ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ६ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
५१९
अविज्ञाय=बिना जाने भी; दुःखस्य=दुःख-समुदायका; अन्तः=अन्त; भविष्यति=हो सकेगा ॥ २० ॥
व्याख्या —भाव यह है कि जिस प्रकार आकाशको चमड़ेकी भाँति लेपटना मनुष्यके लिये सर्वथा असम्भव है, सारे मनुष्य मिलकर भी इस कार्यको नहीं कर सकते, उसी प्रकार परमात्माको बिना जाने कोई भी जीव इस दुःखसमुद्रसे पार नहीं हो सकता। अतः मनुष्यको दुःखोंसे सर्वथा छूटने और निश्चल परमानन्दकी प्राप्तिके लिये अन्य सब ओरसे मनको हटाकर एकमात्र उन्हींको जाननेके साधनमें तीव्र इच्छासे लग जाना चाहिये ॥ २० ॥
तपःप्रभावाद् देवप्रसादाच्च ब्रह्म ह श्वेताश्वतरोऽथ विद्वान् ।
अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं
प्रोवाच सम्यग्पुणिसङ्गजुष्टम् ॥ २१ ॥
ह=यह प्रसिद्ध है कि; श्वेताश्वतरः=श्वेताश्वतर नामक ऋषि; तपः-प्रभावात्=तपके प्रभावसे; च=और; देवप्रसादात्=परमदेव परमेश्वरकी कृपासे; ब्रह्म=ब्रह्मको; विद्वान्=जान सका; अथ=तथा; (उसने) ऋषिसङ्गजुष्टम्=ऋषि-समुदायसे सेवित; परमम्=परम; पवित्रम्=पवित्र (इस ब्रह्मतत्त्वका); अत्याश्रमिभ्यः=आश्रमके अभिमानसे अतीत अधिकारियोंको; सम्यक्=पूर्णरूपसे; प्रोवाच=उपदेश किया था ॥ २१ ॥
व्याख्या —यह बात प्रसिद्ध है कि श्वेताश्वतर ऋषिने तपके प्रभावसे अर्थात् समस्त विषय-सुखका त्याग करके संयममय जीवन बिताते हुए निरन्तर परमात्माके ही चिन्तनमें लगे रहकर उन परमदेव परमेश्वरकी अहैतुकी दयासे उन्हें जान लिया था। फिर उन्होंने ऋषि-समुदायसे सेवित—उनके परम लक्ष्य इस परम पवित्र ब्रह्मतत्त्वका आश्रमके अभिमानसे सर्वथा अतीत हुए देहाभिमानशून्य अधिकारियोंको भलीभाँति उपदेश किया था। इससे इस मन्त्रमें यह बात भी दिखला दी गयी कि देहाभिमानशून्य साधक ही ब्रह्मतत्त्वका उपदेश सुननेके वास्तविक अधिकारी हैं ॥ २१ ॥
५२०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ६ ]
वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्ये प्रचोदितम्।
नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः ॥ २२ ॥
[ इदम् ]=यह; परमम्=परम; गुह्यम्=रहस्यमय ज्ञान; पुराकल्ये=पूर्वकल्पमें; वेदान्ते=वेदके अन्तिम भाग—उपनिषद्में; प्रचोदितम्=भलीभाँति वर्णित हुआ था; अप्रशान्ताय=जिसका अन्तःकरण सर्वथा शान्त न हो गया हो, ऐसे मनुष्यको; न दातव्यम्=इसका उपदेश नहीं देना चाहिये; पुनः=तथा; अपुत्राय=जो अपना पुत्र न हो; वा=अथवा; अशिष्याय=जो शिष्य न हो, उसे; न (दातव्यम्)=नहीं देना चाहिये ॥ २२ ॥
व्याख्या—यह परम रहस्यमय ज्ञान पूर्वकल्पमें भी वेदके अन्तिम भाग—उपनिषद्में भलीभाँति वर्णित हुआ था। भाव यह कि इस ज्ञानकी परम्परा कल्प-कल्पान्तरसे चली आती है, यह कोई नयी बात नहीं है। इसका उपदेश किसे दिया जाय और किसे नहीं, ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—‘जिसका अन्तःकरण विषय-वासनासे शून्य होकर सर्वथा शान्त न हो गया हो, ऐसे मनुष्यको इस रहस्यका उपदेश नहीं देना चाहिये; तथा जो अपना पुत्र न हो अथवा शिष्य न हो, उसे भी नहीं देना चाहिये।’ भाव यह है कि या तो जो सर्वथा शान्तचित्त हो, ऐसे अधिकारीको देना चाहिये अथवा जो अपना पुत्र या शिष्य हो, उसे देना चाहिये; क्योंकि पुत्र और शिष्यको अधिकारी बनाना पिता और गुरुका ही काम है; अतः वह पहलेसे ही अधिकारी हो, यह नियम नहीं है ॥ २२ ॥
यस्य देवे परा भक्तियथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः।
प्रकाशन्ते महात्मनः ॥ २३ ॥
यस्य=जिसकी; देवे=परमदेव परमेश्वरमें; परा=परम; भक्तिः=भक्ति है; (तथा) यथा=जिस प्रकार; देवे=परमेश्वरमें है; तथा=उसी प्रकार; गुरौ=गुरुमें भी है; तस्य महात्मनः=उस महात्मा पुरुषके हृदयमें; हि=ही; एते=ये; कथिताः=बताये
अध्याय ६ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
५२१
हुए; अर्थाः=रहस्यमय अर्थ; प्रकाशन्ते=प्रकाशित होते हैं; प्रकाशन्ते महात्मनः=उसी महात्माके हृदयमें प्रकाशित होते हैं ॥ २३ ॥
व्याख्या —जिस साधककी परमदेव परमेश्वरमें परम भक्ति होती है तथा जिस प्रकार परमेश्वरमें होती है, उसी प्रकार अपने गुरुमें भी होती है, उस महात्मा—मनस्वी पुरुषके हृदयमें ही ये बताये हुए रहस्यमय अर्थ प्रकाशित होते हैं। अतः जिज्ञासुको पूर्ण श्रद्धालु और भक्त बनना चाहिये। जिसमें पूर्ण श्रद्धा और भक्ति है, उसी महात्माके हृदयमें ये गूढ़ अर्थ प्रकाशित होते हैं। इस मन्त्रमें अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति ग्रन्थकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ २३ ॥
॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥
॥ कृष्णयजुर्वेदीय श्वेताश्वतरोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
इसका अर्थ आरम्भमें दिया जा चुका है।
॥ श्रीहरिः ॥
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| असुर्या नाम ते लोकाः | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | २९ |
| अन्धं तमः प्रविशन्ति | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ९ | ३४ |
| अन्यदेवाहुर्विद्यया | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १० | ३५ |
| अन्धं तमः प्रविशन्ति | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | ३८ |
| अन्यदेवाहुः सम्भवात् | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ३९ |
| अग्ने नय सुपथा राये | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १८ | ४४ |
| अनेजदेकं मनसो जवीयः | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ३० |
| अथ वायुमब्रुवन् | केन० | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ७ | ६३ |
| अथाध्यात्मं यदेतत् | ,, | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ५ | ७० |
| अथेन्द्रमब्रुवन् | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ११ | ६५ |
| अग्निर्यथैको भुवनम् | कठ० | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ९ | १५२ |
| अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | १२ | १४३ |
| ,, ,, | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | १३ | १४४ |
| ,, ,, | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १७ | १६८ |
| अजीर्यताममृतानाम् | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २८ | ९७ |
| अणोरणीयान्महतः | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २० | ११५ |
| अनुपश्य यथा पूर्वे | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ६ | ८० |
| अन्यच्छ्रेयोऽन्यत् | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १ | ९८ |
| अन्यत्र धर्मादन्यत्र० | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १४ | १११ |
| अरण्योर्निहितः | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ८ | १४१ |
| अविद्यायामन्तरे | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ५ | १०२ |
( ५२३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अव्यक्तात्तु परः | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ८ | १६२ |
| अशब्दमस्पर्शम् | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १५ | १३३ |
| अशरीरँशरीरेषु | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २२ | ११७ |
| अस्तीत्येवोपलब्धव्यः | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १३ | १६६ |
| अस्य विस्रंसमानस्य | ,, | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ४ | १४९ |
| अत्रैष देवः स्वप्ने | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | ५ | २०७ |
| अथ कबन्धी कात्यायनः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ३ | १७४ |
| अथ यदि द्विमात्रेण | ,, | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | ४ | २१६ |
| अथ हैनं कौसल्यः | ,, | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | १ | १९४ |
| अथ हैनं भार्गवः | ,, | ... | ... | ... | ... | २ | ... | १ | १८६ |
| अथ हैनं शैब्यः | ,, | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | १ | २१३ |
| अथ हैनं सुकेशा | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | १ | २२० |
| अथ हैनं सौर्यायणी | ,, | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | १ | २०३ |
| अथादित्य उदयन् | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ६ | १७६ |
| अथैकयोर्ध्व उदानः | ,, | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ७ | १९८ |
| अथोत्तरेण तपसा | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १० | १८० |
| अन्नं वै प्रजापतिः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १४ | १८४ |
| अरा इव रथनाभौ | ,, | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ६ | १८९ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | ६ | २२५ |
| अहोरात्रो वै प्रजापतिः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १३ | १८३ |
| अग्निर्मूर्धा चक्षुषी | मुण्डक० | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ४ | २५० |
| अतः समुद्रा गिरयश्च | ,, | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ९ | २५५ |
| अथर्वणे यां प्रवदेत | ,, | ... | १ | ... | १ | ... | ... | २ | २३० |
| अरा इव रथनाभौ | ,, | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ६ | २६० |
| अविद्यायामन्तरे | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ८ | २४३ |
( ५२४ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अविद्यायां बहुधा | मुण्डक० | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ९ | २४४ |
| अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | २९६ |
| अग्निर्वाग्भूत्वा मुखम् | ऐत० | १ | ... | ... | २ | ... | ... | ४ | ३०६ |
| अथ यदि ते | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ११ | ३ | ३६६ |
| अथाधिज्यौतिषम् | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | २ | ३३७ |
| अथाधिविद्यम् | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ३ | ३३८ |
| अथाधिप्रजम् | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ४ | ३३८ |
| अथाध्यात्मम् | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ५ | ३३९ |
| अथातोऽनुप्रश्नाः | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ६ | ३ | ३८७ |
| अन्तरेण तालुके | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ६ | २ | ३५१ |
| अन्नं न निन्द्यात् | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | ७ | १ | ४१५ |
| अन्नं न परिचक्षीत | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | ८ | १ | ४१७ |
| अन्नं बहु कुर्वीत | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | ९ | १ | ४१९ |
| अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | २ | १ | ४०६ |
| अन्नाद् वै प्रजाः प्रजायन्ते | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | २ | १ | ३७४ |
| असद् वा इदमग्र आसीत् | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ७ | १ | ३९० |
| असन्नेव स भवति | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ६ | १ | ३८६ |
| अहं वृक्षस्य रेरिवा | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | १० | १ | ३६१ |
| अजात इत्येवं कश्चित् | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | २१ | ४८९ |
| अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ४६७ |
| अपाणिपादो जवनो ग्रहीता | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १९ | ४७१ |
| अग्निर्यत्राभिमथ्यते | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | ४५० |
| अणोरणीयान् महतो महीयान् | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | २० | ४७१ |
| अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ५०१ |
| अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णाम् | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ४७६ |
( ५२५ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः | श्वे० | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | ८ | ४९६ |
| आत्मानँ रथिनम् | कठ० | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ३ | १२३ |
| आशाप्रतीक्षे संगतम् | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ८ | ८१ |
| आसीनो दूरं व्रजति | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २१ | ११६ |
| आत्मन एष प्राणः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ३ | १९५ |
| आदित्यो ह वै प्राणः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ५ | १७५ |
| आदित्यो ह वै बाह्यः | ,, | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ८ | १९९ |
| आविः संनिहितम् | मुण्डक० | ... | २ | ... | २ | ... | ... | १ | २५६ |
| आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् | तैत्ति० | ... | ... | ३ | ... | ... | ६ | १ | ४१३ |
| आवहन्ती वितन्वाना | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | २ | ३४३ |
| आमायन्तु | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | ३ | ३४३ |
| आकाशशरीरं ब्रह्म | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ६ | ४ | ३५३ |
| आप्नोति स्वाराज्यम् | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ६ | ३ | ३५३ |
| आदिः स संयोगनिमित्तहेतुः | श्वे० | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ५०६ |
| आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ५०५ |
| इह चेदवेदीदथ | केन० | ... | ... | ... | २ | ... | ... | ५ | ५७ |
| इतीमा महासँहिताः | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ६ | ३४० |
| इन्द्रियाणां पृथग्भावम् | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ६ | १६१ |
| इन्द्रियाणि हयानाहुः | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ४ | १२३ |
| इन्द्रियेभ्यः परं मनः | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ७ | १६२ |
| इन्द्रियेभ्यः पराः | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १० | १२८ |
| इह चेदशकद् बोद्धुम् | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ४ | १६० |
| इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ९ | १९१ |
| इष्टापूर्तं मन्यमानाः | मुण्डक ० | ... | १ | ... | २ | ... | ... | १० | २४४ |
( ५२६ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ईशा वास्यमिदꣳसर्वम् | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १ | २८ |
| उपनिषदं भो ब्रूहि | केन० | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ७ | ७२ |
| उत्तिष्ठत जाग्रत | कठ० | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १४ | १३२ |
| उत्पत्तिमायतिम् | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | १२ | २०२ |
| उद्गीतमेतत् परमं तु ब्रह्म | श्वे० | ... | १ | ... | ... | ... | ... | ७ | ४३९ |
| ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयति | कठ० | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ३ | १४८ |
| ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाखः | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १ | १५७ |
| ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १ | १२० |
| ऋग्भिरेतं यजुर्भिः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | ७ | २१९ |
| ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ९ | १ | ३५९ |
| ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ८ | ४७९ |
| एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा | कठ० | २ | ... | २ | ... | ... | ... | १२ | १५४ |
| एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १३ | ११० |
| एतत्तुल्यं यदि मन्यसे | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २४ | ९३ |
| एतदालम्बनꣳश्रेष्ठम् | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १७ | ११३ |
| एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १६ | ११२ |
| एष तेऽग्निर्नचिकेतः | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | १९ | ८९ |
| एष सर्वेषु भूतेषु | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १२ | १३१ |
| एतःह वाव | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ९ | २ | ४०३ |
| एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | ९ | २११ |
| एषोऽग्निस्तपति | ,, | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ५ | १८९ |
| एतस्माज्जायते प्राणः | मुण्डक० | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ३ | २५० |
| एतेषु यश्चरते | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ५ | २४० |
| एषोऽणुरात्मा चेतसा | ,, | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | ९ | २७२ |
| एह्येहीति तमाहुतयः | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ६ | २४१ |
( ५२७ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| एष सर्वेश्वरः | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | २९० |
| एष ब्रह्मैष इन्द्रः | ऐत० | ३ | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ३२७ |
| एको वशी निष्क्रियाणाम् | श्वे० | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | ५११ |
| एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्म | ,, | १ | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | ४४४ |
| एको देवः सर्वभूतेषु | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ११ | ५११ |
| एष ह देवः प्रदिशोऽनु | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १६ | ४५८ |
| एकैकं जालं बहुधा | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | ४९२ |
| एको हि रुद्रो न द्वितीयाय | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | २ | ४६० |
| एष देवो विश्वकर्मा | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १७ | ४८५ |
| एको हंसो भुवनस्यास्य | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १५ | ५१४ |
| ओमित्येतदक्षरमिदम् | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १ | २८३ |
| ओमिति ब्रह्म | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ८ | १ | ३५७ |
| ॐ केनेषितं पतति | केन० | ... | ... | ... | १ | ... | ... | १ | ४८ |
| ॐ उशन् ह वै | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | १ | ७६ |
| ॐ सुकेशा च भारद्वाजः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १ | १७२ |
| ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः | मुण्डक० | ... | १ | ... | १ | ... | ... | १ | २२९ |
| ॐ शं नो मित्रः | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | १ | १ | ३३० |
| ॐ आत्मा वा इदम् | ऐत० | १ | ... | ... | १ | ... | ... | १ | ३०० |
| कामस्याप्तिं जगतः | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ११ | १०८ |
| कामान् यः कामयते | मुण्डक० | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | २ | २७४ |
| काली कराली च | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ४ | २४० |
| कालः स्वभावो नियतिः | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | ... | २ | ४३२ |
| क्रियावन्तः श्रोत्रियाः | मुण्डक० | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | १० | २८० |
| कुर्वन्नेवेह कर्माणि | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | २ | २८ |
| कोऽयमात्मेति वयम् | ऐत० | ३ | ... | ... | १ | ... | ... | १ | ३२५ |
(५२८)
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गताः कलाः पञ्चदश | मुण्डक० | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | ७ | २७८ |
| गर्भे नु | ऐत० | २ | ... | ... | १ | ... | ... | ५ | ३२२ |
| गुणान्वयो यः फलकर्म | श्वे० | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | ७ | ४९५ |
| घृतात् परं मण्डमिव | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १६ | ४८५ |
| छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ९ | ४८० |
| जानाम्यहꣳशेवधिः | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १० | १०७ |
| जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | २८५ |
| जागरितस्थानो वैश्वानरः | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ९ | २९२ |
| तदेजति तन्नैजति | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ३१ |
| तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् | केन० | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ४ | ६१ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ८ | ६३ |
| तद्व तद्वनं नाम | ,, | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ६ | ७१ |
| तद्वैषां विजज्ञौ | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | २ | ६० |
| तस्माद्वा इन्द्रोऽतितराम् | ,, | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ३ | ६८ |
| तस्माद्वा एते देवाः | ,, | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | २ | ६८ |
| तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यम् | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ५ | ६१ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ९ | ६४ |
| तस्मै तृणं निदधौ | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ६ | ६२ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | १० | ६४ |
| तस्यै तपो दमः कर्मेति | ,, | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ८ | ७२ |
| तस्यैष आदेशो यदेतत् | ,, | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ४ | ६९ |
| तꣳह कुमारꣳ सन्तम् | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २ | ७६ |
| तदेतदिति मन्यन्ते | ,, | २ | ... | २ | ... | ... | ... | १४ | १५६ |
| तमब्रवीत् प्रीयमाणः | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | १६ | ८७ |
| तद्ये ह वै तत् | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १५ | १८४ |
| तस्मै स होवाच | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ४ | १७५ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ... | २ | ... | २ | १८६ |
( ५२९ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तस्मै स होवाच | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | २ | १९५ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | २ | २०३ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | २ | २१४ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | २ | २२१ |
| ,, ,, | मुण्डक० | ... | १ | ... | १ | ... | ... | ४ | २३१ |
| तत्रापरा ऋग्वेदः | ,, | ... | १ | ... | १ | ... | ... | ५ | २३२ |
| तदेतत्सत्यमृषिः | ,, | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | ११ | २८१ |
| तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | १ | २३७ |
| तदेतत्सत्यं यथा | ,, | ... | २ | ... | १ | ... | ... | १ | २४८ |
| तपसा चीयते ब्रह्म | ,, | ... | १ | ... | १ | ... | ... | ८ | २३५ |
| तपः श्रद्धे ये ह्युपवसन्ति | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ११ | २४५ |
| तस्माच्च देवा बहुधा | ,, | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ७ | २५३ |
| तस्मादग्निः समिधः | ,, | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ५ | २५१ |
| तस्मादृचः साम यजूंषि | ,, | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ६ | २५२ |
| तस्मै स विद्वानुपसन्नाय | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | १३ | २४७ |
| तच्चक्षुषाजिघृक्षत् | ऐत० | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ५ | ३११ |
| तच्छिश्नेनाजिघृक्षत् | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ९ | ३१३ |
| तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत् | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ६ | ३११ |
| तत्त्वचाजिघृक्षत् | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ७ | ३१२ |
| तत्प्राणेनाजिघृक्षत् | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ४ | ३१० |
| तत्स्त्रिया आत्मभूतम् | ,, | २ | ... | ... | १ | ... | ... | २ | ३१९ |
| तदपानेनाजिघृक्षत् | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | १० | ३१३ |
| तदेनत् सृष्टम् | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ३ | ३०९ |
| तन्मनसाजिघृक्षत् | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | ८ | ३१२ |
| तमभ्यतपत् | ,, | १ | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | ३०२ |
( ५३० )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तमशनायापिपासे | ऐत० | १ | ... | ... | २ | ... | ... | ५ | ३०७ |
| तस्मादिन्द्रो नाम | ,, | १ | ... | ... | ३ | ... | ... | १४ | ३१७ |
| तस्यैष एव शारीरः | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ६ | २ | ३८७ |
| तस्माद्वा एतस्मात् | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | १ | ३ | ३७३ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | २ | २ | ३७६ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ३ | २ | ३७८ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ४ | २ | ३८१ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ५ | २ | ३८४ |
| तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | १० | ३ | ४२५ |
| तमीश्वराणां परमं महेश्वरम् | श्वे० | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ७ | ५०८ |
| तद् वेदगुह्योपनिषत्सु गूढम् | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | ४९४ |
| तदेवाग्निस्तदादित्यः | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | २ | ४७४ |
| ततो यदुत्तरतरं तदरूपम् | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १० | ४६६ |
| ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तम् | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | ७ | ४६४ |
| तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तम् | ,, | १ | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ४३५ |
| तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूयः | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | ५०४ |
| तपःप्रभावाद् देवप्रसादाच्च | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | २१ | ५१९ |
| तां योगमिति मन्यन्ते | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ११ | १६५ |
| तान् वरिष्ठः प्राणः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ३ | १८७ |
| तान् ह स ऋषिः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | २ | १७३ |
| तान् होवाचैतावत् | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | ७ | २२५ |
| ता एता देवताः सृष्टाः | ऐत० | १ | ... | ... | २ | ... | ... | १ | ३०४ |
| ताभ्यः पुरुषमानयत्ताः | ,, | १ | ... | ... | २ | ... | ... | ३ | ३०५ |
| ताभ्यो गामानयत्ताः | ,, | १ | ... | ... | २ | ... | ... | २ | ३०५ |
| तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीः | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ९ | ८२ |
( ५३१ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | ६ | २१८ |
| तिलेषु तैलं दधनीव सर्पिः | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | ... | १५ | ४४६ |
| तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेदः | केन० | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | ३ | ६० |
| तेजो ह वा उदानः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ९ | २०० |
| ते तमर्चन्तः | ,, | ... | ... | ... | ... | ६ | ... | ८ | २२६ |
| तेषामसौ विरजः | ,, | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १६ | १८५ |
| ते ये शतम् | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ३ | ३९५ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ४ | ३९६ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ५ | ३९६ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ६ | ३९७ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ७ | ३९८ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ८ | ३९८ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ९ | ३९९ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | १० | ३९९ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | ११ | ४०० |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | १२ | ४०० |
| ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | ४३४ |
| तं दुर्दर्शं गूढम् | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १२ | १०९ |
| त्वं स्त्री त्वं पुमानसि | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | ४७४ |
| दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः | मुण्डक० | ... | २ | ... | १ | ... | ... | २ | २४९ |
| दूरमेते विपरीते | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ४ | १०१ |
| देवैरत्रापि विचिकित्सितम् | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २१ | ९१ |
| ,, ,, | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २२ | ९१ |
| देवानामति वह्नितमः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ८ | १९० |
| द्वा सुपर्णा सयुजा | मुण्डक० | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | १ | २६५ |
( ५३२ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | ४७७ |
| द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | १ | ४९० |
| धनुर्गृहीत्वौपनिषदम् | मुण्डक० | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ३ | २५८ |
| न तत्र चक्षुर्गच्छति | केन० | ... | ... | ... | १ | ... | ... | ३ | ५० |
| न जायते म्रियते वा | कठ० | १ | ... | २ | ... | ... | ... | १८ | ११३ |
| न तत्र सूर्यो भाति | ,, | २ | ... | २ | ... | ... | ... | १५ | १५६ |
| न नरेणावरेण | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ८ | १०५ |
| न प्राणेन नापानेन | ,, | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ५ | १४९ |
| न वित्तेन तर्पणीयः | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २७ | ९६ |
| न संदृशे तिष्ठति | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ९ | १६३ |
| न साम्परायः प्रतिभाति | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ६ | १०३ |
| न चक्षुषा गृह्यते | मुण्डक० | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | ८ | २७१ |
| न तत्र सूर्यो भाति | ,, | ... | २ | ... | २ | ... | ... | १० | २६३ |
| न कञ्चन वसतौ | तैत्ति० | ... | ... | ३ | ... | ... | १० | १ | ४२१ |
| नवद्वारे पुरे देही | श्वे० | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १८ | ४७० |
| न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | २० | ४८८ |
| न तस्य कार्यं करणं च | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ८ | ५०९ |
| न तत्र सूर्यो भाति न | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १४ | ५१३ |
| न तस्य कश्चित् पतिरस्ति | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | ९ | ५०९ |
| नाहं मन्ये सुवेदेति | केन० | ... | ... | ... | २ | ... | ... | २ | ५५ |
| नाचिकेतमुपाख्यानम् | कठ० | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १६ | १३३ |
| नायमात्मा प्रवचनेन | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २३ | ११७ |
| नाविरतो दुश्चरितात् | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २४ | ११८ |
| नायमात्मा प्रवचनेन | मुण्डक० | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | ३ | २७५ |
| नायमात्मा बलहीनेन | ,, | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | ४ | २७६ |
( ५३३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नान्तःप्रज्ञम् | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ७ | २९० |
| नित्यो नित्यानाम् | कठ० | २ | ... | २ | ... | ... | ... | १३ | १५५ |
| ,, ,, | श्वे० | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ५१२ |
| निष्कलं निष्क्रियम् | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १९ | ५१८ |
| नीलः पतङ्गो हरितः | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ४७५ |
| नीहारधूमाकानिलानलानाम् | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | ११ | ४५४ |
| नैव वाचा न मनसा | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १२ | १६५ |
| नैषा तर्केण मतिः | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | ९ | १०६ |
| नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चम् | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १९ | ४८७ |
| नैव स्त्री न पुमानेष | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | १० | ४९८ |
| पराचः कामाननुयन्ति | कठ० | २ | ... | १ | ... | ... | ... | २ | १३६ |
| पराञ्चि खानि व्यतृणत् | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | १ | १३५ |
| पञ्चपादं पितरम् | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | १ | ... | ११ | १८१ |
| परमेवाक्षरम् | ,, | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | १० | २१२ |
| परीक्ष्य लोकान् | मुण्डक० | ... | १ | ... | २ | ... | ... | १२ | २४६ |
| पञ्चस्रोतोऽम्बुम् | श्वे० | १ | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ४३७ |
| पायूपस्थेऽपानम् | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ५ | १९६ |
| पीतोदका जग्धतृणाः | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ३ | ७७ |
| पुरमेकादशद्वारम् | ,, | २ | ... | २ | ... | ... | ... | १ | १४६ |
| पुरुष एवेदं विश्वम् | मुण्डक० | ... | २ | ... | १ | ... | ... | १० | २५६ |
| पुरुषे ह वा अयम् | ऐत० | २ | ... | ... | १ | ... | ... | १ | ३१८ |
| पुरुष एवेदं सर्वम् | श्वे० | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १५ | ४६८ |
| पूषन्नेकर्षे यम सूर्य | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | १६ | ४२ |
| पृथिवी च पृथिवीमात्रा | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | ८ | २०९ |
| पृथिव्यन्तरिक्षम् | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ७ | १ | ३५४ |
( ५३४ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे | श्वे० | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | ४५५ |
| प्रतिबोधविदितम् | केन० | ... | ... | ... | २ | ... | ... | ४ | ५७ |
| प्र ते ब्रवीमि तदु | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | १४ | ८५ |
| प्रजापतिश्चरसि | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | ७ | १९० |
| प्रणवो धनुः शरः | मुण्डक० | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ४ | २५९ |
| प्राणस्येदं वशे | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | १३ | १९२ |
| प्राणाग्नय एवैतस्मिन् | ,, | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | ३ | २०५ |
| प्राणो ह्येष यः | मुण्डक० | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | ४ | २६७ |
| प्राणं देवा अनुप्राणन्ति | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ३ | १ | ३७७ |
| प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात् | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | ३ | १ | ४०८ |
| प्राणान् प्रपीड्येह | श्वे० | २ | ... | ... | ... | ... | ... | ९ | ४५२ |
| प्लवा ह्येते अदृढाः | मुण्डक० | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ७ | २४२ |
| बहूनामेमि प्रथमः | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ५ | ७९ |
| बृहच्च तद् दिव्यम् | मुण्डक० | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | ७ | २७० |
| ब्रह्म ह देवेभ्यः | केन० | ... | ... | ... | ३ | ... | ... | १ | ५९ |
| ब्रह्मविदाप्नोति परम् | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | १ | १ | ३७१ |
| ब्रह्मैवेदममृतम् | मुण्डक० | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ११ | २६४ |
| भयादस्याग्निस्तपति | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ३ | १५९ |
| भावग्राह्यमनीडाख्यम् | श्वे० | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | १४ | ५०२ |
| भिद्यते हृदयग्रन्थिः | मुण्डक० | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ८ | २६२ |
| भीषास्माद् वातः | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ८ | १ | ३९४ |
| भूर्भुवः सुवरिति | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ५ | १ | ३४६ |
| भूरिति वा अग्निः | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ५ | २ | ३४८ |
| भूरिति वै प्राणः | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ५ | ३ | ३४९ |
| भृगुर्वै वारुणिः | ,, | ... | ... | ३ | ... | ... | १ | १ | ४०५ |
( ५३५ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मनसैवेदमाप्तव्यम् | कठ० | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ११ | १४३ |
| महतः परमव्यक्तम् | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ११ | १२९ |
| मनो ब्रह्मेति व्यजानात् | तैत्ति० | ... | ... | ३ | ... | ... | ४ | १ | ४१० |
| महान् प्रभुर्वै पुरुषः | श्वे० | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | ४६७ |
| मासो वै प्रजापतिः | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | १ | ... | १२ | १८२ |
| मायां तु प्रकृतिम् | श्वे० | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १० | ४८१ |
| मा नस्तोके तनये | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | २२ | ४८९ |
| मातृदेवो भव | तैत्ति० | ... | ... | १ | ... | ... | ११ | २ | ३६४ |
| मृत्युप्रोक्तां नचिकेतः | कठ० | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १८ | १६९ |
| यस्तु सर्वाणि भूतानि | ईश० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | ३२ |
| यस्मिन् सर्वाणि भूतानि | ,, | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ७ | ३२ |
| यच्चक्षुषा न पश्यति | केन० | ... | ... | ... | १ | ... | ... | ६ | ५२ |
| यच्छ्रोत्रेण न शृणोति | ,, | ... | ... | ... | १ | ... | ... | ७ | ५३ |
| यत् प्राणेन न प्राणिति | ,, | ... | ... | ... | १ | ... | ... | ८ | ५३ |
| यदि मन्यसे सुवेदेति | ,, | ... | ... | ... | २ | ... | ... | १ | ५४ |
| यद् वाचानभ्युदितम् | ,, | ... | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | ५१ |
| यन्मनसा न मनुते | ,, | ... | ... | ... | १ | ... | ... | ५ | ५१ |
| यस्यामतं तस्य मतम् | ,, | ... | ... | ... | २ | ... | ... | ३ | ५६ |
| य इमं परमम् | कठ० | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १७ | १३४ |
| य इमं मध्वदम् | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ५ | १३८ |
| य एष सुप्तेषु जागर्ति | ,, | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ८ | १५१ |
| यच्छेद् वाङ्मनसी | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | १३ | १३१ |
| यतश्चोदेति सूर्यः | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ९ | १४१ |
| यथाऽऽदर्शे तथा | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | ५ | १६० |
| यथा पुरस्ताद् भविता | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | ११ | ८३ |
( ५३६ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यथोदकं दुर्गे वृष्टम् | कठ० | २ | ... | १ | ... | ... | ... | १४ | १४५ |
| यथोदकं शुद्धे शुद्धम् | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | १५ | १४६ |
| यदा पञ्चावतिष्ठन्ते | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १० | १६४ |
| यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १४ | १६६ |
| यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | १५ | १६७ |
| यदिदं किं च जगत्सर्वम् | ,, | २ | ... | ३ | ... | ... | ... | २ | १५८ |
| यदेवेह तदमुत्र | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | १० | १४२ |
| यस्तु विज्ञानवान् | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ६ | १२५ |
| ,, ,, | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ८ | १२६ |
| यस्त्वविज्ञानवान् | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ५ | १२४ |
| ,, ,, | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | ७ | १२६ |
| यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २९ | ९७ |
| यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च | ,, | १ | ... | २ | ... | ... | ... | २५ | ११९ |
| यः पूर्वं तपसः | ,, | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ६ | १३९ |
| यः सेतुरीजानानाम् | ,, | १ | ... | ३ | ... | ... | ... | २ | १२२ |
| य एवं विद्वान् प्राणम् | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ११ | २०१ |
| यच्चित्तस्तेनैष प्राणम् | ,, | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | १० | २०१ |
| यथा सम्राडेव | ,, | ... | ... | ... | ... | ३ | ... | ४ | १९६ |
| यदा त्वमभिवर्षसि | ,, | ... | ... | ... | ... | २ | ... | १० | १९१ |
| यदुच्छ्वासनिःश्वासौ | ,, | ... | ... | ... | ... | ४ | ... | ४ | २०६ |
| यः पुनरेतं त्रिमात्रेण | ,, | ... | ... | ... | ... | ५ | ... | ५ | २१६ |
| यत्तदद्रेश्यमग्राह्यम् | मुण्डक० | ... | २ | ... | १ | ... | ... | ६ | २३३ |
| यथा नद्यः स्यन्दमानाः | ,, | ... | ३ | ... | २ | ... | ... | ८ | २७९ |
| यथोर्णनाभिः सृजते | ,, | ... | १ | ... | १ | ... | ... | ७ | २३४ |
| यदर्चिमद्यदणुभ्यः | ,, | ... | २ | ... | २ | ... | ... | २ | २५७ |
| यदा पश्यः पश्यते | ,, | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | ३ | २६६ |
( ५३७ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यदा लेलायते ह्यर्चिः | मुण्डक० | ... | १ | ... | २ | ... | ... | २ | २३८ |
| यं यं लोकं मनसा | ,, | ... | ३ | ... | १ | ... | ... | १० | २७२ |
| यः सर्वज्ञः सर्ववित् | ,, | ... | १ | ... | १ | ... | ... | ९ | २३६ |
| ,, ,, | ,, | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ७ | २६१ |
| यस्मिन् द्यौः पृथिवी | ,, | ... | २ | ... | २ | ... | ... | ५ | २५९ |
| यस्याग्निहोत्रमदर्शम् | ,, | ... | १ | ... | २ | ... | ... | ३ | २३८ |
| यत्र सुप्तः | माण्डू० | ... | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | २८८ |
| यदेतद्धृदयं मनश्चैतत् | ऐत० | ३ | ... | ... | १ | ... | ... | २ | ३२६ |
| यतो वाचो निवर्तन्ते | तैत्ति० | ... | ... | २ | ... | ... | ९ | १ | ४०३ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ४ | १ | ३८१ |
| यथाऽऽपः प्रवता | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | ५ | ३४५ |
| यद् वै तत्सुकृतम् | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ७ | २ | ३९१ |
| यदा ह्येवैष | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ७ | ३ | ३९२ |
| ,, ,, | ,, | ... | ... | २ | ... | ... | ७ | ४ | ३९२ |
| यशो जनेऽसानि स्वाहा | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | ४ | ३४४ |
| यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः | ,, | ... | ... | १ | ... | ... | ४ | १ | ३४१ |
| यदाऽऽत्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वम् | श्वे० | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १५ | ४५७ |
| य एको जालवानीशत ईशनीभिः | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | १ | ४५९ |
| यस्मात्परं नापरमस्ति | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | ९ | ४६५ |
| य एकोऽवर्णो बहुधा | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १ | ४७३ |
| यदातमस्तन्न दिवा | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १८ | ४८६ |
| यच्च स्वभावं पचति | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ४९३ |
| यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभिः | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १० | ५१० |
| यदा चर्मवदाकाशं | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | २० | ५१८ |
| यस्य देवे पराभक्तिः | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | २३ | ५२० |
( ५३८ )
| मन्त्रप्रतीकानि | उ० | अ० | मु० | व० | खं० | प्र० | अनु० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तम् | श्वे० | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १४ | ४५६ |
| या प्राणेन सम्भवति | कठ० | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ७ | १४० |
| या ते तनूर्वाचि | प्रश्न० | ... | ... | ... | ... | २ | ... | १२ | १९२ |
| या ते रुद्र शिवा | श्वे० | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ४६२ |
| यामिषुं गिरिशन्त हस्ते | ,, | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | ६ | ४६३ |
| युञ्जते मन उत युञ्जते | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ४४९ |
| युजे वां ब्रह्म पूर्व्यम् | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | ५ | ४४९ |
| युञ्जानः प्रथमं मनः | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १ | ४४७ |
| युक्तेन मनसा वयम् | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | २ | ४४८ |
| युक्त्वाय मनसा देवान् | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | ३ | ४४८ |
| येन रूपं रसम् | कठ० | २ | ... | १ | ... | ... | ... | ३ | १३७ |
| येयं प्रेते विचिकित्सा | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २० | ८९ |
| ये ये कामा दुर्लभाः | ,, | १ | ... | १ | ... | ... | ... | २५ | ९४ |
| येनावृतं नित्यमिदं | श्वे० | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | २ | ५०४ |
| यो वा एतामेवम् | केन० | ... | ... | ... | ४ | ... | ... | ९ | ७३ |
| योनिमन्ये प्रपद्यन्ते | कठ० | २ | ... | २ | ... | ... | ... | ७ | १५० |
| यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च | श्वे० | ३ | ... | ... | ... | ... | ... | ४ | ४६२ |
| ,, ,, | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १२ | ४८२ |
| यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येकः | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | ११ | ४८१ |
| ,, ,, | ,, | ५ | ... | ... | ... | ... | ... | २ | ४९१ |
| यो देवानामधियः | ,, | ४ | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ४८३ |
| यो ब्रह्माणं विदधाति | ,, | ६ | ... | ... | ... | ... | ... | १८ | ५१७ |
| यो देवो अग्नौ यो अप्सु | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १७ | ४५९ |
| लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वम् | ,, | २ | ... | ... | ... | ... | ... | १३ | ४५६ |
| लोकादिमग्निम् | कठ० | १ | ... | १ | ... | ... | ... | १५ | ८६ |