ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३१२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
नहीं होते तो कौन जीवित रह सकता और कौन प्राणोंकी क्रिया—हिलना-डुलना आदि कर सकता ? अर्थात् समस्त प्राणी सुखस्वरूप परमात्माके ही सहारे जीते और हलन-चलन आदि चेष्टा करते हैं। इतना ही नहीं, सबके जीवन-निर्वाहकी सब प्रकारसे सुव्यवस्था करनेवाले भी वे ही हैं; अन्यथा इस जगत्की समस्त भौतिक क्रिया, जो नियमित और व्यवस्थितरूपसे चल रही है, कैसे हो सकती ? अतः मनुष्यको यह दृढ़तापूर्वक विश्वास करना चाहिये कि इस जगत्के कर्ता-हर्ता परब्रह्म परमेश्वर अवश्य हैं तथा निःसंदेह ये परमात्मा ही सबको आनन्द प्रदान करते हैं। जब आनन्दस्वरूप एकमात्र परमात्मा ही हैं, तब दूसरा कौन आनन्द दे सकता है ?
यदा ह्यैव एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति।
हि=क्योंकि; यदा एव=जब कभी; एषः=यह जीवात्मा; एतस्मिन्=इस; अदृश्ये=देखनेमें न आनेवाले; अनात्म्ये=शरीररहित; अनिरुक्ते=बतलानेमें न आनेवाले; (और) अनिलयने=दूसरेका आश्रय न लेनेवाले परब्रह्म परमात्मामें; अभयम्=निर्भयतापूर्वक; प्रतिष्ठाम्=स्थिति; विन्दते=लाभ करता है; अथ=तब; सः=वह; अभयम्=निर्भयपदको; गतः=प्राप्त; भवति=हो जाता है।
व्याख्या —क्योंकि उन परब्रह्म परमेश्वरको पानेकी अभिलाषा रखनेवाला यह जीव जब कभी देखनेमें न आनेवाले, बतलानेमें न आनेवाले और किसीके आश्रित न रहनेवाले शरीररहित परब्रह्म परमात्मामें निर्भय (अविचल) स्थिति लाभ करता है, उस समय वह निर्भयपदको प्राप्त हो जाता है—सदाके लिये भय एवं शोकसे रहित हो जाता है।
यदा ह्यैव एतस्मिन्नदृशमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति। तत्त्वेव भयं विदुषो मन्वानस्य। तदप्येष श्लोको भवति।
हि=क्योंकि; यदा एव=जबतक; एषः=यह; उदरम्=थोड़ा-सा [ बै= ] भी;
अनु० ७ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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एतस्मिन् अन्तरम्=इस परमात्मासे वियोग; कुरुते=किये रहता है; अथ=तबतक; तस्य=उसको; भयम्=जन्म-मृत्युरूप भय; भवति=प्राप्त होता है; तु=तथा; तत् एव=वही; भयम्=भय; (केवल मूर्खको ही नहीं होता, किंतु) मनवानस्य=अभिमानी; विदुषः=शास्त्रज्ञ विद्वान्को भी अवश्य होता है; तत्=उसके विषयमें; अपि=भी; एषः=यह (आगे कहा हुआ); श्लोकः=श्लोक; भवति=है।
व्याख्या —क्योंकि जबतक यह जीवात्मा उन परब्रह्म परमात्मासे थोड़ा-सा भी अन्तर किये रहता है—उनमें पूर्ण स्थिति लाभ नहीं कर लेता या उनका निरन्तर स्मरण नहीं करता—उन्हें थोड़ी देरके लिये भी भूल जाता है, तबतक उसके लिये भय है, अर्थात् उसका पुनर्जन्म होना सम्भव है; क्योंकि जिस समय उसकी परमात्मामें स्थिति नहीं है, वह भगवान्को भूला हुआ है, उसी समय यदि उसकी मृत्यु हो गयी तो फिर उसका अन्तिम संस्कारके अनुसार जन्म होना निश्चित है; क्योंकि भगवान्ने गीतामें कहा है—‘जिस-जिस भावको स्मरण करता हुआ मनुष्य अन्तकालमें शरीर छोड़ता है, उसीके अनुसार उसे जन्म ग्रहण करना पड़ता है (८।६)’ और मृत्यु प्रारम्भके अनुसार किसी क्षण भी आ सकती है। इसीलिये योगभ्रष्टका पुनर्जन्म होनेकी बात गीतामें कही गयी है (६।४०—४२)। जबतक परमात्मामें पूर्ण स्थिति नहीं हो जाती अथवा जबतक भगवान्का निरन्तर स्मरण नहीं होता, तबतक यह पुनर्जन्मका भय—जन्म-मृत्युका भय सभीके लिये बना हुआ है—चाहे कोई बड़े-से-बड़ा शास्त्रज्ञ विद्वान् क्यों न हो और चाहे कोई अपनेको बड़े-से-बड़ा ज्ञानी अथवा पण्डित क्यों न माने। वे परमेश्वर सबपर शासन करनेवाले हैं, उन्हींकी शासन-शक्तिके जगत्की सारी व्यवस्था नियमितरूपसे चल रही है। इसी विषयपर यह आगे अष्टम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।
॥ सप्तम अनुवाक समाप्त ॥ ७ ॥
—◆◆◆◆◆—
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
अष्टम अनुवाक
सम्बन्ध—पिछले अनुवाकमें जिस श्लोकका लक्ष्य कराया गया था, उसका उल्लेख करते हैं—
भीषास्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषास्मादग्निश्चन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चम इति।
अस्मात् भीषा=इसीके भयसे; वातः=पवन; पवते=चलता है; भीषा=(इसीके) भयसे; सूर्यः=सूर्य; उदेति=उदय होता है; अस्मात् भीषा=इसीके भयसे; अग्निः=अग्नि; च=और; इन्द्रः=इन्द्र; च=और; पञ्चमः=पाँचवाँ; मृत्युः=मृत्यु; धावति=(ये सब) अपना-अपना कार्य करनेमें प्रवृत्त हो रहे हैं; इति=इस प्रकार यह श्लोक है।
व्याख्या—इन परब्रह्म परमेश्वरके भयसे ही पवन नियमानुसार चलता है, इन्हींके भयसे सूर्य ठीक समयपर उदय होता है और ठीक समयपर अस्त होता है तथा इन्हींके भयसे अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु—ये सब अपना-अपना कार्य नियमपूर्वक सुव्यवस्थितरूपसे कर रहे हैं। यदि इन सबकी सुव्यवस्था करनेवाला इन सबका प्रेरक कोई न हो तो जगत्के सारे काम कैसे चले। इससे सिद्ध होता है कि इन सबको बनानेवाला, सबको यथायोग्य नियममें रखनेवाला कोई एक सत्य, ज्ञान और आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मा अवश्य है और वह मनुष्यको अवश्य मिल सकता है*।
सम्बन्ध—उन आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माका यह आनन्द कितना और कैसा है, इस जिज्ञासापर आनन्दविषयक विचार आरम्भ किया जाता है—
सैषाऽऽनन्दस्य मीमाः सा भवति। युवा स्यात्साधुयुवाध्यायक आशिष्टो द्रढिष्टो बलिष्ठस्तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात्। स एको मानुष आनन्दः।
सा=वह; एषा=यह; आनन्दस्य=आनन्दसम्बन्धी; मीमांसा=विचार; भवति=आरम्भ
- इसी भावकी श्रुति कठोपनिषद्में भी आयी है (२।३।३)।
अनु० ८ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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होता है; युवा=कोई युवक; स्यात्=हो; (वह भी ऐसा-वैसा नहीं) साधयुवा=श्रेष्ठ आचरणवाला युवक हो; (तथा) अध्यायक:=वेदोंका अध्ययन कर चुका हो; आशिष्ठ:=शासनमें अत्यन्त कुशल हो; द्रढिष्ठ:=उसके सम्पूर्ण अङ्ग और इन्द्रियाँ सर्वथा दृढ़ हों; (तथा) बलिष्ठ:=वह सब प्रकारसे बलवान् हो; तस्य=(फिर) उसे; इयम्=यह; वित्तय पूर्णा=धनसे परिपूर्ण; सर्वा=सब-की-सब; पृथिवी=पृथ्वी;; स्यात्=प्राप्त हो जाय; (तो) स:=वह; मानुष:=मनुष्यलोकका; एक:=एक; आनन्द:=आनन्द है।
व्याख्या —इस वर्णनमें उस आनन्दका विचार आरम्भ करनेकी सूचना देकर सर्वप्रथम मनुष्यलोकके भोगोंसे मिल सकनेवाले बड़े-से-बड़े आनन्दकी कल्पना की गयी है। भाव यह है कि एक मनुष्य युवा हो; वह भी ऐसा-वैसा मामूली युवक नहीं—सदाचारी, अच्छे स्वभाववाला, अच्छे कुलमें उत्पन्न श्रेष्ठ पुरुष हो; उसे सम्पूर्ण वेदोंकी शिक्षा मिली हो तथा शासनमें—ब्रह्मचारियोंको सदाचारकी शिक्षा देनेमें अत्यन्त कुशल हो; उसके सम्पूर्ण अङ्ग और इन्द्रियाँ रोगरहित, समर्थ और सुदृढ़ हों और वह सब प्रकारके बलसे सम्पन्न हो। फिर धन-सम्पत्तिसे भरी यह सम्पूर्ण पृथ्वी उसके अधिकारमें आ जाय तो यह मनुष्यका एक बड़े-से-बड़ा सुख है। वह मानव-लोकका एक सबसे महान् आनन्द है।
ते ये शतं मानुषा आनन्दाः । स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते=वे; ये=जो; मानुषा:=मनुष्यलोक-सम्बन्धी; शतम्=एक सौ; आनन्द:=आनन्द हैं; स:=वह; मनुष्यगन्धर्वाणाम्=मानव-गन्धर्वोंका; एक:=एक; आनन्द:=आनन्द होता है; च=और (वह); अकामहतस्य=जिसका अन्तःकरण भोगोंकी कामनाओंसे दूषित नहीं हुआ है, ऐसे; श्रोत्रियस्य=वेदवेत्ता पुरुषको स्वभावसे ही प्राप्त है।
व्याख्या —जो मनुष्ययोनियोंने उत्तम कर्म करके गन्धर्वभावको प्राप्त हुए हैं, उनको ‘मनुष्य-गन्धर्व’ कहते हैं। यहाँ इनके आनन्दको उपर्युक्त मनुष्यके
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[ वल्ली २ ]
आनन्दसे सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्य-सम्बन्धी आनन्दका पहले वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर आनन्दकी जो एक राशि होती है, उतना मनुष्य-गन्धर्वोंका एक आनन्द है। परन्तु जो पहले बताये हुए मनुष्यलोकके भोगोंकी और इस गन्धर्वलोकके भोगोंतककी कामनासे दूषित नहीं है, इन सबसे सर्वथा विरक्त है, उस श्रोत्रिय—वेदज्ञ पुरुषको तो वह आनन्द स्वभावसे ही प्राप्त है।
ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः । स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; मनुष्यगन्धर्वाणाम्=मनुष्य-गन्धर्वोंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; देवगन्धर्वाणाम्=देवजातीय गन्धर्वोंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=तथा; (वही) अकामहतस्य=कामनाओंसे अदूषित चित्तवाले; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को स्वभावतः प्राप्त है।
व्याख्या —इस वर्णनमें पहले बताये हुए मनुष्य-गन्धर्वोंकी अपेक्षा देव-गन्धर्वोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्य-गन्धर्वके आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी राशि होती है, उतना सृष्टिके आरम्भसे देवजातीय गन्धर्वरूपमें उत्पन्न हुए जीवोंका एक आनन्द है तथा जो मनुष्य इस आनन्दकी कामनासे आहत नहीं हुआ है अर्थात् जिसको इसकी आवश्यकता नहीं है तथा जो वेदके उपदेशको हृदयङ्गम कर चुका है, ऐसे विद्वान्को वह आनन्द स्वभावतः प्राप्त है।
ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः । स एकः पितूणां चिरलोकलोकानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; देवगन्धर्वाणाम्=देवजातीय गन्धर्वोंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; चिरलोकलोकानाम्=चिरस्थायी पितुलोकको
अनु० ८ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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प्राप्त हुए; पितृणाम्=पितरोंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकाममहतस्य=भोगोंके प्रति निष्काम; श्रोत्रियस्य=वेदज्ञ पुरुषको स्वतः प्राप्त है।
व्याख्या —इस वर्णनमें देव-गन्धर्वोंके आनन्दकी अपेक्षा चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त दिव्य पितरोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि देव-गन्धर्वोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर आनन्दकी जो एक राशि होती है, उतना चिरस्थायी पितृलोकमें रहनेवाले दिव्य पितरोंका एक आनन्द है तथा जो उस लोकके भोग-सुखकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् जिसको उसकी आवश्यकता ही नहीं रही है, उस श्रोत्रियको—वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्तको वह आनन्द स्वतः ही प्राप्त है।
ते ये शतं पितृणां चिरलोकलोकानामानन्दः। स एक आजानजानां देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; चिरलोकलोकानाम्=चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त हुए; पितृणाम्=पितरोंके; शतम्=एक सौ; आनन्दः=आनन्द हैं; सः=वह; आजानजानाम्=आजानज नामक; देवानाम्=देवताओंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और (वह आनन्द); अकाममहतस्य=उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ)को स्वभावतः प्राप्त है।
व्याख्या —इस वर्णनमें चिरस्थायी लोकोंमें रहनेवाले दिव्य पितरोंके आनन्दकी अपेक्षा 'आजानज' नामक देवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि चिरस्थायी लोकोंमें रहनेवाले दिव्य पितरोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंकी मात्राको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना 'आजानज' नामक देवताओंका एक आनन्द है। देवलोकके एक विशेष स्थानका नाम 'आजान' है; जो लोग स्मृतियोंमें प्रतिपादित किन्हीं पुण्य-कर्मोंके कारण वहाँ उत्पन्न हुए हैं, उन्हें 'आजानज' कहते हैं। जो उस लोकतकके भोगोंकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् जो उस आनन्दको भी तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध है।
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[ वल्ली २ ]
ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः। स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः। ये कर्मणा देवानपियन्ति श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; आजानजानाम्=आजानज नामक; देवानाम्=देवोंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; कर्मदेवानाम् देवानाम्=(उन) कर्मदेव नामक देवताओंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; ये=जो; कर्मणा=वेदोंक कर्मोंसे; देवान्=देवोंको; अपियन्ति=प्राप्त हुए हैं; च=और; (वह) अकामहतस्य=उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ)को तो स्वतः प्राप्त है।
व्याख्या —इस वर्णनमें आजानज देवोंके आनन्दकी अपेक्षा कर्मदेवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि आजानज देवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना आनन्द जो वेदोंक कर्मद्वारा मनुष्ययोनिसे देवभावको प्राप्त हुए हैं, उन कर्मदेवताओंका आनन्द है। जो उन कर्मदेवताओंतकके आनन्दकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् जिसको देवलोकतकके भोगोंकी इच्छा नहीं रही है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध है।
ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः। स एको देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते=वे (पूर्वोक्त); ये=जो; कर्मदेवानाम् देवानाम्=कर्मदेव नामक देवताओंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; देवानाम्= देवताओंका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को तो स्वभावतः प्राप्त है।
व्याख्या —इस वर्णनमें कर्मदेवोंकी अपेक्षा सृष्टिके आदिकालमें जिन स्थायी देवोंकी उत्पत्ति हुई है, उन स्वभावसिद्ध देवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि कर्मदेवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया
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है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना उन स्वभावसिद्ध देवताओंका एक आनन्द है। जो उन स्वभावसिद्ध देवताओंके भोगानन्दकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् उसकी भी जिसको कामना नहीं है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले निष्काम विरक्तके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध ही है।
ते ये शतं देवानामानन्दाः। स एक इन्द्रस्यानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते=वे; ये=जो; देवानाम्=देवताओंके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; इन्द्रस्य=इन्द्रका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=इन्द्रतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=वेदवेताको स्वतः प्राप्त है।
व्याख्या —इस वर्णनमें पहले बताये हुए स्वभावसिद्ध देवोंके आनन्दकी अपेक्षा इन्द्रके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि देवताओंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना इन्द्रभावको प्राप्त देवताका एक आनन्द है। जो इन्द्रके भोगानन्दकी कामनासे आहत नहीं हुआ है, अर्थात् जिसको इन्द्रके सुखकी भी आकाङ्क्षा नहीं है—जो उसे भी तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले निष्काम पुरुषको तो वह आनन्द स्वतः प्राप्त है।
ते ये शतमिन्द्रस्यानन्दाः। स एको बृहस्पतेरानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।
ते=वे; ये=जो; इन्द्रस्य=इन्द्रके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; बृहस्पतेः=बृहस्पतिका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=बृहस्पतितकके भोगोंमें निःस्पृह; श्रोत्रियस्य=वेदवेताको स्वतः प्राप्त है।
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[ वल्ली २ ]
व्याख्या —इस वर्णनमें इन्द्रके आनन्दकी अपेक्षा बृहस्पतिके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि इन्द्रके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है; वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना बृहस्पतिके पदको प्राप्त हुए देवताका एक आनन्द है। परंतु जो मनुष्य बृहस्पतिके भोगानन्दकी कामनासे भी आहत नहीं है, उस भोगानन्दको भी अनित्य होनेके कारण जो तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो चुका है, उस वेदके रहस्यको जाननेवाले निष्काम मनुष्यको वह आनन्द स्वतः प्राप्त है।
ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः । स एकः प्रजापतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते=वे; ये=जो; बृहस्पतेः=बृहस्पतिके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; प्रजापतेः=प्रजापतिके; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=प्रजापतितकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=वेदेवेता पुरुषको स्वतः प्राप्त है।
व्याख्या —इस वर्णनमें बृहस्पतिके आनन्दकी अपेक्षा प्रजापतिके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि बृहस्पतिके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना प्रजापतिके पदपर आरूढ़ देवताका एक आनन्द है। परंतु जो मनुष्य इस प्रजापतिके भोगानन्दकी कामनासे भी आहत नहीं है, अर्थात् उससे भी जो विरक्त हो चुका है, उस वेदके रहस्यको जाननेवाले निष्काम मनुष्यको तो वह आनन्द स्वभावसे ही प्राप्त है।
ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः । स एको ब्रह्मण आनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते=वे; ये=जो; प्रजापतेः=प्रजापतिके; शतम्=एक सौ; आनन्दाः=आनन्द हैं; सः=वह; ब्रह्मणः=ब्रह्माका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है; च=और; (वह) अकामहतस्य=ब्रह्मलोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ)को स्वभावतः प्राप्त है।
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व्याख्या —इस वर्णनमें प्रजापतिके आनन्दसे भी हिरण्यगर्भ ब्रह्माके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि प्रजापतिके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो एक आनन्दकी राशि होती है, उतना सृष्टिके आरम्भमें सबसे पहले उत्पन्न होनेवाले हिरण्यगर्भ ब्रह्माका एक आनन्द है तथा जो मनुष्य उस ब्रह्माके पदसे प्राप्त भोगसुखकी कामनासे भी आहत नहीं है, अर्थात् जो उसे भी अनित्य और तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, जिसको एकमात्र परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त करनेकी ही उत्कट अभिलाषा है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषको वह आनन्द स्वतः प्राप्त है।
इस प्रकार यहाँ एकसे दूसरे आनन्दकी अधिकताका वर्णन करते-करते सबसे बढ़कर हिरण्यगर्भके आनन्दको बताकर यह भाव दिखाया गया है कि इस जगत्में जितने प्रकारके जो-जो आनन्द देखने-सुनने तथा समझनेमें आ सकते हैं, वे चाहे कितने ही बड़े क्यों न हों, उस पूर्णानन्दस्वरूप परमात्माके आनन्दकी तुलनामें बहुत ही तुच्छ हैं। बृहदारण्यकमें कहा भी है कि 'समस्त प्राणी इसी परमात्मसम्बन्धी आनन्दके किसी एक अंशको लेकर ही जीते हैं (४।३।३२)।'
स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः। स य एवंविदस्माल्लोकात्प्रेत्य। एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति। तदप्येष श्लोको भवति।
सः =वह (परमात्मा); यः =जो; अयम् =यह; पुरुषे =मनुष्यमें; च =और; यः =जो; असौ =वह; आदित्ये च =सूर्यमें भी है; सः =वह (सबका अन्तर््यामी); एकः =एक ही है; यः =जो; एवंवित् =इस प्रकार जाननेवाला है; सः =वह; अस्मात् लोकात् =इस लोकसे; प्रेत्य =विदा होकर; एतम् =इस; अन्नमयम् =अन्नमय; आत्मानम् =आत्माको; उपसंक्रामति =प्राप्त हो जाता है; एतम् =इस; प्राणमयम् =प्राणमय;
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[ वल्ली २ ]
आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त होता है; एतम्=इस; मनोमयम्=मनोमय; आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त होता है; एतम्=इस; विज्ञानमयम्=विज्ञानमय; आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त होता है; एतम्=इस; आनन्दमयम्=आनन्दमय; आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त होता है; तत्=उसके विषयमें; अपि=भी; एषः=यह (आगे कहा जानेवाला); श्लोकः=श्लोक; भवति=है।
व्याख्या —ऊपर बताये हुए समस्त आनन्दोंके एकमात्र केन्द्र परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही सबके अन्तर्यामी हैं। जो परमात्मा मनुष्योंमें हैं, वे ही सूर्यमें भी हैं। वे सबके अन्तर्यामी एक ही हैं। जो इस प्रकार जान लेता है, वह मरनेपर इस मनुष्य-शरीरको छोड़कर उस पहले बताये हुए अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है। तात्पर्य यह कि इन पाँचोंके जो आत्मा हैं, वे पाँचों जिनके स्वरूप हैं, उन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। पहले इन पाँचोंका वर्णन करते समय सबका शरीरान्तर्वर्ती आत्मा अन्तर्यामी परमात्माको ही बतलाया था। फलरूपमें उन्हींकी प्राप्ति होती है और वे ही ब्रह्म हैं—यह बतलानेके लिये ही यहाँ पाँचोंको क्रमसे प्राप्त होनेकी बात कही गयी है। वास्तवमें इस क्रमसे प्राप्त होनेकी बात कहना अभीष्ट नहीं है; क्योंकि अन्नमय मनुष्यशरीरको तो वह पहलेसे प्राप्त था ही, उसे छोड़कर जानेके बाद प्राप्त होनेवाला फल परमात्मा है, शरीर नहीं। अतः यहाँ अन्नमय आदिके अन्तर्यामी परमात्माकी ही प्राप्ति बतायी गयी है। इसलिये इन सबमें परिपूर्ण, सर्वरूप, सबके आत्मा, परम आनन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाना ही इस फल-श्रुतिका तात्पर्य है। इसके विषयमें आगे नवम अनुवाकमें कहा जानेवाला यह श्लोक भी है।
॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥ ८ ॥
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तैत्तिरीयोपनिषद्
४०३
नवम अनुवाक
सम्बन्ध— आठवें अनुवाकमें जिस श्लोक (मन्त्र)को लक्ष्य कराया गया है, उसका उल्लेख किया जाता है—
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति।
मनसा सह=मनके सहित; वाचः=वाणी आदि समस्त इन्द्रियाँ; यतः=जहाँसे; अप्राप्य=उसे न पाकर; निवर्तन्ते=लौट आती हैं; [ तस्य ] ब्रह्मणः=उस ब्रह्मके; आनन्दम्=आनन्दको; विद्वान्=जाननेवाला (महापुरुष); कुतश्चन=किसीसे भी; न बिभेति=भय नहीं करता; इति=इस प्रकार यह श्लोक है।
व्याख्या— इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माके परमानन्दस्वरूपको जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि मनके सहित सभी इन्द्रियाँ उसे न पाकर जहाँसे लौट आती हैं—जिस ब्रह्मानन्दको जाननेकी इन मन और इन्द्रियोंकी शक्ति नहीं है, परब्रह्म परमात्माके उस आनन्दको जाननेवाला ज्ञानी महापुरुष कभी किसीसे भी भय नहीं करता, वह सर्वथा निर्भय हो जाता है। इस प्रकार इस श्लोकका तात्पर्य है।
एतॄः ह वाव न तपति। किमहॄः साधु नाकरवम्। किमहं पापमकरवमिति। स य एवं विद्वान्ते आत्मानॄः सृणुते। उभे द्वौ वैष एते आत्मानॄः सृणुते। य एवं वेद। इत्युपनिषत्।
ह वाव=यह प्रसिद्ध ही है कि; एतम्=उस (महापुरुष)को; (यह बात) न तपति=चिन्तित नहीं करती कि; अहम्=मैंने; किम्=क्यों; साधु=श्रेष्ठ कर्म; न=नहीं; अकरवम्=किया; किम्=(अथवा) क्यों; अहम्=मैंने; पापम्=पापाचरण; अकरवम् इति=किया; यः=जो; एते=इन पुण्य-पापकर्मोंको; एवम्=इस प्रकार (संतापका हेतु); विद्वान्=जाननेवाला है; सः=वह; आत्मानम् सृणुते=आत्माकी रक्षा करता है; हि=अवश्य ही; यः=जो; एते=इन पुण्य और पाप; उभे एव=दोनों ही कर्मोंको;
४०४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली २ ]
एवम्=इस प्रकार (संतापका हेतु); वेद=जानता है; [सः] एषः=वह यह पुरुष; आत्मानम् स्पृणुते=आत्माकी रक्षा करता है; इति=इस प्रकार; उपनिषत्=उपनिषद् (की ब्रह्मानन्दवल्ली) पूरी हुई।
व्याख्या —इस वर्णनमें यह बात कही गयी है कि ज्ञानी महापुरुषको किसी प्रकारका शोक नहीं होता। भाव यह है कि परमात्माको ऊपर बताये अनुसार जाननेवाला विद्वान् कभी इस प्रकार शोक नहीं करता कि ‘क्यों मैंने श्रेष्ठ कर्मोंका आचरण नहीं किया, अथवा क्यों मैंने पाप-कर्म किया।’ उसके मनमें पुण्य-कर्मोंके फलस्वरूप उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका लोभ नहीं होता और उसे पापजनित नरकादिका भय भी नहीं सताता। लोभ और भयजनित संतापसे वह ऊँचा उठ जाता है। उक्त ज्ञानी महापुरुष आसक्तिपूर्वक किये हुए पुण्य और पाप दोनों प्रकारके कर्मोंको जन्म-मरणरूप संतापका हेतु समझकर उनके प्रति राग-द्वेषसे सर्वथा रहित हो जाता है और परमात्माके चिन्तनमें संलग्न रहकर आत्माकी रक्षा करता है।
इस मन्त्रमें कुछ शब्दोंको अक्षरशः अथवा अर्थतः दुहराकर इस वल्लीके उपसंहारकी सूचना दी गयी है।
॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥
॥ ब्रह्मानन्दवल्ली समाप्त ॥ २ ॥
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ॐ
भृगुवल्ली *
प्रथम अनुवाक
भृगुर्वै वारुणिः, वरुणं पितरमुपससार अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तस्मा एतत्प्रोवाच। अत्रं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति। तः होवाच। यतो वा इमानी भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्यभिर्संविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।
वै=यह प्रसिद्ध है कि; वारुणिः=वरुणका पुत्र; भृगुः=भृगु; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् उपससार=वरुणके पास गया (और विनयपूर्वक बोला—); भगवः=भगवन्!; (मुझे) ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश कीजिये; इति=इस प्रकार प्रार्थना करनेपर; तस्मै=उससे; (वरुणने) एतत्=यह; प्रोवाच=कहा; अत्रम्= अत्र; प्राणम्=प्राण; चक्षुः=नेत्र; श्रोत्रम्=श्रोत्र; मनः=मन; (और) वाचम्=वाणी; इति=इस प्रकार (ये सब ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं), तम् ह उवाच=पुनः (वरुणने) उससे कहा; वै=निश्चय ही; इमानी=ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले; भूतानि=प्राणी; यतः=जिससे; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; येन=जिसके सहारे; जीवन्ति=जीवित रहते हैं; (तथा) प्रयन्ति=(अन्तमें इस लोकसे) प्रयाण करते हुए; यत् अभिर्संविशन्ति=जिसमें प्रवेश करते हैं; तत्=उसको; विजिज्ञासस्व=तत्त्वसे जाननेकी इच्छा कर; तत्=वही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार (पिताकी बात सुनकर); सः=उसने; तपः अतप्यत=तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—
- वरुणने अपने पुत्र भृगु ऋषिको जिस ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया था, उसीका इस वल्लीमें वर्णन है, इस कारण इसका नाम भृगुवल्ली है।
४०६
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली ३ ]
व्याख्या—भृगु नामसे प्रसिद्ध एक ऋषि थे, जो वरुणके पुत्र थे। उनके मनमें परमात्माको जानने और प्राप्त करनेकी उत्कट अभिलाषा हुई, तब वे अपने पिता वरुणके पास गये। उनके पिता वरुण वेदको जाननेवाले, ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष थे; अतः भृगुको किसी दूसरे आचार्यके पास जानेकी आवश्यकता नहीं हुई। अपने पिताके पास जाकर भृगुने इस प्रकार प्रार्थना की— ‘भगवन्! मैं ब्रह्मको जानना चाहता हूँ, अतः आप कृपा करके मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।’ तब वरुणने भृगुसे कहा ‘तात! अन्न, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, मन और वाणी—ये सभी ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं। इन सबमें ब्रह्मकी सत्ता स्फुरित हो रही है।’ साथ ही यह भी कहा—‘ये प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले सब प्राणी जिनसे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिनके सहयोगसे, जिनका बल पाकर ये सब जीते हैं—जीवनोपयोगी क्रिया करनेमें समर्थ होते हैं और महाप्रलयके समय जिनमें विलीन हो जाते हैं, उनको वास्तवमें जाननेकी (पानेकी) इच्छा कर। वे ही ब्रह्म हैं।’ इस प्रकार पिताका उपदेश पाकर भृगु ऋषिने ब्रह्मचर्य और शम-दम आदि नियमोंका पालन करते हुए तथा समस्त भोगोंके त्यागपूर्वक संयमसे रहते हुए पिताके उपदेशपर विचार किया। यही उनका तप था। इस प्रकार तप करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमें कही गयी है।
॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय अनुवाक
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्। अन्नाद्ब्रह्मेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। अन्नैन जातानि जीवन्ति। अन्नं प्रयन्यन्थिर्संविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तः होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तत्त्व।
अनु० २]
तैत्तिरीयोपनिषद्
४०७
अन्नम्=अन्न; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; अन्नात्=अन्नसे; एव=ही; इमानि=ये सब; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; अन्नैन=अन्नसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (और) प्रयन्ति=(अन्तमें यहाँसे) प्रयाण करते हुए; अन्नम् अभिसंविशन्ति=अन्नमें ही प्रविष्ट होते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उसको; विज्ञाय=जानकर; (वह) पुनः=पुनः; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् एव उपससार=वरुणके ही पास गया; (तथा अपनी समझी हुई बात उसने पिताको सुनायी; किंतु पिताने उसका समर्थन नहीं किया। तब वह बोला—) भगवः=भगवन्!; (मुझे) ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका बोध कराइये; इति=तब; तम् ह उवाच=उससे सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने कहा; तपसा=तपसे; ब्रह्म=ब्रह्मको; विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार (पिताकी आज्ञा पाकर); सः=उसने; तपः अतप्यत=(पुनः) तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—
व्याख्या—भृगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि अन्न ही ब्रह्म है; क्योंकि पिताजीने ब्रह्मके जो लक्षण बताये थे, वे सब अन्नमें पाये जाते हैं। समस्त प्राणी अन्नसे—अन्नके परिणामभूत वीर्यसे उत्पन्न होते हैं, अन्नसे ही उनका जीवन सुरक्षित रहता है और मरनेके बाद अन्नस्वरूप इस पृथ्वीमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार निश्चय करके वे पुनः अपने पिता वरुणके पास आये। आकर अपने निश्चयके अनुसार उन्होंने सब बातें कहीं। पिताने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने सोचा—‘इसने अभी ब्रह्मके स्थूल रूपको ही समझा है, वास्तविक रूपतक इसकी बुद्धि नहीं गयी; अतः इसे तपस्या करके अभी और विचार करनेकी आवश्यकता है। पर जो कुछ इसने समझा है, उसमें इसकी तुच्छ बुद्धि कराकर अश्रद्धा उत्पन्न कर देनेमें भी इसका हित नहीं है, अतः इसकी बातका उत्तर न देना ही ठीक है।’ पितासे अपनी बातका समर्थन न पाकर भृगुने फिर प्रार्थना की—‘भगवन्! यदि मैंने ठीक नहीं समझा हो तो आप मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।’ तब वरुणने कहा—‘तू तपके द्वारा ब्रह्मके तत्त्वको समझनेकी
४०८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली ३ ]
कोशिश कर। यह तप ब्रह्मका ही स्वरूप है, अतः यह उनका बोध करानेमें सर्वथा समर्थ है।' इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर भृगु ऋषि पुनः पहलेकी भाँति तपोमय जीवन बिताते हुए पितासे पहले सुने हुए उपदेशके अनुसार ब्रह्मका स्वरूप निश्चय करनेके लिये विचार करते रहे। इस प्रकार तप करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमें कही गयी है।
॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय अनुवाक
प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्। प्राणाङ्ग्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणं प्रयन्त्यभिर्संविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तत् होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।
प्राणः=प्राण; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; प्राणात्=प्राणसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; प्राणेन=प्राणसे ही; जीवन्ति=जीते हैं (और); प्रयन्ति=(अन्तमें यहाँसे) प्रयाण करते हुए; प्राणम् अभिर्संविशन्ति=प्राणमें ही सब प्रकारसे प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उसे; विज्ञाय=जानकर; पुनः=फिर; पितरम् वरुणम् एव उपससार=(अपने) पिता वरुणके ही पास गया (और वहाँ उसने अपना निश्चय सुनाया; जब पिताने उत्तर नहीं दिया, तब वह बोला—); भगवः=भगवन्! (मुझे); ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश दीजिये; इति=इस प्रकार प्रार्थना करनेपर; ह तम् उवाच=सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने उससे कहा; ब्रह्म=ब्रह्मको; तपसा=तपसे; विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही; ब्रह्म=ब्रह्म अर्थात् उनकी प्राप्तिका बड़ा साधन है; इति=इस प्रकार
अनु० ३ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
४०९
पिताकी आज्ञा पाकर; सः=उसने (पुनः); तपः अतप्यत=तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—
व्याख्या —भृगुने पिताके उपदेशानुसार तपके द्वारा यह निश्चय किया कि प्राण ही ब्रह्म है; उन्होंने सोचा, पिताजीद्वारा बताये हुए ब्रह्मके लक्षण प्राणमें पूर्णतया पाये जाते हैं। समस्त प्राणी प्राणसे उत्पन्न होते हैं, अर्थात् एक जीवित प्राणीसे उसीके सदृश दूसरा प्राणी उत्पन्न होता हुआ प्रत्यक्ष देखा जाता है; तथा सभी प्राणसे ही जीते हैं। यदि शासका आना-जाना बन्द हो जाय, यदि प्राणद्वारा अन्न ग्रहण न किया जाय तथा अन्नका रस समस्त शरीरमें न पहुँचाया जाय तो कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता और मरनेके बाद सब प्राणमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि मृत शरीरमें प्राण नहीं रहते; अतः निःसन्देह प्राण ही ब्रह्म है, यह निश्चय करके वे पुनः अपने पिता वरुणके पास गये। पहलेकी भाँति अपने निश्चयके अनुसार उन्होंने पुनः पितासे अपना अनुभव निवेदन किया। पिताने फिर भी कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने सोचा कि यह पहलेकी अपेक्षा तो कुछ सूक्ष्मतामें पहुँचा है; परंतु अभी बहुत कुछ समझना शेष है; अतः उत्तर न देनेसे अपने-आप इसकी जिज्ञासामें बल आयेगा; अतः उत्तर न देना ही ठीक है। पिताजीसे अपनी बातका समर्थन न पाकर भृगुने फिर उनसे प्रार्थना की—‘भगवन्! यदि अब भी मैंने ठीक न समझा हो तो आप ही कृपा करके मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।’ तब वरुणने पुनः वही बात कही—‘तू तपके द्वारा ब्रह्मको जाननेकी चेष्टा कर; यह तप ही ब्रह्म है, अर्थात् ब्रह्मके तत्त्वको जाननेका प्रधान साधन है।’ इस प्रकार पिताजीकी आज्ञा पाकर भृगु ऋषि फिर उसी प्रकार तपस्या करते हुए पिताके उपदेशपर विचार करते रहे। तपस्या करके उन्होंने क्या किया, यह अगले अनुवाकमें बताया गया है।
॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥
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४१०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली ३ ]
चतुर्थ अनुवाक
मनो ब्रह्मेति व्यजानात्। मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। मनसा जातानि जीवन्ति। मनः प्रयत्यन्थिभंसविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तः होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।
मनः=मन; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=समझा; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; मनसः=मनसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; मनसा=मनसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (तथा) प्रयन्ति=(इस लोकसे) प्रयाण करते हुए; (अन्तमें) मनः अभिसंविशन्ति=मनमें ही सब प्रकारसे प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उस ब्रह्मको; विज्ञाय=जानकर; पुनः एव=फिर भी; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् उपससार=वरुणके पास गया (और अपनी बातका कोई उत्तर न पाकर बोला—); भगवः=भगवन्! (मुझे); ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश दीजिये; इति=इस प्रकार (प्रार्थना करनेपर); ह तम् उवाच=सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने उससे कहा; ब्रह्म=ब्रह्मको; तपसा=तपसे; विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर; सः=उसने; तपः अतप्यत=तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—
व्याख्या —इस बार भगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि मन ही ब्रह्म है; उन्होंने सोचा, पिताजीके बताये हुए ब्रह्मके सारे लक्षण मनमें पाये जाते हैं। मनसे सब प्राणी उत्पन्न होते हैं—स्त्री और पुरुषके मानसिक प्रेमपूर्ण सम्बन्धसे ही प्राणी बीजरूपसे माताके गर्भमें आकर उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर मनसे ही इन्द्रियोंद्वारा समस्त जीवनोंपयोगी वस्तुओंका उपभोग करके जीवित रहते हैं और मरनेके बाद मनमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं—मरनेके बाद इस शरीरमें प्राण और इन्द्रियाँ नहीं रहतीं, इसलिये मन ही ब्रह्म है। इस प्रकार निश्चय करके वे पुनः पहलेकी भाँति अपने पिता वरुणके पास गये और उन्होंने अपने
अनु० ५ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
४११
अनुभवकी बात पिताजीको सुनायी। इस बार भी पितासे कोई उत्तर नहीं मिला। पिताने सोचा कि यह पहलेकी अपेक्षा तो गहराईमें उतरा है, परंतु अभी इसे और भी तपस्या करनी चाहिये; अतः उत्तर न देना ही ठीक है। पितासे अपनी बातका उत्तर न पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति प्रार्थना की—‘भगवन्! यदि मैंने ठीक न समझा हो तो कृपया आप ही मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।’ तब वरुणने पुनः वही उत्तर दिया—‘तू तपके द्वारा ब्रह्मके तत्त्वको जाननेकी इच्छा कर। अर्थात् तपस्या करते हुए मेरे उपदेशपर पुनः विचार कर। यह तपरूप साधन ही ब्रह्म है। ब्रह्मको जाननेका इससे बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है।’ इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति संयमपूर्वक रहकर पिताके उपदेशपर विचार किया। विचार करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमें कही गयी है।
॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥
पञ्चम अनुवाक
विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्। विज्ञानाच्छ्रेयं खल्विमानि भूतानि जायन्ते। विज्ञानेन जातानि जीवन्ति। विज्ञानं प्रयन्यन्थिभसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तः होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।
विज्ञानम्=विज्ञान; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; विज्ञानात्=विज्ञानसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; विज्ञानेन=विज्ञानसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (और) प्रयन्ति=अन्तमें यहाँसे प्रयाण करते हुए; विज्ञानम् अभिसंविशन्ति=विज्ञानमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार; तत्=उस ब्रह्मको; विज्ञाय=जानकर; पुनः एव=(वह) पुनः उसी प्रकार; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् उपससार=वरुणके