गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२०१- भगवद्भक्तिनिरूपण तथा भक्तोंकी महिमा
काण्ड ] भगवान् विष्णुकी महिमा, चतुष्पाद-धर्मनिरूपण ४०७
जो मनुष्य अवरोध उत्पन्न करनेके लिये पशुके दो पैरोंमें बन्धन लगानेका पाप करता है और उस पशुकी मृत्यु जलाशयके समीप, वनमें अथवा घरमें जलनेसे या कण्ठमें रस्सी बाँधने, घण्टी, घुँघरू आदि आभूषणोंके पहनानेसे हो जाती है तो उस मनुष्यको कृच्छ्रपादव्रत करना चाहिये।
गायके शरीरकी हड्डी तोड़नेपर, सींग तोड़नेपर, चमड़ा भेदन करनेपर तथा पूँछ काटनेपर लगे हुए पापका प्रायश्चित्त आधे मासतक 'यावक पान' करनेसे होता है। हाथी, घोड़े और शस्त्र आदिसे गौकी ऐसी क्षति होनेपर कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। यदि अनजानमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य मल, मूत्र, मदिरासे संस्पृष्ट पदार्थका भोजन कर लें तो उन्हें पुनः 'द्विजातीय संस्कार' करना चाहिये। पुनः द्विजातीय संस्कारके समय केशमुण्डन, मेखलाधारण, दण्डग्रहण और भिक्षाचरणादिकी आवश्यकता नहीं है।
अन्त्यजके पात्रमें रखा हुआ कच्चा मांस, घृत, मधु तथा यथासमय उत्पन्न स्निग्ध पदार्थ तैल आदि उसके पात्रसे निकाले जानेके बाद शुद्ध हो जाते हैं।
क्रमशः प्रथम दिन एकभक्तव्रत<sup>१</sup>, दूसरे दिन नक्तव्रत<sup>२</sup>, तीसरे दिन अयाचितव्रत<sup>३</sup> करते हुए जो उपवास किया जाता है, वह पादकृच्छ्रव्रत है। कृच्छ्रार्धका द्विगुण प्राजापत्यव्रत कहा जाता है। यह सभी पापोंका विनाशक है। सात उपवास करनेसे कृच्छ्रव्रत पूर्ण होता है। इसीको महासान्तपनव्रतके नामसे स्वीकार किया गया है। तीन दिन गरम जलमात्र, उसके बाद तीन दिन गरम दूधमात्र और उसके बाद तीन दिन गरम घृतमात्र पान करते हुए जो व्रत किया जाता है, वह तप्तकृच्छ्रव्रत है। यह समस्त पापोंको विनष्ट करनेवाला है। बारह दिनोंतक जलमात्र ग्रहण कर उपवास करनेसे एक पराकव्रत सम्पन्न होता है। यह व्रत सभी पापोंका विनाशक है। जिस व्रतमें शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिको एक ग्रासमात्र भोजन करके क्रमशः पूर्णिमापर्यन्त प्रत्येक तिथिको एक-एक ग्रास भोजनकी वृद्धि की जाती है और उसके बाद कृष्णपक्षकी प्रतिपदा तिथिसे प्रतिदिन अमावास्या तिथितक एक-एक ग्रास भोजनकी मात्रा कम की जाती है, उसे चान्द्रायणव्रत कहते हैं।
सोनेके समान वर्णवाली गायका दूध, श्वेतवर्णवाली गायका गोबर, ताम्रवर्णवाली गायका मूत्र, नीलवर्णवाली गायका घृत तथा कृष्णवर्णवाली गायका दही प्रशस्त है। इन चारोंके साथ कुशोदक मिलाकर जो पदार्थ तैयार किया जाता है, उसको पञ्चगव्य कहते हैं। इस मिश्रणमें गोमूत्रकी मात्रा आठ माशा, गोबरकी मात्रा चार माशा, दूधकी मात्रा बारह माशा, दहीकी मात्रा दस माशा और घृतकी मात्रा पाँच माशा कही गयी है। इस विधिसे तैयार किया गया पञ्चगव्य सभी मलोंका विनाशक होता है।
(अध्याय २२२)
भगवान् विष्णुकी महिमा, चतुष्पाद-धर्मनिरूपण, पुराणों तथा उपपुराणों और अठारह विद्याओंका परिगणन, चारों युगोंके धर्मोंका कथन एवं कलियुगमें नामसंकीर्तनका माहात्म्य
**श्रीब्रह्माजीने कहा—**हे व्यास! मुनियोंद्वारा भक्तिपूर्वक आचरण किये गये उन धर्मोंको मैंने कहा, जिनसे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। सूर्यादि देवोंकी पूजा, पितृतर्पण, होम तथा संध्यावन्दनसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इस पुरुषार्थचतुष्टयकी सिद्धि प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णु स्वयं भक्तोंको
<sup>१</sup> १-एक समय मात्र हविष्यान्न-ग्रहण। <sup>२</sup> २-रात्रिमें उपवास। <sup>३</sup> ३-बिना याचनाके जो प्राप्त हो उसीका ग्रहण।
| ४०८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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प्राप्त हो जाते हैं। भगवान् विष्णु धर्मस्वरूप ही हैं। पूजा, तर्पण, हवन, संध्या, ध्यान, धारणा आदि जो भी सत्कर्म हैं, वे सब हरि ही हैं।
सूतजीने कहा—हे शौनक ! मैं चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन करता हूँ, आप सुनें।
चार हजार युगोंका एक कल्प होता है, इसको ब्रह्माका एक दिन माना गया है। कृतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलि—ये चार युग होते हैं। कृतयुगमें सत्य, दान, तप तथा दया—इन चार पादोंसे धर्म अवस्थित रहता है। धर्मका संरक्षण करनेवाले हरि ही हैं। इस रहस्यको जानकर जो लोग संतुष्ट रहते हैं, वे ही ज्ञानी हैं। सत्ययुग (कृतयुग)-में मनुष्य चार हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। सत्ययुगके अन्तमें धर्मपालनकी दृष्टिसे क्षत्रिय उत्कर्षकी स्थितिमें रहते हैं। शूद्रोंकी अपेक्षा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य धर्मपालनमें उच्च आदर्श प्रस्तुत करते हैं। सर्वाधिक बलशाली एवं शूर भगवान् विष्णु ही राक्षसोंका विनाश करते हैं।
त्रेतायुगमें धर्म सत्य, दान और दया—इन तीन पादोंपर ही अवस्थित रह जाता है। इस कालके मनुष्य यज्ञपरायण होते हैं। सम्पूर्ण संसार क्षत्रियोंसे सुरक्षित रहता है। रक्तवर्णके भगवान् हरि मनुष्योंद्वारा इस युगमें पूजित होते हैं। मनुष्योंकी आयु एक हजार वर्षकी होती है। इस युगमें विष्णु भीमरथ कहलाते हैं और क्षत्रियोंके द्वारा राक्षसोंका संहार होता है।
द्वापरमें धर्मकी मूर्ति दो पादोंपर अवस्थित रहती है। इस युगमें अच्युत भगवान् विष्णु पीतवर्ण धारण करते हैं। लोगोंकी आयु चार सौ वर्षकी होती है। ब्राह्मण और क्षत्रिय-वर्णसे उत्पन्न प्रजासे पृथिवी व्याप्त रहती है। इस युगके लोगोंकी अल्प बुद्धिको देखकर वेदव्यासका रूप धारण कर भगवान् विष्णुने एक ही रूपमें विद्यमान वेदको चार भागोंमें विभक्त किया और अपने समस्त शिष्योंको उन चारों वेदोंका अध्ययन कराया। भगवान् वेदव्यासने ऋग्वेदकी शिक्षा 'पैल' नामक शिष्यको, सामवेदकी शिक्षा 'जैमिनि' नामक शिष्यको, अथर्ववेदकी शिक्षा 'सुमन्तु' नामक शिष्यको और यजुर्वेदकी शिक्षा 'महामुनि वैशम्पायन' नामक शिष्यको प्रदान की तथा वेदाङ्गों और पुराणोंका अध्ययन सूतजीको कराया। इन पुराणोंके एकमात्र वेद्य हरि ही हैं। ये अठारह पुराणोंके रूपमें विभक्त हैं।
सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—ये पुराणके पाँच लक्षण हैं। ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव, भागवत, भविष्यत्, नारदीय, स्कन्द, लिङ्ग, वराह, मार्कण्डेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त, कूर्म, मत्स्य, गरुड, वायु तथा ब्रह्माण्ड नामक अठारह पुराण प्रसिद्ध हैं। मुनियोंने अनेक उपपुराणोंकी भी बात बतायी है। उनमें सबसे पहला उपपुराण सनत्कुमारके द्वारा कथित है। भगवान् नरसिंहके द्वारा उपदिष्ट एक दूसरा उपपुराण है, जो नरसिंहपुराणके नामसे प्रसिद्ध है। तीसरा उपपुराण स्कन्द है, इसको भगवान् शिवके पुत्र कुमार कार्तिकेयजीने कहा है। चौथा उपपुराण शिवधर्म (शिवधर्मोत्तर) नामक है, जिसे भगवान् नन्दीश्वरने कहा है। महर्षि दुर्वासाद्वारा प्रोक्त आश्चर्य (अद्भुत) पुराण तथा देवर्षि नारदजीद्वारा कथित नारद उपपुराण है। इसी प्रकार कपिल, वामन तथा उशनस् उपपुराण महर्षि कपिल, वामन तथा उशनस्द्वारा उपदिष्ट हैं। इसी प्रकार ब्रह्माण्ड, वारुण, कालिका, माहेश्वर, साम्ब, पराशर, मारीच तथा भार्गव नामक उपपुराण भी हैं। पुराण, धर्मशास्त्र, चारों वेद, शिक्षा, कल्पादि, छः वेदाङ्ग, न्याय, मीमांसा, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, गन्धर्वशास्त्र तथा धनुर्वेदशास्त्र—ये अठारह विद्याएँ हैं—
पुराणं धर्मशास्त्रं च वेदास्त्वंगानि यन्मुने।
न्यायः शौनक मीमांसा आयुर्वेदार्थशास्त्रकम्॥
(२२३।२१)
काण्ड ] भगवान् विष्णुकी महिमा, चतुष्पाद-धर्मनिरूपण ४०९
द्वापरयुगके अन्तमें भगवान् श्रीहरि पृथ्वीके भारका हरण करते हैं।
कलियुगमें धर्म एक पादपर अवस्थित रह जाता है। भगवान् अच्युत कृष्णवर्णके होते हैं। उस कालमें लोग दुराचारी और निर्दय होने लगते हैं। मनुष्योंमें सत्त्व, रज तथा तम—ये तीनों गुण दिखायी देते हैं। कालकी प्रेरणासे ये सभी गुण मनमें उत्पन्न होते हैं और परिवर्तित होते रहते हैं।
हे शौनक! जब प्रवृद्ध सत्त्वगुणसे मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ व्याप्त हो जाती हैं और लोगोंकी अनुरक्ति ज्ञानार्जन तथा तपश्चरणमें बढ़ जाती है तब सत्ययुग जानना चाहिये। जब मनुष्योंकी आसक्ति काम्यकर्म और यशमें होती है, उस समय रजोगुणकी प्रवृत्तिसे त्रेतायुग जानना चाहिये और तमोगुणकी प्रबलताके साथ रजोगुणकी वृद्धिके कारण जब लोगोंमें लोभ, असंतोष, मान, दम्भ और मत्सरके भाव प्रबल होते हैं और काम्य कर्मोंमें आसक्ति बढ़ जाती है तब द्वापरयुग समझना चाहिये। जब सदा असत्य बोलने, आलस्य, नींद और हिंसा आदि साधनोंमें ही प्रवृत्ति हो जाती है, शोक, मोह, भय और दीनताका भाव जब बढ़ जाता है, तब तमोगुणको सर्वाधिक प्रबल मानना चाहिये। यही काल कलियुग है*।
इसी प्रकार जब लोग कामी हो जाते हैं, सदैव कटुवाणी बोलते हैं, जनपद चोर, डाकुओंसे भर जाते हैं, वेद पाखण्डियोंसे दूषित हो जाते हैं, राजा प्रजाओंका सर्वस्व हरण करते हैं, लोग मैथुन और पेट पालनके कर्मसे स्वतः पराजित होने लगते हैं, ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्यव्रतका परित्याग करके अशुचि हो जाते हैं, कुटुम्बी अर्थात् गृहस्थ भिक्षाटन करने लगते हैं, तपस्वी गाँवोंमें रहना प्रारम्भ कर देते हैं, संन्यासी अर्थलोभमें फँस जाते हैं, लोग लघु शरीर होनेपर भी अत्यधिक भोजन करते हैं और जो चोर हैं, उन्हें साधुके रूपमें लोग स्वीकार करने लगते हैं, तब कलियुग ही मानना चाहिये।
इस कलिकालमें भृत्यगण अपने स्वामीका तिरस्कार करते हैं, तपस्वी अपने व्रतोंका परित्याग कर देते हैं, शूद्र प्रतिग्रह लेने लगते हैं, वैश्य ब्राह्मणोंकी सेवाकी उपेक्षा कर स्वयं व्रत-परायण हो जाते हैं, धार्मिक भाव कम होनेसे सभी लोग बेचैन रहते हैं, संतानें धार्मिक शिक्षाका अभाव होनेसे पिशाचके समान बन जाती हैं, अन्यायसे अर्जित भोजनके द्वारा अग्निदेवको आहुति, देवताओंको नैवेद्य तथा द्वारपर आये हुए अतिथि देवकी पूजा होती है, तब कलियुग समझना चाहिये।
हे शौनक! कलियुगके आ जानेपर लोग अपने पितरोंको जलतक नहीं देंगे। सभी प्राणी स्त्रीके वशमें हो जायँगे। सबके कर्म शूद्रवत् होंगे। इस कलिकालमें स्त्रियाँ अत्यधिक संतानोत्पत्ति करनेवाली और दुर्बल भाग्यवाली होंगी तथा बड़ोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन उनका स्वभाव होगा। ऐसा स्वभाव हो जानेपर यदि उनकी निन्दा की जायगी तो वे उसके प्रति गम्भीर न होकर उपेक्षाभाव अपनायेंगी। वे इस उपेक्षाभावको अपना सिर खुजलाकर व्यक्त करेंगी।
कलियुगके मनुष्य भगवान् विष्णुकी पूजा नहीं करेंगे। उन सभीका विश्वास पाखण्डमें बढ़ जायगा। हे ब्राह्मणो! यह कलिकाल दोषोंसे भरा हुआ है, किंतु इस दोषपूर्ण युगमें एक महान् गुण भी है। वह
* प्रभूतञ्च यदा सत्त्वं मनो बुद्धीन्द्रियाणि च। तदा कृतयुगं विद्याज्ज्ञाने तपसि यद्रतिः॥
यदा कर्मसु काम्येषु शक्तिर्यशसि देहिनाम्। तदा त्रेता रजोभूतिरिति जानीहि शौनक ॥
यदा लोभस्त्वसन्तोषो मानो दम्भश्च मत्सरः। कर्मणां चापि काम्यानां द्वापरं तद्रजस्तमः ॥
यदा सदानृतं तन्द्रा निद्रा हिंसादिसाधनम्। शोकमोहौ भयं दैन्यं स कलिस्तमसि स्मृतः ॥
४१० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
गुण है भगवान् श्रीकृष्णका संकीर्तन। उनका संकीर्तन करनेसे ही मनुष्य संसारके महाबन्धन अर्थात् आवागमनके जालसे मुक्त हो जाता है। हे शौनक! कृतयुगमें प्राणीको जो फल भगवान् विष्णुका ध्यान करनेसे प्राप्त होता है, त्रेतायुगमें जो फल उनका जप करनेसे प्राप्त होता है और द्वापरयुगमें जो फल उन विष्णुदेवकी सेवा करनेसे प्राप्त होता है, वही फल कलिकालमें भगवान्के गुण, लीला और नाम-संकीर्तनसे ही प्राप्त हो जाता है। इसलिये नित्य ही भगवान् श्रीहरिका ध्यान, पूजन और संकीर्तन करना चाहिये—
कलेर्दोषनिधेर्विप्रा अस्ति ह्येको महागुणः ॥
कीर्तनादेव कृष्णस्य महाबन्धं परित्यजेत्।
कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां जपत: फलम्॥
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्।
तस्माद्ध्येयो हरिर्नित्यं गेयः पूज्यश्च शौनक ॥
(२२३ । ३५-३७)
(अध्याय २२३)
नैमित्तिक तथा प्राकृतिक प्रलय और भगवान् विष्णुसे पुनः सृष्टिका प्रादुर्भाव
सूतजीने कहा—चार हजार युगोंके बीतनेपर ब्रह्माका नैमित्तिक प्रलयकाल आता है। कल्पके अन्तमें सौ वर्षतक अनावृष्टि होती है। आकाशमण्डलमें प्रचण्ड रूपसे संतप्त करनेवाले भयंकर सात सूर्य उदित हो जाते हैं। वे अपनी प्रखर रश्मियोंसे सम्पूर्ण जलराशिका पानकर तीनों लोकोंको सुखा देते हैं।
भगवान् विष्णु रुद्रस्वरूप धारण करके भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक तथा पाताललोककी समस्त चराचर सृष्टिको जला देते हैं। भगवान् विष्णु तीनों लोकोंको जलानेके बाद संवर्तक नामके मेघोंकी सृष्टि करते हैं। नाना प्रकारके महामेघ सौ वर्षोंतक बरसते हैं। विष्णुरूपमें स्थित वायु अत्यन्त तेजगतिसे सौ वर्षोंतक चलती है। उस जलवृष्टिसे समुद्रके समान उत्ताल तरंगोंवाले संसारके इस प्रलयकालमें स्थावर-जंगमके नष्ट होनेपर ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णु अनन्तशय्यापर शयन करते हैं। एक हजार वर्षतक सोनेके पश्चात् जब वे जागते हैं तो पुनः उन्हींके द्वारा इस जगत्की सृष्टि होती है।
हे शौनक! इसके बाद मैं प्राकृतिक प्रलयका वर्णन करता हूँ, उसको आप सुनें। ब्रह्माके एक सौ वर्ष बीत जानेपर भगवान् हरि अपने योगबलसे समस्त सृष्टिको अपनेमें लीन करके ब्रह्माको धारण कर लेते हैं। इस कालमें जो प्राणी ब्रह्मलोकमें स्थित रहते हैं, वे भी भगवान् विष्णुमें लीन हो जाते हैं।
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! उस कालमें अनावृष्टि करनेवाले सूर्योंसे सम्पन्न मेघ थे। मेघोंके लगातार सौ वर्षतक बरसते रहनेसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जलसे भर उठता है। अंदर प्रविष्ट हुई उस जलराशिसे ब्रह्माण्ड फट जाता है। ब्रह्माकी आयु पूर्ण होते ही सब कुछ जलमें ही लय हो जाता है। संसारमें कुछ भी शेष नहीं रहता। संसारको आधार प्रदान करनेवाली यह पृथ्वी भी उस जलराशिमें डूब जाती है। उस समय जल तेजमें, तेज वायुमें, वायु आकाशमें और आकाश भूतादि महत्तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाता है और वह महत्तत्त्व प्रकृतिमें तथा प्रकृति अव्यक्त परमपुरुषमें लीन हो जाती है। वे हरि (अव्यक्त पुरुष) सौ वर्षतक सोते हैं। तदनन्तर (ब्रह्माका) दिन आनेपर अव्यक्तादि क्रमसे पुनः व्यक्तिभूत चराचर जगत्की सृष्टि करते हैं। (अध्याय २२४)
२०२- नामसंकीर्तनकी महिमा
काण्ड ] कर्मविपाकका कथन ४११
कर्मविपाकका कथन
सूतजीने कहा—जगत्सृष्टि और प्रलय आदिकी चक्रगतिको जाननेवाले जो विद्वान् हैं, वे यदि आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक—इन तीन सांसारिक तापोंको जानकर ज्ञान और वैराग्यका मार्ग स्वीकार कर लेते हैं तो आत्यन्तिक लय (मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं। अब मैं उस संसारचक्रका वर्णन करूँगा, जिसको जाने बिना पुरुषार्थी परमात्मामें लीन नहीं होते।
प्राणके उत्क्रमण कालमें इस शरीरका परित्याग करके मनुष्य दूसरे सूक्ष्म शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है। इस मृत्युलोकसे मृत्युके पश्चात् जीवको यमराजके दूत बारह दिनकी अवधिमें यमलोकको ले जाते हैं। वहाँपर उस मरे हुए व्यक्तिके बन्धु-बान्धव जो उसके लिये तिलोदक और पिण्डदान देते हैं, वही सब यमलोकके मार्गमें वह खाता-पीता है। पापकर्म करनेके कारण वह नरकलोकमें जाता है और पुण्यकर्म करनेके कारण स्वर्ग। अपने उन पाप-पुण्योंके प्रभावसे नरक तथा स्वर्गमें गया हुआ प्राणी पुनः नरक और स्वर्गसे लौटकर स्त्रियोंके गर्भमें आता है। वहाँ विनष्ट न होकर वह दो बीजोंके आकारको धारण कर लेता है। उसके बाद वह कलल फिर बुद्बुदाकार बन जाता है। तत्पश्चात् उस बुद्बुदाकार रक्तसे मांसपेशीका निर्माण होता है। मांसपेशीसे मांस अण्डाकार बन जाता है। वह एक पल (परिमाण-विशेष)-के समान होता है। उसी अण्डेसे अंकुर बनता है। उस अंकुरसे अंगुली, नेत्र, नाक, मुख और कान आदि अङ्ग-उपाङ्ग पैदा होते हैं। उसके बाद उस विकसित अंकुरमें उत्पादक-शक्तिका सञ्चार होने लगता है। जिससे हाथ-पैरकी अंगुलियोंमें नख आदि निकल आते हैं। शरीरमें त्वचा और रोम तथा बाल निकलने लगते हैं। इस प्रकार गर्भमें विकसित होता हुआ यह जीव नौ मासतक अधोमुख स्थित रहकर दसवें मासमें जन्म लेता है। तदनन्तर संसारको अत्यन्त मोहित करनेवाली भगवान् विष्णुकी वैष्णवी माया उसे आवृत कर लेती है। यह जीव बाल्यावस्था, कौमारावस्था, युवावस्था तथा वृद्धावस्थाको प्राप्त करता है। इसके बाद यह पुनः मृत्युको प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार यह जीव इस संसारचक्रमें घटीयन्त्रके समान घूमता रहता है।
जीव नरकभोग करनेके पश्चात् पापयोनिमें जन्म लेता है। पतितसे प्रतिग्रह स्वीकार करनेके कारण विद्वान् भी अधोयोनिमें जन्म ग्रहण करता है। याचक नरकभोग करनेके बाद कृमियोनिको प्राप्त होता है। गुरुकी पत्नी अथवा गुरुके धनकी मनसे भी कामना करनेवाला व्यक्ति कुत्ता होता है। मित्रका अपमान करनेवाला गधेकी योनिमें जन्म लेता है। माता-पिताको कष्ट पहुँचानेवाले प्राणीको कछुएकी योनिमें जाना पड़ता है। जो मनुष्य अपने स्वामीका विश्वसनीय बन कर उसको छलकर जीवनयापन करता है; वह मृत्युके बाद व्यामोहमें फँसे हुए वानरकी योनिमें जाता है।
धरोहररूपमें अपने पास रखे हुए पराये धनका अपहरण करनेवाला व्यक्ति नरकगामी होता है। नरकसे निकलनेके पश्चात् वह कृमियोनिमें जन्म लेता है। नरकसे मुक्त होनेपर उस ईर्ष्यालु मनुष्यको राक्षसयोनिमें जाना पड़ता है। जो मनुष्य विश्वासघाती होता है, वह मत्स्ययोनिमें उत्पन्न होता है। यव और धान्यादि अनाजोंकी चोरी करनेवाले व्यक्ति मरनेके पश्चात् चूहेकी योनिमें जन्म लेते हैं। दूसरेकी स्त्रीका अपहरण करनेवाला मनुष्य खूँखार भेड़ियेकी योनिमें जाता है। जो मनुष्य अपने
२०३- विष्णुपूजामें श्रद्धा-भक्तिकी महिमा
| ४१२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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भाईकी स्त्रीके साथ सहवास करता है, वह कोकिलयोनिमें जन्म लेता है। गुरु आदिकी स्त्रियोंके साथ सहवास करनेपर मनुष्य सूअर-योनिको प्राप्त होता है।
यज्ञ, दान तथा विवाह आदिमें विघ्न डालनेवाले मनुष्यको कृमियोनि प्राप्त होती है। देवता, पितर और ब्राह्मणोंको बिना भोजन आदि दिये जो मनुष्य अन्न ग्रहण कर लेता है, वह नरकको जाता है। वहाँसे मुक्त होकर वह पापी काकयोनिको प्राप्त करता है। बड़े भाईका अपमान करनेसे मनुष्यको क्रौञ्च (पक्षिविशेष)-योनिकी प्राप्ति होती है। यदि शूद्र ब्राह्मण-स्त्रीके साथ रमण करता है तो वह कृमियोनिमें जन्म लेता है। उस ब्राह्मणीसे यदि वह संतानोत्पत्ति करता है तो वह लकड़ीमें लगनेवाले घुन नामक कृमिकी योनिको प्राप्त होता है। कृतघ्न व्यक्ति कृमि, कीट, पतङ्ग तथा बिच्छूकी योनियोंमें भ्रमण करता है। जो मनुष्य शस्त्रहीन पुरुषको मारता है, वह दूसरे जन्ममें गधा होता है। स्त्री और बच्चेका वध करनेवालेको कृमियोनि प्राप्त होती है। भोजनकी चोरी करनेवाला मक्खीकी योनिमें जाता है। अन्नकी चोरी करनेवाला बिल्लीकी योनि तथा तिलकी चोरी करनेवाला चूहेकी योनिमें जन्म लेता है। घीकी चोरी करनेवाला मनुष्य नेवला और मद्गुर (मत्स्यविशेष)-के मांसकी चोरी करनेवाला काकयोनिमें जाता है। मधुकी चोरी करनेपर मनुष्य दंशयोनि* तथा अपूप (पुआ)-की चोरी करनेपर चींटीकी योनिमें जन्म लेता है। जलका अपहरण करनेपर पापी व्यक्ति काकयोनिमें उत्पन्न होता है। लकड़ीकी चोरी करनेपर मनुष्य हारीत (हारिल नामक पक्षी) अथवा कबूतरकी योनिमें जन्म लेता है। जो प्राणी स्वर्ण-पात्रकी चोरी करता है, उसको कृमियोनिमें जन्म लेना पड़ता है। कपाससे बने वस्त्रोंकी चोरी करनेपर क्रौञ्च पक्षी, अग्निकी चोरी करनेपर बगुला, अंगराग आदि रंजकद्रव्य (शरीर-संस्कारकद्रव्य) और शाक-पातकी चोरी करनेपर मनुष्य मयूर होता है। लाल रंगकी वस्तुकी चोरी करनेसे मनुष्य जीवक (पक्षिविशेष), अच्छी गन्धवाली वस्तुओंकी चोरी करनेसे छुछुन्दर तथा खरगोशकी चोरी करनेसे वह खरगोशयोनिको प्राप्त होता है। कलाकी चोरी करनेपर मनुष्य नपुंसक, लकड़ीकी चोरी करनेपर घास-फूसमें रहनेवाला कीट, फूलकी चोरी करनेपर दरिद्र तथा यावक (जौका सत्तू, धान, लाख आदि) चुरानेपर पंगु होता है।
शाक-पातकी चोरी करनेपर हारीत और जलकी चोरी करनेपर चातक पक्षी होता है। जो मनुष्य किसीके घरका अपहरण करता है, वह मृत्युके पश्चात् महाभयानक रौरव आदि नरकलोकोंमें जाकर कष्ट भोगता है। तृण, गुल्म, लता, वल्लरी और वृक्षोंकी छाल चुरानेवाला व्यक्ति वृक्ष-योनिको प्राप्त होता है। यही स्थिति गौ, सुवर्ण आदिकी चोरी करनेवाले मनुष्योंकी भी है। विद्याकी चोरी करनेवाला मनुष्य विभिन्न प्रकारके नरकलोकोंका भोग करनेके पश्चात् गूँगेकी योनिमें जन्म लेता है। समिधारहित अग्निमें आहुति देनेवाला मन्दाग्नि-रोगसे ग्रस्त होता है।
दूसरेकी निन्दा करना, कृतघ्नता, दूसरेकी मर्यादाको नष्ट करना, निष्ठुरता, अत्यन्त घृणित व्यवहारमें अभिरुचि, परस्त्रीके साथ सहवास करना, पराये धनका अपहरण करना, अपवित्र रहना, देवोंकी निन्दा तथा मर्यादाके बन्धनको तोड़कर अशिष्ट व्यवहार करना, कृपणता करना तथा मनुष्योंका हनन करना—नरकभोग करके जन्म लिये हुए मनुष्योंके ये लक्षण हैं—ऐसा सभीको जान लेना चाहिये।
* दंशक—वनमक्षिका (बड़े मच्छर)।
२०४- विष्णुभक्तिका माहात्म्य
काण्ड ] अष्टाङ्गयोग एवं एकाक्षर ब्रह्मका स्वरूप तथा प्रणवजपका माहात्म्य [ ४१३
प्राणियोंके प्रति दया, सद्भावपूर्ण वार्तालाप, परलोकके लिये सात्त्विक अनुष्ठान, सत्कार्योंका निष्पादन, सत्यधर्मका पालन, दूसरेका हितचिन्तन, मुक्तिकी साधना, वेदोंमें प्रामाण्यबुद्धि, गुरु, देवर्षि और सिद्धर्षियोंकी सेवा, साधुजनोंद्वारा बताये गये नियमोंका पालन, सत्क्रियाओंका अनुष्ठान तथा प्राणियोंके साथ मैत्रीभाव—ये स्वर्गसे आये हुए मनुष्योंके लक्षण हैं। जो मनुष्य योगशास्त्रद्वारा बताये यम, नियमादिक अष्टाङ्गयोगके साधनसे सद्-ज्ञानको प्राप्त करता है, वह आत्यन्तिक फल अर्थात् मोक्षका अधिकारी बन जाता है।
(अध्याय २२५)
अष्टाङ्गयोग एवं एकाक्षर ब्रह्मका स्वरूप तथा प्रणवजपका माहात्म्य
सूतजीने कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! अब मैं समस्त अङ्गोंसहित महायोगका वर्णन करूँगा। यह महायोग मनुष्योंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेका श्रेष्ठतम साधन है। भक्तिपूर्वक इस महायोगकी विधिका पाठ करनेमात्रसे मनुष्यके सभी पापोंका विनाश हो जाता है, इसे अब आप सुनें।
महामति भगवान् दत्तात्रेयने राजा अलर्कसे कहा था कि हे राजन्! ममता ही दुःखका मूल है और ममताका परित्याग ही दुःखसे निवृत्तिका उपाय है। अहंकार अज्ञानरूपी महातरुका अंकुर है। ममता उसका तना है। घर और क्षेत्र आदि उसकी शाखाएँ हैं। पत्नी उसका पल्लव है तथा धन-धान्य महान् पत्र हैं और पाप ही उसका अत्यन्त दुर्गम मूल है। इस प्रकार पापमूलक आपातरमणीय सुख-शान्तिके लिये यह अज्ञानरूपी महातरु पैदा हुआ है। जो लोग ज्ञानरूपी कुल्हाड़ीसे अज्ञानरूप महावृक्षको काट गिराते हैं, वे ही परमब्रह्ममें लीन हो जाते हैं। तदनन्तर ब्रह्मरसको प्राप्तकर उसका भलीभाँति निष्कण्टक पान करके प्राज्ञ पुरुष नित्य-सुख एवं परम शान्तिको प्राप्त करते हैं।
समस्त दृश्य-प्रपञ्च एवं इन्द्रियाँ भी उसी (परब्रह्म)-में लीन हो जाती हैं। हे राजन्! वहाँपर न तो 'तुम' रहते हो और न 'मैं' ही रहता हूँ, न शब्दादि तन्मात्राएँ रहती हैं और न अन्तःकरण ही रहता है। हे राजेन्द्र! हम दोनोंके बीच कौन-सा तत्त्व प्रधान है? वास्तवमें हम दोनों निःसार हैं।
हे राजन्! जीव और आत्मामें ऐक्य होनेपर भी पृथक्-भावका बोध होता है। यह पृथक्-भावका बोध ज्ञान (स्वरूपज्ञान)-के तिरोधानसे होता है। यद्यपि ज्ञानका तिरोधान योगी (ब्रह्माभिन्न जीव)-में नहीं होना चाहिये, पर भेदबुद्धि एवं भेदबुद्धिमूलक समस्त प्रपञ्च सबके अनुभवमें आ रहा है; अतः इसकी उपपत्ति के लिये यह मानना पड़ता है कि ज्ञानका तिरोधान अनादिकालसे चला आ रहा है। यह ज्ञानका तिरोधान अज्ञानमूलक है। इसीलिये अज्ञानको ज्ञाननाशकी दशा कहा जाता है। यह ज्ञाननाशकी दशा ज्ञानके वियोगकी दशा है और यह ज्ञानका वियोग ही जीवात्मा एवं आत्मा (ब्रह्म)-का पृथक्-भाव है तथा इस पृथक्-भावके ज्ञानका नाश जीव एवं आत्मा (ब्रह्म)-के ऐक्यज्ञानसे ही होता है। यह ऐक्यज्ञान (ऐक्यका प्रत्यक्षात्मक अनुभव) ही मुक्ति है। अनैक्यका अनुभव तो प्राकृतगुणों (मायिक विस्तार)-के कारण होता है।
प्राणीका जिसमें निवास होता है, वह घर है।
| ४१४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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जिसके द्वारा उसके जीवनकी रक्षा होती है, वह भोज्य पदार्थ है। जो मुक्तिका हेतु है, वह ज्ञान है और जो बन्धनका हेतु है, वह अज्ञान है। हे राजन्! प्राणियोंके पुण्य और पापका विनाश उसके द्वारा किये जानेवाले (सुख-दुःखात्मक) भोगोंसे होता है और अवश्यकरणीय जो कर्तव्य हैं, उनको न करनेसे पुण्यका क्षय हो जाता है।
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—ये पाँच यम हैं। शौच दो प्रकारका बताया गया है—बाह्यशौच और अन्तःशौच। संतोष, तपस्या, शान्ति, नारायणका पूजन और इन्द्रियदमन—ये योगके साधन हैं। आसनोंके पद्म आदि भेद हैं।
शरीरके अन्तर्गत प्रवाहित होनेवाली वायुपर विजय प्राप्त करना ‘प्राणायाम’ है। प्रत्येक प्राणायाम पूरक, कुम्भक और रेचकके भेदसे तीन प्रकारका होता है। यही तीन प्राणायाम जब दस मात्राओंका होता है तो इसे लघु प्राणायाम तथा इससे दुगुनी मात्राका मध्यम प्राणायाम और तीन गुनी मात्राओंका उत्तम प्राणायाम कहा गया है। जिस प्राणायाममें योगिजन जप और ध्यानसे युक्त होते हैं, उसे ‘सगर्भ’ प्राणायाम और उसके अतिरिक्त प्राणायाम (अर्थात् जप तथा ध्यानसे रहित होनेपर) ‘अगर्भ’ नामक प्राणायाम कहलाता है। प्रथम प्राणायामसे योगी स्वप्नपर जय प्राप्त करता है, द्वितीय प्राणायामसे योगी कम्पपर और तृतीय प्राणायामसे विपाकपर* जय प्राप्त करता है। इस प्रकार इन तीनों दोषोंको योगी प्राणायामसे जीत लेता है।
योगीको आसन लगाकर ‘प्रणव’ में चित्त एकाग्र करके ध्यान और जप करना चाहिये। इस स्थितिमें वह अपनी दोनों एड़ियोंसे लिंग और अण्डकोशोंको दबाकर एकाग्र मनसे स्थित रहे। जो योगमार्गसे भलीभाँति परिचित है, उसे अपनी रजोवृत्तिसे तमोवृत्तिको तथा सत्त्ववृत्तिसे रजोवृत्तिको निरुद्ध करके निश्चल-भावसे प्रणवका जप करते हुए ध्यान करना चाहिये। इन्द्रियों, प्राण और मन आदिको उनके विषयोंसे निगृहीत करना चाहिये। इस तरह एक साथ ही प्रत्याहार (विषयोंसे इन्द्रियोंको हटाकर अन्तर्मुख करना)—का उपक्रम करना चाहिये।
विधिवत् अठारह बार किया गया जो प्राणायाम है, उसे योगमें ‘धारणा’ के नामसे स्वीकार किया जाता है। योगके तत्त्वको जाननेवाले योगिजन ऐसी धारणाकी दो आवृत्तिको ही योग कहते हैं। योगियोंकी पहली धारणा नाड़ीमें, दूसरी हृदयमें, तीसरी वक्षःस्थलमें, चौथी उदरमें, पाँचवीं कण्ठमें, छठी मुखमें, सातवीं नासाग्रपर, आठवीं नेत्रमें, नवीं दोनों भौंहोंके मध्य और दसवीं मूर्धास्थानमें होती है। इस प्रकार योगमें इस धारणाको दस प्रकारका माना गया है। इन दसों धारणाओंमें सफलता प्राप्त करके योगी अक्षयरूपता (ब्रह्मत्व)—को प्राप्त कर लेता है।
जिस प्रकार अग्निमें छोड़ी गयी अग्नि एकाकार हो जाती है, उसी प्रकार परमात्माके ध्यानमें लगायी गयी आत्मा तदाकार हो जाती है। ऐसी स्थितिमें योगीको ब्रह्मस्वरूप महापुण्यदायक ‘ॐ’ इस महामन्त्रका जप करना चाहिये। इस प्रणव-महामन्त्रमें ‘अकार, उकार और मकार’—ये तीन अक्षर हैं। इन तीन अक्षरोंके अतिरिक्त इस महामन्त्रमें सत्त्व, रजस् तथा तमस्—इन तीन मात्राओंका योग भी है जो क्रमशः सात्त्विक तथा राजसिक और तामसिक मनोवृत्तिका परिचायक है। ॐकारमें जो चतुर्थ आद्य अर्धमात्रा स्थित है, वह निर्गुण है तथा केवल योगियोंद्वारा ही जानने योग्य है। गान्धारस्वर (ग)—के आश्रित रहनेवाली इस अर्धमात्राको गान्धारी
* विपाक — कर्मफल।
काण्ड ] भगवद्भक्तिनिरूपण तथा भक्तोंकी महिमा ४१५
नामसे जानना चाहिये। यह अक्षर परम ब्रह्म ॐकारके नामसे योगमार्गमें स्वीकृत है। अतः इस महामन्त्रका जप और ध्यान करते हुए अपनी मुक्तिके लिये इस प्रकार अपनेमें ब्रह्मभावनाका निश्चय करना चाहिये—
'मैं स्थूलदेहसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं जरा-मरणसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं इस पृथ्वीके सभी मलोंसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं वायु और आकाशसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं सूक्ष्मदेहसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं समस्त स्थान या अस्थानसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म* हूँ। मैं गन्धतन्मात्रासे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं श्रोत्रेन्द्रिय और त्वचा नामक इन्द्रियसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं जिह्वा तथा घ्राणेन्द्रियसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं प्राण तथा अपान वायुसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं व्यान और उदान वायुसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं अज्ञानसे रहित ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण और अहंकारसे रहित तुरीयावस्थामें विद्यमान परमपदस्वरूप, ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ। मैं नित्य-शुद्ध-बुद्ध, मुक्त, आनन्दमय, अद्वैत, ज्ञानस्वरूप, ज्योतिर्मय परमब्रह्म हूँ।'
सूतजीने कहा— हे शौनक! इस प्रकार मैंने मुक्ति देनेवाले अष्टाङ्गयोगका वर्णन कर दिया है। जो लोग मायापाशसे आबद्ध हैं, वे सभी नित्य-नैमित्तिक ही कार्य करते हैं और उसीमें अन्ततक लगे रहते हैं। इस कारण उन्हें परमात्माका ऐक्य प्राप्त नहीं होता, वे पुनः इस संसारमें जन्म लेते हैं। जो अज्ञानसे मोहित हैं, वे ज्ञानयोग प्राप्त करके अज्ञानसे मुक्त हो जाते हैं। उसके बाद वह जीवन्मुक्त योगी न कभी मरता है, न दुःखी होता है; न रोगी होता है और न संसारके किसी बन्धनसे आबद्ध होता है। न वह पापोंसे युक्त होता है, न तो उसे नरकयातनाका ही दुःख भोगना पड़ता है और न वह गर्भवासमें दुःखी ही होता है। वह स्वयं अव्यय नारायणस्वरूप हो जाता है। इस प्रकारकी अनन्य भक्तिसे वह योगी भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् नारायणको प्राप्त कर लेता है।
ध्यान, पूजा, जप, स्तोत्र, व्रत, यज्ञ और दानके नियमोंका पालन करनेसे मनुष्यके चित्तकी शुद्धि होती है। चित्तशुद्धिसे ज्ञान प्राप्त होता है। प्रणवादि मन्त्रोंका जप करके द्विजोंने मुक्ति प्राप्त की है। इन्द्रने भी इन्द्रासन प्राप्त किया। श्रेष्ठ गन्धर्वों और अप्सराओंने उच्च पद प्राप्त किया। देवताओंने देवत्व और मुनियोंने मुनित्व प्राप्त किया। गन्धर्वोंने गन्धर्वत्व तथा राजाओंने राजत्वको प्राप्त किया।
(अध्याय २२६)
भगवद्भक्तिनिरूपण तथा भक्तोंकी महिमा
सूतजीने कहा— अब मैं विष्णुभक्तिका वर्णन करूँगा, जिससे सब कुछ प्राप्त हो जाता है। भगवान् विष्णु भक्तिसे जितना संतुष्ट होते हैं, उतना अन्य किसी साधनसे नहीं। भगवान् हरिका निरन्तर स्मरण करना मनुष्योंके लिये महान् श्रेयका मूल है। यह पुण्योंकी उत्पत्तिका साधन है और जीवनका मधुर फल है—
यथा भक्त्या हरिस्तुष्येत् तथा नान्येन केनचित् ॥
महतः श्रेयसो मूलं प्रसवः पुण्यसंततेः।
जीवितस्य फलं स्वादु नियतं स्मरणं हरेः ॥
(२२७।१-२)
इसलिये विद्वानोंने विष्णुकी सेवाको भक्तिका
* १-परम व्यापक ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है, उसका कोई आश्रय नहीं है। इसलिये उसके स्थान या स्थानाभावकी कल्पना सर्वथा असम्भव है।
| ४१६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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बहुत बड़ा साधन कहा है। भगवान् त्रिलोकीनाथ विष्णुके नाम तथा कर्मादिके कीर्तनमें तन्मय होकर जो लोग प्रसन्नताके आँसू बहाते हैं और रोमाञ्चित होकर गद्गद हो उठते हैं, वे ही उनके भक्त हैं—
ते भक्ता लोकनाथस्य नामकर्मादिकीर्तने॥
मुञ्चन्त्यश्रूणि संहर्षाद्घो प्रहृष्टतनूरुहाः।
(२२७।३-४)
अतः हम सभीको जगत्स्रष्टा देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुके दिव्य उपदेशोंका अनुसरण करना चाहिये। वे ही वैष्णव हैं, जो वेद-शास्त्रोंके अनुसार अवश्यकरणीय नित्य-कर्मोंका पालन करते हुए श्रीविष्णुके प्रति अति स्निग्ध रहते हैं तथा भक्तिप्रवणताके कारण अद्वैतभावसे स्वयंको पृथक्कर जिन नामोंका स्मरण स्वयं भगवान् भी करते हैं, उन मङ्गलमय नामोंका श्रवण-कीर्तन करनेके साथ स्वामि-सेवकभावसे सदा भगवान् श्रीविष्णुको प्रणाम किया करते हैं। वे ही महाभागवत हैं, जो श्रीविष्णुके भक्तजनोंके प्रति वात्सल्यभाव रखते हैं तथा श्रीविष्णुके पूजन एवं उनकी आज्ञाका अनुसरण करते हैं। भगवान् श्रीविष्णुकी मङ्गलमयी कथाओंके श्रवणमें ही अतिशय प्रीतिपूर्वक सदा लीन रहते हैं तथा अपने नेत्र आदि समस्त अङ्गोंकी समस्त चेष्टाएँ भगवान्की सेवाके लिये ही समर्पित किये रहते हैं। संक्षेपमें यह समझना चाहिये कि जो लोग पूर्ण समर्पणभावसे श्रीविष्णुकी भक्तिमें ही अपने मनको निरन्तर एकाग्र रखते हैं, वे ही परम भागवत हैं। इन परम महाभागवत लोगोंका मुख्य लक्षण यह है कि ये लोग ब्राह्मणोंमें ही श्रीविष्णुका सदा निवास मानकर उनकी सेवामें सदा लगे रहते हैं। ये लोग अपने समस्त साधनोंको भी श्रीविष्णुके चरणोंमें ही समर्पित किये रहते हैं। श्रीविष्णुकी सेवाके लिये ही सांसारिक संगोंसे दूर रहते हैं। श्रीविष्णुको ही अपना एकमात्र आश्रय मानकर उन्हींकी अर्चामें सदा तत्पर रहते हैं।<sup>१</sup>
वैष्णव या महाभागवत जिस श्रीविष्णुभक्तिको अपना सर्वस्व मानते हैं, वह (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य तथा सख्य-भेदसे) आठ प्रकारकी होती है। इसमें म्लेच्छ व्यक्ति भी अधिकारी माना गया है। इस संसारमें तो वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है, वही मुनि है, वही ऐश्वर्यसे सम्पन्न है और वही मोक्षको प्राप्त करता है, जो भगवान् हरिकी भक्तिमें तन्मय रहता है। जो भगवद्भक्त है, उसीको दान देना चाहिये, उसीसे दान लेना चाहिये, उसीकी हरिकी भाँति पूजा करनी चाहिये। भगवद्भक्त द्विजोत्तमका स्मरण कर, उनके साथ भाषण कर, उनका पूजन कर हम अपनेको पवित्र कर लेते हैं। यदि कोई भगवद्भक्त चाण्डालजातिका है तो वह भी अपनी पवित्र भक्तिकी महिमासे हम सबको पवित्र कर देता है।<sup>२</sup>
'हे नाथ! आप मुझपर दया करें, मैं आपकी शरणमें हूँ' ऐसा जो प्राणी कहता है, उसको भगवान् हरि सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय कर देते हैं, किसीसे भी उसको भय नहीं होता, यह भगवान्की प्रतिज्ञा है—
दयां कुरु प्रपन्नाय तवास्मीति च यो वदेत्।
अभयं सर्वभूतेभ्यो दद्यादेतद् व्रतं हरेः॥
(२२७।११)
१-प्रणामपूर्वकं भक्त्या यो वदेद्वैष्णवो हि सः। तद्भक्तजनवात्सल्यं पूजनं चानुमोदनम्॥
तत्कथाश्रवणे प्रीतिरश्रूनेत्राङ्गविक्रियाः। येन सर्वात्मना विष्णौ भक्त्या भावो निवेशितः॥
विप्रेभ्यश्च कृतात्मत्वान्महाभागवतो हि सः। विक्षेपोपकरणं नित्यं तदर्थं सङ्गवर्जनम्।
स्वयमभ्यर्चनं चैव यो विष्णुं चोपजीवति॥ (२२७।६-८)
२-भक्तिरष्टविधा ह्येषा यस्मिन् म्लेच्छेऽपि वर्तते। स विप्रेन्द्रो मुनिः श्रीमान् स याति परमां गतिम्॥
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा हरिः। स्मृतः सम्भाषितो वापि पूजितो वा द्विजोत्तमः॥
पुनाति भगवद्भक्तश्चण्डालोऽपि यदृच्छया॥ (२२७।९-१०)
२०५- नृसिंहस्तोत्र तथा उसकी महिमा
काण्ड ] भगवद्भक्तिनिरूपण तथा भक्तोंकी महिमा ४१७
मन्त्रका जप करनेवाले हजार जपकर्ताओंकी अपेक्षा सभी वेदान्तदर्शनों, शास्त्रोंमें पारंगत विद्वान् श्रेष्ठ है। सर्ववेदान्तनिष्णात करोड़ों विद्वानोंकी अपेक्षा विष्णुभक्त श्रेष्ठ है। जो लोग भगवान् विष्णुमें ऐकान्तिक भक्ति रखते हैं, वे सशरीर श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त करनेमें सफल हो जाते हैं। श्रीविष्णुभक्तिको ही परम पुरुषार्थ माननेवाले एकान्ती भक्त हैं। इनका चित्त सर्वात्मना भागवत होता है। ऐसे परम भागवत श्रीविष्णुके ही समान हो जाते हैं, किंबहुना, श्रीविष्णु ऐसे परम भागवत भक्तोंके परायण (सर्वथा अभिन्न) रहते हैं। ये परम भागवत भक्त देवदेव श्रीविष्णुके परम प्रिय लोगोंसे भी अधिक सुप्रिय होते हैं। इनकी भक्ति अव्यभिचारिणी (नितान्त सुदृढ़) होती है। इसीलिये कठिन-से-कठिन आपत्कालमें भी यह भक्ति सुस्थिर रहती है। ये परम भागवत भक्त सदा यही प्रार्थना करते रहते हैं—'प्रभो! विष्णो! विषयोंमें जो अधिकाधिक स्थिर प्रीति होती है, वही आपका स्मरण करते हुए मुझमें सदा अविचल-भावसे बनी रहे।' यह विशेष रूपमें ध्यातव्य है कि प्रभु श्रीविष्णुकी ही भक्ति करनी चाहिये। यदि कोई अन्य किसीके प्रति दृढ़ भक्त है, सर्वेश्वर प्रभुका भक्त नहीं है तो वेदादि समस्त शास्त्रोंके अर्थका पारङ्गत होनेपर भी वह वास्तवमें पुरुषाधम ही है। जिसने वेद या अन्य शास्त्रोंका अध्ययन नहीं किया है, जो यज्ञादिक पुण्यकर्मोंको अपने जीवनमें सम्पन्न करनेसे वञ्चित रह गया है, वह भी यदि भगवान् विष्णुमें भक्ति रखता है तो (समझना चाहिये कि) उसने सब कुछ कर लिया है। जो लोग याज्ञिक हैं, अश्वमेध, राजसूयादिक मुख्य यज्ञोंको करनेवाले हैं और वेदोंके पारंगत हैं, वे मुनिसत्तम (मुनिश्रेष्ठ) भी उस परमगतिको प्राप्त नहीं कर पाते, जिस परमगतिको विष्णुभक्त अपनी भक्तिसे प्राप्त कर लेते हैं। इस संसारमें जो मनुष्य निर्दयी हैं, दुष्टात्मा हैं तथा दुराचारमें लगे रहते हैं, वे भी यदि भगवान् विष्णु नारायणकी भक्तिमें संलग्न हों तो उन्हें परमगतिकी प्राप्ति होती है। जब मनुष्यकी भक्ति भगवान् जनार्दनके प्रति अचल और दृढ़ हो जाती है, तब उसके लिये स्वर्गका सुख कितना महत्त्व रखता है! वह भक्ति ही उसके लिये मुक्ति है। हे शौनक! इस संसारके दुर्गम कर्ममार्गमें भ्रमण करते हुए मनुष्योंके लिये भक्ति ही एकमात्र अवलम्ब है, जिसके करनेसे जनार्दन संतुष्ट होते हैं। जो मनुष्य देवाधिदेव विष्णुके दिव्य गुणोंको नहीं सुनता, वह बहरा है और सभी धर्मोंसे बहिष्कृत है। हरिनाम-संकीर्तनसे जिस व्यक्तिका शरीर रोमाञ्चित नहीं हुआ, उसका वह शरीर मृतकके समान है। हे द्विजश्रेष्ठ! जिसके अन्तःकरणमें विष्णुभक्ति विद्यमान रहती है, उसे यथाशीघ्र ही इस संसारके आवागमन-चक्रसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। जिन मनुष्योंका मन हरिभक्तिमें रमा हुआ है, उनके सभी पापोंका विनाश सब प्रकारसे निश्चित है।
हाथमें पाश लेकर खड़े हुए अपने दूतको देखकर यमराज उसके कानमें कहते हैं कि हे दूत! तुम उन लोगोंको छोड़ देना जो मधुसूदन विष्णुके भक्त हैं। मैं तो अन्य दुराचारी और पापियोंका स्वामी हूँ, वैष्णवोंके स्वामी स्वयं हरि हैं। श्रीविष्णुने स्वयं कहा है कि यदि दुराचारी व्यक्ति भी मुझमें अनन्य भक्ति रखता है तो वह साधु ही है; क्योंकि उसने भक्तिका निश्चय कर लिया है कि श्रीविष्णुकी भक्तिके समान अन्य कुछ भी नहीं है। निश्चयपूर्वक भगवान्की भक्तिमें अनन्य भावसे लगा हुआ व्यक्ति तुरंत धर्मात्मा हो जाता है और उसको शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है। हे द्विजश्रेष्ठ! आप ऐसा निश्चित ही जान लें कि विष्णुभक्तका कभी विनाश नहीं होता। समस्त संसारके मूल कारण भगवान् हरिमें जिस मनुष्यकी भक्ति स्थिर रहती है, उसके लिये धर्म, अर्थ और काम—इस त्रिवर्गका कोई महत्त्व नहीं है; क्योंकि परम सुखरूप मुक्ति ही उसके हाथमें सदा रहती है। यह जो हरिकी त्रिगुणात्मिका दैवी माया है, उसको वे लोग पार करते हैं जो हरिकी शरणमें
४१८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
जाते हैं। जिनकी बुद्धिमें भगवान् हरि निवास करते हैं, उनके लिये यज्ञाराधन आदिसे क्या लाभ? भक्तिसे ही नारायणकी आराधना होती है। भक्तिके अतिरिक्त उनकी आराधनाके लिये अन्य कोई साधन नहीं है। विभिन्न प्रकारके दान देनेसे, भलीभाँति पुष्प-समर्पणसे अथवा अनेक प्रकारके दिव्य अनुलेपनसे भी परमात्मा जनार्दन विष्णु उतना संतुष्ट नहीं होते जितना भक्तिसे।
इस संसाररूपी विषवृक्षके अमृतके समान दो फल हैं—पहला फल है—भगवान् केशवकी भक्ति और दूसरा फल है, उनके भक्तोंका सत्संग—
संसारविषवृक्षस्य द्वे फले ह्यमृतोपमे।
कदाचित्केशवे भक्तिस्तद्भक्तैर्वा समागमः॥
(२२७।३२)
सनातन पुरुष श्रीविष्णु एकमात्र भक्तिसे सुलभ हैं और यह भक्ति अनायास पत्र, पुष्प, फल अथवा जलका श्रद्धाके साथ श्रीविष्णुके चरणोंमें समर्पणमात्रसे प्राप्य है। ऐसी स्थितिमें अतिकष्टसाध्य मुक्तिके लिये क्यों प्रयत्न किया जाय?
‘हमारे कुलमें एक विष्णुभक्तने जन्म लिया है, यह हमारा इस संसार-सागरसे उद्धार करेगा।’ यह सोचकर पितृगण ताल ठोकते हैं और पितामह ताली बजा-बजाकर नृत्य करते हैं। अज्ञानी और पापात्मा शिशुपाल तथा सुयोधन आदि भी सुरश्रेष्ठ भगवान्की निन्दा-अपमानके ब्याजसे, भगवान्का स्मरणमात्र करके निष्पाप हो गये और मुक्तिको प्राप्त कर लिये। ऐसी स्थितिमें भगवान्में परमभक्ति रखनेवालोंके मुक्तिलाभमें कौन-सा संशय है? वह तो निस्सन्देह प्राप्त होगी ही—
अज्ञानिनः सुरवरे समधिक्षिपन्तो
यत्पापिनोऽपि शिशुपालसुयोधनाद्याः।
मुक्तिं गताः स्मरणमात्रविधूतपापाः
कः संशयः परमभक्तिमतां जनानाम्॥
(२२७।३५)
ध्यानयोगसे रहित होकर भी जो लोग श्रीविष्णुकी शरणमें आ जाते हैं, वे मृत्युका अतिक्रमण करके परम वैष्णवगतिको प्राप्त हो जाते हैं।
हे माधव! इस संसारमें प्राप्त होनेवाले सैकड़ों कष्टोंसे व्यथित और शरीरमें विद्यमान अनेक इन्द्रिय-छिद्ररूप अश्वोंके साथ विषयवासनाओंमें भटकते हुए इस मेरे मनरूपी घोड़ेको आप रोक लें और अपने चरणरूपी खूँटेमें सुदृढ़ भक्तिरूपी बन्धनसे बाँध दें, जिससे यह मेरा मन आपके चरणकमलका परित्याग कर अन्यत्र न जा सके—
भवोद्भवक्लेशशतैर्हतस्तथा
परिभ्रमन्निन्द्रियरन्ध्रकैर्हयैः।
नियम्यतां माधव मे मनोहय
स्त्वदङ्घ्रिशङ्कौ दृढभक्तिबन्धने॥*
(२२७।३७)
विष्णु ही परमब्रह्म हैं, वे ही तीन भिन्न रूपोंमें वेद-शास्त्रादिके प्रतिपाद्य हैं। इस तथ्यको उनकी मायासे मोहितजन नहीं जानते और जो लोग इस मायासे परे रहते हैं तथा श्रीविष्णुमें अपनी अचल भक्ति रखते हैं, उन्हें यह भेद नहीं दिखायी देता। उनके लिये तो सब विष्णुमय ही होता है। (अध्याय २२७)
* यह श्लोक प्राचीन आप्तपरम्परामें इस प्रकार प्रसिद्ध है—
भवोद्भवक्लेशकशाहताहतः परिभ्रमन्नैन्द्रियकापथान्तरे। निगृह्यतां माधव मे मनोहयस्त्वदङ्घ्रिशङ्कौ दृढभक्तिबन्धनैः॥
इसका अर्थ है—‘हे माधव! मेरा मनरूपी अश्व संसारमें उत्पन्न क्लेशरूपी सैकड़ों कोड़ोंसे आहत होकर ऐन्द्रिय (इन्द्रियसम्बन्धी) अनेक कापथ (कुत्सित मार्गों)-में भटक रहा है। कृपया आप अपने भक्तिरूप दृढ़ बन्धनोंसे अपने चरणरूपी शङ्कुमें इसे बाँधकर निगृहीत कर लें।’
[काशीके प्रसिद्ध परम आस्तिक प्रौढ विद्वान् श्रीरामयशजी त्रिपाठी (महाशयजी) इसी रूपमें इस श्लोकका प्रतिदिन प्रातः पाठ करते थे और कहा करते थे कि यह गरुडपुराणका श्लोक है। विशेषकर वर्तमान कलिकालमें इस श्लोकका पाठ भगवान्की भक्ति प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त उपयोगी है। यह तथ्य महाशयजीके शिष्य स्व० श्री पं० बालचन्द्र दीक्षितजीसे ज्ञात हुआ है।]
२०६- कुलामृतस्तोत्र
काण्ड ] नामसंकीर्तनकी महिमा ४१९
नामसंकीर्तनकी महिमा
**सूतजीने कहा—**मुक्तिके कारणभूत, अनादि, अनन्त, अज, नित्य, अव्यय और अक्षय भगवान् विष्णुको जो मनुष्य नमन करता है, वह समस्त संसारके लिये नमस्कारके योग्य हो जाता है। मैं आनन्दस्वरूप, अद्वैत, विज्ञानमय, सर्वव्यापक एवं सभीके हृदयमें निवास करनेवाले भगवान् विष्णुको भक्तिभावसे भरे हुए एकाग्र-मनसे सदा प्रणाम करता हूँ। जो ईश्वर अन्तःकरणमें विराजमान रहकर सभीके शुभाशुभ कर्मोंको देखते हैं, उन सर्वसाक्षी परमेश्वर विष्णुको मेरा नमन है।
शरीरमें शक्ति रहते हुए जो मनुष्य भगवान् चक्रपाणि विष्णुको प्रणाम नहीं करता, उससे इस संसारके अति तुच्छ तृण भी उद्विग्न रहते हैं। जलसे परिपूर्ण नूतन-श्यामल मेघों-जैसी सुन्दर कान्तिवाले, लोकनाथ, परमपुरुष तथा अप्रमेय भगवान् कृष्णको भाव-विभोर होकर दृढ़ भक्तिके साथ मात्र एक बार किया गया प्रणाम श्वपच (चाण्डाल)-को भी तत्काल उत्तम गति देनेमें सक्षम है। जो व्यक्ति पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम करते हुए भगवान् हरिकी पूजा करता है, उसको वह गति प्राप्त होती है, जो सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे भी सम्भव नहीं है। जंगल एवं समुद्रकी भाँति दुर्गम संसारमें दौड़ते हुए पुरुषोंको कृष्णके लिये उनके द्वारा किया गया एक ही प्रणाम उन्हें मुक्ति प्रदान करके तार देगा। बैठा हो, शयन कर रहा हो अथवा जहाँ कहीं भी रह रहा हो—हर स्थितिमें कल्याणकामी पुरुषको 'नमो नारायणाय' मन्त्रका स्मरण करना चाहिये। 'नारायण' यह शब्द सुलभ है और वागिन्द्रिय मनुष्यके वशमें है, फिर भी मूर्ख मनुष्य नरकमें गिरता है, इससे बढ़कर आश्चर्य क्या होगा! यदि कोई चार मुखोंसे युक्त हो जाय अथवा उसके करोड़ों मुख हो जायँ, चाहे कोई विशुद्ध चित्तवाला मनुष्य हो, फिर भी वह देवश्रेष्ठ भगवान् विष्णुके गुणोंसे सम्बन्धित दस हजारवें भागका भी वर्णन नहीं कर सकता। मधुसूदन (श्रीविष्णु)-की स्तुति करनेवाले व्यास आदि मुनि अपनी बुद्धिकी क्षीणताके कारण श्रीविष्णुके गुण-वर्णनसे विरत होते हैं न कि श्रीविष्णुके गुणोंकी इयत्ताके कारण। सिंहसे डरकर मृग जैसे तत्काल भाग जाते हैं वैसे ही श्रीविष्णुके नामोंका कीर्तन करनेसे अशक्त व्यक्तिके भी सभी पातक तत्काल नष्ट हो जाते हैं और निष्पाप होनेके कारण वह व्यक्ति अपने पूरे परिवारके साथ मोक्षके लिये संनद्ध हो जाता है।
स्वप्नमें भी भगवान् नारायणका नाम लेनेवाला मनुष्य अपनी अक्षय पापराशिको विनष्ट कर देता है। यदि कोई मनुष्य प्रबोध-दशामें परात्पर विष्णुका नाम लेता है तो फिर उसके विषयमें कहना ही क्या? 'हे कृष्ण! हे अच्युत! हे अनन्त! हे वासुदेव! आपको नमस्कार है।' ऐसा कहकर जो भक्तिभावसे श्रीविष्णुको प्रणाम करते हैं, वे यमपुरी नहीं जाते। अग्निके प्रज्वलित होनेपर अथवा सूर्यके उदित हो जानेपर जैसे अन्धकार विनष्ट हो जाता है, वैसे ही हरिका नामसंकीर्तन करनेसे प्राणियोंके पाप-समूहका विनाश हो जाता है। नामसंकीर्तनसे जिस नित्य सर्वोत्तम अक्षय सुखका अनुभव होता है, उसके सम्मुख अनित्य क्षयशील स्वर्गसुख सर्वथा नगण्य है। जिनका चित्त श्रीकृष्णचिन्तनमें ही प्रतिक्षण रम रहा है, उनके लिये श्रीकृष्णधामतक पहुँचनेके लंबे मार्गमें श्रीकृष्णनामसंकीर्तन सर्वोत्तम पाथेय (अनुपम अवलम्ब) है। संसाररूपी सर्पके दंशसे व्याप्त विषके भयंकर उपद्रवको शान्त करनेके लिये एकमात्र औषध 'श्रीकृष्ण' नाम है। इस वैष्णव मन्त्रका जप करके मनुष्य संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है—
२०७- मृत्वष्टकस्तोत्र
| ४२० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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पाथेयं पुण्डरीकाक्ष नामसंकीर्तनं हरेः।
संसारसर्पदंशष्टविषचेष्टैकभेषजम् ॥
(२२८।१७)
कृतयुगमें भगवान् हरिका ध्यान करते हुए, त्रेतायुगमें इन्हीं भगवान् हरिके मन्त्रोंका जप करते हुए, द्वापरमें इन्हींकी पूजा करते हुए, जो फल प्राणियोंको प्राप्त होता है, वही फल कलियुगमें मनुष्य उन्हीं भगवान् 'केशव' के स्मरणमात्रसे प्राप्त कर लेता है—
ध्यायन् कृते जपन् मन्त्रैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्।
यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संस्मृत्य केशवम्॥
(२२८।१८)
जिस व्यक्तिकी जिह्वाके अग्रभागमें 'हरि' ये दो अक्षर विद्यमान होते हैं, वह इस संसारसागरको पार कर विष्णु-पदको प्राप्त करनेमें सफल हो जाता है—
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जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्।
संसारसागरं तीर्त्वा स गच्छेद्वैष्णवं पदम्॥
(२२८।१९)
ज्ञानपूर्वक किये गये हजारों पापोंसे परिशुद्धि प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवाले व्यक्तिके लिये भगवान्का नाम परम कल्याणकारी है। भगवान् नारायणके स्तवन और गुणानुवादसे भरी हुई कथाओंके श्रवणमें निमग्न रहनेवाला व्यक्ति स्वप्नमें भी इस संसारको नहीं देखता—
विज्ञातदुष्कृतिसहस्रसमावृतोऽपि
श्रेयः परं तु परिशुद्धिमभीप्समानः।
स्वप्नान्तरे न हि पुनश्च भवं स पश्ये-
न्नारायणस्तुतिकथापरमो मनुष्यः॥
(२२८।२०)
(अध्याय २२८)
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विष्णुपूजामें श्रद्धा-भक्तिकी महिमा
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सूतजीने पुनः कहा— हे शौनक! समस्त लोकोंके स्वामी भगवान् हरिकी आराधना ही सार है। पुरुषसूक्तके* द्वारा जो मनुष्य पुष्प और जल आदि उस परात्पर देवको समर्पित करता है, वह सम्पूर्ण चराचर जगत्की पूजा कर लेता है। जो विष्णुकी पूजा नहीं करते, उन्हें ब्रह्मघाती समझना चाहिये। जिन भगवान्से समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है और यह समस्त चराचर जगत् जिनसे व्याप्त है, उन विष्णुका जो ध्यान नहीं करता, वह विष्ठाका कृमि होता है। नरकलोकमें होनेवाले कष्टोंसे संतप्त हो रहे पापी जीवसे यमराज स्वयं पूछते हैं कि क्या तुमने कष्टविनाशक भगवान् विष्णुदेवका पूजन नहीं किया था? द्रव्योंका अभाव होनेपर मात्र जलसे ही पूजा करनेपर जो देव प्रसन्न होकर
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स्वयं अपने ही लोकको दे देते हैं, क्या तुमने उनकी पूजा नहीं की थी?
श्रद्धापूर्वक की गयी पूजासे संतुष्ट भगवान् हृषीकेश मनुष्यका जो उपकार करते हैं, वह न माता करती है, न पिता करता है और न तो उसका भाई ही करता है। वर्णाश्रम-धर्मका आचरण करनेवाले मनुष्यके द्वारा यदि भगवान् विष्णुकी पूजा होती है तो वे (श्रीविष्णु) उस पूजासे संतुष्ट हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है, जो उनको संतुष्ट कर सके। न तो वे प्राणियोंके द्वारा दिये गये विभिन्न प्रकारके दानसे उतना संतृप्त होते हैं, न तो पुष्पोपहार और भाँति-भाँतिके सुगन्धित पदार्थोंके अनुलेपनसे उतना संतुष्ट होते हैं, जितना भक्तिसे। सम्पत्ति, ऐश्वर्य, माहात्म्य,
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* 'सहस्रशीर्षा पुरुषः' आदि १६ मन्त्र 'पुरुषसूक्त'-रूपमें प्रसिद्ध हैं। ये मन्त्र सभी वेदोंकी संहितामें उपलब्ध हैं।
२०८- अच्युतस्तोत्र
काण्ड ] विष्णुभक्तिका माहात्म्य ४२१
पुत्र-पौत्रादिक संतान तथा अन्यान्य कर्मसम्पादनसे भी भगवान् हरि संतुष्ट नहीं होते। विमुक्तजनोंके लिये भी हरिका ऐक्य श्रीहरिकी आराधनासे ही प्राप्त होता है; क्योंकि श्रीहरिकी आराधना ही ऐक्यभावका मूल है।
(अध्याय २२९)
विष्णुभक्तिका माहात्म्य
सूतजीने कहा— सभी शास्त्रोंका अवलोकन करके तथा पुनः-पुनः विचार करके यह एक ही निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्यको सदैव भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये—
आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः।
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा॥
( २३०।१)
जो व्यक्ति एकनिष्ठ होकर नित्य उस नारायणका ध्यान करता है, उसके लिये नाना प्रकारके दान, विभिन्न तीर्थोंका परिभ्रमण, तपस्या और यज्ञोंका सम्पादन करनेसे क्या प्रयोजन? अर्थात् श्रीमन्नारायणका ध्यान सर्वोत्कृष्ट है।
छियासठ हजार तीर्थ भगवान् नारायणके प्रणामकी सोलहवीं कलाकी भी बराबरी नहीं कर सकते। समस्त प्रायश्चित्त और जितने भी तप-कर्म हैं, इन सभीमें भगवान् कृष्णका स्मरण ही सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा समझना चाहिये। जिस पुरुषकी अनुरक्ति सदैव पापकर्ममें रहती है, उसके लिये एकमात्र श्रेष्ठतम प्रायश्चित्त भगवान् हरिका स्मरण है।
जो प्राणी एक मुहूर्तभर भी निरालस्य होकर नारायणका ध्यान कर लेता है, वह स्वर्ग प्राप्त करता है, फिर नारायणमें अनन्य-परायण भक्तके विषयमें क्या कहा जाय—
मुहूर्तमपि यो ध्यायेन्नारायणमतन्द्रितः।
सोऽपि स्वर्गतिमाप्नोति किं पुनस्तत्परायणः॥
(२३०।६)
जो मनुष्य योगपरायण है अथवा योगसिद्ध है, उसकी चित्तवृत्ति जागते, स्वप्न देखते तथा सुषुप्तावस्थामें भगवान् अच्युतके ही आश्रित होती है। उठते, गिरते, रोते, बैठते, खाते, जागते भगवान् गोविन्द माधव विष्णुका स्मरण करना चाहिये।
अपने-अपने कर्ममें संलग्न रहते हुए भगवान् जनार्दन हरिमें ही चित्तको अनुरक्त रखना चाहिये, ऐसा शास्त्रका कथन है। अन्य बहुत-सी बातोंको कहनेसे क्या लाभ—
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः कुर्याच्चित्तं जनार्दने।
एषा शास्त्रानुसारोक्तिः किमन्यैर्बहुभाषितैः॥
( २३०।९)
ध्यान ही परम धर्म है, ध्यान ही परम तप है, ध्यान ही परम शुद्धि है, अतः मनुष्यको (भगवद्) ध्यानपरायण होना चाहिये। विष्णुके ध्यानसे बढ़कर अन्य कोई ध्यान नहीं है, उपवाससे बढ़कर अन्य कोई तपस्या नहीं है, अतः भगवान् वासुदेवके चिन्तनको ही अपना प्रधान कर्म मानना चाहिये। इस लोक और परलोकमें प्राणीके लिये जो कुछ दुर्लभ है, जो अपने मनसे भी सोचा नहीं जा सकता, वह सब बिना माँगे ही ध्यानमात्र करनेसे मधुसूदन प्रदान कर देते हैं।
यज्ञ आदि उत्तम कर्म करते समय प्रमादवश स्खलनसे जो न्यूनता होती है, वह विष्णुके स्मरणमात्रसे सम्पूर्णतामें परिवर्तित हो जाती है, ऐसा श्रुतिवचन है—
प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्।
स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः॥
( २३०।१३)
पापकर्म करनेवालोंकी शुद्धिका ध्यानके समान
| ४२२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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अन्य कोई साधन नहीं है। यह ध्यान पुनर्जन्म देनेवाले कारणोंको भस्म करनेवाली योगाग्नि है। समाधि (ध्यानयोग)-से सम्पन्न योगी योगाग्निसे तत्काल अपने समस्त कर्मोंको नष्ट करके इसी जन्ममें मुक्ति प्राप्त कर लेता है। वायुके सहयोगसे ऊँचे उठनेवाली ज्वालासे युक्त अग्नि जैसे अपने आश्रय कक्ष (कमरे)-को जलाकर भस्म कर देती है, वैसे ही योगी (ध्यानयोगी)-के चित्तमें स्थित श्रीविष्णु योगीके समस्त पापोंको भस्म कर देते हैं। जैसे अग्निके संयोगसे सोना मलरहित हो जाता है, वैसे ही मनुष्योंका मल भगवान् वासुदेवके सांनिध्यसे विनष्ट हो जाता है।
हजारों बार गङ्गास्नान तथा करोड़ों बार पुष्कर नामक तीर्थमें स्नान करनेसे जो पाप नष्ट होता है, वह हरिका मात्र स्मरण करनेसे नष्ट हो जाता है। हजारों प्राणायाम करनेसे जो पाप नष्ट होता है, वही पाप क्षणमात्र भगवान् हरिका ध्यान करनेसे निश्चित ही नष्ट हो जाता है। जिस मनुष्यके हृदयमें भगवान् केशव विराजमान हैं, उसके मानसपर उन दुष्ट उक्तियों तथा पाखण्डका प्रभाव नहीं पड़ता, जो कलिके प्रभावसे प्रवृत्त हैं। जिस समय हरिका स्मरण किया जाता है, वही तिथि, वही दिन, वही रात्रि, वही योग, वही चन्द्रबल और वही लग्न सर्वश्रेष्ठ है। जिस मुहूर्त या क्षणमें वासुदेवका चिन्तन नहीं होता, वह मुहूर्त या क्षण हानिका समय है। वह अत्यन्त व्यर्थ है। वह किसी भी प्रकारके लाभसे रहित होनेके कारण मूर्खता एवं मूकता (गूँगेपन)-का समय है।
जिसके हृदयमें भगवान् गोविन्द विद्यमान हैं, उसके लिये कलियुग भी सत्ययुग ही है। इसके विपरीत जिसके हृदयमें अच्युत भगवान् गोविन्दका वास नहीं है, उसके लिये तो सत्ययुग भी कलियुग ही है। जिसका चित्त आगे और पीछे, चलते तथा बैठते, सदैव भगवान् गोविन्दमें रमा हुआ है, वह व्यक्ति सदा ही कृतकृत्य है—
कलौ कृतयुगं तस्य कलिस्तस्य कृते युगे।
<div align="right">(२३०। २३-२४)</div>
हृदये यस्य गोविन्दो यस्य चेतसि नाच्युतः॥
यस्याग्रतस्तथा पृष्ठे गच्छतस्तिष्ठतोऽपि वा।
गोविन्दे नियतं चेतः कृतकृत्यः सदैव सः॥
हे मैत्रेय! जप, होम एवं पूजा आदिके द्वारा जिसका मन वासुदेव श्रीकृष्णकी आराधनामें अनुरक्त है, उसके लिये इन्द्र आदिका पद विघ्नके समान है।
जिन्होंने श्रीकेशवके चरणोंमें अपने मनको अर्पित कर दिया है, वे गृहस्थाश्रमका परित्याग बिना किये ही, कठिन तपश्चर्या बिना किये ही पौरुषी (पुरुषोत्तम परब्रह्मकी शक्ति) मायाके जालको काट डालते हैं।
गोविन्द दामोदरका हृदयमें वास रहनेपर मनुष्य क्रोधियोंके प्रति क्षमा, मूर्खोके प्रति दया और धर्ममें संलग्न प्राणियोंके प्रति प्रसन्नता प्रकट करते हैं—
क्षमां कुर्वन्ति क्रुद्धेषु दयां मूर्खेषु मानवाः।
<div align="right">(२३०। २७)</div>
मुदं च धर्मशीलेषु गोविन्दे हृदयस्थिते॥
स्नान-दान आदि कर्मोंमें तथा विशेष रूपसे सभी प्रकारके दुष्कर्मोंका प्रायश्चित्त करते समय भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये।
जिनके हृदयमें नीलकमलके समान सुन्दर श्यामवर्ण भगवान् हरि विराजमान रहते हैं, उन्हींको वास्तविक लाभ और जय प्राप्त होते हैं। उनका पराभव कैसे हो सकता है—
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराभवः।
<div align="right">(२३०। २९)</div>
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥
हरिमें समर्पित चित्तवाले कीड़े-मकोड़े, पक्षी आदि जीव-जन्तुओंकी भी ऊर्ध्व (उत्तम) गति
काण्ड ] विष्णुभक्तिका माहात्म्य ४२३
होती है। फिर ज्ञानसम्पन्न मनुष्योंकी गतिके विषयमें कहना ही क्या—
कीटपक्षिगणानां च हरौ संन्यस्तचेतसाम्।
ऊर्ध्व्वा ह्येव गतिश्चास्ति किं पुनर्ज्ञानिनां नृणाम्॥
(२३०।३०)
भगवान् वासुदेवरूपी वृक्षकी छाया न तो अधिक शीतल होती है और न अधिक तापकारक होती है। नरकके द्वारका शमन करनेवाली (नरकमें जानेसे रोकने-वाली) इस छायाका सेवन क्यों नहीं किया जाय—
वासुदेवतरुच्छाया नातिशीतातितापदा।
नरकद्वारशमनी सा किमर्थं न सेव्यते॥
(२३०।३१)
हे मित्र! भगवान् मधुसूदनको अपने हृदयमें अहर्निश प्रतिष्ठित रखनेवाले प्राणीका विनाश करनेमें न तो महाक्रोधी दुर्वासाका शाप समर्थ है और न तो देवराज इन्द्रका शासन ही समर्थ है—
न च दुर्वाससः शापो राज्यं चापि शचीपतेः।
हन्तुं समर्थं हि सखे हृत्कृते मधुसूदने॥
(२३०।३२)
बोलते हुए, रुकते हुए अथवा इच्छानुसार अन्य कार्य करते हुए भी यदि भगवद्विषयक चिन्तन निरन्तर बना रहे तो धारणा (ध्येयपर चित्तकी स्थिरता)-को सिद्ध हुआ मानना चाहिये—
वदतस्तिष्ठतोऽन्यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः।
नापयाति यदा चिन्ता सिद्धां मन्येत धारणाम्॥
(२३०।३३)
सूर्यमण्डलके मध्य विराजमान रहनेवाले, कमलासनपर सुशोभित, केयूर*, मकराकृतकुण्डल और मुकुटसे अलंकृत, दिव्य हारसे युक्त, मनोहारिणी सुन्दर स्वर्णिम आभासे युक्त शरीरवाले, शंख-चक्रधारी भगवान् विष्णुका सदैव ध्यान करना चाहिये—
ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती
नारायणः सरसिजासनसंनिविष्टः।
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी
हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः॥
(२३०।३४)
इस संसारमें भगवान्के ध्यानके समान अन्य कोई पवित्र कार्य नहीं है। श्रीविष्णुके ध्यानमें ही सदा निरत रहनेवाला मनुष्य चाण्डालका भी अन्न खाते हुए इस संसारके पापसे संलिप्त नहीं होता, क्योंकि ऐसा मनुष्य अपने स्वत्वको भगवान्में लीन कर देनेसे भगवन्मय हो जाता है, अतएव उसकी भेददृष्टि पूरी तरह निर्मूल हो जाती है।
प्राणीका चित्त सदा सांसारिक विषयवासनाओंके भोगमें जिस प्रकार अनुरक्त रहता है, यदि उसी प्रकार नारायणमें ही अनुरक्त हो तो इस संसारके बन्धनसे क्यों नहीं विमुक्त हो सकता—
सदा चित्तं समासक्तं जन्तोर्विषयगोचरे।
यदि नारायणेऽप्येवं को न मुच्येत बन्धनात्॥
(२३०।३६)
सूतजीने फिर कहा—हे शौनक! सर्वदा जिसके चित्तमें भगवान् विष्णुकी भक्ति विद्यमान रहती है, वह प्रतिक्षण श्रीविष्णुको ही नमन करता रहता है। इस स्थितिमें वह हरिकृपासे अपनेको पापके समुद्रसे तार लेता है।
वही ज्ञान है जिस ज्ञानका विषय गोविन्द हों, वही कथा है जिस कथामें केशवकी लीला हो, वही कर्म है जो प्रभुके निमित्त किया जाय; अन्य बहुत-सी बातोंको कहनेसे क्या लाभ? जो जिह्वा हरिकी स्तुति करती है वही जिह्वा है, जो चित्त श्रीहरिको समर्पित है वही चित्त है तथा भगवान्की पूजा करनेमें जो हाथ लगे हुए हैं वे ही वास्तविक हाथ हैं—
* बाँहके मूलमें पहना जानेवाला आभूषण, इसे अङ्गद, बिजायट, बाजूबंद आदि भी कहते हैं।
| ४२४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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तज्ज्ञानं यत्र गोविन्दः सा कथा यत्र केशवः।
तत्कर्म यत् तदर्थाय किमन्यैर्बहुभाषितैः॥
सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत् तदर्पितम्।
तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ॥
(२३०।३८-३९)
मस्तकका फल है भगवान्को नतमस्तक होकर प्रणाम करना, हाथका फल है भगवान्की पूजा करना, मनका फल है उनके गुण और कर्मका चिन्तन करना तथा वाणीका फल है गोविन्दके गुणोंका कीर्तन करना—
प्रणाममीशस्य शिरःफलं विदु-
स्तदर्चनं पाणिफलं दिवौकसः।
मनःफलं तद्गुणकर्मचिन्तनं
वचस्तु गोविन्दगुणस्तुतिः फलम्॥
(२३०।४०)
मनुष्यके पापकर्मकी जो राशि सुमेरु और मन्दराचलके समान विशाल हो गयी हो, वह सम्पूर्ण पापराशि भी भगवान् केशवका स्मरणमात्र करनेसे ही विनष्ट हो जाती है—
मेरुमन्दरमात्रोऽपि राशिः पापस्य कर्मणः।
केशवस्मरणादेव तस्य सर्वं विनश्यति॥
(२३०।४१)
श्रीविष्णुपरायण भक्त अनासक्त-भावसे यदि अपने सभी कर्मोंको श्रीविष्णुके चरणोंमें समर्पित करता है तो उसके कर्म साधु हों या असाधु बन्धनकारक नहीं होते। हे प्रभो! सुर, असुर, मनुष्य, तिर्यक्, स्थावर आदि भेदोंमें विभक्त तृणसे लेकर ब्रह्मापर्यन्त समस्त जगत् आपकी ही मायासे मोहित है।
जिनमें मन लगा देनेसे प्राणी नरकमें नहीं जाता और जिनके चिन्तन-सुखकी तुलनामें स्वर्गकी प्राप्ति विषके समान है तथा ब्रह्मलोककी कामना भी अत्यल्प होनेके कारण किसी भी प्रकार मनमें प्रवेश नहीं पाती, जो अव्यय भगवान् जड बुद्धिवाले मनुष्योंके चित्तमें स्थित होकर उन्हें मुक्ति प्रदान कर देते हैं, उन अच्युतका कीर्तन करनेपर यदि उनमें प्राणीका विलय हो जाता है तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात है* ?
दुःख-सागरको पार करनेके लिये यज्ञ, जप, स्नान और विष्णुका ध्यान तथा पूजन करना चाहिये।
राष्ट्रका आश्रय राजा, बालकका आश्रय पिता और समस्त प्राणियोंका आश्रय धर्म है; किंतु सभीके आश्रय श्रीहरि ही हैं—
राष्ट्रस्य शरणं राजा पितरो बालकस्य च।
धर्मश्च सर्वमर्त्यानां सर्वस्य शरणं हरिः॥
(२३०।४६)
हे मुनिवर! जो लोग जगत्के कारणस्वरूप सनातन भगवान् वासुदेवको नमन करते हैं, उनसे अधिक श्रेष्ठ पुण्यवान् कोई तीर्थ नहीं है। निरालस्य होकर गोविन्दका ध्यान करते हुए उन्हींको समर्पित स्वाध्याय आदि कर्म करना चाहिये। भगवद्भक्त व्यक्ति चाहे शूद्र हो अथवा निषाद हो या चाण्डाल हो, उसे द्विजातियोंके समान ही माननेवाला व्यक्ति नरकमें नहीं जाता। जैसे धनप्राप्तिकी अभिलाषासे धनवान् व्यक्तिकी सदैव सम्मानपूर्वक स्तुति की जाती है, वैसे ही जगत्स्रष्टा श्रीविष्णुकी स्तुति-पूजा आदि की जाय तो क्यों नहीं इस संसारके बन्धनसे मुक्ति हो सकती है ?
जिस प्रकार वनमें लगी हुई अग्नि गीले ईंधनको जलाकर राख कर देती है, उसी प्रकार योगियोंके हृदयमें स्थित भगवान् विष्णु उनके समस्त पापोंको विनष्ट कर देते हैं। जैसे चारों ओरसे लगी हुई
* यस्मिन् न्यस्तमतिर्न याति नरकं स्वर्गोऽपि यच्चिन्तने विघ्नो यत्र न वा विशेत् कथमपि ब्राह्मोऽपि लोकोऽल्पकः।
मुक्तिं चेतसि संस्थितो जडधियां पुंसां ददात्यव्ययः किं चित्रं यदयं प्रयाति विलयं तत्राच्युते कीर्तिते॥ (२३०।४४)
काण्ड ] नृसिंहस्तोत्र तथा उसकी महिमा ४२५
अग्निकी ज्वालासे घिरे हुए पर्वतका आश्रय मृग आदि पशु एवं पक्षी नहीं लेते, वैसे ही सभी पाप योगाभ्यासमें लगे हुए मनुष्यका आश्रय नहीं ग्रहण करते। उन विष्णुके प्रति जिसका विश्वास जितना अधिक दृढ़ होता है, उसको उतनी ही अधिक सिद्धि प्राप्त होती है।
भगवान् कृष्णके ऐसे प्रभावका आकलन कर शत्रुभावसे उन गोविन्दका स्मरण करता हुआ दमघोषका पुत्र शिशुपाल भगवान्में लीन हो गया। यदि कोई मनुष्य भक्तिभावसे विष्णुपरायण है, तो उसके विषयमें क्या कहना? उसकी मुक्ति तो पहलेसे ही सुनिश्चित हो जाती है—
विद्वेषादपि गोविन्दं दमघोषात्मजः स्मरन्।
<p align="right">(२३०।५४)</p> <p align="right">(अध्याय २३०)</p>
शिशुपालो गतस्तत्त्वं किं पुनस्तत्परायणः॥
नृसिंहस्तोत्र तथा उसकी महिमा
सूतजीने कहा—हे शौनक! अब मैं भगवान् शिवद्वारा कही गयी नारसिंहस्तुति (नृसिंहस्तोत्र)-का वर्णन करूँगा।
प्राचीन कालकी बात है, एक बार सभी मातृगणोंने भगवान् शंकरसे कहा कि हे भगवन्! हम सब आपकी कृपासे देव, असुर और मनुष्य आदि जो इस संसारमें प्राणी हैं, उन सबको खायेंगे। हम सभीको आप इसके लिये आज्ञा प्रदान करें।
शंकरजीने कहा—हे मातृकाओ! आप सबके द्वारा संसारकी समस्त प्रजाकी रक्षा होनी चाहिये। इसलिये इस महाभयंकर पापसे आप लोग अपने-अपने मनको शीघ्र वापस कर लें।
भगवान् शंकरके द्वारा ऐसा कहे जानेपर भी मातृकाएँ उनके वचनका अनादर करते हुए त्रिभुवनके समस्त चराचर प्राणियोंको खानेके लिये जुट गयीं। मातृकाओंके द्वारा त्रैलोक्यका भक्षण करते देखकर भगवान् शिवने नृसिंहरूप उन श्रीविष्णुदेवका इस रूपमें ध्यान किया—जो आदि-अन्तसे रहित एवं समस्त चराचर जगत्के कारण हैं, विद्युत्के समान लपलपाती हुई जिनकी जिह्वा है, जिनके बड़े-बड़े महाभयंकर दाँत हैं, जिनकी ग्रीवा देदीप्यमान केसरसे* सुशोभित है, जो रत्नजटित अङ्गद एवं मुकुटसे सुशोभित हैं। जिनका शिरोभाग सोनेके समान दिखायी देनेवाली जटाओंसे युक्त है, जिनके कटिप्रदेशमें सोनेकी करधनी है, जो नीलकमलके समान श्यामवर्णके हैं, जो रत्नखचित पायल धारण किये हुए हैं। जिनके तेजसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड व्याप्त है। जिनका शरीर आवर्ताकार रोमसमूहसे युक्त है और जो देव श्रेष्ठतम पुष्पोंसे गूँथी गयी एक विशाल मालाको धारण किये हुए हैं। इस तरह भगवान् रुद्रने भक्तिपूर्वक जिस रूपमें नारायणका ध्यान किया था, उसी रूपमें ध्यान करनेमात्रसे नृसिंहदेव श्रीविष्णुने उन्हें अपना दर्शन दिया। यह रूप देवताओंके द्वारा भी दुर्निरीक्ष्य था।
शिवने देवेश नृसिंहको प्रणाम करके उन्हें तुष्ट किया और वे इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे। शंकरजीने कहा—
नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ नरसिंहवपुर्धर।
दैत्येश्वरेन्द्रसंहारिनखशुक्तिविराजित ॥
नखमण्डलसंभिन्नहेमपिङ्गलविग्रह ।
नमोऽस्तु पद्मनाभाय शोभनाय जगद्गुरो।
कल्पान्ताम्भोदनिर्घोष सूर्यकोटिसमप्रभ॥
सहस्रयमसंत्रास सहस्रेन्द्रपराक्रम।
सहस्रधनदस्फीत सहस्रचरणात्मक॥
* सिंहकी ग्रीवाके ऊपरी भागके केशसमूहको 'केसर' कहते हैं।
२०९- ब्रह्मज्ञाननिरूपण तथा षडङ्गयोग
| ४२६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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सहस्रचन्द्रप्रतिम सहस्त्रांशुहरिक्रम।
सहस्ररुद्रतेजस्क सहस्रब्रह्मसंस्तुत॥
सहस्ररुद्रसंजप्य सहस्राक्षनिरीक्षण।
सहस्रजन्ममथन सहस्रबन्धमोचन॥
सहस्रवायुवेगाक्ष सहस्त्राज्ञकृपाकर।
(२३१। १२-१६ १/२)
हे समस्त संसारके स्वामी ! हे नृसिंहरूपधारिन् ! हे दैत्यराज हिरण्यकशिपुके वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले ! शुक्तियोंके समान चमकीले नाखूनोंसे सुशोभित देव ! आपको नमस्कार है। हे नखमण्डलकी कान्तिसे मिश्रित सुवर्णके समान देदीप्यमान शरीरवाले ! हे जगद्वन्द्य ! हे शोभासम्पन्न भगवान् पद्मनाभ ! प्रलयकालीन मेघके सदृश गर्जना करनेवाले, करोड़ों सूर्यके समान प्रभासम्पन्न देव ! आपको नमन है। दुष्ट पापियोंको हजारों यमराजके समान भयभीत करनेवाले ! हजारों इन्द्रकी शक्ति अपनेमें संनिहित रखनेवाले ! हजारों कुबेरके सदृश धनसम्पन्न ! हजारों चरणसे युक्त हे देव ! आपको नमस्कार है। हजारों चन्द्रके समान शीतल कान्तिवाले ! हजारों सूर्यके सदृश पराक्रमशाली ! हजारों रुद्रकी भाँति तेजस्वी ! हजारों ब्रह्मासे स्तुत्य हे देव ! आपको मेरा नमन है। हजारों रुद्र देवताओंके द्वारा मन्त्ररूपमें जप करने योग्य महामहिम ! इन्द्रके हजारों नेत्रोंसे देखे जानेवाले ! हजारों जन्मके पाप-पुण्योंका मन्थन करनेवाले ! संसारके हजारों जीवोंका बन्धन काटकर उन्हें मुक्त करनेवाले ! हजारों वायुदेवोंके समान वेगवान् और हजारों मूर्ख प्राणियोंपर कृपा करनेवाले हे दयानिधान ! आपको मेरा नमस्कार है।
इस प्रकार नृसिंहरूपधारी देवदेवेश्वर भगवान् हरिकी स्तुति करके विनम्रतापूर्वक शिवने पुनः उनसे कहा—
हे देवदेवेश्वर ! अन्धकासुरका विनाश करनेके लिये जिन मातृकाओंकी सृष्टि मैंने की थी, वे तो मेरे ही वचनकी अवहेलना करके संसारकी विविध प्रजाओंका भक्षण कर रही हैं। मातृकाओंकी सृष्टि करके तो अब स्वयं मैं इनका संहार करनेमें असमर्थ हूँ। पहले इनकी सृष्टि की, अब कैसे इनका विनाश करूँ ? यह मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।
रुद्रके ऐसा कहनेपर नृसिंहरूपधारी भगवान् हरिने उसी समय अपनी जिह्वाके अग्रभागसे हजारों देवियोंको उत्पन्न करके उन्हींके द्वारा देवता, असुर और मनुष्य आदिका संहार करनेवाली क्रुद्ध मातृकाओंका विनाश कर संसारका कल्याण किया। तदनन्तर वे हरि अन्तर्धान हो गये।
जो मनुष्य नियमपूर्वक इस नारसिंहस्तोत्रका जितेन्द्रिय होकर पाठ करता है, निश्चित ही भगवान् हरि उसके समस्त मनोरथको वैसे ही पूर्ण करते हैं जैसे उन्होंने शिवके मनोरथको पूर्ण किया था।
मध्याह्नकालीन प्रचण्ड सूर्यके समान तेजस्वी नेत्रोंवाले, श्वेत वर्णके कमलमें स्थित, प्रज्वलित अग्निके सदृश भयंकर, अनादि, मध्य और अन्तसे रहित पुराणपुरुष, परात्पर, जगदाधार भगवान् नृसिंहका ध्यान करना चाहिये—
ध्यायेन्नृसिंहं तरुणार्कनेत्रं
सिताम्बुजातं ज्वलिताग्निवक्त्रम्।
अनादिमध्यान्तमजं पुराणं
परात्परेशं जगतां निधानम्॥
(२३१। २३)
जो मनुष्य इस स्तोत्रका निरन्तर जप करता है, उसके दुःखसमूहको श्रीनृसिंह उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं जिस प्रकार अंशुमाली सूर्य कुहरेकी राशिको अपने सामनेसे हटा देते हैं। जब साधक कल्याणकारी मातृवर्गसे युक्त नृसिंहदेवकी मूर्तिका निर्माण करके उनकी पूजा करता है, तब वह सदैव उन परात्परदेवके समीपमें ही रहता है। त्रिपुरारि शिवने भी तो उन्हीं देवदेवेश्वर नृसिंहमूर्ति भगवान् हरिकी पूजा की थी। उन्हीं देवको प्रसन्न करके श्रीशिवजीने वर प्राप्त किया और मातृकाओंसे संसारकी रक्षा की। (अध्याय २३१)