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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

प्रस्तुत किया है। भूमिका में मैंने उनकी दृष्टि का बहुत अंश में अनुसरण करने का प्रयत्न किया है। बाण के साहित्य को जानने के लिए जो कुछ अन्य स्रोत भी मिले हैं मैंने उनका उपयोग किया है।

अनुवाद के सम्बन्ध में

हर्षचरित का अनुवाद मैंने किया यह कहने की हिम्मत मुझमें नहीं। अनुवाद आरम्भ करने के पूर्व मैंने अपने गुरुदेव डा० अग्रवाल जी से इस सम्बन्ध में पूछा था। उन्होंने सहर्ष अनुमति दी और उत्साहित किया। तत्काल स्वयं चौखम्बा विद्याभवन के अध्यक्ष महोदय से उन्होंने बातें भी कर लीं और मुझे अनुवाद तैयार करने के लिए सूचित किया। उन्होंने उत्साहित करते हुए यह कहा कि कहीं शंका हो तो पूछ लेना। मैंने अपना कार्य आरम्भ कर दिया। इसी बीच अध्यापनार्थ मुझे वैद्यनाथधाम गुरुकुल आना पड़ा। मैं ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता गया मेरी कठिनाइयाँ भी बढ़ने लगीं। किसी किसी प्रसंग में मैंने अपने आपको सर्वथा असमर्थ पाया। अनुवाद की परिसमाप्ति की लोलुपता और गुरुदेव का असांनिध्य दोनों ने मुझे अहोरात्र उद्वेलित किया। तब मैंने ऐसे प्रसंगों में 'हर्षचरित एक सांस्कृतिक अध्ययन' की शरण ली और बड़ी सरलता से पूरे ग्रन्थ का अनुवाद तैयार कर लिया। इस अनुवाद की आधारभित्ति गुरुदेव की कृति ही है। अतः गुरुदेव के लिए मैं अपनी कृतज्ञता कैसे प्रकट करूँ ? आशा है वे मेरी विवशताजन्य धृष्टता को क्षमा कर देंगे।

चौखम्बा विद्याभवन के अध्यक्ष महोदय धन्यवाद के पात्र हैं, जिन्होंने मेरे अनुवाद को अपने यहाँ से प्रकाशित किया और आगे के कार्य के लिए भी प्रेरित किया।

वैद्यनाथधाम } गुरुकुल } जगन्नाथ पाठक

विषय-सूची प्रथम उच्छ्वास (वात्स्यायनवंशवर्णन) विषय पृष्ठ. मङ्गलाचरण १ कुकवि-निन्दा ३ काव्य का देशिक रूप-भेद ४ काव्य-स्वरूप, आख्यायिकाकार कवि ५ बासवदत्ता, हरिचन्द्र, सातवाहन, प्रवरसेन, भास, कालिदास, बृहत्कथा, आढ्यराज आदि का उल्लेख ६ हर्षचरित-आख्यायिका ९ ब्रह्माजी की गोष्ठी में विवाद १० सरस्वती-वर्णन ११ दुर्वासा का क्रोध १४ सावित्री-वर्णन १६ दुर्वासा का सरस्वती को शाप देना १८ ब्रह्माजी द्वारा दुर्वासा की भर्त्सना १८ फिर सरस्वती को सान्त्वना देना १९ सन्ध्या-रात्रि-चन्द्रोदयवर्णन २२ सावित्री का सरस्वती को सान्त्वना देना २३ ब्रह्मलोक से सरस्वती और सावित्री का प्रस्थान तथा मन्दाकिनी-वर्णन २८ शोण के तट पर सरस्वती का निवास ३० दूर से घोड़ों को देखना ३३ दधीच-वर्णन ३४ विकुक्षिवर्णन ३९ दधीच और सरस्वती का परिचय ४० दधीच का च्यवनाश्रम जाना ४५ सरस्वती का औत्सुक्य ४६ विकुक्षि का पुनः आगमन ४९ मालती-वर्णन ५१ सरस्वती-मालती की रहःसंकथा ५५

( २ ) मालती का प्रस्थान, सरस्वती की उत्कण्ठा ५८ दधीच का आगमन और सरस्वती के साथ रहना ६० पुत्रोत्पत्ति के बाद सरस्वती का गमन ६१ सारस्वत और वत्स में स्नेह ६२ वात्स्यायन वंश के ब्राह्मण ६३ बाण के पूर्वज ६५ बाण और उसके साथी ६६ घुमक्कड़ बाण का अपने गांव लौटना ६९ द्वितीय उच्छ्वास (राजदर्शन) बाण द्वारा अपने गांव के घर में घूमना ७१ ग्रीष्म-समय-वर्णन ७३ कृष्ण के दूत मेखलक का आगमन और उसके द्वारा कृष्ण का संदेश सुनाना ७३ बाण का एकान्त में विचार करके निर्णय करना ८० बाण का तैयार होकर प्रीतिकूट से निकल पड़ना ९० मल्लेकूट और वनग्रामक पार करके राजद्वार पर पहुँचना, और राजद्वार का वर्णन ९२ प्रतीहार पारियात्र का वर्णन ९९ मन्दुरा और इभधिष्ण्यागार-वर्णन १०० दर्पशात हाथी का वर्णन १०४ सम्राट् हर्ष का वर्णन ११२ बाण की हर्ष से भेंट १२८ बाण और हर्ष की तीखी बातचीत और मेल १२९ तृतीय उच्छ्वास (राजवंशवर्णन) शरत्काल-वर्णन १३५ बाण का दरबार से अपने गांव लौटना १३७ गांव के भाई-बन्धुओं से परस्पर वार्तालाप १३८ पुस्तकवाचक सुदृष्टि द्वारा वायुपुराण का पाठ १४० बाण के भाइयों की हर्षचरित सुनाने के लिए उससे प्रार्थना १४२ दूसरे दिन बाण द्वारा हर्षचरित का आरम्भ १४३ श्रीकंठजनपद-वर्णन १५३

( ३ ) स्थाण्वीश्वर-वर्णन १५७ पुष्पभूति का वर्णन १६२ भैरवाचार्य का शिष्य १६६ भैरवाचार्य का वर्णन १६९ पुष्पभूति को भैरवाचार्य का कृपाण देना १७६ भैरवाचार्य की साधना १८२ पुष्पभूति का श्रीकंठनाग को परास्त करना १८५ लक्ष्मी का प्रसन्न होकर प्रकट होना और पुष्पभूति को वर देना १८७ भैरवाचार्य का विद्याधर-योनि को प्राप्त होना १९१ चतुर्थ उच्छ्वास ( चक्रवर्तिजन्मवर्णन ) पुष्पभूति के वंश में प्रभाकरवर्धन १९७ यशोमतीवर्णन १९९ यशोमती का स्वप्न देखना २०३ यशोमती के गर्भ से राज्यवर्धन की उत्पत्ति २०७ हर्ष की उत्पत्ति २०९ पुत्रजन्मोत्सव-वर्णन २१३ राज्यश्री का जन्म २२३ हर्ष का ममेरा भाई भण्डि २२४ मालवराज पुत्र कुमारगुप्त और माधवगुप्त २२९ राज्यश्री के विवाह की चिन्ता २३४ विवाह की तैयारियां २३६ ग्रहवर्मा का बरात लेकर आना २४३ ग्रहवर्मा द्वारा वधूमुखदर्शन २४५ विवाह और वासगृह में वर-वधू का आना २४७ पञ्चम उच्छ्वास ( महाराज-मरण-वर्णन ) युद्ध के लिए राज्यवर्धन का प्रयाण २५० हर्ष का बीच में ही मृगया के लिए रुक जाना २५१ दुःस्वप्न-दर्शन ,, दीर्घाध्वग कुरंगक का आगमन २५३ पिताजी की बीमारी का समाचार सुनकर हर्ष का लौटना २५४ शोकाकुल स्कन्धावार २५५

राजकुल में प्रवेश २५८ धवलगृह में प्रभाकरवर्धन की परिचर्या २५९ रुग्णावस्था में प्रभाकरवर्धन का वर्णन २६२ प्रभाकरवर्धन का पुत्र-प्रेम २६६ रसायन का पावक-प्रवेश २७१ राजभवन में अशुभ-सूचक महोत्पात २७३ बेलाप्रतीहारी का पहुँचकर हर्ष को यशोमती के सती होने की तैयारी की सूचना देना २७५ यशोमती सतीवेश में २७८ यशोमती के अन्तिम वाक्य २८१ हर्ष को प्रभाकरवर्धन की सान्त्वना २८६ प्रभाकरवर्धन की मृत्यु २८८ राजा की और्ध्वदैहिक क्रिया २९० हर्ष की चिन्ता २९० राजा की चिन्ता में भृत्य, मित्र, सचिवों का गृह-त्याग २९४ हर्ष को राज्यवर्धन की चिन्ता २९७ षष्ठ उच्छ्वास ( राजप्रतिज्ञावर्णन ) राज्यवर्धन का लौटना ३०२ राज्यवर्धन का हर्ष को समझाना और निर्वेद की बात करना ३०६ हर्ष का चिन्ता करना ३१० मालवराज द्वारा गृहवर्मा की मृत्यु और राज्यश्री को कारावास दिए जाने का समाचार ३१४ राज्यवर्धन का क्रोध करना और युद्ध के लिए प्रस्थान करना ३१४ हर्ष का दुःस्वप्न देखना ३१९ राज्यवर्धन के वध का समाचार ३२१ राज्यवर्धन का प्रचंड क्रोध ३२२ सेनापति सिंहनाद ३२५ सिंहनाद का उपदेश ३२७ हर्ष की दिग्विजयप्रतिज्ञा ३३५ हर्ष का प्रदोषस्थान और शयनगृह में जाना ३३७ गजसेना के अध्यक्ष स्कन्दगुप्त ३३९ स्कन्दगुप्त का राजाओं के छल-कपट का वर्णन करना ३४२ अपशकुन-वर्णन ३४८

( २ ) सप्तम उच्छ्वास ( छत्रलब्धि ) दण्डयात्रालग्न का निश्चय, ब्राह्मणों को दान देना ३५० छावनी में सैनिकप्रयाण की कलकल ३५३ सैनिक-प्रयाण से जनता को कष्ट ३६५ हर्ष द्वारा सेना का निरीक्षण ३७१ हंसवेग का आगमन ३७३ छत्र की विशेषता ३७४ छत्रवर्णन ३७५ भास्करवर्मा के भेजे हुए अन्य उपहार ३७७ हंसवेग द्वारा संदेश-कथन ३८२ सरकारी नौकरों पर फबतियाँ ३८६ भण्डि का आगमन ३९३ राज्यश्री का समाचार ३९५ राज्यश्री की खोज में हर्ष का प्रयाण और विन्ध्याटवी के समीप आ जाना ३९७ विन्ध्याटवी-वर्णन ३९७ अष्टम उच्छ्वास ( विन्ध्याद्रिनिवेशन ) हर्ष का विन्ध्याटवी में प्रवेश और आटविक सामन्त शरभकेतु ४०४ शबरयुवक निर्घात का वर्णन ४०४ निर्घात की हर्ष से बातें ४०७ विभिन्न वृक्षों का वर्णन ४०९ दिवाकरमित्र का वर्णन ४१३ दिवाकरमित्र द्वारा हर्ष का सत्कार ४१७ हर्ष द्वारा आगमन-प्रयोजन का निवेदन ४२१ एक भिक्षु द्वारा राज्यश्री की दशा का वर्णन ४२२ हर्ष का राज्यश्री के समीप जाना ४३१ स्त्रियों के आलाप " हर्ष का राज्यश्री से मिलन ४३५ दिवाकरमित्र द्वारा हर्ष को एकावली की भेंट ४३९ राज्यश्री को दिवाकरमित्र का उपदेश ४४४ राज्यश्री को हर्ष द्वारा सौंपना ४४९ सूर्यास्त-चन्द्रोदय-वर्णन ४५१

॥ श्रीः ॥ हर्षचरितम् 'संकेत' संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेतम् प्रथम उच्छ्वासः 'नमस्तुङ्गशिरश्चुम्बिचन्द्रचामरचारवे । त्रैलोक्यनगरारम्भमूलस्तम्भाय शंभवे ॥ १ ॥ ✤ संकेत: ✤ श्च्योतन्मदाम्बुभरनिर्भरचण्डगण्डशुण्डाग्रशौण्डपरिमण्डितभूरिभृङ्गान् । विघ्नानिवानवरतं चलगण्डतालैरुत्सारयन्नयति जातगुणो गणेशः ॥ शङ्करनामा कश्चिच्छ्रीमत्पुण्याकरात्मजो व्यलिखत् । शिष्टोपरोधवशतः सङ्केतं हर्षचरितस्य ॥ 'सर्वकर्माणि कुर्वीत प्रणिपत्येष्टदेवताम्' इति शिष्टाचारमनुपालयन् 'अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः । यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते ॥' इति काव्यलक्षणामपूर्वां सृष्टिं स्थिरां प्रवर्तयञ्छेोष कविः शिवं बहुशक्तियुतमपि नियत- शक्त्यात्मकमेव स्तौति—नमस्तुङ्गेत्यादिना। न क्वचित्प्रणतो यो मूर्धा तत्स्पर्शी चन्द्र एव सितबालतुल्यप्रभाप्रसरतया स्वेदादिविनाशाद्विशिष्टस्थानस्थितञ्च चामरम् । त्रैलोक्यमेव नानाभक्तिशोभित्वाद्नगरं तदारम्भे मूलस्तम्भः। नगरारम्भे हि मूलस्तम्भो भवति । तत्र च पट्टबन्धादिविदुल्लेखणानन्तरमुद्धते पृष्ठदेशे चन्द्रतुल्यं श्वेतं चामरं क्रियत इति स्थितिः । केचित्पुनः—त्रैलोक्यनगरस्यारम्भे मूलं मूलकारणं परमाणव- स्तेषामुपामयेण मूलकारणत्वात्स्तम्भ इव । ते हि तद्द्वारात्कार्यमारभन्ते । तस्य १. जीवानन्दपाठे प्रथमः श्लोकः— चतुर्मुखमुखाम्भोजवनहंसवधूर्म्मम । मानसे रमतां नित्यं सर्वशुक्ला सरस्वती ॥

२ हर्षचरितम् निमित्तकारणत्वादित्याहुः । 'स्वयंभूः शम्भुरादित्यः' इति नामसहस्रे दृष्टत्वाद्धरेः, 'शम्भू ब्रह्यत्रिलोचनौ' इत्यभिधानकोशदर्शनाच्च ब्रह्मणोऽपि नमस्कारोऽयमित्यन्ये वदन्ति । व्याकुर्वते च हरिपक्षे-त्रैलोक्याक्रमणकाले । यद्वा-'यस्याभिरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ मही' इत्यभिप्रायेण तुङ्गमूच्छितं चुलक्षणं यच्छिरस्तच्चुम्बि- चन्द्र एव चामरं तेन चारवे । ब्रह्मपक्षे-चन्द्रः स्वर्णं तन्मयं चामरमिव चामरं केशकलापः हिरण्यकेशो हि ब्रह्मा त्रैलोक्यादीनि सर्वत्र तृप्यसीति ॥ १ ॥ ❖ हिन्दीव्याख्या ❖ उन भगवान् शिव को मैं प्रणाम करता हूँ जिनके कहीं भी न झुकने वाले उन्नत मस्तक पर विराजमान चन्द्ररूपी चँवर की शोभा है, जो त्रिभुवनरूपी नगर के निर्माण- आरम्भ में मूलस्तम्भ के समान है ॥ १ ॥ हरकण्ठग्रहानन्दमीलिताक्षीं नमाम्युमाम् । कालकूटविषस्पर्शजातमूर्च्छागमामिव ॥ २ ॥ इत्यारिना । प्रियं प्रति गाढस्नेहादि सौकुमार्यं चोपमयोच्यते । कालकूटविषेति प्रशंसाद्यर्थः सामान्यपदप्रयोगो मेरुमहीधरचूतवृक्षादिवत् । आगमः प्रारम्भः ॥ २ ॥ उमा को प्रणाम करता हूँ, जिनकी आँखें शिव के कण्ठालिङ्गन के आनन्द से मूँद गई हैं, मानों शिव के गले में स्थित कालकूट विष के स्पर्श हो जाने से उन्हें तत्काल मूर्च्छा आ गई हो ॥ २ ॥ नमः सर्वविदे तस्मै व्यासाय कविबेधसे । चक्रे पुण्यं सरस्वत्या यो वर्षमिव भारतम् ॥ ३ ॥ संप्रत्युत्कृष्टकवित्वानिमानेन तादृशमेव कविवरं स्तौति-नमः सर्वेत्यादिना । सर्वा वेदादिका विद्या गीतादिकलाश्च वेत्ति यस्तस्मै । तदुक्तम्-'नासौ शब्दो न तद्वाच्यं न सा विद्या न सा कला । जायते यन्न काव्याङ्गमहो भारो महाकवेः ॥' इति कविरेव वेधाः । उक्तं च-'अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः' । कवीनां वेधाः । कविशब्दोऽत्रोपचारात्कविबुद्धिषु वर्तते । तेन कविबुद्धीनां श्रेष्ठ इत्यर्थः । तथा चाह मुनिः-'इतिहासोत्तमादस्माज्जायन्ते कविबुद्धयः' इति । यद्वा व्युत्पत्त्यु- त्पादनद्वारेण कवय एवंभूताः सन्तः क्रियन्ते । मुख्य एव कविशब्दस्यार्थः । यदुक्तम्-'इदं कविवरैः सर्वैराख्यानमुपजीव्यते' इति । पुण्यं पावनम् । यदुक्तम्- 'भारताध्ययनात्पुण्यादपि पादमधीयतः । श्रद्दधानस्य पूयन्ते सर्वपापानि देहिनः॥' इति । सरस्वती वाणी, तस्या लताया इव पुष्पादिहेतुत्वाद्वर्षं वृष्टिमिव । वर्ष वा स्थानविशेषः । यतोऽसौ तत्रास्ते । यदुक्तम्-'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न १. पाठान्तरम्-हरकण्ठग्रहानन्द । २. स्पर्शाञ्जात ।

तत्क्वचित्' । भरतानधिकृत्य कृतो ग्रन्थो भारतस्तम् । यद्वा—भारतं वर्षमिव । 'भरतः कश्चिद्राजा तस्य निवासं भारतं वर्षं भूभागैकदेशस्तद्विव । उक्तं च—'स्या- द्भूतधां लोकधाभ्यंशे वासरे वर्षमस्त्रियाम्' इति । यद्वा—भारतवर्षान्तस्था भावा मनुष्येषु सुलभास्तद्वन्महाभारतस्था सरस्वती । एतदपि सरस्वत्याख्यया पुण्यम् ॥३॥ वेदादि समस्त विद्याओं और कलाओं को जानने वाले और कवियों के प्रजापति सर्वज्ञ महर्षि व्यास को प्रणाम है, जिन्होंने अपनी वाणी से महाभारत को उस प्रकार पवित्र किया जैसे सरस्वती नदी ने सारे भारतवर्ष को ॥ ३ ॥ प्रायः कुकवयो लोके रागाधिष्ठितदृष्टयः । / कोकिला इव जायन्ते वाचालाः कामकारिणः ॥ ४ ॥ एवं सर्वज्ञतागुणकथनेन कविप्रशंसां कृत्वा काव्यप्रशंसामाह—प्राय इत्यादिना । काव्यमेतं नाम स्वभावसुभगम् । येनेदृशा अपि कवयः प्रायः प्राचुर्येण कोकिला इव जायन्ते वग्गुवाचः संपद्यन्ते, किं पुनः संविद्विद्वा न जायेरन् । कोचत्पुनर्भूयसा कुत्सिताः कवयो जायन्त इति कुकविनिन्देवैयमिति व्याख्यातवन्तः । रागो द्वेष- पूर्वकोऽनर्थाभिनिवेशस्तेनाधिष्ठिता दृष्टिर्बुद्धिर्येषाम् । वाचाला असम्बद्धप्रलापिनः । कामेन स्वेच्छया, न त्वलंकारकृतशितनीत्या, कुर्वन्ति ये ते । कोकिलपक्षे—कुकन्ति गृह्णन्ति चेतांसीति कुकाः, ते च ते वयो मयूरप्रवराः पक्षिणः; रागो लौहित्यम् । दृष्टिश्चक्षुः । वाचा भारत्या । आला आ समन्ताज्ज्ञान्यावर्जयन्ति यतस्तादृशाः सन्तः । कामं व्यसनं कुर्वन्ति तच्छीलाः । कामोद्दीपनविभावतां यान्तीत्यर्थः । यद्वा—अवाचालाः । अकारप्रश्लेषोऽत्र ॥ ४ ॥ लोक में प्रायः देखा जाता है कि राग-द्वेष की अकुशल भावनाओं से भरे हुए पर ऊपर से राग का प्रदर्शन करने वाले कोकिल के समान अनेक कुकवि उत्पन्न हो जाते हैं, जो मनमाना बकवास करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार नियमों की व्यवस्था का उल्लंघन करते हैं ॥ ४ ॥ / सन्ति श्वान इवासंख्या जातिभाजो गृहे गृहे । उत्पादका न बहवः कवयः शरभा इव ॥ ५ ॥ सन्तीत्यादि । असख्या अगणनार्हाः । जातिं स्वरूपवर्णनमात्ररूपां वक्रोक्ति- शून्यां भजन्ते । 'गतोऽस्तमको भातीन्दुर्यान्ति वासाय पक्षिणः' इत्यादिवत् । श्वानोऽप्यसंख्याः । नास्ति संख्या सङ्गामो येषां ते । जातिशब्देनात्र श्वाजातिसमवेता अमेध्यभक्षणाद्यो गृहीताः । यद्वा-श्वत्वं नाम जातिस्तत्प्रतिपादनं प्रयोनान्तर- १. मृतैर्वः । २. कामचारिणः ।

४ हर्षचरितम् शून्यतामावेदयति । उत्पादका नवनिर्माणकारिणः, ऊर्ध्वपादाश्च । शरभा हि प्राणि- भेदाः । अष्टपादा एते । सजातीया इति केचित् ॥ ५ ॥ कुत्तों के समान घर-घर में केवल जन्म लेने वाले कवि असंख्य हैं, जो स्वरूप मात्र का वर्णन करते हैं। शरभों के समान उत्पादक¹ अर्थात् नव-निर्माण करने वाले कवि जगत् में बहुत नहीं हैं ॥ ५ ॥ अन्यवर्णपरावृत्त्या बन्धचिह्ननिगूहनैः । अनाख्यातः सतां मध्ये कविश्चौरो विभाव्यते ॥ ६ ॥ अन्वेति । कविश्चौरः सहृदयानां मध्येऽनाख्यातः कथितोऽपि न ज्ञायते । न आ समन्तात्ख्यातः, अपि तु किञ्चित्प्रथितो वा । अन्ये पूर्वकविनिबद्धविलक्षणा ये वर्णा अक्षराणि तेषां रचनेन बन्धचिह्नं श्रीलक्ष्मीप्रभृतिरचनालिङ्गम् । अन्ये तु भाषा- लंकारप्रभृतिबन्धचिह्नमाहुः । अथ च सतां साधूनां मध्ये चौरो लक्ष्यते । कीदृक् ? न ना अना कापुरुषः, आख्यातोऽप्रसिद्धः । केन ? अन्यः प्राक्तनच्छायाव्यतिरिक्तच्छा- सकृतः पाण्डिमादिवर्णो मुखरागविशेषस्तत्परिवर्तनेन । यद्वा-शूद्रत्वे सति द्विजा- तिवर्णाश्रयेण । स्वजात्युचितस्य स्वभावस्य त्यक्तुमशक्यत्वाद्भावप्रकटनमवश्यमेव भवति । यतो बन्धः शृङ्खलादिकृतो ग्रन्थिस्तच्चिह्नं त्वग्दूषणादि ॥ ६ ॥ सहृदय जनों के बीच अप्रसिद्ध कवि दूसरे कवि के वर्णों को बदल देने से एवं निर्माण के चिह्नों को छिपाने से चोर समझा जाता है, क्योंकि चोर भी लोगों के बीच मुख के अकस्मात् फीके पड़ जाने से और हाथों पर लगे हुए बेड़ी के दागों को छिपाने से पहचान लिया जाता है ॥ ६ ॥ श्लेषप्रायमुदीच्येषु प्रतीच्येष्वर्थमात्रकम् । उत्प्रेक्षा दाक्षिणात्येषु गौडेष्वक्षरडम्बरम् ॥ ७ ॥ श्लेषेत्यादि । मात्रकपदेन श्लेषयमकाद्यलंकारशून्यत्वं दर्शयति । अक्षरेत्यादिनार्थ- विशेषाभावं प्रसादादिगुणगुम्फनाभावं चाख्याति । एतदुक्तं भवति—क्वचित्कश्चि- द्गुणोऽपि भवति । स च भवन्नपि न सहृदयजनावर्जक इति । अमुनैवाभिप्रायेण नव इत्यादीनि प्रत्येकं विशेषणपदानि वक्ष्यति ॥ ७ ॥ उत्तरी क्षेत्र के कवियों की रचना श्लेष-प्रधान होती है । पश्चिमी क्षेत्र के कवि प्रधान रूप से अर्थाडम्बर में लगे रहते हैं । दाक्षिणात्य कवि उत्प्रेक्षा करने में निपुण होते हैं और गौड़देशीय (प्राच्य) कवियों की रचना में अक्षरमात्र का प्राचुर्य रहता है ॥ ७॥

१. उठे पैरों वाले । शरभ एक प्राणी है जिसके आठ पैर होते हैं और सब ऊपर की ओर उठे रहते हैं । १. डम्बरः ।

प्रथम उच्छ्वासः ५ नवोऽर्थो जातिरग्राम्या¹ श्लेषोऽक्लिष्टः स्फुटो रसः । विकटो²ऽक्षरबन्धश्च कृत्स्नमेकत्र दुष्करम् ॥ ८ ॥ नव इत्यादि । नव आद्यैः कविभिरनिबद्धः, चमत्कारी च । जातिः स्वभावोक्तिः । अग्राम्येति । न तु 'गतोऽस्तमर्कः' इत्यादिरूपा । सधर्मेषु तन्त्रप्रयोगः श्लेषः । अक्लिष्टः सम्यगनेकार्थप्रतिपादनक्षमः । स्फुटो दुर्बोधभङ्गथादिभिरदूषितः । रसः शृङ्गारादिः । विकट उदारतालक्षणबन्धगुणयुक्तः । यत्र सति नृत्यन्तीव पदानि प्रतिभासन्ते ॥ ८ ॥ नवीन अर्थ जिसे अबतक किसी कवि ने नहीं लिखा हो, अर्थात् चमत्कारी, अग्राम्य जाति अर्थात् स्वभावोक्ति, बिना माथापच्ची के ही समझ में आ जाने वाला श्लेष, सुबोध रस एवं आकर्षक शब्दों का संचयन-इन सब गुणों का एकत्र किसी काव्य में होना कठिन है ॥ ८ ॥ किं कवेस्तस्य काव्येन सर्ववृत्तान्तगामिनी । कथेव भारती यस्य न व्योप्नोति³ जगत्त्रयम् ॥ ६ ॥ किमित्यादि । वृत्तानि वर्णमात्रागणसमार्धसमविषमरूपाणि तदन्तगमनं तद्वि- रचनक्षमत्वम् । भारती वाणी । व्याप्नोति । अदृष्टमपि दृष्टमिव जगत्त्रयं प्रतिभानव- शाद्युत्प्रेक्षेत तथात्वेन प्रकाशयति । यद्वा-जगत्त्रयप्रथिता भवतीति स्फुट एवार्थः । भरतानधिकृत्य प्रथिता भारती कथेव । सापि सर्वे ये वृत्तान्ताः सत्पुरुषचरितान्यु- पाख्यानानि च तान्नामयति बोधयति । तथा सर्वत्र ज्ञेया भवति । तथा च- 'नारदोऽश्रावयद्देवानसितो देवलः पितॄन् । गन्धर्वयक्षरक्षांसि श्रावयामास वै शुकः ॥' इत्युक्तम् ॥ ९ ॥ उस कवि के काव्य से क्या, जिसकी वाणी सब प्रकार के वृत्तान्तों वाली महाभारत की कथा के समान तीनों जगत् में व्याप्त नहीं होती ॥ ९ ॥ उच्छ्वासान्तेऽप्यखिन्नास्ते येषां वक्त्रे सरस्वती । कथमाख्यायिकाकारा न ते वन्द्याः कवीश्वराः ॥ १० ॥ अधुना स्वगुरुतः स्वप्रभृतिभिः कृतानाख्यायिकादीन्काव्यभेदान्स्तुवन्ननौद्धत्यार्थं सर्वत्र नमस्कारमाह-उच्छ्वासान्त इति । उच्छ्वास इवोच्छ्वासो विश्रान्तिस्थानं सर्गा- दिवत्कथासन्धिरतस्यान्तेऽप्यखिन्ना उच्छ्वासान्तरकरणक्षमाः । अविच्छिन्नप्रतिभाना इति यावत् । गुरुत्वाद्वहुवचनम् । 'नान्द्यन्ते शम्भुधैर्यक्रम' इति वक्रलक्षणम् । वक्त्रे सरस्वती । वृत्तविशेषयोगिनीत्यर्थः । एतस्मिन्नाख्यायिकाकृद्भिर्भाविवस्तुसंसूचनाय वाग्विरच्यते । तथा चाह भामहः- 'वक्रं चापरवक्रं च काव्ये काव्यार्थशंसिनि' १. अग्राम्याः । २. विकटो । ३. प्रामोति दिगन्तरम् ।

६ हर्षचरितम्

इति। आख्यायिकाः कुर्वन्तीत्याख्यायिकाकाराः। यद्वा—आख्यायिकैवाकारो येषाम्। अथ 'कविं पुराणम्' इति न्यायेन कवयश्च त ईश्वरा हरिहरब्रह्माणः। उच्छ्वसन्ति भूतान्यस्मिन्नित्युच्छ्वासः कल्पस्तदन्ते संहारेऽपि तेऽखिन्नाः कल्पान्तर- जननोद्योगिनस्तेषां मुखे वागीशी। उक्तं च—'सरस्वतीवाग्बलमुत्तमोऽनिलः' इत्यादि। आख्यायिकाभिराख्यानैराकारो येषाम्। सर्वस्य हि शास्त्रागमसमधि- गम्याः, न पुनः प्रत्यक्षलक्ष्याः। ते च वन्द्याः सर्वस्य ॥ १० ॥ जो उच्छ्वास के बाद भी नहीं थकते और जिनके मुख में सरस्वती विराजमान हैं ऐसे आख्यायिकाओं के निर्माण करने वाले कवि क्यों नहीं वन्दनीय हैं ? ॥ १० ॥ कवीनामगलद्दर्पो नूनं वासवदत्तया। शक्त्येव पाण्डुपुत्राणां गतया कर्णगोचरम् ॥ ११ ॥ कवीनामिति। वासवदत्ता कथा, वासवेन शक्रेण दत्ता च। कर्णः श्रवणं, राधेयश्च। कवीनां काव्यकर्तॄणां, द्रोणादीनां च ॥ ११ ॥ निश्चय ही कवियों का अभिमान सुबन्धु की रचना 'वासवदत्ता' के कानों तक पहुँचते ही उस प्रकार चूर्ण हो गया जिस प्रकार इन्द्रद्वारा प्राप्त शक्ति नामक अस्त्र विशेष को कर्ण के पास देखते ही द्रोण आदि का गर्व बिलकुल नहीं रहा ॥ ११ ॥ पदबन्धोज्ज्वलो हारी कृतवर्णक्रमस्थितिः। भट्टारहरिचन्द्रस्य गद्यबन्धो नृपायते ॥ १२ ॥ पदेत्यादि। पदानां सुप्तिङन्तानां बन्धः प्रकृष्टा रचना। रीतिरित्यर्थः। स्वम- ण्डललावण्यमश्च। हारी हृद्यः, हारयुक्तश्च। अहारीति वा। न कस्यचिदपि यो हरति। कृता वर्णानामक्षराणां क्रमेण भामहादिप्रदर्शितनीत्या स्थितिरवस्थानं यत्र; कृत- युगवर्द्धर्णानां द्विजादीनां क्रमेण मन्वादिस्मृतिकारप्रकाशितमार्गेण स्थितिः पालनं यस्मिन्सतीति च। भट्टारेति पूजावचनम् ॥ १२ ॥ आर्य हरिश्चन्द्र द्वारा निर्मित गद्यकाव्य राजा के समान है, उसमें शब्दों की रचना निर्मल है, वह मनोहर है एवं उसमें आलंकारिकों के मतानुसार अक्षरों की एक क्रम से संघटना है ॥ १२ ॥ अविनाशिनमग्राम्यमकरोत्सातवाहनः। विशुद्धजातिभिः कोशं रत्नैरिव सुभाषितैः ॥ १३ ॥ अविनाशिनमित्यादि। अविनाशिनं प्रसिद्धम्, अनश्वरं च। अग्राम्यं वैदग्ध्ययुक्तम्, १. पुत्रस्य । २. पदबद्धोज्ज्वलो हारिकृतकण्ठक्रमस्थितिः । ३. पद्य । ४. कुविनाशिनम् ।

अग्राम्यभावं च । जातिः स्वभावोक्तिरूपोऽलङ्कारः। कोशः समुच्चयः, गञ्जश्च। सुभाषितैः सूक्तिभिः, शोभनं च भाषितं प्रभाववर्णनं येषां तैः ॥ १३ ॥ सातवाहन ने निर्दोष गुणालङ्कारयुक्त सुभाषितों का एक संग्रह तैयार किया जो विशुद्ध जाति के रत्नों के कोष के समान कभी विनष्ट नहीं होने वाला, वैदग्ध्यपूर्ण हुआ ॥ १३॥ कीर्तिः प्रवरसेनस्य प्रयाता कुमुदोज्ज्वला । सागरस्य परं पारं कपिसेनेव सेतुना ॥ १४ ॥ कीर्तिरिन्यादि । प्रवरसेनः कश्चित्कविः प्रवे प्लुते रसो येषां ते प्रवरसा वानरा- स्तेषामिनः स्वामी, प्रवरा च सेना यस्य स सुग्रीवश्च । कुमुदवत्कैरववत् । यद्वा- कुभूमिस्तस्या मुत् प्रहर्षस्तयेति, कुमुदेन वानरसेनापतिना च । सेतुः प्राकृतका- व्यग्रन्थः, सेतुश्च ॥ १४ ॥ प्रवरसेन नामक कवि की कुमुद के समान उज्ज्वलकीर्ति सेतु (बन्ध) नामक प्राकृतकाव्य के द्वारा समुद्र को पार कर गई, जैसे वानरों की सेना सेतु के द्वारा समुद्र पार पहुँच गई थी ॥ १४ ॥ सूत्रधारकृतारम्भैर्नाटकैर्बहुभूमिकैः । सपताकैर्यशो लेभे भासो देवकुलैरिव ॥ १५ ॥ सूत्रेत्यादि । सूत्रधारः पूर्वरङ्गस्य प्रवक्ता चार्चिक्यः, स्थपतिश्च । भूमिकाः पात्राणि रामाद्यनुकार्यावस्थाभूमयः, उपभोगनिमित्तान्युत्पत्तिस्थानानि । पताका अर्थप्रकृतिः । उक्तं च—‘बीजं बिन्दुः पताका च प्रकरी कार्यमेव च । अर्थप्रकृतयो ह्येताः पञ्च सर्वप्रयोगगाः ॥’ इति । ‘यद्वृत्तं तु परार्थं स्यात्प्रधानस्योपकारकम् । प्रधानवच्च कल्पेत सा पताकेति कीर्त्यते ॥’ इति वैजयन्ती च पताका ॥ १५ ॥ भास ने देवमन्दिरों के समान अपने नाटकों से लोक में ख्याति प्राप्त की जिनका आरंभ सूत्रधार करता, जिनमें पात्रों की भूमिकायें (अवस्था) और सहायक कथायें (पताका) रहतीं ॥ १५ ॥ निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु । प्रीतिर्मधुरसान्द्रासु मञ्जरीष्विव जायते ॥ १६ ॥ निर्गतास्विति । निर्गता उच्चारितमात्राः । आस्तां तावदर्थावगतिः, आपात एव गीतध्वनिवत्किमपि श्रोत्रहारिण्यः । यदुक्तम्—‘अपर्यालोचितेऽप्यर्थे बन्धसौन्दर्य- संपदा । गीतवद्धृदयाह्लादं तद्विदां विदधाति यत् ॥ तत्काव्यम्’ इत्यादि । तथा निर्गताः सर्वदेशप्रतीताः, अन्यत्र—निर्गता अभिनवोद्भिन्नाः न वा कस्येत्यनेनैत- १. भूषिकैः । २. भासा । ३. निसर्गसूरवंशस्य ।

८ हर्षचरितम् दुक्तम् । आस्तां तावत्काव्यतत्त्वविदः सहृदया विवेक्तारः, येऽपि शास्त्राप्रहितबुद्धयो दुरूढमत्सरप्रायास्तेषामपि या हृदयंमाह्लादयन्ति । तथा चोक्तम्—‘असुणिअ परमंथान वि हरेह वाआमहाणं कइम्मांण । आणाणजकुवलभवणमलद्धगंधाण वि सुहाइ ॥’ इति । मधुराश्च ताः सान्द्राः सरसाः । अन्यत्र-मधुना मकरन्देन किंज- ल्केन रसेन सान्द्राः सुगन्धयः ॥ १६ ॥ नई उकसी हुई मंजरियों के समान मधुर एवं सरस कालिदास की सूक्तियों में उच्चारणमात्र से ही किसे नहीं आनन्द आता ? ॥ १६ ॥ समुद्दीपितकंदर्पा कृतगौरीप्रसाधना । हरलीलेव नो कस्य विस्मयाय बृहत्कथा ॥ १७ ॥ समुदित्यादि । बृहत्कथा कस्य न विस्मयाय । अपि तु सर्वस्यैव गर्वविनाशाय भवतीत्यर्थः । अद्भुतकथावर्णनादाश्चर्याय । समुद्दीपितो वृद्धिं नीतः कंदर्पो यस्याम् । कामजननानां बहूनां वृत्तान्तानां वर्णनादुद्बोधितः स्मरो ययेति वा । काव्यसेवया हि शृङ्गाररसः समुद्भवति । तथा चोक्तम्—‘ऋतुमाल्यालंकारप्रिय- जनगान्धर्वकाव्यसेवाभिः । उपवनगमनविहारैः शृङ्गाररसः समुद्भवति ॥’ यद्वा- समुद्दीपितः प्रकाशितः ख्यातिं नीतः कन्दर्पो नरवाहनदत्तो यस्यामिति । स हि कामांश इत्यागमः । कृतं गौर्या विद्याभेदस्याराधनं यस्याम् । सा हि नरवाहनद- त्तेनेक्षारूपाराधितेति तत्रोक्तम् । यद्वा-गौरीं प्रति पूरयति गौरीप्रः । साधनं परि- करबन्धो यथाप्रस्तावो यस्याम् । गौरीप्रेरितेन हि हरेण तथा तस्यां परिकरबन्धः कृतो यथा सातीव पिप्रिये । हरलीलापि समुत् सहर्षा, दग्धकामा च । कृतं गौर्याः प्रसाधनं मण्डनं यस्याम् । क्व कामं प्रति तादृग्द्वेषः, क्व च कान्तां प्रति प्रसाधन- मिति कृत्वा विस्मयमाश्चर्यम् ॥ १७ ॥ जैसे कामदेव को जलाकर भस्म करना और पार्वती का श्रृङ्गार करना आदि परस्पर विरुद्ध बातों से शिव की लीला किसे नहीं विस्मित करती, उसी प्रकार वर्णनों द्वारा कन्दर्प (कामदेव या नरवाहनदत्त) को प्रकाशित करने वाली एवं पार्वती के प्रति आराधना से युक्त (गुणाढ्य की) बृहत्कथा किसे नहीं विस्मय-विमुग्ध करती ? ॥ १७ ॥ आढ्यराजकृतोत्साहैर्हृदयस्थैः स्मृतेरपि । जिह्वान्तःकृष्यमाणेव न कवित्वे प्रवर्तते ॥ १८ ॥ आढ्येति । आढ्यराजः कश्चित्कविः । उत्साहो नृत्ते तालविशेषः । उदीर्यमाण- गीत्याधारभूतपदोपचारात्काव्यमप्युत्साह इति केचित् । यत्र पूर्वं श्लोकेनार्थ उपक्षि- प्यते, पश्चात्स एव गद्येन वितन्यते, मध्ये वृत्तनिबन्धश्च भवति, स परिसमाप्तार्थ १. आध :

उत्साह उच्यत इत्यन्वे । अपिः समुच्चये । यद्वा—आढ्यराजहृदयस्य अप्यन्तर्जिह्वां नाकर्षयन्ति, तत्कथं त एव स्मृता इत्यपिशब्दार्थः ॥ १८ ॥ आढ्यराज के उत्साह या महान् कार्य को हृदयस्थ करके स्मरण करने पर मानों मेरी जीभ मुँह के भीतर की ओर ही खिंची जा रही है और कविता करने में प्रवृत्त नहीं हो रही है । निष्कर्ष यह कि आढ्यराज के सामने मैं कवि बनने का साहस नहीं कर पा रहा हूँ ॥ १८ ॥ तथापि नृपतेर्भक्त्या भीतो निर्वहणाकुलः । करोम्याख्यायिकाम्भोधौ जिह्वाप्लवनचापलम् ॥ १६ ॥ एवमनौद्धत्यमुक्तवाह—तथेत्यादि । तथापीत्थं जानन्नपि जिह्वाप्लवनलक्षणं चापलं करोमि । यतो नृपतेर्भक्त्याहमभि इतः समन्ताद्युक्तः । निर्वहणे समाप्तावाकुलः । जिह्वा चाब्धावकालवातस्तत्र वहन्यां कश्चिद्यथा प्लवनरूपं चापलं करोति । अत्र पक्षे—अभीतोऽग्रस्तः । निर्वहणं पारप्राप्तिः । 'कृत्ये च' इति णत्वम् ॥ १९ ॥ ऐसा जानता हुआ भी मैं सम्राट् के प्रति अपने असाधारण अनुराग से प्रेरित होकर आख्यायिका रूपी समुद्र को पार करने में आकुलता और भय का अनुभव करते हुए भी अपनी जीभ (अर्थात् वाणी द्वारा) के चप्पू द्वारा तैरने की चपलता कर रहा हूँ ॥१९॥ सुखप्रबोधललिता सुवर्णघटनोज्ज्वलैः १ । शब्दैराख्यायिका भाति शय्येव प्रतिपादकैः ॥ २० ॥ सुखेत्यादि । सुखेन जायासम्मितत्वेन हृदयाह्लादनपूर्वम् , न तु वेदेतिहासादि- वत् , यः प्रबोधः प्रकृष्टं बोधनं धर्मादिसाधनव्युत्पत्तिः । उक्तं च—'कटुकौषधिव- त्काव्यमविद्यामयाधिभेषजम् । आह्लादमृतवत्काव्यमविवेकगदापहम् ॥' इति । सुवर्ण- घटना शोभनाक्षररचना । प्रतिपादकैर्विवक्षिताभिधायकैः । शय्यापक्षे—सुखं यः प्रबोधः स्वापाद्युत्थानम् । सुवर्णघटना हेमयोजन। प्रतिपादकैः खट्वाया उत्तामकैः । तदा पादानां प्रतिच्छन्दाः प्रतिपादकाः पुरुषयत्नोत्थापिताः पादमुद्रास्तैः । अत्र च शोभनो वर्णोऽलक्तादिकृतः ॥ २० ॥ बिना किसी प्रयास के सुखपूर्वक समझ में आ जाने से सुन्दर लगने वाली और आकर्षक रचना वाले एवं विवक्षित अर्थ को व्यक्त करने वाले शब्दों से आख्यायिका उस शय्या के समान शोभित है जिसपर सुखपूर्वक नींद तोड़ी जाती है और जो सोने से मढ़े पावों से चमकती है ॥ २० ॥ जयति २ ज्वलत्प्रतापज्वलनप्राकारकृतजगद्रक्षः ३ । सकलप्रणयिमनोरथसिद्धिश्रीपर्वतो हर्षः ॥ २१ ॥ १. घटनोज्ज्वला; घटिनोज्ज्वला । २. जयत्युज्ज्वलत्प्र; जयज्ज्वलत्प्र । ३. प्रकार ।

१० हर्षचरितम् इदानीं वसुद्विष्ट्येवमाख्यायिका क्रियते तस्य 'तथापि नृपतेर्भक्त्या' इत्यनेन नृपतिशब्देन सामान्येन निर्देशं कृत्वा विशेषेणाह-जयतीत्यादि । ज्वलन्दीप्रतया प्रसरन्, प्रताप एव ज्वलनस्तं प्राति पूरयति य आकारस्तेन कृता जगति रक्षा येन सः । सकलानां प्रणयिनां ये मनोरथास्तत्सिद्धौ श्रियां पर्वतो गिरिः । श्रियस्तत्र कूटीभूता इव स्थिता इति यावत् । यद्वा-यथा पर्वतस्थः कश्चिद्दुरभिभवः, तद्वद- वस्था श्रीरिति । अथ च श्रीपर्वताख्यो गिरिरीदृगेव । तथा च ज्वलत्प्रकृष्टतापो यो ज्वलनो जठराग्निः स एव निषेधकत्वात्प्राकारः सालस्तेन कृता मुक्तेर्विघ्नहेतुतया जगतो भूलोकस्य रक्षा येन सः । अन्यत्रोत्सादनं तथावत् । अन्ये तु-त्रिपुरदाहे यो विघ्नमकरोद्द्द्रोणेशस्तदा हरेण ज्वलत्प्रकृष्टतापो ज्वलनप्राकारो निर्मितः । तेन च तत्र रक्षा विधीयत इत्याहुः । ज्वलत्प्रतापो ज्वलनप्राकारश्च द्वौ मुद्रारूपौ मन्त्रवि- शेषौ स्तः, ताभ्यां कृतजग्रक्ष इति केचित् । प्रणयिनः सिद्धिकामाः । हर्षः कथा- नायकः । इतरत्र-हर्षकारितया हर्षः । सर्वत्र च परमार्थतो हर्ष एव जयति । तस्यैवाभिलषणीयत्वात्स एव काव्येन क्रियत इति ध्वनयति ॥ २१ ॥ सम्राट् हर्ष की विजय हो, जो सारे जगत् की रक्षा चारों ओर प्रज्वलित प्रतापाग्नि की दीवार बनाकर करते हैं और जो समस्त प्रियजनों के मनोरथ सिद्ध करने में श्रीपर्वत के सदृश हैं ॥ २१ ॥ एवमनुश्रूयते-पुरा किल भगवान्स्वलोकमधितिष्ठन्परमेष्ठी विका- सिनि पद्माविष्टरे समुपविष्टः सुनासीरप्रमुखैर्गीर्वाणैः परिवृतो ब्रह्मोद्याः कथाः कुर्वन्नन्याश्च निरवद्या विद्यागोष्ठीर्भावयन्कदाचिदासञ्चक्रे । तथा- सीनं च तं त्रिभुवनप्रतीच्यं मनुदक्षचाक्षुषप्रभृतयः प्रजापतयः सर्वे च सप्तर्षिपुरःसरा महर्षयः सिषेविरे । केचिदृचः स्तुतिचतुराः समुदचा- रयन् । केचिदपचितिभाञ्जि यजूंष्यपठन् । केचित्प्रशंसासामानि सामानि जगुः । अपरे विवृतक्रतुक्रियातन्त्रान्मन्त्रान्व्याचचक्षिरे । विद्या- विसंवादकृताश्च तत्र तेषामन्योन्यस्य विवादाः प्रादुरभवन् । एवमिति । अनुश्रूयते पारम्पर्येणाकर्ण्यते । किलेत्यत एवागमसूचनाय । भग- वानिति केवलनिर्देश उल्लुण्ठनपरिहारार्थम् । ब्रह्मलोकमित्युक्ते सत्युत्कर्षदायिन्या- त्मीयताप्रतिपत्तिर्न स्यादिति स्वग्रहणं साभिप्रायम् । अधितिष्ठन्बहुमानेन तद्योग- क्षेमादिकमुद्वहन् । परमे पदे तिष्ठतीति परमेष्ठी । विकासिनीति नित्ययोग इनिः । १. शुनासीर । २. गीर्वाणगणैः । ३. ब्रह्मोदिताः । ४. महामुनयः । ५. अपि विभाजि । ६. सामानि । ७. विततक्रतु० । ८. विद्याविवादाः ।

प्रथम उच्छ्वासः १९ विष्टरमासमम् । सुनासीर इन्द्रः । गिरः स्तुतिरूपा वर्णन्ति भजन्तीति गीर्वाणा देवाः । गीरेव बाणः शरो येषामिति वा, परिवृतश्चतुर्दिकं वृतः परिवलितः । तस्य चतुर्मुखत्वात् । ब्रह्म वदन्तीति ब्रह्मोद्याः । 'वदः सुपि क्यप् च' । ब्रह्मण वेद्रेन, ब्रह्मणि परमात्मनि वा वेदितव्या ब्रह्मोद्याः । उक्तं च—'ब्रह्मोद्या सा कथा यस्या- मुच्यते ब्रह्म शाश्वतम्' इति । सामान्यविशेषभावेन 'उद्वासिकामासते' इतिवत् । ब्रह्मवदनरूपा वा कथास्तासां वक्ष्यमाणगोष्ठ्यभिप्रायेण प्राधान्यात्स्वयं करणम् । निरवद्या दोषरहिताः । तथा च वात्स्यायनः—'या गोष्ठी लोकविद्विष्टा या च स्वैर- विसर्पिणी । परहिंसात्मिका या च न तामवतरेद्बुधः ॥ लोकचित्तानुवर्तिन्या क्रीडा- मात्रैककार्यया । गोष्ठ्या सह चरन्विद्वाँल्लोकसिद्धिं नियच्छति ॥' समानविद्या- वित्तशील बुद्धिवयसामनुरूपैरालापैरकत्रासनबन्धो गोष्ठी । प्रतीचयः पूज्यः सम्य- गुदात्तादित्रैस्वर्यादिप्राधान्यादुच्चारयञ्जगुः । अपचितिः पूजा । सामानि जगुरिति साम्नां गानमेवोचितम् । विद्याविसंवादकृता इति, न तु मात्सर्यादिना । प्रादुर्भ्रूव- क्षित्यनौचित्यशङ्कया तत्कर्तृत्वपरिहारः । ऐसा सुना जाता है—बहुत पहले की बात है, भगवान् ब्रह्मा अपने ब्रह्मलोक में शासन कर रहे थे। किसी समय विकसित कमल के आसन पर विराजमान हो इन्द्रप्रमुख देवताओं के बीच घिरे हुए शाश्वत ब्रह्म के विषय में चर्चा कर रहे थे और अन्य दोष-रहित विद्यागोष्ठियों में भाग ले रहे थे । उस प्रकार अपने आसन पर बैठे हुए तीनों लोकों के पूजनीय भगवान् ब्रह्मा की सेवा में मनु, दक्ष, चाक्षुष आदि प्रजापति और सप्तर्षि आदि महर्षि संलग्न थे। उनमें कुछ ने बड़ी स्पष्टता के साथ स्तुतिप्रधान ऋचाओं का पाठ किया। कुछ ने पूजन के यजुर्वेदीय मंत्र पढे । कुछ ने प्रशंसामूलक सामों का गान किया। अन्य लोगों ने यज्ञक्रियाओं के उपयोग में आने वाले मंत्रों की व्याख्या की। वहां उन लोगों के बीच मत-मतान्तर को लेकर परस्पर विद्याविषयक विवाद उठ खड़े हुए । अथातिरोषणः प्रकृत्या महातपा मुनिरत्रस्तनयस्तारापतेर्भ्राता नाम्ना दुर्वासा द्वितीयेनोपमन्युनाम्ना मुनिना सह कलहायमानः साम गायन्क्रो- धान्धो विस्वरमकरोत् । सर्वेषु च तेषु शापभयंप्रतिपन्नमौनेषु मुनिष्व- न्यालापलीलया चांवधीरयति कमलसंभवे भगवती कुमारी किंचिदुन्मु- क्तबालभावे भूषितनवयौवने वयसि वर्तमाना, गृहीतचामरप्रचलद्भुजलता पितामहमुपवीजयन्ती, निर्भर्त्सनताडनजातरागाभ्यामिव स्वभावारुणा- १. मन्द। २. सामगायः । ३. शापभयात्प्र । ४. अवधीरयति । ५. नवे वयसि । ६. स्वभावारुणपाद ।

भ्यां पादपल्लवाभ्यां समुद्रासमाना, शिष्यद्वयेनेव पदक्रममुखरेण नूपुर- युगलेन वाचालितचरणयुगला, धर्मनगरतोरणस्तम्भविभ्रमं बिभ्राणा जङ्घाद्वितयं^१, सलीलमुक्तकुलहंसकुलकेलालापप्रलापिनि मेखलादाम्नि^३ विन्यस्तवामहस्तकिसलया, विद्वन्मानवनिवासलग्नेन गुणकलापेनेवाँ- सावलम्बिना ब्रह्मसूत्रेण^५ पवित्रीकृतकाया, भास्वन्मध्यनायकमनेकमु- क्तानुयातमपवर्गमार्गमिव हारमुद्वहन्ती, वदनप्रविष्टसर्वविद्यालक्तकरसेनेव पाटलेन^७ स्फुरता दशनच्छदेन विराजमाना, संक्रान्तकमलासनकृष्णाजि- नप्रतिमां मधुरगीताकर्णावतीर्णशशिहरिणामिव कपोलस्थलीं दधाना, तिर्यक्सावर्त्तङ्गुभ्रमितैकभ्रूलता, श्रोत्रमेकं विस्वरश्रवणकलुषितं प्रक्षाल- यन्तीवापाङ्गर्निगतेन लोचनाश्रुजलप्रवाहेणेतरश्रवणेन च विकसितसि- तसिन्धुवारमञ्जरीजुषा हसतेव प्रकटितविद्यामदा, श्रुतिप्रणयिभिः प्रण- वैरिव कर्णावतंसकुसुमधुकरकुलैरुपास्यमाना, सूक्ष्मविमलेन प्रज्ञाप्रता- नेनेवांशुकनाच्छादितशरीरा^१३, वाङ्मयमिव निर्मलं दिक्षु दशनज्योत्स्ना- लोकं विकिरन्ती^१४ देवी सरस्वती श्रुत्वा जहास । प्रकृत्येति । अन्यथा ब्रह्मसन्निधानेन कथमौहाक्षेपः । कथमौदृशोऽवकाश इत्याह—महातपा इति । मुनिरित्यनेनास्य ज्ञानप्राधान्यात्तद्व्यतोऽशासनमतीवो- पकारः। अत्रेस्तनय इति न केवलं महातपस्त्वेन यावदत्रितनयत्वेन ब्रह्मलोकप्राप्ति- रस्य । ततस्तारापतेरित्यादिना तथाभूतपरमप्रजापतिसम्बन्धयोग्यत्वमस्याख्यायते। द्वितीयेनेति तत्समत्वमुच्यते । कथं सामगानेऽप्यनवहित इत्याह—क्रोधान्ध इति । सर्वेष्वित्यादौ देवी सरस्वती श्रुत्वा जहासेति क्रियाप्रतिपत्तिरस्य मा भूदित्यु- त्तमप्रकृतिरत्वादन्त्येत्याद्युक्तम् । अन्येन सह्ालापलीलाकथाक्रीडया । कुमारीति । कुमारित्वेनास्या [हास्यादिकं नानुचितमिति दर्शयति । भूषितेत्यनेन दर्शनीयत्व- माह-पितामहमिति । सर्वप्राधान्यमनेनोक्तम् । निर्भर्त्सनं ताडनं तेन तदर्थं वा यत्ता- डनं रोषाद्भूमिहननं तद्वशाच्च जातरागाभ्यामिव पादपल्लवाभ्यामित्यनेनारुणत्वं सौकु- मार्यं चाह। अत एव गाढताडनेन रक्तत्वमुल्लेखितम् । ताडितो वा यं ताडितस्तत्तुल्यो

१. द्वितीयम् । २. कुलकल; कुलाकलापप्र । ३. धाम्नि । ४. नेवांशाव । ५. सहजब्रह्म । ६. हारमुरसासमु । ७. पाटलेनेव च । ८. साममधुर; समम; प्रतिबिम्बां मधुर । ९. सावर्णमु । १०. तीवाह्विनि । ११. सिन्दु । १२. संसक्तमधु; वतंसमधु । १३. तनुलता । १४. किरन्ती ।

प्रथम उच्छ्वासः १३ रागो जातो ययोरिति व्याख्येयम् । पदक्रमं पादन्यासपरिपाटी । अन्यत्र च-पदानि च क्रमश्च तत्पदक्रमम्, चरणौ पादौ चरणाश्च विशिष्टशाखापाठकता वाचालिताः शोभिता ययेति । उल्का उत्सुकाः । मेखलादाम्नि रशनागुणे । मानसं चित्तं, सरोवि- शेषश्च । गुणा अपि भास्वान्दीप्तो मध्यनायकः पदकं यत्र तत् । अथ च भास्वतो मध्यं तेन नयति सः । यदुक्तम्-‘परिव्राड्योगयुक्तश्च शूरश्चाभिमुखे हतः । द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनौ ॥' इति । मुक्ता मौक्तिकानि, मोक्षगामिनश्च । हारं मुक्ता- कलापं च, अपवर्गमपि ।' हारं हरसम्बन्धिनं तत्प्रसादप्राप्यत्वात् । 'अलक्तरसेनेव पाटलेन' इति वा पाठः । स्फुरतेति रोषात् । भगवतीकपोले शशिहरिणस्यैवावतारः सम्भाव्यत इति शशिपदम् । अत्र हि कपोले ब्रह्मकृष्णाजिनसंक्रान्तिः, तत्र काम- सम्भावना सामान्यहरिणस्यावतरणे । कलुषितं प्रक्षालयन्तीवेति । सलिलस्य क्षालन- मेव युक्तमिति समुचितेयमुक्तिः । श्रुतिप्रणयिभिरिति । श्रूयते इति श्रुतिर्ध्वनिस्तस्या प्रणयः प्रशंसातिशयो येषां तैः । यद्वा-श्रुती श्रोत्रे तत्कर्तृकः प्रणयः प्रार्थना मधुर- ध्वनित्वाद्येषां तैः । कर्णसम्बन्धैरिति व्याख्याने तु कर्णावतंसेत्यादिना पौनरुक्त्यम- परिहार्यम् । श्रुतिर्वेदोऽपि । सूक्ष्मार्थदर्शित्वात्सूक्ष्मस्तीक्ष्णः विमलस्तत्त्वग्राही । अन्यत्र-सूक्ष्मं तनु, विमलं शुक्लम् । प्रतानः प्रसारः । इसी बीच स्वभाव से अत्यन्त क्रोधी, महातपस्वी, अत्रि का पुत्र, तारापति का भ्राता दुर्वासा नाम का मुनि उपमन्यु नाम के दूसरे मुनि के साथ झगड़ा कर बैठा और सामगान करते हुए क्रोध से अन्धे होकर उसने स्वर-भंग कर दिया । शाप न दे दे इस डर से सबके सब चुप हो गए और दूसरों के साथ बात करने के बहाने ब्रह्माजी ने भी (उस विस्वर सामगान की) उपेक्षा की । पर कुमारी सरस्वती वहीं उपस्थित थी । वह कुछ कुछ अपना बालभाव छोड़ नये यौवन को सुशोभित करने वाली उम्र में आ पहुँची थी । चँवर पकड़ कर भुजलता को हिलाते हुए पितामह ब्रह्माजी पर झल रही थी । दुर्वासा के प्रति झुंझलाहट के कारण भूमि पर पटकने से मानो लाल हुए पल्लव के समान स्वाभाविक लाल अपने चरणों से शोभित थी । पदन्यास से मुखरित होने वाले नूपुरों से उसके दोनों चरण वाचाल हो रहे थे, मानों पदपाठ और क्रमपाठ के अभ्यास में मुखर दो शिष्य अपने चरण अर्थात् शाखा का स्वाध्याय कर रहे हों । उसकी दोनों जांघें धर्मनगर के तोरणस्तम्भ का अनुकरण कर रही थीं । उत्सुक कलहंस की भांति अव्यक्त शब्द करती हुई अपनी करधनी (मेखलादाम) पर वह लीला के साथ किसलयसदृश अपना बायां हाथ रखे हुए खड़ी थी । विद्वानों के चित्त में हमेशा निवास करने से संक्रान्त हुए गुणों (श्लेष से तन्तुओं) के समान कंधे पर लटके हुए ब्रह्मसूत्र से उसका शरीर पवित्र हो रहा था । वह चमकते हुए मध्यमणि से युक्त और अनेक मोतियों से गुम्फित हार को पहने थी, जो सूर्य के मध्य से के जाने वाले और अनेक मोक्षगामी जीवों द्वारा

१४ हर्षचरितम् अनुसृत मोक्षमार्ग की तरह प्रतीत हो रहा था। मुख में विद्यमान समस्त विद्याओं के चरण के आलते से मानों पाटल हुए (क्रोध से) फड़कते ओठ उसे सुशोभित कर रहे थे। उसके कपोलों पर ब्रह्माजी के काले मृगचर्म की छाया पड़ रही थी, मानों उसके मीठे गानों को सुनने के लिए चन्द्रमा का मृग ही वहाँ उतर कर आ गया हो। उसकी एक भौंह कुछ तिरस्कार का भाव लिए हुए टेढ़ी और ऊपर की ओर उठी हुई थी। आँख के कोने से निकलते हुए आँसू की धारा से मानों वह भ्रष्ट पाठ के श्रवण करने से कलुषित अपने एक कान को धो रही थी और उसके दूसरे कान पर खिले हुए श्वेत सिन्धुवार की मंजरी हँस रही थी जिससे उसका विद्यामद प्रकट हो रहा था। उसके कान पर लगे कनकफूल पर भौंरे छाए हुए थे, मानों वह श्रुति (वेद) से प्रेम करने वाले अनेक प्रणवों (ओं अक्षरों) से उपासित हो रही थी। प्रज्ञा के प्रतान की तरह बहुत बारीक तन्तुओं से बना और उज्ज्वल अंशुक उसका शरीर ढँक रहा था। वह वाग्द्व्य के समान निर्मल अपने दाँतों से चाँदनी का आलोक दिशाओं में छिटका रही थी। (दुर्वासा के स्वरहीन पाठ को) सुन कर वह हँस पड़ी। दृष्ट्वा च तां तथा हसन्तीं स मुनिः 'आः पापकारिणि, दुर्गृहीतविद्या- लवावलेपदुर्विदग्धे, मामुपहससि' इत्युक्त्वा शिरःकम्पशीर्यमाणबन्धविश- रारोरुन्मिषत्पिङ्गलिम्नो जटाकलापस्य १ रोचिषा २ सिञ्चन्निव रोषदहन- द्रवेण दश दिशः, कृतकालसंनिधानामिवान्धकारितललाटपट्टाष्टापदा- मन्तकान्तः ४ पुरमण्डनपत्रभङ्गमकरिकां भ्रुकुटिमाबध्नन् , अतिलोहितेन चक्षुषामर्षदेवतायै स्वसृधिरोपहारमिव प्रयच्छन् , निर्दयदष्टदशनच्छ- दभयपलायमानामिव वाचं रुन्धन्दन्तांशुच्छलेन, अंसावंसंसिनः शापशासनपट्टस्येव प्रध्नन्ग्रन्थिमन्यथा कृष्णाजिनस्य, स्वेदकणप्रति- बिम्बितैः शापशङ्काशरणागतैरिव सुरासुरमुनिभिः प्रतिपन्नसर्वावयवः, कोपकम्पतरलिताङ्गुलिना करेण प्रसादनलग्नामक्षरमालामिवाक्षमाला- माक्षिप्य कामण्डलवेन वारिणा संमुपस्पृश्य शापजलं जग्राह। दृष्ट्वेत्यादौ। स मुनिस्तां तथा हसन्तीं दृष्ट्वा शापजलं जग्राहेति सम्बन्धः। तथेति १. जटासञ्चयस्य। २. शोचिषा। ३. ललाटाष्टापदां । ४. अन्तक मण्डन । ५. अंससंसिनः। ६. स्वेदप्रति। ७. शापभयाच्छरण । ८. प्रसादलग्नामक्षमालां विक्षिप्य; अङ्करावस्थितामिवाक्षरमाला। ९. स समुप।