गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२५० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
महाभारतकी कथा एवं बुद्ध आदि अवतारोंकी कथाका वर्णन
ब्रह्माजीने कहा—अब मैं महाभारतके युद्धकी कथाका वर्णन करूँगा, जो पृथिवीपर बढ़े हुए अत्याचारके भारको उतारनेके लिये हुआ था, जिसकी योजना युधिष्ठिरादि पाण्डवोंकी रक्षाके लिये तत्पर कृष्णने स्वयं की थी।
भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई। ब्रह्मासे अत्रि, अत्रिसे सोम, सोमसे बुध हुए। बुधने इला नामक अपनी पत्नीसे पुरूरवाको उत्पन्न किया। पुरूरवासे आयु, आयुसे ययाति और ययातिके वंशमें भरत, कुरु तथा शान्तनु हुए। राजा शान्तनुकी पत्नी गङ्गासे भीष्म हुए। भीष्म सर्वगुणसम्पन्न तथा ब्रह्मविद्याके पारङ्गत विद्वान् थे।
शान्तनुकी सत्यवती नामक एक दूसरी पत्नी थी। उस पत्नीके दो पुत्र हुए, जिनका नाम चित्रांगद तथा विचित्रवीर्य था। चित्रांगद नामवाले गन्धर्वके द्वारा युद्धमें चित्रांगद मार डाला गया। विचित्रवीर्यका विवाह काशिराजकी पुत्री अम्बिका और अम्बालिकाके साथ हुआ। विचित्रवीर्य भी निःसंतान ही मर गये थे। अतः व्याससे उनके दो क्षेत्रज पुत्रों—अम्बिकाके गर्भसे धृतराष्ट्र तथा अम्बालिकाके गर्भसे पाण्डुका जन्म हुआ। उन्हीं व्यासके द्वारा दासीके गर्भसे विदुरका जन्म हुआ। धृतराष्ट्रके गान्धारीसे सौ पराक्रमी पुत्र हुए, जिनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था। पाण्डुपत्नी कुन्ती और माद्रीसे पाँच पुत्रोंका जन्म हुआ। युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव—ये पाँचों पुत्र बड़े ही बलवान् और पराक्रमशाली थे।
दैववशात् कौरव और पाण्डवोंमें वैरभाव उत्पन्न हो गया। उद्धत स्वभाववाले दुर्योधनद्वारा पाण्डवजन बहुत ही सताये गये। लाक्षागृहमें उन्हें विश्वासघातसे जलाया गया, किंतु वे अपनी बुद्धिमत्तासे बच गये। उसके बाद उन लोगोंने एकचक्रा नामक पुरीमें जाकर एक ब्राह्मणके घरमें शरण ली। वहाँ रहते हुए उन सभीने बक नामक राक्षसका संहार किया। तदनन्तर पाञ्चाल नगरमें हो रहे द्रौपदीके स्वयंवरको जानकर वे सभी वहाँ पहुँचे। वहाँ अपने पराक्रमका परिचय देकर उन पाण्डवोंने द्रौपदीको पत्नीके रूपमें प्राप्त किया।
इसके बाद द्रोणाचार्य और भीष्मकी अनुमतिसे धृतराष्ट्रने पाण्डवोंको अपने पास बुला लिया और आधा राज्य उन्हें दे दिया। आधा राज्य प्राप्त करनेके पश्चात् इन्द्रप्रस्थ नामक एक सुन्दर नगरीमें रहकर वे राज्य करने लगे। उन तपस्वी पाण्डवोंने वहाँपर एक सभामण्डपका निर्माण करके राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान किया।
तत्पश्चात् मुरारि भगवान् वासुदेवकी अनुमतिसे ही द्वारकापुरीमें जाकर अर्जुनने उनकी बहन सुभद्राका पाणिग्रहण किया। उन्हें अग्निदेवसे नन्दिघोष नामक दिव्य रथ, तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध गाण्डीव नामका श्रेष्ठतम दिव्य धनुष, अविनाशी बाण तथा अभेद्य कवच प्राप्त हुआ। उसी धनुषसे कृष्णके सहचर वीर अर्जुनने अग्निको खाण्डव-वनमें संतुष्ट किया था। दिग्विजयमें देश-देशान्तरके राजाओंको जीतकर उनसे प्राप्त रत्नराशि लाकर उन्होंने अपने नीति-परायण ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिरको सौंप दी।
भाइयोंके साथ धर्मराज युधिष्ठिर कर्ण, दुःशासन और शकुनिके मतमें स्थित पापी दुर्योधनके द्वारा द्यूतक्रीड़ाके मायाजालमें जीत लिये गये। उसके बाद बारह वर्षोंतक उन्हें वनमें महान् कष्ट उठाना पड़ा। तदनन्तर धौम्य ऋषि तथा अन्य मुनियोंके साथ द्रौपदीसहित वे पाँचों पाण्डव विराट-नगर गये और गुप्तरूपसे वहाँ रहने लगे। एक वर्षतक वहाँ रहकर दुर्योधनद्वारा हरण की जाती हुई गायोंका प्रत्याहरण करके अर्थात् वापस लौटाकर वे अपने राज्यमें जा पहुँचे। सम्मानपूर्वक दुर्योधनसे उन्होंने अपने आधे राज्यके हिस्सेके रूपमें पाँच गाँव माँगे, किंतु दुर्योधनसे वे भी प्राप्त न हो सके। अतः कुरुक्षेत्रके मैदानमें उन वीरोंको युद्ध करना पड़ा। उसमें पाण्डवोंकी ओर सात दिव्य अक्षौहिणी सेना थी और दुर्योधनादि
काण्ड ] महाभारतकी कथा एवं बुद्ध आदि अवतारोंकी कथाका वर्णन २५१
ग्यारह अक्षौहिणी सेनासे युक्त थे। यह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान महाभयंकर हुआ था।
सबसे पहले दुर्योधनकी सेनाके सेनापति भीष्म हुए और पाण्डवोंका सेनापति शिखण्डी बना। उन दोनोंके बीचमें शस्त्र-से-शस्त्र तथा बाण-से-बाण भिड़ गये। दस दिनोंतक महाभयंकर युद्ध होता रहा। शिखण्डी और अर्जुनके सैकड़ों बाणोंसे बिंधकर भीष्म धराशायी हो गये, किंतु इच्छामृत्युका वरदान होनेसे भीष्मकी उस समय मृत्यु नहीं हुई। जब सूर्य उत्तरायणमें आ गये तब धर्म-सम्बन्धित विभिन्न उपदेश देकर उन्होंने अपने पितरोंका तर्पण किया और भगवान् गदाधरका ध्यान करते हुए अन्तमें वे उस परमपदको प्राप्त हुए, जहाँपर आनन्द-ही-आनन्द है और जो निर्मल आत्माओंके लिये मुक्तिका स्थान है।
तदनन्तर सेनापतिके पदपर द्रोणाचार्य आसीन हुए। उनका युद्ध पाण्डव-सेनापति धृष्टद्युम्नके साथ हुआ। यह परम दारुण युद्ध पाँच दिनोंतक चलता रहा। जितने भी राजा इस युद्धमें सम्मिलित हुए, वे सभी अर्जुनके द्वारा मारे गये। पुत्रशोकका समाचार सुनकर द्रोणाचार्य उस शोकके सागरमें डूबकर मर गये।
इसके बाद वीर अर्जुनसे लड़नेके लिये कर्ण युद्धभूमिमें आया। दो दिनोंतक महाभयानक युद्ध करके वह भी उनके द्वारा प्रयुक्त अस्त्रोंसे न बच सका। तत्पश्चात् शल्य धर्मराजसे युद्ध करनेके लिये गया। अपराह्नकाल होनेके पूर्व ही धर्मराजके तीक्ष्ण बाणोंसे वह भी चल बसा।
तदनन्तर कालान्तक यमराजके समान क्रुद्ध दुर्योधन गदा लेकर भीमसेनको मारनेके लिये दौड़ा, किंतु वीर भीमसेनने अपनी गदासे उसे गिरा दिया। उसके बाद द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने रात्रिमें सोयी हुई पाण्डवोंकी सेनापर आक्रमण कर दिया। अपने पिताके वधका स्मरण करके उसने बड़ी ही बहादुरीसे बहुतोंको मौतके घाट उतार दिया। धृष्टद्युम्नका वध करके उसने द्रौपदीके पुत्रोंको भी मार डाला। इस प्रकार पुत्रोंका वध होनेसे दुःखित एवं रोती हुई द्रौपदीको देखकर अर्जुनने अश्वत्थामाको परास्तकर ऐषिक नामक अस्त्रसे उसकी शिरोमणिको निकाल लिया।
उसके बाद अत्यन्त शोकसन्तप्त स्त्रीजनोंको आश्वस्त करके धर्मराज युधिष्ठिरने स्नान करके देवता और पितृजनोंका तर्पण किया। तत्पश्चात् भीष्मके द्वारा दिये गये सदुपदेशोंसे आश्वस्त महात्मा युधिष्ठिर पुनः राज्यकार्यमें लग गये। अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान करके उन्होंने भगवान् विष्णुका पूजन किया तथा विधिवत् ब्राह्मणोंको दक्षिणादि देकर संतुष्ट किया। साम्बके पेटसे निकले हुए मूसलके द्वारा यदुवंशियोंके विनाशका समाचार सुनकर उन्होंने राज्यसिंहासनपर अभिमन्युके पुत्र परीक्षित्को बैठाकर भीमादि अपने सभी भाइयोंसहित विष्णुसहस्रनामका जप करते हुए स्वयं भी स्वर्गके मार्गका अनुगमन किया।
वासुदेव कृष्ण असुरोंको व्यामोहित करनेके लिये बुद्धरूपमें अवतरित हुए। अब वे कल्कि होकर फिर सम्भल ग्राममें अवतार लेंगे और घोड़ेपर सवार होकर वे संसारके सभी विधर्मियोंका विनाश करेंगे।
अधर्मको दूर करनेके लिये, सत्त्वगुण-प्रधान देवता आदिकी रक्षा और दुष्टोंका संहार करनेके निमित्त भगवान् विष्णुका समय-समयपर वैसे ही अवतार होता है, जैसे समुद्रमन्थनके समय धन्वन्तरि होकर उन्होंने देवता आदिकी रक्षाके लिये विश्वामित्रके पुत्र महात्मा सुश्रुतको आयुर्वेदका उपदेश किया।
इस तरह महाभारतकी कथा एवं भगवान्के अवतारोंकी कथाका मैंने वर्णन किया, इसे सुनकर मनुष्य स्वर्गको प्राप्त करता है। (अध्याय १४५)
| २५२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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आयुर्वेद-प्रकरण
[गरुडपुराणका आयुर्वेद-प्रकरण अत्यन्त महत्त्वका है। इस प्रकरणके प्रथम बीस अध्यायोंमें निदान-स्थानके विषय वर्णित हैं। किस कारणसे रोग उत्पन्न हुआ है और रोगके लक्षण क्या हैं जिससे रोगका निर्णय हो सके इत्यादि विषय 'निदान' शब्दसे अभिप्रेत हैं। इसके बाद लगभग चालीस अध्यायोंमें रोगोंकी चिकित्सा-हेतु औषधियोंका निरूपण हुआ है तथा उन औषधियोंके निर्माणकी विधि बतायी गयी है। इस औषधिका यह अनुपान है, किस प्रकार इसका सेवन करना चाहिये आदि बताया गया है। एक ही रोगके लिये अनेक औषधिक योगोंको भी बताया गया है, पर यह सब किसी सुयोग्य वैद्यके परामर्शसे ही करना उचित है।
उपलब्ध गरुडपुराणका पाठ कहीं-कहीं अस्पष्ट तथा खण्डित भी प्रतीत होता है। आयुर्वेदके आर्षग्रन्थोंका आश्रय करके यथासम्भव अर्थ ठीक करनेकी चेष्टा की गयी है, पाठकोंको इससे लाभ उठाना चाहिये—सम्पादक]
निदानका अर्थ तथा रोगोंका सामान्य निदान-निरूपण
धन्वन्तरिजीने कहा— हे सुश्रुत! प्राचीन कालमें आत्रेय आदि श्रेष्ठ मुनियोंने जिस प्रकार सभी रोगोंका निदान बताया है, वैसे ही मैं तुम्हें सुनाऊँगा। पाप्मा, ज्वर, व्याधि, विकार, दुःख, आमय, यक्ष्मा, आतङ्क, गद और आबाध—ये पर्यायवाची शब्द हैं।
रोगके ज्ञानके पाँच उपाय हैं—निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और सम्प्राप्ति। निमित्त, हेतु, आयतन, प्रत्यय, उत्थान तथा कारण—इन पर्यायोंसे निदान कहा जाता है अर्थात् निमित्त आदि शब्दोंसे जिस वस्तुका निश्चय होता है वही निदान है। दोष-विशेषके ज्ञानके बिना ही उत्पन्न होनेवाला रोग जिन लक्षणोंसे जाना जाता है, उसे पूर्वरूप कहते हैं। यह पूर्वरूप सामान्य और विशिष्ट-भेदसे दो प्रकारका होता है। यह उत्पद्यमान रोग जिन लक्षणोंसे जाना जाता है, उन लक्षणोंको अल्पताके कारण थोड़ा व्यक्त होनेसे पूर्वरूप कहा जाता है। वही पूर्वरूप व्यक्त हो जानेपर रूप कहलाता है। संस्थान, व्यञ्जन, लिङ्ग, लक्षण, चिह्न और आकृति—ये रूपके पर्यायवाची शब्द हैं। हेतु-विपरीत, व्याधि-विपरीत, हेतु-व्याधि-उभय-विपरीत तथा हेतु-विपरीत अर्थकारी (हेतुके समान प्रतीत होनेपर भी विपरीत क्रिया करनेवाला), व्याधि-विपरीत अर्थकारी और हेतु-व्याधि-उभय-विपरीत अर्थकारी औषध, अन्न तथा विहारके परिणाममें सुखदायक उपयोगको उपशय कहते हैं, इसीका नाम सात्म्य भी है। उपशयके विपरीत अनुपशय होता है। इसका दूसरा नाम व्याध्यसात्म्य भी है। दोष जिस प्रकार (प्राकृत आदि विविध) निदानोंसे दूषित होकर (ऊर्ध्व आदि भिन्न गतियोंके द्वारा शरीरमें) विसर्पण करते हुए (धातु आदिको दूषित कर) रोगको उत्पन्न करता है, उसे सम्प्राप्ति कहा जाता है। उसके पर्यायवाची शब्द हैं—जाति तथा आगति।
संख्या, विकल्प, प्राधान्य, बल और व्याधि कालकी विशेषताओंके आधारपर उस सम्प्राप्तिके भेद किये जाते हैं। जैसे इसी शास्त्रमें बताया जायगा कि ज्वरके आठ भेद होते हैं (यह संख्यासम्प्राप्ति हुई)। रोगोत्पत्तिमें कारणभूत दोषोंकी अंशांशकल्पना (न्यूनाधिक्य आदि)-का विवेचन विकल्पसम्प्राप्ति, स्वतन्त्रता और परतन्त्रताद्वारा दोषोंका प्राधान्य या अप्राधान्य-विवेचन प्राधान्यसम्प्राप्ति, हेतु-पूर्वरूप और रूपकी सम्पूर्णता अथवा अल्पताके द्वारा बल या अबलका विवेचन बलसम्प्राप्ति और दोषानुसार रात्रि, दिन, ऋतु एवं भोजन (-के परिपाक)-के अंश (आदि, मध्य और अन्त)-द्वारा रोगकालके ज्ञानको कालसम्प्राप्ति समझना चाहिये।
इस प्रकार निदानके सामान्य अभिधेयों (निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और सम्प्राप्ति)-का निरूपण किया गया। सम्प्रति उनका विस्तारसे वर्णन किया
१२६- रक्त-पित्त-निदान
काण्ड ]
ज्वर-निदान
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जायगा। सभी रोगोंके मूल कारण [शरीरमें स्थित] कुपित दोष ही हैं। किंतु दोष-प्रकोपका भी कारण अनेक प्रकारके अहितकर पदार्थोंका सेवन है। यह अहितसेवन तीन प्रकार (असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग, प्रज्ञापराध तथा परिणाम)-का होता है, इन तीनों योगोंको पहले बताया जा चुका है।
वात-प्रकोपका निदान
तिक्त, उष्ण, कटु, कषाय, अम्ल और रूक्ष खाद्यान्नका असंयमित आहार, दौड़ना, जोरसे बोलना, रात्रि-जागरण तथा उच्च भाषण, कार्योंमें विशेष अनुरक्ति, भय, शोक, चिन्ता, व्यायाम एवं मैथुन करनेसे शरीरके अन्तर्गत विद्यमान वायु प्रकुपित हो जाती है। विशेषतः यह वायु-विकार ग्रीष्म-ऋतुके दिन तथा रात्रिमें भोजन करनेके पश्चात् पाकके अन्तमें होता है।
पित्त-प्रकोपका निदान
कटु, अम्ल, तीक्ष्ण, उष्ण, लवण तथा क्रोधोत्पादक एवं दाहोत्पादक आहार करनेसे पित्त प्रकुपित होता है। पित्तका यह प्रकोप शरद्-ऋतुके मध्याह्न, अर्धरात्रि तथा अन्य दाह उत्पन्न करनेवाले क्षणोंमें विशेषरूपसे होता है।
कफ-प्रकोपका निदान
मधुर<sup>१</sup>, अम्ल, लवण, स्निग्ध, गुरु, अभिष्यन्दी तथा शीतल भोजनोंके प्रयोगसे, बैठे रहनेसे, निद्रासे, सुख-भोगसे, अजीर्णसे, दिवा-शयनसे, अत्यन्त बलकारक पदार्थोंके प्रयोगसे, वमन आदि न करनेसे, भोजनके परिपाकके प्रारम्भकालमें, दिनके प्रथम भागमें तथा रात्रिके प्रथम भागमें कफ कुपित होता है और दो-दो दोषोंके प्रकोपक आहार-विहारका सेवन करनेसे दो-दो दोष प्रकुपित होते हैं।
त्रिदोष-प्रकोपका निदान एवं सब रोगोंकी सामान्य सम्प्राप्ति
त्रिदोषके (वात-पित्त<sup>२</sup> तथा श्लेष्मा—इन सभीके) प्रकुपित तथा मिश्रित स्वभावसे सन्निपातकी उत्पत्ति होती है। संकीर्ण भोजन, अजीर्णतामें भोजन, विषम तथा विरुद्ध भोजन, मद्यपान, सूखे शाक, कच्ची मूली, पिण्याक (खली), मृत्युवत्सर पूति (सत्तू) शुष्क, कृशा, मांस तथा मत्स्यादिका भक्षण करनेसे, वात-पित्त एवं श्लेष्मोत्पादक विभिन्न पदार्थोंके उपभोगसे, आहार्य अन्नका परिवर्तन, धातुजन्य-दोष, वात-पित्त, श्लेष्माका परस्पर मिलकर उपद्रव करनेसे शरीरमें यह विकार (सन्निपात) उत्पन्न होता है। दूषित कच्चे अन्नका प्रयोग करनेसे, श्लेष्माजनित विकारसे तथा ग्रहोंके प्रभावसे, मिथ्या आहार-व्यवहारके योगसे, पूर्वजन्ममें संचित विभिन्न पापोंके प्रभाववश किये गये दुराचरणसे, स्त्रियोंमें प्रसव-कालकी विषमता तथा मिथ्योपचारसे शरीरमें सन्निपातकी विकृति उत्पन्न होती है। इस प्रकार प्रकुपित वात आदि दोष रोगोंके अधिष्ठानोंमें जानेवाली रसवाहिनियोंके द्वारा शरीरमें पहुँचकर अनेक प्रकारके विकारोंको उत्पन्न करते हैं।
(अध्याय १४६)
ज्वर-निदान
**धन्वन्तरिजीने कहा—**हे सुश्रुत! अब समस्त ज्वरोंकी<sup>३</sup> विशेष जानकारीके लिये मैं ज्वर-निदानको बताऊँगा।
ज्वर रोगपति, पाप्मा, मृत्युराज, ओजोऽशन (ओजको खा जानेवाला), अन्तक (आयुको समाप्त कर देनेवाला), क्रुद्ध होकर दक्षके यज्ञको विध्वंस
१-अ०हृ०अ० २। १७-१८।
२-अ०हृ०नि०अ० २। १९–२३ (चिकित्सादर्श परि० पृ० ९ वैद्य राजेश्वरशास्त्रीकृत)।
३-अ०हृ०नि०अ०२, माधव ज्वर नि०पृ० ७३।
१२७- कास (खाँसी)-निदान
| २५४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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करनेवाले रुद्रके तीसरे नयनसे उत्पन्न संताप, मोहमय, संतापात्मा तथा अपचारज (मिथ्या आहार-विहारसे उत्पन्न)—इन विभिन्न नामोंसे नाना प्रकारकी योनियोंमें विद्यमान रहता है।
यह हाथियोंमें पाकल, अश्वोंमें अभिताप, कुत्तोंमें अलर्क, मेघोंमें इन्द्रमद, जलमें नीलिका, औषधियोंमें ज्योति और भूखण्डोंमें ऊषर नामसे रहता है।
कफ-ज्वरके लक्षण
कफसे<sup>१</sup> उत्पन्न होनेवाले ज्वरमें हृदयमें घबराहट, वमन, खाँसी, शरीरमें ठंडक तथा अङ्गोंमें सूजन हो जाती है। दोषोंके प्रकोप-कालमें ज्वरकी उत्पत्ति होने लगती है। (पर यह पहलेसे जो उत्पन्न हो चुके हैं) बढ़ावपर आ जाते हैं (ग्रन्थकारका अभिप्राय यह है कि चिकित्सक इस स्थितिसे लाभ उठायें)। पहले वह कालपर विचार करें कि यह वात, पित्त, कफ—इन दोषोंमें किस दोषको प्रकुपित करनेवाला है। इस आधारपर रोगको समझनेमें सुविधा हो सकती है। जिस तरह विशिष्ट कालके द्वारा रोगकी उत्पत्ति या वृद्धि देखकर यह रोग—वात आदि किस दोषसे उत्पन्न हुआ है, यह अनुमान कर लिया जाता है, उसी तरह उपशय (लाभ) और अनुपशय (हानि)-से भी रोगको पहचाना जा सकता है। औषध, अन्न, विहार, देश, काल आदिसे उत्पन्न लाभको उपशय कहते हैं और इन्हीं औषध आदिका उपयोग यदि किसी रोगमें दुःखद हो तो उसे अनुपशय कहते हैं।
अतः किस प्रकारकी औषधि, अन्न आदिके सेवनसे रोगीको लाभ (उपशय) हो रहा है और किस प्रकारकी औषधि आदिसे हानि (अनुपशय) हो रहा है, इसपर विचार करनेसे चिकित्सकको रोग समझनेमें आसानी होती है।
निदान-प्रकरणमें कहे गये (किस औषधि और विहारके सेवनसे) अनुपशय (हानि) होती है और किन पदार्थोंके सेवनसे उपशय (लाभ) होता है, यह देखकर दोषोंका अनुमान किया जा सकता है। अरुचि, अपरिपाक, स्तम्भ, आलस्य, हृदयदाह, विपाक, तन्द्रा, वस्ति, विमर्दावनय, लारका गिरना, मनका भरा होना, भूखका न लगना, मुखकी चिपचिपाहट, शरीरमें श्वेतता होना, उष्णताका रहना, शरीरका भारी लगना, अधिक पेशाबका होना, शरीरकी जीर्णताका विशेष भान होना तथा शरीरकी कान्तिमें मलिनताका आना—ये सभी आम ज्वरके लक्षण हैं।
भूखका न लगना, शरीरका हलका हो जाना, यह सामान्य ज्वर है। जब ज्वरमें वात-पित्त तथा कफ—तीनों दोष बराबर बढ़ते रहते हैं तो उसे परिपक्व अष्टाह<sup>२</sup> (निराम) ज्वरका लक्षण माना जाता है। दो दोषोंके लक्षणोंका संसर्ग होनेपर तीन संसर्गज-द्वन्द्वज<sup>३</sup> ज्वर होते हैं।
वात-पित्त-ज्वरके लक्षण
सिरमें वेदना, मूर्च्छा, वमन, शरीर-प्रदाह, मोह, कण्ठ और मुखकी शुष्कता, अरुचि, शरीरके पर्व-पर्वमें टूटन, अनिद्रा, मनमें विभ्रम, रोमाञ्च (सिहरन), जम्हाई एवं वात-प्रकोपसे त्वचामें शीतलताकी अनुभूतिका होना—ये सभी लक्षण वात और पित्तकी प्रवृत्तिके कारण उत्पन्न हुए ज्वरसे ग्रसित शरीरमें दिखायी देते हैं।
ज्वर-तापकी अल्पता, अरुचि, पर्ववेदना (शरीरके प्रत्येक जोड़में दर्द), सिरपीड़ा, बार-बार थूकनेकी इच्छा, श्वास-कष्ट और खाँसी, चेहरेका रंग उड़ जाना, ठंडक लगना, आँखोंके सामने दिनमें भी अन्धकारका छाया रहना और अनिद्राका होना—ये सभी लक्षण कफ-वातजनित ज्वरकी पहचान कराते हैं।
१-कफ-ज्वरके लक्षण, अ०हृ०अ० २।२२ । २-निरामज्वरका लक्षण (च०चि०अ० ३)। ३-द्वन्द्वज ज्वरका रूप अ०हृ० अ० २।२३-२६।
काण्ड ] ज्वर-निदान २५५
शरीरमें अनियत शीतलताका अनुभव, स्तम्भन, पसीनेका आना, दाहका होना, प्यासका लगना और खाँसीका आना, श्लेष्म एवं पित्तकी प्रवृत्ति, मूर्च्छा, तन्द्रावस्थामें तथा मुखमें कडुवापनका होना—ये सभी लक्षण श्लेष्म-पित्तजन्य ज्वरके रूपका निर्धारण करते हैं।
वात<sup>१</sup>-पित्त और श्लेष्म-प्रवृत्तिजन्य सभी लक्षणोंके एक साथ सर्वज (सन्निपात) ज्वरका आकलन होता है। ऐसी अवस्थामें बार-बार ये सभी लक्षण प्रकट होते रहते हैं। इस ज्वरकालमें रोगीको ठंडक लगती है, दिनमें महानिद्राकी स्थिति बनी रहती है, रात्रिमें नींद नहीं आती या सदैव निद्रा ही रहती है अथवा निद्रा ही नहीं आती। रोगीको अधिक पसीना छूटता है अथवा पसीना ही नहीं आता। वह ऐसी अवस्थामें गीत गाता है, नाचता है या हास्यादिकी क्रियाओंको करता है। उसकी सामान्य प्रकृति पूर्ण बदली हुई होती है। नेत्र मलिन एवं आँसुओंसे डबडबाये रहते हैं। आँखोंकी पलकोंके किनारोंपर लाली छायी रहती है और आँखें खुली रहती हैं अथवा मुँदी रहती हैं। शरीरकी पिण्डुली, पार्श्वभाग, सिर, संधि-स्थान तथा हड्डी-हड्डीमें वेदना होती है और बुद्धिमें भ्रम बना रहता है। दोनों कान ध्वनि एवं वेदनासे व्याप्त रहते हैं। ये अत्यधिक ठंडे हो जाते हैं अथवा अत्यधिक गर्म हो जाते हैं। रोगीकी जिह्वा जली हुई-सी प्रतीत होती है अर्थात् कुछ लाल और कृष्ण वर्णके मिश्रित भावोंसे युक्त तथा खुरदरी हो जाती है, उसमें स्निग्धता नहीं रह जाती। सम्पूर्ण शरीर एवं उसके संधि-स्थानोंमें भारीपन तथा शिथिलता आ जाती है।
रोगीके मुखसे रक्त-पित्तमिश्रित थूक निकलता है, सिर लुढ़क जाता है, अत्यन्त प्यास लगती है। शरीरके समस्त कोष्ठ-प्रदेशोंका वर्ण श्याम और रक्त हो जाता है। उनपर मण्डलाकार धब्बे दिखायी पड़ने लगते हैं। हृदयमें व्यथा होने लगती है। आँख, कान, नाक, गुदा आदिसे निकलनेवाले मलकी प्रवृत्ति बढ़ जाती है अथवा अत्यन्त कम हो जाती है। मुखमें स्निग्धता, बलकी क्षीणता, स्वरभंग, ओजक्षय तथा प्रलापकी स्थिति उत्पन्न होने लगती है। दोषपाक अर्थात् वात-पित्त और कफकी वृद्धि शरीरके अंदर-ही-अंदर पक जाती है, जिससे शरीरकी सामान्य गतिमें अवरोध आ जाता है, कण्ठ घरघराने लगता है। शरीरमें तन्द्राकी अवस्था रहती है और कण्ठसे अव्यक्त शब्द निकलने लगते हैं। ऐसे लक्षणोंसे युक्त रोग शरीरमें अपना स्थान बना लेता है, उसको बलवीर्य-विनाशक अभिन्यास-सन्निपात<sup>२</sup> नामक ज्वर कहना चाहिये।
इस सन्निपातिक ज्वरमें वायु-विकारके कारण कण्ठमें अवरोध उत्पन्न होनेसे पित्त आभ्यन्तर-भागमें पीड़ा पहुँचाने लगता है और (विशेष मार्ग) नाक आदिसे सुखपूर्वक बिना प्रयासके ही बाहर निकलने लगता है। उसी पित्त-प्रभावके कारण नेत्र हल्दीके समान पीले पड़ जाते हैं। वात-पित्त तथा कफजन्य दोषके बढ़ जानेपर जब शरीरमें विद्यमान अग्नि-तत्त्व विनष्ट हो जाता है तो उस समय वह अपने सम्पूर्ण लक्षणोंसे युक्त रहता है। यह सन्निपात-ज्वर असाध्य है। इसपर बड़ी ही कठिनतासे अधिकार प्राप्त किया जा सकता है।
इस सन्निपात<sup>३</sup>का एक अन्य भी रूप है, जिसमें पित्त पृथक्-भावसे स्थित रहता है। ऐसे ज्वरमें त्वचा और कोष्ठके अंदर दाह होता है अथवा यह स्थिति इस ज्वरोत्पत्तिके पहले भी शरीरमें हो सकती है। उसी प्रकार जब वात और पित्तकी
१-त्रिदोषजज्वरका रूप अ०हृ०अ० २। २७-३३। २-वेगसेन अभिन्यास ज्वर-प्रकरण देखें। ३-चरक चि०अ० ३, सु०उ०अ० ३९।
१२८- श्वासरोग-निदान
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प्रवृत्ति शरीरमें बढ़ने लगती है, उस समय भी यह सन्निपात-ज्वर होता है। उस कालमें शीत और दाहका प्रकोप शरीरपर होता है। उनसे मुक्ति प्राप्त करना प्राणीके लिये अत्यन्त कठिन है। शीतका प्रभाव शरीरपर पहले होनेसे पित्तके कारण मुखसे कफ निकलता है और सूख भी जाता है। पित्तके शान्त होनेपर मूर्च्छा, मद और तृष्णा होती है। अन्तमें क्रमशः रोगीको तन्द्रा और आलस्य आ जाता है तथा अम्ल वमन होता है।
आगन्तुक-ज्वरका लक्षण
अभिघात, अभिषंग, शाप तथा अभिचार-कर्मसे आनेवाले चार प्रकारके ज्वरको आगन्तुक-ज्वर माना गया है। दाह आदिके कारण शरीरमें जब पसीना छूटता है तो उसको अभिघातज ज्वर कहा जाता है। अधिक परिश्रम करनेसे शरीरमें वायु प्रायः रक्तको प्रदूषित करता हुआ पीड़ा, शोक तथा शरीरके सामान्य वर्णोंको परिवर्तित करनेवाले पीड़ायुक्त ज्वरको उत्पन्न कर देता है।
ग्रह-प्रभाव, औषधि-प्रयोग, विष-पान तथा क्रोध, भय, शोक एवं कामजन्य भी सन्निपात-ज्वर होता है। ग्रहावेशसे जो ज्वर उत्पन्न होता है, उसमें रोगी अकस्मात् हँसने और रोने लगता है। औषधि और गन्ध-विशेषके प्रयोगसे आये हुए सन्निपात-ज्वरमें मूर्च्छा, सिरपीड़ा, वमन, कम्प तथा क्षय (शरीर-शैथिल्य)-का प्रभाव रोगीपर रहता है। विष-पानसे मूर्च्छा, अतिसार, पीलापन, दाह और मस्तिष्क-भ्रान्तिके लक्षण रोगीमें स्पष्ट होने लगते हैं। क्रोधजन्य सन्निपातमें शरीर काँपने लगता है, मस्तिष्कमें पीड़ा होती है। भय तथा शोकसे उत्पन्न हुए ज्वरमें रोगी प्रलाप करता है। कामजन्य ज्वरमें भ्रम, अरुचि, दाह, लज्जा, निद्रा, बुद्धि तथा धैर्यका ह्रास हो जाता है।
सन्निपातिक ग्रहावेशादिके कारण उत्पन्न हुए ज्वर और आगन्तुकरूप आदि रूपजन्य ज्वरमें वायुका प्रकोप ही प्रभावी रहता है। कोपजन्य ज्वरके कारण रोगीमें पित्त प्रकुपित हो उठता है। शाप तथा अभिचारकर्मके कारण जो ये दो सन्निपात-ज्वर प्राणीमें आते हैं, ये दोनों अत्यन्त भयंकर होते हैं। इन दोनों ज्वरोंको सहन करना रोगीके लिये अतिशय कठिन है। अभिचारजन्य ज्वर तान्त्रिकोंके द्वारा प्रयुक्त मन्त्रोंसे शरीरमें आता है। इसमें मन्त्र-प्रभावके कारण उत्पन्न किये गये असह्य कष्टोंसे प्राणी संतप्त होता रहता है। इसी अभिचार-मन्त्रके द्वारा इसकी पूर्वावस्थाकी जानकारी करनी चाहिये, तत्पश्चात् शरीरपर विचार करना अपेक्षित है। उसके बाद रोगीमें उठे हुए संतापसे विस्फोट तथा दिग्भ्रमित दाह, मूर्च्छा, चेतना आदिसे ज्वरका परीक्षण करना उचित होता है। अन्यथा उस रोगीमें सर्वप्रथम प्रदाह और मूर्च्छाका प्रकोप होता है। उसके बाद ज्वर प्रतिदिन बढ़ता रहता है।
इस प्रकार संक्षेपमें<sup>२</sup> आठ प्रकारका ज्वर देखा गया, किंतु वह विभिन्न प्रकारका होता है—यथा—शारीरिक, मानसिक, सौम्य, तीक्ष्ण, अन्तर्बाह्य, प्राकृत, वैकृत, साध्य, असाध्य, सामज्वर और निरामज्वर इसके विविध रूप हैं।
ज्वर होनेपर प्रथम शरीरमें शारीरिक, मनमें मानसिक ज्वर आनेपर पहले मनमें अनन्तर शरीरमें ताप होता है। प्राकृतिक वायुके बाह्य-प्रभावसे नाक-कान तथा मुँह आदिके द्वारा जो वायु ग्रहण की जाती है, उसके कारण कफ मिश्रित होता है, तब शरीरमें शीत बढ़ जाता है। पित्त-मिश्रित शरीर होनेपर शरीरमें दाह होता है। कफ तथा पित्त दोनोंकी मिश्रित-अवस्थामें शीत और दाहका मिश्रित प्रभाव पड़ता है। इसलिये वात-कफ-ज्वर सौम्य तथा वात-पित्त-
१-च०चि०अ० ३, अ०हृ०नि०अ० २। २-अ०हृ०नि०अ० २।४६।
१२९- हिक्कारोग-निदान
काण्ड ] ज्वर-निदान २५७
ज्वर तीक्ष्ण होता है। अन्तराश्रयज्वरमें अन्तर्विकार अधिक होते हैं तथा तीव्र दाह और मल-मूत्रादिका विबन्ध होता है, बहिराश्रयज्वरमें केवल बाहरी ताप होता है। इसमें तीव्र दाह और मल आदिकी विबन्धता नहीं होती, इसलिये बहिराश्रय-ज्वर सुख-साध्य और अन्तराश्रयज्वर दुःसाध्य होता है।
वर्षा, शरद् तथा वसन्त-ऋतुओंमें वात-पित्त और कफके प्रभावसे जो ज्वर उत्पन्न होता है, उसे प्राकृत-ज्वर कहा जाता है (यथा वर्षाकालमें वातिक, शरत्कालमें पैत्तिक एवं वसन्तकालमें श्लैष्मिक ज्वरका प्राकृतिक प्रभाव रहता है।), वह साध्य है। इस वैकृत ज्वरका जो विपरीत रूप है, वह दुःसाध्य माना गया है। प्राकृतिक ज्वर प्रायः वायुदोषके कारण होता है, यह भी दुःसाध्य है। वायु वर्षाकालमें दोषयुक्त हो जाती है, उसके प्रभावके कारण पित्त एवं कफसे समन्वित ज्वर प्राणियोंमें होता है। शरत्कालमें पित्त-दोषजन्य ज्वरकी उत्पत्ति होती है। इस कालमें पित्त-दोषका अनुगमन कफ करता रहता है, इसलिये इस कालके ज्वरमें पित्त एवं कफ दोनों मिलकर रोगीको कष्ट देते हैं। इस प्राकृतिक ज्वरसे मुक्ति प्राप्त करनेके लिये भोजन न करनेसे रोगीको किसी अन्य रोगका भय नहीं रहता है। वसन्तकालमें कफ कुपित होकर ज्वर उत्पन्न करता है। उसके पीछे ही वात एवं पित्तके दोष भी लगे रहते हैं। इस ज्वरमें उपवाससे हानि हो सकती है।
यदि रोगी बलवान् हो और ज्वर अल्प दोषसे उत्पन्न हुआ हो तथा कासादि दोष उपद्रवोंसे रहित हो तो सुख-साध्य होता है। जैसे रोगीको जैसा ज्वर असाध्य होता है वह पहले बताया गया है। इसका उपद्रव हो जानेपर रोगीमें चिड़चिड़ापन, मन्दाग्नि, बहुमूत्रता, अरुचि, अजीर्ण तथा भूख न लगनेके लक्षण उभर आते हैं, यही सामज्वर है।
तेज ज्वर होनेपर अधिक प्यास-प्रलाप, श्वास तथा चक्कर आता है। नाक-कान, मुँह तथा गुदाभागसे मल निकलनेकी गति तेज होती है। उत्क्लेश होता है, जिससे रोगीको कष्ट होता है। यह पच्यमान-ज्वरका लक्षण है। सामज्वरसे विपरीत लक्षण होनेपर सात दिनका लंघन करना चाहिये, क्योंकि आठवें दिन ज्वर निराम हो जाता है।
मल<sup>१</sup>, काल तथा बलाबलके कारण ज्वर पाँच प्रकारका कहा गया है। यथा—निरन्तर विद्यमान रहनेवाला, सततवाही ज्वर, दूसरे दिनतक रहनेवाला ज्वर, तीसरे और चौथे—चार दिनतक रहनेवाला। विशेषतः ये ज्वर सन्निपातसे ही होते हैं। इस ज्वरमें धातु-मूत्र और विष्ठाको शरीरसे बाहर निकालनेवाले मार्ग मलव्यापी हो जाते हैं। इस समय वे सभी दूषित होकर एक समान ही सम्पूर्ण शरीरको संतप्त करते हैं तथा दूष्य पदार्थों, देश, ऋतु और प्रकृतिद्वारा बढ़कर और बलवान् भारी तथा स्तब्ध होकर रसादिके आश्रित हो जाते हैं तथा प्रतिद्वन्द्वितासे रहित होकर वातादि दोष दुःसह संतत-ज्वरको उत्पन्न करते हैं। अनल-धर्म-ज्वरकी गर्मी, कभी मल और कभी धातुओंका शीघ्र ही क्षय कर देते हैं।
मल<sup>२</sup> और धातुओंके क्षयके कारणसे रसादि सप्त धातु, मल, मूत्र और तीनों दोष—इन बारह पदार्थोंको ज्वरकी ऊष्मा सर्वाकार निःशेष करके कफकी अधिकतासे उत्पन्न हुआ यह संतत-ज्वर सात, दस या बारह दिनमें या तो रोगीको छोड़ देता है या मार डालता है, यह अग्निवेशका मत है। इस विषयमें हारीतका यह मत है कि रोगीकी नीरोगता तथा मृत्युके लिये चौदह, अठारह तथा बाईस दिनतक त्रिदोषकी मर्यादा होती है।
धातुजन्य<sup>३</sup> शुद्धता अथवा अशुद्धताके कारण यह संतत-ज्वर प्राणीके शरीरमें अधिक समयतक
१-अ०हृ०नि०अ० २-५, ६-५९, सु०उ०अ० ३९। २-अ०हृ०नि०अ० २, च०चि०अ० ३, ५३-७३। ३-अ०हृ०नि०अ० २-६३-६६। च०चि०अ० ३, सु०उ०अ० ३९।
१३०- राजयक्ष्मा-निदान
| २५८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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भी अवस्थित रह सकता है। दुर्बल तथा व्याधिमुक्त रोगीके मिथ्याहारादि (अपथ्य)-सेवनसे शरीरमें प्रविष्ट अल्प दोष भी अन्य दूसरे दोषोंसे शक्ति ग्रहणकर महाबलवान् हो जाते हैं। जिस उपचार या पथ्यके कारण ज्वर बढ़ता और घटता है, उसे प्रत्यनीक कहते हैं। यह ज्वर विक्षेप, क्षय तथा वृद्धिसे युक्त रहता है। उपर्युक्त मिथ्याहारका सेवन करनेवाले मनुष्यके देहमें वातादि दोषोंमेंसे कोई-सा बलवान् दोष अपने प्रकोपकालमें संतत आदि ज्वर उत्पन्न करता है। परंतु यह तभी सम्भव है, जब उसे अपने पक्षके किसी रसादि दूष्य पदार्थसे सहायता मिले, सहायता न मिलनेपर वह बलहीन होकर क्षीण हो जाता है।
क्षीण हो रहे दोषसे युक्त ज्वर सूक्ष्म होता है, जो शरीरके अंदर विद्यमान रसादिक^१ सप्त धातुओंमें ही लीन रहता है। रस आदिमें सूक्ष्मभावसे विद्यमान रहनेके कारण वह ज्वर शरीरमें कृशता, विवर्णता और जडतादिको उत्पन्न कर देता है। रसवाही स्रोतोंके मुख खुले होनेके कारण ज्वरको उत्पन्न करनेवाले दोष उन स्रोतोंमें प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त हो जाते हैं। इस कारण संतत-ज्वर निरन्तर रहता है और उक्त हेतुके विपरीत होनेपर सम्पूर्ण स्रोत दूरवर्ती सूक्ष्म मुखवाले होते हैं। इसलिये ज्वरको उत्पन्न करनेवाले दोष विलम्बमें प्रविष्ट होते हैं अर्थात् सम्पूर्ण देहमें फैलने नहीं पाते, इसलिये विच्छिन्न कालमें सततादि ज्वरको उत्पन्न करते हैं। अतः सततादि ज्वर संतत-ज्वरसे विपरीत होता है।
विषमसंज्ञक^२ ज्वरका प्रारम्भ, क्रिया और काल विषम होता है तथा यह ज्वर दीर्घ कालानुबन्धी होता है, प्रायः रक्ताश्रित दोष सतत-ज्वरको उत्पन्न करता है। यह ज्वर अहोरात्रमें दो बार होता है अर्थात् दिनमें एक बार, रातमें एक बार अथवा कभी दिनमें दो बार, रातमें दो बार। जब दोष मांसवाही नाड़ीमें आश्रित होकर अन्येद्यु नामक विषम ज्वरको उत्पन्न करता है, तब यह दिन-रातमें एक बार होता है। उसी ज्वरके प्रभावमें जब मांसवाही एवं मेदावाही नाड़ियाँ भी प्रकुपित दोषके संसर्गमें आ जाती हैं, वह लक्षण तृतीयक (तिजरिया) ज्वरके अन्तर्गत मान लिया जाता है।
तृतीयक ज्वर तीन प्रकारका होता है—वात-पित्ताधिक्य, कफ-पित्ताधिक्य और वात-कफाधिक्य। प्रथम दिन पित्त और वायुके प्रकुपित होनेसे ज्वर मस्तकका ग्राही हो जाता है। दूसरे दिन कफ तथा पित्तके प्रकोपसे वह रीढ़की हड्डीमें प्रविष्ट हो जाता है और तीसरे दिन वायु एवं कफसे दूषित होनेसे वह ज्वर सम्पूर्ण पीठपर अधिकार कर लेता है। अर्थात् पित्त और वायुके प्रकुपित होनेसे ज्वर-प्रभावके कारण पहले दिन रोगीका मस्तक जलने लगता है और उसमें पीड़ा होती है। दूसरे दिन कफ तथा पित्तके प्रकुपित होनेसे रीढ़की हड्डीमें दर्द होता है, तीसरे दिन वायु एवं कफके दोषजन्य प्रभावके बढ़नेसे रोगीको ताप तो होता ही है, किंतु उसकी समस्त पीठमें पीड़ा होती है। यह ज्वर एक-एक दिनका अन्तराल छोड़कर शरीरके तीनों भागोंको प्रभावित करता है, इसीलिये इसको 'एकाहान्तर' नामसे स्वीकार किया गया है।
वात-पित्त और कफजन्य दोषके कारण शरीरके अंदर अधिक बननेवाले मलके द्वारा ज्वर जब मेदा-मज्जा-हड्डी तथा अन्य स्थितियोंमें पहुँच जाता है, तब उसको चतुर्थक ज्वर कहा जाता है। लौकिक भाषामें इसीको लोग 'चौथिया बुखार' कहते हैं। जब यही ज्वर मज्जाभागमें प्रविष्ट होता है तो यह दूसरे प्रकारका हो जाता है और इसका
१-रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा तथा शुक्र—ये सात धातु शरीरको धारण करते हैं। २-च०चि०अ० ३, अ०हृ० नि० अ० २।
काण्ड ] ज्वर-निदान २५९
प्रभाव भी शरीरपर दूसरी रीतिसे पड़ता है।
वाय्वाधिक्यसे सिरमें वेदना होती है। कफाधिक्यसे जंघामें प्रारम्भ होती है। उक्त सिर एवं जंघामें वेदना होकर ही ज्वर चढ़ता है।
तदनन्तर वह अस्थि एवं मज्जामें जाकर अवस्थित होता है। इसी कारण इसको चतुर्थक ज्वरका विपर्यय<sup>२</sup> (दूसरा) रूप माना जाता है। यह ज्वर अपने संतापकालमें एक दिनका अन्तराल करके रोगीपर तीन दिनतक तीन प्रकारसे आक्रमण करता है। यह अस्थि और मज्जा—इन दो धातुओंमें आश्रित होनेके कारण लगातार तीन दिनतक रहकर बीचमें एक दिन छोड़कर आता है और फिर तीन दिन लगातार रहता है। बलाबलके प्रभावसे वात-पित्त तथा कफजन्य दोष अथवा अन्य विकृत चेष्टाओंको जन्म देनेवाले विकारोंकी परिपक्व-स्थितिके आ जानेपर रोगीको सात दिनका लंघन करना चाहिये।
इसी तरह जिस-जिस समय रजोगुण एवं तमोगुणके कारण मानस दोष और मानस कार्यका बलाबल होता है, उसी-उसी समयमें यह सततादि ज्वर उत्पन्न होकर चढ़ता-उतरता रहता है।
उस प्रत्येक कालमें रोगीके कर्मका प्रभाव दिखायी देता है। सन्निपातके द्वारा सम्भूत कारणसे गम्भीर धातुओंमें समाहित दोषोंकी प्रबलता होनेपर यह चतुर्थक ज्वर अत्यन्त कठिन चिकित्साकी अपेक्षा करने लगता है अर्थात् ज्वरका शमन, चिकित्सकके लिये दुःसाध्य हो जाता है। दूरतम देश-काल और अवस्थाके अनुसार सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूपसे ज्वरका शरीरमें जो संक्रमण होता है, रक्तादिक मार्गोंमें जो दोष बहुत समय पहलेसे धीरे-धीरे अल्पमात्रामें प्रभावी होता है, वह सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त नहीं होता (अतएव वह एक दिन शरीरपर अपना पूर्ण अधिकार कर लेता है) और उसी दोषके कारण वह ज्वर प्राणीमें संतापादिके कष्टोंको उत्पन्न करता है। अतः प्राणीको प्रयत्नपूर्वक यथोपचारसे उस ज्वरका विनाश कर देना चाहिये, अन्यथा वह असाध्य हो जाता है। ज्वरका सामान्य लक्षण तो यही है कि वह शरीरमें तापसे युक्त होकर अनुभूत होता है।
विषमगतिसे प्रारम्भ होनेवाला ज्वर विषम कहा जाता है। यह विषम ज्वर मध्यरात्रिकालतक अपने पूर्ण वेगमें रहता है। उसके बाद उसकी गति और शक्ति दोनों मन्द हो जाती है। उसी कालके अनुसार वह शरीरके रसादिपर अपने दोषका प्रभाव डालता है और धीरे-धीरे निष्प्रभावी होता है। ऐसा प्रकुपित दोष प्राणीको अधिकतम समयतक अस्वस्थ रखता है। जैसे भूमिमें जलसे सिंचित बीज अंकुरणके लिये समयकी प्रतीक्षा नहीं करता, वैसे ही (वात-पित्त तथा कफजन्य) दोषका बीजरूप स्वयंको शरीरमें प्रकट करनेके लिये समयकी प्रतीक्षा नहीं करता। जिस प्रकार विष वेगपूर्वक शरीरके आमाशयमें जाकर बलवान् होकर क्रुद्ध हो उठता है, उसी प्रकार शरीरमें स्थित दोष भी यथासमय शक्ति-सम्पन्न होकर स्वास्थ्यपर क्रोध करता है। इसी प्रकार सततादि ज्वर भी शरीरमें विषम भावको प्राप्त कर लेते हैं।
अधिक<sup>३</sup> कष्टका होना, शरीरका भारी लगना, दीनता, अङ्ग-भङ्ग (शरीरका टूटना), जँभाई, अरुचि, वमन और श्वासका फूलना आदि ये दोष सभी रसगत ज्वर होते हैं। जब ज्वर रक्तगत<sup>३</sup> संश्रित हो जाता है तो उस अवस्थामें रोगीको रक्तका वमन, प्यास, रूक्षता, उष्णता, शरीरपर छोटी-छोटी पीडिकाओं (दानों)-का निकलना, दाह, लालिमा, भ्रम, मद तथा प्रलापका उपद्रव
१-सु०उ०अ० ३९।
२-माधव नि० ज्वर ४८-५३।
३-सु०उ०अ० ३९, च०चि०अ० ३।
१३१- अरोचक, वमन आदि रोगोंका निदान
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होता है। मांस और मेदामें ज्वरके संश्रित होनेपर तृष्णा, ग्लानि, कान्तिमन्दता, अन्तर्दाह, भ्रम, अन्धकारदर्शन, दुर्गन्ध, गात्रविक्षेपका दोष उत्पन्न हो जाता है। ज्वरके अस्थिगत होनेपर पसीना, अधिक प्यास, वमन, दुर्गन्धिकी प्रतीति, चिड़चिड़ापन, प्रलाप, ग्लानि तथा अरुचि एवं हड्डियोंमें तोड़ने-जैसी पीड़ा होती है। ज्वरके मज्जागत हो जानेपर उक्त दोष तो होते ही हैं, उसके अतिरिक्त श्वास, अङ्गविक्षेप, अस्पष्ट-ध्वनि, बाह्य शीतलता और हिचकीके दोषकी प्रवृत्ति बढ़ जाती है। शुक्रमें दोषके संश्रित होनेपर रोगीको दिनमें भी अन्धकार दिखायी देता है, शरीरके मर्मोंमें छेदने-जैसी पीड़ा होती है। जननेन्द्रियके स्तब्ध होनेपर निरन्तर उससे वीर्य बहता रहता है। प्रायः ऐसी अवस्थामें शुक्रगत हो जानेपर रोगीकी मृत्यु होती है। वस्तुतः रस, रक्त, मांस, मेद तथा मज्जागत—ये पाँचों ज्वर उत्तरोत्तर दुःसाध्य होते हैं।
मन्द ज्वर होनेपर सम्पूर्ण शरीर कफद्वारा भारीपनके दोषसे संलिप्त रहता है। रोगी प्रलाप करता है, उसको शीतलताकी अनुभूति होती है तथा उसके सभी अङ्ग शिथिल हो जाते हैं। जब शरीरमें नित्य ही मन्द ज्वर होता है तो शरीरमें सूखापन रहता है, रोगी शीतलताका अनुभव करता है और शरीरमें दुर्बलता आ जाती है तथा श्लेष्माकी अधिकता हो जाती है।
जिस ज्वरमें शरीर हल्दीके वर्णका हो जाता है और पेशाब भी पीला हो जाता है, उसको हरिद्रक ज्वर कहा जाता है, यह यमके समान मारनेवाला होता है।
जिसके शरीरमें कफ और वात समान रूपमें रहते हैं तथा पित्तकी कमी होती है, उसमें यह ज्वर दिनमें मन्द वेगसे एवं रात्रिमें तेज हो जाता है तथा इसे रात्रिज्वर कहते हैं।
व्यायामके कारण दिवाकरके शक्ति संचय न करनेसे जब रोगीका शरीर शुष्क हो जाता है तो वातकी अधिकताके कारण रोगीके शरीरमें सदा रातमें ज्वर रहता है, उसे पौर्वरात्रिक ज्वर कहा जाता है।
इस ज्वरमें श्लेष्मा पित्तके नीचे आमाशयमें स्थित रहनेपर आत्मस्थ होकर रोगीका आधा शरीर शीतल और आधा उष्ण रहता है। ज्वरके समय रोगीके शरीरमें जब पित्त परिव्याप्त रहता है तथा श्लेष्मा अन्तमें स्थित रहता है। इसलिये उसका शरीर उष्ण और हाथ-पैर ठंडे रहते हैं। रस और रक्तमें आश्रित तथा मांस एवं मेदामें स्थित ज्वर साध्य है। हड्डी और मज्जामें स्थित ज्वर कष्ट-साध्य है। ज्वर जिस-जिस अङ्गमें रहता है, उसे कान्तिहीन कर देता है। इस ज्वरमें रोगी संज्ञाहीन, ज्वरके वेगसे आर्त और क्रोधयुक्त रहता है। रोगी सदा दोष-समन्वित उष्ण मलका वेगपूर्वक परित्याग करता है।
ज्वरके* शान्त होनेपर शरीर लघु (हल्का) हो जाता है, थकान, मोह और संताप दूर हो जाता है, मुखमें छाले पड़ जाते हैं, इन्द्रियोंमें निर्मलता आ जाती है, पीड़ा नहीं रहती, शरीरमें उचित पसीना छूटता है, भूख लगती है, मन स्वस्थ तथा प्रसन्न हो जाता है, अन्न-ग्रहणकी इच्छा होने लगती है तथा सिरमें खुजलाहट होती है। (अध्याय १४७)
* अ०हृ० निदान २।७९, सु०उ०अ० ३९।
काण्ड ] रक्त-पित्त-निदान २६१
रक्त-पित्त-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब इसके बाद मैं रक्त¹-पित्तके निदानका विधिवत् वर्णन करता हूँ।
अत्यन्त उष्ण, तिक्त, कटु, अम्ल, नमक आदि जो पेटमें विशेष प्रकारका दाह उत्पन्न करनेवाले पदार्थ हैं और कोदो, उद्दालक आदि गरिष्ठ अन्नसे बने भोजन हैं तथा अन्य पित्तवर्धक शाक-पात हैं, उन सभीका अधिक सेवन करनेसे शरीरमें पूर्वसे स्थित पित्तात्मक द्रव कुपित हो उठता है और परस्परमें मिलकर वह रक्तपर दूषित प्रभाव डालता है। जिससे शरीरका रक्त दूषित हो जाता है, उन्हीं भोज्य एवं पेय पदार्थोंके प्रभावसे पित्त और रक्त एक-सा रूप धारण करके सम्पूर्ण शरीरपर अधिकार कर लेते हैं। संसर्ग-दोषके कारण विकृत हुए रक्त-पित्त-गन्ध-वर्ण तथा दोष-प्रवृत्तिमें एक अनुरूपता होनेपर भी उसको रक्त² नामसे ही जाना जाता है। वह दूषित रक्त प्लीहा तथा यकृत भागवाले कोष्ठसे उत्पन्न होता है। इस कारण उसका नाम रक्त-पित्त है।
रक्त-पित्तका दोष निम्नलिखित उपद्रवोंसे जाना जा सकता है। मस्तिष्कमें भारीपन, अरुचि, शीतल पदार्थके सेवनकी इच्छा, कण्ठसे धूम निकलनेका आभास तथा अम्लतायुक्त डकारोंका आना, वमन, वमनमें दुर्गन्ध, खाँसी, श्वास, भ्रम, थकान, लोहा, रक्त तथा मछलीकी-सी गन्ध, स्वरमें क्षीणता, नयनादि अङ्गोंमें लाली, हल्दीकी तरह पीलापन अथवा हरापन होना, नीले, लाल और पीले रंगमें भेदका न मालूम होना और स्वप्नमें भी लाल रंग दिखायी देना—ये लक्षण रक्त-पित्तरोग होनेवालेमें पाये जाते हैं।
रक्त-पित्त तीन प्रकारका होता है—ऊर्ध्वगामी, अधोगामी और उभयगामी। इनमेंसे ऊर्ध्वगामी रक्त-पित्त दोनों नाकके छिद्रों तथा आँखों, कानों और मुख—इन सात द्वारोंसे निकलता है, अधोगामी कुपित रक्त मूत्रेन्द्रिय, योनि और गुदासे निकलता है और उभयगामी रक्त-पित्त समस्त रोमकूपों एवं पूर्वोक्त दसों द्वारोंसे निकलता है। ऊर्ध्वगामी साध्य रक्त-पित्त-कफकी अधिकतासे निकलता है। इसलिये इसका साधन विरेचन है। पित्तशान्तिकी बहुत-सी औषधियाँ हैं, उनमें सबसे प्रधान विरेचन है तथा रक्त-पित्तका अनुबन्धी कफ होता है और कफकी औषधि भी विरेचन ही है। फान्ट आदि कषाय, मधुर रसयुक्त होनेपर भी रोगनाशक होनेके कारण वातादिके दोषसे रहित कफवाले रोगीके लिये हितकारी होते हैं। ऐसी स्थितिमें कटु, तिक्त और कषाय द्रव्य जो स्वभावसे ही कफका नाश करनेवाले हैं, ये अत्यन्त लाभप्रद होते हैं। अधोगामी रक्त-पित्त-वातसे उत्पन्न होनेके कारण याप्य (साध्य) होता है। इसकी चिकित्सा वमन है। पित्तकी चिकित्सा अल्प होनेके कारण वमनसे श्रेष्ठ औषधि नहीं है। रक्त-पित्तका अनुबन्धी वात है। इसीलिये वमन वातका शमन नहीं करता। इसलिये रक्त-पित्त दोषमें मधुर कषाय ही हितकारी होता है।
शरीरमें कफ तथा वायुके संसृष्ट होनेपर रक्त-पित्तजनित उभयगामी रक्त-पित्त असाध्य हो जाता है। प्रतिलोम होने और औषधिसे असाध्य होनेके कारण यह रोग असह्य होता है। प्रतिलोम होनेके कारण इस दोषका कोई प्रतिकार नहीं है। रक्त-पित्त रोगमें शोध प्रतिलोम (रोगका उल्टा) उपाय ही बतलाया गया है। रोगका इसी तरहसे संशोधन और उपशमन सम्भव है।
वात³-पित्त तथा कफ आदि दोषोंके एक-
१-च०चि०अ० २, सु०उ० ४५–५२। २-च०चि०अ० ४, अ०हृ०अ० ३। ३-सु०उ०अ० ४५, च०चि०अ० २, सु०चि०अ० ३४।
१३२- हृदय-तृषारोगका निदान
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दूसरे दोषमें संसृष्ट हो जानेपर सब प्रकारसे शमन औषधि ही हितकारी होती है। इस रोगसे रक्षा करनेमें शिरावेध परीक्षणविधि ही दिखायी देता है। वस्तुतः ऐसे दोषोंमें होनेवाले उपद्रव विकारको लक्ष्य करके ही शरीरपर प्रभावी होते हैं। अतः रोगीके शरीरमें दृष्टिगत उपद्रवोंसे अन्य विकार न उत्पन्न हों, उसके पूर्व ही उनका शमन तथा परीक्षण करा लेना चाहिये। (अध्याय १४८)
कास (खाँसी)-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा—कास (खाँसी)-रोग यथाशीघ्र प्राणीपर अपना कुप्रभाव दिखाता है, इसलिये उसी रोगको अब कहा जायगा।
खाँसी वातज, पित्तज, कफज, क्षतज तथा धातु-क्षयज होनेसे पाँच प्रकारकी मानी गयी है। यदि इन पाँचोंके विनाशकी उपेक्षा कर दी जाती है तो ये क्षयको उत्पन्न कर देती हैं, यह उत्तरोत्तर बलवान् हो जाती हैं। इसका भावी रूप इस प्रकार होता है—
कासरोग होनेपर कण्ठमें खुजलाहट और अरुचि होती है। कान, मुख तथा कण्ठमें शुष्कता आ जाती है। शरीरमें वायु प्रायः अधोगामी होता है। इस रोगमें ऊर्ध्वगामी होकर वक्षःस्थलमें जा पहुँचता है, वहाँ अभिघात करते हुए वायु कण्ठमें रोगकी सृष्टि करता हुआ मस्तिष्क तथा रक्तवाही आदि शरीरके तेरहों स्रोतोंमें जाता है। तदनन्तर सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंमें प्रविष्ट होकर आक्षेप एवं उनको कष्ट पहुँचाता है।
इसका प्रकोप होते ही नेत्रोंमें उत्क्षेप करता हुआ और पीठ तथा हृदय एवं पार्श्वोंमें पीड़ा उत्पन्न करता हुआ मुखसे निकलता है। बोलनेमें<sup>१</sup> भी रोगीको कष्ट होता है, फूटे हुए काँसेकी ध्वनिके समान मुखसे वाणी निकलती है, हृदयके पार्श्वभाग तथा शिरोभागमें पीड़ा उठती है, मोह और क्षोभ होता है एवं स्वरभंग हो जाता है। यह रोगीको अत्यन्त तेज पीड़ाके साथ सूखी खाँसी खाँसनेके लिये विवश कर देता है। रोगीको रोमाञ्च हो जाता है। खाँसनेपर बड़ी ही कठिनतासे अंदरसे सूखा हुआ कफ बाहर निकलता है, जिससे खाँसी कुछ कम हो जाती है।
पित्तजन्य<sup>२</sup> कास होनेसे नेत्र पीले पड़ जाते हैं, मुखमें तीतापन रहता है, ज्वर और भ्रम होता है, रोगी पित्त तथा रक्तसंस्रित वमन करता है, उसे प्यास लगती है, कण्ठसे निकलनेवाली ध्वनि टूटी रहती है, उसको सब ओर धुआँ-ही-धुआँ दिखायी देता है और धूमायित एवं खट्टी डकार आती है तथा उसमें एक प्रकारका मद छाया रहता है। जब रोगीको खाँसीका वेग आता है तो उसी खाँसीके बीच आँखोंके सामने चमकता हुआ छोटा-छोटा प्रकाशपुञ्ज दिखायी देता है।
कफजन्य कासरोग होनेपर वक्षःस्थलमें सामान्य वेदना होती है, सिरमें भारीपन तथा हृदयमें जकड़न आ जाती है। कण्ठमें किसी द्रव्य पदार्थके लेपका अनुभव होता है। एक प्रकारका मद-जैसा शरीरपर छाया रहता है तथा पीनस, वमन, अरुचि, रोमाञ्च और घने स्निग्ध कफकी प्रवृत्ति होती है।
युद्धादि अत्यन्त साहसिक विभिन्न कर्मोंको करनेवाले लोगोंद्वारा जब शक्तिसे अधिक कर्म किया जाता है तो उससे वक्षःस्थलमें क्षत हो जाता है। पित्तसे अनुगमित होकर वायु बलवान् हो जाता
<sup>१</sup>अ०हृ०नि०अ० ३।२१, सु०उ० ५२। <sup>२</sup>अ०हृ० नि०अ० ३, २४-२५; सु०उ० ५२।
१३३- मदात्यय-निदान
काण्ड ]
कास (खाँसी)-निदान
२६३
है। तदनन्तर उसके कारण रोगीको खाँसी आने लगती है, जिसके द्वारा मुखसे रक्तसंश्रित कफ अधिक निकलता है। प्रायः यह कफ पीला, पिंगल, शुष्क, ग्रथित (लोथड़ेकी भाँति) और अत्यन्त दूषित होता है।
इस रोगमें रोगी रुग्ण-कण्ठसे कफरूपी मलको बाहर निकालता है, वायुदोषके कारण हृदय फटा-सा प्रतीत होता है और शरीरमें सुइयोंके चुभने-जैसे कष्टकी अनुभूति होती है तथा कष्टकारी शूलके आघातसे मर्मस्थलमें पीड़ा होती है, रोगीके पर्व-पर्वमें दर्द होता है और ज्वर भी रहता है। उसकी साँस फूलती है। प्यास बढ़ जाती है। उसकी वाणीमें स्वर-भंग होने लगता है तथा शरीरमें कम्पन रहता है।
रोगी<sup>१</sup> इस रोगमें कबूतरके समान कहरने लगता है। उसके पार्श्वभागमें शूल उठने लगता है। कफादि विकारोंके कारण उसको वमन होता है। उसकी शक्ति क्षीण होने लगती है और शरीरका वर्ण कान्तिहीन हो जाता है।
राजयक्ष्मारोग होनेसे रोगीका शरीर क्षीण होने लगता है। उसके पेशाबमें रक्त आता है। साँस फूलनेसे पीठ और कमरमें पीड़ा होती है। जिनको शास्त्रमें आयु कहा गया है, वे आयुरूपी धातुएँ शरीरमें प्रकुपित होकर दौड़ने लगती हैं। यक्ष्मासे पीड़ित रोगी घरको खाँसी और खखारसे भर देता है। वह खखार (पीब)-के समान दुर्गन्धयुक्त तथा हरे और लाल रंगका होता है। ऐसे रोगीको सोनेमें विशेष कष्ट होता है अर्थात् सुप्तावस्थामें भी रोगीको कष्ट होता रहता है। यह रोग रोगीके हृदयको गिरते हुएके समान कष्ट देता है। अचानक रोगीमें उष्ण और शीतल भोजन एवं पेय-पदार्थ ग्रहण करनेकी इच्छा होने लगती है। वह बहुत खाता है। उसका बल क्षीण होने लगता है। मुखपर स्निग्धता बनी रहती है। उसके नेत्र भी शोभा-सम्पन्न रहते हैं, किंतु रोगके बलवान् होनेके बाद सभी विनाशकारी राजयक्ष्माके लक्षण रोगीके शरीरमें जन्म लेते हैं।
क्षयजन्य<sup>२</sup> कासका रूप ऐसा ही है। इस रोगसे क्षीण हुए शरीरवाले रोगियोंकी मृत्यु निश्चित ही हो जाती है अथवा रोगियोंके बलवान् होनेपर यह रोग याप्य—साध्य रहता है। क्षतजन्य कासरोग भी उसी प्रकारका होता है। कास जब रोगीपर अपना प्रथम कुप्रभाव दिखाना प्रारम्भ करे, उसी कालमें इसकी चिकित्सा अपेक्षित है।
रोगीमें<sup>३</sup> उपचारका सामर्थ्य होनेपर यह रोग साध्य भी है। अतः रोगीको यथासामर्थ्य इस रोगका उपशमन अवश्य करना चाहिये, किंतु उपचार प्रारम्भ करनेके पूर्व उसके वात आदि सभी प्रकारोंपर विचार करके ही पृथक्-पृथक् रूपसे प्रयोज्य औषधि तथा पथ्यापथ्य आहार ग्रहण करना हितकर होता है। वृद्ध प्राणीके शरीरमें जो मिश्रित भावसे वातजादि कासरोग होते हैं, वह याप्य है। उनकी उपेक्षा करनेसे खाँसी, श्वास, क्षय, वमन तथा स्वरभंगादिक प्रतिश्यायका प्रकोप होता है। इसकी उपेक्षा करनेसे कासरोग असाध्य हो जाता है। इसलिये शीघ्र ही इसका उपचार कर लेना चाहिये।
(अध्याय १४९)
१-अ०हृ०नि०अ० ३, सु०उ० ५२। २-अ०हृ०नि०अ० ३, ३६-३७, सु०उ० ५२। ३-अ०हृ०नि०अ० ३, च०चि०अ० १८, सु०उ० ५२।
२६४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
श्वासरोग-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा—अब मैं श्वासरोगका निदान कह रहा हूँ।
कासरोगके परिपक्व हो जानेपर उसीसे शरीरमें श्वासरोगकी उत्पत्ति होती है अथवा प्रारम्भकालमें वात-पित्त तथा कफजन्य दोषोंके प्रकुपित होनेसे यह रोग उत्पन्न होता है। इस रोगका प्रादुर्भाव आमातिसार, वमन, विषपान और पाण्डु-रोग एवं ज्वरसे भी हो जाता है। धूलि-ग्रहण, धूप तथा शीत वायुके सेवन करनेसे भी इस रोगका जन्म हो सकता है। मर्मस्थलमें आघात पहुँचनेसे और बर्फीले जलका प्रयोग करनेसे भी शरीरमें इस रोगका प्रकोप हो जाता है।
यह रोग क्षुद्र, तमक, छिन्न, महान् तथा ऊर्ध्व नामसे पाँच प्रकारका माना गया है। कफके द्वारा सामान्य ढंगसे शरीरमें अवरोधित गतिवाला सर्वव्यापी वायु प्राणवाही, जलवाही, अन्नवाही तथा रक्त-पित्तादिजन्य स्रोतोंको प्रकुपित करता हुआ जब हृदयमें स्थित हो जाता है, तब वह आमाशयमें श्वासरोगको उत्पन्न करता है।
इस रोगका पूर्वरूप इस प्रकार होता है—रोगीके हृदय और पार्श्व (बगल)-भागमें शूल उठता है, प्राणवायु शरीरमें प्रतिलोम-गतिसे प्रवाहित होने लगती है, रोगीके मुखसे पीड़ाके कारण बराबर आह-आहकी ध्वनि निकला करती है, फूटे हुए शङ्खको बजानेसे जैसी ध्वनि प्रकट होती है, वैसी ही ध्वनि रोगीके शरीरकी पीड़ाके कारण होती है।
प्रायः शरीरमें इन लक्षणोंका उद्भव अधिक भोजन करनेसे होता है। अधिक भोजन करनेके दोषसे प्रेरित वायु स्वयं मलसे युक्त क्षुद्र श्वासको प्रेरित करता है अर्थात् अधिक भोजन करनेसे रोगीकी साँस फूलने लगती है और उसे मल-विसर्जन करनेकी इच्छा होती है। ऐसी स्थितिमें कफके अवरोधको पार करके वायु प्रतिलोम-भावसे शिरोभागमें प्रवेश करता है, जिससे वह हृदयमें पहुँचता है और वहाँ आमाशयमें जाकर श्वासरोगको बल देता है।
यह वायु<sup>२</sup>-प्रकोप उस समय सिर, गला और हृदयभागको अपने अधिकारमें लेकर पार्श्वभागोंमें पीड़ा उत्पन्न करता हुआ खाँसी, घुरघुराहट, मूर्च्छा, अरुचि और पीनस तथा तृषाका उपद्रव शरीरमें प्रकट करता है। प्राणोंको संतप्त करनेवाली साँस अत्यन्त वेगसे चलने लगती है। यद्यपि खाँसीके द्वारा कण्ठमें आये हुए दूषित कफको थूकनेसे तात्कालिक कुछ शान्ति रोगीको प्राप्त हो जाती है और वह कुछ क्षणके लिये सुखका अनुभव कर सकता है।
श्वासके प्रकोपसे रोगीको प्राणघातक कष्ट होता है। श्वासके प्रकोपसे अत्यन्त कष्ट होनेपर रोगी सो जाता है। यदि बैठ जाता है, तब वह अपनेको कुछ स्वस्थ अनुभव करता है। इस प्रकुपित रोगके कारण रोगीको कष्टाधिक्यके कारण आँखें ऊपरकी ओर निकलती हुई प्रतीत होती हैं, मस्तकसे पसीना छूटने लगता है और रोगी अत्यन्त कातर हो उठता है। बार-बार श्वास आनेसे रोगीका मुँह सूख जाता है। वह काँपता है और उष्ण आहार या पेय पदार्थके सेवनकी अभिलाषा करता है। मेघ घिरनेपर, वर्षा होनेपर, शीत गिरनेपर एवं पूर्वी हवा चलनेपर तथा कफकारक आहार-विहार करनेपर श्वासका वेग बढ़ जाता है।
१-अ०हृ० नि०अ० ४, च०चि०अ० १७, सु०उ०अ० ५१, आयु०नि०चि०दर्श पृष्ठ ४१। २-च०चि०अ० २१, अ०हृ० अ०४-७।
काण्ड ] हिक्कारोग-निदान २६५
यदि बलवान् मनुष्यके शरीरमें तमक नामक श्वास्रोग होता है तो वह याप्य-साध्य होता है। प्रथम दृष्ट्या तो ज्वर और मूर्च्छासे युक्त होनेपर रोगीके इस तमक श्वासका उपशमन शीतल द्रव्य पदार्थोंसे ही करना चाहिये। ऐसे रोगके उपभेदमें रोगी खाँसी और श्वासके प्रकोपसे ग्रस्त, शरीरसे निर्बल तथा मर्मस्थलकी पीड़ासे अत्यन्त दुःखी रहता है। उसे अधिक पसीना आता है, मूर्च्छा होती है, पीड़ासे वह कराहता रहता है, उसके मूत्राशयमें जलन एवं पेशाब (मूत्र) रुक-रुककर होता है। विभ्रमका प्रकोप होता है। रोगीकी दृष्टि अधोगति रहती है, अधिक कष्ट तथा तापके कारण आँखें अपने स्थानसे निकलती-सी प्रतीत होती हैं, उनमें चिकनापन तथा लालिमा छा जाती है, मुख सूख जाता है। कष्टके कारण रोगी प्रलाप करता है। शरीरका तेज नष्ट होकर चेतना भी नष्ट हो जाती है तथा वह मृत्युको प्राप्त हो जाता है।
महाश्वासका<sup>१</sup> रोग-प्रभेद होनेपर रोगी अपने शारीरिक, मानसिक तथा वाचिक महत्त्वसे रहित हो उठता है। वह दीन व्यक्तिके समान प्रतीत होता है, श्वासमें पीड़ाके कारण आवाज तथा गलेमें घड़घड़ाहट होती है। वह मतवाले साँड़के समान रात-दिन धूलिधूसरित होकर हुँकारके साथ श्वास छोड़ता है तथा ज्ञान-विज्ञानसे रहित हो जाता है। उसके नेत्र और मुखपर भ्रान्तिकी अवस्था आ जाती है। नेत्रोंसे वह किसी वस्तुको सत्यरूपमें जान नहीं पाता। उसकी जिह्वामें खाये गये द्रव्य पदार्थोंके स्वादको बतानेकी शक्ति नहीं रह जाती। उसके नेत्रोंमें झपकी चढ़ी रहती है। मूत्रके साथ रोगीका तेज भी निकलता है। उसकी वाणी मुखसे टूटी-फूटी निकलती है। रोगीका कण्ठ सूख जाता है। उसकी बारम्बार साँस फूलती है। उसके कान, गला और सिरमें अत्यन्त पीड़ा होती है। जिस रोगीकी लम्बी-लम्बी ऊर्ध्व गतिवाली साँस निकलती है, वह अपने श्वासको नीचेकी ओर ले जानेमें समर्थ नहीं हो पाता।
इस महाश्वासके<sup>२</sup> रोगमें रोगीके मुख और कान कफसे भरे रहते हैं। शरीरका प्रकुपित वायु उसे बहुत ही कष्ट देता है। अब मैं ऊर्ध्व श्वासके भेदकी समीक्षा कर रहा हूँ। इस रोगमें रोगी चारों ओर अपनी दृष्टिको फेंकता हुआ भ्रान्ति प्राप्त करता है। मर्म छेदनेकी-सी वेदना होती है और वाणी रुक जाती है। इन तीनों प्रकारके श्वासोंके लक्षण जबतक प्रकट नहीं होते हैं, तभीतक साध्य होते हैं, परंतु लक्षण प्रकट हो जानेपर असाध्य हो जाते हैं और निश्चित ही मृत्युकारक बन जाते हैं।
(अध्याय १५०)
हिक्कारोग-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं हिक्का (हिचकी)-रोगके निदानको कहूँगा, आप उसे सुनें।
श्वास्रोगके जो-जो निदान-पूर्वरूप, संख्या, प्रकृति और आश्रयस्थान कहे गये हैं, वे ही हिक्कारोगके भी होते हैं। यह हिक्का पाँच प्रकारकी होती है—भक्तोद्भवा (अन्नजा), क्षुद्रा, यमला, महती और गम्भीरा। रूक्ष, तीक्ष्ण, खर तथा असात्म्य अन्न अथवा पेय पदार्थोंके सेवनसे प्रकुपित वायु हिक्कारोगको पैदा करती है। इस हिक्कारोगमें रोगी श्वास लेता हुआ क्षुधानुगामी मन्द-मन्द शब्द
१-च०चि० २१, अ०हृ० नि०अ० ४। २-सु०उ० ५१, अ० हृ०नि०अ० ४।
१३४- अर्श (बवासीर)-निदान
| २६६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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करता है। अन्न तथा पेय पदार्थके अयुक्तपूर्वक सेवन करनेसे जो हिक्का (हिचकी) रोगीको आती है, उसे 'अन्नजा हिक्का' कहते हैं। यह हिचकी सात्म्य अन्नपानसे शान्त हो जाती है। अधिक परिश्रम करनेसे शरीरमें प्रकुपित हुआ पवन 'क्षुद्रा हिक्का' को जन्म देता है। वह ग्रीवामूलसे निकलकर मन्द-मन्द गतिसे कण्ठके बाहर आता है। यह रोग अधिक परिश्रम करनेसे बढ़ जाता है, किंतु यथोचित मात्रामें भोजन कर लेनेपर कुछ शान्त हो जाता है।
जो हिचकी<sup>१</sup> अधिक समयसे एक या दो बार वेगपूर्वक आती है, परिणामतः वह धीरे-धीरे बढ़ती जाती है। अपने वेगसे जो रोगीके सिर और ग्रीवाभागको प्रकम्पित कर देती है, उसको 'यमला हिक्का'के नामसे स्वीकार करना चाहिये। इसमें रोगी प्रलाप करता है तथा उसको वमन होता है और उसे अतिसार हो जाता है, कमजोरीसे उसके नेत्र बैठ जाते हैं और जम्भाई आती है। ऐसी अवस्थावाली हिक्काको वेगवती परिणाम देनेवाली 'यमला हिक्का' कहते हैं।
जिस हिक्कारोगके वेगसे रोगीकी भौंह और कनपटियोंमें कष्ट होने लगता है, कान तथा नेत्र बंद हो जाते हैं, कानोंसे सुनायी नहीं देता है और आँखोंसे दिखायी नहीं पड़ता है। रोगीके शरीर, वाणी और स्मरणकी शक्तिको शिथिल करती हुई जो हिक्का अन्तमें उसे संज्ञाशून्य कर देती है, तथा अन्य इन्द्रियोंको दुःखित करती हुई वह उसके मर्मस्थलमें पीड़ा पहुँचाती है तथा रोगीको पीठभागसे झुका देती है एवं शरीरको शुष्क कर देती है, उस हिक्काको 'महती हिक्का' कहा जाता है। यह महामूला, महाशब्दा, महावेगा और महाबला होती है।
गम्भीरा नामकी हिक्का पक्वाशय, मलाशय अथवा नाभिभागसे अपने पूर्वस्वभावके अनुसार शरीरमें प्रकट होती है तो उस रोगीको जम्भाई लेनेके लिये विवश कर देती है। उसके हाथ-पैर आदि सभी अङ्ग फैलने लगते हैं। उस हिक्काके कुप्रभावसे रोगीका सम्पूर्ण शरीर शिथिल पड़ जाता है। इसमें गम्भीर शब्द होता है, इसलिये इसका नाम 'गम्भीरा हिक्का' है।
प्रारम्भमें<sup>२</sup> बतायी गयी भक्तोद्भवा (अन्नजा) तथा क्षुद्रा नामक जो दो हिक्काके प्रकार बताये गये हैं, वे साध्य होती हैं। उन दोनोंको छोड़कर शेष अन्य जो यमलादिक तीन हिक्काएँ हैं, वे असाध्य होती हैं। किंतु चिरकाल (पुरानी) हिचकी, वृद्ध मनुष्यकी हिचकी, अतिस्त्री-सेवीकी हिचकी, व्याधिद्वारा क्षीण देहवालेकी हिचकी, अन्नके अभावसे कृश मनुष्यकी हिचकी—ये सब असाध्य होती हैं। सभी रोग शरीरमें प्राणियोंका विनाश करनेके लिये ही आते हैं। किंतु वे वैसी शीघ्रता नहीं करते हैं, जैसी शीघ्रता इस हिक्काके यमलादिक भेद करते हैं। हिक्का और श्वास—ये दोनों रोग जैसे हैं, वैसे अन्य कोई रोग नहीं हैं। वे दोनों तो मृत्युकाल-स्वरूप प्राणीके शरीरमें ही अपना डेरा डाल लेते हैं।
(अध्याय १५१)
राजयक्ष्मा-निदान
**धन्वन्तरिजीने कहा—**अब मैं हिक्कारोगके पश्चात् यक्ष्मारोग<sup>३</sup>के निदानको भलीभाँति कह रहा हूँ।
राजयक्ष्मारोगसे पूर्व प्राणीके शरीरमें अनेक रोग रहते हैं और बादमें अनेक रोग हो जाते हैं। इस रोगको राजयक्ष्मा, क्षय, शोष तथा रोगराज भी कहा जाता है। प्राचीनकालमें नक्षत्र और द्विजोके राजा चन्द्रमाको यह रोग हुआ था। एक तो यह रोगोंका राजा है और दूसरे इसका नाम यक्ष्मा है।
१-अ०हृ०नि०अ०५। २-अ०हृ०नि०अ० ४, च०चि०अ० २१। ३-सु०उ०तं०अ० ४१, च०चि०अ० ६, अ०हृ०नि०अ० ५।
| काण्ड ] | राजयक्ष्मा-निदान | २६७ |
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इसलिये इसे 'राजयक्ष्मा' कहा गया है। यह देह और औषधि दोनोंका क्षय कर देता है तथा शरीर और औषधिका विनाश करनेवाले रोगके रूपमें यह उत्पन्न होता है, इसलिये इसका क्षय नाम दिया गया है। यह रसादि धातुओंका शोषण करनेके कारण शोष नामसे भी जाना जाता है। राजाके समान रोगोंका राजा है, जिसके कारण रोगराजके नामसे अभिहित किया गया है।
साहसके कार्य मल-मूत्रादिके वेगका बलात् अवरोध, शुक्रौज, शारीरिक स्निग्धताका विनाश तथा संयमित आहार-व्यवहारका परित्याग—ये चार इस यक्ष्मारोगकी उत्पत्तिके कारण हैं। शरीरमें उन्हीं कारणोंसे कुपित हुआ वायु पित्त एवं कफको व्यर्थमें ही कुपित कर देता है। तदनन्तर वह शरीरके संधिस्थानोंमें प्रवेश करके उनकी शिराओंको पीड़ित करता हुआ रक्त, अन्न, रसवाही आदि सभी स्रोतोंके मुखोंको बंद करता है अथवा उसी प्रकार उन सभीको छोड़कर हृदयभागमें जा पहुँचता है और उसको मध्य, ऊपर, नीचे तथा तिरछे रूपमें व्यथित करता है।
इस रोगके उत्पन्न होनेसे पूर्व रोगीको प्रतिश्याय ज्वर, लार, प्रवाह, मुखमाधुर्य, अग्निमान्द्यता तथा शारीरिक शिथिलताका दोष होता है। अन्न और पेय पदार्थके प्रति अनिच्छा तथा पवित्रतामें अपवित्रताकी प्रतीति रोगीको होती है। प्रायः उसको भोज्य एवं पेय पदार्थोंमें मक्खी, तृण और बाल गिरनेका भान होता है। रोगीका हृदय कफादिसे संश्लिष्ट हो जाता है, उसको वमन होता है। आहार-विहारके प्रति उसकी रुचि नहीं रह जाती है। भोजन करनेपर भी वह अपनेको शक्तिहीन समझता है। उसके हाथ-पैर, जंघा, वक्षःस्थल, मुख, नेत्र तथा कुक्षिभाग सूख जाते हैं। रक्तकी कमीके कारण उसका रंग श्वेत हो जाता है। उसकी भुजाओंमें विशेष प्रकारकी पीड़ा होती है। उसकी जिह्वामें भी ज्वरादिके कारण उत्पन्न हुए छालोंसे कष्ट रहता है। उसको शरीरके प्रति स्वयं घृणा होती है। उसमें स्त्रीसंसर्ग, मद्य और मांसके प्रति प्रेम तथा घृणा दोनों होने लगते हैं। उसके सिरमें चक्कर आता है। इस रोगके होनेपर रोगीके नाखून, केश तथा अस्थि अपेक्षाकृत पहलेसे अधिक बढ़ते हैं। वह स्वप्नमें अपनी पराजय देखता है।
पतंग, कृकल (गिरगिट), साही, बंदर, कुत्ता तथा पक्षियोंसे भयार्त होकर अपनेको पराजित या गिरता हुआ देखता है। स्वप्नमें अपने शरीरके बाल तथा अस्थिभागको भस्म होते हुए देखकर वह भयभीत होता है। वह स्वप्नमें ही वृक्षपर चढ़ता है। उसे स्वप्नमें निर्जन ग्राम और देशका दर्शन होता है। जलरहित भूभागको देखनेके कारण उसे स्वप्नमें भय लगता है। उसको आकाशमें प्रकाशपुञ्ज तथा दावाग्निसे जलते हुए वृक्ष दिखायी पड़ते हैं, जिससे उस रोगीका मन भयसे व्याकुल हो उठता है। ये सब लक्षण रोगप्रभावके कारण ही होते हैं। अतः इसे पूर्वरूप कहते हैं।
इस राजयक्ष्मारोगके* कोष्ठगत होनेपर रोगीको पीनस, श्वास, कास, स्वरभंग, सिरपीड़ा, अरुचि, ऊर्ध्वनिःश्वास, शारीरिक शुष्कता, वधजन्य कष्ट तथा वमन होता है। उसके पार्श्वभाग तथा संधिस्थानमें पीड़ा होती है। उसका शरीर ज्वरसे संतप्त रहता है। इस प्रकार इस राजयक्ष्माके उक्त ग्यारह लक्षण रोगीके शरीरमें पाये जाते हैं। उनके उपद्रवसे रोगीके कण्ठमें ऐसी पीड़ा होती है जैसी श्वासमार्गमें विकृति एवं हृदयवेदना होनेपर होती है। उसे जम्भाई आती है, प्रत्येक अङ्गमें दर्द होता है, मुखसे बार-बार थूक निकलता है, मन्दाग्नि हो
* सु०उ० ४१, अ०हृ० नि०अ० ५।
| २६८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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जाती है तथा मुखसे दुर्गन्ध आने लगती है।
इस राजयक्ष्माके रोगमें वायुप्रकोपके कारण रोगीके शिरोभाग तथा दोनों पार्श्वमें शूल उठता है, जिसके कारण असह्य पीड़ा होती है। दर्दसे रोगीका अङ्ग-अङ्ग टूटता रहता है, कण्ठावरोध और स्वरभंग हो जाता है। पित्तदोष होनेसे रोगीको स्कन्ध-प्रदेश, हाथ तथा पैरमें दाह, अतिसार, रक्तसंश्रित वमन, मुखदुर्गन्ध, ज्वर और एक प्रकारका मद रहता है। कफजन्य दोषके कारण रोगीको अरुचि, वमन, खाँसी, आधे शरीरका भारीपन, लारबाहुल्य, पीनस, श्वास, स्वरभेद और अग्निमान्द्यका प्रकोप होता है। इसी अग्निमान्द्यता एवं शरीरमें शोथको उत्पन्न करनेवाले प्रदूषित कफजन्य दोषोंसे रोगीके रक्तवाही आदि स्रोतोंके मुखोंका अवरोध तथा धातुओंके क्षीण हो जानेपर हृदयमें दाह और अन्य उपद्रव होते हैं।
शरीरके अंदर पक्वाशय-भागमें उक्त दोषोंके कारण प्रायः अन्न आम्लिक रससे पकता है, जिसके कारण वह सिद्ध नहीं होता और न तो शारीरिक पुष्टतामें सहयोग करनेकी क्षमता ही अर्जित कर पाता है। रोगीके शरीरका ऐसा आम्लिक रस रक्त और मांसको पुष्ट करनेमें अक्षम होता है। सप्तधातुओंका पोषण न होनेपर रोगी केवल मलके भरोसे जीता है।
रोगीमें इन लक्षणोंके कम होनेपर भी अत्यन्त क्षीणता आ सकती है। इस रोगमें छः प्रकारका क्षय होता है। अतः उन सभी प्रकारोंके क्षय होनेपर रोगीके शरीरमें होनेवाले उपद्रवोंको यथोपचार रोककर यथासम्भव इस रोगको समूल दूर करनेका प्रयास करना चाहिये अन्यथा इस रोगसे प्राणीकी मृत्यु ही निश्चित होती है।
उक्त रोगके दोष पृथक्-पृथक् या समूहवत् शरीरपर प्रकट होते ही रोगीके मेदका क्षय हो जाता है, जिसके कारण उसके स्वरोंमें भेद, क्षीणता, रूक्षता और चञ्चलता आ जाती है। वात-प्रकोप होनेसे रोगीका कण्ठ सफेद रंगका हो जाता है। उसके शरीरकी स्निग्धता तथा उष्णता समाप्त हो जाती है। पित्तदोषके कारण रोगीके तालु और कण्ठमें दाह होता है और निरन्तर वह सूखता जाता है। रोगीका मुँह और कण्ठ कफसे संलिप्त रहता है। उसके गलेसे घुरघुराती हुई ध्वनि निकलती है। उस कालमें रोगी स्वयंमें सभी विरुद्ध आचरणोंसे प्रभावित हो उठता है। अतः वह उसकी ओर उन्मुख हो जाता है, जिससे अन्य सभी लक्षणोंकी उत्पत्ति हो जाती है। इससे रोगी मृत्युको ही प्राप्त होता है। वैसी स्थितिमें रोगीको सब ओर धुएँके समान ही दिखायी देता है और सभी कफजन्य लक्षण उसमें प्रकट हो उठते हैं।
इस क्षयरोगसे बचना बड़ा ही कष्टसाध्य है। यदि सभी लक्षणोंसे युक्त होकर यह प्राणीपर आक्रमण करता है तो रोगीकी जीवनरक्षा असम्भव हो जाती है। अतः अल्प लक्षणोंके दिखायी देते ही इस रोगको शरीरसे दूर करनेहेतु विधिवत् चिकित्सा करनी चाहिये। (अध्याय १५२)
अरोचक, वमन आदि रोगोंका निदान
धन्वन्तरिजीने कहा— हे सुश्रुत ! अब मैं आपको अरोचकरोगके निदानके विषयमें बताऊँगा। जब वात-पित्त तथा कफजन्य दोष जिह्वा और हृदय या मनका आश्रय लेते हैं, तब प्राणीके शरीरमें अरोचकरोग उत्पन्न होता है।
यह रोग वातजन्य, पित्तजन्य तथा कफजन्य—
१-च०चि०अ० १६, अ०हृ०नि०अ० ५। २-च०चि०अ० ८, सु०उ०तं०अ० ५७।
| काण्ड ] | अरोचक, वमन आदि रोगोंका निदान | २६१ |
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इन तीन रूपोंके अतिरिक्त सन्निपातजन्य और मनःसंतापजन्य भी होता है। इस रोगके पाँच प्रकार हैं। यथा—वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज और मनःसंतापज। वात आदि दोषोंसे होनेवाली अरुचिमें रोगीका मुख क्रमशः वायुमें कसैला, पित्तमें तिक्त, कफमें मीठा या माधुर्ययुक्त, सन्निपातमें विकृतरस तथा शोक-दुःखादिमें दोषानुसार स्वादवाला¹ हो जाता है। इस रोगमें रोगीको किसी द्रव्य-विशेषका आस्वाद नहीं प्राप्त होता है। शोक, क्रोधादिमें मनकी जैसी स्थिति होती है, उसी प्रकार उसकी भोजनादि ग्रहण करनेकी अभिरुचि होती है। जब मन शोकादिके कारण खिन्न रहता है तो भोजनके प्रति अरुचिके कारण उसे अन्नादि ग्रहण करनेकी अनिच्छा हो जाती है। इस रोगमें अग्निदुष्ट ही प्रधान कारण है।
छर्दि² अर्थात् वमनरोग पाँच प्रकारका होता है—वातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज तथा अनभिप्रेत (इच्छाके विपरीत)। दुष्ट पदार्थोंके ग्रहण करनेसे पाँचवीं छर्दि होती है। सम्पूर्ण प्रकारके वमनरोगमें उदान वायु प्रकुपित होकर सभी प्रकारके अधिकृत दोषोंको उद्दीप्त करता है, जिसके फलस्वरूप क्रमशः शीघ्रातिशीघ्र रोगीको कष्ट होता है, मुख लवणयुक्त रहता है तथा उससे पानी छूटता है और धीरे-धीरे आहार-व्यवहारके प्रति अरुचि हो जाती है। इस रोगमें रोगीकी नाभि तथा पृष्ठ-प्रदेशमें वेदना होने लगती है। रोगीके पार्श्वभागमें भी पीड़ा होती है, जिसके कारण पेटमें अवस्थित अन्न ऊपरकी ओर पक्वाशयसे निकलने लगता है। अर्थात् रोगीको वमनकी इच्छा होती है। अन्ततोगत्वा रोगीके मुँहसे कषाय और फेनयुक्त थोड़ा-थोड़ा करके वमन होता है।
इस वातजन्य वमनरोगमें अत्यन्त कष्टसाध्य पीड़ाके साथ रोगीको तेज दर्द होनेके कारण चिल्लाना पड़ता है। उसको खाँसी आती है, उसके मुखमें शोथ होता है और उसकी वाणीमें स्वरभंग होने लगता है।
पित्तजन्य वमनरोग होनेपर रोगीको क्षारसे युक्त जलके समान धूम्र, हरित या पीतवर्णवाले पित्तका वमन होता है अथवा रक्तसे युक्त अम्ल, कटु, तिक्त पित्त उसके मुँहसे निकलता है। उसके शरीरमें तृष्णा, मूर्च्छा, संताप तथा अग्निके समान दाहका प्रकोप होता है।
कफजन्य वमनरोगके होनेसे रोगीमें स्निग्ध, घनीभूत पीत तथा मधु (शहद)-के समान मधुर, श्लेष्मा (कफ)-का उदय होता है। यह कफ लवण-रससे भी युक्त हो जाता है। इस कफदोषके कारण उत्पन्न वमनके कष्टसे रोगीको भयवश रोमाञ्च हो जाता है। इस रोगमें रोगीके मुखमें शोथ हो जाता है। उसके मुखमें मिठास भरी रहती है, उसके नेत्रोंमें तन्द्रा छायी रहती है, उसके हृदयमें कष्ट होता है और उसे खाँसी आती है।
सन्निपातिक वमनरोगमें सभी दोषोंके लक्षण दिखायी देते हैं। ऐसी अवस्थामें उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। ऐसे रोगीको देखना, सुनना आदि कुछ अच्छा नहीं लगता है।
वातादिके³ प्रकुपित होनेपर ही उदरभागमें कृमिजन्य और अन्नजन्य वमनरोग भी उत्पन्न होता है। कृमिजन्य छर्दिरोगमें शरीरमें शूल, कम्पन, मिचली तथा हल्लास (हृदयकी धड़कन)-के उपद्रवकी उत्पत्ति विशेष रूपसे ही होती है।
(अध्याय १५३)
१-अ०हृ०नि०अ० ५, च०चि०अ० २६। २-च०चि०अ० २३, सु०उ० तं०अ० ४९। ३-च०चि०अ० २०, अ०हृ०नि०अ० ५।