे संतुष्ट करता है। ऐसा न करके तुम देवऋण और हम सभी पितृजनोंके ऋणसे आबद्ध हो। मनुष्य, ऋषि एवं अन्य प्राणिजनोंके लिये भी तुम प्रतिदिन ऋणी ही हो रहे हो। पुत्रोत्पत्ति, देव-पूजा तथा पितृतर्पण तथा संन्यासग्रहण किये बिना ही तुम कैसे उस स्वर्ग-प्राप्तिकी इच्छा कर रहे हो।

हे पुत्र! इस अन्यायसे तुमको मात्र कष्ट ही प्राप्त होगा। इससे तो मरनेके बाद तुम्हें नरककी प्राप्ति होगी और दूसरे जन्ममें भी क्लेश ही होगा।

**रुचिने पितृजनोंसे कहा—**जीवनमें परिग्रह (ग्रहण करना) अत्यन्त दुःख-भोग, पाप-संग्रह एवं अन्तकालमें अधोगति प्रदान करनेके लिये होता है। ऐसा विचार करके ही मैंने स्त्रीपरिग्रह (विवाह) नहीं किया है। क्षणमात्र विचार करनेसे ही अपने अन्तःकरणमें विद्यमान संशय—संदेहको दूर करनेका उपाय किया जा सकता है। परिग्रह उस मुक्तिका कारण नहीं हो सकता है। जो

७३- भगवान् विष्णुका मूर्त ध्यानस्वरूप

काण्ड ] प्रजापति रुचि और उनके पितरोंका संवाद १४७

निष्परिग्रह-व्यक्ति प्रतिदिन विद्याके सद्-ज्ञानोपार्जनरूपी जलद्वारा अपने आत्माको निर्मल करता है, मेरे लिये तो वही श्रेष्ठ है। विद्वानोंने अनेक प्रकारके सांसारिक कर्मरूपी पंकिलचिह्नोंका वर्णन किया है। अतएव जितेन्द्रिय पुरुषोंको तत्त्वज्ञानरूपी जलसे आत्माका प्रक्षालन करना चाहिये।

पितरोंने कहा—‘हे वत्स! जितेन्द्रियजनोंके द्वारा आत्माका प्रक्षालन करना चाहिये’—ऐसा तुम्हारा कहना उचित ही है, किंतु यह कल्याणका मार्ग नहीं है, जिसके ऊपर तुम चल रहे हो।

पञ्चयज्ञ, तप तथा दानके द्वारा अपने अमङ्गलको दूर करते हुए फलप्राप्तिकी कामनासे रहित किये हुए जो शुभ और अशुभ कर्म हैं, वे बन्धनके हेतु नहीं होते और जो पूर्वका कर्म है, वह भोगसे नष्ट होता है।

प्रारब्धका जो पुण्यापुण्य कर्म है, वह सुख-दुःखात्मक भोग भोगनेसे निरन्तर नष्ट होता रहता है। इस प्रकार विद्वज्जनोंके द्वारा अपनी आत्माका प्रक्षालन होता रहता है और कर्मबन्धनसे उसकी रक्षा की जाती है। अपने विवेकसे रक्षित आत्मा पापरूपी पंकसे लिप्त नहीं होता।

रुचिने कहा—हे पितामह आदि पितृगण! वेदमें कर्म-मार्गके प्रतिपादनके द्वारा अविद्या-मायाकी परिपुष्टि की गयी है। इसलिये आप सब कैसे मुझे उसी मार्गमें चलनेके लिये प्रवृत्त कर रहे हैं।

पितरोंने कहा—‘कर्मके द्वारा जो कुछ किया जाता है, वह सब अविद्या है’—ऐसा जो तुम्हारा कहना है, वह असत्य वचन नहीं है; किंतु विद्याकी सम्यक्-प्राप्तिमें भी तो कर्म ही हेतु है। शास्त्र-प्रतिपादित जो विहित कर्म हैं, सज्जन पुरुष उनका उल्लंघन नहीं करते। उन्हें उसीसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। विहित कर्मका अनुष्ठान न करना अधोगति-प्रदायक है। हे वत्स! ‘मैं अपरिग्रहादिके द्वारा आत्मप्रक्षालन कर रहा हूँ!’, ऐसा तुम उचित मानते हो, किंतु शास्त्रविहित कर्मोंका अनुष्ठान न करनेसे उत्पन्न पापोंके द्वारा भी तुम स्वयं अपनेको जला रहे हो।

अविद्या भी विषके समान मनुष्योंका उपकार करनेके लिये ही होती है। जिस प्रकार विषका यथोचित उपयोग करनेसे प्राणीका कल्याण होता है, उसी प्रकार समुचित रूपसे अविद्यारूप विहित कर्मका अनुष्ठान करनेसे कर्ताका हित ही होगा! वह भवबन्धनके लिये नहीं, अपितु मोक्षके लिये है।

हे पुत्र! इस कारण तुम विधिपूर्वक दार-परिग्रह अर्थात् अपना विवाह करो। लौकिक कर्मोंका सम्यक् रीतिसे अनुष्ठान न करनेसे तुम आजन्म विफलताको ही प्राप्त करोगे।

रुचिने कहा—हे पितृगण! अब तो मैं वृद्ध हो गया हूँ। कौन मुझे अपनी कन्या प्रदान करेगा? वैसे भी मुझ-जैसे अकिञ्चन व्यक्तिके लिये दार-परिग्रह अर्थात् विवाह करना अत्यन्त कष्टसाध्य है।

१४८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-
पितरोंने कहा—हे वत्स! यदि तुम हमारे वचनका अनुपालन नहीं करते हो तो निश्चित ही हम सभी पितरोंका पतन होगा और तुम्हारी अधोगति होगी।हे मुनिश्रेष्ठ! ऐसा कहकर उस प्रजापति रुचिके सभी पितृगण देखते-ही-देखते वायुवेगके झोंकोंसे बुझे हुए दीपकोंके समान सहसा अदृश्य हो गये।<br>(अध्याय ८८)

रुचिद्वारा की गयी पितृस्तुति तथा श्राद्धमें इस पितृस्तुतिके पाठका माहात्म्य

पितृजनोंके द्वारा उस प्रकारके वाक्यको सुनकर वे ब्रह्मर्षि रुचि मन-ही-मन अत्यधिक व्याकुल हो उठे और कन्या प्राप्त करनेकी इच्छासे पृथिवीलोकमें विचरने लगे, किंतु उन्हें कोई कन्या प्राप्त न हो सकी। अतएव पितरोंके उक्त वचनरूपी अग्निसे संतप्त हुए वे अतिशय चिन्ताग्रस्त होकर व्यग्र-मनसे इस प्रकार सोचने लगे—

‘मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे पितृगणोंका और मेरा अभ्युदय करनेवाला वह स्त्री-परिग्रह (विवाह-संस्कार) किस प्रकार हो सकेगा?’

इस प्रकार चिन्तन करते हुए उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं कमलयोनि उन ब्रह्माको ही तपस्याके द्वारा प्रसन्न करता हूँ। तदनन्तर महात्मा रुचिने सौ दिव्य वर्षोंतक कठिन तप किया। वे तपस्याके लिये वनमें एक ही स्थानपर चिरकालतक अवस्थित रहे।

तत्पश्चात् जगत्पितामह ब्रह्माने दर्शन दिया और कहा कि मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम अपनी अभिलाषा प्रकट करो। तदनन्तर सम्पूर्ण संसारको गति प्रदान करनेवाले उन आराध्य-देव ब्रह्माको प्रणाम करके रुचिने पितृजनोंके कथनानुसार जो-जो उनकी अभिलाषा थी। उनसे निवेदन किया।

इसपर ब्रह्माजीने कहा—हे विप्र! तुम प्रजापति होओगे। तुम्हारे द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि होगी। प्रजारूपी पुत्रोंकी उत्पत्ति करके ही तुम पितृजनोंके लिये श्राद्ध एवं पिण्डदानादिको सम्पन्न करनेके पश्चात् साधिकार उक्त कामनाकी सिद्धि प्राप्त कर सकोगे। अतः तुम्हारे पितरोंके द्वारा उचित ही कहा गया है कि ‘तुम स्त्री-परिग्रह करो।’ इस अभिलाषाको भलीभाँति ध्यानमें रखते हुए तुम्हें पितरोंकी ही पूजा करनी चाहिये। प्रसन्न होकर वे ही पितृगण तुम्हारी इस कामनाको पूर्ण करेंगे। सम्यक् पूजासे संतुष्ट हुए पितामहादि पितृगण स्त्री-पुत्र आदि क्या नहीं दे सकते।

ब्रह्माजीका इस प्रकारका वचन सुनकर ऋषि रुचिने नदीके एकान्त तटपर पहुँच करके अपने

७५- वर्णधर्म-निरूपण

काण्ड ]
रुचिद्वारा की गयी पितृस्तुति तथा श्राद्धमें इस पितृस्तुतिके पाठका माहात्म्य
१४१


पितरोंका तर्पणकर उन्हें संतृप्त किया। तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर भक्तिपूर्वक वे इन स्तुतियोंके द्वारा पितरोंकी आराधना करने लगे*—
रुचि बोले—जो अधिदेवताके रूपमें विद्यमान

* रुचिरुवाच

नमस्येऽहं पितॄन् भक्त्या ये वसन्त्यधिदैवतम् । देवैरपि हि तर्प्यन्ते ये श्राद्धेषु स्वधोत्तरैः ॥
नमस्येऽहं पितॄन् स्वर्गे ये तर्प्यन्ते महर्षिभिः । श्राद्धैर्मनोमयैर्भक्त्या भुक्तिमुक्तिमभीप्सुभिः ॥
नमस्येऽहं पितॄन् स्वर्गे सिद्धाः संतर्पयन्ति यान् । श्राद्धेषु दिव्यैः सकलैरुपहारैरनुत्तमैः ॥
नमस्येऽहं पितॄन् भक्त्या येऽर्च्यन्ते गुह्यकैर्दिवि । तन्मयत्वेन वाञ्छद्भिर्ऋद्धिमत्यान्तिकीं पराम् ॥
नमस्येऽहं पितॄन् मर्त्यैरर्च्यन्ते भुवि ये सदा । श्राद्धेषु श्रद्धयाभीष्टलोकपुष्टिप्रदायिनः ॥
नमस्येऽहं पितॄन् विप्रैरर्च्यन्ते भुवि ये सदा । वाञ्छिताभीष्टलाभाय प्राजापत्यप्रदायिनः ॥
नमस्येऽहं पितॄन् ये वै तर्प्यन्तेऽरण्यवासिभिः । वन्यैः श्राद्धैर्यताहारैस्तपोनिर्धूतकल्मषैः ॥
नमस्येऽहं पितॄन् विप्रैर्नैष्ठिकैर्धर्मचारिभिः । ये संयतात्मभिर्नित्यं संतर्प्यन्ते समाधिभिः ॥
नमस्येऽहं पितॄञ्छ्राद्धे राजन्यैस्तर्पयन्ति यान् । कव्यैरशेषैर्विधिवल्लोकद्वयफलप्रदान् ॥
नमस्येऽहं पितॄन् वैश्यैरर्च्यन्ते भुवि ये सदा । स्वकर्माभिरतैर्नित्यं पुष्पधूपान्नवारिभिः ॥
नमस्येऽहं पितॄञ्छ्राद्धे शूद्रैरपि च भक्तितः । संतर्प्यन्ते जगत्कृत्स्नं नाम्ना ख्याताः सुकालिनः ॥
नमस्येऽहं पितॄञ्छ्राद्धे पाताले ये महासुरैः । संतर्प्यन्ते सुधाहारास्त्यक्तदम्भमदैः सदा ॥
नमस्येऽहं पितॄञ्छ्राद्धैरर्च्यन्ते ये रसातले । भोगैरशेषैर्विधिवन्नागैः कामानभीप्सुभिः ॥
नमस्येऽहं पितॄञ्छ्राद्धैः सर्पैः संतर्पितान् सदा । तत्रैव विधिवन्मन्त्रभोगसम्पत्सन्वितैः ॥
पितॄन्नमस्ये निवसन्ति साक्षाद्ये देवलोकेऽथ महीतले वा । तथान्तरिक्षे च सुरारिपूज्यास्ते वै प्रतीच्छन्तु मयोपनीतम् ॥
पितॄन्नमस्ये परमार्थभूता ये वै विमाने निवसन्त्यमूर्ताः । यजन्ति यानस्तमलैर्मनोभिर्योगिश्वराः क्लेशविमुक्तिहेतून् ॥
पितॄन्नमस्ये दिवि ये च मूर्ताः स्वधाभुजः काम्यफलाभिसन्धौ । प्रदानशक्ताः सकलेप्सितानां विमुक्तिदा येऽनभिसंहितेषु ॥
तृप्यन्तु तेऽस्मिन्पितरः समस्ता इच्छावतां ये प्रदिशन्ति कामान् । सुरत्वमिन्द्रत्वमितोऽधिकं वा गजाश्वरत्नानि महागृहाणि ॥
सोमस्य ये रश्मिषु येऽर्कबिम्बे शुक्ले विमाने च सदा वसन्ति । तृप्यन्तु तेऽस्मिन्पितरोऽन्नतोयैर्गन्धादिना पुष्टिमितो व्रजन्तु ॥
येषां हुतेऽग्नौ हविषा च तृप्तिर्ये भुञ्जते विप्रशरीरसंस्थाः । ये पिण्डदानेन मुदं प्रयान्ति तृप्यन्तु तेऽस्मिन्पितरोऽन्नतोयैः ॥
ये खड्गमांसेन सुरैरभीष्टैः कृष्णैस्तिलैर्दिव्यमनोहरैश्च । कालेन शाकेन महर्षिवर्यैः संप्रीणितास्ते मुदमत्र यान्तु ॥
कव्यान्यशेषाणि च यान्यभीष्टान्यतीव तेषां मम पूजितानाम् । तेषां च सांनिध्यमिहास्तु पुष्पगन्धान्नुभोग्येषु मया कृतेषु ॥
दिने दिने ये प्रतिगृह्णतेऽर्चां मासान्तपूज्या भुवि येऽष्टकासु । ये वत्सरान्तेऽभ्युदये च पूज्याः प्रयान्तु ते मे पितरोऽत्र तृप्तिम् ॥
पूज्या द्विजानां कुमुदेन्दुभासो ये क्षत्रियाणां ज्वलनार्कवर्णाः । तथा विशां ये कनकावदाता नीलीप्रभाः शूद्रजनस्य ये च ॥
तेऽस्मिन्समस्ता मम पुष्पगन्धधूपाम्बुभोज्यादिनिवेदनेन । तथाग्निहोमेन च यान्ति तृप्तिं सदा पितृभ्यः प्रणतोऽस्मि तेभ्यः ॥
ये देवपूर्वाण्यभितुष्टिहेतोरश्नन्ति कव्यानि शुभाहतानि । तृप्ताश्च ये भूतिसृजो भवन्ति तृप्यन्तु तेऽस्मिन् प्रणतोऽस्मि तेभ्यः ॥
रक्षांसि भूतान्यसुरांस्तथोग्रान् निर्णाशयन्तु त्वशिवं प्रजानाम् । आद्याः सुराणाममरेशपूज्यास्तृप्यन्तु तेऽस्मिन् प्रणतोऽस्मि तेभ्यः ॥
अग्निष्वात्ता बर्हिषद आज्यपाः सोमपास्तथा । व्रजन्तु तृप्तिं श्राद्धेऽस्मिन्पितरस्तर्पिता मया ॥
अग्निष्वात्ताः पितृगणाः प्राचीं रक्षन्तु मे दिशम्। तथा बर्हिषदः पान्तु याम्यां मे पितरः सदा।
प्रतीचीमाज्यपास्तद्वदुदीचीमपि सोमपाः ॥
रक्षोभूतपिशाचेभ्यस्तथैवासुरदोषतः । सर्वतः पितरो रक्षां कुर्वन्तु मम नित्यशः ॥
विश्वो विश्वभुगाराध्यो धर्मो धन्यः शुभाननः । भूतिदो भूतिकृद् भूतिः पितॄणां ये गणा नव ॥
कल्याणः कल्पदः कर्ता कल्पः कल्पतराश्रयः । कल्पताहेतुरनघः षडिमे ते गणाः स्मृताः ॥
वरो वरेण्यो वरदस्तृष्टिदः पुष्टिदस्तथा । विश्वपाता तथा धाता सप्तैते च गणाः स्मृताः ॥
महान्महात्मा महितो महिमावान्महाबलः । गणाः पञ्च तथैवैते पितॄणां पापनाशनाः ॥
सुखदो धनदश्चान्यो धर्मदोऽन्यश्च भूतिदः । पितॄणां कथ्यते चैव तथा गणचतुष्टयम् ॥
एकत्रिंशत्पितृगणा यैर्व्याप्तमखिलं जगत् । त एवात्र पितृगणास्तृप्यन्तु च मदाहितात् ॥

मार्कण्डेय उवाच
एवं तु स्तुवतस्तस्य तेजसो राशिरुच्छ्रितः । प्रादुर्बभूव सहसा गगनव्याप्तिकारकः ॥
तद्दृष्ट्वा सुमहत्तेजः समाच्छाद्य स्थितं जगत् । जानुभ्यामवनीं गत्वा रुचिः स्तोत्रमिदं जगौ ॥

रुचिरुवाच
अर्चितानाममूर्तानां पितॄणां दीप्ततेजसाम् । नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम् ॥
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा । सप्तर्षीणां तथान्येषां तानमस्यामि कामदान् ॥
मन्वादीनां च नेतारः सूर्य्याचन्द्रमसोस्तथा । तानमस्याम्यहं सर्वान् पितॄनप्युदधावपि ॥
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा । द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलिः ॥
प्रजापतेः कश्यपाय सोमाय वरुणाय च । योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलिः ॥
नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु । स्वायम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ॥

१५०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

रहते हैं और जो श्राद्धके अवसरपर देवताओंसे, स्वधाद्वारा तृप्त किये जाते हैं, मैं उन पितृगणोंको नमस्कार करता हूँ। स्वर्गमें भी अवस्थित महर्षिगण भुक्ति और मुक्तिकी कामनासे मानसिक श्राद्धके द्वारा जिनको भक्तिपूर्वक तृप्त करते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ।

स्वर्गमें सिद्धजन श्राद्धके सुअवसरोंपर सभी दिव्य उत्तम उपहारोंके द्वारा जिन पितरोंको भलीभाँति संतुष्ट करते हैं, उन पितरोंको मेरा नमन है। गुह्यकजन स्वर्गमें आत्यन्तिकी श्रेष्ठ ऋद्धिकी कामनासे भक्तिपूर्वक तन्मयभावसे जिन पितरोंका पूजन करते हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ। पृथिवीपर मनुष्योंके द्वारा श्राद्धोंमें सदैव जिनकी पूजा होती है, जो श्रद्धापूर्वक स्वजनोंसे पूजित होकर अभीष्ट लोक प्रदान करते हैं, मैं उन पितृगणोंको प्रणाम करता हूँ। इस पृथिवीपर ब्राह्मणजन वाञ्छित अभीष्ट लाभके लिये प्राजापत्यलोक प्रदान करनेवाले जिन पितरोंकी सदैव पूजा करते हैं, मैं उन सभीको नमन करता हूँ।

तपके द्वारा निर्धूतकल्मष, संयत आहार करनेवाले अरण्यवासी मुनियोंके द्वारा वनमें उत्पन्न पदार्थोंके माध्यमसे किये गये श्राद्धद्वारा जिन पितरोंको तृप्ति प्रदान की जाती है, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ। नैष्ठिक धर्मचारी, जितेन्द्रिय एवं समाधिस्थ ब्राह्मणोंके द्वारा जो विधिवत् नित्य संतृप्त किये जाते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। क्षत्रियगण इस लोक तथा स्वर्गलोकका फल प्रदान करनेवाले जिन पितृगणोंको श्राद्धमें प्रदत्त कव्य-पदार्थोंसे संतुष्ट करते हैं, उन सभी पितरोंको मेरा नमन है। स्वकर्मनिरत वैश्यगण पृथ्वीपर सदा जल, पुष्प, धूप तथा अन्नादिके द्वारा जिनकी अर्चना करते हैं, उन पितरोंको मैं नमस्कार करता हूँ। शूद्रगण इस भूत़लपर भक्तिपूर्वक श्राद्धमें जिन समस्त लोकको संतृप्त करते हैं, मैं ऐसे सुकालिन् नामसे विख्यात पितरोंको प्रणाम करता हूँ।

पाताललोकमें रहनेवाले असुरगण अपने दम्भ एवं अहंकारका परित्यागकर श्राद्धमें जिन अमृतपान करनेवाले पितरोंको तृप्ति प्रदान करते हैं, मैं उन सभी पितृजनोंको नमन करता हूँ। रसातलमें अवस्थित नागगण अपनी मनोवाञ्छित कामनाओंको पूर्ण करनेकी अभिलाषाओंसे प्रेरित होकर विधिपूर्वक श्राद्धमें प्रदत्त भोग-पदार्थोंके द्वारा जिन पितृगणोंकी पूजा करते हैं, मैं उन पितरोंको नमस्कार करता हूँ। रसातलमें स्थित सर्पगण भी विधिवत् मन्त्रोच्चारके साथ प्रदान किये गये भोग-पदार्थोंसे समन्वित श्राद्धके द्वारा जिन पितृगणोंकी अर्चना करते हैं, मैं उन सभीको प्रणाम करता हूँ। जो देवलोक, अन्तरिक्ष एवं पृथिवीलोकमें प्रत्यक्षरूपसे निवास करते हैं, देवताओं तथा दैत्योंके भी जो पूज्य हैं, ऐसे उन पितृजनोंको मैं नमन करता हूँ। वे मेरे द्वारा निवेदित वस्तुओंको प्राप्त करें।

जो परमार्थ अर्थात् दूसरेका हित करनेके लिये पितृयोनिमें रहकर भी अमूर्तरूपसे विमानमें विद्यमान रहते हैं, श्रेष्ठ योगीजन कष्टोंमें मुक्ति प्रदान करनेवाले जिन पितृजनोंकी पूजा अपने निर्मल मनसे करते हैं, मैं उन पितरोंको नमस्कार करता हूँ। जो स्वर्गमें मूर्तिमान् होकर निवास करते हैं एवं स्वधाभोजी हैं, जो सभी अभिलषित जनोंको उनकी इच्छित कामनाओंका फल प्रदान करनेमें समर्थ हैं और जो निष्काम-जनोंकी मुक्तिके कारण हैं, मैं उन पितरोंको प्रणाम करता हूँ।


सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्त्तिधरांस्तथा। नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्॥
अग्निरूपांस्तथैवान्यान्नमस्यामि पितॄनहम्। अग्निसोममयं विश्वं यत एतदशेषतः॥
ये च तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः। जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः॥
तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः। नमो नमो नमस्तेऽस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुजः॥
मार्कण्डेय उवाच
एवं स्तुतास्ततस्तेन तेजसो मुनिसत्तमाः। निष्क्रममुस्ते पितरो भासयन्तो दिशो दश॥
निवेदनं च यत्तेन पुष्पगन्धानुलेपनम्। तद्भूषितानथ स तान् ददृशे पुरतः स्थितान्॥
प्रणिपत्य रुचिर्भक्त्या पुनरेव कृताञ्जलिः। नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यमित्याह पृथगादृतः॥ (८९।१३-६३)

७६- गृहस्थधर्म-निरूपण

काण्ड ] रुचिद्वारा की गयी पितृस्तुति तथा श्राद्धमें इस पितृस्तुतिके पाठका माहात्म्य १५१

जो इच्छुकजनोंके अभीष्टको इसी लोकमें सिद्ध कर देते हैं तथा देवत्व, इन्द्रत्व और उससे भी अधिक श्रेष्ठ पद अथवा हाथी, घोड़े, रत्न और उत्तम प्रकारके भवन प्रदान करनेमें सक्षम हैं, वे समस्त पितृजन मेरी इस प्रार्थनासे संतुष्ट हों। जो चन्द्ररश्मि, सूर्यमण्डल और स्वच्छ विमानमें सदा निवास करते हैं, वे पितृजन इस पूजामें हमारे द्वारा प्रदत्त अन्न, जल, गन्धादिके द्वारा संतुष्ट हों और शक्तिवान् बनें।

अग्निमें प्रदान की गयी हविष्यकी आहुतिसे जिन्हें संतुष्टि प्राप्त होती है, जो ब्राह्मणके शरीरमें प्रविष्ट होकर श्राद्ध-भोजन करते हैं, जो पिण्डदान देनेसे प्रसन्न होते हैं, वे सभी पितृगण हमारी इस पूजामें प्रदान किये गये अन्न-जलसे संतुष्ट हों। जो काले-काले सुन्दर तिलोंद्वारा प्रसन्न होते हैं, जो महर्षिजनोंके द्वारा श्राद्धमें उस कालमें प्राप्त शाक-पातसे आनन्दित हो उठते हैं, वे पितृजन प्रसन्न हों।

मेरे उन पूज्य पितरोंके जो अतिशय प्रिय समस्त कव्य पदार्थ हैं, उन्हें उन सभी पदार्थोंकी प्राप्ति, इस पूजामें मेरे द्वारा प्रदान किये गये पुष्प, गन्ध, जल तथा पक्वान्न-भोज्य पदार्थोंमें ही हो जाय। इस भूलोकमें प्रतिदिन जो पितृगण श्रद्धावान् जनोंके द्वारा सम्पन्न की गयी पूजाको स्वीकार करते हैं, जो प्रत्येक मासकी अन्तिम तिथि तथा अष्टकाकालमें श्रद्धालुओंके पूज्य हैं और जिन पितृजनोंकी पूजा वर्षान्त एवं अभ्युदयकालमें होती है, वे सभी मेरे पितृगण इस श्राद्धमें संतुष्टि प्राप्त करें।

कुन्द-पुष्प तथा चन्द्रके समान स्वच्छ गौर वर्णकी कान्तिको धारण करनेवाले जो पितृजन ब्राह्मणोंके पूज्य हैं, देदीप्यमान सूर्यके समान वर्णवाले जिन पितरोंका पूजन क्षत्रियजन करते हैं, स्वर्णके समान कान्तिको धारण किये हुए जो पितृगण वैश्यवर्ण और नीली कान्तिसे सुशोभित जो पितृजन शूद्रवर्णके पूजनीय हैं, वे सभी इस पूजामें मेरे द्वारा निवेदित गन्ध, पुष्प, धूप, जल एवं भोज्यादि-पदार्थ तथा अग्निमें समर्पित आहुतिसे सदाके लिये तृप्ति प्राप्त करें। मैं उन सभी पितरोंको प्रणाम करता हूँ।

श्राद्धादिमें अपनी क्षुधाको पूर्णरूपसे संतुष्ट करनेके निमित्त जो पितृगण देवताओंके पूर्व ही श्रद्धालु व्यक्तियोंके द्वारा अर्पित कव्य-पदार्थोंको ग्रहण कर लेते हैं और संतुष्ट होकर जो अपने स्वजनोंके लिये ऐश्वर्योंकी सृष्टि करते हैं, मैं इस श्राद्धमें उन सभी पितरोंको प्रणाम करता हूँ। जो देवताओंके आदिपुरुष एवं देवराज इन्द्रसे भी पूजित हैं, वे राक्षस, भूत, वेताल, असुर तथा उग्र योनिवाले (हिंसक जीव-जन्तुओं)-का विनाश करके अपनी प्रजा (संतति)-की रक्षा करें। मैं उन पितरोंको प्रणाम करता हूँ।

जो अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, आज्यप तथा सोमप नामक पितृगण हैं, वे सभी इस श्राद्धमें मेरे द्वारा संतृप्त होकर तृप्तिको प्राप्त करें। अग्निष्वात्त पितर मेरी पूर्व दिशाकी रक्षा करें। बर्हिषद् नामक पितृगण सर्वदा मेरी दक्षिण दिशाकी अभिरक्षा करें। आज्यप पितृजन पश्चिम दिशा तथा सोमप पितृगण उत्तर दिशाकी रक्षा करें। ये समस्त पितृजन राक्षस, भूत, पिशाच एवं असुरगणोंके कारण उत्पन्न दोषोंसे नित्य सब प्रकारसे हमारी रक्षा करें।

विश्व, विश्वभुक्, आराध्य, धर्म, धन्य, शुभानन, भूतिद, भूतिकृत् और भूति नामक जो पितरोंके नौ गण हैं तथा कल्याण और कल्यद, कल्यकर्ता, कल्यतराश्रय, कल्यताहेतु एवं अनघ नामक जो पितरोंके छः गण कहे गये हैं और वर, वरेण्य, वरद, तुष्टिद, पुष्टिद, विश्वपात एवं धाता नामसे विख्यात—ये सात गण तथा पितृगणोंके पापविनाशक जो महान्, महात्मा, महित, महिमावान् और महाबल

१५२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

नामसे प्रसिद्ध—ये पाँच गण हैं, उन गणोंके ही साथ सुखद, धनद, धर्मद और भूतिद नामक पितरोंका एक अन्य गण-चतुष्टय कहा गया है। इस प्रकार कुल मिलाकर उन पितरोंके इकतीस गण हो जाते हैं, जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् परिव्याप्त है। ये सभी पितृजन इस श्राद्धमें मेरे द्वारा प्रदत्त कव्यादिसे संतुष्ट हों।

इस प्रकार उस रुचिकी स्तुतिसे पितर अत्यन्त प्रसन्न हो गये। उसी समय सहसा एक दिव्य तेजोराशि उत्पन्न हुई, जो आकाशमण्डलको अपने तेजसे चतुर्दिक् परिव्याप्त कर रही थी। सम्पूर्ण विश्वको अपने तेजसे भलीभाँति आच्छादित करनेवाली उस तेजोराशिको देखकर रुचि पृथिवीपर घुटने टेककर पुनः इस स्तुतिका गान करने लगे—

रुचि बोले—‘जो सर्वपूज्य, अमूर्त, देदीप्यमान तेजसे युक्त, ध्यानियोंके हृदयमें विराजमान रहनेवाले एवं दिव्य दृष्टिसे सम्पन्न पितृजन हैं, उन सभीको मैं नमस्कार करता हूँ। जो इन्द्रादि देवगण, दक्ष, मरीचि एवं सप्तर्षियों तथा अन्य श्रेष्ठजनोंके नायक और सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं उन पितरोंको मैं नमन करता हूँ। जो मनु आदि तथा सूर्य, चन्द्र एवं समुद्रके भी अधिनायक हैं, उन समस्त पितृगणोंको मैं प्रणाम करता हूँ। जो नक्षत्र, ग्रह, वायु, अग्नि, आकाश, स्वर्ग और पृथिवीके नेता हैं, उन पितरोंको मैं हाथ जोड़कर नमस्कार करता हूँ।'

मैं प्रजापति, कश्यप, सोम, वरुण और श्रेष्ठ योगीजनोंको सर्वदा हाथ जोड़कर नमन करता हूँ। मैं सातों लोकमें अवस्थित सप्तगणोंको प्रणाम करता हूँ। स्वयम्भू और योगचक्षु ब्रह्माको नमन करता हूँ। जो चन्द्रलोककी भूमिपर अवस्थित रहनेवाले एवं योगमूर्ति-स्वरूप हैं, ऐसे पितरोंको नमस्कार करता हूँ तथा इस जगत्के पितृदेव सोमको भी मैं नमन करता हूँ।

अग्नि ही जिनका रूप है—ऐसे पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। उसी प्रकार जिनसे यह सम्पूर्ण विश्व अग्नि-सोममय है, ऐसे पितरोंको भी नमस्कार करता हूँ। जो तेजमें विद्यमान रहते हैं, जो चन्द्र-सूर्य और अग्निकी प्रतिमूर्ति हैं, जो जगत्स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं—ऐसे उन योगपरायण समस्त पितरोंको संयतचित्तसे अवस्थित होकर मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ। वे सभी स्वधाभुजी पितृजन प्रसन्न हों।'

**मार्कण्डेयजीने कहा—**हे मुनिश्रेष्ठ क्रौष्टुकि! रुचिके द्वारा इस प्रकार स्तुति किये गये तेजःस्वरूप वे सभी पितृगण दसों दिशाओंको प्रतिभासित करते हुए प्रत्यक्ष प्रकट हो गये।

रुचिने जिन पुष्प, गन्ध और अनुलेप पदार्थका उन्हें निवेदन किया था, उन्हींसे विभूषित उन पितरोंको उन्होंने अपने समक्ष उपस्थित देखा।

रुचिने पुनः भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर प्रणाम निवेदन किया और **‘पृथक्-पृथक्-**रूपसे आप सभीको नमन है, नमन है'—ऐसा आदरपूर्वक कहा—

प्रसन्न होकर उन पितृजनोंने उन मुनिश्रेष्ठ रुचिसे **‘वर माँगो'—**ऐसा कहा। नतमस्तक रुचिने उन पितरोंसे कहा—

**रुचिने कहा—**हे पितृदेव! ब्रह्माने प्रजाओंकी सृष्टि करनेके लिये मुझे आदेश दिया है। अतः मैं आपसे संतानोत्पादनमें समर्थ, श्रेष्ठ एवं दिव्य पत्नीकी कामना करता हूँ।

**पितरोंने कहा—**हे मुनिसत्तम! इसी स्थानपर आपको अभी इसी क्षण मनोरमा पत्नीकी प्राप्ति होगी, उसीसे

काण्ड ] प्रम्लोचा नामक अप्सराकी दिव्य कन्या मानिनीसे प्रजापति रुचिका विवाह [ १५३


आपको पुत्र होगा। हे रुचि! वह बुद्धिमान् मन्वन्तराधिप होकर आपके ही रौच्य इस नामसे तीनों लोकोंमें ख्याति प्राप्त करेगा। उसके भी अतिशय बलवान्, महापराक्रमशाली, महात्मा और पृथिवीका पालन करनेवाले बहुत-से पुत्र होंगे। आप भी प्रजापति होकर चार प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि करके अधिकार समाप्त होनेपर धर्मके तत्त्वज्ञानको प्राप्तकर सिद्धि प्राप्त करेंगे।

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस स्तुतिसे हम सभीको संतुष्ट करेगा, उससे प्रसन्न होकर हम लोग उसे उत्तम भोग, आत्मविषयक उत्तम ध्यान, आयु, आरोग्य तथा पुत्र-पौत्रादि प्रदान करेंगे। अतः कामनाओंकी पूर्ति चाहनेवाले श्रद्धालुओंको निरन्तर इस स्तोत्रसे पितरोंकी स्तुति करनी चाहिये। जो मनुष्य श्राद्धमें भोजन कर रहे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके समक्ष भक्तिपूर्वक अत्यन्त प्रिय इस स्तोत्रका पाठ करेगा तो उस स्तवनको सुननेके प्रेमसे हम सबकी भी वहाँ उपस्थिति रहेगी। हम लोगोंकी उपस्थितिके कारण वह श्राद्ध अक्षय होगा, इसमें संदेह नहीं है<sup></sup>

जिस श्राद्धमें इस स्तोत्रका पाठ किया जाता है, उस श्राद्धमें हमारी तृप्ति बारह वर्षतकके लिये हो जाती है। हेमन्त-ऋतुमें इस स्तोत्रका पाठ बारह वर्षपर्यन्त हमें संतृप्ति प्रदान करता है। शिशिर-ऋतुमें इस शुभ स्तोत्रका पाठ करनेसे चौबीस वर्षोंतक हमारी तृप्ति रहती है। वसन्त एवं ग्रीष्म-ऋतुमें सम्पन्न होनेवाले श्राद्ध-कर्मके अवसरपर इस स्तोत्रका पाठ हम लोगोंके लिये सोलह वर्षोतक तृप्ति प्रदान करनेका साधन होता है। हे रुचे! वर्षाकालके दिनोंमें इस स्तोत्र-पाठके साथ किया गया श्राद्ध हम सभीके लिये अक्षय तृप्ति प्रदान करनेवाला होता है। शरत्कालमें सम्पादित श्राद्धके अवसरपर पठित यह स्तोत्र हम लोगोंको पंद्रहवर्षीय तृप्ति प्रदान करता है।

जिस घरमें लिखकर यह सम्पूर्ण स्तोत्र सदैव रखा रहता है, वहाँ श्राद्ध करनेपर हमारी उपस्थिति विद्यमान रहती है अर्थात् उस श्राद्धमें हम लोग उपस्थित रहते हैं। हे महाभाग! इसलिये श्राद्धमें भोजन करते हुए ब्राह्मणोंके सामने हम लोगोंको तृप्ति प्रदान करनेवाले इस स्तोत्रको सुनाना चाहिये<sup></sup>
(अध्याय ८९)


प्रम्लोचा नामक अप्सराकी दिव्य कन्या मानिनीसे प्रजापति रुचिका विवाह

**मार्कण्डेय मुनिने कहा—**पितरोंकी कृपासे उसी समय उस नदीके मध्यसे ही रुचिके समीप प्रम्लोचा नामकी मनको प्रिय लगनेवाली कृशाङ्गी, सुन्दर श्रेष्ठ एक अप्सरा प्रकट हुई। उस श्रेष्ठ अप्सराने प्रिय एवं


१-स्तोत्रेणानेन च नरो योऽस्मांस्तोष्यति भक्तितः। तस्य तुष्टा वयं भोगानात्मजं ध्यानमुत्तमम्॥
आयुरारोग्यमर्थं च पुत्रपौत्रादिकं तथा। वाञ्छद्भिः सततं स्तव्याः स्तोत्रेणानेन वै यतः॥
श्राद्धेषु य इमं भक्त्या त्वस्मत्प्रीतिकरं स्तवम्। पठिष्यति द्विजाग्र्याणां भुञ्जतां पुरतः स्थितः॥
स्तोत्रश्रवणसंप्रीत्या संनिधाने परे कृते। अस्माभिरक्षयं श्राद्धं तद्भविष्यत्यसंशयम्॥ (८९।७०-७३)
२-यस्मिन् गेहे च लिखितमेतत्तिष्ठति नित्यदा। संनिधाने कृते श्राद्धे तत्रास्माकं भविष्यति॥
तस्मादेतत्त्वया श्राद्धे विप्राणां भुञ्जतां पुरः। श्रावणीयं महाभाग अस्माकं पुष्टिकार्कम्॥ (८९।८२-८३)

१५४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

मधुर वाणीमें महात्मा रुचिसे कहा—हे तपस्विश्रेष्ठ ! मेरी प्रसन्नतासे वरुणके पुत्र महात्मा पुष्करद्वारा मेरी एक अतिशय सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई है। मैं उस सुन्दर स्वरूपवाली मानिनी नामवाली कन्याको भार्याके रूपमें आपको प्रदान करती हूँ; आप इसे वरण करें, इस कन्यासे अतिशय बुद्धिमान् मनु नामक आपका पुत्र उत्पन्न होगा।

इसपर उस रुचिने ‘ऐसा ही होगा।’—इस प्रकार कहा। ऐसा कहनेपर उस नदीके मध्य-जलसे मानिनी नामकी शरीरधारिणी एक दिव्य कन्या निकली।

उस नदीके तटपर मुनिश्रेष्ठ रुचिने अनेक महामुनियोंको बुलाकर विधिपूर्वक कन्याके साथ पाणिग्रहण किया। उस कन्यासे अतिशय पराक्रमी और महाद्युति तथा पिताके नामसे रौच्यके रूपमें विख्यात एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो रौच्य मन्वन्तरका अधिपति हुआ। (अध्याय ९०)


भगवान् विष्णुका अमूर्त ध्यान-स्वरूप

**सूतजीने कहा—**हे शौनक ! स्वायम्भुव मनु आदि मुनिजन व्रत, यम, नियम, पूजा, ध्यान, स्तुति तथा जपमें निरत रहकर भगवान् हरिका ध्यान करते हैं। वे हरि देहेन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण और अहंकारसे रहित हैं। वे आकाश, तेज, जल, वायु तथा पृथिवी नामक सभी पञ्चभूतोंसे असम्बद्ध हैं तथा उनके धर्मसे भी रहित हैं। वे सभी प्राणियोंके स्वामी, सबको आबद्धकर नियमन करनेवाले नियन्ता एवं इस जगत्‌के प्रभु हैं। वे चैतन्यरूप, सबके स्वामी और निराकार हैं। वे सभी आसक्तियोंसे रहित, सभी देवोंसे पूजित तथा महेश्वर हैं। वे तेजःस्वरूप तथा तीनों गुणोंसे भिन्न हैं। वे सभी रूपोंसे रहित एवं कर्तृत्वादिसे शून्य हैं।

वे वासनाविहीन, शुद्ध, सर्वदोषरहित, पिपासावर्जित तथा शोक-मोहादिसे दूर रहते हैं। वे हरि जरा-मरणसे रहित कूटस्थ तथा मोहवर्जित हैं। वे सृष्टि एवं प्रलयसे रहित एवं सत्यस्वरूप हैं, निष्कल परमेश्वर हैं। वे जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति आदि अवस्थाओंसे रहित तथा नामरहित हैं। वे जाग्रत् आदि अवस्थाओंके अध्यक्ष, शान्तस्वरूप देवाधिदेव हैं। वे जाग्रत् आदि अवस्थाओंमें विद्यमान रहनेवाले हैं तथा नित्य हैं और कार्य-कारणभावसे रहित हैं।

वे सभीके द्वारा देखने योग्य, मूर्तस्वरूप, सूक्ष्म, सूक्ष्मतर एवं सूक्ष्मतम हैं। वे ज्ञानदृष्टिवाले कर्णेन्द्रियके लिये सुनने योग्य विज्ञान और परमानन्दस्वरूप हैं। वे संसारसे रहित तथा तैजससे भी वर्जित हैं। वे प्रकृष्ट ज्ञानसे अप्राप्य, तुरीयावस्थामें विद्यमान रहनेवाले परमाक्षरस्वरूप ब्रह्म हैं। वे सभीके रक्षक एवं सभीके हन्ता हैं। वे सभी प्राणियोंके आत्मस्वरूप हैं, बुद्धि और धर्मसे रहित हैं। वे हरि निराधार हैं। साक्षात् कल्याणस्वरूप शिव हैं। वे विकारहीन, वेदान्तियोंके द्वारा जानने योग्य, वेदरूप, इन्द्रियातीत, सर्वकल्याणप्रद, परमशुभ, भूतेश्वर, शब्द, रूप, रस, स्पर्श और गन्ध—इन पाँच तन्मात्राओंसे रहित अनादि ब्रह्म हैं। वे योगियोंके द्वारा सम्पुटित ब्रह्मरन्ध्रमें अवस्थित ‘मैं ही ब्रह्म हूँ’ ऐसे परिज्ञानमात्र हैं।

हे महादेव ! इस प्रकार ज्ञान प्राप्तकर जितेन्द्रिय मनुष्यको उन हरिका ध्यान करना चाहिये। जो मनुष्य इस प्रकारसे उन हरिका ध्यान करता है, वह निश्चित ही ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। (अध्याय ९१)

७७- वर्णसंकर जातियोंका प्रादुर्भाव, गृहस्थधर्म, वर्णधर्म तथा सैंतीस प्रकारके अनध्याय

कांड ] * वर्णधर्म-निरूपण * १५५

भगवान् विष्णुका मूर्त ध्यानस्वरूप

भगवान् हरिका मूर्त ध्यानरूप इस प्रकार है— वे विष्णु करोड़ों सूर्यके समान जयशील, अद्वितीय प्रभासम्पन्न, कुन्दपुष्प एवं गोदुग्ध-सदृश धवल-वर्ण हैं। मोक्ष चाहनेवाले मुनियोंको ऐसे श्रीहरिका ध्यान करना चाहिये। वे अत्यन्त सुन्दर एवं विशाल शंख-समन्वित हैं। हजारों सूर्यके समान प्रचण्ड ज्वालाओंकी मालासे आवेष्टित, उग्ररूप, चक्रसे युक्त, शान्तस्वभाव और सुन्दर मुखमण्डलवाले वे विष्णु अपने हाथमें गदा धारण करते हैं।

वे रत्नोंसे देदीप्यमान बहुमूल्य किरीटसे युक्त सर्वत्रगामी देव कमलको धारण करते हैं। वे वनमालाको धारण करनेवाले तथा शुभ्र हैं, समान स्कन्धोंवाले तथा स्वर्णाभूषणको धारण करते हैं, वे शुद्ध वस्त्र धारण करनेवाले, विशुद्ध देहवाले और सुन्दर कान्तिवाले हैं तथा कमलपर विराजमान रहते हैं।

वे स्वर्णमय शरीरवाले विष्णु सुन्दर हार, शुभ अंगद (बाजूबंद), केयूर और वनमालासे अलंकृत हैं। वे श्रीवत्स कौस्तुभमणि धारण करनेवाले हैं एवं लक्ष्मीसे वन्दनीय और नेत्रद्वयसे शोभायमान हैं। वे अणिमादिक गुणोंसे समन्वित विष्णु जगत्के सृष्टिकर्ता और संहारक हैं।

वे मुनि, देव तथा दानव सभीके लिये ध्यानगम्य, अत्यन्त सुन्दर हैं। वे ब्रह्मादिसे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणिवर्गके हृदयमें विराजमान हैं। वे सनातन, अव्यय, सभीके ऊपर कृपालु, प्रभु, नारायण, देवाधिदेव तथा चमकते हुए मकराकृत कर्णकुण्डलोंसे सुशोभित हैं। वे दुःखविनाशक, पूजनीय, मङ्गलमय, दुष्टोंके संहारक, सर्वात्मा, सर्वस्वरूप, सर्वत्रगामी और ग्रहदोषोंके निवारक हैं।

वे देदीप्यमान नखोंसे समन्वित तथा सुन्दर-सुन्दर अँगुलियोंसे सम्पन्न, जगत्के शरणस्थल, सभीको सुख देनेवाले सौम्यस्वरूप महेश्वर हैं। वे समस्त अलंकारोंसे अलंकृत, सुन्दर चन्दनसे संलिप्त, सर्वदिवससमन्वित तथा सभी देवताओंका प्रिय करनेवाले हैं।

वे सम्पूर्ण लोकोंके हितैषी, सर्वेश्वर एवं सभीकी भावनाओंमें विराजमान रहते हैं। वे सूर्यमण्डलसे अधिष्ठित देव, अग्नि और जलमें भी निवास करते हैं। वे वासुदेव जगत्के धाता और मुमुक्षुओंके ध्यान करनेयोग्य हैं। हे हर! इस लोकमें प्राणियोंके द्वारा 'मैं ही वासुदेव हूँ', इस प्रकार चिन्तनीय वे हरि आत्मस्वरूप हैं।

जो मनुष्य इस प्रकारके भगवान् विष्णुका ध्यान करते हैं, वे परमगति प्राप्त करते हैं। प्राचीन कालमें महर्षि याज्ञवल्क्यने ऐसे स्वरूपवाले उन देवेश्वरका ध्यान किया था, जिसके फलस्वरूप धर्मोपदेशकके कर्तृत्वको प्राप्त करके उन्होंने परमपद प्राप्त किया था। जो मनुष्य इस विष्णु-ध्यान नामक अध्यायका पाठ करता है, उसको भी परमगतिकी प्राप्ति होती है। (अध्याय ९२)


वर्णधर्म-निरूपण

श्रीशिवजीने कहा— हे हरे! हे केशिहन्ता! हे माधव! महर्षि याज्ञवल्क्यजीने जिस धर्मका प्रतिपादन किया था, आप मुझको उसे सुनानेकी कृपा करें।

श्रीहरिने कहा— मिथिलापुरीमें विराजमान महर्षि याज्ञवल्क्यजीके पास पहुँचकर ऋषियोंने उनका अभिवादन किया और उनसे सभी वर्णोंके धर्मादिक कर्तव्योंको जाननेकी अपनी इच्छा प्रकट की। तत्पश्चात् वे जितेन्द्रिय महामुनि सर्वप्रथम

१५६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

भगवान् विष्णुका ध्यान करके उन सभी ऋषियोंसे धर्मसम्बन्धित विषयका वर्णन करने लगे।

याज्ञवल्क्यजीने कहा—जिस देशमें कृष्णसार नामक मृग विचरण करते हैं, मैं उस देशके धर्मादिक विषयोंका वर्णन करता हूँ, आप सब सुनें।

पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द एवं ज्योतिषके सहित चार वेद—ये धर्म तथा चौदह विद्याओंके स्थान हैं। मनु, विष्णु, यम, अङ्गिरा, वसिष्ठ, दक्ष, संवर्त, शातातप, पराशर, आपस्तम्ब, उशना, व्यास, कात्यायन, बृहस्पति, गौतम, शंख-लिखित, हारीत और अत्रिके साथ मैं स्वयं—हम सब भगवान् विष्णुका ध्यान करके धर्मोपदेशक हुए।

धर्मका अर्थ है—पुण्य। पुण्यकी उत्पत्तिके हेतु हैं—शास्त्रविहित देशमें, शास्त्रविहित कालमें, शास्त्रविहित उपायसे श्रद्धापूर्वक योग्य पात्र (विद्या एवं तपसे समृद्ध ब्राह्मण)-को दिया गया दान तथा इसके अतिरिक्त अन्य सभी शास्त्रोक्त कर्म। इन्हें अलग-अलग तथा समूहरूपमें धर्म (पुण्य)-का उत्पादक समझना चाहिये। धर्मके उत्पादक इन हेतुओंका मुख्य फल (परम धर्म) योग (चित्तवृत्तिनिरोध)-के द्वारा आत्मदर्शन (आत्माका साक्षात्कार) ही है। इस आत्मदर्शनरूप परम धर्मके लिये देश आदिका कोई नियम नहीं है। चित्तवृत्तिनिरोध (योग) होनेसे यह होता ही है। चित्तवृत्तिनिरोधके लिये विहित उपायोंके अनुष्ठानकी सम्पन्नतामें देश आदिका नियम आवश्यक है। अभी धर्मके उत्पादक जिन हेतुओंका निर्देश किया गया है, उनके बारेमें संदेह होनेपर निर्णय प्राप्त करनेके लिये परिषद् (धर्मसभा)-का सहयोग लेना चाहिये। यह परिषद् वेदों एवं धर्मशास्त्रोंके ज्ञाता चार ब्राह्मणोंकी अथवा तीन ब्राह्मणोंकी होती है। इस परिषद्का निर्णय धर्मके सम्बन्धमें मान्य होता है। ब्रह्मवेत्ता—वेद एवं धर्मशास्त्रका विज्ञ एक ब्राह्मण भी धर्मके विषयमें उत्पन्न संदेहका निराकरण कर सकता है।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण हैं। इनमें प्रारम्भके तीन वर्ण द्विज कहलाते हैं। गर्भाधानसे लेकर श्मशानपर्यन्त ऐसे द्विजोंकी समस्त क्रियाएँ मन्त्रोंके द्वारा होती हैं।

गर्भाधान-संस्कार ऋतुकालमें* होता है। गर्भस्पन्दन होनेसे पूर्व ही पुंसवन-संस्कार किया जाता है। गर्भाधानके छठे अथवा आठवें मासमें सीमन्तोन्नयन-संस्कार होता है। सन्तानोत्पत्तिके बाद जातकर्म और ग्यारहवें दिन नामकरण-संस्कार करनेका विधान है। चतुर्थ मासमें निष्क्रमण तथा छठे मासमें अन्नप्राशन-संस्कार करना चाहिये। उसके बाद कुल-परम्पराके अनुसार चूडाकरण नामक संस्कार करनेका विधान है।

इस प्रकार सन्तानके लिये विहित उक्त संस्कारोंको करनेसे बीज (शुक्र) तथा गर्भ (शोणित)-के कारण उत्पन्न हुए सभी पाप शान्त हो जाते हैं। स्त्रियोंकी ये सभी क्रियाएँ (संस्कार) अमन्त्रक होती हैं और विवाह-संस्कार समन्त्रक होता है। (अध्याय ९३)


* स्त्रियोंका वह कालविशेष ऋतुकाल है, जो गर्भ धारणके योग्य अवस्थाविशेषसे युक्त है। यह विशेष काल रजोदर्शनके दिनसे सोलह अहोरात्रका होता है। इन सोलह अहोरात्रोंमें प्रथम चार रात्रियाँ गर्भाधानके लिये वर्जित हैं; अतः इन चार रात्रियोंके बादकी बारह रात्रियाँ ही गर्भाधानके लिये विहित हैं।

काण्ड ]वर्णधर्म-निरूपण१५७

वर्णधर्म-निरूपण

याज्ञवल्क्यजीने कहा—गर्भधारण अथवा जन्म-ग्रहणके आठवें वर्षमें ब्राह्मण, ग्यारहवें वर्षमें क्षत्रिय तथा बारहवें वर्षमें वैश्यका उपनयन-संस्कार गुरु करे अथवा कुल-परम्पराके अनुसार करे। गुरु इस उपनीत शिष्यको महाव्याहृतियोंके सहित वेद पढ़ाये और शौचाचारकी शिक्षा प्रदान करे।

द्विजोंको दिन और संध्याकालमें उत्तराभिमुख तथा रात्रिके समय दक्षिणाभिमुख होकर मल-मूत्रका परित्याग करना चाहिये। तदनन्तर मिट्टीसे एवं जलसे* मल-मूत्रके गन्ध एवं लेपका निवारण जबतक न हो तबतक इन्द्रियोंका परिमार्जन करे।

तत्पश्चात् शुद्ध स्थानमें जाकर दोनों पाँवोंको भलीभाँति धोकर दोनों जानुओंके मध्य अपने हाथोंको अवस्थित करके उत्तराभिमुख या पूर्वाभिमुख बैठे और दाहिने हाथमें स्थित ब्राह्मतीर्थ (अर्थात् अंगुष्ठका मूल स्थान)-से आचमन करे। कनिष्ठा, तर्जनी एवं अंगुष्ठ अंगुलिके मूल स्थान तथा हाथके अग्रभागमें क्रमशः प्रजापतितीर्थ, पितृतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ और देवतीर्थका अधिष्ठान होता है।

कूप एवं तड़ागादिके शुद्ध जलसे तीन बार आचमन करके अंगुष्ठमूलसे दो बार ओठोंका मार्जन करना चाहिये। द्विजातियोंको चाहिये कि वे फेन और बुद्बुदोंसे रहित प्रकृतिद्वारा प्रदत्त शुद्ध-स्वाभाविक जलसे अपनी इन्द्रियोंका स्पर्श यथाविधि करें। हृदय, कण्ठ एवं तालुतक पहुँचनेवाले जलसे ही क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य आचमन करके शुद्ध होते हैं। स्त्री एवं शूद्रकी तालुतक पहुँचनेवाले शुद्ध जलसे एक बार आचमन करनेसे ही शुद्धि हो जाती है। जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ है, उनके लिये भी इसी प्रकार आचमनकी व्यवस्था है।

प्रातःस्नान, जलदैवत 'ॐ आपो हि ष्ठा०' आदि मन्त्रोंसे मार्जन, प्राणायाम, सूर्योपस्थान एवं गायत्रीमन्त्रका जप प्रतिदिन अपने अधिकारके अनुसार यथाविधि करना चाहिये।

'ॐ आपो ज्योती०' आदि मन्त्र ही गायत्रीमन्त्रका शिरोभाग हैं। इस शिरोभागसे युक्त प्रतिमहाव्याहृति एक-एक बार प्रणव जोड़कर तीनों महाव्याहृतियोंके साथ गायत्रीमन्त्रका मानस-जप करते हुए मुख एवं नासिकामें संचरणशील वायुका नियमन करना ही प्राणायाम है।

प्राणायाम करनेके पश्चात् तीन बार जल देवताके मन्त्रसे प्रोक्षणकर प्रतिदिन सायंकाल नक्षत्रदर्शनतक पश्चिममुख बैठकर गायत्रीमन्त्रका जप करे। इसी प्रकार प्रातःकालकी संध्या करके पूर्वमुख होकर गायत्रीमन्त्रका जप करते हुए सूर्यदर्शनके समयतक स्थिर रहे। उन दोनों संध्याओंमें अपने गृह्यसूत्रके अनुसार अग्निहोत्र करे।

तदनन्तर 'मैं अमुक हूँ' इस प्रकार कहते हुए वृद्धजनों (गुरु आदि बड़े लोगों)-को प्रणाम करे। इसके बाद संयमी ब्रह्मचारी स्वाध्यायके लिये एकाग्रचित्त होकर गुरुकी सेवामें उनके अधीन सदा रहे। तत्पश्चात् गुरुके द्वारा बुलानेपर उनके पास जाकर अध्ययन करे (गुरुको स्वयं अध्यापनके लिये प्रेरित न करे) और भिक्षामें जो कुछ प्राप्त हो, उसे गुरुके चरणोंमें समर्पित करे। मन, वाणी और शरीरके द्वारा गुरुके हितकारी कार्योंमें सदा संलग्न रहे।

ब्रह्मचारीको दण्ड, मृगचर्म, यज्ञोपवीत और मूँजमेखलाका धारण यथाशीघ्र करना चाहिये तथा


* कूप आदिसे बाहर निकाले गये जलके द्वारा शुद्धिका विधान है। जलके मध्य शौच आदि क्रिया निषिद्ध है।

१५८ [ आचार- संक्षिप्त गरुडपुराण

अपनी जीविकाके लिये अनिन्दित श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके घरसे भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। भिक्षा ग्रहण करते समय ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य-वर्णके ब्रह्मचारीको क्रमशः आदिमें, मध्यमें तथा अन्तमें 'भवति' शब्दका प्रयोग करना चाहिये। इसके अनुसार 'भवति भिक्षां देहि', 'भिक्षां भवति देहि' और 'भिक्षां देहि भवति'—इस प्रकार वाक्यप्रयोग यथाक्रम ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य ब्रह्मचारीको करना विहित है। इस वाक्यका अर्थ है—आप भिक्षा दें। 'भवति' यह माताओंके लिये सम्बोधन है।

अग्निकार्य (अग्निहोत्र) करके गुरुकी आज्ञासे विनयपूर्वक आपोऽशान¹-क्रिया करके सम्मानके सहित उस भिक्षासे प्राप्त भोज्यान्नको बिना निन्दा किये ही मौन होकर ग्रहण करना चाहिये। ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए आपित्तरहित कालमें, रोग आदिके अभावमें अनेकका अन्न ग्रहण करे (एक घरका अन्न न ग्रहण करे)। अपने व्रतका संयमपूर्वक पालन करता हुआ ब्राह्मण ब्रह्मचारी श्राद्धमें आदरपूर्वक आहूत होनेपर इच्छानुसार भोजन कर सकता है, किंतु उसे श्राद्धकाल या अन्य अवसरोंमें मधु, मद्य, मांस अथवा उच्छिष्ट अन्न भोजनके रूपमें ग्रहण नहीं करना चाहिये।

जो विधि-विहित क्रियाओंको सम्पन्न कराके ब्रह्मचारीको वेदकी शिक्षा प्रदान करता है, वही 'गुरु' है। जो केवल यज्ञोपवीत-संस्कार कराके ब्रह्मचारीको वेदकी शिक्षा देता है, वह 'आचार्य' कहा गया है। जो वेदके एक देशका² अध्ययन कराता है, वह 'उपाध्याय' है। जो वरण लेकर यजमानके यज्ञको सम्पन्न करता है, उसे 'ऋत्विक्' कहा जाता है। यथाक्रम ये सभी—गुरु, आचार्य, उपाध्याय और ऋत्विक् ब्रह्मचारीके लिये मान्य हैं, किंतु इन सभीसे माता श्रेष्ठ है।

प्रत्येक वेदके अध्ययनके लिये बारह-बारह वर्षतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करना चाहिये। अशक्तावस्थामें प्रत्येक वेदके अध्ययनके लिये पाँच-पाँच वर्षतक भी ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया जा सकता है। कुछ लोगोंका यह भी मत है कि वेदाध्ययन पूर्ण होनेतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन होना चाहिये। केशान्त³-संस्कार गर्भसे सोलहवें वर्षमें ब्राह्मणका, गर्भसे बाईसवें वर्षमें क्षत्रियका तथा गर्भसे चौबीसवें वर्षमें वैश्यका होना चाहिये।

ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यवर्णके लिये क्रमशः सोलह, बाईस और चौबीस वर्षतक उपनयनकाल रहता है। इस कालतक उपनयन न होनेपर ये सभी पतित हो जाते हैं, सर्वधर्मच्युत हो जाते हैं। उनका किसी भी धर्मकार्यमें अधिकार नहीं रहता। व्रात्यस्तोम नामके क्रतुका अनुष्ठान करके ही ये यज्ञोपवीत-संस्कारके लिये योग्य होते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य सबसे पहले माताके उदरसे उत्पन्न होते हैं, उसके बाद पुनः मौञ्जीबन्धन अर्थात् यज्ञोपवीत-संस्कारसे उनका द्वितीय जन्म होता है। अतः ये द्विजाति कहलाते हैं।

श्रौत-स्मार्त यज्ञ, तपस्या (चान्द्रायण आदि व्रत) और शुभकर्मों (उपनयन आदि संस्कारों)-का बोधक एकमात्र वेद है। अतः द्विजातियोंके लिये वेद ही परम कल्याणका साधन है। इससे वेदमूलक स्मृतियोंका भी उपयोग स्पष्ट है।

जो द्विज प्रतिदिन ऋग्वेदका अध्ययन करता है, वह देवताओंको मधु एवं दुग्धसे तथा पितरोंको


१-भोजनके पूर्व तथा अन्तमें एक बार जलसे आचमन करना 'आपोऽशान-क्रिया' है। इसमें 'अमृतोपस्तरणमसि' इस वाक्यका प्रयोग विहित है।
२-मन्त्र एवं ब्राह्मणरूपमें वेदके दो भाग हैं। इनमेंसे केवल एक भागका अध्यापन अथवा वेदके अङ्गमात्रका अध्यापन वेदके एक देशका अध्यापन है।
३-केशान्त-संस्कारसे ही श्मश्रु (दाढ़ी) बनवानेका आरम्भ होता है।

काण्ड ] गृहस्थधर्म-निरूपण [ १५९

मधु एवं घृतसे प्रतिदिन तृप्त करता है। जो द्विज प्रतिदिन यजुर्वेद, सामवेद अथवा अथर्ववेदका अध्ययन करता है, वह घृत एवं अमृतसे पितरों तथा देवताओंको प्रतिदिन तृप्त करता है। ऐसे ही जो द्विज प्रतिदिन वाकोवाक्य<sup></sup>, पुराण, नाराशंसी<sup></sup>, गाथिका<sup></sup>, इतिहास<sup></sup> तथा विद्याका<sup></sup> अध्ययन करता है, वह पितरों एवं देवताओंको मांस (फल), दूध और ओदन (भात)-से प्रतिदिन तृप्त करता है। संतृप्त ये देवता और पितृजन भी इस स्वाध्यायशील द्विजको समस्त अभीष्ट शुभ फलोंसे संतुष्ट करते हैं। द्विज जिस-जिस यज्ञके प्रतिपादक वेद-भागका अध्ययन करता है, उस-उस यज्ञके फलको प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त भूमिदान, तपस्या और स्वाध्यायके फलका भी भागी होता है।

नैष्ठिक ब्रह्मचारीको अपने आचार्यके सांनिध्यमें रहना चाहिये। आचार्यके अभावमें आचार्यपुत्र और उसके अभावमें आचार्य-पत्नी तथा उसके भी अभावमें वैश्वानर-अग्निके आश्रयमें (अपनेद्वारा उपास्य अग्निकी शरणमें) रहना चाहिये। इस प्रकार अपने देहको क्षीण करता हुआ जितेन्द्रिय द्विज ब्रह्मचारी ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। उसका पुनः जन्म नहीं होता। (अध्याय ९४)


गृहस्थधर्म-निरूपण

याज्ञवल्क्यजीने कहा—हे यतव्रत मुनियो! आप सभी अब गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन सुनें।

(विद्याध्ययनकी समाप्तिके पश्चात्) गुरुको दक्षिणा प्रदान करके उन्हींकी अनुज्ञासे स्नानकर शिष्यको ब्रह्मचर्यव्रतकी समाप्ति करनी चाहिये। तदनन्तर वह सुलक्षणा, अत्यन्त सुन्दर मनोरमा, असपिण्डा, अवस्थामें छोटी, अरोगा, भ्रातृमती, भिन्न प्रवर एवं गोत्रवाली कन्यासे विवाह करे।

सभी असपिण्डा कन्याको विवाहयोग्य बताया गया है। इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि सपिण्डा कन्यासे विवाह नहीं करना चाहिये। महर्षि याज्ञवल्क्यने यहाँ सपिण्डाके बारेमें यह बताया है—मातासे लेकर उनके पिता, पितामह आदिकी गणनामें पाँचवीं परम्परात्तक तथा पितासे लेकर उनके पिता, पितामह आदिकी गणनामें सातवीं परम्परात्तक सपिण्ड्य समझना चाहिये। इसके मध्यमें आनेवाली कन्या सपिण्ड्य तथा इसके मध्यमें न आनेवाली कन्या असपिण्डा होगी। इसके अनुसार विवाहके लिये असपिण्डा कन्याका चयन होना चाहिये। ऐसे ही उसी कन्यासे विवाह उचित है, जिसका मातृकुल तथा पितृकुलमें पाँच-पाँच परम्परात्तक सदाचार, अध्ययन एवं पुत्र-पौत्रादिकी समृद्धिकी दृष्टिसे विख्यात हो। ऐसे ही कन्याके लिये समानवर्णमें उत्पन्न श्रोत्रिय एवं विद्वान् पुरुष श्रेष्ठ होता है। अन्य विद्वानोंने जो यह कहा है कि द्विजातियोंके लिये शूद्रकुलमें उत्पन्न हुई कन्या भी ग्रहण करने योग्य होती है, यह मेरा अभिमत नहीं है, क्योंकि उस कन्यामें उससे विवाह करनेवाला उसका पति ही स्वयं उत्पन्न होता है<sup></sup>। तीनों वर्ण तीन, दो, एक इस क्रमसे वर्णोंमें विवाह कर सकते हैं। शूद्र-वर्णको अपने ही वर्णसे कन्या प्राप्त करनी चाहिये।

अपने घरपर वरको बुलाकर उसे यथाशक्ति अलंकृत अपनी कन्या प्रदान करना 'ब्राह्मविवाह'


<sup></sup>-वाकोवाक्य—प्रश्नोत्तररूप वेद-वाक्य। <sup></sup>-नाराशंसी—रुद्रदैवत्य मन्त्र। <sup></sup>-गाथिका—यज्ञ-सम्बन्धी इन्द्र आदिकी गाथाएँ। <sup></sup>-इतिहास—महाभारत आदि। <sup></sup>-विद्या—वारुणी आदि विभिन्न विद्याएँ। <sup></sup>-'आत्मा वै जायते पुत्रः' के अनुसार पिता ही पुत्रके रूपमें जन्म लेता है।

१६०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

है। इस विधिसे विवाहित स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न होनेवाली संतान दोनों कुलोंके इक्कीस पीढ़ियोंको पवित्र करती है। यज्ञदीक्षित ऋत्विक् ब्राह्मणको अपनी कन्या देना 'दैवविवाह' है तथा वरसे एक जोड़ा गौ (स्त्री गौ एवं पुरुष गौ) लेकर उसको कन्या प्रदान करना 'आर्षविवाह' कहा जाता है। इस प्रथम (ब्राह्मविवाह) विधिसे विवाहित स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न पुत्र अपनी प्रथमकी सात तथा बादकी सात—इस तरह चौदह पीढ़ियोंको पवित्र करता है। आर्षविधिके विवाहसे उत्पन्न पुत्र तीन पूर्व तथा तीन बादकी—इस तरह छः पीढ़ियोंको पवित्र करता है।

'तुम इस कन्याके साथ धर्मका आचरण करो'—यह कहकर विवाहकी इच्छा रखनेवाले वरको पिताके द्वारा जब कन्या प्रदान की जाती है, तब ऐसे विवाहको 'काय (प्राजापत्य)-विवाह' कहते हैं। इस विवाह-विधिसे उत्पन्न पुत्र अपनेसहित पूर्वकी छः तथा बादकी छः पीढ़ियों—इस तरह कुल तेरह पीढ़ियोंको पवित्र करता है। कन्याके पिता या बन्धु-बान्धव अथवा कन्याको ही यथाशक्ति धन देकर यदि कोई वर उससे विवाह करता है तो इस विवाहको 'असुरविवाह' और वर एवं कन्याके बीच पहले ही पारस्परिक सहमति हो जानेके बाद जो विवाह होता है, उसको 'गान्धर्वविवाह' कहते हैं। कन्याकी इच्छा नहीं है, तब भी बलात् युद्ध आदिके द्वारा अपहृत उस कन्याके साथ विवाह करना 'राक्षसविवाह' है। स्वाप (शयन) आदि अवस्थामें अपहरणकर उसके साथ जो विवाह किया जाता है, उसको 'पैशाचविवाह' कहते हैं।

इन उपर्युक्त आठ विवाहोंमें प्रथम चार प्रकारके विवाह अर्थात् ब्राह्म, दैव, आर्ष और प्राजापत्यविवाह ब्राह्मणवर्णके लिये उपयुक्त हैं। गान्धर्वविवाह तथा राक्षसविवाह क्षत्रियवर्णके लिये उचित है। असुरविवाह वैश्यवर्ण और अन्तिम गर्हित पैशाच नामक विवाह शूद्रवर्णके लिये (उचित) माना गया है।

समान वर्णवाले वर-कन्याके विवाहमें कन्याओंके द्वारा गृह्यसूत्रकी विधिके अनुसार वरका पाणिग्रहण अर्थात् हाथ पकड़ना चाहिये। क्षत्रियकन्या ब्राह्मणवरसे विवाह करते समय ब्राह्मणवरके दाहिने हाथमें विद्यमान शर (बाण)-के एकदेशको ग्रहण करे। वैश्यकन्या ब्राह्मण अथवा क्षत्रियवरसे विवाह करते समय वरके हाथमें विद्यमान चाबुकके एकदेशको ग्रहण करे। ऐसे ही शूद्रकन्या ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्यवरसे विवाह करते समय वरके उत्तरीय वस्त्र (ऊपर ओढ़े हुए चादर)-के किनारेको ग्रहण करे^२।

पिता, पितामह, भ्राता, सकुल्य^३ (बन्धु-बान्धव) अथवा माता कन्यादान करनेके अधिकारी हैं। पूर्वके अभावमें उत्तरोत्तर कन्यादानके अधिकारी हैं, यदि उन्माद आदि दोषसे ग्रस्त नहीं हैं। यदि कन्यादानका अधिकारी समयपर कन्यादान न करे तो कन्याके ऋतुमती हो जानेपर कन्यादानके अधिकारीको कन्याके प्रति ऋतुकालमें एक-एक भ्रूणहत्याका पाप लगता है। कन्यादानके दाताके अभावमें कन्याको स्वयं उपयुक्त वरका वरण कर लेना चाहिये।

कन्या एक बार दी जाती है, इसलिये कन्या एक बार देकर पुनः उसका अपहरण करनेवाला


^१-कन्याका पिता वरसे गौका जोड़ा मूल्यके रूपमें नहीं लेता, आवश्यकतावश धर्मकार्य (याग आदि) सम्पन्न करनेके लिये होता है। इसीलिये मनुस्मृति (३। २९)-के अनुसार जितनासे धर्मकार्य हो सके, उतना ही (एक ही गौ या गौका जोड़ा) कन्या-पिताको वरसे लेना चाहिये।
^२-दूसरे वर्णसे विवाह करनेकी यह व्यवस्था कलियुगके लिये नहीं है।
^३-सकुल्य—आठवीं पीढ़ीसे दसवीं पीढ़ीतक 'सकुल्य' कहा जाता है।

७८- द्रव्यशुद्धि

काण्ड ]गृहस्थधर्म-निरूपण१६१

चौरकर्मके समान दण्डका भागी होता है। निर्दुष्ट अर्थात् सौम्य सुशीला पत्नीका परित्याग करनेपर पति दण्डनीय है, किंतु अत्यन्त दुष्ट (महापातक आदिसे दुष्ट) पत्नीका उपायान्तरके अभावमें परित्याग किया जा सकता है।

यदि कन्याका किसी वरके साथ विवाह करनेके लिये वाग्दानमात्र किया गया हो, अनन्तर विवाहके पूर्व ही वरका मरण हो गया तो कलियुगसे अन्य युगोंमें ऐसी कन्याको पुत्र प्राप्त करनेका उपाय यह है—ऐसी कन्या पुत्र चाहती है तो उसका देवर अथवा कोई सपिण्ड या कोई सगोत्र बड़ोंकी आज्ञा प्राप्त होनेपर अपने सभी अङ्गोंमें घृतलेप कर ऋतुकालमात्रमें उस कन्याके पास तबतक जा सकता है, जबतक गर्भ-धारण न हो। गर्भ-धारणके बाद यदि वह ऐसी कन्याके पास जाता है तो पतित हो जाता है। इस विधिसे इस कन्यासे उत्पन्न पुत्र जिस वरको कन्याका वाग्दान किया गया था, उसका क्षेत्रज पुत्र माना जाता है।

जो स्त्री व्यभिचारिणी है, बहुत प्रयत्न करनेपर भी व्यभिचारसे विरत नहीं हो रही है, उसको अपने गर्हित जीवनके प्रति वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये अपने घरमें ही रखते हुए समस्त अधिकारोंसे अलग कर देना चाहिये तथा उसे मलिनदशामें ही रखकर उतना ही भोजन देना चाहिये, जितनासे उसकी प्राणरक्षामात्र हो सके। साथ ही उसके निन्दनीय कर्मके लिये उसकी भर्त्सना करनी चाहिये और भूमिपर ही उसके शयनकी व्यवस्था करनी चाहिये।

स्त्रियोंको विवाहसे पूर्व चन्द्रने शुचिता, गन्धर्वने सुन्दर मधुर वाणी एवं अग्निने सब प्रकारकी पवित्रता प्रदान की है। इसीलिये स्त्रियाँ पवित्र ही होती हैं। अतएव उनके लिये अल्प प्रायश्चित्तकी व्यवस्था है। पर इतनेसे यह नहीं समझना चाहिये कि स्त्रियोंमें दोषका संक्रमण नहीं होता है। यदि कोई स्त्री केवल मनसे पर पुरुषकी इच्छा करती है तो यह भी एक तरहका व्यभिचार ही है। ऐसे ही अन्य पुरुषसे सम्पर्क करनेका संकल्पमात्र कोई स्त्री कर लेती है तो यह भी किसी रूपमें व्यभिचार ही है। ऐसा व्यभिचार यदि प्रकाशमें नहीं आया है तो इससे उत्पन्न दोषका मार्जन उस स्त्रीके ऋतुकालमें रजोदर्शनसे हो जाता है। यदि पर पुरुष शूद्रके साथ सम्पर्क कर कोई स्त्री गर्भधारण कर लेती है तो इस पापका प्रायश्चित्त उस स्त्रीका त्याग ही है। ऐसे ही गर्भबध, पतिका वध, ब्रह्महत्या आदि महापातकसे ग्रस्त होनेपर तथा शिष्य आदिके साथ गमन करनेवाली स्त्रीका त्याग ही कर देना चाहिये।

मदिरापान करनेवाली, दीर्घ रोगिणी, द्वेष रखनेवाली, वन्ध्या, अर्थका नाश करनेवाली, अप्रियवादिनी (निष्ठुरभाषिणी), कन्याको ही उत्पन्न करनेवाली एवं पतिका अहित ही करनेवाली भार्याका परित्याग कर दूसरा विवाह किया जा सकता है। प्रथम विवाहिता (परित्यक्ता) स्त्रीका भी दान, मान, सत्कार आदिके द्वारा भरण करना चाहिये, अन्यथा उस स्त्रीके पतिको महापाप होता है। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान देने योग्य है कि जिस घरमें पति-पत्नीके मध्य किसी भी प्रकारका विरोध नहीं होता, उस घरमें धर्म-अर्थ और काम—इस त्रिवर्गकी अभिवृद्धि होती है। अतः प्रथम विवाहिता एवं वर्तमान भार्यामें, अस्वीकृत स्त्री भी पूर्वमें भार्या रही है। इस दृष्टिसे उससे विरोध नहीं ही करना चाहिये। उसे पूर्ण प्रसन्न रखना चाहिये। जो स्त्री पतिकी मृत्युके पश्चात् अथवा उसके जीवित रहते हुए अन्य पुरुषका आश्रय नहीं लेती, वह इस लोकमें यश प्राप्त करती है और अपने पातिव्रत्य-पुण्यके प्रभावसे परलोकमें

७९- दान-धर्मकी महिमा

१६२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

जाकर पार्वतीके साहचर्यमें आनन्द प्राप्त करती है।

यदि पति अपनी स्त्रीका परित्याग करता है तो उस स्त्रीको भरण-पोषणके लिये अपनी सम्पत्तिका तृतीयांश दे देना चाहिये।

स्त्रियोंको अपने पतिकी आज्ञाका पालन करना चाहिये—यही उनका परम धर्म है। स्त्रियोंमें ऋतु अर्थात् रजोदर्शनके प्रथम दिनसे सोलह रात्रितक उनका ऋतुकाल होता है। अतः पुरुषको उक्त सोलह रात्रियोंकी युग्म रात्रियोंमें अपनी पत्नीके साथ पुत्र-प्राप्तिके लिये संसर्ग करना चाहिये¹। पर्वोंकी तिथियोंमें² तथा ऋतुकालकी प्रारम्भिक चार तिथियोंमें सहवास नहीं करना चाहिये। अपनी अपेक्षा क्षाम (दुर्बल) स्त्रीका सहवास पुत्र-प्राप्तिमें सहायक होता है। मघा और मूल नक्षत्रमें सहवास वर्जित है।

इन नियमोंका पालन करके ही अपनी स्त्रीसे सुन्दर, सबल, उत्तम लक्षणोंवाले नीरोग पुत्रको उत्पन्न किया जा सकता है। स्त्रियोंको इन्द्रने जो वर³ दिया है, उसे ध्यानमें रखते हुए पुरुष यथाकामी (पत्नीकी इच्छानुसार ऋतुकालकी रात्रियोंसे अतिरिक्त अनिषिद्ध रात्रियोंमें भी अपनी पत्नीके साथ सहवास करनेवाला) भी हो सकता है। पुरुषके यथाकामी होनेमें दो कारण हैं—(१) पुरुषको अपनी पत्नीमें ही रति रखनी चाहिये और (२) स्त्रियोंकी रक्षा करना पुरुषका धर्म है। पति, भ्राता, पिता, पितृव्य, सास, श्वशुर, देवर तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंको स्त्रियोंका आभूषण-वस्त्र एवं भोजनादिके द्वारा पर्याप्त आदर करना चाहिये।

स्त्रीको घरकी सामग्री संयमित रूपमें रखनी चाहिये, कार्यकुशल होना चाहिये, प्रसन्न रहना चाहिये, मितव्ययी (अधिक खर्चीली नहीं) होना चाहिये तथा सर्वदा अपने सास-श्वशुरके चरणोंका वन्दन करना चाहिये।

जो स्त्री प्रोषितपतिका है अर्थात् जिसका पति परदेश चला गया है, उसके लिये किसी प्रकारकी क्रीड़ा (खेल-तमाशा), शरीरकी सजावट, सामाजिक उत्सवोंका दर्शन, हास-परिहास तथा दूसरेके घरमें गमन करना वर्जित है।

बाल्यावस्थामें पिता, यौवनकालमें पति, वृद्धावस्थामें पुत्र, पुत्रके अभावमें अन्य सम्बन्धियोंको नारीकी रक्षा करनी चाहिये। दिन हो अथवा रात्रि हो, कभी भी स्त्री अपने पतिके बिना एकान्तमें निवास न करे। पतिको सदैव धर्म-कार्यमें अपनी ज्येष्ठा पत्नीको ही संलग्न करना चाहिये। कनिष्ठा भार्या धर्म-कार्यके लिये उपयुक्त नहीं मानी गयी है। सदाचारिणी स्त्रीके मृत्यु होनेपर पतिको चाहिये कि वह अग्निहोत्रमें प्रयुक्त अग्निसे उसका दाह-संस्कार करे। तदनन्तर अविलम्ब अन्य स्त्रीके साथ पाणिग्रहण करके पुनः अग्निका संचयन करे। पतिहितैषिणी पत्नी इस लोकमें यश अर्जित करके अन्तमें स्वर्गलोकको प्राप्त करती है। (अध्याय ९५)


१-इन नियमोंका पालन करनेवालेको 'ब्रह्मचारी' कहा गया है।
२-पर्व-तिथि चार हैं—अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या और पूर्णिमा (मनु० ४। १५६)।
३-एक बार स्त्रियोंने पुरुषकी अपेक्षा आठगुनी अपनी कामभावनासे बाध्य होकर इन्द्रदेवकी शरणमें जाकर अपने मनोभावको उनसे स्पष्ट किया। इन्द्रदेवने स्त्रियोंके भावको जानकर उन्हें वर दिया—'भवतीनां कामविहन्ता पातकी स्यात्' ('आप लोगोंकी कामभावनाका हनन करनेवाला पुरुष पातकी होगा')। इसी वरके अनुसार पत्नीकी इच्छाके अनुसार ऋतुकालसे अन्य कालकी अनिषिद्ध रात्रियोंमें भी पत्नीगमन अनुज्ञात है।