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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

काण्ड ] प्रमेहरोग-निदान २८३


शुक्र मूत्र-क्षरण होनेसे पहले अथवा बादमें लिंगसे बाहर आता है। इसका स्वरूप भस्ममिश्रित जलके समान होता है। उसको वैद्यकमें मूत्रशुक्रके नामसे जाना जाता है।

जब रूक्षता और दुर्बलताके कारण वातजन्य दोषसे उदावर्त उपद्रव होता है अर्थात् शरीरके अंदर विद्यमान अपानवायु व्यानवायुसे घिर जाता है अर्थात् मलावरोध हो उठता है तो उस कालमें वह मल-मूत्र स्रोतकी संसृष्टिसे संयुक्त हो जाता है। इसमें मूत्र बूँद-बूँद ही होता है और इस टपकनेवाले मूत्र-बिन्दुओंमें एक दुर्गन्ध-सी रहती है। ऐसे रोगको मूत्रविघातके नामसे स्वीकार किया जाता है।

पित्त², व्यायाम, तीक्ष्ण और अम्लाहार तथा आध्मान (पेट फूलने) अथवा अन्य विकृतियोंके द्वारा शरीरके आभ्यन्तरिक भागमें बढ़ा हुआ पित्त-वायु-विकार वस्तिभागमें दाह उत्पन्न कर देता है, जिसके कारण रक्तयुक्त मूत्र निकलता है अथवा उष्ण रक्त ही उसकी मूत्र-प्रवाहिकासे बार-बार कष्टपूर्वक गिरता है। इस प्रकारके कष्टको उत्पन्न करनेके कारण लोगोंने उस रोगको उष्णवातकी संज्ञा दी है।

रूक्षाहार तथा परिश्रम करनेसे श्रान्त रोगीका पित्त और वायु कुपित हो उठता है। वह उसके वस्तिभागमें मूत्रावरोध, पीड़ा, क्षय और जलन उत्पन्न कर देता है। उस लक्षणसे युक्त मूत्राघात-कष्टको मूत्रक्षय कहा गया है।

यदि कुपित वायुके द्वारा पित्त और कफ अथवा इन दोनोंको संक्षुब्ध कर दिया जाता है तो उस समय प्राणीको जलन, कष्टसाध्य मूत्र-निर्गमन होता है। उसके मूत्रका वर्ण पीला, रक्त तथा श्वेत हो जाता है और उसमें गाढ़ापन भी आ जाता है। वस्तिभागमें दाहभरी जलन होती है। जो मूत्र निकलता है, उसका वर्ण सूखे गोरोचन तथा शंख-चूर्णके समान होता है। इस रोगको कृच्छ्रमूत्रसाद कहते हैं। इस प्रकार विस्तारपूर्वक मूत्रमें होनेवाले रोगोंको भी मैंने बता दिया है। (अध्याय १५८)

प्रमेहरोग-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं आपको प्रमेह³-रोगोंका निदान सुनाऊँगा, उसे सुनें।

प्रमेह बीस प्रकारके होते हैं। उनमें दस प्रमेह कफजन्य, छः प्रमेह पित्तजन्य और चार प्रमेह वातजन्य हैं। इन सभीमें मेद, मूत्र और कफकी संसृष्टि होती है।

प्रमेहका सबसे पहला प्रकार हारिद्रमेह है। इस प्रमेहके होनेपर रोगीको कटु, रसमिश्रित मूत्र हल्दीके समान मल-मूत्र होता है। इस प्रमेहका दूसरा प्रकार मंजिष्ठामेह है। मंजिष्ठामेहके होनेपर मंजिष्ठ (मजीठ)-वर्णके जलके सदृश होता है। इसका तीसरा प्रकार है रक्तमेह। इस रक्तमेहके होनेपर रक्तवर्णकी आभावाला कच्चे मांसकी गन्धसे समन्वित उष्ण तथा लवण-तत्त्व-मिश्रित मूत्र होता है। वसामेहमें चर्बी-मिला हुआ मूत्र अथवा केवल चर्बी ही बार-बार निकलती है। वसायुक्त मज्जामेही व्यक्ति वर्ण और गन्धमें समानता रखनेवाले मज्जा-तत्त्वसे संश्लिष्ट मूत्रत्याग करता है।

जब प्राणी मतवाले हाथीके समान असंयमित वेगसे अधिक समयतक मूत्र निकालता है, जिसके साथ एक चिपचिपा पदार्थ भी आता है और यह यदा-कदा बीच-बीचमें रुक भी जाता है तो उस रोगीको हस्तिमेही मानना चाहिये। हस्तिमेह प्रायः वृद्धावस्थामें होता है। जब व्यक्तिको मधुके समान


१-सु०उ० ५७। २-सु०अ० ८५। ३-च०चि० ७, वा० नि० १० ।

१४०- पाण्डु-शोथ-निदान

२८४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

मूत्र होता है अर्थात् उस मूत्रमें शरीरके अंदर विद्यमान मधुर रसका तत्त्व आने लगता है तो उसे मधुमेही कहा जाता है। यह दो प्रकारका माना गया है। एक तो धातुके क्षीण होनेपर वायुके कुपित होनेसे तथा दूसरा पित्तादि दोषसे वायुका मार्ग रुक जानेसे।

इस प्रमेह<sup></sup>से घिरा हुआ रोगी प्रायः अन्य सभी दोषजन्य प्रमेहोंके लक्षणोंसे संयुक्त हो जाता है। ऐसे रोगीमें अन्य दोषोंके लक्षणोंका आगमन कोई कारण नहीं रखता। यह रोग तो अपनी प्रबलताके प्रभावसे उन्हें बिना निमित्तके ही रोगीके शरीरपर प्रकट कर देता है। यह ऐसा प्रमेह है कि क्षणमात्रमें नष्ट हो सकता है और क्षणमात्रमें ही अपने पूर्ण बलके साथ उभर सकता है। अतः रोगीको चाहिये कि वह कष्ट उठाकर भी इस वर्गभेदवाले मधुमेहरोगका निदान कर ले। इसकी सामयिक उपेक्षा कर देनेपर प्राणीके शरीरका सब कुछ मधुमेहताको ही प्राप्त कर लेता है अर्थात् शरीरके समस्त स्रोतोंमें इसका विकार पहुँच जाता है और एक दिन मधुमेहके अतिरिक्त कुछ शेष ही नहीं रह जाता तथा उसकी असामयिक मृत्यु हो जाती है। इसका विस्तार हो जानेपर सभी प्रकारके मेहरोगोंमें रोगी प्रायः मधुके समान ही गाढ़ा मूत्र नलीसे निकालता है। शरीरमें जो मधुरता है, वह मधुरता इन सभी प्रमेहोंमें नष्ट होती है, इसलिये इन सभी प्रमेहोंको मधुमेह ही कहा जाता है। इस प्रमेहरोगमें रोगी अपच, अरुचि, वमन, अनिद्रा, खाँसी और पीनसके उपद्रवसे ग्रस्त हो जाता है।

कफजन्य प्रमेहमें वस्ति तथा मूत्राशय-भागमें पीड़ा, हृष्ट-पुष्ट शरीरका क्षरण और ज्वरके उपद्रव जन्म लेते हैं। पित्तप्रमेह होनेपर रोगीके शरीरमें दाह, तृष्णा, खट्टी डकार, मूर्च्छा, अतिसार एवं मलभेदका विकार होता है। वातज प्रमेहमें उदावर्त, कम्पन, हृदयवेदना, बेचैनी, शूल, अनिद्रा, शुष्कता, श्वास तथा खाँसीके विकार पैदा हो जाते हैं।

शराविका, कच्छपिका, ज्वालिनी, विनता, अलजी, मसूरिका, सर्षपिका, पुत्रिणी, सविदारिका और विद्रधि नामक दस प्रकारकी फुंसियाँ प्रमेह-रोगोंकी उपेक्षा कर देनेपर उत्पन्न होती हैं।

प्रायः कफजन्य<sup></sup> दोषसे संश्लिष्ट होनेके कारण खाया हुआ अन्न प्रमेहरोगके रूपमें परिणत हो जाता है। उसका रस मूत्रके मार्गसे निकल जाता है। मधुर, अम्ल, लवण, स्निग्ध, भारी, चिकना और शीतल पेय, नया चावल, मदिरा, मिर्च-मसाला, मांस, इक्षुरस, गुड़, गोरसके सेवन, एक स्थान और एक आसनपर शयन इस मधुमेहरोगके उत्पादक हैं। इस प्रमेहरोगके होनेसे कफ वस्तिभागमें पहुँचकर उसको दूषित कर देता है। तदनन्तर वह स्वेद, मेदा, वसा और मांससे युक्त शरीरको दूषित करके शिथिल बना देता है।

जब कफ पहले क्षीण हो जाता है तो वायु मूत्रके सहित पित्त, रक्त और धातुको वस्तिभागमें लाकर उसका वहींपर विनाश करता है। साध्य-असाध्य प्रतीत होनेवाले जो मेह हैं, वे सभी इसी वायु-विकारसे ही उत्पन्न होते हैं। जब वायु, पित्त और कफकी मात्रा निर्दुष्ट होकर समान रहती है, तब मेह भी समान-भावसे रहता है।

उक्त प्रमेह-भेदोंका सामान्य लक्षण तो प्रचुर मात्रामें विकृत मूत्रका होना है, किंतु शरीरमें उस विकारके संयुक्त होते ही विशेष परिस्थितिमें भी पड़े हुए मनुष्यके लिये अपेक्षित है कि उस दोषका निवारण कर ले। मूत्रके वर्णादिक लक्षणोंके अनुसार इन प्रमेहरोगोंमें भेदकी कल्पना की जाती है। यह मेहरोग दस प्रकारका है। सामान्यतः मूत्र स्वच्छ,


<sup></sup>-च०चि०अ० ६, अ०हृ०नि०अ० १७। <sup></sup>-वा०नि० १०, अ०हृ०नि०अ० १०।

१४१- विसर्परोगका निदान

काण्ड ] प्रमेहरोग-निदान २८५

अत्यन्त श्वेत, शीतल, गन्धहीन तथा जलके समान होता है, किंतु जो प्राणी उदकमेहसे ग्रसित है, वह कुछ मटमैले और चिपचिपे मूत्रका क्षरण करता है। इक्षुमेह-रोगीके शरीरसे इक्षुरसके समान अत्यन्त मधुर मूत्र निकलता है। सान्द्रमेहसे प्रभावित रोगी बासी रखे हुए जलके समान मूत्र छोड़ता है। सुरामेही रोगीका मूत्रस्त्राव सुरा (मदिरा)-के सदृश होता है, जो ऊपरसे देखनेमें स्वच्छ तथा सान्द्र प्रतीत होता है, किंतु अंदरसे गाढ़ा रहता है। पिष्टमेहसे ग्रसित रोगीको प्रायः मूत्रस्रावके समय रोमाञ्च हो उठता है। वह तण्डुलमिश्रित जलके समान अत्यन्त श्वेत मूत्रका परित्याग करता है। जो शुक्रमेही है, उसको शुक्रमिश्रित अथवा शुक्रके समान वर्णवाला मूत्र गिरता है। सिकता अर्थात् रेतमेहसे पीड़ित व्यक्तिको रेतके समान ही मूत्र तथा उसके सदृश मल अथवा विकार हो जाता है। शीतमेही रोगीको प्रायः अधिक मात्रामें मधुर और अत्यन्त शीतल मूत्र गिरता है। जो रोगी शनैर्मेही विकारसे संतप्त होता है, वह धीरे-धीरे, बार-बार, मन्द-मन्द गतिसे मूत्र-क्षरण किया करता है। लालामेही रोगी लालातन्तु अर्थात् लारके समान तार बनानेवाले चिपचिपे मूत्रकी धार छोड़ता है। क्षारमेह<sup></sup> होनेपर रोगी गन्ध, वर्ण, रस तथा स्पर्शमें समान क्षारयुक्त मूत्र करता है। नीलमेही नीलवर्णके समान और मसी अर्थात् स्याहीके सदृश कृष्णवर्णवाले मूत्रका परित्याग करता है।

संधिस्थान<sup></sup>, मर्मस्थल, मांसलभाग तथा कोष्ठ-प्रदेशोंमें जो प्रमेहपिडिका होती है, वह अन्तमें उन्नत, मध्यमें निम्न, आर्द्रतासे रहित और सहन करनेवाली पीड़ासे समन्वित होती है।

जो पिडिका (फुंसी) किनारोंपर ऊँची, बीचमें नीची, श्यामवर्ण, क्लेद और वेदनासे युक्त होती है तथा जिसकी शराव (मिट्टीका कसोरा)-के समान स्थिति और आकृति होती है, उसे शराविका कहते हैं। जो पिडिका कछुएके समान होती है और उसमें जलन रहती है, उस पिडिकाको विद्वान् लोग कच्छपिका नामसे स्वीकार करते हैं। बहुत बड़ी नीलवर्णके समान दिखायी देनेवाली पिडिकाको विनताके नामसे माना गया है। शरीरमें जिस पिडिकाके उभर आनेसे त्वचामें जलन होती और रोगी कष्टका अनुभव करता है, उस पिडिकाको ज्वालिनी कहा जाता है। रक्त-श्वेत तथा स्फोटका रूप धारण करनेवाली कठोर पिडिकाका नाम अलजी है। जो पिडिकाएँ मसूरके समान आकृतिवाली हैं, उन्हें मसूरिकाके नामसे जानना चाहिये। जिह्वामें सरसोंके समान छोटे-छोटे उभरे हुए दानोंको सर्षपिका कहा जाता है, जो रोगीको अत्यधिक कष्ट देते हैं। पुत्रिणी नामक पिडिका बड़ी अथवा छोटी होती है। यह अत्यन्त सूक्ष्म भी हो सकती है। जो पिडिका विदारीकन्दके समान गोल तथा कठोर होती है, उसका नाम विदारिका है। विद्रधिके लक्षणोंसे युक्त अर्थात् पीपसे युक्त पिडिकाको विद्रधिका कहा जाता है।

पुत्रिणी और विदारी नामक प्रमेहजनित पिडिकाएँ अत्यन्त कष्टकारी होती हैं। सद्यः पित्तके प्रकुपित होनेसे मेदको अल्प मात्रामें विकृत करनेवाली अन्य पिडिकाएँ उत्पन्न होती हैं। प्रायः शरीरमें जैसे-जैसे दोषकी अभिवृद्धि होती है, वैसे-ही-वैसे उन सभी पिडिकाओंका आविर्भाव होता है। मेदको विकृत करनेवाली इन पिडिकाओंका जन्म तो बिना प्रमेहके भी हो सकता है। जबतक पिडिका वर्णरहित होती है, तबतक उसके प्रधान लक्षणको निर्दिष्ट नहीं किया जा सकता। जो हल्दीके समान अथवा रक्तवर्ण या प्रारम्भिक


१-मा०नि०प्र० ३३-१३, १४। २-वा०नि० १०, अ०हृ०नि०अ० १०, सु०नि० ६।

२८६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

स्वरूपका परित्याग करनेवाले रक्त मूत्रका क्षरण करता है, उसको प्रमेहरोगके बिना रक्तपित्तरोग जानना चाहिये। रक्तपित्तरोगके प्रभावसे ही मूत्रका रंग हरिद्रा एवं रक्तवर्णका हो जाता है।

प्रमेहरोगोंके पूर्वरूपमें स्वेद, अङ्ग-विशेषमें अप्रिय गन्ध और अङ्गोंमें शिथिलता, शय्या, भोजन, निद्रा तथा सुखकी आसक्ति, हृदय, नेत्र, जिह्वा एवं कानोंमें असाधारण या साधारण भारीपन, जलन, बाल और नाखूनोंमें अभिवृद्धि, शीतल पदार्थोंके प्रति प्रेम, कण्ठ तथा तालुमें शोथ, मुखपर माधुर्यभाव और हाथ-पैरमें जलनके लक्षण दिखायी देते हैं। प्रायः इन सभी प्रमेहरोगोंके रोगीके द्वारा किये गये मूत्रपर चीटियाँ दौड़ने लगती हैं।

प्रमेहरोगमें तृष्णा, मधुरता तथा चिकनाहट का लक्षण तो सामान्य है, किंतु मधुमेह होनेपर अनेक प्रकारके विकारोंका जन्म हो जाता है। शरीरमें इस रोगके परिव्याप्त होनेपर इसकी उत्पत्तिका कारण कफजन्य मानना चाहिये अथवा सभी दोषोंके क्षीण हो जानेपर यदि प्रमेहका कोई विकार दिखायी देता है तो वह वायुजन्य होता है। प्रमेहके ये सभी प्रकार तो कफ और पित्तसे युक्त होते हैं, यथाक्रम जिनकी उत्पत्ति रति-प्रसंगकी आसक्तिके कारण रोगीके मूत्र-भागमें होती है। जो प्रमेह पित्तदोषके कारण उत्पन्न होते हैं, वे याप्य हैं। साध्य वही प्रमेय होता है जो अपने सम्पूर्ण लक्षणोंसे समन्वित होकर रोगीके शरीरमें दिखायी नहीं देता। यदि वह सभी लक्षणोंसे पूर्ण हो जाता है तो उसका निवारण असम्भव ही है। (अध्याय १४९)

विद्रधि एवं गुल्म-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं विद्रधि और गुल्मका निदान कहता हूँ, उसे आप सुनें।

बासी एवं अत्यन्त उष्ण, रूक्ष, शुष्क तथा विदाहकारी भोजन करनेसे, टेढ़ी-मेढ़ी शय्यापर टेढ़ा-मेढ़ा शयन करनेसे तथा रक्तको दूषित करनेवाले विरुद्ध आहार-विहारसे रक्त दूषित होकर चमड़ा (त्वक्), मांस, मेदा, अस्थि, स्नायु एवं मज्जाको दूषितकर यह उदरका आश्रयण करता है। दुष्ट रक्त जब उदरका आश्रयण करता है तो अङ्ग-विशेषमें (बाहरकी ओर मुँहवाला अतिशय शूलके साथ और अतिशय पीड़ासे युक्त वृत्ताकार अथवा भीतरकी ओर मुँहवाला आयताकार) जो शोथ उत्पन्न हो जाता है, आयुर्वेदवेत्ता वैद्यगण उसे विद्रधिरोग कहते हैं।

दोषोंके द्वारा (वायु, पित्त आदिके) भिन्न-भिन्न रूपमें या मिश्रितरूपमें रक्त एवं स्रावके तत्तत् अङ्गमें ग्रन्थिके आकारका विद्रधिरोग अतिशय दारुण, गम्भीर और गुल्मको बढ़ानेवाला होता है। वह वल्मीक अर्थात् दीमकके घरके समान सच्छिद्र होता है और सभी छिद्रोंसे सदा रक्त आदि बहता रहता है, इससे जठराग्नि मन्द हो जाती है। नाभिवृत्ति, यकृत, प्लीहा, क्लोम (वृक्क), कुक्षि, गुद एवं वंक्षण आदि स्थानोंमें विद्रधिरोग उत्पन्न होनेपर रोगीका हृदय सदा काँपता रहता है और विद्रधि-स्थानमें तीव्र वेदनाकी अनुभूति होती है।

विद्रधिका शोथ श्यामवर्ण अथवा रक्तवर्णका होता है। इसका ऊपरी भाग उन्नत रहता है। कालान्तरमें पाक हो जानेसे यह विषम आकारका हो जाता है। विद्रधिरोगमें संज्ञा-नाश, भ्रम, अनाह, रक्तस्राव और अव्यक्त शब्द होता है। पित्तज विद्रधि रक्त (लाल), ताम्र अथवा कृष्णवर्णका शीघ्रपाकी होता है। इसमें तृषा, दाह, मोह, ज्वर,


१-वा०नि० १०। २-च०सू०अ० १७, सु०नि०अ० ९।

१४२- कुष्ठरोगका निदान

काण्ड ] विद्रधि एवं गुल्म-निदान २८७

बेहोशी तथा जलन आदि उपद्रव होते हैं। कफज विद्रधि तेजीसे उभरता है एवं शीघ्र पक जाता है, पीला हो जाता है और खुजलाहटसे युक्त अरुचि, स्तम्भ रहता है। सन्निपातजन्य विद्रधिमें अधिक क्लेश, शीत, स्तम्भ (जकड़न), जृम्भण (जम्हाई), अरुचि, शरीरका भारीपन आदि सभी लक्षण व्यक्त होते हैं। सन्निपातिक (त्रिदोषजन्य) विद्रधि चिरकालमें उत्पन्न होता है और उसका पाक शीघ्र नहीं होता।

बाह्य और आभ्यन्तरिक विद्रधिमें मल पतला होता है। सन्निपातक विद्रधि कृष्णवर्ण, स्फोटावृत और श्यामवर्णका होता है। उसमें रोगीको अधिक दाह, विद्रधि-स्थानमें पीड़ा और तीव्र ज्वर हो जाता है।

बाह्य विद्रधि प्रायः पित्तज और रक्तज होती है। गर्भाशयगत रक्तज अन्तर-विद्रधि केवल नारियोंको ही होती है। शस्त्र आदिके अभिघातसे अधिक रक्तके बहनेपर यह रोग उत्पन्न हो जाता है। किसी स्थानके कटनेपर वायुके द्वारा परिचालित रक्त पित्तको प्रेरित करता है, जिससे रक्त-पित्त लक्षणवाला विद्रधिरोग उत्पन्न होता है। यह अत्यन्त उपद्रवकारी होता है। स्थान-भेदसे उपद्रवोंका भेद कहा जाता है। नाभिमें विद्रधिरोग होनेपर उसकी धौंकनीकी तरह गति (हिचकी) होती है। वस्ति और मूत्राशय आदिमें विद्रधि होनेपर मूत्र-त्यागमें दुर्गन्ध बहुत तथा क्लेश अधिक होता है। प्लीहा-स्थानमें विद्रधि होनेपर श्वास-प्रश्वासका रोध हो जाता है और अत्यन्त प्यास लगती है। क्लोम-स्थानमें विद्रधि उत्पन्न होनेपर गलेका रोधतृषा होने लगती है। हृदयमें विद्रधि होनेपर सर्वाङ्गमें वेदना होती है। मोह, तमक, श्वास, काससे हृदयकी शून्यताका बोध होता है। कुक्षि और पार्श्वके आभ्यन्तरमें विद्रधि उत्पन्न होनेपर कुक्षिमें अनेक प्रकारके दोष उत्पन्न हो जाते हैं तथा ऊरु, संधि, धड़, वंक्षण, कटि, पीठ, बगल तथा नितम्ब—इन स्थानोंमें विद्रधिके उत्पन्न होनेपर अपानवायु-अवरोध होकर अत्यन्त वेदना होने लगती है। विद्रधिके कच्चे होनेपर, पक जानेपर अथवा सूजनके आधारपर आगेकी स्थितिका निर्देश करना चाहिये। आन्तर विद्रधि यदि नाभिसे ऊपर ऊर्ध्वमुख है तो मवाद एवं रक्तका स्राव मुखसे होता है और नाभिके नीचे होनेपर गुदामार्गसे स्राव होता है तथा नाभिमें होनेपर दोनों ओरसे होता है। उच्च विद्रधिमें दोष क्लेदके समान जानना चाहिये। सन्निपातज विद्रधि अपने स्थानमें अनेक प्रकारके विवर्तको उत्पन्न कर देता है। नाभि और वस्तिमें स्थित विद्रधि अन्तर्गत या बाह्यगत किसी भी प्रकारका हो, वह निश्चित ही पककर फटता है। उसका परिपाक विद्रधि बढ़नेपर होता है, यह विद्रधि क्षीण होनेपर भी अनेक प्रकारके उपद्रवको जन्म देती है। दुष्ट स्वभाववाली एवं पापिनी स्त्रीकी गर्भगत संतान यदि नष्ट हो जाती है तो गर्भमें अधिक सूजन उत्पन्न होता है। स्त्रियोंके स्तनमें जो विद्रधि होती है, वह अतिशय दुःखप्रद होती है। यह बाह्य विद्रधिका लक्षण है। कन्याओंकी नाड़ियाँ अतिशय सूक्ष्म होनेके कारण उन्हें यह स्तनविद्रधि रोग नहीं होता है। यह अपानवायुकी* गतिरोध होनेपर क्रुद्ध वायु लिंगमूलमें शोथ उत्पन्न करता है तथा मुष्क एवं वंक्षणगत फलकोशतक जानेवाली फलकोटकी शिराओंको पीड़ितकर उसमें वृद्धि करता है। इससे मेदामें दोष उत्पन्न होता है। यह वृद्धिरोग है, जो सात प्रकारका होता है—वातज, पित्तज, कफज, रक्तज, मेदज, मूत्रज और आन्त्रज। वातज वृद्धिरोगमें मूत्र वातपूर्ण, कठोर स्पर्शवाला


* वा०नि० ११, अ०हृ०नि०अ० ११।

२८८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

तथा बाह्य और आभ्यन्तरिक एवं रूक्ष वायुके कारण जलन पैदा करनेवाला होता है। पित्तज वृद्धिरोग पके हुए गूलरके फलके समान दाह और ऊष्मासे युक्त होता है और पक जाता है। कफज वृद्धि कफजन्य होती है, वह तीव्र, गुरु, स्निग्ध और कठोर तथा खुजलीसे युक्त रहती है। इसमें अल्प वेदना होती है। रक्तज वृद्धि, कृष्णवर्ण, स्फोटसे युक्त, पिण्डके समान होती है और उसके वृद्धिका लक्षण पित्तजके समान होता है। मेदज वृद्धि मृदु और तालफलके समान होती है। इसके लक्षण कफजके समान होते हैं। जो मूत्रके वेगको धारण करते हैं, उनको मूत्रज वृद्धिरोग उत्पन्न होता है। इसमें मूत्रकृच्छ्र हो जाता है। मूत्रज वृद्धिमें अण्डकोष मसकके समान हिलता है। यह वेदनायुक्त और मृदु होता है। इसमें मूत्रकृच्छ्र हो जाता है और अण्डकोषके नीचेके भागमें कंकण-जैसा आकार उत्पन्न हो जाता है। आन्त्रज वृद्धिरोग वायुको कुपित करनेवाले आहारसे और शीतल जलमें स्नान करने तथा मल-मूत्रके वेगको रोकनेसे, अङ्गकी चेष्टाओंसे क्षुब्ध किये जानेपर जब ओजशक्ति क्षुब्ध होकर शरीरको क्षीण कर देती है, तब वायु दूषित होकर रक्तको नीचेकी ओर ले जाता है। इससे संधि-स्थानमें ग्रन्थिके समान शोथ हो जाता है।

वृद्धिरोगकी उपेक्षा करनेपर गुल्म-वृद्धि,* अन्त्र-वृद्धि, आध्मान आदि अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न हो जाते हैं। रोगी अत्यन्त पीड़ित हो जाता है। आभ्यन्तरमें शब्द होने लगता है और वायु शिरःप्रदेशमें आध्मान हो जाता है। रक्तज गुल्म वृद्धिरोग असाध्य है और इसके लक्षण वातज वृद्धिरोगके समान होते हैं। गुल्म वृद्धिरोग काली-नीली शिराओंके जालसे उसी प्रकार व्याप्त हो जाता है, जैसे कोई झरोखा मकड़ीके जालसे आवृत हो जाता है। यह गुल्मरोग आठ प्रकारका होता है—वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, पित्तकफ और (त्रिदोषज) सन्निपातिक। ऋतुसम्बन्धित रक्तके दूषित होनेपर आठवाँ (आर्तवदोषज) गुल्म केवल स्त्रियोंके गर्भाशयमें होता है।

जो मनुष्य ज्वर, मूर्च्छा, अतिसारके द्वारा एवं वमन-विरेचनादि पञ्चकर्मके द्वारा दुर्बल हो तथा वातकारक अन्नका भोजन करे; जो शीतसे अथवा भूखसे पीड़ित हो और भोजनसे पूर्व खाली पेट अधिक जल पीये अथवा जलमें तैरे एवं देहको क्षुब्ध करनेवाला उपवास करे तथा वमनका वेग न होनेपर भी वमन करनेका प्रयास करे, स्नेहन, स्वेदनके बिना वमन, विरेचन आदि करे अथवा ठीक प्रकारसे शुद्धि कर्मके बिना वात-विदाहि अन्नका सेवन करे या कष्ट देनेवाले सवारीपर चढ़े तो सम्पूर्ण वातादि दोष अलग-अलग या एक साथ मिलकर देहस्रोत (आम पक्वाशय)-में गमन करते हैं और ऊर्ध्व-अधोमार्गको आच्छादित या निरोध करके वायुशूल उत्पन्न करते हैं। ऐसी दशामें छूनेसे अनुभवमें आनेवाला, गरम, ऊँचा उठा हुआ तथा गाँठ-जैसा गुल्मरोग उत्पन्न हो जाता है।

धातुके क्षीण हो जानेसे कफ, विष्ठादिके द्वारा मार्ग अवरुद्ध हो जानेसे वायु कोष्ठमें स्थित हो जाता है और रूक्षताके कारण कठोर हो जाता है। यह अपने आश्रय (अथवा पक्वाशय)-में स्वतन्त्र रूपसे दुष्ट हो जाता है और पराश्रय (आमाशय)-में परतन्त्र-भावसे (कफादिके अधीन) दुष्ट हो जाता है। तदनन्तर मल एवं श्लेष्मासे संयुक्त होनेके कारण पिण्ड-जैसा हो जाता है। इसे वातगुल्म कहते हैं। यह वस्ति, नाभि, हृदय और पसलियोंमें उत्पन्न होता है। वातज गुल्मरोगमें सिरमें पीड़ा, ज्वर, प्लीहा, आन्त्रकूजन, सूईके वेधके समान


* च०नि०अ० ३, सु०उ०तं०अ० ४२, अ०हृ०नि०अ० ११।

काण्ड ] विद्रधि एवं गुल्म-निदान २८९


पीड़ा—ये सभी उपद्रव होते हैं और बहुत कष्टसे मूत्र होता है। उक्त रोग वायुचालित होकर शरीर, मुख, पैर, शोथ, अग्निमान्द्य आदि उपद्रवको उत्पन्न करता है। विशेषतः शरीरमें चमड़ा रूक्ष और कृष्णवर्णका हो जाता है। वायुके चञ्चल होनेके कारण गुल्मरोगका कोई निर्दिष्ट एक स्थान नहीं है। अतः यह अनेक प्रकारकी व्यथाएँ उत्पन्न करता है। वातज गुल्मरोगमें चींटीके चढ़ने या काटने-जैसा स्फुरण होता है और चुभनेकी तरह व्यथा होती है।

पित्तज गुल्मरोगमें दाह, अम्लोद्गार, मूर्च्छा, मलभेद, पसीना, तृष्णा और ज्वर—ये सभी उपद्रव होते हैं। सम्पूर्ण शरीर हल्दीके वर्णका हो जाता है। इस रोगमें शोथ भी हो जाता है और श्लेष्मा घटता-बढ़ता रहता है। गुल्मके स्थानमें जलन-सी प्रतीत होती है।

कफज गुल्मरोगमें स्तैमित्य, अरुचि, सिरमें वेदना और अङ्गोंमें शिथिलता, शीतज्वर, पीनस, आलस्य, हृल्लास, चमड़ेका सफेद या काला होना आदि लक्षण होते हैं। कफज गुल्म गम्भीर, कठिन और गर्भस्थ बालकके समान भारी होता है। अपने स्थानमें स्थित रहने तथा वहाँसे न चलनेके कारण यह मृत्युकारक होता है।

त्रिदोषजन्य गुल्मरोगमें प्रायः एक-दूसरेके लक्षण घुले-मिले रहते हैं। इसमें तीव्र वेदना और अतिशय दाह होता है। यह अतिशय उन्नत और सघन होकर शीघ्र ही पक जाता है, तथा असाध्य है।

रक्तगुल्म¹ स्त्रियोंको ही होता है। जिस स्त्रीको ऋतुकालमें अतिशय वेदना या किसी प्रकारका योनिरोग रहता है अथवा वायुकारक पदार्थोंको सेवन करनेसे वायु कुपित होकर प्रतिमाह व्यवस्थित ऋतुस्रावको योनिमें ही रोक देता है तो वह रुका हुआ रक्त कुक्षिमें जाकर गर्भके चिह्नोंको प्रकट करता है। इस रोगमें हृल्लास, गर्भिणी-जैसी इच्छा, स्तनमें दुग्ध-दर्शन, कामाचारिता आदि लक्षण प्रकाशित होने लगते हैं। क्रमशः वायुके संसर्गसे पित्त योनिमें रक्तका संचय करता है। शोणित जब गर्भाशयका आश्रयण करता है, तब वात-पित्तज गुल्मके विकार उत्पन्न हो जाते हैं। यह दुष्ट रक्तका आश्रय लेकर गर्भाशयमें अत्यन्त शूल उत्पन्न करता है। योनिमें स्राव, दुर्गन्ध, कभी-कभी स्पन्दन और वेदना होती है। कभी-कभी यह गुल्म गर्भ-जैसा हो जाता है।

दुष्ट रक्त एवं दुष्ट आश्रयके कारण यह विद्रधि गुल्म कभी देरमें पकता है, कभी नहीं पकता है और कभी जल्दी पक जाता है। अतः शीघ्र दाह पैदा करनेवाला होनेके कारण यह विद्रधि गुल्म कहा जाता है। अन्तराश्रय गुल्ममें वस्ति, कुक्षि, हृदय और प्लीहामें वेदना होती है। जठराग्नि और बलका नाश हो जाता है। मल-मूत्रादिका वेग रुद्ध हो जाता है। बहिराश्रय गुल्ममें इसका उलटा होता है अर्थात् वस्ति, कुक्षि आदिमें वेदना अधिक नहीं होती, वेगका प्रवर्तन होता है। गुल्म-स्थानमें विवर्णता और बाहरके भागमें अत्यधिक ऊँचापन आदि लक्षण उपस्थित होते हैं। ऊपर-नीचे वायुरोधके कारण तीव्र वेदना और उदरमें आध्मान होता है। इसे अनाहरोग कहते हैं। जो ग्रन्थि ऊपर उठी होती है तथा कठोर अष्ठीलाकी तरह होती है, उसे अष्ठीला विद्रधि कहते हैं। उसकी आकृति यदि समस्त चिह्नोंसे युक्त एवं तिरछी हो तो उसे प्रत्यष्ठीला कहते हैं। पक्वाशयमें उत्पन्न होनेवाला वायु तीव्र वेदनासे युक्त होकर डकारोंकी अधिकता, शौचका विबन्ध, भोजनकी अनिच्छा, आँतोंका सूजन, आटोप आध्मान, अग्निमान्द्य—ये सब उत्पन्न होनेवाले गुल्मके पूर्व संकेत हैं।²

(अध्याय १६०)


१-सु०उ०तं०अ०, ४२ अ०हृ०नि०अ० १२। २-सु०नि०अ० ६१, च०नि० ३, चि०अ० ५०, अ०हृ०नि०अ० ११, वाग्भट नि० ११।

२९०संक्षिप्त गरुड़पुराण[ आचार-

उदररोग-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं उदररोगका निदान कहूँगा, सुनो! मन्दाग्नि होनेपर सभी प्रकारके रोग उत्पन्न होते हैं और उदररोग विशेषकर मन्दाग्निसे ही होते हैं।

उदरमें मल संचित होनेपर अजीर्ण आदि भिन्न-भिन्न रोग, ऊर्ध्व और अधोगति वायुके अवरोध होनेसे सभी प्रवाहिणी नाड़ियाँ अकर्मण्य हो जाती हैं। प्राणवायु अपानादि वायुको दूषितकर उनको मांससंधिमें प्रविष्ट कर देती है। इससे कुक्षिस्थान अवरुद्ध होकर उदररोग उत्पन्न होता है। उदररोग आठ प्रकारके हैं—वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, सलिलजन्य, प्लीहाजन्य, बद्धोदर-वृद्धि और क्षतजन्य। उदररोग होनेपर हाथ-पैर तथा पेटमें सूजन आ जाती है। शारीरिक चेष्टा, बल और आहार कम हो जाता है। शरीर दुर्बल हो जाता है और अफरा हो जाता है। इस रोगसे ग्रस्त व्यक्तिका आकार प्रेतके समान विकृत हो जाता है।

उदररोगका पूर्व लक्षण भूख-नाश, अरुचि, पाकके समय दाह आदि होता है। ऐसा रोगी अपथ्यका सेवन करता है। उदररोगसे बलक्षय हो जाता है। अतः रोगीके थोड़ा कार्य करनेपर श्वास-प्रश्वासकी वृद्धि हो जाती है। किसी भी विषयमें उसकी बुद्धि प्रवेश नहीं कर पाती और शोक एवं शोथ आदि हो जाते हैं। उदररोगी थोड़ा खानेपर भी वस्तिसंधिमें निरन्तर पीड़ाका अनुभव करता है। सभी प्रकारके उदररोगमें रोगी वृद्धावस्थाके समान जीर्ण हो जाता है और बलहीन हो जाता है। तन्द्रा, आलस्य, मलवेग, मन्दाग्नि, दाह, सूजन और आध्मान—ये सभी जलोदरके लक्षण हैं। सब प्रकारका जलोदररोग मृत्युकारक है। इसलिये उसके लिये शोक करना व्यर्थ है। उदररोगमें रोगीका उदर गवाक्षकी तरह शिरोजालसे व्याप्त हो जाता है और सदा गुड़गुड़ शब्द होने लगता है।

उदररोगमें* वायु नाभि और आँतमें विष्टब्धता उत्पन्न करके नष्ट हो जाता है। वायुजन्य उदररोगमें हृदय, नाभि, कटि, पायु, वंक्षण—इन सभी स्थानोंमें पीड़ा करके स्वयं वायु शान्त हो जाता है। शब्दके साथ वायु निकलने लगता है एवं अल्प परिमाणमें ही मूत्र होता है। उसकी किसी भी विषयमें चञ्चलता नहीं रहती और मुख सदा उदास रहता है। वातोदरमें हाथ-पैर, मुख और कुक्षिमें शोथ हो जाता है। उदर-पार्श्व तथा कटि और पृष्ठ आदि स्थानोंमें पीड़ाका अनुभव होता है और जोड़ोंमें दर्द रहता है। शुष्क कास, शरीरमें पीड़ा, अधोभागमें गुरुता, मलसंग्रह, शरीरमें श्यामवर्णता या अरुणवर्णता आ जाती है एवं मुँहमें बार-बार पानी आता है। पेटमें नीली और काली शिराएँ उभर जाती हैं और व्यथा होती है तथा थपथपानेपर मशक-जैसा शब्द करता है। उदरमें वेदनाके साथ सशब्द वायु चारों तरफ घूमती है। पित्तजनित उदर-रोगमें ज्वर, मूर्च्छा, दाह, प्यास, मुखमें कटुता, अतिसार, त्वचा, नख आदिपर पीलापन, उदरपर हरापन एवं पीली और ताम्रवर्णकी शिराएँ अधिकतासे दीखती हैं तथा ऊष्मा और दाह बना रहता है।

कफजनित उदररोगमें शरीरमें अवसाद, शोथ, भारीपन, निद्राधिक्य, अरुचि, श्वास-कास, त्वचा आदिमें श्वेतता, श्वेत शिराओंसे व्याप्त उदर बड़ा एवं धीरेसे वृद्धिको प्राप्त करता है। त्रिदोषको कुपित करनेवाले आहार-विहारसे, अधिक भोजन करनेसे, शरीरको क्षुब्ध करनेसे, गाड़ी आदिपर यात्रा करनेसे, दौड़ने, कूदने, मैथुन करने, भार उठाने, चलने तथा ज्वरादिसे दुर्बल व्यक्तियोंके


* च०चि०अ० १३ ।

१४३- कृमि-निदान

काण्ड ] उदररोग-निदान २९१


वामपार्श्वमें स्थित प्लीहा अपने स्थानसे च्युत होकर वृद्धिको प्राप्त होने लगता है। प्लीहा पहले कठोर तथा पुनः उन्नत या उठा हुआ होकर उदररोग उत्पन्न करता है और श्वास-कास, मुख-विरसता, अफरा, शूल, पाण्डु, वमन, मूर्च्छा, शरीरवेदना, दाह, विभ्रम आदि अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न हो जाते हैं। उदरका रंग काला, लाल, विकृत नीला एवं पीला हो जाता है। प्लीहोदरमें भी वात, पित्त और कफका सम्बन्ध रहता है। प्लीहाके समान ही उदरके दक्षिण भागमें स्थित यकृत विकृत होकर भी उदररोग उत्पन्न करता है।

कुपित अपानवायु मल (पुरीष), पित्त एवं कफको अवरुद्ध करके उदरमें बद्ध गुदोदर नामक रोग उत्पन्न करता है और ज्वर, कास, श्वास एवं सिर, नाभि, पार्श्व और गुदामें पीड़ा उत्पन्न करता है। उदर स्थिर एवं अचल बना रहता है। उसपर नीली एवं लाल शिराओंका जाल दीखता है और उदरके ऊपरका हिस्सा गायकी पूँछके समान होकर मल संचय होता रहता है।

भोजनमें हड्डी और पाषाण आदि उदरमें जानेसे तथा अत्यधिक खानेसे आँतोंके फटनेपर पककर मवाद एवं मलके साथ जल निकलकर गुदामार्गसे जब बाहर आता है, वह पीला, लाल पुरीष गन्धयुक्त रहता है। अवशिष्ट भाग पेटमें रुककर उदर-वृद्धि करके जलोदररोग होकर बादमें वातादि दोषोंसे पुनः विकृत हो परिस्रावीच्छिद्रोदर रोग हो जाता है।

स्नेहपान, स्वेदन, वमन, विरेचन करते समय एकाएक ठंडा जल अधिक पान करनेसे मन्दाग्नि रहनेपर या दुर्बलतामें अधिक आम जल पीनेपर वायु एवं कफ कुपित होकर जलवाही स्रोतोंको अवरुद्ध कर उस दूषित जलको बढ़ा देता है और क्लोम, नलिकासे आकर अवरुद्ध हो उदररोग उत्पन्न कर देता है। तदनन्तर प्यास, गुदासे जलस्राव होता हुआ उदरमें वेदना होती रहती है। पुनः कास-श्वास एवं अरुचि हो जाती है। उदरपर अनेक रंगकी शिराएँ उभर आती हैं। उदर जलपूर्ण-सा हो जाता है तथा उसमें कम्पन आदि अनेक उपद्रव प्रारम्भ हो जाते हैं, इस स्थितिमें उसे दकोदर, उदकोदर या जलोदररोग कहते हैं। उदर-रोगोंकी उपेक्षा करनेसे वातादि दोष अपने स्थानसे विमुख होकर जलको बढ़ाकर उस जलसे शरीरके जोड़ोंके स्रोतोंके मुखोंको गीला या आर्द्र कर देते हैं। अतः शरीरके* पसीनेके रुकनेपर सभी स्रोत अवरुद्ध हो जाते हैं। इससे उदर परिपूर्ण होकर उदररोग उत्पन्न होता है। किसी-किसी रोगीके उदरमें अधिक जलके सञ्चित हो जानेपर वह वर्तुलाकार हो जाता है, उसको ताड़न करनेपर शब्द नहीं होता। इस रोगमें रोगी क्रमशः दुर्बल हो जाता है। यह रोग भयंकर होता है और नाड़ीको दबानेपर जल आगे बढ़ जाता है। उदररोगमें जब उदरगत शिराएँ अन्तर्हित हो जाती हैं, तब उस रोगको सभी लक्षणोंसे आक्रान्त कहा जाता है। वातोदर, पीतोदर, कफोदर, श्लेष्मोदर, प्लीहोदर, सन्निपातोदर और जलोदर—ये क्रमशः कष्टसाध्य होते जाते हैं। एक पक्षके भीतर ही इस रोगमें जल एकत्र होने लगता है। ये सभी उदररोग जन्मसे ही कष्टसाध्य होते हैं। (अध्याय १६१)


* च०चि०अ० १३, सु०नि०अ० ७, अ०हृ०नि०अ० १३।

१४४- वातव्याधि-निदान

२१२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

पाण्डु-शोथ-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं पाण्डु और शोथरोगका निदान कहता हूँ, सुनो! पित्त-प्रधान द्रव्योंसे सम्पूर्ण वातादि दोष कुपित करनेवाले हेतुओंसे पित्त एवं मल कुपित होकर पाण्डुरोग उत्पन्न करते हैं। इन तीनों कुपित दोषोंमेंसे बलवान् वायु-पित्त हृदयस्थ दस धमनियोंका आश्रय लेकर सम्पूर्ण शरीरमें फैल जाता है। वह पित्तका आश्रयणकर श्लेष्मा, चर्म, रक्त, मांस आदिको दूषित कर देता है। इससे दूषित रक्त चमड़े और मांसके बीचमें जाकर चमड़ेको भिन्न-भिन्न रंगका कर देता है। इस रोगमें चमड़ा हरिद्रादि अनेक रंगका हो जाता है, परंतु इसमें पीले रंगकी अधिकता रहती है। इसीसे इसे पाण्डुरोग कहते हैं। इस रोगमें धातुका गुरुत्व और स्पर्शमें शिथिलता होती है। अम्लजन्य पाण्डुरोगमें शरीरके सभी प्रकारके गुण नष्ट हो जाते हैं। इससे शरीरका रक्त क्रमशः कम हो जाता है, मेदा और अस्थि निस्सार हो जाते हैं। इस रोगमें सभी अङ्ग निर्बल हो जाते हैं, हृदयमें द्रवता आ जाती है एवं नेत्रोंमें सूजन हो जाती है। मुँहमें लालायुक्त लारकी अधिकता हो जाती है। रोगीको प्यास कम लगती है, ठंडक अच्छी नहीं लगती, रोमाञ्च और मन्दाग्नि हो जाती है एवं शरीरकी शक्ति घट जाती है तथा ज्वर, श्वास, कर्णशूल, चक्कर—ये सभी उपद्रव होने लगते हैं।

पाण्डुरोग* पाँच प्रकारके हैं—वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज एवं मृत्तिका-भक्षणजन्य। हृदयमें स्पन्दन, चमड़ेकी रूक्षता, अरुचि, मूत्रकी पीतवर्णता, पसीना और मूत्रका कम होना—ये सभी पाण्डुरोगके पूर्वरूप हैं। वायुजन्य पाण्डुरोगमें तीव्र वेदना, शरीरमें चिपचिपाहट आदि लक्षण दिखायी देते हैं। इस रोगमें शिरा, नख, विष्ठा, मूत्र और नेत्र कृष्णवर्ण तथा अरुणवर्णके हो जाते हैं। इससे शोथ, नासिका और मुखमें विरसता, मलशोष, पार्श्वमें वेदना—ये सभी उपद्रव होने लगते हैं। पित्तज पाण्डुरोगमें शिराएँ आदि हरित पित्त-जैसी हो जाती हैं एवं ज्वर, आँखोंके आगे अँधेरा, प्यास, शोष, मूर्च्छा, दुर्गन्ध, शैत्य-सेवनकी इच्छा, मुखमें कड़वाहट—ये सभी लक्षण व्यक्त होने लगते हैं। कफज पाण्डुरोगमें हृदयमें आर्द्रता, मलभेद, खट्टी डकार और दाह होता है। तन्द्रा, मुखमें लवण-रसका स्वाद, श्वास, रोमाञ्च, स्वरभंग, कास, वमन, दुःसहता—ये सभी लक्षण व्यक्त होने लगते हैं। त्रिदोषज होनेपर इसके लक्षणोंको पहचानना कठिन हो जाता है और अतिशय असह्य हो जाता है। मिट्टी खानेसे उत्पन्न पाण्डुरोगमें कसैली मिट्टी वायु, खारी मिट्टी पित्त और मीठी मिट्टी कफको दूषित करके तथा रस आदिको सुखा करके शिराओंको रक्तसे भर देती है तथा उसे वहीं रोक देती है और पाण्डुरोग पैदा हो जाता है। पाण्डुरोगके बढ़ जानेपर नाभि, पैर, मुख और मूत्रमार्गमें शोथ हो जाता है। कृमियुक्त तथा रक्तमिश्रित और कफसमन्वित मल निकलने लगता है।

जो पाण्डुरोगी पित्त उत्पन्न करनेवाले पदार्थोंका सेवन करता है, उसका पित्तरक्त और मांसका दाह करके कोष्ठ शाखामें मिलकर कामलारोग उत्पन्न करता है। कामला-रोगमें रोगीका मूत्र, नेत्र, त्वक्, मुख और विष्ठा हल्दीके रंगका हो जाता है। रोगी दाह, अविपाक और तृषासे पीड़ित होकर मेढकके समान पीला और दुर्बल हो जाता है। पाण्डुरोगीको पित्तज शोथ होने लगता है। इसकी


* च०चि० १६, सु०उ०तं०अ० ४३, अ०हृ०सू० २।

काण्ड ] विसर्परोगका निदान २१३

उपेक्षा करनेपर जो अतिशय शोथ बढ़ जाता है, वह बहुत क्लेशप्रद होता है। इस रोगको कुम्भकामला कहा जाता है। पित्त यदि हरित और श्यामवर्णका है तो उससे पाण्डुरोग होता है, उस स्थितिमें वात-पित्तके प्रभावसे चक्कर आना, तृष्णा, स्त्रियोंके प्रति अरुचि, थोड़ा-थोड़ा ज्वर, तन्द्रा, अग्निमान्द्य और अतिशय आलस्य—ये सभी रोगके लक्षण व्यक्त हो जाते हैं। इस रोगको हलीमक नामसे जाना जाता है।

पाण्डुरोगसे उत्पन्न सभी उपद्रवोंमें शोथ प्रधान है। इसलिये शोथका वर्णन किया जाता है। वायु कुपित होकर रक्त, पित्त और कफको दूषित करनेके कारण वह त्वक्, शिरा और मांसका आश्रय लेकर ऊँचाई पैदा करता है। सभी शोथ त्रिदोषज होते हैं, क्योंकि सूजन वात, पित्त और कफ—इन तीनोंसे होती है। इसलिये जैसे वातिक, पैत्तिक, श्लेष्मिक कारण-भेदसे शोथ नौ प्रकारका होता है—वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, पित्तकफज, सन्निपातिक, अविघातक, विषज और एकाङ्गज। निज और आगन्तुक-भेदसे यह दो प्रकारका होता है—सर्वाङ्गज और एकाङ्गज। विस्तृत, उन्नत, अग्रभाग गाँठदार होनेसे इसके अवान्तर तीन भेद हैं।

पैत्तज शोथ पीतवर्ण, कृष्णवर्ण या रक्तवर्णका होता है एवं यह शोषणकारी होता है। यह बहुत जल्दी शान्त नहीं होता। इस शोथके उत्पन्न होनेसे पूर्व शरीरमें दाह उत्पन्न होता है। तृष्णा, दाह, ज्वर, पसीना, भ्रम, क्लेद, मद—ये सभी उपद्रव इसमें होने लगते हैं। इस रोगमें रोगीको शीत वस्तुकी इच्छा होती है, मलभेद हो जाता है, दुर्गन्धि होती है, स्पर्श नहीं सहा जाता और कोमलता होती है। कफज शोथमें खुजली होती है। रोम और चमड़ेमें पीलापन, कठोरता, शीतलता, गुरुता, स्निग्धता, कोमलता, स्थिरता और पीड़ा होती है। इस रोगमें निद्रा, मन्दाग्नि, वमन—ये सभी उपद्रव हो जाते हैं।

आघात—अस्त्र-शस्त्रादिकृत छेदन-भेदनसे क्षत होनेपर अभिघातज शोथ होता है। शीतल वायु तथा समुद्रीवायु और भल्लातक-रसके लग जाने एवं केंवाच इत्यादिके लग जानेसे जो सूजन होती है, वह फैल जाती है। यह अत्यन्त गरम लाल रंगका और पित्तज शोथके लक्षणोंसे युक्त होती है।

विषधर³ प्राणीके किसी अङ्गके ऊपरसे चलनेपर अथवा किसी अङ्गमें मूत्र करनेपर और विषहीन प्राणीके भी दाढ़, दाँत एवं नखके द्वारा घात करनेपर उस स्थानमें जो शोथ उत्पन्न होता है, वही विषज शोथ है। इसके अतिरिक्त विषधर प्राणीके विष्ठा, मूत्र, शुक्र आदिसे सने हुए वस्तुके सम्पर्कसे, विषवृक्षके वायुके सेवनसे, विषयुक्त वस्तु शरीरपर मलनेसे विषशोथरोग उत्पन्न होता है। विषजशोथ कोमल, गतिशील, अवलम्बी, शीघ्र दाह और शूलको उत्पन्न करनेवाला होता है। नये और उपद्रवरहित शोथ साध्य होते हैं और पहले कहे हुए असाध्य होते हैं। (अध्याय १६२)


विसर्परोगका निदान

धन्वन्तरिने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं विसर्पादि रोगोंके मूल कारणोंका वर्णन कर रहा हूँ, उसे आप सुनें।

वात, पित्त, कफ एवं अभिघात नामक दोषोंसे तथा पित्त, रक्त एवं कफके दूषित होनेसे शोथ-सदृश विसर्परोग होता है। बाह्य, अन्तः, उभय—ये उसके तीन अधिष्ठान हैं। इनमें अपने-अपने प्रकोपक तथा विदाहकारी कारणोंसे शरीरमें शीघ्र विसर्पण


१-सु०उ०तं०अ० ४४, मा०नि०पाण्डुप्र० २२, २३। २-च०चि०अ० १२, च०सू०अ० १८, सु०चि०अ० २३।

२९४संक्षिप्त गरुड़पुराण[ आचार-

कर बाहर एवं अंदर विकृत करके विसर्परोग शरीरके बाहर तथा अंदर उत्पन्न करते हैं।

आन्तरिक विसर्पसे हृदय आदिमें उपताप होनेके कारण अत्यन्त मोह तथा कर्ण-नासा आदिमें विघटन होता है। प्यासकी अधिकता और मलमूत्रादिमें विषमता होती है। कफजन्य* विसर्परोगमें अत्यधिक खुजलाहट होती है। उसमें स्निग्धता बनी रहती है और कफजन्य ज्वरके समान इस रोगमें भी रोगीको कष्ट भोगना पड़ता है।

संनिपातज विसर्प होनेपर रक्त-वातादि सभी दोषोंके लक्षण प्रकट हो जाते हैं। इन सभी प्रकारके विसर्प-भेदोंकी उपेक्षा कर देनेपर वे यथाक्रम अपने-अपने दोषोंके लक्षणोंसे समन्वित होकर फुंसियोंके रूपमें उभर आते हैं। ये जब पककर फूट जाते हैं, तब अपने-अपने लक्षणोंमें उक्त व्रणका रूप धारण कर लेते हैं।

वात-पित्तज विसर्परोगमें रोगीको ज्वर, वमन, मूर्च्छा, अतिसार, प्यास, भ्रम, हड्डी टूटना, अग्निमान्द्य, तमक, श्वास और अरुचिका उपद्रव ग्रस्त कर लेता है। यह रोग प्रज्वलित अग्निके अंगारेके समान रोगीके सम्पूर्ण अङ्गको संतप्त कर देता है। यह विसर्प शरीरके जिन-जिन स्थानोंपर फैलता है, वे स्थान बुझे हुए अंगारेके समान काले, नीले तथा रक्तवर्णके हो जाते हैं। अपने स्फुटित व्रणोंके द्वारा यथाशीघ्र ही अग्निसे दग्ध हुए स्थानके सदृश विस्तृत क्षेत्रमें यह फैल जाता है। शीघ्रगामी होनेके कारण विसर्प मर्मस्थलतक पहुँच जाता है। इस रोगमें वायु प्रबल हो जाता है और वह प्रकुपित होकर सम्पूर्ण अङ्गोंको पीड़ित करता है तथा रोगीको चेतनाशून्य कर देता है। उसके प्रभावसे रोगीकी निद्रा भी समाप्त हो जाती है। उसकी श्वसन-क्रियामें विकार आ जाता है। ऐसे रोगीको हिचकी भी आने लगती है। इस प्रकारके रोगमें रोगीकी ऐसी अवस्था हो जाती है कि वह पीड़ासे ग्रस्त हो उठता है तो उसको अत्यन्त व्याकुलताकी अनुभूति होती है। भूमि, शय्या तथा आसन आदिपर उठने-बैठने और लेटनेसे उसको तनिक भी शान्ति प्राप्त नहीं होती। इस रोगसे ग्रस्त रोगी उससे विमुक्त होनेके लिये विभिन्न प्रकारकी चेष्टा करता है, किंतु उस कष्टसे विमुक्त नहीं हो पाता। ऐसा रोगी मन और शरीर दोनोंसे शिथिल होकर ऐसी गम्भीर मूर्च्छाको प्राप्त कर लेता है, जिससे पुनः चेतनामें उसको लौटना बड़ा ही दुस्साध्य होता है। इन लक्षणोंसे युक्त विसर्पको अग्निविसर्प कहा जाता है।

कफसे अवरुद्ध वायु उस अवरोधक कफका बहुत प्रकारसे भेदन कर देती है, तब ग्रन्थिमाला तैयार हो जाती है अथवा जिस रोगीका रक्त बढ़ जाता है, उसके त्वचा, शिरा, स्नायु तथा मांसगत रक्तको दूषित करके वह वायु लम्बी, छल्लेदार, स्थूल और खरदरी ग्रन्थियोंकी रक्तभरी मालाकी सृष्टि करती है। इसके कारण रोगीको तीव्र पीड़ादायक ज्वर होता है। यह रोग होनेपर रोगी श्वास, खाँसी, अतिसार, मुखशोष, हिचकी, वमन, भ्रम, मोह, वर्णभेद, मूर्च्छा, अङ्गभेद और अग्निमान्द्यके दोषसे भी घिर जाता है। इस प्रकार कफ और वायुके संक्षोभसे उत्पन्न इस रोगको ग्रन्थिविसर्प कहते हैं।

कफ और पित्तके प्रकुपित होनेसे रोगीमें ज्वर, स्तम्भन, निद्रा, तन्द्रा, शिरोवेदना, विक्षेप, प्रलाप, अरुचि, भ्रम, मूर्च्छा, अग्निमान्द्य, अस्थिभेद, प्यास, इन्द्रियजनित जड़ता, आँवनिर्गमन तथा रसादिक स्रोतोंका लेप—ये लक्षण दिखायी देते हैं। प्रायः यह दोष आमाशयके एक देशमें होता है और धीरे-धीरे अन्य भागोंमें फैलता जाता है, परंतु


* च०चि०२१, सु०नि०अ० १०, अ०हृ०नि०अ० १३।

१४५- वातरक्त-निदान

काण्ड ] कुष्ठरोगका निदान २९५


इसमें दर्द नहीं होता। यह अत्यन्त पीला, लोहित और पाण्डु रंगकी पिडिकाओंसे भर जाता है। इसके स्वरूपकी कान्ति कृष्ण और मलिन मानी गयी है। यह रोग शोथसे युक्त और भारी होता है। यह स्पर्श करनेमें अधिक ऊष्मासे समन्वित अनुभूत होता है। इसमें पसीने-जैसी चिपचिपाहट होती है। जब यह पककर फूटता है तो इसमें मांस गल-गलकर नये रूपमें निकलने लगता है। शरीरकी स्नायु तथा शिराएँ स्पष्ट रूपसे दिखायी देने लगती हैं। इस प्रकार सभी लक्षणोंसे युक्त हुआ यह विसर्परोग अन्ततोगत्वा शरीरकी त्वचासे सम्पृक्त हो जाता है, जिसके कारण यह बाह्य भागमें दिखायी देने लगता है। इस रोग-स्थानसे शवके समान दुर्गन्ध निकलती है। विद्वानोंने इसको कर्दम विसर्परोगके नामसे अभिहित किया है।

बाह्य आघात आदिके कारण क्षत हुए शरीरसे क्रुद्ध १ वायु पित्तको रक्तसमन्वित करता हुआ कुलथीके दानोंके समान स्फोटजनित विसर्पको जन्म देता है। इसमें शोथ, ज्वर, पीड़ा, दाहाधिक्य, श्याम और रक्तवर्णताका लक्षण भी दिखायी पड़ता है। पृथक्-पृथक् वात, पित्त तथा कफजनित दोषसे उत्पन्न उक्त तीनों प्रकारका विसर्परोग साध्य है। इतना ही नहीं, वात-पित्त आदि द्वन्द्वजनित दोषसे समन्वित विसर्प यदि उपद्रवसे रहित हैं तो वे भी यथापेक्षित चिकित्सासे दूर किये जा सकते हैं, किंतु जो विसर्प समस्त दोषोंसे युक्त हो जाते हैं और जिनका आक्रमण रोगीके मर्म २ स्थलको आहत करनेमें सफल हो जाता है, जिसके दुष्प्रभावसे रोगीके शरीरका स्नायु, शिरा और मांस गल जाता है और जिनसे शवके समान दुर्गन्ध आने लगती है—वे विसर्परोग असाध्य हो जाते हैं, उनकी चिकित्सा सम्भव नहीं है। (अध्याय १६३)


कुष्ठरोगका निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! मिथ्या एवं विरोधी आहार-विहार करनेसे तथा सज्जनोंकी निन्दा एवं अपमान और वध या हत्या करनेसे, दूसरोंकी धन-सम्पत्तिके हरण एवं पाप-कृत्यसे, पूर्वजन्मकृत पापका उदय होनेसे वातादि दोष कुपित होकर शिराओंमें जाकर त्वचा, लसीका, रक्त एवं मांसको दूषित और अङ्गोंकी क्रिया-हानि करके वे दोष बाहर आकर त्वचापर विविध प्रकारके कुष्ठ ३ को उत्पन्न करते हैं।

सामयिक उपेक्षा करनेपर यह रोग आभ्यन्तरिक समस्त कोष्ठकोंके सहित शरीरमें व्याप्त होकर बाहर और भीतर रहनेवाली सभी धातुओंको गलाकर अपना अधिकार कर लेता है। इस रोगमें पसीनेके जलबिन्दुओंसे युक्त प्राणीके शरीरपर कुछ आर्द्रता होती है। इसमें अत्यन्त कष्टदायक बहुत ही छोटे-छोटे कीड़े होते हैं। इन सभी लक्षणोंसे युक्त यह रोग क्रमशः रोगीके रोम, त्वचा, स्नायु तथा धमनियोंपर आक्रमण करता है।

बाह्य भागमें फैला हुआ कुष्ठरोग प्राणीके उस आक्रान्तित शरीरको भस्मसे आच्छादित हुएके समान रूक्ष बना देता है। वात, पित्त, श्लेष्म, वातपित्त, वातश्लेष्म, पित्तश्लेष्म और संनिपात-दोषजन्य प्रभावसे यह रोग सात प्रकारका होता है। इन सभी प्रकारके कुष्ठ-भेदोंमें वात-पित्त तथा कफज दोषके अन्तर्गत प्राप्त होनेवाली विकृति अधिक रहती है।


१-सु०नि०अ० १०; च०चि०अ० २१। २-च०चि० २१; अ०हृ०नि०अ० १४। ३-सु०नि०अ० ५।

२९६ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

वात-दोषसे कापाल, पित्त-दोषसे उदुम्बर, कफ-दोषसे मण्डल तथा विचर्चिका नामक कुष्ठ उत्पन्न होता है। वातपित्तज दोषसे ऋक्ष, वातश्लेष्मजन्य दोषसे चर्म, एककुष्ठ, किटिम, सिध्म, अलसक तथा विपादिका नामक कुष्ठ होते हैं। श्लेष्मपित्तजन्य दोषसे दद्रु, शतारुषी, पुण्डरीक, विस्फोट, पामा और चर्मदल नामक कुष्ठोंकी उत्पत्ति होती है। इन सभी दोषोंकी संनिपात-अवस्था आनेपर १८ प्रकारके कुष्ठ-रोग उत्पन्न होते हैं।

इनमें पूर्वमें कहे—कापाल, उदुम्बर तथा मण्डल—ये तीन और दद्रु, काकण, पुण्डरीक तथा अरिजिव्हा नामक इन सात कुष्ठोंको महा कुष्ठ माना गया है। शेष ग्यारह क्षुद्र कुष्ठ कहलाते हैं।

कुष्ठरोग* होनेके पूर्व रोगीकी त्वचाओंमें अत्यन्त चिकनाहट, रूक्षता, स्पर्शता, स्वेद, अस्वेद, वर्णभेद, दाह, खुजली, स्पर्शानुभूतिकी कमी, सुई चुभानेसे होनेवाली पीड़ाके समान कष्ट, पित्तीका उछलना और अनायास श्रमकी अनुभूति, रोगीके घावोंमें अत्यधिक पीड़ा, व्रणोंका यथाशीघ्र उद्भव, अधिक समयतक उन व्रणोंका रहना, व्रण-भरावके समय रूक्षता, सामान्य तथा थोड़ेसे कारणपर रोगीको अत्यधिक क्रोध, रोमाञ्च तथा रक्तका काला होना—ये दोषपूर्ण कुलक्षण दिखायी देते हैं।

कापाल कुष्ठका वर्ण काला और लाल होता है अथवा आँवेंमें पकाये गये मिट्टीके खप्परके सदृश वह देखनेमें लगता है। उसमें रूक्षता और कठोरता होती है। इस कुष्ठ-रोगकी आकृति शरीरके अधिक भागमें फैली रहती है। उन स्थानोंमें रहनेवाले रोमसमूह भी दूषित हो जाते हैं। उन दूषित स्थानोंपर सूचिकाभेदनसे होनेवाली पीड़ाके समान अत्यधिक पीड़ा भी होती है। वह कुष्ठ विषम अर्थात् दुःसाध्य माना गया है।

जो कुष्ठरोग उदुम्बर अर्थात् गूलर-फलके समान दिखायी देता हो, उसको औदुम्बर कुष्ठरोग कहना चाहिये। इसकी आकृति वर्तुलाकार होती है। इसमें अत्यधिक गीलापन, दाह और पीड़ा होती है। जिस प्रकार बिना छानी गयी मदिराका वर्ण होता है, जिसमें छोटे-छोटे कीड़े भरे रहते हैं; वैसे ही सामान्य पके हुए उदुम्बरका फल पीत और लाल होता है, उसी रूपमें इस कुष्ठरोगका वर्ण स्वीकार करना चाहिये। इसमें रोगजन्य कृमि रहते हैं, जिसके कारण उस व्रणमें खुजली भी होती है।

जो कुष्ठ स्थिर, गोल, भारी, चिक्कण, श्वेत या रक्त-वर्णवाला और मलसमन्वित हो, उसके वर्ण परस्पर मिले हों, उसमें अत्यधिक खुजलाहट उत्पन्न करनेवाले कृमि हों, उनसे पीब निकलता रहे तथा वह चिकने, पीत वर्णकी आभासे युक्त मण्डलके समान दिखायी देता हो तो उसको मण्डल कुष्ठरोग कहा गया है।

खुजलाहटसे भरी हुई फुंसियोंवाले धूसर वर्णसे युक्त और स्राव-समन्वित कुष्ठका नाम विचर्चिका कुष्ठ है। जो कुष्ठ कर्कश होता है, जिसके किनारेपर लाल वर्ण और बीचमें काला वर्ण विद्यमान रहता है, जिसकी आकृति ऊँची और रीछ अर्थात् भालूकी जिह्वाके समान होती है, जिसमें बहुत-से कृमि भी होते हैं; उसको आयुर्वेदमें ऋष्यजिह्वा या ऋक्षजिह्वा कुष्ठके नामसे अभिहित किया गया है।

हाथीके चमड़ेके समान रोगीका खरखराहट-भरा चमड़ा होनेपर गजचर्मकुष्ठ कहा जाता है। जो कुष्ठ पसीनेसे रहित मछलीके शल्क (अभ्रकवत् चर्म)-के सदृश होता है, उसे एककुष्ठ कहते हैं। जो कुष्ठ रूखा, अग्निके समान वर्णवाला या काला, स्पर्श करनेमें कष्टकारी, खुजलाहटसे युक्त


* सु०नि०अ० ५; च०चि०अ० ५, ७; अ०हृ०नि०अ० १४; वा०नि० ७।

काण्ड ] कुष्ठरोगका निदान २१७

तथा कठोर होता है, वह किटिम कुष्ठ माना गया है। सिध्म कुष्ठ अन्तर्भागसे रूक्ष और बाह्यरूपमें स्निग्ध होता है। इसके आभ्यन्तरिक भागको रगड़नेसे बालूके कणके समान रज गिरता है। इस रोगके होनेपर शरीरका स्पर्श करनेसे चिकनाहट का अनुभव होता है। इसमें स्वच्छता होती है। इसकी वर्णाकृति काले पुष्पके समान दिखायी देती है, यह कुष्ठ प्रायः शरीरके ऊपरी भागमें होता है।

अलंशुका (अलसक) कुष्ठमें खुजली और लाल रंगकी पिडिका होती है। विपादिका कुष्ठमें हाथ और पाँव फट जाते हैं, अत्यन्त वेदना और खुजली होती है तथा लाल वर्णकी फुंसियाँ हो जाती हैं। जिस कुष्ठमें दद्रु या दाद दूर्वाके समान बहुत जगहमें फैल जाता हो तथा अलसीके फूलके सदृश कान्ति दिखायी देती हो और ऊँचे-ऊँचे गोल चकत्ते हों, ऐसा खुजलाहटसे परिव्याप्त कुष्ठ दद्रु या दाद कुष्ठ कहलाता है।

अपने मूलभागमें स्थूल, दाह और वेदनासे समन्वित रक्तस्राववाले प्रचुर व्रणोंसे युक्त कुष्ठरोगका नाम शतारुषी है। इस प्रकारके कुष्ठरोगमें दाह, क्लेद और वेदना होती है। यह प्रायः अस्थिके जोड़ोंमें होता है। जिस कुष्ठमें कुष्ठ-स्थानका मण्डल रक्तसे भरा हुआ तथा पाण्डु वर्णका होता है, उसमें दाह और खुजलाहट-भरी पीड़ा भी होती है, खिले हुए रक्तवर्ण और जलसे संसिक्त पुण्डरीक-दल अर्थात् श्वेत कमलकी पंखुड़ियोंके समान शरीरपर उभरा हुआ और व्रणके किनारे पद्मपत्रकी जल-विन्दुओंसे युक्त मांसवाले दिखायी देते हैं, उसे पुण्डरीक कुष्ठ कहते हैं। विस्फोटक कुष्ठ पतले चमड़ेसे ढका होता है तथा सफेद और लाल फुंसियोंसे व्याप्त होता है।

पामा नामक कुष्ठ पककर फूटनेवाली छोटी-छोटी असंख्य फुंसियोंसे भरा होता है। इसमें खुजली, मलस्राव और वेदना होती है। प्रायः इसका वर्ण श्याम और लाल होता है। इसमें रूक्षता होती है। यह रोगीके कूल्हे, चूतड़ और हाथके रोम-छिद्रोंमें होता है। चर्मदल नामक कुष्ठ फोड़ा-फुंसीके रूपमें उभरकर फफोले पड़कर फूटता है, यह किये गये स्पर्शको सहन करनेमें समर्थ नहीं होता। इसमें खुजलाहट होती है, रक्तस्राव होता है, जलन भी होती है और मांस गलकर गिरता है।

काकण नामक कुष्ठमें अत्यन्त दाह और तीव्र वेदना होती है। गुंजाफलके समान यह पहले लाल और काले अनेक रंगका होता है। अपने-अपने कारणोंसे सब कुष्ठोंके लक्षण इसमें पाये जाते हैं।

दोषै-भेदके अनुसार त्रिदोषोंमें जो दोष कुष्ठमें अधिक विहित हो, उसीके लक्षण और कर्मके अनुसार त्रिदोषज कुष्ठका स्वरूप समझना चाहिये। जो कुष्ठ-भेद अपने ही दोषका अनुगमन करता है अर्थात् वह द्वन्द्वज दोष या संनिपातज दोषसे सम्पृक्त नहीं होता तो उसकी चिकित्सा सम्भव है। किंतु जब वह सभी दोषोंसे परिव्याप्त हो जाता है तो उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये, वह असाध्य हो जाता है।

उपर्युक्त जितने भी कुष्ठ हैं, उनमेंसे जो कुष्ठ अस्थि, मज्जा और शुक्राणुओंमें प्रविष्ट हो गया है, वह कुष्ठ भी असाध्य है। जो कुष्ठ मेदगत है और जो स्नायु, अस्थि एवं मांसमें पहुँच गया है, वह अधिक कष्टसाध्य नहीं है। जिस कुष्ठका जन्म कफ और वातके कारण त्वचापर ही होता है, जिसमें विशेष दोष नहीं रहता, वह कष्टसाध्य नहीं होता। सामान्य चिकित्सासे ही उसकी शान्ति हो सकती है।

त्वचाभागपर ऐसे कुष्ठके उभर आनेसे शरीरका वर्ण बदल जाता है, उसमें रूक्षता आ जाती है।


* सू०सू०अ० १२।

२९८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

तदनन्तर जब वह कुष्ठ रक्त और मांसमें प्रविष्ट हो जाता है तो रोगीके शरीरमें स्वेद, ताप तथा शोथके लक्षण उभर आते हैं। रोगीके हाथ और पैरोंमें फोड़े हो जाते हैं। शरीरके संधि-भागोंमें अधिक पीड़ा होती है। दोषाधिक्य होनेपर वह मेदामें पहुँच जाता है, जिसके कारण उसमें उपद्रव होने लगता है। रोगीकी इन्द्रियोंमें संज्ञाशून्यता बढ़ जाती है अर्थात् वह चलने-फिरनेमें अशक्त हो जाता है। रोगीके शरीरकी मज्जा और अस्थिमें जब वह कुष्ठ पहुँच जाता है तो उसके नेत्रोंकी ज्योति तथा वाणीके स्वरोंमें भेद उत्पन्न हो जाता है।

कुष्ठरोगके कृमियोंके द्वारा रोगीके वीर्यमें विकार उत्पन्न हो जानेपर वह दोष स्त्री और संतानके लिये बाधायुक्त हो जाता है। रस-रक्तादि धातुगत कुष्ठोंमें अपने-अपने लक्षणोंके अतिरिक्त यथापूर्व धातुगत कुष्ठोंके लक्षण भी हो जाते हैं।

श्वित्र और कुष्ठ इन दोनों रोगोंकी उत्पत्तिका कारण एक ही है और इनकी चिकित्सा भी एक ही है। इसीको किलास तथा दारुण भी कहते हैं। इनमें अन्तर यही है कि कुष्ठ संनिपातिक है और श्वित्र अलग-अलग दोषोंसे उत्पन्न होता है। कुष्ठ स्रावी है और श्वित्र अपरिस्रावी। कुष्ठ रसादि सातों धातुओंपर आक्रमण करता है और श्वित्र रक्त, मांस तथा मेद—इन तीन धातुओंका आश्रय ग्रहण करता है।

वातज और आभ्यन्तरिक रूक्षताके कारण उत्पन्न हुआ श्वित्र कुष्ठरोग अरुण वर्णका होता है। जब वह पित्तज दोषके कारण जन्म लेता है तो उसका वर्ण पद्मपत्रके समान या ताम्रवत् होता है। यह दाहयुक्त और रोमविनाशक होता है। कफज दोषके कारण उभरा हुआ श्वित्र श्वेतवर्ण, सघन, भारी और खुजलीसे युक्त होता है।

ये श्वित्र क्रमशः रक्त, मांस और मेदामें पहुँचकर आश्रय ग्रहण करते हैं अर्थात् वातज श्वित्र रक्तमें, पित्तज श्वित्र मांसमें तथा कफज श्वित्र मेदमें होता है। अरुण आदि वर्णके आधारपर ही श्वित्रके वातादिक दोष तथा रक्तादि आश्रय—दोनों ही जाने जाते हैं। उत्तरोत्तर इनकी चिकित्सा कष्ट-साध्य होती है अर्थात् यह श्वित्ररोग जबतक रक्ताश्रित होता है, तबतक उसकी चिकित्सा सम्भव है। मांसगत होते ही यह कष्टसाध्य हो जाता है और उसके बाद तो जब यह मेदामें पहुँच जाता है, तब अत्यन्त कष्टसाध्य हो जाता है।

जो श्वित्र कृष्ण वर्णवाले रोमोंसे भरा हुआ होता है, उसके दाग एक-दूसरेसे संश्लिष्ट नहीं होते। वह अधिक समयका न होकर नया ही होता है और उसका जन्म अग्निसे जलनेके कारण नहीं हो तो उसे चिकित्सा-साध्य समझना चाहिये। इन लक्षणोंके विपरीत होनेपर इसका उपचार करना चिकित्सकके लिये त्याज्य है, क्योंकि यह असाध्य हो जाता है। रोगीके गुह्यभाग, करतल और ओष्ठ-प्रदेशमें तो यथाशीघ्र भी उत्पन्न हुआ यह रोग असाध्य बन जाता है। यश प्राप्त करनेके इच्छुक वैद्यको तो किलास नामक श्वित्र-भेदकी चिकित्साको सर्वथा त्याग देना चाहिये, क्योंकि उसका उपचार सम्भव नहीं है।

प्रायः सभी रोग संक्रामक होते हैं। रोगीका स्पर्श करनेसे, उसके साथ बैठकर भोजन करनेसे, उसके साथ रहनेसे, एक शय्या और आसनपर उसके साथ सोने और बैठनेसे तथा उस रोगीके द्वारा प्रयुक्त वस्त्र, माला एवं अनुलेप-पदार्थका प्रयोग करनेसे दूसरे प्राणीमें रोगोंका प्रादुर्भाव हो जाता है। (अध्याय १६४)

१४६- वैद्यकशास्त्रकी परिभाषा

काण्ड ] कृमि-निदान २९१

कृमि-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! बाह्य और आभ्यन्तर भेदके कारण कृमियोंके दो प्रकार हैं। उनमें बाह्यगत जो कृमि (कीड़े) होते हैं, उनका जन्म बाहरी मल, कफ, रक्त और विष्ठासे होता है। जन्मगत भेदके कारण उनके चार भेद हो जाते हैं, किंतु नाम-भेदसे कृमियोंके बीस प्रकार माने गये हैं। बाह्य कृमि बाह्य मलसे उत्पन्न होते हैं। इनका परिमाण, आकार और वर्ण तिलके समान होता है। इनका निवास प्राणियोंकी केशराशि तथा उनके वस्त्रोंमें होता है। अनेक पैरोंवाले उन कृमियोंकी आकृति सूक्ष्म होती है। नामतः उन्हें जूँ और लीख कहा जाता है। इन दोनों प्रकारवाले कृमियोंके द्वारा प्राणियोंके बाह्य शरीरपर कोष्ठ (चकत्ते), पिडिका (फुंसी), कण्डू (खुजली) तथा गण्ड (गाँठ)नामक रोग कहे जाते हैं।

कुष्ठरोगका एकमात्र कारण शरीरके आभ्यन्तरिक भागमें उत्पन्न होनेवाला श्लेष्मज कृमि है। यह प्राणीके बाह्य श्लेष्ममें भी उत्पन्न हो सकता है। मधुर अन्न, गुड़, दूध, दही, मछली और नये चावलका भात खानेसे प्राणीके आभ्यन्तरिक भागमें कफ उत्पन्न होता है, उसी कफसे उत्पन्न होकर कृमिवर्ग आमाशयमें पहुँच जाता है। उसीमें इस कृमिवर्गकी अभिवृद्धि होती है और उसीसे निकलकर शरीरमें यह सब ओर फैल जाता है। उनमें कुछ चमड़ेकी मोटी ताँतके समान, कुछ केंचुएके सदृश, कुछ धान्याङ्कुरके समान छोटे-बड़े और कुछ अणुकी भाँति होते हैं। इनका वर्ण श्वेत तथा ताँबे-जैसा होता है। नामतः इन कृमियोंके सात प्रकार हैं—अन्नाद, उदरावेष्ट, हृदयाद, महागुद, च्युरव, दर्भकुसुम और सुगन्ध।

इन कृमियोंके उत्पन्न होनेसे प्राणीके हल्लास, मुखस्राव (लार), अपच, अरुचि, मूर्च्छा, वमन, ज्वर, आनाह, कृशता, शोथ तथा पीनस नामक रोगोंकी उत्पत्ति होती है।

रक्तवाही शिराओंमें स्थित रक्तसे उत्पन्न होनेवाले कृमि अणुरूप, पादविहीन, वृत्ताकार और ताम्रवर्णके होते हैं। अपनी सूक्ष्मताके कारण उनमेंसे कुछ कृमि तो दृष्टिगोचर ही नहीं होते। इनके केशाद, रोमविध्वंस, रोमद्वीप, उदुम्बर, सौरस तथा मातर—ये छः भेद हैं। इन सभी कृमियोंका एकमात्र कार्य कुष्ठरोग उत्पन्न करना है।

पक्वाशयमें गुदा-भागसे बाहर निकलनेवाले विष्ठाजन्य कृमियोंका उद्भव होता है। वहींपर बढ़कर जब ये आमाशयकी ओर उन्मुख होते हैं, तब प्राणियोंके डकार और श्वासमें विष्ठा-सदृश दुर्गन्ध आती है। वे कृमि लम्बे, गोल, छोटे और मोटे होते हैं। उनका वर्ण श्याम, पीत, श्वेत और कृष्ण होता है। उन कृमियोंके ककेरुक, मकेरुक, सौसुराद, शूलाख्य तथा लेलिह—ये पाँच नामभेद हैं। जब ये प्रकुपित हो उठते हैं तो प्राणीके शरीरमें मलभेद, शूल, विष्टम्भ, कृशता, कर्कशता, पाण्डुता, रोमाञ्च, मन्दाग्नि और पाण्डु तथा गुदामें खुजलाहट का दोष उत्पन्न हो जाता है।

(अध्याय १६५)


१-वा० नि० अ० १४। २-सु० उ० तं० अ० ५४ ।

३०० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

वातव्याधि-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं आपको वातव्याधिका निदान सुना रहा हूँ, उसे आप सुनें।

शरीरमें विशेष रूपसे सर्वथा अनर्थ और विघ्नोंका एकमात्र कारण न दिखायी देनेवाला दुष्ट (प्रकुपित) पवन ही है। वह वायु ही विश्वकर्मा, विश्वात्मा, विश्वरूप, प्रजापति, स्रष्टा, धाता, विभु, विष्णु, संहर्ता, मृत्यु और अन्तक-रूप है। इसलिये उस वायुको सम रखनेके लिये विशेष रूपसे प्रयत्न करना चाहिये।

उस वातबाधित शरीरसे सम्बद्ध, कहे गये दोष-विज्ञानमें कर्म दो प्रकारका माना गया है। उनमें एक है प्राकृत कर्म और दूसरा है वैकृत कर्म। संक्षेपमें प्रतिपादित दोष-भेदोंका विचार करके प्रत्येक कर्मके पाँच-पाँच दोष सिद्ध किये गये हैं। इनमें वैकृत कर्म-दोष प्राकृतकी अपेक्षा शक्तिशाली और गतिमान् होता है। अब यहाँ यथाविभाग लक्षणसहित उसके निदानको कहा जा रहा है।

शरीरकी धातुओंको क्षीण करनेवाले द्रव्य-पदार्थोंके उपभोग तथा आचार-विचारसे क्रुद्ध वायु अत्यधिक समरूपमें प्रवहमान नहीं रहता। वह रस आदिके चारों स्रोतोंसे प्रवाहित होकर पुनः उनमें तज्जनित दोषोंको परिपूर्ण कर देता है। उसके बाद उन दोषपूर्ण स्रोतोंसे निकलकर वह संक्षुब्ध वायु उसके मुखको विधिवत् आच्छादित करके रोगीके शरीरमें शूल, आनाह, आन्त्रकूजन, मलावरोध, स्वरभंग, दृष्टिभेद, पीठ तथा कटि-प्रदेशमें पीड़ादायक उपद्रवोंको जन्म देता है। उसीके प्रभावसे रोगीके शरीरमें अन्य ऐसे उपद्रवोंका जन्म होता है, जो कष्टसाध्य हैं।

आमाशयमें वात-दोष होनेपर वमन, श्वास, खाँसी, विषूचिका, कण्ठावरोध तथा नाभिके ऊपरके भागमें अनेक व्याधियोंका जन्म होता है। कुपित वायु नेत्र-कान आदि इन्द्रियोंमें विघ्न तथा त्वचा-भागमें प्रविष्ट होकर पककर फूटनेवाले फोड़े और रूक्षताका कारण बन जाती है। रक्तमें वायुके प्रविष्ट होनेसे रोगीको अत्यन्त कष्टदायक पीड़ा होती है, श्वास तथा गलेमें जलन और स्वरभेदका रोग होता है। आँतके मध्य प्रदूषित वायुके पहुँचनेपर विष्टम्भ, अरुचि, कृशता और भ्रमके रोगोंकी उत्पत्ति होती है। मांस और मेदामें प्रकुपित हुआ वायु शरीरमें ग्रन्थि, कर्कशता, भारीपन, लाठी एवं मुष्टि-प्रहारसे होनेवाली पीड़ाके समान पीड़ा उत्पन्नकर रोगीको अत्यधिक कष्ट देता है। अस्थियोंमें प्रविष्ट हुए संक्षुब्ध वायुसे सक्थि तथा संधि-स्थानोंमें रहनेवाली अस्थियोंके अन्तर्गत तीव्र शूल उठनेसे रोगीको कष्ट होता है।

मज्जागत कुपित वायु रोगीकी अस्थियोंमें क्षरण एवं अनिद्रा उत्पन्न करता है, जिससे रोगीको पीड़ा होती है। शुक्रगत कुपित वायु वीर्य और गर्भका शीघ्र पतन करता है अथवा वह विकृत हो जाता है। शिरागत वायु सिरमें पीड़ा और रिक्तताका अनुभव कराता है। स्नायु-स्थित क्रुद्ध वायु रोगीके शरीरमें शोथ उत्पन्न कर देता है, जिसके कारण उसको अधिक कष्ट होता है।

शरीरके संधि-स्थानोंमें प्रवहमान प्रकुपित वायुके कारण रोगी जलसे परिपूर्ण दृति (गलगण्ड), स्पर्श तथा शुष्कताके उपद्रवसे ग्रस्त हो जाता है। शरीरके समस्त अङ्गोंमें कुपित वायुके प्रविष्ट हो जानेपर पीड़ा, टूटन और स्फुरणका दोष होता है। स्वप्नावस्थामें विकार होनेसे वायु-स्तम्भन, आक्षेपण, संधिभंग तथा कम्पनका दोष प्राणीके शरीरमें उत्पन्न कर

काण्ड ] वातव्याधि-निदान ३०१


देता है। जब क्रुद्ध वायु शरीरकी सम्पूर्ण धमनियोंमें बारम्बार प्रवाहित होने लगता है तो उस समय शरीरके अङ्ग विक्षिप्त हो उठते हैं। इस व्याधिको आक्षेपण नामसे कहा गया है।

जब नीचेसे ताड़ित वायु कुपित होकर ऊपर चढ़ता है और फिर ऊर्ध्वभागकी ओर प्रवाहित होने लगता है, तब वह रोगीके हृदयको पीड़ितकर सिर और मस्तककी अस्थिमें पीड़ा उत्पन्न कर देता है। वह चारों ओरसे शरीरपर प्रहार करता है, जिससे शरीर विक्षिप्त हो उठता है। वह हनु और मुखकी शक्तिको भी क्षीण करके रोगीको व्यथित करनेका प्रयास करता है। रोगी बड़े ही कष्टसे श्वास लेता और उसका परित्याग करता है। उसके दोनों नेत्र बंद होने लगते हैं। कण्ठसे कबूतरके समान ध्वनि होने लगती है और रोगी ज्ञानशून्य होने लगता है। चिकित्सा-क्षेत्रमें इसका नाम अपतन्त्रक रोग है। हृदयमें स्थित दोषपूर्ण वायुके द्वारा प्रेरित वह रोग जब रोगीकी वाम नासिकाके छिद्रमें जाकर आश्रय लेता है, तब उसके कारण रोगी बार-बार स्वस्थता और बार-बार अस्वस्थताका अनुभव करता है।

अभिघातजन्य वातव्याधि (अपतानक रोग) अत्यन्त दुश्चिकित्स्य है।

जब कुपित वायु ग्रीवा और पार्श्वमें स्थित मन्या नामवाली दोनों शिराओंको जकड़कर और सम्पूर्ण धमनियोंका आश्रय लेकर सम्पूर्ण शरीरमें फैल जाती है, जिससे गर्दन तथा कक्षकी संधियाँ टेढ़ी पड़ जाती हैं और शरीर भीतरकी ओर धनुषकी तरह झुक जाता है, रोगीके नेत्र स्तम्भित हो जाते हैं, वह जँभाई लेने लगता है, दाँतोंको चबाने लगता है, कफयुक्त वमन करता है, दोनों पसलियोंमें वेदना होती है, वाणी रुक जाती है तथा हनु, पृष्ठ और मस्तक जकड़ जाते हैं, तब इसको अन्तरायाम वातरोग कहते हैं।

बहिरायाम रोगमें शरीर बाहरकी ओर धनुषके सदृश झुक जाता है। वक्षःस्थल ऊँचा हो जाता है और सिर तथा कंधा पीछेकी ओर झुक जाता है। दाँतों तथा मुखका रंग बदल जाता है, पसीना अधिक आता है, शरीर शिथिल हो जाता है। इस वातव्याधिको बाह्यायाम या धनुस्तम्भ कहा जाता है।

रोगीके मल, मूत्र और रक्तमें प्रविष्ट हुआ वात-दोष सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त होकर शरीरमें अनेक प्रकारके दोष उत्पन्न करता है। इस रोगको व्रणायाम कहते हैं। जिस व्रणायाम रोगमें रोगीको अत्यन्त तृषा हो और उसका शरीर पीला पड़ गया हो, वह असाध्य होनेसे वर्जित है। सभी प्रकारके आक्षेपक रोगोंमें वायुका वेग शान्त हो जानेपर रोगी स्वस्थ हो जाता है।

जिह्वाको* अत्यधिक रगड़ने और उष्ण भोजन करनेसे हनु अर्थात् ठोड़ीमें स्थित वायु कुपित होकर हनुभागमें स्तम्भन-दोष उत्पन्न करके मुखको खोल देता है अथवा बंद कर देता है। इसीको वातव्याधिमें हनुस्तम्भ-व्याधि कहते हैं। इसके कारण रोगीको खाने-चबाने तथा बोलनेमें अधिक कठिनाई होती है।

कुपित वायु वाग्वाहिनी शिरामें स्थित होकर जिह्वाको स्तम्भित कर देता है। यह जिह्वास्तम्भ नामक वातव्याधिका भेद माना गया है। इसके दुष्प्रभावसे रोगीके मुखमें खाने-पीने तथा बोलने-चालनेकी सामर्थ्य नहीं रह जाती। सिरके द्वारा भार ढोने, अत्यन्त हँसने और बोलने, ऊबड़-खाबड़ स्थानपर सोने तथा कठोर पदार्थोंके चबानेसे वायु विकारयुक्त होकर शरीरमें बढ़ता है और ऊर्ध्वभागमें पहुँचकर आश्रित हो जाता है। इससे रोगीका मुख


* सु०शा०अ० ९।

३०२ संक्षिप्त गरुड़पुराण [ आचार-

टेढ़ा हो जाता है। वह ऊँचे स्वरमें अट्टहास करता है तथा किसी ओर अपने नेत्रोंको एकटक लगाकर ध्यानमग्न होकर देखता है। उसके बाद उसी दोषसे रोगीकी वाक्शक्ति शिथिल पड़ जाती है, नेत्रोंमें स्तब्धता छा जाती है, दाँत किटकिटाते हैं, स्वरभंग हो जाता है, बहरापन तथा अन्धत्वका दोष आ जाता है। इन दोषोंके अतिरिक्त गन्धकी अज्ञानता, स्मृतिध्वंस, भय, श्वास, थूक, पार्श्वभेद, एक नेत्रकी शक्तिका ह्रास, दाढ़के ऊर्ध्वभागमें, शरीरके आधे भागमें या नीचेके भागमें प्रबल वेदना होती है। कुछ लोग इसे अर्दित और कुछ एकाङ्गदोष कहते हैं।

जब प्रकुपित वायु रक्तका आश्रय लेकर मूर्धमें स्थित शिराओंको रूक्ष, शूलयुक्त और कृष्णवर्णका कर देता है, तब उसे शिरोग्रह दोष कहते हैं और यह असाध्य है।

जब प्रकुपित वायु शरीरको अपने अधिकारमें करके उसमें निहित शिराओं तथा स्नायु-तन्त्रिकाओंको अपने अधिकारमें कर लेता है और उनमें अवरोध उत्पन्न करके वह रोगीके शरीरके एक पक्ष अथवा अन्य किसी विशेष भागपर प्रहार करता है, जिससे वह भाग चेतना-शून्य अथवा अकर्मण्य हो जाता है, तब उस दोषको लोग पक्षाघात कहते हैं। कुछ लोगोंने तो उसको एकाङ्ग या अर्धाङ्ग रोग और कुछ अन्य लोगोंने कक्षव्याधिके नामसे स्वीकार किया है। परंतु सम्पूर्ण शरीरमें प्रकुपित वायुका आश्रय होनेपर सर्वाङ्गरोध (सर्वाङ्ग-पक्षाघात) और जकड़न नामक रोग होता है।

जो पक्षाघातरोग केवल वातके कारण होता है, वह अत्यन्त कष्ट-साध्य है। जब वह वातरोग पित्तादि अन्य दोषोंके संयोगसे होता है, तब कष्ट- साध्य तथा जो वातरोग धातुओंके क्षय हो जानेसे होता है, वह असाध्य होनेसे वर्ज्य है।

कफसे युक्त वात जब आमाशयमें अवरुद्ध हो जाता है, तब उस समय रोगीके शरीरको वह जकड़ देता है। उसके कारण रोगीका शरीर डंडेके समान सीधा हो जाता है। इसीलिये इसको दण्डापतानक कहा जाता है। यह सम्पूर्ण दोषोंसे समन्वित होनेपर निश्चित ही असाध्य बन जाता है।

स्कन्ध-प्रदेशके मूलभागसे उठा हुआ प्रकुपित वायु उसकी शिराओंको संकुचित करके बाहुओंकी स्पन्दन-शक्तिको नष्ट कर देता है, उसे अवबाहुक रोग कहते हैं। भुजाओंके पृष्ठभागसे होकर प्रत्येक अँगुलीके तलप्रदेशतक जो एक मोटी नाड़ी जाती है, उसका नाम कण्डरा है। उसमें कुपित हुआ वात उसके कर्म-सामर्थ्यको समाप्त कर देता है, उसको विषूची कहा जाता है। रोगीके कटिप्रदेशमें रहनेवाला वायु जब जंघाप्रदेशतक जाता है, तो अपनी उस मोटी कण्डरा नाड़ीको आक्षिप्त कर देता है अर्थात् उसे जकड़ लेता है, इससे रोगी खञ्ज (लँगड़ा) हो जाता है। जब दोनों जंघाओंकी नसोंको जकड़कर दोनों पैरोंकी कण्डराएँ आक्षिप्त हो उठती हैं, तब उस रोगको पङ्गु कहा जाता है। जब रोगी चलनेमें काँपने लगता है और खञ्जन पक्षीकी भाँति लँगड़ाते हुए चलता है, उसके संधि-बन्धन शिथिल पड़ जाते हैं तो उस दोषको कलायखञ्ज नामक रोग मानना चाहिये।

जीर्ण या अजीर्ण-अवस्थामें शीतल, उष्ण, द्रव-पदार्थ, शुष्क, गुरु, स्निग्ध भोज्य-पदार्थका सेवन, अधिक परिश्रम, संक्षोभ, शैथिल्य तथा अधिक जागरण करनेसे वात-कफयुक्त मेद अत्यधिक मात्रामें संचित होकर पित्तका पराभव करके शरीरको परिव्याप्त कर लेता है।

अन्तःश्लेष्मके द्वारा जंघाप्रदेशकी हड्डियोंके दोष-समन्वित होनेपर स्तम्भन-रोग उन्हें ग्रसित करता है। उस समय शीत-वात-दोषके प्रभावसे