हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
प्रथम उच्छ्वासः ३१ अथ इति पदेन धावनक्रियासहत्वाज्जलस्य ग्रहणं सूच्यते । अत एव धवलाः शुक्लाः पयोधरा मेघा यस्यास्ताम् । इतरत्राधोधावमानाः पयःपूर्णत्वाल्लम्बमानाः क्षीरयुतेश्च धवलाः स्तना यस्याः । अधो धावमानं वेगेन प्रसरद्धवलं पयो धारयति या ताम्, अधो धावमानो धवलो यः पयोधो वत्सस्तं राति ददाति या ताम्, धवलो वृष- स्तस्मै पयो धारयति या तां वेत्यादिकाः कुव्याख्या एव । उद्धुर उद्भटः । अन्धक- मथनः शिवः । आलीयमानाः श्लिष्यन्तः । वालखिल्या मुनिभेदाः । रोधस्तटम् । त्वङ्गत्तरत् । आप्लवनं स्नानम् । पितरो देवविशेषाः, आज्यपाः, सोमपाः, वहिर्षा- दयश्च । आचमनेत्यादिना पितामहवन्न स्नानादिनिष्ठत्वमस्योच्यते । अत एव शची- पदेन संभोगासक्तत्वमिव पोषितम् । निकायः समूहः । सुषुम्णाख्योऽमृतमयो रवि- रश्मिः । धिषणो बृहस्पतिः । सिद्धकृतत्वेन लिङ्गेषु भगवत्संनिधानमावेद्यते । निर्मोकः सर्पकञ्चुकः । विस्रंसतया शुक्लत्वेन, लहरिकावलीत्वेन च निर्मोकमुक्तिमिवेत्युत्प्रेक्षा । गगनमिवोरगः कृष्णतया । ललाटिका ललाटालंकारः । विटो भुजङ्गः । उष्णीषं शिरोवेष्टनं दिक्षु प्रसिद्धम् । दुगूलशब्दो दुकूलसमानार्थः । पद्धतिर्मार्गः । अपवर्गो मोक्षः । कृतयुगस्य रचितयुगकाष्ठस्य रथस्येत्यर्थः । यथा नेमिवशाद्रथग्रहणं तथा तद्गुणात्कृताख्यस्य युगस्य । सप्तसागरराजः क्षीरसमुद्रः । चन्द्राख्यः पर्वत इति केचित् । शशिमणिश्चन्द्रकान्तः । पितामहस्येति । तद्भक्त्या तदाश्रयणम् । सिकता विद्यन्ते यस्य स सिकतिलः । मत्तशब्देन सशब्दत्त्वम्, वेणीपदेन च तन्त्रीसन्निवेश- सादृश्यमाह । वेणी पङ्क्तिः । लिङ्ग्यतेऽनेनेति लिङ्गमाकारः । पञ्च ब्रह्माणि सद्योजातः, वामदेवः, अघोरः, तत्पुरुषः, ईशानश्चेति । मुद्राबन्धो विशिष्टकराङ्गुलिसन्निवेशः । ध्रुवाख्या विशिष्टा गीतिः । वनं तोयम् । यजमान उग्रः । अष्टौ पुष्पाण्येवाष्टपु- प्पिका । तत्र गन्धप्रधानं पार्थिवम्, अर्घस्नानादिकं रसप्रधानमाप्यम्, प्रदीपा- भरणप्रभादिरूपप्रधानं तैजसम्, अनुलेपनप्रभृति स्पर्शप्रधानं वायवीयम्, सुषिरा- तोद्यगीतादिकं शब्दप्रधानमाकाशीयम्, अनुध्यानं मानसम्, अस्ति सर्वत्रेश्वर इति निश्चयो बौद्धम्, अहमेवेश्वर इत्याहंकारिकम् । यद्वा,-आसनवर्गप्रवृत्तिष्वष्टसु प्रत्ये- कमष्टपुष्पिका । अतिशेतुमभिभवितुमिच्छतातिशिशयिषमाणेण । स्वादिम्ना बृह- त्वेन । शरीरस्थितिमिति । न त्वातृप्तिभोजनम् । अन्येद्युरन्यस्मिन्नहनि । तब क्रम से सरस्वती सात सागरों की पटरानी मंदाकिनी का अनुसरण करती हुई मर्त्यलोक में उतरी । वह मंदाकिनी ध्रुव से निकली हुई कामधेनु के समान नीचे लटकते हुए पयोधरों को धारण कर रही थी । उसकी ध्वनि गम्भीर थी । वह अंधक के शत्रु भगवान् शंकर के मस्तक की मालतीमाला थी । तट पर वालखिल्य मुनियों की भीड़- भाड़ थी । अरुन्धती वहाँ वल्कल का संमार्जन करती थी । उसकी दौड़ती हुई ऊँची लहरों पर चंचल तारे हिलोरेँ ले रहे थे । उसकी रेतों को तापस अपने तरु तिलोदक से
३२ हर्षचरितम् पुलकित कर रहे थे। स्नान से पवित्र ब्रह्मा जी द्वारा पितरों के लिए लुढ़काए गए पिण्डों से उसका तट उज्ज्वल हो रहा था। पास में सोये सप्तर्षियों को कुश-शय्या से सूचित हो रहा था कि उन्होंने यहाँ सूर्यग्रहण के अशौच का उपवास किया है। आचमन से पवित्र होकर इन्द्र द्वारा भेंट किए गए पूजा के फूलों से वह विविध वर्ण वाली हो रही थी। शिवपुर से गिरी मंदारमाला को वह धारण कर रही थी। आयास के बिना ही उसने मन्दराचल की कन्दराओं के चट्टान तोड़ डाले थे। अनेक दिव्याङ्गनाओं के कुचकलशों से (आहत होकर) वह डोल रही थी। घड़ियालों और चट्टानों पर निपात होने से उसके प्रवाह मुखर हो उठते थे। सूर्य की अमृत-मय रश्मिसुषुम्णा के कण, जो चन्द्रमा से उत्पन्न होते हैं, मन्दाकिनी के तीर पर तारों की तरह बिछ गए थे। बृहस्पति के यज्ञ से उत्पन्न धुवाँ नदी की रेत को धुआँसा कर रहा था। सिद्धों द्वारा बनाए गए बालू के शिवलिंग का अकस्मात् लंघन हो जाने से उत्पन्न त्रास के कारण विद्याधर इधर-उधर छट- पटा रहे थे। मानों वह मंदाकिनी गगन-सर्प की उज्ज्वल लहराती हुई केंचुल हो, त्रिभुवन- रूपी विट (धूर्त) की लीला-ललाटिका (ललाट का अलंकार) हो, पुण्यरूप सौदे की बाजार-गली हो, नरक रूपी नगर के द्वार को बन्द करने वाली भागल (अर्गला) हो, सुमेरु पर्वत रूपी राजा की अंशुक नामक महीन वस्त्र की उष्णीष (पगड़ी) पर बंधी हुई लम्बी पाट हो, कैलास रूपी हाथी की रेशमी पताका हो, मोक्ष का मार्ग हो, सतयुग के रथ की धुरा हो। आकाश में उतरी हुई सरस्वती ने भगवान् पितामह के अपत्य हिरण्य- वाह नामक महानद को देखा जो वरुण देवता के हार के समान था, जो चन्द्र-पर्वत से झरता हुआ अमृत-निर्झर के समान था, जो विन्ध्य पर्वत से बहता हुआ चन्द्रकान्त मणि के प्रवाह के सदृश था, जो दण्डकारण्य के कर्पूर वृक्ष से बहते हुए कपूरी प्रवाह के समान था। दिशाओं के लावण्यरस का वह जैसे सोता था। मानों वह आकाश लक्ष्मी के शयन के लिए गढ़ा हुआ स्फटिक का शिलापट्ट (पाटा) हो। वह महानद स्वच्छ, शिशिर और सुरस (स्वादिष्ट) जल से भरा था, उसे लोग शोण भी कहते हैं। शोण को देख कर सरस्वती का हृदय उसकी रमणीयता में रम गया और उसने वहीं डेरा डाला। उसने सावित्री से कहा—'सखी, इस महानद के तटवर्ती कछार में मोर मधुर ध्वनि करते हैं। वृक्षों के नीचे फूलों की रज बालू की तरह ढेर हो जाती है। फूलों की गन्ध से मतवाले भौंरे वीणा के समान गुंजार कर रहे हैं। इसके सामने मन्दाकिनी भी कुछ नहीं। मेरा मन यहाँ रम रहा है, मेरा हृदय भी इसी स्थान में रहने के पक्ष में है।' सावित्री ने 'तथा' कह कर सरस्वती की बात का समर्थन किया। तब सरस्वती उसे लेकर उस महानद के पश्चिमी तीर पर उतरी। वहीं एक पवित्र शिलातल से युक्त लतामण्डप को घर मान कर ठहर गई। कुछ देर तक विश्राम करने के बाद उठी और सावित्री के साथ पूजा के फूल चुन कर स्नान किया। तब उसने नदी के किनारे रेत में बैठ कर बालू का शिवलिंग प्रतिष्ठित किया और पद्मब्रह्म की स्तुति के अनन्तर सम्यक् प्रकार से कई
प्रथम उच्छ्वासः ३३ मुद्राबंध किए और ध्रुवागीति के साथ पृथिवी, वायु, जल, आकाश, अग्नि, सूर्य, चन्द्र और यजमानमयी शिव की आठ मूर्तियों का देर तक ध्यान करती हुई आठ फूलों को अर्पित किया। किसी यत्न के बिना ही मिले हुए अमृत-रस से भी बढ़ कर मीठे फल- फूल से और शोण के ठण्डे जल से उसने शरीर की रक्षा मात्र के लिए अत्यल्प भोजन किया। इस प्रकार उस दिन को बिता उसी लतामण्डप के शिलातल पर पत्तों की सेज बनाकर लेट गई। दूसरे दिन इसी क्रम से उसने रात-दिन गुजारे। एवमतिक्रामत्सु दिवसेषु गच्छति च काले याममात्रोद्गते च रवा- वुत्तरस्यां ककुभि प्रतिशब्दपूरितवनगह्वरं गम्भीरतारतरं तुरङ्गहेषित- ह्रादमशृणोत् । उपजातकुतूहला च निर्गत्य लतामण्डपादिवलोकयन्ती विकचकेतकीगर्भपत्रपाण्डुरं रजःसङ्घातं नातिदवीयसि संमुखमापतन्तम- पश्यत् । क्रमेण च सामीप्योपजायमानाभिव्यक्ति तस्मिन्महति शफ- रोदरधूसरे रजसि पयसीव मकरचक्रं प्लवमानं पुरः प्रधावमानेन, प्रलम्बकुटिलकचपल्लवघटितललाटजूटकेन, धवलदन्तपत्रिकाद्युतिहसि- तकपोलभित्तिना, पिनद्धकृष्णागुरुपङ्ककल्कच्छुरणकृष्णशबलकषायकञ्चु- केन, उत्तरीयकृतशिरोवेष्टनेन, वामप्रकोष्ठनिविष्टस्पृष्टहाटककटकेन, द्विगुणपट्टपट्टिकागाढग्रन्थिग्रथितासिधेनुना, अनवरतव्यायामकृतकर्कश- शरीरेण, वातहरिणयूथेनेव मुहुर्मुहुः खमुड्डीयमानेन, लङ्घितसमविषमा- वटविटपेन, कोणधारिणा, कृपाणपाणिना, सेवागृहीतविविधवनकुसुम- फलमूलपर्णेन, 'चल चल, याहि याहि, अपसर्पापसर्प, पुरः प्रयच्छ पन्थानम्' इत्यनवरतकृतकलकलेन युवप्रायेण, सहस्रमात्रेण पदातिज- नेन सनाथमश्ववृन्दं संददर्श । यामः प्रहरः । नक्तंदिनशब्देन तत्कालनिवर्तनीयं कर्मैव लक्ष्यते । गम्भीरश्चिर- कालस्थितः । तारतरो दूरदेशश्रूयमाणः । हेषितमश्वशब्दः, तद्रूपो ह्रादो ध्वनि- स्तम् । क्रमेणेत्यादावश्ववृन्दं संददर्शेति संबन्धः । शफरा मत्स्याः । तदुदरवत्तैश्च धूसरे । प्रलम्बेत्यादिना सज्जात्वमुक्तम् । कचाः केशाः । सौकुमार्यात्पल्लवानीव । घटितललाटजूटा दाक्षिणात्येषु वेषः । दन्तपत्रिका कर्णाभरणभेदः । पिनद्धो बद्धः । कृष्णागुरुणः पङ्को निर्धृष्टं कृष्णागुरुः, तस्य शुष्कस्य सतः कल्कश्चूर्णः, तच्छुरणा- त्कृष्णेन गुणेन शबलं कषायं साधिवासितं कञ्चुकं वारबाणं यस्य । उत्तरीयेत्यादिना। सज्जतां वर्मादिप्रसङ्गं चाह । वामेत्यनेनाश्रमित्वस्वभाववर्णना शृङ्गारिता चोक्ता । 'प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादरत्निमणिबन्धयोः' । हाटकं स्वर्णम् । यदेव द्विगुणाऽत एव ३ ह०
३४ हर्षचरितम् गाढग्रन्थिसहस्रम् । ग्रथिताविस्रंसिनी । असिधेनुश्छुरिका । वातहरिणो यो वाता- भिमुखं धावति । अवट उन्मार्गः । कोणो लगुडः । इस तरह कई दिन कट गए, समय बहुत चला गया । एक रोज एक पहर दिन चढ़ गया, तब सावित्री को उत्तर दिशा की ओर घोड़ों की हिनहिनाइट भरी आवाज सुन पड़ी, वह अपने शब्दों से वन की घांधियों को भर रही थी और अत्यन्त गम्भीर एवं तीखी थी । सरस्वती के मन में कुतूहल हुआ तो लतामण्डप से निकल आई और उसने सामने थोड़ी ही दूर पर खिले हुए केवड़े के पत्तेदार गर्भ के समान सफेद उड़ती हुई धूलराशि को देखा । क्रम से जब वह और भी समीप आ गई तो मछली के पेट के समान धूसर वर्ण वाले उस धूलि-पटल में एक सहस्र प्रायः युवकों की पैदल सेना के साथ घोड़े इस तरह चलते हुए दिखाई पड़े मानों जल में झुण्ड के झुण्ड मगर तैर रहे हों । पैदल सेना के वे हजार जवान आगे की ओर दौड़ते आ रहे थे। उनके सिर पर लम्बे और घुँघराले बालों का बँधा हुआ जूड़ा था । उनके कपोलों पर हाथीदाँत के बने पत्ते हँसी की चमक उत्पन्न कर रहे थे। वे काले अगुरु की बुंदकियों के छींटे वाले लाल रंग के कंचुक कसे हुए थे । उन्होंने अपने सिर पर चादर की पगड़ी बाँध ली थी । उनके बाएँ हाथ की कलाइयों में सोने के कड़े थे। उनकी कमर में कपड़े की दोहरी पेटी की मजबूत गाँठ थी और उसमें छुरी खोंसी हुई थी । निरन्तर व्यायाम करने से उनका बदन पतला, पर गठा हुआ था । हवा से बात करने वाले हिरनों की तरह वे मानों आकाश में उड़ते चल रहे थे । वे ऊबड़- खाबड़ जमीन, खाइयों और झाड़ियों को डाँकते जाते थे । कुछ सैनिक मुँगरी या डंडे लिए थे और कुछ के हाथ में तलवारें थीं । सहायता के लिए उन्होंने बनैले फूल, फल, मूल और पत्ते ले लिए थे । 'चलो चलो', 'जाओ जाओ', 'बढ़ो बढ़ो', 'आगे रास्ता दो' इस तरह हमेशा वे शोर-गुल मचा रहे थे । मध्ये च तस्य सार्धचन्द्रेण मुक्ताफलजालमालिना विविधरत्नखण्ड- खचितेन शङ्खक्षीरफेनपाण्डुरेण क्षीरोदेनेव स्वयं लक्ष्मीं दातुमागतेन
- गगनगतेनातपत्रेण कृतच्छायम्, अच्छाच्छेनाभरणद्युतीनां निवहेन दिशामिव दर्शनानुरागलग्नेन चक्रवालेनानुगम्यमानम्, आनितम्बविल- म्बिन्या मालतीशेखरस्रजा सकलभुवनविजयार्जितया रूपपताकयेव विराज मानम्, उत्सर्पिभिः शिखण्डखण्डिकापद्मरागमणोरुणैरंशुजालैरदृ- श्यमानवनदेवताविधूतैर्बालपल्लवैरिव प्रमृज्यमानमार्गरेणुपरुषवपुषम्, बकु- लकुङ्मलमण्डलीमुण्डमाला मण्डनमनोहरेण कुटिलकुन्तलस्तबकमालिना मौलिना मीलिततातपं पिबन्तमिव दिवसम्, पशुपतिजटामुकुटमृगाङ्कद्वि- तीयसकलघटितस्येव सहजलक्ष्मीसमालिखितस्य ललाटपट्टस्य मनःशि-
[Header] प्रथम उच्छ्वासः ३५
लापङ्कपिङ्गलेन लावण्येन लिम्पन्तमिवान्तरिक्षम्, अभिनवयौवनारम्भा- वष्टम्भप्रगल्भदृष्टिपाततृणीकृतत्रिभुवनस्य चक्षुषः प्रथिम्ना विकचकुमुद- कुवलयकमलसरःसहस्रसंछादितदशदिशं शरदभिव प्रवर्तयन्तम्, आय- तनयननदीसीमन्तसेतुबन्धेन ललाटतटशशिमणिशिलातलगलितेन कान्तिसलिलस्रोतसेव द्राघीयसा नासावंशेन शोभमानम्, अतिसुरभि- सहकारकर्पूरकक्कोललवङ्गपारिजातकपरिमलमुचा मत्तमधुकरकुलकोला- हलमुखरेण मुखेन सनन्दनवनं वसन्तमिवावतारयन्तम्, आसन्नसुहृ- त्परिहासभावनोत्तानितमुखमुग्धहसितैर्दर्शनज्योत्स्नास्नपितदिङ्मुखैः पुनः- पुनर्नभसि संचारिणं चन्द्रालोकमिव कल्पयन्तम्, कदम्बमुकुलस्थूलमु- क्ताफलयुगलमध्याध्यासितमरकतस्य त्रिकण्टककर्णाभरणस्य प्रेङ्खतः प्रभया समुत्सर्पन्त्या कृतसकुसुमहिरितकुन्दपल्लवकर्णावतंसमिवोपलक्ष्यमाणम्, आमोदितमृगमदपङ्कलिखितपत्रभङ्गभास्वरम्, भुजयुगलमुद्दाममकराक्रा- न्तशिखरमिव मकरकेतुकेतोः दण्डद्वयं दधानम्, धवलब्रह्मसूत्रसीम- न्तितं सागरमथनसामर्षगङ्गास्रोतःसंदानितमिव मन्दरं देहमुद्वहन्तम्, कर्पूरक्षोदमुष्टिक्षुरणपांशुलेनेव कान्तोच्चकुचचक्रवाकयुगलविपुलपुलिनेनो- रःस्थलेन स्थूलभुजायामपुञ्जितम्, पुरा विस्तारयन्तमिव दिक्कचक्रम्, पुरस्तादीपद्धोनाभिनिहितकङ्कणकमनीयेन पृष्टतः कक्ष्याधिकक्षिप्तपल्ल- वेनोभयतःसंवलनप्रकटितोरुत्रिभागेन हारीतहरिता निबिडनिपीडितेनाध- रवाससा विभज्यमानतनुतरमध्यभागम्, अनवरतश्रमोपचितमांसकठि- नविकटकरमुखसंलग्नजानुभ्यामतिविशालवक्षःस्थलोपलवेदिकोत्तम्भन- शिलास्तम्भाभ्यां चारुचन्दनस्थासकस्थूलतरकान्तिभ्यामूरुदण्डाभ्यामुप- हसन्तमिवैरावतकरायामम्, अतिभरितोरुभारवहनखेदेनेव तनुतरजङ्घा- काण्डम्, कल्पपादपपल्लवद्वयस्येव पाटलयोरुभयपार्श्वावलम्बिनः पाद- द्वयस्य दोलायमानैर्नखमयूखैरश्वमण्डनचामरमालामिव रचयन्तम्, अभि- मुखमुखैरुद्ध्वद्भिरतिचिरमुपरिविश्राम्यद्भिरिव वलितविकटं पतद्भिः खुरैः खण्डितभुवि प्रतिक्षणदशनविमुक्तखणखणायतखरखलीने दीर्घघ्राणली- नलालिके ललाटलुलितचारुचामीकरचक्रके शिञ्जानशातकौम्भायानशो-
१. अतिभरितोरुभागमर ।
द्वितीय उच्छ्वास: बाण का राजदरबार गमन व सम्राट हर्ष भेंट
३६ हर्षचरितम्
भिनि मनोरंहसि गोलाङ्गूलकपोलकालकायलोम्नि नीलसिन्धुवारवर्णे वाजिनि महति समारूढम्, उभयतः पर्याणपट्टश्लिष्टहस्ताभ्यामासन्नप- रिचारकाभ्यां दोधूयमानधवलचामरिकायुगलम्, अग्रतः पठतो बन्दिनः सुभाषितमुत्कण्टकितकपोलफलकेन लग्नकर्णोत्पलकेसरपद्मशकलेनेव मुखशशिना भावयन्तम्, अनङ्गयुगावतारमिव दर्शयन्तम्, चन्द्रमयी- मिव सृष्टिमुत्पादयन्तम्, विलासप्रायमिव जीवलोकं जनयन्तम्, अनु- रागमर्यामिय सर्गान्तरमारचयन्तम्, शृङ्गारमयमिव दिवसमापादयन्तम्, रागराज्यमिव प्रवर्तयन्तम्, आकर्षणामञ्जनमिव चक्षुषोः, वशीकरणम- न्त्रमिव मनसः, स्वस्थावेशचूर्णमिवेन्द्रियाणाम्, असंतोषमिव कौतुकस्य, सिद्धयोगमिव सौभाग्यस्य, पुनर्जन्मदिवसमिव मन्मथस्य, रसायनमिव यौवनस्य, एकराज्यमिव रामणीयकस्य, कीर्तिस्तम्भमिव रूपस्य, मूल- कोशमिव लावण्यस्य, पुण्यकर्मपरिणाममिव संसारस्य, प्रथमाङ्कुरमिव कान्तिलतायाः, सर्गाभ्यासफलमिव प्रजापतेः, प्रतापमिव विश्रमस्य, यशःप्रवाहमिव वैदग्ध्यस्य, अष्टादशवर्षदेशीयं युवानमद्राक्षीत् । vv
मध्य इत्यादौ । तस्य च मध्येऽष्टादशवर्षदेशीयं युवानमद्राक्षीदिति सम्बन्धः । क्षीरोदस्याप्यर्थचन्द्रादि सर्वं योज्यम् । छाया कान्तिर्वा । चक्रवालेम समूहेन । नितम्बशब्दो मुख्यार्थः । 'पश्चाग्नितम्बः स्त्रीकट्याः' इत्यमरः । ^२शिखण्डखण्डिका चूडाभरणम् । प्रमृज्यमानेति । वर्तमानकालोऽत्र विवक्षितः । बकुलेत्यादिना निपी- यमानात्तपतुह्यवस्तुनिर्देशः । कुन्तलः केशहस्तः, स एव स्तबकः । पुष्पस्तबकः पुष्पसंघातः । सहजाऽकृत्रिमा, सहोत्पन्ना च । लक्ष्मीः शोभना, श्रीश्च । लावण्यमत्र कान्तिः । अवष्टम्भो गर्वः । द्राघीयसा दीर्घतरेण । सहकारः सुगन्धद्रव्यभेदः सह- कारफलेनैव क्रियते । पारिजातकोऽनेकद्रव्यसंस्कृतो मुखवासविशेषः, देववृक्षश्च । वसन्तश्चैवंविधेनैव मुखेन प्रारम्भेनोपलक्षितो भवति । रत्नत्रितयेन कृतं त्रिकोणक- ण्टकाख्यं कर्णाभरणम् । मृगमदः कस्तूरिका । संदानितं बद्धम् । वेष्टितमित्यर्थः । कुचावत्र कान्तासंबन्धिनावेव चक्रवाकयुगलं तस्य कृते पुलिनसदृशम् । कोणः पल्लवः । पृष्ठतः पश्चाद्भागे कक्ष्यायाः परिवलनादधिकस्रुतिरित्युक्तः । क्षिप्तो लम्ब- मानः पल्लवो यस्य तत् । संवलनं संकोचनम् । हारीतः पक्षिभेदः । हरिता नीलेन । मकरमुखं जानुनोरुपरिभागः । उत्तम्भनं धारणम् । स्थासकश्चन्द्रकः । आयामो दैर्घ्यम् । न केवलमायामं शुक्लत्वमप्युपहसन्तम् । धर्मयोरकनिर्देशोऽन्यसंविस्सा-
१. मार्गान्तरमानयन्तं । २. शाखंडेन्दुचूडामरणं.
हर्च्यत् । 'अनिर्भरतोरूभारवहनेन' इति पाठः । ऊरू एव भारः । प्रशस्ता जङ्घा जङ्घाकाण्डम् । कल्पपादपसम्बन्धितया न केवलं लौहित्यं सौकुमार्याद्युच्यते । याव- =सकलसंपत्फलप्रदत्वादिप्रकर्षान्तरम् । अतिचिरमित्यादिनानाकुलत्वमुच्यते । यद्यु- कम्—'आवृताः कुञ्चिताः स्थूलदलपाल्यग्रसंस्थिताः । विवर्ज्याश्चाकुलपदन्यासेन गमनेन च ॥' इति । विकटं चित्रम् । सुरैरिति । तद्व्यापारवैचित्र्याद्बहुत्वमग्रिमयो- रेव । एवंविधसंनिवेशसंभवात् । खलीनं कविका । लालिका कविकाशेखरम् । आयानं हयमण्डनमाला । गोलाङ्गूलः कृष्णमुखो वानरः । नीलेत्यादौ कुमुदकुन्दमृणालगौर इत्यादिवन्न पौनरुक्त्यम् । महतीति । उक्तं च—'सर्वलक्षणहीनोऽपि महाकायः प्रशस्यते' इति । आसन्नेत्यनेन विश्वसनीयत्वमुक्तम् । अनङ्गयुगेति । अनङ्गजन्मना यदुपलक्षितं युगं कालविशेषस्तस्य नूतनमदनसादृश्यात् । यद्वा-अनङ्गयोर्युगं तद- वतारमिव । द्वित्वसंख्यापूर्वकत्वात् । चन्द्रमयीमिवेति कान्तिमयत्वेन । आकर्षणाञ्जनं वशीकरणार्थं कज्जलम् । अमृतलेपमिवेति । यस्यैनं प्राप्य कौतुकं न निवर्तते, नस्य संतोष एव नास्ति । केषांचिदेव द्रव्याणां संबन्धी यो न कदाचित्कार्ये व्यभि- चरति स सिद्धयोगः । सौभाग्यं तावत्सर्वं किंचन वशीकुरुते, एवं चास्य तदेव सिद्धयोग इव तदाश्रयेण निःशेषलोकवशीकरणक्षमत्वम् । जन्मदिवसमिति । तद्गो- चरपतितानां कामोत्पत्तेः । रसायनमिवेति । यथा रसायनवशात्कश्चित्परिपूर्णश्च स्थिरश्च भवति, तद्वदेतदाश्रयेण यौवनम् । ईषदसमाप्तोऽष्टादशवर्षोऽष्टादशवर्षदे- शीयस्तम् । न परेण संश्लिष्टस्तुरङ्गो यस्य तम् । दधीचस्य तु पर्याणश्लिष्टायुक्तम् । परिणतवयस्त्वेन सत्यवादिना सावित्रीसरस्वत्यौ प्रति च विस्रम्भकारित्वमुच्यते । अन्यथोपक्रम एव संभाषणमात्रं न प्रवर्तते । सरस्वती ने घोड़ों की उस टुकड़ी के बीच में अट्ठारह वर्ष के एक अश्वारोही युवक को देखा । अर्धचन्द्र से युक्त, मोतियों की मालाओं वाला, अनेक प्रकार के रत्नों से खचित, शंख और दूध के फेन की तरह उजला छत्र उस पर छाया कर रहा था, मानों लक्ष्मी को उसे स्वयं अर्पित करने के लिये क्षीरसमुद्र ही आकाश में लहरा रहा हो । आभूषणों की निर्मल किरणें इस तरह उसका पीछा कर रही थीं मानों उसके दर्शन के अनुराग से सारी दिशाएँ एकत्र होकर अनुसरण कर रही हों । मालती की शेखरस्रज उसके नितम्ब तक लटक रही थी, मानों वह समस्त भुवनों की विजय करने से प्राप्त रूप की पताका से बिरा- जमान हो । शिखण्ड-खण्डिका नामक उसके शिरोभूषण में जड़ी हुई पद्मराग मणि की लाल किरणें फैल रही थीं, मानों दृष्टिपथ में न आने वाली वनदेवता बाल पल्लवों द्वारा मार्ग की धूल से उसकी रूखर देह को झाड़ती हो । मौलसिरी के कुद्मलों से बनी हुई मुण्डमाला से मनोहर एवं घुँघराले बालों के गुच्छों से भरे हुए अपने सिर से दिन के आतप को मन्द करता हुआ वह मानों दिन को पी रहा था। उसका ललाट शिव के ललाट के मुकुटचन्द्र के दूसरे खण्ड से मानों बना हुआ था और उसमें स्वाभाविक शोभा थी, मानों
३८ हर्षचरितम् वह मनःशिला के पंकसदृश लाल-पीले अपने ललाट के लावण्य से सारे अन्तरिक्ष को लीप रहा था। वह नई जबानी के आरम्भ में गर्वीले और उद्धत दृष्टिपात करने बाली- अपनी आँखों से सारे संसार को तृण के बराबर समझ रहा था, ऐसी आँखों की दीर्घता से मानों वह कुमुद, कुवलय और कमल से भरे हुए हजारों सरोवरों से समस्त दिशाओं को ढकने वाली शरत् को प्रवर्तित कर रहा था। उसका नासावंश मानों दीर्घ नयनों की नदी के सीमान्त में बनाया गया पुल का बाँध हो, या उसके ललाट रूपी चन्द्रकान्तमणि के शिलातल से चू कर बहता हुआ कान्ति का प्रवाह हो, ऐसे वह अपने नासावंश से सुशो- भित था। सहकार, कर्पूर, कङ्कोल, लवङ्ग और पारिजातक इन पाँच सुगन्धित पदार्थों की गंध उसके मुख से निकल रही थी, उस पर मतवाले भौंरे गुंजार रहे थे, मानों वह चन्दन वन के सहित वहाँ वसन्त को उतार रहा था। वह जब कभी अपने पास के मित्रों के साथ परिहास की भावना से मुँह ऊँचा करके हँसता था तो समस्त दिशाएँ उसके दाँतों की चाँदनी में घुल जाती थीं और मानों वह आकाश में बार बार संचरण करने वाले चन्द्रा- त्पेोक का निर्माण कर रहा था। उसके कान में त्रिकंटक नाम का गहना था, जो कदम्ब के कुड्मल के समान दो स्थूल मोतियों के बीच में पन्ने का जड़ाव करके बनाया गया था, ऐसे त्रिकंटक की प्रभा फैल रही थी, मानों उस युवक ने फूल के सहित कुन्द के हरे पल्लवों को कर्णावतंस बना लिया हो। सुगन्धिन कस्तूरी के पंक की बनी हुई पत्ररेखाओं से उसके दोनों हाथ चमक रहे थे, मानों कामदेव की पताका के बड़े बड़े मकरों से आक्रान्त शिखर वाले दो डंडे हों। मानों समुद्रमथन से क्रुद्ध गंगा की धाराओं से जकड़े हुए मन्दराचल के समान श्वेत यज्ञोपवीत से वेष्टित शरीर को वह धारण कर रहा था। कर्पूर के चूर्ण की मूठों से धूसरित उसकी छाती कान्ता के ऊँचे स्तन रूपी चक्रवाक युगल के लिए चौड़ी रेतीली जमीन थी, ऐसी छाती से वह मानों अपनी स्थूल भुजाओं के आयाम में पुञ्जीभूत दिशाओं को फैला रहा था। हारीत पक्षी के समान नील वर्ण का कस कर बँधा हुआ अधोवस्त्र उसकी पतली कमर को विभाजित कर रहा था, सामने की ओर नाभि से कुछ नीचे उसका एक कोना बहुत अच्छा लग रहा था, उस अधोवस्त्र का कच्छ भाग पीछे की ओर पल्ला खोंसने के बाद भी कुछ ऊपर निकला रहता था। दोनों ओर शरीर के मोड़ने से दाहिनी जांघ का कुछ भाग दिखाई दे जाता था। वह अपने ऊरुदण्डों से ऐरावत की सूँड़ का मानों उपहास कर रहा था, दोनों जांघों का मांस हमेशा व्यायाम करते रहने से बढ़ गया था, वे ऐसी लगती थीं मानों कठिन और विकट मगर के मुख में फँस गई हों, वे चौड़ी छाती के चबूतरे को धारण करने के लिए शिलास्तम्भ थीं। चन्दन के सुन्दर थप्पे से उसकी जाँघों में कान्ति और भी निखर उठी थी। हद से ज्यादा उभरी हुई जाँघों के भार-वहन करने से खिन्न होकर मानों उसकी टाँगें पतली हो गई थीं। कल्पवृक्ष के दो पल्लवों के समान ललछहू रंग के दोनों ओर लटकते हुए पैरों के नखों की किरणें डोलती हुईं मानों घोड़ों का चामरमाला नामक अलंकार बना रही थीं।
प्रथम उच्छ्वासः ३६ मन के समान वेग वाले, लंगूर के मुँह की तरह काले रोंगटे वाले, सिन्धुवार जैसे नीले, तगड़े घोड़े पर वह सवार था। वह घोड़ा अपने खुरों से जो सामने देर तक उठे रह जाते और विकट रूप में टेढ़े होकर गिरते, जमीन को कोड़ रहा था। वह काँटेदार लगाम को प्रतिक्षण अपने दाँतों से छोड़ता तो खड़-खड़ आवाज होती। घोड़े की नाक पर सामने की ओर लगाम का कमानीदार हिस्सा और माथे पर सोने का पदक झूल रहा था। आवाज करती हुई सुवर्ण की आयान नामक माला से वह घोड़ा सुशोभित हो रहा था। अपने अश्व के पलान का एक हाथ से सहारा लेकर उसके दोनों ओर दो आसन्न परिचारक चँवर झल रहे थे। आगे आगे जो बंदीजन सुभाषित पाठ कर रहे थे उसे सुन कर उसके मुख- चन्द्र के दोनों कपोलभाग रोमाञ्चित हो रहे थे मानों उसके कर्णोत्पल का पराग झर गया हो। मानों वह अनङ्ग युग का अवतार दिखला रहा था, सारी सृष्टि को चन्द्रमय बना रहा था, सारे प्राणिलोक को विलासमय कर रहा था, राग के राज्य का प्रवर्तन कर रहा था। मानों वह नेत्र का आकर्षणाञ्जन, मन का वशीकरणमंत्र, इन्द्रियों को विवश करने वाला चूर्ण, कुतूहल का असन्तोष, सौभाग्य का सिद्धियोग, कामदेव का पुनर्जन्मदिन, यौवन का रसायन, सौन्दर्य का एकच्छत्र राज्य, रूप का कीर्तिस्तम्भ, लावण्य का मूल कोश, संसार के सारे पुण्यकर्मों का परिणाम, कान्ति रूपी लता का पहला अंकुर, ब्रह्मा जी के सृष्टिनिर्माण के अभ्यास का फल-स्वरूप, विभ्रम का प्रताप और वैदग्ध्य का यशःप्रवाह था। पार्श्वे च तस्य द्वितीयमपरसंश्लिष्टतुरङ्गमं, प्रांशुमुत्तप्तपनीयस्तम्भा- कारम्, परिणतवयसमपि व्यायामकठिनकायम्, नीचनखश्मश्रुकेशम्, शुक्तिकखलतिम्, ईषत्तुन्दिलम्, रोमशोरःस्थलम्, अनुलब्णोदारवेष- तया जरामपि विनयमित्र शिक्षयन्तम्, गुणानपि गरिमाणमिवानयन्तम्, महानुभावतामपि शिष्यतामिवानयन्तम्, आचारस्याप्याचार्यकमिव कुर्वाणम्, वलक्षवारबाणधारिणम्, धौतदुकूलपट्टिकापरिवेष्टितमौलिं पुरुषम् । शुक्तिकखलतिं शुक्त्याकारखल्वाटम् । तुन्दिलं लम्बोदरम् । अत एवास्य विकु- क्षिरिति नाम । अनुलब्णोऽनुद्धतः । उदारः श्रेष्ठः । जरामिति । जरा किल सर्वं विनयं शिक्षयति । महानुभावता महाशयता । अनुभावयति कार्यमकार्यं वा बोध- यतीत्यनुभावः । शिष्यतामिति । परशासनदक्षकर्म महानुभावतया तत एवावसी- दत इत्युक्तं भवति । आचारः शास्त्रकारप्रदर्शिता विशिष्टा नीतिः । सच सर्वस्मि- न्नाचार्यकमवलम्बते । संस्कारातिशयमापादयतीत्यर्थः । वलक्षः शुक्लः । वारबाणः कञ्चुकः । मौलयः केशाः । उस नवयुवक के बगल में एक दूसरे पुरुष को देखा । वह भी घोड़े पर सवार था।
४० हर्षचरितम् उसकी कद लम्बी थी । उसकी आकृति तपे हुए सोने के खम्भे के समान थी । अवस्था अधेड़ होने पर भी उसका शरीर व्यायाम से गँठा हुआ था । उसके दाढ़ी, मूँछ और नाखून साफ-सुथरे कटे हुए थे । बाल झड़ जाने से बिलकुल सितुहे-जैसा लगता था । उसकी तोंद निकल आई थी । छाती में बाल जम गए थे, वेष सौम्य और श्रेष्ठ था, मानों वह अपनी वृद्धावस्था को भी विनय की सीख दे रहा था, गुणों में भी गौरव भर रहा था, महानुभावता को भी शिष्य बना रहा था, आचारों का भी आचार्य हो रहा था । वह उज्ज्वल कंचुक पहने हुए और धुली हुई दुकूलपट्टिका बाँधे हुए था । अथ स युवा पुरोयायिनां यथादर्शनं प्रतिनिवृत्यातिविस्मितम- नसां कथयतां पदातीनां सकाशादुपलभ्य दिव्याकृतितत्कन्यायुगल- मुपजातकुतूहलः प्रतूर्णतुरगो दिदृक्षुस्तं लतामण्डपोद्देशमाजगाम । दूरादेव च तुरगादवततार । निवारितपरिजनश्च तेन द्वितीयेन साधुना सह चरणाभ्यामेव सविनयमुपससर्प । कृतोपसंग्रहणौ तौ सावित्री समं सरस्वत्या किसलयासनदानादिना सकुसुमफलार्घ्यावसानेन वनवासोचिते- नातिथ्येन यथाक्रममुपजग्राह । आसीनयोश्च तयोरासीना नातिचिरमिव स्थित्वा तं द्वितीयं प्रवयसमुद्दिश्यावादीत्—‘आर्य, सहजलज्जाधनस्य प्रमदाजनस्य प्रथमाभिभाषणमशालीनता, विशेषतो वनमृगीमुग्धस्य कुलकुमारीजनस्य । केवलमियमालोकनकृतार्थाय चक्षुषे स्पृहयन्ती प्रेरयत्युदन्तश्रवणकुतूहलिनी श्रोत्रवृत्तिः । प्रथमदर्शने चोपायनमिवोपनयति सज्जनः प्रणयम् । अप्रगल्भमपि जनं प्रभवता प्रश्रयेणार्पितं मनोमध्विव वाचालयति । अयत्नेनैवातिनम्रे साधौ धनुषीव गुणः परां कोटिमारो- पयति विश्रम्भः । जनयन्ति च विस्मयमतिधीरधियामप्यदृष्टपूर्वा दृश्य- माना जगति स्रष्टुः सृष्ट्यतिशयाः । यतस्त्रिभुवनाभिभावि रूपमिदमस्य महानुभावस्य । सौजन्यपरतन्त्रा चेयं देवानांप्रियस्यातिभद्रता कारयति कथां न तु युवतिजनसहोत्था तरलता । तत्कथयागमनेनापुण्यभा- कतमो विजृम्भितविरहव्यथः शून्यतां नीतो देशः ? क वा गन्तव्यम् ? को वायमपहृतहरहुंकाराहंकारोऽपर इवानन्यजो युवा ? किंनाम्नो वा समृद्धतपसः पितुरयममृतवर्षी कौस्तुभमणिरिव हरेर्हृदयमाह्लादयति ? का चास्य त्रिभुवननमस्या विभातसंध्येव महतस्तेजसो जननी ? कानि वास्य पुण्यभाञ्जि भजन्त्यभिख्यामक्षराणि ? आर्यपरिज्ञानेऽप्ययमेव
क्रमः कौतुकानुरोधिनो हृदयस्य' इत्युक्तवत्यां तस्यां प्रकटितप्रश्रयोऽसौ प्रतिव्याजहार—'आयुष्मति, सतां हि प्रियंवदता कुलविद्या। न केवल- माननं हृदयमपि च ते चन्द्रमयमिव सुधाशीकरशीतलैराह्लादयति वचोभिः। सौजन्यजन्मभूमयो भूयसा शुभेन सज्जन्निर्माणशिल्पकला इव भवादृश्यो दृश्यन्ते। दूरे तावदन्योन्यस्याभिलपनमभिजातैः सह दृशोऽपि मिश्रीभूता महतीं भूमिमारोपयन्ति। श्रूयताम्—अयं खलु भूषणं भार्गववंशस्य भगवतो भूर्भुवःस्वस्त्रितयतिलकस्य, अदभ्रप्रभाव- स्तम्भितजम्भारिभुजस्तम्भस्य, सुरासुरमुकुटमणिशिलाशयनदुर्ललितपा- दपङ्केरुहस्य, निजतेजःप्रसरप्लुष्टपुलोम्नश्च्यवनस्य बहिर्वृत्तिजीवितं दधीचो नाम तनयः। जनन्यप्यस्य जितजगतोऽनेकपार्थिवसहस्रानुयातस्य शर्यातस्य सुता राजपुत्री त्रिभुवनकन्यरत्नं सुकन्या नाम। तां खलु देवीमन्तर्वत्नीं विदित्वा वैजनने मासि प्रसवाय पिता पत्युः पार्श्वात्स्व- गृहमनाययत। असूत च सा तत्र देवी दीर्घायुषमेनम्। अवर्धतानेहसा च तत्रैवायमानन्दितज्ञातिवर्गो बालस्तारकराज इव राजीवलोचनो राजगृहे। भर्तृभवनमागच्छन्त्यामपि दुहितरि नासेचनकदर्शनमिम- ममुञ्चन्मातामहो मनोविनोदनं नप्तारम्। अशिक्षतायं तत्रैव सर्वा विद्याः सकलाश्च कलाः। कालेन चोपारूढयौवनमिममालोक्याहमिवासावप्यनु- भवतु मुखकमलावलोकनानन्दमस्येति मातामहः कथंकथमप्येनं पितु- रन्तिकमधुना व्यसर्जयेत्। मामपि तस्यैव देवस्य सुगृहीतनाम्नः शर्या- तस्याज्ञाकारिणं विकुक्षिनामानं भृत्यपरमाणुमवधारयतु भवती। पितुः पादमूलमायान्तं मया साभिसारमकरोत्स्वामी। तद्धि नः कुलक्रमागतं राजकुलम्। उत्तमानां च चिरंतनता जनयत्यनुजीविन्यपि जने किय- न्मात्रमपि मन्दाक्षम्। अक्षीणः खलु दाक्षिण्यकोशो महताम्। इतश्च गव्यूतिमात्रमिव पारेशोणं तस्य भगवतश्च्यवनस्य स्वनाम्ना निर्मितव्यप- देशं च्यावनं नाम चैत्ररथकल्पं काननं निवासः। तदवधिरेवेयं नौ यात्रा। यदि च वो गृहीतक्षणं दाक्षिण्यमनवहेलं वा हृदयमस्माकमुपरि भूमिर्वा प्रसादानामयं जनः श्रवणार्हो वा, ततो न विमाननीयोऽयं नः प्रथमः प्रणयः कुतूहलस्य। वयमपि शुश्रूषवो वृत्तान्तमायुष्मत्योः। नेय- माकृतिर्दिव्यतां व्यभिचरति। गोत्रनामनी तु श्रोतुमभिलषति नौ
४२ हर्षचरितम् हृदयम् । तत्कथय कतमो वंशः स्पृहणीयतां जन्मना नीतः । का चेय- मत्रभवती भवत्याः समीपे समवाय इव विरोधिनां पदार्थानाम् । तथा हि, संनिहितबालान्धकारा भास्वन्मूर्तिश्च, पुण्डरीकमुखी हरिणलोचना च, बालातपप्रभाधारा कुमुदहासिनी च, कलहंसस्वना समुन्नतपयोधरा च, कमलकोमलकरा हिमगिरिशिलापृथुनितम्बा च, करभोरुर्विलम्बित- गमना च, अमुक्तकुमारभावा स्निग्धतारका च' इति । अथेति । नतु गतागतिकतया सर्वचेतनाभिप्रायेण सौन्दर्यमेतयोरभिव्यज्यते । प्रतिनिवृत्य न पुनः प्रसङ्गत उपेत्य । कन्यकात्वादेतन्नानुचितम् । प्रतूर्णी वेगगामी । साधुना विनीतेन । 'उपसंग्रहणं धीराः कथयन्त्यभिवादनम्' । आतिथ्यमेवोपज- ग्राहापूजयत् । 'प्रवयाः स्यात्परिणतः' । अशालीनता धृष्टता । वनशब्देन मृगोत्सा- मान्येऽपि जनसंपर्काच्चभावमाह । उपायनं ढौकनिका । उपनयति ढौकयति । प्रग- ल्भमित्यादि । मनःकर्तृ अप्रगल्भमपि जनं वाचालयति । कीदृशम् ? प्रभवता स्वामिना प्रश्रयेण प्रत्यर्पितं दत्तमैवंविधमस्मदीयं युष्मासु मन इति बहिः प्रकाशितं यश्च परतश्च केनापि प्रभावशीलेन ढौकितं मद्यप्रगल्भमपि जनं कुलयोषित्प्रायं वाचालयति किंचन जल्पयति । अत्रापि प्रश्रयेणेति साभिप्रायम् । तथा च—'अन्य- यान्यवनितागतचित्तं चित्तनाथमभिशङ्कितवत्या । पीतभूरिसुरयापि न मोदे निर्वृ- तिर्हि मनसो मदहेतोः ॥' इत्युक्तम् । नम्रे प्रह्वे, कुब्जे च । गुणो विनयादिः, ज्या च । कोटिः प्रकर्षः, धनुःशिखा च । 'देवानांप्रियस्येति पूजावचनम् । षष्ठ्या अलुक् । अत्रागमनेत्यादिना ब्रह्मोक्तशापबुद्ध्या दधीचस्य तद्भर्तृयोग्यतया कतम इति देशोत्कर्षकूलादिकं पृच्छति—कस्येति । देवस्य । सिद्धा देवाः । अनन्यजः कामः । महतस्तेजस ऽनि । महच्च तेजः सूर्याख्यम् । अभिख्या नाम । अयमेव क्रम इति । यथास्योत्पश्यादिकं तद्वद्भवतोऽपीत्यर्थः । कला उपायः । भूरिति रेफान्तो भूवाची । भुव इति रेफान्तः पातालवाची । भूश्च भुवश्च स्वश्च भूर्भुवःस्वः, एषां त्रयमिति समासः । अदभ्रोऽनल्पः । जम्भारिरिन्द्रः । स ह्यश्विभ्यां यज्ञभागभुजौ कुर्यावामिति चिरं प्रार्थितः । तथेति प्रतिपद्य ताभ्यां भागं दददिन्द्रेणोद्यतवज्रेण रोषितः । तत- स्तेनास्य सवज्रः स्तम्भितो भुज इति । दुर्ललितोऽलभ्यविषयः । प्लुष्टपुलोम्न इति । अनवरतं रुदत्यां दुहितरि कोपान्मात्रा गृहाणेमामिति पुलोम्नो राक्षसस्योक्तम् । ततस्तां प्रतिगृह्य तत्रैव स्थापयित्वा क्वापि गते रक्षसि सा भृगुणा विवाहिता । ततः सगर्भा सती पुलोम्नागत्यापह्रियमाणतया च्यवनं गर्भमत्याक्षीत् । तेन चान्वर्थ- नाम्ना तदृक्षो दृष्टैवादहत् । अन्तर्वत्नीं गर्भिणीम् । वैजनने मासि प्रसवमासे । दीर्घायुषमिति साभिप्रायम् । रूपकुलाद्युत्कर्षे वर्णिते सत्येतदेव वरगुणवर्णनमव- शिष्यते । अनेहसा परिपूर्णेन कालेन । 'न जायते यत्र तृप्तिस्तदासेचनकं विदुः' ।
प्रथम उच्छ्वासः ४३ नप्तारं पौत्रम् । साभिसारं ससहायम् । मन्दाक्षमुपरोधम् । गव्युतिः क्रोशद्वयम् । यात्रा प्रस्थानम् । गोत्रं वंशः । समवाय एकत्रस्थितिः । बालेषु केशेष्वन्धकारं तम इति यस्या बालं प्रत्यग्रम् । भास्वती मूर्तिमती, भास्वत आदित्यस्य च मूर्तिः । न कदाचित्सन्निहितबालान्धकारा भवतीति विरोधः । पुण्डरीकं पद्मम्, सिंहश्च यस्या मुखं तत्र कथं हरिणस्य लोचने स्त इति विरोधः । पयोधरौ स्तनौ, मेघाश्च पयोधराः । कलहंसानां स्वनो यस्यां सा । सरित्कथं प्रावृड् भवतीति विरोधः । करो हस्तः, रश्मिश्च । शिला वातवञ्जीभूतं हिमम् । यत्र च हिमगिरिशिलाभिः पृथुर्मध्यभागस्तत्र कथं पद्मकोमलकान्तिः । हिमस्पर्शं पद्मानाशात् । 'मणिबन्धादा- कनिष्ठं करस्य करभो बहिः' करभश्चोष्ट्रः । विलम्बितं सविलासम् , लम्बितश्च करभो यस्याः । करभोरुः कथं विगतकरभममनेति विरोधः । कुमारभावो बाल्यम्, कुमारे च भावो भक्तिः । स्निग्धो रम्यः, प्रतीतश्च । तारकाऽक्ष्णोः कनीनिका, दैत्यभेदश्च तारकः स्कन्देन यो हतः । उस युवक ने देखकर लौट हुए अग्रगामी पैदल सैनिकों से दिव्य आकृति वाली कन्या के विषय में सुनते ही कुतूहल से भर कर देखने के लिये उत्सुक हो घोड़े को ऐंड़ लगाई और शीघ्र उस लतामण्डप के समीप पहुँच गया । कुछ ही दूर पर घोड़े से उतर गया । अपने और साथियों को उसने वहीं रोक दिया, लेकिन उस सज्जन पार्श्वचर को साथ लेकर पैदल ही विनीत भाव से आया । सरस्वती के साथ सावित्री ने उन दोनों का अभिवादन किया और वनवास के योग्य फूल, फल एवं अर्घ्य आदि से उनका क्रम से आतिथ्य-सत्कार किया । दोनों पूर्ण रूप से स्थिर हुए तो वह स्वयं बैठी और कुछ ही देर ठहर कर उस दूसरे वृद्ध सज्जन से बोली—'आर्ये, सहजलज्जाशील नारियों का पहले पहल बोल बैठना बड़ी धृष्टता होती है, विशेष कर तो उनका जो वन्य मृगी की भाँति मुग्ध कुलकुमारियाँ हैं। आँखें तो देखकर कृतार्थ हो गईं, पर केवल कर्णेन्द्रिय की वृत्ति वृत्तान्त सुनने के लिए कुतूहल से प्रेरित कर रही है। प्रथम दर्शन में ही सज्जन व्यक्ति उपहार के रूप में प्रणय को समर्पित करता है। प्रभावशाली विनय से अर्पित किया हुआ मन मद्य के समान अधृष्ट जन को भी वाचाल बना देता है। अत्यन्त नम्र स्वभाव वाले सज्जन में बिना यत्न के ही विश्वास अधिक हो जाता है, जैसे धनुष के अग्रभाग तक उसका गुण बढ़ जाता है । पहले कभी नहीं देखे गए फिर देखे जाने वाले विधाता के उत्कृष्ट निर्माण अत्यन्त धीर लोगों में आश्चर्य को उत्पन्न कर देते हैं। बात यह है कि इन महानुभाव का रूप त्रिभुवन को अभिभूत कर देने वाला है। देवानांप्रिय की सौजन्य से भरी यह अतिभद्रता ही मुझे बोलने के लिए तत्पर कर रही है, युवतियों में स्वभावतः होने वाली चंचलता नहीं। तो कहिए इन्होंने किस पुण्यहीन देश को अपनी विरह- व्यथा के द्वारा सूना कर दिया है। ये कहाँ जायँगे ? ये मानों दूसरे कामदेव हैं जो शिव के हुंकारजनित अहंकार को न मानकर उत्पन्न हो गया है। कौन हैं ये ? बढ़ी हुई तपस्या
४४ हर्षचरितम् वाले किस पिता के अमृतवर्षी स्वभाव से ये हृदय को आह्लादित करते हैं जैसे कौस्तुभ- मणि विष्णु के हृदय को ? त्रिभुवन द्वारा नमन करने योग्य और महान् तेजस्वी को उत्पन्न करने वाली प्रभात की सन्ध्या के समान कौन इनकी जननी है ? कौन से पुण्य- वान् अक्षर इनके नाम में जुटते हैं ? आर्य के सम्बन्ध में जानने के लिए इस कुतूहल भरे हृदय के प्रश्न क्रमशः ये ही हैं।' सावित्री के इतना पूछने पर विनय प्रकट करते हुए पार्श्वचर ने उत्तर दिया—'आयुष्मती, प्रिय बोलना तो सज्जनों की कुलविद्या है। केवल तुम्हारा मुख ही नहीं, प्रत्युत हृदय भी चन्द्रमय है, क्योंकि वह अमृत के शीतल फुहारों के सदृश वचनों से आह्लादित कर रहा है। आपके सदृश लोग जो सौजन्य की जन्मभूमि हैं बड़े ही शुभकर्मों से मिलते हैं, क्योंकि वे सज्जनों के निर्माण की शिल्प- विद्या के स्वरूप हैं। ऐसे कुलीन लोगों के साथ परस्पर बातचीत करना तो दूर है इनके साथ आँखें ही मिलकर अलौकिक भूमि में पहुँचा देती हैं। तो सुनिए—यह भार्गववंश का कुलभूषण, महर्षि च्यवन का पुत्र दधीच है। इसके पिता भगवान् च्यवन पृथिवी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग लोक में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने अपनी तपस्या के प्रभाव से इन्द्र की भुजशक्ति को भी स्तम्भित कर दिया है। उनके चरण-कमल सुर-असुरों की मुकुटमणियोँ से अभ्यर्चित हैं। अपने तेज से उन्होंने पुलोमा नामक दैत्य को भस्म कर डाला है। ऐसे पिता के पुत्र इस दधीच की जननी का नाम सुकन्या है जो जगद्विजयी सहस्रों नृपतियों से अनुगत शर्याति की सुता, राजपुत्री एवं त्रिभुवन की कन्याओं में रत्न के समान है। देवी सुकन्या को गर्भिणी जान उसके पिता दसवें महीने में प्रसव के लिए उसे पति के पास से अपने घर ले गए। वहीं उसने चिरंजीवी दधीच को उत्पन्न किया। राजा के घर में राजीवलोचन यह चन्द्रमा के समान बांधवों को आनन्दित करता हुआ समय के साथ बढ़ा। पुत्री सुकन्या अपने पति के घर आने लगी, तब भी नाना ने नेत्र के सुखद और मन बहलाने वाले नाती को नहीं छोड़ा। इसने ननिहाल में ही समस्त विद्याओं और कलाओं की शिक्षा प्राप्त की। समय से इसे जवान देख और 'मेरे समान इसके पिता भी इसके मुखकमल को देखकर आनन्द का अनुभव करें' यह सोच इसके नाना ने किसी-किसी प्रकार पिता के पास भेजा है। उन्हीं सुगृहीतनामा देव शर्याति का आज्ञाकारी विकुक्षि नामक एक तुच्छ भृत्य मुझे समझें। मेरे मालिक ने पिता के पास आते हुए इसके साथ मुझे लगा दिया। वह राजकुल मेरी वंशपरम्परा द्वारा सेवित है। सम्बन्ध के पुराने हो जाने पर उत्तम लोग अपने भृत्य के प्रति कुछ लज्जा का अनुभव करते हैं। महान् लोगों की उदारता का भण्डार कभी नहीं घटता। यहाँ से दो कोस आगे सोन पार भगवान् च्यवन का निवास च्यवनाश्रम है, जो चैत्ररथ नामक कुबेर के उद्यान के सदृश है। हम दोनों की यात्रा वहीं तक है। यदि आप दोनों का हमारे ऊपर क्षणिक सौजन्य है या हृदय में किसी प्रकार की अवज्ञा नहीं, या यह जन प्रसाद को प्राप्त करने योग्य है तो हमारे प्रणय का यह कुतूहल भी उपेक्षा के योग्य नहीं।
प्रथम उच्छ्वासः ४५ आप दोनों का वृत्तान्त हम सुनना चाहते हैं । तो कहिए—किस वंश को आपने जन्म लेकर स्पृहणीय बनाया ? आपके समीप यह कौन हैं जो बहुत से विरोधी पदार्थों के समवाय की भाँति लग रही हैं । जैसा कि इनके बाल अन्धकार के समान सन्निहित हैं, फिर भी सूर्य के समान इनकी मूर्ति देदीप्यमान है । पुण्डरीक ( व्याघ्र या श्वेत कमल ) के समान इनका मुख है ( फिर भी ) आँखें हरिण के समान हैं । उगते हुए सूर्य की प्रभा के समान इनका अधर है (फिर भी ) कुमुद के सदृश इनकी मुसकान है। मतवाले हंस के समान इनकी आवाज है ( फिर भी ) इनके पयोधर ( स्तन या मेघ ) उठे हुए हैं। कमल के समान कोमल इनके हाथ हैं ( फिर भी ) हिमालय की चट्टान के समान मोटे इनके नितम्ब हैं। ऊँट के समान इनकी दोनों जाँघ हैं ( फिर भी ) चाल धीमी चलती हैं। कुमारभाव ( बाल्यकाल या कार्तिकेय का भाव ) इन्होंने नहीं छोड़ा है ( फिर भी ) इनकी आँखों के तारक (पुतले या तारकासुर ) स्नेह को व्यंजित कर रहे हैं।' सा त्ववादीत्—'आर्य, श्रोष्यसि कालेन । भूयसो दिवसानत्र स्थातुमभिलषति नौ हृदयम् । अल्पीयांश्चायमध्वा । परिचय एव प्रकटी- करिष्यति । आर्येण न विस्मरणीयोऽयमनुषङ्गदृष्टो जनः' इत्यभिधाय तूष्णीमभूत् । दधीचस्तु नवाम्भोभरगभीराम्भोधरध्वनिनिभया भारत्या नर्तयन्वनलताभवनभाजो भुजंगभुजः सुधीरमुवाच—'आर्य, करिष्यति प्रसादमार्याराध्यमाना । पश्यामस्तावत्ताम् । उत्तिष्ठ । व्रजामः' इति । तथेति च तेनाभ्यनुज्ञातः शनकैरूथाय कृतनमस्कृतिरुच्चचाल । तुरगारूढं च तं प्रयान्तं सरस्वती सुचिरमुत्तम्भितपक्ष्मणा निश्चलतारकेण लिखिते- नेव चक्षुषा व्यलोकयत् । उत्तीर्य च शोणमचिरेणैव कालेन दधीचः पितुराश्रमपदं जगाम । गते च तस्मिन्सा तामेव दिशमालोकयन्ती सुचिरमतिष्ठत् । कृच्छ्रादिव च संजहार दृशम् । परिचयः संस्तवः । अनुषङ्गः प्रसङ्गः । विवृत्तप्रार्थितयापि सावित्र्या कौतुक- निवृत्तिर्मा भूदित्यात्मस्वरूपं नोक्तम् । अत एवोत्तरत्र तदनुबन्ध एवोक्तः— भूयसो दिवसानित्यादिना । स्वरूपोक्तौ च ज्ञातसरस्वतीकत्वेनापत्यजननकार्यभङ्गो भवेत् । भारती वाक् । भुजङ्गभुजो मयूरान्, भुजग इव भुजावस्येति च । उच्च- चाल गन्तुं प्रवृत्तः । उत्तम्भितान्युत्क्षिप्तनि । सावित्री ने कहा—'आर्य, समय पर सब मालूम हो जायगा। हम दोनों के मन में यहाँ बहुत दिनों तक अभी रहने की इच्छा है। यह रास्ता बहुत थोड़ा है। परिचय बढ़ने से सब बात खुल जायगी । इस बहाने मिले हुए इस जन को आर्य न भूलेंगे।' इतना कह वह चुप हो गयी । जल भर जाने से गम्भीर आवाज वाले नये मेघ की भाँति लता-भवन
४६ हर्षचरितम् के मयूरों को नचाते हुए धीर स्वर में दधीच बोल उठे—'आर्य, अवश्य ही आराधना करने पर आर्या प्रसन्न होंगी। तब तक हम पिता जी के दर्शन करें। उठिए, चलें।' पार्श्वचर के स्वीकार करने पर दधीच धीरे से उठे और नमस्कार करके चल दिए। घोड़े पर सवार होकर जाते हुए उन्हें सरस्वती निश्चल आँखें फाड़ कर देर तक देखती रही। सोन पार करके कुछ ही देर में दधीच च्यवनाश्रम पहुँचे। उनके चले जाने पर सरस्वती उसी दिशा को देर तक निहारती हुई बैठी रही। बड़ी कठिनाई से वह अपनी आँख मोड़ सकी। अथ मुहूर्त्तमात्रमिव स्थित्वा स्मृत्वा च तां तस्य रूपसंपदं पुनः- पुनर्व्यस्मयतास्या हृदयम्। भूयोऽपि चक्षुराचकाङ्क्ष तद्दर्शनम्। अवशेव केनाप्यनीयत तामेव दिशं दृष्टिः। अप्रहितमपि मनस्तेनैव सार्धम- गात्। अजायत च नवपल्लव इव बालवनलतायाः कुतोऽप्यस्या अनुराग- श्चेतसि। ततः प्रभृति च सालस्येव शून्येव सनिद्रेव दिवसमनयत्। अस्तमुपयाति च प्रत्यक्पर्यस्तमण्डले लाङ्गलिकास्तबकताम्रत्विषि कम- लिनीकामुके कठोरसारसशिरःशोणशोचिषि सावित्रे त्रयीमये तेजसि, तरुणतरतालश्या मले च मलिनयति व्योम व्योमव्यापिनि तिमिरसंचये, संचरत्सिद्धसुन्दरीनूपुररवानुसारिणि च मन्दं मन्दं मन्दाकिनीहंस इव समुत्सर्पति शशिनि गगनतलम्, कृतसंध्याप्रणामा निशामुख एव निपत्य विमुक्ताङ्गी पल्लवशयाने तस्थौ। सावित्र्यपि कृत्वा यथाक्रियमाणं सायंतनं क्रियाकलापमुचिते शयनकाले किसलयशयनमभजत। जातनिद्रा च सुष्वाप। कुतोऽपि कस्मादपि न ज्ञायत इत्यर्थः। मनुप्यतस्तथाविधस्तादृश्याः कथम- नुराग इति। कथमेतदस्या उपपद्यत इति न वाच्यम्। यदाह मुनिः—'शापभ्रं- शात्तु दिव्यानां तथा चापत्यलिप्सया। कार्यों मानुषसंयोगः शृङ्गाररससंश्रयः॥' इति। अन्यत्र-कुतः क्षितेर्नवपल्लवोऽनुरागहतो लताथो जायत इत्येवमभिलाषरूपं प्रथमं दशान्तरमालम्ब्येत्यादिना द्वितीयचिन्तनरूपमाह। अनयत् कष्टेनात्यवाह- यत्। अस्तमित्यादौ पल्लवशयाने तस्थाविति संबन्धः। प्रतीच्यां पश्चिमास्याम्। लाङ्ग- लिका फलिनी। मयूरशिखोषधिरित्यपरे, रक्तिकेत्यन्ये। कमलिनीकामुक इति सरस्वतीदयिताभिप्रायेणोक्तम्। कठोरो जरठः। सारसो लक्ष्मणः। शोणो लोहितः। शोचिर्दीप्तिः। 'ऋग्यजु सामनामानि त्रयो वेदास्त्रयी स्मृता। वेदे च पठ्यते सैषा'। त्रय्येव विद्या तपतीति। 'कृत-' इत्यादिना 'तस्थौ' इत्यन्तेन क्रियान्तरत्यागेन वैमनस्यमावेद्यते। 'वेपते श्वसते चैव मनोरथविचिन्तनैः। प्रद्वेषेणान्यकार्याणाम-
नुस्तृप्तिरपीष्यते ॥' निशामुख एवेति । न पुनरुचिते शयनकाले विमुक्ताङ्गीशयनेन निःसहाङ्गत्वमस्या दर्शयते । तस्याविति । न पुनर्निद्रामलभत । यथाक्रियमाणमित्यनेन च सरस्वतीतोऽस्या व्यतिरेकं दर्शयन्सरस्वत्या एवानङ्गावस्थामह ।
अब सरस्वती का हृदय कुछ देर तक ठहर उस दधीच के रूप-लावण्य का स्मरण करके बार बार आश्चर्य से भरने लगा । बार बार उसकी आँखें दधीच के दर्शनों के लिए उत्सुक होने लगीं । मानों उसकी बेसुध नजर को कोई उसी दिशा की ओर फेर लेता था । बिना भेजे ही मन दधीच के साथ ही चला गया । सुकुमार वनलता में नये पल्लव के समान उसके चित्त में अनुराग अंकुरित होने लगा । उसी समय से अलसाई-सी, शून्य सी, निंदियाई सी उसने दिन को व्यतीत किया । जब पश्चिम में ढलते हुए मण्डल वाले, मञ्जलिका नामक फूलों के गुच्छों के समान कान्ति वाले, कमलिनियों को चाहने वाले तथा वृद्ध सारस के सिर के समान ललाई वाले सूर्य का वेदमय तेज अस्त हो रहा था, विशाल तमाल वृक्ष के समान काला, आकाशव्यापी प्रगाढ़ अंधकार आकाश को मलिन कर रहा था तथा चलती-फिरती सिद्धाङ्गनाओं के नूपुरों की ध्वनि का अनुसरण करने वाले आकाशगंगा के हंस के समान चन्द्रमा आकाश में धीरे धीरे उदित हो रहा था उस समय सायं-सन्ध्यावन्दन करके सरस्वती रात के आरम्भ होते ही अपने अङ्गों की सुध-बुध भूल पल्लव के शयन पर पड़ रही । सावित्री भी सायंकालीन क्रियाओं से निवृत्त होकर सोने के समय पल्लवशयन पर पहुँची और नींद आते ही सो गई ।
इतरा तु मुहुर्मुहुरङ्गवलनैर्विलुलितकिसलयशयनतला निमीलितनय- नापि नालभत निद्राम् । अचिन्तयच्च—'मर्त्यलोकः खलु सर्वलोकाना- मुपरि, यस्मिन्नेवंविधानि भवन्ति त्रिभुवनभूषणानि सकलगुणग्रामगुरूणि रत्नानि । तथा हि—तस्य मुखलावण्यप्रवाहस्य निस्यन्दबिन्दुरिन्दुः । * तस्य च चक्षुषो विक्षेपाः कुमुदकुवलयकमलाक[राः । तस्य चाधरमणे- र्दीधितयो विकसितबन्धूकवनराजयः । तस्य चाङ्गस्य परभागोपकरण- मनङ्गः । पुण्यभाञ्जि तानि चक्षूंषि चेतांसि यौवनानि वा क्षणानि, येषा- मसावविषयो दर्शनस्य । क्षणं नु दर्शयता च तमन्यजन्मजनितेनेव मे फलितमधर्मेण । का प्रतिपत्तिरिदानीम् ?' इति चिन्तयन्त्येव कथंकथ- मप्युपजातनिद्रा चिरात्क्षणमशेत । सुप्तापि च तमेव दीर्घलोचनं ददर्श । स्वप्नसादितद्वितीयदर्शना चाकर्णाकृष्टकार्मुकेण मनसि निर्दयमताड्यत मकरकेतुना । प्रतिबुद्धाया मदनशराहतायाश्च तस्या वार्त्तामिवोपलब्धुम- रतिराजगाम । तथा हि—ततः प्रभृति कुसुमधूलिधवलाभिर्वनलताभिर-
४८ हर्षचरितम् ताडितापि वेदनामधत्त । मन्दमन्दमारुतविधुतैः कुसुमरजोभिरदूषित- लोचनाप्यश्रुजलं मुमोच । हंसपक्षतालवृन्तवातव्रातविततैः शोणशी- करैरसिक्ताप्यार्द्रतामगात् । प्रेङ्खत्कादम्बमिथुनाभिरनूढाप्यघूर्णत वनकम- लिनीकल्लोलदोलाभिः । विघटमानचक्रवाकयुगलविस्सृष्टैरस्पृष्टापि श्यामता- माससाद विरहनिःश्वासधूमैः । पुष्पधूलिधूसरैरदृष्टापि व्यचेष्टत मधुकरकुलैः। विलुलितं विपर्यासितम् । मर्त्यलोक इत्यादिना गुणकीर्तनम् । चतुर्थमवस्था- विशेषमाह । तदुक्तम्—'अङ्गप्रत्यङ्गलीलाभिर्भावैश्चेतसाहितेक्षणैः । नास्त्यन्यः सदृ- शस्तेन तदेतद्गुणकीर्तनम् ॥' इति । गुणा वैदग्ध्यादयः, सूत्राणि च । तद्देशेन गुरूणि बहुमानभाञ्जि । इतरत्त्र तु तिष्ठतु तावदेकः । गुणग्रामस्यापि गुणिरूपिते- नापि दुर्बहानीति यावत् । तस्येनेति । पूर्वानुभूतस्य बिन्दुरिति न केवलं लावण्यप्र- वाहाभिप्रायेण यावत्संनिवेशसादृश्यात् । विक्षेपाः परतः प्रेरणानि । कुमुदेत्याद्यु- क्तम् । शुक्लकृष्णरक्तरुचित्वाच्चक्षुषो दीधितय इति मणिशब्दाभिप्रायेण । विकसित- शब्देन लौहित्यातिशयमाह । अङ्गानि विचिन्त्यते यस्य तदङ्गं शरीरम् । परभागो वर्ण्य- स्य वर्णान्तरेण शोभातिशयः । स्त्रैणानि स्त्रीसम्बन्धीनि । का प्रतिपत्तिः किमनुष्ठेयम् ? मदन-इत्यादिनोद्वेगरूपं पञ्चममवस्थाभेदमाह । यदुक्तम्—'आसने शयने वापि न हृष्यति न तुष्यति । नित्यमेवोत्सुका च स्यादुद्वेगस्थानमाश्रिता ॥ चिन्तानिःश्वास- खेदेन हहाहाभिनयेन च । कुर्यात्तदेवमत्यन्तमुद्योगेनाभिनयेन च ॥' इति । दश किल कामावस्थाः । तदुक्तम्—'प्रथमे त्वभिलाषः स्याद्द्वितीये चिन्तनं भवेत् । अनु- स्मृतिस्तृतीये तु चतुर्थे गुणकीर्तनम् ॥ उद्वेगः पञ्चमे प्रोक्तः प्रलापः षष्ठ उच्यते । उन्मादः सप्तमे चैव भवेद्व्याधिस्तथाष्टमे ॥ नवमे जडता प्रोक्ता दशमे मरणं भवेत् ॥' इति । अरतिर्दुःखासिका हि कामवधूप्रतिपत्तिभूतेति तदागमनाभिभ्रानम् । हंस- पक्षा इव तालवृन्तं व्यजनम् । आर्द्रता स्नेहताम्, क्लिन्नतां च । प्रेङ्खद्दोलाय- मानम् । कादम्बाः कृष्णहंसाः । श्यामता शृङ्गाररसाविष्कारिवैवर्ण्यम् । यदुक्तम्— 'शृङ्गारदेवो भगवान्मुरारिः संगीयते श्यामवपुर्मुरारिः । श्यामो मनाक्चिज्झषध्वजश्च तेन शृङ्गारशंसी मुखराग उक्तः ॥' अथ श्यामता सधूमता । श्यामत्वेऽपि सधूमता इति विरोधाभासः । लेकिन सरस्वती बार बार करवट बदलने लगी, अपने पल्लवशयन को मसल डाला, आँखें मूँद लीं, फिर भी नींद नहीं आई । सोचने लगी—'निश्चय ही मर्त्यलोक समस्त लोकों में बढ़ा-चढ़ा है, जहाँ त्रिभुवन के भूषण, समस्त गुणों के गौरव से भरे, ऐसे ऐसे रत्न पड़े हैं। जैसा कि—चन्द्रमा उसके लावण्य प्रवाह का चूआ हुआ एक बिन्दु ही तो है । उसके नेत्रों के विलास ही तो सफेद, काले और लाल कमलों के आकर हैं । उसके अधरमणि की कान्ति ही तो बन्धूक की खिली हुई वनराजि है । कामदेव
प्रथम उच्छ्वासः ४५ इसके अंग के शोभातिशय का साधन है। उन युवतियों की आँखें, चित्त एवं यौवन पुण्य- वान् हैं जिन्होंने इसके दर्शन नहीं किए। मानों दूसरे जन्म का उत्पन्न अधर्म फलित हो गया, जो मैंने क्षण भर इसके दर्शन किए। इस समय क्या करूँ?' यह सोच ही रही थी कि किसी किसी तरह बहुत देर बाद नींद आ गई और क्षण भर सोई रही। सोने पर भी उसी दीर्घलोचन दधीच को देखा। स्वप्न में उसने दूसरी बार दधीच को देखा तो मानों कामदेव ने उसे बड़ी निर्दयता से कान तक खींच कर बाण मारा। जब काम के बाण से घायल सरस्वती को नींद खुली तब उसकी खबर लेने के लिए मानों अरति (वैराग्य) आई। तब वह पुष्पपराग से उज्ज्वल वनलताओं द्वारा ताड़ित न होकर भी वेदना अनुभव करने लगी। मंद मंद हवा से काँपते हुए फूलों की रज उसकी आँखों में न भी पड़ती तो भी वह आँसू बहाती। हंस पक्षियों के पंखों की हवा से फैलते हुए सोन (नदी) के फुहारों द्वारा सिक्त न होने पर भी (पसीने से) तर होने लगी। काले हंसों की जोड़ियों से युक्त वन की कमलिनी की दोलाओं पर न बैठो हुई भी चकराने लगी। विघटित होते हुए जोड़े चक्रवाकों के विरहजन्य निश्वास-धूम से स्पृष्ट न होने पर भी श्यामता (कालिख) को प्राप्त करने लगी। फूल की धूल में लोट पोट करने वाले भौरों से न काटे जाने पर भी वह उद्विग्न होने लगी।
अथ गणरात्रापगमे निवर्तमानस्तेनैव वर्त्मना तं देशं समागत्य तथैव निवारित परिजनश्छत्रधारद्वितीयो विकुक्षिरुद्दँलोके । सरस्वती तु तं दूरादेव संमुखमागच्छन्तं प्रीत्या ससंभ्रममुत्थाय वनमृगीवोद्ग्रीवा विलोकयन्ती मार्गपरिश्रान्तमस्नपयदि्व धवलितदशदिशा दृशा । कृतासनपरिग्रहं तु तं प्रीत्या सावित्री पप्रच्छ—'आर्य, कच्चित्कुशली कुमारः ?' इति । सोऽब्रवीत्—'आयुष्मति, कुशली । स्मरति च भवत्योः । केवलममीषु दिवसेषु तनीयसीमिव तनुं बिभर्ति । अविज्ञायमाननिमित्तां च शून्य- तामिवाधत्ते । अपि च । अन्वक्षमागमिष्यत्येव मालतीति नाम्ना वाणिनी वार्तां वो विज्ञातुम् । उच्छ्वसितं हि सा कुमारस्य' इति । तच्छ्रुत्वा पुनरपि सावित्री समभाषत—'अतिमहानुभावः खलु कुमारो येनैवमवि- ज्ञायमाने क्षणदृष्टेऽपि जने परिचितिमनुबध्नाति । तस्य हि गच्छतो यदृच्छया कथमप्यंशुकमिव मार्गलतासु मानसमस्मासु मुहूर्तमासक्त- मासीत् । अशून्यं हि सौजन्यमाभिजात्येन वः स्वामिसूनोः । अलसः खलु लोको यदेवं सुलभसौहार्दानि येन केनचिन्न क्रीणाति महतां मनांसि । सोऽयमौदार्यातिशयः कोऽपि महात्मनामितरजनदुर्लभो ४ ह० च०
५० हर्षचरितम् येनोपकरणीकुर्वन्ति त्रिभुवनम्' इति । विकुक्षिस्तूचावचैरालापैः सुचिर- मिव स्थित्वा यथामिलषितं देशमयासीत् । ४४ • गणरात्रं निशाबहुत्वः । तेनैव वर्त्मनेति । अनेन तस्य यदृच्छया तदाश्रयमा- गमनमिति दर्शयति । प्रधानप्रकृतेः स्थवीयसस्तथाविधव्यापारविनियोगाद्यनौचि- त्याद् । अत एव वक्ष्यति — 'यथामिलषितं देशमयासीत्' । हुडोके इत्यनेन निमित्त- परतन्त्रतया संनिकृष्टमेवैनमालुलोकेति प्रदर्शितम् । यदुक्तम् — 'पटुता धाष्ट्रर्यता इङ्गि- ताकारज्ञानं प्रतारणे देशकालज्ञता कार्येषु विषह्यबुद्धित्वं लघ्वी प्रतिपत्तिः सापाया च इति दूतीगुणाः' । भरतमुनिरपि — 'विज्ञानगुणसंपन्ना कथिनी लिङ्गिनी तथा । रङ्गोपजीविनी चापि प्रतिपत्तिविचक्षणा ॥ प्रोत्साहनेककुशलेत्यादिदूतीगुणैर्युता ॥' इति । अत एवागूढश्चाकारतःप्रभृतीत्यादि वक्ष्यते । अन्वक्षं प्रत्यक्षम् । वाणिनी दूती । उच्छ्वसितमित्यनेनातिविस्रम्भवत्ता स्याता । उच्छ्वसितं प्राण इति वा । यदृ- च्छया यथाकथंचित् । यश्च तथागच्छति यस्य निरवधानतया क्वचिदंशुकादि गलति । आभिजात्येन महाकुलीनत्वेनोपकरणीकुर्वन्त्यायततां नयन्ति । उच्चावचैः प्रकृतव- स्वसंस्पर्शिभिः, विचित्रैरिति वा । इस तरह कई रातें गुजर गईं । एक दिन उसी मार्ग से लौटता हुआ विकुक्षि परिजनों को बाहर रोक छत्रवाहक को साथ ले पहुँचा । सरस्वती ने दूर ही से सामने आते हुए उसे देखा और प्रेम से फड़क उठी । वह हिरनी की तरह गर्दन ऊँची उठाकर देखने लगी मानों मार्ग में थके हुए विकुक्षि को दिशाओं को धवलित करने वाली दृष्टि से स्नान कराने लगी । जब वह आकर आसन पर बैठ गया तब सावित्री ने प्रीतिपूर्वक पूछा— 'आर्य, क्या कुमार दधीच कुशल से हैं ?' उसने कहा—'आयुष्मती, कुमार सकुशल हैं । आप दोनों का स्मरण करते हैं । इन दिनों उनका शरीर क्षीण होता जा रहा है । पता नहीं क्यों, शून्य-शून्य से लगते हैं । और भी, मालती नाम की दूती समाचार लेकर सामने आने वाली है । कुमार का उसे प्राण ही समझना ।' यह सुनकर फिर सावित्री बोली—'कुमार सचमुच बड़े ही महानुभाव हैं, जो अज्ञातजन में भी क्षण भर की देखा- देखी में ही अपना परिचय-सम्बन्ध जोड़ रहे हैं । वे जाने लगे तो उनका मन हम लोगों में क्षण भर इस तरह लग गया जैसे मार्ग की लताओं में अंशुक फँस जाता है । आपके स्वामिपुत्र दधीच में कुलीनता के साथ सौजन्य भी है । दुनिया वाले बड़े आलसी होते हैं जो सुलभ सौहार्द वाले महापुरुषों के मन को जिस किसी वस्तु से खरीदते नहीं । महापुरुषों में ही इस तरह बढ़कर उदारता होती है जो इतर लोगों में नहीं होती और जिससे वे लोग त्रिभुवन को अपने वश में कर लेते हैं ।' विकुक्षि भी लम्बी बातचीत करके अपने अभिलषित देश की ओर चला गया ।