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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

नेत्र

चौर कर या जीवी आदि से जीभ को भी साफ करें ताकि जीभ के ऊपर का सफेद मैल सोफ हो जाय और मुख से दुर्गन्ध न आवे। मंजन कपूर देशी इमाराश, फिटकरी की खील १ तोला, सेलखड़ी पिसी हुई १० तोला सब को मिला कर पीस लें। रात्रि को सोते समय मंजन करने से दीर्घों को विशेष लाभ होता है और कौड़ा नहीं लगता।

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नेत्र

नेत्र बिन सुना संसार

शरीर में नेत्र कितना उपयोगी अंग है। इसके बिना मनुष्य जीवन व्यर्थ है। नेत्र हीन व्यक्ति न तो कोई प्राकृतिक दृश्य का सुख और आनन्द ले सकता है और न ही ईश्वरीय रचनाओं का। वह रूप, रंग, व्यक्ति, पशु, पक्षी आदि को केवल सुनकर ही अनुमान लगा लेगा। सत्य तो यह है कि नेत्र हीन होना सबसे बड़ा कष्ट है।

प्रातःकाल नेत्रों को शुद्ध और ताजे जल से भली प्रकार धोना चाहिए। काँच का ग्लास जो नेत्र धोने के लिए ही होता है। उसमें जल भर कर चाँक्या सूतों को खील २ रत्ती डाल कर उसमें नेत्रों को डुबाकर धोना चाहिए। नेत्र खुले रहें और २,३ मिनट तक डुबे रहें। ऐसा करने से नेत्रों के अनेक रोग नष्ट हो जाते हैं। यदि इस क्रिया का नित्य न कर सकें तो सप्ताह में दो बार अवश्य करें, रात्रि का नेत्रों में लगाने के लिए 'नेत्र मणि' उत्तम है। सोफ और लाल इलायची के दानों को मिलाकर भोजन के पश्चात् खाने से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है और पान खाने की आदत भी छूट जाती है।

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इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अभ्यंग

अध्ययन

शरीर में तेल मर्दन करने से शरीर पुष्ट होकर हल्का स्फूर्तिदायक और सुन्दर हो जाता है। जिस प्रकार मशीन में तेल देने से मशीन हल्की और सुगमता से चलने लगती है उसी प्रकार शरीर भी तेल मर्दन से स्फूर्तिदायक होकर सुगमता से कार्य करने लगता है। जाड़ों में तीसरे दिन और गर्मियों में दसवें दिन तेल मर्दन करना चाहिए।

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व्यायाम

व्यायाम क्षुण्ण गात्रस्य आयुस्तेजो यशोबलम्।

प्रवर्धनो मनुष्यस्य तस्माद् व्यायाममाचरेत्॥

अर्थ- व्यायाम करने से जिसका शरीर पुष्ट हो गया है, उस मनुष्य की आयु तेज कीर्ति और बल में वृद्धि हो जाती है, इसलिए मनुष्य को व्यायाम करना चाहिए।

जिस प्रकार प्रयोग में न आने वाली मशीन को जंग लग जाती है और पुनः चलाने पर अपना कार्य पूरा नहीं कर पाती इसी प्रकार मनुष्य शरीर है। इसमें भी जिस अंग से कार्य नहीं लिया जायगा तो वह अंग शिथिल पड़ जायेगा। व्यायाम द्वारा प्रत्येक अंग पुष्ट होकर निरोगता पाकर अपने काम को सुचारू रूप से कर सकते हैं समर्थ होंगे।

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वीरेंद्र गुप्तः

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स्नान

स्नान

गुणा-दश स्नान परस्य साधौ,

रूपंच तेजश्च बलश्च शौचम्।

आयुष्यं मारोग्यमलोलुपत्वं,

दुःस्वप्न नाशश्च यशश्च मेधा॥

अर्थ- स्नान से रूप, तेज, बल, शौच, आयु, आरोग्यता, यश तथा धारणवती बुद्धि बढ़ती है। मल और स्वप्न दोष का नाश होता है।

स्नान से बुद्धि ठीक रहती है शरीर हल्का होता है भोजन और कार्य में रुचि बढ़ती है पूजनदि में ध्यान लगता है, शरीर की कान्ति सुन्दर होती है, शरीर सुखील और दृढ़ होता है स्नान से अनेक रोगों को दूर किया जा सकता है। सबसे उत्तम स्थान स्नान के लिए नदी या सालाब है। स्नान सदैव ताजे ठंडे जल से करना चाहिए। सिर पर गर्म जल डालने से कोश शीघ्र पंक जाता है, नेत्रों की ज्योति मन्द पड़ जाती है, स्मरण शक्ति निर्बल हो जाती है। गर्म जल में ठंडा जल मिलाना विष रूप हो जाता है ऐसे जल को कभी प्रयोग में नहीं लाना चाहिए।

न संहताभ्यां पाणिभ्यां कराडुयेदात्मनः शिरः।

न स्पृशेच्छैतदुच्छिष्टो न चस्नायाहिना ततः॥

अर्थ- दोनों हाथों से एक साथ अपना सिर न खुजोवे और झूठे हाथों से सिर न छुए और बिना सिर पर जल डाले स्नान न करे।

तेल मर्दन के पश्चात् बैसन का उबटन करके स्नान करना उत्तम है। भोजन पाने के पश्चात् स्नान करना मन्दारिन

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वीरेन्द्र गुप्तः

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संध्या वन्दन

उत्पन्न करता है। कम से कम सप्ताह में एक बार सारे शरीर को कच्चा दूध मलकर स्नान करना उत्तम है। दूध से शरीर का मैल साफ होकर शरीर पुष्ट और सुन्दर होता है। कहावत है—'दूध नहाओ पूतन फलो' इससे प्रतीत होता है पहले हमारे पूर्वज दूध से स्नान करने वाले को उतना ही भाग्यशाली मानते थे जितना उत्तम गुणवान पुत्र के प्राप्त करने वाले को।

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संध्या वन्दन

मनुष्य जीवन को यशस्वी, परक्रीम, ख्यातिमान बनाने वाला उपाय है तो वह ईश्वर स्मरण ही है। हमारा इतिहास इस बात का साक्षी है कि जितने भी पराक्रमी, बुद्धिमान, तेजस्वी पुरुष एवं देवियों हुई हैं वे सब एक मात्र तप के ही बल से हुए हैं। हम ईश्वर का स्मरण करते हैं, जिसके प्रभाव से हमारी बुद्धि शुभ बनती है इससे हम सम्पूर्ण पर चल कर सानन्द निर्विघ्न अपनी जीवन यात्रा समाप्त करते हैं। हमारी सबसे बड़ी यह इच्छा रहती है कि हे ईश्वर हमें सदबुद्धि दो, बिना सदबुद्धि के हम अनेक दुःखों में पड़कर कष्ट भोगते हैं। गृहस्थ जीवन में, अनेक कार्य ऐसे हो जाते हैं जिन को द्वारा गृहस्थी हिंसा के पाप से बच नहीं पाता। जैसे भोजन तैयार करने में लकड़ी के साथ घुन या अन्य जन्तुओं का जल जाना, बहारी (झाड़ू), लगाते समय चीटियों आदि का मर जाना आदि अनेक ऐसे कर्म हैं। इन्हीं पाप कर्मों का प्रायश्चित्त करने के लिए हमारे ऋषियों ने पंच महायज्ञ के नाम से नित्य कर्म में पाँच यज्ञों को करना बतलाया है।

पञ्च सूना गृहस्थस्थ चुल्ही पेचरायुपस्करः।

कराठनी चोदकुम्भश्च वध्यते यास्तु वाहयन्॥

मनु ३/६८

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- यह पाँच वस्तु गृहस्थ में हिंसा का मूल हैं। चूर्त्ता, चक्की, बूहारी, उलूखल, मूसल, जल का घड़ा इनको अपने कर्मों में लाता हुआ (पाप से) बँध जाता है।

तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्य महर्षिः।

पञ्च कल्पता महायज्ञः प्रत्यहं गृसमेधिनाम्॥

मनु ३/१९

अर्थ- गृहस्थियों को उन पापों के प्रायश्चित्तार्थ महर्षियों ने प्रतिदिन के पंच महायज्ञ रचे हैं।

अध्यापन ब्रह्मयज्ञः पितु यज्ञस्तु तर्पणम्।

होमो दैवोबलि भौतोनयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥

मनु ३/७०

अर्थ- ब्रह्मयज्ञ=वेद पाठ स्वाध्याय करना। पितु यज्ञ= तर्पण माता-पिता गुरु आदि को भोजन वस्त्र से तृप्त करना। देवयज्ञ=होम अग्नि होत्र करना। बलिवैश्य यज्ञ=बनाये हुए भोजन में से जो लवण रहित हो उसकी दस आहुति अग्नि में दें। अतिथि यज्ञ=विद्वानों का सत्कार करना।

अधं स केवलं मुङ्क्तयः पञ्चत्यात्मकारणात्।

यज्ञं शिष्टाशनं द्वीतस्ततामन्नं विधीयते॥

मनु ३/१२८

अर्थ- जो केवल अपने लिए अन्न पकाता है वह निरापाप खाता है, और जो यज्ञादि से शेष अर्थात् बलिवैश्य यज्ञ के पश्चात् का भोजन है वह सज्जनों का भोजन है।

यज्ञशिष्टाशनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बषैः।

भुज्यंते ते स्वर्घं पाप ये पञ्चत्यात्मकारणात्॥

गीता ३/१३

अर्थ- कारण! कि यज्ञ से शेष बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से छूटते हैं और जो पापी लोग अपने शरीर पोषण के लिए ही (अन्न) पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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गाय, कूत्ता, कौवा आदि को पहले भोजन देना बाद में आप खाना। अतिथि यज्ञ = बिना बुलाये, बिना सूचना के विद्वान्, सन्यासी या अन्य जन गृह पर आये तो उसे भोजन कराकर आप भोजन पायें।

उपरोक्त पाँच यज्ञों को गृहस्थ जीवन में नित्यप्रति अवश्य ही करने चाहिए। जिन परिवारों में गृहस्थ में यह पाँच यज्ञ कर्म नित्य होते हैं उस जगह शान्त, जीवन, धन, यश और ऐश्वर्य की दिन प्रतिदिन वृद्धि होती है।

अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिवृष्ट्यर्न् ततः प्रजाः॥

मनु ३/७६

अर्थ- अग्नि में डाली आहुति आदित्य को पहुँचती है और सूर्य से वृष्टि होती है, और वृष्टि से अन्न, अन्न से प्रजा होती है।

मन्त्र पाठ के पश्चात् यज्ञ में घृत अथवा हवि की आहुति देते हैं। आहुति देने के पश्चात् 'इदन्मम' का उच्चारण करते हैं जिसका अर्थ है 'यह मेरा नहीं'।

एक यांजक इदन्मम कहकर यज्ञाग्नि को हवि देता है। वह यज्ञाग्नि उस हवि को अपने ही पास न रखकर इदन्मम कहती हुई ज्वालाओं को देती है और वह ज्वालाएँ याजक की दी हुई हवि को अपने पास नहीं रखती वह भी इदन्मम कहती हुई गगन मण्डल को दे देती हैं। वह गगन मण्डल उस हवि को अपने पास न रखकर इदन्मम का उच्चारण करता हुआ मेघों के अपेग कर देता है और वह मेघ उस हवि को सब के समान उपयोग के अधिकार की वस्तु समझ कर अपने पास न रखकर वर्षा की जल धारा के साथ इदन्मम का मधुर संगीत गा-गा कर नसुन्धरा को सौंप देता है।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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माता अपना सब कुछ पुत्रों को ही दे देती है। वह अपने लिए कुछ भी नहीं रखती, तो यह कैसे हो सकता है कि माता वसुंधरा एक याजक की दी हुई हवि को अपने पास रख सके। वह माता वसुंधरा भी उसे अपने पास नहीं रखती वह सबका अनुकरण करती है। वह लहराती हुई वनस्पति को करतल ध्वनि में इदन्मम का सन्देश सुना-सुना कर अपने पुत्रों के अर्पण कर देती है। इसी प्रकार गौ उस वनस्पति को चर कर अपने स्तनों से इदन्मम के नाद के साथ दूध की धारा यज्ञ में चढ़ाती हैं और हम मानव भी पूर्व की भांति इदन्मम का गान करते हुए यज्ञ में हवि चढ़ाते हैं। यही क्रम प्रतिक्षण पुनः पुनः चक्राकार में इदन्मम के गान का चलता रहता है।

इसलिए जो अग्निहोत्र हवन करता है वह सम्पूर्ण प्रजा का पालन करता है।

सूर्य अपनी किरणों द्वारा निरन्तर सब जगत के रस, गन्ध, दुर्गन्ध आदि को ऊपर खींचता रहता है। पुष्यादि की सुगन्ध, दुर्गन्ध का निवारण करती रहती है। जब सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनों के समान परमाणु सूर्य की किरणों द्वारा ब्रह्माण्ड में पहुँच कर वायु को मध्यम कोटि का बना देते हैं, उस मध्यम कोटि के वायु से मध्यम कोटि की जल वृष्टि होती है और मध्यम कोटि की जल वृष्टि से अन्न और वनस्पति आदि भी मध्यम कोटि के होते हैं। उस अन्न से मनुष्यों के शरीर बल, वीर्य, बुद्धि, पराक्रम, धैर्य और शूरवीरतादि गुण भी मध्यम कोटि के होते हैं। क्योंकि जिसका जैसा कारण होता है वैसा ही उसका कार्य। इसी प्रकार जब मनुष्य अपने सुख लाभ के कारण अनेक प्रकार से दुर्गन्ध बढ़ाने वाले कार्य करता है, जैसे धूमपान, नवीन-नवीन प्रकार के कल-कारखाने जिसके द्वारा विषाक्त धूम उत्पन्न होता है वह सब वायु को अधिक दुर्गन्ध युक्त करके निकृष्ट बना देता है जिसका फल यह होता है कि उस निकृष्ट वायु से जल वृष्टि

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वीरेन्द्र गुप्तः

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आदि द्वारा अन्नादि और अन्नादि द्वारा मनुष्यों के शरीर, बल, बुद्धि, पराक्रमादि गुण और सभी कार्य निकृष्ट हो जाते हैं। जबकि वायु को दुर्गन्ध और निकृष्ट करने वाले मनुष्य ही हैं तो उसका निवारण भी मनुष्यों को ही करना उचित है। वह निवारण यज्ञ द्वारा ही हो सकता है। मनुष्य अपने कृत्यों द्वारा जितनी दुर्गन्ध उत्पन्न करता है। तो उसे उचित है कि उस दुर्गन्ध से अधिक न हो तो कम से कम दुर्गन्ध के बराबर ही सुगन्ध को भी यज्ञ द्वारा उत्पन्न करे।

हो सकता है आप कहें कि यज्ञ द्वारा ही सुगन्ध को क्यों उत्पन्न किया जाय। हम उसे पुष्प, तेल, इत्र, आदि का उपयोग करके उत्पन्न कर सकते हैं। परन्तु मेरे मित्र! इत्र आदि की सुगन्ध आप तक ही सीमित रहती है, और अग्नि उसके तत्वों को विकसित करके, वायु उसे दूर तक प्रसारित कर देती है। जिस प्रकार एक लाल मिर्च खाने से उसी खाने वाले को चरपरी लगती है और उसी को कष्ट देती है। यदि वही लाल मिर्च अग्नि के अर्पण कर दी जाय तो एक ही मिर्च अग्नि और वायु के सहयोग से दूर तक मनुष्यों को व्याकुल कर देती है, और अधिक समय तक मनुष्य खाँसते, छींकते रहते हैं। इसलिए उस इत्र पुष्पादि सुगन्धित पदार्थ को अपने पास न रखकर उसे अग्नि के अर्पण करके सबका उपकार करना उचित है।

हमारे पूर्वज दैनिक यज्ञ से लेकर अश्वमेध यज्ञ तक किया करते थे। उस समय वायु उत्तम होकर जल वृष्टि अन्नादि भी उत्तम होते थे और उस उत्तम अन्न जल का पान करके मनुष्यों का शरीर, बल, वीर्य, बुद्धि, पराक्रम, धैर्य, शूरवीरतादि गुण उत्तम होकर समस्त विश्व को ज्ञान देकर चक्रवर्ती राज्य द्वारा सुखोपम व्योत्था का संचालन करते थे।

जो यज्ञ करता है वह अपना और अपने देश का भला करता है।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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‘किशमिश, मुनक्का और मिश्री’ इन तीनों में से एक या तीनों ही तथा गुगल और चन्दन धूरा मिलाकर आंगन मे डालने से अनेक रोगों के कीटाणुओं को नष्ट करके वायु को शुद्ध करता है।

जिस समय भारतवर्ष के प्रत्येक परिवार में दैनिक यज्ञ करने की प्रथा थी उस समय हमारा देश इतने रोगों से प्रसित न था जितना आज है। यज्ञ से वायु शुद्ध होकर रोगों के कीटाणुओं को नष्ट करके आरोग्यता प्रदान करती है। हे भारतवासियों अपने पूर्वजों के नियमों को अपनाओ और भारत को रोग रहित तथा हष्ट-पुष्ट बनाओ।

“धुएँ के लाभ दिखलाते हुए फ्रांस के विज्ञानवेत्ता अध्यापक ट्रिलवर्ट कहते हैं कि जलती हुई शक्कर में, वायु शुद्ध करने की बहुत बड़ी शक्ति है। उन्होंने इसके प्रयोग भी दिखलाये हैं। वे कहते हैं कि इससे क्षय, चेचक, हैजा आदि बीमारियाँ तुरन्त नष्ट हो जाती हैं। इसी तरह डा॰ एम॰ ट्रेल्ट ने मुनक्का, किशमिश आदि फलों को (जिसमें शक्कर अधिक होती है) जला कर देखा है। उनको मालूम हुआ है कि उनमें धुएँ से टाइफाइड के रोगकीट ३० मिनट में और दूसरे रोगों के कीट घन्टे दो घन्टे में नष्ट हो जाते हैं। मद्रास के सेनेटरी कमिश्नर डाक्टर कर्नल किंग आई॰एम॰एस॰ ने कालेज के विद्यार्थियों को उपदेश किया है कि घी और चावल में केसर मिलाकर जलाने से रोग जन्युओं का नाश हो जाता है। फ्रांस का डाक्टर हैफकिन कहता है कि घी के जलाने से रोगकीट मर जाते हैं। इन प्रमाणों से पाया जाता है कि विचारपूर्वक स्थिर किये हुए रोगनाशक पदार्थों के धुएँ से लाभ ही होता है।”

वैदिक सम्पत्ति प्रकरण हवन और वैज्ञानिक शंका अमरीका के एक डा॰ ने टी॰बी॰ के कीटाणुओं के नष्ट करने के लिए औषधि खोज निकालने का निश्चय किया। वह इच्छानुसार सन्तान ५१ वीरेन्द्र गुप्तः

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अपनी प्रयोगशाला में बैठा है। उसके सामने एक मेज पर बार्यों और अनेक टी-बी के कीटाणुओं की प्लेटें रखी हुई हैं। बीच में अनेक प्रकार की औषधियों की शीशियाँ रखी हैं। दायीं ओर वह प्लेटें रखी हैं जिन पर टी-बी के कीटाणुओं की प्लेटों पर परीक्षा के लिए औषधियाँ लगी हैं। डा० का आदेश था कि उसकी प्रयोगशाला में कोई भी न आये केवल उसकी पत्नी ही आ सकती है। वह भी बिना किसी आहट के, समय पर चाय आदि रख जाय। एक दिन ठण्ड अधिक पड़ रही थी। डा० की पत्नी चाय देने के लिए प्रयोगशाला में गई उसने बार्यों और पास में रखी अंगीठी पर चाय की कोतली रख दी और चमचे से कोतली में चीनी डालने लगी। ठण्ड के कारण से हाथ काँप गया और थोड़ी सी चीनी आग में जा गिरी अंगीठी से धूम उठने लगा वह डर के कारण शीघ्र ही भाग आया। इसी बीच डा० एक प्लेट को औषधि लगा रहा था उसने प्लेट को औषधि लगाकर दायीं ओर रखी और बार्यों ओर से दूसरी प्लेट उठायी ज्योंही उसने उस प्लेट पर औषधि लगाने को हुआ तो उसने देखा कि उस प्लेट के कीटाणु मरे हुए हैं। वह एकदम चकराने लगा और कहने लगा यह कैसे मरे जबकि इन कोई भी औषधि नहीं लगाई गई, उसने देखा बार्यों ओर जितनी प्लेटें रखी थीं उन सभी प्लेटों के कीटाणु मर गये थे। उसका ध्यान अंगीठी से उठते धूम पर गया उसने औषधि लगी प्लेट को उड़ाया और अंगीठी से उठते हुए धूम से लगाया प्लेट को धूम लगते ही उसके कीटाणु मर गये। उसने उसी समय पत्नी को बुलाया। वह घरवा उठी। डा० ने पूछा कि तुमने अंगीठी में क्या डाला है घरवाओ मत सही-सही बताओ तब उसने सही बात कह दी। डा० ने पुनः अपने हाथ से चीनी अंगीठी की आग पर डाली और जीवित कीटाणुओं की प्लेटों को उसका धूम लगाया धूम के लगने से सारे कीटाणु मर गये। डा० ने उसी समय घोषणा की कि यह रोग भारत में नहीं होता क्योंकि भारत के पूर्वजों ने पहले

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वीरेन्द्र गुप्तः

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प्राणायाम

से ही नित्य यज्ञ करने की प्रथा डाली थी और यज्ञ की हवि में चीनी, मीठा मिलाया ही जाता है।

न वै स्वयं तदशीयादितिथि यन्न भोजयेत्।

धन्य यशस्यमायुष्य स्वार्थं वाजितिथिपूजनम्॥

मनु ३/१०६

अर्थ- जो अतिथि को भेजनार्थ न दे उसमें से आप भोजन न करें, यह अतिथि पूजन धन्य है, धन हितार्थ, यश, आयु तथा स्वर्ग का देने वाला है।

अब आप समझ गये होंगे कि यह पीछों यज्ञ मनुष्य जीवन में कितने उपयोगी हैं। नित्य नियमित रूप से करने के लिए स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की लिखित पंच महायज्ञ विधि में देखें।


प्राणायाम

मनुष्य शरीर में सबसे अधिक महत्व का अंग है तो वह फेफड़े हैं। फेफड़े हर समय श्वास की गति के साथ दृषित रक्त को लेकर उसे शुद्ध करके बाहर धमनियों में भेज देते हैं। जब मशीन से कार्य नहीं लिया जाता है तो उसे जंग लग जाती है। और अन्त में वह मशीन बेकार होकर समाप्त हो जाती है। यही स्थिति हमारे फेफड़ों की है। हम जो श्वास हर समय लेते हैं वह इतनी गति का नहीं होता कि वह फेफड़े के सबसे निचले भाग में वायु पहुँचा सके। सबसे निचले भाग में वायु पहुँचाने के लिए और उसे बेकार होने से बचाने के लिए पूर्वजों ने प्राणायाम को रखा है। फेफड़े के सबसे निचले भाग में जब वायु नहीं पहुँचेगी तो फेफड़े के उस भाग के छिद्रों में रक्त शुद्ध होने के लिए नहीं पहुँचेगा, और जब रक्त शुद्ध होने के लिए नहीं पहुँचेगा तो वह भाग कर्महीन होता हुआ उसी प्रकार बेकार हो जायेगा जिस प्रकार

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वीरेन्द्र गुप्तः

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प्रयोग में न आने वाली मशीन जंग लगकर बेकार हो जाती है। इसी प्रकार फेफड़े का निचला भाग बिगड़ने लगता है जिस कारण सबसे भयंकर रोग क्षय (टी॰बी॰) हो जाती है। फेफड़े के गल जाने को ही क्षय (टी॰बी॰) कहते हैं। दूसरे हमारी आयु श्वासों पर आधारित है। नित्य के कार्यों में जैसे भागना, अधिक परिश्रम का कार्य करना, सोना, मैथुन आदि में स्वभाविक श्वैसों की अपेक्षा अधिक श्वैसों का व्यय होता है। उसकी पूर्ति करने के लिए प्राणायाम करना आवश्यक है। प्राणायाम से तेज, बल, स्मृति भी प्राप्त होती है इसलिए प्रत्येक मनुष्य को नित्य कम से कम ३ प्राणायाम तो अवश्य ही करने चाहिए। यदि इससे अधिक करें तो और भी उत्तम है। नित्य प्राणायाम के अभ्यासी को फेफड़ों का कोई भी भयानक रोग नहीं लगता; प्राणायाम से क्षय (टी.बी.) श्वैस रोग, नजला जुकाम आदि अनेक रोग शरीर से दूर रहते हैं और शरीर पुष्ट रहता है।

प्रथम श्वैस को तीव्रगति से बाहर फेंकना और बाहर ही रोकना और पुनः गहरा श्वैस तीव्रगति से भीतर खींचकर रोकना। जब दम घुटने लगे तो धीरे-धीरे श्वैस को बाहर निकालना। यह एक प्राणायाम हुआ, श्वैस को बाहर निकालने को रेचक कहते हैं और श्वैस को बाहर ही रोकने को रेचक कुम्भक कहते हैं। श्वैस को अन्दर खींचने को पूरक कहते हैं और श्वैस को अन्दर ही रोकने को पूरक कुम्भक कहते हैं। श्वैस खींचने में जितना समय लगे उससे चौगुना रोकने में, और उससे दुगुना श्वैस को बाहर छोड़ने में लगाना चाहिए।

शरद ऋतु में भत्रिका प्राणायाम करने से ठण्ड का विकार नहीं होता और फेफड़े सुदृढ़ होते हैं। भत्रिका प्राणायाम श्वैस को तीव्रगति के साथ लेना और छोड़ना। जैसे बाजे की धौकनी निरन्तर बिना रुके चलती है उसी प्रकार श्वैस बिना रोके जल्दी जल्दी लम्बे खींचना और छोड़ना।

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प्राणायाम के अनेक भेद हैं जिन्हें समझने के लिए किसी योग्य शिक्षक की आवश्यकता है। परन्तु प्रत्येक व्यक्ति को योग्य शिक्षक मिल जाय, यह सम्भव नहीं। इसी कारण अधिकांश व्यक्ति प्राणायाम के लाभ से वंचित रह जाते हैं। शुद्ध खाद्य पदार्थों के अभाव में मानव की जठराग्नि दिन प्रतिदिन क्षीण होती जा रही है जिसके कारण से मानव में 'वात और कफ' सम्बन्धी रोग बढ़ते चले जा रहे हैं। शरीर में ऊष्मा कम होने पर ही शरीर शिथिल होने लगता है। शरीर की ऊष्मा को सही अनुपात में स्थित रखने के लिए हमारे योगियों ने 'भस्त्रिका' प्राणायाम करने की व्यवस्था दी है, जिसके द्वारा शरीर में ऊष्मा उचित मात्रा में उत्पन्न होकर जठराग्नि को बलिष्ठ बनाता है और जठराग्नि के बलिष्ठ होने से पाचन क्रिया सही होती है, पाचन क्रिया सही होने से भोजन का रस उत्तम बनता है और उत्तम रस से शरीर की सभी धातुएँ पुष्ट होकर शरीर निरोगी बनता है और 'वात-कफ' सम्बन्धी समस्त रोगों से मुक्ति पाता है। 'भस्त्रिका' प्राणायाम को प्रत्येक व्यक्ति बड़ी सुामता से घर बैठे कर सकता है, यह प्राणायाम कई प्रकार से होता है उसके कुछ प्रकार हम यहाँ प्रस्तुत करते हैं।

१- पद्यासन या सुखासन में बैठ कर अपने दाहिने हाथ का अंगूठा नासिका को दाहिनी ओर रखें और बाँच की दो अंगुलियाँ नासिका के बायीं ओर रखें पहले अंगुलियों से बायें नथने को दबा कर बन्द करें और दाहिने नथने से लम्बा श्वास खींच कर अंगूठे से दबा कर बन्द करें बायें नथने से अंगुलियाँ हटाकर श्वास को लम्बाई के साथ बाहर छोड़ें, जब पूरा श्वास बाहर निकल जाये तो उसी नथने से श्वास खींचें। इसी प्रकार जिस नथने से श्वास खींचा है उससे दूसरे नथने से श्वास छोड़ें और जिससे श्वास छोड़ी है उसी से श्वास खींच कर दूसरे नथने से छोड़ें। इसी प्रकार इस क्रिया को करते रहना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार क्रिया को तीव्र करते रहें और पहले २ मिनट से अध्यास

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वीरेन्द्र गुप्तः

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करें और शनैः शनैः समय बढ़ाते जायें।

२- केवल एक नथने को बन्द करके दूसरे नथने से लम्बे-लम्बे श्वैस खींचना और छोड़ना, कुछ देर पश्चात् इसी क्रिया को दूसरे नथने से करना।

३- सीधे बैठ कर नासिका को बिना हाथ लगाये दोनों नथनों से एक साथ श्वैस खींचना और छोड़ना।

४- सीधे बैठ कर बाँयें हाथ को कमर के पीछे भूमि पर पंजा खोल कर रखें हाथ का अंगूठा नितम्ब के मध्य रीढ़ की हड्डी के पास लगा दो दाहिने हाथ के अंगूठे से नासिका के दायें नथने को बन्द करके और ठोड़ी को बायें कन्धे के पास तक घुमाकर बायें नथने से लम्बे लम्बे श्वैस खींचें और छोड़ें इसी प्रकार दायी हाथ कमर के पीछे रखकर हाथ का अंगूठा नितम्ब के मध्य रीढ़ की हड्डी के पास लगाकर बायें हाथ के अंगूठे से बायीं नथना बन्द करके और ठोड़ी को दायें कन्धे के पास घुमाकर दायें नथने से लम्बे लम्बे श्वैस खींचें और छोड़ें।

५- सीधे बैठ कर दोनों नथनों से एक साथ सीधा श्वैस न खींच कर उसे समान बराबर के छः टुकड़ों में खींचें और इसी अनुपात के तीन टुकड़ों के समय तक रोकने के पश्चात् उपरोक्त छः टुकड़ों के समान ही छः टुकड़ों में बाहर छोड़ें और उसी अनुपात के तीन टुकड़ों के समय तक बाहर ही रोकें यह एक प्राणायाम हुआ इसी प्रकार पांच प्राणायाम करें और सामर्थानुसार बढ़ाते जायें।

यह पांचों प्रकार के प्राणायाम भक्तिका प्राणायाम ही हैं, यह दोष रहित प्राणायाम हैं, इनके करते रहने में किसी भी प्रकार की हानि पहुँचने की सम्भावना नहीं है। हर प्रकार के प्राणायाम के समय कमर, रीढ़ की हड्डी सीधी रहनी चाहिये और मूलबन्ध बराबर लगा रहना चाहिए मूलबन्ध का अर्थ है गुदा और मूत्रेन्द्रिय को ऊपर खींचे रहना। प्रत्येक प्रणायाम को पहले हल्के-हल्के

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आहार

करना चाहिए, कुछ दिनों के अभ्यास के पश्चात् गति और मात्रा को अपनी शक्ति और सामर्थ्यानुसार बढ़ाते रहना चाहिए। प्राणायाम का समय प्रातः काल का उचित है। यह अपने गृह पर एकाग्रता और स्वच्छ कमरे में बैठ कर करना चाहिए, ग्रीष्म ऋतु में द्वार खिड़की आदि को खोल देना चाहिए और शरद ऋतु में बन्द कर सकते हैं। प्राणायाम के अभ्यासी को घी और दूध की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए।

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आहार

भोजन हर प्राणी को जीवित रहने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। भोजन से शरीर में रस, रक्त, मांस, मेष, अस्थि मज्जा और वीर्य पदार्थ बनकर मन, वाणी और तेज को प्राप्त होते हैं। भोजन से बल पुरुषार्थ और बुद्धि भी बनती है। जिस प्रकार का और जिस भावना के वातावरण के साथ मनुष्य भोजन करेगा। उसका मन, भावना और बुद्धि वैसी ही बन जायेगी। यदि भोजन करते समय मन को अन्दर काम भाव आये और आपने काम भावनाओं से युक्त चित्रों से सुसज्जित कमरे में बैठ कर भोजन किया है, तो आपकी काम भावना भोजन के पश्चात् पहले की अपेक्षा चौगुनी हो जायेगी। उसी प्रकार बुद्धि की तीव्रता, बल और तेज की प्राप्ति के लिए, जैसी आपकी इच्छा हो, वैसी ही भावना और वैसे ही चित्रों से सुसज्जित कमरे में बैठकर भोजन करें। आपको जैसा अपना मन, बुद्धि आदि बनानी हो, भोजन से और भोजन समय की भावनाओं से वैसा ही मन बन जाता है। भोजन समय की भावनाओं द्वारा मनुष्य अपने मन, बुद्धि को जिधर ले जाना चाहे ले जा सकते हैं।

अनमशितं त्रेधा विधीयते तस्य वः छान्दोग्य स्यविस्तो धातुस्तत् पुरीष भवति, यो उपनिषद् मध्यम स्तन्मा थं सं योऽणिष्ठस्तन्मनः॥ ६/५/१

इच्छानुसार सन्तान ५७ वीरेन्द्र गुप्ताः

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अर्थ- जब 'अन्न' खाना खाया जाता है, तो वह तीन प्रकार का बन जाता है उसका सबसे स्थूल भाग मल बन जाता है, जो मध्यम भाग है वह मांस और जो सबसे सूक्ष्म भाग है वह मन बन जाता है।

आपः पीता स्नेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातु स्तन्मूर्त्रं भवति यो मध्यम • स्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः॥

छान्दोग्य ३- ६/५/२

अर्थ- जब जल पिया जाता है, तो वह तीन प्रकार का बन जाता है, उसका जो सबसे स्थूल भाग है वह मूर्त्र बन जाता है, जो मध्यम भाग है वह रुधिर और सबसे सूक्ष्म भाग है वह प्राण बन जाता है।

तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातु स्तदस्थि भवति, यी मध्यमः समज्जा योऽणिष्ठः सा वाक्॥

छान्दोग्य ३- ६/५/३

अर्थ- जब तेज (अर्थात् जो तेल घी आदि में है वा जो अन्न में मिला हो) खाया जाता है, तो वह तीन प्रकार का बन जाता है, जो स्थूल भाग है वह हृद्धी बन जाता है, जो मध्यम भाग है वह मज्जा और सबसे सूक्ष्म भाग है वह वाणी बन जाता है।

प्रत्येक वस्तु अन्न जल और तेज, तीनों की बनी हुई है, इस लिए जो कोई वस्तु खाता है, उसमें इन तीनों का भाग पाया जाता है, चाहे उनका न्यूनाधिक भाग कुछ ही हो।

उपरोक्त प्रणाली से आप अनुमान लगालें कि अन्न, जल और घी आदि भोजन से क्या-क्या बनता है। इसलिए संस्कारित शुद्ध और ताजा भोजन खाना चाहिए, बासी भोजन आलस्य उत्पन्न और बुद्धि को मन्द कर देता है।

इच्छासम्पन्न संततः तीर्थेन्द्र गुप्तः CC-0 Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पुजितं हृशन नित्यं बलमूर्ज च यच्छति। अपुजितं तु तद भुक्तमुभयं नाशयेदितम्।।

मनु २/५५

अर्थ- संस्कृत अन्न वीर्य को देता है और असंस्कृत अन्न बल, सामर्थ्य इन दोनों का नाश करता है। (इसलिए शुद्ध पवित्र भोजन बलिवैश्य यज्ञ करके खाना चाहिए)

भोजन का स्थान एकात्म, स्वच्छ, पवित्र और सुन्दर होना चाहिए। क्रोध तथा शोक के समय में खाया हुआ भोजन शरीर में रस के स्थान पर विष बनाता है। इसलिये क्रोध और शोक के समय भोजन न करना चाहिए। भोजन के पात्र सुन्दर, आकर्षक और स्वच्छ हों।

भोजन के समय माता, पिता, वैद्य, मित्र, परिवार जन और पाककर्ता के अतिरिक्त अन्य किसी को समीप न रहने दो तथा मोर, चकोर, वानर, मुर्गा की दृष्टि के अतिरिक्त अन्य का दृष्टिपात योग्य नहीं।

भोजन करने के प्रथम अदरक और लवण की बनी चटनी खा लेनी चाहिए, इससे रुचि बढ़ती है और ग्रन्थियां खूब रस देने लगती हैं। यह रस पाचन में विशेष स्थान रखता है। तत्पश्चात् मधुर चिकना हलन्गरी घी, चावल, मीठा, फल, दही, रोटी उत्तम शाक के साथ धीरे-धीरे खाना चाहिए और अन्त में रुचिपूर्वक मिश्री युक्त दूध पियें। भोजन के आदि में जल पीने से मन्दाग्नि तथा भोजन के अन्त में जल पीने से विष सद्गुण और कफ को बढ़ाने वाला होता है। इसलिए भोजन के मध्य में थोड़ा सा जल धीरे-धीरे पीना चाहिए। जो अमृत के तुल्य है। भोजन के उपरान्त एक घण्टे के पश्चात् जल पीने से बल बढ़ता है।

अजीर्णं भैषजं वारि जीर्णं वारि बलप्रदम्।

भोजने चामृत वारि भोजनान्ते विषप्रदम्।।

चाणक्य नीति ८/७

इच्छानुसार सन्तान

५९

वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- जल अजीर्ण (कब्जा) में औषधि है, पच जाने पर बल देने वाला है भोजन के मध्य में जल अमृत के समान है, और वही भोजन के अन्त में विष का फल देता है।

भोजन करते समय इस बात का ध्यान रखना उचित है कि आधा पेट भोजन से भर लें और चतुर्थ भाग जल से तथा शेष चतुर्थ भाग वायु के लिए रिक्त रहने दें। इस प्रकार की मात्रा से भोजन कभी अजीर्ण नहीं करता और सदैव सुख देता है। अधिक प्यास लगी होने पर भोजन नहीं करना चाहिए। भोजन करने से गुल्म रोग हो जाता है, इसलिए जल पीकर एक घण्टे पश्चात् भोजन करें। भूख लगने पर जल नहीं पीना चाहिए। जल पी लेने से जलोदर हो जाता है। भोजन सदैव सादा हल्का शीघ्र ही पच जाने वाला खाना चाहिए। अधिक मसालेदार भोजन से हानि होती है। भोजन को भली प्रकार चबा-चबाकर खाना चाहिए। एक-एक ग्राम को ३२ बार चबाना चाहिए जिससे उसमें लार गिल्हियों का रस पूरी मात्रा में मिलकर पाचन क्रिया को ठीक रखे। प्रभु ने दंत भोजन पीसने को दिये हैं और आँतें पचाने के लिए। जो मनुष्य दंतों का काम आँतों से लेते हैं वह सदैव रोगी रहते हैं। उनकी आँतें शक्ति हीन होकर अपना भी कार्य करने में असमर्थ हो जाती हैं। भोजन सदैव निश्चित समय पर ही करना उचित है। कहावत है कि हजार काम छोड़ कर नहाना और सौ काम छोड़कर खाना। भोजन हाथ पैर और मुख थोकर करना चाहिए इससे आयु और बल बढ़ता है।

शतं विहाय भोकव्यं, सहस्रं स्नान माचरेत्। लक्षं विहाय दातव्यं, कोटिं त्यक्त्वा हरि भजेत्॥

महाभारत

अर्थ- सौ काम छोड़कर भोजन करना, हजार काम छोड़कर स्नान करना चाहिये, लाख काम छोड़कर दान और करोड़ों कामों को त्यागकर प्रभु चिन्तन अर्थात् सन्ध्यापासनादि करना चाहिये।

इच्छानुसार सन्तान

६०

वीरेन्द्र गुप्तः

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आर्त्तादास्तु भुंजीत नाद्रपदास्तु सविशोत्। आद्रपदिस्तु भुजानो दीर्घमायुखात्नयात्।।

मनु ४/७६

अर्थ- गीले पैर भोजन करे, किन्तु गीले पैर सोवे नहीं। क्योंकि गीले पैर भोजन करने वाला दीर्घायु पाता है। न स्नानमाचरेद्भुक्त्वा नातुरो न महानिधि। न वासोभिः सुहजस्त्रं नाडविज्ञाते जलाशये।।

मनु ४/१२९

अर्थ- भोजन करके, रोग में, मध्य रात्रि में, कपड़ों के साथ और जहाँ पानी गहरा हो और विदित न हो ऐसे जलाशय तथा समय में स्नान न करे।

भोजन के पश्चात् हाथ मुख धोकर दोनों हाथों को मसल कर नेत्र और मुख पर फेरने से तेज और ज्योति बढ़ती है। मस्तिष्क और सर पर हाथ फेरने से बुद्धि बढ़ती है। भोजन करके १०० कदम टहलो कार्यवश बैठे रहने से शरीर भारी होता है, सीधे खाट पर लेटे रहने से अन्न नहीं पचता और दौड़ने वाले के साथ तो मानो मृत्यु ही दौड़ती है। रात्रि को सोते समय दूध अवश्य ही पीना चाहिए। क्योंकि दूध पीने से जो दिन में विदाही लवण, कटु, तिक आदि पदार्थ खाये जाते हैं, उनका विदाह शान्त होकर मीठा हितकारी पाक होता है।

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इच्छानुसार सन्तान

६१

वीरेन्द्र गुप्तः

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संध्या समय

संध्या समय

कुर्वैलिन दन्तलोपधारिणं

बाहवशिणं निष्कुरभाषिणं च।

सूर्यादये चास्तिमिते शयान

विमुञ्चति श्रीयदि चक्रपाणिः॥

चाणक्य नीति १५/४

अर्थ- मलीन वस्त्र वाले को, दांतों के मल को दूर न करने वाले को, बहुत भोजन करने वाले को कटुभाषी को और सूर्य के उदय और अस्त के समय में सोने वाले को लक्ष्मी छोड़ देती है। चाहे वह विष्णु भी हों।

संध्या समय १. भोजन २. मैथुन ३. अध्ययन और ४. निद्रा यह चार कार्य मत करो, क्योंकि संध्या के भोजन से रोग मैथुन से भयंकर सन्तान होती है।

जब दिति स्त्री धर्म से शुद्ध हुई तब उसने संध्या समय भोग करने की इच्छा करके कश्यप जी अपने पति के पास जाकर कहा, कि इस समय मुझे कामदेव दुःख दे रहा है व मेरे सौत के बेटे राजसिंहासन का सुख भोगते हैं। यह दुःख मुझसे सहा नहीं जाता, सो मेरी चिन्ता दूर कीजिए। यह वचन सुनकर मरीचि के बेटा कश्यप मुनि बोले हे दिति! इस समय तेरे साथ भोग व विलास, जो बहुत बुरा काम है नहीं कर सकता, संध्या से चार घड़ी रात बीते तक व चार घड़ी रात रहे से प्रातः काल तक सवाय लेने नाम व करने ध्यान परमेश्वर के दूसरा काम न करना चाहिए। इसलिए तू चार घड़ी और धैर्य रख जिसमें परमेश्वर के भजन व स्मरण का समय बीत जावे। उस समय दिति कामदेव के मद में ऐसी मतवाली हो रही थी कि अपने पति के समझाने पर भी उसने सन्तोष नहीं करके लाज व शर्म को छोड़ दिया व

इच्छानुसार सन्तान

६२

वीरेन्द्र गुप्तः

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